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Video: ‘अब हम कमजोर हो रहे हैं, हमें समर्थन की जरूरत है’: ईद के दिन मस्जिद में लश्कर के आतंकी

ईद के दिन यानी बुधवार (जून 05, 2019) को जम्मू-कश्मीर के कुलगाम की जामिया मस्जिद में लश्कर-ए-
तैय्यबा के दो आतंकियों ने न केवल ईद की नमाज में घुसपैठ की बल्कि उसके बाद वहाँ मौजूद लोगों को संबोधित किया और लश्कर के समर्थन में नारेबाजी भी की। इस पूरी घटना के दौरान किसी ने भी उन्हें रोकने की कोशिश नहीं की।

लश्कर-ए-तैय्यबा के खूंखार आतंकवादी कश्मीर घाटी में अपनी नापाक हरकतों से बाज नहीं आ रहे हैं। अब लश्कर आतंकियों ने अपनी हरकतों को जारी रखने के लिए लोगों से समर्थन की ‘भीख’ माँगने का नया तरीका निकाला है। जब पूरे हिंदुस्तान में मुस्लिम समुदाय के लोग ईद-उल-फितर की नमाज अदा कर रहे थे और खुशियाँ मना रहे थे, तब लश्कर के आतंकी लोगों को भारत के खिलाफ भड़काने और टेरर फंडिंग करने में जुटे थे।

सोशल मीडिया पर एक वीडियो शेयर किया जा रहा है, जिसमें जम्मू-कश्मीर के कुलगाम के तारिगाम में मस्जिद में ईद की नमाज के दौरान लश्कर के आतंकियों को मस्जिद में घुसकर भारत के खिलाफ जहर उगलते और लोगों को गुमराह करते देखा जा सकता है। आतंकियों के हाथ में पिस्टल भी थीं। इस दौरान आतंकियों में सेना का खौफ भी दिख रहा था, लिहाजा वो अपनी जान बचाने और आतंक की दुकान चलाने के लिए लोगों से समर्थन माँग रहे थे। इतना ही नहीं, ये आतंकी अपने संगठन लश्कर के लिए फंड भी माँग रहे थे।

‘पाकिस्तान से रिश्ता क्या?’ ‘भाई-भाई इलल्लाह’

इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। वीडियो में साफ-साफ दिख रहा है कि लश्कर के दोनों आतंकी एक और शख्स के साथ खड़े हैं। तीसरा शख्स शायद मस्जिद का इमाम हो सकता है। ये दोनों आतंकी नारेबाजी कर रहे हैं और चीख-चीखकर लोगों से वीडियो नहीं बनाने को कह रहा है। कैमरा बंद करने की धमकी भी दे रहे है। इस बीच हवा में हथियार लहराते हुए नारेबाजी भी कर रहे हैं। लश्कर के आतंकी कह रहे हैं, “आप क्या चाहते हैं” तो भीड़ नारे लगाती है, “आजादी”। दूसरे और तीसरे नारे में आतंकी पूछता है, “पाकिस्तान से रिश्ता क्या?” तो भीड़ से आवाज आ रही है “भाई-भाई इलल्लाह”। इसके बाद आतंकी कहता है, “तैयबा-तैयबा” तो भीड़ कहती है- “लश्कर-ए तैय्यबा ।”

इस वीडियो को शेयर करते हुए टीवी एंकर और पत्रकार रोहित सरदाना लिखा है, “कुलगाम की जामिया मस्जिद में ईद के दिन लश्कर का कमांडर बंदूक़ लहरा-लहरा कर तक़रीर करता रहा, किसी मौलाना, किसी इमाम ने रोकने की कोशिश नहीं की?”

मस्जिद में आम लोगों से आतंकी कह रहे थे, “अब हम कमजोर हो रहे हैं और आप लोगों के समर्थन की जरूरत है।” इस बीच आतंकियों ने ईद की नमाज अदा करने आए लोगों से फंड देने को कहा। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ईद की नमाज के दौरान लश्कर के आतंकियों ने आम लोगों से खूब फंड जुटाया।

जम्मू-कश्मीर में भारतीय सेना आतंकियों के खिलाफ अभियान चला रही है और आतंकियों को चुन-चुनकर मारा जा रहा है। पिछले कुछ महीनों में कई बड़े आतंकी कमांडरों को ढेर करने में कामयाबी मिली है। गृह मंत्री अमित शाह के कार्य संभालने के बाद घाटी में आतंकवादियों में डर का माहौल है।

साजिद, आबिद और तौफीक़ ने किया बजरंग दल के कार्यकर्ताओं पर हमला, पुलिस की वर्दी भी फाड़ी

उत्तर प्रदेश के श्यामली में अजुध्या चौक बाजार में गुरुवार (जून 6, 2019) को 3 मुस्लिम युवकों ने मोमोज़ खाने को लेकर बजरंग दल के 2 कार्यकर्ताओं पर हमला किया। हमले में दोनों कार्यकर्ता घायल हो गए। आरोपितों में से एक को पुलिस ने गिरफ्तार किया लेकिन मुस्लिमों की भीड़ ने इकट्ठा होकर पुलिस से हाथापाई शुरू कर दी और अपने साथी को भगा ले गए।

खबरों के अनुसार इन मुस्लिम युवकों का नाम साजिद, आबिद और तौफिक बताया जा रहा है। ये लोग अजुध्या चौक पर मोमोस खाने आए थे जहाँ पहले से बजरंग दल के कार्यकर्ता हिमांशु और हर्ष मौजूद थे। थोड़ी देर बाद बातों ही बातों में झगड़ा शुरू हो गया, और फिर इस झगड़े ने हिंसक झड़प का रूप ले लिया। मुस्लिम युवकों ने अपने साथियों को बुलवाया और हिमांशु और हर्ष की जमकर पिटाई की।

