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ओवैसी जैसे लोग शरीर पर विष्ठा लेप लेंगे अगर मोदी कह दे कि फ्लश करना चाहिए

प्रधानमंत्री मोदी ने जब-जब लाल किले से बोला है तो वो महज अपने सरकार की उपलब्धियाँ ही नहीं गिनाते बल्कि उनके भाषण में सारे मंत्रालयों के लिए अगले साल की प्राथमिकताएँ भी शामिल होती हैं। उनके भाषणों से सार्वजनिक अभियानों ने सफलता पाई हैं। इनमें ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’, ‘स्वच्छता अभियान’, ‘सिलिंडर सब्सिडी छोड़ो’ जैसे अभियान शामिल हैं। इस बार के भाषण में प्लास्टिक से लेकर जल संरक्षण और जनसंख्या नियंत्रण जैसे मुद्दे शामिल रहे।

हर भारतीय जानता है कि बड़ी जनसंख्या और कम संसाधन हमारे देश की हर समस्या की जड़ है। यह एक बिगड़ा हुआ अनुपात है जो कि किसी भी क्षेत्र में अच्छा नहीं है। आप स्कूल बनाइए, कम पड़ जाएँगे; कॉलेज बनाइए, कम पड़ जाएँगे; हॉस्पिटल बनाइए, कम पड़ जाएँगे; सब्सिडी देते रहिए, लोग पैदा होते रहेंगे; योजनाएँ बनाइए, पैसे कम पड़ जाएँगे; हर ढाँचा हमेशा ही सीमा से ज्यादा लोड उठाता रहेगा और समय से पहले टूट जाएगा…

आप चाहे शिक्षा की गुणवत्ता की बात कीजिए या स्वास्थ्य सेवाओं की, जड़ में जनसंख्या कहीं न कहीं आती ही है। क्योंकि बच्चे उतने ही होने चाहिए जितने पाले जा सकें, न कि उन्हें हमने ऊपर वाले की नेमत समझ कर पैदा तो किया ही, पलने भी छोड़ दिया जबकि इसमें ऊपर वाले का कोई हाथ नहीं। बच्चों को हम पैदा करते हैं, और हमारी जिम्मेदारी है कि हम उन्हें एक बेहतर जीवन स्तर उपलब्ध कराएँ।

बेहतर जीवन स्तर से मतलब है: पोषण, शिक्षा और स्वास्थ्य। एक परिवार में जितने सदस्य बढ़ेंगे, आमदनी विभाजित होगी। चाहे सरकार से ही सब्सिडी क्यों न मिले, संख्या बढ़ते ही वो बँटेगा ही। एक बच्चे को पढ़ाना, उसे पालना, शिक्षित करना, और भविष्य के लिए तैयार करना, तीन बच्चों को पढ़ाने, पालने, शिक्षित करने और नौकरी योग्य बनाने की अपेक्षा आसान है। और, ये बात मैं भारतीय समाज की विषमताओं को देखते हुए कर रहा हूँ जहाँ, वैश्विक संदर्भ में देखा जाए तो हम एक लोअर मिडिल इनकम देश हैं।

गरीबी और परिभाषा के हिसाब की गरीबी

भारत में 95% लोग या तो गरीब हैं, या बहुत गरीब। ये परिभाषा मैं किसी कमिटी के ‘बीस रुपए प्रतिदिन’ पर नहीं बता रहा। वो टेक्निकल बात है कि आदमी जिंदा है। वो गरीबी नहीं, सर्वायवल है, जिंदा रहना है। उसे सिर्फ भोजन मिल रहा है। गरीबी यह भी है कि आपके सर पर छत नहीं, शिक्षा नहीं, स्वास्थ्य सुविधाएँ नहीं, आपकी आशाओं की पूर्ति के साधन नहीं हैं।

आपका जीवन एक संघर्ष है, आप परिवार चला रहे हैं, आपके बच्चे में काबिलियत है लेकिन पैसों के कारण वो पढ़ नहीं पा रहा, आपका जीवन बच सकता है लेकिन आप दवाई नहीं खरीद पा रहे। इस दायरे में आपको यह जानना चाहिए कि भारत की एक प्रतिशत जनता के पास देश का 73% पैसा है। मतलब, बाकी के 27% में 99% जनसंख्या का काम चलता है। सिर्फ 9 करोड़ ऐसे हैं जिनकी आमदनी ₹2.5 लाख से ज़्यादा है। इसमें से दो करोड़ लोग टैक्स के दायरे में नहीं आते।

कहने का तात्पर्य यह है कि हम एक गरीब देश हैं और हर टैक्स अदा करने वाले पर चार लोग और आश्रित होंगे। आमदनी सीमित हो, और बच्चे ज्यादा, तो उसके जीवन स्तर पर बिलकुल असर पड़ेगा। ऊपर के पाँच प्रतिशत लोग दस बच्चे भी पाल लेंगे, लेकिन नीचे के लोगों के पास एक बच्चे को भी ठीक से पालने का सामर्थ्य नहीं है। अगर आप उन्हें इस दुनिया में ला रहे हैं तो ये आपकी जिम्मेदारी है कि ऊपर वाले पर फेंकने की बजाय उन्हें एक बेहतर जीवन दें।

जब प्रधानमंत्री ने इस पर बोला तो चिदंबरम जैसे घोषित विरोधियों ने भी इसका स्वागत किया। कोई भी विवेकशील व्यक्ति इसका स्वागत ही करेगा। हर वो व्यक्ति जो हमारी और आपकी तरह निम्न मध्यम वर्ग से ताल्लुक रखता है, जिसने अपने माँ-बाप को लगातार मेहनत करते देखा है, खुद कम खा कर, कर्ज लेकर बच्चों को पढ़ाया है, पड़ोस के लोगों को बच्चों को न पढ़ा पाने का दर्द महसूस करते देखा है, वो जानता है कि जनसंख्या कितनी बड़ी समस्या है।

हर साल लाखों बच्चे बीटेक करके निकलते हैं, एमबीए पढ़ते हैं, पत्रकारिता करते हैं, यूपीएससी के लिए बैठते हैं, और हर साल उनके चयनित होने का, नौकरी पाने की संभावना कम होती जाती है। हर साल एक नौकरी पर आवेदकों की संख्या बढ़ती जाती है। हर व्यक्ति को एक ही तरह की नौकरी नहीं दी जा सकती, लेकिन बीटेक की डिग्री ले कर सड़क बनाने में जुटना भी तो अच्छी बात नहीं है। सरकार चाह कर भी इस तरह के रोजगार के अवसर पैदा नहीं कर सकती।

ऐसे में भविष्य को ध्यान में रखते हुए, जनसंख्या पर नियंत्रण एक बेहतर कदम है। हम चीन की तरह नीति नहीं बना सकते क्योंकि हम एक लोकतंत्र हैं। लोगों तक ज्यादा बच्चों के होने से आने वाली समस्याओं पर जागरूकता ला कर ही इस पर काबू किया जा सकता है।

