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‘सेक्युलर’ शरद पवार में जागा संघ प्रेम, कहा- RSS से सीखें घर-घर जाकर जनता से कैसे मिला जाता है

लोकसभा चुनाव में करारी शिकस्त के बाद एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने पार्टी कार्यकर्ताओं को आरएसस से सीख लेने की नसीहत दी है। उन्होंने कहा कि पार्टी के कार्यकर्ताओं को राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ से सीखना चाहिए कि जनता से किस प्रकार संपर्क में रहा जाए। एनसीपी अध्यक्ष ने विधानसभा चुनावों नजदीक देखते हुए सभी कार्यकर्ताओं से कहा है कि वो लोगों से घर-घर जाकर मिलें।

गुरुवार (जून 6, 2019) को पिंपरी-चिंचवाड में बोलते हुए शरद पवार ने आरएसएस स्वंयसेवकों की खूब तारीफ़ की। उन्होंने कहा, “हमारे कार्यकर्ता किसी के घर जाते हैं और अगर वहाँ कोई न मिले तो पार्टी का पैम्पलेट दरवाजे पर डालकर चले आते हैं। आपको देखना चाहिए कि आरएसएस के स्वयंसेवक कैसे प्रचार करते हैं। अगर वे पाँच घरों में जाते हैं और एक बंद रहता है तो वे बार-बार वहाँ जाते हैं, जब तक कि अपना संदेश न पहुँचा दें। लोगों के संपर्क में कैसे रहना है, इसे आरएसएस के कार्यकर्ता अच्छे से जानते हैं।”

अमर उजाला की खबर के मुताबिक पवार का कहना है कि उन्हें एक भाजपा नेता ने बातचीत के दौरान बताया कि दृढ़ निश्चय और अनुशासन ने उनको जीत दिलाने में मदद की। इसके बाद उन्होंने कहा, “मुझे नहीं लगता कि वह जो कुछ कर रहे हैं हमें उसे अपनाने की जरूरत है लेकिन लोगों के साथ जुड़ने और बातचीत करने की उनकी स्किल महत्वूर्ण है, हमें उसको फॉलो करना चाहिए। आज या कल जब आप लोगों तक लोगों कर पहुँचना शुरू करें तो इन बातों को अपने दिमाग में जरूर रखें।”

पवार ने अपने कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ाते हुए कहा कि लोकसभा चुनाव के नतीजों से उन्हें निराश नहीं होना चाहिए। अब अक्टूबर-नवंबर में होने वाले महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटना चाहिए। शरद पवार ने कार्यकर्ताओं से कहा है कि कार्यकर्ता जनता से घर जाकर मिलें और पार्टी का प्रचार शुरू कर दें। उन्होंने कहा ऐसा करने से मतदाता उनसे ये नहीं पूछेंगे कि विधानसभा चुनाव के दौरान आपको हमारी याद क्यों आई।

शेर ख़ान ने दी राहुल के सिंहासन को चुनौती, कहा- मुझे बनाओ कॉन्ग्रेस अध्यक्ष

पूर्व केंद्रीय मंत्री और हॉकी ओलंपियन असलम शेर खान ने एक पत्र में दो साल की अवधि के लिए कॉन्ग्रेस अध्यक्ष बनने की इच्छा प्रकट की है। लेकिन उनकी इस पेशकश को कॉन्ग्रेसी खेमे में किसी भी वरिष्ठ नेता ने गंभीरता से नहीं लिया।

आम चुनाव में पराजय के बाद राहुल गाँधी ने 25 मई को दिल्ली में कॉन्ग्रेस कार्यसमिति की बैठक में अपने इस्तीफ़े की पेशकश की थी। हालाँकि, उनका इस्तीफ़ा नामंज़ूर कर दिया गया था और इस नाते वो आज भी अपने पद पर आसीन हैं। ख़बर के अनुसार, असलम ख़ान पहले ऐसे नेता हैं जिन्होंने राहुल गाँधी की जगह ख़ुद को स्थापित करने का प्रस्ताव रखा। इसका सीधा-सा मतलब है कि उन्होंने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष पद का कार्यभार को संभालने की इच्छा सबसे पहले प्रकट की।

पार्टी के सर्वोच्च निर्णय लेने वाले निकाय ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया और एक प्रस्ताव पारित किया, जिसमें राहुल गाँधी को संगठन में सुधार के लिए कहा गया। देश भर के कॉन्ग्रेस नेताओं और गठबंधन दलों के प्रमुखों ने गाँधी से अपने फ़ैसले पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया। 27 मई को कॉन्ग्रेस अध्यक्ष को लिखे पत्र में ख़ान ने लिखा:

“… मैं अपनी सेवाएँ पार्टी को देना चाहूँगा और केवल दो साल की समय-अवधि के लिए एक अस्थायी कॉन्ग्रेस अध्यक्ष के रूप में ज़िम्मेदारी लूँगा।”

ओलंपियन असलम शेर ख़ान, जो मलेशिया में कुआलालंपुर में 1975 का विश्व कप जीतने वाली भारतीय हॉकी टीम के सदस्य थे, उन्होंने कहा कि वो एक अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी और एक राजनीतिज्ञ हैं और अपने इसी अनुभव के आधार पर उन्होंने यह पेशकश की।