चूँकि घटना बीच बाजार हुई थी, तो बाजार में मौजूद लोग हिमांशु और हर्ष के समर्थन आ खड़े हुए। उन्होंने कार्यकर्ताओं को बचाया और घटना की जानकारी पुलिस को दी। स्थानीय पुलिस वहाँ पहुँची तो आरोपितों में से एक को गिरफ्तार किया। लेकिन कुछ देर बाद ही वहाँ कुछ और मुस्लिमों लोगों की भीड़ आई। उन्होंने गिरफ्तार युवक को छुड़ाने के लिए पुलिस से हाथापाई की और उनकी वर्दी तक फाड़ दी।

स्थानीय व्यापारियों और हिंदू संगठन द्वारा इस मामले पर सख्त जाँच की माँग की जा रही है। पुलिस ने बताया है कि श्यामली पुलिस ने साजिद,आबिद और तौफ़िक के अलावा 50 अन्य लोगों पर भी शिकायत दर्ज की गई है। साथ ही अन्य हमलावरों को पकड़ने के लिए तलाश शुरू कर दी है।

कठुआ और अलीगढ़ का अंतर हमारे कथित लिबरल बिना बोले बताते हैं, इन्हें छोड़िए मत

ऐसा नहीं है कि ढाई साल की सोनम (बदला हुआ नाम, अलीगढ़ घटना की पीड़िता बच्ची) की हत्या पहली बार हुई है। ऐसा भी नहीं हुआ है कि पहली बार आपसी रंजिश के कारण इस तरह का अपराध हुआ हो। ऐसा भी तो नहीं है कि ये साम्प्रदायिक एंगल पहली बार आया हो। ये देश इतना व्यापक है, और यहाँ नकारात्मक तौर पर भी इतनी विविधताएँ हैं कि आप अपने मन से भी कुछ बना कर बोल देंगे कि ‘राह चलते मुस्लिम को हिन्दू ने धक्का मारा’, या ‘मुस्लिमों ने की आगजनी’, तो वो घटना आपको सही में किसी ख़बर की शक्ल में मिल जाएगी।

इस देश में कुछ और भी चीज़ें हैं जो बहुत सामान्य हो गई हैं। हर साल पाँच से सात चुनाव होते हैं। हर साल देश में विचारधाराओं की जंग होती रहती है। हर समय आपको, हर अपराध को हमारे देश का लिबरल हिन्दू-मुस्लिम के चश्मे से देखता हुआ मिल जाएगा। आखिर आप सोचिए कि लिबरल जैसे शब्द गाली क्यों बन गए हैं जबकि ये तो सकारात्मक शब्द हैं? क्योंकि, हमारे देश में ऐसे लोग हद दर्जे के नंगे और दोगले क़िस्म के हैं। मुझे ‘दोगला’ शब्द इस्तेमाल करना पड़ रहा है क्योंकि इससे बेहतर कुछ मिला नहीं जो इनकी सोच का प्रतिनिधित्व कर सके। ये गाली नहीं है, विशेषण है जो हमारे देश के छद्मबुद्धिजीवियों ने बहुत मेहनत से कमाया है।

हम उस समय में जी रहे हैं जब हमारे ही देश का वो हिस्सा जिसने केंकड़े-सी प्रवृत्ति के कारण, सिर्फ टाँग खींचने के (अव)गुण के बल पर अपनी पहचान अंतरराष्ट्रीय मीडिया में बना ली है। हम उस समय में जी रहे हैं जब बेकार हो चुके अभिनेता और अभिनेत्रियाँ, फुँक कर मंद हो चुके तथाकथित निर्देशक अपनी कला के एकमात्र स्रोत के रूप में अपने बापों या माँओं के उस उद्योग में होने को ही बता सकते हैं। हमारा दौर वह है जहाँ अपनी बातों को वजन देने के लिए 300 तथाकथित कलाकार चिट्ठी लिख कर सिग्नेचर कैम्पेन चलाते हैं कि फ़लाँ को वोट मत दो।

जब आपका प्रतिनिधित्व करने वाला साहित्यकार, कलाकार, या लम्बे समय तक सत्ता में पैठ बना चुका नेता ही खोखला निकले तो आपकी छवि सही हो भी नहीं सकती। साथ ही, जब भारत जैसे फ़ाइनल फ़्रंटियर को सपाट करने का सपना बाहर के समुदाय विशेष और ईसाईयों के लिए सतत प्रयास वाला कार्य हो जाए, तो आपकी छवि सही नहीं हो पाएगी। जब आपके मीडिया के सम्मानित लोग दस डॉलर लेकर वाशिंगटन पोस्ट में लेख लिखते हैं, और उस वाशिंगटन पोस्ट को भारतीय समाज पर लिखे गए रिपोर्ट का सत्यापनकर्ता मान कर भारतीय मीडिया स्खलित होने लगता है, तब आपकी छवि बर्बाद ही हो पाएगी, अच्छी नहीं।

आप जरा सोचिए कि क्या मंगलयान छोड़ने पर भारत को भैंसपालक बता कर उपहास करने की धृष्टता करने वाला न्यूयॉर्क टाइम्स भारतीय समाज को लेकर कभी सकारात्मक रिपोर्टिंग कर पाएगा? आप जरा सोचिए कि लगातार फेक न्यूज छाप कर, फेक न्यूज पर फर्जी रिसर्च छाप कर, टुटपँजिए लौंडों के ब्लॉग को लीड ख़बर बनाने वाला, नस्लभेदी, कॉलोनियल मानसिकता से सना हुआ, पत्रकारिता का बेहूदा मापदंड बीबीसी, या बिग बीसी, कभी भारत को लेकर नकारात्मक बातों को हवा देने से बाज़ आएगा? जी नहीं, नहीं आएगा। इसलिए आप उनकी तरफ देखना बंद कीजिए।

