भारत की राजनीति में समाजवाद के पुरोधा माने जाने वाले डॉक्टर राम मनोहर लोहिया ने कभी कहा था कि ‘पिछड़े पावें सौ में साठ’। लेकिन डॉक्टर लोहिया को ये नारा देते समय शायद बिल्कुल भी ये आभास नहीं था कि भविष्य उनके ही नाम पर राजनीति करने वाली पार्टियाँ पिछड़ा का मतलब सिर्फ दो जातिवर्ग तक समेट देंगीं।
जी हाँ, कुछ ऐसा ही किया है समाजवादी पार्टी ने। आप सबको ये बात पता है कि समाजवादी पार्टी, देश की बाकी कथित सेक्युलर पार्टियों की तरह ही एक परिवार प्राइवेट लिमिटेड है। लेकिन क्या आपको पता है कि पार्टी में अगर टॉप के लोग छोड़ भी दिए जाएँ तो भी तस्वीर नहीं बदलतीं?
दरअसल हम बात कर रहे हैं समाजवादी पार्टी के उत्तर प्रदेश के संगठन की। समाजवादी पार्टी भले ही आज PDA यानी पिछड़ा दलित और अल्पसंख्यक का राग अलापती हो लेकिन उसका मूल चरित्र यानी मुस्लिम यादव समीकरण नहीं बदला है।
दलितों को तो शायद उसने सिर्फ नाम के लिए ही जोड़ा है। समाजवादी पार्टी का उत्तर प्रदेश में संगठन यादव और मुस्लिमों से डोमिनेटेड है। और ये कोई हवा हवाई बात नहीं है, ना ही कोई पूर्वाग्रह… बल्कि डाटा यह बात कह रहा है।
ऑपइंडिया की जाँच में सामने आए तथ्य चौंकाने वाले हैं। हमारी जाँच में पता चला है कि समाजवादी पार्टी के उत्तर प्रदेश में 66% जिलाध्यक्ष यादव और मुस्लिम हैं। यानी दो तिहाई पदों पर सिर्फ इन्हीं समूहों का कब्जा है। और इसमें भी ज्यादा बड़ा कब्जा अखिलेश यादव ने अपने सजातीयों यानी यादवों को दिलाया है।
चाहे अमरोहा हो या बलिया, चाहे सोनभद्र हो या बरेली! आपको जिलाध्यक्ष के नाम पर सिर्फ़ एक ही जाति के लोग दिखाई पड़ेंगे। ऊपर से नीचे तक आपको एक ही जाति का नाम बार बार आते हुए दिखेगा। हमने आपको भागीदारी का गणित बताया।
अब आते हैं नंबर्स पर। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी का संगठन 76 जिलों में बाँटा हुआ है। इन 76 जिलों में से अभी 75 पर जिलाध्यक्ष नियुक्त हैं और 1 जिलाध्यक्ष का पद खाली है। थोड़ा शॉकिंग और नॉट सो शॉकिंग बात ये है कि इन 75 में से 35 जिलों में जिलाध्यक्ष नियुक्त करने के लिए अखिलेश यादव ने अपने सजातीयों को तरजीह दी है।
और ऐसा करने के पीछे कास्ट पॉलिटिक्स के अलावा और कोई रीजन नहीं समझ आता। क्योंकि ऐसे जिलों में भी उन्होंने अपने सजातीयों को जिलाध्यक्ष बनाया है, जहाँ इस जाति की आबादी एकदम सीमित है। दरअसल, समस्या इस बात से नहीं है कि यादवों को रिप्रजेंटेशन मिल रहा है, बल्कि समस्या ये है कि समाजवादी पार्टी सामाजिक न्याय जैसे शब्द दिन में 40 बार मल्टीविटामिन कैप्सूल की तरह यूज करती है।
अखिलेश यादव PDA पर ज़ोर देते हैं, जिसमें पिछड़ा का मतलब उन्होंने अपनी जाति को मान लिया है और अल्पसंख्यक के नाम पर बस मुस्लिम हैं। दलित इस पूरी कहानी से ग़ायब है। वापस लिस्ट पर लौटते हैं। समाजवादी पार्टी के जिलाध्यक्षों में 35 यादवों के साथ ही 15 मुस्लिम जिलाध्यक्ष हैं।
मुस्लिम जिलाध्यकों को भी लेकिन उन्हीं जिलों तक सीमित कर दिया गया है जहाँ उनकी आबादी ठीकठाक है, अधिकांश मुस्लिम जिलाध्यक्ष पश्चिमी यूपी में हैं जहाँ कई जिलों में मुस्लिम आबादी 25% से ज्यादा है और कई मामलों में तो ये 50% के आसपास है।
लेकिन अखिलेश यादव ने अपनी जाति के विषय में ये बाध्यता नहीं लगा रखी। कन्नौज, फर्रुखाबाद, बदायूँ और आजमगढ़ या चंदौली जैसे जिलों में तो माना जा सकता है कि जाति को प्रतिनिधित्व दिया गया है लेकिन जिन जिलों में दलितों की आबादी ज्यादा है, उन्हें लिस्ट से ग़ायब कर दिया गया है।
समाजवादी पार्टी की पूरी लिस्ट अगर आप देखेंगे तो पता चलेगा कि यहाँ दलित ढूँढने से भी नहीं मिल रहे, जो दलित प्रदेश की आबादी में लगभग 20% का हिस्सा रखते हैं, उन्हें जिलों की जिम्मेदारी इक्का दुक्का ही दी गई है। ये हाल तब है जब समाजवादी पार्टी का पूरा जोर PDA पॉलिटिक्स पर है।
सीतापुर जैसे जिले जहाँ दलित आबादी प्रदेश में सबसे ज्यादा है, वहाँ भी समाजवादी पार्टी ने हाल ही में अपना जिलाध्यक्ष बदला है और शमीम कौसर सिद्दीकी को ये जिम्मेदारी दी है। यानी 15 लाख की आबादी में समाजवादी पार्टी को एक भी उपयुक्त दलित चेहरा नहीं मिला।
समस्या ये है कि समाजवादी पार्टी, बसपा का वोटबैंक तो हिलाना चाहती है, दलितों को अपनी साइड तो करना चाहती है लेकिन अपनी पुरानी आदतें नहीं छोड़ना चाहती। इन फैक्ट वो इस बात के लिए बिल्कुल राजी नहीं है कि संगठन में उनको जगह दी जाए, जिससे उनका कोई दख़ल निर्णय लेने
और दलितों की बात छोड़ दीजिए, ख़ुद को पिछड़ों का पुरोधा बताने वाले अखिलेश यादव ने अपने जिलाध्यक्षों में कहीं भी बाक़ी पिछड़ी जातियों को भी हिस्सा नहीं दिया है। लोधी, कहार, निषाद, कुर्मी जो जातियाँ यूपी में प्रोमिनेंट हैं, उनको भी कोई खास तवज्जो समाजवादी पार्टी ने नहीं दी है।
और ये तब हो रहा है जब ये जातियाँ लगातार अपनी भागीदारी के लिए प्रयास कर रहे हैं, यूपी में इन जातियों को लंबे समय से अपना हक नहीं मिला है। OBC में कुछ जातियों ने ही प्रॉमिनेंस लिया हुआ है और इनकी भी इच्छा है कि इन्हें राजनीतिक भागीदारी मिले।
समाजवादी पार्टी प्रदेश का दूसरा सबसे बड़ा दल होकर ये काम नही कर रही। यानी लोहिया के चेलों ने लोहिया के ही आइडियाज़ की तिलांजलि दे दी है। वैसे लोहिया ने ही कभी कहा था कि आगे चलके मेरे चेले मेरे सारे आदर्शों की तिलांजलि दे दें तो मुझे दुख नहीं होगा। कमोबेश वैसा ही हुआ है।
आप सोच रहे होंगे कि हम लगातार जिलाध्यक्षों की बात क्यों कर रहे रहे हैं, तो ऐसा इसलिए है क्योंकि जिलाध्यक्ष किसी भी पार्टी संगठन का आधार होते हैं, ये वो पिलर्स होते हैं जिनके ऊपर पार्टी खड़ी होती है। वैसे समाजवादी पार्टी जैसे दलों में निर्णय बेहद केंद्रित तरीके से लिए जाते हैं, लेकिन जिलाध्यक्ष तब भी बड़े स्तर पर निर्णय प्रभावित करते हैं।
वो केंद्रीय नेतृत्व और स्थानीय कार्यकर्ताओं के बीच लिंक का काम करते हैं और इससे भी ज्यादा ये दिखाते हैं कि पार्टी कितना डाइवर्सिटी में विश्वास रखती है। और इसी मोर्चे पर समाजवादी पार्टी औंधे मुँह गिर जाती है। समाजवादी पार्टी कभी कभार ब्राह्मणों से भी फ्लर्टिंग करती रहती है, आप इस लिस्ट में शायद कोई भी ब्राह्मण ना पाएँ।
राजपूतों का भी उत्तर प्रदेश में ठीकठाक वोट है और उनकी सहभागिता जरूरी है लेकिन यहाँ भी समाजवादी पार्टी गंभीर नजर नहीं आती। वैसे समाजवादी पार्टी में एक जाति या मज़हब की कहानी सिर्फ़ जिले तक ही सीमित नहीं है। अगर आप इसकी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की संरचना भी देखेंगे तो यहाँ भी 30% हिस्सा दो कम्युनिटी के पास है।
इसमें भी टॉप के 4 लोगों में से तीन अखिलेश ख़ुद और उनके चाचा शिवपाल और रामगोपाल हैं, इसके अलावा आजम ख़ान का नाम टॉप पर लिखा गया है। कुल मिलाकर बात ये है कि समाजवादी पार्टी अपने आप को कितना भी PDA के रैपर में पैक करे, उसका पुराना MY लिफ़ाफ़ा कहीं नहीं जा रहा।
और वैसे भी समाजवादी पार्टी की पूरी पॉलिटिक्स उत्तर प्रदेश में बसपा और भाजपा के ही ख़िलाफ़ रही है। बसपा के ख़िलाफ़ लड़ाइए का मतलब समाजवादी पार्टी के नेता एंटी दलित पॉलिटिक्स से लेते आए हैं। और इस का सबूत ये है कि जैसे ही 2012 में उत्तर प्रदेश समाजवादी पार्टी जीत कर आई थी, तुरंत दलितों के ख़िलाफ़ हिंसा शुरू हो गई थी।
साल 2012 में 3 मार्च का दिन था, यूपी में विधानसभा चुनाव पूरे हुए थे इलेक्शन रिजल्ट्स में सपा को 224 सीटों के साथ मेजॉरिटी मिली थी और बसपा बाहर हो चुकी थी।
बस बसपा का सत्ता से बाहर होना था और समाजवादी पार्टी के लठैतों को हिसाब चुकता करने का मौक़ा मिल गया था। सपा की जीत के अगले 36 घंटों में दलितों के साथ क्या हुआ, सुनते जाइए। सपा की जीत के बाद तुरंत सीतापुर के भंबिया गाँव में दलितों के लगभग एक दर्जन घर जला दिए गए।
और ऐसा क्यों हुआ? दलितों ने बताया कि उन्होंने इलेक्शन में एक इंडिपेंडेट कैंडिडेट को समर्थन किया था, इसलिए उनके घर पर चुनाव के बाद तुरंत हमला हुआ। लेकिन अगर आप सोच रहे हो कि ये कोई आइसोलेटेड इंसिडेंट था, तो आप गलती कर रहे हैं।
सीतापुर से लगभग 500 किलोमीटर दूर आगरा में बसपा समर्थित एक ग्राम प्रधान पति की हत्या कर दी गई। हत्या का आरोप सपा के लठैतों पर। इसी दिन बलिया के भुज छपरा गाँव में समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं पर पाँच दलित महिलाओं और बच्चों को बुरी तरह मारने−पीटने के आरोप लगे।
बताया गया कि जैसे ही समाजवादी पार्टी वालों को यह पता चला कि इस गांव के ज्यादातर लोगों ने जेडीयू को वोट दिया था तो 40 से ज्यादा लठैत गाँव में घुसे और मारपीट की। और समाजवादी पार्टी आज भले ही अपने हर पोस्ट में PDA का जिक्र करती हो लेकिन उसने सत्ता में आने के बाद दलित प्रतीकों को अपमानित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।
अखिलेश यादव ने सीएम बनने के बाद जुलाई 2012 में उन 8 जिलों के नाम बदल दिए थे, जिनके नाम मायावती ने सीएम रहते हुए दलित विचारकों पर रखें थे। इसमें छत्रपति शाहूजी महाराज नगर को अमेठी, रमाबाई नगर को कानपुर देहात, भीम नगर को संभल, प्रबुद्ध नगर को शामली और पंचशील नगर को हापुड़ कर दिया गया था।
मायावती सरकार में जो भी योजनाएँ दलित आइकॉन्स के नाम पर थीं, उनके नाम बदलना भी समाजवादी सरकार की प्रियोरोटी थी। अखिलेश यादव की सरकार ने मई 2012 में ही अंबेडकर ग्राम सभा विकास योजना, कांशीराम शहरी आवास योजना, सावित्री बाई फुले बालिका शिक्षा सहायता योजना जैसी लगभग 26 स्कीम्स के नाम चेंज कर दिए गए।
ऐसे में आज जब समाजवादी पार्टी PDA पॉलिटिक्स की बात करती है तो मामला काफ़ी हास्यास्पद हो जाता है, हालाँकि ये काम कितना हाफ हार्टेड तरीके से किया जा रहा है, वो मैंने आपको पुरानी घटनाएँ और जिलाध्यक्षों की लिस्ट दिखा कर बता दिया।
उत्तर प्रदेश ने वर्ष 2017 के बाद निवेश प्रोत्साहन के क्षेत्र में एक सुनियोजित नीतिगत यात्रा शुरू की, जिसका उद्देश्य राज्य को निवेशकों के लिए एक भरोसेमंद गंतव्य के रूप में स्थापित करना था। हालाँकि प्रपेगेंडा मीडिया न्यूजलॉन्ड्री ने 30 जून 2026 को उत्तर प्रदेश में हुए निवेश और समझौता ज्ञापनों पर आर्टिकल लिखा।
इस आर्टिकल में शब्दों का हेर फेर कर न्यूजलॉन्ड्री ने ये बताने की कोशिश की कि यूपी में निवेश को लेकर हुए MoU केवल कागजी बातें हैं और सरकार सुर्खियों के आधार पर बड़े-बड़े दावे कर रही है।
असल में फरवरी 2018 में शुरू हुए पहले यूपी इन्वेस्टर्स समिट से लेकर फरवरी 2023 के ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट तथा जून 2026 के उत्तर प्रदेश ग्लोबल ग्रोथ डायलॉग (बेंगलुरु) तक उत्तर प्रदेश सरकार ने निवेश के लिए मेमोरंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग यानी एमओयू के मंच का बार-बार उपयोग किया है।
न्यूजलॉन्ड्री ने शब्दों से खेल कर निवेश को बताया झूठ
न्यूजलॉन्ड्री ने उत्तर प्रदेश में आए निवेश को लेकर एक रिपोर्ट की सीरीज ‘द एमओयू मिराज’ प्रकाशित किया है। इसमें न्यूजलॉन्ड्री ने यूपी के कई एमओयू पर सवाल उठाए हैं।
MoU को कागजी दावे लिखकर न्यूजलॉन्ड्री ने यूपी के पूरे निवेश मॉडल को फर्जी बताने की कोशिश की
रिपोर्ट में कहा गया कि ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट 2023 में उत्तर प्रदेश सरकार ने लगभग ₹33.50 लाख करोड़ के निवेश प्रस्ताव मिलने का दावा किया था। इस दावे को लेकर न्यूजलॉन्ड्री सवाल खड़े कर रही है। उसका कहना है कि निवेश को बढ़ा चढ़कर और केवल ‘शून्य बढ़ाकर’ कागजी दावे किए जा रहे हैं।
वास्तव में ₹33.50 लाख करोड़ के निवेश प्रस्ताव मिलने के दावे का सही अर्थ यह है कि इतने मूल्य के निवेश प्रस्ताव सरकार को मिले थे, न कि उतना पैसा एक साथ राज्य में आ गया था। निवेश प्रस्ताव और वास्तविक निवेश में बड़ा फर्क होता है, और यह फर्क रिपोर्ट में धुंधला कर दिया गया है।
इसके अलावा रिपोर्ट में यह साफ नहीं किया गया कि किन MoU में बाद में कितनी प्रगति हुई, कौन-सी परियोजनाएँ अप्रूवल तक पहुँचीं और किन्हें रद्द किया गया। यानी रिपोर्ट में साइनिंग का प्रक्रिया को ही पूरा निवेश समझ कर पाठकों को अंतिम सत्य बता दिया बता दिया गया।
Newslaundry ने MoUs को ‘कागजी निवेश’ कहकर वास्तविक निवेश से बराबरी पर रखा। यह गलत है क्योंकि सरकार ने कभी इन्हें realised investment नहीं बताया, बल्कि ‘pipeline’ और ‘commitments’ के रूप में प्रस्तुत किया है।
रिपोर्ट में लिखा गया कि कई MoU बाद में धरातल पर नहीं उतरे। इस बात में बताते हुए लेखक ये बताना भूल गए कि उत्तर प्रदेश सरकार ने MoU के लिए मॉनिटरिंग तंत्र बनाया गया है ताकि राज्य में निवेश प्रस्तावों पर विभागीय स्तर पर फॉलो-अप, नियमित समीक्षा और प्रगति रिपोर्टिंग पर काम किया जा सके।
इसका महत्व इसलिए है क्योंकि यदि कोई राज्य वास्तव में केवल कागजी आँकड़े बढ़ाना चाहता, तो उसे निगरानी और सत्यापन की ऐसी व्यवस्था बनाने की कोई जरूरत नहीं होती।
निगरानी तंत्र यह दिखाता है कि राज्य ने गलती की संभावना को स्वीकार किया, लेकिन उसे सुधारने के लिए संस्थागत ढाँचा भी बनाया। इसीलिए अधूरे और वित्तीय अनियमितताओं वाले MoU पर समय पर कार्यवाही होनी सुनिश्चित हुई।
MoU से नहीं होता आर्थिक हस्तांतरण
पहली बात जो साफ तौर पर जानने के लायक है वह ये अगर कोई व्यक्ति या कंपनी MoU पर हस्ताक्षर करती है, तो इसका मतलब यह नहीं कि राज्य का पैसा तुरंत ट्रांसफर हो गया या जनता का धन सीधे खतरे में आ गया।
MoU से पहले भी सरकारी स्तर पर जाँच होती है, और बाद में भी प्रोजेक्ट की क्षमता, वित्तीय स्थिति, भूमि उपलब्धता, अनुमतियों और अनुपालन की समीक्षा होती है। इसलिए केवल किसी असंगत या कम-ज्ञात इकाई के MoU पर हस्ताक्षर कर देने से इसे ‘घोटाला’ कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।
इसके अलावा जब भी किसी निवेशक की वित्तीय साख पर कोई सवाल खड़े होते हैं तब राज्य सरकार के पास उसकी समीक्षा, MoU रद्द करने या उस पर अन्य कार्रवाही करने का तंत्र होता है।
अब तक की 4 ग्राउंड ब्रेकिंग सेरेमनी के माध्यम से ₹15 लाख करोड़ से अधिक की परियोजनाएँ धरातल पर उतर चुकी हैं और लगभग 60 लाख रोजगार सृजित हुए हैं। ये अकेले एमओयू की चर्चा से कहीं आगे की वास्तविकता दर्शाता है।
सत्यापन, निगरानी एवं कार्रवाई की प्रक्रिया
न्यूजलॉन्ड्री ने आयोजनों में आए पुच एआई, ओब्दु डिजिटल हेल्थ केयर जैसी कुछ कंपनियों के निवेश प्रस्ताव में हुई धोखाधड़ी और उनके संदिग्धता पर सवाल करते खड़े करते हुए योगी कार्यकाल में आए सभी तरह के निवेश को ही झूठ बताने की कोशिश की।
सच्चाई यह है कि जिन संदिग्ध कंपनियों के बारे में सरकार को पता चला उस पर जाँच की गई है और कुछ एक निवेश प्रस्ताव को छोड़कर ज्यादातर निवेश प्रस्ताव को धरातल पर उतरने का काम शुरू किया जा चुका है।
राज्य सरकार के पास एमओयू के बाद निवेशक की साख को जाँचने के लिए ‘निवेश मित्र’ सिंगल विंडो पोर्टल है। इसे और अधिक अपडेट कर ‘निवेश मित्र 3.0’ के तौर पर मार्च 2026 में लॉन्च किया गया।
यह पोर्टल राज्य के लगभग 20 विभागों की 70 से अधिक सेवाओं को एक ही जगह पर लाकर निश्चित समय में ट्रांसपेरेंट क्लीयरेंस की सुविधा देता है।
पुच एआई मामला- सक्रिय सत्यापन
23 मार्च 2026 को बेंगलुरु स्थित स्टार्टअप पुच एआई के साथ ₹25,000 करोड़ के एआई पार्क, डेटा सेंटर व एआई विश्वविद्यालय हेतु एमओयू पर हस्ताक्षर हुए थे।
कंपनी की वित्तीय क्षमता को लेकर सार्वजनिक स्तर पर सवाल उठने के तुरंत बाद नोडल एजेंसी Invest UP ने तुरंत स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोटोकॉल (SOP) के तहत कंपनी से वित्तीय दस्तावेज और नेटवर्थ के प्रमाण माँगे।
कंपनी जब तय समय में अपनी वित्तीय साख (Financial Linkages) साबित नहीं कर पाई, तो सरकार ने तुरंत ऐक्शन लेते हुए MoU हस्ताक्षर के मात्र तीन दिन बाद 26 मार्च 2026 को ही इस ₹25,000 करोड़ के MoU को रद्द (Cancel) कर दिया।
ये इस बात का सुबूत है कि सरकार संदिग्ध क्रेडेंशियल्स मिलने पर समझौतों को खारिज करने में देरी नहीं करती। मुख्यमंत्री कार्यालय ने इसके साथ ही भविष्य में अधिक धनराशि वाले एमओयू पर साइन करने से पहले निवेशकों की जाँच पड़ताल करने का निर्देश भी जारी किया।