65 वर्षीय पूर्व ओलंपियन असलम ख़ान ने 1972 में म्यूनिख ओलंपिक में भाग लिया था। वो कभी-कभार कॉन्ग्रेस पार्टी में एक वर्ग के ख़िलाफ़ अपनी आलोचनात्मक टिप्पणियों के लिए सुर्ख़ियों में रहे हैं, उन्हें लगता है कि वह फिर से एक सुपर-सब बन सकते हैं। 2017 में, तत्कालीन मध्य प्रदेश कॉन्ग्रेस प्रमुख अरुण यादव के ख़िलाफ़ ख़ान ने एक ऐसा बयान दिया था जिसके चलते राज्य इकाई को यह घोषणा करनी पड़ गई थी कि असलम ख़ान अब पार्टी से नहीं जुड़े रहेंगे।

कॉन्ग्रेस-जेडीएस के बीच दरार बढ़ी, देवगौड़ा के पोते ने कहा, कभी भी हो सकते हैं चुनाव

कर्नाटक में सत्तारूढ़ कॉन्ग्रेस और जेडीएस के बीच अविश्वास की खाई लगातार बढ़ती जा रही है। ख़बर के अनुसार, मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी के बेटे निखिल का एक वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हुआ है जिसमें वह पार्टी कार्यकर्ताओं को विधानसभा चुनाव के लिए तैयार रहने को कहते नज़र आ रहे हैं। उनका कहना है कि कॉन्ग्रेस और जेडीएस के बीच रिश्तों में खटास बढ़ती जा रही है इसलिए राज्य में कभी भी चुनाव सकते हैं, हो सकता है कि चुनाव अगले साल या दो या तीन साल बाद भी हो जाएँ, इसलिए पहले से ही तैयार रहें।

इस वीडियो के अनुसार, निखिल ने पार्टी कार्यकर्ताओं से कहा कि चुनाव के लिए हमें अभी से तैयारी शुरू कर देनी चाहिए। उन्होंने कहा कि फ़िलहाल यह नहीं कहा जा सकता कि तैयारियाँ बाद में कर लेंगे, इसके लिए ख़ुद को अगले महीने से तैयार करना होगा। वर्तमान स्थिति को देखते हुए यह लग रहा है कि पता नहीं कब चुनाव हो जाएँ। इसलिए जेडीएस नेताओं को हर परिस्थिति का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए।

इससे पहले भी कॉन्ग्रेस और जेडीएस गठबंधन के बीच दरार की ख़बरें सामने आ चुकी हैं। इसकी वजह यह भी है कि लोकसभा चुनाव में दोनों पार्टियों का वोट एक-दूसरे को ट्रांसफर नहीं हुआ, जिसकी उम्मीद की जा रही थी। जेडीएस सुरेश गौड़ा ने कॉन्ग्रेस पर आरोप लगाया था कि मांड्या क्षेत्र में बीजेपी को कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने ही वोट दिया है। सुरेश गौड़ा ने यहाँ तक कॉन्ग्रेस पर निशाना साधते हुए पूछा था कि उनके कार्यकर्ता आख़िर किसे प्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं, नरेंद्र मोदी को या राहुल गाँधी को?

वहीं, बीजेपी नेता येदियुरप्पा ने भी दावा किया था कि में राज्य की वर्तमान कॉन्ग्रेस-जेडीएस गठबंधन सरकार से कॉन्ग्रेसी खेमा नाख़ुश नज़र आ रहा है। अपने बयान में उन्होंने कहा था कि कॉन्ग्रेस के लगभग 20 विधायक ऐसे हैं जो परेशान होकर कभी भी कोई फ़ैसला ले सकते हैं, बस थोड़ा इंतज़ार कीजिए।

पश्चिम बंगाल में अब BJP नहीं निकाल सकेगी जुलूस, ममता का तुग़लकी फरमान

भाजपा पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हिंसा भड़काने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा है कि अब सूबे में भाजपा के विजय जुलूस को निकलने की इजाजत नहीं दी जाएगी और इस आदेश का उल्लंघन करने वालों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई होगी।

ममता बनर्जी ने गुरुवार को नार्थ 24 परगना जिले के निमता में टीएमसी के मारे गए कार्यकर्ताओं के घर का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने कहा कि उनके पास सूचनाएँ हैं कि भाजपा ने अपने विजय जुलूसों के नाम पर हुगली, बांकुरा, पुरुलिया और मिदनापुर जिलों में अव्यवस्था फैलाई है। इसलिए अब से एक भी विजय जुलूस नहीं निकलेगा।

ममता बनर्जी ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि अब एक भी विजय जुलूस नहीं निकलना चाहिए क्योंकि लोकसभा चुनाव के नतीजे आए 10 दिन से ज्यादा हो चुके हैं। ऐसे में अगर कोई नेता राज्य में दंगे जैसी स्थिति पैदा करने की कोशिश करेगा, तो पुलिस उससे सख्ती से पेश आएगी। पुलिस को को कानून के हिसाब से कार्रवाई करने और स्थिति बिगड़ने से रोकने के लिए कड़े एक्शन लेने को कह दिया है।

गुरुवार (जून 6,2019) को ममता बनर्जी सीआईडी और दूसरी एजेंसियों के अधिकारियों के साथ निमता का दौरा करने पहुँची थी। दरअसल, मंगलवार को निमता में 4-5 अज्ञात हमलावरों ने टीएमसी नेता निर्मल कुंडू की गोली मारकर हत्या कर दी थी। यहाँ उन्होंने कुंडू के परिजनों को भरोसा दिलाया कि मामले में पूरी जाँच होगी और इंसाफ मिलेगा। उन्होंने कहा, “यह सिर्फ एक हत्या की बात नहीं है… हमें साजिश रचने वाले का पता लगाना है। एक पार्टी रक्तपात और हिंसा क्यों कर रही है?”

