Home Blog Page 5470

‘5 साल से अपना खून-पसीना कॉन्ग्रेस को दिया, ₹5 करोड़ में बेच दिया टिकट’

हरियाणा कॉन्ग्रेस का घमासान थमता नहीं दिख रहा। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर ने विधानसभा चुनाव के टिकटों के बॅंटवारे में धांधली का आरोप लगाते हुए कांग्रेस मुख्यालय के बाहर बुधवार को प्रदर्शन किया। उन्होंने सोहना विधानसभा सीट का टिकट पॉंच करोड़ रुपए में बेचे जाने का आरोप लगाया।

तंवर ने समर्थकों के साथ पार्टी मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन किया और धरना दिया। कहा कि विधानसभा की सीटों के बंटवारे को लेकर बड़े पैमाने पर धांधली चल रही है। पुराने और समर्पित कार्यकर्ताओं की अनदेखी की जा रही है। उन्होंने कहा कि धांधली कर अगर कमजोर उम्मीदवार मैदान में उतारे गए तो पार्टी जीत कैसे हासिल करेगी।

तंवर ने कहा, “पिछले 5 सालों से मैंने अपना खून-पसीना कॉन्ग्रेस को दिया। यहाँ नेतृत्व बरबाद हो चुका है। हम पार्टी के लिए समर्पित हैं, लेकिन ऐसे लोगों को टिकट क्यों दी जाए, जिन्होंने अभी हाल ही में पार्टी को ज्वाइन किया है और पहले पार्टी की आलोचना कर चुके हैं।“

उन्होंने कहा, “आज बीजेपी के 14 विधायक ऐसे हैं जिन्हें कॉन्ग्रेस से भगा दिया गया। 7 सांसद ऐसे हैं जिनकी पृष्ठभूमि कॉन्ग्रेसी है। बीजेपी ने 3 महीने में मुझे भी 6 बार ऑफर दिया। लेकिन मैंने इसे स्वीकार नहीं किया और न करूॅंगा।”

उनका कहना है कि बीते 5 सालों में जिन्होंने पार्टी के लिए काम किया उन्हें टिकट बँटवारे के दौरान अनदेखा किया गया और जिन्होंने पार्टी के ख़िलाफ़ काम किया, उन्हें भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने टिकट देने के दौरान तवज्जो दी। वो चाहते उनके समर्थकों को टिकट दी जाए। जिसके लिए उन्होंने हरियाणा से टिकट चाहने वाले कॉन्ग्रेसियों की लंबी चौड़ी सूची आलाकमान को भी सौंपी हैं।

यहाँ बता दें कि अभी कुछ दिन पहले ही तंवर की जगह शैलजा कुमारी को हरियाणा कॉन्ग्रेस की कमान दी गई है। हुड्डा स्वयं तंवर को अलग करने की माँग कर रहे थे। जिसके बाद से दोनों नेताओं में अंदरुनी तनातनी चल रही थी, लेकिन चुनाव नजदीक आते-आते ये सार्वजनिक हो गया है।

सूत्रों के अनुसार तंवर ने पार्टी नेतृत्व से 10 सीटें मॉंगी है। राज्य में 21 अक्टूबर को विधानसभा चुनाव के लिए वोट डाले जाएँगे और 24 अक्टूबर को नतीजे आएँगे। 90 सदस्यीय विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा 78 उम्मीदवारों के नाम का ऐलान कर चुकी है।

150 रुपए का डॉलर, 3.3% पर दम तोड़ती अर्थव्यवस्था: इमरान खान के गर्जन-तर्जन के पीछे फटेहाल पाक

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के कश्मीर पर बिगड़ते जा रहे बोल असल में बदहाल अर्थव्यवस्था और एक देश के तौर पर नाकामी की ओर बढ़ रहे हालातों से ध्यान भटकाने की कोशिश हैं। पिछले अगस्त में सत्ता संभालने वाले ‘तालिबान खान’ इमरान का ‘नया पाकिस्तान’ आर्थिक मोर्चे पर गिरती विकास दर (3.3%) और मुँह फैलाती जा रही महंगाई के दो पाटों में पिस रहा है। डॉलर की कीमत (150 रुपए)आसमान पर है और एक कर्ज की क़िस्त चुकाने के लिए उसे दूसरा कर्ज लेना पड़ रहा है।