आप उनकी तरफ देखना बंद इसलिए कीजिए क्योंकि सत्ता के खिलाफ लिखने से लेकर, नकारात्मक बातों को उस पूरे समाज का नमूना बता कर पेश करना पत्रकारिता नहीं है। पत्रकारिता यह नहीं है कि कठुआ की पीड़िता नाम की मासूम बच्ची की हत्या आठ लोगों ने कर दी तो उसे ऐसे दिखाया गया कि यहाँ का हर हिन्दू, दूसरे मजहब की हर बच्ची की हत्या या बलात्कार करने की फ़िराक़ में रहता है। पत्रकारिता यह नहीं है कि जुनैद सीट के झगड़े में मरता है और बताया जाता है कि हिन्दुओं में असहिष्णुता है। पत्रकारिता यह नहीं है कि प्रकाश मेशराम नामक पुलिस वाले के ऊपर समुदाय विशेष के गौतस्कर भागते हुए गाड़ी चढ़ा कर मार देते हैं, और वो ख़बर होमपेज तक नहीं पहुँच पाती।

फिर आप कहाँ देखेंगे जब सोनम की हत्या कोई जाहिद कर देगा? आपको लगता है कि साड़ी और ब्लाउज़ सिलवाने पर ध्यान देने वाली, फ़िल्मों के पास होने पर तख्ती लगवाने वाली, खास नेताओं की गोद में कूदने वाले, भेड़ चाल में शरीक होने वाले लोग आपकी आवाज बनेंगे? वो नहीं बनेंगे क्योंकि पीड़ित बच्ची, जो ढाई साल की थी, उसका नाम सोनम शर्मा है, शबनम, सलमा, या जाहिदा नहीं, और उसे मारने वाले का नाम राजेश, सुरेश, रमेश या गौतम नहीं है।

अब ये दोगले लोग, जो वैश्विक स्तर तक भारत जैसे देश को दुनिया का रेप कैपिटल बना आए, जबकि भारत बलात्कार के मामले में शीर्ष दस देशों में भी कहीं नहीं आता, चुप हैं क्योंकि यहाँ हिन्दू और दूसरा मजहब तो है, लेकिन पात्रों के संदर्भ बदल गए हैं। इससिए इनसे उम्मीदें मत पालिए। हाँ, उनके नाम लेकर बुलाइए इन्हें क्योंकि इन्हें याद दिलाना ज़रूरी है कि तुम्हें आम जनता अब कैसे देखती है।

अब यह कहा जा रहा है कि पुलिस स्टेटमेंट में तो सोनम के रेप की पुष्टि नहीं हुई है। पुलिस स्टेटमेंट और डॉक्टर की टिप्पणी में तो उस बच्ची के उन अंगों का भी गायब होना लिखा हुआ है। पुलिस के स्टेटमेण्ट का इंतजार तो इशरत जहाँ से लेकर अमित शाह और मोदी तक के किसी भी मामले में नहीं किया गया था। पुलिस स्टेटमेण्ट का इंतजार तो कठुआ की पीड़िता के भी रेप कन्फर्म होने तक नहीं किया गया था।

यहाँ पर दूसरी बात और है कि समुदाय विशेष के व्यक्ति का आरोपित होना ही इन दोगलों की पूरी जमात के लिए चुप्पी साधने के लिए काफी होता है। इन्हें जब गाली पड़ती है तो ये बाहर आकर कहते हैं कि इसका राजनीतिकरण नहीं होना चाहिए। ये बहुत ही गम्भीर मुद्रा में बताते हैं कि बच्ची को इंसाफ़ मिलना चाहिए, मजहब तलाश करने से कुछ नहीं मिलने वाला।

जबकि सत्य यह है कि जब पहली बार हिन्दू-मुस्लिम हुआ, और तुमने लिख कर हमें बताया कि अपराधी का हिन्दू होना भर ही उसमें धर्म और मज़हब का एंगल ले आता है, तो फिर यहाँ भी वही तर्क क्यों न इस्तेमाल किया जाए? अपराधी के अपराध करने के पीछे की मंशा अगर यह रही हो कि वो मजहब विशेष का है इसलिए उसका बलात्कार करने के बाद उसकी हत्या कर दी जाए, तो समझ में आता है कि उस अपराधी ने धर्म को आधार बना कर अपराध को अंजाम दिया।

हालाँकि, इसके बाद भी वो एक धार्मिक अपराध नहीं है। इसके बाद भी आप यह नहीं कह सकते कि हिन्दू ने दूसरे समुदाय वाले का रेप किया। नैतिकता, सामाजिकता, विवेक और न्यायसंगत बात यह है कि आप लिखें और बोलें कि बच्ची का बलात्कार हुआ और अपराधी ने धर्म को आधार बना कर ऐसा किया। आप इस अपवाद सदृश अपराध को उदाहरण जैसा बना कर नहीं लिख सकते।

लेकिन, आपने पहले कठुआ की पीड़िता को इंसाफ़ दिलाने के नाम पर दोगलई दिखाते हुए, अपनी सफ़ेद तख़्तियों पर ‘हिन्दू’, ‘देवीस्थान’, ‘हिन्दुस्तान’ जैसे शाब्दिक प्रतीकों का इस्तेमाल किया है तो फिर आपको विपरीत विचारधारा वाले तो याद दिलाएँगे ही कि दोगलो, अब किस बिल में छुपे हुए हो। आपको तो गालियाँ पड़ेंगी ही कि जब कठुआ की पीड़िता के समय पूरा हिन्दू समाज पर ही शर्मिंदगी का बोझ डाला जा रहा था तो फिर आज समुदाय विशेष पर वही कृपा क्यों नहीं की जा रही?

