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उभरते हुए क्रिकेट स्टार की हत्या में शामिल सोहेल खान पर चुप क्यों है मीडिया!

मुंबई के भांडुप इलाक़े में क्रिकेटर राकेश अंबादास पवार की शुक्रवार (7 जून) को सुबह चंदनवाड़ी गाँव की सड़क पर एक पेट्रोल पंप पर तीन अज्ञात व्यक्तियों ने चाकू मारकर हत्या कर दी।

सोशल मीडिया यूजर ने क्रिकेट स्टार की हत्या पर बॉलीवुड, NDTV और The Print के ख़िलाफ़ तीखी प्रतिक्रिया दर्ज करते हुए लिखा कि एक स्थानीय क्रिकेट स्टार राकेश पवार को सोहेल ख़ान (18) और आसिफ़ ख़ान (48) द्वारा सार्वजनिक स्थल पर मार डाला गया। पवार को एक चॉपर जैसे हथियार से बेरहमी से काट दिया गया! हालाँकि मिड-डे की खबर के मुताबिक केवल सोहैल का नाम सामने आया है जिसे उसी चॉल में रहने वाली राधिका की भतीजी ने देखा था। राकेश के भाई रवि को खान भाईयों पर पूरा शक है।

पुलिस के अनुसार, शुक्रवार की सुबह लगभग 12.30 बजे, राकेश पवार, जो कि युवा खिलाड़ियों के कोच भी हुआ करते थे, एक अज्ञात महिला मित्र के साथ अपनी बाइक पर महावीर पेट्रोल पंप पर गए थे, वहाँ पहले से उनका इंतज़ार कर रहे तीन व्यक्तियों ने उन पर अचानक हमला बोल दिया

पेट्रोल पंप के कर्मचारियों ने गंभीर अवस्था में घायल पवार को नज़दीकी अस्पताल में भर्ती कराया, जहाँ उन्हें कुछ घंटों के बाद मृत घोषित कर दिया गया। भांडुप पुलिस ने हत्या का मामला दर्ज कर लिया किया है और अपराध शाखा इस हत्या मामले की जाँच में जुट गई है।

पुलिस ने इस बात की भी जानकारी दी कि क्रिकेटर की हत्या मामले में उस अज्ञात महिला के भी बयान दर्ज कर रही है जो उसके साथ घटना स्थल पर मौजूद थी। एक अधिकारी ने कहा, “उससे पूछताछ की जा रही है।” पुलिस को शक़ है कि क्रिकेटर की हत्या के लिए पहले से योजना बनाई गई थी। पुलिस पेट्रोल पंप के सीसीटीवी फुटेज खंगाल रही है।

PM मोदी तोड़ेंगे कॉन्ग्रेस का रिकॉर्ड, 2047 तक सत्ता में रहेगी BJP: राम माधव

भारतीय जनता पार्टी दूसरी बार प्रचंड जीत हासिल करके सत्ता में वापस आई है। इस जीत के बाद भाजपा महासचिव राम माधव ने शुक्रवार (जून 7, 2019) को त्रिपुरा में पार्टी कार्यक्रम के दौरान एक बड़ा दावा किया है। उन्होंने दावा किया कि भाजपा सत्ता में सबसे ज्यादा समय तक रहने के कॉन्ग्रेस के रिकॉर्ड को तोड़ देगी और 2047 तक सत्ता में बनी रहेगी। बीजेपी नेता ने कहा, “यदि कोई पार्टी सबसे ज्यादा सत्ता में रही है तो वह कॉन्ग्रेस है। कॉन्ग्रेस ने 1950 से 1977 तक देश में शासन किया है। मैं आपको आश्वस्त करता हूँ कि मोदी जी ये रिकॉर्ड तोड़ने जा रहे हैं। 2047 में आजादी के 100वें वर्ष में प्रवेश करने तक बीजेपी सत्ता में काबिज रहेगी।”

राम माधव ने कहा कि उनकी पार्टी पिछले 5 वर्षों में सांप्रदायिक अशांति, भ्रष्टाचार को रोकने, आर्थिक स्थिरता लाने और एक मजबूत भारत का निर्माण करने में कामयाब रही, जिसकी वजह से पार्टी को प्रचंड जीत मिली है। उन्होंने कहा कि संसद तक पहुँचने के लिए उनकी पार्टी ने सेना की उपलब्धियों का सहारा नहीं लिया।

इस दौरान भाजपा महासचिव ने कहा कि पीएम मोदी की भाजपा इस देश का वर्तमान है और भविष्य में भी पीएम मोदी की भाजपा ही होगी। उन्होंने कहा कि पार्टी 2022 में एक नए भारत का निर्माण करेगी, जहाँ न तो कोई बेघर नहीं होगा और न ही कोई बेरोजगार होगा। आजादी के शताब्दी वर्ष 2047 में पीएम मोदी के नेतृत्व में भारत एक विश्व गुरु के रुप में उभरकर सामने आएगा। इसके साथ ही उन्होंने जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि राष्ट्रवाद भाजपा के डीएनए में है, इसी से भाजपा की पहचान है। चाहे चुनाव हो या न हो, भाजपा का मतलब राष्ट्रवाद और राष्ट्रवाद का मतलब भाजपा है।

The Hindu को तमाचा: 11 घंटे में 510 लोगों ने अक्षयपात्र को दान किए ₹21 लाख

पत्रकारिता के समुदाय विशेष (मुख्यतः The Hindu और ईसाई फे डिसूज़ा के सम्पादन में चलने वाला Mirror Now) के द्वारा इस्कॉन/गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय के एनजीओ ‘अक्षय पात्र फाउंडेशन’ के खिलाफ चल रहे दुष्प्रचार को भारत ने बड़ा तमाचा मारा है। अपने धार्मिक आग्रहों को बच्चों की भोजन जरूरतों की कीमत पर थोपने का आरोप लगाने वाले The Hindu के लेख और फे डिसूज़ा द्वारा इसी मुद्दे पर अक्षय पात्र पर कीचड़ उछालने की कोशिश के बाद लेखक, वैज्ञानिक और स्वराज्य पत्रिका के स्तम्भकार आनंद रंगनाथन की अपील पर 510 लोगों ने 11 घंटे में अक्षय पात्र फाउंडेशन को ₹21 लाख का दान दिया है, कुछ ने तो अपनी पॉकेट मनी तक दान कर दी।

