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25,000 लोगों की मौत की सौदागर कॉन्ग्रेस: आज ही के दिन सुप्रीम कोर्ट में खेला था गणित का ‘गंदा’ खेल

भोपाल गैस त्रासदी भारत की अब तक की सबसे बड़ी औद्योगिक आपदा है। ये वो घटना है जिसके बारे में आज भी यदि सोच लिया जाए तो रूह काँप जाती है। ज़रा सोचिए! कितनी भयंकर घड़ी होगी वो जब फेफड़ो में घुसी ज़हरीली गैस की वजह से, सोते-जागते-भागते क़रीब 25 हज़ार लोग इसकी चपेट में आए और 5 लाख से ज़्यादा प्रभावित हुए।

साल 1984 में 2-3 दिसंबर की मध्यरात्रि में अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनी यूनियन कार्बाइड के भोपाल स्थित संयंत्र से जानलेवा गैस लीक होनी शुरू हुई। इस गैस का नाम ‘मिक’ (मिथाईल आइसो-साइनेट) था। जिसके हवा में घुलने की वजह से 25,000 से अधिक लोगों की मौतें हुई और जो आज ज़िदा है उनमें से कुछ अपंगता के कारण बेबस है तो कुछ अन्य बीमारियों की वजह से लाचार।

ये घटना जिस समय हुई थी, उस समय राजीव गाँधी के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस पार्टी सत्ता में थी। इस बात को करना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि बिना सुरक्षा शर्तों के इतने ख़तरनाक कारखाने को लगाने की इजाज़त, अपने आपको ‘जन कल्याणकारी सरकार’ कहने वाली सरकार ने ही दी थी।

शायद इसलिए पहले इस कारखाने में सामान्य सुरक्षा की व्यवस्थाओँ पर ख़र्च में लगातार कटौती करके सिस्टम बंद किए जाते रहे। जब गैस लीक हुई तो लोगों को मरने के लिए बेसहारा छोड़कर सरकार भी भाग खड़ी हुई और बड़े-बड़े अफसर भी।

लेकिन, जब सवाल यूनियन कार्बाइड कंपनी पर लापरवाही के सवाल उठने शुरू हुए तो तात्कालीन सरकार (राजीव सरकार) एक बार फिर से कंपनी के साथ आकर खड़ी हो गई। सरकार ने इस दौरान एक क़ानून बनाया और गैस पीड़ितों से कर्बाइड कंपनी के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्यवाही करने का अधिकार भी छीनकर अपने हाथ में ले लिया।

इस घटना के बाद आज से ठीक 30 साल पहले सुप्रीम कोर्ट में एक समझौता पेश किया गया। इसके समझौते के अनुसार कंपनी को 3.3 बिलियन डॉलर (5355.9 करोड़ रुपए) के क्लेम के बजाए केवल 470 मिलियन डॉलर (762.81 करोड़ रुपए, 1 डॉलर = 16.23 रुपया वर्ष 1989 में) देने थे। इस समझौते के साथ ही कंपनी पर से लापरवाही से हत्या करने वाला आपराधिक केस भी खत्म होना था। सब सरकार के हाथ में था, नतीजन इस समझौते को कोर्ट में भी मान्यता भी मिल गई ।

14 फरवरी 1989 को सर्वोच्च न्यायालय ने यूनियन कार्बाइड कॉर्पोरेशन को उस ज़हरीली गैस रिसाव के पीड़ितों को हुए नुक़सान के लिए $ 470 मिलियन का भुगतान करने का आदेश दिया। शर्मनाक बात तो यह है कि जिस गणित के अनुसार यह रकम तय की गई थी, उसमें पीड़ितों की मूलभूत ज़रूरतों को सिरे से नकारा गया। जब इस राशि का बँटवारा गैस पीड़ितों में हुआ तो 5 लाख दावेदारों में से 90 प्रतिशत पीड़ितों के हिस्से में मात्र 25-25 हज़ार रुपए आए।

आदेश के लगभग 30 साल बाद भी पीड़ितों के ज़ख़्मों का किसी प्रकार का कोई मरहम नहीं लगा है। आज इस समझौते को पूरी तरह से धोखा करार दिया जाता है। क्योंकि दुर्घटना से पीड़ित लोग आज भी मुआवज़ो और बुनियादी सुविधाओं की लड़ाई को लगातार लड़ रहे हैं।

भोपाल गैस पीड़ित महिला उद्योग संगठन के संयोजक अब्दुल ज़ब्बार का कहना है कि इस समझौते में मृतकों और घायल लोगों की संख्या को काफ़ी कम दर्शाया गया था, जबकि हकीक़त में यह बहुत ज़्यादा थी। समझौते पर उठे ऐसे सवालों पर 3 जनवरी 1991 को उच्चतम न्यायलय ने कहा था कि यदि मरने वालों की सँख्या में बढ़ौतरी होती है तो भारतीय सरकार इसका मुआवज़ा देगी।

आजतक की रिपोर्ट में लिखा है कि ज़ब्बार ने बताया कि इस समझौते में गैस के लीक होने की वजह से केवल 3,000 लोगों की मौत और 1.02 प्रभावित लोग दर्शाए गए थे। जबकि, इस दुर्घटना से अब तक वास्तविकता में 20,000 लोगों की मौत हुई है और 5 लाख से अधिक लोग प्रभावित हुए है।

इस दिल दहला देने वाली घटना के मुख्य आरोपी एंडरसन के बारे में बताया जाता रहा है कि तात्कालीन पीएम राजीव गांधी के इशारे पर राज्य के मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने उनकी देश छोड़कर भागने में मदद की थी। इसलिए, एंडरसन को सरकारी प्लेन द्वारा कड़ी सुरक्षा के बीच भोपाल से दिल्ली पहुंचाया गया था, जिसके बाद वो अमेरिका वापस चला गया और कभी भारत लौट कर न लाया जा सका। 92 साल की उम्र में 29 सितंबर 2014 में एंडरसन की मौत भी हो गई, लेकिन भारत में इस मामले पर अब भी पीड़ितों को दिए जाने वाले हक पर विचार-विमर्श ही हो रहा है।

इस त्रासदी का 346 टन ज़हरीला कचरा निस्तारण अब भी भारत के लिए एक चुनौती बना हुआ है। ये कचरा आज भी कंपनी के कारख़ाने में कवर्ड शेड में मौजूद है। इसके ख़तरे को देखते हुए अब भी यहाँ पर आम जन को प्रवेश यहाँ पर वर्जित है।