पारम्परिक रूप से पाकिस्तान चीन, अमेरिका और सऊदी की तिकड़ी के सहारे खड़ा रहता था। लेकिन पिछले कुछ समय में समीकरण बदले हैं। डोनाल्ड ट्रम्प के आने के बाद से चाहे उनके इस्लामोफोबिया के चलते या फिर चाहे इस सच के अनुभव से कि इतने साल में पाकिस्तान ने अमेरिका से पैसा लेकर आतंक का खात्मा नहीं किया, बल्कि उसे बढ़ावा ही दिया है, अमेरिका और पाकिस्तान के संबंध बहुत हद तक ठंडे पड़ गए हैं। पाकिस्तान को नया कर्ज या सहायता तो दूर, ट्रम्प ने लगभग हर पुराने मदद के रास्ते को रोक दिया है या पहरा बिठा दिया है।

चीन से हिंदुस्तान की दुश्मनी में जा मिला ‘दुनिया का पहला इस्लामिक स्टेट’ पाक उससे भी बहुत अधिक आर्थिक सहायता इसलिए लेने में कतरा रहा है क्योंकि वह ‘कर्ज’ के बदले अनीश्वरवादी चीन के साम्राज्य का हिस्सा नहीं बन सकता। CPEC (चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा) उसने इसीलिए ठंडे बस्ते में डाल दिया है और चीन के साथ वह केवल रणनीतिक रूप से हिंदुस्तान को घेरने, खुद को आतंकी के आधिकारिक ठप्पे से बचाने और गधों के निर्यात के नकद कारोबार जैसी चीजों तक सीमित किए हुए है।

ले-देकर बचा सऊदी, तो उसकी सीमित सहायता पाकिस्तान के विशाल, अनुत्पादक खर्चों और 2018 के 3.9% से वित्त वर्ष 2019 में 7.3% हो रही और अगले एक साल में 13% (अनुमानित) होने जा रही महंगाई के चलते ऊँट के मुँह में जीरा साबित हो रही है। UNCTAD ट्रेड ऐंड डिवेलपमेंट रिपोर्ट 2019 के मुताबिक सऊदी ही नहीं, IMF (अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष) का 6 अरब डॉलर का कर्ज भी पाकिस्तान के ज्यादा काम नहीं आना है।

घाटा, टैक्स चोरी और मुँह फाड़े सेना

पाकिस्तानी सेना देश के बजट का 17-22% लेती है। बावजूद इसके कि वह खुद 100 अरब डॉलर के आर्थिक साम्राज्य की मालिक है, जो बैंकिंग, सीमेंट, रियल एस्टेट जैसे क्षेत्रों में पसरा हुआ है। हाल ही में उसने सरकार से खनन, तेल और गैस का काम भी अपने हाथों में ले लिया है। इसके उलट पाकिस्तानी सरकारी कम्पनियाँ घाटे में गहरी डूबती जा रहीं हैं। केवल 1% के टैक्स देने वाले नागरिकों के दायरे के अलावा उसका टैक्स-जीडीपी अनुपात 11% दुनिया के न्यूनतम में से एक है।

वराह, कमल, विक्रमादित्य, हाथी: राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट में फॅंसीं बाबरी मस्जिद की पैरोकार

सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या मामले की रोजाना सुनवाई के दौरान ऐसे कई मौके आए हैं, जब मुस्लिम पक्ष के वकील अपनी ही दलीलों में उलझते नजर आए। खासकर, अयोध्या में खुदाई पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की रिपोर्ट को लेकर।

