माता-पिता अपनी संतान के सुख के लिए अपना सर्वस्व जीवन उन पर क़ुर्बान कर देते हैं। अपने फ़र्ज़ को निभाते-निभाते वो कब उम्र के आख़िरी पड़ाव तक पहुँच जाते हैं पता ही नहीं चलता। उम्र के इसी पड़ाव में उन्हें अपनी संतान की सख़्त ज़रूरत होती है। क्या हो अगर बुढ़ापे की यही लाठी उनपर क़हर बनकर बरसने लगे। ऐसा ही एक मामला पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट की चौखट तक जा पहुँचा जहाँ 85 वर्ष की एक बूढ़ी माँ ने न्याय की गुहार लगाई।
दरअसल, 85 वर्षीय हरबंस कौर का उनके बेटे जगमोहन सिंह के साथ पिछले एक साल से घर में रहने को लेकर विवाद चल रहा था। बूढ़ी माँ ने अपने बेटे के बुरे व्यवहार के चलते उसके ख़िलाफ़ अमृतसर ज़िला मजिस्ट्रेट की अदालत में याचिका दायर की थी। इस याचिका पर सुनवाई करते हुए 27 जुलाई, 2017 को अदालत ने मेंटेनेंस एंड वेल्फेयर आफ़ पेरेंट्स एंड सीनियर सिटीजन एक्ट, 2007 के प्रावधानों के तहत जगमोहन सिंह को माँ का मकान खाली करने का आदेश दिया था।
अपनी याचिका में बूढ़ी माँ ने अदालत को इस सत्य से अवगत कराया था कि उनके बेटे का परिवार घर में ज़बरदस्ती रह रहा है और वो उनकी किसी भी तरह से कोई देखभाल नहीं करता। बूढ़ी माँ ने अदालत को अपने बेटे द्वारा किए जा रहे दुर्व्यवहार के बारे में भी बताया। अपनी बूढ़ी माँ के ख़िलाफ़ जगमोहन सिंह ने अमृतसर ज़िला मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती देने के लिए अपील दायर की। माँ हरबंस कौर बेटे जगमोहन सिंह की अपील पर सुनवाई के लिए हाईकोर्ट तक जा पहुँची। इस पर हाईकोर्ट ने 2018 में जगमोहन सिंह को मकान में तीन कमरों का कब्जा हरबंस कौर को देने के आदेश दिए थे, लेकिन इस फ़ैसले के बाद भी माँ और बेटे के बीच विवाद नहीं थमा।
इसके बाद चीफ़ जस्टिस कृष्ण मुरारी और जस्टिस अरुण पल्ली की खंडपीठ ने एक बार फिर इस मामले की सुनवाई अपने चैंबर में की। क़रीब 1 घंटे तक चली सुनवाई के बाद कोर्ट ने जगमोहन सिंह को आदेश देते हुए कहा कि अगले आदेश तक वो हरबंस कौर के मकान में केवल एक कमरे में रह सकता है और इसके लिए 1500 रुपए बतौर किराया भी देना होगा। किराया देना इसलिए ज़रूरी किया गया क्योंकि हरबंस कौर ने अदालत को बताया था कि उनके पास आय का कोई स्रोत नहीं है, इसलिए अदालत ने उनके हक़ में आदेश जारी किया।
बता दें कि हरबंस कौर के पास कोई वकील नहीं था, ऐसी परिस्थिति में पंजाब के एडवोकेट जनरल अतुल नंदा ने उनकी सहायता के लिए अदालत के समक्ष किसी न्यायिक अधिकारी की नियुक्ति की जाने की गुज़ारिश की। नंदा की इस सलाह पर अदालत ने उन्हें ही इस मामले में एमिकस क्यूरी नियुक्त कर दिया।
पुलवामा हमले का गुनहगार और पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के चीफ मसूद अजहर पर प्रतिबंध लगाने को लेकर अब अमेरिका डायरेक्ट मैदान में आ गया है। 27 मार्च 2019 को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में मसूद अजहर को बैन करने का प्रस्ताव अमेरिका द्वारा दिया गया। प्रमुख बात यह भी कि अमेरिका के इस प्रस्ताव का फ्रांस और ब्रिटेन ने समर्थन भी कर दिया है।
अमेरिका ने यह प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के 15 सदस्यीय काउंसिल को दिया है। इसमें कहा गया है कि मसूद अजहर पर बैन जल्द से जल्द लगाया जाना चाहिए। आतंकी मसूद पर प्रस्ताव में यह भी स्पष्ट किया गया है कि उसकी संपत्तियां जब्त करने के साथ-साथ उसकी विदेश यात्राओं पर प्रतिबंध लगाया जाए।
भारत के लिए यह एक बड़ी कूटनीतिक जीत मानी जा रही है। हालाँकि अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि इस प्रस्ताव पर वोटिंग कब होगी। चीन द्वारा इस प्रस्ताव के खिलाफ फिर वीटो लगाने की आशंका को देखते हुए अमेरिका ने उसे भी कड़े शब्दों में चेतावनी दी है। कूटनीतिक चाल चलते हुए अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो ने चीन की आंतरिक नीतियों और हिंसक इस्लामिक आतंकी समूहों पर दोहरे मापदंड का आरोप लगाया।
China has detained more than one million #Uighurs, ethnic #Kazakhs, and other #Muslim minorities in internment camps in #Xinjiang since April 2017. The U.S. stands with them and their family members. China must release all those arbitrarily detained and end its repression.
The world cannot afford China’s shameful hypocrisy toward Muslims. On one hand, China abuses more than a million Muslims at home, but on the other it protects violent Islamic terrorist groups from sanctions at the UN.
