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अरुण जेटली ने समझाया, कैसे बनते हैं कॉन्ग्रेस के ‘स्वीटहार्ट’ डील्स पाने के योग्य

ऑपइंडिया द्वारा संदिग्ध भूमि सौदों में राहुल गाँधी को संजय भंडारी से जोड़ने वाली जानकारी मीडिया में पहुँचाने के बाद भाजपा ने कॉन्ग्रेस और राहुल गाँधी को परिवार सहित जमीन घोटाले में लिप्त होने के आरोप पर जमकर घेर लिया है। आज दिन में प्रेस वार्ता के माध्यम से केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने प्रियंका गाँधी और राहुल गाँधी को घोटाले में शामिल होने पर और इस मामले में अन्य लोगों से सम्बन्ध होने पर खूब घेरा। भाजपा ने आज दावा किया कि 70 सालों में संस्थागत भ्रष्टाचार कॉन्ग्रेस की देन रहा है और पिछले 24 घंटों में समाचार माध्यमों से सामने आए तथ्य दर्शाते हैं कि कैसे गाँधी-वाड्रा परिवार ने पारिवारिक भ्रष्टाचार को परिभाषित किया है।

इसके साथ ही अरुण जेटली ने भी कॉन्ग्रेस के घोटालों के कच्चे चिट्ठे पर अपने ब्लॉग में OpIndia की रिपोर्ट का जिक्र करते हुए कॉन्ग्रेस पर कटाक्ष किए। इसके साथ ही केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि पीएम मोदी की अगुवाई में NDA सरकार सत्ता में वापसी करेगी, इसमें कोई संदेह नहीं है। उन्होंने कहा कि मौजूदा सरकार के खाते में कामयाबियों की लंबी लिस्ट है। ये सरकार स्कैम फ्री सरकार के तौर पर याद रखी जाएगी। अपनी बात के समर्थन में वो 2014 के पहले का हवाला देते हैं। जेटली ने कहा कि आप याद करिए कि यूपीए पार्ट-2 में हर एक साल भ्रष्टाचार के मामले अलग अलग रूप में सामने आते थे। जनमानस में ये सामान्य धारणा बन चुकी थी कि यूपीए सरकार के लिए विकास का मतलब सिर्फ भ्रष्टाचार का विकास है। 

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अपने ब्लॉग के अंत में लिखा, “जब मैं इस ब्लॉग को अंतिम रूप दे रहा था, तब एक ऑनलाइन साइट (ऑपइंडिया) द्वारा विस्तृत गाँधी परिवार (गाँधी-वाड्रा परिवार) को लेकर किया गया एक गहन विश्लेषण सामने आया। जब भी भारतीय समाज में एक साफ-सुथरी छवि के साथ सार्वजनिक जीवन जीने की बात होती है तो हमेशा एक बात उठती है कि कई भारतीय नेता और उनसे जुड़े लोग बिना कोई कार्य किए ही बेहतरीन जीवन जी रहे हैं। यह खोजी ख़बर आपके ऐसे सवालों का जवाब देती है कि गाँधी-वाड्रा परिवार कैसे ऐसा कर पाता है।”

उन्होंने आगे लिखा, “जबकि कई लोग घूस आदि जैसे पारम्परिक तरीके से भ्रष्टाचार के रास्ते अपनाते रहे हैं, इस परिवार ने नया तरीक़ा इजाद किया है। ‘व्हीलर डीलर्स’ और ‘फ्लाय बाय नाइट ऑपरेटर्स’ होने के कारण आपको ‘स्वीटहार्ट डील्स’ पाने के योग्य पाया जाता है। बस थोड़े से निवेश के साथ, कुछ लोगों के लिए बहुत बड़े फ़ायदे का रास्ता बनाया जाता है क्योंकि उनके ज़रिए और पैसा बनाया जा सकता है।”

आगे अरुण जेटली इस पूरे नेक्सस की बारीकी बताते हुए लिखते हैं, “पोलिटिकल इक्विटी के कारण आपकी पैठ बनती है। इसके कारण आप बाहर से भीतर के निर्णयों को प्रभावित कर सकते हैं। जब इनका खुलासा होता है तो इसका लाभ उठाने वाले लोग ‘बिजनेस करने की चतुराई’ के नाम पर छुप जाते हैं। अगर कॉन्ग्रेस पार्टी द्वारा पैसा बनाने के तरीक़ों की फोरेन्सिक जाँच हो तो तथ्य अपने आप ही सामने आकर बोलेंगे। शीशे के घरों में रहने वालों को दूसरों के घर पर पत्थर नहीं फेंकना चाहिए।”

अरुण जेटली के ब्लॉग का स्क्रीनशॉट

इससे पहले भाजपा सहित उनके कई नेताओं ने ऑपइंडिया के इस ख़ुलासे का ज़िक्र करते हुए राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस को आड़े हाथों लिया। स्मृति ईरानी ने इस पर बात करते हुए प्रेस कॉन्फ़्रेंस में कहा कि बीते चौबीस घंटों में इस ख़ुलासे ने दिखा दिया है कि गाँधी-वाड्रा परिवार के लिए भ्रष्टाचार एक पारिवारिक उद्यम है।

OpIndia के खुलासे के बाद ‘जीजा-साले’ पर बरसी BJP

ऑपइंडिया ने कुछ संदिग्ध भूमि सौदों के माध्यम से राहुल गाँधी को संजय भंडारी से जोड़ने वाली जानकारी मीडिया में पहुँचाने के बाद कॉन्ग्रेस के गलियारों में हड़कंप का माहौल देखने को मिल रहा है। OpIndia के खुलासे के बाद केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने बुधवार (मार्च 13, 2019) को कॉन्ग्रेस को जमकर घेरा। भाजपा ने आज दावा किया कि 70 सालों में संस्थागत भ्रष्टाचार कॉन्ग्रेस की देन रहा है और पिछले 24 घंटों में समाचार माध्यमों से सामने आए तथ्य दर्शाते हैं कि कैसे गाँधी-वाड्रा परिवार ने पारिवारिक भ्रष्टाचार को परिभाषित किया है।

केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर गाँधी परिवार के जमीन घोटाले की बात मीडिया के सामने रखी। इसमें राहुल गाँधी, उनके जीजा जी रॉबर्ट वाड्रा और श्रीमति प्रियंका गाँधी वाड्रा का नाम भी शामिल है। स्मृति ईरानी ने कहा कि जीजा जी के साथ साले साहब भी भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। केंद्रीय मंत्री ने कॉन्ग्रेस पर ‘फैमिली पैकेज भ्रष्टाचार’ करने का आरोप लगाया। स्मृति ईरानी ने कहा कि गाँधी परिवार ने भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया है। एचएल पाहवा के यहाँ पर ED की रेड में राहुल गाँधी के नाम के दस्तावेज पाए गए।

केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने संवाददाताओं से कहा कि पूर्ववर्ती सरकार में रक्षा से संबंधित सौदे और पेट्रोलियम संबंधित सौदे में संजय भंडारी और सीसी थंपी के तार जुड़े हैं। स्मृति ईरानी ने जोर दिया कि रॉर्बट वाड्रा के खिलाफ जाँच जारी है और मीडिया में जो रिपोर्ट आ रही है, उसमें मिसेज वाड्रा यानी प्रियंका गाँधी का उल्लेख भी मिलता है।