मुस्लिम पक्ष की ओर से दलीलें रख रहीं वरिष्ठ वकील मीनाक्षी अरोड़ा ने कोर्ट में कहा कि विक्रमादित्य सुंग वंश के थे। इसके बाद जस्टिस अशोक भूषण ने उन्हें याद दिलाया कि वह गुप्त वंश के थे। अरोड़ा ये बोल कर फँस गईं कि उस स्थल पर खुदाई के बाद हाथी की मूर्तियों के मिलने से यह नहीं कहा जा सकता कि वहाँ मंदिर ही था। बता दें कि हिन्दू संस्कृति में हाथी के पूजा का सिद्धांत रहा है। भगवान गणेश को गजानन भी कहते हैं। इंद्र का वाहन भी हाथी ही है। अरोड़ा ने हाथी की मूर्तियों के खिलौना होने की बात कही।

इसके बाद जजों ने उनसे कमल के निशान को लेकर सवाल पूछा। जजों ने अरोड़ा से पूछा कि क्या मस्जिदों में भी कमल के निशान होते हैं? इस पर साफ़-साफ़ जवाब न दे पाने वाली अरोड़ा ने ये कह कर पल्ला छुड़ाने की कोशिश की कि ऐसा हो सकता है। हालाँकि, पीठ के अन्य जजों ने जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर से ये बात जाननी चाही। जस्टिस नजीर ने साफ़-साफ़ कह दिया कि उनकी जानकारी में कहीं ऐसा नहीं है कि मस्जिदों में कमल के निशान हो। मीनाक्षी अरोड़ा ने दावा किया कि कमल किसी भी धर्म का प्रतीक चिह्न रहा हो सकता है- हिन्दू, मुस्लिम, जैन, बौद्ध या मुस्लिम।

मीनाक्षी अरोड़ा अदालत में इतनी कन्फ्यूज्ड नजर आईं कि उन्होंने अष्टकोणों को भी हिन्दू धर्म का मानने से इनकार कर दिया। जजों को उन्हें याद दिलाना पड़ा कि अष्टकोण का सिद्धांत हिन्दू धर्म में ही रहा है। जस्टिस एसए बोबडे ने इस दौरान वराह की मूर्ति को लेकर भी सवाल किया। उन्होंने कहा कि एएसआई की रिपोर्ट में वराह का भी जिक्र है, जिसके बारे में हिन्दू धर्म-ग्रंथों में भी चर्चा है। उन्होंने कहा कि वराह तो मस्जिद में नहीं हो सकता। मीनाक्षी अरोड़ा एक बार फिर से बगले झाँकती हुई नज़र आईं। इसी तरह एएसआई की पूरी रिपोर्ट को ही त्रुटिपूर्ण करार देने के चक्कर में उन्होंने कई और गलतियाँ की।

मीनाक्षी अरोड़ा ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि पुरातत्व कोई फिजिक्स या केमिस्ट्री जैसा विज्ञान नहीं है, यह सामाजिक विज्ञान है। अरोड़ा ने कहा था कि कार्बन डेटिंग जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं किया गया। अरोड़ा ने कहा कि चूँकि, आर्कियोलॉजी एक नेचुरल साइंस नहीं है, इसके रिपोर्ट्स में यथार्थता नहीं है। उन्होंने दावा किया था कि पुरातत्व ने अभी तक ऐसा कोई निष्कर्ष नहीं दिया है, जिसे वेरीफाई किया जा सके।

गौरतलब है कि मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अगुवाई वाली संविधान पीठ मामले की रोजाना सुनवाई कर रही है। पीठ में जस्टिस एसए बोबडे, डीवाई चंद्रचूड़, अशोक भूषण और एस अब्दुल नज़ीर शामिल हैं।

दूरदर्शन तमिल ने प्रधानमंत्री के भाषण का किया ब्लैकआउट, सहायक निर्देशक निलंबित

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के IIT-मद्रास में दिए गए भाषण को न प्रसारित करने के कारण डीडी (दूरदर्शन) के तमिल संस्करण की सहायक निर्देशक को निलंबित कर दिया गया है। मोदी तमिलनाडु की राजधानी चेन्नै में दीक्षांत समारोह के दौरान छात्रों को संबोधित कर रहे थे। दूरदर्शन पोडिगई टीवी की सहायक निर्देशक आर वासुमति पर कर्त्तव्य की उपेक्षा (dereliction of duty) का आरोप है।