रंगनाथन की अपील, बातें नहीं पैसे से ठोस समर्थन दिखाओ

The Hindu ने दो-चार बच्चों की प्याज-लहसुन के बिना पकाए गए खाने की नापसंदगी को पूरे कर्नाटक के बच्चों द्वारा अक्षय पात्र के मिड डे मील को ख़ारिज करने की कहानी रचते हुए लेख छापा था। इस पर ऑपइंडिया समेत देश के अधिकाँश हिस्सों से तीखी प्रतिक्रिया हुई थी।

इसके बाद Mirror Now की सम्पादिका फे डिसूज़ा ने भी इस पर The Hindu सरीखा ही प्रोग्राम किया।

इसके बाद आनंद रंगनाथन ने अक्षय पात्र के समर्थकों से अपील की कि केवल जबानी समर्थन देने की बजाय अक्षय पात्र के कार्य के समर्थकों को अपना पैसा अपने समर्थन के रूप में लगाना चाहिए। तभी हिन्दूफ़ोबिक गिरोहों को जवाब मिलेगा।

उनकी इस अपील के बाद समर्थकों ने अक्षय पात्र को भारी मात्रा में दान भेजना शुरू कर दिया। महज़ 11 घंटे के अंतराल में अक्षय पात्र को 510 सोशल मीडिया यूज़र्स ने ₹21 लाख दान कर दिए। जहाँ एक अनाम दानदाता ने ₹2 लाख अकेले दान किए, वहीं पूरी दान राशि का औसत ₹3800 प्रति व्यक्ति के आसपास रहा। स्वराज्य पत्रिका की रिपोर्ट के अनुसार एक व्यक्ति ने तो एक दूसरे व्यक्ति की ओर से भी दान किया, जब उसे पता चला कि वह व्यक्ति अक्षय पात्र फाउंडेशन का समर्थक तो है लेकिन आर्थिक मजबूरी के चलते दान करने में अक्षम है।

फाइनेंशियल एक्सप्रेस के सम्पादक सुनील जैन ने भी मुहिम में हिस्सा लिया।

लोगों के इस भारी समर्थन के लिए आंनद रंगनाथन ने उन्हें धन्यवाद करते हुए ट्वीट किया:

अक्षय पात्र ने हाल ही में अपना 300 करोड़-वाँ मिड डे मील परोसा था। इस उपलक्ष्य में वृंदावन चंद्रोदय मंदिर में उसके कार्यक्रम में उपस्थित हो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद 20 बच्चों को खाना खिलाया

गिरिराज सिंह ने ममता बनर्जी की तुलना किम जोंग उन से करते हुए कही ये बड़ी बातें

गुरुवार (जून 7, 2019) को पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी के द्वारा भाजपा के विजय जुलूस पर प्रतिबंध लगाए जाने पर केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने शुक्रवार (जून 7, 2019) को अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की। इस दौरान उन्होंने ममता बनर्जी की तुलना उत्तर कोरिया के तानाशाह नेता किम जोंग उन से कर दी। गिरिराज सिंह ने कहा कि ममता बनर्जी अपने राजनीतिक विरोधियों का दमन करने के लिए उसी तरह की क्रूरता पर उतर आई हैं, जैसा कि उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन करते हैं। उन्होंने कहा कि वो (ममता) किम जोंग उन का किरदार निभा रही हैं, जो भी आवाज उठाता है, उसकी हत्या कर दी जाती है। किसी को ‘विजय यात्रा’ निकालने की अनुमति नहीं मिलती है। जनता उनकी उल्टी गंगा का जुलूस निकाल देगी। उनके श्राद्ध का जुलूस निकाल देगी।

गिरिराज सिंह ने कहा कि कि ममता बनर्जी जिस तरह से शासन चला रही हैं उसे देखकर ऐसा लगता है कि जैसे उनको संविधान में विश्वास ही नहीं हैं। वो प्रधानमंत्री को भी प्रधानमंत्री नहीं मानती हैं, लोकतंत्र में विश्वास नहीं करती हैं, वो सिस्टम में नहीं आना चाहतीं। मगर अब लोग विकास चाहते हैं और उनकी (ममता) उल्टी गिनती शुरू हो गई है।

गौरतलब है कि, इससे पहले ममता बनर्जी ने नीति आयोग को लेकर अपनी नाराजगी प्रकट की थी। उन्होंने 15 जून को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में नीति आयोग की होने वाली बैठक में शिरकत करने से इनकार करते हुए इसे निरर्थक बताया था और कहा कि नीति आयोग के पास कोई वित्तीय अधिकार नहीं है और ना ही आयोग के पास राज्य की योजनाओं को समर्थन देने अधिकार है ऐसे में उनका बैठक में भाग लेना बेकार है।

ICC ने ‘बलिदान बैज’ वाले ग्लव्स को नहीं दी मंजूरी, अब क्या करेंगे धोनी?

अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) ने पूर्व भारतीय कप्तान महेंद्र सिंह धोनी को वर्ल्ड कप के आने वाले मुकाबलों में ‘बलिदान बैज’ लगे हुए ग्लव्स पहनकर खेलने की इजाजत देने से मना कर दिया है। आईसीसी ने कहा कि नियमों के मुताबिक, खिलाड़ी के कपड़ों या उनके खेल के सामनों पर कोई भी व्यक्तिगत संदेश या लोगो लगाने की इजाजत नहीं है। इसके साथ ही ये विकेटकीपर के ग्लव्स पर लागू नियम के भी खिलाफ है। नियम के मुताबिक, विकेट कीपिंग के प्रत्येक दस्ताने पर बनाने वाली कंपनी के दो लोगो लगाने की इजाजत है।

दरअसल, बुधवार (जून 5, 2019) को दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ मैच में धोनी जो ग्लव्स पहनकर विकेटकीपिंग करने उतरे थे, उस पर भारतीय सेना की स्पेशल फ़ोर्स का ‘बलिदान बैज’ का लोगो लगा था। गुरुवार (जून 6, 2019) को आईसीसी ने इस पर आपत्ति जताते हुए बीसीसीआई से धोनी के विकेटकीपिंग ग्लव्स से ‘बलिदान बैज’ को हटाने के लिए कहा था। जिसके बाद शुक्रवार (जून 7, 2019) को बीसीसीआई ने आईसीसी को पत्र लिखकर धोनी को ‘बलिदान बैज’ लगे ग्लव्स पहनकर विकेटकीपिंग करने की इजाजत देने की माँग की थी। मगर आईसीसी ने नियमों का हवाला देते हुए इजाजत देने से इनकार कर दिया है।