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी कॉन्ग्रेस और राहुल गाँधी के विस्तृत परिवार पर हुए इस खुलासे को लेकर कहा कि पैसा बनाने के लिए इस परिवार के लोग नए तरीके अख्तियार करते रहते हैं, “जबकि कई लोग घूस आदि जैसे पारम्परिक तरीके से भ्रष्टाचार के रास्ते अपनाते रहे हैं, इस परिवार ने नया तरीक़ा इजाद किया है। ‘व्हीलर डीलर्स’ और ‘फ्लाय बाय नाइट ऑपरेटर्स’ होने के कारण आपको ‘स्वीटहार्ट डील्स’ पाने के योग्य पाया जाता है। बस थोड़े से निवेश के साथ, कुछ लोगों के लिए बहुत बड़े फ़ायदे का रास्ता बनाया जाता है क्योंकि उनके ज़रिए और पैसा बनाया जा सकता है।”

सहयोगी दलों को साथ रखने की कला जानते हैं मोदी-शाह, कॉन्ग्रेस की एकता बस मंचों तक ही सीमित

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गठबंधन धर्म में विश्वास रखते हैं। किसी के व्यवहार इसी बात से लगाया जाता है कि वे अपने से छोटों के साथ कैसा बर्ताव करते हैं। कोई आपसे उम्र में छोटा हो सकता है, कोई पद में, कोई प्रसिद्धि में और राजनीतिक दलों के मामले में संख्याबल यह तय करता है कि कौन छोटा और कौन बड़ा। स्पष्ट है कि विश्व की सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते भाजपा सबसे बड़ी है, राजग में भी बड़े भाई की भूमिका में है। जहाँ कॉन्ग्रेस हर एक राज्य में गठबंधन बनाने के लिए तरस रही है, भाजपा ने सभी राज्यों में लगभग अपना गठबंधन फाइनल कर लिया है।

नरेंद्र मोदी को हिटलर और तानाशाह कहने वाले विपक्षी दल एक-दूसरे से ख़ुश नहीं हैं और पल-पल पाला बदल रहे हैं जबकि मोदी सभी गठबंधन साथियों को मिला कर आगामी लोकसभा चुनाव की रणभेड़ी बजा चुके हैं। चाहे वो दूर दक्षिण में तमिलनाडु हो या उत्तर-पूर्व में असम, चाहे वो दिल्ली से सटा उत्तर प्रदेश हो या सिख बहुल पंजाब- भाजपा ने हर जगह बिना किसी लाग-लपेट के नया गठबंधन बनाया है और पुराने साथियों को छिटकने से रोका है।

केजरीवाल दिल्ली में कॉन्ग्रेस के साथ गठबंधन करने का सपना देख रहे। कॉन्ग्रेस उन्हें ठुकरा रही। राहुल गाँधी को यूपी के महागठबंधन में एक भी सीट नहीं मिली। बिहार में पेंच फँसा हुआ है। ये कैसे मिला कर चलने वाले नेता हैं जो मंच पर तो एक साथ दिखते हैं लेकिन परदे के पीछे एक-दूसरे को नीचा दिखाने में लगे रहते हैं। भाजपा को अलोकतांत्रिक और तानाशाही पार्टी बताने वालों को उनसे सीखना चाहिए कि गठबंधन साथियों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है। यहाँ हम भाजपा द्वारा किए गए कुछ महत्वपूर्ण गठबंधनों के बारे में बात कर बताएँगे कि कैसे राजग इस फ्रंट पर सबसे ऊपर नज़र आ रहा है। मोदी-शाह की जोड़ी ने जो किया है, उस से आगामी चुनाव में स्वतः ही उनका पलड़ा भारी हो गया है।

अन्नाद्रमुक को मना कर तमिलनाडु में विजयकांत को जोड़ा

2011 से 2016 तक तमिलनाडु में विपक्ष के नेता रहे अभिनेता विजयकांत की बात द्रमुक और अन्नाद्रमुक, दोनों पार्टियों से चल रही थी। उनकी पार्टी डीएमडीके 2014 में राजग का हिस्सा थी लेकिन 2016 तमिलनाडु विधानसभा चुनावों में उसने वामपंथी संगठनों के साथ गठबंधन किया और अधिकतर सीटों पर उसके उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई। 2011 में तमिलनाडु विधानसभा में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी रही डीएमडीके को 2016 में एक भी विधानसभा सीट नहीं मिली। ऐसी स्थिति में राज्य की सत्ताधारी पार्टी अन्नाद्रमुक के साथ गठबंधन कर भाजपा को निश्चिंत हो जाना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ। भाजपा ने अन्नाद्रमुक से साफ़-साफ़ कह दिया कि डीएमडीके कितनी भी छोटी पार्टी हो, उसे गठबंधन में लेना चाहिए। अन्नाद्रमुक के नेताओं के कई बार खुलेआम कहा कि वे विजयकांत के साथ इतने मोलभाव नहीं कर सकते लेकिन भाजपा के दबाव के कारण मज़बूरी में उन्हें ऐसा करना पड़ रहा है।

अंततः विजयकांत की पार्टी को 4 सीटें देकर मना लिया गया और तमिलनाडु में भाजपा को एक और गठबंधन सहयोगी मिल गया। यह दिखाता है कि भाजपा ने 37 सांसदों वाली लोकसभा में देश की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी अन्नाद्रमुक के साथ रहते तमिलनाडु में एक छोटे दल को आदर दिया, वो भी उसकी पुरानी गलती को भूल कर। डीएमडीके वामपंथियों के साथ चली गई थी और भाजपा के पास उस से नाराज़ होने के कई वजह थे लेकिन भाजपा ने सब भूल कर डीएमडीके को अपनाया। यह प्रधानमंत्री की सबको साथ लेकर चलने की नीति को स्पष्ट करता है।

गालियाँ खा कर भी महाराष्ट्र में शिवसेना और यूपी में राजभर को साथ बनाए रखा

महाराष्ट्र में भाजपा के लिए संकट खड़ा हो गया था। शिवसेना सालों से पार्टी पर हमलावर थी। यहाँ तक कि शिवसेना, उसके नेताओं और पार्टी के मुखपत्र सामना ने प्रधानमंत्री मोदी को कई बार निशाना बनाया। जिस तरह से शिवसेना के टुच्चे नेता भी मोदी को लेकर अनाप-शनाप बक रहे थे, भाजपा की उसके साथ गठबंधन न होने की उम्मीद थी। शिवसेना ने सरकार की हर योजना की आलोचना की, गठबंधन तोड़ने की धमकी दी और कई बार तो संसद तक में सरकार का साथ नहीं दिया। लेकिन, देवेंद्र फडणवीस और नितिन गडकरी ने काफ़ी शांति से मैच्युरिटी का परिचय देते हुए न सिर्फ़ गठबंधन बचाया बल्कि शिवसेना को मना कर सीटों की संख्या भी फाइनल कर ली। हाँ, गडकरी ने शिवसेना नेताओं को पीएम के ख़िलाफ़ अपशब्द न बोलने की चेतावनी ज़रूर दी।

अगर कॉन्ग्रेस की सहयोगी पार्टी एनसीपी उसे इस तरह गालियाँ देनी शुरू कर दे और हर एक मंच से पवार सोनिया गाँधी की आलोचना करने लगे तो शायद ही महाराष्ट्र में कॉन्ग्रेस-राकांपा का गठबंधन हो। भाजपा और कॉन्ग्रेस में यही अंतर है।