ओब्दु डिजिटल हेल्थ केयर प्रकरण की शिकायत पर कार्रवाई
फरवरी 2023 के ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट में ओब्दु डिजिटल हेल्थ केयर ने ₹3,350 करोड़ के एमओयू पर हस्ताक्षर किए। फरवरी 2024 की चौथी ग्राउंड ब्रेकिंग सेरेमनी में 14,701 इकाइयों में इसे ‘ग्राउंडिंग’ चरण में शामिल किया गया था।
हालाँकि बाद में कई निवेशकों ने शिकायत की कि क्लीनिक की स्थापना के लिए जमा की गई धनराशि के बदले न तो क्लीनिक शुरू किए गए और न ही रिफंड मिला।
इससे जुड़े गोंडा में एक शिकायत के आधार पर 28 अप्रैल 2026 को खरगुपुर थाने में कंपनी के निदेशक के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 316(2) के तहत FIR दर्ज की गई और अब पुलिस इसकी जाँच कर रही है।
इस मामले में लखनऊ के विभूतिखंड थाने में 40 से अधिक निवेशकों ने अलग से शिकायत भी दर्ज कराई। 8 जून 2026 को पीड़ित निवेशकों के एक समूह ने मुख्यमंत्री जनता दरबार में जाकर अपनी शिकायत भी दी जहां मुख्यमंत्री कार्यालय के अधिकारियों ने कार्रवाई का आश्वासन दिया।
इन दोनों प्रकरणों को साथ रखकर देखने पर यह जरूर साफ हो जाता है कि दोनों ही मामलों में MOU के दौरान राज्य के नाम पर कोई सरकारी धन नहीं डूबा। पुच एआई मामले में एक भी रुपया नहीं दिया गया। साथ ही ओब्दु प्रकरण में धोखाधड़ी सरकारी निवेश के बजाय निवेशकों की निजी पूंजी से जुड़ी है।
2BE Educate पर उठे सवाल का जवाब
रिपोर्ट में 2BE Educate (India) Private Limited का उदाहरण देते हुए कहा गया कि कंपनी ने ₹18,000 करोड़ का MoU किया। तर्क ये था कि कंपनी का बैलेंसशीट फाइलिंग स्टेटस कमजोर था।
हालाँकि उपलब्ध सार्वजनिक कॉर्पोरेट स्रोत यह बताते हैं कि ये कंपनी एक MCA-registered कंपनी है, जिसकी स्थापना 9 अगस्त 2021 को हुई है यानी ‘कंपनी का कोई रिकॉर्ड ही नहीं था’ कहना गलत है।
न्यूजलॉन्ड्री के इस तर्क का जवाब ये है कि अगर किसी कंपनी की MoU के बाद की जाँच में बैलेंस शीट, नेट वर्थ, फंडिंग क्षमता या प्रोजेक्ट एक्जीक्यूशन एबिलिटी कमजोर निकलती है, तो यहाँ पर ही ड्यू डिलिजेंस मैकेनिज्म काम करता है। इस प्रणाली का यही उद्देश्य है कि ऐसे प्रस्तावों को आगे बढ़ने से रोका जाए।
आरजी स्ट्रैटेजीज ग्रुप और ‘नो रिकॉर्ड’ वाला तर्क
रिपोर्ट में आरजी स्ट्रैटेजीज ग्रुप के बारे में कहा गया कि उसका भारत में कंपनी का रिकॉर्ड नहीं मिला। इस आरोप का जवाब ये है कि किसी कंपनी की व्यावसायिक पहचान, ब्रांड पहचान और कानूनी कंपनी पहचान हमेशा एक जैसी नहीं होती। निवेश सम्मेलनों में कई बार समूह कंपनियाँ, संयुक्त उपक्रम, सलाहकारी ढांचे, प्रवर्तक समूह या सहयोगी संस्थाएँ प्रस्तावों के साथ सामने आती हैं।
अगर किसी कंपनी के पीछे की असली कंपनी बाद में अस्पष्ट मिले तब समझौते के बाद विस्तृत जांच की व्यवस्था है। किसी बड़े प्रस्ताव के मिलने के बाद उसका पूरा कंपनी स्ट्रक्चर बाद की छानबीन में सामने आना स्वाभाविक प्रक्रिया है।
महज एक कंपनी के स्ट्रक्चर में परेशानी या अस्पष्टता होने से पूरे निवेश सम्मेलन को ही झूठा करार दे देना ही असल में न्यूजलॉन्ड्री का असली प्रोपेगेंडा बन कर सामने आया है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि 600 विद्यार्थियों वाली एक यूनिवर्सिटी ने साधारण बैलेंस शीट के साथ ₹40,000 करोड़ का निवेश प्रस्ताव रखा। इसके अलावा NGO के ₹1,400 करोड़ के समझौते पर भी सवाल उठाए गए।
यहाँ भी यह समझना जरूरी है कि MoU कई बार कई चरणों वाली परियोजनाओं, इंफ्रास्ट्रक्चर, आवास, शैक्षणिक विस्तार, सेवा-व्यवस्था और लंबे समय के पूंजीगत खर्च को जोड़कर बनाए जाते हैं। इसलिए सिर्फ मौजूदा बैलेंस-शीट बनाम प्रस्तावित निवेश की तुलना करके उसे धोखाधड़ी बता देना जल्दबाजी दिखती है।
भले ही कुछ एमओयू कागजी रहे हों, लेकिन वास्तविकता में ₹10 लाख करोड़ से अधिक के असल प्रोजेक्ट्स का भूमि पूजन (Ground Breaking Ceremony 4.0) हो चुका है और उन पर काम चल रहा है।
एमओयू की कानूनी एवं प्रशासनिक प्रकृति
कानूनी दृष्टि से एमओयू कोई बाध्यकारी अनुबंध नहीं, बल्कि निवेश-आशय का एक प्रारंभिक दस्तावेज है। यह किसी निवेशक को भूमि या किसी भी तरह की सब्सिडी आदि पाने का स्वतः अधिकार नहीं देता। यह केवल विस्तृत परियोजना मूल्यांकन, वित्तीय सत्यापन और अनुमोदन प्रक्रिया की शुरुआत भर है।
यहाँ तक कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मार्च 2026 में पुच एआई (Puch AI) एमओयू प्रकरण के दौरान सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया था कि इन्वेस्ट यूपी द्वारा हस्ताक्षरित एमओयू विस्तृत सत्यापन और परियोजना मूल्यांकन से पहले की एक प्रारंभिक प्रक्रिया मात्र होती है, न कि निवेश को लेकर कई प्रतिबद्धता।
इसका सीधा अर्थ यही है कि अगर कोई कंपनी MOU पर हस्ताक्षर के बाद परियोजना को धरातल पर लाने में अक्षम हो या फिर कंपनी में कई गड़बड़ी मिलती है तो भी इससे राज्य के खजाने को कोई प्रत्यक्ष राजकोषीय हानि नहीं होती।
किसी भी सरकारी निधि का वितरण एमओयू की प्रक्रिया के दौरान नहीं बल्कि उसके बाद की विस्तृत स्वीकृति और अन्य प्रक्रिया में होता है।
नोट करने वाली बात ये है कि यह व्यवस्था भारत के साथ-साथ वैश्विक स्तर पर भी निवेश प्रोत्साहन की मानक प्रक्रिया के अनुरूप है। सभी जगह पर एमओयू के दस्तावेजों को निवेश के अंतिम निर्णय से अलग रखा जाता है।
न्यूजलॉन्ड्री को ये समझना जरूरी है कि MoU और वास्तविक निवेश अलग-अलग चीजें हैं और रिपोर्टिंग में इस अंतर को साफ-साफ नहीं रखा गया। ₹33.5 लाख करोड़ का आंकड़ा निवेश प्रस्तावों का था, नकद जमा हो चुके निवेश का नहीं। MoU गैर-बाध्यकारी होते हैं, इसलिए उन्हें धोखा या सरकारी धन का नुकसान कह देना पूरी तरह से गलत है।
रिपोर्ट की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि वह MoU के non-binding nature को स्वीकार करने के बावजूद कई जगह ऐसी भाषा इस्तेमाल किया गया जिससे पाठक यह मान ले कि हर बड़ा MoU पहले ही फर्जी निवेश था। यह निष्कर्ष खुद दिए गए तथ्यों से सीधे नहीं निकलता, क्योंकि कोई MoU यह वादा नहीं करता कि पैसा उसी दिन ट्रांसफर हो जाएगा।
उत्तर प्रदेश में क्या है वास्तविक निवेश की ऐतिहासिक प्रगति
MOU के दायरे से परे देखें तो धरातल पर परियोजनाओं के क्रियान्वयन का रिकॉर्ड काफी बेहतर है। फरवरी 2018 के प्रथम यूपी इन्वेस्टर्स समिट में 1,045 एमओयू पर हस्ताक्षर हुए थे, जिनका प्रस्तावित मूल्य लगभग ₹4.28 लाख करोड़ था।
विधानसभा में सरकार द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, 5 वर्ष बाद इस राशि का लगभग 61% भाग वाणिज्यिक उत्पादन के चरण में पहुँच चुका था। इसके अलावा 3 आरंभिक ग्राउंड ब्रेकिंग सेरेमनी के जरिए लगभग 3.24 लाख रोजगार सृजित हुए।
फरवरी 2023 के ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट में यह प्रगति अधिक बढ़ी। ₹33.52 लाख करोड़ के प्रस्तावित मूल्य के 19,250 एमओयू पर हस्ताक्षर किए गए। फरवरी 2024 की चौथी ग्राउंड ब्रेकिंग सेरेमनी में अकेले ₹10.23 लाख करोड़ मूल्य की 14,619 परियोजनाओं का शिलान्यास हुआ।
कुल मिलाकर अब तक संपन्न 4 ग्राउंड ब्रेकिंग सेरेमनी में ₹15 लाख करोड़ से अधिक की परियोजनाएँ धरातल पर उतारी जा चुकी हैं। सरकार के अनुसार, इनसे लगभग 60 लाख रोजगार अवसर सृजित हुए हैं।
नवंबर 2025 से लंबित पांचवीं ग्राउंड ब्रेकिंग सेरेमनी (जीबीसी-5.0) के अंतर्गत ₹7 लाख करोड़ से अधिक की परियोजनाओं के शिलान्यास की तैयारी चल रही है।
बीते 9 वर्षों में UP को ₹50 लाख करोड़ से अधिक के निवेश प्रस्ताव मिले हैं। प्रस्तावित निवेश के आधार पर सरकार ने इनसे 1.10 करोड़ रोजगार अवसर सृजित होने की संभावना जताई है।
इसके अलावा अप्रैल 2017 से जून 2025 के बीच UP में ₹17,004 करोड़ का निवेश विदेश से आया। ये जून 2000 से मार्च 2017 में मिले ₹3,303 करोड़ की तुलना में पाँच गुना से भी अधिक है।
फैक्ट्रीज एक्ट के अंतर्गत पंजीकृत इकाइयों की संख्या 14,169 से बढ़कर 31,459 हो गई और राज्य का निर्यात ₹86,000 करोड़ से बढ़कर ₹2 लाख करोड़ के पार पहुँच गया।
किन क्षेत्रों में रही निवेशकों की भागीदारी
डिजिटल अवसंरचना क्षेत्र इस औद्योगिक बदलाव का सबसे स्पष्ट उदाहरण है। राज्य में वर्तमान में छह डेटा सेंटर पार्क तथा दो स्वतंत्र डेटा सेंटर संचालित हो रहे हैं।
इसके अलावा 644 मेगावाट की प्रतिबद्ध क्षमता वाले प्लांट का कार्य प्रगति पर है। हिरानंदानी समूह, एनटीटी ग्लोबल डेटा सेंटर्स, अडाणी समूह, एसटी टेलीमीडिया, वेब वर्क्स और सिफी टेक्नोलॉजीज जैसी कंपनियाँ इन पर काम कर रही हैं।
जून 2026 की समीक्षा बैठक में यह भी सामने आया कि 5,410 मेगावाट की अतिरिक्त क्षमता हेतु घरेलू व वैश्विक निवेशकों ने रुचि दिखाई है, जिससे राज्य में लगभग ₹4.9 लाख करोड़ तक का निवेश आ सकता है और 2030 तक भारत की कुल डेटा सेंटर क्षमता में उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी 8-9% तक पहुँचने का अनुमान है।
एमओयू के लिहाज से ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (जीसीसी) क्षेत्र में भी काफी काम किया गया है। 24 जून 2026 को बेंगलुरु में आयोजित उत्तर प्रदेश ग्लोबल ग्रोथ डायलॉग में पंद्रह से अधिक कंपनियों ने कुल ₹50,000 करोड़ से अधिक के निवेश प्रस्तावों पर हस्ताक्षर किए।
इनमें एलजी, एऑन, मेटलाइफ तथा टेबलस्पेस ने जीसीसी क्षेत्र में एमओयू पर हस्ताक्षर किए, जबकि प्रेस्टीज समूह (₹15,000 करोड़), ब्लैकस्टोन-समर्थित होराइजन (₹10,000 करोड़), एम्बेसी तथा राहेजा माइंडस्पेस रीट (₹5,000 करोड़ प्रत्येक) ने औद्योगिक व व्यावसायिक पार्क विकास हेतु प्रतिबद्धता जताई।
UP सरकार का लक्ष्य वर्ष 2031 तक चार करोड़ वर्ग फुट ग्रेड-ए कार्यालय स्थान तथा 500 जीसीसी इकाइयाँ स्थापित करने का है। अन्य उपलब्धियों में यमुना एक्सप्रेसवे क्षेत्र में एचसीएल-फॉक्सकॉन द्वारा उत्तर भारत की पहली सेमीकंडक्टर इकाई की स्थापना (₹3,700 करोड़ से अधिक) शामिल है।
जनवरी 2026 के विश्व आर्थिक मंच दावोस सम्मेलन में एआई, डेटा सेंटर व नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्रों में ₹2.94 लाख करोड़ के एमओयू हुए, तथा सिंगापुर व जापान यात्राओं के दौरान ₹1.5 लाख करोड़ के एमओयू के साथ-साथ ₹2.5 लाख करोड़ से अधिक के अतिरिक्त निवेश प्रस्ताव प्राप्त हुए।
न्यूजलॉन्ड्री की ‘एमओयू मिराज’ शृंखला की 30 जून 2026 की रिपोर्ट में यह तर्क दिया गया है कि 2023 के समिट में हस्ताक्षरित कुछ बड़े एमओयू ऐसी कंपनियों अथवा संस्थाओं से जुड़े हैं जिनका भारत में कॉर्पोरेट रिकॉर्ड सीमित है।
इसके अलावा साइन हुए एमओयू की कुल घोषित राशि और वास्तविक क्रियान्वयन क्षमता के बीच का अंतर एमओयू की प्रक्रिया की उपयोगिता पर सवाल खड़े करता है।
इस रिपोर्ट का जवाब यह है कि एमओयू की गैर-बाध्यकारी प्रकृति और पूर्व-स्वीकृति सत्यापन तंत्र राज्य के सरकारी खजाने नुकसान से बचाते हैं। साथ ही निवेश मित्र 3.0 जैसे सुधार भविष्य में तेज और अधिक बेहतर वित्तीय-साख सत्यापन का रास्ता अपनाते हैं।
उत्तर प्रदेश की निवेश-प्रोत्साहन यात्रा राज्य के आर्थिक परिदृश्य को असल धरातल पर लाने में सफल रही है। एमओयू पर हस्ताक्षर मात्र आशय की अभिव्यक्ति है, न कि अंतिम प्रतिबद्धता, और जब भी किसी निवेशक की साख पर सवाल उठे हैं तो उसकी समीक्षा और कार्रवाई की व्यवस्था सुनिश्चित की गई है।
अन्य राज्यों के साथ क्या है UP की तुलना
उत्तर प्रदेश ने 2021 से दिसंबर 2025 तक कुल 702 निवेश प्रस्ताव दाखिल किए जिनकी प्रस्तावित राशि ₹5,30,416 करोड़ रही।
वहीं, IEMs Implemented के आँकड़े बताते हैं कि इसी अवधि में 998 औद्योगिक इकाइयाँ धरातल पर उतरीं, जिनमें ₹5,83,096 करोड़ का वास्तविक निवेश हुआ।
Source- DPIIT
यह आँकड़ा दर्शाता है कि उत्तर प्रदेश ने केवल कागजी एमओयू नहीं, बल्कि असल औद्योगिक क्रियान्वयन में भी उल्लेखनीय प्रगति की है।
Source- DPIIT
अन्य राज्यों से अगर तुलना करें तो महाराष्ट्र ने 2025 तक ₹6,13,008 करोड़ का निवेश लागू किया, जबकि यूपी ने ₹5,83,096 करोड़ का निवेश जारी किया। यानी यूपी अब औद्योगिक निवेश में देश के शीर्ष तीन राज्यों में शामिल है।
FDI data till sept 2025 (source- DPIIT)
इसके अलावा गुजरात ने ₹4,15,810 करोड़ का प्रस्तावित निवेश दर्ज किया, पर लागू निवेश ₹2,08,025 करोड़ रहा। इसके एवज में यूपी की निवेश लागू करने की दर (implementation ratio) अधिक मजबूत है। वहीं कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे पारंपरिक औद्योगिक राज्य भी यूपी के निवेश क्रियान्वयन दर से पीछे हैं।
हर राज्य में सभी MoU हकीकत में नहीं बदलते। लेकिन इसी तर्क से यह निष्कर्ष निकाल लेना कि पूरा निवेश मॉडल ही फर्जी है, गलत होगा। किसी भी निवेश प्रोत्साहन व्यवस्था में कुछ परियोजनाएँ सफल होती हैं, कुछ लटकती हैं, और कुछ निरस्त भी होती हैं।
इस बात का महत्व अधिक है कि राज्य सरकार उन मामलों को ट्रैक करे, जवाबदेही तय करे, और संदिग्ध मामलों पर कार्रवाई करे। यूपी के मामले में रिकॉर्ड यही बताता है कि मॉनिटरिंग के लिए औपचारिक व्यवस्था बनाई गई। इसीलिए अब तक धरातल पर उतरी योजनाएँ सरकार के साथ मिलकर लोगों को रोजगार और सुविधा मुहैया करवाने में सफल हो रही हैं।
कल रात विश्व कप में हुए अप्रत्याशित उलटफेरों की चर्चा अभी थमी भी नहीं थी कि Round of 32 के अगले मुकाबलों ने फुटबॉल प्रेमियों का ध्यान फिर अपनी ओर खींच लिया। पहला मुकाबला डलास में खेला जाना था, जहां कोटे डी आइवोआर के सामने यूरोप की सबसे विस्फोटक आक्रमण पंक्ति वाली टीमों में से एक नॉर्वे खड़ी थी।
एक ओर एर्लिंग हालांड, एंटोनियो नूसा और अलेक्ज़ेंडर सोरलोथ जैसे खिलाड़ी थे, जो एक पल की चूक को भी गोल में बदलने की क्षमता रखते हैं। दूसरी ओर कोटे डी आइवोआर की युवा, तेज़ और आक्रामक टीम थी, जिसकी निगाहें लगातार पहली बार विश्व कप के अगले दौर में पहुंचने पर टिकी थीं। यान डियोमांडे और निकोलास पेपे आक्रमण की कमान संभाल रहे थे, जबकि मिडफील्ड में फ्रांक केस्सी अनुभव और संतुलन का आधार थे। उधर नॉर्वे के लिए कप्तान मार्टिन ओदेगार्द पूरे खेल की धुरी बनने वाले थे। उनका काम केवल पास बांटना नहीं, बल्कि हालांड तक हर निर्णायक गेंद पहुंचाना भी था।
किक-ऑफ से पहले ही यह साफ़ था कि यह मुकाबला केवल दो टीमों के बीच नहीं, बल्कि दो अलग-अलग फुटबॉल दर्शन के बीच होने वाला था; एक ओर तेज़ ट्रांज़िशन और घातक फिनिशिंग, दूसरी ओर गति, ड्रिब्लिंग और लगातार दबाव बनाकर मैच की लय अपने पक्ष में करने की कोशिश। डलास का मैदान तैयार था, और विश्व कप को एक और यादगार रात मिलने वाली थी।
मैच शुरू होता है। कोटे डी आइवोआर का प्रयास रहता है कि शुरुआती गोल दागकर नॉर्वे पर दबाव बनाया जाए। वह लगातार आक्रमण करते रहते हैं। खासकर मैदान के बाएं छोर से यान डियोमांडे अपनी मंत्रमुग्ध कर देने वाली ड्रिब्लिंग से लगातार नॉर्वे के लिए खतरे पैदा कर रहे थे। नॉर्वे किसी तरह खुद को बचाए हुए था। लेकिन मैच के उनतालीसवें मिनट में कप्तान मार्टिन ओदेगार्द गेंद को बाईं ओर एंटोनियो नूसा की तरफ बढ़ाते हैं। नूसा अपने सामने मौजूद डिफेंडर को छकाते हुए गोलपोस्ट से लगभग बीस मीटर की दूरी से एक शानदार शॉट लगाते हैं। गेंद गोलकीपर को छकाते हुए सीधे गोलपोस्ट के भीतर चली जाती है।
नॉर्वे मुकाबले में 1-0 की महत्वपूर्ण बढ़त हासिल कर लेता है। इसके बाद दोनों टीमों ने कई अवसर बनाए, लेकिन कोई भी उन्हें गोल में तब्दील नहीं कर सका। कोटे डी आइवोआर लगातार घातक मौके बना रहा था, मगर फिनिशिंग में चूक उसके रास्ते का सबसे बड़ा रोड़ा बनी रही। एंटोनियो नूसा के शानदार गोल की बदौलत नॉर्वे पहले हाफ की समाप्ति तक बढ़त बनाए रखने में सफल रहा।
दूसरे हाफ का खेल शुरू होता है। कोटे डी आइवोआर लगातार अच्छे मौके बना रही थी, लेकिन गोल अब भी उससे दूर था। मैच के साठवें मिनट के आसपास कोटे डी आइवोआर के कोच अपनी आक्रमण क्षमता बढ़ाने के उद्देश्य से बदलाव करते हैं। तेईस वर्षीय अमाद दियालो भी अब मैदान में उतर चुके थे। वहीं सत्तरवें मिनट में नॉर्वे की ओर से एंटोनियो नूसा और अलेक्ज़ेंडर सोरलोथ की जगह क्रमशः आन्द्रेस शेल्डरुप और ऑस्कर बॉब मैदान में आते हैं।