बनर्जी के मुताबिक साल 2014 में जब उनकी पार्टी ने जीत हासिल की थी, तो किसी भी तरह की हिंसा या हत्या नहीं हुई थी, लेकिन इस बार कई सीटों पर भाजपा के जीतने के बाद हिंसा और हत्याओं का सिलसिला रुक ही नहीं रहा है। गौरतलब है इससे पहले पश्चिम बंगाल राज्य में भाजपा के कई कार्यकर्ताओं की बेरहमी से हत्या हुई थी। जिसका इल्जाम भाजपा ने टीएमसी पर लगाया है, लेकिन ममता ने इसपर कोई प्रतिक्रिया देनी जरूरी नहीं समझा, अब चूँकि बात टीएमसी कार्यकर्ताओं की मौत की है तो ममता कड़े कदम उठाने की बात कर रही हैं।

J&K: पुलिस के SPO गए थे आतंकी बनने, सेना ने ऑपरेशन में मार गिराया

जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में चल रही मुठभेड़ में अब तक 4 आतंकी मार गिराए जा चुके हैं। इन 4 आतंकियों में जम्मू-कश्मीर पुलिस के 2 एसपीओ भी शामिल हैं। ये दोनों एसपीओ गुरुवार की शाम सर्विस राइफल लेकर फरार हो गए थे। दोनों पुलवामा के रहने वाले हैं और इनकी पहचान शबीर अहमद और सलमान अहमद के रूप में हुई है। बताया जा रहा है ये चारों आतंकी जैश-ए-मोहम्मद आतंकी संगठन से जुड़े हुए थे।

शुक्रवार (जून 7, 2019) को सुरक्षाबलों को मिली जानकारी के अनुसार पता चला कि ये आतंकी रिहायशी इलाके में छिपे हुए है, जिसके बाद कार्रवाई की गई। मारे गए आतंकियों के पास से 3 एके राइफल्स बरामद की गई है।

खबरों के अनुसार ख़ुफ़िया इनपुट्स के आधार पर ही सेना की 44 राष्ट्रीय राइफल्स, जम्मू-कश्मीर के स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप और सीआरपीएफ जवानों ने पुलवामा के लस्सीपोरा इलाके में तलाशी अभियान शुरू किया था। इसी बीच पंजारण इलाके में आतंकियों ने सेना के जवानों पर फायरिंग कर दी। जिसके बाद सेना ने इलाके को घेरा और जवाबी कार्रवाई शुरू की।

चार आतंकियों के मारे जाने के बाद भी अभी इलाके में कुछ और आतंकियों के छिपे होने की आशंका है, इसलिए सर्च ऑपरेशन अभी जारी है। फिलहाल, इलाके में तनाव के कारण इंटरनेट सुविधा को बंद कर दिया गया है और साथ ही सुरक्षा के इंतजामों को भी बढ़ाया गया है।

कैप्टन ने कतरे सिद्धू के पर, बदला मंत्रालय, ज़ुबानी जंग चालू

लोकसभा चुनाव के बाद पंजाब मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह की पहली कैबिनेट बैठक में शामिल न होने वाले नवजोत सिंह सिद्धू का मंत्रालय बदल दिया गया है। खबरों के अनुसार सिद्धू को बिजली एवं नवीकरण ऊर्जा मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी गई है। साथ ही कुछ अन्य मंत्रियों के विभाग में भी बदलाव किया गया है।

कॉन्ग्रेस नेता नवजोत सिंह सिद्धू पर इससे पहले स्थानीय निकाय के साथ पर्यटन एवं संस्कृति मंत्रालय की जिम्मेदारी थी, लेकिन बैठक के फैसले के बाद उनसे पर्यटन और संस्कृति मामलों का प्रभार ले लिया गया है। बैठक में लिए फैसले के मुताबिक सिर्फ़ 4 मंत्रियों को छोड़कर अन्य सभी मंत्रियों के प्रभारों में कुछ न कुछ फेरबदल हुआ है। मुख्यमंत्री का कहना है कि इससे सरकार के कामकाज में अधिक सुधार होगा। साथ ही कार्यों में पारदर्शिता और कुशलता आएगी।

नवभारत टाइम्स की खबर के मुताबिक कैप्टन ने जहाँ नवजोत सिंह सिद्धू को बिजली तथा नवीकरण ऊर्जा का प्रभार सौंपा है, वहीं उनके पर्यटन तथा संस्कृति के मामलों की जिम्मेदारी चरणजीत सिंह चन्नी को सौंप दी है। सीएम ने स्थानीय शासन विभाग का जिम्मा सबसे वरिष्ठ सहयोगी ब्रह्मा मोहिंद्र को दिया है जबकि उनके पास रहे स्वास्थ्य और परिवार कल्याण का प्रभार बलबीर सिद्धू को दे दिया है। बलबीर सिद्धू के पशुपालन, मत्स्य पालन और डेयरी प्रभार तृप्त बाजवा को दिया गया है और उन्हें उच्च शिक्षा का भी प्रभार मिला है।