सर्वोच्च न्यायलय के आदेश पर 13-18 अगस्त 2015 तक इंदौर के पीथमपुर में ‘रामके’ कंपनी के इंसीनरेटर में यहाँ का लगभग 10 टन ज़हरीला कचरा जलाया गया था। ट्रीटमेंट स्टोरेज डिस्पोजल फेसीलिटीज संयंत्र से इसके निष्पादन में पर्यावरण कितना प्रभावित हुआ, इसकी रिपोर्ट केंद्रीय वन-पर्यावरण मंत्रालय को भेज दी गई थी। लेकिन इस क़दम का असर क्या हुआ, ये अब भी सवाल बना हुआ है।

इस हादसे के बाद इस ज़हरीले कचरे को जर्मनी भेजने का प्रस्ताव तैयार किया गया था, लेकिन वहाँ के लोगों के विरोध की वजह से इस कूड़े को वहाँ पर नहीं भेजा जा सका। प्राप्त जानकारियों के अनुसार इस तरह के पदार्थ को 2 हज़ार डिग्री से अधिक के तापमान पर जलाया जाता है।

वैसे बता दूँ अभी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में इसी मामले में पीड़ितों और केंद्र सरकार द्वारा याचिका दायर की गई है। इस याचिका में यूनियन कार्बाइड कंपनी से 7413 करोड़ रुपयों की माँग की गई है। सरकार ने इस बात को माना है कि दुर्घटना पीड़ितों को उचित मुआवज़ा नहीं मिला है। इसी याचिका पर कोर्ट ने अप्रैल में सुनवाई करने के लिए कहा है।

1993 मुंबई ब्लास्ट: 26 वर्षों बाद दुबई में पकड़ा गया मोस्ट वॉन्टेड आतंकी अबू बकर, प्रत्यर्पण शीघ्र

भारतीय जाँच एजेंसियों को 1993 बम ब्लास्ट मामले में बड़ी क़ामयाबी मिली है। घटना के 26 वर्षों बाद मोस्ट वॉन्टेड आतंकी अबू बकर को दुबई में गिरफ़्तार कर लिया गया है। अबू बकर के साथ एक अन्य आतंकी को भी पकड़ा गया है। दूसरे आतंकी का नाम फ़िरोज़ है। दोनों को शीघ्र ही प्रत्यर्पित कर भारत लाया जाएगा। इसके लिए तैयारी शुरू कर दी गई है। ज्ञात हो कि मार्च 1993 में मुंबई में हुए सिलसिलेवार बम ब्लास्ट में 257 लोग मारे गए थे और 700 से भी ज्यादा लोग घायल हुए थे।

पकड़े गए आतंकी का पूरा नाम अबू बकर गफ़ूर शेख है। वह खाड़ी देशों से सोना, कपड़े और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की स्मगलिंग कर मुंबई और आसपास के लैंडिंग पॉइंट में सप्प्लाई किया करता था। दोनों आतंकी लंबे समय से ‘मोस्ट वॉन्टेड’ की सूची में शामिल थे। 1993 मुंबई धमाके वाले मामले में तैयार की गई 10,000 पन्नों की चार्जशीट में दाऊद इब्राहिम को मुख्य अभियुक्त बनाया गया था। आरोपितों की कुल संख्या 189 है। दाऊद अभी तक भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की पकड़ से बाहर है।

अबू बकर के ख़िलाफ़ 1997 में ही रेड कॉर्नर नोटिस जारी कर दिया गया था। पाकिस्तान और संयुक्त अरब अमीरात में रह रहे अबू बकर के बारे में भारतीय एजेंसियों को ख़ुफ़िया इनपुट मिले थे। उसने ईरान की एक महिला से दूसरी शादी कर रखी है। दुबई में व्यापार चलाने वाले अबू बकर से पूछताछ के दौरान मुंबई धमाकों से जुड़े कई अन्य राज खुलने की संभावना है।

1993 में हुए धमाके बॉम्बे स्टॉक एक्चेंज, नरसी नाथ स्ट्रीट, शिव सेना भवन, सेंचुरी बाजार, माहिम, झावेरी बाजार, सी रॉक होटल, प्लाजा सिनेमा, जूहू सेंटूर होटल, सहार हवाई अड्डा और एयरपोर्ट सेंटूर होटल के आसपास हुए थे। आतंकियों ने कुल 12 जगहों को निशाना बनाया था। हमले के अन्य दोषियों में याकूब मेनन और मुस्तफ़ा दौसा शामिल है। याकूब मेनन को जुलाई 2015 में फाँसी दे दी गई थी। मुस्तफ़ा की जून 2017 में मुंबई के जेजे असपताल में मौत हो गई थी।

पकड़े गए आतंकी अबू बकर ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में ट्रेनिंग ली थी। अबू बकर ने मुंबई धमाकों के लिए आरडीएक्स लाने का काम किया था। दाऊद इब्राहिम के दुबई स्थित घर पर धमाकों की साजिश रची गई थी जिसमे अबू बकर भी शामिल हुआ था।

12वीं पास आदमी को हस्ताक्षर करने की समझ नहीं… केजरीवाल के बेहूदे बयान से करोड़ों युवा आहत!

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने एक बार फिर प्रधानमंत्री मोदी पर विवादित टिप्पणी की है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर बुधवार (फरवरी 13, 2019) को आयोजित ‘तानाशाही हटाओ, लोकतंत्र बचाओ सत्याग्रह’ रैली को सम्बोधित करते हुए केजरीवाल ने मोदी की तुलना पाकिस्तान से तो की ही, साथ ही उन्हें 12वीं पास भी बताया। रैली में कई विपक्षी नेताओं का जमावड़ा लगा। तृणमूल कॉन्ग्रेस अध्यक्ष ममता बनर्जी, एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार और टीडीपी अध्यक्ष चंद्रबाबू नायडू सहित और भी नेताओं ने अपनी उपस्थिति दिखाई।

प्रधानमंत्री मोदी की शैक्षणिक योग्यता को सवालों के घेरे में खड़ा करते हुए केजरीवाल ने कहा:

“पिछली बार आपने 12वीं पास व्यक्ति को देश का प्रधानमंत्री बनाया। इस बार यह गलती मत दोहराइएगा और किसी शिक्षित को ढूंढिए क्योंकि 12वीं कक्षा पास व्यक्ति को यह समझ नहीं होती कि वह अपने हस्ताक्षर कहाँ कर रहा है। मैं सारे देश से कहना चाहता हूँ कि इस बार जब वोट करने जाओ, तो एक पढ़े-लिखे प्रधानमंत्री के लिए वोट करना। जो देश के बारे में सोचे न किसी एक व्यक्ति के बारे में। मैं नरेंद्र मोदी से कहना चाहता हूँ कि वे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की तरह बर्ताव करना बंद करें। देश को तोड़कर मोदी जी पाकिस्तान का सपना पूरा कर रहे हैं। मैं उनसे पूछना चाहता हूं कि वे भारत के प्रधानमंत्री हैं या पाकिस्तान के?”

