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कॉन्ग्रेस नेता दे रहे थे जनता को धन्यवाद, कट गई उनकी जेब, जानें क्या है माजरा

एक तो लोकसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस की पूरे देश में बुरी तरह हार हुई है, ऊपर से अब जेबकतरों ने भी उनकी मौज लेनी शुरू कर दी है। जैसा कि हमें पता है, देश भर में मोदी लहर होने के बावजूद पंजाब में कैप्टेन अपना किला बचाने में सफल रहे और अपनी व्यक्तिगत छवि के दम पर राज्य में पार्टी की नैया पार लगाई। पंजाब में 13 में से 8 सीटों पर कॉन्ग्रेस ने जीत का परचम लहराया जबकि भाजपा व शिरोमणि अकाली दल को दो-दो सीटें मिलीं। आम आदमी पार्टी भी एक सीट जीतने में सफल रही। भगवंत मान ने दोबारा जीत कर अपना गढ़ बचा लिया। पंजाब में कॉन्ग्रेस सत्ताधारी पार्टी है लेकिन अमरिंदर सिंह ने ताबड़तोड़ रलियाँ कर पार्टी की इज्जत बचाई। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कॉन्ग्रेस सरकार होने के बावजूद पार्टी का सफाया हो गया।

उधर पंजाब से एक अजीब घटना सामने आई है। फतेहगढ़ साहिब सीट से कॉन्ग्रेस के टिकट पर लोकसभा चुनाव जीतकर सांसद बने डॉ. अमर सिंह के धन्यवाद कार्यक्रम में जेबकतरों ने नेताओं की जेबों पर हाथ साफ कर दिया। ख़बर के अनुसार, जेबकतरे नवनिर्वाचित सांसद के साथ सेल्फी खींचने के बहाने कार्यक्रम में शामिल हुए थे। डॉ अमर सिंह ने अकाली दल के दरबारा सिंह गुरु को करीब 94,000 मतों से हराया। इसके बाद जनता को धन्यवाद करने के लिए उन्होंने क्षेत्र में अन्य स्थानीय नेताओं के साथ एक कार्यक्रम रखा था।

यह घटना अमलोह रोड पर स्थित सुरजीत बैंक्वेट हॉल में घटी। यहाँ सांसद को बधाई देने के लिए जगह-जगह से कई कार्यकर्ता और नेता पहुँचे हुए थे। दैनिक भास्कर की ख़बर के अनुसार, जेबकतरों ने कॉन्ग्रेस विधायक तक को नहीं छोड़ा। विधायक रणदीप काका की जेब कटने की बात भी पता चली है। कुल मिलाकर 10 कॉन्ग्रेसी नेताओं को जेबकतरों ने अपना शिकार बनाया। विधायक के पीए रामकृष्ण भल्ला का पर्स भी चुरा लिया गया। पुलिस ने कहा कि चोरी करने वाले लोगों को ट्रेस कर लिया गया है और उन्हें जल्द ही गिरफ़्तार किया जाएगा।

ईश्वर की योजना है नरेंद्र मोदी का प्रधानमंत्री बनना, प्रधानसेवक हमारे अभिभावक हैं: शिवसेना

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज (मई 30, 2019) दूसरे कार्यकाल के लिए पीएम पद की शपथ लेने जा रहे हैं, जिसमें शामिल होने के लिए बिम्सटेक (BIMSTEC) देशों के राष्‍ट्र-प्रमुखों को आमंत्रित किया गया है। शपथ-ग्रहण से पहले शिवसेना ने पीएम मोदी की तारीफ करते हुए कहा है कि वह ‘ईश्‍वर की योजना से’ एक बार फिर इस देश की अगुवाई करने जा रहे हैं।

लोकसभा चुनाव में NDA को मिली प्रचंड जीत के बाद शिवसेना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ करते नहीं थक रही है। इसी क्रम में उन्होंने मुखपत्र “सामना” में नरेंद्र मोदी को देश के प्रधानमंत्री के तौर पर चुने जाने को ईश्वर की योजना बताया है। शिवसेना का कहना है कि पीएम मोदी का शपथ ग्रहण समारोह देश को मजबूती की और ले जाने वाला साबित होगा। इसी के साथ शिवसेना पार्टी ने पीएम मोदी की तारीफों के पुल बाँधते हुए कहा है कि पहले पीएम मोदी प्रधानसेवक और चौकीदार थे, लेकिन अब वो अभिभावक भी हैं। नरेंद्र मोदी की तारीफ करते हुए शिवसेना ने यह भी लिखा है कि आज देश के समक्ष कई मुद्दे हैं, लेकिन पीएम मोदी इनसे दृढ़ संकल्‍प से पार पाने में समर्थ हैं।

शिवसेना ने कहा, “जीत के बाद पीएम मोदी ने विपक्ष के खिलाफ एक शब्द नहीं कहा, इस पर गौर किया जाना चाहिए। पीएम मोदी की कार्यशैली से साफ हो गया है कि ये नई सरकार मानवता और संयम की भावना के साथ काम करेगी।”

मुखपत्र “सामना” में शिवसेना ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर भी निशाना साधा है। ममता बनर्जी के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल नहीं होने को लेकर सामना में कहा गया है कि ममता बनर्जी का ये कदम लोकतंत्र के दायरे में नहीं आता। शिवसेना ने सामना में लिखा है, “पीएम मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में उन लोगों के परिवार वालों को भी बुलाया गया है, जो पश्चिम बंगाल में हुई हिंसा के दौरान मारे गए। ये नाराज होने की कोई वजह नहीं हो सकती। उन परिवारों को भी शपथ ग्रहण समारोह में मौजूद रहने का अधिकार है। अगर ममता बनर्जी और उनकी पार्टी को ये मंजूर नहीं, तो ये तय है कि वो लोकतंत्र को नहीं मानते।”

‘ये जो दहशतगर्दी है, उसके पीछे वर्दी है’: Pak में पश्तून आंदोलन और प्रेस पर ज़ुल्म

