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Gandos = गांडोस या गांडोज: डिक्शनरी से लेकर भाषा-वैज्ञानिक से जानिए इसकी परिभाषा, किसके लिए प्रयोग किया जाता है यह ट्रेंडिंग शब्द

मूर्ख हैं वो लोग, जो कहते हैं कि TV मत देखो… TV आपको बीमार कर देगा। मैं तो न जाने कितने दिनों से TV देखता आ रहा हूँ, सर्दी-खाँसी-बुखार के अलावा कभी सीरियस बीमार हुआ हूँ, यह याद नहीं। जो मना करते हैं, उनका संदर्भ वो जानें… मैं तो ज्ञानवर्धन के लिए TV देखता हूँ, देखता रहूँगा।

चित्रहार शब्द मैंने TV से ही सीखा। चड्डी पहन के फूल भी खिल सकता है, यह TV ने ही बताया। कितना गिनाऊँ! लेटेस्ट मतलब एकदम हाल-फिलहाल में भी एक नया शब्द सिखा – Gandos. पहली बार में समझ नहीं आया, इसलिए मेरे अंदर का खोजी पत्रकार जाग गया – खोजना और खोदना शुरू कर दिया।

ऑक्सफोर्ड की मोटी और बड़ी भारी-भरकम डिक्शनरी पर भरोसा था। सबसे पहले उसे ही पलटा। निराशा हाथ लगी। अंग्रेज कहने को सिर्फ एडवांस हैं, हकीकत में हैं पिछड़े। Gandos जैसा ट्रेंडिंग शब्द भी जिस भाषा-कोष में न मिले, वो काहे का एडवांस भला!

अंग्रेजी से हारा तो हिंदी का सहारा लिया। यहाँ सफलता के करीब-करीब पहुँच गया था… लेकिन निराशा हाथ लगी। Gandos का हिंदी उच्चारण गांडोस या गांडोज तो नहीं मिला लेकिन इससे मिलता-जुलता एक शब्द मिल गया। इसलिए ऊपर लिखा कि करीब-करीब सफल हो चुका था। मेरी सर्च ‘गाँडू’ शब्द पर आकर रुक गई। 150000+ शब्दों वाली ‘नालंदा विशाल शब्द सागर’ डिक्शनरी के अनुसार गाँडू = गुदा मैथुन कराने वाला, डरपोक, बुजदिल, निकम्मा आदि होता है।

दोनों भाषाओं ने निराश ही किया एक तरीके से। थक हार कर मैंने गूगल बाबा का सहारा लिया। गूगल ने निराश नहीं किया। हूबहू Gandos शब्द खोज कर निकाल दिया। जब उस पेज को खोल कर पढ़ा तो जरूर निराशा हाथ लगी। वो इसलिए क्योंकि इस पेज में Gandos सरनेम वाले अमेरिकी परिवार की जानकारी दी गई है। इंडियन TV मीडिया में अमेरिकी परिवार पर चर्चा क्यों? इसलिए गूगल से भी धोखा ही मिला, यह कह सकते हैं।

मैं मीडिया इंडस्ट्री में काम करता हूँ। अपना धंधा ही कॉन्टैक्ट बनाए रखने पर चलता है। तो समझ लीजिए कि मेरे पास भी कुछ कॉन्टैक्ट्स हैं। शब्दकोष से थक कर गूगल पर गिरे… अंत में जब बात समझ में नहीं आई तो इन्हीं कॉन्टैक्ट्स को फोन घुमाया। बात इंडियन TV मीडिया पर पूरे दिन छाए एक शब्द की थी, तो मैंने लगभग सभी राज्यों के अपने कॉन्टैक्ट्स को फोन कर डाला। अंधेरे में चलाया तीर गुजरात और महाराष्ट्र में जाकर लगा सटीक निशाने पर।

गुजराती भाषा पर पकड़ रखने वाले प्रोफेसर लिंकन से जब हमने बात की तो उन्होंने विस्तार से इस शब्द की व्याख्या की। उन्होंने बताया कि गुजराती भाषा में ‘Gandos’ का सीधा-सीधा अर्थ है ‘पागल’। Gando यानी गाँडो (ગાંડો) का अर्थ ही है पागल या ऐसा व्यक्ति जिसके पास दिमाग नहीं है, या फिर दिमाग है पर उसका उपयोग नहीं करता।

जब गुजरात के सौराष्ट्र इलाके का कोई व्यक्ति अपनी स्थानीय (काठियावाड़ी) भाषा में Gandos कहता है, उसका अर्थ होता है ‘गाँडो + छे’ (ગાંડો છે) यानी ‘पागल है’ या ‘मुर्ख है’। प्रोफेसर साहब ने थोड़े कड़क अंदाज में यह भी कहा कि इस शब्द का प्रयोग गुजराती सदियों से करते आ रहे हैं। इसलिए भाजपा के किसी नेता को इसके उद्भव का श्रेय नहीं दिया जा सकता।

आपको बता दें कि प्रोफेसर लिंकन ही वो शख्स हैं, जिन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोलंड ट्रंप (Donald Trump) को गुजराती के 2-4 शब्द सिखाए थे, जिनका प्रयोग उन्होंने न सिर्फ भारत दौरे पर किया बल्कि अमेरिका में रह रहे गुजरातियों को भी अपने शब्दों से मोहित कर बंपर जीत हासिल की।

महाराष्ट्र में जिन शख्स से मैंने बात की, उन्होंने तो एक अलग आयाम ही खोल दिया। महिला सशक्तीकरण की प्रखर आवाज श्रीमती सिद्धी जी ने बताया कि यह एक गाली है, जिसका मतलब होता है – Asshole. Gandos = Asshole, ऐसा सुन कर ही मैं सदमे में चला गया। श्रीमती सिद्धी जी ने भी निराशा व्यक्त की और कहा कि बच्चे-बच्चे तक इसका प्रयोग करते हैं।

मैं तो सदमे में इसलिए था क्योंकि अगर यह इतनी गंदी गाली है तो फिर TV पर इसे क्यों चलाया जा रहा है? यह प्रश्न मेरे दिमाग में घूमने लगा। 

मीडिया मतलब सवाल। मेरे एक सवाल का जवाब मिल गया तो दूसरा सर पर नाचने लगा। यह पोस्टर को गौर से देखने के बाद हुआ। मैंने अपने सूत्रों से पोस्टर बनाने वाले को खोज निकाला। उन्होंने तो अलग ही कहानी सुना डाली। उन्होंने अपने काम को भाषा से कई स्टेप ऊपर जाकर आध्यात्म और दर्शन से जुड़ा बताया। 