केजरीवाल ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तारीफ़ में भी ख़ूब कसीदे पढ़े। ममता बनर्जी और सीबीआई की लड़ाई को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए मुख्यमंत्री केजरीवाल ने कहा:

“कुछ दिनों पहले केंद्र ने सीबीआई के 40 अधिकारियों को कोलकाता भेजा था। मैं मोदी जी को बताना चाहता हूं कि पश्चिम बंगाल भी भारत का हिस्सा है। उन्होंने सीबीआई को भेजकर बंगाल सरकार पर हमला किया है। इससे पहले उन्होंने दिल्ली पर भी हमला किया था। दिल्ली और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों पर हमला करने के बारे में केवल पाकिस्तान ही सोच सकता है। सरकार ने पश्चिम बंगाल में सीबीआई को भेजकर पूरे संघीय ढांचे का अपमान किया है। अगर उस दिन कमिश्नर गिरफ्तार हो जाते, तो पूरे देश की राज्य सरकार के लिए यह अच्छा मैसेज नहीं जाता। पूरे देश में डर का माहौल पैदा हो जाता। मोदी जी लोकतंत्र को खत्म करने पर तुले हैं। वह आंबेडकर के संविधान से अलग हटकर शासन करना चाहते हैं। मैं ममता जी को सैल्यूट करता हूं, जिन्होंने अधिकारियों को भगा दिया। वह संविधान बचाना चाहती हैं।”

अरविन्द केजरीवाल ने अपने धरने की तुलना अप्रैल 2011 में हुए अन्ना हजारे के अनशन से की। उन्होंने कहा कि जिस तरह जंतर-मंतर पर हुए भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने कॉन्ग्रेस को उखाड़ फेंका था, ऐसे ही उनकी यह रैली मोदी सरकार को हटा देगी। केजरीवाल ने रक्षा मंत्रालय के एक कथित काग़ज़ को भी हवा में लहराया और लोगों से कहा कि मोदी ने ख़ुद राफेल की कम्पनी से बात की।

Valentine’s Day: फ्रैंक ड्रेक के फॉर्मूले से जानिए जीवनसाथी खोजने का गणित

बड़े शहरों में रहने वाले लड़के लड़कियाँ अपने जीवन साथी का चुनाव अपने तरीके से करते हैं जिनमें डेटिंग करना आम बात है। डेटिंग में लड़का लड़की मिलते हैं, बातें करते हैं, खाते पीते हैं और एक दूसरे को जानने की कोशिश करते हैं। डेटिंग के बाद घर जाकर अपने परिवारवालों या दोस्तों को अपनी ‘डेट’ के किस्से सुनाते हैं।

लेकिन सवाल ये है कि कोई अपने जीवन साथी की तलाश में कितनी डेट पर जा सकता है। जवानी से बुढ़ापे तक के सफर में कोई कितनी दोस्ती या डेटिंग कर सकता है? दिल तो बेचारा एक ही होता है, एक व्यक्ति उसे कितनी बार टूटने दे सकता है? एक आकलन के मुताबिक यदि विश्व का प्रत्येक व्यक्ति एक दूसरे से हाथ भी मिलाए तो उम्र कम पड़ जाएगी। ऐसे में हम सबसे ‘सूटेबल पार्टनर’ की खोज में कितना इंतज़ार कर सकते हैं?

इसका जवाब देते हुए पीटर बैकस ने 2010 में एक फॉर्मूला सुझाया था। वॉरविक इकोनॉमिक समिट में बैकस ने एक शोधपत्र पढ़ा था: “Why I don’t have a girlfriend” जिसमें बैकस ने 1961 में डॉ फ्रैंक ड्रेक द्वारा दिए गए एक फॉर्मूले का इस्तेमाल यह जानने के लिए किया था कि उनके आसपास रहने वाली कितनी लड़कियाँ गर्लफ्रेंड बन सकती हैं।

डॉ फ्रैंक ड्रेक एक एस्ट्रोनॉमर थे। उन्होंने एक फॉर्मूला दिया था जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि हमारी गैलेक्सी में हमारे अलावा कितनी सभ्यताएँ फल-फूल रही हैं। ड्रेक के फॉर्मूले के हिसाब से हमारी आकाश गंगा में हमसे सम्पर्क स्थापित कर सकने में सक्षम 10,000 के लगभग सभ्यताएँ हो सकती हैं।

अब यदि ड्रेक के फॉर्मूले पर अमल किया जाए तो यह कैलकुलेट किया जा सकता है कि किसी लड़के को गर्लफ्रेंड बनाने के लिए कम से कम कितनी लड़कियाँ मिल सकती हैं। हैना फ्राय ने अपनी पुस्तक “Mathematics of Love” में इस फॉर्मूले का सरलीकरण कर इस प्रकार समझाया है:

सबसे पहले तो यह सोचिए कि आपके शहर में कितने लड़के या लड़कियाँ हैं। चलिए मान लेते हैं कि आप पुरुष हैं और लंदन जैसे बड़े शहर में रहते हैं जहाँ तक़रीबन 40 लाख महिलाएँ हैं। अब इन 40 लाख महिलाओं में से कितनी होंगी जो आपकी उम्र के आसपास की होंगी? मान लेते हैं कि 40 लाख महिलाओं में से करीब 20% प्रतिशत अर्थात 8 लाख युवतियाँ होंगी। अब इन 8 लाख में से कितनी कुँवारी होंगी? मान लेते हैं कि 50% या 4 लाख युवतियाँ कुँवारी हैं।

अब यदि आप यूनिवर्सिटी ग्रेजुएट हैं तो ज़ाहिर है कि अपना पार्टनर भी यूनिवर्सिटी ग्रेजुएट ही चुनना चाहेंगे। अनुमान लगाइये कि इन 4 लाख कुँवारी युवतियों में से यूनिवर्सिटी ग्रेजुएट कितनी होंगी? मान लेते हैं कि आधे से कुछ ज़्यादा यानि 26% युवतियाँ यूनिवर्सिटी ग्रेजुएट हैं। चार लाख का 26% हुआ 1,04,000 मतलब अंदाज़न इतनी युवतियाँ यूनिवर्सिटी ग्रेजुएट हैं।

