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ऑस्ट्रेलिया की नौकरी छोड़, PM मोदी को वोट देने भारत आए शख़्स ने निभाई अपनी ज़िम्मेदारी

यूँ तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कई प्रशंसक हैं, लेकिन एक प्रशंसक ऐसा भी है, जिसने पीएम मोदी को वोट देने के लिए ऑस्ट्रेलिया में अच्छी खासी नौकरी छोड़ दी। बता दें कि यह शख्स ऑस्ट्रेलिया में नौकरी करता था और वोटिंग के दिन की छुट्टी न मिलने पर उसने नौकरी छोड़कर वोट देना उचित समझा। जी हाँ, कर्नाटक के रहने वाले सुधींद्र हेब्बार नाम के एक शख्स ने इसलिए नौकरी छोड़ दी, क्योंकि वो पीएम मोदी को वोट देकर फिर से प्रधानमंत्री बनवाना चाहते हैं और इसलिए वो नौकरी छोड़कर भारत आ गए।

दरअसल, सुधींद्र हेब्बार सिडनी एयरपोर्ट पर स्‍क्रीनिंग ऑफिसर के तौर पर काम कर रहे थे और उन्हें पीएम मोदी को वोट देने के लिए छुट्टी चाहिए थी, लेकिन जब उन्हें वोटिंग के दिन की छुट्टी नहीं मिली तो उन्होंने नौकरी छोड़ दी। सुधींद्र ने बताया कि उन्हें 5 अप्रैल से 12 अप्रैल तक की छुट्टी मिली थी और आगे आने वाले त्योहार ईस्टर और रमजान की वजह से वो अपनी छुट्टियों को आगे नहीं बढ़ा सकते थे, क्योंकि इस दौरान एयरपोर्ट पर काफी भीड़ होती है। मगर उन्होंने सोच लिया था कि वो किसी भी हालत में वोट डालेंगे, इसीलिए उन्होंने ये फैसला लिया।

इसके पीछे का तर्क देते हुए सुधींद्र कहते हैं कि सिडनी में जब लोग भारत की तारीफ करते हुए कहते हैं कि भारत का भविष्य बहुत अच्छा है, तो उन्हें बहुत गर्व होता है और वो इसका सारा श्रेय प्रधानमंत्री मोदी को देते हैं। उनका कहना है कि वो सीमा पर जाकर जाकर देश की रक्षा तो नहीं कर सकते, लेकिन वोट डालकर एक वोटर का फर्ज तो निभा सकते हैं।

नौकरी की बात पर सुधींद्र कहते हैं कि वो ऑस्‍ट्रेलिया में परमानेंट रेजिडेंट कार्ड होल्‍डर हैं और वो पहले भी सिडनी में रेलवे के साथ काम कर चुके हैं। इसलिए उन्हें नहीं लगता कि दूसरी नौकरी खोजने में कोई दिक्‍कत आएगी।

ख़बर के अनुसार, सुधींद्र पिछले लोकसभा चुनाव में भी वो 17 अप्रैल 2014 को भारत आए थे और अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर वापस सिडनी चले गए थे। इस बार भी वो 23 मई को चुनाव के नतीजे आने के बाद ही सिडनी जाएँगे और फिर कोई दूसरी नौकरी ढूँढेंगे।

‘चौकीदार’ का जवाब ‘मुजाहिद’ से दें; ‘मुजाहिद’ डिप्टी मेयर की कश्मीरी युवाओं से अपील

लोकसभा चुनावों की शुरूआत के साथ ही कश्मीर में ‘मैं मुजाहिदीन’ की जो मुहिम शुरू हुई थी अब वह ‘मैं मुजाहिद’ पर आ टिकी है। पहले नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी (पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी) के बीच यह होड़ लगी थी कि दोनों में से किसका काडर असली मुजाहिदीन है तो अब कॉन्ग्रेस के सहयोग से श्रीनगर नगर निगम के डिप्टी मेयर बनने वाले इमरान शेख ने नई मुहिम ‘मैं मुजाहिद’ शुरू कर दी है।

उन्होंने 2019 लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के ‘मैं भी चौकीदार’ अभियान पर हमला बोलते हुए विवादित बयान दिया है। अकसर विवादों में रहने वाले श्रीनगर नगर निगम के डिप्टी मेयर शेख इमरान ने ‘मैं भी चौकीदार’ की तरह ही अपने नाम के आगे ‘मुजाहिद’ लगा लिया है। इसके साथ उन्होंने अपने समर्थकों से भी आग्रह किया है कि वे सोशल मीडिया पर अपने नाम के आगे मुजाहिद जोड़ लें। सोशल मीडिया पर इमरान की इस हरकत की कड़ी निंदा हो रही है। इसके बाद भी वे अपनी जिद पर अड़े हुए हैं।

‘मुजाहिद’ का मतलब

‘मुजाहिद’ डिप्टी मेयर शेख इमरान ने श्रीनगर में एक बयान में कहा कि ‘मुजाहिद’ शब्द का मतलब जिहाद (पवित्र लड़ाई) में शामिल होने वाले लोगों से है और वह बुराई पर हमला करने और सच्चाई का समर्थन करने वाला रक्षक हैं। उन्होंने कहा है कि सभी मुस्लिमों को ‘मुजाहिद’ होना ही चाहिए और इस शब्द का प्रयोग करने में कोई समस्या नहीं है। जिहाद दुश्मनों के खिलाफ एक आध्यात्मिक लड़ाई है। मीडिया के एक तबके ने हमारे धर्म की गलत व्याख्या की है।

शेख मुहम्मद इमरान आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर के भी करीबी हैं। इमरान ने अपने ट्वीटर हैंडल पर अपने नाम के आगे मुजाहिद जोड़ लिया है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम लिए बिना कश्मीरी युवकों से कहा कि वह ‘चौकीदार’ का जवाब ‘मुजाहिद’ से दें। सभी अपने नाम के आगे मुजाहिद लिखें। उन्होंने कहा कि मुजाहिद का मतलब ‘धर्मयोद्धा’ होता है, जो इस्लाम के दुश्मनों से लड़े।

डिप्टी मेयर द्वारा मुजाहिद शब्द के इस्तेमाल के लिए लोगों को उकसाने पर स्थानीय हलकों में तीखी प्रतिक्रिया हुई है। इसे उनकी सांप्रदायिक मानसिकता का प्रतीक बताया जा रहा है।

इस विवाद पर इमरान ने कहा, “आज सब अपने नाम के आगे चौकीदार लिखे हुए हैं। मैं कश्मीर के हवाले से इतना ही कहूँगा कि मैं आज से अपने नाम के आगे मुजाहिद लिख रहा हूँ। उन्होंने कहा कि मुजाहिद का मतलब है, जो बुराइयों के खिलाफ आध्यात्मिक लड़ाई लड़े। इस्लाम एक शांति का मजहब है, लेकिन इसमें उन लोगों से जंग की बात भी है, जो इस्लाम को नुकसान पहुँचाए।”

साथ ही उन्होंने लोगों से चुनाव बहिष्कार के आह्वान को नकारते हुए मतदान की अपील की है। उन्होंने कहा कि इस्लाम के नाम पर पैदा हुए पाकिस्तान समेत बहुत से इस्लामिक मुल्कों में वोट डाले जाते हैं। हमें कश्मीर में भी वोट के हक का इस्तेमाल करना चाहिए।