उनके अनुसार पोस्टर बना कर उन्होंने सिर्फ कर्म किया है, तत्पश्चात फल पर उनका कोई अधिकार नहीं है। पोस्टर भी उन्होंने तभी बना डाला था, जब कॉन्ग्रेस वालों ने मोदी और अडानी को जोड़ कर एक फोटो बनाई थी, जिसका नाम दिया था “मोडानी”। इसी तर्क के आधार पर उन्होंने गाँधी और सोरोस को मिला कर एक पोस्टर तैयार किया था। उन्होंने कहा कि यह राहुल गाँधी के कर्मों का फल है कि लोग पोस्टर पर लिखे शब्द का अलग-अलग मतलब निकाल रहे हैं।

इतने गंभीर उत्तर के बाद मैंने दोबारा उस TV क्लिप को देखा। इसमें GANDOS लिखा एक पोस्टर है। पोस्टर में एक फोटो भी है। फोटो में एक शख्स है। उसके आधे चेहरे में बकरे जैसी इस्लामी दाढ़ी है, आधे में कोई ठरकी बुड्ढा दिख रहा है। फोटो को पूर्णता में देखते-समझते हुए मैं भी जोर से बोल उठा – यही है GANDOS… और नींद खुल गई।, बीवी से अत्यधिक TV देखने और बड़बड़ाने के लिए डाँट पड़ी सो अलग।

‘जिसने की मेरी शिकायत, उसे छोड़ूँगा नहीं’: बशीर ने थाने के बाहर ही पुलिसकर्मी पर किया चाकू से हमला… लोगों को याद आया गोरखनाथ मंदिर हमले का आतंकी मुर्तजा अब्बासी

राजस्थान के टोंक जिले में एक मुस्लिम युवक ने थाने के सामने ही पुलिस कांस्टेबल पर हमला कर दिया। इस हमले का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। पुलिसकर्मी को चाकू मारने वाले नाम मोहम्मद बशीर उर्फ़ सद्दाम है घटना रविवार (8 दिसंबर,2024) की है। पुलिस ने बताया है कि उन्होंने बशीर के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई कर दी है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, घटना टोंक जिले के कोतवाली नगर इलाके की है। इस क्षेत्र में रहने वाले सद्दाम नाम से चर्चित मोहम्मद बशीर को उपजिलाधिकारी (SDM) ने पेश होने का नोटिस दिया था। रविवार को वही नोटिस ले कर सद्दाम गुस्से से तमतमाते हुए थाने पहुँचा। गेट पर एक पुलिस कॉन्स्टेबल खड़ा था। सद्दाम ने उससे पूछा, “किसने मेरी शिकायत की है? मैं उसे छोड़ूँगा नहीं।” बताया जा रहा है कि सिपाही कुछ जवाब दे पाता उस से पहले ही सद्दाम ने उस पर हमला बोल दिया।

बशीर मोहम्मद एक चाकू छिपा कर लाया था। उसी से उसने पुलिसकर्मी पर वार किए चाकू से बचने के लिए पुलिसकर्मी ने बशीर का हाथ पकड़ा। बशीर ने पुलिसकर्मी को जमीन में गिरा दिया। यह हमला सड़क पर दिनदहाड़े हुआ। हमले के दौरान बशीर जोर-जोर से चिल्ला रहा था जबकि कॉन्स्टेबल अपने बचाव में लगा था।

कुछ ही समय के अंदर आसपस से गुजर रहे कुछ लोगों व अन्य पुलिसकर्मी भी घटनास्थल पर पहुँच गए। उन्होंने बशीर को सिपाही से अलग किया। आरोपित को कस्टडी में ले लिया गया। किसी राहगीर ने इस घटना का पूरा वीडियो बना कर सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया। टोंक पुलिस के मुताबिक मामले में जरूरी कानूनी कार्रवाई की गई है। गौरतलब है कि ऐसे ही मुर्तजा अहमद अब्बासी ने गोरखनाथ मंदिर में हमला करके PAC जवानों को घायल कर दिया था।

जनेऊ पहनने वाला प्रह्लाद अमेरिका में कैसे बन गया कट्टर, पहनता है इस्लामी आतंकियों जैसे कपड़े: करने गया था PhD, अब MIT कैंपस में घुसने पर भी लगी रोक

अमेरिका के मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) में पढ़ाई करने वाले भारतीय मूल के छात्र प्रह्लाद अयंगर को फिलिस्तीन के पक्ष में एक पत्रिका में निबंध लिखने के बाद उसके कॉलेज में घुसने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। उसे जनवरी 2026 तक के लिए निलंबित किया गया है। इसके कारण उसकी 5 साल की NSF फ़ेलोशिप समाप्त हो गई है। वहीं, एमआईटी कोलिशन अगेंस्ट अपार्थाइड (MCAA) उसके समर्थन में आया है और उसके निलंबन को परिसर में फ्री स्पीच पर हमला बताया है।

प्रह्लाद इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग एवं कंप्यूटर साइंस विभाग में Ph.D का छात्र है। साल 2023 में उसे फिलिस्तीन समर्थक रैलियों में भाग लेने के लिए निलंबित कर दिया गया था। एमआईटी के ‘छात्र जीवन’ के डीन डेविड वॉरेन रैंडल द्वारा पत्रिका के संपादकों को एक ईमेल भेजा गया, जिसमें कहा गया कि ऑन पैसिफ़िज़्म नामक निबंध में प्रहलाद द्वारा इस्तेमाल की गई फोटो और भाषा को ‘एमआईटी में विरोध के अधिक हिंसक या विनाशकारी रूपों के आह्वान के रूप में व्याख्या किया जा सकता है।’

ईमेल में निबंध में इस्तेमाल की गई तस्वीरों का भी हवाला दिया गया है, जिसमें यूएस स्टेट डिपार्टमेंट द्वारा आतंकवादी संगठन घोषित ‘पॉपुलर फ्रंट फॉर द लिबरेशन ऑफ फिलिस्तीन’ का लोगो भी शामिल है। इस पत्रिका के संपादकों को अनुशासनात्मक कार्रवाई का सामना करना पड़ रहा है। WBUR से बात करते हुए प्रह्लाद ने अपने निलंबन को फ्री स्पीच का घोर उल्लंघन बताया। अयंगर के अनुसार, “पत्रिका का उद्देश्य हमारे शब्दों में यह बताना था कि हम क्या कर रहे थे, हम ऐसा क्यों कर रहे थे और कैंपस में क्या हो रहा था।”

MCAA ने एक बयान में कहा कि निलंबन वास्तव में निष्कासन है, क्योंकि इससे अयंगर का शैक्षणिक करियर बाधित होगा। उसने आगे कहा कि उसके उसकी प्रवेश की अनुमति उसी पैनल द्वारा दी जानी चाहिए, जिसने उन्हें निलंबित किया था। MCAA ने कहा, “प्रह्लाद अब चांसलर के समक्ष अपने मामले की अपील कर रहा है, ताकि उसके खिलाफ लगाए गए अन्यायपूर्ण प्रतिबंधों को रद्द या कम किया जा सके।”