अब केवल यूनिवर्सिटी ग्रेजुएट होना ही तो काफ़ी नहीं। हर लड़का या लड़की अपना पार्टनर आकर्षक चुनने की ख़्वाहिश रखता है तभी तो ‘लाखों में एक’ वाला मुहावरा बना। तो चलिए मान लेते हैं कि 1,04,000 में से मात्र 5% युवतियाँ ही आकर्षक होंगी। अब यह आँकड़ा 5,200 युवतियों पर आ गया।

इन 5,200 युवतियों में से सबके साथ डेटिंग की जा सके यह भी संभव नहीं और सबको आप उतने ही आकर्षक लगें इसकी भी गारंटी नहीं। तो मान लेते हैं कि इनमें से 5% या 260 युवतियाँ आपके प्रति आकर्षित होंगी। लेकिन अभी भी डेटिंग के लिए 260 की संख्या बहुत ज़्यादा है। इन 260 में से 10% यानि कुल 26 लड़कियाँ ही ऐसी होंगी जिनके साथ दोस्ती कर और कुछ समय बिताने के बाद आप अपना जीवन साथी चुन सकते हैं।

गर्लफ्रेंड या बॉयफ्रेंड कैसा होगा उसमें कौन सी खूबियाँ होनी चाहिए वह क्राइटेरिया और उसका प्रतिशत आप अपने हिसाब से प्रयोग कर सकते हैं। यह तरीका केवल एक अनुमान बताता है न कि कोई सटीक संख्या। अनुमान लगाने या ‘एस्टिमेशन’ के इस गणित को ‘फर्मी एस्टिमेशन’ भी कहा जाता है और इसका प्रयोग फ़िज़िक्स से लेकर गूगल के इंटरव्यू तक में किया जाता है।

पीटर बैकस ने जब इस तरीके को गर्लफ्रेंड की संख्या का अनुमान लगाने के लिए प्रयोग किया तो कुछ लोगों ने उनकी हँसी भी उड़ाई लेकिन कहा जाता है कि प्रकृति की भाषा गणित है और हम सब भी प्रकृति की ही संतानें हैं। क्या पता सच्चा प्रेम मिलने या न मिलने में किसी छिपे हुए गणितीय सूत्र का हाथ हो!       

वेलेंटाइन डे स्पेशल: ‘राजुला-मालूशाही’ की कहानी जो बन गया प्यार के लिए संन्यासी

वेलेंटाइन डे आ चुका है। कहते हैं कि फ़िज़ाओं में प्रेम की महक फैल रही है। प्रेम तो ऐसा भाव है कि अपने अलग आयामों में बहुत कुछ समेट लेता है। यह कालातीत है, जीवत्व और जीवन के बंधनों से परे है। बहुत कम जीव हैं जिन्हें प्रेम की अनुभूति नहीं होती। हर समय, हर समाज, हर जगह प्रेम से जुड़ी ऐसी कहानियाँ मिलती हैं, जो अपनी पवित्रता और आत्मीयता से हमें आश्चर्यचकित कर देती हैं।

ऐसी ही एक ‘टाइमलेस कहानी’ आपके लिए देवभूमि उत्तराखंड के इतिहास से, जिसके प्रमुख पात्र हैं राजुला और मालूशाही। कहानियों के अनुसार, कुमाऊँ के पहले राजवंश कत्यूर से ताल्लुक रखने वाले मालूशाही शौका वंश की राजुला के प्रेम में राज-पाट छोड़ संन्यासी हो गए थे।

ये प्रेम कथा है 15वीं शताब्दी की जो उत्तराखंड में आज भी लोकगीतों, लोकनाटकों और लोकगाथाओं में देखी, सुनी, कही जाती है। कत्यूर राजवंश के राजकुमार मालूशाही और शौका वंश की सुंदरी राजुला ‘शौक्याणी’ की इस प्रेम कहानी के अलग-अलग संस्करण उत्तराखण्ड के विभिन्न क्षेत्रों में खूब प्रचलित हैं।

कुमाऊँ के पहले कत्यूर राजवंश की ये कहानी अपनी प्रेमिका के लिए मालूशाही के राजा से जोगी बन जाने तक का सफर है। उस समय कत्‍यूरों की राजधानी बैराठ (वर्तमान चौखुटिया) थी। ‘रंगीले बैराठ’ में तब राजा दुलाशाह शासन करते थे। सम्पन्नता के बावज़ूद संतानविहीन होना दुलाशाह की एक बड़ी वेदना थी। किसी ने राजा को बताया कि वह बागनाथ (बागेश्वर) में शिव की अराधना करें, तो उन्‍हें अवश्य संतान प्राप्‍ति होगी।

भाग्यवश, सूर्य के उत्तरायण का पर्व था और इसी दिन पंचाचूली पर्वत शृंखला में स्थित क्षेत्र ‘मल्ला दारमा’ का सम्पन्न व्यापारी ‘सुनपति शौक’ अपनी पत्नी ‘गांगुली शौक्याण’ के साथ बागेश्वर के बागनाथ मंदिर में दर्शन करने गए थे। यहीं पर दुलाशाह की मुलाकात भोट (दारमा) के व्‍यापारी सुनपति शौक और उसकी पत्‍नी गांगुली से हुई, वह भी संतान की चाह में ही वहाँ आए थे।

दोनों पक्षों की व्यथा एक ही होने के कारण दोनों ने आपस में समझौता किया कि यदि संतानें लड़का और लड़की हुई तो उनकी आपस में शादी कर देंगें। आशुतोष भगवान बागनाथ के आशीष से रंगीले बैराठ के राजा को पुत्र प्राप्ति हुई, उसका नाम ‘मालुशाही’ रखा गया। व्यापारी सुनपत शौक के घर में लड़की हुई, उसका नाम ‘राजुला’ रखा गया।

राजुला और मालू

समय बीतता गया, बैराठ में मालू जवान हो चुका था और भोट में राजुला का सौन्‍दर्य चर्चा का विषय था। बुराँस का पुष्प उसे देखकर खिलता और वसंत उसके केशों में झूमता था। राजुला का मुख कंचन की तरह दमकता, जिस दिशा से वो गुजरती, उसका लावण्‍य समय की गति रोक देता।