हालाँकि, इस मामले में धोनी को केंद्रीय मंत्री और खेल जगत का भी साथ मिला। पूर्व सेनाध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री जनरल वी के सिंह ने धोनी का समर्थन करते हुए कहा था, “धोनी के दस्ताने पर बलिदान बैज से उनका सुरक्षाबलों के प्रति प्यार और आदर झलकता है। आईसीसी को यह समझना चाहिए कि यह राजनीतिक, धार्मिक और नस्ल से जुड़ा हुआ मामला नहीं है बल्कि यह हमारे राष्ट्रीय गौरव का विषय है।”

खेल मंत्री किरण रिजूजू ने ट्वीट करते हुए कहा था कि सरकार खेल निकायों के मामलों में हस्तक्षेप नहीं करती है, वे स्वायत्त हैं। लेकिन जब मुद्दा देश की भावनाओं से जुड़ा होता है, तो राष्ट्र के हित को ध्यान में रखना होता है। इसके साथ ही उन्होंने बीसीसीआई से इस मामले में उचित कदम उठाने का आग्रह किया था।

वहीं, केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह भी धोनी के समर्थन में आए और उन्होंने धोनी की जमकर प्रशंसा करते हुए उन्हें सच्चा देशभक्त बताया। उन्होंने कहा, “धोनी सिर्फ एक क्रिकेटर ही नहीं हैं। वह एक सच्चे राष्ट्रभक्त हैं। वह अन्य हस्तियों की तरह नहीं हैं, जिनका देश के प्रति प्रेम नहीं है। वह एक देशभक्त हैं और अपने देश के गौरव के लिए प्रतिबद्ध हैं।”

स्क्रॉल, टेलीग्राफ, NDTV समेत कई संस्थानों से सम्पादकीय टीम में छँटनी, फंडिंग एक बड़ी वजह

स्वघोषित ‘विरोध की पत्रकारिता’ और किसी खास वर्ग और पार्टी की पक्षकारिता का झंडा बुलंद करने वाले कई स्वनामधन्य मीडिया समूह पिछले एक-दो सालों में चुपचाप अपने सम्पादकों, टेक्निकल स्टाफ़ और ग्रॉउंड रिपोर्टरों, पत्रकारों को बाहर का रास्ता दिखाते रहें। कुछ ने अपने कई एडिशन बंद किए तो कुछ किसी तरह चुनाव तक अपना एजेंडा इस आस में चलाते रहें कि अगर वो अपने मतलब की सरकार बनवाने में कामयाब हो गए तो शायद उनके वही ‘लुटयंस पत्रकारिता’ का सुनहरा दौर लौट आए। पर अफ़सोस! लोकसभा चुनाव-2019 के साथ उनकी रही-सही उम्मीद भी जाती रही।

चुनाव परिणाम के बाद फिर से आनन-फानन में सम्पादकों को बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है। उन्हें संस्थान से त्यागपत्र देने को कहा जा रहा है बिना यह सोचे कि अब वही उनके अजेंडा परोसने वाले संपादक-पत्रकार आखिर जाएँ तो जाएँ कहाँ?

पहले की खबरों पर नज़र दौड़ाएँ तो कई मीडिया संस्थानों में नौकरियों की कटौती की शुरुआत जनवरी 2017 से ही शुरू हो गई थी। इसमें सबसे पहला नाम जो नज़र आता है वह है Hindustan Times जिसने अपने 4 ब्यूरो बंद करने का निर्णय लिया जिससे सैकड़ों कर्मचारी एक झटके में बेरोजगार हो गए। इसके बाद यह सिलसिला उन तमाम मीडिया समूहों में जारी रहा जिनकी पत्रकारिता का पर्याय ही एक मात्र बीजेपी का विरोध है। सरकार के अच्छे से अच्छे काम में भी खोट निकालना और अपने समर्थक पार्टी की बड़ी से बड़ी गलती को भी छिपा जाना ही इनके लिए पत्रकारिता का स्वर्णिम मानदंड बन चुका था।

बाद के समय में The TelegraphNDTVDB Post ने अपने कई सम्पादकों, एंकरों, रिपोर्टरों की नौकरियाँ छीन लीं। इस साल के शुरुआत में भी BuzzfeedVice और DNA ने भी अपने कई सम्पादकों, पत्रकारों को बाहर का रास्ता दिखा दिया। जो बचे रहे उन्होंने लोकसभा चुनाव के दौरान विरोध के नाम पर खुलेआम पक्षकारिता और फेक न्यूज़ की बाढ़ लगा दी ताकि किसी भी तरह से अपने सत्ता में घुसपैठ वाली और लगातार डर का माहौल है या एक तरफा खबरों वाली पत्रकारिता को बचाया जा सके लेकिन वह काम नहीं आया। सारे हथकंडे फेल हो गए यहाँ तक कि टीवी न देखने की अपील को भी जनता ने ठुकरा दिया।

30 मई को मोदी के शपथ के दिन जहाँ देश उत्सव के माहौल में डूबा था तो वहीं अगले ही दिन विरोध और नफ़रत की पत्रकारिता को हवा देने वाले एक और संस्थान Scroll.in ने 31 मई को अपने कई सम्पादकों को निकालने की तैयारी कर ली। न्यूज़ लॉन्ड्री के मुताबिक स्क्रॉल ने अपने सम्पादकीय टीम के 16 कर्मचारियों को 3 जून तक त्यागपत्र देने को कहा। हालाँकि इसमें अभी तक बाहर किए जाने वाले पत्रकारों और प्रॉडक्शन, मार्केटिंग टीम के कर्मचारियों की संख्या शामिल नहीं है और न ही स्क्रॉल के हिंदी वेबसाइट सत्याग्रह से कितनों को बाहर किया गया इसकी अभी तक कोई सूचना नहीं है।