अमाद दियालो मैदान में आते ही अपनी टीम के आक्रमण में नई धार भर देते हैं। मैच के चौहत्तरवें मिनट में निकोलास पेपे गेंद को अमाद दियालो की ओर बढ़ाते हैं। नॉर्वे के दो-तीन खिलाड़ियों से घिरे होने के बावजूद दियालो शानदार फुटवर्क का प्रदर्शन करते हुए अकेले आगे बढ़ते हैं और बेहतरीन गोल दाग देते हैं। सब कुछ इतनी तेजी से होता है कि नॉर्वे के खिलाड़ी संभल भी नहीं पाते और स्कोर 1-1 से बराबर हो जाता है।
अब तो कोटे डी आइवोआर मानो तूफान की तरह लगातार आक्रमण करने लगती है। यान डियोमांडे, निकोलास पेपे और अमाद दियालो हर दिशा से नॉर्वे के डिफेंस पर दबाव बना रहे थे। नॉर्वे एकाएक बैकफुट पर आ गई थी। लेकिन फिर मैच के छियासीवें मिनट में सुपर स्ट्राइकर एर्लिंग हालांड अचानक ही एक गोल दागकर स्कोर 2-1 कर देते हैं। कोटे डी आइवोआर अंतिम क्षणों तक बराबरी के लिए संघर्ष करती रही। इंजरी टाइम में उसे एक फ्री-किक भी मिलती है। एक बार फिर अमाद दियालो गेंद के पीछे खड़े होते हैं। लियोनेल मेस्सी की याद दिलाने वाली उनकी सटीक किक सीधे गोलपोस्ट की ओर बढ़ती है। एक पल को ऐसा लगता है कि गेंद जाल में समा जाएगी, लेकिन नॉर्वे के अनुभवी गोलकीपर ओर्यान नायलांड मानो कह उठते हैं, “Not Today.” वह असाधारण सेव करते हैं। यह बचाव इतना शानदार था कि एक क्षण के लिए विश्वास ही नहीं होता कि गेंद गोलपोस्ट के भीतर नहीं गई।
कोटे डी आइवोआर ने इस मुकाबले में विपक्षी गोलपोस्ट पर कुल चौदह शॉट लगाए, जिनमें से पांच निशाने पर रहे। उसे पूरे मैच में चौदह कॉर्नर भी मिले, लेकिन आज ओर्यान नायलांड का शानदार गोलकीपिंग प्रदर्शन नॉर्वे के लिए ढाल बन गया। परिणामस्वरूप कोटे डी आइवोआर 2-1 से मुकाबला हारकर टूर्नामेंट से बाहर हो गई। जहां कल ओरलांडो गिल का दिन था, वहीं आज एक बार फिर इस विश्व कप में एक गोलकीपर अपनी टीम का सबसे बड़ा नायक बनकर उभरा।
यह मुकाबला इतनी तीव्रता से खेला गया कि मैच समाप्त होने के बाद एर्लिंग हालांड स्वयं भी कुछ क्षणों तक मानो विश्वास नहीं कर पा रहे थे कि उनकी टीम ने यह कठिन लड़ाई जीत ली है। अर्लिंग हालांड ने आज के गोल के साथ नॉर्वे के लिए अपने 53वें अंतरराष्ट्रीय मुकाबले में 60 गोल पूरे कर लिए। यह आँकड़ा अपने आप में बताता है कि आधुनिक फुटबॉल में उनके जैसा नैसर्गिक गोलस्कोरर कितनी दुर्लभ चीज़ है। इतनी कम पारियों में इस मुकाम तक पहुंचने वाले वह विश्व फुटबॉल के सबसे तेज़ गोलस्कोररों में शुमार हो गए। अब Round of 16 में नॉर्वे का सामना ब्राज़ील से होगा।
अगला मुकाबला, रात ढाई बजे, न्यू जर्सी स्टेडियम में फ्रांस बनाम स्वीडन के बीच खेला गया। इस मैच में दोनों ही टीमों के पास कई घातक गोलस्कोरर मौजूद थे। इसलिए दोनों ओर से गोल देखने की पूरी उम्मीद थी। जैसा कि हमने चर्चा की थी, स्वीडन को इस मुकाबले में कुछ अच्छा करने के लिए अपनी रक्षापंक्ति बेहद अनुशासित रखनी थी।
पिछले मैच में बत्तीसवें मिनट तक हैट्रिक दागकर उस्मान डेंबेले बता चुके थे कि फ्रांस का आक्रमण कितना घातक हो सकता है। मगर अफसोस, फ्रांसीसी तूफान के आगे स्वीडन की रक्षापंक्ति बीती रात पूरी तरह बेबस नजर आई। यहां देर रात यह मुकाबला देखना ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो आपके शहर के किसी थिएटर में कोई मैटिनी शो चल रहा हो, जिसका नायक किलियन एमबाप्पे हो। फ्रांस के तमाम खिलाड़ियों की व्यक्तिगत प्रतिभा के बावजूद यह मुकाबला पूरी तरह किलियन एमबाप्पे के नाम रहा।
न्यू जर्सी में मैच शुरू होता है। शुरुआती सीटी बजते ही फ्रांस अपनी पूरी आक्रामक क्षमता के साथ मैदान पर उतरता है। मानो उसका उद्देश्य ही विपक्षी टीम पर पूरी तरह हावी हो जाना हो। आक्रमण पंक्ति में किलियन एमबाप्पे के साथ ब्रैडली बारकोला, उस्मान डेंबेले और माइकल ओलीसे लगातार स्वीडिश डिफेंस पर दबाव बनाते रहे। पिछले मुकाबले में जहां डेंबेले ने दाएं छोर से कहर बरपाया था, इस बार वही भूमिका सेंट्रल फॉरवर्ड किलियन एमबाप्पे निभाते दिखाई दिए।
पहले हाफ के अंतिम क्षणों में एमबाप्पे ने स्वीडन की सघन रक्षापंक्ति को भेदते हुए एक दर्शनीय गोल दागकर फ्रांस को बढ़त दिला दी। यह गोल देखने लायक था। बेहद तेज गति से वह हाफ लाइन से गेंद लेकर आगे बढ़ते हैं, विपक्षी ‘डी’ के बाहर पहुंचकर एक बैकहील के जरिए गेंद ब्रैडली बारकोला की ओर बढ़ाते हैं, स्वयं खाली स्थान बनाते हैं और जैसे ही गेंद दोबारा उनके पास लौटती है, वह बिना कोई गलती किए उसे गोल में बदल देते हैं। पहले हाफ की समाप्ति तक फ्रांस 1-0 की बढ़त हासिल कर चुका था।
दूसरे हाफ की शुरुआत भी फ्रांस ने उसी आक्रामक तेवर के साथ की। खेल शुरू होने के दस मिनट के भीतर माइकल ओलीसे शानदार रन बनाते हुए स्वीडिश डिफेंस को अपनी ओर खींच लेते हैं। सही समय पर वह गेंद ब्रैडली बारकोला की ओर बढ़ाते हैं और बारकोला बिना किसी गलती के उसे गोल में तब्दील कर फ्रांस की बढ़त 2-0 कर देते हैं।
स्वीडन अभी इस झटके से उबर भी नहीं पाया था कि एक बार फिर, चौहत्तरवें मिनट में माइकल ओलीसे स्वीडिश रक्षापंक्ति का ध्यान अपनी ओर खींचते हुए गेंद किलियन एमबाप्पे के लिए छोड़ते हैं। एमबाप्पे इस अवसर को भी व्यर्थ नहीं जाने देते और शानदार फिनिश के साथ अपना दूसरा तथा टीम का तीसरा गोल दाग देते हैं। इस गोल के साथ वह विश्व कप के नॉकआउट चरण में सर्वाधिक गोल करने वाले खिलाड़ी बन गए। साथ ही विश्व कप के विभिन्न संस्करणों में उनके नाम अब 18 गोल दर्ज हो चुके हैं। महज़ 27 वर्ष की उम्र में वह विश्व कप के इतिहास में सबसे अधिक गोल करने वाले खिलाड़ियों की सूची में वह अब शीर्ष स्थानों के बेहद करीब पहुंच चुके हैं।
फ्रांस इस गोल के साथ मुकाबला 3-0 से अपने नाम कर लेता है और अगले दौर का टिकट भी कटवा लेता है, जहां अब उसका सामना जर्मनी को पेनाल्टी शूटआउट में हराकर उलटफेर करने वाली पराग्वे की टीम से होगा। यह मुकाबला 4 जुलाई को फिलाडेल्फिया में खेला जाएगा।
ले ब्लूज़ की यह टीम कई मायनों में पिछले संस्करणों में उतरी टीमों से अलग है। इस बार यह टीम केवल घातक आक्रमण के भरोसे नहीं उतरी है। उसकी रक्षापंक्ति में विलियम सालीबा, जूल्स कूंदे, दायो उपामेकानो और लूका डीने जैसे अनुभवी खिलाड़ियों का मजबूत संयोजन मौजूद है।
वहीं बेंच पर रेयान शेरकी, जाँ-फिलिप मातेता, मार्कस थुराम और देज़िरे दूए जैसे आक्रमणकारी खिलाड़ी हैं, जो मैदान पर उतरते ही कुछ ही मिनटों में मैच का रुख बदलने की क्षमता रखते हैं। फिलहाल जिस आत्मविश्वास और संतुलन के साथ यह टीम खेल रही है, उसे देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि उसका लक्ष्य केवल अच्छा प्रदर्शन करना नहीं, बल्कि विश्व कप ट्रॉफी जीतना है।
खैर, अब बात करते हैं तीसरे मुकाबले की। मेक्सिको, अपने ही घर में, ग्रुप चरण में जर्मनी जैसी दिग्गज टीम को हराकर सनसनी मचाने वाले इक्वाडोर के सामने थी। घरेलू परिस्थितियां, भरे हुए स्टेडियम और हजारों समर्थकों का उत्साह पहले से ही मेक्सिको के पक्ष में दिखाई दे रहा था।
लेकिन विश्व कप में केवल माहौल नहीं, मौके भुनाने की क्षमता भी मायने रखती है। मेक्सिको ने पहले ही हाफ में मुकाबले की दिशा तय कर दी। हूलियान क्वीनोनेज़ और 35 वर्षीय अनुभवी स्ट्राइकर राउल जिमेनेज़ ने एक-एक गोल दागते हुए स्कोर 2-0 कर दिया। इसके बाद इक्वाडोर ने वापसी की कोशिश जरूर की, मगर मेक्सिको की रक्षापंक्ति ने कोई बड़ी चूक नहीं की। इसी स्कोरलाइन के साथ मेक्सिको ने मुकाबला अपने नाम किया और Round of 16 में प्रवेश कर लिया, जहां अब उसका सामना इंग्लैंड और डीआर कांगो के बीच होने वाले मुकाबले के विजेता से होगा। उल्लेखनीय है कि अगला मुकाबला भी मेक्सिको अपने घरेलू मैदान पर खेलेगा।
अब निगाहें आज रात अटलांटा पर होंगी, जहां थॉमस टुखेल की इंग्लैंड का सामना डीआर कांगो से होगा। कागज़ों पर इंग्लैंड इस मुकाबले की प्रबल दावेदार दिखाई देती है, लेकिन विश्व कप बार-बार यही सिखाता है कि यहां भविष्यवाणियां अक्सर नब्बे मिनट के भीतर बदल जाती हैं। फुटबॉल अनिश्चितताओं का खेल है, और यही उसकी सबसे बड़ी खूबसूरती भी है।
डीआर कांगो के मुख्य कोच सेबास्टियन देसाब्रे अच्छी तरह जानते हैं कि यदि उनकी टीम खुलकर आक्रामक फुटबॉल खेलने लगी तो इंग्लैंड जैसी प्रतिभाशाली टीम उन्हें भारी नुकसान पहुंचा सकती है। यही कारण है कि इस पूरे टूर्नामेंट में उन्होंने परिस्थितियों के अनुसार अपनी रणनीति बदली है। पुर्तगाल और कोलंबिया जैसी मजबूत टीमों के खिलाफ उन्होंने पारंपरिक चार-डिफेंडर प्रणाली की जगह पांच रक्षकों वाली संरचना अपनाई थी। उसी अनुशासन की बदौलत उनकी टीम दोनों मुकाबलों से अंक लेकर बाहर निकली। ऐसे में आज भी यही उम्मीद की जा सकती है कि डीआर कांगो शुरुआत से ही मैच की गति धीमी रखने, इंग्लैंड के आक्रमण को रोकने और मुकाबले को अधिक से अधिक देर तक बराबरी पर बनाए रखने की कोशिश करेगा। यदि वह ऐसा करने में सफल रहा, तो मुकाबला अतिरिक्त समय या पेनाल्टी शूटआउट तक भी जा सकता है।
आज का दूसरा मुकाबला बेल्जियम और सेनेगल के बीच सिएटल में खेला जाएगा। भारतीय समयानुसार इसकी शुरुआत रात डेढ़ बजे होगी। इसके बाद सुबह साढ़े पांच बजे सैन फ्रांसिस्को में मेज़बान अमेरिका का सामना बोस्निया और हर्ज़ेगोविना से होगा। घरेलू परिस्थितियों और मौजूदा फॉर्म को देखते हुए मॉरिसियो पोचेतीनो की अमेरिकी टीम इस मुकाबले में बढ़त रखती दिखाई देती है, लेकिन विश्व कप में कागज़ी समीकरण कितनी जल्दी बदलते हैं, यह पिछले कुछ दिनों में पूरी दुनिया देख चुकी है।
आज के मुकाबलों में किलियन एमबाप्पे, माइकल ओलीसे, अमाद दियालो और एंटोनियो नूसा ने अपने आक्रामक खेल से दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया। वहीं दूसरी ओर, अंतिम क्षणों में अमाद दियालो की खतरनाक फ्री-किक को रोकने वाले नॉर्वे के गोलकीपर ओर्यान नायलांड भी किसी नायक से कम नहीं रहे। कई बार एक शानदार सेव भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है, जितना कोई निर्णायक गोल।
इस विश्व कप ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि यहां कुछ भी संभव है। यहां वही टीम अंत तक टिकती है, जो दबाव के सबसे कठिन क्षणों में भी अपने धैर्य और संयम को बनाए रख सके। यही कारण है कि विश्व कप केवल कौशल की नहीं, बल्कि साहस और मानसिक दृढ़ता की भी परीक्षा है।
इसी संदर्भ में जर्मनी और पराग्वे के बीच खेला गया पेनाल्टी शूटआउट भी लंबे समय तक याद रखा जाएगा। पांच-पांच पेनाल्टी के बाद भी जब दोनों टीमें बराबरी पर थीं, तो मुकाबला ‘सडन डेथ’ में पहुंच गया। अंततः पराग्वे ने शूटआउट अपने नाम किया और जर्मनी, जो विश्व कप इतिहास में पेनाल्टी शूटआउट में लंबे समय तक लगभग अजेय मानी जाती थी, टूर्नामेंट से बाहर हो गई। एक ओर पराग्वे के गोलकीपर ओरलांडो गिल ने शानदार बचाव किए, तो दूसरी ओर जर्मनी निर्णायक क्षणों में अवसरों का लाभ नहीं उठा सकी। विश्व कप अक्सर ऐसे ही छोटे-छोटे पलों में अपने सबसे बड़े नायक और सबसे बड़ी त्रासदियां चुनता है।
ऐसे ही क्षणों को देखकर होमर के महाकाव्य इलियड की ये पंक्तियां सहज ही स्मरण हो उठती हैं:
“Let me not then die ingloriously and without a struggle, but let me first do some great thing that shall be told among men hereafter.”
फुटबॉल केवल एक खेल नहीं है। यह जज़्बे का दूसरा नाम है। यह उम्मीदों, साहस, असंभव को संभव बनाने की जिद और करोड़ों लोगों की सामूहिक धड़कनों का उत्सव है। और इसलिए, फुटबॉल के ये खूबसूरत किस्से आगे भी यूं ही लिखे जाते रहेंगे।
अयोध्या में राम मंदिर के चंदे में कथित हेराफेरी की खबरों और गिरफ्तारियों के बीच देश की सियासत में एक बार फिर भगवार राम का नाम गूँज रहा है। लेकिन इस बार सबसे दिलचस्प नजारा कॉन्ग्रेस पार्टी के खेमे से आ रहा है। राम मंदिर के भूमि पूजन और प्राण प्रतिष्ठा के ऐतिहासिक आयोजनों से दूरी बनाने वाली कॉन्ग्रेस को अचानक भगवान राम की याद सताने लगी है। कॉन्ग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत भगवान राम को ‘इमाम-ए-हिंद’ बताते हुए भी हिंदू घृणा दिखा रही हैं।
यह वही कॉन्ग्रेस है जिसने कुछ महीने पहले 22 जनवरी को अयोध्या में हुए राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम के निमंत्रण को ठुकरा दिया था। राजनीति के जानकार और आम जनता आज कॉन्ग्रेस के इस बदले हुए रुख को देखकर हैरान हैं। जो पार्टी कभी अदालत में लिखित रूप से कहती थी कि भगवान राम का कोई ऐतिहासिक वजूद ही नहीं था, वह आज अचानक इतनी बड़ी राम भक्त कैसे हो गई है? आइए कॉन्ग्रेस की इस ‘सीजनल राम भक्ति’ और उसके पीछे छिपी राजनीति की पूरी कहानी को विस्तार से समझते हैं…
चंदे के बहाने घड़ियाली आँसू और सुप्रिया श्रीनेत का अचानक बदला हुआ बयान
अयोध्या राम मंदिर के चंदे और जमीन खरीद में कथित हेराफेरी के कुछ आरोपों को लेकर देश में सियासत तेज हुई है। इस मुद्दे को लपकते हुए कॉन्ग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने दिल्ली में एक बड़ी प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई। उन्होंने भाजपा और RSS पर सीधा हमला बोलते हुए कहा कि इन लोगों ने भगवान राम के भक्तों का पैसा हड़प लिया है और मंदिर के चढ़ावे में चोरी की है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुप्पी पर सवाल उठाते हुए इसे एक ‘महा-घोटाला’ बताया और माँग की कि इस पूरे मामले की जाँच सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जज से कराई जानी चाहिए।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में सुप्रिया श्रीनेत ने सरकार को घेरते हुए कहा, “राम मंदिर के भूमिपूजन से लेकर उसकी प्राण-प्रतिष्ठा तक, सब कुछ अपनी देखरेख में कराने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चढ़ावे की इस चोरी पर एक शब्द भी नहीं बोल रहे हैं। उन्हें अपनी चुप्पी तोड़नी चाहिए और इस धोखे के लिए भक्तों से माफी माँगनी चाहिए। उनकी यह चुप्पी कई बड़े सवाल खड़े करती है। यह श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट कोई साधारण ट्रस्ट नहीं है। इसकी घोषणा खुद प्रधानमंत्री ने फरवरी 2020 में की थी और इसके पदाधिकारी वे लोग हैं जो जीवन भर RSS से जुड़े रहे हैं। भाजपा-RSS ने इस ट्रस्ट को अपने ही पसंदीदा लोगों से भर दिया और जानबूझकर इसे आरटीआई (RTI) के दायरे से बाहर रखा।”
सुप्रिया श्रीनेत ने आगे कहा कि भगवान श्री राम का मंदिर आस्था, विश्वास और सम्मान का प्रतीक है, जिससे देश के करोड़ों लोगों की भावनाएँ जुड़ी हैं, लेकिन इस ट्रस्ट ने हिंदुओं के भरोसे के साथ विश्वासघात किया है। अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने उत्तर प्रदेश के कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और अन्य नेताओं को नजरबंद (हाउस अरेस्ट) किए जाने का मुद्दा उठाया और कहा कि विपक्ष पर यह कार्रवाई इसलिए हो रही है ताकि भगवान राम को लूटने वाले पापी बचकर निकल सकें।
लेकिन इस पूरे बयान में सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि हिंदुओं के गुस्से से बचने के लिए सुप्रिया श्रीनेत ने अचानक पैंतरा बदला और भगवान राम को ‘इमाम-ए-हिंद’ बताते हुए उनकी तारीफों के पुल बाँधने शुरू कर दिए। जो पार्टी कुछ महीने पहले तक राम मंदिर को सिर्फ भाजपा का राजनीतिक एजेंडा बताती थी, वो आज चंदे के बहाने खुद को सबसे बड़ा राम भक्त साबित करने में जुट गई है ताकि हिंदू वोट बैंक को रिझाया जा सके।
जब सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर कॉन्ग्रेस ने भगवान राम के अस्तित्व को नकारा था…
कॉन्ग्रेस की इस ‘सीजनल’ राम भक्ति के पीछे का असली सच देखना हो, तो हमें साल 2007 के उस वाकये को याद करना होगा जब केंद्र में कॉन्ग्रेस की अगुवाई वाली UPA सरकार सत्ता में थी। उस समय भारत और श्रीलंका के बीच बने पौराणिक और ऐतिहासिक ‘राम सेतु’ को तोड़कर ‘सेतुसमुद्रम परियोजना’ नाम का एक समुद्री रास्ता बनाने की तैयारी चल रही थी। जब देश भर के करोड़ों हिंदुओं, संतों और भाजपा ने इस बात का विरोध किया कि यह भगवान राम की सेना द्वारा बनाया गया पवित्र ‘राम सेतु’ है और इसे नहीं तोड़ा जाना चाहिए, तब कॉन्ग्रेस सरकार ने हिंदू आस्था की धज्जियाँ उड़ाने का काम किया था।