संस्था ने आगे कहा, “हमने एमआईटी के प्रशासन पर दबाव डालने के लिए एक अभियान शुरू किया है, ताकि इतिहास के सही पक्ष पर खड़े छात्रों का अपराधीकरण बंद किया जा सके। हम सभी संगठनों और संस्थानों से आह्वान करते हैं कि वे इसमें शामिल हों और एमआईटी के दमन के खिलाफ खड़े हों।”

वह निबंध जिसके कारण प्रह्लाद को निलंबित कर दिया गया

ऑपइंडिया ने ऑनलाइन पत्रिका के लिए लिखे प्रह्लाद अयंगर के निबंध की जाँच की। यह निबंध 7 अक्टूबर 2023 को फिलिस्तीनी आतंकी संगठन हमास द्वारा इजरायल में किए गए आतंकी हमले के जवाब में इजरायल की सैन्य कार्रवाई का विरोध किया गया था और उसके खिलाफ फिलिस्तीन आंदोलन का समर्थन करने के लिए लिखा गया था।

अपने निबंध में प्रह्लाद ने फिलिस्तीनी मुक्ति आंदोलन के भीतर शांतिवादी रणनीतियों पर निर्भरता की आलोचना की थी। उसने एमआईटी सहित संस्थानों में विरोध प्रदर्शनों के उद्देश्य को लेकर सवाल उठाए थे। निबंध में अयंगर ने ‘रणनीतिक शांतिवाद’ को अप्रभावी बताया था। उसकी भाषा और रूपरेखा को विश्वविद्यालय परिसरों में विघटनकारी रूपों की वकालत के रूप में व्याख्या की जा सकती है।

प्रह्लाद ने विशेष रूप से ‘रणनीति की विविधता’ की अपील की और प्रतीकात्मक विरोध को अप्रभावी बताया था। उसका निबंध फिलिस्तीन आंदोलन के लिए अपनी आवाज़ उठाने वाले एक्टिविस्ट को चुनौती देता हुआ प्रतीत होता है कि वे ऐसे कार्यों पर विचार करें जो ‘अहिंसा’ तक सीमित ना रहे।

अयंगर के अनुसार, पारंपरिक शांतिवादी दृष्टिकोण सीमित है और इससे अपेक्षित प्रभाव हासिल नहीं होता। उसका मानना था कि यह ‘उस प्रणाली में डिज़ाइन किया गया है जिसके खिलाफ हम लड़ते हैं’। उसने आगे कहा कि शांतिपूर्ण रैलियाँ और गिरफ्तारियाँ एक दिखावा है। ये राजनीतिक नाटक का एक उदाहरण है, जो अपने लोगों की अंतरात्मा को शांत करने के लिए अधिक काम करता है, न कि उस इकाई से कुछ हासिल करने के लिए जो उसी उत्पीड़न को अंजाम दे रही है जिसका वे विरोध कर रहे हैं।

दिलचस्प बात यह है कि प्रह्लाद अयंगर ने युद्ध में इस्तेमाल की जाने वाली तकनीकों के लिए एक सैन्य ठेकेदार और योगदानकर्ता के रूप में इसकी भूमिका को उजागर करके एमआईटी के खिलाफ ही द्वार खोल दिए। उसने तर्क दिया कि शांतिवाद से संस्थागत मिलीभगत को चुनौती नहीं दिया जा सकता। इससे विरोध प्रदर्शनों के लिए अधिक टकरावपूर्ण दृष्टिकोणों की गुंजाइश बनी रहती है।

अपने निबंध में उसने लिखा, “हमारे कार्य किसी राज्य के विरोध की अंतर्निहित धारणा का हिस्सा हैं – हम एक तरह से सांस्कृतिक रूप से शांत हैं, न कि जानबूझकर शांतिवादी।” यह धारणा बताती है कि प्रतीकात्मक गिरफ़्तारियाँ सरकार की दमनकारी सिस्टम को रोकने में सक्षम नहीं है। इसे ऐसी रणनीति के रूप में देखा जा सकता है, जिसे सरकार आसानी से समायोजित नहीं कर सकता है।

उसने कार्रवाई के अधिक आक्रामक रूपों में शामिल करने की अनिच्छा का आलोचना की और लोगों को उकसाते हुए कहा, “एक भयानक नरसंहार के एक वर्ष बाद अब समय आ गया है कि आंदोलन तबाही मचाना शुरू कर दे, अन्यथा जैसा कि हमने देखा है यह सब वास्तव में हमेशा की तरह ही चलता रहेगा।” इस तरह अयंगर ने विरोध को हिंसक बनाने के लिए उकसाया।

ऑपइंडिया ने पाया कि प्रह्लाद ने आतंकवादी संगठन पॉपुलर फ्रंट फॉर द लिबरेशन ऑफ फिलिस्तीन के लोगो वाले दो पोस्टर इस्तेमाल किए। इसके साथ ही ‘हर जगह इंतिफ़ादा’ का आह्वान करते हुए एक पोस्ट भी इस्तेमाल किया। दरअसल, इंतिफ़ादा इजरायल के खिलाफ़ फिलिस्तीन की सशस्त्र कार्रवाई (जिसमें आतंकवादी गतिविधियाँ भी शामिल हैं) है। सबसे पहले जो पोस्टर दिखाया गया, उसमें लिखा था, “हम तुम्हारे पैरों के नीचे की ज़मीन जला देंगे”। पोस्टर में एक PFLP आतंकवादी को हथियार के साथ दिखाया गया था।

Source: Written Revolution

प्रह्लाद अयंगर द्वारा इस्तेमाल किए गए दूसरे पोस्टर पर अरबी भाषा में लिखा था, “रक्त की एकता: विजय की राह पर एक कदम। यहूदी आतंकवाद के खिलाफ संयुक्त लेबनानी-फिलिस्तीनी संघर्ष अमर रहे।” ये दोनों पोस्टर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर साझा किए गए हैं। डीन ने अपने पत्र में कहा है कि ऐसे पोस्टरों के इस्तेमाल को परिसरों में हिंसक विरोध प्रदर्शन के आह्वान के रूप में देखा जा सकता है।

Source: Written Revolution

कुछ सालों में बदल गया प्रह्लाद अयंगर

प्रह्लाद के फेसबुक और इंस्टाग्राम प्रोफाइल पर शेयर किए गए पोस्ट पर नज़र डालने से पता चलता है कि पहले वह एक खुशमिजाज़ लड़का था, जिसे घूमना-फिरना और अपने दोस्तों के साथ समय बिताना पसंद था। उसका फेसबुक प्रोफाइल साल 2019 में यूरोप भर में अपने दोस्तों के साथ यात्रा करने वाली तस्वीरों से भरा पड़ा था।