इसी तरह सुहेलदेव समाज के नेता सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओपी राजभर ने योगी कैबिनेट का हिस्सा होकर भी सीएम योगी और पीएम मोदी की ख़ूब आलोचना की। राजभर ने ऑपइंडिया से बात करते हुए कहा भी था कि वह अपने नेता स्वयं हैं। योगी को भी अक्सर तानाशाह बताने की कोशिश की जाती है लेकिन न सिर्फ यूपी में राजभर के सुर बदल गए बल्कि उन्होंने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने का फिर से संकल्प लिया। इस पार्टी के उम्मीदवारों का जमानत जब्त कराने का पुराना इतिहास रहा है और न तो यूपी में योगी को उनकी ज़रूरत है और न केंद्र में मोदी को (एसबीएसपी के 4 विधायक व शून्य सांसद हैं), लेकिन फिर भी राजग ने उन्हें छिटकने नहीं दिया। यह दर्शाता है कि भाजपा छोटे दलों के साथ भी अच्छी तरह पेश आती है।

असम में एजीपी को 2 महीने में ही वापस मना लिया

असम में भाजपा और बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट मिल कर बहुमत की स्थिति में हैं। 128 सदस्यों वाली विधानसभा में अकेले भाजपा के 61 विधायक हैं। एक निर्दलीय भी है। अगर सरकार की स्थिति को देखें तो मुख्यमंत्री सर्बानंद सोणोवाल को अपनी सरकार बचाने या चलाने के लिए असम गण परिषद (एजीपी) की कोई ज़रूरत नहीं है। नागरिकता संशोधन विधेयक भाजपा के ड्रीम प्रोजेक्ट्स में से एक है और इसके विरोधियों को भाजपा करारा जवाब देती आई है। एजीपी ने भी इसी विधेयक को लेकर असम सरकार से समर्थन वापस ले लिया और अपने मंत्रियों को भी इस्तीफा दिला दिया। पार्टी के पास एक भी लोकसभा सांसद नहीं है। 2 महीने पहले राजग से छिटके एजीपी को आज बुधवार को भाजपा ने फिर अपने खेमे में मिला लिया।

एजीपी अध्यक्ष अतुल बोरा ने इस अवसर पर साफ़-साफ़ कहा कि वे भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के निवेदन के कारण पार्टी में वापस आए हैं। अगर भाजपा का शीर्ष नेतृत्व सुदूर असम में एक सांसदों वाली पार्टी से भी स्वयं निवेदन करती है, यह एक बड़ी पार्टी की सौहार्दता और विनम्रता को दिखाता है। यह दिखाता है कि कैसे भाजपा सहयोगी पार्टियों की गलतियों को भी भूल जाती है और गठबंधन के लिए किसी भी प्रकार की रंजिश को आड़े नहीं आने देती।

बिहार में जदयू-लोजपा और पंजाब में अकाली दल

रामविलास पासवान मौसम वैज्ञानिक माने जाते हैं। उनकी पार्टी को मनाने के लिए भाजपा को ख़ास मेहनत करनी पड़ी। पासवान की पार्टी लोजपा से गठबंधन बचाने के लिए स्वयं अमित शाह ने कई राउंड की बैठकें की और अंततः सीटों की साझेदारी फाइनल की गई। ख़ुद नितीश कुमार लोजपा को अपने हिस्से की सीटें देने को तैयार नहीं थे लेकिन भाजपा ने जदयू को भी समझा-बुझा कर रखा और लोजपा अध्यक्ष ने मोदी को पीएम बनाने का संकल्प लिया। जिस तरह से जदयू को भाजपा से सहर्ष स्वीकार किया, वो भी एक राजनीतिक पार्टी की परिपक्वता को दिखाता है। भाजपा के धुर विरोधी लालू परिवार को राजनीती में पुनर्स्थापित करने वाले नितीश कुमार की राजग में धमाकेदार वापसी हुई और भाजपा ने सभी रंजिश भुला कर गठबंधन बनाया।

नरेंद्र मोदी और नितीश कुमार

इसी तरह पंजाब में शिरोमणि अकाली दल को ले लीजिए। अकाली दल भाजपा की सबसे पुरानी सहयोगियों में से एक है और विपक्ष द्वारा हिन्दुओं की पार्टी कही जाने वाली भाजपा के सिखों की इस पार्टी के साथ जैसे सम्बन्ध हैं, वैसे कॉन्ग्रेस के शायद ही उसकी किसी सहयोगी पार्टी से हो। कर्नाटक में रोंदू कुमारस्वामी के साथ कैसा गठबंधन चल रहा है, यह किसी से छिपा नहीं है। बजट सेशन के पहले दिन अकाली दल ने राजग की बैठक में हिस्सा नहीं लिया। भाजपा ने समय रहते गठबंधन सुनिश्चित किया और पहले की तरह ही पंजाब में दोनों साथ चुनाव लड़ेंगे। इसी तरह कुल मिला कर देखें तो राजग में इस बार 2014 के मुक़ाबले ज्यादा पार्टियाँ हैं।

कुल मिलाकर देखें तो जिसे ‘तानाशाह’ कहा जाता है, वो सबको मिला कर चल रहा है, सहयोगियों की आलोचनाओं को भी बर्दाश्त कर रहा है और नए सहयोगी भी जोड़ रहा है। लेकिन, जो मंच पर हाथ मिला कर और हाथ उठा कर साथ होने का दावा करते हुए कोलकाता से बंगलोर तक फिर रहे थे, वे एक-दूसरे की पीठ में छुरा घोप कर अलग-अलग डील फाइनल कर रहे हैं। विडम्बना भी इसे दख घूँघट से अपना सर ढक ले।

भेड़ का मांस कहकर खिला दिया गोमांस, युवक ने मांगा भारत आने-जाने का खर्च

एक हिन्दू कितना धर्मपरायण हो सकता है इसकी बानगी देखने को मिली विश्व के दक्षिणी कोने में स्थित न्यूज़ीलैंड में। वहाँ एक युवक को सुपरमार्केट वालों ने भेड़ का मांस कहकर बीफ अर्थात गोमांस खिला दिया

हुआ यह कि न्यूजीलैंड के साउथ आइलैंड में रहने वाले जसविंदर पाल एक सुपरमार्केट में गए और उन्होंने मांसाहार मांगा। उन्होंने ब्लेनहाइम काउंटडाउन मार्केट से लैंब मीट (भेड़ का मांस) खरीदा। लेकिन खाने पर पता चला कि वह गाय का मांस था। जब परिवारवालों को पता चला तो उन्होंने जसविंदर से बात करना तक बंद कर दिया।

हिन्दू धर्म में गाय को पवित्र माना जाता है और गोवंश को मारना भी पाप है। इसलिए क्षुब्ध होकर अब जसविंदर भारत आकर संतों से अपनी शुद्धि करवाना चाहते हैं। शुद्धि में चार छः हफ्ते का समय लग सकता है।

जसविंदर का कहना है कि जब उनके साथ हुए धोखे का अहसास हुआ तो वे सुपरमार्केट हर्जाना मांगने पहुंचे। वहाँ कर्मचारियों ने उनसे माफी मांगते हुए 200 डॉलर का एक गिफ्ट वाउचर ऑफर किया। लेकिन जसविंदर ने इसे लेने से इनकार कर दिया और भारत आने-जाने की फ्लाइट का खर्च मांग लिया।