ओवैसी की दिक्कत और मुस्लिमों की हालत

अगर गरीबी रेखा की ही बात करें तो मुस्लिम लोगों में 25.4% लोग तेंदुल्कर कमिटी की गरीबी रेखा से नीचे हैं। मुस्लिम घरों की आय देश की औसत आय से सात प्रतिशत नीचे है। शिक्षा की बात करें तो 14% जनसंख्या वाले मुस्लिमों में उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे बच्चों में उनका प्रतिशत 4.4 है। सच्चर कमिटी की एक रिपोर्ट के अनुसार, सेकेंडरी स्कूल जाने वाले मुस्लिम बच्चों में से आधे बीच में पढ़ाई छोड़ देते हैं। यही रिपोर्ट हमें यह भी बताती है कि 25 स्नातक (अंडर ग्रेजुएट) विद्यार्थियों में से सिर्फ एक, और 50 परास्नातकों (पोस्ट ग्रेजुएट) में सिर्फ एक विद्यार्थी इस्लाम मजहब का होता है। 2011 के आँकड़ों के हिसाब से मात्र 2.75% मुस्लिम बच्चे ग्रेजुएट हैं। मुस्लिम लड़कियों का हाल और भी बुरा है।

एक जगह यह भी पढ़ा कि मुस्लिमों को आरक्षण और ‘फेयर रिप्रेंजेंटेशन’, यानी उचित प्रतिनिधित्व दे कर इस विषमता को पाटा जा सकता है। पढ़ाई में फेयर रिप्रेंजेंटेशन कैसे दिया जाए? जबकि इस्लामी स्कूल हैं, कॉलेज भी हैं। ये सुविधा एससी और एसटी समुदायों को हासिल नहीं। वो इसलिए नहीं है क्योंकि ऐसे कॉलेज और स्कूल का मतलब है कि आप उन्हें अलग करने की कोशिश कर रहे हैं। इसलिए उन्हें बाकी स्कूल-कॉलेजों में ही पढ़ने का विकल्प दिया जाता है।

लोग यह नहीं सोचते कि अगर हर परिवार में कम बच्चे होंगे तो परवरिश में बेहतरी आएगी, बच्चे को स्कूल में पढ़ाना सहज हो सकेगा। चाहे वो परिवार हिन्दू हो, या मुस्लिम, कम बच्चे का सीधा मतलब है, उसका हिस्सा बढ़ना। उसे स्कूल छोड़ना नहीं पड़ेगा। उसे बचपन से ही बाल मजदूरी नहीं करनी पड़ेगी। उसे परिवार में बचपन से ही आमदनी का स्रोत बनने को मजबूर नहीं होना पड़ेगा। उसके जीवन का स्तर सुधरने की संभावना है।

लेकिन ओवैसी जैसे लोग इन बातों को कॉन्सपिरेसी बता कर, चिल्लाते हुए कि ये विदेशियों की साजिश है, अपने मजहब के लोगों के उस प्रचलित विश्वास को बल देते हैं कि सरकार पोलियो के ड्रॉप में नपुसंकता की दवाई मिला रही है। उन्हें हर बात एक साजिश लगती है कि सरकार मुस्लिमों की जनसंख्या पर नियंत्रण करते हुए, उन्हें गायब कर देना चाहती है।

जबकि, ये एक तथ्य है कि मुस्लिमों की वृद्धि दर हिन्दुओं से हमेशा ज़्यादा रही है। किसी सरकार ने उन्हें गायब करने की बात नहीं की। ये बात हर व्यक्ति को समझनी चाहिए कि बच्चे पैदा करना और उन्हें अपने हाल पर छोड़ देना उस बच्चे पर अत्याचार है। आप लगातार बच्चे भी पैदा करेंगे, आपके पास साधन भी नहीं हैं, और फिर आप सरकार को ही अपनी दुर्गति के लिए कोसेंगे, यह तो मूर्खता है। ये मूर्खता इसलिए है कि सरकार आपको चावल और गेहूँ तो दे सकती है, आरक्षण से शायद स्कूल में भी दाखिला दे दे, लेकिन उसके बाद हर जगह संभावनाओं की कमी होती जाती है।

ओवैसी के ट्वीट और रीट्वीट

राजनीति आपसे बहुत कुछ करवाती है। राजनीति में अपना स्वार्थ अगर सर्वोपरि हो तो फिर आप स्टेज से मुस्लिमों की बेहतरी की बात करते हैं, लेकिन उसके भीतर ‘किसी भी हद तक गिरते जाने’ का ध्येय वाक्य रहता है। ओवैसी जैसों की राजनीति अपने ही समुदाय को डरा कर रखने पर है। कश्मीर के मुस्लिमों की स्थिति से भले ही उत्तर प्रदेश के मुस्लिमों का कोई वास्ता नहीं, लेकिन ओवैसी उन्हें यह बता देगा कि आज कश्मीर के मुस्लिमों का ‘हक’ छीना गया, कल तुम्हारा छीन लेगा। भले ही उत्तर प्रदेश के मुस्लिमों का वो ‘हक’ क्या है, ये न तो ओवैसी बताता है, न वो भीड़ वापस पूछती है।

इसीलिए, मुस्लिमों को हिन्दुओं का दुश्मन बना कर रखना महबूबा, ममता, अब्दुल्ला, अखिलेश, लालू, ओवैसी जैसे स्वघोषित मजहबी नेताओं का स्वार्थ साधता है। ये हमेशा भीम-मीम से लेकर तमाम अदरक-लहसुन करते रहते हैं। और सबके केन्द्र में यही बात होती है कि देखो हिन्दू तुमको काटने की तैयारी में है, तुम्हारे बकरीद का बकरा छीन लेगा, तुम्हें अब बच्चे पैदा नहीं करने देगा, तुम्हारे बच्चों को नपुंसक बना देगा।

जबकि वास्तवकिता यही है कि पाँच साल हो गए, कोई हिन्दू तलवार लेकर सड़कों पर नहीं दौड़ा, लेकिन मुस्लिम एक झूठे डर के कारण हिंसक होते गए। उन्होंने काँवड़ियों पर पत्थरबाजी की, उनकी गाड़ियों पर हमले किए, रामनवमी के जुलूस पर पत्थर फेंके, दुर्गा के पंडालों पर ईंट फेंके। ये सब तब से ज़्यादा हुआ है जबसे इन नेताओं ने मोदी और भाजपा के नाम पर मुस्लिमों को उकसाना शुरू किया। आप सर्च कर लीजिए कि काँवड़ियों पर पत्थरबाजी किस साल से शुरू हुई, और 2019 में इतनी ज़्यादा क्यों हो रही है। आप खोजिए जा कर कि हिन्दुओं के मंदिरों पर चढ़ाई करना और उन्हें तोड़ने की घटनाएँ अचानक से आम कैसे हो गई हैं।