पाकिस्तान में पत्रकार गौहर वज़ीर को गिरफ्तार किए जाने पर अंतरराष्ट्रीय पत्रकार बिरादरी ने कड़ी प्रतिक्रिया जताई है। कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट (Committee to Protect Journalists) नामक अंतरराष्ट्रीय गैर सरकारी संगठन ने पाकिस्तानी अधिकारियों से गौहर को रिहा करने को कहा है। CPJ ने कहा है कि गौहर को इसलिए गिरफ्तार नहीं किया जा सकता कि उन्होंने PTM जैसे विवादास्पद संगठन की रिपोर्टिंग की। दरअसल गौहर वज़ीर पाकिस्तान में पश्तूनों के हक़ के लिए लड़ने वाले संगठन ‘पश्तून तहफ़्फ़ुज़ मूवमेंट’ (PTM) के समर्थन में थे इसलिए पाकिस्तानी फौज के इशारे पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया है।

गौहर वज़ीर को 21 अन्य लोगों के साथ खैबर पख्तूनख्वाह के बन्नू ज़िले से गिरफ्तार किया गया है। ‘खैबर न्यूज़’ अख़बार के रिपोर्टर गौहर पर आरोप है कि उन्होंने मोहसिन डावर का इंटरव्यू लिया था जिसने PTM मेम्बरों के साथ मिलकर पाकिस्तान सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया था। डॉन की खबर के अनुसार यह विरोध प्रदर्शन हिंसक हो गया था और इसमें 3 लोगों की जान चली गई थी, तथा 15 घायल हो गए थे।

पीटीएम का कहना है कि वो रविवार (26 मई) को शांतिपूर्ण तरीक़े से अपनी मांगों के लेकर प्रदर्शन कर रहे थे और पाकिस्तानी फ़ौज ने उनके निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर फ़ायरिंग शुरू कर दी, जिसमें कई लोग घायल हो गए। हमले के बाद पाकिस्तान के ट्विटर पर #StateAttackedPTM ट्रेंड कर रहा था। हालाँकि पाकिस्तान के न्यूज़ चैनलों पर दूसरी ख़बरें दिखाई जा रही थीं। पाकिस्तानी फ़ौज यह बता रही थी कि कुछ हथियारबंद लोगों ने फ़ौज पर हमला किया।

बता दें कि पाकिस्तान की सरकार ने पश्तूनों को सारे अधिकारों से वंचित कर रखा है। लोगों को बिना किसी अपराध के उठा लिया जाता है और उनपर ज़ुल्म किए जाते हैं। पीटीएम की माँग रही है कि ट्राइबल बेल्ट में अनावश्यक चेक पोस्ट और जानलेवा लैंडमाइन हटाई जाएँ, और उन्हें वापस लौटाया जाए जिन्हें पाकिस्तानी फ़ौज जबरन उठा ले गई। गौरतलब है कि पश्तून क्षेत्रों में आज भी अंग्रेजों वाले कानून ही लागू हैं और वहाँ के लोगों की माँग है की उन्हें भी वही अधिकार दिए जाएँ जो कराची या इस्लामाबाद में रहने वाले नागरिकों को मिले हैं। पाकिस्तान की सरकार पश्तूनों की आवाज़ को दुनिया तक पहुँचने नहीं देना चाहती इसलिए वहाँ की प्रेस और मीडिया को दबा कर रखती है। इसी सिलसिले में गौहर वज़ीर को गिरफ्तार किया गया है जिसपर अब अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने आवाज़ बुलंद की है।

पश्तून पाकिस्तान के सबसे बड़े जनजातीय समूहों में से हैं और उनके आंदोलन की जड़ें पाकिस्तान के निर्माण से पहले से हैं। उनकी माँग रही है कि अफ़ग़ानिस्तान-पाकिस्तान बॉर्डर पर पश्तूनों का अलग देश बनाया जाए। पाकिस्तानी सरकार इस बात से डरती है कि कहीं पीटीएम उस आंदोलन से न जुड़ जाए। गत वर्ष जनवरी 2018 में वज़ीरिस्तान के एक 27 वर्षीय पश्तून मॉडल नक़ीबुल्लाह महसूद को पुलिस ने गोली मार दी थी जिसके बाद पश्तून आंदोलन और भड़क उठा था। नक़ीबुल्लाह एक उभरता हुए मॉडल था। उसकी मौत के ख़िलाफ़ लोगों ने प्रदर्शन शुरू कर दिया, जिसमें मंज़ूर पश्तीन शामिल हो गए। मंज़ूर पश्तीन की पहचान पाकिस्तान के पिछड़े और दबे-कुचले समाज की आवाज़ के रूप में की जाती है।

पश्तून तहफ़्फ़ुज़ मूवमेंट (PTM) जिसे 2014 में मंज़ूर पश्तीन ने बनाया था, नक़ीबुल्लाह की हत्या के बाद और मुखर हो उठा। नक़ीबुल्लाह की गैर क़ानूनी रूप से की गई हत्या के बाद पीटीएम की मुहिम का असर यह हुआ कि हत्या में शामिल सुपरिटेंडेंट ऑफ़ पुलिस राव अनवर अहमद खान को भागकर छिप जाना पड़ा। पीटीएम ने नारा दिया था– “यह जो दहशतगर्दी है, उसके पीछे वर्दी है।” इस नारे के कारण ही पाकिस्तानी फ़ौज पीटीएम को देशद्रोही कहती है।

पाकिस्तान में दूसरे सबसे बड़े जातीय समूह पश्तून लगातार अपनी सुरक्षा, नागरिक स्वतंत्रता और समान अधिकार के लिए संघर्ष कर रहे हैं। वास्तव में पश्तून समाज अपने लिए एक अलग देश की माँग तब से करता रहा है जब पाकिस्तान बना भी नहीं था। पीटीएम एक अहिंसक आंदोलन है और उसे किसी अन्य देश से किसी प्रकार का संसाधन नहीं मिलता। पाकिस्तान यह अफवाह फैलाता है कि पश्तून आंदोलन को भारत द्वारा फंडिंग की जा रही है लेकिन वास्विकता यह है कि पीटीएम अपने दम पर पाकिस्तानी ज़ुल्म से लड़ रहा है।

