डोनाल्ड ट्रंप की महत्वाकांक्षी टैरिफ (टैक्स) नीति खुद अमेरिकी अर्थव्यवस्था और वहाँ के आम नागरिकों के लिए बड़ी मुसीबत बन गई है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के अर्थशास्त्रियों की एक नई रिपोर्ट ने चौंकाने वाला खुलासा किया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, इन भारी-भरकम शुल्कों से विदेशी निर्यातकों पर कोई असर नहीं पड़ा, बल्कि अमेरिकी खरीदारों को अब महँगे दामों पर घटिया क्वॉलिटी का सामान खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
दरअसल, जब साल 2025 में ये टैक्स लगाए गए थे, तब दावा किया गया था कि विदेशी कंपनियाँ अमेरिकी बाजार में टिके रहने के लिए अपने दाम कम कर देंगी और इससे अमेरिका में रोजगार बढ़ेंगे। लेकिन आईएमएफ (IMF) के अर्थशास्त्रियों जेबीन आन, लोरेंजो रोटुनो और मिशेल रूटा ने जब अमेरिकी सीमा शुल्क और सेंसस ब्यूरो के आँकड़ों की बारीकी से जाँच की, तो सच कुछ और ही निकला। इस रिसर्च ने यह साबित कर दिया है कि ट्रंप की हाई रेसिप्रोकल टैरिफ नीति अपने उद्देश्यों में न केवल विफल रही है, बल्कि उसने अमेरिकी बाजार को सस्ते और निम्न गुणवत्ता वाले उत्पादों का डंपिंग ग्राउंड बनाने की शुरुआत कर दी है।
IMF पेपर का स्क्रीनशॉट
विदेशी निर्यातकों ने कीमतें घटाने से साफ इनकार
आर्थिक सिद्धांतों के अनुसार, जब कोई बड़ा देश किसी आयातित वस्तु पर भारी शुल्क लगाता है, तो अगर उस देश की बाजार में धाक (मोनोप्सोनी पावर) हो, तो विदेशी निर्यातक अपनी वस्तुओं की मूल कीमतों में कटौती कर लेते हैं ताकि वे प्रतिस्पर्धी बने रह सकें। इसे अर्थशास्त्र में ‘टैरिफ एब्जॉर्प्शन’ या निर्यातकों द्वारा लागत का बोझ उठाना कहा जाता है। ट्रंप प्रशासन को भी यही उम्मीद थी कि चीन, मैक्सिको, कनाडा और यूरोपीय संघ जैसे बड़े हिस्सेदार अमेरिकी बाजार में टिके रहने के लिए अपने उत्पादों के दाम घटाएंगे।
लेकिन आईएमएफ के बारीक प्रॉडक्ट-लेवल डेटा विश्लेषण से जो बात सामने आई है, वह इसके बिल्कुल विपरीत है। विदेशी निर्यातकों ने अमेरिकी टैरिफ के जवाब में अपनी कीमतों में कोई कटौती नहीं की। यदि उत्पाद के स्तर पर सबसे सूक्ष्म ‘वेरायटी’ (यानी किसी खास देश से आने वाला विशिष्ट उत्पाद) की जाँच की जाए, तो शुल्क हटाने के बाद की कीमतें (Duty-Exclusive Prices) लगभग वैसी ही बनी रहीं जैसी टैरिफ लागू होने से पहले थीं।
IMF द्वारा जारी किया गया चार्ट
इसका सीधा और साफ मतलब यह है कि ट्रंप द्वारा लगाए गए टैक्स का पूरा का पूरा बोझ अमेरिकी आयातकों (Importers) और अंततः वहाँ के आम उपभोक्ताओं की जेब पर ट्रांसफर हो गया।
इस रिसर्च पेपर के सामने आने के बाद अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की पूर्व डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर गीता गोपीनाथ ने सोशल मीडिया पर बयान जारी करते हुए लिखा, “टैरिफ से अभी भी कोई अच्छी खबर नहीं है। नए शोध से पता चलता है कि टैरिफ के कारण अमेरिका द्वारा आयात किए जाने वाले उत्पादों की गुणवत्ता में भारी गिरावट आई है। सीधे शब्दों में कहें तो, टैरिफ ने निर्यात की कीमतों को कम करने में बहुत कम काम किया और इसके बजाय हम सस्ते, कम गुणवत्ता वाले आयात की ओर मुड़ गए। उच्च कीमतों का भुगतान करने के अलावा सामान की गुणवत्ता भी घट गई है।”
Still no good news from the tariffs. New research from Ahn, Rotunno, Ruta show that tariffs have led to a drop in the *quality* of products the US imports. So basically, the tariffs did little to reduce the prices of exports to the US and instead we rotated to cheaper lower…
महँगे लेकिन अच्छे सप्लायर्स OUT, सस्ते और घटिया सप्लायरों की एंट्री
अब सवाल यह उठता है कि यदि व्यक्तिगत स्तर पर वस्तुओं की कीमतें नहीं घटीं, तो फिर अमेरिका के कुल आयात मूल्य (Import Bill) में जो थोड़ी-बहुत गिरावट या बदलाव दिखाई दे रहा है, उसकी असली वजह क्या है? आईएमएफ के शोधकर्ताओं ने इसके पीछे एक बेहद जटिल और महत्वपूर्ण आर्थिक प्रक्रिया को उजागर किया है, जिसे ‘इंपोर्ट रीएलोकेशन’ (आयात का पुनर्वितरण) कहा जाता है।
जब अमेरिका ने कुछ खास देशों या उत्पादों पर भारी शुल्क लगाया, तो उन देशों से आने वाले बेहतरीन और उच्च गुणवत्ता वाले उत्पाद अमेरिकी आयातकों के लिए बहुत महँगे हो गए। परिणामस्वरूप अमेरिकी कंपनियों ने उन स्थापित, ब्रांडेड और उच्च कीमत वाले सप्लायर्स से नाता तोड़ना या कम करना शुरू कर दिया। उनके स्थान पर आयातकों ने ऐसे नए देशों और सप्लायर्स की खोज की जिन पर टैरिफ की मार कम थी या जिनके उत्पाद बुनियादी रूप से बहुत सस्ते थे।
इस शोध के आँकड़े बताते हैं कि अध्ययन की अवधि के दौरान अमेरिका की औसत प्रभावी टैरिफ दरें लगभग 8 प्रतिशत बढ़ गईं। इस बढ़ोतरी के कारण कुल आयात मात्रा में करीब 3.6% की गिरावट दर्ज की गई। लेकिन सबसे बड़ा खेल प्रॉडक्ट बास्केट के भीतर हुआ। टैरिफ बढ़ने के बाद अधिक कीमत और उच्च गुणवत्ता वाले सप्लायर्स के अमेरिकी बाजार छोड़ने की संभावना नाटकीय रूप से बढ़ गई, जबकि कम कीमत वाले नए सप्लायर्स ने बड़ी तेजी से अमेरिकी बाजार में एंट्री मारी। आईएमएफ के अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि कीमतों में जो भी थोड़ी-बहुत गिरावट या स्थिरता ऊपरी तौर पर दिखाई दे रही है, उसमें से लगभग 65% की वजह सप्लायर्स बदलने का यही पैटर्न था।
गुणवत्ता में गिरावट की कड़वी सच्चाई का ‘अपील स्कोर’ में हुआ खुलासा
ट्रंप प्रशासन इस बात की पीठ थपथपा सकता था कि सप्लायर्स बदलने से अमेरिका को कम कीमत पर सामान मिल रहा है, लेकिन आईएमएफ की रिसर्च ने इस भ्रामक खुशी को भी एक बड़े झटके में बदल दिया है। रिसर्चर्स का स्पष्ट तर्क है कि कम कीमत का मतलब हमेशा बेहतर मूल्य या बचत नहीं होता। यह बचत केवल इसलिए दिख रही है क्योंकि अमेरिका अब घटिया उत्पाद खरीद रहा है।
शोधकर्ताओं ने साल 2023 और 2024 के बेसलाइन डेटा का उपयोग करके विभिन्न देशों के उत्पादों का एक ‘अपील स्कोर’ (Product Appeal Score) तैयार किया था। उपभोक्ता माँग के सिद्धांतों के तहत जो उत्पाद ऊँची कीमत के बावजूद बाजार में अपनी मजबूत हिस्सेदारी बनाए रखते हैं, उनका अपील स्कोर अधिक माना जाता है क्योंकि उपभोक्ता उनकी गुणवत्ता, टिकाऊपन और ब्रांड वैल्यू को पसंद करते हैं। जब आईएमएफ ने 2025 के टैरिफ के बाद आए नए सप्लायर्स के उत्पादों के अपील स्कोर की जाँच की तो पाया कि अमेरिकी आयातकों को आकर्षित करने वाले इन नए सप्लायर्स का स्कोर बेहद खराब था।
जब इन गुणवत्ता संबंधी अंतरों को सांख्यिकीय मॉडलों में शामिल किया गया, तो कीमतों में दिखने वाला सारा का सारा फायदा हवा हो गया। आईएमएफ के अध्ययन का अनुमान है कि 2025 के टैरिफ के बाद कीमतों में देखी गई तथाकथित गिरावट का लगभग आधा हिस्सा (तकरीबन 50%) असल में कुछ और नहीं, बल्कि उच्च गुणवत्ता से निम्न गुणवत्ता यानी कम-क्वालिटी वाले सप्लायर्स की ओर मजबूरन किया गया झुकाव था।
साल 2024-25 और 2017-19 के टैरिफ एपिसोड के दौरान विभिन्न उत्पादों के भीतर शुल्क दरों में आए उतार-चढ़ाव का विश्लेषण, फोटो साभार: IMF Report
दिलचस्प बात यह है कि इंपोर्ट का यह पैटर्न पहली बार नहीं देखा जा रहा है। आईएमएफ के अर्थशास्त्रियों ने अपने शोध में साल 2018-19 के दौरान हुए प्रसिद्ध अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध (US-China Tariff Tension) के डेटा की भी दोबारा पड़ताल की। उस दौरान भी ट्रंप ने चीन पर भारी टैरिफ लगाए थे। तब भी यह देखा गया था कि चीन के निर्यातकों ने अपनी कीमतें कम नहीं की थीं, बल्कि अमेरिकी खरीदार वियतनाम, ताइवान और अन्य दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों की ओर स्थानांतरित हो गए थे।
साल 2018-19 और 2025 के इन दोनों आर्थिक झटकों की तुलना करने पर यह साफ हो जाता है कि टैरिफ का असर निर्यातकों की जेब पर पड़ने के बजाय हमेशा आयात बास्केट की संरचना को बिगाड़ने में होता है। 2018-19 में जहाँ केवल चीन को निशाना बनाया गया था, इसलिए रीएलोकेशन का दायरा थोड़ा सीमित था, वहीं 2025 के टैरिफ अधिक व्यापक और अनिश्चितता से भरे थे। इसके बावजूद, बुनियादी आर्थिक व्यवहार नहीं बदला, बल्कि दोनों ही बार अमेरिकी आयातकों को अंततः निम्न गुणवत्ता वाले इनपुट और उत्पादों की शरण में जाना पड़ा।
अमेरिका पर ही मंडरा रहा लंबे समय का खतरा
यह स्थिति सिर्फ आम उपभोक्ताओं द्वारा रोजमर्रा के इस्तेमाल में लाए जाने वाले कपड़ों, जूतों या इलेक्ट्रॉनिक्स की घटिया क्वॉलिटी तक सीमित नहीं है। इसका एक अधिक खतरनाक पहलू अमेरिकी विनिर्माण क्षेत्र की उत्पादकता (Productivity) से जुड़ा है। अमेरिका में आयात होने वाले सामान का एक बहुत बड़ा हिस्सा कच्चा माल, मध्यवर्ती वस्तुएँ (Intermediate Goods) और पूँजीगत उपकरण (Capital Goods) होते हैं, जिनका उपयोग अमेरिकी फैक्ट्रियाँ अपने अंतिम उत्पाद बनाने के लिए करती हैं।
जब अमेरिकी फैक्ट्रियाँ टैरिफ के डर से उच्च गुणवत्ता वाले पुराने सप्लायर्स को छोड़कर सस्ते और कम अपील स्कोर वाले नए सप्लायर्स से मशीनरी या पुर्जे आयात करती हैं, तो उनकी खुद की उत्पादन क्षमता और उत्पाद की गुणवत्ता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। औद्योगिक सर्वेक्षणों के अनुसार, विनिर्माण क्षेत्र के अधिकांश गुणवत्ता प्रबंधकों (Quality Leaders) ने स्वीकार किया है कि टैरिफ और व्यापारिक बाधाओं के कारण उनके लिए अपने अंतिम उत्पादों की गुणवत्ता बनाए रखना बेहद कठिन हो गया है।
उदाहरण के लिए, कपड़ा और परिधान उद्योग में स्थापित सप्लायर्स से हटकर नए देशों में ट्रांसफर की गई सप्लाई चेन के कारण शिपमेंट में डिफेक्ट (खामियों) की दरें तेजी से बढ़ी हैं। इसका सीधा नुकसान अमेरिकी कंपनियों को उठाना पड़ रहा है, क्योंकि उनके उत्पाद वैश्विक बाजार में अपनी प्रतिस्पर्धात्मकता खो रहे हैं।
डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों में संरक्षणवाद की नीतिगत विफलता का सबक
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की इस रिपोर्ट ने साफ कर दिया है कि डोनाल्ड ट्रंप की यह नीति खुद अमेरिका के पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसी साबित हुई है। ऐसे में ट्रंप की टैरिफ नीति ‘अँधेरे में तीर चलाने’ जैसी साबित हुई है, जिसका निशाना दुश्मन पर नहीं बल्कि खुद के पैरों पर लगा है। बाहरी देशों को सबक सिखाने के चक्कर में इस नीति ने खुद अमेरिका के बाजार को बिगाड़ दिया है। सस्ते और घटिया सामानों पर निर्भरता भले ही कागजों पर आयात का खर्च थोड़ा कम दिखा दे, लेकिन लंबे समय में यह देश की अर्थव्यवस्था को खोखला कर रही है।
आईएमएफ का यह वर्किंग पेपर दुनिया भर के नीति निर्माताओं के लिए एक कड़ा सबक है कि संरक्षणवाद की दीवारें अक्सर बाहर के दुश्मनों को रोकने के बजाय, भीतर की आर्थिक खुशहाली और उत्पाद की गुणवत्ता का दम घोंट देती हैं। ट्रंप के टैरिफ ने अमेरिका को आत्मनिर्भर बनाने के बजाय, अनजाने में एक ऐसे चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है जहाँ महँगाई और घटियापन एक साथ उसकी अर्थव्यवस्था का स्वागत कर रहे हैं। यह पूरी दुनिया के लिए सबक है कि संरक्षणवाद (अपने बाजार को बंद करने) की दीवारें अक्सर फायदे के बजाय खुद का ही दम घोंट देती हैं।
शिक्षा व्यवस्था में सुधारों और परीक्षाओं में गड़बड़ी के खिलाफ शुरू हुआ ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) का आंदोलन अब एक नया मोड़ ले चुका है। 20 दिनों से अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक को दिल्ली पुलिस द्वारा सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराए जाने के बाद, जंतर-मंतर पर चल रहे इस प्रदर्शन की कमान पूरी तरह से ‘डफलीबाज गैंग’ यानी वामपंथी छात्र संगठनों (AISA और SFI) के हाथों में आती दिख रही है।
एक तरफ जहाँ गैर-राजनीतिक होने का दावा करने वाले इस आंदोलन को फ्रंट से लीड करने के लिए वामपंथी नेता आगे आ गए हैं, वहीं दूसरी ओर सोशल मीडिया और प्रदर्शन स्थल पर इन लीडर्स के ‘फर्जी अनशन’ और ‘पर्दे के पीछे के ड्रामे’ को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
सोनम वांगचुक के जाते ही फ्रंट पर आए AISA के चेहरे
अब तक इस आंदोलन को गैर-राजनीतिक बनाए रखने की कोशिश की जा रही थी, लेकिन जैसे ही शनिवार (18 जुलाई 2026) सुबह को सोनम वांगचुक को खराब स्वास्थ्य के कारण दिल्ली हाई कोर्ट के आदेशानुसार सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया, इतने ही पर्दे के पीछे सक्रिय वामपंथी संगठनों ने मंच पर कब्जा जमा लिया।
After Sonam Wangchuk left, the stage was empty, so Abhijeet Dipke put AISA's Fraud, Neha Bora, on the stage instead.
Neha leaves for home every night at 11 PM. A Tata Nexon comes to pick her up every single day, and she returns to the protest only around 12 PM the next… pic.twitter.com/xASSOyffzA
विशेष रूप से ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) के तीन बड़े चेहरे नेहा बोरा, अमीन अमितोज और मनीष कुमार जो जेएनयू (JNU), आंबेडकर यूनिवर्सिटी दिल्ली (AUD) और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के PhD स्कॉलर्स हैं, अब खुद को आंदोलन का मुख्य चेहरा साबित करने में जुटे हैं।
इनका दावा है कि वे सोनम वांगचुक के साथ ही पिछले 21 दिनों से अनशन पर बैठे हैं। लेकिन प्रदर्शन स्थल पर मौजूद लोग और सोशल मीडिया पर आ रही जानकारियाँ कुछ और ही कहानी बयाँ कर रहे हैं।
अनशन या महज राजनीतिक प्रोपेगेंडा?
जब से AISA की नेहा बोरा की अनशन पर सवाल उठे हैं और उनके बेनकाब होने की बातें सामने आई हैं, तब से प्रदर्शन स्थल पर एक नया ड्रामा देखने को मिल रहा है। खुद को सचमुच 21 दिनों से भूखा दिखाने के लिए अब वह व्हीलचेयर का सहारा ले रही हैं, ताकि यह प्रदर्शित किया जा सके कि वह चलने-फिरने में भी असमर्थ हैं।
Ever since I exposed AISA's Neha Bora on her fake hunger strike, she has been putting on a full drama to show that she has genuinely been on a hunger strike at the CJP protest for 21 days.
Now she has brought out a wheelchair to show that she can't even walk. Tonight at 11 PM, a… pic.twitter.com/Snj4r18gkd
गंभीर विरोधाभास तब सामने आया जब सरकारी डॉक्टरों की टीम इन AISA सदस्यों का मेडिकल चेक-अप करने पहुँची। 21 दिनों से अनशन का दावा करने वाले इन छात्र नेताओं ने सरकारी डॉक्टरों से इलाज कराने से साफ इनकार कर दिया। इस इनकार ने आंदोलन की साख पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है।
रात में मटन बिरयानी और सीख कबाब का गुप्त मेन्यू
प्रदर्शन स्थल के आस-पास से सामने आए वीडियोज के हवाले से यह दावा किया जा रहा है कि इन वामपंथियों का अनशन महज दिन के उजाले और कैमरों के सामने तक ही सीमित है। कई ऐसे वीडियो सामने आए है जिनमें ये तथाकथित अनशनकारी रात के अंधेरे में अपनी अनशन तोड़ते हुए मटन बिरयानी और सीख कबाब का लुत्फ उठाते देखे गए हैं।
These AISA and SIF students who have been on a hunger strike for the past 20 days are all frauds.
They eat mutton, chicken, and kebabs at night, and poori-bhaji and rajma-chawal during the day at the CJP protest site.
यही वजह है कि दिल्ली पुलिस ने इन्हें अस्पताल ले जाने में कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई, क्योंकि इनका स्वास्थ्य सोनम वांगचुक की तरह वास्तव में गंभीर नहीं था। यहाँ तक कि खुद को आंदोलन का कर्ता-धर्ता बताने वाले इन लीडर्स को लेकर प्रदर्शनकारियों के बीच ही फूट पड़ गई है।
अनशन पर बैठे 3 AISA लीडर्स: कौन हैं ये चेहरे और क्या हैं इनके दावे?