जवाब है मजहब के नेताओं की स्वार्थसिद्धी की बलि चढ़ता मुस्लिम समुदाय। ओवैसी ने प्रधानमंत्री की इस बात को बेकार सोच का नतीजा कहा, और कहा कि ये दूसरों के जीवन में दखलंदाजी करने जैसा है। उसके बाद उसने कुछ ट्वीटों को रीट्वीट किया जिसमें अमेरिका भारत की जनसंख्या पर नियंत्रण की बात कर रहा था।

ओवैसी पढ़े-लिखे आदमी हैं, और मुस्लिम जनता उनकी आलोचना पर सीधे गाली दे कर ‘तूने ओवैसी साहब को ऐसा कहा कैसे’ से शुरू करते हुए बताते हैं कि लिखने वाला उनके चरणों की धूलि भी नहीं है। लेकिन वो बेचारे यह नहीं जानते कि ओवैसी को अपनी राजनीति दिखती है, मुस्लिमों के जीवन स्तर से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। वो ये बात बखूबी जानते हैं कि छोटे भाई को खुल्ला छोड़ कर, शेरवानी पहन कर वो जब तक मोदी के विरोध में दिखेंगे, मुस्लिम उन्हें बंगाल में भी वोट देंगे।

यही कारण है कि मोदी की सही बात भी इन्हें खराब लगती है। हर बेहतर कदम में मुस्लिमों के ख़िलाफ़ साजिश की बात ले आने वाले ओवैसी यह भूल रहे हैं कि 15% मुस्लिम आबादी, देश की दूसरी बड़ी बहुसंख्यक आबादी, इस देश की सच्चाई है। इसे यहाँ से कोई नहीं हटा सकता। जिन्हें हटना था, वो पाकिस्तान में हैं। बेहतर यही होगा कि वो अपने आप को मुस्लिम कम और भारतीय नागरिक ज़्यादा समझें, जिसे भारतीय संविधान ने बराबरी का अधिकार दिया हुआ है। यही उनकी बेहतरी का रास्ता है।

वरना, नेता आते-जाते रहेंगे और अपनी रैलियों की भीड़ के लिए बच्चे पैदा करने को उकसाते रहेंगे। इसका हासिल कुछ नहीं होता। ओवैसी के लिए हर मुस्लिम महज एक वोट है, जिसके सहारे वो अपनी राजनीति चमकाना चाहता है। और इसे चमकाने के लिए वो किसी भी हद तक गिरता रहेगा। लालू इसका बेहतर उदाहरण है जिसने अपने वोटबैंक के लिए पूरी जनसंख्या को अशिक्षित और गरीब रखा, ताकि वो न तो दुनिया को जान सकें, न ही उसकी धूर्तता को समझ सकें। यही कारण है कि बिहार आज की तारीख में सबसे ज़्यादा गरीबी, अशिक्षा और बीमारी झेल रहा है।

भारत के मुस्लिम जितनी जल्दी अपने नेताओं को समझ लेंगे, उतना ही बेहतर होगा क्योंकि अपने समर्थन के लिए ओवैसी को एक दुश्मन, यानी मोदी चाहिए, जो कि बाय डिफॉल्ट पूरे इस्लाम का दुश्मन हो जाता है, और फिर वो दुश्मन जो भी बात कहे, उसका ‘मुँहतोड़ जवाब दिया ओवैसी साहब ने’ के चक्कर में ओवैसी एक दिन मानव विष्ठा का फेसपैक लगा कर, आँखों पर खीरा-टमाटर रखे मुस्लिमों को विश्वास दिलाता रहेगा कि मोदी ने जो कहा है कि मल त्यागने के बाद पानी डालना चाहिए, वो गलत है क्योंकि उसे चेहरे पर लगाने से चमक आती है। पसंद आपकी, आप क्या करना चाहते हैं।

कर्नाटक में कॉन्ग्रेस-जेडीएस सरकार की कब्र खोदने वाले नागराज ने खरीदी 11 करोड़ की लग्जरी कार

कर्नाटक विधानसभा स्पीकर द्वारा अयोग्य ठहराए गए विधायक एमटीबी नागराज फिर से सुर्खियों में हैं। उन्होंने रोल्स रॉयस फैंटम VIII नामक 11 करोड़ रुपए की कार खरीदी है। नागराज उन 14 बागी विधायकों में शामिल थे जिनके पार्टी से इस्तीफे के कारण राज्य में कॉन्ग्रेस-जेडीएस की सरकार को जाना पड़ा था। जानकारी के मुताबिक, उन्होंने अभी अपनी कार पर टैक्स अदा नहीं किया है। टैक्स चुकाने के बाद इस लग्जरी कार की कीमत और भी बढ़ जाएगी।

गौरतलब है कि, कर्नाटक में कॉन्ग्रेस के 17 विधायकों ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया था, जिसके बाद कुमारस्वामी की सरकार अल्पमत में आ गई थी और कुमारस्वामी को सीएम पद से इस्तीफा देना पड़ा था। कुमारस्वामी के इस्तीफे के बाद बीजेपी नेता येदियुरप्पा ने प्रदेश में अपनी सरकार बनाई। 

तब बीजेपी पर यह इल्जाम लगा था कि 17 बागी विधायकों से पैसे के दम पर इस्तीफा दिलाया गया है। इन्हीं विधायकों में एमटीवी नागराज भी शामिल थे। इन 17 में से 14 विधायक को स्पीकर ने सदस्यता से अयोग्य घोषित कर दिया था।

वैसे, नागराज की गिनती देश के सबसे अमीर विधायकों में होती रही है। इतनी महँगी कार खरीदने वाले भी वे कर्नाटक के पहले नेता नहीं हैं। खनन कारोबार के लिए चर्चित जनार्दन रेड्डी के पास भी ऐसी ही कार है। लेकिन कॉन्ग्रेस से बगावत और कुमारस्वामी सरकार को डूबोने के बाद नागराज का इतनी महँगी कार खरीदना चर्चा का विषय बन गया है।

गाँधी-नेहरू नाम काफी नहीं, क्षेत्रीय दलों के मरने पर ही जिंदा होगी कॉन्ग्रेस: अधीर रंजन चौधरी

लोकसभा में कॉन्ग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने शनिवार (अगस्त 17, 2019) को कहा कि गांधी-नेहरू परिवार से बाहर के किसी व्यक्ति का पार्टी चला पाना काफी मुश्किल है, क्योंकि गाँधी-नेहरू परिवार ही कॉन्ग्रेस की ब्रांड इक्विटी हैं। चौधरी के मुताबिक, कॉन्ग्रेस पार्टी की वापसी अब काफी हद तक उन क्षेत्रीय पार्टियों के कमजोर होने पर निर्भर है, जिनकी कोई विचारधारा ही नहीं है।