बाइक, सिगरेट, हेयर जेल, डियोडरेंट, जूते… आतंकी ज़ाकिर मूसा के शौक़ पर मर-मिटा मेनस्ट्रीम मीडिया

खूंखार आतंकवादी ज़ाकिर मूसा के अपराधों पर पर्दा डालने की क़वायद में मेनस्ट्रीम मीडिया भी पीछे नहीं है। मूसा जो हिज़्बुल का पूर्व कमांडर था और फ़िलहाल अल-क़ायदा से जुड़े आतंकी संगठन अंसार ग़ज़ावत-उल-हिंद का सरगना था, उसे सुरक्षा बलों ने 23 मई को मार गिराया था।

लेकिन मेनस्ट्रीम मीडिया और कुछ तथाकथित-धर्मनिरपेक्ष-उदारवादी मारे गए इन आतंकियों की मौत का शोक मनाने में कभी विफल नहीं होते और वो अक्सर कुख़्यात आतंकियों के अपराधों पर पर्दा डालने पर उतारू हो जाते हैं। इतना ही नहीं मेनस्ट्रीम मीडिया ऐसे आतंकियों को ‘नायक’ या ‘शहीद’ का दर्जा देने से भी नहीं चूकती।

न्यूज़ 18 ने मारे गए आतंकवादी मूसा पर एक ख़बर प्रकाशित की है। इस ख़बर में मूसा के बारे में ऐसी-ऐसी सांसारिक जानकारी शेयर की गई हैं, जैसे कि वो एक रॉकस्टार या फ़िल्म अभिनेता हो। न्यूज़ 18 की ख़बर में इस बात को उजागर करने का प्रयास किया गया है कि 2013 में, पेशे से इंजीनियर मूसा के पिता अब्दुल रशीद भट को आईफोन, आईपॉड और तीन डेबिट कार्ड वाला एक पैकेट कैसे मिला था। इस ख़बर में मूसा के दुखी पिता के शब्दों को अहमियत देते हुए बताया गया कि मूसा ने अपने विलासिता के जीवन को त्यागकर आतंकवादी बनने का फ़ैसला लिया था।

ख़बर में आतंकवादी मूसा के दोस्तों के हवाले से लिखा गया है कि मूसा को हेयर जेल, महँगे डियोडरेंट, नए कपड़े और जूते पसंद थे।

न्यूज़ 18 की ख़बर में उस मुख्य वजह को भी जानने का प्रयास किया गया, जिसकी वजह से तथाकथित “युवा लड़के जो स्पोर्ट्स बाइक और सिगरेट से प्यार करते थे” वो आतंकवादी संगठनों में क्यों शामिल हो जाते हैं? इस ख़बर में यह ‘ख़ुलासा’ किया गया कि मूसा के आतंकवादी बनने के पीछे एक घटना शामिल है, जब उसे एक पुलिसकर्मी ने थप्पड़ मारा था और उस पर पथराव का झूठा आरोप लगाया गया था।

सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल है, जिसमें आतंकी ज़ाकिर मूसा के पिता एक भीड़ को संबोधित करते हुए कह रहे हैं कि सभी ‘मुज़ाहिद’ अल्लाह के लिए लड़ रहे हैं और उन्हें एकजुट होना चाहिए। मूसा ने इस तथाकथित ‘आज़ादी’ के लिए कभी संघर्ष नहीं किया, बल्कि उसने ख़लीफ़ा के लिए लड़ाई लड़ी। वो जिहाद का सिपाही था और उसका घोषित उद्देश्य ग़ज़वा-ए-हिंद था।

इससे पहले AltNews के संस्थापक प्रतीक सिन्हा ने आतंकवादी मूसा को ‘अलगाववादी’ कह कर उसके गुनाहों पर पर्दा डालने का भरसक प्रयास किया था।

इसके अलावा मेनस्ट्रीम मीडिया और कई पत्रकारों द्वारा बुरहान वानी और पुलवामा के हमलावरों के नरसंहारों पर भी पर्दा डाला गया था। कुख्यात आतंकियों और मानवता के दुश्मनों को स्टाइलिश, फैशनेबल युवा पुरुष और क्रांतिकारियों के रूप में चित्रित करने का प्रयास ठीक उसी तरह है जैसे पाकिस्तान द्वारा कश्मीर में अपने एजेंडे को सफल करने के लिए किया जाता है। कुख्यात आतंकियों की पसंद-नापसंद से भला जनता को क्या लेना-देना!

ज़ाकिर मूसा एक अमीर परिवार से था। वह पंजाब के एक कॉलेज में सिविल इंजीनियरिंग का छात्र था। इस तथ्य के बावजूद मूसा ने आतंकवादी बनने का विकल्प चुना। उसके आतंकवादी बनने के पीछे बेरोज़गारी और ग़रीबी को दोष नहीं दिया जा सकता। अगर फिर भी कोई उसके बारे में ऐसा सोचता है तो यह सिर्फ़ इस्लामी कट्टरता ही है।

पुलवामा का हमलावर हो या ज़ाकिर मूसा, इन सभी आतंकियों ने अपने मक़सद को स्पष्ट किया था कि वो इस्लामिक ख़िलाफ़त चाहते थे, लेकिन वो कश्मीर को अलग नहीं करना चाहते। जबकि पुलवामा के हमलावर ने कहा था कि वह गोमूत्र पीने वालों को मारना चाहता है। मूसा ने कहा था कि वह भारत के हिन्दुओं से छुटकारा चाहता है। मीडिया और तथाकथित धर्मनिरपेक्ष लोग ऐसे नरसंहार करने वालों की विचारधाराओं के पीछे के कारणों को खोजने का प्रयास करते रहते हैं, इनका मक़सद केवल जनता को वास्तविक मुद्दों से भटकाना होता है।

सेब जितने वजन के साथ हुआ ‘सबसे छोटी’ बच्ची का जन्म, डॉक्टरों को लगा सिर्फ़ 1 घंटे का है समय…