पीएमओ ने जावड़ेकर को किया था तलब  

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार प्रधानमंत्री कार्यालय ने केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर से इसका जवाब माँगा था। जावड़ेकर के मंत्रालय के ही अंतर्गत दूरदर्शन आता है। पीएमओ ने पूछा था कि दूरदर्शन पोडिगई टीवी पर प्रधानमंत्री के भाषण का सजीव प्रसारण (live telecast) न किए जाने का क्या कारण था।

30 सितंबर की घटना

घटना 30 सितंबर (सोमवार) की है, जब प्रधानमंत्री के भाषण के समय दूरदर्शन पोडिगई टीवी पर एक तमिल गाना और नाटिका प्रसारित हो रहे थे। उस समय मोदी IIT-मद्रास के 56वें दीक्षांत समारोह और इस दौरान हुई सिंगापुर-भारत हैकिंग प्रतियोगिता (Hackathon) के पुरस्कार वितरण समारोह में भागीदारी करने पहुँचे हुए थे।

उल्लेखनीय है कि सरकारी चैनल होने के चलते दूरदर्शन की यह ज़िम्मेदारी थी कि प्रधानमंत्री के भाषण को अपने दर्शकों तक वरीयता पर पहुँचाना। हालाँकि एक सीमा तक दूरदर्शन को परिचालन की स्वायत्ता है, लेकिन यह अंततः लोक सेवक प्रसारक (public service broadcaster) है, जिसकी संस्थापक सरकार ही है। अतः मोदी का भाषण दिखाना दूरदर्शन के लिए बाध्यकारी था, न कि निजी चैनलों की तरह ऐच्छिक।

निकाय चुनाव से पहले J&K के कई नेता आजाद, 58 दिनों से थे नजरबंद

जम्मू-कश्मीर में कई नेताओं की नजरबंदी हटा दी गई है। माना जा रहा है कि निकाय चुनावों के कारण प्रशासन ने यह कदम उठाया है। आर्टिकल 370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने के बाद इन नेताओं को एहतियातन उनके घर में नजरबंद कर दिया गया था। करीब दो महीने तक ये नेता नजरबंद रहे।

जिन नेताओं की नजरबंदी हटाई गई है उनमें पूर्व मंत्री और डोगरा स्वाभिमान संगठन पार्टी के अध्यक्ष चौधरी लाल सिंह का नाम भी शामिल है। जानकारी के मुताबिक जिन नेताओं पर से नजरबंदी हटाई गई हैं उसमें नेशनल कॉन्फ्रेंस, कॉन्ग्रेस, पैंथर्स पार्टी के नेताओं के नाम हैं। इसमें लाल सिंह के अलावा नेशनल कॉन्फ्रेंस के देवेंद्र राणा और एसएस सालाथिया, कॉन्ग्रेस रमन भल्ला और पैंथर्स पार्टी के हर्षदेव सिंह का नाम है। एनसीपी के उमर अब्दुल्ला, फारूक अब्दुल्ला, पीडीपी की महबूबा मुफ्ती और जम्मू-कश्मीर पीपुल्स कॉन्फ्रेंस सज्जाद गनी लोन अब भी हाउस अरेस्ट हैं।

पैंथर पार्टी के हर्षदेव ने एएनआई को बताया, “5 अगस्त को मुझे रमण भल्ला, देवेन्द्र राणा, एसएस सालाथिया और जावेद राणा के साथ हिरासत में लिया गया था। मैं अपने घर में बंद था। कल 58 दिन बाद हमें बाहर जाने की अनुमति मिली। हमें कहा गया कि हमारे बयानों पर निगरानी रखी जाएगी।”

बता दें कि राज्य में हालात नियंत्रण में रखने के लिए इन नेताओं को एहतियातन नजरबंद किया गया था। आशंका थी कि ये नेता भड़काऊ बयान देकर के लोगों को हिंसा के लिए उकसा सकते हैं।