चौधरी ने कहा कि कॉन्ग्रेस जैसी मजबूत विचारधारा वाली पार्टी, जिसकी हर जगह पहुँच हो वह पार्टी ही भाजपा जैसे सांप्रदायिक दल का सामना कर सकती है। अधीर रंजन चौधरी का कहना है कि वर्तमान समय में क्षेत्रीय दल जिस तरह से काम कर रहे हैं, वे आने वाले दिनों में अपना महत्व खो देंगे और उनके महत्व खोने का मतलब है कि देश द्विध्रुवी राजनीति की ओर बढ़ जाएगा। और द्विध्रुवी राजनीति की स्थिति उत्पन्न होने से कॉन्ग्रेस दोबारा सत्ता में आ सकते हैं। इसलिए पार्टी का भविष्य उज्ज्वल है।

कॉन्ग्रेस नेता ने कहा कि कॉन्ग्रेस पार्टी की वापसी अब काफी हद तक उन क्षेत्रीय पार्टियों के कमजोर होने पर निर्भर करता है, जिनकी कोई विचारधारा ही नहीं है। जबकि कॉन्ग्रेस को व्यापक समर्थन प्राप्त है। साथ ही उन्होंने सोनिया गाँधी के अंतरिम अध्यक्ष बनने पर भी टिप्पणी करते हुए कहा कि सोनिया गाँधी पार्टी की डोर हाथ में नहीं लेना चाहती थीं, लेकिन राहुल गाँधी के इस्तीफा देने के बाद संगठन को संकट में देख उन्होंने वरिष्ठ कॉन्ग्रेस पदाधिकारियों का अनुरोध स्वीकार कर लिया। चौधरी ने कहा कि सोनिया गाँधी ने संकट के समय में पार्टी की बागडोर संभाली। उन्हीं के नेतृत्व में ही मुश्किल समय में 2004 और 2009 में दो बार कॉन्ग्रेस ने सरकार बनाई थी।   

उन्होंने कहा, ‘‘गाँधी परिवार से बाहर किसी व्यक्ति का पार्टी का नेतृत्व करना वास्तव में मुश्किल होगा। राजनीति में भी ‘ब्रांड इक्विटी’ होती है। अगर आप अभी भाजपा को देखेंगे तो क्या मोदी और शाह के बिना वह सुचारू रूप से चल सकती है? जवाब है नहीं। इसी तरह हमारी कॉन्ग्रेस पार्टी में भी गाँधी परिवार हमारी ‘ब्रांड इक्विटी’ है। इसमें कोई नुकसान नहीं है। किसी और पार्टी के पास वह बात नहीं है। यह एक कठोर सत्य है।”

इसके साथ ही उन्होंने कहा कि पुराने और नए लोगों का मिश्रण पार्टी के लिए अच्छा है। पार्टी में विचारों में अंतर हो सकता है, लेकिन लक्ष्य समान है। चौधरी का कहना है कि कॉन्ग्रेस राजनैतिक और वैचारिक दोनों ही स्तर पर भाजपा से लड़ रही है। अभी भले ही सांप्रदायिक राजनीति का स्तर ऊपर है, मगर ये स्थाई नहीं रहेगा। जल्दी ही चीजें बदल जाएँगी। 

वहीं, जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 के निरस्त होने को लेकर चौधरी का कहना है, “जिस तरह से अनुच्छेद 370 को निरस्त किया गया वह अभूतपूर्व और अलोकतांत्रिक है। हमने यूटी को राज्यों में परिवर्तित होते देखा है लेकिन यह पहली बार है कि किसी राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बदल दिया गया है।”

PAk से आज़ादी माँग रहे बलूचिस्तान में बीएनपी नेता और उनके 14 साल के पोते को गोलियों से छलनी किया

पाकिस्तान से आजादी की मॉंग जोड़ पकड़ने के साथ ही बलूचिस्तान में नेताओं की हत्या का सिलसिला शुरू हो गया है। बलूचिस्तान नेशनल पार्टी (बीएनपी) के नेता मीर नवाब अमानुल्लाह जेहरी की खुजदार में शुक्रवार देर रात गोली मारकर हत्या कर दी गई।

हमलावरों ने जेहरी के 14 साल के पोते और दो मित्रों को भी गोलियों से छलनी कर दिया। बीएनपी अध्यक्ष और नेशनल एसेंबली के सदस्य अख्तर मेंगल ने जेहरी की हत्या की पुष्टि की है। उन्होंने ट्वीट कर जेहरी की हत्या को “पार्टी और बलूचिस्तान की जनता के लिए काला दिवस करार दिया है।”

मेंगल ने कहा, “बीएनपी और बलूचिस्तान की जनता के लिए एक और काला दिन। जेहरी की हत्या से हम सभी बेसहारा हो गए हैं। शहीद जेहरी और उनके मित्र तथा निर्दोष पोते की मध्य रात्रि निर्मम ढंग से हत्या का समाचार सुन सन्न हूँ।” डॉन के मुताबिक मृतकों के शव उनके परिजनों के हवाले कर पुलिस मामले की जॉंच कर रही है।

गौरतलब है कि जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 के प्रावधानों को निष्प्रभावी किए जाने के बाद से ही बलूचिस्तान में भी पाकिस्तान के खिलाफ आवाजों ने जोर पकड़ लिया है। आज़ादी की लड़ाई लड़ रहे क्रांतिकारियों और सेनानियों ने पाकिस्तान के चंगुल से आज़ाद होने के लिए हिंदुस्तान से मदद माँगी है।

पाकिस्तान को अपने स्वतन्त्रता दिवस (14 अगस्त) के दिन तब शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा जब ट्विटर पर बलूचिस्तान के समर्थन में BalochistanSolidarityDay और 14thAugustBlackDay हैशटैग ट्रेंड करने लगा था। इन ट्रेंडों पर तकरीबन क्रमशः 100,000 और 54,000 ट्वीट्स हुए।

पाकिस्तान के कब्जे के खिलाफ बलूचिस्तान 1948 से ही संघर्ष करता आ रहा है। इस इलाके में पाकिस्तानी सेना पर मानवाधिकार के जघन्य आरोप आए दिन लगते रहते हैं। बलूचों की आवाज दबाने के लिए समय-समय पर उनके नेताओं की भी हत्याएँ होती रही है। अमूमन ऐसी हत्याओं का दोष अज्ञात हमलावरों के सिर मढ़ दिया जाता है जो कभी पकड़ में नहीं आते।

जिसके पिता ने लिखी सत्यनारायण कथा, उसके 3 बेटों ने ‘इज्जत लूटने वाले’ अंग्रेज को मारा और चढ़ गए फाँसी पर

आज अगर कोई कहे कि घर में पूजा है, तो ये माना जा सकता है कि “सत्यनारायण कथा” होने वाली है। ऐसा हमेशा से नहीं था। दो सौ साल पहले के दौर में घरों में होने वाली पूजा में सत्यनारायण कथा सुनाया जाना उतना आम नहीं था। हरि विनायक ने कभी 1890 के आस-पास स्कन्द पुराण में मौजूद इस संस्कृत कहानी का जिस रूप में अनुवाद किया, हमलोग लगभग वही सुनते हैं। हरि विनायक की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी और वो दरबारों और दूसरी जगहों पर कीर्तन गाकर आजीविका चलाते थे।