हालाँकि, बाजवा के पास ग्रामीण विकास और पंचायत प्रभार कायम है लेकिन उनसे आवास और शहरी विकास का कार्यभार लेकर सुखविंदर सिंह सरकारिया को दे दिया गया है। स्कूली शिक्षा का प्रभार विजय इंद्र सिंगला को दिया गया है। जानकारी के मुताबिक मनप्रीत बादल के पास वित्त, योजना और कार्यक्रम क्रियान्वयन का विभाग बना रहेगा लेकिन मुख्यमंत्री ने शासन सुधार अपने पास लेने का फैसला किया है।

बता दें पंजाब मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और कॉन्ग्रेस नेता नवजोत सिंह के बीच चल रहा मनमुटाव किसी से छिपा नहीं है। दोनों में चुनाव से पहले से ही जुबानी जंग जारी है। सिद्धू का कहना है कि उन्हें अनुचित तरीके से कॉन्ग्रेस के ख़राब प्रदर्शन के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, और यही कारण है कि उन्हें कुछ लोग पार्टी से निकालना चाहते हैं।

सिद्धू का कहना है कि चुनावों में मिली हार के लिए उनपर निशाना साधा जा रहा है, जो कि बहुत गलत है। सिद्धू का कहना है कि हार सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्हें महत्वहीन नहीं समझा जा सकता। उन्होंने कैप्टन पर निशाना साधते हुए कहा है कि हार के लिए उनपर निशाना क्यों साधा जा रहा है और बाकी नेताओं के ख़िलाफ़ क्यों नहीं? जबकि वो हमेशा एक अच्छे परफ़ॉर्मर रहे हैं।

BREAKING: आतंकियों ने कश्मीर में की ईद मनाने आए जवान की हत्या, सेना का तलाशी अभियान जारी

अनंतनाग के अपने गाँव सदूरा में ईद मानाने आए 34वीं राष्ट्रीय राइफल्स के जवान मंज़ूर अहमद बेग की हत्या कर दी गई है। आ रही खबरों के अनुसार हत्या बेग के घर में घुसकर की गई है। कुछ मीडिया रिपोर्ट के अनुसार इसमें जम्मू-कश्मीर के आतंकियों का हाथ हो सकता है। हालाँकि, अहमद बेग को फ़ौरन अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। इलाके को घेर कर सेना के एसओजी दस्ते ने कातिलों को ढूँढ़ने का अभियान शुरू कर दिया है

राइफलमैन औरंगज़ेब के मामले की आई याद

यह मामला राइफलमैन औरंगज़ेब के हत्या कांड की याद दिला रहा है। उसमें भी पिछले साल के जून में ही दहशतगर्दों ने सेना के राइफलमैन औरंज़ेब की अपहरण कर हत्या तब कर दी थी जब वे ईद मनाने अपने घर आ रहे थे। उनकी हत्या में शामिल आतंकी ज़ाकिर मूसा को सेना ने पिछले महीने की 23 को ही देर शाम मार गिराया था।

(यह डेवलपिंग स्टोरी है। अधिक जानकारी मिलने पर इसे अपडेट किया जाएगा।)

हाशिए पर खड़े लुटियंस-खान मार्केट गिरोह बने ‘प्राउड’ हिंदुस्तानी, इन्हें सत्ता की मलाई चाहिए

‘खान मार्केट’ और ‘लुटियंस मीडिया’ दोनों ही मुख्यधारा के भारतीय मीडिया में, और चूँकि यह मीडिया ही सार्वजनिक संवाद का एकलौता साधन हुआ करता था तो एक तरह से भारत के पूरे सार्वजनिक जीवन में, हैरी पॉटर उपन्यास के मुख्य खलनायक लॉर्ड वोल्डेमॉर्ट जैसा रहा है- ‘तुम-जानते-हो-कौन’। एक ऐसी सत्ता, जिसने शासन हमेशा पर्दे के पीछे से, अँधेरी परछाइयों से किया, और अपना नाम लेने को ‘टैबू’ बना कर रखा। उपरोक्त खलनायक की तरह, माफिया फिल्मों में दिखाए गए मुँह बंद रखने और नाम न लेने, एक-दूसरे पर उँगली न उठाने के अनकहे, अलिखित समझौते, ‘कोड ऑफ़ साइलेंस’ (जिसे ‘ओमेर्टा’ कहते हैं) का सजीव उदाहरण।

इसके बारे में बात की जा सकती थी, “आखिर यह देश क्यों आगे नहीं बढ़ रहा?”, “हमें क्या रोके हुए है हमारे साथ या बाद आज़ाद हुए मुल्कों के बराबर तरक्की करने से?” जैसे सवाल पूछे तो जा सकते थे, लेकिन इन सवालों का जवाब हमेशा सन्नाटा होता था- क्योंकि सवाल जिस महफ़िल में होते थे, वहाँ बैठे हर एक इंसान को पता होता था कि जवाब देना, उस नाम को ज़बान पर लाना उनके कैरियर का अंत होगा। 