एक ही दिन पति और भाई की मौत होने पर ट्रक ड्राइवर बन बेटी-बेटा को पालने वाली योगिता रघुवंशी

2003 में ज़िन्दगी ने भोपाल निवासी योगिता रघुवंशी को कहीं का नहीं छोड़ा जब उनके पति राजबहादुर रघुवंशी और भाई की बहुत छोटे अन्तराल पर सड़क हादसे में मौत हो गई। उनके भाई की मौत तो उनके पति की अंत्येष्टि क्रिया में भाग लेने जाते समय हुई

वाणिज्य व कानून की डिग्री और ब्यूटीशियन का हुनर भी योगिता की 8 साल की बेटी और 4 साल के बेटे को पढ़ाने के लिए नाकाफ़ी साबित होने लगे। एक महीने तक एक वकील की जूनियर और कुछ दिनों तक एक बुटीक में असिस्टेंट के तौर पर कम करने के बाद योगिता की समझ में आ गया कि इन पेशों की शुरुआती आय से उनके परिवार की ज़रूरतें पूरी नहीं होने वाली।

ऐसे में योगिता ने अपने वकील रहे पति के ‘साइड’ व्यवसाय यानी ट्रक और मालवहन बिज़नेस को अपना पेशा बनाने की ठान ली। क्योंकि इसमें शुरू में ही अच्छी कमाई का अवसर उन्हें दिखा।

ट्रक तो दूर, गाड़ी चलाना भी नहीं आता था

2003 में योगिता के पास न ही ड्राइविंग का अनुभव था न ही लाइसेंस। पति के बिज़नेस में चूँकि कुल तीन ट्रक थे, अतः योगिता ने एक ड्राइवर और एक सहायक को काम पर रख शुरू में केवल बिजनेस चलाने की कोशिश की। पर छह महीने बाद ही उनका ड्राइवर एक ट्रक को हैदराबाद के पास खेत में घुसा देने के पश्चात भाग खड़ा हुआ।
ट्रक की मरम्मत करा कर भोपाल वापिस लाने के लिए योगिता को एक मैकेनिक और अपने सहायक को साथ लेकर हैदराबाद जाना पड़ा।

योगिता याद करतीं हैं कि उनके बच्चों को उन 4 दिनों तक अकेले रहना पड़ा था। वापिस आते-आते उन्होंने निर्णय ले लिया कि उन्हें ट्रक चलाना सीखना होगा।

2004 में उन्होंने लाइसेंस बनवाया और अपनी यात्रा की शुरुआत की। शुरू में वह सहायक को साथ लेकर चलतीं थीं पर जल्दी ही उन्होंने अकेले यात्रा करने का आत्मविश्वास भी पा लिया।

महाराष्ट्र के नंदूरबार में चार भाई-बहनों में पली-बढ़ी योगिता शुरू में ट्रक में सोने के अलावा खाना भी ट्रक के अंदर ही पकातीं थीं। बाद में जब दूसरे ट्रक-चालकों ने उनका हौसला बढ़ाया, ढाबों में गर्मजोशी के साथ स्वागत होने लगा तो उन्होंने ढाबों में खाना शुरू किया।

रात भर चलाना पड़ा है ट्रक, लोगों ने ‘हाथ साफ करने’ की भी की है कोशिश

योगिता बतातीं हैं कि अन्य ट्रक-चालकों की तरह उन्हें भी कई बार रात-रात भर ड्राइविंग करनी पड़ती है- खासकर तब, जब वह शराब या फलों जैसी जल्दी खराब हो जाने वाली चीजों की ढुलाई कर रहीं हों। ऐसे में जब कभी नींद हावी होने लगती है तो वे किसी पेट्रोल पम्प के आस-पास ट्रक खड़ा कर के एक झपकी ले लेतीं हैं।

एक बार जब वह खाना बना रहीं थीं तो उन पर तीन आदमियों ने हमला भी कर दिया था। योगिता ने भी पलट कर उन पर हमला किया। इस दौरान उन्होंने हमलावरों को तो सबक सिखा दिया पर जब तक और लोग मदद के लिए आते, तब तक उन्हें भी बहुत चोटें आ चुकीं थीं।

वह यह भी साफ़ कर देतीं हैं कि वह इस पेशे में किसी ‘स्टीरियोटाइप को तोड़ने’ या ‘पितृसत्ता को चुनौती देने’ के लिए नहीं हैं– यह उनकी आर्थिक ज़रूरतों को पूरा करने का सबसे बेहतर तरीका भर है।

भीमा कोरेगाँव: बाबासाहेब अंबेडकर ने नहीं दी थी ब्राह्मणों को गाली, झूठ बोलते हैं अर्बन नक्सली

भीमा कोरेगाँव की लड़ाई (1817)

ब्रिटिश शासनकाल में भारत में नियुक्त अधिकारी फिलिप मेसन ने अपनी पुस्तक ‘A Matter Of Honour’ में भीमा कोरेगाँव की लड़ाई का संक्षिप्त किन्तु प्रभावशाली विवरण लिखा है। दिसंबर 31, 1817 को बॉम्बे आर्मी के कप्तान स्टॉन्टन को 41 मील दूर पेशवाओं से संघर्ष कर रहे कर्नल बर्र को सैन्य सहायता प्रदान करने का आदेश मिलता है। स्टॉन्टन की टुकड़ी में बॉम्बे आर्मी (प्रथम बॉम्बे रेजिमेंट की दूसरी बटालियन) के प्राइवेट रैंक के 500 ‘सिपाही’, नयी बनी ‘ऑक्सिलिअरी हॉर्स’ (जिसे बाद में पूना हॉर्स के नाम से जाना गया) के 250 सैनिक तथा मद्रास आर्टिलरी की एक टुकड़ी सम्मिलित थी।

आर्टिलरी टुकड़ी में दो ‘सिक्स-पाउण्डर’ तोपें, 24 यूरोपीय तोपची, तोपगाड़ी खींचने वाले और तोपें साफ़ करने वाले भारतीय गन-लास्करों समेत कुल 100 सैनिक थे। आदेश मिलने के पश्चात कप्तान स्टॉन्टन रात 8 बजे 900 सैनिकों से भी कम संख्याबल के साथ निकल पड़ता है। सारी रात सत्ताईस मील चलने के पश्चात जनवरी 1, 1818 को प्रातः 10 बजे स्टॉन्टन की टुकड़ी आराम करने के लिए रुकती है। उसी समय पेशवा की मुख्य सेना की दृष्टि उन पर पड़ती है। पेशवा की सेना में 20,000 घुड़सवार तथा 8,000 पैदल सैनिक थे।