कुछ तो आर्थिक कारणों से और कुछ अपने बेटों को अपना काम सिखाने के लिए उन्होंने अपनी कीर्तन मंडली में अलग से कोई संगीत बजाने वाले नहीं रखे। उन्होंने अपने तीनों बेटों को इसी काम में लगा रखा था। दामोदर, बालकृष्ण और वासुदेव को इसी कारण कोई ख़ास स्कूल की शिक्षा नहीं मिली। हाँ ये कहा जा सकता है कि संस्कृत और मराठी जैसी भाषाएँ इनके लिए परिवार में ही सीख लेना बिलकुल आसान था। ऊपर से लगातार दरबार जैसी जगहों पर आने-जाने के कारण अपने समय के बड़े पंडितों के साथ उनका उठना-बैठना था। दामोदर हरि अपनी आत्मकथा में भी यही लिखते हैं कि दो चार परीक्षाएँ पास करने से बेहतर शिक्षा उन्हें ज्ञानियों के साथ उठने-बैठने के कारण मिल गई थी।

आज अगर पूछा जाए तो हरि विनायक को उनके सत्यनारायण कथा के अनुवाद के लिए तो नहीं ही याद किया जाता। उन्हें उनके बेटों की वजह से याद किया जाता है। सर्टिफिकेट के आधार पर जो तीनों कम पढ़े-लिखे बेटे थे और अपनी पत्नी के साथ हरि विनायक पुणे के पास रहते थे। आज जिसे इंडस्ट्रियल एरिया माना जाता है, वो चिंचवाड़ उस दौर में पूरा ही गाँव हुआ करता था। 1896 के अंत में पुणे में प्लेग फैला और 1897 की फ़रवरी तक इस बीमारी ने भयावह रूप धारण कर लिया। ब्युबोनिक प्लेग से जितनी मौतें होती हैं, पुणे के उस प्लेग में उससे दोगुनी दर से मौतें हो रही थीं। तब तक भारत के अंतिम बड़े स्वतंत्रता संग्राम को चालीस साल हो चुके थे और फिरंगियों ने पूरे भारत पर अपना शिकंजा कस रखा था।

अंग्रेजों को दहेज़ में मिले मुंबई (तब बॉम्बे) के इतने पास प्लेग के भयावह स्वरूप को देखते हुए आईसीएस अधिकारी वॉल्टर चार्ल्स रैंड को नियुक्त किया गया। उसके प्लेग नियंत्रण के तरीके दमनकारी थे। उसके साथ के फौजी अफसर घरों में जबरन घुसकर लोगों में प्लेग के लक्षण ढूँढते और उन्हें अलग कैंप में ले जाते। इस काम के लिए वो घरों में घुसकर औरतों-मर्दों सभी को नंगा करके जाँच करते। तीनों भाइयों को साफ़ समझ में आ रहा था कि महिलाओं के साथ होते इस दुर्व्यवहार के लिए वॉल्टर रैंड ही जिम्मेदार है। उन्होंने देशवासियों के साथ हो रहे इस दमन के विरोध में वाल्टर रैंड का वध करने की ठान ली।

थोड़े समय बाद (22 जून 1897 को) रानी विक्टोरिया के राज्याभिषेक की डायमंड जुबली मनाई जाने वाली थी। दामोदर, बालकृष्ण और वासुदेव ने इसी दिन वॉल्टर रैंड का वध करने की ठानी। हरेक भाई एक तलवार और एक बन्दूक/पिस्तौल से लैस होकर निकले। आज जिसे सेनापति बापत मार्ग कहा जाता है, वो वहीं वॉल्टर रैंड का इन्तजार करने वाले थे मगर ढकी हुई सवारी की वजह से वो जाते वक्त वॉल्टर रैंड की सवारी को पहचान नहीं पाए। लिहाजा अपने हथियार छुपाकर दामोदर हरि ने लौटते वक्त वॉल्टर रैंड का इंतजार किया। जैसे ही वॉल्टर रवाना हुआ, दामोदर हरि उसकी सवारी के पीछे दौड़े और चिल्लाकर अपने भाइयों से कहा “गुंडया आला रे!”

सवारी का पर्दा खींचकर दामोदर हरि ने गोली दाग दी। उसके ठीक पीछे की सवारी में आय्रेस्ट नाम का वॉल्टर का ही फौजी एस्कॉर्ट था। बालकृष्ण हरि ने उसके सर में गोली मार दी, जिससे उसकी फ़ौरन मौत हो गयी। वॉल्टर फ़ौरन नहीं मरा था, उसे ससून हॉस्पिटल ले जाया गया और 3 जुलाई 1897 को उसकी मौत हुई। इस घटना की गवाही द्रविड़ बंधुओं ने दी थी। उनकी पहचान पर दामोदर हरि गिरफ्तार हुए और उन्हें 18 अप्रैल 1898 को फाँसी दी गई। बालकृष्ण हरि भागने में कामयाब तो हुए मगर जनवरी 1899 को किसी साथी की गद्दारी की वजह से पकड़े गए। बालकृष्ण हरि को 12 मई 1899 को फाँसी दी गई।

भाई के खिलाफ गवाही देने वाले द्रविड़ बंधुओं का वासुदेव हरि ने वध कर दिया था। अपने साथियों महादेव विनायक रानाडे और खांडो विष्णु साठे के साथ उन्होंने उसी शाम (9 फ़रवरी 1899) को पुलिस के चीफ कॉन्स्टेबल रामा पांडू को भी मारने की कोशिश की, मगर पकड़े गए। वासुदेव हरि को 8 मई 1899 और महादेव रानाडे को 10 मई 1899 को फाँसी दी गई। खांडो विष्णु साठे उस वक्त नाबालिग थे इसलिए उन्हें दस साल कैद-ए-बामुशक्कत सुनाई गई।

मैंने स्कूल के इतिहास में भारत का स्वतंत्रता संग्राम पढ़ते वक्त दामोदर चापेकर, बालकृष्ण चापेकर और वासुदेव चापेकर की कहानी नहीं पढ़ी थी। जैसे पटना में सात शहीदों की मूर्ती दिखती है, वैसे ही चापेकर बंधुओं की मूर्तियाँ पुणे के चिंचवाड़ में लगी हैं। उनकी पुरानी किस्म की बंदूकें देखकर जब हमने पूछा कि ये क्या 1857 के सेनानी थे? तब चापेकर बंधुओं का नाम और उनकी कहानी मालूम पड़ी। भारत के स्वतंत्रता संग्राम को अहिंसक साबित करने की जिद में शायद इनका नाम किताबों में शामिल करना उपन्यासकारों को जरूरी नहीं लगा होगा। काफी बाद में (2018) भारत सरकार ने दामोदर हरि चापेकर का डाक टिकट जारी किया है।

बाकी इतिहास खंगालिएगा भी तो चापेकर के किए अनुवाद से पहले, सत्यनारायण कथा के पूरे भारत में प्रचलित होने का कोई पुराना इतिहास नहीं निकलेगा। चापेकर बंधुओं को किताबों और फिल्मों आदि में भले कम जगह मिली हो, धर्म अपने बलिदानियों को कैसे याद रखता है, ये अगली बार सत्यनारायण की कथा सुनते वक्त जरूर याद कर लीजिएगा। धर्म है, तो राष्ट्र भी है!