नेहा बोरा जेएनयू से PhD की छात्रा है और AISA की एक सक्रिय सदस्य है। आंदोलन के शुरुआती दिनों से ही वह मंच के आस-पास सक्रिय थी। हाल ही में सोशल मीडिया पर उनके फर्जी अनशन के खुलासे के बाद वे भारी विवादों में घिर गई हैं।
आलोचकों का दावा है कि अपनी अनशन को सच साबित करने और सहानुभूति बँटोरने के लिए वे अब व्हीलचेयर का इस्तेमाल कर रही हैं, जबकि डॉक्टरों की जाँच से वे लगातार बच रही हैं।
अंबेडकर यूनिवर्सिटी का PhD स्कॉलर अमीन अमितोज भी नेहा के साथ 21 दिनों से अनशन पर बैठने का दावा कर रहा है। प्रदर्शन स्थल पर मौजूद वॉलंटियर डॉक्टरों के मुताबिक, लंबे समय तक भूखे रहने के दावों के बीच अमीन के मसूड़ों से खून आने की शिकायत सामने आई है, जिसे डॉक्टर विटामिन-C और प्रोटीन की भारी कमी या लीवर को हो रहे नुकसान का संकेत मान रहे हैं। हालाँकि सरकारी मेडिकल टीम के सामने इसने भी स्वास्थ्य परीक्षण कराने से इनकार कर दिया।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ताल्लुक रखने वाला PhD स्कॉलर मनीष कुमार इस तिकड़ी का तीसरा सदस्य है। दिल्ली पुलिस की कार्रवाई पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए मनीष ने कहा था, “जब पुलिस ने सोनम वांगचुक को उठाया, तो उन्होंने हमें भी पकड़ने की कोशिश की, लेकिन भीड़ ने हमें घेर लिया।” मनीष की स्थिति भी अमीन की तरह ही बताई जा रही है, जहाँ शरीर में पोषक तत्वों की भारी कमी के लक्षण दिख रहे हैं।
हालाँकि एक तरफ प्राइवेट डॉक्टरों द्वारा इन्हें गंभीर रूप से बीमार बताया जाना और दूसरी तरफ सरकारी डॉक्टरों को चेक-अप न करने देना, रात में बिरयानी और कबाब खाकर अनशन तोड़ने के वीडियो सामने आने की बातें, इन तीनों लीडर्स को संदेह के घेरे में खड़ा करती हैं।
क्या था असली आंदोलन और कैसे बदला इसका स्वरूप?
दरअसल यह पूरा आंदोलन मई के महीने में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) नाम से एक ऑनलाइन व्यंग्यात्मक मुहिम के रूप में शुरू हुआ था। इसका मुख्य उद्देश्य देश की शीर्ष प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे NEET में हुए पेपर लीक और प्रशासनिक अनियमितताओं का विरोध करना था।
सोशल मीडिया पर युवाओं और छात्रों के थोड़े से समर्थन के बाद यह आंदोलन जंतर-मंतर पर जमीनी धरने में बदल गया, जहाँ प्रदर्शनकारी खुद को ‘कॉकरोच’ कहकर संबोधित करते हैं।
इनकी मुख्य माँग केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा है। शिक्षा मंत्री ने इस आंदोलन को पहले ही माहौल खराब करने वाला करार देकर खारिज कर दिया था। आंदोलन को तब बड़ी ताकत मिली जब सोनम वांगचुक इसमें शामिल हुए और सिर्फ नमक-पानी पर रहकर 20 दिनों तक उपवास किया, जिसके कारण उनका वजन 9 किलोग्राम से अधिक घट गया।
दिल्ली पुलिस की कार्रवाई और राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ
शनिवार (18 जुलाई 2026) की सुबह करीब 07:30 बजे भारी पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने जंतर-मंतर पर पहुँचकर सोनम वांगचुक को चादरों के घेरे में लिया और एम्बुलेंस के जरिए सफदरजंग अस्पताल पहुँचाया। अस्पताल की मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ चारू बांबा के अनुसार, वांगचुक स्थिर और सचेत हैं, हालाँकि लंबे अनशन के कारण उन्हें कमजोरी और डिहाइड्रेशन है।
In the morning, as per directions of Hon’ble High court as well as a routine daily scheduled check up, doctors arrived for medical examination of Shri Sonam Wangchuk. There was obstructions caused by some protestors. This created some commotion also.
पुलिस का कहना है कि यह कार्रवाई दिल्ली हाई कोर्ट के उस आदेश के तहत की गई है जिसमें सरकार को नियमित रूप से वांगचुक के स्वास्थ्य की निगरानी करने और जरूरत पड़ने पर तुरंत इलाज मुहैया कराने का निर्देश दिया गया था।
सोनम वांगचुक की अनुपस्थिति में अब CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके ने अनिश्चितकालीन उपवास शुरू कर दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि 20 जुलाई 2026 को संसद मार्च हर हाल में आयोजित किया जाएगा। वांगचुक के हटाए जाने के बाद अब CJP ने सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस्तीफे की माँग शुरू कर दी है।
हालाँकि AISA और वामपंथियों द्वारा आंदोलन को हाई जैक करने और सुबह अनशन का दिखावा कर रात में बिरयानी खाने जैसी चर्चाओं ने इस पूरे मोर्चे की साख को भारी नुकसान पहुँचाया है।
पेपर लीक मामले में छात्रों के नाम पर महीनों तक सियासत चमकाने और अंततः वहाँ पूरी तरह फेल रहने के बाद कॉन्ग्रेस ने अब संसद के मॉनसून सत्र से पहले अपनी राजनीति को जीवित रखने के लिए एक नया तमाशा खड़ा करने की कोशिश शुरू कर दी है। अयोध्या के राम मंदिर चंदा चोरी केस को लेकर अब कॉन्ग्रेस की नींद टूटी है, जब उस मामले पर जाँच अपने अंतिम दौर में पहुँच चुकी है।
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संयुक्त पत्र लिखकर इस मामले में हस्तक्षेप की माँग की है। ध्यान देने वाली बात है कि इन्होंने मॉनसून सत्र से ठीक पहले ये चिट्ठी लिखी है, ताकि इस सत्र में भी देश के बाकी मुद्दों को साइड कर इस संवेदनशील मुद्दे पर हंगामा खड़ा कर सकें।
"Your silence now in the face of such a crime is unacceptable. It is your duty to ensure accountability and restitution."
राजनीतिक लाभ के लिए करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था पर चोट
यह कोई पहली बार नहीं है जब कॉन्ग्रेस ने राम मंदिर से जुड़े मुद्दों पर राजनीति करने का प्रयास किया हो, लेकिन इस बार उसने सीधे तौर पर करोड़ों राम भक्तों की श्रद्धा को अपने सियासी एजेंडे का मोहरा बना लिया है। पीएम मोदी को लिखे गए पत्र में राहुल गाँधी और मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा, “आप राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में हजारों करोड़ रुपए की चोरी से वाकिफ हैं। जिन लाखों श्रद्धालुओं ने अपनी गाढ़ी कमाई, श्रद्धा, भक्ति और विश्वास के साथ दान की थी, वो इस चोरी से खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।”
पेपर लीक मामले में सरकार को घेरने में नाकाम रहने के बाद जनता का ध्यान भटकाने और देश का सियासी पारा गरमाने के लिए कॉन्ग्रेस ने जानबूझकर इस संवेदनशील विषय को चुना है। चिट्ठी के जरिए कॉन्ग्रेस ने न केवल सरकार पर हमला बोला है बल्कि हमेशा की तरह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और विश्व हिंदू परिषद (VHP) को भी लपेटे में ले लिया है।
पत्र में विपक्षी नेताओं ने प्रधानमंत्री मोदी से कहा कि उन्होंने खुद सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर संसद में इस ट्रस्ट के गठन की घोषणा की थी लेकिन इसके सदस्यों की नियुक्ति में पक्षपात किया गया। राहुल और खरगे ने पत्र में साफ तौर पर लिखा है, “ये सार्वजनिक रूप से सभी को पता है कि ट्रस्ट के सदस्य RSS, VHP और उनसे जुड़े संगठनों से जुड़े हैं। इसके कलंकित पूर्व महासचिव भी आपके करीबी सहयोगी रहे हैं।”
इस तरह के बयानों से यह साफ झलकता है कि कॉन्ग्रेस का वास्तविक मकसद किसी जाँच से ज्यादा वैचारिक रूप से जुड़े संगठनों की छवि को धूमिल करना है।
क्या है कॉन्ग्रेस की बेवजह की 3 मुख्य माँगे? सीएम योगी पहले गठित कर चुके हैं SIT
अपनी राजनीति को धार देने के लिए कॉन्ग्रेस ने इस मामले में तीन बड़ी माँगें सामने रखी हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपनी ‘चुप्पी’ तोड़ने को कहा है। पत्र में लिखा गया है, “इतने बड़े अपराध के सामने आपकी मौजूदा चुप्पी बर्दाश्त से बाहर है। जवाबदेही और नुकसान की भरपाई तय करना आपका फर्ज है।”
इसके साथ ही दोनों नेताओं ने सीधे तौर पर माँग उठाई है कि वे तुरंत ट्रस्ट के वित्तीय मामलों की स्वतंत्र और व्यापक जाँच का आदेश दें जिसमें नकद, सोना और चाँदी सहित सभी चढ़ावों का प्रबंधन भी शामिल होना चाहिए। इतना ही नहीं कॉन्ग्रेस नेताओं ने कहा है कि इस जाँच के नतीजे और ट्रस्ट के खाते पूरी तरह सार्वजनिक किए जाने चाहिए।
ऐसा इसलिए ताकि हर श्रद्धालु को यह पता चल सके कि उनके चढ़ावे का इस्तेमाल कैसे किया गया है और इस पूरे मामले में जो भी लोग जिम्मेदार पाए जाएँ, उनके पद या प्रभाव की परवाह किए बिना उन्हें सख्त रूप से जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। बता दें कि मामला संज्ञान में आने के बाद यूपी की योगी सरकार ने 13 जून 2026 को ही SIT का गठन किया था।
इस टीम की अध्यक्षता लखनऊ मंडल के आयुक्त विजय विश्वास पंत (IAS) को दी गई थी। उनके साथ पुलिस स्तर पर जाँच की जिम्मेदारी आईजी रेंज किरन एस (IPS) को सौंपी गई थी, जो मामले के आपराधिक पहलू और सोशल मीडिया पर फैली अफवाहों की भी जाँच कर रहे थे।
वहीं, वित्त विभाग के विशेष सचिव नील रतन को दान राशि, ऑडिट और सभी वित्तीय प्रक्रियाओं की तकनीकी जाँच की जिम्मेदारी दी गई थी।
आपकी सरकार की विश्वसनीयता अब आपकी कार्रवाई पर निर्भर: राहुल गाँधी
प्रधानमंत्री को आधिकारिक पत्र भेजने के साथ ही राहुल गाँधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर भी इस मुद्दे को लेकर एक पोस्ट लिखी। उन्होंने लिखा, “प्रधानमंत्री जी, श्री राम मंदिर में करोड़ों श्रद्धालुओं ने आस्था के साथ अपनी कमाई अर्पित की – वहाँ हुई चंदा चोरी अब किसी से छुपी नहीं है। ट्रस्ट के हर सदस्य को आपकी सरकार ने चुना था।”
प्रधानमंत्री जी,
श्री राम मंदिर में करोड़ों श्रद्धालुओं ने आस्था के साथ अपनी कमाई अर्पित की – वहां हुई चंदा चोरी अब किसी से छुपी नहीं है।
ट्रस्ट के हर सदस्य को आपकी सरकार ने चुना था। इस चंदा चोरी पर आपकी चुप्पी अस्वीकार्य है।
उन्होंने लिखा, “इस चंदा चोरी पर आपकी चुप्पी अस्वीकार्य है। तत्काल स्वतंत्र जाँच कराइए, पूरा हिसाब सार्वजनिक कीजिए और दोषियों को कानून के कटघरे में लाइए। आपकी सरकार की विश्वसनीयता अब आपकी कार्रवाई पर निर्भर है।”
हालाँकि कॉन्ग्रेस इस मामले में जिस प्रकार का तमाशा खड़ा करने की कोशिश कर रही है, उसकी हवा पहले ही निकल चुकी है क्योंकि उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने इस अनियमितता की भनक लगते ही बेहद मुस्तैदी दिखाई थी। यूपी सरकार ने पिछले महीने 13 जून को ही इस पूरे मामले की निष्पक्ष जाँच के लिए SIT का गठन कर दिया था।
सोशल मीडिया पर उड़ीं अफवाहों का सच आ चुका है सामने
अपनी जाँच के दौरान SIT ने सोशल मीडिया और समाचार माध्यमों पर चल रही उन खबरों का भी बारीकी से संज्ञान लिया था, जिनमें करोड़ों के चढ़ावे और बहुमूल्य वस्तुओं के गायब होने के आरोप सीधे ट्रस्ट पर लग रहे थे। इसमें मुख्य रूप से तीन बड़ी खबरें थीं।
पहली खबर इंडियन बुलियन एंड ज्वेलर्स एसोसिएशन के उत्तर भारत के प्रमुख अनुराग रस्तोगी और सराफा एसोसिएशन द्वारा 38kg और 22 Kg से ज्यादा की चाँदी की ईंटें दान करने और उनके गायब होने से जुड़ी थी। दूसरी खबर विश्व सिंधी सेवा समाज के अध्यक्ष राजू मंडवानी द्वारा बिना रसीद के 200Kg चाँदी की ईंटें भेंट करने के दावे की थी।
तीसरी खबर मुंबई के व्यवसायी अनिल विश्वकर्मा के चाँदी के हार और चरण पादुकाओं को लेकर थी। ऑपइंडिया के पास मौजूद SIT रिपोर्ट के अनुसार, जब ट्रस्ट के बही-खातों और रिकॉर्ड का मिलान किया तो पाया कि सराफा संगठनों की चाँदी को तय प्रक्रिया के तहत गलाकर बैंक लॉकर में सुरक्षित रखा गया है।
वहीं सिंधी समाज और मुंबई के व्यवसायी का सारा सामान भी ट्रस्ट की सुरक्षित अभिरक्षा में मिला। इस तरह सोशल मीडिया के ट्रस्ट पर लगाए आरोप पूरी तरह झूठे साबित हुए, लेकिन SIT ने यह जरूर कहा कि भविष्य में ऐसी अफवाहों से बचने के लिए प्रबंधन व्यवस्था को और मजबूत तथा जवाबदेह बनाने की सख्त जरूरत है।
ऐसे में जब राज्य सरकार पहले ही कड़े कदम उठा चुकी है, तब कॉन्ग्रेस द्वारा पीएम मोदी की सीधी दखल की माँग करना और पत्र का आखिरी हिस्सा, “आपकी सरकार और ट्रस्ट की विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करती है कि आप कितनी पारदर्शिता और तेजी से काम करते हैं” लिखना केवल अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेकने का जरिया मात्र दिखाई देता है।
जब साल 1954 में जवाहरलाल नेहरू ने भारत और चीन के बीच तिब्बत मामले को लेकर ‘पंचशील’ का सिद्धांत दुनिया के सामने रखा था, ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ के नारों के बीच उस पंचशील का जो हश्र हुआ, वो आज पूरा देश जानता है- पीठ में छुरा घोंपा गया और नतीजा 1962 की शर्मनाक हार के रूप में सामने आया।
आज ‘पंचशील’ नाम का वही जहर जंतर-मंतर पर चल रहे प्रदर्शनों के बीच से निकलकर आया है। इसे जारी करने वाले हैं जाने-माने ‘आंदोलनजीवी’ योगेंद्र यादव, जो सोनम वांगचुक के अस्पताल में भर्ती होने के बाद से कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के मंच पर बैठने लगे हैं और इस पूरे प्रदर्शन को डायरेक्शन देने में जुट गए हैं।
CJP के मंच से योगेंद्र यादव के इस नए ‘पंचशील’ को देखें तो इसमें बड़ी-बड़ी बातें की गई हैं, जैसे मार्च में सिर्फ तिरंगा झंडा रखना, हाथ में संविधान या गाँधी-अंबेडकर-भगत सिंह की फोटो होना, जुबान पर ‘भारत माता की जय’ और ‘इंकलाब जिंदाबाद’ जैसे नारे होना, अनुशासन बनाए रखना और किसी भी हाल में हाथ न उठाना।
इस का पालन सभी को करना है,
पंचशील/ पाँच प्रतिज्ञा 1. मार्च में सिर्फ़ एक झंडा — तिरंगा। किसी पार्टी, किसी संगठन का और कोई झंडा नहीं होगा । 2. हाथ में या तो संविधान या फिर गांधी, आंबेडकर या भगत सिंह की तस्वीर रहेगी। 3. जुबान पर कोई नेगेटिव नारा नहीं — बस “जय हिन्द”, “भारत माता… pic.twitter.com/U0JJvpyiuY
— Cockroach Janta Party (@CJP_for_India) July 19, 2026
इनमें कुछ बातें स्वाभाविक हैं, जो शायद हर देशभक्त जानता है लेकिन पता नहीं योगेंद्र यादव को बताने की क्या जरूरत आन पड़ी? यह तो उनका पास्ट रिकॉर्ड ऐसा रहा है, जो उनको लोगों का भरोसा जीतने के लिए ‘जय हिंद’ बोलने की जरूरत पड़ रही है। क्योंकि हम सब जानते हैं कि योगेंद्र यादव को आंदोलन की कितनी भूख है, और अचानक से उनका इस प्रदर्शन की प्लानिंग में लगना हमें दिल्ली में CAA विरोधी प्रदर्शनों में उनकी वह तस्वीर याद दिलाता है, जिसमें वह शरजील इमाम, उमर खालिद के साथ बैठकें कर रहे थे और नतीजतन दंगे-फसाद भड़काने में आज वही लोग जेल में बंद हैं।
जब एजेंडा हुआ एक्सपोज, तो शुरू हुआ डैमेज कंट्रोल का स्वाँग
खैर, पिछले करीब एक महीने से NEET पेपर लीक के विरोध में जंतर-मंतर पर CJP के प्रदर्शन में भी कुछ ऐसी तस्वीरें नहीं आई हैं, जिन पर भरोसा किया जा सके। चाहे वह माता सीता का अपमान करते हिंदू विरोध का एजेंडा हो, ब्राह्मणवाद का विरोध हो और वहीं दूसरी ओर अल्लाह का नाम हो, स्वरा भास्कर जैसे पुराने चेहरे हों, या हो AISA-SFI जैसे वही लेफ्ट संगठनों से जुड़ा एजेंडा। यही नहीं, चाहे 18 जुलाई 2026 को अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक को अस्पताल में शिफ्ट करने का विरोध करते हुए हिंसा का रवैया हो, इसमें ऑपइंडिया के पत्रकार को भी निशाना बनाया गया जब वह शांतिपूर्ण तरीके से सवाल पूछ रहे थे।