लेकिन भाग्य को कुछ और ही था मंजूर

मालू छोटा था जब एक ज्योतिषी ने राजा दुलाशाह को बताया कि यह अल्पायु होगा, ज्योतिषी ने कहा, “राजा! तेरा पुत्र बहुरंगी है, लेकिन इसका तो अल्प-मृत्यु का योग है, इसका निवारण करने के लिए जन्म के 5वें दिन इसका ब्याह किसी नौरंगी कन्या से कराना होगा।” राजा ने फ़ौरन अपने पुरोहित को शौक देश भेजा और उसकी कन्या राजुला से ब्याह करने की बात की, सुनपति शौक तैयार हो गए और खुशी-खुशी अपनी नवजात पुत्री राजुला का प्रतीकात्मक विवाह मालूशाही के साथ कर दिया। इसी बीच राजा दुलाशाह की मृत्यु हो गई जिस पर दरबारियों ने कहा कि जो लड़की मंगनी के बाद अपने ससुर को खा गई, यदि वो इस राज्य में आएगी तो अनर्थ हो जाएगा। इसलिए मालूशाही से यह बात गुप्त रखी गई।

धीरे-धीरे दोनों जवान होने लगे, राजुला जब बड़ी हो गई तो सुनपति शौक ने सोचा राजुला को रंगीली वैराट में मालूशाही से ब्याहने का वचन राजा दुलाशाह को दिया था, लेकिन वहाँ से कोई खबर अब तक नहीं आई।

एक दिन राजुला ने अपनी माँ से पूछा, “माँ, दिशाओं में कौन दिशा प्यारी? पेड़ों में कौन पेड़ बड़ा, गंगाओं में कौन गंगा? देवों में कौन देव? राजाओं में कौन राजा और देशों में कौन देश?” इस पर राजुला की माँ ने जवाब दिया, “दिशाओं में प्यारी पूर्व दिशा, जो नवखंडी पृथ्वी को प्रकाशित करती है, पेड़ों में पीपल सबसे बड़ा, क्योंकि उसमें देवता वास करते हैं। गंगाओं में सबसे बड़ी भागीरथी, जो सबके पाप धोती है। देवताओं में सबसे बड़े महादेव, जो आशुतोष हैं। राजाओं में राजा है राजा रंगीला मालूशाही और देशों में देश है रंगीलो वैराट।”

इस पर राजुला ने अपनी माँ से अपना विवाह रंगीले वैराट प्रदेश में ही करने की इच्छा व्यक्त की। जनश्रुतियों के अनुसार राजुला ने कहा,
“मिकणी बिवाय बाबू, पाली पछाऊँ का देश।
पाली पछाऊँ का देश म, रंगेलो गेवाड़ा।
रंगीलो गेवाडा म, रंगीलो वेरठा।
मिकणी बिवाय बाबू, रंगेलो गेवाड़ा।”

इसी समय तिब्बत के हूण राजा विक्खीपाल ने हमला करने की धमकी देकर सुनपति शौक से राजुला से शादी करने का विचार रखा। वैराट में मालूशाही को स्वप्न में बचपन में हुए विवाह का स्मरण हुआ और राजुला को दिया हुआ विवाह का वचन उसे याद आया। यही सपना राजुला को भी हुआ और अब एक ओर मालूशाही का वचन था तो दूसरी ओर हूण राजा विक्खीपाल की धमकी। इस सब से व्यथित होकर राजुला ने निर्णय लिया कि वह स्वयं वैराट जाएगी और मालूशाही से मिलेगी। उसने अपनी माँ से वैराट का रास्ता पूछा, लेकिन उसकी माँ ने कहा कि अब राजुला को हूण देश ही जाना है, इसलिए वैराट और मालूशाही का विचार वो मन से निकाल दे।

इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश ‘ग़ालिब’

निराश होकर राजुला ने अपने हाथ की हीरे की अंगूठी और एक पत्र मालूशाही को भेज दिया। पत्र में लिखा था, “क्योंकि मेरे पिता अब मुझे हूण देश ब्याह रहे हैं, तो मुझे लेने तुम तिब्बत के हूण देश ही आना।”

…. इक आग का दरिया है और डूब के जाना है

राजुला का पत्र पढ़कर मालूशाही शोक में डूब गया, राजुला के विवाह की ख़बर ने मानो उसे निर्जीव कर दिया। मालूशाही की आँखें सूख गई, उसका अन्न-जल त्याग हुआ, लेकिन वो जानता था कि यह समय विलाप का नहीं है।

मालूशाही ने व्यथित होकर अपना राजसी मुकुट, राजसी कपड़े नदी में बहा दिए और गुरु गोरखनाथ की शरण में पहुँच गया। वो जानता था की हूण देश के लोग तंत्र-विद्या के महारथी हैं और उनसे टकराव आसान न होगा। मालूशाही ने गोरखनाथ से निवेदन किया कि राजुला से मिलवाने में वो उसकी मदद करें। लेकिन गुरु गोरखनाथ आने वाले कष्टों को भाँप चुके थे, जिस कारण उन्होंने मालूशाही से वापस जाकर राजपाठ संभालने को कहा। लेकिन, मालूशाही का मर्म तो प्रेम था और राजुला की व्यथा सोचकर वह अपनी जिद पर अड़े रहें।

यह देखकर गुरु गोरखनाथ ने मालूशाही को दीक्षा दी और ‘बोक्साड़ी विद्या’ सिखाई। उन्होंने मालूशाही को वे तंत्र-मंत्र भी सिखाए जिससे वह हूण और शौका देश के विष से बच सके। इसके बाद मालूशाही ने राजुला से मिलने के लिए राजपाट छोड़ा, सर मुंडाया, जोगी का वेश धर लिया और धूनी की राख शरीर में मल कर जोगी का वेश धर लिया।

धरकर जोगी का भेष, मालूशाही पहुँचा राजुला के देश

मालूशाही जोगी के वेश में घूमता हुआ हूण देश पहुँचा, साथ में चालाकी से अपनी कत्यूरी सेना भी लेकर गया। मालू घूमते-घूमते राजुला के महल पहुँचा, वहाँ बड़ी चहल-पहल थी, क्योंकि विक्खीपाल राजुला को ब्याह कर लाया था। मालू ने भिक्षा के लिए आवाज लगाई। गहनों से लदी राजुला सोने के थाल में भिक्षा लेकर आई और जोगी को भिक्षा देने लगी। लेकिन जोगी एकटक राजुला को देखता रह गया, उसने अपने स्वप्न में देखी राजुला को साक्षात देखा, तो अवाक रह गया और अपनी सुध-बुध खोकर स्तब्ध हो गया।

जोगी ने राजुला से कहा, “अरे रानी, तू तो बड़ी भाग्यवती है, यहाँ कहाँ से आ गई?”
राजुला ने जोगी की ओर अपना हाथ बढ़ाकर अपने हाथ की रेखाएँ देखकर बताने को कहा। जोगी ने कहा कि वो बिना नाम-ग्राम के हाथ न देखेगा।
राजुला ने उसे बताया, “मैं सुनपति शौक की लड़की राजुला हूँ, अब बता जोगी, मेरा भाग्य क्या है।”
जोगी बने मालूशाही ने प्यार से राजुला का हाथ अपने हाथ में लिया और कहा “तेरे भाग्य में तो रंगीलो वैराट का मालूशाही था।”