कोरेगाँव नामक गाँव समीप ही था जहाँ पत्थर के मकान और छुपने के कई स्थान थे। कप्तान स्टॉन्टन ने शीघ्रता से गाँव को अपने कब्जे में लेने का प्रयास किया किन्तु पेशवा के सेनापति ने भी उसी तत्परता से अरबी लड़ाकों की तीन टुकड़ियाँ भेज दीं। अरबों की प्रत्येक टुकड़ी में एक हजार सैनिक थे। उस समय पेशवा की सेना में अरबी लड़ाके भी भर्ती किए जाते थे। पेशवा और ब्रिटिश में से कोई भी कोरेगांव पर पूर्ण रूप से कब्जा करने में सफल नहीं हुआ और आमने-सामने का युद्ध प्रारंभ हो गया। एक घर से दूसरे घर कब्जा करते और शत्रु से छुड़ाते हुए दोनों सेनाओं के पैदल सैनिक एक दूसरे पर टूट पड़े।

घुड़सवार यह कार्य नहीं कर सकते थे अतः रक्षात्मक मुद्रा में ही लड़ते रहे। कप्तान स्टॉन्टन के सैनिकों ने पिछली रात कूच करने से लेकर कोरेगाँव पहुँचने तक न कुछ खाया था न एक बूँद पानी ही पिया था। दो तोपों तथा पैदल सैनिकों के मध्य भीषण युद्ध चलता रहा। तभी अरबों ने एक ब्रिटिश अधिकारी (लेफ्टिनेंट चिसहोम) का शीश काटकर तोप को अपने कब्जे में ले लिया। उसी समय मृत होने का दिखावा कर रहे लेफ्टिनेंट पैटिन्सन ने शवों के ढेर से उठकर अपने साथियों को आवाज़ दी और तोप पर पुनः कब्जा कर लिया। संध्या होने तक पेशवा की सेना ने ईस्ट इंडिया कम्पनी को समर्पण करने का न्योता भेज दिया। कम्पनी की सेना के बारह तोपची मारे जा चुके थे और आठ घायल थे। स्टॉन्टन ने अपने सिपाहियों (Sepoys) से कहा कि अब वे अंतिम साँस तक लड़ेंगे। जब कोई ब्रिटिश तोपची जीवित नहीं बचा तब सात भारतीय गन-लास्करों ने मोर्चा संभाला। स्टॉन्टन की टुकड़ी के बचे हुए सैनिकों ने रात के नौ बजे तक कोरेगाँव खाली करवा कर दम लिया।

स्टॉन्टन के थके मांदे सिपाही गाँव के कुँए तक पहुँचे और कुल पच्चीस घंटे बाद उनके हलक से पानी उतरा। अगले दिन प्रातःकाल पेशवा की सेना पीछे हट गई क्योंकि उन्हें संदेह हो गया था कि कर्नल बर्र को सैन्य सहायता देने के लिए कई अन्य टुकड़ियाँ निकल चुकी होंगी। स्टॉन्टन के सिपाहियों ने झंडे, बंदूकें इत्यादि उठाए और वर्दियाँ पहन कर ड्रम बजाते हुए सबसे नज़दीक स्थित गैरिसन टाउन की ओर चल पड़े। अपना स्टेशन छोड़ने के कुल 48 घंटे पश्चात गैरिसन टाउन पहुँचने पर स्टॉन्टन और उसके सैनिकों ने खाना खाया।

फिलिप मेसन के दिए आकड़ों के अनुसार स्टॉन्टन की टुकड़ी के कुल 900 सैनिकों में से लगभग 150 मारे गए थे। कोरेगांव की लड़ाई में न कोई पूर्ण रूप से विजयी हुआ न परास्त हुआ। जो रह गया वह था भारतीय ‘सिपाहियों’ का शौर्य जिसकी गाथा कई दशकों तक अंग्रेजों ने गाई। फिलिप मेसन की भारतीय सेना के इतिहास पर लिखी पुस्तक में दिए इस वृत्तान्त के आधार पर बहुत से तथ्य निकल कर सामने आते हैं। सर्वप्रथम तो यह कि कोरेगांव की लड़ाई में स्टॉन्टन की सैन्य टुकड़ी मुख्यतः उन अरबी कट्टरपंथी लड़ाकों पर भारी पड़ी थी जो पेशवा के अधीन लड़े थे।

फिलिप मेसन ने अंग्रेजों के पराक्रम के गुण तो गाए ही हैं साथ में कोरेगाँव का उल्लेख पाँच स्थान पर किया है। ईस्ट इंडिया कम्पनी की सेना में जहाँ ऊँची रैंक का अधिकारी अंग्रेज ही होता था वहीं ‘सिपाही’ के रूप में योद्धा जातियों के भारतीय सैनिक भर्ती किए जाते थे। ऐसी ही महान योद्धा जाति है ‘महार’। कोरेगांव की लड़ाई की प्रशंसा ब्रिटेन की संसद तक में हुई थी और कोरेगाँव में एक स्मारक भी बनवाया गया था। इस स्मारक पर उन 22 महारों के नाम भी लिखे हैं जो कम्पनी सरकार की ओर से लड़े थे। इससे यह प्रमाणित होता है कि कोरेगाँव की लड़ाई दलित बनाम ब्राह्मण थी ही नहीं, यह तो दो शासकों के मध्य एक बड़े युद्ध का छोटा सा हिस्सा मात्र थी।

कोरेगाँव में बाबासाहेब भीमराव रामजी अंबेडकर का पदार्पण

कोरेगाँव की इस लड़ाई का स्मारक ब्राह्मणों पर दलितों की विजय के रूप में दुर्भाग्य से परिवर्तित हो गया। सन 1818 के पश्चात् काठियावाड़ (1826) और मुल्तान (1846) की लड़ाई में भी महारों ने शौर्य का प्रदर्शन किया था। लेकिन सन 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में बॉम्बे रेजिमेंट के कुछ महार सिपाहियों ने अंग्रेजों से विद्रोह कर दिया था। उनकी इसी भूमिका के कारण अंग्रेजों ने षड्यंत्र रचकर महारों को ‘नॉन-मार्शल कास्ट’ घोषित कर दिया और मई 1892 के पश्चात अपनी सेना में भर्ती करने से मना कर दिया। तत्पश्चात महारों को ब्रिटिश सेना का अंग बनाने के लिए शिवराम जानबा कांबले द्वारा प्रयास किया जाता रहा जिसके फलस्वरूप प्रथम विश्वयुद्ध में महारों की दो पलटनें बनाई गयीं। परन्तु जैसे ही युद्ध समाप्त हुआ महारों की भर्ती पुनः रोक दी गयी।

यहाँ पर बाबासाहेब भीमराव रामजी अंबेडकर का आगमन होता है। काम्बले ने अंबेडकर को कोरेगाँव स्मारक पर 1 जनवरी 1927 को भाषण देने का निमंत्रण भेजा। अंबेडकर स्वयं महार जाति के थे और उनके पिता अंग्रेजों की सेना में सैनिक थे, अतः अंबेडकर ने न केवल निमंत्रण स्वीकार किया अपितु उन्होंने महारों को सेना में पुनः सम्मिलित किये जाने के लिए संघर्ष भी किया। यहाँ एक बात जानना आवश्यक है कि उस समय अंग्रेजों ने कई जातियों को नॉन मार्शल कास्ट घोषित कर दिया था इसलिए महाराष्ट्री ब्राह्मण, तमिल, तेलुगु आदि कई समुदाय के लोग सेना में जाने के लिए विचित्र तर्क भी दिया करते थे। स्टीफेन फिलिप कोहेन ने अपनी पुस्तक The Indian Army: Its Contribution to the Development of a Nation में लिखा है कि कुछ तेलुगु ब्राह्मण मद्रास प्रेसिडेंसी आर्मी में नौकरी करने हेतु मनुस्मृति उद्धृत करते थे जिससे अंग्रेजों को यह विश्वास हो जाए कि वे भी मार्शल-कास्ट में आते हैं।