जब प्रदर्शन का यह चाल-चरित्र सोशल मीडिया औऱ मीडिया के जरिए देश के सामने आया, तो आम जनता ने इस प्रदर्शन से दूरी बना ली। भीड़ जुटनी बंद हो गई और हर तरफ सिर्फ बदनामी होने लगी। अभिजीत दिपके पर स्याही फेंकना भी इसी बदनामी का नतीजा था। और जब योगेंद्र यादव जैसे ‘प्रदर्शन के रणनीतिकारों’ ने देखा कि उनका एजेंडा और प्रोपेगेंडा पूरी तरह एक्सपोज होने लगा है, तो उन्हें अपनी डूबती नैया को बचाने के लिए ‘डैमेज कंट्रोल’ की याद आई।
आसान शब्दों में समझें तो यह पंचशील कोई मन का बदलाव या अचानक जागी देशभक्ति नहीं है। ‘भारत माता की जय’ और ‘तिरंगे’ का सहारा ये लोग अपनी मर्जी से नहीं, बल्कि अपनी साख बचाने की मजबूरी में ले रहे हैं ताकि बहुसंख्यक समाज के गुस्से को शांत किया जा सके।
दरअसल, CJP ने 20 जुलाई 2026 को जंतर-मंतर से संसद की ओर मार्च करने का ऐलान किया है, यही दिन संसद के मॉनसून सत्र का पहला दिन भी है। इसी प्रदर्शन में भीड़ जुटाने के लिए संविधान और गाँधी की बात हो रही है। क्योंकि इस मार्च के लिए अपनी असलियत जानते हुए अभिजीत दिपके और उसकी गैंग के लिए भीड़ जुटाना मुश्किल होता जा रहा है। इसीलिए योगेंद्र यादव ने पुरानी गलतियों से सीख लेकर काफी सॉफ्ट ढंग से ‘देशभक्ति’ की बात कर दी है। बाकी डैमेज कंट्रोल का हिस्सा, सोनम वांगचुक के बाद खुद को ‘हीरो’ बतलाने वाले अभिजीत का ‘रोना’ तो हम सबने देखा ही।
‘जय भीम’ और ‘इंकलाब’ के नारों के पीछे का असली सच
इस नए पंचशील में जिन दो प्रमुख नारों को बहुत चालाकी से शामिल किया गया है- ‘जय भीम’ और ‘इंकलाब जिंदाबाद’, उसके बारे में आम जनता को जानना भी जरूरी है। क्योंकि ये नारे एक बहुत बड़े छद्म को छुपाने का जरिया बन रहे हैं।
जय भीम, भाईचारे के नाम पर हिंदुओं को ‘चारा’ बनाने का खेल
सीजेपी के प्रदर्शन में ‘जय भीम’ के नारे का इस्तेमाल दलित-मुस्लिम एकता (जिसे ‘जय भीम जय मीम’ का नारा भी कहा जाता है) के नैरेटिव को मजबूत करने के लिए किया जा रहा है। लेकिन इतिहास के पन्ने पलटें तो यह प्रयोग कोई नया नहीं है। देश के विभाजन के समय जोगेंद्र नाथ मंडल इस भ्रामक भाइचारे के सबसे बड़े पैरोकार थे।
उन्होंने अनुसूचित जातियों को भरोसा दिलाया था कि मुस्लिम लीग के साथ उनका भविष्य पाकिस्तान में सुरक्षित रहेगा और जिन्ना ने उन्हें वहाँ का पहला श्रम मंत्री भी बनाया। सन 1949 में जिन्ना ने उन्हें कॉमनवेल्थ और कश्मीर मामलों के मंत्रालय की जिम्मेदारी भी सौंप दी थी। लेकिन इसका हश्र क्या हुआ? पाकिस्तान में हिन्दुओं को कुचलना कभी रुका ही नहीं। बलात्कार आम बात थी। हिन्दुओं की स्त्रियों को उठा ले जाना जोगेंद्र नाथ मंडल की नजरों से भी छुपा नहीं था। वो बार-बार इन पर कार्रवाई के लिए चिट्ठियाँ लिखते रहे।
इस्लामिक हुकूमत को ना उनकी बात सुननी थी, ना उन्होंने सुनी। हिन्दुओं की हत्याएँ होती रहीं। जमीन, घर, स्त्रियाँ लूटी जाती रहीं। कुछ समय तो जोगेंद्र नाथ मंडल ने प्रयास जारी रखे। आखिर उन्हें समझ आ गया कि उन्होंने किस पर भरोसा करने की मूर्खता कर दी है। जिन्ना की मौत होते ही 1950 में जोगेंद्र नाथ मंडल भारत लौट आए।
इस नेता का नाम किसी इतिहास की किताब में शामिल नहीं किया गया। बस समस्या है कि ना आपने खुद पढ़ने की कोशिश की और दल हित चिन्तक तो आपको सिर्फ एक वोट बनाना चाहते हैं! तो वो क्यों पढ़ने देते भला? अब भी यही हो रहा है। जागिए! इससे पहले देर हो जाए।
इंकलाब जिंदाबाद: भगत सिंह के नाम पर खिलाफत के इतिहास को छुपाना
आम जनमानस में आज भी यह एक गहरा भ्रम फैला हुआ है कि ‘इंकलाब जिंदाबाद’ का नारा मूल रूप से बलिदानी भगत सिंह ने ही दिया था। जबकि इतिहास के पन्ने खंगालें तो पता लगता है कि यह नारा 1921 में इस्लामी कट्टरपंथी और खिलाफत आंदोलन के प्रमुख रणनीतिकार मौलाना हसरत मोहानी द्वारा गढ़ा गया था।
भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने जब 1929 में असेंबली में बम फेंका, तब उन्होंने इस नारे को बुलंद किया, जिससे यह देश के कोने-कोने में फैल गया। लेकिन, इस नारे की उत्पत्ति का मूल संबंध भारत की आजादी से नहीं, बल्कि खिलाफत आंदोलन और ‘उम्माह’ (वैश्विक इस्लामी सत्ता) की भावना से जुड़ा हुआ था। बता दें कि खिलाफत आंदोलन तुर्की के खलीफा की सत्ता को बहाल करने के लिए चलाया गया था, जिसका नेतृत्व मोहम्मद अली जौहर (जामिया मिली इस्लामिया के संस्थापकों में से एक) ने किया था।
और इस आंदोलन को महात्मा गाँधी ने भी अंध समर्थन किया था, जिसका खामियाजा खामियाजा भी कोहाट दंगों और मोपला नरसंहार के रूप में ‘हिंदुओं’ को ही भुगतना पड़ा था।
जब आज CJP जैसे प्रदर्शनों में इस नारे को गाँधी, अंबेडकर और भगत सिंह की तस्वीरों के साथ मिलाकर लगाया जाता है, तो यह केवल एक बौद्धिक छलावा होता है। इसका उद्देश्य वामपंथी और इस्लामी कट्टरपंथी विचारधारा के मूल एजेंडे को देशभक्ति के रंग में रंगकर प्रस्तुत करना है।
निष्कर्ष: पंचशील सिर्फ दोगलेपन और पाखंड की पराकाष्ठा
योगेंद्र यादव का ‘पंचशील’, दरअसल उस दोगलेपन की पराकाष्ठा है, जहाँ मन में हिंसा और समाज को तोड़ने की प्लानिंग होती है, लेकिन मंच से शांति, संविधान और अनुशासन की दुहाई दी जाती है। अगर मन में वास्तव में अहिंसा का संकल्प होता, तो ऑपइंडिया के पत्रकार पर हमला करने वाले तत्वों को उसी समय मंच से बहिष्कार किया गया होता। अगर वास्तव में ‘भारत माता की जय’ पर अटूट विश्वास होता, तो इस मारने को लगाने के लिए किसी गाइडलाइन या ‘पंचशील’ नाम देने की जरूरत नहीं पड़ती।
नेहरू के पंचशील ने देश को एक बार धोखा दिया था, लेकिन देश की जनता अब इन नए ‘आंदोलनजीवियों’ और उनकी क्रोनोलॉजी को अच्छी तरह समझ चुकी है। 2020 के दिल्ली दंगों के जख्म अभी भरे नहीं हैं और यही कारण है कि जंतर-मंतर से लेकर संसद मार्च तक के इस नए ड्रामे को लेकर समाज में कोई सहानुभूति नहीं है। यह आंदोलन अपने ही अंतर्विरोधों, वैचारिक पाखंड और हिंसक प्रवृत्तियों के कारण जनता की नजरों में पूरी तरह गिर चुका है। अब तिरंगे और महापुरुषों की आड़ लेकर चाहे जितना भी डैमेज कंट्रोल कर लिया जाए, इस आंदोलन का असली सच देश के सामने पूरी तरह बेनकाब हो चुका है।
बिहार की राजधानी पटना में फायरिंग से शुरू हुआ ‘खान ग्लोबल स्टडीज’ वाले खान सर उर्फ फैजल खान और ‘ज्ञान बिंदु’ कोचिंग वाले रौशन आनंद का विवाद अब जुबानी जंग में बदल गया है। पिछले दिनों खान सर, उनके स्टाफ और गार्ड को कोर्ट से राहत मिली थी। अब खान सर का एक पॉडकास्ट सामने आया है।
इसमें उन्होंने आरोप लगाया है कि रौशन आनंद के भाई प्रिंस यादव पर अपहरण और आर्म्स एक्ट के मामले दर्ज थे। उसे पुलिस पहले से ही खोज रही थी। वहीं ऑपइंडिया को रौशन आनंद ने बताया है कि इस पॉडकास्ट में खान सर ने जिन मामलों का हवाला दिया है, उनमें उनके भाई को अदालत कुछ साल पहले ही बरी कर चुकी है।
उल्लेखनीय है कि प्रिंस यादव का शव नेपाल के विराट नगर के एक होटल में मिला था। उस समय 2 जून 2026 को हुए फायरिंग विवाद के मामले में रोशन आनंद जेल में बंद थे। ऑपइंडिया को रौशन आनंद ने बताया है कि जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने 17 जून और फिर 19 जून 2026 को पटना के कदमकुआँ थाना में शिकायत दी थी। लेकिन पुलिस उनकी शिकायत के आधार पर एफआईआर दर्ज करने में टालमटोल कर रही है। उन्होंने इस संबंध में बिहार के मुख्यमंत्री और राज्य के पुलिस महानिदेशक को मेल भी किया है। रौशन आनंद का कहना है कि करीब 10 दिन बीत जाने के बाद भी उन्हें इसका जवाब नहीं मिला है।
क्या है खान सर और रौशन आनंद का मामला?
2 जून 2026 की रात पटना के मुसल्लहपुर हाट इलाके में कोचिंग विवाद में फायरिंग की बात सामने आई थी। खान सर का एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें उन्होंने मीडिया को बताया था कि ‘आठ-दस राउंड फायरिंग’ होते उन्होंने खुद देखा है। गौरतलब है कि खान ग्लोबल स्टडीज और ज्ञान बिंदु कोचिंग मुसल्लहपुर हाट के किसान कोल्ड स्टोरेज में अगल-बगल ही स्थित है।
इस घटना को लेकर 2 जून को ही कन्हैया कुमार सिंह ने कदमकुआँ थाने में शिकायत दी। सिंह, खान ग्लोबल स्टडीज का प्रबंधन देखते हैं। शिकायत में उन्होंने दावा किया,
दिनांक 02.06.2026 को करीब रात 10:00 बजे तक क्लास चलने के बाद कोचिंग बंद किया गया था। उसी समय 10:10 बजे के समय मेरे कोचिंग का गार्ड चुनचुन, उम्र 25 वर्ष, को ज्ञान बिंदु कोचिंग के डायरेक्टर रोशन आनंद के कहने पर अभिषेक और प्रिंस (रोशन आनंद का भाई) तथा उसका स्टाफ रोशन एवं गौरव के साथ करीब 15-20 लड़के अचानक मेरे कोचिंग के गेट पर आया और गार्ड को खींचकर मारपीट करने लगे, जिससे उसका सिर फट गया।
इस शिकायत में तोड़फोड़, गाली-गलौज, खान ग्लोबल स्टडीज का बोर्ड, खान सर का फोटो फाड़ने की बात कही गई थी। दो दिन के भीतर कोचिंग को बम से उड़ा देने की धमकी देने की बात कही गई थी। बताया गया था कि बिहार पुलिस सिपाही भर्ती में खान सर के कोचिंग के ज्यादा बच्चों का चयन होने को लेकर ये विवाद हुआ।
फायरिंग की खबरों ने कैसे पकड़ा जोर?
कन्हैया सिंह की शिकायत के आधार पर 2 जून को ही केस दर्ज किया गया। इसकी संख्या- 410/26 है। आप ऊपर इस शिकायत के बारे में पढ़ चुके हैं। इसमें कहीं भी फायरिंग की बात नहीं कही गई है।
ऐसे में सवाल उठता है कि फिर फायरिंग की खबरों ने क्यों जोर पकड़ लिया? इसका जिम्मेदार खान सर का वह बयान है, जिसमें उन्होंने खुद आठ से दस राउंड फायरिंग होने का दावा किया था। इसके बाद कुछ वीडियो भी वायरल हुए थे, जिसमें गार्ड फायरिंग करते दिखे थे।
खान सर ने दिया फायरिंग का आदेश
कदमकुआँ थाना के आरक्षी निरीक्षक अनिल कुमार 4 जून को घटनास्थल पर जाकर जाँच की। इसकी कॉपी ऑपइंडिया के पास मौजूद है। इसके आधार पर एक केस 418/26 दर्ज की गई है। इसमें बताया गया है कि जाँच के दौरान पता चला कि वायरल वीडियो में फायरिंग कर रहे प्रदीप सिंह और तालबर सिंह, दोनों खान सर के निजी गार्ड हैं। खान सर ने खुद भी इनकी पहचान की पुष्टि पुलिस के सामने की और बताया कि उनके हाथ में दिख रहे हथियार लाइसेंसी हैं।
पूछताछ में प्रदीप और तालबर ने पुलिस को बताया कि 2 जून की रात विवाद होने के बाद खान सर के साथ वे दोनों ऑफिस से बाहर आए थे। खान सर ने उनसे कहा,
देख क्या रहे हो। भीड़ पर अविलंब फायर करो। जो होगा मैं समझ लूँगा।
गार्ड ने पूछताछ में खान सर के आदेश के बाद फायरिंग करने की बात कही। इसके बाद जाँच रिपोर्ट में दोनों गार्डों के अलावा खान सर और कुछ अज्ञातों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने की अनुशंसा की गई है। इसके आधार पर खान सर के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की जा चुकी है।
इस रिपोर्ट में भी ज्ञान बिंदु कोचिंग के लोगों की तरफ से फायरिंग करने की कोई बात नहीं की गई है। इसमें भी खान ग्लोबल स्टडीज के गार्ड चुनचुन के साथ मारपीट, बैनर फाड़ने और हो-हल्ला होने की बात फायरिंग करने वाले खान सर के दोनों गार्ड के हवाले से कही गई है।
खान सर के झूठ से खड़ा होता है रौशन आनंद का सवाल
ऑपइंडिया को रौशन आनंद ने बताया कि उनकी गिरफ्तारी, उन्हें जेल में धमकी देने और उनके भाई की संदिग्ध मौत एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। यह सब कुछ इसलिए हुआ, क्योंकि खान सर ने आठ-दस राउंड फायरिंग का झूठ बोला।
उन्होंने बताया कि जमानत मिलने और भाई के अंतिम संस्कार के बाद इस संबंध में पटना पुलिस के पास वे दो बार औपचारिक शिकायत दर्ज करा चुके हैं। पहली शिकायत उन्होंने 17 जून 2026 को कदमकुआँ थाने में दी थी। इसकी कॉपी ऑपइंडिया के पास मौजूद है।
इसमें उन्होंने बताया है कि 2 जून की रात उनके और खान सर के कोचिंग स्टाफ के बीच पोस्टर हटाने को लेकर मामूली सा विवाद और मारपीट की घटना हुई थी। उस समय मौके पर न वे खुद थे और न उनके भाई प्रिंस तथा अभिषेक। न ही इस घटना को लेकर उनके पास कोई जानकारी थी। लेकिन खान सर, किसान कोल्ड स्टोरेज के मालिक डॉक्टर रमाशंकर प्रसाद और खान ग्लोबल स्टडीज के मैनेजर कन्हैया कुमार सिंह व अन्य ने आपराधिक साजिश करते हुए पहले खुद फायरिंग करवाई, फिर मीडिया के सामने इसका आरोप उन पर लगाते हुए केस दर्ज करवा दिया। रौशन आनंद ने कहा है कि इनलोगों ने उसके बाद अपने रसूख का इस्तेमाल कर उन्हें जेल भिजवा दिया।
शिकायत में रौशन आनंद ने यह भी दावा किया है कि इनलोगों ने 13 जून 2026 को जेल के भीतर उन्हें जान से मरवाने की धमकी भी दिलवाई। साथ ही गिरफ्तारी से बचने का प्रयास कर रहे उनके 24 वर्षीय भाई प्रिंस की हत्या करवा दी, जिसका शव 13 जून को नेपाल के विराटनगर में एक होटल के कमरे में संदिग्ध परिस्थितियों में मिला था।
जमानत मिलने के बाद रौशन आनंद 15 जून को जेल से बाहर निकले थे। इसी दिन उनके भाई का अंतिम संस्कार भी हुआ था।
रौशन आनंद ने ऑपइंडिया को बताया कि पुलिस ने यह कहते हुए उनकी शिकायत के आधार पर मामला दर्ज करने और जाँच से इनकार कर दिया कि उनको धमकी देने और उनके भाई की मौत का मामला कदमकुआँ थाना क्षेत्र से बाहर का है। रौशन आनंद का दावा है कि कदमकुआँ थाना प्रभारी जनमेजय राय ने उनसे कहा कि वे केवल 2 जून की घटना को लेकर शिकायत दें तभी जाँच होगी।
इसके 2 दिन बाद 19 जून को रोशन आनंद ने एक नई शिकायत कदमकुआँ पुलिस को दी। इसकी कॉपी भी ऑपइंडिया के पास मौजूद है। इसमें खान सर सहित 6 लोग आरोपित बनाए गए हैं। कहा गया है कि ये लोग हथियारों के साथ उनके कोचिंग के पास आए। ज्ञान बिंदु के स्थायी बैनर के ऊपर खान ग्लोबल स्टडीज का बैनर लगा दिया। जब उनके स्टाफ ने इसका विरोध किया तो खान सर आगबबूला हो गए। कथित तौर पर उन्होंने कहा- गोली मारकर सबकी हत्या कर दो। रौशन आनंद के अनुसार इसके बाद ही उनके गार्डों ने फायरिंग की, जिसका वीडियो वायरल हुआ था।
इस शिकायत में रौशन आनंद ने आरोपितों के विरुद्ध संबंधित धाराओं में केस दर्ज कर कार्रवाई की गुहार पुलिस से लगाई है। लेकिन रौशन आनंद ने ऑपइंडिया को बताया कि उनकी इस शिकायत पर भी अब तक कोई एक्शन नहीं लिया गया है। उनसे कहा गया है कि इस मामले की जाँच पुलिस पहले से ही कर रही है।
रौशन आनंद की शिकायतों पर क्या कर रही पटना पुलिस?
रौशन आनंद की शिकायतों और इस मामले की जाँच में हुई प्रगति जानने लिए ऑपइंडिया ने कदमकुआँ थाने के प्रभारी जनमेजय राय को फोन किया। उन्होंने कहा;
उन दोनों (खान सर और रौशन आनंद) के मैटर में यहाँ से अब कोई कमेंट नहीं। आप सीनियर अधिकारियों से संपर्क करिए। आपको जो भी पूछना है सीनियर अफसर से ही पूछिए। जो भी देना होता है यहाँ से हम लोग उनको बता देते हैं। अब क्या देना है, क्या नहीं, वे लोग जानें। इस मैटर में हमसे कोई बात नहीं करिए।
इतना कुछ कहने के बाद थाना प्रभारी राय ने झट से कॉल काट दिया। इसके बाद हमने पटना के एसएसपी कार्तिकेय शर्मा को भी फोन किया। लेकिन उन्होंने कॉल नहीं उठाया। उनसे बातचीत होने पर हम इस खबर को अपडेट करेंगे।
पटना कोचिंग फायरिंग विवाद में अब तक हम क्या जानते हैं?