लुटियंस और खान मार्केट दिल्ली के सबसे महँगे इलाके हैं- यह भारत के नव-अभिजात्य वर्ग का गढ़ हैं। उन लोगों के जो नेहरूवियन समाजवाद और सेक्युलरवाद के पुजारी थे, खुद धनाढ्य होने के बावजूद। वह लोग जो खुद (या उनका कोई-न-कोई करीबी) उद्योग-धंधे, कल-कारखाने चलाते थे, लेकिन किसी नए व्यवसायी के किसी नए व्यापार के लिए लाइसेंस-कोटा-परमिट राज के समर्थक थे। वह लोग, जिनके घर से जब किसी का ‘फैमिली बिज़नेस’ में मन नहीं लगता था तो उसे सिविल सर्विसेज़ की तैयारी की सलाह दे दी जाती थी- क्योंकि पता था कि चयन तो होना ही है! जेएनयू का वीसी भी इन्हीं लोगों के प्रेस क्लब और जिमखाना के बार में बैठकर व्हिस्की की चुस्कियों में तय होता था, और भारत का अगला उर्वरक से लेकर वित्त मंत्री तक भी।

यही लोग इस ‘गैंग’ के सदस्य भी थे, चौकीदार भी, और एंट्री के नियम तय करने वाले भी। गिटपिट अंग्रेजी बोलते और हिंदी-हिन्दू-हिंदुस्तान के सिद्धांत से ही घिनाते इस गैंग से निकला ‘लुटियंस मीडिया’। चूँकि, अधिकाँश बड़े अख़बार और पत्रिकाएँ इसी गैंग के आर्थिक अंग इन्डस्ट्रियलिस्टों के हाथ में थे, जो पहले ही नेताओं के साथ लाइसेंस-कोटा-परमिट की आपसी ‘अंडरस्टैंडिंग’ में थे, तो वहीं से इस ‘अंडरस्टैंडिंग’ का विस्तार मीडिया में हुआ। वरिष्ठ नौकरशाह चूँकि अंग्रेजों के समय में लगभग निरंकुश सत्ता का स्वाद चखने के बाद ताकत छिनने की आशंका में थे, तो उन्होंने भी ज़ाहिर तौर पर हाथ बेझिझक मिलाया।

अकादमी और बौद्धिक जगत के लोगों के लिए भी यह फायदे का सौदा था, क्योंकि यह गैंग मीडिया में ‘छपास’ (शब्द भले शायद मोदी का हो, लेकिन प्रवृत्ति पुरानी है, और 95% मीडिया की रोजी-रोटी का स्रोत भी), विश्वविद्यालयों से लेकर आयोगों में मलाईदार नियुक्ति, अपने बाल-बच्चों के देश के चोटी के लोगों के साथ उठने-बैठने की सेटिंग, विदेशी यूनिवर्सिटियों में प्रवेश के लिए अनुशंसा पत्र- सब चीजों का ‘सिंगल-विंडो क्लियरेंस’ था। (लगता है मोदी ने सच में कुछ ‘नया’ नहीं सोचा, केवल पुरानी सुविधाओं का विस्तार मुट्ठी-भर लोगों से देश की हर एक मुट्ठी तक पहुँचा दिया- और इसी की सारी नाराज़गी है।)

‘खान मार्केट गैंग’ और ‘लुटियंस मीडिया’ इसी नेता-नौकरशाह-इंडस्ट्रियलिस्ट-बुद्धिजीवी-पत्रकार का गुप्त गठजोड़ था- एक-दूसरे का ‘ध्यान रखने’ की मौन सहमति, जिसमें नूरा कुश्ती की तो गुंजाईश थी, एक-दूसरे की सेनाओं के के ‘फुट सोल्जर्स’ को खेत करने की भी आज़ादी थी, लेकिन ऊपरी स्तर पर एक-दूसरे को, और इन-सबको जोड़ने वाले वैचारिक सूत्र, गाँधी-नेहरूवाद, पर बुनियादी सवाल न करने, और अगर कोई भी (‘अंदर का आदमी’ हो या ‘बाहरी’) उस पर सवाल करे तो उसे ज़बरदस्ती, येन-केन-प्रकारेण अप्रासंगिक कर देने का भी अलिखित समझौता था।

और मोदी के राज में इसी गठजोड़ की गर्भनाल पहली बार शायद सूख गई है। पहली बार शायद राजनीति के उच्चतम गलियारों से पत्रकारों को ‘एक्सक्लूसिव लीक्स’ नहीं मिल रहे, प्रधानमंत्री तक पहुँच न केवल बंद है, बल्कि मोदी की सोशल मीडिया उपस्थिति ने इन्हीं की प्रासंगिकता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इनके चैनलों और अख़बारों में गाँधी-नेहरू के गुण गाने के पीछे हज़ार काले कर्म छिपाने वालों की मलाईदार पोस्टिंग्स बंद हैं, हिंदी-भाषी और हिंदी-माध्यम के स्कूलों से आए ‘संघियों’ को वह पद दिए जा रहे हैं, और नौकरशाहों का एक बड़ा वर्ग (जिसमें सभी नौकरशाह नहीं हैं) इसलिए अवसादग्रस्त है कि कुर्सी तोड़ने और ‘मलाई काटने’ की जिस उम्मीद में उन्होंने जिंदगी के बाकी मौके छोड़ दिए, मोदी के राज में जिंदगी उसके ठीक उलटी हो रखी है- काम कमरतोड़ हो रहा है, और रिश्वत के स्रोत सूखते जा रहे हैं।