वैसे मजाक-मजाक में यह भी कहा जा रहा है कि बीजेपी विरोध के नाम पर झूठ और फेक न्यूज़ परोसने वाले इन पत्रकारों के सामने दोहरा संकट है। एक तो यहाँ से इनकी नौकरी गई, दूसरा CV में यदि उस संस्थान का जिक्र करते हैं तो आगे भी इन्हें कोई मीडिया संस्थान नौकरी नहीं देगा। खबर यह भी है कि Scroll ने कॉस्ट कटिंग के लिए या व्यूअरशिप की संख्या कम होने के कारण Hotstar पर आने वाले अपने एक शो का प्रसारण भी बंद कर दिया है।

स्क्रॉल द्वारा निकाले गए कर्मचारियों के लिए कहा जा रहा है कि राहत की बात यह कि उन्हें जून-जुलाई दो महीने के पेमेंट के साथ विदा किया जाएगा। मीडिया जगत में इतने बड़े पैमाने पर छँटनी का कारण यह बताया जा रहा है कि हालिया आर्थिक स्थिति उन्हें इतना भारी-भरकम स्टॉफ मैनेज करने की इजाजत नहीं दे रहा है। साथ ही, वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए अधिकांश इन्वेस्टर ऐसे पोर्टलों और चैनलों में दोबारा पैसा लगाने से कतरा रहे हैं।

कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि एकतरफा पत्रकारिता में संलिप्त होने के कारण आने वाला दौर ऐसे पत्रकारों के लिए बहुत कठिन हो गया है क्योंकि उनकी छवि किसी भी हद तक जाकर सरकार का विरोध करने की बन गई है। इसके अलावा उनकी चिंता यह भी है कि अभी आने वाले कई महीनों तक अधिकांश मीडिया समूहों में भर्ती भी बंद है।

The Quint के संस्थापक राघव बहल के खिलाफ ED ने दर्ज किया मनी लांड्रिंग का मामला

प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने प्रोपगैंडा न्यूज़ वेबसाइट ‘द क्विंट’ के संस्थापक राघव बहल के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग का मामला दर्ज किया है। उन पर विदेश में अघोषित संपत्ति खरीदने के लिए मनी लांड्रिंग का आरोप है।

मीडिया के अनुसार, अधिकारियों ने शुक्रवार को बताया कि राघव बहल के खिलाफ आयकर विभाग की शिकायत और आरोपपत्र पर संज्ञान लेते हुए ईडी ने इसी हफ्ते की शुरुआत में उनके खिलाफ इंफोर्समेंट केस इंफॉरमेशन रिपोर्ट (ईसीआइआर) दर्ज की है। यह पुलिस की एफआइआर के समकक्ष होती है। उनके खिलाफ प्रिवेंशन ऑफ मनी लांड्रिंग एक्ट (पीएमएलए) के तहत मामला दर्ज किया गया है। आयकर विभाग ने हाल ही में राघव बहल के खिलाफ मेरठ की अदालत में कालाधन निरोधी कानून के तहत आरोपपत्र दाखिल किया था।

ईडी की कार्रवाई की पुष्टि करते हुए राघव बहल ने आरोप लगाया कि सभी करों का ईमानदारी और तत्परतापूर्वक भुगतान करने के बावजूद बिना कोई गलत काम किए उन्हें उनका शिकार किए जाने का एहसास हो रहा है। उन्होंने इस संबंध में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के अलावा केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) और ईडी के प्रमुखों को ईमेल के जरिए पत्र भेजे हैं। उनके संगठन ने यह पत्र पीटीआई के साथ साझा किया है।

कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया: कश्मीरी आतंकियों की तरह कार-चोर शाहरुख़ भी पकड़ा गया गर्लफ्रेंड की वजह से

"वो लोग बहुत ख़ुशक़िस्मत थे 
जो इश्क़ को काम समझते थे 
या काम से आशिक़ी करते थे 
हम जीते जी मसरूफ़ रहे 
कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया
काम इश्क़ के आड़े आता रहा
और इश्क़ से काम उलझता रहा 
फिर आख़िर तंग आकर हम ने 
दोनों को अधूरा छोड़ दिया"

मशहूर शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की ये पंक्तियाँ हाल ही में घटी कुछ घटनाओं के बाद खुद ही जुबान पर आ रही हैं। लेकिन इस किस्से को अगर आप भी पढ़ेंगे तो हो सकता है आप कुछ और शायरों को भी गुनगुनाने लगें। ऐसा ही एक किस्सा कुछ दिन पहले तब प्रासंगिक हुआ जब जाने-माने आतंकवादी ज़ाकिर मूसा को सेना ने कुत्ते की मौत मारा था। अपने ‘मिशन’ के दौरान प्रेमरोग के चक्कर में बुरहान वनी और जाकिर मूसा को अपनी जान गँवानी पड़ी, इस तरह प्रेम कहानियाँ ही उन दिलजले आशिक़ों की मौत का जरिया बनीं। अब ऐसा ही एक नया प्रकरण जो सामने आया है वो है, कार चोर शाहरुख़ का।

कुछ दिन पहले ही दिल्ली में नशे की हालत में बेतरतीब तरीके से तेज रफ्तार में कार चलाकर लोगों को टक्कर मारने वाले शख्स कार-चोर शाहरूख़ को पुलिस ने पकड़ लिया है। वह अपनी गर्लफ्रेंड की गलती के कारण पकड़ा गया। दरअसल, ईद के अवसर पर, एक तेज़ रफ़्तार से कार गुज़रने के बाद भड़के नमाजियों ने अपना आक्रोश व्यक्त करते हुए डीटीसी की बस सहित कई सार्वजनिक संपत्ति को भारी क्षति पहुँचाई थी। इस हादसे में 17 नमाज़ियों के घायल होने की अफ़वाह भी फैलाई गई थी, जो कि पूरी तरह से झूठी थी। घटना के बाद से ही पुलिस कार चालक की तलाश में जुट गई थी। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कार-चोर शाहरुख़ पर करीब दो दर्जन आपराधिक मामले पहले से दर्ज हैं।

ईद के अवसर पर दिल्ली के जगतपुरी इलाके में लोग नमाज पढ़कर लौट रहे थे, तभी एक तेज रफ्तार होंडा सिटी कार ने कुछ गाड़ियों को टक्कर मारने के बाद खुरंजी गाँव की एक गली में घुस गई। वहाँ भी कई लोग कार की चपेट में आने से बाल-बाल बचे।