ऑपइंडिया की पड़ताल से पटना के चर्चित कोचिंग फायरिंग में कुछ बातें स्पष्ट हैं। ये हैं;
2 जून की रात खान ग्लोबल स्टडीज और ज्ञान बिंदु कोचिंग के लोगों के बीच विवाद हुआ था।
ज्ञान बिंदु के लोगों की तरफ से फायरिंग का अब तक कोई तथ्य सामने नहीं आया है।
खान सर ने झूठ बोला था कि उन्होंने खुद आठ से दस राउंड फायरिंग होते देखा है।
फायरिंग करने वाले खान सर के ही गार्ड थे। दोनों ने दो-दो राउंड फायरिंग की। उन्होंने फायरिंग खान सर के आदेश पर की।
खान ग्लोबल स्टडीज के मैनेजर की शिकायत पर कार्रवाई करते हुए पुलिस ने ज्ञान बिंदु के संचालक रौशन आनंद को गिरफ्तार कर लिया, लेकिन खान सर के गार्ड की गिरफ्तारी मामले के तूल पकड़ने और जाँच आगे बढ़ने के बाद हुई। फायरिंग का आदेश देने वाले खान सर अग्रिम जमानत पाने में कामयाब रहे।
ऑपइंडिया की बात
हमारी मंशा बिहार पुलिस या कोर्ट की भूमिका पर संदेह करना नहीं है। लेकिन इस मामले की निष्पक्ष जाँच सुनिश्चित करना व्यवस्था का ही काम है। रौशन आनंद जेल में खुद को धमकी दिए जाने और अपने भाई की मौत को संदिग्ध बता रहे हैं तो उनकी समुचित सुनवाई भी इसी व्यवस्था का काम है। खान सर के मीडिया में दिए गए बयान और उनके मैनेजर की शिकायत पर फौरन कार्रवाई करते हुए रौशन आनंद को गिरफ्तार करने वाली पुलिस ‘सीनियर से बात करिए’ कहकर अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती।
उत्तर प्रदेश के चित्रकूट में मुस्लिम लड़की से प्रेम करने वाले शिवशंकर शुक्ला ने कथित तौर पर फाँसी लगाकर आत्महत्या कर ली है। 26 वर्षीय संविदा बिजली लाइनमैन शिवशंकर का शव राजापुर थाना क्षेत्र के भटरी गाँव के नंदू पुरवा के बाहर एक पेड़ से फंदे पर लटका मिला। परिवार का आरोप है कि यह सिर्फ आत्महत्या नहीं बल्कि लगातार धमकियों, मानसिक प्रताड़ना और एक दरोगा अजहर जमाल के दबाव का नतीजा है। घटना के बाद अजहर जमाल को लाइन हाजिर किया गया है।
मृतक के मोबाइल में कथित तौर पर दरोगा की धमकी भरी कॉल रिकॉर्डिंग मिली है जबकि एक सुसाइड नोट और डायरी में लिखे नंबर भी पुलिस को सौंपे गए हैं। दूसरी ओर पुलिस का कहना है कि पूरे मामले की जाँच की जा रही है और पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद ही स्थिति पूरी तरह स्पष्ट होगी।
’10 साल जेल में सड़ोगे…’: दरोगा अजहर पर धमकाने और पैसे मांँगने का आरोप
मृतक के पिता राजेश कुमार शुक्ला के अनुसार, सरधुआ बिजली उपकेंद्र में संविदा पर लाइनमैन के रूप में काम करने वाले शिवशंकर शुक्रवार (17 जुलाई 2026) रात ड्यूटी से लौटे थे। कुछ देर बाद वह घर से निकले लेकिन वापस नहीं आए। अगले दिन सुबह उनका शव गाँव के बाहर पेड़ से लटका मिला।
परिजनों का आरोप है कि सरधुवा थाने में तैनात उपनिरीक्षक (दरोगा) अजहर जमाल ने शिवशंकर को फोन पर गालियाँ दीं, जेल भेजने की धमकी दी और कहा, “तुम्हारे दिन पूरे हो गए हैं, अब जेल जाने की तैयारी कर लो, 10 साल जेल में ही सड़ोगे।” परिवार का दावा है कि यह बातचीत शिवशंकर के मोबाइल में रिकॉर्ड है और यही ऑडियो वायरल भी हो रहा है। हालाँकि, वायरल ऑडियो की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
पिता का आरोप है कि कुछ महीने पहले भी इसी दरोगा ने शिवशंकर को थाने बुलाकर धमकाया था। उन्होंने आरोप लगाया कि दरोगा ने समझौते और बचाने के नाम पर पहले 2 लाख रुपए लिए थे और बाद में 3 लाख रुपए की और माँग कर रहा था। परिवार का कहना है कि लगातार मिल रही धमकियों और मानसिक दबाव ने शिवशंकर को ऐसा कदम उठाने पर मजबूर कर दिया। वहीं, उन्होंने यह आशंका भी जताई है कि बेटे की हत्या कर शव को पेड़ से लटकाया गया हो सकता है।
मृतक के भाई ने कहा, “दरोगा अजहर जमाल बोला था कि मैं तुम्हें उठवा लूँगा। पिछले साल इसने 2 लाख रुपए ले लिए थे और 3 लाख रुपए और माँग रहा था, धमकी दे रहा था।”
#चित्रकूट: राजापुर थाना क्षेत्र के महुवा गांव के सुरजवापुरवा में एक लाइनमैन का शव संदिग्ध परिस्थितियों में पेड़ से फंदे पर लटका मिलने से सनसनी फैल गई। सूचना पर पहुंची @chitrakootpol ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और मामले की जांच शुरू कर दी है। स्थानीय स्तर… pic.twitter.com/dnZIPyninP
— UttarPradesh.ORG News (@WeUttarPradesh) July 18, 2026
8 महीने पुराना प्रेम प्रसंग, मुस्लिम युवती से रिश्ते के बाद शुरू हुआ विवाद
परिजनों के मुताबिक, करीब आठ महीने पहले शिवशंकर का अर्की गाँव की एक मुस्लिम युवती से प्रेम संबंध था। दोनों एक बार घर से चले भी गए थे। उस समय युवती पक्ष ने गुमशुदगी दर्ज कराई थी। बाद में पुलिस दोनों को बरामद कर लाई और दोनों पक्षों के बीच समझौता कराया गया।
परिवार का आरोप है कि समझौते के बाद भी युवती लगातार शिवशंकर को फोन करती रही। जब शिवशंकर ने इसकी शिकायत युवती के अब्बू से की तो उन्होंने कथित तौर पर सरधुवा थाने में तैनात अपने सजातीय दरोगा अजहर जमाल से संपर्क किया। इसके बाद शिवशंकर को लगातार धमकी भरे फोन आने लगे।
हालाँकि, इस मामले में चित्रकूट के एसपी अरुण कुमार सिंह का पक्ष अलग है। हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने कहा कि युवती को वापस लाकर उसके परिजनों को सौंप दिया गया था और युवती के अब्बू ने सामाजिक मान-मर्यादा का हवाला देते हुए कोई कानूनी कार्रवाई नहीं कराई थी। एसपी के अनुसार, बाद में शिवशंकर अलग-अलग नंबरों से युवती के पिता को फोन कर धमका रहा था। इसकी शिकायत मिलने पर दरोगा ने फोन पर उसे कड़े शब्दों में डाँटा था। वायरल ऑडियो की भी जाँच कराई जा रही है।
(नोट: वायरल ऑडियो में अभद्र भाषा का प्रयोग किया गया है)
सुसाइड नोट, डायरी और 15 नंबरों की सूची: परिवार बोला- इन्हीं लोगों ने बनाया निशाना
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, शिवशंकर ने मरने से पहले एक सुसाइड नोट लिखा था। उसमें उसने लिखा है, “मैंने लड़की के पिता को फोन लगाया था कि तुम्हारी बेटी मुझे फोन कर परेशान करती है, उसकी रिकॉर्डिंग सुन लो। तुम्हारी बेटी मुझे कसम देकर गाँव बुला रही है, अगर मैं आता हूँ और कोई समस्या होती है तो इसके जिम्मेदार तुम और तुम्हारी बेटी होगे।”
पिता के मुताबिक, बेटे की डायरी में 15 ऐसे मोबाइल नंबर लिखे मिले हैं, जिनसे उसे लगातार धमकी भरे फोन आते थे। डायरी में युवती और उसके अब्बू का नंबर भी दर्ज है। परिवार ने यह डायरी और अन्य दस्तावेज पुलिस को सौंप दिए हैं।
अजहर जमाल लाइन हाजिर: पुलिस ने क्या कहा?
चित्रकूट पुलिस ने X पर एक विषय में विस्तृत बयान जारी किया है। चित्रकूट पुलिस ने कहा, “इससे पहले मृतक शिवशंकर शुक्ला के विरूद्ध नाबालिक लड़की के पिता के द्वारा 28 अक्टूबर 2025 को स्वयं उपस्थित आकर के कही चले जाने को लेकर प्रार्थना पत्र देकर केस दर्ज कराया था। जिसकी विवेचना स्थानीय थाने के SI अजहर जमाल ने की थी।”
पुलिस ने आगे कहा, “विवेचना के दौरान वादी ने मृतक शिवशंकर शुक्ला का नाम बताया लेकिन साक्ष्य के अभाव में पीड़िता द्वारा दिनाँक 5 नवंबर 2025 को उपस्थित आकर अपना लिखित बयान दिया जिसमें अपने माता पिता से नाराज होकर अपने मौसी के घर जाने की बात कही। बाद में लड़की के नाबालिक होने की स्थिति में पारिवारिक जनों को सुपर्द किया गया। 07 नवंबर 2025 को मुकदमा समाप्त किया गया।”
चित्रकूट पुलिस ने कहा, “फिर से मृतक के पिता के मोबाइल पर फोन कर लड़की से सम्पर्क करने तथा धमकाने का प्रयास किया जिसकी क्षेत्रीय उ0नि0 द्वारा जरिए दूरभाष मृतक को समझाया गया और आगाह किया गया कि न मानने पर जेल जाने की बात कही गयी। मृतक का आचरण सही न होने की वजह से ही बार बार उसका स्थानान्तरण सम्बन्धित विभाग द्वारा किया जा रहा था। ऐसा प्रतीत होता है कि मृतक द्वारा लड़की के प्रेम में पड़कर ही आत्महत्या किया गया है। अजहर जमाल को तत्काल प्रभाव से लाइन हाजिर किया गया व सम्पूर्ण प्रकरण की जाँच क्षेत्राधिकारी राजापुर को दी गई है।”
करीब चार दशकों तक पूर्वी उत्तर प्रदेश एक्यूट इंसेफ्लाइटिस सिंड्रोम (AES) और जापानी इंसेफ्लाइटिस (JE) के लगातार खतरे में जीता रहा। हर साल, खासकर मानसून के मौसम में, गोरखपुर, कुशीनगर, महाराजगंज, देवरिया और आसपास के जिलों में इस बीमारी के नए मामले सामने आते थे।
अस्पताल मरीजों से भर जाते थे, माता-पिता अपने बच्चों की जान बचाने की उम्मीद में इमरजेंसी वार्ड के बाहर इंतजार करते रहते थे और डॉक्टर बड़ी संख्या में मरीजों का इलाज करने के लिए लगातार संघर्ष करते थे। गोरखपुर का बाबा राघव दास (BRD) मेडिकल कॉलेज इस संकट का सबसे बड़ा केंद्र बन गया था।
हर साल बीमारी के चरम मौसम में इंसेफ्लाइटिस से पीड़ित सैकड़ों बच्चों को यहाँ भर्ती कराया जाता था और लंबे समय तक यह बीमारी हर वर्ष सैकड़ों मासूमों की जान लेती रही। हालात इतने गंभीर हो चुके थे कि इंसेफ्लाइटिस को सिर्फ मौसमी बीमारी नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी स्वास्थ्य चुनौतियों में से एक माना जाने लगा था।
2017 में जब योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में जिम्मेदारी संभाली, तब उनके सामने कई दशकों से बनी इस गंभीर बीमारी पर नियंत्रण पाने की बड़ी चुनौती थी।
सिर्फ बीमारी से नहीं, इंसेफ्लाइटिस के हर कारण से लड़ने के लिए सरकार ने पूरे राज्य में खड़ी की व्यवस्था
योगी सरकार ने यह तय किया कि इंसेफ्लाइटिस जैसी बीमारी को सिर्फ अस्पतालों के भरोसे नहीं हराया जा सकता। इसलिए सरकार ने केवल मरीजों के बीमार होने के बाद उनका इलाज करने तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि बीमारी के फैलने से पहले ही उसे रोकने के उद्देश्य से एक व्यापक रणनीति अपनाई।
सरकार बनने के कुछ ही समय बाद एक्यूट इंसेफ्लाइटिस सिंड्रोम (AES) की रोकथाम और उपचार के लिए दिशा-निर्देश जारी किए गए। इसके तहत कई विभागों को शामिल करते हुए एक समन्वित कार्ययोजना तैयार की गई। स्वास्थ्य विभाग को इंसेफ्लाइटिस से प्रभावित 38 जिलों के लिए नोडल एजेंसी बनाया गया, जबकि चिकित्सा शिक्षा, शहरी विकास, ग्रामीण विकास, पंचायती राज, महिला एवं बाल कल्याण, पशुपालन और बेसिक शिक्षा सहित कई विभागों ने एक साझा ढाँचे के तहत मिलकर काम किया।
यह राज्य की कार्यप्रणाली में एक बड़ा बदलाव था। टीकाकरण, स्वच्छता, जागरूकता, निगरानी, उपचार सुविधाएँ और बुनियादी ढाँचे के विकास को अलग-अलग प्रयासों के बजाय समाधान के समान रूप से महत्वपूर्ण हिस्सों के तौर पर देखा गया।
घर-घर टीकाकरण और जागरूकता अभियान से सुनिश्चित की गई लाखों बच्चों की सुरक्षा
सरकार की रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण आधार टीकाकरण और जनजागरूकता के जरिए बीमारी की रोकथाम था। फरवरी 2018 में उत्तर प्रदेश सरकार ने दस्तक अभियान शुरू किया, जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि जापानी इंसेफ्लाइटिस (JE) के खतरे वाले क्षेत्रों में कोई भी बच्चा टीकाकरण से वंचित न रहे।
परिवारों के स्वास्थ्य केंद्रों तक आने का इंतजार करने के बजाय आशा कार्यकर्ता, शिक्षक और स्वास्थ्यकर्मी प्रभावित जिलों के गाँवों और घर-घर तक पहुँचे।
उन्होंने लोगों को बताया कि इंसेफ्लाइटिस कैसे फैलता है, शुरुआती लक्षण वाले बच्चों की पहचान की और माता-पिता को समझाया कि चेतावनी के संकेत दिखाई देने पर तुरंत चिकित्सा सहायता लें। स्कूलों को जागरूकता कार्यक्रमों का केंद्र बनाया गया, जबकि जोखिम वाले मौसम के दौरान गाँवों में लगातार जनजागरूकता अभियान चलाए गए।
सरकार का मानना है कि टीकाकरण और जागरूकता को सीधे लोगों के घरों तक पहुँचाने से बीमारी की शुरुआती पहचान बेहतर हुई और गंभीर संक्रमण के मामलों में कमी आई।
स्वच्छता को भी बनाया गया बीमारी की रोकथाम का मजबूत माध्यम
प्रशासन ने यह समझा कि प्रभावित जिलों में रहने की परिस्थितियों में सुधार किए बिना इंसेफ्लाइटिस पर प्रभावी नियंत्रण संभव नहीं है। स्वास्थ्य संबंधी उपायों के साथ-साथ सरकार ने इस अभियान को स्वच्छ भारत मिशन से जोड़ा और गाँवों में स्वच्छता तथा साफ-सफाई को बढ़ावा दिया।
जागरूकता कार्यक्रमों के जरिए लोगों को सुरक्षित पेयजल का उपयोग करने, आसपास का वातावरण साफ रखने और मच्छरों के पनपने की जगहों को खत्म करने के लिए प्रेरित किया गया। लोगों को सलाह दी गई कि बच्चों को सीधे मिट्टी के फर्श पर न सुलाएँ, जहाँ उपलब्ध हों वहाँ सुरक्षित पेयजल के लिए इंडिया मार्क-II हैंडपंप का इस्तेमाल करें।
संवेदनशील क्षेत्रों में सूअर रखने की जगहों को रिहायशी इलाकों से दूर रखें। जापानी इंसेफ्लाइटिस (JE) के प्रसार को रोकने के लिए फॉगिंग और मच्छर नियंत्रण के उपायों को भी तेज किया गया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कई बार कह चुके हैं कि राज्य में इंसेफ्लाइटिस से होने वाली मौतों में कमी लाने में बेहतर स्वच्छता की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
बेहतर अस्पतालों से इलाज और आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं को किया गया मजबूत
समुदाय स्तर पर बीमारी की रोकथाम के उपाय जारी रहने के साथ-साथ सरकार ने पूर्वी उत्तर प्रदेश में इलाज की सुविधाओं को भी मजबूत किया। ग्रामीण क्षेत्रों में 15 ब्लॉक स्तरीय इंसेफ्लाइटिस उपचार केंद्र और मिनी पीडियाट्रिक केयर सेंटर स्थापित किए गए, ताकि मरीजों को लंबी दूरी तय किए बिना समय पर इलाज मिल सके।
आपातकालीन स्थिति से बेहतर ढंग से निपटने के लिए ब्लॉक स्तर के अस्पतालों में कम से कम तीन-तीन वेंटिलेटर उपलब्ध कराए गए। इंसेफ्लाइटिस की रोकथाम, शुरुआती लक्षणों की पहचान और इलाज की प्रक्रिया को लेकर 3.5 लाख से अधिक अधिकारियों और सरकारी कर्मचारियों को विशेष प्रशिक्षण दिया गया।
इन सुधारों से बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज जैसे बड़े अस्पतालों पर मरीजों का दबाव कम करने में मदद मिली और गंभीर रूप से बीमार मरीजों को पहले से अधिक तेजी से चिकित्सा सुविधा मिलनी शुरू हुई।
समन्वित सरकारी कार्रवाई के बाद इंसेफ्लाइटिस के मामले और मौतों में आई बड़ी कमी
टीकाकरण, स्वच्छता, जनजागरूकता और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार जैसे कदमों का असर कुछ ही वर्षों में दिखाई देने लगा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अनुसार, समन्वित अभियान शुरू होने के बाद उत्तर प्रदेश में इंसेफ्लाइटिस के मामलों में करीब 75 प्रतिशत और इससे होने वाली मौतों में लगभग 85 प्रतिशत की कमी आई।
इस बदलाव का सबसे बड़ा असर गोरखपुर में देखने को मिला, जिसे कभी इंसेफ्लाइटिस का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता था। मुख्यमंत्री ने कहा है कि वर्ष 1977 से 2017 के बीच गोरखपुर में हर साल औसतन करीब 600 बच्चों की मौत एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (AES) के कारण होती थी।
हालाँकि हाल के वर्षों में मौतों की संख्या में भारी गिरावट आई है, जो बीमारी पर नियंत्रण में हुए बड़े सुधार का संकेत है।
अस्पतालों में भर्ती होने वाले मरीजों की संख्या में भी उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई। बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज, जहाँ हर साल अगस्त महीने में आमतौर पर 500 से 600 इंसेफ्लाइटिस मरीज भर्ती होते थे, वहाँ प्रभावित जिलों में रोकथाम के उपायों के विस्तार के बाद भर्ती होने वाले मरीजों की संख्या में काफी कमी आई।
जापानी इंसेफ्लाइटिस (JE) के मामले, जो कभी सैकड़ों की संख्या में दर्ज होते थे, अब पहले की तुलना में बहुत कम रह गए हैं।
सरकारी आँकड़ों में भी दिखी जापानी इंसेफ्लाइटिस के मामलों में लगातार गिरावट
सरकारी आँकड़े भी जापानी इंसेफ्लाइटिस (JE) के मामलों में लगातार आई गिरावट को दर्शाते हैं।
वर्ष 2017 में उत्तर प्रदेश में जापानी इंसेफ्लाइटिस के 693 मामले और 93 मौतें दर्ज की गई थीं। इसके बाद हर साल स्थिति में लगातार सुधार देखने को मिला। वर्ष 2018 में 323 मामले और 25 मौतें दर्ज हुईं। इसके बाद 2019 में मामले घटकर 235 रह गए।
वर्ष 2020 में 100 मामले, 2021 में 153, 2022 में 124 और जनवरी से जुलाई 2023 के बीच केवल 17 मामले सामने आए, जबकि इस अवधि में एक भी मौत दर्ज नहीं हुई।
राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण केंद्र (National Centre for Vector-Borne Disease Control) के अनुसार, इस दौरान जापानी इंसेफ्लाइटिस के मामलों में 80 प्रतिशत से अधिक और मौतों में 95 प्रतिशत से ज्यादा की कमी दर्ज की गई।
9 सितंबर को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने घोषणा की थी कि 1 जनवरी से 7 सितंबर के बीच उत्तर प्रदेश में जापानी इंसेफ्लाइटिस, चिकनगुनिया और मलेरिया से एक भी मौत दर्ज नहीं हुई। उन्होंने इसे 2017 के बाद शुरू किए गए लगातार प्रयासों का परिणाम बताया और कहा कि सरकार का अगला लक्ष्य इस बीमारी का पूरी तरह उन्मूलन करना है।
सैकड़ों मौतों वाले दौर से निकलकर राज्य वर्ष 2024 से इंसेफ्लाइटिस से शून्य मौतों की स्थिति दर्ज कर रहा है। वहीं वर्ष 2026 में अब तक इंसेफ्लाइटिस के केवल 3 मामले सामने आए हैं और सभी मरीजों का सफलतापूर्वक इलाज किया गया है।
उत्तर प्रदेश के इंसेफ्लाइटिस नियंत्रण मॉडल को यूनिसेफ से मिली अंतरराष्ट्रीय सराहना
उत्तर प्रदेश के प्रयासों की सराहना संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) ने भी की। यूनिसेफ ने दस्तक अभियान के तहत जापानी इंसेफ्लाइटिस (JE) और एक्यूट इंसेफ्लाइटिस सिंड्रोम (AES) के खिलाफ उत्तर प्रदेश के बड़े स्तर पर चलाए गए टीकाकरण अभियान की प्रशंसा की।
संगठन ने इस बात को विशेष रूप से रेखांकित किया कि सरकार ने केवल अस्पतालों में इलाज पर निर्भर रहने के बजाय टीकाकरण, स्वच्छता, जनजागरूकता और समुदाय की सक्रिय भागीदारी को एक साथ जोड़कर काम किया।
यूनिसेफ ने स्वास्थ्यकर्मियों, शिक्षकों और आशा कार्यकर्ताओं की भी सराहना की, जिन्होंने प्रभावित जिलों के दूर-दराज के गाँवों तक जागरूकता और टीकाकरण अभियान पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इस अंतरराष्ट्रीय सराहना ने उत्तर प्रदेश की उस छवि को और मजबूत किया है, जिसने कई पीढ़ियों से क्षेत्र को परेशान कर रही इस बीमारी पर प्रभावी नियंत्रण हासिल करने में महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त की।
क्या है जापानी इंसेफ्लाइटिस और कैसे फैलती है यह बीमारी?