माइक पॉम्पियो ने कहा कि चीन अपने यहाँ लाखों मुस्लिमों को प्रताड़ित करता है, लेकिन वीटो का सहारा लेकर हिंसक इस्लामिक आतंकी समूहों को संयुक्त राष्ट्र प्रतिबंध से बचाता है। जैश-ए-मोहम्मद या मसूद अजहर का नाम लिए बिना पॉम्पियो ने ट्वीट किया, “दुनिया मुस्लिमों के प्रति चीन के पाखंड को बर्दाश्त नहीं कर सकती। एक तरफ चीन अपने यहाँ 10 लाख से अधिक मुस्लिमों को प्रताड़ित करता है, जबकि दूसरी तरफ वो हिंसक इस्लामिक आतंकी समूहों को यूएन के प्रतिबंध से बचाता है।”
अमेरिकी विदेश मंत्री ने भले ही अपने ट्वीट में किसी का नाम नहीं लिया हो लेकिन यह स्पष्ट है कि उनका इशारा जैश-ए-मोहम्मद और इसके चीफ मसूद अजहर की ओर ही था। क्योंकि दो सप्ताह पहले ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में चीन ने मसूद अजहर को ग्लोबल आतंकी घोषित करने से बचाने के लिए अपने वीटो पावर का इस्तेमाल किया था। तब भी अमेरिका ने चीन पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि यदि आतंकियों को संरक्षण देने की आपकी नीति में बदलाव नहीं आता है तो सुरक्षा परिषद के सदस्य देश अन्य कड़े कदम उठाने के लिए मजबूर होंगे।
आपको बता दें कि इस्लामिक आतंकवाद पर पाकिस्तान को प्रश्रय देने की चीन की नीति का अब भांडाफोड़ हो चुका है। इस मामले पर चीन पूरे विश्व में अलग-थलग पड़ गया है। 20 मार्च को यूरोपियन यूनियन में मसूद अज़हर को ग्लोबल आतंकी घोषित कराने के लिए जर्मनी ने प्रस्ताव पेश किया था। इससे पहले फ्रांस ने जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अज़हर की सभी फ्रांसीसी सम्पत्तियों को ज़ब्त करने का फैसला किया था।
केंद्रीय सड़क एवं परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने नागपुर सीट पर नामांकन दाखिल कर दिया है। बता दें कि गडकरी अपना क़िला बचाने के लिए पूरे दमखम से नागपुर के चुनावी मैदान में उतर गए हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुख्यालय होने के कारण नागपुर संघ और भाजपा, दोनों के लिए ही प्रतिष्ठा का विषय बना हुआ है। पार्टी ने गडकरी पर एक बार फिर भरोसा जताया है। 2014 में हुए लोकसभा चुनावों में नितिन जयराम गडकरी ने कॉन्ग्रेस के अपने प्रतिद्वंदी को पौने तीन लाख से भी अधिक मतों ने मात दी थी। गडकरी को 5,87,000 से भी अधिक वोट मिले थे जबकि उनके प्रतिद्वंदी विलास मुत्तेमवार को क़रीब तीन लाख वोट ही मिले। 54% वोट हासिल कर गडकरी ने यहाँ से लगभग एकतरफा जीत दर्ज की थी।
अब गडकरी ने कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं के भी अपने साथ होने का दावा किया है। पूर्व भाजपा अध्यक्ष ने कहा कि उनके पास कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं के रोज फोन कॉल्स आते हैं, जिनमें वो गडकरी को वोट देने और उनका समर्थन करने की बात कहते हैं। गडकरी ने कहा कि शारीरिक रूप से भले ही कॉन्ग्रेसी कार्यकर्तागण अपनी पार्टी के लिए प्रचार-प्रसार करें लेकिन मानसिक रूप से वो सभी उनके साथ हैं। अपने संसदीय क्षेत्र में एक विशाल जनसभा को सम्बोधित करते हुए गडकरी ने कहा, “कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता मुझे बुला रहे हैं और कह रहे हैं कि मैं लोकसभा चुनाव जरूर जीतूँगा। उनका कहना है कि वह मेरे साथ हैं।“
Union Minister Nitin Gadkari in Nagpur: Congress workers are calling me and saying that I’m sure to win (Lok Sabha elections) and that they are with me. They say that physically they might be campaigning for Congress but mentally they are with me. #Maharashtrapic.twitter.com/EwCJ3iZB19
अभी हाल ही में कुछ दिनों पहले गडकरी ने दलबदलू नेताओं पर भी निशाना साधा था। चुनावी माहौल में नेतागण का टिकट के लिए एक दल से दूसरे दल में शामिल होने पर गडकरी ने सवाल उठाया था और दल-बदल को ग़लत ठहराया था। गडकरी ने कहा था कि उन्हें पहले कई लोगों ने कहा था कि वो भाजपा में फिट नहीं बैठते हैं लेकिन उनकी एक विचारधारा है और वो आज भी अपनी विचारधारा पर अडिग हैं। नितिन गडकरी अपने सीधे-सपाट जवाब और व्यवहार के कारण जाने जाते हैं। मीडिया के सवालों का जवाब देते वक्त भी वह राजनीति से हटकर विचारधारा और अपने द्वारा किए गए कार्यों की बात करते हैं।
कई लोग मज़ाक में गडकरी को सड़क एवं परिवहन के क्षेत्र में उनके द्वारा किए गए कार्यों की वजह से उन्हें रोडकरी भी कहते हैं। अपने इन्हीं विकास कार्यों की बदौलत गडकरी को उम्मीद है कि आगामी चुनाव में भी वह नागपुर के गढ़ में भाजपा का झंडा बुलंद रखने में कामयाब होंगे। नामांकन के दौरान दाखिल हलफनामे में गडकरी ने 25.12 करोड़ रुपए की चल और अचल संपत्ति का विवरण दिया है। अपने हलफनामे में उन्होंने जानकारी दी कि उन्हें 1,57,21,753 रुपए का क़र्ज़ भी चुकाना है। उनके पास कुल छह कारें हैं, जिनमें से चार उनकी पत्नी के नाम पर हैं।