गर्लफ्रेंड की वजह से पकड़ा गया ‘आशिक़ शाहरुख़

पुलिस ने बताया कि कि कार-चोर शाहरुख अपनी गर्लफ्रेंड के साथ था। मंगलवार (4 जून) को दोनों ने यमुना बाजार इलाके से ड्रग्स खरीदी और नशे की हालत में ही दोनों रानी गार्डन इलाके में कार खड़ी कर के सो गए। इसके बाद दोनों आनंद विहार से होते हुए डासना के पास गंगनहर पहुँचे। वहाँ नहाने के बाद खाना खाया और फिर दिल्ली की तरफ लौटे। वहाँ आनंद विहार के पास कार में सीएनजी खत्म हो गई। दोनों ने कार को वहीं खड़ा किया और एक स्कूटी चुराकर उससे यमुना बाजार पहुँच गए। इसी बीच पुलिस को मुखबिरों ने सूचना दी कि शाहरुख के साथ उसकी प्रेमिका याशिका भी है। इसके बाद पुलिस ने याशिका के मोबाइल को ट्रैक किया और उसके सहारे दोनों तक पहुँच गई। शाहरुख ने अपने सभी नंबर बंद कर रखे थे।

जब AltNews ने 3 वर्षीय बच्ची की निर्मम हत्या के आरोपित ज़ाहिद, असलम के पापों को धोने की कोशिश की

उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में जाहिद नाम के व्यक्ति ने अपने साथी असलम के साथ मिलकर एक 3 साल की बच्ची की निर्मम हत्या कर डाली। बताया जा रहा है कि इस बर्बर हत्या के पीछे का कारण बच्ची के परिवार से हुई एक बहस थी, जो 10,000 रुपए के लोन के कारण हुई थी।

2 जून को बच्ची का शव बरामद करने के बाद अलीगढ़ पुलिस ने जाहिद और उसके दोस्त असलम को गिरफ्तार कर लिया है। बच्ची का अपहरण 31 मई 2019 को किया गया था। और उसी दिन अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश) के टप्पल पुलिस थाने में FIR भी दर्ज की गई थी। हालाँकि, पुलिस का पोस्ट मार्टम रिपोर्ट के आधार पर यह भी कहना है कि रेप की पुष्टि नहीं हो पाई है यहाँ ध्यान रखने वाली बात है कि इसका यह मतलब नहीं है कि रेप हुआ ही नहीं है।

एक तरफ जहाँ आज कुछ संवेदनशील लोग इस घटना से स्तब्ध और आक्रोशित हैं वहीं तमाम वामपंथी इस पर मौन हैं या न्याय के लिए दबे-छुपे स्वरों में अपील तो कर रहे हैं लेकिन साथ ही यह सलाह भी कि इस पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। क्योंकि यहाँ आरोपित ज़ाहिद और असलम है और पीड़ित बच्ची हिन्दू, यहाँ कोई नारेबाजी नहीं हो रही और न ही विरोध के स्वर अभी मुखर हुए हैं।

यहाँ तक कि गिरोह के कई सदस्य लीपा-पोती में जुट गए हैं जबकि आरोपित पकड़ में हैं। स्वघोषित फैक्ट-चेकर AltNews ने ज़ाहिद और असलम के अपराधों को धोने-सुखाने के कुछ ज़्यादा तेजी से प्रयास किए और क्लेम कर दिया कि कोई रेप नहीं हुआ है। इसे साबित करने का आधार इन्होनें यह निकाला कि ऐसा उत्तर-प्रदेश पुलिस के कुछ अधिकारियों का कहना है।

“AltNews ने एसएसपी अलीगढ़ का जिक्र करते हुए कहा कि पीड़ित का रेप नहीं हुआ है पोस्ट मार्टम रिपोर्ट के अनुसार गला घोंटने से उसकी हत्या हुई है। सोशल मीडिया पर जो दावा किया जा रहा है कि उसकी आँखें बाहर आ गई थी और उसकी बाँह उखड़ी हुई थी, भी गलत है। उसके शरीर पर एसिड डाला गया था यह भी गलत है, ऐसा कुछ नहीं हुआ था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट पीड़ित के परिवार से भी साझा किया गया है।”

यहाँ गौरतलब है कि ऐसे स्वघोषित एक्टिविस्ट के लिए पुलिस का स्टेटमेंट ही अंतिम सत्य की तरह है क्योंकि यह इनके एजेंडे और नैरेटिव को आगे बढ़ा रहा है। यदि इनके एजेंडे को शूट नहीं कर रहा है तो यह गिरोह कोर्ट के निर्णय को भी मानने से इनकार कर देगा। AltNews के इसी तर्क से सवाल यहाँ यह भी है कि क्या AltNews के संस्थापक इशरत जहाँ के मामले में यह स्वीकार सकते हैं कि वह एक आतंकी थी क्योंकि कई पुलिस वालों ने ऐसा कहा है। हम सब को उनका जवाब पता है।

चलिए, इनके पाखंड से आगे बढ़ते हैं, इस मामले में पर्याप्त सबूत हैं या तो उस बच्ची का रेप हुआ है या नहीं दोनों वैलिड या इनवैलिड साबित हो सकते हैं।

अलीगढ़ मामले की पोस्ट मार्टम रिपोर्ट (image courtesy: journalist @anjanaomkashyap on Twitter)

ऑपइंडिया ने इस पोस्टमार्टम रिपोर्ट को कई डॉक्टरों को दिखाया। उन्होंने बताया कि बच्ची की मौत उसे लगने वाली कई गंभीर चोटों की वजह से हुई है। एक डॉक्टर ने यह भी स्पष्ट किया, “जख्म इतने गहरे और घातक हैं कि उससे शॉक और मौत निश्चित है। शॉक की पुष्टि वेसल्स के कोलैप्स होने से हो जाती है (ऐंटेमार्टम साइन) मृत्यु से पहले बहुत ज़्यादा ब्लड लॉस भी हुआ था।”