हालाँकि, जॉर्ज फ्लॉयड की मौत के बाद ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ आंदोलन के दौरान चीजें बदल गईं। मई 2020 में उसने एक डार्क-थीम वाली पोस्ट की। उसमें उसने दावा किया कि फ्लॉयड की मौत के बाद पुलिस की बर्बरता के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के दौरान अटलांटा में उथल-पुथल मचने पर उसने विचार किया। उसने निष्क्रिय समर्थन से सक्रिय भागीदारी की ओर बढ़ा और अराजकता को स्वीकार किया।

Source: Prahlad’s Facebook page

यह वह समय था, जब अचानक उनकी प्रोफ़ाइल बदल गई और वह एक ऐक्टिविस्ट बन गया। वह विरोध प्रदर्शनों में भाग लेने लगा। फिर फ़िलिस्तीनी मुद्दे के लिए विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। हमास के खिलाफ़ इज़रायल की सैन्य कार्रवाई के बाद से वे फ़िलिस्तीनी समर्थक आंदोलन करने लगे। प्रह्लाद अयंगर इसमें भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने लगा।

Source: Prahlad’s Facebook page

प्रह्लाद भारतीय मूल का एक साधारण और जनेऊधारी ब्राह्मण लड़का था, जो अपने जीवन से प्यार करता था। हालाँकि, कैंपस एक्टिविज्म और कैंपस में छात्रों के घोर कट्टरपंथीकरण ने उसका पूरा जीवन बदल दिया। इसके कारण वह प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में से एक एमआईटी से निलंबित कर दिया गया है।

(इस लेख को मूलत: अंग्रेजी में अनुराग ने लिखा है। आप इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं।)

41 दंगाई गिरफ्तार, 450 पत्थरबाजों की हुई पहचान… नकली पत्रकार असीम रज़ा की भी खुली कलई: दंगे के बाद संभल के उपद्रवियों को बचा नहीं पा रहा ‘नकाब’

उत्तर प्रदेश के संभल जिले में 24 नवंबर, 2024 को हुई हिंसा के बाद पुलिस ने दंगाइयों के खिलाफ अपनी कार्रवाई तेज कर दी है। पुलिस ने इस कार्रवाई में 41 दंगाई गिरफ्तार किए गए है। पुलिस ने लगभग 450 पत्थरबाजों को CCTV फुटेज व अन्य माध्यमों से चिन्हित किया है। इनकी तलाश जारी है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, संभल पुलिस ने 50 और उपद्रवियों की पहचान कर ली है। अब तक 450 ऐसे ही उपद्रवियों की पहचान हो चुकी है। इनमें से 100 के नाम भी पुलिस को पता चल गए हैं। संभल में हिंसा करने वाले दंगाइयों की पहचान में इसलिए भी समय लग रहा है क्योंकि उन्होंने हमले के वक्त नकाब पहन रखा था। संभल हिंसा मामले में हाल ही में एक पत्रकार को भी गिरफ्तार किया था। उसके बारे में भी कई जानकारियाँ सामने आई हैं।

पहले दी पुलिस को धमकी, फिर माफ़ी

संभल पुलिस ने 6 दिसंबर, 2024 को एक फर्जी पत्रकार असीम रज़ा जैदी को गिरफ्तार किया था। असीम जैदी हिंसा के बाद भड़काऊ वीडियो शेयर कर रहा था। उसने मुस्लिमों को इकट्ठा किया था और उन्हें उकसा रहा था। इस संबंध में सूचना संभल पुलिस को दी गई थी।

उसको रोकने के लिए जब पुलिस पहुँची तो वह धमकाने पर उतर आया। उसने सब इंस्पेक्टर संजीव को तक धमकी दे डाली। असीम जैदी ने सब इंस्पेक्टर जैदी से कहा, “मुझे जानते नहीं हो। मैं पत्रकार हूँ। अपनी एक खबर से तुमको बर्खास्त करवा दूँगा।” असीम ने ऊपर के अधिकारियों से भी दारोगा की शिकायत की धौंस दी। इसके बाद असीम को गिरफ्तार कर लिया गया।

असीम के खिलाफ इसके बाद पुलिस ने ही FIR दर्ज की। ऑपइंडिया के पास FIR कॉपी मौजूद है। पुलिसकर्मियों ने इसके बाद असीम जैदी के दावों का सत्यापन भी करवाया कि आखिर वह कहाँ का पत्रकार है। जब असीम के बताए संस्थान से पूछा गया तो उन्होंने बताया कि वह उनका कर्मचारी नहीं है।

पोल-पट्टी खुल जाने के बाद असीम जैदी पुलिस के आगे गिड़गिड़ा कर माफ़ी माँगने लगा। उसने यह भी माना कि वह पत्रकारिता के नाम पर फर्जीवाड़ा कर धंधा चला रहा था। असीम रजा के ऊपर अब फर्जीवाड़े समेत बाकी धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया है।

संवेदनशील इलाकों में हो रही घरों की तलाशी

संभल हिंसा के बाद पुलिस सतर्क को गई है। पुलिस की टीमें संवेदनशील मोहल्ले में चिन्हित किए गए घरों की तलाशी ले रहीं हैं। इसी तलाशी के दौरान सोमवार (10 दिसम्बर, 2024) को कई घरों से नशे की खेप और अवैध हथियार बरामद हुए थे।

तलाशी का यह अभियान नखासा के उस इलाके में चलाया गया था जहाँ सांसद जियाउर्रहमान बर्क का घर है। इसी कार्रवाई में मुल्ला आसिफ, महबर और ताजवर के परिजनों को पूछताछ के लिए थाने में तलब किया गया था। गौरतलब है कि 24 नवंबर को कोर्ट के आदेश पर जामा मस्जिद का सर्वे करने पहुँची टीम पर अल्लाह हू अकबर चिल्लाती मुस्लिम भीड़ ने हमला बोल दिया था। इस हमले में लगभग 2 दर्जन पुलिसकर्मी घायल हो गए। घायलों में डिप्टी कलेक्टर और DSP भी शामिल हैं।

‘भगवान के दर्शन करने आते हैं श्रद्धालु, CM-मंत्रियों की चेहरे देखने नहीं’, केरल हाई कोर्ट ने मंदिरों से वामपंथी सरकार के नेताओं के बैनर हटाने का दिया आदेश

केरल हाई कोर्ट ने त्रावणकोर देवस्थानम बोर्ड(TDB) को मंदिर प्रांगण में मुख्यमंत्री, मंत्री या नेताओं के पोस्टर-बैनर लगाने पर कड़ी फटकार लगाई है। हाई कोर्ट ने कहा है कि TDB अपने आप को मंदिरों का मालिक ना समझे। कोर्ट ने कहा कि मंदिरों में श्रद्धालु भगवान के दर्शन करने आते हैं ना कि मुख्यमंत्री या मंत्रियों के चेहरे देखने। कोर्ट ने ऐसे बैनर-होर्डिंग तुरंत हटाने को कहा है।