और ऐसे ही गमगीन माहौल में यशवंत सिन्हा की पत्नी नीलम सिन्हा लिखतीं हैं कि खान मार्केट गैंग को यूँ न बदनाम करो, बड़ी मेहनत से ये गैंग बनाया है; कॉन्ग्रेस नेता बदरुद्दीन तैय्यबजी की पोती लैला तैय्यबजी को याद दिलाना पड़ता है कि हम भी इस देश के ही हैं मालिक! और चाहे मैं मान भी लूँ कि 2-4-5-8% इनके लेखों की मैंने ‘स्ट्रॉमैनिंग’ (किसी के विचारों को तोड़मरोड़कर वाहियात या हास्यास्पद दिखाना, जबकि वे ऐसे हैं नहीं) की है, तो भी 90% यही लिखा है- आप लिंक खोल कर जाँच के लिए स्वतंत्र हैं।

अपने ‘वो भी क्या दिन थे’ में गिरफ्तार लैला तैय्यबजी

लैला तैय्यबजी के द वायर में लिखे गए लेख का अधिकाँश हिस्सा जिन चीजों में लगा है, वही लुटियन-निवासियों से आम आदमी की नफ़रत का मुख्य कारण है- वह याद करतीं हैं कि कैसे नींबू पानी की चुस्कियाँ लेते हुए वे लोग देश का नीति और नियति निर्धारण करते थे; कैसे उनकी 50 और 60 के दशक की दिल्ली की यादें सरकारों और दूतावासों की हैं; कैसे उनके पास खिदमतगार, भिश्ती, बावर्ची, चपरासी और यहाँ तक कि मसालची हुआ करते थे। उनकी जिंदगी 50-60 के दशक में अधिक सीधी हुआ करती थी। अब उन्हें कैसे समझाया जाए कि उनके इसी ‘विशषाधिकार’ से तो आज लोगों का खून उबला हुआ है- आपके पास उन दिनों में रेस कोर्स, वेलिंग्डन क्रेसेंट में घूमने की सुविधा थी, जब यह देश एक खूनी बँटवारे के बाद खड़ा होने की कोशिश कर रहा था।

आप आपत्ति कर सकते हैं कि क्यों भई, इनके परिवार के पास पैसा था, सुरक्षित रहने के साधन थे, तो इससे क्या? इससे तुम्हारा क्यों खून उबला जा रहा है? तो जवाब होगा वह इसलिए क्योंकि यह लुटियंस गैंग अपने गैंग के ‘बाहर के लोगों’ को यही समाजवाद (जो कि परसन्ताप पर, ईर्ष्या पर, दूसरे की सम्पत्ति और अच्छी किस्मत से चिढ़ पर ही आधारित है) उस समय भी पढ़ाता था, और आज भी पढ़ाता है- तो लाज़मी है कि उन्हें भी इसका स्वाद दिया जाए! इन्हें भी यह बताया जाए कि इनकी सम्पत्ति, इनकी सम्पन्नता इनसे नफरत करने, इनका विरोध करने का पर्याप्त कारण है। इसके अलावा लैला जी का यह संस्मरण तत्कालीन कॉन्ग्रेसियों का दोगलापन भी दिखाता है- दूसरों को समाजवाद सिखाने वाले, एक समय आयकर 97% से ज्यादा सामाजिक और आर्थिक न्याय के नाम पर दूसरों के लिए करने वाले खुद विपन्न देश के महासागर में विपुलता के द्वीप थे।

नीलिमा सिन्हा खान मार्केट गैंग के गैंग होने के सारे सबूत खुद ही देतीं हैं

नीलिमा सिन्हा, जो 24 साल आईएएस ऑफ़िसर रहे और फ़िलहाल अपनी पार्टी में हाशिए पर चले गए एक नेता की पत्नी हैं, मोदी के खान मार्केट कटाक्ष को पहले तो गलत बताते हुए लेख शुरू करतीं हैं, लेकिन लेख का अंत करते-करते मान लेतीं हैं कि हाँ, खान मार्केट वाले एक “गैंग” हैं। बीच में वह अपनी जीवन-गाथा सुना कर शायद लोगों में सहानुभूति पैदा करने की कोशिश करतीं हैं। लेकिन ऊपर दिए लैला तैय्यबजी के उदाहरण की ही तरह वह यह भूल जातीं हैं कि यह सुनकर कि वह सिविल सर्वेंटों के ही परिवार में, उनके बँगलों में ही पहले बेटी, फिर पत्नी, फिर माँ/सास बनकर रहीं, उन्हें इस बात का ख्याल नहीं होने वाला कि नहीं भाई, आप खान मार्केट वाले नहीं हैं, बल्कि उसका आप लोगों के एक ही ‘गैंग’ का होने का संदेह और दृढ़ हो जाता है।