फेसबुक ने भारत के अभिन्न अंग जम्मू कश्मीर को अलग देश बताने के बाद अपनी इस हरकत पर माफ़ी माँग ली है। सोशल नेटवर्किंग साइट के सिक्योरिटी पॉलिसी प्रमुख नैथनियल ग्लेचर ने बुधवार (मार्च 27, 2019) को एक ब्लॉग के माध्यम से कश्मीर को अलग देश बताया था। उन्होंने कश्मीर को भारत से स्वतंत्र एक अलग राष्ट्र बताया था। लोगों द्वारा आपत्ति जताने के बाद फेसबुक ने इस ब्लॉग को हटा दिया। इस पर सफाई देते हुए कम्पनी ने कहा:
“दरअसल, हम ऐसे देश और क्षेत्रों को सूचीबद्ध कर रहे थे, जिन पर ईरानी नेटवर्क का प्रभाव था। ऐसे में हमने गलती से कश्मीर को भी इस सूची में शामिल कर लिया। ऐसा नहीं किया जाना चाहिए था। हमने ब्लॉग में सुधार कर लिया है। हम किसी भी तरह की ग़लतफ़हमी को लेकर माफ़ी माँगना चाहते हैं।”
गलेचार ने अपने ब्लॉग में कश्मीर को भारत से अलग सत्ता बताते हुए उसे एक अलग देश की तरह सम्बोधित किया था। उन्होंने बताया कि ऐसे हज़ारों फ़र्ज़ी पेजेज व एकाउंट्स को हटाया गया है, जिनके द्वारा आपत्तिनजक सामग्रियाँ पोस्ट की जा रही थी। इनमें ऐसे 513 पेजेज व एकाउंट्स शामिल हैं जो अलग-अलग देशों में चल रहे थे। ये मिस्त्र, भारत, इंडोनेशिया, इजरायल, इटली, कश्मीर, कजाकिस्तान, मिडिल ईस्ट और कुछ अफ़्रीकी देशों से ऑपरेट किए जा रहे थे।
आपत्ति जताने के बाद फिलहाल फेसबुक ने कश्मीर का नाम इस सूची से हटा दिया है। फेसबुक ने बताया कि ईरानी नेटवर्क के प्रभाव से ऐसा हुआ। बकौल फेसबुक, इसके लिए जिम्मेदार लोगों ने छिपने की कोशिश की लेकिन उसने इसका सिरा ईरान में ढूँढ निकाला है। बता दें कि कश्मीर को भारत से अलग दिखाना भारतीय अखंडता और सम्प्रभुता का अपमान तो है ही, साथ ही लोकतंत्र के भी विरुद्ध है। पाकिस्तान कुछ ऐसा ही दावा करता रहा है लेकिन विश्व समुदाय भी कश्मीर को भारत के अंग के रूप में स्वीकार करता आया है।
दैनिक भास्कर में प्रकाशित एक ख़बर के अनुसार, फेसबुक के भारत में 30 करोड़ यूजर्स हैं, जो दुनिया में सबसे ज्यादा हैं। फेसबुक के मुताबिक उसके द्वारा 2632 पेज, समूह और अकाउंट्सपर कार्रवाई की है, जिनमें ईरान, रूस, मेसेडोनिया, कोसोवो जैसे देशों से आपत्तिजनक पोस्ट्स की जा रही थी। ये अकाउंट्स इंस्टाग्राम पर भी सक्रिय थे। ज्ञात हो कि फेक न्यूज़ और आपत्तिजनक सामग्रियों के दुष्प्रभाव को लेकर भारत सरकार पहले ही फेसबुक को फटकार लगा चुकी है।
बता दें कि चुनाव आयोग ने आगामी लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान सोशल मीडिया के प्रयोग को लेकर भी दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इस दौरान चुनाव आयोग फेसबुक, ट्विटर सहित तमाम सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर पैनी नज़र रखेगा। राजनीतिक पार्टियों व उम्मीदवारों द्वारा सोशल मीडिया पर किए जा रहे विज्ञापन भी अब उनके चुनावी ख़र्च में शामिल होंगे। नेता व राजनीतिक दलों को अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर विज्ञापन जारी करने से पहले चुनाव आयोग से उसका सत्यापन कराना होगा। अर्थात, अब सोशल मीडिया पर असत्यापित विज्ञापन पोस्ट करने पर आयोग कार्रवाई करेगा।
भारत के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने लो अर्थ ऑर्बिट (Low Earth Orbit) में मौजूद एक सैटेलाइट को मिसाइल से मार गिराया है। अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारत ऐसा करने वाला दुनिया का चौथा देश बन गया है। इससे पहले अमेरिका, रूस और चीन यह कर चुके हैं। आज दिन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संबोधन में यह घोषणा की। पीएम मोदी ने कहा कि यह ऑपरेशन बेहद मुश्किल था, लेकिन भारतीय वैज्ञानिकों और DRDO की टीम ने यह कर दिखाया है। सिर्फ तीन मिनट में लो अर्थ ऑरबिट सैटेलाइट (Low Earth Orbit Satellite) को ध्वस्त कर दिया गया।
इस ऑपरेशन को मिशन शक्ति नाम दिया गया। पीएम नरेंद्र मोदी ने आज राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा, “ऐंटी सैटलाइट वेपन A-SAT सफलतापूर्वक लॉन्च किया गया। मैं इसके लिए डीआरडीओ के सभी वैज्ञानिकों को इसके लिए बधाई देना चाहता हूँ।”
देश की घास से लेकर भारत के अंतरिक्ष और आकाश तक में विचरते बिगबैंग से निकले पार्टिकल तक, हर चीज नेहरू, इंदिरा या राजीव गाँधी की ही देन हैं, ऐसा कॉन्ग्रेस पार्टी मानती आई है। हाल ही में, अपने समय में मुंबई हमलों के बाद एयर स्ट्राइक करने के वैश्विक डर से झुकने की नीति अपनाने वाले कॉन्ग्रेस ने बालाकोट स्ट्राइक का क्रेडिट मोदी को देने से इनकार कर दिया था। उनके अनुसार वो तो एयर फ़ोर्स ने किया।