तो राजुला ने रोते हुए कहा, “हे जोगी, मेरे माँ-बाप ने तो मुझे जानवरों की तरह विक्खीपाल के पास हूण देश भेज दिया।”
इसके बाद मालूशाही अपना जोगी वेश उतारकर कहा, “मैंने तेरे लिए ही जोगी वेश लिया है राजुला, मैं तुझे यहाँ से ले जाने आया हूँ।”

राजुला-मालूशाही, दोनों प्रेमी-प्रेमिका ने एक दूसरे को पहचान लिया। हूण राजा विक्खीपाल को मालूशाही के चेहरे और हाव-भाव से उसके राजा होने का संदेह हो गया और अंदेशा होने पर वो मालूशाही और उसके साथियों को मार देने की योजना बनाने लगा। राजा विक्खीपाल ने अपने सेवकों से मेहमानों (साधू और उसके चेले) के लिए हलवा-पूरी, खीर आदि पकवान खिलाने को कहा और मालूशाह की खीर में जहर मिलाकर उन सबको बेहोश कर दिया।

इसकी सूचना मिलते ही गुरु गोरखनाथ ने एक सेना के साथ हूण देश जाकर अपनी बोक्साड़ी विद्या का प्रयोग कर के मालू को जीवित कर दिया। फिर मालूशाही ने हूण राजा विक्खीपाल को उसकी सेना समेत मार गिराया और रंगीले वैराट लौट गया।

सवाल पूछने वाले मॉब लिंचर हैं, नहीं चाहिए इनका वोट: मनसे नेता ने मोदी समर्थक को कहा ‘हत्यारा’

जी न्यूज के कार्यक्रम ‘ताल ठोक’ का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। ऑपइंडिया टीम के सदस्यों को भी इस कार्यक्रम से जुड़ी एक वीडियो मिली है। 10 मिनट के इस वीडियो में कॉन्ग्रेस और महाराष्ट्र नवनिर्णाण सेना (मनसे) के दो नेता युवाओं के धारदार सवाल के आगे घुटने टेकते नजर आ रहे हैं।

दरअसल, जी न्यूज के ‘ताल ठोक’ कार्यक्रम की जो वीडियो वायरल हो रहा है, उसमें अमन चोपड़ा एकरिंग करते हुए दिख रहे हैं। इस कार्यक्रम में मनसे की तरफ़ से संदीप देशपांडे ने शिरकत किया है। कार्यक्रम के दौरान कॉन्ग्रेस नेता ने प्रधानमंत्री मोदी को ‘फेंकू’ कह दिया, इसके बाद जब युवाओं ने कॉन्ग्रेस नेताओं से उनका एजेंडा पूछा तो वो घबराकर चिल्लाने लगे। इसके बाद जब लगातार युवाओं द्वारा एक के बाद एक सवाल पूछा जाने लगा तो कॉन्ग्रेस नेता घबराए नजर आए।

इसके बाद युवाओं के सवाल पर भड़ककर मनसे नेता संदीप देशपांडे ने बीच में ही एंकर अमन चोपड़ा को कहा कि ‘वो यहाँ मॉब लिचिंग करा रहे हैं’। जब एंकर अमन ने संदीप से पूछा कि क्या सवाल पूछना मॉब लिंचिंग है? इस सवाल से घबराकर संदीप देशपांडे कॉन्ग्रेस नेता के साथ मिलकर कार्यक्रम के दौरान चिल्लाने लगते हैं। यही नहीं, वहाँ मौजूद सवाल पूछ रहे युवाओं को मॉब लिंचर करार देते हैं।

कार्यक्रम के दौरान जब एंकर पूछते हैं कि संदीप जी आपको इन युवाओं का वोट नहीं चाहिए, तो इस सवाल पर संदीप देशपांडे का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच जाता है और वो कहते हैं कि नहीं मुझे इन युवाओं का वोट नहीं चाहिए।

कॉन्ग्रेस और मनसे नोताओं के इस जवाब के बाद युवाओं ने एक के बाद एक धारदार सवाल खड़ा करना शुरू कर दिया, जिसके बाद दोनों ही नेताओं ने कार्यक्रम के दौरान अपना आपा खो दिया।

BSP नेता याकूब कुरैशी के बूचड़खाने को मेरठ पुलिस ने किया सील

मेरठ विकास प्राधिकरण (MDA) ने मंगलवार को बहुजन समाज पार्टी (BSP) के नेता याकूब कुरैशी के बूचड़खाने को सील कर दिया है। फ़रवरी के पहले सप्ताह में स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा बूचड़खाने के संबंध में कार्रवाई पर रोक लगाने वाले आदेश को MDA ने रद्द कर दिया है।

अल फहीम मीटेक्स प्राइवेट लिमिटेड (Al Faheem Meatex Pvt Ltd meat factory) नाम के इस मीट फैक्ट्री को बनाने से पहले संबंधित सरकारी अधिकारियों से नक्शे को मंजूरी नहीं मिली थी। जिस जमीन पर बूचड़खाने का निर्माण किया गया है, उसके कुछ हिस्से नन-कंपाउंडेबल क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं।

इससे पहले स्थानीय प्रशासन ने एमडीए द्वारा बूचड़खाने को सील करने पर रोक लगा दी थी। हालाँकि, फैक्ट्री को सील करने से पहले MDA ने संचालक को अपना पक्ष रखने के लिए कहा था, लेकिन जब संचालक अपना पक्ष नहीं दे सका, तो MDA की तरफ से स्टे आर्डर रद्द कर दिया गया।

बता दें कि बूचड़खाने के मालिक कुरैशी को बसपा ने मेरठ-हापुड़ सीट के लिए के लोकसभा प्रभारी के रूप नियुक्त किया है। पिछले दिनों कुरैशी ने उच्च न्यायालय से सीलिंग पर रोक लगाने की माँग की थी, लेकिन उच्च न्यायालय ने कुरैशी की माँग को ठुकरा दिया था।

पिछले मंगलवार को MDA के अधिकारी पुलिस के साथ बूचड़खाने वाली जगह पर पहुँचे। इसके बाद बूचड़खाने को अधिकारियों ने सील कर दिया। यही नहीं किसी भी इस क्षेत्र में किसी भी अप्रिय स्थिति से बचने के लिए पुलिस की तरफ से काफ़ी सतर्कता बरती गई थी।