जब वो पैदा हुई तो उसका वजन एक सेब जितना था – 245 ग्राम। डॉक्टरों ने उसके पिता से कहा कि उनकी बेटी के पास सिर्फ़ एक घंटा है। लेकिन देखते ही देखते वो एक घंटा, 24 घंटों में बदल गए, और वो 24 घंटे पूरे एक हफ्ते में तब्दील हो गया। लेकिन उसे कुछ नहीं हुआ। 5 महीने से ज्यादा की जिंदगी जी चुकी ‘saybie’ आज 2 किलोग्राम की हो चुकी है। अपने इस नन्हें से जीवन से उसने उन सभी मानकों को झुठलाया है जिनके आधार पर एक नवजात की जिंदगी का फैसला किया जाता है। ‘saybie’ का जीवन इस बात का उदाहरण है कि जिंदगी मिलना स्वाभाविक प्रक्रिया नहीं बल्कि एक करिश्मा है।

बुधवार (मई 29, 2019) को सैन डियागो अस्पताल ने बच्ची के माँ-बाप की अनुमति से इस किस्से का खुलासा किया। डॉक्टरों ने बताया कि बच्ची का जन्म प्रिमैच्योर अवस्था में दिसंबर में हुआ था। 40 हफ्तों का समय जहाँ किसी भी नवजात के विकास के लिए न्यूनतम माना जाता है वहीं ‘saybie’ 23 हफ्तों में ही दुनिया में आ गई। जिस कारण दुनिया के सबसे छोटे बच्चे के रूप में जीवित रहने के लिए उसकी रैंकिंग आइवा विश्वविद्यालय द्वारा बनाए गए tiniest बेबी रजिस्ट्री में उल्लेखित है। आइवा विश्वविद्यालय के पीडिएट्रिक्स प्रोफेसर एडवर्ड बेल का कहना है कि रजिस्ट्री में सबसे कम वजन वालों में ‘saybie’ का नाम दर्ज है, लेकिन इस बात को भी खारिज नहीं किया जा सकता कि ‘saybie’ से भी कम वजन के नवजात हुए हैं, जानकारी के अभाव में शायद उनका नाम रजिस्ट्री में मौजूद नहीं है। ‘saybie’ से पहले 2015 में जर्मनी में जन्मा एक बच्चा tiniest बेबी था, जो 7 ग्राम ज्यादा वजनी था।

शार्प मैरी बर्च हॉस्पिटल फॉर वुमेन एंड न्यूबॉर्न द्वारा जारी वीडियो में बच्ची की माँ ने बताया कि वो दिन उनके लिए सबसे डरावने दिनों में से एक था। उन्होंने बताया कि जिस दिन उन्हें अस्पताल ले जाया गया उस दिन उनकी स्थिति बेहद गंभीर बनी हुई थी। बीपी बढ़ने के कारण डॉक्टरों ने तुरंत डिलीवरी करना उचित समझा। बच्ची की माँ कहती हैं कि वो डॉक्टरों को बार-बार कह रही थीं कि उनकी डिलीवरी हुई तो बच्ची नहीं जी पाएगी, वो सिर्फ़ 23 हफ्तों की है। लेकिन सभी विषम परिस्थितियों में साँस लेकर ‘saybie’ ने अपनी माँ के इस डर को दूर किया। अस्पताल की नर्स बताती हैं कि जब वह हुई थी तो उसे बेड पर बहुत मुश्किल से देख पाते थे क्योंकि वो बहुत छोटी थी। जब ‘saybie’ ने अस्पताल छोड़ा तो वहाँ की नर्सों ने उसे एक छोटी सी ग्रैज्युएशन कैप पहनाई।

बता दें कि बच्ची का असल नाम ‘saybie’ नहीं है। दरअसल, अस्पताल के कहने पर माँ-बाप ने इस कहानी को शेयर करने की अनुमति तो दे दी, लेकिन नाम को गुमनाम रखा और कहा कि पूरा किस्सा शेयर करते समय ‘saybie’ नाम का ही प्रयोग किया जाए। यह नाम अस्पताल की नर्सों द्वारा उसे दिया गया है।

जनादेश से बौखला कर जनता को ‘कॉलर पकड़ कर धमकाने’ वाले YoYa की दाढ़ी में कितने तिनके?

भाजपा की प्रचंड जीत के बाद अगर सबसे ज्यादा धक्का किसी को लगा है, तो उसका नाम है- योगेन्द्र यादव। ख़ुद को सेफोलोजिस्ट बताने वाले योगेन्द्र यादव ने प्रोपेगैंडा वेबसाइट ‘द प्रिंट’ में एक लेख लिखा है। ‘द प्रिंट’ के कई राजनीतिक विश्लेषण पूरी तरह से ग़लत साबित हुए हैं और योगेन्द्र यादव के अब तक के विश्लेषणों में शायद ही कोई सही साबित हुए हों। आप सोच सकते हैं कि इन दोनों का साथ आना किसी लेख को कितना बड़ा प्रोपेगैंडा बना सकता है। इस लेख में योगेन्द्र यादव मतदाताओं से परेशान नज़र आते हैं। जैसा कि अंदेशा था, मोदी, EVM, भाजपा और सरकार को गाली देने के बाद अब लिबरल गैंग भारत के मतदाताओं को ही गालियाँ देगा। अब ठीक वैसे ही हो रहा है। सवालों की शक्ल में जरा यादव की भाषा पर गौर फ़रमाइए –

“इस वक़्त मेरा कर्त्तव्य क्या करना बनता है? क्या मैं अपनी प्रतिबद्धताओं को भूल जाऊँ, पीएम मोदी और उनकी पार्टी के प्रति अपनी राय बदल दूँ? भारत को लेकर जो मेरी सच्ची धारणा है, उसे उनके नज़रिए के रूप में स्वीकार कर लूँ? अब जब जनमत आ चुका है, विजेता ट्रोल शायद मुझ से यही चाहते हैं। इसके अलावा, क्या मैं मतदाताओं को कॉलर पकड़कर बताऊँ कि वे कितने धर्मांध और कट्टर हो गए हैं? या फिर, मैं उनके निर्णय की निर्धनता को लेकर उनकी अनभिज्ञता पर तरस खाऊँ? या मैं अपनी विचारधारा के लोगों से सहानुभूति जताऊँ कि इस दुनिया को क्या हो गया है?”