कट्टरपंथियों के हाथों मारे गए हरीश का परिवार आत्मदाह की तैयारी में, नेत्रहीन पिता पहले ही कर चुके हैं आत्महत्या

मजहबी भीड़ के हाथों मारे गए हरीश जाटव के परिवार ने आत्मदाह की चेतावनी दी है। न्याय मिलने में देरी से आहत हरीश के नेत्रहीन पिता रत्तीराम पहले ही जहर खा कर जान दे चुके हैं। अब परिजनों ने जल्द न्याय नहीं मिलने पर आत्मदाह की बात कही है।

मामला राजस्थान के अलवर का है। हरीश के परिजनों ने पुलिस पर मामले को दबाने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि पुलिस के काम करने के तरीके से परेशान होकर ही रत्तीराम ने आत्महत्या की। पीड़ित परिवार का आरोप है कि अलवर पुलिस मॉब लिंचिंग के इस मामले को एक्सीडेंट साबित करने पर तुली हुई है।

गत 16 जुलाई को हरीश जाटव बाइक पर सवार होकर अलवर के भिवाड़ी से अपने गाँव झिवाणा जा रहा था। रास्ते में फलसा गाँव में हरीश की बाइक से दूसरे समुदाय की एक महिला को टक्कर लग गई थी। इसके बाद महिला के परिजनों ने हरीश की जमकर पिटाई की। वह गंभीर रूप से घायल हो गया था। इलाज के दौरान 18 जुलाई को
हरीश की मौत हो गई। हरीश के परिजन इसे मॉब लिंचिंग की घटना बता रहे, वहीं अलवर एसपी ने प्रेसवार्ता कर हरीश की मौत को एक एक्सीडेंट करार दिया।

इस मामले में पुलिस की कथित लापरवाही और हरीश के नेत्रहीन पिता की आत्महत्या के बाद दलित समाज के लोग टपूकड़ा में एकत्रित हो गए और आरोपितों की गिरफ्तारी नहीं होने पर जयपुर-दिल्ली राष्ट्रीय राजमार्ग जाम करने की चेतावनी दी।

मामला सामने आने के बाद बसपा और भाजपा के नेता टपूकड़ा पहुँच गए हैं। दलित समाज के आक्रोश को देखते हुए पुलिस फोर्स तैनात की गई है। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी दलित समाज के प्रमुख लोगों को समझाने के प्रयास में जुटे है। बसपा विधायक संदीप यादव ने बताया कि पार्टी के सभी 6 विधायक इस मामले में मुख्यमंत्री से मिलकर दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की माँग करेंगे।

370 का हटना: देश के स्वाभिमान और विकास का सूरज उगना… लेकिन विरोधियों का मुरझाना

एक भारत, श्रेष्ठ भारत का संकल्प पूरा हो रहा है। भारत के एकीकरण में जो दृढ़ इच्छाशक्ति लौह पुरुष सरदार बल्लभ भाई पटेल ने दिखाई थी, वैसी ही संकल्पबद्धता एवं साहस भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने जम्मू-कश्मीर के अभिशाप अनुच्छेद 370 को समाप्त कर प्रदर्शित किया है।

महाराजा हरिसिंह द्वारा 26 अक्टूबर, 1947 को बिना शर्त भारत में रियासत का विलय किया गया था। लेकिन जवाहर लाल नेहरू पर यह आरोप लगते रहे हैं कि वो मजहबी उन्मादियों के नेता शेख अब्दुल्ला के साथ सांठगांठ कर जम्मू-कश्मीर को भारत से अलग-थलग करने के लिये अनुच्छेद 370 करने का कुचक्र रचने लगे थे।

नेहरू पर षडयंत्र का यह आरोप तब और मजबूत होने लगा, जब भारत की सेना कबाइलियों के वेश में आये पाकिस्तानी सेना के हमलावरों से पूरा कश्मीर का एक—एक इंच वापस लेने के लिये विजयी होती हुई आगे बढ़ रही थी, तभी अचानक उन्होंने अकारण ही एकतरफा युद्ध विराम की घोषणा करके जम्मू-कश्मीर को विवादित बताते हुये स्वयं ही संयुक्त राष्ट्र में जाकर जनमत संग्रह कराने की पहल कराने का प्रस्ताव किया और तत्कालीन उपप्रधानमंत्री व गृह मंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल के राष्ट्रीय एकीकरण की राह एक तरह से बाधा बनते हुए कश्मीर का विषय गृह मंत्रालय से लेकर अपने पास रख लिया।

जब नेहरू ने अचानक 17 अक्टूबर, 1949 को नेहरू ने संसद में अपने कैबिनेट मंत्री गोपालस्वामी अयंगर ने घोषणा करवाई कि वो जम्मू-कश्मीर को अनुच्छेद 370 देना चाहते हैं तो उन पर आरोप गहरा गया। आनन-फानन में बिना पर्याप्त चर्चा के यह अनुच्छेद पारित कर दिया गया।

बाबा साहब अंबेडकर पहले ही अनुच्छेद 370 का विरोध करते हुए इसका प्रारूप तैयार करने से मना कर चुके थे। बाबा साहब ने कहा था कि अनुच्छेद 370 जैसे कानून को तैयार करना और लागू करना देशद्रोह के समान है। किंतु नेहरू नहीं माने और इसका प्रारूप एन गोपालस्वामी अयंगर से तैयार करवाया। हालाँकि नेहरू ने इस धारा को 370 लागू करते समय देश को गुमराह करते हुए कहा कि यह अस्थाई है और जब स्थिति सामान्य होगी तो हट जाएगी, लेकिन जब उन्होंने शेख अब्दुल्ला के साथ मिलकर 1952 में अनैतिक समझौता ‘दिल्ली अग्रीमेंट’ करके अलगाववाद को और ईंधन देने वाली अनुच्छेद 35-ए लागू करने की पृष्ठभूमि तैयार की तो संदेह बढ़ गया कि वो स्वयं ही जम्मू-कश्मीर को शेष भारत से पूर्णतः अलग-थलग करने के षडयंत्रकारी हैं।

भारतीय जनता पार्टी के पूर्ववर्ती संगठन जनसंघ के संस्थापक डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने मुखर विरोध करते हुए कहा कि आर्टिकल 370 व ‘दिल्ली एग्रीमेंट’ से भारत टुकड़ों में बंट रहा है। डॉ मुखर्जी ने जम्मू-कश्मीर को देश की मुख्यधारा से पृथक करने के इस षडयंत्र के विरुद्ध संघर्ष करने का बीड़ा उठाया। उन्होंने इस अनुच्छेद के विरुद्ध भूख हड़ताल की। एक ध्वज, एक विधान और एक प्रधान के नारे के साथ जब वे इसको समाप्त करने की माँग करते हुए आंदोलन के लिए जम्मू-कश्मीर जा रहे थे तो केंद्र की नेहरू और राज्य की शेख अब्दुल्ला की सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और 23 जून 1953 को हिरासत के दौरान ही उनकी रहस्यमय ढंग से हत्या (संदिग्ध मृत्यु) हो गई।