स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत कोरेगाँव की लड़ाई लगभग भुला दी गयी थी। कोरेगाँव स्मारक को दलित बनाम ब्राह्मण बनाने का छल बाबासाहेब अंबेडकर के बाद आए नवबौद्धों और अर्बन नक्सलियों ने किया है जिनका साथ वामपंथी इतिहासकारों ने दिया है। बाबासाहेब अंबेडकर ने 1927 में कोरेगाँव में कोई ब्राह्मण विरोधी भाषण नहीं दिया था न ही यह कहा था कि कोरेगांव की लड़ाई में दलितों को ब्राह्मणों पर विजय प्राप्त हुई फिर भी दशकों तक सर्वत्र मिथ्या प्रचार किया जाता रहा और कोरेगांव स्मारक पर प्रत्येक पहली जनवरी को मेला लगता रहा।

नवबौद्धों के दृष्टिकोण से देखें तो महारों की वास्तविक विजय तो अरबी कट्टरपंथियों की उस टुकड़ी पर थी जिसे पेशवा ने लड़ने भेजा था। क्या इस तथ्य को नकारा जा सकता है? यदि हाँ तो फिर यह भी मानना पड़ेगा कि कोरेगाँव की लड़ाई ब्राह्मण बनाम दलित नहीं थी। कोरेगाँव की लड़ाई से दलितों को एक और महत्वपूर्ण सबक सीखना है। उन्हें यह समझना होगा कि अंग्रेज हमें हमारे समाज में बाँटकर और अपनी सेना में संगठित रखकर जीतते थे। कुछ विधर्मियों द्वारा बरगलाए जाने पर हम समाज में आज भी बंटे हुए हैं। यदि आज भारत को प्रगति के मार्ग पर आगे बढ़ते देखना है तो भारत के प्रत्येक नागरिक को जातिगत हितों से ऊपर उठकर एक सेना के रूप में संगठित होना होगा। भारतीय सेना की महार रेजिमेंट इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। नवबौद्ध और दल-हित चिंतक गत सत्तर वर्षों में दलितों के लिए कुछ नहीं कर पाए हैं। वे मतांतरण का उपकरण मात्र बन कर रह गये हैं।

हिन्दू धर्म से विरत होकर दलितों ने वस्तुतः कुछ विशेष अर्जित नहीं किया है। इतिहास में इसका एक स्पष्ट उदाहरण मिलता है। स्टीफेन कोहेन ने लिखा है कि जब अंग्रेजों ने महारों को अपनी सेना में लेने से मना कर दिया था तब कुछ ईसाई बन गये महारों ने अंग्रेजों के सम्मुख प्रार्थना की कि चूँकि अब वे ईसाई बन गए हैं इसलिए उन्हें सेना में भर्ती किया जाये। महारों की इस अपील को भी अंग्रेजों ने ठुकरा दिया था।

मेसन का एक महत्वपूर्ण अवलोकन है कि अंग्रेजों ने भारतीय योद्धाओं के कौशल को कुचलने का प्रयास नहीं किया अपितु उसे पहचान कर उसका समुचित प्रयोग अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए किया। ऐसा ही प्रयोग वामपंथी इतिहासकार अपनी रोटी चलाने के लिए और राजनीतिक दल सत्ता पाने के लिए करते हैं। अंग्रेजों से पूर्व शिवाजी महाराज ने अपनी सेना में महारों को स्थान दिया था। कितनी बड़ी विडम्बना है कि उन्हीं शिवाजी को आदर्श मानने वाले भिड़े गुरुजी को मीडिया ने दंगे भड़काने का आरोपी बताया। यह सब षड्यंत्र समाज को विघटित करने के लिए किया जा रहा है जिसका परिणाम वैमनस्य के अलावा और कुछ नहीं।

जनवरी 2018 में भीमा-कोरेगाँव में हुई हिंसा के बाद इस केस में जून में गिरफ्तार किए गए माओवादी अर्बन नक्सली सुरेंद्र गाडलिंग, सुधीर धवले, रोना विल्सन, शोमा सेन, महेश राउत, और फिर अगस्त में गिरफ्तार हुए वरवर राव, सुधा भारद्वाज, अरुण फरेरा, गौतम नवलखा और वर्नन गोंसाल्वेस- ये सभी एक अलगाववादी विचारधारा के समर्थक हैं जिसका ध्येय है भारत का जाति आधारित विखंडन। इसीलिए देश विदेश के प्रोफेसरों और दलित चिंतकों ने आनंद तेलतुंबडे जैसे नक्सली को हिरासत से छुड़ाने के लिए मुहिम छेड़ी हुई है। उनका साथ देते हैं वे मार्क्सवादी बुद्धिजीवी इतिहासकार जिनके सरगनाओं में शामिल हैं रोमिला थापर और उनके जैसे झूठे इतिहासकार।

रोमिला थापर और उनके जैसे इतिहासकारों और उनसे प्रभावित समाजशास्त्रियों ने भारतीय वाङ्मय में निहित जातियों के समन्वय के विपरीत जातियों के संघर्ष पर प्रमुखता से विमर्श किया जिसके कारण आज नवबौद्ध इतने आक्रामक हैं। इन नवबौद्धों के जन्म की कहानी से ही भारत में मार्क्सवादी चिंतकों का उद्भव पता चलता है। वास्तव में रोमिला थापर आदि बुद्धिजीवियों के शैक्षणिक ‘गुरु’ थे दामोदर धर्मानंद कोसंबी और इनके पिता सीनियर कोसंबी से प्रभावित होकर ही भीमराव रामजी अंबेडकर बौद्ध बने थे। हालाँकि अरुण शौरी ने लिखा है कि अंबेदकर बौद्ध मत से भीतर तक प्रभावित नहीं थे लेकिन सच्चाई यही है कि वामपंथियों ने भीमा कोरेगाँव की लड़ाई में भारत की स्वतंत्रता से पहले ही बिना लड़े बढ़त बना ली थी। यदि हमें इसे जीतना है तो दलित समाज को बाबासाहेब के सिद्धांतों का सच बताना होगा।

अल्पसंख्यक ही नहीं बहुसंख्यक भी होते हैं सांप्रदायिक वारदातों के शिकार, छिपाता है मीडिया

आजकल हमारे देश में एक नया ख़तरनाक ट्रेंड चल पड़ा है। देश के किसी कोने में जब कोई जुनैद मारा जाता है (जो कि दुःखद है, निंदनीय है) तो उसे जबरदस्ती सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की जाती है। जब कोई वसीम घृणाभाव से भरकर महाशिवरात्रि के दौरान पूजा पंडाल उखाड़ (यह भी निंदनीय है) डालता है तो इस पर आउटरेज नहीं होता। ऐसा कब तक चलता रहेगा? अगर पीड़ित जुनैद है तो आपसी विवाद भी सांप्रदायिक रंग में रंग दिए जाते हैं और अगर अपराधी, आरोपित या दोषी वसीम है तो इस घटना को बड़ी चालाकी से ‘समुदाय विशेष द्वारा किया गया’ कहकर समाचारपत्रों, मीडिया पोर्टलों और टीवी न्यूज़ चैनलों से छिपा दिया जाता है। अब इन गिद्धों को कौन समझाए कि जब पीड़ित संयोग से अल्पसंख्यक हो तो घटना सांप्रदायिक नहीं हो जाती। यहाँ हम कुछ ऐसी ही घटनाओं की पड़ताल कर मीडिया के दोहरे रवैये की पोल खोलेंगे।