यहाँ बात किसी सोनम या कठुआ की पीड़िता की नहीं है। मैं यह जानता हूँ कि सामाजिक अपराध का बोझ किसी भी धर्म या मज़हब पर तब तक नहीं डाला जा सकता जब तक सामूहिक रूप से, व्यवस्थित तरीक़ों से ऐसी घटनाओं को वृहद् स्तर पर अंजाम दिया जाए। मजहबी दंगों का भी बोझ हर जगह के हिन्दू या दूसरे मजहब वाले नहीं उठा सकते क्योंकि वो एक छोटे से इलाके के कुछ लोग करते हैं। इसलिए अख़लाक़ की मौत पर मैं संवेदनशील हो सकता हूँ कि ऐसा नहीं होना चाहिए, लेकिन मैं एक भारतीय या हिन्दू के तौर पर शर्मिंदा नहीं हो सकता।

इन बलात्कार या मौतों पर मेरे धर्म या राष्ट्र की धार्मिक किताब या संविधान की सहमति नहीं है। अगर ऐसा होता तो बेशक मैं कहता कि हम किस धर्म या राष्ट्र का हिस्सा हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। ठीक उसके विपरीत, ये जो नौटंकीबाज़ कलाकार और साहित्यकार जब किसी भी वैश्विक या सामाजिक मंच पर हमारे समाज या देश की छवि बर्बाद करते हैं, तब हर भारतीय नागरिक का यह संवैधानिक कर्तव्य बनता है कि इनका मुँह बंद किया जाए। इनका मुँह बंद करना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि ये एक सामाजिक अपराध को राजनैतिक बनाते हुए पूरे धर्म और देश की छवि को नुकसान पहुँचा रहे हैं।

दूसरी बात यह है कि इन निर्लज्ज लम्पटों को छोड़ना या इग्नोर करना भी गलत है। गलत बात को देख कर चुप रहना भी अपराध ही है। इसलिए, इनकी बिलों में हाथ डालना पड़े तो बेशक डालिए, ये चिंचियाते रहें, इन्हें पूँछ पकड़ कर बाहर निकालिए और इनसे पूछिए कि वो जो ट्वीट तुमने लिखा है कि हमें इसका राजनीतिकरण नहीं करना चाहिए, वो तुम्हारे उसी बाप ने लिख कर दिया है जिसके नाम के कारण तुम हीरो और हीरोईन बने फिरते हो, या किसी पेड़ के नीचे नया ज्ञान प्राप्त हुआ है।

जब युद्ध वैचारिक होते हैं और सामने वाला सेलेक्टिव रूप से आप पर हमले बोलता है, तो आपको नैतिकता त्यागनी होगी। आप यह कह कर बैठे नहीं रह सकते कि ‘रहने दो, ये लोग तो अभी चुप हैं’। जी नहीं, इनको राजनैतिक रूप से धूल चटाने के बाद इनको तोड़ना जरूरी है, इनको मसलना जरूरी है, इनको इतना गिराना है कि ये उठने लायक न रहें।

ये सारी बातें फर्जी हैं कि विरोध का स्वर होना चाहिए, लोकतंत्र में विरोधियों का होना आवश्यक है। ये बेकार की बातें भी इन्हीं लिबरलों और वामपंथियों ने चलाई हैं। जब विरोधी इस घटिया स्तर के हों तो उनका समूल नाश अत्यावश्यक है। और हाँ, ये हम तय करेंगे कि इनका स्तर घटिया है कि नहीं। क्योंकि हमने इन्हें लगातार झेला है, हमने इन्हें दीमकों में बदलते देखा है, हमने इन्हें कुतरते देखा है, हमने इन्हें ठोस जगहों को धीरे-धीरे धूल बनाते देखा है। इसलिए हम यह जानते हैं कि इनके विरोध का स्तर घटिया और सेलेक्टिव है।

अतः, बात सोनम की तो है ही नहीं। बात कठुआ की पीड़िता की तो थी ही नहीं। बात तो हिन्दुओं को बदनाम करने की थी। बात राष्ट्र की छवि बर्बाद करने की थी कि दूसरे देश को लोग अपने देश की कम्पनियों पर दबाव बना सकें, अपने नेताओं पर दबाव बना सकें कि भारत के साथ संबंध मत रखो। आज के दौर में जब बात ग्लोबल विलेज की होती है, वैश्विक मंचों पर आपसी संबंधों की होती है, तो राष्ट्र की छवि का असर पड़ता है।

सत्ता की मलाई से दूर हो चुके लोग, किसी भी हद तक गिर कर सरकारों को हिलाने की कोशिश में लगे हुए हैं। ये लोगों में डर पैदा करना चाहते हैं कि फ़लाँ सरकार तो हिन्दुओं को कह रही है कि अल्पसंख्यकों को काट दो, दंगे करा दो। लेकिन लोगों को इन पर अब विश्वास होना बंद हो चुका है। आप कभी इन लोगों के सोशल मीडिया पोस्ट के नीचे के कमेंट पढ़िए। आपको पता चलेगा कि इनकी स्वीकार्यता कितनी गिर चुकी है।

हर जगह ये गाली सुनते रहते हैं। हर पोस्ट पर लोग इन्हें घेर कर याद दिलाते हैं कि इन्होंने मुद्दों को चुन-चुन कर, उसमें जाति और धर्म देखने के बाद, राज्य में किसकी सरकार है, यह गूगल से पता लगाने के बाद अपनी भावनाओं को भाड़े के शब्दों की अभिव्यक्ति दी है।

इन घटनाओं को देख कर लगता है कि सिर्फ अपने मतलब की सरकार के आ जाने से वैचारिक युद्ध ख़त्म नहीं होता। वैचारिक युद्ध बाँस की जड़ों पर कन्सन्ट्रेटेड एसिड डाल कर, इनके दोबारा पनपने की शक्ति को ही ख़त्म करके जीते जाते हैं। इन्होंने समाज को धर्म और जाति के आधार पर बाँटा है। लोगों में भय फैलाने की कोशिश की है। इन लोगों को तब तक इनके कुकृत्यों की याद दिलाते रहना ज़रूरी है जब तक ये अपना अँगूठा उठाने से पहले अच्छी तरह से सोचने न लगें कि जो ये नौटंकी रचने जा रहे हैं, उस पर क्या प्रतिक्रिया आएगी।