जापानी इंसेफ्लाइटिस (JE) एक वायरल बीमारी है, जो संक्रमित मच्छरों के काटने से फैलती है। यह वायरस प्राकृतिक रूप से सूअरों और कुछ प्रजातियों के पक्षियों में पाया जाता है। मच्छर इन संक्रमित जानवरों से वायरस लेकर इंसानों तक पहुँचाते हैं। यह बीमारी एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में सीधे नहीं फैलती।
यह वायरस मस्तिष्क पर हमला करता है और तेज बुखार, सिरदर्द, उल्टी, दौरे पड़ना, भ्रम की स्थिति और बेहोशी जैसे लक्षण पैदा कर सकता है। गंभीर मामलों में यह स्थायी रूप से तंत्रिका तंत्र को नुकसान पहुँचा सकता है या मरीज की मौत भी हो सकती है।
बच्चों में इस बीमारी का खतरा सबसे अधिक होता है, इसलिए उनके लिए समय पर टीकाकरण और शुरुआती इलाज बेहद जरूरी माना जाता है।
जापानी इंसेफ्लाइटिस का कोई विशेष इलाज उपलब्ध नहीं है। इसलिए सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ टीकाकरण, मच्छर नियंत्रण, स्वच्छता, समय पर बीमारी की पहचान और सहायक उपचार को इससे होने वाली मौतों को कम करने का सबसे प्रभावी तरीका मानते हैं।
दीर्घकालिक योजना से मिली सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र की बड़ी सफलता
UP में इंसेफ्लाइटिस के खिलाफ लड़ाई यह दिखाती है कि लंबे समय से चली आ रही किसी स्वास्थ्य चुनौती से समन्वित प्रयासों के जरिए प्रभावी ढंग से निपटा जा सकता है।
टीकाकरण, घर-घर जागरूकता अभियान, स्वच्छता, बेहतर अस्पताल, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी और कई विभागों के बीच तालमेल को एक साथ जोड़कर राज्य ने इस बीमारी से कई स्तरों पर मुकाबला किया। कई दशकों तक इंसेफ्लाइटिस पूर्वी उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी स्वास्थ्य आपदाओं में से एक रहा।
हर मानसून में हजारों परिवार अपने बच्चों को खोते थे और अस्पतालों पर मरीजों का भारी दबाव रहता था। पिछले कुछ वर्षों में मामलों और मौतों में आई लगातार गिरावट ने उत्तर प्रदेश के इस मॉडल को इस बात का महत्वपूर्ण उदाहरण बना दिया है कि लंबे समय तक लगातार किए गए सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रयास किसी महामारी जैसी चुनौती की दिशा बदल सकते हैं।
(मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
दिल्ली को एक बार फिर ‘बंधक’ बनाने की नापाक साजिश रची जा रही है, लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी की इस नापाक इरादे को करारा झटका लगा है।
आम आदमी पार्टी से जुड़े सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दिपके को उम्मीद थी कि वे ‘ सामाजिक कार्यकर्ता’ सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल का लाभ उठाते हुए नीट परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक के खिलाफ जनता को सड़कों पर ले आएँगे, लेकिन शनिवार (18 जुलाई 2026) को पुलिस वांगचुक को उठाकर अस्पताल ले गई और इनके मनसूबे पर पानी फिर गया।
लाखों छात्रों के करियर से जुड़े एक अति संवेदनशील मुद्दे को भटकाने की पूरी कोशिश की गई और इसका राजनीतिक लाभ उठाने के लिए संसद मार्च का आह्वान भी किया गया। सोनम वांगचुक को अस्पताल में भर्ती कराया गया है, और सूत्रों का कहना है कि उनकी भूख हड़ताल जल्द ही समाप्त हो जाएगी।
इस तरह का घटनाक्रम कॉकरोच जनता पार्टी के लिए गंभीर चिंता का विषय है, जिसकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएँ सोनम वांगचुक की बिगड़ती स्वास्थ्य स्थिति से निर्धारित होतीं।
जब जनता को ‘अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल’ का सहारा लेकर भावनात्मक रूप से प्रभावित करने वाला कोई नहीं बचा, तो अभिजीत दिपके (जो अब तक मौज-मस्ती करते रहे हैं) ने अनुपस्थित कार्यकर्ता के नक्शेकदम पर चलने का फैसला किया है और उन्होंने यह निर्णय तब लिया जब सोशल मीडिया पर उनकी गिरफ्तारी के बारे में झूठ फैलाकर दहशत और घबराहट पैदा करने के प्रयास विफल रहे।
कॉकरोच जनता पार्टी की भड़काऊ बयानबाजी
यह साफ है कि आम आदमी पार्टी (AAP) समर्थित वायरल मार्केटिंग के आधार पर अस्तित्व में आई कॉकरोच जनता पार्टी इस अवसर को हाथ से जाने नहीं देगी। यही वजह है कि समर्थक और नेता अब हिंसा की भाषा बोलने लगे हैं, लेकिन काफी चालाकी से। इसकी शुरुआत अभिजीत दिपके ने कर दी है।
(अभिजीत दिपके की ट्वीट का स्क्रीनशॉट)
मुख्य न्यायिक समिति के प्रवक्ता आशुतोष रांका ने भी रणनीति के तहत जानबूझकर सोनम वांगचुक की ‘गिरफ्तारी’ और अभिजीत दिपके पर हमले के बारे में फर्जी खबरें फैलाईं।
उन्होंने घोषणा की, “दिल्ली पुलिस ने अपना असली रंग दिखा दिया है। अब चुप रहने का समय नहीं है। हमें पूरे भारत में ‘शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन’ शुरू करने की जरूरत है।”
Delhi Police is cracking down at Jantar Mantar. Beating up people and taking away Sonam sir forcefully
इसके बाद उन्होंने समर्थकों से झटपट ‘जंतर मंतर’ पहुँचने का आह्वान किया और दावा किया कि यह भारत और सोनम वांगचुक को ‘बचाने’ की लड़ाई है।
सौरव दास भली-भांति जानते हैं कि हजारों प्रदर्शनकारियों की अचानक भीड़ अशांति पैदा कर सकती है और कानून-व्यवस्था को बिगाड़ सकती है। भीड़ हिंसा और तोड़फोड़ भी कर सकती है।
लेकिन सीजेपी के प्रवक्ता इसके बजाय लोगों की भावनाओं को भड़काने और बड़ी संख्या में लोगों को लामबंद करने में व्यस्त हैं, उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि लोगों का जमावड़ा हिंसक भी हो सकता है। ऐसा लगता है कि इसके परिणाम को लेकर उनकी जवाबदेही तो बिल्कुल भी नहीं है।
(सौरभ दास के ट्वीट का स्क्रीनशॉट)
इन सबके बीच सारा ध्यान (20 जुलाई 2026) सोमवार को प्रस्तावित ‘संसद मार्च’ पर है। मुख्य न्यायाधीश को उम्मीद है कि इस सरकार विरोधी जुलूस में 15 लाख लोग सड़कों पर उतरेंगे।
Everyone should show up at Jantar Mantar immediately! This is a fight to save India! A fight to save Sonam! https://t.co/Lb2IWbBxVg
2020 के दिल्ली हिंदू विरोधी दंगों से भी नहीं सीख रहे ये लोग
हिंसा के अप्रत्यक्ष आह्वान का पैटर्न और रणनीति वैसी ही लगती है, जो 2020 में हुए दिल्ली हिंदू विरोधी दंगों में देखा जा सकता है।
सीएए विरोध प्रदर्शनों की आड़ में, शाहीन बाग की ‘शेरनियों’ ने सड़कों पर धरना दिया, जनजीवन ठप्प कर दिया और उत्तर-पूर्वी दिल्ली में 52 लोगों की जान लेने वाले 2020 के दंगों की नींव रखी।
इस्लामवादियों का जमावड़ा दिसंबर 2019 में ही शुरू हो गया था। उस वक्त जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय से संसद तक मार्च निकाला गया था। हालाँकि पुलिस ने इसे नाकाम कर दिया था। शरजील इमाम जैसे भारत विरोधी इस्लामिस्ट भी इस विरोध प्रदर्शन का हिस्सा थे, जिसमें हिंसा, संपत्ति की तोड़फोड़ और सुरक्षा बलों के साथ झड़पें हुईं।
इस घटना के बाद, भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद जामा मस्जिद पहुँचे और भारी पुलिस बल की मौजूदगी के बावजूद विरोध प्रदर्शन पर लगे प्रतिबंध का उल्लंघन किया। शुक्रवार की नमाज के बाद जामा मस्जिद के गेट के अंदर अपने समर्थकों का नेतृत्व करते हुए आजाद को संविधान की प्रस्तावना की एक प्रति और बीआर अंबेडकर के पोस्टर पकड़े हुए देखा गया।
बाद में पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया। पुलिस के मुताबिक, आजाद ने भीड़ को उकसाया था , जिसके कारण दिल्ली गेट के पास हिंसा भड़क गई और एक कार में आग लगा दी गई।
Abhijeet Dipke sits on an indefinite hunger strike.
The ‘Chalo Sansad’ march on 20 July will proceed as planned.
— Cockroach is Back (@Cockroachisback) July 18, 2026
‘जय भीम’ के संस्थापक चंद्रशेखर आजाद अब फिर कॉकरोज जनता पार्टी (सीजेपी) का समर्थन करते नजर आ रहे हैं।
‘आंदोलनजीवी’ योगेंद्र यादव ने भी सोनम वांगचुक का समर्थन किया। वह सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दिपके को सांत्वना देते हुए देखे गए। दिसंबर 2019 में यादव की मुलाकात शरजील इमाम से उमर खालिद के जरिए हुई थी।
दिल्ली पुलिस द्वारा दायर आरोपपत्र के अनुसार , योगेंद्र यादव, शरजील इमाम और उमर खालिद के बीच यह तय हुआ था कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल मुसलमानों को कट्टरपंथी विचारधारा में ढालने और चक्का जाम के लिए लोगों को लामबंद करने के लिए किया जाएगा। वह सीएबी-जैम नामक एक व्हाट्सएप ग्रुप का भी सदस्य था, जिसने सीएए विरोधी हिंसक प्रदर्शनों के बीच सामंजस्य स्थापित की थी।
Since this morning, this is the fifth time Abhijeet Dipke has pretended to cry.
The only thing he's upset about is that, in the heat of the moment, he announced that he was going on a hunger strike, but now he's starving.
डोनाल्ड ट्रम्प की भारत यात्रा के समय हुए दंगों से पहले 10 फरवरी 2020 को इस्लामवादियों ने एक और विरोध मार्च निकाला था। यह मार्च जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय से शुरू होकर संसद के सामने समाप्त होना था। बाद में दिल्ली पुलिस ने इसे रोक दिया।
सीजेपी के प्रति अपना समर्थन कॉन्ग्रेस ने पहले ही जता दिया है। उसने सीएए विरोधी प्रदर्शनों को भी याद किया है लोगों के जमावड़े के बारे में भी इशारों-इशारों में बता रही है।
गौरतलब है कि फरवरी 2020 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिल्ली में हिंदू विरोधी दंगों के दौरान नफरत फैलाने वाले भाषण देने के आरोप में कॉन्ग्रेस नेताओं सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी वाड्रा के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की माँग करने वाली याचिका को लेकर दिल्ली पुलिस, राज्य सरकार और केंद्र को नोटिस जारी किया था।
हमने यह भी देखा है कि कैसे खालिस्तानियों ने किसान विरोध प्रदर्शनों की आड़ में 2021 में लाल किले तक मार्च निकाला और भारतीय तिरंगे का अपमान किया ।
इसलिए इस बार सतर्क रहने की जरूरत है। सोनम वांगचुक को अस्पताल ले जाना भी इस दिशा में एक बड़ा कदम है। फिर भी पुलिस और केन्द्र सरकार को पूरी तरह तैयार रहना होगा, ताकि ‘प्रदर्शनकारी’ एक बार फिर राज्य को बंधक न बना सकें।
जो लोग इतिहास से सबक नहीं सीखते, वे उसे दोहराने के लिए अभिशप्त होते हैं। कॉकरोच जैसी जनता पार्टी 20 जुलाई 2026 को एक खतरनाक खेल खेलने जा रही है। दिल्ली को बचाने के लिए इसका विफल होना बेहद जरूरी है।
(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)
जब देश का कोई उद्योगपति 500 करोड़ या 5000 करोड़ रुपए का निवेश करने का फैसला करता है, तो उसके सामने सबसे बड़ा सवाल सिर्फ यह नहीं होता कि उसे सस्ती जमीन कहाँ मिलेगी या सबसे ज़्यादा टैक्स छूट कौन देगा।
उसका पहला सवाल होता है अगर मैं इस राज्य में निवेश करता हूँ, तो क्या मेरी फैक्ट्री तय समय पर बन पाएगी? क्या सरकार मेरे साथ एक साझेदार की तरह काम करेगी या मुझे महीनों तक फाइलों और मंजूरियों के चक्कर लगाने पड़ेंगे? बंदरगाह कितनी दूर है? क्या 24 घंटे बिजली उपलब्ध रहेगी? क्या तैयार सामान देश और विदेश के बाजारों तक तेजी से पहुँच सकेगा? और सबसे अहम बात, क्या आज लागू नीतियों पर अगले पाँच साल बाद भी भरोसा किया जा सकेगा?
ये सवाल भले ही सामान्य लगें, लेकिन दुनिया भर में अरबों डॉलर का निवेश किस देश या किस राज्य में जाएगा, इसका फैसला अक्सर इन्हीं सवालों के जवाब तय करते हैं। यही वजह है कि निवेश की दुनिया में एक मशहूर कहावत है कि कोई भी कारोबारी सबसे पहले नक्शा नहीं देखता, बल्कि सरकार का रवैया देखता है। नक्शा बाद में देखा जाता है।
भारत में भी निवेश आकर्षित करने के लिए राज्यों के बीच लंबे समय से प्रतिस्पर्धा चल रही है। कुछ राज्य सस्ती जमीन उपलब्ध कराते हैं, कुछ टैक्स में छूट देते हैं, कुछ विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) विकसित करते हैं।
जबकि कुछ बड़े-बड़े निवेश शिखर सम्मेलन आयोजित कर दुनिया भर के उद्योगपतियों को निवेश के लिए आमंत्रित करते हैं। लेकिन इन सभी प्रयासों के बीच एक सवाल का व्यवस्थित और स्पष्ट जवाब कभी सामने नहीं आया निवेशक के नजरिए से भारत का सबसे अनुकूल राज्य कौन सा है?
इसी सवाल का जवाब तलाशने के लिए नीति आयोग ने पहली बार पूरे देश के लिए ‘निवेश अनुकूलता सूचकांक’ तैयार किया है। इस सूचकांक के तहत सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का एक समान मानदंडों पर आकलन किया गया।
इसमें सिर्फ सरकारों के दावों को ही आधार नहीं बनाया गया, बल्कि निवेशकों के वास्तविक अनुभवों को भी बराबर महत्व दिया गया। इस मूल्यांकन के नतीजों में गुजरात देश का सबसे निवेश-अनुकूल राज्य बनकर सामने आया। इसके बाद महाराष्ट्र दूसरे और तमिलनाडु तीसरे स्थान पर रहा।
A matter of immense pride for every Gujarati.
Gujarat has emerged as the top-ranked state in NITI Aayog's Investment Friendliness Index, reaffirming our position as India's most preferred investment destination.
Inspired by the visionary leadership of Hon'ble PM Shri…
इस खबर को सिर्फ ‘गुजरात नंबर 1’ के तौर पर नहीं देखना चाहिए। क्योंकि यह कोई सामान्य रैंकिंग नहीं है, न ही किसी मीडिया संस्थान का दिया गया पुरस्कार है और न ही किसी एक विभाग का मूल्यांकन।
यह सरकार की एक ऐसी पहल है, जिसके जरिए पहली बार यह समझने की कोशिश की गई है कि अगर कोई निवेशक अपना पैसा लेकर भारत आता है, तो निवेश के लिए उसे किस राज्य पर सबसे ज्यादा भरोसा होता है।
और जब इस सवाल का जवाब गुजरात के पक्ष में आता है, तो यह सिर्फ एक साल की मेहनत का नतीजा नहीं माना जा सकता। इसके पीछे कई वर्षों से लगातार अपनाई गई एक व्यापक रणनीति है, जिसका असर आम लोगों को अक्सर तुरंत दिखाई नहीं देता।
यह सूचकांक केवल रैंकिंग के लिए नहीं है, यह भारत के भविष्य के लिए है
आज भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। आने वाले दो दशकों में भारत को विनिर्माण, निर्यात और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं का प्रमुख केंद्र बनाने की लगातार बात की जा रही है। लेकिन सिर्फ इच्छा जताने से निवेश नहीं आता।
दुनिया की बड़ी कंपनियाँ अब केवल सस्ते श्रम को नहीं देखतीं। वे नीतिगत स्थिरता, कानूनी स्पष्टता, मजबूत बुनियादी ढाँचा, कुशल मानव संसाधन, बिजली, पानी, बंदरगाह, लॉजिस्टिक्स और सरकारी फैसले लेने की गति जैसे सभी पहलुओं का एक साथ आकलन करती हैं।
नीति आयोग ने भी अपनी रिपोर्ट में इसी बात पर जोर दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने का लक्ष्य केवल केंद्र सरकार के प्रयासों से हासिल नहीं किया जा सकता।
आखिरकार उद्योग राज्यों में स्थापित होते हैं, रोजगार भी राज्यों में ही पैदा होता है और निवेश का सबसे बड़ा असर भी राज्यों पर ही दिखाई देता है। इसलिए यदि भारत को वैश्विक निवेश केंद्र बनना है, तो यह आकलन करना जरूरी है कि हर राज्य इसके लिए कितना तैयार है।
यह सोच एक दिन में विकसित नहीं हुई। जुलाई 2024 में नीति आयोग की गवर्निंग काउंसिल की बैठक के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्यों के लिए निवेश-अनुकूल ढाँचा तैयार करने की आवश्यकता पर जोर दिया था।
इसके बाद केंद्रीय बजट 2025-26 में इसकी औपचारिक घोषणा की गई और अंततः यह सूचकांक तैयार किया गया। इसका उद्देश्य केवल राज्यों की रैंकिंग तय करना नहीं था, बल्कि उन्हें एक-दूसरे से सीखने, अपनी कमियों को पहचानने और बेहतर प्रदर्शन के लिए प्रोत्साहित करना भी था। इसी वजह से इस सूचकांक को केवल एक साधारण रैंकिंग नहीं, बल्कि राज्यों के लिए एक ‘मार्गदर्शक’ के रूप में देखा जाना चाहिए।
निवेशक को अंततः क्या दिखता है?