बात महाशिवरात्रि से शुरू करते हैं। अगर आप आज भी महाशिवरात्रि के एक दिन बाद के अख़बारों को खंगालेंगे तो आपको पता चलेगा कि ऐसी न जाने कितनी घटनाएँ हुईं, जिनमें पूजा-पाठ में व्यवधान पैदा किया गया, टेंट उखाड़ डाला गया, शिवजी की बरात रोक दी गई, शिवलिंग को लेकर वाल्मीकि समुदाय के लोगों से मारपीट की गई। आपने कहीं मीडिया में ये ख़बरें पढ़ीं क्या? आपने नहीं पढ़ी क्योंकि इसे या तो अख़बारों के एक कोने में छोटी सी जगह देकर ‘समुदाय विशेष’ के भीतर छिपा दिया गया या फिर न्यूज़ पोर्टल्स और टीवी मीडिया द्वारा बड़े स्तर पर नज़रअंदाज़ किया गया। महाशिवरात्रि में हुई ऐसी घटनाओं की एक बानगी देखिए। इसे पढ़ने के बाद आपको पता चलेगा कि पीड़ित सिर्फ़ अल्पसंख्यक ही नहीं होते।

महाशिवरात्रि पर हुई सांप्रदायिक वारदातों पर मीडिया की चुप्पी

फतेहगंज पश्चिमी में पुलिस चौकी के बगल में स्थित ब्रह्मदेव महाराज धर्मस्थल पर महाशिवरात्रि की वार्षिक पूजा चल रही थी। तभी वसीम ने आकर टेंट उखाड़ डाला, जिसके बाद इलाक़े में तनाव फैल गया। सूचना मिलते ही पुलिस घटनास्थल पर पहुँची, जिसके बाद अनुष्ठान फिर से शुरू हो सका। पंचायत की बैठक बुलाने के बाद पूजा समिति धीमी आवाज पर माइक बजाने के लिए तैयार हो गई, जिसके बाद सब कुछ सामान्य हो सका। इसका क्या अर्थ निकलता है? इसका अर्थ यह है कि दिन में पाँच बार लाउडस्पीकर से आवाज आए तो किसी को कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए और दिक्कत होते ही ये सांप्रदायिक रंग ले लेगा लेकिन साल भर में एक बार आने वाली महाशिवरात्रि के दौरान ज़ोर की आवाज़ का बहाना बनाकर टेंट ही उखाड़ डाला जाता है।

अव्वल तो यह कि इस पर कोई आउटरेज नहीं होता। आपको याद है कि कैसे प्रसिद्ध गायक सोनू निगम को लाउडस्पीकर के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के कारण ट्विटर छोड़ना पड़ा था। हालाँकि, उन्होंने मंदिरों व मस्जिदों दोनों के ही लाउडस्पीकर्स पर सवाल खड़े किए थे लेकिन किन लोगों द्वारा उन्हें धमकियाँ दी गई, प्रताड़ित किया गया, ये छिपा नहीं है। अब आप सोचिए कि अगर किसी अल्पसंख्यक समुदाय के पूजा-प्रतिष्ठान में व्यवधान डालते हुए उनके धार्मिक सेट-अप को उखाड़ फेंका जाता तो मीडिया का क्या रिएक्शन होता? निंदनीय दोनों है, कार्रवाई दोनों मामलों के दोषियों पर होनी चाहिए, लेकिन एक को छिपा कर एक पर सीधा केंद्र सरकार पर निशाना बनाना और फिर पूरे भारत को भीड़तंत्र द्वारा शासित साबित कर देना मीडिया हिपोक्रिसी है।

रायबरेली के ऊंचाहार में भगवान शिव की बारात निकाली गई, जिसका वहाँ के समुदाय विशेष के लोगों ने विरोध किया। विरोध इतना ज्यादा बढ़ गया कि पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा, जिसके बाद मामला शांत हुआ और बारात दूसरे रास्ते से निकाली गई। दरअसल शिवरात्रि के मौके पर ऊंचाहार में तकरीबन एक दशक से शिव जी की बारात निकाली जा रही है। इस घटना से क्या पता चलता है? यह घटना बताती है कि आप दशकों पुरानी वार्षिक धार्मिक परंपरा को निभाते हैं तो भी आपको परेशान किया जाएगा लेकिन मीडिया द्वारा इसे सांप्रदायिक नहीं मना जाएगा। महाशिवरात्रि की शिव-बारात से मुस्लिमों को आपत्ति होती है और श्रद्धालुओं को दशकों पुराना रास्ता बदलना पड़ता है।

क्या आप इस घटना को दूसरे रूप में सोच सकते हैं? क्या आप सोच सकते हैं कि अगर किसी ईदगाह में कुछ लोग पहुँच कर मुस्लिमों को तुरंत जगह बदलने को मज़बूर कर दें तो क्या होगा? आउटरेज। मीडिया और बुद्धिजीवियों द्वारा हंगामा खड़ा कर दिया जाएगा और ये देशस्तरीय मुद्दा बन जाएगा। लेकिन, जिन्हें असहिष्णु कहा जाता है, वो दूसरे समुदाय की आपत्ति के कारण रास्ता बदल लेते हैं और मीडिया में कोई उनकी तरफ से आवाज़ तक नहीं उठाता। उनकी ख़बर ‘समुदाय विशेष की आपत्ति’ के हेडलाइन तले स्थानीय अख़बार के एक कोने में पड़ी होती है। अरे, हिन्दू तो बने ही हैं दूसरों की आपत्ति के कारण अपनी परंपरा, पूजा-पाठ के तरीके और स्थान में बदलाव करने के लिए! इस सबके बावजूद असहिष्णु बहुसंख्यक ही है!