केरल हाई कोर्ट की जस्टिस अनिल के नरेन्द्रन और जस्टिस मुरली कृष्णा एस की बेंच ने एक स्वतः संज्ञान वाले मामले में मंगलवार (10 दिसम्बर, 2024) को सुनवाई करते हुए यह टिप्पणियाँ की। यह मामला केरल के अलप्पुझा जिले से जुड़ा हुआ था। यहाँ एक सबरीमला देवस्थान में एक फ्लेक्स बैनर लगाया गया था।

इस बैनर में केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन, देवासम मामलों के मंत्री, स्थानीय विधायक और मंदिर के बोर्ड के सदस्य की तस्वीरें थी। इसको लेकर एक शिकायत भी की गई थी। इस पोस्टर में वामपंथी सरकार को इस बात की बधाई दी गई थी कि उसने सबरीमला के भक्तों के लिए अन्नदानम की अनुमति दी है। इसकी अनुमति वर्तमान वर्ष के सबरीमला यात्रा आयोजन को लेकर दी गई थी। यह बैनर थूरावूर मंदिर प्रांगण के भीतर लगाया गया था।

हाई कोर्ट ने इसको लेकर कहा, “इस तरह की गतिवधियों की अनुमति नहीं दी जा सकती। आप (TDB) इस मुगालते में मत रहे कि वह मंदिरों के मालिक हैं। बोर्ड सिर्फ उनके न्यासी (ट्रस्टी) हैं और मंदिरों का प्रबन्धन करते हैं… मंदिर में श्रद्धालु भगवान का दर्शन करने आते हैं ना कि मुख्यमंत्रियों या मंत्रियों का चेहरा देखने।”

हाई कोर्ट ने कहा कि ऐसे बैनर-पोस्टर TDB के पैसे से नहीं लगाए जाने चाहिए क्योंकि ये उसके अधिकार क्षेत्र का मामला नहीं हैं। हाई कोर्ट ने मंदिर में बैनर पोस्टर लगाने पर रोक लगा दी है। हाई कोर्ट ने TDB को यह भी आदेश दिया कि वह इस देवस्थानम में श्रद्धालुओं के लिए अच्छी व्यवस्थाएँ करे ताकि उन्हें समस्या ना हो।

‘भारत जाना है तो करो खालिस्तान से किनारा, कहो- भारत की करता हूँ इज्जत’: कनाडा के GlobalNEWS ने छापा, बूढ़े माँ-बाप के नाम पर भी रहम की भीख नहीं

भारत कनाडा के सिखों को वीजा देने के बदले उनसे खालिस्तान से किनारा करने को कहता है। खालिस्तान समर्थक सिखों से कहा जाता है कि वह एक ऐसे कागज पर हस्ताक्षर करें जिसमें भारत की एकता और अखंडता का पूर्ण समर्थन किया गया हो। ऐसा ना करने वाले सिखों को बड़ी समस्याओं पर भी भारत आने का वीजा नहीं दिया जाता। यह सभी दावे कनाडा के ग्लोबल न्यूज ने एक रिपोर्ट में किए हैं। ग्लोबल न्यूज की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि पहले वीजा को मना कर दिया जाता है और फिर इस पत्र पर हस्ताक्षर करने को मजबूर किया जाता है।

क्या कहा ग्लोबल न्यूज ने?

कनाडा के ग्लोबल न्यूज ने ‘तहकीकात: वीजा बन गए हैं भारत के विदेशी दखल का हथियार’ नाम की एक रिपोर्ट मंगलवार (10 दिसम्बर, 2024) को छापी है। इस रिपोर्ट को स्टीवर्ट बेल और जेफ़ सेम्पल ने तैयार किया है। इसमें एक कनाडाई सिख के हवाले से बताया गया है कि कैसे 2016 में जब उसने भारत आने के लिए वीजा की माँग की तो पहले उसे मना कर दिया गया और फिर एक पत्र पर हस्ताक्षर करने को कहा गया जिसमें खालिस्तान का विरोध करने की बात थी।

ग्लोबल न्यूज की रिपोर्ट में बिक्रमजीत सिंह संधर का जिक्र है। संधर कथित तौर पर 2016 में भारत आना चाहता था। यहाँ उसे अपने बूढ़े और बीमा दादा को देखना था तथा साथ ही में एक पारिवारिक समारोह में शामिल होना था। संधर ने ग्लोबल न्यूज को दिए इंटरव्यू में दावा किया कि उसका वीजा कनाडा में स्थित भारत के दूतावास ने उसे वीजा देने से मना कर दिया। संधर के दावे के अनुसार, भारतीय दूतावास ने उसका वीजा इसलिए रोका क्योंकि वह एक गुरूद्वारे का मुखिया रहने के दौरान खालिस्तान की वकालत करता था।

संधर, जिन्होंने ग्लोबल न्यूज में वीजा सम्बन्धी आरोप लगाए हैं (फोटो साभार: Global News)

संधर उसी सरे के गुरूद्वारे का मुखिया था जहाँ 2023 में खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर को मार दिया गया था। संधर ने दावा किया कि वीजा को मना किए जाने के बाद उनको एक कागज दिया गया, जिसमें भारत को महान और लोकतांत्रिक देश बताया गया था। उनसे इस कागज पर हस्ताक्षर करने को कहा गया था। संधर ने दावा किया कि इस पत्र में उनको इस बात की घोषणा भी करनी थी कि कि वह खालिस्तान का समर्थन नहीं करते हैं तथा भारत की एकता था संप्रुभता का पूरा सम्मान करते हैं।

ग्लोबल न्यूज की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि भारतीय दूतावास के अधिकारी लगातार कई लोगों से ऐसे ही कागजों पर हस्ताक्षर करने को कहते हैं। रिपोर्ट में दावा किया गया कि यह वीजा इसलिए अस्वीकार किए जाते हैं क्योंकि भारत को खालिस्तान समर्थक सिखों के बयान पसंद नहीं आते। दावा किया गया है कि भारतीय दूतावास सिख समुदाय के प्रभावशाली लोगों को इस कागज पर हस्ताक्षर जरूर करने को कहता है क्योंकि उनकी बात बाकी सिख सुनते हैं।

‘पहले वीजा को मना करते हैं, फिर किसी से मिलवाते हैं’

ग्लोबल न्यूज की रिपोर्ट में दावा है कि वीजा अस्वीकार किए जाने के कुछ दिन बाद बाद इन सिखों या कनाडाई नागरिकों को कुछ ऐसे लोगों से सम्पर्क करने को कहा जाता है, जो भारत समर्थक माने जाते हैं। संधर ने दावा किया कि वीजा को लेकर मना किए जाने के कुछ दिन बाद उन्हें मनप्रीत सिंह गिल नाम के एक शख्स से मिलने को कहा गया था। मनप्रीत गिल भी उसी इलाके के निवासी हैं जहाँ सरे गुरुद्वारा है। संधर ने कहा कि गिल ने उनसे एक कागज पर हस्ताक्षर की बात कही थी।