उसी तर्ज़ पर इसरो जैसे संस्थानों की हर उपलब्धि पर ये लोग तुरंत ये बताने लगते हैं कि नेहरू जी इसरो के कैम्पस में करनी से सीमेंट को बराबर किया करते थे। वैज्ञानिक कुछ करें तो तुरंत बताते हैं कि वो जिस बिल्डिंग में काम करते हैं वो कॉन्ग्रेस काल में बनी थी। उसी तर्ज़ पर आज जब डीआरडीओ द्वारा विकसित स्वदेशी तकनीक से लैस एंटी सैटेलाइट मिसाइल (ASAT) ने धरती से 300 किमी ऊपर एक सक्रिय उपग्रह को तीन मिनट में मार गिराया, तो कॉन्ग्रेस ने नेहरू और इंदिरा को इसका श्रेय दिया।
इनकी बातों का विरोधाभास देखिए कि इनके अनुसार ये काम वैज्ञानिकों ने किया, तो वो बधाई के पात्र हैं। अगर ऐसा है तो फिर नेहरू ने कौन-सी मिसाइल तकनीक विकसित की थी? या, इंदिरा गाँधी ने कब इसरो जाकर कंट्रोल रूम सँभाला था? वैसे भी, मोदी ने तो कहीं भी, एक भी बार, यह नहीं कहा कि इस उपलब्धि के लिए वो अपने कैबिनेट, पार्टी और गठबंधन को बधाई देते हैं।
जब मोदी ने इसरो को बधाई दी, देश के हर नागरिक को शुभकामनाएँ दी, तो फिर इसमें राहुल गाँधी का ‘वर्ल्ड थिएटर डे’ कहना कहाँ तक उचित है? ये बात सबको पता है कि राहुल गाँधी के वश की बात नहीं है दिनों की ऐतिहासिकता या प्रासंगिकता को याद रखना। उनकी एक टीम होगी जो उनके नाम से यह सारी बातें लिखती है, और वो ख़बर बनती है। फिर भी, जब नाम उनका है, और पार्टी उसे डिफ़ेंड करती है, तो फिर उन्हें ये बताना चाहिए कि उनकी समस्या क्या है। क्योंकि, समस्या बता देंगे तो फिर आयुष्मान योजना में कुछ व्यवस्था की जा सकेगी।
राहुल गाँधी या कॉन्ग्रेस पार्टी हर दूसरे दिन मोदी और भाजपा से पिट रही है। उनके पास ‘रिडिक्यूल’ के अलावा और कुछ नहीं बचा। उनकी पार्टी स्वघोषित रूप से भारतीय राष्ट्र मीम्स आयोग बन कर नाम कमा रहा है। उनके पार्टी के प्रवक्ता ये नहीं सोच पा रहे कि अध्यक्ष ने जो बात कह दी है, उसमें से गणित कहाँ है, और उसे कैसे जस्टिफाय किया जाए।
इसलिए, जिन्हें यह समझ में नहीं आ रहा कि सेटैलाइट सूट करना कितनी बड़ी उपलब्धि है, वो आज की लीडरशिप को तो इसका क्रेडिट नहीं दे रहे, लेकिन अपनी दादी और उनके पिता को ज़रूर सामने ला रहे हैं। अब यही कहना बचा है कॉन्ग्रेस के लिए कि नेहरू के प्रधानमंत्रीत्व में ही भारतीय परिवारों में बच्चे हुए, अतः उनकी तमाम उपलब्धियाँ बाय डिफ़ॉल्ट नेहरू जी की हैं।
जबकि, नेहरू की एक उपलब्धि राहुल गाँधी भी हैं। इससे राहुल गाँधी भी इनकार नहीं कर सकते। इससे सोनिया गाँधी भी इनकार नहीं कर सकती। इससे कॉन्ग्रेस प्रवक्ता से लेकर कोई भी समर्थक भाग नहीं सकता।
राहुल गाँधी ने ऐसे हर मौक़े पर देश की तमाम संस्थाओं का अपमान किया है। सर्जिकल स्ट्राइक पर सबूत माँगते रहे, एयर स्ट्राइक पर सबूत माँगते रहे और अब इस तकनीक का भी सबूत वो शायद एक-दो दिन में माँग ही लेंगे। यही पैटर्न है उनका और तमाम महागठबंधन की पार्टियों का। पहले दिन वो संस्था को बधाई देते हैं, लेकिन ज्योंहि उन्हें पता चलता है कि ‘अरे, अभी तो मोदी ही पीएम है’, वो फ़टाक से सबूत माँगने लगते हैं सबूत। इनके कहने का तरीक़ा भले ही अलग हो, मूल में बात वही होती है कि सरकार जो उपलब्धि गिना रही है, उसे वो मानने को तैयार नहीं है।
उसके बाद एक गिरोह सक्रिय हो जाता है। राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस की नौटंकी के साथ ही ममता बैनर्जी टाइप के लोग बेकार की बातें कहने लगे हैं। इनका स्क्रिप्ट भी एक ही रहता है: ये चुनावों के समय हुआ है, इसका पोलिटिकल मायलेज लिया जा रहा है। इनका तर्क इतना वाहियात है कि इन सबकी सामूहिक मानसिक क्षमता पर आप आँख मूँदकर सवाल उठा सकते हैं।
कहना है कि ये काम तो वैज्ञानिकों का है, उन्हें आकर यह बताना था। सही बात है। फिर सरकार करती क्या है आखिर? सड़क मज़दूर और इंजीनियरों के सहयोग से बनता है, फ़ीता ममता जी काटती हैं। पुलिस अपराधियों को पकड़ती है, ममता जी कहती हैं कि उनकी सरकार कानून व्यवस्था पर… सॉरी, वो ऐसा नहीं कहतीं क्योंकि बंगाल में कानून व्यवस्था नाम की चीज है ही नहीं।
मेरे कहने का मतलब यह है कि सेना कुछ करे तो सैनिक प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर लें, सड़क बने तो इंजीनियर, पुलवामा हमला हो तो सीआरपीएफ़ बयान दे दे, गंगा साफ हो तो उसमें काम करने वाले लोग बताएँ। सरकार कुछ न करे, क्योंकि सरकारों का इसमें रोल है ही क्या? अंततः, ममता जी के लॉजिक से चलेंगे तो आप कन्विन्स हो जाएँगे कि चुनावों की क्या ज़रूरत है, जबकि हर काम तो अंत में मज़दूर, इंजीनियर, शिक्षक, डॉक्टर या सैनिक कर रहा होता है!