नीलिमा जी, ज़रा यह समझाइए कि यह कैसा ‘संयोग’ और खान मार्केट गैंग के गैंग न होने का कैसा उदाहरण है कि आपके पिता खान मार्केट के बँगले में रहे, आपकी शादी भी उसी इलाके में तैनात इंसान से हुई, उसी सर्विस, उसी सर्किल का हिस्सा, और उसके बाद आपकी बेटी से शादी होने के बाद आपके दामाद की भी अपने-आप तैनाती अपने बैंक की खान मार्केट शाखा में हो गई? अगर बिना किसी ‘कनेक्शन’ वाला बैंक कर्मचारी अपने बैंक की खान मार्केट शाखा में तैनाती माँगने पहुँच जाए तो उसकी भी खान मार्केट शाखा में तैनाती हो जाएगी जैसे आपके दामाद की हुई? इतने सारे संयोग या तो चमत्कारिक संयोग हैं, या गैंग के गैंग होने का सीधा उदाहरण।

और जो आप अपने पिता और पति के गरीब घरों से आने का उदाहरण देतीं हैं तो गरीबी से मेहनत कर अमीर हो जाना कबीले-तारीफ़ है मगर भ्रष्टाचार या गुटबाजी में इंसान के न पड़ने का सर्टिफिकेट नहीं। उदाहरण के तौर पर अगर आपके पति यशवंत सिन्हा गरीब चायवाले के बेटे मोदी पर अगर गरीब-से-अमीर बने धीरूभाई अम्बानी के बेटे के साथ मिलकर देश को चूना लगाने का आरोप लगा सकते हैं तो वैसी ही परिस्थितियों से आए, और वैसे ही ‘मौके’ पाए हुए आपके पिता, पति और पुत्र खान मार्केट में गैंग बनाने के आरोप से केवल जीवन परिस्थितियों के आधार पर मुक्त कैसे माने जा सकते हैं? और अगर ”गैंग्स’ की बात करें तो गैंग्स में ज़मीनी स्तर पर भी भर्ती होती रहती है, और नए आए लोगों को गैंग की सीढ़ियाँ चढ़ने के मौके भी मिलते रहते हैं- लेकिन इतने भर से गैंग, गैंग होना बंद नहीं कर देते। आपका खान मार्केट गैंग भी अपवाद नहीं है।

हमने अपने राज में तो एकछत्र मलाई काटी, और अब तुम्हारी भी मलाई में हिस्सा चाहिए

अपने पैसे के दम पर सीढ़ियाँ चढ़ते हुए दूसरों को समाजवाद का उपदेश देने वाले, ज़मीनी संस्कृति, हिन्दू धर्म की संस्कृति, से न केवल कटे बल्कि उसे जड़ से मिटा देने की खुद कोशिश करने वाले और उस पर कहर बरपाने वाले इस्लामी हमलावरों की 70 साल वाइटवॉशिंग करने वाले, नैतिक और आर्थिक भ्रष्टाचार और वामपंथ में डूबे लुटियन मीडिया और खान मार्किट गैंग ने सत्तर साल इस देश पर एकछत्र राज किया है। चाहे कॉन्ग्रेस सत्ता के अंदर रही या बाहर, ‘इकोसिस्टम’ का बाल भी बाँका नहीं हुआ। ऐसे सिस्टम का वही हाल होता है, जो इनका हो रहा है। लेकिन अब इन्हें ‘ग्लोबल सिटीजनशिप’, ‘लिबरल थॉट्स’ भूल कर इस देश में अपनी भी हिस्सेदारी याद आ रही है।

लेकिन असल में यह देश में नहीं, सत्ता की मलाई में हिस्सेदारी माँग रहे हैं- यह उसी इकोसिस्टम को जिला कर, 2.0 बना कर वापिस लाने की बात कर रहे हैं। ये विचारों की नहीं, अपनी जगह तलाश रहे हैं, जबकि अपना राज रहते संघ को, दक्षिणपंथियों को, वास्तविक हिन्दुओं को इन्होंने अपने संगमरमर के सत्ता के, ताकत के महलों के आसपास भी नहीं फटकने दिया। जेनएयू बनाया, जादवपुर, उस्मानिया, एएमयू जैसी उसकी ‘शाखाएँ’ भी बनाईं लेकिन कोई दक्षिणपंथियों का गढ़ नहीं बनने दिया। तो अब सामान्य नागरिक अधिकारों के अलावा कुछ समय इन्हें भी लाइन के ‘उस तरफ’ गुज़ारने देना चाहिए।

कश्मीर की मस्जिद में ईद पर लश्कर आतंकियों ने पढ़ाया जिहादी-आतंकी पाठ, तंजीम के नाम पर जुटाए फंड

कश्मीर में मस्जिदों का इस्तेमाल भारत विरोधी गतिविधियों के लिए होना नई बात नहीं है लेकिन अब यहाँ खुले तौर पर आतंकवादी मस्जिद में भारत के खिलाफ जहरीले भाषण देकर युवाओं को आतंक एवं हिंसा के लिए भड़का रहे हैं। टाइम्स नाउ के खुलासे के अनुसार कुलगाम की एक मस्जिद का एक ऐसा ही वीडियो सामने आया है जिसमें लश्कर ए-तैयबा के दो आतंकवादी मस्जिद में दाखिल होकर वहाँ के लोगों को भारत के खिलाफ भड़काते हैं। वीडियो में इनमें से एक आतंकवादी को खुले में पिस्टल लहराते और भारत विरोधी बातें करते हुए देखा जा सकता है। यह वीडियो ईद-उल-फ़ितर के दिन का बताया जा रहा है।