मनप्रीत गिल ‘इंडिया रेडियो’ नाम से एक रेडियो चैनल चलाते हैं और भारत के पक्ष में विचार रखते हैं। मनप्रीत सिंह गिल ‘फ्रेंड्स ऑफ़ कनाडा एंड इंडियन फाउंडेशन’ नाम से एक संगठन भू चलाते हैं, जो भारत और कनाडा के रिश्ते मजबूत करने के लिए प्रयास करता है। गिल ने सिखों को वीजा के मामले में मदद करने की बात स्वीकारी है। गिल ने कहा कि उनके भारत के साथ अच्छे रिश्ते हैं और यह कोई अपराध नहीं है। गिल ने ट्रूडो पर भारत के साथ रिश्तों को रसातल में ले जाने के आरोप भी जड़े हैं।

भारत कनाडा वीजा खालिस्तान
वीजा में मदद करने वाले मनप्रीत गिल (फोटो साभार: Global News)

गिल ने कहा,” मेरे दरवाजे सबके लिए खुले हैं। लोग मेरे पास मदद मांगने आते हैं, कभी-कभी किसी का भारत में कोई रिश्तेदार मर रहा होता है, किसी का शोषण किया जा रहा होता है क्योंकि उनके पास भारत जाने के लिए पूरे कागज नहीं होते… मैं उनको सलाह देता हूँ, उन्हें जानकारी देता हूँ। मैंने कभी इस बात से मना नहीं किया कि मेरे भारतीय दूतावास के साथ अच्छे संबंध हैं।”

पत्र में क्या लिखा?

जिस कागज पर हस्ताक्षर करवाने के दावे ग्लोबल न्यूज ने किए हैं, उसका एक नमूना भी अपनी खबर में पेश किया है। इस कागज पर लिखा, “मैं कभी किसी अपराध में शामिल नहीं रहा या मुझ पर कोई आरोप नहीं लगा है… मैंने अपनी मातृभूमि के खिलाफ कोई गलत काम नहीं किया है। मेरे मन में हमेशा भारत और उसके नागरिकों के लिए सम्मान और स्नेह रहा है। मैंने कभी भी खालिस्तान या भारत के खिलाफ किसी अन्य आंदोलन का समर्थन नहीं किया है।”

भारत कनाडा वीजा खालिस्तान
वह कथित पत्र, जिसे हस्ताक्षर करने को कहा जाता है (साभार: Global news)

इस पत्र में लिखा है, “मेरा विश्वास है कि भारत एक महान संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य है और मैं उन आदर्शों का सम्मान करता हूँ जिन पर भारतीय संविधान आधारित है। हालाँकि, मैं कनाडा में रहता हूँ, फिर भी मैं भारत से प्यार करता हूँ। मैं भारत की संप्रभुता और अखंडता में दृढ़ विश्वास रखता हूँ। मैं यह घोषणा करता हूँ कि यह सच है और यह जानते हुए कि ये कनाडा के कानून के अंतर्गत भी आता है।”

सही है भारत का यह कदम

ग्लोबल न्यूज का कहना है कि भारत खालिस्तान समर्थकों को वीजा ना देकर गलत कर रहा है। उन्होंने इसे ‘विदेशी हस्तक्षेप’ करार दिया है। भारत ने इस संबंध में कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया है। भारत संभवतः ऐसे काम करता भी नहीं है। हालाँकि, कोई भी देश उनको वीजा नहीं देता, जो उसकी संप्रभुता को खत्म करने पर तुले हों और उसके टुकड़े करना चाहते हों। खालिस्तानी लगातार कनाडा या बाकी देशों में बैठ कर भारत में हिंसा भड़काने और इसे तोड़ने की साजिश रचते आए हैं। ऐसे में उन तत्वों को वीजा दिया ही नहीं जा सकता, जो ऐसी बातें करते हों।

सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि हर देश किसी भी व्यक्ति को वीजा देने से पहले उसकी पृष्ठभूमि जाँचता है। जिस प्रकार कनाडा या अमेरिका में 9/11 हमले के आतंकियों या उसका समर्थन करने वालों को वीजा नहीं दिया जाएगा, उसी तरह भारत को भी इस बात का पूरा हक़ है कि वह यहाँ देश तोड़ने वालों को अपनी सीमा के भीतर ना घुसने दे। गौरतलब है कि कनाडा लगातार खालिस्तानी आतंकियों को प्रश्रय देता है। यह खालिस्तानी आतंकी भारतीय दूतावास को निशाना बनाते हैं और मंदिरों पर तक हमला करते हैं।

भारत और कनाडा के बीच लगातार बीते कुछ समय से रिश्ते ठीक नहीं है। यह रिश्ते कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो के आतंकियों के समर्थन में भारत पर आरोप लगाने के बाद बिगड़े हैं। भारत ने बीते कुछ दिन पहले कनाडा के 6 राजनयिकों को भी बाहर कर दिया था। भारत ने आरोप लगाया था कि जस्टिन ट्रूदो अपने राजनीतिक फायदे के लिए दोनों देशों के रिश्तों में दरार डाल रहे हैं। भारत ने अपने हाई कमिश्नर संजय वर्मा को भी वापस बुला लिया था।

तौफीक ने 67 साल की दिव्यांग महिला से किया रेप, फिर कर दी हत्या: कान में पहनीं सोने की बालियाँ भी लूटी, केरल पुलिस ने किया गिरफ्तार

केरल के तिरुवनंतपुरम में एक दिव्यांग वृद्धा की रेप के बाद हत्या कर दी गई है। पीड़िता का अर्धनग्न शव मंगलवार (10 दिसंबर 2024) को उसके अस्थाई घर में मिला। इस घटना के आरोपित के तौर पर पुलिस ने तौफीक को गिरफ्तार किया है। तौफीक लूटपाट के इरादे से वृद्धा के घर में घुसा था। उसने मृतका के शव से गहने भी उतार कर बेच दिए, जिसे जब्त कर लिया गया है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह घटना तिरुवनंतपुरम के मंगलपुरम इलाके की है। मंगलवार (11 दिसंबर 2024) की सुबह 7 बजे पुलिस को एक अस्थाई टेंट में एक महिला का अधनंगा शव पड़े होने की सूचना मिली। पुलिस तत्काल मौके पर पहुँची तो पाया कि लगभग मृतका की उम्र 67 साल की है। लाश को धोती से ढका गया था और उस पर घाव के भी निशान थे।

पड़ोस में ही रहने वाली मृतका की बहन ने लाश की पहचान की। इसके बाद पुलिस ने केस दर्ज करके जाँच-पड़ताल शुरू कर दी। पुलिस की पड़ताल में पता चला कि हत्या से पहले मृतका से रेप किया गया था। मृतका के कान से सोने की बालियाँ गायब थीं। CCTV फुटेज व अन्य माध्यमों से खोजबीन की गई तो आरोपित की पहचान तौफीक के तौर पर हुई।