कॉन्ग्रेस सरकार ने देश की सबसे बड़ी अदालत, यानी सुप्रीम कोर्ट में एक लिखित हलफनामा दायर कर दिया। इस आधिकारिक दस्तावेज में सरकार ने साफ-साफ शब्दों में लिखा, “वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस बेशक प्राचीन भारतीय साहित्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, लेकिन इन्हें कोई ऐतिहासिक रिकॉर्ड नहीं माना जा सकता जिससे अकाट्य रूप से यह साबित किया जा सके कि इसमें दिखाए गए किरदार (भगवान राम, माता सीता, हनुमान जी) और घटनाएँ सचमुच इतिहास में घटित हुई थीं।”
सरल शब्दों में कहें तो कॉन्ग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट में यह लिखकर दे दिया था कि भगवान राम का कोई वैज्ञानिक या ऐतिहासिक अस्तित्व ही नहीं था, वे केवल एक कहानी के पात्र थे। इस हलफनामे के सामने आने के बाद जब देश भर में भारी आक्रोश फैल गया और भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने इसे हिंदू भावनाओं पर घोर प्रहार बताते हुए देशव्यापी आंदोलन की चेतावनी दी, तब भी कॉन्ग्रेस सरकार अपने अहंकार में चूर रही। सरकार ने इस ईश-निंदा वाले हलफनामे को तुरंत वापस लेने से भी साफ इनकार कर दिया था। कॉन्ग्रेस की इसी सोच के कारण उनके सांसद कुमार केतकर जैसे नेता भी TV चैनलों पर बैठकर खुलेआम कहते रहे कि राम केवल साहित्य की रचना हैं।
नेहरू की पुस्तक ‘Selected Works’ में दर्ज सबूत: जब रामलला के प्रकट होने पर भड़क गए थे देश के PM
कॉन्ग्रेस का भगवान राम और अयोध्या से यह बैर आज का नहीं है, बल्कि यह उनकी विरासत का हिस्सा है जिसकी शुरुआत देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के समय ही हो गई थी। 22 दिसंबर 1949 की रात जब अयोध्या में राम जन्मभूमि के विवादित ढांचे के भीतर अचानक रामलला की मूर्ति प्रकट हुई और हिंदुओं ने वहाँ भजन-कीर्तन शुरू कर दिया, तो प्रधानमंत्री नेहरू बुरी तरह भड़क गए थे।
जवाहर लाल नेहरू ने 26 दिसंबर 1949 को उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत को एक कड़ा टेलीग्राम भेजा। यह टेलीग्राम ‘Selected Works of Jawaharlal Nehru‘ के वॉल्यूम 14, पार्ट 1 के पेज 443 पर हूबहू छपा हुआ है। इस टेलीग्राम में जवाहर लाल नेहरू ने लिखा था कि अयोध्या की घटना से वे बहुत ज्यादा विचलित हैं और वहाँ जो कुछ भी हुआ है, उससे उन्हें गहरा धक्का लगा है।
जवाहर लाल नेहरू का मानना था कि अगर रामलला की मूर्तियों को तुरंत जन्मभूमि से बाहर नहीं निकाला गया, तो पूरे भारत और विशेषकर कश्मीर में बहुत गलत संदेश जाएगा। नेहरू किसी भी कीमत पर वहाँ से मूर्तियों को हटवाना चाहते थे और इसके लिए वे खुद अयोध्या जाने की जिद पर अड़ गए थे। इस बात का पक्का प्रमाण इसी पुस्तक के वॉल्यूम 14, पार्ट 1 के पेज 444 पर दर्ज उनके दूसरे टेलीग्राम से मिलता है, जो उन्होंने 5 फरवरी 1950 को गोविंद वल्लभ पंत को भेजा था। इस टेलीग्राम में नेहरू ने साफ शब्दों में लिखते हैं, “प्रिय पंत जी, मुझे प्रशन्नता होगी अगर आप अयोध्या के हालात से मुझे अवगत करवाएँगे। जैसा कि आप जानते हैं, मैं इसे समूचे भारत और खासतौर से कश्मीर पर पड़ने वाले इसके असर को बहुत महत्व देता हूँ। अगर आप जरूरी समझें तो मैं स्वयं अयोध्या आउँगा।”
नेहरू की नाराजगी यहीं शांत नहीं हुई, वे रामलला की मूर्तियों को हटाने का विरोध करने वाले स्थानीय अधिकारियों से भी नफरत करने लगे थे। इसका सबसे बड़ा सबूत इसी पुस्तक के वॉल्यूम 14, पार्ट 2 के पेज 445 पर मिलता है, जो टेलीग्राम उन्होंने 5 मार्च 1950 को महात्मा गाँधी के मुख्य सहायक किशोर लाल मशरूवाला को भेजा था। इस पत्र में पंडित नेहरू लिखते हैं, “आपने अयोध्या की मस्जिद का जिक्र किया। यह वाक्या दो या तीन महीने पहले हुआ और मैं इसको लेकर चिंतित हूँ। उत्तर प्रदेश सरकार ने हिम्मत दिखाने का दिखावा किया और हकीकत में जो किया वो कम था। फैजाबाद के अधिकारियों ने या तो बदमाशी की या फिर इस घटना को रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया। UP में कई कॉन्ग्रेसियों और पंडित गोविंद बल्लभ पंत ने इस घटना की कई मौकों पर निंदा की, लेकिन वो दंगों के भय से कोई भी कड़ी कार्रवाई करने से बचते रहे। मैं इससे बुरी तरह अशांत हूँ और मैंने बार-बार पंतजी का ध्यान इस ओर आकर्षित किया है।”
उत्तर प्रदेश को ‘सांप्रदायिक’ बताना और सरकारी खर्च पर बाबरी मस्जिद बनाने की नेहरू की सोच
अयोध्या के इस पूरे घटनाक्रम से पंडित नेहरू को कितना मानसिक कष्ट हो रहा था, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने उत्तर प्रदेश के पूरे समाज को ही कटघरे में खड़ा कर दिया था। इसी पुस्तक के वॉल्यूम 14, पार्ट 2 के पेज 293 पर दर्ज एक अन्य पत्र में नेहरू ने अपने दिल का दर्द बयाँ करते हुए लिखा था कि उत्तर प्रदेश अब उनके लिए एक अजनबी और पूरी तरह से सांप्रदायिक जगह बनता जा रहा है, जहाँ वे खुद को बिल्कुल अकेला और अलग-थलग महसूस करते हैं। नेहरू को इस बात का बहुत मलाल था कि UP की सरकार और वहाँ के लोग उनकी तरह ‘सेक्युलर’ सोच नहीं रख रहे हैं।
जवाहर लाल नेहरू की सनातनी प्रतीकों और संतों के प्रति नफरत का एक और बड़ा उदाहरण इसी पुस्तक के वॉल्यूम 14, पार्ट 2 के पेज 295 पर मिलता है। 18 मई 1950 को पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री विधान चंद्र राय को लिखे एक टेलीग्राम में नेहरू ने देश में बढ़ रही सांप्रदायिकता के लिए सीधे तौर पर सनातनियों, पंडितों और साधु-संतों को जिम्मेदार ठहराया था। इन सभी ऐतिहासिक तथ्यों और पत्रों की भाषा से यह पूरी तरह साफ हो जाता है कि नेहरू के मन में राम मंदिर को लेकर क्या विचार थे। वे पहली बात तो यह चाहते थे कि रामलला की मूर्तियों को जन्मभूमि से बाहर फेंक दिया जाए, और दूसरी बात यह कि वे सरकारी खर्च पर वहाँ दोबारा बाबरी मस्जिद का निर्माण करवाना चाहते थे।
इसके लिए नेहरू बार-बार गुजरात के सोमनाथ मंदिर का उदाहरण देते थे, जिसका पुनर्निर्माण उन दिनों पूरे जोर-शोर से चल रहा था। जबकि सरदार वल्लभभाई पटेल और अन्य बड़े नेता नेहरू को बार-बार समझाते थे कि बाबरी मस्जिद की तुलना सोमनाथ मंदिर से नहीं की जा सकती क्योंकि सोमनाथ मंदिर का निर्माण सरकार के पैसे से नहीं, बल्कि आम जनता के दान और चंदे से हो रहा था। लेकिन नेहरू अपनी इस जिद को छोड़ने के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं थे।
सोमनाथ मंदिर का विरोध और राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद को नेहरू की वो विवादित चिट्ठी
नेहरू की सेक्युलरिज्म की परिभाषा इतनी अजीब थी कि वे हिंदुओं के गौरव के प्रतीक सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण को भी ‘हिंदू पुनरुत्थानवाद’ का नाम देकर उसका विरोध करते थे। जब सोमनाथ मंदिर का काम पूरा हो गया और उसके प्राण प्रतिष्ठा समारोह की तारीख तय हुई, तो एक अखबार में गलत खबर छप गई कि सौराष्ट्र सरकार इस उत्सव के लिए सरकारी खजाने से 5 लाख रुपए खर्च करने जा रही है। हालाँकि अगले ही दिन सौराष्ट्र सरकार ने इस खबर का खंडन कर दिया, लेकिन नेहरू को हिंदुओं और मंदिर के खिलाफ माहौल बनाने का एक बड़ा मौका मिल गया।
22 अप्रैल 1951 को प्रधानमंत्री नेहरू ने देश के पहले राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद को एक बहुत लंबी और कड़क चिट्ठी लिखी। यह पत्र ‘Selected Works of Jawaharlal Nehru’ के वॉल्यूम 16, सीरिज 2 में प्रमुखता से प्रकाशित है। इस पत्र में नेहरू ने राष्ट्रपति को सोमनाथ मंदिर के उत्सव में न जाने की हिदायत देते हुए लिखा था, “मैं सोमनाथ मंदिर के इस पूरे मामले को लेकर बहुत ज्यादा चिंतित हूँ। इसकी चर्चा अब विदेशों में भी होने लगी है। हमारे आलोचक कह रहे हैं कि भारत जैसी एक धर्मनिरपेक्ष (सेक्युलर) सरकार खुद को ऐसे आयोजनों से कैसे जोड़ सकती है जो विशुद्ध रूप से हिंदू पुनरुत्थान के प्रतीक हैं? इसके जवाब में मैं हर जगह यही कह रहा हूँ कि इस आयोजन से भारत सरकार का कोई लेना-देना नहीं है और जो लोग भी इससे जुड़े हैं, वे व्यक्तिगत रूप से ऐसा कर रहे हैं। विदेशी राजदूत भी मुझसे पूछ रहे हैं कि जब देश भुखमरी की कगार पर है और हम हर तरफ से खर्चों में कटौती कर रहे हैं, तब एक राज्य सरकार एक मंदिर के उत्सव पर 5 लाख रुपए कैसे खर्च कर सकती है? मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि क्या करूँ, लेकिन मुझे भारत सरकार को इस पूरे मामले से बिल्कुल अलग रखना होगा।”
जवाहर लाल नेहरू ने राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद पर दबाव बनाने की पूरी कोशिश की कि वे देश के मुखिया होने के नाते सोमनाथ न जाएँ, क्योंकि इससे भारत की सेक्युलर छवि खराब होगी। लेकिन धन्य हो इस देश के पहले राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद, जिन्होंने नेहरू की इस तुष्टिकरण वाली सोच और तानाशाही दबाव के आगे झुकने से साफ मना कर दिया। वे न केवल सोमनाथ मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह में शामिल हुए, बल्कि उन्होंने वहां जाकर देश के सांस्कृतिक गौरव पर एक ऐतिहासिक भाषण भी दिया था।
अयोध्या का वो जांबाज कलेक्टर केके नायर, जिसने नेहरू के आदेश को ठेंगा दिखाया और जेल गया
आजादी के तुरंत बाद जब अयोध्या के विवादित ढांचे में रामलला की मूर्ति प्रकट हुई, तो तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और यूपी के मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत ने हिंदुओं की आस्था को कुचलने के लिए मूर्तियों को वहाँ से जबरन हटाने का तानाशाही आदेश दे दिया था। नेहरू की इस राम-विरोधी नीति के खिलाफ अयोध्या के तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट (DM) केके नायर दीवार बनकर खड़े हो गए। एक जांबाज IPS अधिकारी के रूप में नायर साहब ने अपने सहायक गुरु दत्त सिंह की उस रिपोर्ट का समर्थन किया, जिसमें जन्मभूमि पर भव्य राम मंदिर निर्माण की सिफारिश की गई थी।
नेहरू के भारी दबाव के बावजूद नायर ने अपनी नौकरी और करियर को दांव पर लगाकर मूर्तियों को हटाने से साफ इनकार कर दिया और सरकार को दो टूक चेतावनी दी कि ऐसा करने से अयोध्या में भारी दंगा और खून-खराबा हो सकता है। नेहरू के इस जनविरोधी आदेश को ठेंगा दिखाने की सजा केके नायर को निलंबन के रूप में भुगतनी पड़ी, हालाँकि बाद में वे अदालत से यह केस जीत गए लेकिन नेहरू सरकार की सनातनी प्रतीकों के प्रति नफरत से तंग आकर उन्होंने इस्तीफा दे दिया।
इसके बाद पूरा नायर परिवार राम मंदिर आंदोलन के संकल्प के साथ जनसंघ में शामिल हो गया, जिसके चलते राम भक्तों ने उन्हें और उनकी पत्नी शकुंतला नायर को भारी मतों से जिताकर लोकसभा सांसद बनाया। नेहरू परिवार का राम भक्तों के प्रति यह बैर यहीं शांत नहीं हुआ। बाद में इंदिरा गाँधी ने अपनी राजनीतिक खुन्नस निकालने के लिए आपातकाल (इमरजेंसी) के काले दिनों के दौरान इस बुजुर्ग देशभक्त दंपत्ति को जबरन गिरफ्तार करवाकर जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया था।
जब सोनिया गाँधी और मल्लिकार्जुन खड़गे ने किया राम मंदिर का बहिष्कार
अयोध्या में 500 वर्षों के लंबे संघर्ष और सुप्रीम कोर्ट के सर्वसम्मत फैसले के बाद जब 22 जनवरी 2024 को रामलला की प्राण प्रतिष्ठा का ऐतिहासिक क्षण आया, तब कॉन्ग्रेस ने अपनी पुरानी राम-विरोधी और तुष्टिकरण की मानसिकता का परिचय दिया। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट द्वारा सोनिया गाँधी, मल्लिकार्जुन खरगे और अधीर रंजन चौधरी को पूरे सम्मान के साथ भेजे गए निमंत्रण को कॉन्ग्रेस आलाकमान ने ठुकरा दिया।
कॉन्ग्रेस ने इस पवित्र राष्ट्रीय उत्सव को भाजपा और RSS का एक ‘राजनीतिक प्रोजेक्ट’ करार दिया और ‘अर्धनिर्मित मंदिर’ का बहाना बनाकर इस महापर्व का पूरी दुनिया के सामने खुला बहिष्कार किया। कॉन्ग्रेस के इस आत्मघाती फैसले से न केवल देश के करोड़ों राम भक्तों की भावनाएँ आहत हुईं, बल्कि खुद पार्टी के भीतर भी भारी कलह और बगावत शुरू हो गई।
आचार्य प्रमोद कृष्णम और अर्जुन मोढवाडिया जैसे वरिष्ठ नेताओं ने खुलकर नाराजगी जताते हुए कहा कि इस फैसले से उन करोड़ों कार्यकर्ताओं का दिल टूटा है जिनकी आस्था भगवान राम में है। दरअसल, राहुल गाँधी के खेमे और दक्षिण भारत के नेताओं ने वोट बैंक के चुनावी गुणा-भाग और इंडिया गठबंधन के सहयोगी दलों (सपा, टीएमसी और वामपंथियों) को खुश रखने के चक्कर में इस महा-उत्सव से दूरी बनाई, जिसके बाद भाजपा ने साफ कहा कि राष्ट्र के इस भव्य कार्यक्रम का बहिष्कार करने वाली कांग्रेस का जनता खुद चुनावों में पूरी तरह बहिष्कार कर देगी।
चुनाव आते ही ‘सीजनल सनातनी’ बनने वाली कॉन्ग्रेस की दोगली नीति पर विचार
कॉन्ग्रेस पार्टी का भगवान राम, राम मंदिर और सनातन धर्म के प्रति पूरा इतिहास अगर खंगाला जाए, तो यह साफ समझ आता है कि इनकी राम भक्ति कोई वास्तविक श्रद्धा नहीं, बल्कि केवल और केवल चुनावी मौसम को देखकर बदलने वाली ‘मौकापरस्त’ राजनीति है। कॉन्ग्रेस की पूरी बुनियाद ही इस दोहरेपन पर टिकी है। जब इन्हें सत्ता का स्वाद चखना होता है या एक खास अल्पसंख्यक वोट बैंक को मजबूत करना होता है, तब ये सुप्रीम कोर्ट में जाकर हलफनामा दे देते हैं कि ‘भगवान राम तो कभी हुए ही नहीं, रामायण तो बस एक काल्पनिक कहानी है।’ ये संसद और टीवी चैनलों पर अपने नेताओं से राम के वजूद पर सवाल उठवाते हैं।
लेकिन जैसे ही चुनाव सिर पर आते हैं और इन्हें जमीन खिसकती हुई दिखाई देती है, वैसे ही कॉन्ग्रेस के तमाम नेता रातों-रात ‘इच्छाधारी सनातनी’ का चोला ओढ़ लेते हैं। तब अचानक राहुल गाँधी कोट के ऊपर जनेऊ पहनकर गोत्र बताने लगते हैं, प्रियंका गाँधी वाड्रा मंदिरों में जाकर माथा टेकने और नदियाँ में डुबकी लगाने लगती हैं, कमलनाथ खुद को हनुमान जी का सबसे बड़ा भक्त घोषित कर देते हैं, और सुप्रिया श्रीनेत को भगवान राम के भीतर ‘इमाम-ए-हिंद’ नजर आने लगता है। यह कैसी और कितनी खोखली श्रद्धा है जो सत्ता में रहते हुए भगवान के अस्तित्व को ही मिटाने पर तुल जाती है और चुनाव हारने के डर से अचानक उसी भगवान के चरणों में लोटने लगती है?
अगर कॉन्ग्रेस के मन में प्रभु श्री राम के प्रति रत्ती भर भी सच्चा सम्मान होता, तो वे 22 जनवरी को अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के उस ऐतिहासिक और पवित्र निमंत्रण को कभी ठुकराते नहीं। उन्होंने देश के करोड़ों हिंदुओं के 500 सालों के इंतजार के पूरे होने के क्षण को एक ‘राजनीतिक इवेंट’ कहकर उसका अपमान किया। सच यह है कि कॉन्ग्रेस आज अपनी ही बुनी हुई तुष्टिकरण की राजनीति के चक्रव्यूह में बुरी तरह फँस चुकी है।
वह न तो खुलकर हिंदुओं की आस्था का साथ दे पाती है और न ही उसे पूरी तरह छोड़ पाती है। उसे डर है कि अगर वह राम मंदिर का खुलकर समर्थन करेगी तो उसका पुराना खास वोट बैंक उससे छिटक जाएगा, और अगर विरोध करेगी तो देश का बहुसंख्यक समाज उसे राजनीति के नक्शे से ही साफ कर देगा। इसी डर, बौखलाहट और छटपटाहट के कारण कॉन्ग्रेस आज कभी राम को काल्पनिक बताती है, तो कभी ‘इमाम-ए-हिंद’ कहकर पूजने का नाटक करती है। लेकिन इस देश की समझदार जनता अब इनके इस ‘सीज़नल’ और ‘दोहरे’ चरित्र को बहुत अच्छी तरह पहचान चुकी है और वक्त आने पर इसका जवाब देना भी जानती है।
भारत में 20% एथेनॉल मिलाए गए पेट्रोल यानी E20 को लेकर विवाद तेज हो गया है। सरकार का कहना है कि इससे कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटेगी, ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी और प्रदूषण कम होगा। वहीं कई वाहन मालिक, खासकर पुराने वाहनों का इस्तेमाल करने वाले लोग, माइलेज घटने, इंजन पर असर पड़ने और खर्च बढ़ने की आशंका जता रहे हैं। मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच चुका है और वहाँ एथेनॉल कार्यक्रम से जुड़ी याचिका पर सुनवाई हो रही है।
विवाद तब और बढ़ गया जब कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में E20 योजना को ‘चल रहा प्रयोग’ बताया है। सरकार ने इन रिपोर्ट्स को खारिज करते हुए कहा कि अटॉर्नी जनरल ने ऐसा कोई बयान नहीं दिया। केंद्र के मुताबिक, एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम कोई प्रयोग नहीं बल्कि सोच-समझकर बनाई गई राष्ट्रीय नीति है।
क्यों एथेनॉल मिलाए गए पेट्रोल को बढ़ावा दे रही सरकार?