फिर नेहरू ने 1954 में अवैध तरीके एक प्रकार से सांसद व देश की जनता से धोखाधड़ी करते हुए अनुच्छेद 35-ए 11 सितम्बर, 1964 को आर्यसमाज के नेता व सांसद प्रकाशवीर शास्त्री (ओम प्रकाश त्यागी) ने अनुच्छेद 370 को हटाने का एक प्रस्ताव संसद में प्रस्तुत किया।

किंतु तत्कालीन गृहमंत्री गुलजारी लाल नंदा 4 दिसम्बर, 1964 को जवाब में इस विषय को टालते रहे, हालाँकि उन्होंने इतना अवश्य कहा कि इस अनुच्छेद में कमियाँ हैं। तब से न जाने कितनी आँखें जम्मू-कश्मीर पर लगे इस ग्रहण के समाप्त होने का सपना पाले संसार से चली गईं, पर अनुच्छेद 370 का जख्म ठीक होने के बजाय नासूर बनता गया। 70 साल की यह टीस समाप्त किया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने। इस धारा को समाप्त करते हुए संसद में अमित शाह ने कहा, ‘यदि 1948 में सेनाओं को छूट दी गई होती तो आज पाक के कब्जे वाला कश्मीर नहीं होता, पूरा कश्मीर ही भारत का अंग होता।

आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साहस के कारण अनुच्छेद 370 का कलंक हटा है। साथ ही गृह मंत्री ने स्पष्टता व ढृढ़ता से कहा, ‘मैंने जब भी संसद में जम्मू कश्मीर की बात की है उसमें हमेशा पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर और अक्साई चिन भी शामिल है। नरेंद्र मोदी की सरकार इसे छोड़ने वाली नहीं है। पर नेहरू की ऐतिहासिक भूल को सुधारकर जम्मू-कश्मीर को देश के विकास की मुख्यधारा के साथ एकीकृत करने के इस महान कार्य को कॉन्ग्रेस, पीडीपी, नेशनल कॉन्फ्रेंस सहित अनेक विपक्षी दल सहन नहीं कर पा रहे हैं। देशहित के इतने बड़े कार्य के विरोध के पीछे इन दलों ने जो कारण बताए हैं, वे अविश्वसनीय हैं, भ्रम उत्पन्न करने वाले हैं। विशेषकर स्वयं को राष्ट्रीय पार्टी कहने वाली कॉन्ग्रेस का पाकिस्तान की भाषा बोलना दुर्भाग्यपूर्ण है।

यह प्रश्न उठता है कि जिस विषय पर पूरा देश सरकार के साथ है, उस पर ये दल जनभावना व जनादेश का अपमान करते हुए विरोध करने का दुस्साहस कैसे कर पा रहे हैं? असल में उनके विरोध के कारण कुछ और हैं। इन कारणों में एक तो यह जान पड़ता है कि मजहबी आधार पर जम्मू-कश्मीर में जनांकिकीय असंतुलन बनाकर अलगाववाद व आतंकवाद को प्रश्रय देना, दूसरा कुछ परिवारों का भ्रष्टाचार और तीसरा जम्मू-कश्मीर के लोगों को विकास की धारा से दूर रखना, ताकि वे गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, विकासहीनता के दलदल में पड़े रहकर इन परिवारों के लिये वोटबैंक बने रहें और इनके आगे भीख माँगते हुए इनकी गुलामी करते रहें और इनके भ्रष्टाचार की ओर जनता का ध्यान न जाए।

370 पर चर्चा के समय उत्तर देते हुए लोकसभा में गृह मंत्री अमित शाह ने बताया कि वर्ष 2004 से 2019 तक केंद्र सरकार की ओर से इस राज्य को 2 लाख 77 हजार करोड़ रुपए भेजे गए, वर्ष 2011-12 में केंद्र की ओर से देश में जहाँ प्रति व्यक्ति औसत 3683 रुपए भेजे गए वहीं जम्मू-कश्मीर में प्रति व्यक्ति 14255 रुपए गए, किंतु वहाँ की जनता आज भी गरीबी, बदहाली, दुर्दिन में जी रही है।

ये धन कहाँ, किसकी जेब में गया? क्या ये इस बात की पुष्टि नहीं करता है कि विरोधी अनुच्छेद 370 का कवच आतंकवाद और इसके वित्त पोषण एवं कुछ परिवारों के भ्रष्टाचार को संरक्षण देने के लिए चाहते हैं?

बात केवल आर्थिक पक्ष की ही नहीं है। यह अनुच्छेद अमानवीय, लोकतंत्र विरोधी तथा महिला, दलित, आदिवासी और गरीब विरोधी भी थी। इस अनुच्छेद के कारण जम्मू-कश्मीर में बाल विवाह निरोधी कानून लागू नहीं कर सकते थे, जैन व बौद्ध अल्पसंख्यकों के लिये अल्पसंख्यक आयोग नहीं बना सकते थे, अनुसूचित जाति व जनजाति के लिये राजनीतिक आरक्षण नहीं दे सकते थे, बच्चों को शिक्षा का अधिकार लागू नहीं कर सकते थे, भूमि अधिग्रहण अधिनियम लागू नहीं कर सकते थे, राज्य में परिसीमन नहीं कर सकते थे, वाल्मीकि समाज के लाखों सफाईकर्मियों को केंद्र सरकार की योजनाओं का लाभ नहीं दे सकते थे, उन्हें नागरिकता तक नहीं दी गई थी, महिलाओं पर परोक्ष रूप से शरीयत लागू करके उनके अधिकार छीन लिए गए थे, राज्य की महिला अपनी इच्छा से राज्य के बाहर विवाह नहीं कर सकती थी।

यह प्रश्न भी समीचीन है कि जब ऐतिहासिक रूप से केंद्रीय धन का अधिकतम भाग जम्मू-कश्मीर को दिया गया, उसके बाद भी यह बुनियादी ढाँचे, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं, रोजगार के अवसर आदि जैसे विकास के कार्यों में क्यों नहीं परिलक्षित हुआ है? राज्य देश के अन्य राज्यों की तरह विकसित क्यों नहीं हो पाया?