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर डॉक्टर्स का कहना है, “सबसे महत्पूर्ण बात यहाँ यह है कि उस बच्ची के गर्भाशय और जेनिटल सहित एब्डॉमिनल ऑर्गन भी गायब हैं। जो इस बात का सबूत है कि उसे वीभत्स तरीके से टार्चर किया गया था जिससे उसकी शरीर से अत्यधिक रक्तस्राव हुआ हो और जो उसके ब्लड वेसेल्स के कोलैप्स होने की वजह भी हो। बाकी दूसरे घातक जख्म, जैसे पाँव का घुटने के नीचे से फैक्चर होना और हाथ की एक हड्डी ह्यूमरस का उखड़ जाना, का वर्णन ही बर्बरता की पूरी कहानी कह रहा है। रेप की पुष्टि के लिए हालाँकि वेजाइनल स्वैब जाँच के लिए भेजा गया है लेकिन बॉडी डिकम्पोज होने की वजह से शायद ही इस जाँच के लिए उपयोगी हो। वैसे यहाँ यह जानना ज़रूरी है कि स्वैब का परिणाम नेगेटिव आना सेक्सुअल एक्ट के न होने का सबूत होता है।”

डॉक्टर ने आगे कहा, “उसकी दाहिने भुजा की हड्डी का उखड़ना और बाएँ पाँव का फ्रैक्चर निश्चित रूप से उसके मौत के पहले की घटना है। उसके एब्डॉमिनल अंगों का गायब होना भी उसके साथ हुई बर्बरता का सबूत है।”

एक दूसरे डॉक्टर ने यह भी कहा, “अब ऐसा लग रहा है कि बहुत ज़्यादा शरीर के नष्ट और सड़ जाने से रेप की अब न पुष्टि हो सकती है और न ही उसे ख़ारिज किया जा सकता है। हालाँकि, कंडीशन देखते हुए यह भी कहा कि जिस तरह से आईबॉल ग़ायब है, पाँव टूटा हुआ है, हाथ उखाड़ा हुआ है, सभी एब्डॉमिनल ऑर्गन गायब हैं, ऐसा किसी जानवर के खा जाने की वजह से भी हो सकता है।”

ऐसे जख्म तब भी उभरते हैं जब जानवर अटैक करते या शरीर का क्षरण हो जाता हैं तब। हालाँकि, ऐसा कहना भी पूरी तरह से सही नहीं है क्योंकि बच्ची का शरीर जंगल या ऐसी किसी जगह न मिलकर कथित रूप से एक डंपिंग ग्राउंड के पास पाया गया है।

डॉक्टर के कमेंट बच्ची के पोस्टमार्टम पर

पोस्टमार्टम में डॉक्टर के कमेंट में यह बात साफ-साफ मेंशन है कि गर्भाशय और दूसरे जेनाइटल ऑर्गन गायब हैं। ऑपइंडिया से बात करते हुए डॉक्टर ने बताया, “जानवर खा गए वाली संभावना को रूल आउट नहीं किया जा सकता है, यह सभी अंग पहले गायब हुए या मृत्यु के बाद में यह पता लगाना बहुत मुश्किल है इसके लिए एडवांस्ड फोरेंसिक परीक्षण की आवश्यकता है।”

हालाँकि, एक डॉक्टर ने जानवर वाली संभावना को बहुत ही क्षीण बताया। उन्होंने कहा, “मैं नहीं समझता कि यह किसी जानवर की हरक़त है क्योंकि जब कोई जानवर हमला करता है तो कटे-फटे या आधा-अधूरा खाए गए मांस के टुकड़े आस-पास मौजूद होते हैं। जानवर के दांतों के निशान भी शरीर पर ज़रूर मौजूद होते। यहाँ तक कि छाती की पसलियों पर भी जानवर द्वारा फाड़े जाने के निशान होते।”

जब यह सवाल किया गया कि कितनी संभावना है अब रेप की पुष्टि के लिए तो डॉक्टर ने कहा, “मेरे हिसाब से अब रेप की पुष्टि और मना करना दोनों मुश्किल है। अब एक संभावना केवल वेजाइनल स्वैब की बचती है अगर वहाँ कोई ह्यूमन फ्लूइड पाया जाता है या उसके ट्रेसेस मिलते हैं तभी इस तरह के सेक्सुअल असॉल्ट पुष्टि हो सकती है।”

इसलिए, अब पोस्टमार्टम रिपोर्ट की विस्तृत छानबीन, ज़रूरी शारीरिक अंगों का गायब होना, उसकी बाँह का उखड़ा होना और बच्ची का रेप हो भी सकता है और नहीं भी। AltNews के उस तथाकथित ‘फेक न्यूज़ के पर्दाफाश’ वाली रिपोर्ट की धज्जियाँ उड़ा देता है।

AltNews ने यहाँ तक दावा कर दिया था कि Opindia की इस घटना पर पहली रिपोर्ट जिसमें बच्ची के शरीर के क्षत होने और बर्बरता की बात कही गई थी ‘फेक’ है। यहाँ उनका पूरा दावा इस आधार पर था कि आँख बाहर नहीं आई थी। जिसके बारे में हमनें डॉक्टर से बात की जिन्हे हमने पोस्टमार्टम रिपोर्ट दिखाया था। उन्होंने साफ कहा और यहाँ तक कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी यही कह रही है कि आँखे भी क्षतिग्रस्त थी।

अलीगढ़ मामले में AltNews की रिपोर्ट से

संक्षेप में कहा जाए तो, AltNews ने सीधे-सीधे इनकार कर दिया जबकि उत्तर प्रदेश पुलिस का साफ स्टेटमेंट है “पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर ‘अभी तक’ रेप की पुष्टि नहीं हुई है।” यहाँ ‘अभी तक’ जिसकी पूरी तरह अवहेलना करते हुए AltNews के स्वघोषित जज ने फैसला सुना दिया कि रेप हुआ ही नहीं है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बच्ची के ऊपर जिस तरह की बर्बरता की पुष्टि की गई है, उसकी गंभीरता को भी AltNews ने बेहद हल्का कर हवा में उड़ा देने की कोशिश की।