मान लीजिए कोई जर्मन ऑटोमोबाइल कंपनी भारत में निवेश करना चाहती है। या फिर अमेरिका, जापान या ताइवान की कोई सेमीकंडक्टर कंपनी करोड़ों रुपए की लागत से अपना प्लांट लगाने की योजना बना रही है।
ऐसे में वह सबसे पहले क्या करेगी? सबसे पहले वह बाजार का आकलन करेगी। फिर कच्चे माल की उपलब्धता की जाँच करेगी। इसके बाद सरकारी नीतियों का मूल्यांकन करेगी। वह यह जानना चाहेगी कि जरूरी मंजूरियाँ मिलने में कितना समय लगता है, पर्यावरण संबंधी प्रक्रियाएँ कितनी पारदर्शी हैं, बिजली और पानी की आपूर्ति कितनी भरोसेमंद है, कानून-व्यवस्था कैसी है और अगर भविष्य में सरकार बदल भी जाए, तो क्या नीतियों में कोई बड़ा बदलाव नहीं होगा।
नीति आयोग ने इन्हीं सभी सवालों के जवाबों को आंकड़ों के रूप में मापने की कोशिश की है। इसके लिए कुल 84 संकेतकों को आठ प्रमुख स्तंभों में बाँटा गया है। बुनियादी ढाँचे से लेकर संस्थागत व्यवस्था, कारोबारी माहौल से लेकर वित्तीय स्थिति और पर्यावरणीय लचीलेपन तक, हर महत्वपूर्ण पहलू को इसमें शामिल किया गया है।
इतना ही नहीं, सिर्फ सरकारों के दावों पर भरोसा करने के बजाय निवेशकों की धारणा का भी सर्वेक्षण किया गया, ताकि कागज पर दर्ज तथ्यों और जमीनी हकीकत के बीच का अंतर भी सामने आ सके।
यहीं से गुजरात की कहानी शुरू होती है। क्योंकि गुजरात की सफलता किसी एक योजना या एक फैसले का नतीजा नहीं है। यह कई वर्षों में लगातार लिए गए ऐसे फैसलों का परिणाम है, जिन्होंने धीरे-धीरे राज्य को न सिर्फ एक मजबूत औद्योगिक केंद्र बनाया, बल्कि निवेशकों के लिए सबसे भरोसेमंद राज्यों में भी शामिल कर दिया।
गुजरात की सबसे बड़ी ताकत सड़कें या बंदरगाह नहीं, बल्कि भरोसा है
गुजरात के पास समुद्र था, लेकिन सिर्फ समुद्र होने से कोई राज्य अपने आप उद्योग का केंद्र नहीं बन जाता। देश के कई अन्य राज्यों के पास भी बंदरगाह हैं। गुजरात के पास पर्याप्त जमीन भी थी, लेकिन केवल जमीन होने से वैश्विक कंपनियाँ करोड़ों रुपए का निवेश करने नहीं आतीं।
असली सवाल यह था कि क्या कोई राज्य अपनी भौगोलिक ताकत को नीतिगत ताकत में बदल सकता है? गुजरात ने पिछले दो दशकों में इस चुनौती को शायद सबसे सफल तरीके से पूरा किया है।
NITI Aayog’s newly launched Investment Friendliness Index ranks Gujarat #1 among large states, with a score of 56.6 driven by our strength in infrastructure and financial health.
This is the outcome of 25 years of consistent, investor-first governance under PM @narendramodi ji’s…
जब तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में वाइब्रेंट गुजरात की शुरुआत हुई, तो कई लोगों ने इसे सिर्फ निवेशकों का एक भव्य सम्मेलन माना। लेकिन समय के साथ यह साफ हो गया कि इसका मकसद केवल समझौता ज्ञापनों (MoU) पर हस्ताक्षर करवाना नहीं था।
इसका असली उद्देश्य दुनिया को यह भरोसा दिलाना था कि गुजरात निवेश के लिए पूरी तरह तैयार है, सरकार निवेशकों की बात सुनने के लिए तत्पर है और फैसले लेने में अनावश्यक देरी नहीं होगी।
यह सिर्फ एक संदेश नहीं था। लेकिन केवल संदेश देने से काम नहीं चलता। उसके पीछे एक मजबूत व्यवस्था भी खड़ी करनी पड़ती है और शायद यहीं से गुजरात ने कई अन्य राज्यों से अलग रास्ता अपनाया।
जब तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में वाइब्रेंट गुजरात की शुरुआत हुई, तो कई लोगों ने इसे सिर्फ निवेशकों का एक भव्य सम्मेलन माना। लेकिन समय के साथ यह साफ हो गया कि इसका मकसद केवल समझौता ज्ञापनों (MoU) पर हस्ताक्षर करवाना नहीं था।
इसका असली उद्देश्य दुनिया को यह भरोसा दिलाना था कि गुजरात निवेश के लिए पूरी तरह तैयार है, सरकार निवेशकों की बात सुनने के लिए तत्पर है और फैसले लेने में अनावश्यक देरी नहीं होगी। यह सिर्फ एक संदेश नहीं था।
लेकिन केवल संदेश देने से काम नहीं चलता। उसके पीछे एक मजबूत व्यवस्था भी खड़ी करनी पड़ती है और शायद यहीं से गुजरात ने कई अन्य राज्यों से अलग रास्ता अपनाया।
नीतियाँ नहीं, बल्कि एक संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र बनाने की रणनीति
गुजरात के औद्योगिक विकास का विश्लेषण करने पर एक बात साफ दिखाई देती है कि राज्य ने कभी भी किसी एक बड़ी परियोजना के भरोसे अपनी विकास रणनीति नहीं बनाई। इसके बजाय, उसने धीरे-धीरे ऐसा निवेश पारिस्थितिकी तंत्र तैयार किया, जिसमें निवेशक की लगभग हर जरूरत एक-दूसरे की पूरक बन गई।
अगर किसी कंपनी को जमीन मिल जाए लेकिन बिजली न हो, तो निवेश रुक जाएगा। अगर बिजली हो लेकिन बंदरगाह तक पहुँचने के लिए बेहतर सड़क न हो, तो उत्पादन की लागत बढ़ जाएगी। अगर बंदरगाह भी हो, लेकिन सरकारी मंजूरियाँ मिलने में वर्षों लग जाएँ, तो कंपनी किसी दूसरे राज्य का रुख कर सकती है।
यही वजह है कि गुजरात ने अलग-अलग परियोजनाओं को स्वतंत्र योजनाओं की तरह नहीं, बल्कि एक समग्र विकास मॉडल के हिस्से के रूप में आगे बढ़ाया। इसी कारण आज जब गुजरात के नक्शे को देखा जाता है, तो वहाँ सिर्फ शहर नहीं, बल्कि एक-दूसरे से जुड़े आर्थिक केंद्र दिखाई देते हैं।
कांडला और मुंद्रा जैसे बंदरगाह देश के व्यापार के प्रमुख प्रवेश द्वार बन चुके हैं। दिल्ली-मुंबई औद्योगिक कॉरिडोर राज्य को सीधे उत्तर भारत से जोड़ता है। समर्पित माल ढुलाई कॉरिडोर माल परिवहन को तेज और अधिक प्रभावी बनाते हैं।
धोलेरा जैसे नए औद्योगिक शहर भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर विकसित किए जा रहे हैं। वहीं सानंद ऑटोमोबाइल उद्योग से लेकर सेमीकंडक्टर विनिर्माण तक, नए उद्योगों का प्रमुख केंद्र बनकर उभरा है।
अगर इन सभी परियोजनाओं को अलग-अलग देखा जाए, तो इनका प्रभाव उतना बड़ा नहीं लगता, लेकिन जब इन्हें एक साथ देखा जाता है, तो गुजरात एक संपूर्ण और मजबूत निवेश पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में सामने आता है।
शायद यही वजह है कि नीति आयोग ने बुनियादी ढाँचे को केवल सड़कों और पुलों तक सीमित नहीं रखा। अपनी रिपोर्ट में आयोग ने स्पष्ट कहा है कि निवेश आकर्षित करने के लिए भौतिक सुविधाओं के साथ-साथ संस्थागत क्षमता और नीतिगत स्थिरता भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।
इसी सोच के तहत इस सूचकांक में बुनियादी ढाँचे के अलावा कारोबारी माहौल, सुशासन, संसाधन उपलब्धता और संस्थागत वातावरण जैसे प्रमुख स्तंभों को भी समान महत्व दिया गया है।
गुजरात ने न केवल उद्योगों को आमंत्रित किया, बल्कि उद्योगों को आत्मविश्वास भी प्रदान किया
भारत में कई राज्य निवेशकों को आकर्षित करने के लिए बड़े-बड़े सम्मेलन आयोजित करते हैं, हजारों करोड़ रुपए के समझौता ज्ञापनों (MoU) की घोषणा करते हैं और टैक्स में अलग-अलग तरह की छूट भी देते हैं। लेकिन निवेशक केवल विज्ञापनों या घोषणाओं से प्रभावित नहीं होते। वे वर्षों तक किसी राज्य के काम करने के तरीके और उसके व्यवहार का आकलन करते हैं।
किसी भी उद्योगपति के लिए सबसे बड़ी पूंजी सिर्फ पैसा नहीं, बल्कि समय होता है। अगर किसी प्लांट को शुरू होने में दो साल की देरी हो जाए, तो इससे हजारों करोड़ रुपए का नुकसान हो सकता है।
यही वजह है कि दुनिया भर की कंपनियों के लिए ईज़ ऑफ डूइंग बिजनेस का मतलब केवल कोई प्रमाणपत्र या रैंकिंग नहीं, बल्कि सरकार के हर विभाग के साथ उनका वास्तविक अनुभव होता है।
गुजरात ने इसी क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई है। पिछले कुछ वर्षों में राज्य ने मंजूरी प्रक्रियाओं को सरल और तेज बनाने की दिशा में लगातार काम किया है। सिंगल-विंडो सिस्टम, समयबद्ध मंजूरी, डिजिटल प्रक्रियाएँ और उद्योग विभाग की सक्रिय भूमिका ने निवेशकों को यह संदेश दिया कि सरकार केवल एक नियामक नहीं, बल्कि विकास की साझेदार भी है।
नीति आयोग ने भी इस पहलू को विशेष महत्व दिया है। अपनी रिपोर्ट में आयोग ने स्पष्ट कहा है कि निवेशकों के लिए नीतिगत पारदर्शिता, तेज निर्णय प्रक्रिया और सरकार के साथ बेहतर समन्वय निवेश को प्रभावित करने वाले सबसे महत्वपूर्ण कारकों में शामिल हैं। शायद यही वजह है कि जब कोई नई वैश्विक कंपनी भारत में निवेश की संभावना पर विचार करती है, तो चर्चा में सबसे पहले गुजरात का नाम सामने आता है।
आज जो कुछ भी देखने को मिलता है, उसकी तैयारी कई साल पहले शुरू हो गई थी
भारत में कई राज्य निवेशकों को आकर्षित करने के लिए बड़े-बड़े सम्मेलन आयोजित करते हैं, हजारों करोड़ रुपए के समझौता ज्ञापनों (MoU) की घोषणा करते हैं और टैक्स में अलग-अलग तरह की छूट भी देते हैं।
लेकिन निवेशक केवल विज्ञापनों या घोषणाओं से प्रभावित नहीं होते। वे वर्षों तक किसी राज्य के काम करने के तरीके और उसके व्यवहार का आकलन करते हैं।
किसी भी उद्योगपति के लिए सबसे बड़ी पूंजी सिर्फ पैसा नहीं, बल्कि समय होता है। अगर किसी प्लांट को शुरू होने में दो साल की देरी हो जाए, तो इससे हजारों करोड़ रुपए का नुकसान हो सकता है।
यही वजह है कि दुनिया भर की कंपनियों के लिए ईज़ ऑफ डूइंग बिजनेस का मतलब केवल कोई प्रमाणपत्र या रैंकिंग नहीं, बल्कि सरकार के हर विभाग के साथ उनका वास्तविक अनुभव होता है।
गुजरात ने इसी क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई है। पिछले कुछ वर्षों में राज्य ने मंजूरी प्रक्रियाओं को सरल और तेज बनाने की दिशा में लगातार काम किया है। सिंगल-विंडो सिस्टम, समयबद्ध मंजूरी, डिजिटल प्रक्रियाएँ और उद्योग विभाग की सक्रिय भूमिका ने निवेशकों को यह संदेश दिया कि सरकार केवल एक नियामक नहीं, बल्कि विकास की साझेदार भी है।
नीति आयोग ने भी इस पहलू को विशेष महत्व दिया है। अपनी रिपोर्ट में आयोग ने स्पष्ट कहा है कि निवेशकों के लिए नीतिगत पारदर्शिता, तेज निर्णय प्रक्रिया और सरकार के साथ बेहतर समन्वय निवेश को प्रभावित करने वाले सबसे महत्वपूर्ण कारकों में शामिल हैं।
शायद यही वजह है कि जब कोई नई वैश्विक कंपनी भारत में निवेश की संभावना पर विचार करती है, तो चर्चा में सबसे पहले गुजरात का नाम सामने आता है।
लेकिन इस सफलता की असली कसौटी कहाँ है?
कोई भी सरकार अपने विकास के दावे कर सकती है। वह बड़ी-बड़ी परियोजनाओं की घोषणा भी कर सकती है। लेकिन उसकी वास्तविक सफलता की परीक्षा तब होती है, जब कोई निष्पक्ष संस्था समान मानदंडों पर सभी राज्यों का मूल्यांकन करे और यह सवाल पूछे कि निवेशकों के लिए सबसे अनुकूल माहौल आखिर कहाँ है।
नीति आयोग का यह पहला निवेश अनुकूलता सूचकांक इसी कसौटी पर आधारित है। इसमें गुजरात का पहले स्थान पर आना इस बात का संकेत है कि पिछले दो दशकों में राज्य द्वारा अपनाया गया विकास मॉडल केवल बड़ी परियोजनाएँ खड़ी करने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने निवेशकों का भरोसा लगातार मजबूत करने में भी सफलता हासिल की है।
आम गुजरातियों के बारे में क्या?
अक्सर जब ऐसी रिपोर्टें सामने आती हैं, तो आम आदमी के मन में यह सवाल उठता है कि अगर किसी राज्य को निवेश के लिए सबसे अनुकूल माना जाता है, तो उससे उसे क्या फायदा होगा? पहली नजर में ऐसा लगता है कि निवेशक आएँगे तो उद्योगपतियों को लाभ होगा, सरकार अपनी उपलब्धियों का जश्न मनाएगी, लेकिन आम नागरिक के जीवन में क्या बदलेगा? वास्तव में, निवेश की पूरी व्यवस्था ऐसी है कि इसका सबसे बड़ा और सबसे व्यापक असर आम लोगों पर ही पड़ता है।
मान लीजिए कोई कंपनी गुजरात में 10000 करोड़ रुपए की लागत से एक नया प्लांट लगाने का फैसला करती है। खबरों में यह बात प्रमुखता से आएगी कि इतने करोड़ रुपए का निवेश हुआ है। लेकिन इसकी असली कहानी तो इसके बाद शुरू होती है।
प्लांट बनने से पहले ही निर्माण कार्य में हजारों लोगों को रोजगार मिलता है। इसके साथ ही मशीनरी पहुँचाने वाले, ट्रांसपोर्टर, गोदाम संचालक, स्थानीय सप्लायर, छोटे-बड़े ठेकेदार और आसपास के कारोबारियों की आय और कामकाज भी बढ़ने लगता है। जब प्लांट शुरू होता है, तो केवल प्रत्यक्ष रोजगार ही नहीं मिलता, बल्कि उससे जुड़े कई छोटे और सहायक उद्योग भी विकसित होने लगते हैं।
किसी एक बड़े उद्योग के आसपास धीरे-धीरे पूरी स्थानीय अर्थव्यवस्था आकार लेने लगती है। नए आवासीय क्षेत्र विकसित होते हैं। स्कूल, अस्पताल, होटल, रेस्टोरेंट, बैंक और दूसरी जरूरी सेवाओं का विस्तार होता है। यही वजह है कि अर्थशास्त्री किसी बड़े निवेश को केवल एक कंपनी का निवेश नहीं मानते, बल्कि पूरे क्षेत्र की आर्थिक प्रगति का इंजन मानते हैं।
शायद इसी कारण से नीति आयोग ने अपनी रिपोर्ट में निवेश को केवल उद्योग स्थापित करने तक सीमित नहीं रखा है। रिपोर्ट में निवेश को रोजगार सृजन, उत्पादन, निर्यात, उत्पादकता और दीर्घकालिक आर्थिक समृद्धि से सीधे जोड़ा गया है। साथ ही यह भी स्पष्ट कहा गया है कि बेहतर निवेश वातावरण किसी भी राज्य की समग्र आर्थिक क्षमता को मजबूत बनाता है।
लेकिन प्रथम स्थान प्राप्त करना ही अंतिम लक्ष्य नहीं है
गुजरात के लिए यह पहला स्थान निश्चित रूप से गर्व की बात है, लेकिन शायद इससे भी बड़ी बात यह है कि अब पूरे देश की निगाहें गुजरात पर होंगी। क्योंकि यह सूचकांक कोई ऐसा दस्तावेज नहीं है, जिसे एक बार तैयार करके बंद कर दिया जाए।
नीति आयोग का स्पष्ट उद्देश्य है कि इस मूल्यांकन को समय-समय पर दोहराया जाए, राज्यों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा मिले और हर राज्य दूसरे राज्यों से सीखकर अपने प्रदर्शन में सुधार करे।
यही वजह है कि आने वाले वर्षों में महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश और अन्य राज्य भी अपनी नीतियों को और बेहतर बनाने की कोशिश करेंगे। इससे राज्यों के बीच प्रतिस्पर्धा और अधिक मजबूत होगी।
ऐसे में गुजरात के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती पहला स्थान हासिल करना नहीं, बल्कि उसे लगातार बनाए रखना है। क्योंकि निवेश की दुनिया में अतीत की उपलब्धियों से कहीं ज्यादा महत्व वर्तमान प्रदर्शन और लगातार सुधार का होता है।
जो राज्य आज सबसे आगे है, अगर वह समय के साथ खुद को नहीं बदलेगी, तो कल पीछे भी छूट सकती है। दुनिया की बड़ी कंपनियाँ केवल भारत के राज्यों की आपस में तुलना नहीं करतीं, बल्कि वे भारत की तुलना वियतनाम, इंडोनेशिया, मलेशिया, मैक्सिको और पूर्वी यूरोप जैसे देशों से भी करती हैं। इसलिए गुजरात के लिए अब प्रतिस्पर्धा सिर्फ देश के भीतर नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर है।
इस चर्चा का शायद सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है
इस सूचकांक को ध्यान से पढ़ने पर एक बात बार-बार सामने आती है। नीति आयोग ने कहीं भी यह नहीं कहा कि सिर्फ सस्ती जमीन उपलब्ध करा देने से निवेश आ जाएगा। न ही रिपोर्ट में यह कहा गया है कि केवल टैक्स में छूट देकर कोई राज्य निवेश का केंद्र बन सकता है।
इसके विपरीत, पूरी रिपोर्ट में एक स्पष्ट और लगातार उभरने वाला विचार यह है कि निवेश तभी आता है, जब पूरा पारिस्थितिकी तंत्र निवेशकों का भरोसा जीतता है। इसका मतलब है, अच्छी और स्थिर नीतियाँ, मजबूत बुनियादी ढाँचा, तेज और पारदर्शी निर्णय प्रक्रिया, प्रभावी शासन और भविष्य के लिए स्पष्ट रणनीति।
शायद यही वजह है कि गुजरात की सफलता को केवल किसी एक विभाग या किसी एक सरकार की उपलब्धि के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह कई वर्षों में विकसित हुए एक ऐसे समग्र विकास मॉडल का परिणाम है, जिसमें बंदरगाह, सड़कें, औद्योगिक गलियारे, निवेश-अनुकूल नीतियाँ, निवेशकों के साथ लगातार संवाद, नई तकनीकों को अपनाने की तैयारी और सुशासन की दक्षता इन सभी ने मिलकर एक-दूसरे की पूरक भूमिका निभाई है।
सिर्फ प्रथम स्थान ही नहीं, बल्कि विकास मॉडल की एक परीक्षा भी
भारत में विकास पर होने वाली चर्चा अक्सर राजनीतिक दावों और प्रतिदावों के बीच उलझ जाती है। जब कोई सरकार किसी उपलब्धि का श्रेय लेती है, तो विपक्ष उसकी आलोचना करता है।
लेकिन कुछ अवसर ऐसे भी होते हैं, जब बहस राजनीतिक बयानों पर नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित और निष्पक्ष मूल्यांकन पर आधारित होती है। नीति आयोग का पहला निवेश अनुकूलता सूचकांक ऐसा ही एक उदाहरण है।
यह सूचकांक यह नहीं कहता कि गुजरात में कोई समस्या नहीं है या वहाँ सुधार की कोई आवश्यकता नहीं है। इसके उलट, इसका उद्देश्य राज्यों को लगातार बेहतर प्रदर्शन करने और सुधार की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करना है। लेकिन यह जरूर दिखाता है कि निवेशकों को आकर्षित करने के लिए जरूरी विभिन्न मानकों पर गुजरात फिलहाल देश के अन्य सभी राज्यों से आगे है।