तौफीक तिरुवनंतपुरम के ही पास ही स्थित पोथनकोडे का रहने वाला है। पुलिस ने जाल बिछाया और आरोपित को दबोच लिया। तौफीक की गिरफ्तारी उस समय हुई, जब वह दिव्यांग मृतका से लूटी गई ज्वैलरी को बेचकर बाजार से लौटा ही था। उसकी निशानदेही पर ज्वैलरी को भी जब्त कर लिया गया है।

खुद को किन्नर बताने वाले फरीन अहमद ने 7 साल की बच्ची से किया रेप किया, जाँच शुरू हुई तो निकला पुरुष: कोर्ट ने 20 साल के लिए भेजा जेल

उत्तर प्रदेश के बरेली जिले की एक अदालत ने सोमवार (9 दिसंबर 2024) को एक बच्ची से रेप करने वाले कथित किन्नर को 20 साल सश्रम कारावास की सजा दी। किन्नर बनकर लोगों को गुमराह करने वाले फरीन पर कोर्ट ने 12 हजार रुपए का जुर्माना भी ठोका है। फरीन 29 मार्च 2022 को 7 साल की एक बच्ची को खीरा दिलाने के बहाने ले गया और उसके रेप किया था।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, मामले की सुनवाई बरेली की पॉक्सो स्पेशल कोर्ट में हुई। लगभग ढाई साल चली सुनवाई में फरीन खुद को किन्नर बताते हुए बेगुनाह होने का दावा करता रहा। जज उमा शंकर के आदेश पर आरोपित के लिंग की जाँच हुई तो वह पुरुष निकला। यह भी पता चला कि फरीन लम्बे समय से किन्नर बनकर लोगों को गुमराह कर रहा था। पोल खुल जाने के बाद फरीन अदालत में ही रोने लगा।

किन्नर बना फरीन कोर्ट से कम सजा देने की अपील करने लगा। हालाँकि, अभियोजन पक्ष ने फरीन के अपराध को गंभीर बताते हुए अदालत से कड़ी सजा देने की माँग की। दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद न्यायाधीश ने फरीन को दोषी करार देते हुए 20 साल की सश्रम कारावास और 12 हजार रुपए जुर्माने की सजा सुनाई। पुलिस ने फरीन को अदालत से ही कस्टडी में लेकर जेल भेज दिया।

क्या था पूरा मामला

यह घटना बरेली जिले के थाना क्षेत्र मीरगंज की है। यहाँ 9 अप्रैल 2022 को 7 साल की नाबालिग बच्ची की माँ ने पुलिस में तहरीर दी थी। तहरीर में महिला ने बताया था कि 29 मार्च को उसकी बेटी TV देख रही थी। इसी दौरान इस्लामिया स्कूल के पास रहने वाला जमील अहमद का बेटा फरीन किन्नर वहाँ पहुँचा। उसने पीड़िता बच्ची को खीरा खिलाने का लालच दिया और अपने साथ ले गया।

फरीन किन्नर ने फिर बच्ची से रेप किया। उसने पीड़िता को धमकी भी दी कि अगर यह बात किसी को बताई तो वह उकी कर देगा। रेप की वजह से पीड़िता को ब्लीडिंग शुरू हो गई थी। बच्ची को अस्पताल में भर्ती करवाया गया। परिजनों की शिकायत पर पुलिस ने फरीन पर IPC (भारतीय दंड संहिता) की धारा 376A, 376B और 506 के साथ पॉक्सो एक्ट के तहत केस दर्ज करके गिरफ्तार कर लिया।

अडानी पर फर्जी रिपोर्ट देने वाला OCCRP अमेरिकी दलाल, स्वतंत्र संस्था नहीं… USAID से लेता है पैसा: वामपंथी MediaPart ने छापी खबर, भाजपा ने शेयर किया तो ‘फेक न्यूज’ बता रोने लगा

फ्रांस का वामपंथी मीडिया संस्थान मीडियापार्ट अब कथित तौर पर भारत में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) से नाराज़ है। मीडियापार्ट की नाराजगी का कारण उसी की एक रिपोर्ट का भाजपा द्वारा इस्तेमाल है। मीडियापार्ट ने हाल ही में अडानी समूह पर आरोप जड़ने वाले OCCRP पर एक रिपोर्ट छापी थी। इसमें OCCRP के लिंक अमेरिकी विदेश विभाग से जुड़े बताए गए थे। भाजपा ने इस रिपोर्ट के आधार पर कॉन्ग्रेस समेत अमेरिका को निशाने पर लिया था।

मीडियापार्ट की रिपोर्ट में बताया गया था कि अडानी समूह पर दो हिट पीस प्रकाशित करने वाले ऑर्गनाइज्ड क्राइम एंड करप्शन रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट (OCCRP) की फंडिंग का आधे से अधिक हिस्सा अमेरिकी विदेश विभाग से आता है। OCCRP खुद को एक स्वतंत्र संस्थान बताता आया है। इस रिपोर्ट के बाद स्पष्ट हुआ था कि OCCRP अमेरिका के कहने पर विदेशों में अलग-अलग कम्पनियों या सरकारों को निशाना बनाता है।

इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद भाजपा ने इसके कुछ हिस्से साझा किए थे। भाजपा ने भारत और भारतीय कम्पनियों के खिलाफ की गई बड़ी साजिश की तरफ इशारा किया था। हालाँकि, भाजपा का रिपोर्ट के कुछ हिस्से साझा करना मीडियापार्ट को पसंद नहीं आया। मीडियापार्ट ने इसको लेकर एक बयान जारी किया है।

भारत में मीडियापार्ट की रिपोर्ट पर हुए सियासी हँगामे के बाद इस पर प्रतिक्रिया देते हुए मीडियापार्ट ने 7 दिसंबर को कहा, “मीडियापार्ट OCCRP के बारे में हाल ही में प्रकाशित अपनी रिपोर्ट के पीएम मोदी का एजेंडा बढ़ाने और प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला करने के लिए भाजपा द्वारा इस्तेमाल करने की कड़ी निंदा करता है।”

मीडियापार्ट की डायरेक्टर और प्रकाशक कैरीन फाउटेउ ने कहा कि भाजपा ने फर्जी खबरें फैलाने के लिए मीडियापार्ट के लेख का गलत तरीके से फायदा उठाया है। उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा ने जिस रिपोर्ट का हवाला दिया वह मीडियापार्ट ने प्रकाशित नहीं की…भाजपा द्वारा प्रचार की जा रही साजिश की योजना के पक्ष में कोई भी तथ्य उपलब्ध नहीं हैं।” मीडियापार्ट ने इस बीच यह नहीं बताया कि भाजपा द्वारा कौन सा हिस्सा साझा किया आना साजिश के तहत आता है।