कुछ दिन पहले केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह भी इस संबंध में बयान देते हुए कहा था कि किसी भी जम्मू-कश्मीर में किसी भी राजनेता को 18 माह से ज्यादा हिरासत में नहीं रखा जाएगा। यहाँ उन्होंने ये भी साफ़ किया था कि जो नेता हाउस अरेस्ट हैं, उन्हें गिरफ्तार नहीं किया गया है, बल्कि उन्हें घर में मेहमान की तरह रखा जा रहा है।

वहीं, भाजपा नेता राम माधव की मानें तो शांति बनाने के लिहाज से पहले हिरासत में लिए लोगों की संख्या 2000-2500 से थी, लेकिन धीरे-धीरे ये संख्या घटकर 200-250 हो गई है। गौरतलब है कि जम्मू-कश्मीर के 310 ब्लॉकों में ब्लॉक विकास परिषदों के अध्यक्षों के चुनाव के लिए मंगलवार को अधिसूचना जारी की गई थी। अधिसूचना के मुताबिक 24 अक्टूबर को चुनाव होंगे। नामांकन दाखिल करने की अंतिम तारीख नौ अक्टूबर है जबकि नामांकन पत्रों की जांच 10 अक्टूबर को की जाएगी। नामांकन वापस लेने की तारीख 11 अक्टूबर है।

मुस्लिमों के लिए दीमक जैसा शब्द प्रयोग होता है, तो क्या यह गाँधी का भारत है या गोडसे का: महबूबा मुफ्ती

महात्मा गाँधी की 150वीं जयन्ती पर जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तंज कसने का प्रयास किया। उन्होंने महात्मा गाँधी पर नरेंद्र मोदी द्वारा लिखे लेख को आधार बनाकर हैरानी जताते हुए कहा कि आप वैश्विक मंच पर बापू को याद करते हैं, लेकिन घर आकर उनके हत्यारों की प्रशंसा करते हैं।

गौरतलब है कि आज राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की 150 वीं जयन्ती पर अमेरिका के डेली अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स ने नरेंद्र मोदी का एक लेख छपा है। जिसमें प्रधानमंत्री ने लिखा, “महात्मा गांधी में समाज में बड़े विरोधाभासों के बीच एक जरिया बनने की अनोखी क्षमता थी।”

जिसे री-ट्वीट करते हुए महबूबा मुफ्ती के ट्विटर हैंडल से लिखा गया, “हैरानी है, आप वैश्विक मंच पर बापू को याद करते हैं लेकिन घर वापस आकर उनके हत्यारों की प्रशंसा करते हैं।”

इसके अलावा महबूबा मुफ्ती अपने ट्वीट से लिखती हैं कि जब हम गाँधीजी की जयन्ती मनातें हैं, तो हमें स्वयं से ये सवाल करना चाहिए कि हम उनके भारत के प्रति न्याय, मानवीय मूल्यों, सत्य और अहिंसा के विचारों के प्रति वचनबद्ध हैं। ऐसे समय में जब मुस्लिमों और अल्पसंख्यकों के लिए एक दीमक जैसा शब्द प्रयोग होता है, तो क्या यह गाँधी का भारत है या गोडसे का?

गौरतलब है कि जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटने के बाद बताया जा रहा है कि महबूबा मुफ्ती को नजरबंद कर दिया गया है और उनका सोशल मीडिया अकॉउंट उनकी बेटी इल्तिजा द्वारा संचालित किया जा रहा है।

‘अगर महात्मा गाँधी आज होते तो वे भी RSS का हिस्सा होते’