जसविंदर न्यूज़ीलैंड में छोटा सा बिज़नेस चलाते हैं इसलिए भारत आने जाने का खर्च उठाने में अक्षम हैं। जसविंदर ने सितंबर 2018 में मांस खरीदा था और वे पिछले पाँच महीने से भारत आकर शुद्धि करवाने का प्रयत्न कर रहे हैं।

कॉन्ग्रेस ने स्वीकारी राहुल गाँधी के जमीन सौदे की बात, पर पाहवा-भंडारी लिंक पर अभी भी चुप

केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी की प्रेस वार्ता के बाद आखिरकार कॉन्ग्रेस ने राहुल गाँधी द्वारा की गई जमीन की डील को स्वीकार कर लिया गया है, लेकिन पार्टी अभी तक भी जमीन विक्रेता एचएल पाहवा और संजय भंडारी के बीच सम्बन्ध को लेकर चुप है।  

आज सुबह (मार्च 13, 2019) स्मृति ईरानी ने OpIndia द्वारा किए गए खुलासे के आधार पर कहा, “एक समाचार सूत्र के माध्यम से राष्ट्र को जानकारी मिली है कि एचएल पाहवा नाम के एक व्यक्ति के यहाँ ED की रेड में उसके पास से राहुल गाँधी के साथ लेनदेन के दस्तावेज मिले हैं। जमीन की खरीददारी से संबंधित इन दस्तावेजों से ये बात सामने आई कि एचएल पाहवा के साथ राहुल गाँधी के आर्थिक संबंध हैं।”

इस अनौपचारिक नोट के अनुसार, वर्ष 2008 में राहुल गाँधी द्वारा जमीन खरीदने के बाद वर्ष 2012 में राहुल गाँधी ने प्रियंका वाड्रा को जमीन गिफ्ट की थी। यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि 2008 से 2012 की अवधि में, हथियार डीलर संजय भंडारी कॉन्ग्रेस सरकार के तहत सक्रिय रूप से अपने ‘बिज़नेस’ के लिए वापसी कर रहे थे और दसाँ (Dassault) के ऑफ-सेट पार्टनर बनने के लिए सक्रिय रूप से प्रयास भी कर रहे थे। दसाँ ने संजय भंडारी के ऑफ-सेट पार्टनर बनने के प्रस्ताव को खारिज कर दिया था।

हालाँकि, भूमि सौदे को स्वीकार करते हुए, कॉन्ग्रेस ने राहुल गाँधी को भूमि के विक्रेता एचएल पाहवा के साथ संबंधों पर चुप्पी ही साध रखी है। एचएल पाहवा ने रॉबर्ट वाड्रा और प्रियंका गाँधी वाड्रा को भी जमीन बेची थी। OpIndia ने अपनी रिपोर्ट में खुलासा किया था कि किस तरह से इस जमीन को बाद में एचएल पाहवा द्वारा रॉबर्ट वाड्रा और प्रियंका गाँधी वाड्रा को एक बढ़ी हुई कीमत पर वापस बेच दिया गया था। असल में एचएल पाहवा ने भुगतान के लिए सीसी थम्पी से पैसे उधार लिए थे, जिसके पास हथियार डीलर संजय भंडारी के साथ कई वित्तीय सौदे हुए हैं।

संयोगवश, कॉन्ग्रेस द्वारा की गई इस बेकार प्रतिक्रिया ने राहुल गाँधी को लेन-देन की इस प्रक्रिया को और भी जटिल बना दिया है। इस लेन-देन की प्रक्रिया की ‘व्याख्या’ करने की कोशिश करते हुए राहुल गाँधी ने परिवार और पाहवा की भूमिका को और अधिक स्पष्ट कर दिया है। रॉबर्ट वाड्रा की पत्नी प्रियंका गाँधी वाड्रा ने भी पाहवा से ज़मीन खरीदी थी और उसे वापस ऊँचे दामों पर बेच दिया था। अब कॉन्ग्रेस  ने स्वीकार किया है कि भूमि को राहुल गाँधी ने एचएल पाहवा से खरीदा था और प्रियंका गाँधी वाड्रा को उपहार में दिया था।

इस पुरे काण्ड में राहुल गाँधी के एचएल पाहवा, सीसी थम्पी और संजय भंडारी के बीच लिंक के विवाद पर अभी भी बयान नहीं दिया गया है। एक और सवाल यह भी उठता है कि आखिर कॉन्ग्रेस के युवा अध्यक्ष राहुल गाँधी इन जमीनों सौदों की फंडिंग किस तरह से कर रहे हैं?

एंटी-बिहारी-यूपी भाषण देकर आपने तालियाँ बटोरी लेकिन यह कॉन्ग्रेस की कब्र खोद डालेगी राहुल G

चेन्नई का स्टेला मैरिस कॉलेज। मद्रास यूनिवर्सिटी से संबद्ध लेकिन ऑटोनमस। कैथोलिक संस्था से जुड़ा हुआ। उच्चतर शिक्षा में सिर्फ लड़कियों के लिए बहुत प्रसिद्ध। यहीं कॉन्ग्रेस अध्यक्ष और ‘युवा नेता’ (जो उन्होंने खुद कहा) आज मतलब 13 मार्च को गए हुए थे। लोकसभा चुनावों के मद्देनज़र राहुल गाँधी के लिए दक्षिण भारत की यह पहली यात्रा है। युवा वोटरों से कॉलेज कैंपस में उन्होंने दिल खोलकर बात की। हँसते-टहलते सारे सवालों का जवाब दिया।

शुरुआत में ही उन्होंने कॉलेज की छात्राओं को सरल नहीं बल्कि कठिन सवाल पूछने की सलाह दी थी। छात्राओं ने भी बखूबी उनका मान रखा। राफेल, मोदी, बीजेपी आदि जैसे जिन मुद्दों पर राहुल गाँधी की ‘अच्छी’ पकड़ है, उन पर उन्होंने ‘शानदार’ जवाब दिए और खूब तालियाँ भी बटोरी। लेकिन विदेश से पढ़े होने के कारण जिन देशी मुद्दों से वो आजीवन अछूते रहे, उन सवालों पर डगमगा गए और फिर से अपने ‘चिर-परिचित’ नाम को सार्थक कर दिया।

पूरा वीडियो अगर आप देखेंगे तो लगभग 37 मिनट 50 सेकंड पर खुशी नाम की छात्रा ने राहुल गाँधी से एक सवाल किया – comment on women about inequality and discrimination and how women will be benefited (महिलाओं को लेकर असमानता और भेदभाव के बारे में अपनी टिप्पणी दें और यह भी बताएँ कि महिलाओं को कैसे लाभान्वित किया जाएगा)। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष ने इस सवाल का जवाब लगभग ढाई मिनट (40:35) तक दिया। और इसी ढाई मिनट में उन्होंने कुछ ऐसा कह दिया, जो नहीं कहा जाना चाहिए था। नहीं कहा जाना चाहिए था क्योंकि सवाल में कहीं भी बिहार-उत्तर प्रदेश नहीं था, फिर भी उन्होंने इसे जबरन घुसाया। क्यों? सिवाय राहुल के शायद ही कोई जान पाए। जो पूरा वीडियो नहीं झेल सकते हैं, उनके लिए सिर्फ वो हिस्सा भी है, जहाँ कॉन्ग्रेस अध्यक्ष ने बिहार-यूपी का जिक्र किया है।

अंग्रेजी नस्ल की मानसिकता

सत्ता की आजादी तो 47 में ही मिल गई पर मानसिक आजादी शायद कॉन्ग्रेस को आज तक नहीं मिली है। ‘फूट डालो और शासन करो’ की नीति तो अंग्रेजों की थी। लेकिन उसे ढोते-ढोते दक्षिण भारत बनाम उत्तर भारत कर देना तो कोई कॉन्ग्रेस से ही सीख सकता है। और राहुल गाँधी तो ठहरे खैर इसके अध्यक्ष ही। इसलिए खुशी को जवाब देते हुए बोल गए कि उत्तर भारत में महिलाओं की स्थिति दक्षिण के महिलाओं के मुकाबले बहुत खराब है। बिहार और उत्तर प्रदेश की महिलाओं की स्थिति तो और भी दयनीय है। इसके बाद वो पॉलिटकली करेक्ट होते हुए आदर्शवाद की बातें करने लगे कि महिलाएँ पुरुषों से कम नहीं… 2019 में आरक्षण दूँगा और फलान-ढिमकान!