इसलिए गुजरात के इस पहले स्थान को केवल एक ट्रॉफी या रैंकिंग के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसे पिछले दो दशकों में राज्य द्वारा तय की गई विकास यात्रा की एक महत्वपूर्ण परीक्षा और उसकी सफलता के प्रमाण के रूप में देखना अधिक उचित होगा।
यही इस पूरी रिपोर्ट का सबसे बड़ा संदेश भी है। निवेशक केवल उन जगहों पर नहीं जाते, जहाँ सबसे बड़ी घोषणाएँ होती हैं, बल्कि वे वहाँ निवेश करते हैं, जहाँ उन्हें सबसे अधिक भरोसा दिखाई देता है।
नीति आयोग के पहले निवेश अनुकूलता सूचकांक ने कम से कम इतना स्पष्ट कर दिया है कि फिलहाल भारत के राज्यों में निवेशकों के भरोसे का सबसे मजबूत केंद्र गुजरात है।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
चीन पर लंबे समय से दुनिया के प्रमुख लोकतांत्रिक देशों के चुनावों में अलग-अलग तरीकों से दखल देने और उन्हें प्रभावित करने के आरोप लगते रहे हैं। अब अमेरिका में ट्रंप प्रशासन ने वर्ष 2020 से जुड़े खुफिया और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के कई दस्तावेजों को सार्वजनिक किया है।
इन दस्तावेजों में दावा किया गया है कि चीन ने 20 करोड़ अमेरिकी मतदाताओं का डेटा हासिल कर लिया था और अमेरिकी चुनाव प्रणाली की कमजोरियों का फायदा उठाकर चुनाव को जो बाइडेन के पक्ष में प्रभावित करने की कोशिश की थी।
चीन ने अमेरिकी वोटर्स का डेटा चुराकर किया इस्तेमाल, ट्रंप ने गोपनीय दस्तावेज सार्वजनिक कर दिए जाँच के दिए आदेश
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 16 जुलाई 2026 को राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में 2020 के चुनावों से जुड़े कई गोपनीय दस्तावेज सार्वजनिक किए। उन्होंने दावा किया कि इन दस्तावेजों से अमेरिकी चुनावी व्यवस्था की गंभीर कमजोरियाँ सामने आती हैं और इसी वजह से उन्होंने यह जाँच कराने का आदेश दिया है कि चीन के कथित चुनावी हस्तक्षेप से जुड़ी खुफिया जानकारी उनके पहले कार्यकाल के दौरान आखिर क्यों दबाई गई या सार्वजनिक नहीं की गई।
अपने संबोधन में ट्रंप ने कहा, “आज रात मैं महत्वपूर्ण खुफिया दस्तावेजों को सार्वजनिक करने की घोषणा कर रहा हूँ। ये दस्तावेज हमारी चुनावी व्यवस्था की चौंकाने वाली कमजोरियों को उजागर करते हैं। इससे पता चलता है कि चुनाव प्रणाली हैकिंग, दुरुपयोग और विदेशी हस्तक्षेप के लिए पहले से कहीं अधिक संवेदनशील रही है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि वर्षों तक यह महत्वपूर्ण जानकारी अमेरिकी जनता से छिपाकर रखी गई।”
US President Donald Trump: Newly declassified documents show that over a period of years starting during the 2020 election cycle, the People’s Republic of China carried out what is believed to be the largest compromise of election data in history — resulting in China’s illicit…
ट्रंप ने अमेरिकी खुफिया एजेंसियों पर आरोप लगाया कि उन्होंने चीन के कथित चुनावी हस्तक्षेप और उन्हें हराने की साजिश से जुड़ी जानकारी को दबाकर रखा। उन्होंने इस मामले की जाँच के लिए ऑफिस ऑफ द डायरेक्टर ऑफ नेशनल इंटेलिजेंस (ODNI), न्याय विभाग (DOJ), फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (FBI) और सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी (CIA) को जाँच शुरू करने का निर्देश दिया।
ट्रंप ने यह भी कहा कि अब स्थिति बदल रही है और जिन दस्तावेजों को सार्वजनिक किया जा रहा है, उन्हें व्हाइट हाउस की गवर्नमेंट ट्रांसपेरेंसी टास्क फोर्स और राष्ट्रपति के इंटेलिजेंस एडवाइजरी बोर्ड ने तैयार किया है। उनके अनुसार, अमेरिका की शीर्ष खुफिया एजेंसियों के प्रमुखों ने इन दस्तावेजों की समीक्षा की है और उनकी प्रामाणिकता की पुष्टि की है।
ट्रंप का दावा है कि सार्वजनिक किए गए दस्तावेज पाँच बड़े मुद्दों से जुड़े हैं। इनमें सबसे बड़ा आरोप यह है कि 2020 के चुनाव के दौरान चीन ने अमेरिकी चुनावी डेटा में इतिहास की सबसे बड़ी सेंध लगाई और अवैध रूप से 22 करोड़ अमेरिकी मतदाताओं का डेटा हासिल कर लिया।
ट्रंप के मुताबिक, इस डेटा में मतदाताओं के नाम, पते, फोन नंबर, राजनीतिक दलों से जुड़ी जानकारी और अन्य संवेदनशील विवरण शामिल थे, जिनका इस्तेमाल वोटर पंजीकरण में गड़बड़ी और अन्य गैरकानूनी गतिविधियों के लिए किया जा सकता था।
उन्होंने इसे ‘अमेरिकी चुनावी सुरक्षा के लिए अभूतपूर्व संकट’ बताते हुए दावा किया कि अमेरिकी खुफिया जानकारी के अनुसार, चीन ने इस डेटा का इस्तेमाल करने के लिए एक विशेष डेटा एक्सप्लॉइटेशन यूनिट भी बनाई थी।
गुरुवार (16 जुलाई 2026) को जारी किए गए दस्तावेजों के दूसरे हिस्से में दावा किया गया है कि अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के तथाकथित ‘डीप स्टेट’ से जुड़े अधिकारियों ने चीन के कथित चुनावी हस्तक्षेप की गंभीरता से जुड़ी जानकारी को जानबूझकर दबाया और उसे कम करके दिखाया।
ट्रंप के अनुसार, यह जानकारी न केवल तत्कालीन राष्ट्रपति से बल्कि अमेरिकी जनता से भी छिपाकर रखी गई। गोपनीयता से मुक्त किए गए मेमो का हवाला देते हुए ट्रंप ने आरोप लगाया कि वर्ष 2020 में चीन ने अमेरिका के 18 राज्यों में करोड़ों मतदाताओं का डेटा खरीदा, चुराया या हैक कर लिया था।
ट्रंप ने कहा, “राष्ट्रपति होने के बावजूद मुझे या किसी और को इसकी जानकारी नहीं दी गई। हमारी जानकारी के अनुसार कॉन्ग्रेस को भी इससे अवगत नहीं कराया गया। इसके बजाय बार-बार यही कहा जाता रहा कि यह हमारे देश के इतिहास का सबसे सुरक्षित चुनाव था।”
सार्वजनिक किए गए गोपनीय दस्तावेजों के अनुसार, अप्रैल 2020 से चीन की खुफिया एजेंसियाँ अमेरिका के विभिन्न राज्यों के मतदाता पंजीकरण से जुड़े कई डेटा सेट का विश्लेषण कर रही थीं। व्हाइट हाउस द्वारा जारी जिप फाइल में ऐसे कई गोपनीय मेमो शामिल हैं, जिनमें मतदाता पंजीकरण रिकॉर्ड तक पहुँच या उनमें कथित सेंध लगाए जाने का उल्लेख किया गया है।
सार्वजनिक किए गए दस्तावेजों में से एक में दावा किया गया है कि अगस्त 2020 में चीनी सरकार ने बड़ी संख्या में नकली अमेरिकी ड्राइविंग लाइसेंस तैयार कर उन्हें गुप्त रूप से अमेरिका भेजा था। दस्तावेज के अनुसार, इन फर्जी लाइसेंसों का इस्तेमाल ऐसे हजारों चीनी छात्रों और प्रवासियों, जिन्हें चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) का समर्थक बताया गया है, को अमेरिकी राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जो बाइडेन के पक्ष में मतदान कराने के लिए किया जाना था, जबकि वे अमेरिका में मतदान करने के पात्र नहीं थे।
गोपनीयता से मुक्त किए गए एक दस्तावेज में दावा किया गया है कि चीन ने टिकटॉक के लाखों अमेरिकी यूजर्स का निजी डेटा, जिसमें उनके नाम, पहचान संबंधी जानकारी और पते शामिल थे, इकट्ठा किया था। दस्तावेज के अनुसार, इस जानकारी का इस्तेमाल असली अमेरिकी नागरिकों के नाम पर फर्जी ड्राइविंग लाइसेंस बनाने के लिए किया जा सकता था।
इन नकली लाइसेंसों में अमेरिकी नागरिकों के वास्तविक पहचान नंबर और पते शामिल होने से उन्हें पकड़ना बेहद मुश्किल होता। दस्तावेज में यह भी दावा किया गया है कि चीन की योजना इन फर्जी लाइसेंसों के जरिए हजारों मेल-इन वोट डलवाने की थी।
सार्वजनिक किए गए दस्तावेजों में यह भी आरोप लगाया गया है कि चीन ने टिकटॉक, फेसबुक, यूट्यूब, ट्विटर और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के साथ-साथ प्रभावशाली लोगों, पत्रकारों और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) से जुड़े नेटवर्क के माध्यम से अमेरिकी जनमत को प्रभावित करने की रणनीति बनाई थी।
दस्तावेजों के अनुसार, चीन ने अमेरिका में प्रवासी समुदायों के बीच सरकार के खिलाफ असंतोष बढ़ाने, ब्लैक लाइव्स मैटर (Black Lives Matter) आंदोलन को हवा देने और विभिन्न प्रमुख मुद्दों पर अपने पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश की।
ट्रंप ने यह भी दावा किया कि चीनी सरकार ने ऐसे अमेरिकी पत्रकारों की पहचान करने की कोशिश की, जिन्होंने राष्ट्रपति के खिलाफ नकारात्मक रिपोर्टिंग की थी और उन्हें राष्ट्रपति के खिलाफ और अधिक नकारात्मक लेख लिखने के लिए बड़ी रकम देने का प्रयास किया।” हालाँकि उन्होंने किसी भी ऐसे पत्रकार का नाम सार्वजनिक नहीं किया।
दस्तावेजों के अनुसार, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) ने अमेरिका के उन आंतरिक मुद्दों की पहचान की, जिनका इस्तेमाल समाज में विभाजन बढ़ाने के लिए किया जा सकता था।
इनमें प्रवासी समुदायों में सरकार के खिलाफ असंतोष पैदा करना, कथित मानवाधिकार उल्लंघनों को लेकर विरोध प्रदर्शनों को बढ़ावा देना, प्रवासी विरोधी और प्रवासी समर्थक समूहों के बीच तनाव बढ़ाना तथा आव्रजन विरोधी प्रदर्शनों को भड़काने जैसी गतिविधियाँ शामिल होने का दावा किया गया है।
दस्तावेजों में यह भी आरोप लगाया गया है कि चीन ने नस्लीय तनाव भड़काने की भी कोशिश की। इसके लिए उसने यह नैरेटिव फैलाया कि ट्रंप के नेतृत्व वाला व्हाइट हाउस अश्वेत लोगों से नफरत करता है। दस्तावेजों के अनुसार, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) ने नस्लीय विभाजन के सबूत के तौर पर प्रदर्शन और मार्च आयोजित कराने या उन्हें बढ़ावा देने का प्रयास किया।
इसके अलावा चीन ने यह नैरेटिव भी फैलाया कि अमेरिकी सरकार और कानून-प्रवर्तन एजेंसियों के बीच बुनियादी स्तर पर गंभीर मतभेद हैं।
इन दस्तावेजों में कुछ राज्यों की मतदाता सूचियों में गैर-नागरिकों के पंजीकरण जैसे अन्य प्रमुख विषय भी शामिल हैं। व्हाइट हाउस के अनुसार, गोपनीयता से मुक्त किए गए दस्तावेज़ों से संकेत मिलता है कि अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग (Department of Homeland Security) का मत था कि कई प्रमुख राज्यों की मतदाता सूचियों में कम से कम 2.5 लाख गैर-नागरिक दर्ज थे।
कुल मिलाकर ट्रंप प्रशासन का मानना है कि गोपनीयता से मुक्त कर सार्वजनिक किए गए दस्तावेज यह संकेत देते हैं कि चीन ने सीधे तौर पर मतपत्रों में बदलाव नहीं किया (हालाँकि ट्रंप ने FBI की 2020 की ‘रॉ इंटेलिजेंस’ का हवाला देते हुए दावा किया कि चीन ने जो बाइडेन के लिए मतपत्र तैयार करने की कोशिश की थी), न ही उसने वोटों की कुल संख्या बदली और न ही मतगणना में इस तरह का हस्तक्षेप किया जिससे 2020 के चुनाव का परिणाम पलट गया हो। लेकिन चीन ने ट्रंप की हार और बाइडेन की जीत सुनिश्चित करने के लिए अमेरिकी चुनावों में हस्तक्षेप जरूर किया।
हालाँकि ट्रंप के आलोचक, जिनमें अमेरिका की पारंपरिक मीडिया भी शामिल है, राष्ट्रपति की इस प्रस्तुति को उनके राजनीतिक लाभ के लिए डेटा तक पहुँच से जुड़े निष्कर्षों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना बता रहे हैं। लेकिन दूसरे देशों की घरेलू राजनीति और चुनावों को प्रभावित करने की चीन की व्यापक प्रवृत्ति को देखते हुए, उनके दावे विश्वसनीय प्रतीत होते हैं।
OpIndia ने पहले रिपोर्ट किया था कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) ने गैर-लाभकारी संगठनों, एक्टिविस्ट समूहों, थिंक टैंक और मीडिया संस्थानों का एक अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क खड़ा किया, जो उसके प्रचार तंत्र के रूप में काम करता है।
CCP ने अमेरिका में जन्मे टेक उद्योगपति नेविल रॉय सिंघम के नेतृत्व में एक प्रो-चीन सूचना-प्रचार (information laundering) नेटवर्क तैयार किया।
सिंघम ने 2017 में अपनी आईटी कंसल्टिंग कंपनी Thoughtworks को लगभग 78.5 करोड़ डॉलर में बेचने के बाद शंघाई में जाकर निवास करना शुरू किया था। यह इन्फॉर्मेशन लॉन्ड्रिंग नेटवर्क कच्चे सामाजिक आंदोलनों (raw activism) को व्यवस्थित प्रचार (polished propaganda) में बदलता है।
इसके बाद रॉय सिंघम द्वारा वित्तपोषित नेटवर्क उसे अमेरिका और अन्य लोकतांत्रिक देशों में मतभेद पैदा करने के लिए फैलाता है, जबकि चीन की छवि को ‘साम्राज्यवाद’, विशेष रूप से अमेरिकी साम्राज्यवाद, के मुकाबले एक ‘हितैषी’ विकल्प के रूप में पेश करता है। रिपोर्ट के अनुसार, क्यूबा में जारी वामपंथी सक्रियता इसका एक स्पष्ट उदाहरण है।
अमेरिका में फिलिस्तीन समर्थक आंदोलन, ट्रंप की क्यूबा में बढ़ती रुचि के बीच वहाँ बड़ी संख्या में वामपंथी कार्यकर्ताओं का पहुँचना और ईरान युद्ध को लेकर ‘नो वॉर’ अभियान जैसे आंदोलन देखने में स्वतःस्फूर्त और वास्तविक लगते हैं। लेकिन रिपोर्ट का दावा है कि ये वास्तव में सुनियोजित, पर्याप्त वित्तपोषित और राजनीतिक उद्देश्य से चलाए गए अभियान हैं, जिनके पीछे नेविल रॉय सिंघम के परोपकारी संगठनों, थिंक टैंक, मीडिया, कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों, हस्तियों, राजनीतिक संगठकों और सहयोगियों का नेटवर्क है।
रिपोर्ट के अनुसार, 2017 से नेविल रॉय सिंघम ने अपने चीन समर्थक प्रचार नेटवर्क में सीधे 27.8 करोड़ डॉलर से अधिक की फंडिंग की, जबकि 2025 तक पाँच महाद्वीपों में 223 लेनदेन के जरिए कुल धन प्रवाह 59.1 करोड़ डॉलर से अधिक रहा। यह भारी धनराशि 1,000 से अधिक आपस में जुड़े संगठनों तक पहुँची, जिनमें से करीब 200 संगठन सीधे तौर पर CCP के निर्देश पर चीन समर्थक और अमेरिका विरोधी संदेश तैयार करने और फैलाने में शामिल थे।
दूसरे देशों की राजनीति और चुनावों में चीन का हस्तक्षेप: क्या है CCP की ‘यूनाइटेड फ्रंट’ रणनीति
चीन के लिए सिर्फ अपने देश में ही नहीं, बल्कि दूसरे देशों में भी नैरेटिव, सत्ता और अपने हितों का सबसे अहम माध्यम है। तियानआनमेन स्क्वायर नरसंहार की सच्चाई दबाने से लेकर सरकार-विरोधी आलोचनाओं पर रोक लगाने तक, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) का मानना है कि उसका अस्तित्व और निर्विवाद शासन नैरेटिव पर नियंत्रण पर निर्भर करता है।
दरअसल CCP की एक राजनीतिक रणनीति है, जिसे ‘यूनाइटेड फ्रंट (United Front)’ कहा जाता है। इसका उद्देश्य विरोधियों को अलग-थलग करना और व्यापारिक समूहों, गैर-कम्युनिस्ट संगठनों तथा अल्पसंख्यक समुदायों जैसे संभावित सहयोगियों को अपने पक्ष में करना है।
CCP का यूनाइटेड फ्रंट वर्क डिपार्टमेंट (UFWD) एक अच्छी तरह से वित्तपोषित इकाई है, जो विभिन्न देशों में कई फ्रंट संगठनों के माध्यम से चीन के हितों को आगे बढ़ाने और उसका प्रभाव बढ़ाने का काम करती है। ये फ्रंट संगठन खुलकर यह नहीं बताते कि उनका संबंध CCP से है।
इन संगठनों के जरिए सरकारी स्वामित्व वाली कंपनियों, चीन में पंजीकृत निजी कंपनियों, चीनी छात्र संगठनों, विदेशी सांस्कृतिक संस्थाओं, विदेशी मीडिया, चीनी मूल के समुदायों तथा प्रभावशाली कारोबारी और राजनीतिक हस्तियों को लोकतांत्रिक संस्थाओं और प्रक्रियाओं के माध्यम से CCP के उद्देश्यों का समर्थन करने के लिए जोड़ा जाता है।
‘यूनाइटेड फ्रंट’ रणनीति, जिसे माओ जेदोंग अपनी ‘जादुई हथियार (Magic Weapon)’ कहा करते थे, के तहत CCP प्रभाव संचालन (Influence Operations) चलाती है, दुष्प्रचार (Disinformation) तैयार करती और फैलाती है, प्रभावशाली लोगों को अपने प्रभाव में लेने की कोशिश करती है, आर्थिक दबाव बनाती है, साइबर जासूसी करती है और प्रॉक्सी नेटवर्क खड़े करती है, ताकि दूसरे देशों में अपने हितों के अनुरूप नैरेटिव, नीतियों और जनमत को प्रभावित किया जा सके।
इस रणनीति के तहत मीडिया, थिंक टैंक, शैक्षणिक संस्थानों और प्रवासी संगठनों को वित्तीय सहायता देना या उन्हें प्रभावित करना, विदेशी सरकारों और लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं की कमजोरियों का फायदा उठाना और कुछ मामलों में अशांति भड़काना भी शामिल होता है।
चीन यूनाइटेड फ्रंट वर्क का इस्तेमाल खुफिया जानकारी जुटाने और विरोधियों के दमन के लिए भी करता है। हालाँकि दूसरे देशों के चुनावों में हस्तक्षेप करने या उन्हें प्रभावित करने की कोशिश केवल चीन तक सीमित नहीं है, लेकिन CCP जैसी केंद्रीकृत व्यवस्था के जरिए इतने बड़े पैमाने पर इस तरह के प्रभाव या शासन परिवर्तन (Regime Change) के प्रयास करने वाला शायद ही कोई दूसरा देश है।
कनाडा के संघीय चुनावों में चीनी हस्तक्षेप के आरोप