महाशिवरात्रि के दौरान ही हुई ऐसी एक और घटना को देखिए। लोहामंडी के मोहल्ला पुरानी गढ़इया में खाली जमीन पर वाल्मीकि बस्ती के लोग भगवान शिव की प्रतिमा स्थापना करना चाहते थे। लेकिन उन्हें ऐसा करने से रोक दिया गया। बताया जाता है कि प्रतिमा स्थापना की तैयारी काफ़ी दिनों से ज़ोर-शोर से चल रही थी। लेकिन 4 मार्च 2019 को सांप्रदायिक तनाव ने मारपीट का रूप ले लिया, जिसके कारण तीन थानों की पुलिस को घटनास्थल पर कैम्प करना पड़ा। तब दलितों के हितैषी कहाँ थे? दलितों से मारपीट की गई लेकिन दलित हितों के कथित रक्षकों, उनकी आवाज़ उठाने का दावा करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं और सोशल मीडिया पर एक दलित के घर हुई चोरी को लेकर भी मोदी को गाली देने वाले बुद्धिजीवियों ने उफ्फ तक नहीं की।

इस घटना से पता चलता है कि ये दलित हितैषी होने का दिखावा तभी तक है, जब तक मामले से कोई सवर्ण न जुड़ा हो। अगर किसी व्यक्ति की उसके भाई द्वारा भी पिटाई की जाती है तो इसे दलितों पर अत्याचार और उनके शोषण के रूप में प्रचारित करनेवाला मीडिया तब चुप हो जाता है जब शिवजी की पूजा के दौरान वाल्मीकि समुदाय के लोगों से मारपीट की जाती है। इनका दलित प्रेम कुछ ‘नियम एवं शर्तों (Terms & Conditions)’ से बँधा हुआ है। दलितों को भगवान शिव की पूजा नहीं करने दी जाती तो इनके कानों पर जूँ तक न रेंगती क्योंकि इसमें इन लोगों का कोई हित नहीं सधेगा। हमने उपर्युक्त घटनाओं में देखा कि कैसे श्रद्धालुओं को रास्ता बदलना पड़ा, मूर्ति स्थापना रोकनी पड़ी और उनका टेंट उखाड़ डाला गया, दलितों से मारपीट हुई सो अलग।

जब घटना को जबरदस्ती दिया गया सांप्रदायिक रंग

अब ऐसी घटनाओं पर आते हैं, जहाँ पीड़ित या पीड़ित होने का दावा करने वाला अल्पसंख्यक था तो घटना को जबरदस्ती सांप्रदायिक रंग देकर इसे मोदी की विफलता और भारत को असहिष्णु बता दिया जाता है। ऐसा दर्शाया जाता है कि भारत में भीड़ हत्या कर देती है और सरकार को उनका समर्थन प्राप्त है। जुनैद वाला मामला याद होगा आपको। ट्रेन में सीटों के बँटवारे को लेकर हुए विवाद में उसकी हत्या कर दी गई थी। यह कृत्य घृणित था लेकिन इससे भी ज्यादा घृणित था इसे सांप्रदायिक रंग देना। ख़ुद जुनैद के भाई ने बताया कि ये विवाद सीटों के बँटवारे को लेकर शुरू हुआ था। पुलिस द्वारा भी इस मामले में ‘Criminal Assault’ और हत्या का मामला दर्ज किया गया था।

न तो शिकायतकर्ताओं और न ही आरोपित द्वारा कहीं भी ‘बीफ’ शब्द का प्रयोग नहीं किया गया लेकिन मीडिया में इसे बीफ के कारण एक अल्पसंख्यक की हत्या के रूप में प्रचारित किया गया। सच्चाई थोड़ी देर बाद सामने आती है लेकिन तब तक झूठ के सहारे ही इस पर एक नैरेटिव तैयार कर अपना कुटिल अजेंडा साध लिया जाता है। जब सच्चाई सामने आई तो इनके मुँह बंध गए। अभी हाल ही में महेश भट्ट की पत्नी सोनी राजदान ने जुनैद को लेकर फिर से झूठ फैलाया। उन्होंने ट्विटर पर लोगों से कहा कि उसे मुस्लिम होने का कारण मार डाला गया जबकि इस हत्याकांड में धर्म कहीं से भी कोई एंगल था ही नहीं। हाईकोर्ट ने भी स्पष्ट किया था कि ये सीट शेयरिंग का मुद्दा था जो हिंसा में बदल गया।

इसी तरह गुरुग्राम में हुई एक घटना को सिर्फ़ इसीलिए सांप्रदायिक रंग दे दिया गया क्योंकि पीड़ित मुस्लिम था और आरोपित गुर्जर समुदाय से आते थे। गाँव वालों ने इसे एक ‘Road Rage’ बताते हुए कहा था कि इसे आतंरिक रूप से ही निबटा दिया गया है। संयोगवश होली के समय हुई घटना के बारे में ख़ुद पीड़ितों ने कहा कि ये हिन्दू-मुस्लिम वाला मामला नहीं है और मीडिया व राजनेता मिलकर इसे सांप्रदायिक रंग दे रहे हैं। ये मीडिया के लोग कौन हैं? ये राजनेता कौन हैं? ये वही ‘Usual Suspects’ हैं, जिन्हे हम अक्सर सोशल मीडिया पर झूठ फैलाते हुए देख सकते हैं। क्या आरोपित अगर गुर्जर हो और पीड़ित मुस्लिम हो तो घटना सांप्रदायिक हो जाती है क्या? क्या ये बुद्धिजीवी अख़बार भी पढ़ते हैं? बिना ग्राउंड रियलिटी जाने हंगामा खड़ा कर देना कैसी पत्रकारिता है?

अभी हाल ही में मेरठ के एक कॉलेज में हुई एक घटना को जबरदस्ती सांप्रदायिक रंग देकर इसे भारतीय जनता पार्टी से जोड़ दिया गया। Times Of India के पत्रकार पीयूष राय ने मेरठ लॉ स्टूडेंट की एक ख़बर की, जिसमें बताया गया कि बीजेपी की टोपी पहनने से मना करने के बाद एक छात्रा को कॉलेज से निलंबित कर दिया गया। अपनी इस झूठी ख़बर के ज़रिए पत्रकार ने भाजपा को निशाना बनाने को कोशिश की। उन्होंने आगे दावा किया कि जिन ‘कथित’ छात्रों ने उमाम खानम को कथित तौर पर ‘बीजेपी की टोपी पहनने से मना’ किया था, उन्हें भी निष्कासित कर दिया गया। सोशल मीडिया पर इस चर्चित इस ख़बर की सच्चाई जानने के लिए स्वराज्य की स्वाति गोयल ने इस पर ग्राउंड रिपोर्ट की, जिनमें ये दावे झूठे पाए गए

क्या चारा है बहुसंख्यकों के पास?

अभी-अभी बीती रामनवमी के दौरान ऐसी कई घटनाएँ सामने आ रही हैं जहाँ समुदाय विशेष के लोगों द्वारा पत्थरबाज़ी की गई, पूजा में व्यवधान डाला गया लेकिन मीडिया चुप है। आप हमारी वेबसाइट पर जाकर ऐसे न्यूज़ देख सकते हैं। यहाँ सवाल उठता है कि आख़िर कब से हिन्दू समुदाय अपनी परंपरा को स्वतंत्रतापूर्वक निर्बाध निभा पाएगा? कब तक असल सांप्रदायिक वारदातों को ‘समुदाय विशेष’ के हेडलाइन तले दबाते रहा जाएगा और आपसी विवादों या अन्य कारणों से हुई आपराधिक वारदातों को सांप्रदायिक रंग दिया जाएगा? अब आम जनता को एक स्टैण्डर्ड तय करना होगा। आँख मूँद कर मेन स्ट्रीम मीडिया पर विश्वास करना छोड़ना पड़ेगा। अगर बिना ग्राउंड रियलिटी जाने कोई सेलिब्रिटी या पत्रकार कुछ कमेंट करता है तो उसे लताड़ना पड़ेगा।