सरकार का कहना है कि एथेनॉल ब्लेंडिंग सिर्फ ईंधन से जुड़ा फैसला नहीं है बल्कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक रणनीति का हिस्सा है। केंद्र के मुताबिक, गन्ने से बने एथेनॉल से पेट्रोल के मुकाबले करीब 65% और मक्के से बने एथेनॉल से करीब 50% कम ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन होता है।
सरकार का दावा है कि इससे गन्ना और मक्का किसानों को फायदा हुआ है, उनकी आय बढ़ी है और गन्ना बकाया चुकाने में मदद मिली है। ESY (Ethanol Supply Year) 2014-15 से जुलाई 2025 तक भारत ने ₹1.44 लाख करोड़ से ज्यादा विदेशी मुद्रा बचाई, 245 लाख मीट्रिक टन कच्चे तेल के आयात की जगह एथेनॉल का इस्तेमाल किया और कार्बन उत्सर्जन घटाया। इस साल किसानों को एथेनॉल उत्पादन से करीब ₹40,000 करोड़ की आय और देश को करीब ₹43,000 करोड़ विदेशी मुद्रा बचत की उम्मीद है।
वाहनों के प्रदर्शन पर उठ रहे सवालों पर सरकार ने IOCL, ARAI और SIAM की स्टडी का हवाला दिया। सरकार के अनुसार E20 ईंधन E10 की तुलना में बेहतर पिकअप, शहरों में स्मूद ड्राइविंग और कम प्रदूषण देता है। हालाँकि चिंता अभी भी है क्योंकि अप्रैल 2023 से पहले बने वाहन मूल रूप से E20 के लिए डिजाइन नहीं थे। कई वाहन मालिक माइलेज कम होने और इंजन पार्ट्स के घिसने की आशंका जता रहे हैं जबकि सरकार का कहना है कि 2009 के बाद बने ज्यादातर वाहन मामूली बदलाव के साथ E20 चला सकते हैं।
नया आइडिया नहीं है एथेनॉल ब्लेंडिंग
एथेनॉल ब्लेंडिंग कोई नई नीति नहीं है। आज भले इसे लेकर बहस हो लेकिन कई देश दशकों से यातायात ईंधन में एथेनॉल का इस्तेमाल कर रहे हैं। ब्राजील इसका सबसे पुराना और सफल उदाहरण माना जाता है। अमेरिका, जापान और स्वीडन जैसे देशों ने भी जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटाने और प्रदूषण कम करने के लिए एथेनॉल को बढ़ावा दिया है।
ब्राजील का मॉडल इतना सफल रहा कि भारत और चीन समेत कई देशों ने अपने एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम बनाते समय उसका अध्ययन किया। ब्राजील में एथेनॉल की शुरुआत जलवायु चिंता से नहीं बल्कि तेल संकट के कारण हुई थी। पहले द्वितीय विश्व युद्ध और फिर 1970 के दशक के मध्य-पूर्व युद्ध ने तेल आपूर्ति को प्रभावित किया।
ब्राजील ने 1930 के दशक में गन्ने से बने एथेनॉल को ईंधन के रूप में इस्तेमाल करना शुरू किया। फरवरी 1931 में सरकार ने सभी आयातित पेट्रोल में 5% एथेनॉल मिलाना अनिवार्य किया। बाद में यह नियम घरेलू तेल पर भी लागू हुआ। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान तेल आपूर्ति पर खतरा बढ़ने के बाद एथेनॉल का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा और एक समय ब्लेंडिंग 50% तक पहुँच गई थी।
1973 के मिडिल ईस्ट युद्ध ने कैसे बदली ब्राजील की तेल नीति
1973 के अरब-इजरायल युद्ध के बाद अरब देशों ने तेल प्रतिबंध लगाया, जिससे दुनिया भर में तेल की कीमतें तेजी से बढ़ीं। उस समय ब्राजील अपने करीब 80% ईंधन के लिए आयात पर निर्भर था, इसलिए उसकी अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर पड़ा। कुछ ही महीनों में देश मंदी में चला गया और विदेशी मुद्रा कमाई का लगभग 40% हिस्सा आयातित तेल खरीदने में खर्च होने लगा।
इसके बाद ब्राजील को समझ आया कि आयातित तेल पर इतनी निर्भरता टिकाऊ नहीं है। 1975 में जनरल अर्नेस्टो गाइजल की सैन्य सरकार ने पेट्रोल में गन्ने से बने 10% एथेनॉल की मिलावट अनिवार्य कर दी। अगले पाँच वर्षों में यह अनुपात बढ़कर 25% तक पहुँच गया। इससे पेट्रोल की बचत हुई और देश के गन्ना किसानों के लिए स्थायी बाजार तैयार हुआ।
सरकार ने एथेनॉल उत्पादन के लिए कर्ज दिए और टेक्नोलॉजी व ईंधन ढाँचे में निवेश किया। वाहन कंपनियों ने भी एथेनॉल से चलने वाली गाड़ियाँ बनाईं। बाद में ब्राजील में फ्लेक्स-फ्यूल वाहन आए, जिनमें चालक पेट्रोल और एथेनॉल में से सस्ता विकल्प चुन सकता था।
आज ब्राजील में शुद्ध पेट्रोल से चलने वाली हल्की गाड़ियाँ नहीं बिकतीं। वहाँ E25 यानी 25% एथेनॉल वाला पेट्रोल आम है जबकि E100 भी फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों के लिए उपलब्ध है। इन्हीं कदमों के कारण ब्राजील को दुनिया की पहली सफल ‘सस्टेनेबल’ बायोफ्यूल अर्थव्यवस्था माना गया और उसका मॉडल कई देशों के लिए उदाहरण बना।
कैसे रही है भारत में एथेनॉल ब्लेंडिंग की यात्रा
भारत में एथेनॉल ब्लेंडिंग की नीति मौजूदा सरकार से कई साल पुरानी है। RTI से मिले सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, इसका पहला औपचारिक कदम अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय उठा था। महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में पायलट प्रोजेक्ट सफल रहने के बाद सितंबर 2002 में केंद्र ने नोटिफिकेशन जारी कर जनवरी 2003 से 9 राज्यों और 4 केंद्रशासित प्रदेशों में पेट्रोल में 5% एथेनॉल मिलाना अनिवार्य किया था।
इसका उद्देश्य वही था जो आज बताया जा रहा है: प्रदूषण कम करना, किसानों को फायदा देना और आयातित तेल पर निर्भरता घटाना। बाद में मनमोहन सिंह सरकार के दौरान 2004 और 2006 में इस कार्यक्रम को और राज्यों तक बढ़ाया गया। 2013 में तेल कंपनियों को 10% तक एथेनॉल मिला पेट्रोल बेचने का निर्देश दिया गया, जिससे इसके देशव्यापी विस्तार की नींव पड़ी।
मोदी सरकार ने इस कार्यक्रम को तेज किया। 2019 में देश के अधिकतर हिस्सों में E10 लागू किया गया, 2021 में E100 को कानूनी मान्यता मिली और उसी साल E20 को मंजूरी दी गई। इसके बाद चरणबद्ध तरीके से E20 लागू हुआ और इस साल यह देश का मानक ईंधन बन गया।
E20 पर मौजूदा बहस भले ही वाहनों की क्षमता, माइलेज और उपभोक्ताओं की चिंता पर केंद्रित हो लेकिन एथेनॉल ब्लेंडिंग का विचार न तो नया है और न ही केवल भारत तक सीमित है। ब्राजील ने करीब 5 दशक पहले तेल संकट के बाद आयातित ईंधन पर निर्भरता घटाने के लिए यह रास्ता अपनाया था। भारत भी दो दशक से ज्यादा समय पहले इसी दिशा में बढ़ना शुरू कर चुका था और अलग-अलग सरकारों ने समय के साथ इस कार्यक्रम को आगे बढ़ाया।
अब जब भारत आने वाले वर्षों में एथेनॉल ब्लेंडिंग को और बढ़ाने की तैयारी कर रहा है, तो बहस इस बात पर नहीं रह जाती कि यह कोई नया प्रयोग है या नहीं। असली सवाल यह है कि देश ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और उपभोक्ताओं के हितों के बीच संतुलन कैसे बनाए जिससे कई सरकारों और पीढ़ियों में विकसित हुई इस नीति को बेहतर तरीके से आगे बढ़ाया जा सके।
(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)
देशभर में ग्रामीण अर्थव्यवस्था और आजीविका की सुरक्षा को लेकर एक ऐतिहासिक बदलाव लागू हो गया है। दो दशक पुराने महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा MGNREGA, 2005) की जगह पर केंद्र सरकार का नया कानून ‘विकसित भारत – रोजगार एवं आजीविका मिशन (ग्रामीण) गारंटी अधिनियम’ यानी ‘वीबी-जी राम जी एक्ट’ (VB-G RAM G Act, 2025) 1 जुलाई 2026 से लागू हो चुका है।
इस कानून के लागू होने के साथ ही देश के ग्रामीण विकास के ढाँचे में आमूल-चूल परिवर्तन होने जा रहा है। सरकार जहाँ इसे ‘विकसित भारत @2047’ के विजन को पूरा करने और ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने वाला एक क्रांतिकारी कदम बता रही है तो वहीं कॉन्ग्रेस ने इस बदलाव के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। कॉन्ग्रेस पुराना मनरेगा बंद किए जाने का रोना रो रही है।
कॉन्ग्रेस ने क्या कहा?
कॉन्ग्रेस के लोकसभा सांसद सप्तगिरि उलाका ने बुधवार (1 जुलाई 2014) को प्रेस कॉन्फ्रेस कर कहा कि आज एक बहुत दुखद दिन है, क्योंकि मोदी सरकार ने मनरेगा योजना को खत्म कर दिया है। कॉन्ग्रेस सांसद ने कहा, “मनरेगा को खत्म कर सरकार ने देश के तमाम गरीबों को एक झटका दिया है, क्योंकि ये ‘मांग आधारित’ रोजगार देने वाली योजना थी।”
उन्होंने कहा, “सप्लाई बेस मॉडल में केंद्र सरकार पहले एडवांस में फंड बजट आवंटित करती है और लेबर बजट मंजूर करती है। इसके तहत राज्य सरकार को पैसा और प्रशासनिक क्षमता को मैच करना पड़ेगा जिससे काम हो पाए। मनरेगा में कितने लोगों ने रोजगार माँगा है, उसके आधार पर पैसा आवंटित किया जाता था लेकिन अब VB GRAM G में एक बजट दिया जाएगा जिसमें काम खत्म करना होगा।”
सप्लाई बेस मॉडल में केंद्र सरकार पहले एडवांस में फंड बजट आवंटित करती है और लेबर बजट मंजूर करती है।
इसके तहत, राज्य सरकार को funds और administrative capacity को match करना पड़ेगा, ताकि काम हो पाए।
मनरेगा में कितने लोगों ने रोजगार मांगा है, उसके आधार पर पैसा आवंटित किया जाता था,… pic.twitter.com/EQenswpnKF
इस अधिनियम के देश भर में लागू होने से पहले केंद्रीय ग्रामीण विकास और कृषि व किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इसे ऐतिहासिक दिन बताया है। उन्होंने कहा कि कोई भी पात्र ग्रामीण श्रमिक एक भी दिन काम से वंचित न रहे, यह सरकार की प्राथमिकता है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के साथ मिलकर अधिनियम के सुचारु क्रियान्वयन के लिए सभी प्रशासनिक, वित्तीय और तकनीकी तैयारियाँ पूरी कर ली हैं।
चौहान ने कहा, “पर्याप्त वित्तीय संसाधन उपलब्ध करा दिए गए हैं, पूरी व्यवस्था तैयार है और चल रहे सभी कार्य बिना किसी बाधा के जारी रहेंगे। रोजगार की गारंटी को 125 दिनों तक बढ़ाने से ग्रामीण परिवारों की आजीविका और मजबूत होगी, टिकाऊ सामुदायिक परिसंपत्तियों का निर्माण होगा तथा विकसित भारत के लक्ष्य को गति मिलेगी।”
इस एक्ट के ठीक से क्रियान्वयन के लिए केंद्र सरकार ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को ₹95,692.31 करोड़ की अंतरिम राशि पहले ही आवंटित कर दी है। इससे अधिनियम लागू होने के पहले दिन से ही रोजगार उपलब्ध कराने, समय पर मजदूरी का भुगतान सुनिश्चित करने और विकास कार्यों को बिना किसी बाधा के जारी रखने में मदद मिलेगी।
सरकार ने नए ढाँचे में सीमलेस ट्रांजिशन सुनिश्चित किया है। पहले से चल रहे सभी कार्य जारी रहेंगे और जिन श्रमिकों का ई-केवाईसी पूरा हो चुका है, उनके मौजूदा जॉब कार्ड ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्ड जारी होने तक मान्य रहेंगे ताकि रोजगार और मजदूरी भुगतान में किसी प्रकार की रुकावट न आए।
मनरेगा VS वीबी जी राम जी: कौन जनता का हितैषी?
विपक्ष द्वारा फैलाए जा रहे बेरोजगारी के इस नैरेटिव की जब तथ्यों के साथ पड़ताल की जाती है, तो तस्वीर पूरी तरह बदली हुई नजर आती है। असल में ‘जी राम जी बिल’ के तहत ग्रामीण रोजगार की गारंटी को खत्म नहीं किया गया है बल्कि इसके दायरे और सामर्थ्य को काफी बढ़ा दिया गया है।
मनरेगा के तहत एक वित्तीय वर्ष में प्रति ग्रामीण परिवार को केवल 100 दिनों के कुशल/अकुशल रोजगार की कानूनी गारंटी मिलती थी लेकिन नए ‘वीबी-जी राम जी एक्ट’ ने इस वैधानिक गारंटी को बढ़ाकर 125 दिन कर दिया है। यानी ग्रामीण परिवारों को अब पहले की तुलना में 25 दिन अधिक सुनिश्चित रोजगार और आय की सुरक्षा मिलेगी।
एक और सबसे महत्वपूर्ण तथ्य जो विपक्ष के दावों को खारिज करता है, वह है दैनिक मजदूरी दरों में की गई ऐतिहासिक वृद्धि। इस नए कानून के लागू होने के साथ ही केंद्र सरकार ने संशोधित मजदूरी दरों को अधिसूचित कर दिया है, जिसके तहत देश का राष्ट्रीय औसत वेतन बढ़कर 327.4 रुपए प्रति दिन हो गया है। अलग-अलग राज्यों के लिए यह दर 300 रुपए से लेकर 409 रुपए प्रति दिन (सिक्किम के कुछ हिस्सों में 450 रुपए) के बीच तय की गई है।
अगर गाँव का कोई पात्र मजदूर काम के लिए आवेदन करता है और उसे काम नहीं मिलता, तो कानून के तहत उसे बेरोजगारी भत्ता देना जरूरी है। यही बात इस योजना को कानूनी मजबूती देती है।
क्यों मनरेगा की जगह जरूरी थी VB-G RAM G?
साल 2005 में जब मनरेगा बना था, तब ग्रामीण भारत की आर्थिक स्थिति अलग थी। समय बदला तो देश में एक ऐसी योजना की जरूरत थी जो केवल ‘गड्ढे खोदने और भरने’ तक सीमित न रहकर ग्रामीण संपत्तियों का आधुनिकीकरण कर सके।
‘जी राम जी बिल’ इसी सोच के साथ देश में 4 मुख्य प्राथमिक कार्यक्षेत्रों (प्रायोरिटी वर्टिकल्स) पर केंद्रित है। इसमें पहला है जल सुरक्षा, जिसके तहत तालाबों का जीर्णोद्धार और भूजल रीचार्जिंग पर काम होगा। दूसरा मुख्य ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर, तीसरा आजीविका से जुड़ी संपत्तियाँ और चौथा चरम मौसमी घटनाओं (क्लाइमेट चेंज) के प्रभावों को कम करने वाले विशेष कार्य हैं।
देशव्यापी स्तर पर इसके लागू होने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में एक बड़ा संरचनात्मक सुधार देखने को मिलेगा। पहले मनरेगा में यह शिकायत आम थी कि बुवाई और कटाई के मुख्य सीजन में जब किसानों को खेतों के लिए मजदूरों की भारी जरूरत होती थी, तब सरकारी कामों के कारण खेतों में लेबर शॉर्टेज (मजदूरों की कमी) हो जाती थी और कृषि मजदूरी में बेवजह की महँगाई आ जाती थी।
इस समस्या का समाधान करते हुए नए कानून की धारा 6 में यह प्रावधान किया गया है कि राज्य सरकारें मुख्य कृषि सीजन के दौरान इस योजना को अधिकतम 60 दिनों के लिए निलंबित या पॉज कर सकती हैं। इससे किसानों को खेती के समय आसानी से श्रमिक उपलब्ध होंगे, जिससे देश के कृषि उत्पादन और किसानों की आय में सीधे तौर पर बढ़ोतरी होगी।
इसके अलावा, योजना में पारदर्शिता लाने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और बायोमेट्रिक ऑथेंटिकेशन का इस्तेमाल अनिवार्य किया गया है ताकि मनरेगा के दौर में होने वाले फर्जीवाड़े, घोस्ट बेनेफिशियरी (फर्जी श्रमिक) और करोड़ों रुपयों के फंड मिसएप्रोप्रिएशन (वित्तीय अनियमितताओं) को पूरी तरह से रोका जा सके। डिजिटल अटेंडेंस और सीधे बैंक खातों में आधार-लिंक्ड भुगतान प्रणाली से मजदूरी की चोरी रुकना देश के करोड़ों ईमानदार श्रमिकों के हित में है।
UP को VB-G RAM G से होंगे क्या फायदे?
VB-G RAM G कानून का उत्तर प्रदेश के लिए बड़ा फायदा इसलिए है, क्योंकि राज्य की बड़ी आबादी गाँवों में रहती है। 2011 की जनगणना के मुताबिक, यूपी की 77.73% आबादी ग्रामीण इलाकों में रहती है। ऐसे में ग्रामीण रोजगार से जुड़ा कोई भी कानून सीधे करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी और आजीविका के लिए फायदे वाला होता है।
मजदूरों की कमाई बढ़ेगी
इस कानून से उत्तर प्रदेश के ग्रामीण मजदूरों की दैनिक कमाई बढ़ेगी। नए प्रावधानों के तहत यूपी में मजदूरों को ₹300 प्रति दिन की न्यूनतम मजदूरी मिलेगी। साथ ही पुराने मनरेगा में जहाँ 100 दिन का रोजगार मिलता था, वहीं अब 125 दिन का सुनिश्चित रोजगार दिया जाएगा। इससे ग्रामीण परिवारों की सालाना आय बढ़ेगी और गाँवों में आर्थिक मजबूती आएगी।
बुंदेलखंड जैसे सूखे इलाकों को राहत
उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड जैसे पठारी और सूखे इलाकों में पानी की समस्या लंबे समय से बनी हुई है। VB-G RAM G कानून में जल सुरक्षा को पहली प्राथमिकता दी गई है। इसके तहत गाँवों में तालाबों को गहरा करने, नए चेकडैम बनाने और वर्षा जल संचयन जैसे काम वैज्ञानिक तरीके से किए जाएँगे। इससे सूखे क्षेत्रों में भूजल स्तर सुधारने में मदद मिलेगी।
UP को सबसे ज्यादा आवंटन
इस योजना के तहत उत्तर प्रदेश को सबसे बड़ा अंतरिम आवंटन मिला है। रिपोर्ट के अनुसार केंद्र ने VB-G RAM G के लिए ₹95,692.31 करोड़ की अंतरिम राशि रखी है जिसमें यूपी को सबसे ज्यादा ₹9,721.48 करोड़ मिले हैं। इससे राज्य में मजदूरी भुगतान, नए काम शुरू करने और पुराने ग्रामीण विकास कार्यों को बिना रुकावट आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी।
कुल मिलाकर VB-G RAM G कानून को ग्रामीण भारत और खासकर उत्तर प्रदेश के लिए एक बड़े बदलाव के रूप में देखा जा सकता है। इस कानून से गाँवों में रहने वाले गरीब और श्रमिक परिवारों को ज्यादा दिनों का रोजगार, बेहतर मजदूरी और समय पर भुगतान मिलने की उम्मीद है। साथ ही जल सुरक्षा, ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर और आजीविका से जुड़े कामों पर जोर देने से गाँवों में स्थायी विकास की राह मजबूत होगी।
उत्तर प्रदेश जैसे बड़े और ग्रामीण आबादी वाले राज्य के लिए यह कानून सिर्फ रोजगार देने वाली योजना नहीं बल्कि गाँवों को आत्मनिर्भर बनाने का अवसर भी साबित हो सकता है। बुंदेलखंड जैसे सूखे इलाकों में पानी से जुड़े काम, मजदूरों की बढ़ी हुई कमाई और सबसे बड़े आवंटन के कारण यूपी को इसका सीधा लाभ मिलेगा।
बंगाल विधानसभा में सोमवार (29 जून 2026) को OBC से जुड़े दो संशोधन बिल ध्वनिमत मत से पास किए गए। ये बिल हैं – पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग आयोग (संशोधन) बिल, 2026 और पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग (अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अलावा) संशोधन बिल, 2026।
दरअसल इन विधेयकों के जरिए राज्य के ओबीसी आरक्षण के ढाँचे को पूरी तरह से बदल दिया गया है। कलकत्ता उच्च न्यायालय के मई 2024 टीएमसी सरकार को आदेश दिया था, जिसे अब विधेयक में शामिल किया गया है। इसमें टीएमसी के कार्यकाल में जोड़ी गई 77 मुस्लिम जातियों समेत कुल 113 समुदायों को आरक्षण सूची से बाहर कर दिया गया है, साथ ही ओबीसी आरक्षण को 17 % से घटाकर 7 % कर दिया गया है। दरअसल कोलकाता हाईकोर्ट ने 2011 के बाद ओबीसी सूची में किए गए विस्तार और 17 फीसदी तक के कोटे को रद्द कर दिया था।
विधानसभा में बिल पेश करते हुए पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री गौरीशंकर घोष ने कहा कि पूर्व टीएमसी सरकार ने बगैर सर्वे किए मुस्लिमों को फायदा पहुँचाने के लिए ओबीसी सूची में मुस्लिम समुदाय को शामिल कर लिया था, इसलिए इसे कोलकाता हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया। उन्होंने कहा कि सर्वे के आधार पर 66 समुदायों को ओबीसी कटेगरी में बरकरार रखा गया है।
ममता बनर्जी सरकार का फॉर्मूला रद्द
तृणमूल सरकार के कार्यकाल के दौरान OBC को दो कटैगरी में बांटा गया था। OBC ‘A’ और OBC’B’ कैटेगरी बनी थी। अब इसे हटा दिया गया है और OBC कटेगरी बन गई है। इसमें OBC ‘A’ कैटेगरी में शामिल 65 समुदायों को शामिल किया गया है। अब 2010 से पहले शामिल 66 जातियाँ ही आरक्षण की पात्र होंगी। इस तरह से एक नया आरक्षण का ढाँचा बनाने का रास्ता साफ हो गया है।
2012 के आरक्षण कानून में कई अहम बदलाव किए जा रहे हैं। इस कानून का नाम बदलकर ‘पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग (पदों में आरक्षण) अधिनियम, 2012’ किया जा रहा है।
अब OBC का दर्जा ‘पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग आयोग अधिनियम, 1993’ के आधार पर तय किया जाएगा। इसका मतलब है कि OBC सूची में समुदायों को शामिल करने या हटाने में आयोग की भूमिका और भी अहम होगी।
संशोधन के तहत, राज्य सरकार पिछड़ा वर्ग आयोग से सलाह लेकर OBC आरक्षण का प्रतिशत तय करेगी। जरूरत पड़ने पर, सरकारी गजट नोटिफिकेशन के जरिए आरक्षण की दर बढ़ाई जा सकती है। हालाँकि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और OBC को मिलाकर कुल आरक्षण किसी भी हाल में 50 प्रतिशत से ज्यादा नहीं हो सकती। इसके अलावा आयोग की सिफारिशों के आधार पर OBC समुदायों को उनकी सामाजिक और शैक्षणिक स्थिति के अनुसार कई समूहों में बांटा जा सकता है, जिससे हर कैटेगरी के लिए अलग-अलग आरक्षण दरें तय की जा सकेंगी।
पिछड़ा वर्ग आयोग में बड़े बदलाव
एक और संशोधन बिल पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग आयोग के ढांचे में बदलाव लाता है। नई व्यवस्था के तहत, आयोग में एक अध्यक्ष, तीन सदस्य और एक सदस्य-सचिव होंगे। सदस्य-सचिव के तौर पर ऐसे सरकारी अधिकारी को नियुक्त किया जाएगा जिसने कम से कम तीन साल तक अतिरिक्त सचिव के रूप में काम किया हो।
आयोग की जिम्मेदारियों का भी विस्तार किया गया है। किसी व्यक्ति या समुदाय को ‘पिछड़ा वर्ग’ के रूप में मान्यता देने, सूची में शामिल करने या सूची से हटाने से पहले, आयोग एक विस्तृत सर्वेक्षण करेगा और राज्य सरकार को अपनी सिफारिशें सौंपेगा। असल में, भविष्य में OBC सूची तैयार करने के लिए आयोग की राय ही मुख्य आधार होगी।
बंगाल के मंत्री ने कहा कि पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग आयोग को टीएमसी सरकार ने दरकिनार कर दिया था और फर्जी ओबीसी जातियाँ बना दी थी। नई सरकार इन्हें खत्म कर रही है और अब ओबीसी समुदाय की सामाजिक आर्थिक स्थिति का आकलन भी किया जाएगा।
सरकार का कहना है कि इस संशोधन से OBC आरक्षण व्यवस्था अधिक पारदर्शी, कानूनी रूप से सही और सुव्यवस्थित होगी। इसके अलावा, नए कानून को लागू करने से सरकार पर कोई अतिरिक्त वित्तीय बोझ नहीं पड़ेगा।