इसमें सवाल उठाने वाले और टेढ़ा बोलने वालों की कमी नहीं है। मिलिट्री कू की फर्जी स्टोरी से अपनी समझदारी साबित कर चुके शेखर गुप्ता के लिए ये कोई बड़ी उपलब्धि नहीं है। गुप्ता जी को लिखने या सेंसिबल बातें कहने की कोशिश से संन्यास ले लेना चाहिए। मुझे नहीं लगता कि इस उम्र में उनका दिमाग ठीक से काम कर रहा है क्योंकि किसी देश के पास सैटेलाइट को मार गिराने की क्षमता आ जाना उन्हें एक एयर स्ट्राइक जैसी आम ख़बर लगती है।
बात यह भी है कि अब ये लोग इस तकनीक को नीचा तो दिखा नहीं सकते क्योंकि इसमें वैज्ञानिक और इसरो जैसी संस्था का नाम जुड़ा है। फिर बचता यही है कि इसे पोलिटिकल डेस्पेरेशन कह दिया जाए। जबकि ऐसा ट्वीट करने के बाद पिन करके टॉप में लगाए रखना बताता है कि आप कितने डेल्यूजनल हैं इस ट्वीट में कही बातों को लेकर।
ये शेखर गुप्ता जैसों का डेस्पेरेशन है कि हम हैं एडिटर, हमको करना पड़ेगा टाइप, उसमें कुछ ज्ञान देने जैसे शब्द होने चाहिए, और फिर कुछ भी लिख दिया जाता है जिसका तर्क से कोई लेना-देना नहीं होता। ये वही गिरोह है जो शाम होने तक यह कहने ज़रूर आएगा कि भारत में इतने लोग गरीब हैं, और मोदी आकाश में सैटेलाइट उड़ा रहा है।
कुल मिलाकर बात यह है कि ये लोग मोदी के आर्मर में चिंक नहीं ढूँढ पा रहे। राफेल घोटाला वाला मुद्दा क्रैश कर चुका है। नोटबंदी और जीएसटी के बावजूद इकॉनमी स्वस्थ है, रोजगार लगातार बढ़ें हैं, टैक्स कलेक्शन बढ़ा है, किसान बेहतर स्थिति में है, सड़कें बन रही हैं, गंगा साफ हो रही है, विदेश में भारतीय छवि बेहतर हुई है, पाकिस्तान को उसकी भाषा में लगातार जवाब दिया गया है, अतंरिक्ष में हम नए कीर्तिमान बना रहे हैं।
और, हर बार की तरह न तो विपक्ष के पास, न ही पत्रकारिता के समुदाय विशेष के पास कुछ भी ढंग का है कहने को। इसलिए ममता इस बात पर चुनाव आयोग जाने की धमकी देती हैं, गुप्ता जी इसे डाउनप्ले करते हैं जैसे उनके लौंडे ने बीयर की बोतल में बीस रुपए का रॉकेट रखकर आग लगाई हो, राहुल गाँधी को इसमें थिएटर डे की याद आती है, और कॉन्ग्रेस को याद आता है कि नेहरू जी तो इसरो में ही बीड़ी पीने जाया करते थे।
इससे मोदी या भाजपा की छवि को दो पैसा फ़र्क़ नहीं पड़ता। इससे फ़र्क़ पड़ता है वैसे लोगों को जो जनता की नज़रों में स्वयं ही कपड़े उतार कर नंगे हो रहे हैं। आम जनता को भले ही मिसाइल की ट्रैजेक्ट्री कैलकुलेट करने न आए लेकिन वो इतना समझता है कि अंतरिक्ष में चल रहे सैटेलाइट का मार गिराना कितनी बड़ी बात है।
विपक्ष और मीडिया में बैठे तथाकथित निष्पक्ष लम्पट पत्रकार मंडली को यह जानना चाहिए कि दौर अख़बारों का नहीं है। दौर वह है जहाँ हाथ में रखे फोन पर, शेखर गुप्ता के ज्ञानपूरित ट्वीट से पहले पाँचवी के बच्चे तक को ASAT का अहमियत समझाने वाले विडियो उपलब्ध हो जाते हैं। दौर वह है जहाँ मोदी की सात मिनट की स्पीच के आधार पर इस तकनीक से जुड़े दस-दस लेख, हर पोर्टल, हर भाषा में उपलब्ध करा रहा है।
इसलिए, जनता को विवेकहीन मानकर एकतरफ़ा संवाद करने वाले नेताओं, पत्रकारों और छद्मबुद्धिजीवियों को याद रखना चाहिए कि वो चैनल और सोशल मीडिया से भले ही कैम्पेनिंग करते रहें, लेकिन जनता के सामने हर तरह के विकल्प मौजूद हैं। इनके तर्क इनकी बुद्धि की तरह ही खोखले हैं।
इंतजार कीजिए, कोई मूर्ख नेता और धूर्त पत्रकार जल्द ही यह पूछेगा कि जो सेटैलाइट मार गिराया गया, उसका धुआँ तो आकाश में दिखा ही नहीं, उसके पुर्ज़े तो कहीं गिरे होंगे, उसका विडियो कहाँ है। और इन मूर्खतापूर्ण बातों पर भी प्राइम टाइम में बैठे पत्रकार गम्भीर चेहरा लिए कह देंगे, “आप कहते हैं कि आपने सेटैलाइट मार गिराया। जब आपके पास इतनी उन्नत तकनीक है, तो फिर मारते समय विडियो लेने की भी तो तकनीक होगी। सबूत दिखाने में क्या हर्ज है?”