सोनम या कठुआ की पीड़िता की लड़ाई प्रतीकों की लड़ाई है। इसके लिए आप सरकार का मुँह मत देखिए। इसमें आप घृणा मत लाइए क्योंकि फिर आपको दूसरी विचारधारा के लोग ख़ारिज करने लगेंगे। इसमें इनके पुराने पोस्ट और ट्वीट निकालिए, इन्हें याद दिलाइए कि घृणा फैलाने का काम तो इन्होंने किया है। इनकी पूरी खेती ही घृणा की है, हम तो बस आईना लेकर खड़े हो गए हैं।

असलम कर चुका है अपनी 4 साल की बेटी का भी बलात्कार: ‘सोनम’ की माँ का आरोप

अलीगढ़ में ढाई साल की सोनम (बदला हुआ नाम) शर्मा के साथ बलात्कार के बाद दरिंदगी से मार देने की घटना के बीच एक हैरान कर देने वाला तथ्य भी सामने आया है। अलीगढ़ में ढाई साल की जिस बच्ची को दरिंदगी से मार दिया गया, उस बच्ची की माँ ने उनमें से एक आरोपित असलम पर बड़ा ‘आरोप’ लगाया है।

सोनम शर्मा की माँ ने कहा है कि असलम नाम के आरोपित ने अपनी 4 साल की बेटी के साथ भी बलात्कार किया था और उसकी पत्नी अपनी बेटी को लेकर अपने पिता के घर चली गई थी। बच्ची की माँ ने कहा कि आरोपितों के खिलाफ अगर कार्रवाई नहीं की गई, तो उन्हें आगे भी अपराध करने का बढ़ावा मिलेगा।

मृतक बच्ची की माँ ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से निवेदन किया है कि दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए और दोषियों के लिए मौत की सजा की माँग रखी है। बच्ची की माँ ने कहा कि दोषी अगर 7 साल में ही छूटकर आ जाते हैं तो वे अपराध करने के लिए और प्रोत्साहित होंगे।

उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में ढाई साल की बच्ची सोनम शर्मा के साथ हुई दरिंदगी से पूरा देश सदमे में है। ढाई साल की बच्ची जो अभी ठीक से खड़ी भी नहीं हो पाती होगी, उसके साथ जाहिद और असलम ने जो हैवानियत की है उसे सुनकर किसी की भी रूह काँप जाएगी। हालाँकि मीडिया का एक बड़ा ‘सेक्युलर’ और ‘निष्पक्ष’ वर्ग ऐसा है, जो अभी भी जाहिद और असलम के पक्ष को मजबूत साबित करने का प्रयास कर रहा है। जाहिद और असलम ने महज़ ₹5000 के लिए ढाई साल की बच्ची को बेरहमी से मार डाला। बच्ची को इंसाफ दिलाने के लिए अब पूरे देश से आवाज उठ रही है।

ढाई साल की बच्ची 30 मई को अचानक लापता हो गई थी और 2 जून को उसका शव मिला। पुलिस के मुताबिक
बेइज्जती का बदला लेने के लिए मोहल्ले के ही जाहिद और असलम ने बच्ची की हत्या कर दी। बच्ची के घरवालों ने जाहिद को 40 हजार रुपये उधार दिए थे, जिनमें 35 हजार रुपये तो उसने वापस कर दिए थे लेकिन बाकी पांच हजार रुपये मांगने पर जाहिद ने अपनी बेइज्जती की बात कही थी। ₹5000 के लिए ढाई साल की बच्ची को बेरहमी से मार डाला। बच्ची को इंसाफ दिलाने के लिए अब पूरे देश से आवाज उठ रही है।

मासूम ‘सोनम’ की नृशंस हत्या मामले की जाँच के लिए SIT गठित

अलीगढ़ के टप्पल में ढाई वर्षीय सोनम (बदला हुआ नाम) की नृशंस हत्या मामले की जाँच के लिए उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा एक विशेष जाँच दल (SIT) का गठन किया गया है।

पुलिस के अनुसार, इस मामले में POCSO (यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण) अधिनियम के तहत कार्रवाई की जाएगी। डीजी (लॉ एंड ऑर्डर) आनंद कुमार के अनुसार, ‘अलीगढ़ एसएसपी ने मामले को तेजी से ट्रैक करने के लिए एक SIT का गठन किया है जिससे अपराधियों को जल्द से जल्द सज़ा दिलाई जा सके। उन्होंने कहा कि साइंटिफ़िक सबूतों के आधार पर जाँच आगे बढ़ाई जा रही है।’

इसके आगे उन्होंने कहा कि माता-पिता के बयानों के आधार पर दो मुख्य दोषियों को गिरफ़्तार कर लिया गया है और संबंधित SHO के ख़िलाफ़ भी कार्रवाई की गई है। उन्होंने कहा कि अगर कोई अन्य पुलिस कर्मी भी इस मामले में लापरवाही का दोषी पाया गया तो उसके ख़िलाफ़ भी कार्रवाई की जाएगी।

इससे पहले हमने एक ख़बर की थी जिसमें आरोपी ज़ाहिद और असलम के अपराधों पर पर्दा डालने का प्रयास किया गया था, जिसमें यह दावा किया गया कि बच्ची का बलात्कार नहीं किया गया, जबकि सच्चाई यह है कि अभी पोस्टमार्टम रिपोर्ट में ऐसा कोई तथ्य निकलकर सामने नहीं आया। फ़िलहाल, POCSO अधिनियम भी जाँच में शामिल कर लिया गया है। इस मामले की पूरी सच्चाई बाहर आना अभी बाक़ी है, फिर कोई यह कैसे कह सकता है कि बच्ची का यौन शोषण हुआ ही नहीं था। इसलिए, जाँच में यौन शोषण के एंगल को ख़ारिज नहीं करना चाहिए।