किसी ट्रोल की भाषा में लेख लिख रहे योगेन्द्र यादव के शब्दों के चुनाव पर गौर फरमाइए। अगर वो लिखते कि “जनता कट्टर और धर्मांध हो गई है” तो उन पर उँगलियाँ उठतीं, लेकिन उन्होंने लिखा, “क्या मैं मतदाताओं को कॉलर पकड़कर बताऊँ कि वे कितने धर्मांध और कट्टर हो गए हैं?” योगेन्द्र यादव ने बड़ी चालाकी से अपनी दिमागी हालत और सोच को शब्दों में बयाँ करने के लिए उसे सवालों का रूप दे दिया, लेकिन उससे करोड़ों मतदाताओं को लेकर उनकी घटिया राय समझ में आ गई। जब टीवी डिबेट में महीन बातें करने वाला व्यक्ति कॉलर पकड़ने और धमकाने की बातें करे, तो समझा जा सकता है कि उसके मानसिक संतुलन की क्या स्थिति होगी।

इसे कुछ यूँ समझिए। अगर कोई व्यक्ति योगेंद्र यादव के बारे में अपने लेख में लिखता है, “योगेंद्र पागल हो गया है“, तो इसे ग़लत कहा जा सकता है। लेकिन वहीं कोई दूसरा व्यक्ति लिखता है, “मैं योगेंद्र को चाँटा मारकर नहीं पूछ सकता कि क्या तुम पागल हो गए हो?“, तो भाव यही रहेगा लेकिन, शब्दों के खेल में फँसकर उसके पीछे की सोच सही से उजागर नहीं हो पाएगी। इसमें योगेन्द्र यादव ने बड़ी चालाकी से अपने पिछले लेखों की बात की है और गर्वित होकर याद दिलाया है कि कैसे उन्होंने पीएम को सबसे बड़ा झूठा बताया था।

इसके बाद योगेन्द्र यादव आलोचना करने व आरोप लगाने के लिए अन्य माध्यम ढूँढने लगते हैं। उन्हें चुनाव आयोग के रूप में अगला शिकार मिला। चुनाव आयोग को पुर्णतः पक्षपाती बताते हुए उन्होंने लिखा कि भाजपा ने इस चुनाव में हद से ज्यादा पैसे ख़र्च किए। अप्रैल में एक ख़बर आई थी, जिसमें पता चला था कि मायावती की बसपा के पास भारतीय राजनीतिक दलों में सबसे ज्यादा बैंक बैलेंस है। इसके बाद सपा का स्थान आता है। बैंक बैलेंस के मामले में सपा-बसपा देश की दो सबसे अमीर पार्टियाँ साबित हुईं, लेकिन दोनों के गठबंधन को यूपी चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। योगेन्द्र यादव को आँकड़ों में विश्वास नहीं है, बिना तथ्य अस्पष्ट किए लिख देना उनका पेशा है।

विपक्ष की गलतियाँ, चुनाव आयोग का पक्षपात, ख़ुद के कथित किसान आन्दोलन का हाइजैक हो जाना सहित योगेन्द्र यादव ने भाजपा की जीत की कई कमियाँ गिनाई हैं। यहाँ तक तो सब ठीक है, लेकिन तभी उन्हें भाजपा की प्रचंड जीत नज़र आती है और वे फिर से मतदाताओं को गाली देने के लिए लौटते हैं। इस बार सवालों की जगह उन्होंने “ऐसा हो सकता है कि” का प्रयोग किया है ताकि सीधे कुछ लिखने की जगह इससे ही भाव स्पष्ट हो जाए। वो लिखते हैं:

“मतदाता अनभिज्ञ हो सकते हैं (अर्थात वो चीजों से अनजान हो सकते हैं), सम्मोहित किए गए हो सकते हैं, उनका ध्यान कहीं और भटका हुआ हो सकता है या फिर पूर्वग्रह से ग्रसित हो सकते हैं। ठीक उसी तरह, जैसा हम लोग शॉपिंग मॉल में खरीददारी करते समय महसूस करते हैं। मतदाताओं ने सजग निर्णय नहीं लिया, ध्यान देकर और समझ-बूझ से काम नहीं लिया।”

मतदान की तुलना शॉपिंग मॉल में खरीददारी से करने वाले योगेंद्र यादव को शायद यह पता नहीं कि देश की एक बड़ी आबादी ने कभी शॉपिंग मॉल को देखा भी नहीं है। इसका अर्थ ये नहीं कि इन्हें अपनी इच्छानुसार वोट देने का अधिकार नहीं है। उनके मत का भी उतना ही मान है, जितना यादव का और मुकेश अम्बानी का। यही तो लोकतंत्र है। योगेंद्र यादव के लिए भले ही पोलिंग बूथ एक मॉल हो, जनता के लिए वह अगली सरकार चुनने का एक माध्यम होता है। योगेंद्र यादव ने ये तो बता दिया कि वे मॉल में चीजें खरीदते समय कैसा महसूस करते हैं, लेकिन जनता भी वोट देते समय ऐसा ही महसूस करती है, इसके लिए कोई कारण नहीं बताया यानी, ब्रह्मवाक्य है, लिख दिया तो लिख दिया।

आधे लेख के बाद योगेन्द्र यादव को दिव्य ज्ञान की प्राप्ति होती है और देशहित को देखते हुए उन्हें लगता है कि मौजूदा विकल्प में नरेन्द्र मोदी ही बेहतर हैं। दिव्य ज्ञान की अवधि ख़त्म होते ही उन्हें मोदी मुस्लिमों को छाँट कर चलने वाले दिखने लगते हैं और उनकी ‘विभाजित करने वाली और नेगेटिव’ प्रचार अभियान चलाने से लेकर उनके द्वारा ‘अपने कार्यकाल के वास्तविक रिकॉर्ड को छिपाने’ का आरोप लगाते हैं। इसके बाद उनके पास विपक्षी दलों के लिए कुछ सलाह होती है। योगेन्द्र यादव को लगता है कि अब जातिवाद से काम नहीं चल रहा है, कुछ और आजमाना पड़ेगा।