उत्तर बनाम दक्षिण वाली बात अगर एक बार होती तो शायद उसे जुबान का फिसलना मान कर माफ़ किया जा सकता था। लेकिन नहीं। राहुल ने बहुत ही शातिराने और राजनीति से प्रेरित होकर यह बात कही। कैसे? वीडियो के 52:50 मिनट से 54:35 मिनट तक का हिस्सा सुनिए। यहाँ सुष्मिता नाम की एक छात्रा को राहुल हेलो बोलकर उसका सवाल सुने बिना ही एक मिनट तक कुछ और ही बोलते रहे। फिर सुष्मिता को सॉरी बोल कर सवाल सुना। उसने पूछा – South India is going to play a major role for making government in 2019. If you come to power, what do you plan to do for the South India? (2019 में केंद्र में सरकार बनाने में दक्षिण भारत एक बड़ी भूमिका निभाने जा रहा है। अगर आप सत्ता में आते हैं, तो दक्षिण भारत के लिए क्या करने की योजना है)? इस पर एक बार फिर कॉन्ग्रेस अध्यक्ष ने उत्तर भारत बनाम दक्षिण भारत का राग छेड़ा। मोदी सरकार को उत्तर भारत की ओर ज्यादा ध्यान देने वाला बताया और खुद को ‘संपूर्ण भारत, एक भारत’ का समर्थक।

अध्यक्ष महोदय ही जब उत्तर-दक्षिण की बातें करने लगे तो छुटभैये नेता तो लाठी लेकर खड़े होंगे ही। ऐसा ही एक टटपुंजिया नेता (विधायक) है- अल्पेश ठाकोर। पिछले साल गुजरात के साबरकांठा जिले में एक बच्ची से बलात्कार के बाद राज्य में उत्तर भारतीयों, खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों पर स्थानीय लोगों ने हमले किए थे। इस घटना के बाद वहाँ से इन दोनों राज्यों के लोगों का पलायन भी हुआ था।

जब टूटा था ‘दुर्गा’ का दंभ

सांसद अटल बिहारी वाजपेयी ने पाकिस्तान से 1971 में मिली जीत पर तब देश की प्रधानमंत्री को दुर्गा का प्रतीक बताया था। लेकिन शायद वाजपेयी को भी नहीं पता होगा कि प्रतीक स्वरूप कहे गए शब्द को वह सच मान लेंगी और खुद को राजनीति का भी ‘दुर्गा’ मान बैठेंगी। पर हुआ वही। 77 आते-आते इंदिरा ने खुद को दुर्गा मान लिया था – अपराजेय दुर्गा। 77 में ही इस ‘अपराजेय दु्र्गा’ को जयप्रकाश नाम के एक ‘बिहारी’ ने बिहार के ही ऐतिहासिक गाँधी मैदान से ललकारा था और तोड़ा था ऐसा दंभ, जिसे राजनीतिक इतिहास में शायद ही कभी भुलाया जा सकेगा। लेकिन राहुल गाँधी चूँकि विदेश से पढ़े हैं इसलिए अपनी दादी की कहानी से शायद वाकिफ नहीं होंगे।

दादी से थोड़ा आगे बढ़ें तो राहुल गाँधी के पिताजी भी कोई कम बड़े राजनेता नहीं थे। वजह चाहे भी जो भी रहा हो लेकिन 415 सांसदों के साथ प्रधानमंत्री बनने का सपना तो वर्तमान परिस्थिति में शायद मोदी भी न देख पाएँ। लेकिन राजीव गाँधी और कॉन्ग्रेस पार्टी ने यह करिश्मा कर दिखाया था। लेकिन 1989 आते-आते हुआ क्या? वीपी सिंह और चंद्रशेखर (दोनों ही उत्तर प्रदेश के लाल) ने राजीव गाँधी की सत्ता को पलट दिया था।

समस्याएँ तो हैं…

महिलाओं को लेकर बिहार में समस्याएँ तो हैं। कोई शक नहीं। लेकिन क्यों? कभी सोचा राहुल गाँधी आपने? मैं बताता हूँ। समस्याएँ हैं क्योंकि आपकी पार्टी ने सबसे अधिक समय तक बिहार में राज किया। राज किया मतलब सच में सिर्फ राज ही किया। थोड़ा सा भी काज करते तो महिलाओं की स्थिति जो एक सामाजिक समस्या है, को जरूर सुधार पाते। क्योंकि यह सुधरता है शिक्षा से, साक्षरता से, साधन से, संसाधन से… लेकिन इसके लिए कॉन्ग्रेस में आपके बाप-दादाओं (राजनीतिक तौर पर प्रतीक स्वरूप, सच में मत समझ लीजिएगा) को काज करना पड़ता, जो उनसे शायद संभव ही नहीं था।

डेटा स्रोत : मैप्स ऑफ इंडिया

इसलिए हे राहुल गाँधी! अगर सत्ता किसी भी हाल में चाहिए तो केजरीवाल बन जाइए। बीजेपी के साथ जुड़ जाइए। वो मना कर दे तो दोबारा कोशिश कीजिए। न सुने तो गिड़गिड़ाइये। लेकिन आपको खुदा का वास्ता! कृपया इस देश को उत्तर-दक्षिण में मत बाँटिए।

नई राजनीति: आत्ममुग्ध बौने ने पूछा, ‘तुम होते कौन हो, तुम्हारे बाप की दिल्ली है?’

अरविन्द केजरीवाल को जब उनके पूर्व सहयोगी कुमार विश्वास ने आत्ममुग्ध बौना कहा था तो किसी ने सोचा नहीं होगा कि केजरीवाल उन्हें सच साबित करने के लिए किस हद तक जाएँगे। आज दिल्ली से सांसद और दिल्ली भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी पर मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने राजनीति के पिछले सभी कीर्तिमान ध्वस्त करते हुए गंभीर अपमानजनक टिप्पणी कर डाली।

जनता को नई वाली राजनीति का वायदा करने के बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री बने आम आदमी पार्टी के अध्यक्ष अरविन्द केजरीवाल ने मनोज तिवारी को संबोधित करते हुए कहा, “तुम होते कौन हो, तुम्हारे बाप की दिल्ली है?”