गौरतलब है कि 2 दिसंबर, 2024 को मीडियापार्ट ने ‘द हिडेन लिंक्स बिटवीन जायंट ऑफ़ इनवेस्टिगेटिव जर्नलिज्म एंड यूएस गवर्मेंट’  शीर्षक से एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी। जिसमें OCCRP के कामकाज में अमेरिकी सरकार के हस्तक्षेप की बात की गई थी। मीडियापार्ट ने इस रिपोर्ट में बताया कि OCCRP खुद को भले ही पूरी तरह से स्वतंत्र बताता है, लेकिन इसके मैनेजमेंट ने इसे अमेरिका पर पूरी तरह से निर्भर कर दिया है। मीडियापार्ट की रिपोर्ट के अनुसार, अभी भी OCCRP की फंडिंग का लगभग 50% से अधिक अमेरिकी एजेंसियाँ देती हैं।

अडानी पर हमले का OCCRP का है इतिहास

अगस्त 2023 में, ऑपइंडिया ने भविष्यवाणी की थी कि OCCRP अमेरिका स्थित शॉर्ट सेलर ‘हिंडनबर्ग रिसर्च’ के नक्शेकदम पर चलते हुए भारतीय बाजार में उथल-पुथल मचाने की योजना बना रहा है। हमने खुलासा किया था कि OCCRP को जॉर्ज सोरोस के ओपन सोसाइटी फाउंडेशन (OSF), फोर्ड फाउंडेशन और रॉकफेलर ब्रदर्स फाउंडेशन जैसी संस्थाओं से फंड मिलता है।

OSF ने संगठन की क्रॉस-बॉर्डर रिपोर्टिंग को ‘मजबूत’ करने और प्रभाव बढ़ाने के लिए संगठित OCCRP को $8,00,000 (₹6.61 करोड़) का अनुदान भी दिया। ‘पत्रकारों के नेटवर्क’ ने अब तक दो हिट लेख प्रकाशित किए हैं। एक अगस्त 2023 में और दूसरा मई 2024 में। अडानी समूह और मॉरीशस स्थित फंड ‘360 वन’ द्वारा OCCRP के इन दावों को खारिज कर दिया गया।

यहाँ तक ​​कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भी फैसला सुनाया था कि OCCRP की रिपोर्ट का इस्तेमाल सेबी द्वारा चल रही जाँच पर संदेह जताने के लिए नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बिना किसी सत्यापन के किसी संगठन की रिपोर्ट पर सबूत के तौर पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

मीडियापार्ट के खुलासे ऐसे समय में हुए हैं जब गौतम अडानी को रिश्वतखोरी के कथित आरोपों को लेकर अमेरिका में परेशान किया जा रहा है। गौरतलब है कि जिस USAID से OCCRP पैसा लेता है, वह कई देशों में सरकारें बदलने के लिए ज़िम्मेदार रहा है।

रिक्शावाले मुस्लिम भी हिंदुओं को दिखाते हैं आँख, मारते हैं ओवरटेक करने पर भी… बांग्लादेश में 79 दिन में हिंदुओं के खिलाफ 88 घटनाएँ: यूनुस सरकार ने खुद माना

बांग्लादेश ने मंगलवार (10 दिसंबर 2024) को स्वीकार किया कि शेख हसीना को पीएम पद से हटाने के बाद मुल्क में अल्पसंख्यक हिंदुओं को निशाना बताया गया। मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने माना कि अल्पसंख्यक, खासकर हिंदुओं के खिलाफ सांप्रदायिक हिंसा की 88 घटनाएँ हुई हैं। हालाँकि, ये आँकड़े वास्तविक नहीं लगते और घटनाएँ इससे कहीं ज्यादा हैं, फिर भी बांग्लादेश ने यह सच्चाई स्वीकार की।

मोहम्मद यूनुस के प्रेस सचिव शफीकुल आलम ने भी कहा कि 5 अगस्त से 22 अक्टूबर तक अल्पसंख्यकों से संबंधित घटनाओं के 88 मामले दर्ज किए गए हैं। इन घटनाओं में 70 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। उन्होंने कहा, “मामलों और गिरफ्तारियों की संख्या में वृद्धि होने की आशंका है, क्योंकि पूर्वोत्तर सुनामगंज, मध्य गाजीपुर और अन्य क्षेत्रों में हिंसा की नई घटनाएँ सामने आई हैं।”

हालाँकि, तीन महीनों से भी कम समय में हुई इतनी घटनाओं को अलग मोड़ देने की कोशिश करते हुए आलम ने कहा कि कुछ घटनाओं को छोड़कर हिंदुओं पर उनकी आस्था के कारण हमला नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि इनमें ऐसे भी मामले हैं, जिनमें पीड़ित शेख हसीना के नेतृत्व वाली पिछली सत्तारूढ़ पार्टी आवामी लीग के सदस्य थे। वहीं, कुछ मामले ऐसे हैं, जिनमें लड़ाई व्यक्तिगत है।

शफीकुल आलम ने कहा कि 22 अक्टूबर के बाद हुई घटनाओं के बारे में मीडिया को जल्द ही विवरण साझा किया जाएगा। बता दें कि कुछ दिन पहले ही भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्त्री बांग्लादेश की यात्रा पर थे। वहाँ उन्होंने मोहम्मद यूनुस और अपने समक्ष से मुलाकात कर अल्पसंख्यकों पर हमलों को लेकर चिंता जताई थी। इसके बाद बांग्लादेश का यह बयान आया है।

सरकार के दावों से अलग है कहानी

बांग्लादेश की सरकार भले ही अपनी छवि बचाने के लिए यह दावा करे अल्पसंख्यक हिंदुओं के खिलाफ हुई हिंसा, उनकी आस्था को लेकर नहीं बल्कि राजनीतिक एवं व्यक्तिगत था। लेकिन, सच्चाई इससे अलग है। बांग्लादेश में रहने वाले हिंदुओं का कहना है कि उन्हें मुल्क में आवाज नीची करके बात करना पड़ता है। रिक्शेवाले भी आँख दिखाते हैं। गाड़ी ओवरटेक करने पर भी पिटाई कर दी जाती है।

ढाका में रेडीमेड कपड़ों की फैक्ट्री चलाने वाले उद्यमी संजीव जैन ने हिंदी अखबार एवं सोशल मीडिया दैनिक जागरण को इसके बारे में बताया। 10 दिन पहले ही बांग्लादेश से लौटे जैन ने बताया कि वहाँ स्थिति बहुत बिगड़ गई है। वहाँ अल्पसंख्यकों का जीना हराम होता जा रहा है। उन्होंने बताया कि जब वे ढाका गए थे तो खुद दाढ़ी बढ़ाकर गए थे।