राज्यसभा सांसद राकेश सिन्हा ने कहा है कि अगर महात्मा गाँधी आज होते तो वे भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हिस्सा होते। संघ विचारक सिन्हा के इस बयान की बड़ी प्रतिक्रियाएँ आनी तय है। उन्होंने महात्मा गाँधी की 150वीं जयंती पर कॉन्ग्रेस को आड़े हाथों लिया। सिन्हा ने कहा कि जो लोग गाँधी का नाम और चित्र सबसे ज्यादा इस्तेमाल करते रहे हैं, उन्होंने ही गाँधी के विचारों को भुला दिया और वे ही गाँधी के विचारों के ख़िलाफ़ हैं। साथ ही उन्होंने आरएसएस को गाँधी की विचारधारा का अनुयायी करार दिया।

राज्यसभा सांसद प्रोफेसर राकेश सिन्हा दिल्ली विश्वविद्यालय के प्राध्यापक भी हैं। वह काफ़ी दिनों से मीडिया चर्चाओं में संघ की तरफ से अपनी बात रखते रहे हैं और आरएसएस के इतिहास को लेकर उनके अध्ययन की सभी प्रशंसा करते हैं। उन्होंने आरएसएस संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार की जीवनी भी लिख रखी है। राकेश सिन्हा ने ट्विटर पर लिखा:

“महात्मा गाँधी सिर्फ़ स्वतंत्रता की ही लड़ाई नहीं लड़ रहे थे बल्कि भारतीय सभ्यता के मूल तत्व को आधार बनाकर पश्चिमी सभ्यता की राक्षसी प्रकृति जिसमें दमन, अमानवीयता, संसाधनों की लूट, विस्तारवाद, ताक़तवर होने का अहम, व्यक्तिवाद और ‘हम और तुम’ की खाई अंतर्निहित है, को भी चुनौती दे रहे थे।

बता दें कि संघ विचारक का ये बयान ऐसे समय में आया है जब कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने आरोप लगाया है कि भाजपा गाँधी को हटा कर आरएसएस को आगे कर रही है। वहीं, दूसरी तरफ सरसंघचालक मोहन भागवत ने महात्मा गाँधी को पूजनीय बताते हुए कहा कि संघ उनकी विचारधारा पर काम कर रहा है। मोहन भागवत ने कहा कि ‘स्व’ के आधार पर भारत की पुनर्रचना का स्वप्न देखने वाले तथा सामाजिक समता और समरसता के संपूर्ण पक्षधर, अपनी कथनी का स्वयं के आचरण से उदाहरण देने वाले, सभी लोगों के लिए आदर्श पूज्य गाँधीजी को हम सबको देखना, समझना तथा अपने आचरण में उतारना चाहिए।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी राजघाट जाकर महात्मा गाँधी को नमन किया। कई अन्य बड़े नेताओं व मंत्रियों ने महात्मा गाँधी को उनके जन्मदिवस पर याद किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘स्वच्छता अभियान’ में भी महात्मा गाँधी के चेस को ही प्रतीक चिह्न बनाया गया था।

मंदी का डर पर्यावरण पर हावी: प्लास्टिक पाबंदी से पीछे हटी मोदी सरकार

मोदी सरकार अपनी बहुप्रचारित और आज (2 अक्टूबर, गाँधी जयंती) से प्रस्तावित एकल-प्रयोग (single-use) प्लास्टिक के इस्तेमाल पर पाबंदी से पीछे हट गई है। फ़िलहाल सरकार का ध्यान केवल जनजागरूकता तक सीमित है। स्वच्छ भारत मिशन के आधिकारिक हैंडल ने इस आशय से ट्वीट भी किया है।

@swachhbharat हैंडल का ट्वीट रॉयटर्स की उस खबर के जवाब में है, जिसमें दावा किया गया है कि जब आर्थिक मंदी और नौकरियों के खत्म होने का माहौल वैसे भी बना हुआ है, ऐसे में सरकार का यह कदम उद्योग जगत को कतई रास नहीं आ रहा। उसी के जवाब में सरकारी हैंडल ने स्पष्टीकरण दिया कि 11 सितंबर को प्रधानमन्त्री मोदी द्वारा शुरू किया गया ‘स्वच्छता ही सेवा’ अभियान सिंगल-यूज़ प्लास्टिक का इस्तेमाल रोकने के लिए नहीं, बल्कि उसके बारे में जागरूकता बढ़ाने का और एक जनांदोलन के ज़रिए उसका इस्तेमाल बंद करने का है। ट्वीट में प्रधानमन्त्री कार्यालय और पर्यावरण मंत्रालय के ट्विटर हैंडलों (@PMOIndia और @moefcc) को टैग किया गया है।