सोनी राजदान जैसे इन तथाकथित सेलेब्स को रास्ता दिखाना होगा। हमारा कर्त्तव्य बनता है कि जब भी ये कोई फेक न्यूज़ या फेक एंगल लेकर झूठी साम्प्रदायिकता तले अपनी दुकान चलाने की कोशिश करें, हम सच्चाई से इन पर ऐसी चोट करें कि ये फिर से ऐसी हरकत करने से पहले सौ बार सोचें। हिन्दू आज़ादी से अपने त्यौहार मनाएँ, मुस्लिम बिना व्यवधान से नमाज़ पढ़े, लेकिन दोनों ही मामलों में अगर कोई बाधा डालने वाला कार्य करता है तो दोनों ही ख़बरों को समान प्राथमिकता दी जाए। एक को छिपाना और एक को विश्व स्तर पर ले जाकर भारत को भीड़तंत्र वाला देश साबित करने का प्रोपेगंडा अब नहीं चलेगा।

अंतरजातीय विवाह: कमलनाथ के मध्य प्रदेश में महिला को मिली शर्मसार कर देने वाली सज़ा, लोगों ने बनाया वीडियो

मध्य प्रदेश के एक गाँव में एक महिला को दूसरी जाति के व्यक्ति से शादी करने के लिए न सिर्फ़ शर्मसार होना पड़ा बल्कि उसे सज़ा भी दी गई। यह घटना मध्य प्रदेश के झाबुआ ज़िले के देवीगढ़ गाँव की है, जहाँ महिला को सज़ा के रूप में मजबूर किया गया कि वो अपने पति को कंधों पर उठाकर खेत में चले। महिला ने इस सज़ा को पूरा किया और इस दौरान वहाँ मौजूद लोगों ने महिला का मजाक उड़ाया, उसे परेशान किया और जयकार करते हुए उसके सामने नाचे-गाए भी।

कथित घटना का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसके बाद यह मामला सामने आया।

वीडियो में महिला अपने पति को अपने कंधों पर उठाए हुए नज़र आ रही है। ग्रामीण उसका मजाक उड़ा रहे हैं। इस वीडियो में आप देख सकते हैं कि जिस वक्त वो महिला साँस लेने के लिए रुकती है उस समय लोग उसे गालियाँ देना शुरू कर देते हैं। जबकि सभी लोग हो-हल्ला मचाने के साथ-साथ उसका उपहास उड़ा रहे हैं। इस वीडियो में एक बुजुर्ग व्यक्ति नाचता हुआ भी दिखता है। वहीं एक और शख़्स झंडा लहराता हुआ नज़र आ रहा है।

झाबुआ के एसपी विनीत जैन ने कहा कि इन सभी के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया गया है और अब तक 2 लोगों की गिरफ़्तारी हो चुकी है। पुलिस बाकी आरोपियों को पकड़ने की कोशिश कर रही है, जिसकी पुष्टि विनीत जैन ने की है।

IAS बेटे को टिकट मिलने पर केंद्रीय मंत्री बीरेंद्र सिंह ने BJP को सौंपा इस्तीफा, नहीं चाहते परिवारवाद को बढ़ावा देना

लोकसभा चुनाव के लिए भारतीय जनता पार्टी ने हरियाणा की दो सीटों पर उम्मीदवारों का एलान कर दिया है। बीजेपी ने रोहतक से अरविंद शर्मा और हिसार से केंद्रीय मंत्री चौधरी बीरेंद्र सिंह के बेटे ब्रिजेंद्र सिंह को चुनाव मैदान में उतारा है। बीजेपी ने अपनी 20वीं सूची में 6 लोकसभा प्रत्याशियों के नामों का ऐलान किया है, वहीं पश्चिम बंगाल में विधानसभा उपचुनाव के लिए एक उम्मीदवार के नाम की घोषणा की है।

भारतीय जनता पार्टी की उम्मीदवारों की 20वीं सूची में हरियाणा के हिसार से बृजेंद्र सिंह को भी टिकट दिया गया है। बता दें कि बृजेंद्र सिंह केंद्रीय इस्पात मंत्री बीरेंद्र सिंह के बेटे हैं, लेकिन बेटे को टिकट मिलने से चौधरी बीरेंद्र सिंह नाराज हो गए हैं। इतना ही नहीं उन्होंने बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह से राज्यसभा और मंत्री पद से इस्तीफे की पेशकश तक कर डाली है।

माना जा रहा है कि चौधरी बीरेंद्र सिंह परिवारवाद को बढ़ावा नहीं देना चाहते हैं। यही वजह है कि उन्होंने अपने इस्तीफे की पेशकश की है।

IAS अधिकारी हैं बृजेन्द्र सिंह

बीजेपी ने हरियाणा के हिसार से केंद्रीय मंत्री चौधरी बीरेंद्र सिंह के बेटे बृजेन्द्र सिंह को उम्मीदवार घोषित किया। 47 वर्षीय बृजेंद्र सिंह IAS अधिकारी हैं और इस समय HAFED के MD हैं। बृजेंद्र के पिता बीरेंद्र सिंह 2022 तक राज्यसभा सदस्य हैं और वह चुनाव लड़ने से मना कर चुके हैं। बृजेंद्र सिंह वर्ष 1998 में 26 साल की उम्र में IAS बने थे। उनकी रिटायरमेंट वर्ष 2032 में होनी है, लेकिन अब वह नामांकन से पूर्व स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर राजनीतिक पारी की शुरुआत करेंगे। बृजेंद्र सिंह चंडीगढ़, पंचकूला और फरीदाबाद में डीसी रह चुके हैं।

PM और CM नीतीश लैला-मजनू से कम नहीं: ‘नरेंद्र मोदी बीफ खाकर सोने’ वाले नेता की बदजुबानी

बिहार के किशनगंज में एआईएमआईएम चीफ असदुद्दीन ओवैसी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बिहार के सीएम नीतीश कुमार के गठबंधन पर तंज कसा है। ओवैसी ने पीएम मोदी और सीएम नीतीश कुमार के बीच के संबंध को ‘लैला-मजनू का प्‍यार’ करार दिया है। उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी की आशिकी लैला-मजनू जैसी है। जब इनकी दास्तां लिखी जाएगी तो मोहब्बत की जगह नफरत का नाम लिखा जाएगा। उसमें लिखा जाएगा कि जब से ये दोनों साथ आए हैं, हिंदुस्तान में हिंदू-मुस्लिम तनाव में हैं।

असदुद्दीन यहीं नहीं रूके, उन्होंने आगे कहा, “नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी की आशिकी बड़ी मजबूत आशिकी है, लैला-मजनू से भी ज्यादा मोहब्बत इन दोनों में है। नीतीश कुमार और मोदी की मोहब्बत की दास्तान जब लिखी जाएगी, मुझसे मत पूछिए इसमें लैला कौन है और मजनू कौन है, ये आप तय कीजिए।”

बिहार के किशनगंज, पूर्णिया और कटिहार में 18 अप्रैल को मतदान है और किशनगंज में अल्पसंख्यक मतदाताओं की अच्छी-खासी तादाद को देखते हुए ओवैसी इस इलाके में अपनी पैठ बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इसके साथ ही ओवैसी ने सीएम नीतीश कुमार पर जहाँ कुर्सी के लिए पाला बदलने का आरोप लगाया, तो वहीं प्रधानमंत्री मोदी पर जनता से झूठे वादे कर गुमराह करने की बात कही। किशनगंज से एआईएमआईएम ने स्थानीय नेता अख्तरुल इमान को टिकट दिया है।

वैसे ये पहली बार नहीं है जब असदुद्दीन ओवैसी ने इस तरह का बयान दिया है। इससे पहले भी वह अपने बयानों के कारण सुर्खियों में बने रहे हैं। पिछले दिनों ओवैसी ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला करते हुए पूछा था कि जब पुलवामा हमला हुआ थो तो प्रधानमंत्री मोदी बीफ खाकर सो रहे थे क्या?