इसके अलावा, पुलिस अधिकारियों द्वारा बरती गई लापरवाही पर डीजी ने टिप्पणी करते हुए कहा कि पुलिस के बयानों को अंतिम सत्य के रूप में नहीं लिया जा सकता है। ख़ासकर तब, जब साइंटिफ़िक सबूत कुछ और ही हक़ीकत बयाँ करते हों।

इलाज से नाखुश रफीक ने डॉक्टर की पत्नी को मार डाला, बेटे को भी किया घायल

इंदौर में डॉक्टर के इलाज से नाखुश रफीक राशिद नाम के व्यक्ति ने गुरुवार (जून 6, 2019) को गुस्से में डॉक्टर की पत्नी की हत्या कर दी। खबरों के अनुसार राशिद डॉक्टर से मिलने मालवा हिल्स पर मौजूद उनके क्लिनिक पर गया था। लेकिन वहाँ डॉक्टर राम कृष्ण मौजूद नहीं थे बल्कि उनकी पत्नी लता वर्मा थीं जो अपने पति को क्लिनिक के काम में मदद करती थीं।

लता ने रफीक को बताया कि उनके पति शहर से बाहर गए हुए हैं। इस पर रफीक ने लता से बहस करनी शुरु कर दी। थोड़ी देर में ये बहस इतनी ज्यादा बढ़ गई कि रफीक ने महिला को चाकू मारना शुरू कर दिया। जब डॉक्टर का बेटा अभिषेक अपनी माँ को बचाने के लिए बीच में आया तो रफीक़ ने लड़के पर भी चाकू से वार किए। अस्पताल पहुँचने के बाद लता को मृत घोषित कर दिया गया, जबकि अभिषेक अभी खतरे से बाहर बताया जा रहा है।

तुकोगंज के सीएसपी बीपीएस परिहार ने हिन्दुतान टाइम्स से हुई बातचीत में बताया कि 45 वर्षीय रफीक राशिद त्वचा सम्बंधी रोग से पीड़ित था। उसका इलाज पिछले 6 महीने से डॉक्टर रामकृष्ण वर्मा कर रहे थे, लेकिन उसे इससे कोई फायदा नहीं हो रहा था। गुरुवार को सुबह 11 बजे जब रफीक डॉक्टर के पास पहुँचा तो लता ने उसे बताया कि डॉक्टर दिल्ली गए हुए हैं।

जिसके बाद रफीक को गुस्सा आ गया और उसने 50 वर्षीय महिला पर लगातार चाकू से वार किए। पुलिस ने बताया कि आरोपित चाकू को अपने साथ लेकर आया था। मदद के लिए माँ की आवाज सुनते ही जब डॉक्टर का बेटा अभिषेक अपनी माँ को बचाने आया तो रफीक ने उसे भी चाकू मारे और भाग निकला। कुछ लोगों ने चीखने चिल्लाने की आवाज सुनी और रफीक को धर पकड़ा। बाद में उसे पुलिस के हवाले कर दिया गया।

फ़िलहाल, पुलिस रफीक से पूछताछ कर रही है। पुलिस पता करने की कोशिश कर रही है कि डॉक्टर की गैर मौजूदगी में कहीं रफीक ने महिला के साथ शारीरिक सम्बंध बनाने का प्रयास तो नहीं किया। पुलिस के मुताबिक आरोपित 2015 में भी एक मर्डर के केस में शामिल था, अभी वो बेल पर बाहर है। रफीक हमेशा अपने पास चाकू रखता है।

शपथ ग्रहण के बाद अब ममता का NITI आयोग से भी किनारा, नेहरू के बहाने PM मोदी को लिखी चिट्ठी

ऐसा लगता है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी लोकसभा चुनाव के दौरान हुई राजनीतिक हत्याओं में मारे गए लोगों के परिवारजनों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में बुलाए जाने से अभी तक नाराज हैं। PM मोदी के इस निर्णय से ममता इतनी आहत हैं कि पहले तो उन्होंने शपथ ग्रहण समारोह में जाने का अपना निर्णय बदला और अब NITI आयोग की बैठक में भी शामिल नहीं होंगी। जाहिर सी बात है कि उनके इस हठ का परिणाम पश्चिम बंगाल की जनता और शासन-प्रशासन को भी झेलना पड़ सकता है।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक बार फिर तल्ख तेवर दिखाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में होने वाली NITI आयोग की बैठक से किनारा कर लिया है। इस बैठक में सभी प्रदेशों के मुख्यमंत्री भाग लेने वाले हैं। लेकिन, ममता बनर्जी ने पीएम मोदी को चिट्ठी लिखकर इसमें शामिल होने से इंकार कर दिया है। ममता बनर्जी ने चिट्ठी में कहा है कि NITI आयोग के पास कोई आर्थिक अधिकार नहीं हैं, साथ ही यह राज्यों की नीतियों का समर्थन करने की भी ताकत नहीं रखता। ऐसे में उनका बैठक में शामिल होना बेकार है।

नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह के बाद ममता बनर्जी का नीति आयोग की कमियों पर ध्यान गया और उन्होंने तीन पेज की चिट्ठी लिखकर नीति आयोग को लेकर कई सवाल उठाए हैं। 15 जून को नई दिल्ली में नीति आयोग की बैठक होनी है, जिसमें केंद्र सरकार ने सभी राज्यों के मुख्यमंत्री, नीति आयोग के सदस्य और केंद्रीय मंत्रियों को बुलाया है। नरेंद्र मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल की ये पहली बैठक है।

ममता बनर्जी ने अपनी चिट्ठी में लिखा है, “मुझे इस बैठक के बारे में बताया गया है, लेकिन इसको लेकर मैं कुछ सवाल करना चाहूँगी। आपने 5 अगस्त 2014 को नीति आयोग का गठन, योजना आयोग को खत्म कर के किया था, तब किसी भी मुख्यमंत्री से नहीं पूछा था।” बंगाल की मुख्यमंत्री ने सवाल किया है कि जब नीति आयोग किसी भी राज्य की वित्तीय मदद नहीं कर सकता है, ना ही राज्यों द्वारा चलाई जा रही योजना में किसी तरह की सहायता करता है, तो फिर इस बेमतलब की बैठक में आने का क्या फायदा है?