एक ओर सरकार ने कोई नया प्रतिबंध न लगाने का आश्वासन दिया है, जिसके पीछे कारण विभिन्न मीडिया रिपोर्टों में आर्थिक मंदी के और गहराने की आशंका बताया जा रही है। वहीं दूसरी ओर केंद्र की मोदी सरकार राज्यों को अपने यहाँ मौजूद कानूनों को ही लागू करने के लिए प्रोत्साहित कर रही है। इन कानूनों में पॉलीथिन बैगों, स्टाइरोफ़ोम के बर्तनों आदि के प्रयोग, उत्पादन और भंडारण पर विभिन्न पाबंदियाँ हैं। ओडिशा जैसे कुछ राज्यों ने तो 2 अक्टूबर से पूर्ण प्रतिबंध की बात कह भी दी है।

‘दवाओं की बोतलों का विकल्प है क्या?’

इस बीच, उद्योग चैंबर CII ने इस प्रस्तावित प्रतिबंध के अनुपालन पर सवाल उठाते हुए चिंता जताई कि कई उद्योगों के लिए कुछ प्लास्टिक उत्पाद इतने ज़रूरी हैं कि उनके बिना अचानक से हो जाने पर यह उद्योग अस्तित्व के संकट में आ जाएँगे। कई चीजों में प्लास्टिक का कोई विकल्प फ़िलहाल नहीं है। उन्होंने उदाहरण के तौर पर दवाइयों की प्लास्टिक की बोतलों और स्वास्थ्य-संबंधी उत्पादों को छूट दिए जाने की माँग की है।

6 फीट पानी में तो इंसान डूब जाता है, आपका अहंकार क्यों नहीं डूबता…

जिस समय राजेंद्रनगर और कंकड़बाग में नाव चल रही है, ठीक उसी समय बोरिंग रोड और बेली रोड में धूल उड़ रही है। अगर ये प्राकृतिक आपदा है, तो फिर ऐसा क्यों?

साहब, अपनी गलती के लिए प्रकृति को दोष मत दीजिए। ये 6 फ़ीट तक जमा पानी, आपकी नाकामी है। अपनी नाकामी तो मत छिपाइए। ये पानी अगर आपके अफसरों की आँखों में होता तो पटना डूबता नहीं। संप हाउस ठीक से काम कर रहे होते। नालों में कचरा नहीं होता। घरों में हज़ारों लोग कैद नहीं होते।

जलजमाव वही हैं, जहॉं नाला उड़ाही में लापरवाही हुई। जहॉं संप हाउस के मोटर खराब हैं। जहॉं नए नालों के नाम पर पुराने नाले ध्वस्त कर दिए गए मगर नए नालों को लिंक किया ही नहीं। तभी तो पाटलिपुत्र कॉलोनी और श्रीकृष्णापुरी में कमर तक पानी है, मगर चिरैयाटांड़ जैसी पुरानी बस्ती में कहीं पानी नहीं दिख रहा।

लापरवाही तो हुई है। मौसम विभाग ने भारी बारिश को लेकर 72 घंटे पहले चेताया था। बैठक भी हुई थी। मंत्री-अफसर सब जुटे थे। नाश्ते में काजू भी रहा होगा मगर उस बैठक का नतीजा क्या हुआ? आपके अफसरों ने संप हाउस के खराब मोटर तक को बनाना जरूरी नहीं समझा। डीजल तक नहीं था कि मोटर चलाई जाती। बारिश होती रही, फिर भी ढीठ सिस्टम मुॅंह ताकता रहा। कहा गया कि बारिश रुकते ही पानी निकल जाएगा मगर क्या हुआ?