अरुंधति राय द्वारा वित्तपोषित AltNews के संस्थापक प्रतीक सिन्हा क्या बिलकुल ही दिमाग से पैदल है या पूरी तरह सेंसलेस और संवेदनहीन है कि यदि कोई डेड बॉडी को भी बाहर सड़ने या जानवरों के खाने के लिए फेंक दे तो यह बर्बरता भी उसकी क्रूर और घृणित मानसिकता का स्पष्ट दस्तावेज नहीं कहा जा सकता? यहाँ तक कि ऐसे मामलों में कोर्ट खुद स्वतः संज्ञान लेते हुए ऐसे कार्यों को निर्दयतापूर्ण और रेयरेस्ट ऑफ़ रेयर अपराध की श्रेणी में रखते हुए कठोर से कठोर सजा का प्रावधान करती है।

आरोपित ज़ाहिद और असलम

लेकिन, स्वघोषित ‘फैक्ट चेकर’ और ‘जज’ AltNews के लिए एक हत्यारे का रोल वहीं ख़त्म हो जाता है जहाँ पीड़ित की मृत्यु हो जाती है। यह न केवल असंवेदनशीलता की चरमावस्था है बल्कि एक जघन्य अपराध की वाइटवाशिंग में सभी सीमाएँ लाँघ दी गई हैं क्योंकि यहाँ अपराधी मुस्लिम है और पीड़ित 3 साल से भी कम उम्र की एक मासूम हिन्दू बच्ची।

क्या रोजगार-शिक्षा में नैतिकता और मूल्य पिछले जमाने की बात हो चुकी हैं?

किसी देश को अगर अपंग बनाना हो तो उसकी शिक्षा प्रणाली को खोखला कर दो। भारत में तो पहले ही सौ प्रतिशत शिक्षा का आंकड़ा नहीं है, तिस पर आए दिन आती धाँधली की ख़बरें यही सोचने पर मजबूर करती हैं कि यह देश कैसी बुनियाद पर खड़ा है? ईमानदारी की बातें करता कौन सा ऐसा व्यक्ति है जो पूर्णतः ईमानदार है? शिक्षक, डॉक्टर, इंजीनियरिंग, कलेक्टर कौन रिश्वत देकर बना है या मेहनत से? कैसे पता लगाएँगे? किस पैमाने से जाँचेंगे?

करीब आठ साल पहले मैं बतौर शिक्षक, शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा बनना चाहती थी। इसी उद्देश्य के साथ पुणे से भोपाल आई थी। हाथ में थी बनस्थली यूनिवर्सिटी से एम.टेक की डिग्री और सीडेक से आर्टिफीसियल इंटेलीजेंस में एक वर्ष का अनुभव।

वरन नौकरी पाने के लिए यह काफी नहीं, इस बात का एहसास भोपाल पहुँचकर हुआ। भोपाल, जहाँ सौ से ज़्यादा इंजीनियरिंग कॉलेज हैं, जिनमें सैकड़ों में शिक्षक हैं; वहाँ नौकरी मिलना आपकी डिग्री, आपके कार्य अनुभव या आपके ज्ञान से ज़्यादा जुगाड़ और पहचान पर निर्भर था। कुछेक कॉलेजों में अप्लाई करने के बाद जब यह एहसास हुआ तो मन डूबने लगा। कोशिश करती रही और एक दिन एक कॉलेज में भर्ती हुई। उसके बाद प्रिंसिपल से हर दूसरे दिन होने वाली उसूलों की लड़ाई ने सात माह बाद ही कॉलेज छोड़ने पर मजबूर कर दिया। वे चाहते थे मैं रटंत विद्या को आधार बनाऊँ, जबकि मेरा पढ़ाने का तरीका समझ पर आधारित था। यह अलग बात है कि जब रिजल्ट आया तो उन्हें अपना उत्तर मिल गया लेकिन, मैं हर दिन की लड़ाई से थक चुकी थी और नौकरी छोड़ दी।

शिक्षा स्तर पर यह धाँधली सिर्फ जुगाड़ और पहचान तक नहीं सिमटी थी। यह आँखों देखी बात है कि इंजीनियरिंग कॉलेजों में पढ़ाने वाले कई शिक्षक इस लायक ही नहीं थे। शिवानी (कुंजी) आधारित उनका ज्ञान जाने बच्चों को क्या सिखाता होगा? इसी बीच एक और धाँधली के बारे में पता लगा, एम.टेक की थीसिस पैसे देकर लिखवाने की धाँधली। पूरा व्यापार था। बीई करके नीम-हकीम ज्ञान वाले बच्चे शिक्षक बन रहे थे और साथ में एमटेक कर रहे थे। अपनी थीसिस पैसे देकर लिखवा रहे थे और उस थीसिस के आधार पर नौकरी को पक्का करवा रहे थे। पढ़ाई और परीक्षाओं में जुगाड़ से पास हो रहे थे। यह देखना मेरे लिए शिक्षा व्यवस्था में बिखरे उस ज़हर को छू लेने जैसा था जिससे मैं पूर्णतः अनभिज्ञ थी।

शिक्षक के अलावा छात्र स्तर पर भी गजब धाँधली थी। इंजीनियरिंग कॉलेजों में 60 विद्यार्थियों वाली कक्षाओं में पैसे लेकर 120 तक छात्र ठूँसे जा रहे थे। शिक्षकों को भी भर्ती के इस काम में लगाया जाता था और जो जितने बच्चे लाता था, उसे उतना मुनाफा मिलता था। मुख्य ब्रांच भी पैसों के दम पर बाँटी जा रही थीं। यह ऐसी धाँधली थी, जिसमें सरकार से ज़्यादा वे लोग दोषी हैं जो इस गधा दौड़ में अपने बच्चे की काबिलियत और विषयिक रुझान दरकिनार करके बढ़िया से बढ़िया कॉलेज से उसके माथे पर इंजीनियरिंग का ठप्पा देखना चाहते हैं।

यह परतों में दबा-छुपा ऐसा घोटाला है जिसे कोई ‘बड़ी-बात’ नहीं मानता। न करने वाले, न करवाने वाले और न ही शिकार होने वाले। मध्यप्रदेश में हुए व्यापम घोटाले के सामने इसे कौन बड़ा मानेगा। जिस देश के अधिकन श व्यक्ति छोटे-बड़े रूप में बेईमान हों, वहाँ छोटे-मोटे घोटाले बात करने लायक नहीं माने जाते।