ध्यान देने वाली बात यह है कि भाजपा और मोदी पर लगातार हिन्दू-मुस्लिम राजनीति करने का आरोप लगाने वाले योगेन्द्र यादव ने जातिवाद का जिक्र तो किया है, लेकिन कहीं भी इसकी निंदा नहीं की है। दिव्य ज्ञान वाले भाग में उन्हें मोदी ठीक नज़र आते हैं, लेकिन कई बिना तथ्यों के अंट-शंट आरोपों के साथ वो फिर अपनी कारगुजारी पर उतर आते हैं। यहाँ सोचने वाली बात यह है कि यादव जैसे लोगों को मतदाताओं से समस्या क्यों है? 2014 में गुड़गाँव लोकसभा से चुनाव लड़ने के बाद चौथे नम्बर पर आकर जमानत जब्त कराने वाले योगेंद्र यादव जैसे लोग जब करोड़ों मतदाताओं के बारे में एक आम राय बनाते हुए नेगेटिव ठहरा दें, तो इस पर सवाल उठाना लाजिमी है।

जनादेश के बाद चुने गए लोगों की आलोचना तो होती रही है, लेकिन शायद यह पहला मौका है, जब जनादेश देने वाली जनता को ही भला-बुरा कहा जा कहा जा रहा है क्योंकि उसनें ऐसा नहीं किया, जैसा मुट्ठी भर लिबरल चाहते थे। जनता को ही भटका हुआ, अनपढ़ और पागल साबित करने की कोशिश की जा रही है। कल को ये लोग कहने लगेंगे कि फलाँ पार्टी को वोट देने वाले आतंकवादी हैं, तब क्या? जनादेश को लगातार अपमानित करने वाले इन नेताओं को कुछ दलों द्वारा सदियों से वोटबैंक के लिए फैलाए जा रहे जातिवाद से कोई समस्या नहीं है। फिर बात वहीं आकर रुक जाती है, मैं ये नहीं कह सकता कि “योगेन्द्र यादव की सूजी है” लेकिन मैं ये कह सकता हूँ, “मैं योगेन्द्र यादव की दाढ़ी नोच कर कभी नहीं देखना चाहूँगा कि उनमें कितने तिनके हैं।“

CM रघुवर दास ने इतना गांजा फूँका है कि प्रेस वाली भी… आपत्तिजनक टिप्पणी पर कॉन्ग्रेसी नेता हिरासत में

झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने के लिए यूथ कॉन्ग्रेस नेता अभिजीत राज को 29 मई (बुधवार) को सुबह 10:30 बजे पुलिस ने हिरासत में लिया। पूरे दिन हिरासत में रखने के बाद शाम को उन्हें निजी मुचलके पर छोड़ दिया गया। दरअसल, कॉन्ग्रेसी नेता ने 27 मई को सोशल मीडिया पर एक फ़ोटो शेयर की जिसमें एक महिला पत्रकार झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास का साक्षात्कार ले रही थीं। इस फ़ोटो में महिला पत्रकार ने अपनी नाक पर हाथ रखा हुआ था। कॉन्ग्रेसी नेता ने इसी फ़ोटो को शेयर करते हुए लिखा, “इतना गांजा फूंका है कि प्रेस वाली भी नाक बंद कर ली, ये है झारखंड के मुख्यमंत्री महोदय, जय हो खाजपा।”

इस फ़ोटो को शेयर करते समय यह दावा किया गया कि झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास कथित रूप से नशे की हालत में थे और वो ऐसी हालत में एक न्यूज़ चैनल की महिला पत्रकार को इंटरव्यू दे रहे थे। बता दें कि कॉन्ग्रेस नेता के इस पोस्ट को 1000 से अधिक लोग शेयर कर चुके हैं। इसके लिए फेसबुक पर अभिजीत राज को ट्रोल भी किया गया। एक यूज़र ने अपने ट्विटर हैंडल से लिखा, “ ऐसी हार के बाद कांग्रेस वालों का पागल होना स्वाभाविक है। अब देखिए, इनके राष्ट्रीय अध्यक्ष की हालत देखिए। एसी कमरे में रहने के बाद पसीने छूट रहे हैं, तो इनका पागल होना बनता है। वैसे भी गर्मी अधिक है, तो क्या करें।”

आपको बता दें कि फ़ोटो में जो महिला पत्रकार हैं वो ABP न्यूज़ चैनल की निधि श्री हैं। उन्होंने कॉन्ग्रेस नेता अभिजीत राज की बातों का खंडन किया और ट्वीट किया कि सामान्य बातचीत के दौरान जैसे किसी इन्सान का हाथ उसके नाक या माथे पर चला जाता है, ऐसा ही उस वक्त हुआ। उन्होंने लिखा कि उनकी इस तस्वीर को ग़लत तरीक़े से फैलाया जा रहा है।

इसके अलावा निधि ने यह भी बताया कि यह फ़ोटो 23 मई, 2019 की है, जिस दिन लोकसभा चुनावों की मतगणना हुई थी। उस दिन मुख्यमंत्री रघुवर दास का यह साक्षात्कार चैनल पर भी प्रसारित हुआ था। हालाँकि, अभिजीत राज ने थाने में दिए गए अपने बॉन्ड में लिखा कि उसने सोशल मीडिया पर जो फ़ोटो शेयर की थी वो किसी को ठेस पहुँचाने के लिए नहीं की थी, और अगर उससे किसी को ठेस पहुँची हो तो वो उसके लिए क्षमाप्रार्थी है।

मीडिया का सामना नहीं करेंगे कॉन्ग्रेस व सपा नेता, टीवी चर्चाओं में हिस्सा न लेने का निर्णय