अपने पत्र में ममता बनर्जी ने कहा कि आपको (पीएम मोदी) पता होगा कि योजना आयोग एक राष्ट्रीय योजना समिति थी, जिसे पंडित जवाहर लाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस ने 1938 में बनाया था। 1950 में योजना आयोग का जब गठन किया गया, तब इसके पास वित्तीय शक्तियां थीं और इसके जरिए मुख्यमंत्रियों के साथ विकास संबंधी योजनाओं पर बात-विचार किया जाता था।

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नरेंद्र मोदी को किसी भी सूरत में प्रधानमंत्री ना बनने देने का सपना देखने वाली ममता बनर्जी उनके दोबारा प्रधानमंत्री बनते ही पूरी तरह से बौखला चुकी हैं। ममता बनर्जी ने नरेंद्र मोदी पर चुनाव के दौरान भी लगातार जुबानी हमले जारी रखे और अब यह केंद्र बनाम राज्य की लड़ाई बनती जा रही है। इससे पहले ममता बनर्जी ने नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में आने से इनकार कर दिया था। पहले तो उन्होंने निमंत्रण को स्वीकार किया था, लेकिन जब सरकार की ओर से भारतीय जनता पार्टी के उन कार्यकर्ताओं के परिवारजनों को न्योता दिया गया, जिनकी हत्या चुनाव के दौरान हुई थी तो ममता ने जाने से इनकार कर दिया था।

आंध्र प्रदेश में 1 , 2 या 3 नहीं कुल 5 डिप्टी सीएम होंगे, ये रही वजह

एक राज्य में कितने डिप्टी सीएम हो सकते हैं? वैसे सवाल तो यह भी है कि अभी तक आपने किसी राज्य में कितने डिप्टी सीएम के बारें में सुना है? शायद एक या दो डिप्टी सीएम के बारे में सुना होगा। लेकिन चौकाने वाली ख़बर यह है कि आंध्र प्रदेश में पाँच डिप्टी सीएम होंगे। कुछ ऐसा ही आदेश आंध्र प्रदेश के नवनिर्वाचित सीएम जगनमोहन रेड्डी ने दिया है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, वाईएसआरसीपी के एमएलए मोहम्मद मुस्तफा शाइक का कहना है कि आंध्र प्रदेश में एससी, एसटी, ओबीसी, अल्पसंख्यक और कापू समाज से एक-एक डिप्टी सीएम होंगे। इतना ही नहीं उन्होंने कहा कि सरकार के इस फैसले से पूरे आंध्र प्रदेश में खुशी का माहौल है।

वैसे अगर अभी तक के राजनीतिक इतिहास पर नज़र डाला जाए तो जगनमोहन रेड्डी का यह फैसला ऐतिहासिक है। पाँचों डिप्टी सीएम न केवल विभिन्न सामाजिक वर्गों से हैं बल्कि आंध्र की राजनीतिक समीकरण साधने के लिए अलग-अलग इलाकों का भी खास ध्यान रखा गया है। रायलसीमा, प्रकाशम, कृष्णा डेल्टा गोदावारी और वाइजैग इलाके से ये डिप्टी सीएम नियुक्त होंगे।

जगनमोहन रेड्डी ने अपने इस ऐतिहासिक फैसले पर कहा कि पिछले 10 वर्षों में राज्य के सभी समाज के लोगों ने टीडीपी सरकार के खिलाफ मेहनत की है। आज जब हमें सरकार में आने का मौका मिला है तो उन्हें लगता है कि राज्य के सभी इलाकों के साथ-साथ समाज के सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।

वैसे विशेषज्ञों का कहना है कि आंध्र प्रदेश की राजनीति में रेड्डी और कम्मा समाज का दबदबा है। टीडीपी के चंद्रबाबू नायडू का संबंध जहाँ रेड्डी समाज से है तो जगनमोहन रेड्डी कम्मा समाज से आते हैं। पारंपरिक तौर पर राज्य में एससी और अल्पसंख्यक समाज कॉन्ग्रेस को वोट देते रहे हैं। लेकिन इस दफा ये समीकरण बदला और इन दोनों समाजों के ज्यादातर वोट वाईएसआर के समर्थन में गए।

अब देखना ये है कि राजनीति के विसात पर जगन रेड्डी का यह फैसला कितना कारगर होता है। कहीं ऐसा तो नहीं कि यह प्रयोग सिर्फ राजनीतिक बंदरबाँट ही साबित हो!