सरकार ने इस संशोधन बिल के जरिए पूर्ववर्ती ममता सरकार के मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति पर बड़ा प्रहार किया है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने बिल को लेकर कहा कि यह कदम तुष्टिकरण की राजनीति को खत्म कर संवैधानिक न्याय सुनिश्चित करने की दिशा में अहम कदम है। सरकार ने कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेश का पालन किया है और पुरानी दोषपूर्ण ओबीसी सूची को रद्द कर दिया है।
पूर्व की टीएमसी सरकार ने जो ओबीसी आरक्षण बढ़ा कर 17 फीसदी किया था, जिसे अब पहले की तरह 7 फीसदी कर दिया गया है। साथ ही बगैर सर्वे के ओबीसी श्रेणी में शामिल किए गए जातियों को हटा दिया है।
बंगाल के आमूलचूल परिवर्तन में ये बिल अहम भूमिका निभाएगा। दरअसल ओबीसी के तहत मुस्लिम जातियों को शामिल कर वोट बैंक बनाने की नीति के दम पर ममता बनर्जी चुनाव दर चुनाव जीतती रहीं। संविधान में धर्म आधारित आरक्षण की व्यवस्था नहीं होने के बावजूद मुस्लिमों को जातियों के नाम पर आरक्षण दिया गया। अब शुभेंदु सरकार ने इस आरक्षण को खत्म कर और कोलकता हाईकोर्ट के आदेश को संशोधन बिल में शामिल कर राज्य में आरक्षण के नए ढाँचे के निर्माण का रास्ता बना दिया है।
गुजरात हाई कोर्ट (HC) में एक ऐसा मामला सामने आया जिसमें एक युवक को यह साबित करने के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा कि वह किसी महिला का पति है ही नहीं, जबकि उस महिला के पास एक विवाह प्रमाणपत्र मौजूद था। जस्टिस इलेश जे वोरा और जस्टिस आरटी वच्छानी की बेंच ने इस मामले की सुनवाई करते हुए ऐसा फैसला सुनाया जो हिंदू विवाह अधिनियम की मूल भावना को बहुत साफ शब्दों में समझाता है।
पूरा मामला शुरू होता है कौशल प्रमोदभाई सोनार नाम के एक युवक से, जो पढ़ाई और नौकरी के सिलसिले में ब्रिटेन में रहते हैं। उनके सामने एक दिन ऐसी परिस्थिति आई जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। खुशी संजय शाह नाम की महिला, जो अहमदाबाद में रहती है, अचानक कौशल के माता-पति के पास पहुँची और एक विवाद प्रमाणपत्र दिखाकर यह दावा किया कि वह कौशल की कानूनी रूप से पत्नी है। कौशल के लिए यह खबर किसी झटके से कम नहीं थी क्योंकि उन्होंने न तो कभी इस महिला से कोई विवाह किया था, न कोई हिंदू रीति रिवाज या फेरे लिए थे और न ही कभी पति-पत्नी की तरह साथ रहे।
कौशल ने कोर्ट को बताया कि वह पहले खुशी के पिता की कंपनी में नौकरी करते थे और वहीं उनसे उनका हस्ताक्षर धोखे से करवाया गया। कौशल का आरोप था कि उन्हें प्रमोशन का लालच देकर या नौकरी से निकाल देने की धमकी देकर, बिना उनकी मर्जी के, कुछ विवाह से जुड़े कागजों पर हस्ताक्षर करवा लिए गए। यानी उनकी सहमति के बिना ही उनके हस्ताक्षर लेकर एक ऐसा दस्तावेज तैयार कर लिया गया जो आगे चलकर विवाह प्रमाणपत्र में बदल गया।
कौशल की फैमिली कोर्ट में याचिका हुई खारिज
इसके बाद कौशल ने हिंदू अधिनियम की धारा 5, 7 और 12 के तहत अहमादाबाद के फैमिली कोर्ट में एक याचिका दाखिल की, जिसमें उन्होंने यह घोषणा माँगी कि दोनों के बीच की तथाकथित शादी शुरू से ही अवैध और शून्य मानी जाए। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि खुद खुशी ने फैमिली कोर्ट में दिए गए अपने लिखित बयान में यह साफ-साफ मान लिया कि दोनों के बीच कोई रीति-रिवाज या रस्में हुई ही नहीं थीं और कोई भी वैध विवाह संपन्न नहीं हुआ था।
उसने यह भी कबूल किया कि दोनों के बीच पति-पत्नी जैसा कोई संबंध नहीं है। इस स्वीकृति के आधार पर कौशल ने कोर्ट में एक आवेदन दिया की इसी स्वीकृति के आधार पर फैसला सुना दिया जाए, जिससे पूरी सुनवाई की जरूरत ही न पड़े।
लेकिन फैमिली कोर्ट ने 13 नवंबर 2025 के अपने आदेश में यह कहते हुए इस आवेदन को खारिज कर दिया कि पंजीकृत विवाह प्रमाणपत्र होने से एक वैध विवाह की धारणा बनती है और इसीलिए पूरे मामले की विस्तार से सुनवाई जरूरी है। इसी के साथ पूरी याचिका भी खारिज कर दी गई। इस आदेश से निराश होकर कौशल ने हाई कोर्ट का रुख किया।
कौशल ने हाई कोर्ट में ‘केवल प्रमाणपत्र से विवाह वैध नहीं होने’ की दी दलील
कौशल के वकील राहिल पी जैन ने हाई कोर्ट में दलील दी कि जब खुद पत्नी ने ही अपने लिखित बयान में साफतौर से यह मान लिया है कि कोई भी रीति रिवाज हुए ही नहीं और कोई वैध विवाह संपन्न ही नहीं हुआ तो फिर लंबी सुनवाई कराने की कोई जरूरत ही नहीं बनती। उनका कहना था कि जब जरूरी रस्में हुई ही न हों और खुद दूसरे पक्ष ने यह बात लिखित रूप में स्वीकार कर ली हो तो केवल विवाह प्रमाणपत्र का होना किसी विवाह को वैध नहीं बना देता।
वहीं खुशी की तरफ से वकील अनुराग आर राठौर ने भी कोर्ट में यह स्वीकार किया कि पंजीकरण के अलावा यह साबित करने के लिए कोई और पु्ख्ता रिकॉर्ड पर नहीं है कि विवाह वास्तव में संपन्न हुआ था। उन्होंने कोर्ट से उचित आदेश पारित करने का अनुरोध किया।
हाई कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम के धारा 7 और 8 के हवाले से सुनाया फैसला
हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद अपना फैसला सुनाया। फैसले में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 7 का विस्तार से जिक्र किया। कोर्ट ने कहा कि इस धारा के अनुसार हिंदू विवाह उन प्रथागत रीति रिवाजों के अनुसार संपन्न किया जा सकता है जो किसी भी पक्ष में प्रचलित हों और जहाँ इन रीति रिवाजों में ‘सप्तपदी’ शामिल हो यानी पवित्र अग्नि के सामने वर-वधू का सात फेरे लेना, वहाँ विवाह सातवाँ फेरा पूरा होते ही विवाह संपन्न और कानूनी रूप से वैध माना जाता है।
कोर्ट ने यह भी कहा, “जब तक विवाह आवश्यक प्रधागत रीति-रिवाजों के साथ संपन्न नहीं किया जाता, तब तक इसे अधिनियम के तहत संपन्न विवाह नहीं माना जा सकता।”
इसके साथ ही कोर्ट ने धारा 8 की भी व्याख्या की, जो विवाह के पंजीकरण से जुड़ी है। बेंच ने साफ कहा कि पंजीकरण का उद्देश्य केवल यह होता है कि पहले से वैध रूप से संपन्न हुए विवाह का सबूत आसानी से मिल सके। पंजीकरण अपने आप में किसी विवाह को वैध नहीं बना सकता, अगर धारा 7 के तहत आवश्यक रस्में पहले से पूरी नहीं हुई हों। यानी अगर वास्तव में विवाह हुआ ही नहीं है, तो कोई भी पंजीकरण या प्रमाणपत्र दोनों पक्षों को पति-पत्नी का कानूनी दर्जा नहीं दे सकता।
कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि फैमिली कोर्ट ने एक बड़ी चूक की, क्योंकि उसने यह जाँचे बिना ही कि विवाह वास्तव में संपन्न भी हुआ था या नहीं, सीधे यह मान लिया कि पंजीकरण से ऐसी धारणा बन जाती है जिसे केवल पूरी सुनवाई से ही तोड़ा जा सकता है। बेंच ने कहा, “जब उत्तरदाता ने खुद यह स्वीकार कर लिया है कि आवश्यक विवाह रस्में कभी संपन्न नहीं हुईं, तो पक्षों को लंबी और थकाऊ सुनवाई में डालने का कोई औचित्य या उपयोगी उद्देश्य नहीं रह जाता।”
हाई कोर्ट ने फैसले में हिंदू विवाह के महत्व पर डाली नजर
फैसले में हाई कोर्ट ने हिंदू विवाह के सामाजिक और आध्यात्मिक महत्व पर भी विस्तार से टिप्पणी की। बेंच ने ऋग्वेद का हवाला देते हुए सप्तपदी की रस्म का उल्लेख किया, जिसमें सातवाँ फेरा पूरा होने के बाद वर-वधू से कहता है कि सात फेरों के साथ हम मित्र बन गए हैं और यह मित्रता कभी न टूटे।
कोर्ट ने कहा कि हिंदू परंपरा में पत्नी को अर्धांगिनी माना जाता है, यानी पति का आधा हिस्सा, लेकिन साथ ही उसे अपनी अलग पहचान वाली और विवाह में बराबरी की भागीदार भी माना जाता है। हिंदू कानून के अनुसार विवाह एक संस्कार है और यह किसी नए परिवार की नींव रखता है।
बेंच ने अपने फैसले में युवाओं को एक तरह से सीख भी दी। कोर्ट ने कहा, “विवाह केवल गीत संगीत या खान पान का अवसर नहीं है, विवाह कोई व्यापारिक सौदा नहीं है।” कोर्ट ने कहा कि विवाह एक गंभीर और बुनियादी कायक्रम है जिसके माध्यम से एक पुरुष और महिला भविष्य में परिवार बनाने के उद्देश्य से पति-पत्नी के संबंध में बंधते हैं, और परिवार ही भारतीय समाज की सबसे बुनियादी इकाई है।
कोर्ट ने कहा कि विवाह इसलिए पवित्र माना जाता है क्योंकि यह दो व्यक्तियों के बीच एक जीवनभर चलने वाला, सम्मानजनक, बराबरी वाला और सहमति से बना स्वस्थ संबंध बनाता है और इसे मोक्ष प्राप्ति से जुड़ा हुआ अवसर भी माना जाता है, खासकर जब निर्धारित रीति-रिवाज पूरी विधि से संपन्न किए जाएँ।
लेकिन मौजूदा मामले में जब खुशी ने ही अपने लिखित बयान में मान लिया कि कोई रस्में हुई ही नहीं और कोई वैध विवाह संपन्न ही नहीं हुआ, तो कोर्ट ने कहा कि हिंदू विवाह को जो आध्यात्मिक, सामाजिक और कानूनी दर्ज मिलता है, वह इस मामले में कभी अस्तित्व में आया ही नहीं। इसलिए दोनों के बीच का संबंध कभी भी पति-पत्नी का कानूनी दर्जा हासिल नहीं कर पाया।
इन सभी बातों का ध्यान रखते हुए आखिर में हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के 13 नवंबर 2025 के आदेश को रद्द करते हुए अपील स्वीकार कर ली। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि कौशल और खुशी के बीच की कथित शादी शुरू से ही ‘शून्य और अमान्य’ घोषित की जाती है, क्योंकि इस तथाकथित विवाह से कोई भी अधिकार या दायित्व उत्पन्न नहीं होता। साथ ही कोर्ट ने कौशल को यह आजादी भी दी कि वह विवाह पंजीकरण और विवाह प्रमाणपत्र को रद्द करवाने के लिए संबंधित प्राधिकरण के समक्ष उचित कदम उठा सकते हैं।
क्या है सप्तपदी? जिसने कौशल की नैया पार लगाई
इस पूरे मामले का फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम में शामिल सप्तपदी का जिक्र किया, उसे समझना भी उतना ही जरूरी है क्योंकि यही वह रस्म है जो कौशल के बचाव में आकर उसके हित में फैसला सुनाने को कोर्ट को मजबूर किया। दरअसल सप्तपदी हिंदू विवाह की सबसे महत्वपूर्ण रस्मों में से एक मानी जाती है और इसे विवाह के संपन्न होने का आधार माना गया है। यह असल में पवित्र अग्नि के चारों ओर सात फेरे लगाने की प्रक्रिया है और इन सातों फेरों को सात ऐसे वचनों का प्रतीक माना जाता है जो वर और वधू आपस में एक दूसरे को देते हैं।
इस रस्म में वर और वधू को अग्नि के सामने खड़ा किया जाता है। वर-वधू के दाहिने हाथ को अपने बाएँ हाथ में पकड़ता है और फिर दोनों एक दूसरे के सामने खड़े होकर अग्नि के चारों ओर सात फेरे लगाते हैं। हर एक फेरे के दौरान वर और वधू एक दूसरे को एक वचन देते हैं और सातवें फेरे के बाद दोनों अग्नि के चारों ओर साथ खड़े हो जाते हैं, जिसके साथ ही विवाह पूर्ण माना जाता है।
सप्तपदी के सात वचन
पहला वचन: मैं तुम्हें अपना पति/पत्नी मानता/मानती हूँ। दूसरा वचन: मैं तुम्हें अपना जीवनसाथी मानता/मानती हूँ। तीसरा वचन: मैं तुम्हारी खुशी के लिए जीने का वादा करता/करती हूँ। चौथा वचन: मैं तुम्हारी इच्छाओं का सम्मान करने का वादा करता/करती हूँ। पाँचवाँ वचन: मैं तुम्हारी रक्षा करने का वादा करता/करती हूँ। छठा वचन: मैं तुम्हें अपना जीवन भर प्यार करने का वादा करता/करती हूँ। सातवाँ वचन: मैं तुम्हारे साथ बुरे और अच्छे समय में रहने का वादा करता/करती हूँ।
निष्कर्ष: कोर्ट ने इसी सप्तपदी के आधार पर सुनाया फैसला
यही वजह है कि सप्तपदी को केवल एक रस्म नहीं बल्कि हिंदू विवाह की आत्मा माना जाता है। यह वह क्षण होता है जब वर और वधू अपने वचनों को दोहराते हुए यह प्रतिबद्धता जताते हैं कि वे अपना पूरा जीवन एक साथ बिताएँगे। कोर्ट ने अपने फैसले में इसी बात पर जोर दिया कि जब तक यह रस्म और इसके जैसी अन्य प्रथागत रीति रिवाज पूरी विधि से संपन्न नहीं होतीं, तब तक हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 7 के तहत विवाह को संपन्न विवाह नहीं माना जा सकता।
यही कारण था कि बेंच ने ऋग्वेद का हवाला देते हुए यह भी बताया कि सातवाँ फेरा पूरा होने के बाद वर वधू से कहता है कि सात फेरों के साथ हम मित्र बन गए हैं और यह मित्रता कभी न टूटे। कोर्ट ने इसी बुनियाद पर यह स्पष्ट किया कि मौजूदा मामले में जब खुद खुशी ने ही मान लिया कि कोई रस्में हुई ही नहीं, तो सप्तपदी जैसी कोई भी अनिवार्य प्रक्रिया कभी संपन्न ही नहीं हुई, और इसीलिए दोनों के बीच कानूनन कोई वैध विवाह अस्तित्व में आया ही नहीं। यही वह कड़ी थी जिसने आखिरकार कौशल के पक्ष में फैसला जाने का रास्ता साफ किया।
चीन का एक भगोड़ा अरबपति गुओ वेनगुई (जिसे हो वान क्वोक, गुओ माइल्स, माइल्स क्वोक और “ब्रदर सेवन” जैसे कई नामों से जाना जाता है) कई सालों तक पश्चिमी मीडिया के बीच एक नायक और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) के विरोधी बागी के रूप में ऐश की जिंदगी जी रहा था। गुओ वेनगुई ने पश्चिम में इस दावे के दम पर अपने लाखों समर्थक बना लिए थे कि ‘चीनी सरकार मेरे पीछे पड़ी है’। लेकिन आखिरकार अमेरिकी फेडरल कोर्ट ने उसे अपने ही समर्थकों से 1 अरब डॉलर (करीब 83 अरब रुपए) से ज्यादा की धोखाधड़ी का दोषी पाया। 29 जून 2026 को फेडरल कोर्ट ने गुओ वेनगुई को 30 साल जेल की सजा सुनाई।
धोखाधड़ी के आरोप और गुओ वेनगुई का चीन से पलायन
गुओ वेनगुई चीन में एक रियल एस्टेट डेवलपर (जमीन-जायदाद के कारोबारी) के रूप में उभरा था। खबरों के मुताबिक, 2014 की हुन चीन के अमीरों की लिस्ट में वह 74वें नंबर पर था और उसकी संपत्ति लगभग 2.6 अरब डॉलर आँकी गई थी। जब चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़ा अभियान शुरू किया, तो वेनगुई चीन छोड़कर भाग गया।
इस अभियान में वेनगुई के साथी, जिनमें पूर्व खुफिया अधिकारी मा जियान भी शामिल थे, निशाने पर आए। गुओ वेनगुई उर्फ गुओ माइल्स ने चीनी अधिकारियों की इस कार्रवाई को एक राजनीतिक साजिश बताया। उसने दावा किया कि चीनी सरकार के बड़े भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करने के कारण उसे निशाना बनाया जा रहा है।
भागने के शुरुआती सालों में चीनी अधिकारियों ने उसे भगोड़ा घोषित कर दिया और उसके खिलाफ इंटरपोल नोटिस भी जारी कराया। चीन सरकार ने उस पर रिश्वतखोरी, मनी लॉन्ड्रिंग, अपनी पूर्व सहायक के साथ बलात्कार, अपहरण और अन्य गंभीर अपराधों के आरोप लगाए थे।
हांगकांग समेत कई जगहों पर वेनगुई की संपत्तियाँ सील कर दी गईं। चीन ने अमेरिका से इस जालसाज को वापस सौंपने की माँग भी की थी।
चीन में धोखेबाज, पश्चिम में बागी: बिकाऊ मीडिया की मदद से कैसे बनाई ‘एक्टिविस्ट’ की छवि
खुद को देश से बाहर रखने के दौरान गुओ वेनगुई ने चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के एक बड़े आलोचक के रूप में खुद को नए सिरे से पेश किया। वेनगुई ने अमेरिका सरकार की फंडिंग से चलने वाले वॉयस ऑफ अमेरिका (VoA), बीबीसी, न्यूयॉर्क टाइम्स, फाइनेंशियल टाइम्स और फोर्ब्स सहित कई बड़े पश्चिमी मीडिया घरानों को इंटरव्यू दिए। वह कई ऑडियो पॉडकास्ट में भी शामिल हुआ।
अमेरिकी मीडिया एक्जीक्यूटिव, इन्वेस्टमेंट बैंकर और व्हाइट हाउस के पूर्व रणनीतिकार स्टीव बैनन के साथ मिलकर गुओ वेनगुई ने ‘जीटीवी’ (GTV) नाम की एक मीडिया कंपनी बनाई।
साल 2018 में, स्टीव बैनन और गुओ वेनगुई ने चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का विरोध करने के लिए एक गैर-लाभकारी संस्था (NGO) की स्थापना की, जिसका नाम उसने ‘रूल ऑफ लॉ सोसाइटी’ (Rule of Law Society) रखा। शुरुआत में इस संस्था को गुओ वेनगुई की तरफ से 100 मिलियन डॉलर देने का वादा किया गया था।
हालाँकि जब इस संस्था के पैसों की जाँच शुरू हुई और दस्तावेज देने से इनकार किया गया, तो स्टीव बैनन ने 2021 में ‘रूल ऑफ लॉ सोसाइटी’ के बोर्ड से इस्तीफा दे दिया।
इस जोड़ी ने साल 2020 में एक लग्जरी नाव (याट) से ‘न्यू फेडरल स्टेट ऑफ चाइना’ की घोषणा की और गुओ ने दावा किया कि वह चीनी कम्युनिस्ट पार्टी को उखाड़ फेंकेगा। गुओ के मीडिया वेंचर्स पर कोविड की शुरुआत और अमेरिकी राजनीति को लेकर झूठी खबरें फैलाने के आरोप भी लगे और आलोचना हुई।
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी को निशाना बनाने वाले अपने इस ‘एक्टिविज्म’ और मीडिया इंटरव्यूज के जरिए गुओ वेनगुई ने विदेशों में रहने वाले चीनियों और कम्युनिस्ट पार्टी के विरोधियों के बीच अपने कट्टर समर्थक तैयार कर लिए। वेनगुई ने अपने इस फर्जी एक्टिविज्म को ‘लोकतंत्र और चीनी तानाशाही के खिलाफ एक धर्मयुद्ध’ के रूप में पेश किया।
जनवरी 2025 में इस 1 अरब डॉलर के घोटाले में भूमिका के लिए गुओ की सहयोगी यवेट वांग को भी 10 साल जेल की सजा सुनाई गई थी।
अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते तनाव के दौरान, पश्चिमी मीडिया और मशहूर हस्तियों ने गुओ वेनगुई को एक हीरो की तरह पेश किया। आखिरकार अमेरिकी प्रोपेगैंडा को मजबूत करने के लिए ‘चीनी सरकार की प्रताड़ना’ का शिकार बने एक चीनी अरबपति से बेहतर और क्या हो सकता था। अमेरिका में गुओ के आगे बढ़ने की वजह चीन विरोधी आवाजों को मिलने वाला खुला समर्थन था, शायद इसी वजह से शुरुआत में उसके पुराने रिकॉर्ड की जांच नहीं की गई।
चूँकि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी विरोधियों की आवाज दबाने के लिए जानी जाती है, इसलिए पश्चिम के लोगों को वेनगुई की मनगढ़ंत कहानी बिल्कुल सच लगी।
गुओ वेनगुई उर्फ माइल्स गुओ ने हजारों फॉलोअर्स को कैसे ठगा, अमेरिकी अधिकारियों ने किया खुलासा
गुओ वेनगुई को मार्च 2023 में अमेरिकी न्याय विभाग ने इंटरनेट पर अपने हजारों फॉलोअर्स से 1 अरब डॉलर की ठगी करने की बड़ी साजिश के आरोप में गिरफ्तार किया था। यह धोखाधड़ी जीटीवी (GTV) के प्राइवेट शेयर, लोन, जी|क्लब्स (G|CLUBS) की मेंबरशिप, हिमालय फार्म और ‘हिमालय कॉइन/एक्सचेंज’ नाम की क्रिप्टोकरेंसी के जरिए की गई थी।
सरकारी वकीलों ने आरोप लगाया कि गुओ वेनगुई उर्फ माइल्स गुओ ने अपने चीन विरोधी ‘आंदोलन’ से जुड़े निवेशों पर भारी मुनाफे का वादा किया था। इसके बाद उसने इन पैसों में से करोड़ों डॉलर अपनी निजी विलासिता पर उड़ा दिए। उसने 50,000 वर्ग फुट का एक महल जैसा बंगला, एक फेरारी, 4.4 मिलियन डॉलर की बुगाटी स्पोर्ट्स कार, 37 मिलियन डॉलर की एक लग्जरी नाव (याट) और बेहद महँगे गद्दे खरीदे।
गुओ ने लंदन में रहने वाले अपने बिजनेस पार्टनर किम मिंग जे के साथ मिलकर हेज फंड में निवेश किया, 10 लाख डॉलर के कालीन और 1,40,000 डॉलर का पियानो खरीदने जैसी फिजूलखर्ची की।
अमेरिकी अधिकारियों ने इसे ‘अफ़िनिटी फ्रॉड’ (भरोसे की धोखाधड़ी) कहा, क्योंकि गुओ ने अपनी चीन विरोधी छवि का इस्तेमाल करके अपने फॉलोअर्स के भरोसे का गलत फायदा उठाया था।
गुओ की हरकतों की जाँच से पता चला कि उसने चुराए गए करोड़ों डॉलर की मनी लॉन्ड्रिंग की ताकि अपनी इस अवैध साजिश को छुपा सके और धोखाधड़ी का धंधा चालू रख सके।
साल 2021 में माइल्स गुओ उर्फ हान वो क्वोक ने अवैध रूप से फंड जुटाने के एक मामले में सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन (SEC) के साथ 539 मिलियन डॉलर का समझौता किया था।
जुलाई 2024 में गुओ को जालसाजी की साजिश, ऑनलाइन धोखाधड़ी, सिक्योरिटीज धोखाधड़ी और मनी लॉन्ड्रिंग समेत 12 में से 9 मामलों में दोषी ठहराया गया।
आखिरकार 29 जून 2026 को गुओ वेनगुई उर्फ हान वो क्वोक को 30 साल जेल की सजा सुनाई गई और 889 मिलियन डॉलर जब्त करने का आदेश दिया गया। फैसला सुनाते समय फेडरल जज ने कहा कि गुओ वेनगुई ने उन लोगों को अपना शिकार बनाया जो चीन में लोकतंत्र चाहते थे।
मुकदमे के दौरान भी गुओ वेनगुई खुद को पीड़ित बताता रहा और उसके बचे हुए समर्थकों का दावा है कि अमेरिकी आरोप चीनी सरकार के इशारे पर लगाए गए हैं ताकि उसकी आवाज दबाई जा सके। हालाँकि वकीलों ने गुओ के इन दावों को खारिज करते हुए कहा कि उनके द्वारा पेश किए गए सबूत उसके फॉलोअर्स के साथ की गई वित्तीय धोखाधड़ी से जुड़े हैं, न कि किसी मनगढ़ंत राजनीतिक आरोपों से।
गुओ वेनगुई चीन में अपने कथित घोटाले की कानूनी आँच से बचकर अमेरिका भागा, पश्चिमी मीडिया की मदद से खुद को हीरो साबित करने की कहानी रची, प्रताड़ना का रोना रोया, अपनी इस ‘हीरो’ वाली कहानी को बेचकर पैसे कमाए, लोगों का ध्यान और फॉलोअर्स खींचे, और फिर उसी मंच और फॉलोअर्स के भरोसे का इस्तेमाल एक बहुत बड़े घोटाले के लिए किया।
यह याद रखना भी दिलचस्प है कि गुओ वेनगुई ने अगस्त 2019 में भविष्यवाणी की थी कि अलीबाबा के संस्थापक जैक मा या तो जेल जाएँगे या मारे जाएँगे, क्योंकि चीनी सरकार जैक मा के ‘एएनटी ग्रुप’ (ANT Group) को ‘वापस लेना यानी हड़पना’ चाहती है।
झूठी प्रताड़ना की कहानी गढ़ना, विदेश में नापसंद की जाने वाली सरकार या विचारधारा पर हमला करके फॉलोअर्स जुटाना, लोगों को ठगना और जब जवाबदेही की बारी आए तो किसी तानाशाह या फासीवादी शासन द्वारा ‘राजनीति से प्रेरित प्रताड़ना’ का रोना रोना—गुओ वेनगुई का यह मामला वॉशिंगटन पोस्ट की कॉलमनिस्ट राणा अय्यूब की याद दिलाता है।
राणा अय्यूब: भारत की गुओ वेनगुई?