लोकसभा चुनाव 2019 में करारी हार के बाद बड़े राजनीतिक दलों को गहरा सदमा लगा है। कॉन्ग्रेस और समाजवादी पार्टी ने आधिकारिक रूप से टीवी न्यूज़ बहस व चर्चाओं में हिस्सा न लेने की बात कही है। कॉन्ग्रेस पार्टी के कम्युनिकेशन प्रभारी रणदीप सिंह सुरजेवाला ने एक ट्वीट के माध्यम से बताया कि अगले एक महीने तक पार्टी का कोई भी प्रवक्ता किसी भी प्रकार की टीवी परिचर्चा में हिस्सा नहीं लेगा। पार्टी ने निर्णय लिया है कि किसी भी प्रवक्ता को इन बहसों में नहीं भेजा जाएगा। इसके अलावा उन्होंने सभी मीडिया चैनलों व संपादकों से निवेदन किया है कि कॉन्ग्रेस प्रवक्ताओं या पार्टी की तरफ से बहस में भाग लेने के लिए प्रतिनिधियों को न बुलाएँ।

कॉन्ग्रेस अकेली पार्टी नहीं है जो मीडिया से भाग रही है। समाजवादी पार्टी ने भी अपने सभी मीडिया पैनलिस्ट का मनोनयन तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया है। इसका अर्थ है कि सपा द्वारा जब तक नए पैनलिस्ट के नामों की घोषणा नहीं की जाती, तब तक पार्टी का पक्ष रखने के लिए मीडिया चैनलों पर नेता नहीं जाएँगे। कॉन्ग्रेस की ही तरह सपा ने अभी मीडिया चैनलों से अपने नेताओं को पार्टी का पक्ष रखने के लिए न बुलाने का निवेदन किया है। हारे हुए राजनीतिक दलों द्वारा ऐसे निर्णय लेना यह बताता है कि अभी वे मीडिया का सामना करने की स्थिति में नहीं हैं।

इस लोकसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस को जहाँ सिर्फ़ 52 सीटें आईं, सपा सिर्फ़ 5 पर सिमट कर रह गई। मुलायम-अखिलेश को छोड़ कर यादव परिवार के सभी नेता हार गए। बसपा से गठबंधन का पार्टी को कोई फायदा नहीं हुआ और नेतृत्व अभी आत्ममंथन के दौर में है। वहीं कॉन्ग्रेस में तो अध्यक्ष के पद छोड़ने या न छोड़ने को लेकर ही घमासान मचा हुआ है, शीर्ष नेताओं पर अपने पुत्रों को पार्टी के ऊपर तरजीह देने को लेकर निशाना बनाया जा रहा है। राहुल गाँधी ने नेताओं से मिलना-जुलना बंद कर दिया है।

जाहिर है कि ऐसी स्थिति में इन दोनों ही पार्टी के प्रवक्ताओं को न्यूज़ डिबेट के दौरान तरह-तरह के सवालों के जवाब देने पड़ते, इसीलिए, दोनों दलों ने यह निर्णय लिया है। राजनीतिक दलों का बिना मीडिया के सामने आए गुज़ारा भी नहीं चलने वाला, इसीलिए, देखना यह है कि कब तक इन दलों में आत्ममंथन का दौर चलता है और इनके नेता टीवी चर्चाओं में दिखाई देते हैं।

विद्या लक्ष्मी योजना: 10 से अधिक विभागों की स्कॉलरशिप, 35 बैंकों की 95 लोन स्कीम – ऐसे उठाएँ फायदा

बढ़ती महंगाई के दौर में बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाने के लिए लोन लेना एक बहुत आम बात होती जा रही है। कई बार जानकारी न होने के कारण हम बेहतर विकल्प चुनने से चूक जाते हैं, जिसके कारण बाद में पछताते हैं। हम जगह-जगह भटकने से ज्यादा कोशिश करते हैं कि एक ही जगह पर हमें लोन की हर जानकारी मिल जाए। हमारी इसी इच्छा को पूरा करने के लिए मोदी सरकार हमारे लिए विद्या लक्ष्मी योजना लेकर आई है। इस योजना के जरिए सरकार बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाने में दो तरह से सहायता करती है। पहला तो उन्हें केंद्र के 10 से अधिक मंत्रालयों और विभाग की स्कॉलरशिप योजनाओं के माध्यम से पैसे दिलाए जाते हैं और दूसरा 35 बैंकों द्वारा चलाई जा रही 95 लोन स्कीमों के साथ उन्हें पैसा मिलता है।

आप सोच रहे होंगे कि इस योजना का फायदा आप किस तरह उठा सकते हैं? तो आइए इस योजना के बारे में हम आपको जरूरी जानकारी देते हैं।

दरअसल, विद्यालक्ष्मी योजना एक पोर्टल (https://www.vidyalakshmi.co.in/Students/) के रूप में डिजिटल प्लेटफॉर्म पर मौजूद है। जहाँ आप स्कॉलरशिप या फिर शिक्षा लोन के लिए आसानी से आवेदन कर सकते हैं। इस योजना के तहत आपको हर बैंक में अलग से फॉर्म भरने की आवश्यकता नहीं है।

इस योजना से शिक्षा संबंधी लोन लेना बेहद सहज हो गया है क्योंकि इसके पोर्टल पर लोन के लिए कॉमन एप्लिकेशन फॉर्म (CAF) मौजूद है। इस फॉर्म का फॉर्मेट Indian Banker Association से पारित है। खास बात ये है कि देश के 35 बैंकों ने इस पोर्टल पर शिक्षा लोन की 95 योजनाओं को रजिस्टर कर रखा है। इससे आपको हर बैंक की जानकारी अलग से लेने की आवश्यकता नहीं है। इन बैंकों में इलाहाबाद बैंक, पीएनबी, केनरा बैंक, आईडीबीआई बैंक, विजय बैंक आदि शामिल हैं।

इस योजना का लाभ उठाने के लिए आपको प्रधानमंत्री विद्या लक्ष्मी योजना के पोर्टल पर लॉगिन करना होगा। लॉगिन से ही आपका रजिस्ट्रेशन करवाना होगा। इसके बाद आप लोन के लिए अप्लाई कर सकते हैं। इस योजना के तहत आपको अपनी सुविधा के हिसाब से लोन के लिए आवेदन करना होगा। लोन की मंजूरी मिलते ही आपको इसी पोर्टल पर उसकी जानकारी भी मिल जाएगी।