दिल्ली में एक जनसभा के दौरान अरविंद केजरीवाल ने कहा कि गुजरात, आंध्र, बिहार सब जगह मुख्यमंत्रियों ने धरना दिया, इन राज्यों को भी आधा बना दो। इससे आगे उन्होंने मनोज तिवारी को संबोधित करते हुए कहा, “तुम होते कौन हो दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने वाले। तुम्हारे बाप की दिल्ली है?” सोशल मीडिया पर आजकल ‘आत्ममुग्ध बौने’ नाम से प्रचिलित अरविन्द केजरीवाल ने साथ ही ये भी कह डाला कि मनोज तिवारी के पिता जी ने धरना नहीं दिया था।

बता दें कि हाल ही में मनोज तिवारी ने कहा था कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं दिया जाना चाहिए, क्योंकि ऐसा होने से देश के संघीय ढांचे के लिए खतरा साबित हो सकता है।

कॉन्ग्रेस के सामने लगातार गिड़गिड़ाने के बाद भी कॉन्ग्रेस द्वारा केजरीवाल की गठबंधन की माँग स्वीकार न किए जाने के कारण बौखलाए केजरीवाल ने आज भाजपा अध्यक्ष अमित शाह पर भी आपत्तिजनक टिप्पणी कर डाली केजरीवाल ने अगले ट्वीट में लिखा, “अमित शाह पूरी गुंडागर्दी पर उतरा हुआ है। अमित शाह के इशारे पर दिल्ली पुलिस हमारे कॉल सेंटर बंद करने की धमकी दे रही है। लाखों ज़िंदा लोगों के वोट काट दिए गए, हमने उन लोगों के वोट बनवाए, इसमें कौन सा गुनाह है? और पकड़ना है तो हमें पकड़ो, कॉल सेंटर को धमकी क्यों दे रहे हो?”

केजरीवाल ने अगले ट्वीट में लिखा, “आज सुबह हमारे दो कॉल सेंटर पर अमित शाह ने दिल्ली पुलिस कीं रेड कराई। अब सारे काल सेंटर के मालिकों को थाने बुलाकर धमकाया जा रहा है। कहा जा रहा है कि आम आदमी पार्टी का काम बंद कर दो। अमित शाह, ऐसे चुनाव लड़ोगे? कॉल सेंटर वालों को क्यों तंग कर रहे हो? हिम्मत है तो हमें गिरफ़्तार करो।”

अरविन्द केजरीवाल अब चुनाव के मौसम में अपना धैर्य खोते दिखने लगे हैं। लेकिन अरविन्द केजरीवाल से पहले परेश रावल भी शब्दों की मर्यादा भूलकर कह चुके हैं कि अरविन्द केजरीवाल जूते के लायक हैं

कश्मीर में ‘रिलिजियस आइडेंटिटी’ पर नहीं, तुम्हारी राजनैतिक थेथरई पर खतरा है

जब से NIA ने अलगाववादी मीरवाइज़ उमर फ़ारूक़ पर शिकंजा कसा है तब से कश्मीर में मज़हबी तंज़ीमों ने हल्ला करना शुरू कर दिया है। खबर है कि शिया सुन्नी सलाफ़ी सूफ़ी सब अपनी दुश्मनी भुलाकर सरकार के विरोध में खड़े हो गए हैं। मीरवाइज़ की हिम्मत इतनी बढ़ी हुई है कि उसने जाँच एजेंसी के सम्मुख उपस्थित होने से ही मना कर दिया।

इस प्रकरण के बीच महबूबा मुफ़्ती का कहना है कि NIA द्वारा मीरवाइज़ उमर फ़ारूक़ को समन जारी किया जाना कश्मीर की ‘रिलिजियस आइडेंटिटी’ पर हमला है। हालाँकि यह भी सच है कि मीरवाइज़ पर केस पीडीपी-बीजेपी गठबंधन सरकार के समय ही दर्ज़ हुआ था। इसलिए महबूबा के घड़ियाली ऑंसू मौकापरस्त राजनीति से अधिक कुछ भी नहीं हैं।

ध्यान देने वाली बात यह है कि आज सभी कश्मीरी नेताओं को अपनी रिलिजियस आइडेंटिटी खोने का खतरा सता रहा है। यह सिद्ध करता है कि आज तक कश्मीर में नेताओं ने मज़हबी राजनीति ही की है। फिर चाहे वह 1963 में हज़रतबल दरगाह से बाल गायब होने के बाद तत्कालीन मीरवाइज़ मौलवी फ़ारूक़ और ख्वाजा शम्सुद्दीन द्वारा की गई राजनीति हो या सलमान रूश्दी की किताब के विरोध में की गई हिंसा। विक्टिम कार्ड हमेशा इस्लामी रिलिजियस आइडेंटिटी को लेकर ही खेला जाता है।

अपनी रिलिजियस आइडेंटिटी और श्रीनगर की जामिया मस्जिद का तीन सौ साल पुराना इतिहास याद करने वाले अलगाववादी नेता कश्मीरी पंडितों का 5000 साल पुराना इतिहास भूल जाते हैं। इन्हें हिन्दुओं की रिलिजियस आइडेंटिटी याद नहीं आती जब हरि पर्वत का नाम बदल कर कोह-ए-मारान और शंकराचार्य पहाड़ी का नाम बदल कर तख़्त-ए-सुलेमान रख दिया जाता है। इसी प्रकार अनंतनाग को इस्लामाबाद कहने की प्रथा चल पड़ी है। कश्मीर में स्थानों के हिन्दू नाम बदल कर इस्लामी आइडेंटिटी थोपने का काम वहाँ की सरकारों ने सोची समझी साजिश के तहत किया है।

राहुल पंडिता अपनी पुस्तक Our Moon Has Blood Clots में पुराने जमाने में पंडितों को जलील करने के तरीकों के बारे में लिखते हैं। कश्मीरी पंडित के सर पर मल से भरा घड़ा रख दिया जाता था और लड़के उसपर पत्थर मारते थे। शायद महबूबा मुफ़्ती को इन सबका ज्ञान नहीं इसीलिए वे अपनी कौम की रिलिजियस आइडेंटिटी की चिंता करती हैं लेकिन हिन्दू आइडेंटिटी भूल जाती हैं।

कश्मीर में इस्लामी रिलिजियस आइडेंटिटी पर खतरे की रट लगाने वाले यह भूल जाते हैं कि मार्तण्ड सूर्य मंदिर हिन्दू आइडेंटिटी का प्रतीक था जिसे इस्लामी शासक ने तोड़ा था। इसी प्रकार कश्मीर में स्वतंत्रता के बाद भी सैकड़ों मंदिर तोड़े गए जिनका कोई हिसाब नहीं। किसी स्थान की हिन्दू आइडेंटिटी को चरणबद्ध तरीके से मिटाना और उसके बाद अपनी आइडेंटिटी को लेकर दिनरात विक्टिम कार्ड खेलना थेथरई का अजब नमूना है।

कानून व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर देश ने कभी किसी रिलिजियस आइडेंटिटी को ऊपर नहीं माना है। क्या महबूबा मुफ़्ती यह भूल गईं कि एक मर्डर केस में कांची के शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती को आधी रात में पुलिस ने उठवा लिया था। उस समय यदि रिलिजियस आइडेंटिटी के नाम पर पूरे देश का हिन्दू समाज खड़ा हो जाता तो क्या होता इसकी कल्पना करना कठिन है।

किन्तु हिन्दू एक सहनशील कौम है इसलिए बार-बार उत्पीड़न होने पर भी शांत रहता है। राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में इंदिरा गाँधी ने स्वर्ण मंदिर में मिलिट्री ऑपरेशन करने की भी इजाज़त दे डाली थी। यदि उस समय सिख रिलिजियस आइडेंटिटी का ख्याल रखा जाता तो पंजाब में आतंकवाद और अलगाववाद कभी खत्म ही नहीं होता।    