राणा अय्यूब को 2016 में खुद से प्रकाशित की गई किताब ‘गुजरात फाइल्स: एनाटॉमी ऑफ ए कवर-अप’ से काफी चर्चा मिली थी। उनका दावा था कि यह किताब 2010 में गुजरात के अधिकारियों की की गई अंडरकवर रिकॉर्डिंग्स पर आधारित है, जिसमें उन्होंने 2002 के गोधरा दंगों के बाद मामलों को दबाने और एनकाउंटर की बात ‘कबूल’ की थी।
अय्यूब की तत्कालीन कंपनी ‘तहलका’ ने कहानी अधूरी होने और अन्य संपादकीय कमियों का हवाला देते हुए इसे छापने से मना कर दिया था। हालाँकि वरिष्ठ पत्रकार मधु त्रेहान ने खुलासा किया था कि उन्होंने तहलका के मंच पर इन टेपों को चलाने का ऑफर दिया था, लेकिन राणा अय्यूब ने मना कर दिया था।
इस पत्रकार ने दंगों के इर्द-गिर्द अपनी पक्षपातपूर्ण और बेतुकी पत्रकारिता के जरिए खुद को ‘हिंदुत्ववादियों के अत्याचार के खिलाफ एक निडर आवाज’ के रूप में स्थापित कर लिया।
नरेंद्र मोदी के खिलाफ लंबे समय से एजेंडा चला रहीं राणा अय्यूब को तब बड़ा झटका लगा जब सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात दंगों पर लिखी उनकी इस तथाकथित ‘खोजी’ किताब को कूड़ेदान में डाल दिया।
अय्यूब की किताब में एक इशारा यह भी था कि गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के पूर्व गृह मंत्री हरेन पंड्या की हत्या की साजिश रची थी, जिनकी 26 मार्च 2003 को अहमदाबाद में मॉर्निंग वॉक के दौरान गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।
निचली अदालत ने हरेन पंड्या की हत्या में मुख्य आरोपी असगर अली समेत 12 मुस्लिम पुरुषों को दोषी पाया था। सीबीआई जाँच के मुताबिक, यह हत्या गुजरात दंगों का बदला लेने के लिए मुफ्ती सूफियान नाम के एक मुस्लिम मौलवी के इशारे पर की गई थी।
गुजरात हाईकोर्ट ने सीबीआई की ‘खराब जाँच’ का हवाला देते हुए इन लोगों को हत्या के आरोपों से बरी कर दिया था, लेकिन आपराधिक साजिश और हत्या के प्रयास के आरोप बरकरार रखे थे।
सीबीआई ने हाईकोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जिसने आखिरकार निचली अदालत के मूल फैसले को सही ठहराया।
अय्यूब के ‘मुस्लिम विक्टिमहुड’ (मुसलमानों को पीड़ित दिखाने) के एजेंडे को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी कार्यवाही में राणा अय्यूब की किताब ‘गुजरात फाइल्स’ पर विचार करने से साफ इनकार कर दिया। अदालत ने इस किताब को फटकारते हुए कहा कि यह सिर्फ अनुमानों, अटकलों और कयासों पर आधारित है।
असल में राणा अय्यूब की किताब के दावे इतने संदिग्ध हैं कि धुर-वामपंथी (लेफ्ट विंग) पब्लिकेशंस ने भी इसे छापने से मना कर दिया था, जिसके बाद आखिरकार अय्यूब को इसे खुद ही पब्लिश करना पड़ा। यह किताब एक कथित स्टिंग ऑपरेशन पर आधारित थी, लेकिन उन्होंने कभी भी इसके वीडियो जारी नहीं किए।
अपनी इस तथाकथित प्रसिद्धि के बाद से, राणा अय्यूब लगातार विदेशी वामपंथी मीडिया आउटलेट्स और सोशल मीडिया के जरिए भारत विरोधी और हिंदू विरोधी दुष्प्रचार में लगी रही हैं। सीएए विरोधी शाहीन बाग प्रदर्शन, 2020 के दिल्ली दंगे, कोविड महामारी के दौरान सरकार विरोधी दुष्प्रचार, हर मुद्दे में मुस्लिम उत्पीड़न का एंगल घुसाना, ‘भारतीय सेना कश्मीरी लड़कों को प्रताड़ित कर रही है’ जैसे झूठ फैलाना, 2015 में रानाघाट में एक नन के साथ हुए बलात्कार के लिए आरएसएस और ‘हिंदू आतंकवादियों’ को जिम्मेदार ठहराना राणा अय्यूब की ‘पत्रकारिता’ हमेशा एजेंडा और भाजपा-आरएसएस के विरोध पर टिकी रही है।
उनके इस दुष्प्रचार ने उन्हें वामपंथी और कुछ खास विचारधारा वाले हलकों में लोकप्रिय बना दिया। लेकिन जो बात राणा अय्यूब को गुओ वेनगुई के जैसा बनाती है, वह है कोविड के नाम पर चंदा जुटाने का कथित घोटाला, जिसे अंजाम देने का उन पर आरोप है।
जब भारत कोविड महामारी से जूझ रहा था, तब राणा अय्यूब ने ‘केटो’ (Ketto) प्लेटफॉर्म पर 3 क्राउडफंडिंग अभियानों के जरिए ₹2,69,50,695 की भारी-भरकम रकम जुटाई थी।
राणा को मिले हुए ₹2.69 करोड़ में से लगभग ₹80,49,856 विदेशी मुद्रा में प्राप्त हुए थे, जो फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट (FCRA) 2010 का सीधा उल्लंघन था।
दिलचस्प बात यह है कि राणा अय्यूब ने कोविड राहत कार्य के लिए मिलने वाले इस चंदे को अपने पिता मोहम्मद अय्यूब शेख के बैंक खाते में ₹1.60 करोड़ और अपनी बहन इफ्फत शेख के खाते में ₹37.15 लाख ट्रांसफर करवाए।
इसके बाद राणा अय्यूब ने अपने पिता के खाते से ₹84.40 लाख और अपनी बहन के खाते से ₹36.40 लाख अपने निजी बैंक खाते में ट्रांसफर कर लिए। कुल मिलाकर करीब ₹1,20,80,000 राणा अय्यूब के निजी खाते में भेजे गए।
हैरानी की बात यह है कि अप्रैल 2022 में उन्होंने इतनी बड़ी रकम के हेरफेर को ‘महज 20,000 डॉलर की छोटी सी रकम’ कहकर टालने की कोशिश की, जबकि असल में यह रकम ₹2.69 करोड़ (लगभग $3,14,500) थी।
जुलाई 2025 के अपने आदेश में इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल (ITAT) ने साफ कहा कि चंदे के तौर पर जुटाए गए पैसों में से करीब ₹2.4 करोड़ का अभियान के एक साल बाद भी कोई इस्तेमाल नहीं किया गया था।
अदालत ने कहा, “जिस खाते से करदाता या उसके परिवार के सदस्यों द्वारा पैसे निकाले गए, वह एक पर्सनल सेविंग अकाउंट (निजी बचत खाता) था। इसके अलावा, कोई राहत कार्य करने के बजाय, करदाता ने एक नया करंट अकाउंट खोला और अपने नाम पर फिक्स डिपॉजिट (FD) कर लिया और उसी सेविंग अकाउंट से अपने निजी खर्चे भी किए जिसमें चंदे का पैसा आया था।”
अय्यूब ने आयकर विभाग के सामने दावा किया था कि ₹2.69 करोड़ में से एक ‘छोटा हिस्सा (₹28 लाख)’ प्रवासी मजदूरों को घर भेजने, राशन खरीदने, इलाज, परिवहन और पश्चिम बंगाल के बाढ़ पीड़ितों के लिए तिरपाल खरीदने में खर्च किया गया था।
उन्होंने ₹19 लाख अपने ‘निजी खर्चों’ को पूरा करने में उड़ा दिए। यह भी सामने आया कि इस विवादित ‘पत्रकार’ ने कोविड राहत कार्य के लिए मिले पैसों में से ₹50 लाख की अपने नाम पर पर्सनल फिक्स डिपॉजिट (FD) करवा ली थी।
आयकर विभाग ने सवाल उठाया कि अगर अय्यूब की कोई गलत नीयत नहीं थी, तो उन्होंने अपने निजी नाम पर ₹50,00,000 की एफडी रसीदें क्यों खरीदीं?
जाँच में पता चला कि केटो पर पहले अभियान के जरिए राणा अय्यूब को मिले ₹1.23 करोड़ में से राहत कार्य के लिए सिर्फ ₹18 लाख का इस्तेमाल किया गया था। अपने बचाव में अय्यूब ने दावा किया कि बचे हुए पैसे ‘अस्पताल बनाने के लिए रिजर्व’ रखे गए थे।
इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल ने यह भी पाया कि राणा अय्यूब ने एफसीआरए (FCRA) 2010 का उल्लंघन किया है, क्योंकि वॉशिंगटन पोस्ट की यह ‘पत्रकार’ एफसीआरए की धारा 3(1)(h) के तहत विदेशी चंदा पाने की हकदार ही नहीं है।
अय्यूब ने समर्थकों, झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों और किसानों से कोविड राहत के नाम पर चैरिटी के लिए पैसे जुटाए, लेकिन चैरिटी के लिए इन पैसों के इस्तेमाल का कोई सबूत नहीं मिला। इस विवादित ‘पत्रकार’ ने दान का पैसा अपने रिश्तेदारों के बैंक खातों में जमा कराया और कथित सामाजिक कार्यों के लिए कोई अलग खाता तक नहीं रखा।
इससे पहले, फरवरी 2022 में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने अय्यूब की ₹1.77 करोड़ की संपत्ति कुर्क की थी। वह जाहिर तौर पर अपने ऊपर लगे आरोपों से इनकार करती हैं और इसे अपनी आवाज दबाने के लिए राजनीति से प्रेरित उत्पीड़न बताती हैं।
चूंकि राणा अय्यूब की पत्रकारिता के नाम पर किए जाने वाले इस एक्टिविज्म और चंदे की धोखाधड़ी के आरोपों के कारण पश्चिमी वामपंथी मीडिया आउटलेट्स ने भी उनसे दूरी बना ली, फिर भी उन्हें विदेशी वामपंथी और कुछ राजनीतिक हलकों में नियोक्ता और समर्थक मिल गए, जो वैचारिक रूप से मोदी सरकार के विरोधी हैं।
अय्यूब को कई ‘प्रेस फ्रीडम अवॉर्ड’ मिले हैं और उन्हें ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’, ‘सिटीजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस’, ‘एमनेस्टी’ और संयुक्त राष्ट्र (UN) के दूतों जैसे संगठनों का समर्थन मिला है।
ठीक गुओ वेनगुई की तरह राणा अय्यूब को भी पश्चिम में सरकारों के खिलाफ खड़े होने वाले एक ‘निडर बागी’ के रूप में सराहा गया। उन्होंने भी रोना रोया कि ‘सच बोलने की वजह से सरकार मुझे प्रताड़ित कर रही है’। हालाँकि देर-सवेर असली सच्चाई सामने आ ही जाती है।
(ये रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
भारत से नफरत करने के अलावा पाकिस्तान को अब एक नया चस्का लग गया है। वह प्राचीन भारत के इतिहास को अपना बताने में जुट गया है। यह वही इतिहास है जो पूरी तरह से हिंदू धर्म और संस्कृति से जुड़ा हुआ है। हैरानी की बात यह है कि पाकिस्तान का जन्म ही इस्लाम से पहले के इतिहास (यानी हिंदू अतीत) को पूरी तरह नकारने के आधार पर हुआ था।
लेकिन अब वही पाकिस्तानी सरकार अपने फायदे के लिए उसी अतीत को जबरन अपनाने की कोशिश कर रही है। ऐसा करके वह दुनिया में खुद को जायज साबित करना चाहती है। वह एक ऐसा इतिहास दिखाना चाहती है, जिसका असलियत में कोई वजूद ही नहीं है।
‘तुर्की खून’ से लेकर ‘चाणक्य हमारे पूर्वज’ तक: पहचान के संकट में फँसा पाकिस्तान; अब भारतीय इतिहास पर जता रहा झूठा हक
पाकिस्तान इन दिनों अपनी पहचान के सबसे बड़े संकट से गुजर रहा है। दशकों तक पाकिस्तानी खुद को अरब, तुर्क, फारसी या मध्य एशियाई देशों के वंशज बताते रहे। वे खुद को विदेशी और ‘शुद्ध’ मुस्लिम दिखाने की कोशिश करते थे।
साल 1977 से जनरल जिया-उल-हक का दौर शुरू हुआ। उनके शासनकाल में पाकिस्तान के इतिहास और संस्कृति को पूरी तरह बदलने का काम किया गया। जिया सरकार ने स्कूली किताबों (इस्लामियात और पाकिस्तान स्टडीज) के सिलेबस में बदलाव किए। इसका मकसद बच्चों के दिमाग में जबरन एक अरबी-इस्लामिक पहचान को बिठाना था।
असलियत यह है कि वहाँ के बहुसंख्यक मुसलमानों के पूर्वज हिंदू ही थे। लेकिन कट्टरपंथ के कारण वे अपने इसी हिंदू अतीत से नफरत करने लगे। उन्होंने उस इतिहास से अपना हर रिश्ता तोड़ने की पूरी कोशिश की। अब वही पाकिस्तान बिल्कुल अलग राग अलाप रहा है।
वह सिंधु घाटी सभ्यता, पाणिनी, चाणक्य और राजा पोरस पर अपना हक जता रहा है। वह इस पूरे इतिहास से ‘हिंदू’ शब्द को गायब कर देना चाहता है। ऐसा करके पाकिस्तान एक झूठी और बनावटी ‘प्राचीन पाकिस्तानी’ पहचान गढ़ने की हताश कोशिश कर रहा है।
पाकिस्तानी लोग सोशल मीडिया पर भी अजीबोगरीब और मजाकिया दावे कर रहे हैं। हाल ही में एक पाकिस्तानी एक्स (X) यूजर ने BBC हिंदी का एक वीडियो शेयर किया। इसमें एक पाकिस्तानी मुस्लिम प्रोफेसर संस्कृत पढ़ाते नजर आ रहे हैं। इस Video को शेयर करते हुए यूजर ने दावा कर दिया कि संस्कृत भारत की भाषा ही नहीं है। उसने लिखा कि पाणिनी ने संस्कृत को पाकिस्तान के गांधार में तैयार किया था। उसने यह बेतुका दावा भी किया कि भारतीय लोग संस्कृत और अंग्रेजी दोनों का गलत उच्चारण करते हैं।
गायत्री मंत्र न जानने वाले भी अब संस्कृत पर जता रहे हक: ‘साउथ एशिया’ के नाम पर भारत की हिंदू विरासत चुराने का नया खेल
पाकिस्तानी मुस्लिम बिना गलती किए गायत्री मंत्र का पाठ तक नहीं कर सकते। गूगल किए बिना तो उन्हें यह भी नहीं पता होगा कि यह मंत्र क्या है। इसके अलावा, इस्लाम से थोड़ा भी भटकने पर उन्हें ‘सर तन से जुदा’ होने का खौफ रहता है। लेकिन इसके बावजूद, एक पाकिस्तानी यूजर ने बड़े दुस्साहस के साथ दावा कर दिया कि संस्कृत भारत की भाषा नहीं है। उसका तर्क है कि पाणिनी ने संस्कृत को गांधार में तैयार किया था, जो अब उत्तर-पश्चिम पाकिस्तान में है।
इस तरह के दावों को देखकर किसी भी हिंदू या भारतीयों को एक साथ हँसी और गुस्सा दोनों आ सकते हैं। BBC के Video में दिख रहे प्रोफेसर डॉ राशिद शाहिद ने संस्कृत को ‘साउथ एशिया (दक्षिण एशिया) की साझी विरासत’ बताया है। भारतीय लोग अब बहुत अच्छी तरह जानते हैं कि जब भी पाकिस्तानी- चाहे वे अच्छे इरादे वाले ही क्यों न दिखें, ‘साउथ एशिया’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं, तो उसका असली मतलब क्या होता है।
साजिश बहुत सीधी है। इतिहास, संस्कृति या धर्म के लिहाज से जो कुछ भी हिंदू और भारतीय है, उस पर ‘साउथ एशिया’ का लेबल लगा दो। ऐसा करने के बाद, भारत और हिंदुओं से नफरत करने वाले पाकिस्तानी और कभी-कभी बांग्लादेशी मुस्लिम भी उस विरासत को आसानी से अपना बताकर हड़प लेते हैं।
‘पाणिनी को पाकिस्तानी’ बताने की बचकानी जिद: अष्टाध्यायी में लिखा था ‘भारत’ का नाम
पाकिस्तानी लोग आजकल प्राचीन भारत के इतिहास पर कुछ ज्यादा ही प्यार लुटा रहे हैं। लेकिन वे एक छोटी सी बात भूल जाते हैं। पाणिनी ने जब अपनी किताब ‘अष्टाध्यायी’ लिखी, उससे हजारों साल पहले ही संस्कृत में वेद लिखे जा चुके थे। शुरू में संस्कृत सिर्फ पूजा-पाठ और मंत्र बोलने की भाषा थी।
बाद में यह हिंदू धर्म और साहित्य की एक मजबूत भाषा बन गई। पाणिनी ने संस्कृत को नियम और सही ढांचा दिया, यह सच है। लेकिन सिर्फ इसलिए संस्कृत को पराया बता देना कि पाणिनी गांधार (जो अब पाकिस्तान में है) के रहने वाले थे, बिल्कुल बेवकूफी है। इंटरनेट पर एक पाकिस्तानी यूजर ने तो पाणिनी को ही पाकिस्तानी बता दिया।
पाकिस्तानी यूजर ने लिखा, “संस्कृत के सबसे महान ज्ञानी पाणिनी एक पाकिस्तानी थे। आज आप जिस संस्कृत पर इतराते हैं, उसे एक पाकिस्तानी ने ही ठीक किया था।” यह देखना वाकई मजेदार है कि जो पाकिस्तान अपने कानून के तहत किसी हिंदू को प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बनने नहीं देता, वही आज एक हिंदू ब्राह्मण पाणिनी को अपना बताने के लिए मरा जा रहा है।
वह पाणिनी के नाम से ‘हिंदू’ और ‘भारतीय’ पहचान को गायब करना चाहता है। असल में पाकिस्तान की उम्र सिर्फ 78 साल है, इसलिए वह खुद को पुराना दिखाने के लिए ऐसी अजीब हरकतें कर रहा है। पाणिनी ने अपनी किताबों में भारत के कोने-कोने का जिक्र किया है। लेकिन पाकिस्तानियों की फूटी किस्मत देखिए, पाणिनी ने अपनी किसी भी किताब में ‘पाकिस्तान’ शब्द का नाम तक नहीं लिया।
पाणिनी ने उस समय के पूरे देश को ‘भारत’ कहा था। आज भी हमारा देश इसी नाम का इस्तेमाल करता है। सच तो यह है कि ‘भारत’ शब्द का पहला लिखित सबूत ही पाणिनी की किताब ‘अष्टाध्यायी’ के एक श्लोक ‘नद्व्यचःप्राच्यभरतेषु’ (4.2.113) में मिलता है। पाणिनी ने ‘पूर्वी भारत’ और ‘उत्तरी भारत’ की बात की थी, किसी ‘पूर्वी या उत्तरी पाकिस्तान’ की नहीं।
आपके मन में भी यह सवाल जरूर आया होगा कि क्या पाकिस्तानियों को खुद यह बात नहीं पता? वे अच्छी तरह जानते हैं कि ‘पाकिस्तान’ शब्द का कोई प्राचीन इतिहास नहीं है। यह नाम नया है। लेकिन सब कुछ जानते हुए भी वे इंटरनेट पर झूठ फैला रहे हैं।