तुष्टीकरण और वोटबैंक की राजनीति करने वाले दलों के लिए 370 के उन्मूलन का विरोध सैद्धांतिक नहीं, अपितु अवसरवादी और पोल खुलने के भय से उपजा है। क्योंकि वे जानते हैं जम्मू-कश्मीर से इस कलंक के समाप्त होने के बाद अब वहाँ निजी निवेश के द्वार खुल जाएँगे, जिससे वहाँ विकास की संभावना बढ़ेगी। निवेश में वृद्धि से रोजगार सृजन में वृद्धि होगी और राज्य में सामाजिक-आर्थिक बुनियादी ढाँचे में और सुधार होगा।

उद्योगों के विकास के लिये निजी लोगों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों से निवेश आएगा और स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा। केंद्र की योजनाओं का सीधा लाभ राज्य की जनता को मिलेगा। अब राज्य में विकास, समता व अधिकार का सूरज निकलेगा तो जनता स्वयं फर्क महसूस करेगी और फिर 70 वर्ष तक उन्हें बुनियादी सुविधाओं, अधिकारों और भागीदारी से वंचित करने वालों से जवाब माँगेगी। यही डर विरोधियों को अनुच्छेद 370 के अभिशाप को हटाने का विरोध करने को मजबूर कर रहा है।

लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं।

बेगम ज़मीना को फ़िदायीन बता विमान में ब्लास्ट की धमकी देने वाला नसीरुद्दीन गिरफ़्तार

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने एक ऐसे शख़्स को गिरफ़्तार कर लिया है जिसने अपनी बेगम को फ़िदायीन बताकर विमान में बम विस्फ़ोट की धमकी दी थी। शख़्स की पहचान 29 वर्षीय नसीरुद्दीन के रूप में हुई है। उसे दिल्ली के बवाना इलाक़े से गिरफ़्तार किया गया।

पूछताछ में उसने अपना ज़ुर्म क़बूल करते हुए बताया कि उसने ही एयरपोर्ट की डायल सेवा को कॉल कर फ़्लाइट उड़ाने की धमकी दी थी। बता दें कि 8 अगस्त को दिल्ली एयरपोर्ट की डायल सेवा को एक गुमनाम कॉल आया था कि जिसमें कहा गया कि एक महिला जिसका नाम ज़मीना है वो फ़िदायीन है। फ़ोन करने वाले ने कहा कि महिला दुबई या सऊदी अरब जाने वाली फ़्लाइट को बम से उड़ा सकती है।

इस कॉल से एयरपोर्ट पर अफरा-तफरी मच गई थी। हरकत में आते हुए दिल्ली पुलिस ने मामले की जाँच शुरू की। जाँच में पता चला कि नसीरुद्दीन की बेगम देश से बाहर जा रही थी। अपनी बीवी को रोकने के लिए उसने कॉल की थी।

Zomato सहित कई की डाइन-इन सर्विस से 1200 से अधिक रेस्तरां कंपनियों ने किया किनारा

देश के कई प्रमुख शहरों की रेस्तरां कंपनियों और एग्रीगेटर्स के बीच विवाद गहरा गया है। लिहाजा 1,200 से अधिक रेस्तरां कंपनियों ने जोमैटो सहित अन्य की डाइन-इन सर्विस से किनारा कर लिया है। जोमैटो ने इसे प्रतिस्पर्धा विरोधी और अवैध बताया है।

मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरू, कोलकाता, गोवा, पुणे और वडोदरा के ये रेस्तरां #Logout अभियान के तहत Zomato, EazyDiner, Nearbuy, MagicPin और Gourmet Passport सहित कई प्लेटफार्मों से बाहर हैं। रेस्तरां कंपनियों का कहना है कि एग्रीगेटर्स द्वारा टेबल रिजर्वेशन सेवाओं पर दी जा रही छूट पर्याप्त नहीं थी और इससे उनके बिजनेस को नुकसान हो रहा था।

जोमैटो ने एक ब्लॉग लिखकर #Logout अभियान से रेस्तरां कंपनियों को सावधान रहने के लिए कहा है। साथ ही जोमैटो ने इन कंपनियों को 45 दिन का नोटिस पीरियड भी दिया है और कहा है कि इस बीच वो उन्हें बता दें कि वो उनकी कंपनी से निकलना चाहते हैं या फिर वापस से ज्वाइन करना चाहते हैं। यदि निकलना चाहते हैं तो क्या वो साइन अप शुल्क का भुगतान करने के लिए तैयार हैं।

नेशनल रेस्टोरेंट एसोसिएशन ऑफ इंडिया (NRAI) के अध्यक्ष राहुल सिंह ने कहा, “दो दिन पहले गुड़गाँव में शुरू हुआ #Logout आंदोलन देशव्यापी हो गया है। यह दिखाता है कि बिज़नेस के इस मॉडल से रेस्तरां कैसे नुकसान झेल रहे थे।”

जम्मू में 2G इंटरनेट सेवा शुरू, श्रीनगर में लैंडलाइन सेवा बहाल

जम्मू-कश्मीर में आज शनिवार (17 अगस्त) से फोन सेवाएँ शुरू हो गई हैं। जम्मू में 2G स्पीड के साथ इंटरनेट सेवा शुरू हो गई है। वहीं कश्मीर के श्रीनगर के राजबाग क्षेत्र में लैंडलाइन सेवा शुरू कर दी गई है। फ़िलहाल, कश्मीर में इंटरनेट सेवा शुरू नहीं हुई है।

ख़बर के अनुसार, जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद-370 के प्रावधानों को हटाए जाने के बाद जो प्रतिबंध लगाए गए थे उन्हें चरणबद्ध तरीक़े से हटाया जाएगा। फ़िलहाल, जम्मू, रियासी ज़िले, सांबा, कठुआ और उधमपुर में 2G इंटरनेट सेवा शुरू कर दी गई है। राज्य के मुख्य सचिव बीवीआर सुब्रमण्यम ने शुक्रवार को मीडिया से बात करते हुए कहा था कि सप्ताह के अंत तक कश्मीर घाटी के सभी स्कूल और कॉलेज खुल जाएँगे और दूरसंचार लिंक भी धीरे-धीरे बहाल हो जाएँगे।

अधिकारी ने इस बात की भी जानकारी दी कि बीते 12 दिनों से लॉकडाउन के दौरान कश्मीर घाटी में किसी व्यक्ति की जान नहीं गई है। उन्होंने जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा निष्प्रभावी किए जाने के बाद घाटी में प्रदर्शनों के दौरान मौत व गंभीर रूप से घायल होने की बात का खंडन किया। उनका कहना है कि पाकिस्तान कश्मीर मुद्दे पर भारत के ख़िलाफ़ अंतरराष्ट्रीय सहानुभूति हासिल करने के लिए विदेशी मीडिया रिपोर्टस का इस्तेमाल कर रहा है। इसके साथ ही उन्होंने यह स्पष्ट किया कि जल्द ही प्रतिबंधों को हटा लिया जाएगा और जीवन पूरी तरह से सामान्य हो जाएगा।

ख़बर के अनुसार, जम्मू-कश्मीर के 22 ज़िलों में से 12 ज़िलों में आम जनजीवन अब सामान्य हो गया है। केवल पाँच ज़िले ऐसे हैं जहाँ रात में पाबंदियाँ लगाई जा रही हैं। बीते शुक्रवार (16 अगस्त) को जुमे की नमाज़ के बाद भी पूरे राज्य में शातिंपूर्ण माहौल रहा।