ध्यान रखें:

लेकिन ध्यान रखें कि लोन आवेदन करने का मतलब यह नहीं होता है कि आपको लोन मिल गया। इसलिए आवेदन करने से पहले कुछ बातों का ध्यान रखें। सबसे पहले लोन की पात्रता जाँच लें, ये सारी जानकारी इस पोर्टल पर मौजूद है। हो सकता है कि बैंक आपसे अधिक जानकारी या फिर दस्तावेज माँगे, इसके लिए आपको यह जानकारी बैंक को देनी होगी। इसके बाद बैंक की जाँच को 15-20 दिन में पूरा करने का प्रयास करें, वरना लोन ऐप्लिकेशन को स्वीकारा नहीं जाएगा। आवेदन करते समय अपना मोबाइल नंबर और ई-मेल आईडी सही से भरें, क्योंकि बैंक आपको संपर्क करने की कोशिश कर सकता है। सबसे मुख्य बात – आप एक बार में केवल 3 बैंकों में आवेदन कर सकते हैं। साथ ही हर बैंक की केवल एक ही लोन स्कीम में आवेदन कर सकते हैं।

इसके अलावा आप स्कॉलरशिप के लिए इस लिंक पर भी क्लिक कर सकते हैं-http://scholarships.gov.in/

BJP ने तोड़ा बड़ा मिथक, आधी से भी अधिक ‘अल्पसंख्यक बहुल’ सीटों पर किया कब्ज़ा

लोकसभा चुनाव 2019 के परिणाम को खंगालने पर कई बातों का पता चलता है और कई मिथक भी टूटते हुए नज़र आते हैं। भाजपा पर अक्सर विपक्षी नेताओं व राजनीतिक विश्लेषकों द्वारा अल्पसंख्यक विरोधी होने का ठप्पा लगाया जाता रहा है लेकिन इस चुनाव के आँकड़े दिखाते हैं कि भाजपा समाज के सभी वर्गों का विश्वास जीतने में सफल रही है। भाजपा ने इस बार 90 ऐसे जिलों में 50% से अधिक सीटों को हासिल किया है, जो अल्पसंख्यक बहुल (Minority Concentration Districts) हैं। इन जिलों में यूपीए सरकार ने ही अल्पसंख्यक बहुल माना था। 2008 में कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार के अनुसार, इन जिलों में सामाजिक-आर्थिक और बुनियादी सुविधाएँ राष्ट्रीय औसत से नीचे हैं।

कुल 79 ऐसी लोकसभा सीटें हैं, जो अल्पसंख्यक बहुल हैं। इन 79 में से 41 पर भारतीय जनता पार्टी ने जीत दर्ज की है। अर्थात, कुल अल्पसंख्यक बहुल लोकसभा सीटों में से 51.8% पर भाजपा ने कब्ज़ा किया। ये पिछले लोकसभा चुनाव के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन है। 2014 में भाजपा ने ऐसी 34 सीटों पर जीत दर्ज की थी, यानी इस वर्ष से 7 सीटें कम। वहीं मुख्य विपक्षी दल कॉन्ग्रेस की बात करें तो अल्पसंख्यक बहुत सीटों पर पार्टी का प्रदर्शन गिरा है। 2014 में कॉन्ग्रेस ने 12 अल्पसंख्यक बहुल सीटों पर जीत दर्ज की थी, इस वर्ष पार्टी आधे पर आकर लटक गई और 6 ऐसी सीटों पर ही जीत दर्ज कर सकी।

इन आँकड़ों को देखने के बाद कई विश्लेषकों की राय है कि मुस्लिमों ने इस बार किसी एक पार्टी के लिए थोक में मतदान नहीं किया। अगर सभी जीते उम्मीदवारों की बात करें तो इस बार 27 मुस्लिम उम्मीदवार जीत दर्ज कर संसद पहुँचे हैं। लेकिन, इनमें भाजपा के एक भी सांसद नहीं हैं। ऐसा नहीं है कि भाजपा ने मुस्लिम उम्मीदवारों को मौक़ा नहीं दिया था। भाजपा ने इस चुनाव में कुल 6 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे और सभी के सभी हार गए। सबसे ज्यादा मुस्लिम सांसद तृणमूल कॉन्ग्रेस के हैं। ममता बनर्जी की पार्टी के पास 5 मुस्लिम सांसद हैं जबकि कॉन्ग्रेस 4 मुस्लिम सांसदों के साथ दूसरे नम्बर पर आती है।

राजग की बात करें तो रामविलास पासवान की लोजपा के पास 1 मुस्लिम सांसद है। सबसे ज्यादा गौर करने वाली बात यह है कि भाजपा को सबसे ज्यादा फायदा पश्चिम बंगाल के अल्पसंख्यक बहुल लोकसभा सीटों पर हुआ। 49% मुस्लिम जनसंख्या वाले रायगंज (उत्तर दिनाजपुर जिला) में भाजपा प्रत्याशी देबश्री चौधरी ने 60,000 से भी अधिक मतों से जीत दर्ज की। 2014 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में एक भी मुस्लिम उम्मीदवार ने जीत दर्ज करने में सफलता नहीं पाई थी। यहाँ तक कि इस बार 23% मुस्लिम जनसंख्या वाले दरभंगा में भी भाजपा प्रत्याशी गोपालजी ठाकुर ने जीत दर्ज की।

असम में 45% और 34% मुस्लिम जनसंख्या वाली 2 लोकसभा सीटों पर कॉन्ग्रेस ने जीत का पताका लहराया। कुल मिला कर देखें तो इस बार मुस्लिमों ने एक होकर किसी पार्टी के लिए वोट नहीं किया। भाजपा को मुस्लिम सीटों पर मिली बढ़त पार्टी के लिए राहत की बात है क्योंकि कई मीडिया रिपोर्ट्स में यह बताया जाता है कि मुस्लिम ख़ुद को भाजपा के शासनकाल में असुरक्षित महसूस करते हैं और उनके साथ अत्याचार होता है। मुस्लिम वोटरों ने इस मिथक को इस बार तोड़ दिया है।