मध्य प्रदेश व्यापम घोटाले में 2000 से अधिक लोग गिरफ्तार हुए थे। लगभग 40 मौतें हुई थीं। कितने ही बच्चों का भविष्य दाव पर लगा। वे बच्चे, जिन्होंने दिन-रात मेहनत की होगी, जिनके माता-पिता ने पैसे जोड़-जोड़कर कोचिंग की फीस भरी होगी, उन बच्चों के स्थान पर सीट उसको मिलती है जो अपने ज्ञान से नहीं वरन पैसों के दम पर दाखिला पाता है। इस घोटाले में नेताओं, उच्च अधिकारियों से लेकर व्यवसायी भी शामिल थे।

माँ बचपन में सिखाती थीं कि ज्ञान प्राप्त करो, स्वयं को शिक्षित करो क्योंकि शिक्षा ही ऐसा हथियार है जो तुमसे कोई नहीं छीन सकता। लेकिन, वर्तमान में माँ की यह बात थोड़ी ‘अ-प्रैक्टिकल’ लगती है। जिस ज्ञान के आधार पर कोई छात्र अपने लिए उच्च शिक्षा के सपने देखता हो उसका वह अधिकार तो कोई भारी-जेब वाला मार जाता है।

पिछले दिनों संज्ञान में आए उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के घोटाले ने एक बार फिर यही सोचने पर मजबूर किया कि नौकरी और बेरोजगारी की मारा-मारी में परीक्षा देने वाला, परीक्षा लेने वाला और परीक्षा करवाने वाला तीनों ही अपने-अपने स्तर पर मौके का फायदा उठाने से नहीं चूक रहे। इन घोटालों में सिर्फ नेता या अधिकारी दोषी नहीं हैं बल्कि वे लोग भी उतने ही दोषी हैं जो चोरी हुए पेपर्स का इस्तेमाल करते हैं, अपनी जगह दूसरे लोगों को परीक्षा देने भेजते हैं या किसी होनहार की सीट मारकर उसकी जगह पैसों से सीट पाते हैं। ये वही लोग हैं जो अपना मामला फिट होते ही ईमानदारी की बातें करते या बेईमानी की शिकायत करते अगले ही चौराहे पर हमसे टकरा जाएँगे।

मुझे बीते साल का एक मामला याद आता है। एक महोदय जिन्होंने जाने कैसे माध्यमिक विद्यालय में सरकारी शिक्षक की नौकरी प्राप्त कर ली। उनका मुख्य व्यवसाय एक फर्नीचर की दुकान है और साइड व्यवसाय शिक्षक की वह नौकरी जो उन्हें जुगाड़ से मिली। मैंने उन्हें कभी विद्यालय पढ़ाने जाते नहीं देखा। वे प्रिंसिपल के पद पर हैं और यदा-कदा जब दुकान का सीजन न हो, बाजार मंदा हो तो विद्यालय तक टहल आते हैं। अब सोचिए कि उस गाँव के सरकारी विद्यालय में पढ़ने वाले बच्चों का भविष्य कैसा होगा?

उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग वाले घोटाले में दोषी सिर्फ अंजू लता कटियार नहीं हैं, जिन्होंने ₹2 करोड़ में विद्यार्थियों का भविष्य बेच दिया, बल्कि वे विद्यार्थी भी हैं जिन्होंने नौकरी पाने के लिए गलत रास्ता अपनाया। जो विद्यार्थी गलत तरीके से पैसे देकर शिक्षक की नौकरी पा भी लें तो वे क्या पढ़ाएँगे और क्या नीति की बातें सिखाएँगे? बात सिर्फ शिक्षकों की नहीं है। धाँधली करके प्राप्त की गई किसी भी नौकरी के किसी भी पर पहुँचा अधिकारी क्या उस पद के साथ ईमानदार रह पाएगा? क्या वह आगे भी रिश्वतखोरी नहीं करेगा?

कल एक और ख़बर इसी तरह की धाँधली की पढ़ी। जिसके मुताबिक़ तेलंगाना स्टेट बोर्ड ऑफ इंटरमीडिएट एजुकेशन द्वारा होने वाले इंटरमीडिएट के सप्लीमेंट्री पेपर्स उस पुलिस स्टेशन से ही गायब हो गए जहाँ वे सुरक्षा हेतु रखे गए थे।

यह ख़बर पढ़कर पहली बार तो हँसी आई। जो पुलिस स्टेशन में ही सुरक्षित नहीं वह कहाँ सुरक्षित होगा। फिर लगा कि पास होने की होड़ और अगली कक्षा में पहुँचने की बेकरारी को किसी व्यवसायी ने भाँप लिया और अपना शिकार ढूँढ लिया।

मेरी नज़र में इस तरह के घोटाले नेताओं, सुरक्षा अधिकारियों, शिक्षा से जुड़े उच्च अधिकारियों को तो दोषी ठहराती ही है, साथ-साथ उन माता-पिता को भी दोषी ठहराती है जो कुनीति के रास्ते सफलता हासिल करने का मंत्र अपने बच्चों के कानों में फूँकते हैं।

इस तरह के घोटाले देश और सरकार के साथ दग़ाबाज़ी तो हैं ही साथ ही उन चंद ईमानदार विद्यार्थियों के साथ भी अन्याय है जो इस बेईमानी की दुनिया में आज भी ईमानदारी, मेहनत और ज्ञान के बूते पर कहीं पहुँचने की चाहत रखते हैं। उन गरीब माता-पिता के साथ भी अन्याय है जो एक-एक पैसा जोड़कर अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए, कुछ बनाने के लिए संस्थानों में दाखिला दिलवाते हैं। और उस मानसिकता और विचार के प्रति भी अन्याय है जो यह मानती है कि शिक्षा ही किसी देश को आगे बढ़ा सकती है। खोखली शिक्षा, धांधली से पाई गई सीटें और रिश्वत से पाई गई नौकरी क्या सच में देश को आगे बढ़ाएगी?

मेरी भारत सरकार से विशेष गुज़ारिश है कि इस तरह के घोटालों के विरुद्ध विशेष नीतियाँ और जाँच बैठाएँ। कड़े कानून और सज़ा मुकर्रर करें, ताकि देश मजबूत बुनियाद पर खड़ा हो, न कि खोखली-चरमराती शिक्षा प्रणाली पर आधारित।

यह लेखिका के निजी अनुभव और विचार हैं।