अपने घरों से दरबदर कश्मीरी हिन्दुओं को कम-से-कम अब अपने राज्य और लोकसभा क्षेत्र के चुनाव में भागीदारी का मौका बिना जान खतरे में डाले मिलेगा। चुनाव आयोग ने अपने घरों से तीस साल से निर्वासित कश्मीरी पण्डितों के लिए विशेष चुनावी बूथों का प्रबंध किया है। यह बूथ उनके निवास के लोकसभा क्षेत्रों में ही खोले जाएँगे।
केन्द्रीय चुनाव आयोग ने इसके अलावा उन्हें डाक के जरिए मतपत्र (पोस्टल बैलट) भी उपलब्ध कराने का निर्णय लिया है।
असिस्टेंट रिटर्निंग अफसर (प्रवासी) अनिरुद्ध राय के अनुसार इन सुविधाओं का लाभ उठाने के लिए इच्छुक व्यक्तियों को फॉर्म-एम/फॉर्म-12सी (form-M/form-12C) भरना होगा।
घर पर क्यों वोट नहीं डाल सकते
कश्मीरी हिन्दू घर जाकर अपने विधानसभा क्षेत्रों में वोट इसलिए नहीं दे सकते क्योंकि कश्मीर घाटी में इस्लामी चरमपंथ और हिंसा पूरे जोरों-शोरों से जारी है- 1947 में भारत के आजाद होने के समय से ही। और कश्मीर की राजनीतिक ‘आजादी’ की आड़ में घाटी से हिन्दुओं का सफाया ही इनका मकसद है। इसका सबसे वीभत्स रूप तब देखने को मिला जब 1989 में यासीन मलिक के नेतृत्व में जेकेएलएफ नामक आतंकवादी दस्ते ने हिन्दुओं का कत्ले-आम और बलात्कार शुरू कर दिया, और उनके पास जिन्दा बचने के लिए केवल दो सूरतें दीं- या तो वे इस्लाम अपनाएँ, या घाटी छोड़ दें। लाखों कश्मीरी हिन्दुओं को गिरते-पड़ते, घरबार आदि छोड़कर जान बचाकर भागना पड़ा।
महत्त्वपूर्ण है क्योंकि…
इस कदम को महत्वपूर्ण इसलिए माना जा रहा है क्योंकि इसके पूर्व पोस्टल बैलेट की सुविधा उपलब्ध नहीं थी। कश्मीरी हिन्दुओं को मतदान के लिए दिल्ली या जम्मू तक की यात्रा करनी पड़ती थी। कईयों के यह यात्रा न कर पाने के कारण चुनावी गणित में हिन्दुओं का पलड़ा हल्का पड़ता था, और इस्लामी कट्टरता को हवा देने वालों के लिए चुनाव जीतना आसान हो जाता था।
जम्मू-कश्मीर के मुख्य चुनाव अधिकारी के पास 20 साल से ज्यादा समय से पंजीकरण कराए कश्मीरी पण्डित सालों से अपनी चुनावी भागीदारी आसान करने की माँग कर रहे थे। कश्मीरी हिन्दुओं का एक प्रतिनिधि मण्डल कुछ ही दिन पूर्व चुनाव आयोग से मिला और अपनी माँग रखी, जिस पर यह फैसला हुआ है।
अब उम्मीद की जा सकती है कि घाटी और बाकी देश, दोनों ही जगह पर मताधिकार से वंचित होने के कारण नजरअंदाज कश्मीरी हिन्दुओं की समस्याओं को राजनीतिक दल गंभीरता पूर्वक लेंगे।
जम्मू-कश्मीर में लोकसभा चुनाव 5 चरणों में होंगे- 11, 18, 23, 29 अप्रैल, और 6 मई को। चुनाव आयोग ने मतगणना 23 मई को कराने की भी घोषणा की है।
आत्ममुग्ध बौने के नाम से चर्चा में आए अरविन्द केजरीवाल इस बार चुनाव जीतने के लिए किसी भी हद तक जाने की अपनी बात को सही साबित करते हुए नजर आ रहे हैं। कभी वो लोगों को फोन कर के गुमराह करने की कोशिश करते हैं। तो कभी उनके खत चुनाव आयोग की नजर में आ रहे हैं। नई वाली राजनीति का उनका हर पैंतरा जनता के सामने बेनकाब होता जा रहा है, जो कि उनकी IIT की डिग्री से प्रभावित हुए प्रशंसकों के लिए दुखद खबर हैं।