ICC का दोहरा रवैया: मैदान पर नमाज पढ़ना सही, धोनी के बैज से है दिक्कत

आईसीसी क्रिकेट वर्ल्ड कप 2019 में महेंद्र सिंह धोनी के विकेटकीपिंग दस्ताने विवाद का मुद्दा बन गए है। दरअसल, धोनी के इन ग्लव्स पर भारतीय सेना के स्पेशल फ़ोर्स का ‘बलिदान’ बैज लगा है, जिसपर आईसीसी ने आपत्ति जताई है। आईसीसी ने धोनी को अपने दस्ताने से बैज हटाने को कहा है। हालाँकि इस मामले पर बीसीसीआई की बैठक मुंबई में हुई। बीसीसीआई का कहना है कि धोनी का बैज न राजनैतिक है, न ही कमर्शियल है और न ही धार्मिक, इसमें आपत्ति का कोई सवाल ही नहीं है।

बीसीसीआई ने इस बात का भी खुलासा किया कि धोनी के दस्तानों के लिए बीसीसीआई ने आईसीसी पहले ही इजाजत माँग ली थी। ऐसे में सवाल उठता है कि इजाजत देने के बाद आपत्ति क्यों जताई जा रही है। इस मामले पर वीडियो कॉल के जरिए कप्तान विराट कोहली और टीम मैनेजमेंट के बीच चर्चा होगी।

आईसीसी की इस आपत्ति के बाद पाकिस्तान सरकार के मंत्री फवाद हुसैन ने धोनी के ख़िलाफ़ बयान दिया है। फवाद ने कहा है, “धोनी इंग्लैंड में क्रिकेट खेलने के लिए गए हैं न कि महाभारत के लिए। भारतीय मीडिया में यह क्या बहस चल रही है… मीडिया का एक वर्ग युद्ध से इतना प्रभावित है कि उन्हें सीरिया, अफगानिस्तान या रवांडा भेजा जाना चाहिए।”

जबकि आईपीएल अध्यक्ष राजीव शुक्ला ने इस मुद्दे पर कहा है कि आइसीसी को अपने इस नियम पर दोबारा से पुनर्विचार करना चाहिए क्योंकि ये नियम व्यवसायिक प्रतिबद्धता के लिए लागू होता है। राजीव ने कहा कि महेंद्र सिंह धोनी सिर्फ़ देश की सेना के लिए अपनी भावनाओं को प्रकट कर रहे हैं, उन्होंने किसी तरह का कोई नियम नहीं तोड़ा है।

इसी तरह मशहूर लेखक तारेक फतेह ने भी महेंद्र सिंह धोनी के समर्थन में आवाज़ उठाई है। तारेक फतेह ने ट्वीट करते हुए लिखा कि आईसीसी को पूरी पाकिस्तान टीम से कोई दिक्कत नहीं होती, जो खेल के मैदान ईसाइयों और यहूदियों की निंदा करते हुए नमाज पढ़ती है, लेकिन उन्हें धोनी के दस्तानों पर बने बलिदान के निशान से आपत्ति है।

हजारों पोस्टकार्ड ममता के नाम, डाक विभाग हुआ परेशान

पश्चिम बंगाल में बीजेपी और तृणमूल कॉन्ग्रेस के बीच चल रही राजनीतिक जंग थमने का नाम नहीं ले रही। दोनों के बीच तक़रार इतनी बढ़ गई है कि एक-दूसरे पर पलटवार करने से भी नहीं चूकते। ताज़ा मामला पोस्टकार्ड्स को लेकर है जिसकी वजह से डाक विभाग ख़ासा परेशान है। दरअसल, पिछले कुछ दिनों से साउथ कोलकाता पोस्ट ऑफ़िस में हज़ारों की संख्या में पोस्टकार्ड्स का अंबार लग गया है। इन पोस्टकार्ड्स पर ‘जय श्रीराम’ लिखा हुआ है और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को भेजा गया है। ममता बनर्जी का घर इसी पोस्ट ऑफ़िस के कार्यक्षेत्र में आता है।

वैसे तो डाक विभाग के कर्मचारियों के लिए पोस्टकार्ड काफ़ी मायने रखते हैं और इसीलिए डाक विभाग प्रत्येक डाक को यथास्थान तक पहुँचाने को अपनी ज़िम्मेदारी समझता है। लेकिन, वर्तमान स्थिति ऐसी हो गई है कि हज़ारों की संख्या में आए पोस्टकार्ड्स उनके लिए चुनौती बन गए हैं। ख़बर के अनुसार, पोस्ट ऑफ़िस के सूत्रों ने बताया:

“आमतौर पर सीएम के लिए 30-40 पोस्टकार्ड और रजिस्टर लेटर आते थे। लकिन अचानक से यह कई गुना बढ़ गया है।” उन्होंने इस बात की भी जानकारी दी कि ये पोस्टकार्ड्स अब उनके कार्यालय द्वारा प्रतिदिन संभाले जा रहे कुल डाक का 10 प्रतिशत अधिक हैं।

ख़बर है कि गुरुवार (6 मई) को रेलवे मेल सर्विस ने भी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को भेजे गए क़रीब 4,500 पोस्टकार्ड्स अलग किए। ममता बनर्जी और उनकी पार्टी के कार्यकर्ता इन हरक़तों से बिल्कुल ख़ुश नहीं है और इसलिए उन्होंने भी यह तय किया कि इन पोस्टकार्ड्स का जवाब दिया जाए। तृणमूल कॉन्ग्रेस अब ‘जय श्रीराम’ की जगह ‘जय हिंद’ और ‘जय बांग्ला’ लिखे पोस्टकॉर्ड्स प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भेज रही है।

TMC नेता और राज्य खाद्यान्न मंत्री ज्योतिप्रियो मल्लिक ने कहा:

“मुख्‍यत: उत्‍तरी 24 परगना, हावड़ा और हुगली के हमारे समर्थक प्रतिदिन आठ हज़ार पोस्‍टकार्ड भेज रहे हैं। वर्तमान समय में अब पोस्‍टकार्ड की कमी हो गई है और हमने फ़ैसला किया है कि अब पत्र छापे जाएँगे और उसे पीएम मोदी को भेजा जाएगा। हम पीएमओ को इन पत्रों को भेजना जारी रखेंगे।”

इतनी बड़ी संख्या में एक-दूसरे को पोस्टकार्ड्स भेजने का सिलसिला तो पता नहीं कब थमे, लेकिन इससे डाक विभाग की परेशानी बढ़ना तो तय है।