बारिश रुके 48 घंटे हो चुके हैं। अब तो धूप भी निकल गई है मगर पानी है कि निकलने का नाम ही नहीं ले रहा। छह फ़ीट में बमुश्किल एक से डेढ़ फ़ीट पानी घटा है। बिना बिजली के पानी के बीच फॅंसे लोग भूख प्यास से बिलबिला रहे हैं। अब तो पानी भी सड़ने लगा है। बदबू आ रही है। अगर पानी निकलने की गति यही रही तो दशहरा बीत जाएगा।

अब भी मानिए हुज़ूर कि गलती हुई है। मानिए कि आपके अफसर किसी की नहीं सुनते, आपकी भी नहीं। मानिए कि पटना डूबा नहीं, डुबाया गया है। मानिए की ये प्राकृतिक आपदा नहीं, क्रिमिनल ऑफन्स है। और…इस क्रिमिनल ऑफन्स की सजा मिलनी चाहिए। छह फीट पानी में तो इंसान डूब जाता है, आपका अहंकार क्यों नहीं डूबता…

(लेखक कुमार रजत दैनिक जागरण पटना में कार्यरत हैं)

दुनियाभर में ठप्प हुआ Twitter और TweetDeck, सामान्य यूजर्स सहित मीडिया जगत भी परेशान

भारत सहित पूरी दुनिया में ट्विटर और ट्वीटडेक के ठप्प होने से लोग परेशान हैं। आज गाँधी जयंती होने के कारण सरकारी महकमों से लेकर मीडिया जगत तक, सभी ट्वीटर पर सक्रिय थे लेकिन ट्विटर ठप्प होने से उनकी परेशानी बढ़ गई है। कहा जा रहा है कि माइक्रो ब्लॉगिंग साइट मंगलवार (अक्टूबर 1, 2019) से ही ठप्प है। हज़ारों यूजर्स ने इस सम्बन्ध में ट्विटर को रिपोर्ट दर्ज कराई थी, जिसके बाद कम्पनी ने रिप्लाई करते हुए इस बात की पुष्टि की। इससे मीडिया जगत भी परेशान है।

ट्विटर ने बताया है कि ट्विटर और ट्वीटडेक पर लोगों को ट्वीट करने, ट्वीट शेड्यूल करने और नोटिफिकेशन एवं ट्रेंड्स वगैरह देखने में काफ़ी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। कम्पनी ने यूजर्स को आश्वस्त किया है कि जल्द ही इन खामियों को दूर कर लिया जाएगा। बता दें कि ट्वीटडेक का प्रयोग किसी ट्वीट को किसी निश्चित समय पर शेड्यूल करने के लिए किया जाता है। अधिकतर न्यूज़ पोर्टल्स भी समय-समय पर ट्वीट शेड्यूल कर लोगों तक ख़बरें पहुँचाते हैं।

ट्विटर व ट्वीटडेक के ठप्प होने से यह सब बंद पड़ा हुआ है। दोपहर के समय ख़बर आई थी कि दोनों ही वेबसाइट्स ने फिर से काम करना शुरू कर दिया है। लेकिन, कुछ ही मिनटों बाद यह फिर से ठप्प हो गया। बता दें कि जब फेसबुक, व्हाट्सप्प और इंस्टाग्राम जैसे ऐप्स काम करना बंद कर देते हैं, तब ट्विटर ट्रेंड्स के माध्यम से लोगों को पता चलता है कि ये काम नहीं कर रहे। अब जब ख़ुद ट्विटर ही ठप्प है, तो लोगों के पास कुछ खास विकल्प ही नहीं बचा है।

ज्ञात हो कि ट्वीटडेक किसी निश्चित कीवर्ड्स के आधार पर फिल्टर लगाकर ट्वीट्स को आपके सामने प्रस्तुत करता है। ट्वीटडेक क्रोम, फायरफॉक्स, इंटरनेट एक्स्प्लोरर और सफारी ब्राउजर्स पर काम करता है। यह विंडोज और मैक कमप्यूटर्ज दोनों पर ही काम करता है।