कॉन्ग्रेस से लगातार गठबंधन की भीख माँगने वाले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के नाम से सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल करके भेजी जाने वाली चिट्ठियों को चुनाव आयोग के अधिकारियों ने सील कर दिया है। यह चिट्ठी पानी के बिलों के साथ भेजे जाने की तैयारी की गई थी। अरविंद केजरीवाल दिल्ली जल बोर्ड के अध्यक्ष हैं। चिट्ठियाँ जल बोर्ड के नरेला कार्यालय के कमरे में रखी गईं थीं। इस मामले की शिकायत भाजपा नेता ने चुनाव आयोग से की थी।
मुख्य निर्वाचन अधिकारी डॉ. रणवीर सिंह ने बताया कि नरेला जल बोर्ड ऑफिस से संबंधित एक शिकायत मिली थी, उसमें कहा गया था कि इन चिट्ठियों को पानी के बिल के साथ भेजने की तैयारी की जा रही है। चिट्ठी में केजरीवाल दिल्ली में पानी और सीवर की पुराने समय की बदहाली का जिक्र कर के वर्तमान में किए गए कार्यों को उपलब्धि के तौर पर गिनवा रहे थे, जो कि आचार संहिता का उल्लंघन है।
मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय से जुड़े अधिकारियों ने छापा मारा, वहाँ बड़ी संख्या में ऐसी चिट्ठियाँ मिलीं और इसके बाद अधिकारियों ने उस कमरे को सील किया।
दिल्ली विधानसभा में विपक्ष के नेता विजेंद्र गुप्ता ने मंगलवार (मार्च 27, 2019) को दिल्ली BJP दफ्तर में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बताया कि कॉन्ग्रेस ने भी हाल ही में वोटरों को गुमराह करने के लिए कुछ झूठे, आपत्तिजनक और अभद्र भाषा वाले विडियोज जारी किए हैं। उन्होंने कहा कि हताशा के चलते कॉन्ग्रेस और AAP, दोनों ही आपा खो चुकी हैं और इस कारण दोनों पार्टियाँ अब आचार संहिता का खुलेआम उल्लंघन करने पर उतर आईं हैं। गुप्ता ने दावा किया कि उनकी शिकायत पर दिल्ली जल बोर्ड के नरेला स्थित दफ्तर सहित कुछ अन्य दफ्तरों पर चुनाव आयोग ने रेड डालकर आपत्तिजनक प्रचार सामग्री भी जब्त की है और यह प्रक्रिया अब भी जारी है।
हाल ही में पड़ोसी देश पाकिस्तान में 2 हिंदू लड़कियों के अपहरण और जबरन धर्मांतरण की ख़बर चर्चा का विषय बनी रही, जिसने पूरे विश्व को पाकिस्तान में हिंदुओं की स्थिति पर सोचने के लिए मजबूर कर दिया। लेकिन सोचने की बात ये है कि ऐसे ही पाकिस्तान जैसे देश में और कितने ही मामले हैं, जिन्हें कभी आवाज तक नहीं मिल पाई होगी।
पाकिस्तान में काफी समय से नाबालिग हिंदू लड़कियों को अगवा कर उनका धर्म परिवर्तन कराया जा रहा है। एक हफ्ते से भी कम समय में ऐसे करीब 8 मामले सामने आ चुके हैं। सिंध प्रांत में होली के अवसर पर घोटकी से 2 नाबालिग हिंदू बहनों रवीना और रीना को अगवा कर उनका धर्म परिवर्तन कराया गया। इसके बाद दोनों की इस्लामिक रिवाज के अनुसार निकाह करा दी गई।
इस घटना के अगले दिन सिंध से सोनिया भील नाम की लड़की का अपहरण किया गया। जिसके बाद उसका जबरन धर्म परिवर्तन कराया गया। इसी दौरान सिंध से ही 16 साल की माला कुमारी नाम की एक अन्य हिंदू लड़की का अपहरण किया गया। अपराधी हथियार सहित माला के घर में घुसे और उसे अगवा करके ले गए।
अगर 1947 के बँटवारे के बाद से इस मामले को देखें तो ये सूची बेहद लंबी है। नाबालिग हिंदू लड़कियों को अगवा कर उनका धर्म परिवर्तन कराया जाता है, फिर कानून से बचने के लिए लड़कियों से झूठे बयान दिलवाए जाते हैं। लेकिन जब ये देखा जाता है कि हिंदू लड़कियों का धर्म परिवर्तन कराने के पीछे सबसे बड़ा हाथ किसका है, तो मियाँ मिट्ठू नाम के व्यक्ति का नाम सामने आता है।
कौन है मियाँ मिट्ठू?