हालाँकि, कुछ मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अधिकारियों ने अवैध क्षेत्र को सील करने में केवल औपचारिकता की थी क्योंकि बूचड़खाने का केवल एक छोटा सा हिस्सा सील किया गया था। मीडिया रिपोर्ट में इस बात का भी जिक्र है कि MDA टीम को शुरू में परिसर में प्रवेश करने की अनुमति नहीं थी और बाद में बहुत संघर्ष के बाद बूचड़खाने के अंदर जाने की अनुमति दी गई।

जानकारी के लिए बता दें कि कुरैशी पहली बार 2006 में खबरों में तब आए थे, जब उन्होंने डेनमार्क के एक कार्टूनिस्ट के सिर लाने वाले को 51 लाख रुपए देने की बात कही। कुरैशी ने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि वह कार्टूनिस्ट इस्लाम विरोधी कार्टून बनाता था। यही नहीं कुरैशी यूपी के कद्दावर नेताओं में से एक हैं। इन्हें तत्कालीन मुलायम सिंह यादव सरकार में ‘मुस्लिम मामलों’ का मंत्री बनाया गया था। उन्होंने बाद में बसपा को ज्वाइन कर लिया।

AMU छात्रों ने लगाए भारत विरोधी नारे, 14 छात्रों के ख़िलाफ़ देशद्रोह का मुक़दमा दर्ज

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) छात्र संघ के अध्यक्ष सलमान इम्तियाज सहित 14 छात्रों के ख़िलाफ़ देशद्रोह का मुक़दमा दर्ज किया गया है। इन छात्रों पर आईपीसी की धारा 124A के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई है। पुलिस ने AMU में पढ़ने वाले इन छात्रों के ख़िलाफ़ तोड़-फोड़ और लोगों की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के आरोप भी लगाए हैं।

एएमयू उपद्रवियों के ख़िलाफ़ प्रमुख शिकायतकर्ता भाजपा युवा मोर्चा के सदस्य मुकेश लोढ़ा ने आरोप लगाया है कि एएमयू छात्र संघ अध्यक्ष सहित कुछ अन्य छात्रों ने विरोध दर्ज कराने की वजह से उनकी कार को रोककर उन्हें धमकी दी।

मुकेश लोढ़ा ने बताया कि कैंपस के उपद्रवी छात्रों की भीड़ ने कई वाहनों को आग लगा दी। इसके बाद उपद्रवी छात्रों ने भारत विरोधी और पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगाए। जिसके बाद उन्होंने उपद्रवियों के ख़िलाफ़ राजद्रोह का मामला दर्ज करने के लिए थाने में शिकायत की।

इस मामले में अलीगढ़ पुलिस ने कहा है कि धारा 307 और धारा 153 को किसी समुदाय की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने और हिंसक धमकी और तोड़-फोड़ में लिप्त होने के लिए AMU के अराजक तत्वों के ख़िलाफ़ चालान किया गया है।

यही नहीं अलीगढ़ पुलिस ने एएमयू कैंपस में अराजकता फैलाने वाले 56 छात्रों को कैंपस से निष्कासित करने की माँग विश्वविद्यालय प्रशासन से की है। पुलिस अधिकारियों के अनुसार जल्द ही इन अराजक छात्रों के ख़िलाफ़ गैर-जमानती वारंट जारी किया जाएगा।

बता दें कि एक दिन पहले AMU छात्रों द्वारा रिपब्लिक टीवी के क्रू को परेशान किया गया था जिसके बाद उपद्रवी छात्रों के ख़िलाफ़ धारा 307 और धारा 153 के तहत टीवी क्रू ने स्थानीय पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी।

AMU कैंपस में उपद्रवी छात्रों ने रिपब्लिक टीवी के पत्रकारों को धमकाया था, जिसमें एक महिला पत्रकार भी शामिल थी। भीड़ ने महिला क्रू मेंबर्स को धमकी दी थी कि किसी भी कीमत पर महिला होने की वजह से उन्हें नहीं बख्शा जाएगा। यही नहीं छात्रों ने महिला पत्रकार के साथ अभद्रता करते हुए उसका कैमरा भी तोड़ दिया था।

द वायर ने इस घटना के बारे में एक झूठी कहानी गढ़कर एएमयू के गुंडागर्दी कर रहे छात्रों का समर्थन करते हुए कहा कि रिपब्लिक टीवी वालों ने ही भड़काया था। हालाँकि, एक विडम्बना ये भी है कि एएमयू में पाकिस्तान समर्थक नारे लगाए जाने की ख़बर को मुख्यधारा की मीडिया बहुत अधिक गंभीरता से नहीं ले रही है।

इमाम ने स्कूली बच्ची को बनाया हवस का शिकार, पकड़े जाने पर कहा ‘बीवी है मेरी’

केरल पुलिस ने एक नाबालिग लड़की के यौन शोषण के मामले में थोलिकोड (Tholicode) के मुख्य इमाम और केरल इमाम काउंसिल के सदस्य शफ़ीक़ अल क़ासिमी के ख़िलाफ़ POCSO अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया है।

ख़बरों के अनुसार, मस्जिद कमेटी के बयान के बाद मामला दर्ज किया गया था, जिसमें कहा गया था कि इमाम ने एक 15 वर्षीय लड़की को बहका कर जंगल में ले जाकर बच्ची का यौन उत्पीड़न किया। स्थानीय महिलाओं के एक समूह ने जब इमाम को एक स्कूल जाने वाली लड़की के साथ देखा तो भेद खुल गया।

थोलिकोड मुस्लिम मस्जिद के अध्यक्ष की शिकायत के पर मंगलवार को तिरुवनंतपुरम के नेदुमंगद (Nedumangad) के विथुरा पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज किया गया। कहा जाता है कि इमाम भी उसी मस्जिद में काम किया करता था। घटना की सूचना मिलने के बाद, दरिंदे शफ़ीक़ को मस्जिद और इमाम परिषद में उनके पद से हटा दिया गया था।

रिपोर्ट के अनुसार, कई गवाहों द्वारा नाबालिग के यौन उत्पीड़न की पुष्टि की गई है। मस्जिद के अध्यक्ष बदुशा (Badusha) द्वारा इन गवाहों के बयान का एक ऑडियो क्लिप जारी की गई थी। मस्जिद के सदस्यों द्वारा जाँच शुरू करने के बाद इस पूरे मामले का खुलासा हो गया है। रिपोर्ट के अनुसार, जब स्थानीय महिलाओं ने इमाम से सवाल किया, तो उसने झूठ बोला कि बच्ची उसकी पत्नी थी। जब महिलाओं ने बच्ची के यूनिफॉर्म और स्कूल के बैज पर ध्यान दिया, तो उन्हें संदेह हुआ।