टाइम्स नाउ के इस वीडियो में साफ सुना जा सकता है कि मस्जिद में दाखिल हुए दोनों आतंकवादी पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगाते और कश्मीरी युवकों को आतंकवाद के रास्ते पर चलने के लिए उकसाते नजर आ रहे हैं। यही नहीं दोनों आतंकियों ने तंजीम के नाम पर वहाँ मौजूद जमात से दान करने के लिए भी कहा।

वीडियो में आतंकी कह रहे हैं कि वे कश्मीर की आजादी की लड़ाई लड़ रहे हैं। वह खुलेआम वहाँ जिहाद का पाठ पढ़ा रहे हैं। लेकिन अभी तक किसी भी सेक्युलर नेता, पत्रकार या पक्षकार का इस पर न कोई बयान आया है और न ही ममता बनर्जी, महबूबा मुफ़्ती, उमर अब्दुल्ला, केजरीवाल जैसे नेताओं ने इसकी कोई आलोचना की है। जय श्री राम के नारे में भी भयंकर आतंक देख लेने वाले ये नेता आज आतंकियों के मस्जिद में खुलेआम ऐलान पर भी चुप हैं।

यह वीडियो राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति चिंतित किसी भी सच्चे नागरिक को परेशान कर सकता है। क्योंकि, कश्मीर में बेशक आतंकी गतिविधियाँ वर्षों से संरक्षण पाती आ रही हों लेकिन पाकिस्तान की तरह खुलेआम आतंक और जिहाद के नाम पर उकसाते और चंदा इकठ्ठा करते आतंकी आने वाले किसी बड़े खतरे की आहट हैं।

बता दें कि सेना के ऑपरेशन ‘ऑल आउट’ में बड़ी संख्या में करीब 102 के आस-पास आतंकियों को मार गिराया है। जिससे आतंकियों की कमर टूट चुकी है। हाल ही में सुरक्षाबलों ने लश्कर के आतंकी जाकिर मूसा को भी ढेर कर दिया था। अपने कमांडरों के मारे जाने के बाद आतंकी हताश हो गए हैं।

मोदी सरकार की आतंक के प्रति जीरो टॉलरेंस नीति के कारण आज घाटी में पत्थरबाजी और भारत विरोधी गतिविधियों के लिए कश्मीरी युवाओं को ISI से प्राप्त पैसे देकर उन्हें उकसाने वाले ज्यादातर अलगाववादी या तो नजरबंद हैं या जेल में हैं। कश्मीरी नेताओं के लाख अपील के बाद भी यहाँ तक की रमजान के महीने में भी सेना ने आतंकियों के खिलाफ अपने अभियान को बंद नहीं किया और कई आतंकियों को मौत के घाट उतार दिया।

यहाँ तक कि मोदी के शपथ लेने के बाद गृहमंत्री अमित शाह ने सबसे पहले कश्मीर के टॉप टेन आतंकियों की लिस्ट तैयार करवाई है। अब देखना यह है कि कैसे प्रशासन जम्मू-कश्मीर में फैले इन आतंकियों से निपटती है।

कार-चोर शाहरूख़ चला रहा था ईद पर चोरी की होंडा-सिटी, भड़के नमाज़ियों ने की थी तोड़फोड़

पूर्वी दिल्ली में, ईद के अवसर पर, एक तेज़ रफ़्तार से कार गुज़रने के बाद भड़के नमाजियों ने अपना आक्रोश व्यक्त करते हुए डीटीसी की बस सहित कई सार्वजनिक संपत्ति को भारी क्षति पहुँचाई थी। इस हादसे में 17 नमाज़ियों के घायल होने की अफ़वाह भी ऊड़ाई गई थी, जो कि पूरी तरह से झूठी थी। घटना के बाद से ही पुलिस कार चालक की तलाश में जुट गई थी। दरअसल, उस कार चालक की पहचान शाहरुख़ के रूप में अब उजागर हो गई है। टाइम्स ऑफ़ इंडिया के राज शेखर झा के अनुसार उसे गिरफ़्तार भी कर लिया गया है।

शाहरुख एक ऑटो-लिफ्टर अर्थात एक कार चोर है जो एक चोरी की हुई होंडा सिटी से भाग रहा था। पुलिस द्वारा ऑपइंडिया को बताया गया कि वह (शाहरुख़) बेहद हड़बड़ी में कार चला रहा था। मीडिया में आई अन्य ख़बरों के विपरीत, पुलिस ने यह ख़ुलासा किया कि उस हादसे में कोई भी घायल नहीं हुआ था।

हालाँकि, अभी तक किसी भी उपद्रवी को गिरफ़्तार नहीं किया गया है। ऑपइंडिया ने सुबह जब डीसीपी मेघना यादव से बात की, तो उस समय तक इस मामले को लेकर कोई FIR दर्ज नहीं की गई थी। मुख्य रूप से पुलिस शाहरुख को गिरफ़्तार करना चाहती थी। अब जब इस पर ध्यान दिया गया है, तो ऐसी उम्मीद है कि उपद्रवियों के ख़िलाफ़ भी कार्रवाई की जाएगी।

लोग इस बात से नाराज़ और निराश हैं कि तोड़-फोड़ और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने के मामले में कोई गिरफ़्तारी नहीं हुई। जिसका सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें नमाज़ियों द्वारा सार्वजनिक वाहन को क्षति पहुँचाते हुए साफ देखा जा सकता है।