कश्मीर में अलगाववादियों पर प्रतिबंध, गिरफ़्तारी और खाते सीज़ करने पर उठी बिलबिलाहट का ही नतीजा है कि आज महबूबा को रिलिजियस आइडेंटिटी याद आ रही है। उन्हें याद नहीं है कि पूरे जम्मू कश्मीर राज्य की रिलिजियस आइडेंटिटी मुस्लिम नहीं है, उसमें सिख, हिन्दू, बौद्ध, दरदी, बल्ती आदि भी सम्मिलित हैं।

बुर्के का विरोध करने वाली नसरीन को 38 साल की जेल, 148 कोड़ों की सजा

ईरान की मशहूर वकील को मुस्लिम महिलाओं के बुर्के ना पहनने वकालत करने के लिए 7 अलग-अलग मामलों में 33 साल की जेल और 148 कोड़े लगाने की सजा मिली है। अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त मानवाधिकार वकील नसरीन सोतेदेह को सोमवार (मार्च 11, 2019) को यह सजा सुनाई गई।

नसरीन पहले ही एक मामले में 5 साल की सजा काट रही हैं। इस तरह जेल की कुल सजा 38 साल हो गई है। नसरीन को यह सजा ईरान में विपक्षी कार्यकर्ताओं का केस लड़ने के आरोप में मिली है। इससे पहले 55 वर्षीय नसरीन ने इस्लामिक रिपब्लिक की तरफ से महिलाओं के लिए बुर्का अनिवार्य किए जाने का विरोध करने वाली महिलाओं का केस लड़ा था।

इन महिलाओं ने बिना सिर ढके अपना वीडियो बनाकर उसे सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दिया था। नसरीन के वकील ने कहा कि उनके मुवक्किल को पिछले साल जून में गिरफ्तार किया गया था। मानवाधिकार वकील नसरीन पर जासूसी, दुष्प्रचार करने और ईरान के शीर्ष नेतृत्व का अपमान करने का आरोप लगाया गया। इससे पहले, साल 2010 में नसरीन को दुष्प्रचार करने और देश की सुरक्षा को खतरे में डालने के आरोप में जेल भेजा गया था। हालाँकि, नसरीन ने इन आरोपों से इनकार किया था। 6 साल की सजा काटने के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया था।

मीडिया के अनुसार, तेहरान के रेवोल्यूशनरी कोर्ट के जज मोहम्मद मोकिश ने सोमवार को कहा कि 5 साल की सजा राष्ट्रीय सुरक्षा के खिलाफ एकजुट होने और 2 साल की सजा ईरान के शीर्ष नेता अयातुल्ला अली खामैनी का अपमान करने के अपराध में मिली है। नसरीन के पति रेजा खानदन Reza Khandan ने फेसबुक पर लिखा कि जेल की सजा और 148 कोड़ों की सजा बहुत कड़ी है। उन्होंने लिखा है कि नई सजा को मिलाकर 7 अलग-अलग मामलों 38 साल की सजा मिल चुकी है।

इससे पहले नसरीन को साल 2009 में व्यापक प्रदर्शन करने वाले लोगों का केस लड़ने के बाद 3 साल जेल में गुजारने पड़े थे। ईरान में मानवाधिकार पर संयुक्त राष्ट्र के जांचकर्ता जाविद रहमान ने सोमवार को जेनेवा में नसरीन का मामला उठाया । रहमान ने गिरफ्तारी, सजा, अनुचित व्यवहार के गलत तरीकों पर चिंता व्यक्त की थी। नसरीन को कई बड़े-बड़े मामलों की पैरवी करने के कारण यूरोपीय संसद साल 2012 में सखारोव मानवाधिकार पुरस्कार से सम्मानित कर चुकी है।

आतंक की फंडिंग की जाँच मज़हब में दखल कैसे बन गई?

अभी 24 घंटे भी नहीं बीते थे ‘कश्मीर समस्या’ की इस्लामिक वर्चस्ववादी गर्भनाल को रेखांकित किए हुए और प्रदेश भर के कठमुल्लों के गिरोह ने इस आकलन को सही साबित कर दिया।

शिया-सुन्नी, सलाफ़ी-सूफी का भेद भुलाकर घाटी भर के इस्लामी नेता, अलगाववादी संगठन हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के ‘नरमपंथी’ धड़े के नेता मीरवाइज़ उमर फ़ारुख को एनआइए के जाँच समन के खिलाफ़ इकट्ठे हो गए हैं। उनके मुताबिक कश्मीर में दहशतगर्दी और मौत के वीभत्स नाच के लिए पैसा कहाँ से आ रहा है, इसकी जाँच करना और इसी सिलसिले में जनाब उमर फ़ारुख जी से सवालात करने की हिमाकत घाटी के मज़हबी मामलों में दखलंदाज़ी है।

(आतंक के खिलाफ़ कदम उठाना मजहब के नेताओं के लिए उनके मज़हबी मुआमलों में दखल है, पर देहली की सत्ता के लिए आज भी न ही आतंकवादियों का कोई मज़हब है न ही आतंक का कोई रंग)

180 करोड़ या दुनिया की लगभग एक-चौथाई आबादी के इस्लामिक ‘उम्माह’ की 500 सबसे ताक़तवर शख्सियतों में शुमार उमर फ़ारुख ने अपनी जान को खतरे का हवाला देते हुए दिल्ली आने से मना कर दिया है और एनआइए से इल्तज़ा की है कि उनसे पूछताछ श्रीनगर में ही की जाए। इससे पहले आयकर विभाग और एनआइए ने उनके और उनकी अलगाववादी कौम के कई लीडरान के अड्डों पर इसी मामले के सिलसिले में छापेमारी की थी

हंगामा है क्यों बरपा

पुलवामा हमले के बाद केंद्र सरकार ने उमर फ़ारुख समेत हिंदुस्तान के खिलाफ़ विष-वमन करने वाले अलगाववादी नेताओं, जिनमें हिंदुस्तान के सेक्युलरिज्म को जम कर निचोड़ने के बाद भी उसे ही कश्मीर और इस्लाम के दुश्मन के रूप में निशाने पर रखने वाले सैयद अली शाह गीलानी शामिल हैं, की हिफ़ाज़त में लगे अपने जवान वापस बुला लिए थे।

उमर फ़ारुख केवल हुर्रियत के एक धड़े के मुखिया ही नहीं बल्कि श्रीनगर की जामा मस्जिद के भी सिरमौर हैं। उनको समर्थन देने के लिए घाटी की गालियों में जुटी भीड़, और उस भीड़ के दिलों में मौजूद नफ़रत, फिर एक बार चीख़-चीख़ कर बता रहीं हैं कि कश्मीर की समस्या राजनीतिक नहीं मज़हबी है।

श्रीनगर में 20 मज़हबी जमातों की मीटिंग में प्रस्ताव पारित किया गया कि यह (दहशतगर्दी के समर्थन के आरोप में उमर फ़ारुख को एनआइए की नोटिस) समुदाय विशेष के मज़हबी मुआमलों में सीधी दखलंदाज़ी है। मीरवाइज़ केवल एक सियासी राहनुमा नहीं बल्कि कश्मीर के लोगों के मज़हबी अगुआ भी हैं। उनके उत्पीड़न की हर कोशिश, जिसमें एनआइए की नोटिस भी शामिल है, की पुरज़ोर मुखालफ़त की जाएगी क्योंकि इससे सूबे की रिआया के जज्बातों को ठेस पहुँचती है।

इस प्रस्ताव को एक बार फ़िर से पढ़िए- और ध्यान से देखिए। समुदाय के मज़हबी अगुआ अपने आप पूरी घाटी और पूरे सूबे के मज़हबी लीडर हो गए- किसी ने जम्मू के हिन्दू डोगराओं से, लद्दाख के बौद्धों से, प्रदेश के मुट्ठी भर सिखों से नहीं पूछा कि जिस इस्लाम में उन्हें “काबिल-ए-क़त्ल” और “काफ़िर” कहा जाता है, उसके मज़हबी लीडर उमर फ़ारुख उनके लीडर कैसे हो गए!