जब महिलाओं ने सवाल किया कि 15 साल की लड़की 40 वर्षीय व्यक्ति की पत्नी कैसे हो सकती है, तब इमाम आपा खोने लगा और ख़ुद ही चिल्लाता हुआ वहाँ से भाग निकला।

बता दें कि मदरसों और चर्च में एक के बाद एक यौन उत्पीड़न के मामले सामने आ रहें हैं, कुछ दिन पहले केरल के एक पादरी पर चर्च की ननों के यौन उत्पीड़न का मामला सामने आया था।

देसी वैलेंटाइन: भारत के वो मेले जहाँ लोग अपना जीवन साथी खुद चुनते हैं

इस दुनिया में हर किसी को एक जीवन साथी चाहिए होता है जिसके लिए आजकल शहरों में रहने वाले लड़के-लड़कियाँ तरह-तरह के जतन करते हैं। लेकिन भारत के कुछ भागों में प्राचीनकाल से ही आदिवासी समुदाय के लोग द्रौपदी के स्वयंवर से प्रेरित ऐसे आयोजन का हिस्सा बनते रहे हैं जहाँ लड़के-लड़कियाँ अपना जीवन साथी स्वयं चुनते हैं।

गुजरात के सुरेन्द्रनगर ज़िले में तरनेतर का मेला लगता है जहाँ पारंपरिक नृत्य इत्यादि होते हैं। विवाहिताएँ तो काले लहंगे में नाचती हैं लेकिन जो लड़कियाँ लाल लहंगे में नाचती हैं उन्हें वर चाहिए होता है। त्रिनेत्रेश्वर महादेव के मंदिर के पास लगने वाले मेले में यह परंपरा 200-250 वर्षों से चली आ रही है। यह मेला आज भी लगता है तथा कुछ मात्रा में जीवनसाथी पसन्द भी किए जाते हैं।

छत्तीसगढ़ में ऐसा ही भगोरिया मेला लगता है। भगोरिया एक उत्सव है जो होली का ही एक रूप है। यह मध्य प्रदेश के मालवा अंचल के आदिवासी इलाकों में बेहद धूमधाम से मनाया जाता है। भगोरिया के समय धार, झाबुआ, खरगोन आदि क्षेत्रों के हाट-बाजार मेले का रूप ले लेते हैं और हर तरफ फागुन और प्यार का रंग बिखरा नजर आता है।

भगोरिया हाट-बाजारों में युवक-युवती बेहद सजधज कर अपने भावी जीवनसाथी को ढूँढने आते हैं। इनमें आपसी रज़ामंदी ज़ाहिर करने का तरीका भी बेहद निराला होता है। सबसे पहले लड़का लड़की को पान खाने के लिए देता है। यदि लड़की पान खा ले तो हाँ समझी जाती है। इसके बाद लड़का लड़की को लेकर भगोरिया हाट से भाग जाता है और दोनों विवाह कर लेते हैं। इसी तरह यदि लड़का लड़की के गाल पर गुलाबी रंग लगा दे और जवाब में लड़की भी लड़के के गाल पर गुलाबी रंग मल दे तो भी रिश्ता तय माना जाता है।

बिहार के मिथिला क्षेत्र के मधुबनी में सौराठ सभा अर्थात दूल्हों का मेला लगता है। यह मेला हर साल ज्येष्ठ या अषाढ़ महीने में 7 से 11 दिनों तक लगता है जिसमें कन्याओं के पिता योग्य वर को चुनकर अपने साथ ले जाते हैं। यह एक प्रकार से सामूहिक अरेंज मैरिज होता है। इस सभा में लड़के अपने पिता व अन्य अभिभावकों के साथ आते हैं। कन्या पक्ष के लोग वरों और उनके परिजनों से बातचीत कर एक-दूसरे के परिवार कुल-खानदान के बारे में पूरी जानकारी इकट्ठा करते हैं और दूल्हा पसंद आने पर रिश्ता तय कर लेते हैं।

सौराठ सभा में पारंपरिक पंजीकार होते हैं जो तय हो चुके रिश्ते का पंजीकरण करते हैं। पंजीकार के पास वर और कन्या पक्ष की वंशावली होती है। उसमें पंजीकार दोनों तरफ की सात पीढ़ियों के उतेढ़ (विवाह का रिकॉर्ड) का मिलान करते हैं। दोनों पक्षों के उतेढ़ देखने पर जब पुष्टि हो जाती है कि दोनों परिवारों के बीच सात पीढ़ियों में इससे पहले कोई वैवाहिक संबंध नहीं हुआ है, तब पंजीकार रिश्ता पक्का करने की स्वीकृति देता है।

छत्तीसगढ़ की मुरिया और गोंड जनजाति के लोगों में लड़के लड़कियों के स्वछंद मिलन की प्रथा है जिसे घोटुल कहा जाता है। घोटुल एक बड़े कुटीर को कहते हैं जिसमें पूरे गाँव के बच्चे या किशोर सामूहिक रूप से रहते हैं। यह छत्तीसगढ़ के बस्तर ज़िले और महाराष्ट्र व आंध्र प्रदेश के पड़ोसी इलाक़ों के गोंड ग्रामों में विशेष रूप से मिलते हैं। अलग-अलग क्षेत्रों की घोटुल परंपराओं में अंतर होता है।

कुछ में बच्चे घोटुल में ही सोते हैं और अन्य में वे दिन भर वहाँ रहकर रात को अपने-अपने घरों में सोने जाते हैं। घोटुल में क़बीले से संबंधित आस्थाएँ, ज्ञान, नृत्य-संगीत और कथाएँ सीखी जाती है। कुछ में किशोर किशोरियाँ आपस में बिना बाधा मिलकर जीवन साथी भी चुना करते हैं जिसे आज के ज़माने की ‘डेटिंग’ जैसा समझा जा सकता है। हालाँकि यह आधुनिक शहरी मान्यताओं के दबाव में धीरे-धीरे कम हो रहा है।

इसी प्रकार उत्तराखंड की भोटिया जनजाति में ‘रड़-बड़ विवाह’ की प्रथा हुआ करती थी, जिसमें महिलाओं को अपना वर चुनने का अधिकार होता था। इस प्रथा में विशाल मेले का आयोजन किया जाता था और लोग बड़ी मात्रा में इसमें हिस्सा लेकर अपना मनचाहा जीवन साथी चुन सकते थे। यह परंपरा उत्तराखंड में प्राचीन समय से ही महिलाओं की इच्छाओं के मान सम्मान का भी परिचायक है।

स्रोत:- विकिपीडिया और अन्य वेबसाइट से संकलित