अमेरिका से पहले चीन पर कनाडा के चुनावों में हस्तक्षेप करने के भी आरोप लग चुके हैं। जून 2024 में कनाडा की खुफिया निगरानी संस्था नेशनल सिक्योरिटी एंड इंटेलिजेंस कमेटी ऑफ पार्लियामेंटेरियंस (NSICOP) ने ‘Special Report on Foreign Interference in Canada’s Democratic Processes and Institutions’ शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की।
इस रिपोर्ट में कनाडा की चुनावी और विधायी प्रक्रियाओं में चीन के व्यापक हस्तक्षेप का दावा किया गया। रिपोर्ट के संपादित (Redacted) संस्करण में यह भी उल्लेख है कि कुछ कनाडाई सांसदों ने चीन के साथ मिलीभगत की थी।
रिपोर्ट के अनुसार, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) के समर्थन से कुछ चीनी नागरिक कनाडा की शासन व्यवस्था और अर्थव्यवस्था के हर स्तर में घुसपैठ करने और उसे प्रभावित करने के लिए सुनियोजित प्रयास करते रहे हैं और अब भी कर रहे हैं।
रिपोर्ट में कहा गया कि CCP ने कनाडा के चुनावों में अवैध हस्तक्षेप, कनाडाई अधिकारियों को रिश्वत देने और संसाधनों के दोहन के लिए कनाडा के मूल निवासियों (Indigenous people) का गुप्त तरीकों से इस्तेमाल करने की कोशिश की। इसका उल्लेख रिपोर्ट के 2019 के गैर-संपादित (Non-redacted) संस्करण में भी किया गया था।
रिपोर्ट के अनुसार, चीन ने कनाडा और अन्य देशों में ‘ओवरसीज पुलिस स्टेशन’ (Overseas Police Stations) भी स्थापित किए थे। ट्रंप द्वारा अमेरिकी चुनावों में चीनी हस्तक्षेप के लगाए गए आरोपों की तरह ही NSICOP की रिपोर्ट में कहा गया कि चीन ने सोशल मीडिया और पारंपरिक मीडिया (Legacy Media) का इस्तेमाल कर कनाडाई मतदाताओं, विभिन्न जातीय-सांस्कृतिक समुदायों और सांसदों की राय को प्रभावित करने की कोशिश की।
2021 के कनाडाई संघीय चुनाव के दौरान सिक्योरिटी एंड इंटेलिजेंस थ्रेट्स टू इलेक्शंस टास्क फोर्स (SITE) ने पाया कि मुख्यधारा के मीडिया और सोशल मीडिया पर ऐसी गतिविधियाँ चल रही थीं, जिनका उद्देश्य मतदाताओं को कंजर्वेटिव पार्टी के समर्थन से हतोत्साहित करना था।
हालाँकि इन गतिविधियों का सीधा संबंध चीनी सरकार से स्थापित नहीं हो सका, लेकिन जाँच में सामने आए पैटर्न ने चीन द्वारा संचालित एक समन्वित अभियान की ओर संकेत किया। कनाडियन सिक्योरिटी इंटेलिजेंस सर्विस (CSIS) के आँकलन और हॉग आयोग (Hogue Commission) 2024 की सार्वजनिक जाँच में कहा गया कि बीजिंग ने 2019 और 2021 के कनाडाई संघीय चुनावों में गुप्त और भ्रामक तरीके से हस्तक्षेप किया।
रिपोर्ट के अनुसार, चीन ने जस्टिन ट्रूडो के नेतृत्व वाली लिबरल पार्टी का समर्थन किया। इसके लिए अनुकूल सोशल मीडिया प्रचार, चीनी-कनाडाई समुदाय में प्रॉक्सी एजेंटों का इस्तेमाल और अनुकूल उम्मीदवारों के चुनाव अभियान को वित्तीय सहायता देने जैसे तरीकों का उपयोग किया गया।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि कनाडाई सांसदों पर CCP का प्रभाव इतना बढ़ गया था कि संसद में चीन के पक्ष या विपक्ष में व्यक्त किए गए विचारों के आधार पर सांसदों को पुरस्कृत या दंडित किया जाता था। चीन का चुनावी हस्तक्षेप अमेरिका और कनाडा तक ही सीमित नहीं है, बल्कि भारत जैसे उसके प्रतिद्वंद्वी पड़ोसी देश तक भी पहुँचता है।
भारतीय राजनीति में चीनी हस्तक्षेप: न्यूजक्लिक मामला
अमेरिकी चुनावों में CCP के हस्तक्षेप के ताजा आरोप भारत की चुनावी राजनीति में चीन के लगातार हस्तक्षेप की याद दिलाते हैं। वर्षों से चीन से जुड़े प्रभाव अभियानों, चाहे वे मीडिया संस्थान हों, राजनेता हों या संदिग्ध NGO ने मोदी सरकार के खिलाफ नैरेटिव गढ़े हैं, जिनका अंतिम उद्देश्य सत्ता परिवर्तन (Regime Change) बताया गया है।
इसका सबसे बड़ा उदाहरण न्यूज़क्लिक (NewsClick) मामला है। चीन समर्थक प्रचार पोर्टल पहली बार 2021 में उस समय सुर्खियों में आया, जब वह प्रवर्तन निदेशालय (ED) के रडार पर आया। इस पोर्टल पर कथित तौर पर करीब 38 करोड़ रुपए की विदेशी फंडिंग धोखाधड़ी से प्राप्त करने का आरोप लगा था।
2023 में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत न्यूजक्लिक के संस्थापक प्रबीर पुरकायस्थ, एचआर प्रमुख अमित चक्रवर्ती समेत अन्य लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की और बाद में विस्तृत आरोपपत्र दाखिल किया।
अमेरिका में प्रो-चीन इन्फॉर्मेशन लॉन्ड्रिंग नेटवर्क चलाने वाले वही नेविल रॉय सिंघम भारत में भी अपना नेटवर्क फैला चुके हैं। रॉय सिंघम के Justice and Education Fund ने दिल्ली स्थित चीन समर्थक प्रचार पोर्टल न्यूज़क्लिक को 1.05 करोड़ डॉलर (10.5 मिलियन डॉलर) का दान दिया।
रॉय सिंघम के नेटवर्क के सबसे प्रमुख सदस्यों में विजय प्रसाद शामिल हैं। उन्होंने न्यूजक्लिक के लिए भारत विरोधी प्रचार वाले कई लेख लिखे हैं। विजय प्रसाद CPI(M) नेता बृंदा करात के भतीजे हैं। बृंदा करात, प्रकाश करात की पत्नी हैं, जो CPI(M) के वरिष्ठ नेता हैं।
न्यूजक्लिक की चीनी फंडिंग मामले में पहले सामने आए ईमेल आदान-प्रदान से नेविल रॉय सिंघम और करात परिवार के बीच करीबी संबंधों का खुलासा हुआ था। विजय प्रसाद प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल (Progressive International) के काउंसिल सदस्य भी रह चुके हैं।
यह एक अंतरराष्ट्रीय संगठन है, जो दुनिया भर के वामपंथी कार्यकर्ताओं और संगठनों को संगठित करता है। OpIndia पहले भी बता चुका है कि यह संगठन लगातार ऐसे प्रचार लेख और बयान प्रकाशित करता है, जिनमें मुस्लिम पीड़ित होने (Muslim Victimhood) के नैरेटिव को आगे बढ़ाकर मोदी सरकार को बदनाम किया जाता है।
यह मंच नियमित रूप से हर्ष मंदर जैसे हिंदू विरोधी और इस्लामवादी समर्थकों को जगह देता है, जबकि जयति घोष और ब्रिटेन के पूर्व लेबर सांसद जेरेमी कॉर्बिन इसके काउंसिल सदस्यों में शामिल हैं। रॉय सिंघम के प्रचार नेटवर्क का संबंध हमास समर्थक Tides Foundation से भी है।
यह फाउंडेशन कई हिंदू विरोधी और भारत विरोधी संगठनों तथा तत्वों को फंडिंग देने के लिए बदनाम है। इसने हिंदूज फॉर ह्यूमन राइट्स (HfHR) को भी अनुदान दिया, जिसके संबंध इस्लामवादी और खालिस्तानी तत्वों से बताए गए हैं। HfHR की स्थापना 2019 में इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल (IAMC) और ऑर्गनाइजेशन फॉर माइनॉरटीज ऑफ इंडिया (OFMI) नामक दो इस्लामवादी वकालत करने वाले संगठनों ने की थी।
Tides Foundation ने AMAN पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट (AMAN) को भी फंडिंग दी। इस ट्रस्ट का संबंध न्यूजक्लिक-चीन फंडिंग मामले से बताया गया है, जिसमें आरोप है कि भारत की संप्रभुता को बाधित करने के लिए चीनी संस्थाओं ने न्यूज़क्लिक को धन उपलब्ध कराया।
नेविल रॉय सिंघम ने भारत से जिन लोगों को अपने बड़े नेटवर्क से जोड़ा और जिन्होंने Tricontinental के साथ काम किया, उनमें प्रबीर पुरकायस्थ, सृजना, प्रशांत और विजय प्रसाद शामिल थे। The New York Times ने Tricontinental को उन गैर-लाभकारी संस्थाओं में शामिल बताया था, जो चीन के पक्ष में प्रचार करती थीं।
विजय प्रसाद के अर्बन नक्सल पी साईनाथ से भी करीबी संबंध हैं। उनके प्रचार पोर्टल PARI ने बाद में नेविल रॉय सिंघम के संदर्भ हटा दिए, जब उनके चीन के प्रचार नेटवर्क से जुड़े होने का मामला सामने आया। OpIndia लगातार न्यूजक्लिक के हिंदू विरोधी प्रचार को उजागर करता रहा है।
इसके अलावा न्यूजक्लिक पर चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) से कथित संबंधों को लेकर भी जाँच होती रही है। 2023 में The New York Times की जाँच में कार्यकर्ताओं, गैर-लाभकारी संस्थाओं, शेल कंपनियों और चीन से जुड़े प्रचार नेटवर्क का खुलासा हुआ, जिसके केंद्र में नेविल रॉय सिंघम थे।
2024 में दिल्ली पुलिस द्वारा दाखिल आरोपपत्र में चीनी सरकार को ‘Ultimate Paymaster’ बताया गया और कहा गया कि कश्मीर तथा किसान आंदोलन जैसे मुद्दों पर भारत विरोधी नैरेटिव को बढ़ावा देने के लिए धन भेजा गया। यह मामला फिलहाल कोर्ट में लंबित है।
2021 में OpIndia ने न्यूजक्लिक के संबंधों पर एक विस्तृत जाँच की थी और बताया था कि उसका संबंध ऐसे कई लोगों से था, जो नियमित रूप से भारत के खिलाफ जहर उगलते रहे हैं। इनमें अर्बन नक्सल, तीस्ता सीतलवाड़, अभिसार शर्मा और कई अन्य नाम शामिल थे।
रॉय सिंघम के नेटवर्क से जुड़े कई चीन समर्थक प्रचार तंत्र आज भी भारत विरोधी और सरकार विरोधी नैरेटिव चला रहे हैं। OpIndia ने People’s Dispatch, TriContinental, People’s Forum समेत ऐसे कई संगठनों के बारे में रिपोर्ट प्रकाशित की है।
कश्मीरी अलगाववाद, हिंदू विरोधी नैरेटिव, केरल के ‘कम्युनिस्ट मॉडल’ का महिमामंडन, मुस्लिम पीड़ित होने का नैरेटिव और भारत की वैश्विक छवि को नुकसान पहुंचाने वाले प्रचार से लेकर, CCP से जुड़े नेविल रॉय सिंघम समर्थित ये संस्थाएँ मुद्दों, गैर-लाभकारी संस्थाओं से जुड़े कानूनों, डिजिटल मीडिया और उपलब्ध हर संसाधन का इस्तेमाल प्रतिद्वंद्वी देशों को कमजोर करने, नीतिगत फैसलों को प्रभावित करने, भारत को कमजोर करने और चीन को भू-राजनीतिक बढ़त दिलाने के लिए करती हैं।
इस वर्ष फरवरी में, प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (FEMA) के तहत विदेशी फंडिंग नियमों के उल्लंघन के मामले में न्यूजक्लिक और उसके संस्थापक-संपादक प्रबीर पुरकायस्थ पर 184 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया।
न्यूजक्लिक के संस्थापक पर चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) के सदस्य नेविल रॉय सिंघम के साथ मिलकर भारत सरकार और कोविड-19 के प्रसार को रोकने के उसके प्रयासों को बदनाम करने, तथा भारत बायोटेक द्वारा विकसित भारतीय वैक्सीन ‘कोवैक्सिन’ की प्रभावशीलता पर सवाल उठाने की साजिश रचने के आरोप लगे।
चीन से फंडिंग पाने वाले न्यूजक्लिक ने भारत विरोधी आवाजों को दिया मंच, 2020 के हिंदू विरोधी दिल्ली दंगों के आरोपितों तक पहुँची फंडिंग
न्यूजक्लिक पर आरोप है कि उसने चीन से फंडिंग प्राप्त कर भारत में अशांति फैलाने, विशेषकर नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) विरोधी प्रदर्शनों के दौरान मोदी सरकार को गिराने की कोशिश की। इसके अलावा उसके संबंध गौतम नवलखा जैसे भारत विरोधी चेहरों से भी बताए गए हैं।
दिल्ली पुलिस के आरोपपत्र में न्यूजक्लिक के संस्थापक पर लश्कर-ए-तैयबा (LeT) के आतंकियों से संबंध रखने, 2020 के हिंदू विरोधी दिल्ली दंगों के आरोपित शरजील इमाम तथा नक्सलियों को धन उपलब्ध कराने के आरोप लगाए गए हैं।
17 तारीख को राजामणिकम पी (All India Peoples Science Network- AIPSN) की ओर से ‘Share Notes on CAA docs’ शीर्षक वाला एक ईमेल भेजा गया था। AIPSN की स्थापना प्रबीर पुरकायस्थ ने की थी। ईमेल में CAA और NRC को लेकर दुष्प्रचार फैलाया गया और डर का माहौल बनाने की कोशिश की गई।
इसमें कहा गया कि NRC के जरिए मुसलमानों को प्रताड़ित किया जाएगा, जबकि उस समय NRC का कोई मसौदा तक मौजूद नहीं था और CAA का किसी भी भारतीय नागरिक से कोई संबंध नहीं था।
OpIndia ने पहले रिपोर्ट किया था कि तीस्ता सीतलवाड़, हर्ष मंदर, प्रबीर पुरकायस्थ, गीता हरिहरन और अन्य लोगों ने CAA विरोधी प्रदर्शनों के दौरान हिंसा और पत्थरबाजी भड़काने तथा प्रदर्शनकारियों के लिए फंडिंग की व्यवस्था करने की रणनीति बनाई थी।
8,000 पन्नों के आरोपपत्र में यह भी उल्लेख किया गया कि न्यूजक्लिक ने जानबूझकर अरुणाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर का नक्शा इस तरह विकृत दिखाया, जिससे यह प्रदर्शित हो कि ये क्षेत्र चीन के हैं।
न्यूजक्लिक के संस्थापक और नेविल रॉय सिंघम ने भारत समेत अन्य देशों के अलगाववादी आंदोलनों से गठजोड़ पर की चर्चा
चार्जशीट के अनुसार, न्यूजक्लिक के संस्थापक प्रबीर पुरकायस्थ और नेविल रॉय सिंघम ने इस बात पर चर्चा की थी कि भारत और अन्य देशों में अलगाववादी (Separatist) आंदोलनों के साथ प्रभावी तरीके से गठजोड़ कैसे किया जा सकता है।
आरोपपत्र के अनुसार, इस कथित साजिश की शुरुआत उन ईमेल से हुई, जिन्हें प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल के साथ साझा किया था। स्पेशल सेल के अनुसार, 29 जून 2016 को प्रबीर पुरकायस्थ द्वारा नेविल रॉय सिंघम को भेजा गया एक ईमेल इस कथित साजिश की शुरुआत को दर्शाता है।
ED को मिले इस ईमेल का विषय था ‘Social Media Group in India’। ईमेल में प्रबीर ने नेविल से कहा कि ‘उनके’ मीडिया प्रोजेक्ट में एक समूह केवल डेटा एकत्र करने और उसका विश्लेषण करने वाले टूल्स पर ध्यान केंद्रित करे। इसके अलावा उन्होंने सोशल मीडिया अभियानों के लिए एक अलग समर्पित टीम बनाने का सुझाव दिया।
इन सोशल मीडिया अभियानों के लिए उन्होंने 60,000 से 80,000 अमेरिकी डॉलर का बजट प्रस्तावित किया। इसके कुछ समय बाद, 17 सितंबर 2016 को ईमेल के माध्यम से न्यूजक्लिक का एक लेख साझा किया गया, जिसमें माओवादी शैली में बड़े जनआंदोलन खड़े करने की बात कही गई थी।
रॉय सिंघम और प्रबीर पुरकायस्थ के बीच हुए ईमेल आदान-प्रदान से यह भी सामने आया कि उन्होंने इस बात पर चर्चा की थी कि ‘अलगाववादी’ या पहचान आधारित (Identity) आंदोलनों के साथ प्रभावी ढंग से गठजोड़ कैसे किया जाए।
चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता को घरेलू अनियमितताओं और विदेशी हस्तक्षेप से बचाने के लिए SIR की आवश्यकता
अमेरिका, कनाडा और भारत की चुनावी राजनीति तथा चुनावी नतीजों में चीन के कथित हस्तक्षेप या प्रभाव के मामलों से यह स्पष्ट होता है कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) अपने भू-राजनीतिक और आर्थिक हितों को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिद्वंद्वी या विरोधी देशों में उदारवादी (लिबरल) सरकारों को सत्ता में देखना पसंद करती है।
यह भी दिलचस्प है कि भारत, अमेरिका और कनाडा में चीन समर्थक प्रचारक और राजनेता अक्सर उन सरकारों को, जो चीन के हितों के अनुकूल नहीं होतीं, फासीवादी, अधिनायकवादी, प्रतिगामी, असहिष्णु, नस्लवादी, धार्मिक वर्चस्ववादी और न जाने किन-किन विशेषणों से संबोधित करते हैं।
भारत के संदर्भ में, अमेरिका के हालिया आरोप कि चीन ने 20 करोड़ अमेरिकी मतदाताओं का डेटा हासिल कर उसका इस्तेमाल 2020 के चुनावों को प्रभावित करने के लिए किया, और चुनावों को प्रभावित करने की विदेशी संस्थाओं की बढ़ती आशंकाएँ, मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision- SIR) की आवश्यकता की ओर संकेत करती हैं।
हाल के वर्षों में भारत निर्वाचन आयोग ने बिहार और पश्चिम बंगाल समेत कई राज्यों में चुनावों से पहले SIR अभियान चलाया। इस प्रक्रिया के तहत निर्वाचन अधिकारियों ने घर-घर जाकर सत्यापन, मतदाता सूची का मिलान, डुप्लीकेट मतदाताओं, मृत व्यक्तियों, स्थानांतरित हो चुके मतदाताओं और अवैध मतदाताओं के नाम हटाने का काम किया।
हालाँकि मतदाता सूचियों को साफ और अद्यतन करने के उद्देश्य से चलाए गए इस अभियान के बाद लाखों अवैध या फर्जी मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जाने पर भारत में राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया। विपक्षी दलों ने मुस्लिमों को निशाना बनाकर मताधिकार से वंचित करने का आरोप लगाया, जबकि निर्वाचन आयोग ने मजहबी आधार पर की गई किसी भी कार्रवाई से इनकार किया।
इसी दौरान रिपोर्ट के अनुसार, मुख्य रूप से बांग्लादेश से आए कई अवैध मुस्लिम प्रवासियों में भी घबराहट देखी गई। अमेरिका के आरोप यह दिखाते हैं कि मतदाता डेटा एक अत्यंत महत्वपूर्ण लक्ष्य होता है और यदि मतदाता सूचियों से छेड़छाड़ हो जाए या वे समझौता का शिकार हो जाएँ, तो फर्जी मतदाताओं की एंट्री संभव हो सकती है।
वहीं मीडिया और सोशल मीडिया के जरिए चलाए जाने वाले प्रॉक्सी प्रचार अभियान उस सरकार के खिलाफ जनमत को एकजुट करने का काम करते हैं, जिसे कोई विदेशी सरकार या संस्था सत्ता से हटाना चाहती है।
विदेशी नैरेटिव वॉरफेयर और सत्ता बदलने की साजिशों से भारतीय लोकतंत्र और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिए SIR एक्सरसाइज, FCRA नियमों को सख्ती से लागू करने और तथाकथित ‘बुद्धिजीवियों’ व ‘एक्टिविस्टों’ की भारत-विरोधी गतिविधियों की गहन जाँच करने की जरूरत है, जो लगातार भारत-विरोधी और चीन-समर्थक प्रोपेगैंडा फैलाते रहते हैं।
चुनावों में विदेशी दखलअंदाजी को रोकने के लिए भले ही SIR कोई रामबाण उपाय ना हो, लेकिन यह चुनावी ढाँचे में मौजूद कमजोरियों को सीधे तौर पर दूर करता है।
(मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)