दुर्भाग्यपूर्वक इस्लाम की यही सच्चाई है- जहाँ बहुसंख्यक इस्लामी हैं, वहाँ अल्पसंख्यकों की कोई गिनती ही नहीं है। कश्मीर की यह वही सोच है जो 1947 से पाकिस्तान की रही है- अल्पसंख्यक जब बराबरी के मानवाधिकार तक नहीं रखते तो काहे के राजनीतिक अधिकार?

यही नहीं, प्रस्ताव को पढ़ते हुए कश्मीर के वरिष्ठतम मुफ़्ती (Grand Mufti) नसीर-उल-इस्लाम ने दहशतगर्दी की अनेक घटनाओं में साफ़ तौर पर लिप्त पाए गए संगठन जमात-ए-इस्लामी पर लगे प्रतिबन्ध की निंदा की। निंदा करते हुए इसके सरगनाओं व ज़मीनी दहशतगर्दों (Liberal media की भाषा में “कार्यकर्ताओं/cadres”, और सत्य के शब्दों में foot soldiers) की गिरफ़्तारी को भी मुफ़्ती नसीर-उल-इस्लाम ने इसे भी घाटी के कट्टरपंथियों की मज़हबी गतिविधियों(?) में हस्तक्षेप घोषित किया

इसके पूर्व मंगलवार को घाटी के शांतिप्रिय व्यापारी संगठनों ने भी आतंकवादी नेताओं की गिरफ़्तारी को अपने “नेताओं, संस्थाओं, और संगठनों का बारम्बार उत्पीड़न” मानते हुए इसके खिलाफ़ विरोध प्रदर्शन किया।

नफ़रत की आग में पिता को खोकर भी उमर फ़ारुख को नहीं आई सुध

1990 में अपने पिता को इसी ज़हरीली, इस्लामी-वर्चस्ववादी सोच के दहशतगर्दों के हाथों मीरवाइज़ उमर फ़ारुख खो चुके हैं। उनके वालिद, मीरवाइज़-ए-कश्मीर (लिख कर ले लीजिए कि उन्हें पूरे कश्मीर का मीरवाइज़ घोषित करते समय 300 साल पहले भी किसी ने घाटी के बौद्धों-सिखों-हिन्दुओं से नहीं पूछा होगा कि उन्हें इस्लामी मीरवाइज़ अपने पूरे सूबे के मीरवाइज़ के रूप में स्वीकार हैं या नहीं) मौलाना मौलवी मुहम्मद फ़ारुख शाह, को हिजबुल मुजाहिदीन के दहशतगर्द मोहम्मद अयूब डार ने उनके ही घर में गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया था।

उस समय भारतीय सुरक्षा एजेंसियों, सेना, और पैरा-मिलिट्री फ़ोर्सेज़ पर उनकी हत्या का आरोप लगा था, पर 2011 में हुर्रियत के ही दूसरे नेता प्रोफ़ेसर अब्दुल गनी बट ने मुहम्मद फ़ारुख के क़त्ल को हुर्रियत की ही आतंरिक खींचातानी का परिणाम बताया था।

12 साल बाद उनके क़त्ल की बरसी पर मातम मानते हुए एक दूसरे अलगाववादी नेता अब्दुल गनी लोन को भी पाकिस्तान-परस्त (no surprises here!!) नारे लगा रहे कुछ युवकों ने मौत के घाट उतर दिया था। उस समय लोन के पुत्र सज्जाद गनी लोन ने अपने पिता के क़त्ल की साजिश रचने का इल्ज़ाम आइएसआइ के साथ-साथ हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के ही कट्टरपंथी नेता सैयद अली शाह गीलानी (जो कि बाद में हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के बंटवारे पर कट्टरपंथी धड़े के सिरमौर बने) पर लगया था। बाद में सज्जाद ने यह आरोप ‘किसी कारणवश’ वापिस ले लिया।

1931 में तत्कालीन मीरवाइज़-ए-कश्मीर ने काफ़िर हिन्दुओं के डोगरा समुदाय से ताल्लुक रखने वाले तत्कालीन महाराजा-ए-कश्मीर के खिलाफ़ मज़हबी संघर्ष में महती भूमिका निभाई थी।

महज़ 17 साल की उम्र में अपने वालिद के मीरवाइज़ उत्तराधिकारी बनने वाले उमर फ़ारुख हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के ‘उदारवादी’ धड़े के मुखिया माने जाते हैं।

वह ‘उदारवादी’ किस एंगल से हैं, यह समझना मुश्किल है। शायद इसलिए कि वह अपने कट्टरवादी समकक्ष की तरह खुल कर “हिन्दुओं के दमन के लिए चाहिए आज़ादी” नहीं कहते।  

और कितने सबूत चाहिए

चूँकि भारतीय राजसत्ता सबसे अच्छा वाला केश तेल लगाकर सोती है, अतः इस उदहारण से भी राजनीतिक वर्ग पर सवार एकतरफ़ा सेक्युलरिज़्म और सहिष्णुता की तन्द्रा टूटना मुश्किल है। कश्मीरी बहुसंख्यक और उनके नेता चाहे जितना गला फाड़-फाड़ कर चिल्लाएँ कि उन्हें काफ़िर हिन्दुओं के बराबर में खुद को खड़ा कर देने वाला संविधान मंज़ूर नहीं, सदियों से एक-दूसरे के खून के प्यासे शिया-सुन्नी हिन्दुओं की जिहाद रोकने की हिमाकत का पुरज़ोर जवाब देने एक हो जाएँ, राजनेता “all religions are same” की आलस्यपूर्ण सोच से निकलने से साफ़ मना कर देते हैं।

अभी भी लिख कर ले लीजिए कि वही रील रिवाइंड कर बजाई जाएगी- कट्टरपंथी मज़हबी सोच का राजनीतिक मोल-तोल से band-aid समाधान निकाल कर अपनी पीठ थपथपाई जाएगी, और “मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना” के तरानों से घाटी की नफ़रत भरी दहाड़ और जम्मू-लद्दाख के दिल में बैठे भय के आर्तनाद को दबा दिया जाएगा।

(महायोगी और प्रखर क्रांतिकारी Sri Aurobindo ने दशकों पहले अपने समकालीन भारतीयों में बौद्धिक आलस्य और खुद को छलने की इस प्रवृत्ति को भाँप कर इसे “loss of thought power (in Indians  of HIS TIME)” कहा था। अफ़सोस यह है भारत को आज़ाद हुए 75 साल होने वाले हैं, Aurobindo हमें लगभग 70 साल पहले छोड़ कर जा चुके हैं, और हम एक इंच भी आगे बढ़ने की बजाय 4 मील और पीछे आ गए हैं)