पाकिस्तान में हिंदुओं का गुस्सा सबसे ज्यादा पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के पूर्व सांसद पीर अब्दुल हक पर है, जो ठेके पर धर्म परिवर्तन का काम करता है। इसी व्यक्ति को यहाँ मियाँ मिट्ठू के नाम से जाना जाता है। 2016 के आँकड़ों के अनुसार उसके खिलाफ 117 मामले दर्ज हो चुके हैं। पाकिस्तान में हिंदू लोग मियाँ मिट्ठू के खिलाफ कई बार सड़कों पर भी उतरे हैं। लोगों की माँग है कि उसे गिरफ्तार किया जाए। पाकिस्तान में ये इस्लामी कट्टरता खुलेआम चल रही है, जिसमें मियाँ मिट्ठू नाम के लोग बिना डरे अपराध करते हैं।
मियाँ मिट्ठू की तस्वीर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान और पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा के साथ भी देखी जा सकती है।
कमर जावेद बाजवा और मियाँ मिट्ठू
पाकिस्तानी सेना के लोगों और सरकारी अधिकारियों के साथ मियाँ मिट्ठू
नया पाकिस्तान का दावा करने वाले और भारत को शांति का पाठ समझाने का दिखावा करने वाले पाकिस्तान में हिन्दू अल्पसंख्यक सरकार से मियाँ मिट्ठू के खिलाफ सख्त कदम उठाए जाने की माँग कर चुके हैं। लेकिन, इसके बाद भी सरकार कुछ नहीं करती। पाकिस्तान का मानना है कि वह अपने यहाँ अल्पसंख्यकों के साथ अच्छा व्यवहार करती है। लेकिन जब ऐसे मामले सामने आते हैं, तो पाकिस्तान की पोल खुल जाती है।
300 हिंदू लड़कियों का अपहरण
पाकिस्तान में हिंदुओं पर अत्याचार हर दिन बढ़ रहे हैं। धीरे-धीरे उनके पूजा स्थल और मंदिर भी नष्ट किए जा रहे हैं। हिंदुओं की संपत्ति पर जबरन कब्जे के कई मामले सामने आ रहे हैं। वहीं हिंदू लड़कियों का अपहरण कर उनका धर्म परिवर्तन कराना भी आम हो गया है। पाकिस्तान जैसे मक्कार देश की सहिष्णुता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वहाँ पर हर साल 300 हिंदू लड़कियों का अपहरण कर लिया जाता है। ये बात पाकिस्तान की संस्था ‘मूवमेंट फॉर सॉलिडेरिटी एंड पीस’ द्वारा जारी की गई रिपोर्ट में कही गई है।
इस रिपोर्ट में कहा गया है कि इन अगवा हिंदू लड़कियों में ज्यादातर की उम्र 12 से 15 साल के बीच होती है। इन लड़कियों की शादी कराकर इनसे जबरन इस्लाम कबूल करवाया जाता है। हालाँकि, माना जाता है कि असल संख्या 300 से भी अधिक है। वर्तमान में पाकिस्तान में हिंदू धर्म का अनुसरण करने वालों की संख्या कुल जनसंख्या का 1.6% है, यानि करीब 36 लाख।
मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि बीते 50 सालों में पाकिस्तान में बसे 90% हिंदू देश छोड़ चुके हैं। ऐसे में भारत में बैठे पाक अकुपाइड पत्रकार के मीडिया गिरोहों को इमरान खान के लिए शान्ति के नोबल पुरस्कार की अपील करने से पहले इस तरह के आँकड़ों पर भी ध्यान देना चाहिए। शायद जिस तरह से उनकी आवाज हाल ही में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने सुनी है, हो सकता है कि इस समस्या पर भी इमरान खान कोई सख्त कदम उठा दें।
भारत के मिशन शक्ति पर पाकिस्तान-चीन की वैसी ही प्रतिक्रिया आई है, जैसी की उम्मीद की जा सकती थी। दोनों ने ही भारत से सीधा टकराव लेने से बचते हुए यह जता दिया कि भारत की ताकत में बढ़ोतरी उन्हें फूटी आँख नहीं सुहा रही है।
किताबों-किरदारों की आड़ में पाकिस्तान
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कर कहा कि अन्तरिक्ष मानवता की साझी विरासत है और हर देश की यह जिम्मेदारी है कि वह ऐसी हरकतों से बचे, जिनसे कि अंतरिक्ष में सैन्यीकरण को बढ़ावा मिले। हालाँकि इस बयान में पाकिस्तान भारत का सीधे-सीधे नाम लेने से बचता हुआ दिखा।
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने कहा, “हम उम्मीद करते हैं कि वह देश जिन्होंने अतीत में दूसरों की ऐसी ताकतों के प्रदर्शन की कड़ी निंदा की थी, वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसे उपायों के विकास में सहयोग करेंगे, जिनसे अन्तरिक्ष में सैन्य खतरों को रोका जा सके।”
अपने बयान में उन्होंने यह भी कहा कि ऐसी क्षमताओं का प्रदर्शन डॉन क्विक्सोट के पवन चक्कियों को धकेलने की याद दिलाता है। उनका इशारा 17वीं शताब्दी के स्पेनिश उपन्यास के भ्रमित नायक की ओर था। उपन्यास के लेखक मिगुएल दे सेरवान्तेस थे।
इस प्रतिक्रिया के बाद पाकिस्तान में प्रधानमंत्री इमरान खान द्वारा एक उच्च स्तरीय बैठक बुलाने की भी खबर आई, जिसका एजेण्डा पाकिस्तान की सुरक्षा को लेकर चर्चा ही माना जा रहा है।
Prime Minister @ImranKhanPTI today chaired a high level meeting at Prime Minister’s Office; Security matters were discussed during the meeting pic.twitter.com/kExrixExy5
चीन का जवाब पाकिस्तान के मुकाबले अधिक सधा हुआ और डिप्लोमैटिक रहा। समाचार एजेंसी पीटीआई के प्रश्न का लिखित उत्तर देते हुए चीनी विदेश मंत्रालय ने बयान दिया, “हमने रिपोर्टें देखी हैं और हम उम्मीद करते हैं कि हर देश अंतरिक्ष में शांति बनाए रखेगा।”
चीन का इतना सधा हुआ जवाब दो कारणों से महत्वपूर्ण है। एक इसलिए क्योंकि एशिया में एंटी-सैटलाइट होड़ शुरू करने का श्रेय चीन को ही जाता है। 2007 में अपने एक ख़राब मौसमी उपग्रह को एंटी-सैटलाइट मिसाइल से उड़ाकर चीन ने अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया था।
दूसरा इसलिए क्योंकि इस समय चीन, रूस और अमेरिका के साथ जिनेवा में दूसरों देशों को ऐसी ही तकनीक पाने से रोकने के लिए नूराकुश्ती में लगा हुआ है। माना जा रहा है कि अंतिम ध्येय इस नूराकुश्ती के बिना पर अन्य देशों के हाथ यह तकनीक लगने या उनके इसे खुद विकसित करने को रोकना है, ताकि यह तीन देश इस तकनीक पर एकछत्र राज स्थापित करके अपने स्वार्थ साधने के लिए इसका इस्तेमाल कर सकें। ऐसे में भारत ने ऐन मौके पर यह परीक्षण कर के इनके मंसूबों पर कुछ हद तक पानी फेर दिया है।