फैक्ट चेक: मुरली मनोहर जोशी ने नहीं लिखी आडवाणी को ANI के लोगो वाली ‘वायरल’ चिट्ठी

सोशल मीडिया पर विपक्ष द्वारा लगभग हर दिन भाजपा नेताओं के बीच मनमुटाव दिखाने का प्रोपेगैंडा तैयार किया जाता है। इसी कड़ी में एक नई फर्जी खबर सोशल मीडिया पर देखने को मिली जिसमें दावा किया जा रहा है कि ANI के लोगो वाली एक चिट्ठी भाजपा के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी द्वारा लिखी गई है।

भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के नाम कानपुर से पार्टी के मौजूदा सांसद मुरली मनोहर जोशी की एक चिट्ठी जब शनिवार (अप्रैल 13, 2019) को सोशल मीडिया पर वायरल हुई, तो लोगों में हड़कंप मच गया। चिठ्ठी में ये आरोप लगाया गया था कि उन्हें (आडवाणी और जोशी) को घर (पार्टी) के लोगों ने अपमानित कर बाहर निकाल दिया। इसमें लोकसभा चुनाव में बीजेपी की संभावनाओं का भी जिक्र था। हालाँकि, देर शाम होते-होते मुरली मनोहर जोशी के दफ्तर ने स्पष्ट कर दिया गया कि यह फेक चिट्ठी है, उन्होंने ऐसी कोई चिट्ठी नहीं लिखी।

जोशी जी के नाम से वायरल हुई फर्जी चिट्ठी में लिखा गया है कि कैसे पार्टी ने उनके जीवनभर की तपस्या को व्यर्थ कर दिया और पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। चिठ्ठी में लिखा है, “मुझे समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की तरफ से टिकट मिलने का काफी दबाव था, लेकिन जीवनभर भाजपा की सेवा करने के कारण उन्होंने इस ऑफर को ठुकरा दिया।” चिठ्ठी के मुताबिक, मुरली मनोहर जोशी ने सड़क किनारे पीएम नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के बड़े-बड़े पोस्टरों का जिक्र करते हुए लिखा कि जिन सिद्धान्तों को लेकर उत्साह के साथ पार्टी बनाई गई थी, आज उसी पत्थर को दरकिनार कर दिया गया है। घर के लोगों ने ही अपमानित करके हमें बाहर कर दिया।

सोचिए मीडिया पर वायरल हुई फर्जी चिठ्ठी

इस चिट्ठी पर समाचार एजेंसी ANI का लोगो होने के कारण सोशल मीडिया पर इसे पढ़ रहे लोगों ने इसे सच मान लिया। लोकसभा चुनाव में टिकट न दिए जाने के बाद जोशी की तरफ से आई प्रतिक्रिया के कारण भी लोगों के लिए इस चिट्ठी पर यकीन करना आसान हो गया था।

हालाँकि, शनिवार को सामने आई इस चिट्ठी में कई जगह की गई त्रुटियों के कारण कुछ लोगों के मन में संदेह भी हुआ और जोशी के तरफ से इस चिट्ठी के फेक होने की पुष्टि किए जाने के बाद स्थिति आखिरकार साफ हो गई। समाचार एजेंसी ANI ने भी इसके फेक होने की पुष्टि की है।

विपक्ष लगातार फेक खबरों के सहारे अपनी अभिव्यक्ति की आजादी का इस्तेमाल कर के प्रोपगैंडा के कारोबार में प्रतिदिन नए आयाम जोड़ता नजर आ रहा है। शुक्रवार को ही कॉन्ग्रेस ने एक दावा ये भी किया था कि सेना प्रमुखों ने राष्ट्रपति के नाम चिठ्ठी लिखकर मोदी सरकार पर सेना के राजनीतिकरण का आरोप लगाया है, जिसे राष्ट्रपति भवन और पूर्व सेना प्रमुखों की ओर से नकार दिया गया था।

जोधपुर: रामनवमी पर शोभायात्रा से लौट रहे भक्तों पर पत्थरबाजी, वाहन फूँके, दो लोग गिरफ़्तार

राजस्थान में जोधपुर के सूरसागर क्षेत्र में रामनवमी पर दो गुटों के बीच तनाव इतना बढ़ गया कि शोभायात्रा से लौट रहे लोगों पर एक समुदाय के लोगों ने पथराव किया। घटना शनिवार (13 अप्रैल) की है जहाँ इस मामले को शांत कराने की कोशिश में दो पुलिसकर्मी समेत पाँच लोग भी घायल हो गए। ख़बर यह भी है कि पथराव के बाद समुदाय विशेष के लोगों ने दो वाहनों को आग भी लगा दी।

दरअसल, सूरसागर क्षेत्र के व्यापारियों के मोहल्ले में दो दिन पहले किसी बात को लेकर कुछ युवकों में आपसी बहस हो गई थी। यह बहस इतनी बढ़ गई कि विवाद साम्प्रदायिक झगड़े में तब्दील हो गया। विवाद बढ़ता देख वहाँ मौजूद कुछ लोगों ने मामले को शांत करा दिया लेकिन रामनवमी के मौके पर शोभायात्रा में हिस्सा लेने वाले लोग जब अपने घर लौट रहे थे, तभी उन पर कुछ लोगों ने अपनी छतों पर से पत्थर बरसाने शुरू कर दिए। अचानक पत्थरों की बौछार से शोभायात्रा में शामिल लोगों में अफ़रा-तफ़री का माहौल बन गया। इसी अफ़रा-तफ़री में कुछ लोग गंभीर रूप से घायल भी हो गए।

थोड़ी देर के बाद दोनों समुदाय के बीच जमकर पत्थरबाजी हुई जिसके बाद मामले को शांत कराने पुलिस मौक़े पर पहुँची। पहले तो पुलिस ने स्थिति पर काबू पाने के लिए वहाँ उपस्थित भीड़ को खदेड़ा। उसके बाद जो लोग छत से पथराव कर रहे थे उन्होंने पुलिस पर भी पथराव करना शुरू कर दिया। इससे दो पुलिसकर्मियों को गंभीर चोटें आईं।

बिगड़ती स्थिति पर क़ाबू पाने के लिए अतिरिक्त पुलिस बल के साथ पुलिस कमिश्नर बीजू जार्ज जोसफ ख़ुद घटना स्थल पर पहुँचे। पुलिस ने पथराव कर रहे दो लोगों को हिरासत में लिया। हिरासत के विरोध में आए लोगों को पुलिस ने एक तरफ खदेड़ दिया। फिलहाल स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है। दोनों गुटों के लोगों में आपसी विवाद अभी भी जारी है।