जब पाकिस्तानी मुस्लिम सोशल मीडिया पर ‘पाणिनी एक पाकिस्तानी थे’ जैसा सफेद झूठ बेचते हैं, तो उनकी असलियत सामने लाना बहुत जरूरी हो जाता है। ऐसे में इतिहास के सही तथ्यों के साथ उनका थोड़ा मजाक उड़ाना और उन्हें आईना दिखाना बिल्कुल लाजिमी है।
त्रिपुंडधारी ब्राह्मण पाणिनी और चाणक्य को ‘पाकिस्तानी’ बताने की अजीब जिद
पाकिस्तानी यूजर ने पाणिनी का जो उदाहरण शेयर किया है, वह उनकी एक बहुत बड़ी कमजोरी को दिखाता है। पाकिस्तानी मुसलमानों की सोच में यही सबसे बड़ा खोट है। वे सोचते हैं कि आज के भूगोल के हिसाब से प्राचीन भारत के सभी ऐतिहासिक लोग, चाहे उनका धर्म कोई भी हो, ‘प्राचीन पाकिस्तानी’ बन जाते हैं।
माथे पर त्रिपुंड लगाने वाले एक हिंदू ब्राह्मण और संस्कृत के महाज्ञानी पाणिनी की मेज पर पाकिस्तान का ‘चांद-तारा’ वाला झंडा दिखाना बेहद अजीब और मजाकिया है। पाणिनी खुशनसीब थे कि वे उस दौर में पैदा हुए जब इस्लाम या पाकिस्तान जैसा कुछ था ही नहीं। पाकिस्तान खुद को ‘रियासत-ए-मदीना’ कहता है और काफिरों, खासकर मूर्तिपूजक हिंदुओं से नफरत करता है।
लेकिन चूंकि उनके पास जिहादी आतंकियों के अलावा अपना कोई ऐतिहासिक हीरो नहीं है, इसलिए वे प्राचीन भारत के हिंदुओं को जबरन ‘पाकिस्तानी’ बनाने में जुटे हैं। पाणिनी की लिखी ‘अष्टाध्यायी’ वेदों के छह अंगों (वेदांग) में से एक है। वेद हिंदू सनातन धर्म के सबसे पवित्र ग्रंथ हैं। इतिहास में इस्लामिक आक्रमणकारियों ने इन्हें पूरी तरह मिटाने और नष्ट करने की बहुत कोशिश की।
हालाँकि, समय से परे मौजूद इन वेदों को खत्म करना नामुमकिन है। भारतीय हिंदू हस्तियों को जबरन पाकिस्तानी बताने का यह मजाक यहीं नहीं रुका। अब वे महान राजनीतिक रणनीतिकार और चंद्रगुप्त मौर्य के गुरु, आचार्य चाणक्य के पीछे भी पड़ गए हैं। इसी सिलसिले में एक पाकिस्तानी एक्स (X) यूजर ने लिखा, “महान चाणक्य ने पाकिस्तान की तक्षशिला यूनिवर्सिटी में पढ़ाई की थी। वहाँ मिले ज्ञान ने ही उन्हें इतिहास का सबसे बड़ा रणनीतिकार बनाया, जिससे उन्होंने चंद्रगुप्त मौर्य को मौर्य साम्राज्य खड़ा करने में मदद की। आज भी उनके विचार राजनीति और शासन को प्रभावित करते हैं।”
अब कुछ पाकिस्तानी यूजर इस हद तक नासमझी दिखा रहे हैं कि वे ईसा पूर्व चौथी सदी की ‘तक्षशिला’ को ‘पाकिस्तानी यूनिवर्सिटी’ बता रहे हैं, जबकि उस दौर में न तो इस्लाम मजहब था और न ही पाकिस्तान नाम का कोई मुल्क।
हद तो तब हो गई जब इंटरनेट पर एक यूजर ने बिना किसी ऐतिहासिक सबूत के पंजाब के महान राजा पोरस (राजा पुरुषोत्तम) को जबरन एक बौद्ध राजा घोषित कर दिया और सोशल मीडिया पर इस सफेद झूठ को सच साबित करने की बचकानी जिद पर अड़ गया।
राजा पुरुषोत्तम (राजा पोरस) एक महान प्राचीन भारतीय राजा थे। उन्होंने झेलम (वितस्ता) और चिनाब (असीकनी) नदियों के बीच के इलाके पर राज किया था। उन्होंने ईसा पूर्व 326 में झेलम नदी के किनारे सिकंदर के बढ़ते कदमों को रोक दिया था। हालाँकि राजा पोरस के धर्म को लेकर बहुत ज्यादा विवरण नहीं मिलते। लेकिन सभी इतिहासकार मानते हैं कि वे वैदिक धर्म यानि हिंदू धर्म के अनुयायी थे।
गंगा घाटी से नफरत और पाकिस्तान का अधूरा ज्ञान
भारत के गंगा मैदानी इलाके से नफरत करने वाले पाकिस्तानियों ने तुरंत राजा पोरस को ‘बौद्ध’ घोषित कर दिया। वे यह भूल गए कि बौद्ध धर्म की शुरुआत भी भारत के इसी पूर्वी गंगा मैदान (बिहार-यूपी) से हुई थी। वे इस बात को नहीं जानते या जानबूझकर नजरअंदाज करते हैं कि बौद्ध धर्म सम्राट अशोक के काल के बाद ही उत्तर-पश्चिम (आज के पाकिस्तान वाले इलाके) में ठीक से फैला था। लेकिन पाकिस्तानी तो मनगढ़ंत प्रोपेगेंडा चलाने में माहिर हैं। उनके लिए इतिहास के तथ्य मायने नहीं रखते, बल्कि उनका झूठा नैरेटिव सबसे ऊपर रहता है।
सोशल मीडिया पर ऐसे झूठे दावों की बाढ़ आई हुई है। पाकिस्तान की प्रोपेगेंडा विंग (ISPR) के बॉट्स मिलकर एक सोची-समझी साजिश चला रहे हैं। इनका मकसद प्राचीन भारत के हिंदू इतिहास को चुराकर एक नकली ‘प्राचीन पाकिस्तान’ की विरासत तैयार करना है। खुद को दूसरों से बेहतर दिखाने के लिए पाकिस्तानी अब एक नया पैंतरा अपना रहे हैं। वे ‘सिंधु घाटी बनाम गंगा घाटी’ का एक फर्जी विवाद पैदा कर रहे हैं।
वे गंगा घाटी के इतिहास और संस्कृति को सिंधु घाटी से कमतर या घटिया दिखाने की कोशिश में जुटे हैं। वे जानबूझकर ‘हम बेहतर और तुम खराब’ की सोच फैला रहे हैं। ऐसा करके वे सिंधु घाटी सभ्यता पर अपना झूठा हक जताना चाहते हैं। इस साजिश के जरिए वे ‘अखंड प्राचीन भारत’ के ऐतिहासिक और भौगोलिक वजूद को ही मिटाना चाहते हैं। इस दिशा में उनका पहला कदम भारतीय उपमहाद्वीप (Indian Subcontinent) की जगह जबरन ‘साउथ एशिया’ शब्द को बढ़ावा देना था।
इतिहास को अपनाने से लेकर चुराने तक का खेल: पाकिस्तान ने सिंधु घाटी सभ्यता पर क्यों बढ़ा लालच?
यह बेहद अजीब और चौंकाने वाला है। साल 1947 में पाकिस्तान ‘द्वि-राष्ट्र सिद्धांत’ (टू-नेशन थ्योरी) के आधार पर बना था। तब कहा गया था कि हिंदू और मुसलमान दो अलग-अलग देश हैं और वे कभी साथ नहीं रह सकते। लेकिन आज वही पाकिस्तानी लोग प्राचीन भारत के हिंदुओं और उनके महान कामों पर अपना हक जताने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। उनका तर्क है कि ये हस्तियाँ जिस जगह पैदा हुईं या जहाँ उन्होंने काम किया, वह इलाका अब आधुनिक पाकिस्तान में आता है, इसलिए वे ‘प्राचीन पाकिस्तानी’ थे।
आइए कुछ सच बिल्कुल साफ-साफ समझ लेते हैं। यह सच है कि सिंधु घाटी सभ्यता (सिंधु-सरस्वती सभ्यता) के कुछ बड़े मुख्य हिस्से जैसे हड़प्पा और मोहनजोदड़ो आज के पाकिस्तान में हैं। तक्षशिला और पाणिनी का जन्मस्थान (अटक का शालातुला) भी वहीं है। लेकिन कड़वा सच यह है कि पाकिस्तान इन ऐतिहासिक जगहों की ठीक से देखभाल नहीं करता है। इसके उलट, भारत में सिंधु घाटी सभ्यता की 2,000 से ज्यादा जगहें हैं और भारत सरकार उन्हें बहुत अच्छे से संभालकर रखती है। एक मजेदार तथ्य यह भी है कि इस प्राचीन सभ्यता की लगभग 60% जगहें आज के भारत में ही मौजूद हैं।
भारतीय लोगों या भारत सरकार ने इस भौगोलिक सच से कभी इनकार नहीं किया है। लेकिन पाकिस्तानियों की चालाकी यह है कि वे इन जगहों को जबरन एक नकली ‘प्राचीन पाकिस्तान’ के रूप में दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। पाकिस्तानी लोग अक्सर ऐसे इतिहासकारों का सहारा लेते हैं जो कट्टरपंथी सोच के हैं। वे इन लोगों की मदद से सिंधु घाटी सभ्यता से हिंदू धर्म के गहरे जुड़ाव को पूरी तरह मिटाना चाहते हैं।
पाकिस्तान का अकेला मकसद यही है कि किसी भी तरह भारत को उसकी पुरानी जड़ों से अलग कर दिया जाए। वे यह साबित करना चाहते हैं कि भारत की सभ्यता कहीं और से उधार ली गई है, ताकि भारतीयों के मन में अपनी संस्कृति को लेकर हीनभावना पैदा हो सके। इसी साल (2026) मई में भारत के संस्कृति मंत्रालय ने हमारी अटूट सभ्यता का एक बड़ा सबूत दुनिया के सामने रखा।
मंत्रालय ने ‘पशुपति सील’ (मोहर) का जिक्र किया। यह मोहर अखंड भारत के समय मोहनजोदड़ो में मिली थी। पत्थर से बनी यह मोहर करीब 4,300 साल पुरानी है। इसमें एक योगी की मूर्ति है जो योग मुद्रा (मूलबंधासन) में बैठी है। इसे भगवान शिव का ‘पशुपति’ रूप माना जाता है, जिनके चारों तरफ जानवर मौजूद हैं।
संस्कृति मंत्रालय ने साफ शब्दों में कहा, “भले ही ये प्राचीन जगहें आज की नई सीमाओं के पार चली गई हों, लेकिन भारत आज भी इस विरासत का असली और जिंदा रखवाला है। पशुपति सील में दिखने वाली योग मुद्रा, भगवान शिव का प्रतीक और आध्यात्मिक सोच आज भी भारत के मंदिरों, रोज की पूजा-पाठ और योग परंपराओं में पूरी तरह जिंदा है। वैदिक काल से लेकर आज के आधुनिक भारत तक, हमारी सभ्यता की यह कड़ी कभी नहीं टूटी। यह हमारे विचारों, रीति-रिवाजों और हमारी आत्मा में गहराई से बसी हुई है।”
भारत के संस्कृति मंत्रालय के बयान के तुरंत बाद, देश-विदेश का एक खास वामपंथी और कट्टरपंथी बुद्धिजीवियों का गुट (कैबाल) मैदान में कूद पड़ा। इस पूरे गैंग का एक ही मकसद था, किसी भी तरह सिंधु घाटी सभ्यता से वैदिक हिंदू धर्म के जुड़ाव को पूरी तरह नकार दिया जाए।
भारत से नफरत करने वाली और क्रूर मुगल शासक औरंगजेब की प्रशंसक ऑड्रे ट्रुशके ने इस मामले पर सोशल मीडिया पर जहर उगला। उसने लिखा, “यह भगवान शिव की मूर्ति नहीं है। इसकी जगह यह एक यूरेशियन देवता (पशुओं के भगवान) को दिखाने वाले प्रोटो-एलामाइट प्रतीकों से प्रभावित कोई आकृति हो सकती है।”
इस वामपंथी गुट ने इतिहास के स्थापित सच को झुठलाने के लिए तुरंत अपनी पूरी ताकत झोंक दी। वे यह मानने को बिल्कुल तैयार नहीं हैं कि मोहनजोदड़ो में मिली पशुपति सील का संबंध सीधे तौर पर सनातन धर्म और भगवान शिव से है।
इतिहासकार जॉन मार्शल को भी नकारने लगा पाकिस्तान: वामपंथियों के सहारे भारत विरोधी प्रोपेगेंडा
ऑड्रे ट्रुशके के इसी बेतुके दावे का सहारा लेकर कई पाकिस्तानी यूजर्स भारत के संस्कृति मंत्रालय के पोस्ट पर आकर रोना रोने लगे। वे ब्रिटिश इतिहासकार सर जॉन मार्शल को भी गलत बताने लगे। जॉन मार्शल ने साल 1931 में अपनी किताब ‘मोहनजो-दड़ो एंड द इंडस सिविलाइजेशन’ में साफ लिखा था कि पशुपति सील असल में ऐतिहासिक भगवान शिव का ही शुरुआती रूप है।
सिंधु घाटी सभ्यता के कई बड़े और मुख्य हिस्से जैसे कालीबंगा (राजस्थान), बनावली और राखीगढ़ी (हरियाणा), धोलावीरा और लोथल (गुजरात) आज के भारत में मौजूद हैं। ये सभी जगहें घग्गर-हकरा नदी तंत्र, यानी पौराणिक सरस्वती नदी के किनारे बसी हुई थीं। इससे साफ पता चलता है कि इस पूरी सभ्यता के विकास में एक बहुत बड़ी नदी का सहारा था। यही वजह है कि इतिहासकार इसे ‘सिंधु-सरस्वती सभ्यता’ भी कहते हैं।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के पूर्व महानिदेशक और मशहूर पुरातत्वविद् ब्रज बासी लाल (BB लाल) ने भी एक अहम बात बताई थी। उन्होंने सबूतों के साथ कहा था कि हड़प्पा संस्कृति की ज्यादातर जगहें सिंधु नदी के पास नहीं, बल्कि सरस्वती नदी के रास्ते पर बसी थीं। इससे साबित होता है कि सरस्वती नदी ही इस सभ्यता का मुख्य केंद्र थी। इसके अलावा, राजस्थान के कालीबंगा में हुई खुदाई के दौरान प्राचीन वैदिक यज्ञ वेदियाँ, हवन कुंड और यूप (यज्ञ स्तंभ) मिले हैं। ये चीजें साफ इशारा करती हैं कि वैदिक संस्कृति और सिंधु घाटी सभ्यता के बीच एक अटूट धार्मिक और सांस्कृतिक रिश्ता था।
भारत और विदेशों के कुछ पक्षपाती इतिहासकारों ने जानबूझकर सरस्वती नदी को ‘काल्पनिक’ (एक मिथक) बताकर खारिज कर दिया। पुख्ता रिसर्च और नई खोजों के बावजूद उन्होंने ऐसा किया। उनका एकमात्र मकसद हिंदू धर्मग्रंथों, खासकर वेदों को ऐतिहासिक रूप से सच्चा और भरोसेमंद मानने से रोकना था।
इतिहासकारों के इस पक्षपात का पूरा फायदा पाकिस्तान उठा रहा है। कुछ पाकिस्तानी हर कीमत पर तथ्यों को झुठलाने में लगे हैं। वे सिंधु-सरस्वती सभ्यता के अवशेषों में साफ दिखने वाली हिंदू और वैदिक संस्कृति की कड़ियों को तोड़ना चाहते हैं। हालाँकि, वैज्ञानिक खोजों ने उनका झूठ पकड़ लिया है। हाल ही में राजस्थान के डीग जिले के बहज गाँव में जमीन से 23 मीटर नीचे एक प्राचीन नदी का रास्ता (पैलियोचैनल) दबा हुआ मिला है, जो इस सभ्यता के सच को साबित करता है।
बात सिर्फ ‘पाकिस्तान’ नाम की नहीं है। साल 1947 से पहले दुनिया के नक्शे पर पाकिस्तान नाम का कोई राजनीतिक वजूद था ही नहीं। इसलिए, ‘प्राचीन पाकिस्तान’ जैसी किसी भी चीज के होने का तो सवाल ही नहीं उठता। इसके लिए सही शब्द सिर्फ ‘प्राचीन भारत’ या प्राचीन अखंड भारत का इतिहास ही है। भारतीय इतिहासकार आज के पाकिस्तान में मौजूद सिंधु घाटी सभ्यता के हिस्सों को प्राचीन भारतीय इतिहास का ही भाग मानते हैं। पाकिस्तान चाहे कितना भी मनगढ़ंत प्रोपेगेंडा कर ले, या एक ही झूठ को बार-बार सच बताने की हिटलर के मंत्री गोएबल्स जैसी चालें चल ले, इतिहास का सच कभी नहीं बदलेगा।
सिर्फ 93 साल पुराना है ‘पाकिस्तान’ शब्द का इतिहास
भले ही द्वि-राष्ट्र सिद्धांत (टू-नेशन थ्योरी) की जड़ें 19वीं सदी में सर सैयद अहमद खान के विचारों में मिलती हैं, जिन्होंने मुसलमानों के लिए अलग मुल्क की वकालत की थी। लेकिन ‘पाकिस्तान’ शब्द पहली बार साल 1933 में चौधरी रहमत अली खान ने गढ़ा था। उन्होंने इस नाम को पाँच इलाकों को मिलाकर एक शॉर्ट फॉर्म (अक्रोनिम) के रूप में बनाया था। इसमें ‘P’ का मतलब पंजाब, ‘A’ का अफगानिया (खैबर पख्तूनख्वा), ‘K’ का कश्मीर, ‘S’ का सिंध और ‘tan’ का मतलब बलूचिस्तान था।
आज के पाकिस्तानी तर्क देते हैं कि चूंकि पाकिस्तान के नाम में इन पाँचों क्षेत्रों के नाम शामिल थे, इसलिए इन इलाकों का ‘प्राचीन’ इतिहास स्वाभाविक रूप से पाकिस्तान का ही है। ऐसा कहते हुए वे बड़ी चालाकी से इस सच को छुपा जाते हैं कि चौधरी रहमत अली का पाकिस्तान किसी धर्मनिरपेक्ष देश की सोच नहीं था। वे तो केवल और केवल मुसलमानों के लिए एक अलग, स्वतंत्र और संप्रभु मुल्क बनाना चाहते थे।
पिछले 70 से ज्यादा सालों से पाकिस्तान के स्कूलों के सिलेबस, वहाँ के नेताओं के भाषणों, मीडिया और यहाँ तक कि मनोरंजन उद्योग में भी हमेशा इस्लामिक आक्रमणों का गुणगान किया गया। वहाँ की आम मुस्लिम जनता को झूठा दिलासा दिया गया कि वे तुर्क, अरब या अन्य ‘लड़ाकू नस्लों’ के वंशज हैं और उनका हिंदुओं से कोई लेना-देना नहीं है। जबकि असलियत यह है कि एक अदद DNA टेस्ट ही उन्हें उनके इस ‘असहज’ कर देने वाले सच से रूबरू करा सकता है कि उनके पूर्वज हिंदू ही थे। वे आज भी 8वीं शताब्दी में मोहम्मद बिन कासिम द्वारा सिंध पर किए गए हमले को पाकिस्तानी मुसलमानों के लिए एक महान और जश्न मनाने वाला ऐतिहासिक पल बताते हैं।
असल में, पाकिस्तान के स्कूलों की इतिहास की किताबों और वहाँ के देशभक्ति के गानों में हिंदू राजाओं को हमेशा विलेन की तरह दिखाया जाता है। ‘आओ बच्चों सैर कराएँ तुमको पाकिस्तान की’ जैसे मशहूर गानों में सिंध के हिंदू राजा दाहिर की छवि को बेहद खराब करके पेश किया गया है। इसके उलट, वे मोहम्मद बिन कासिम के क्रूर हमले को पाकिस्तान के इतिहास की एक शानदार शुरुआत बताते हैं। वे ऐसा दिखाते हैं जैसे बिन कासिम के आने से ही वहाँ सभ्यता की शुरुआत हुई थी।
पाकिस्तानी सरकार और वहाँ की आम जनता हिंदुओं से नफरत के चलते मोहम्मद घोरी और सोमनाथ मंदिर को तोड़ने वाले ‘बुतशिकन’ (मूर्तियाँ तोड़ने वाले) महमूद गजनवी जैसे जिहादी हमलावरों का खूब गुणगान करती है। हिंदुओं के प्रति यह नफरत उनकी धार्मिक और राजनीतिक सोच में बहुत गहराई तक धँसी हुई है। यही वजह है कि मुसलमानों के लिए एक अलग मुल्क (पाकिस्तान) लेने, वहाँ के हिंदू अल्पसंख्यकों को प्रताड़ित करने और अनगिनत मंदिरों को तोड़ने के बाद भी उनकी नफरत शांत नहीं हुई है। वे आज भी उस हिंदू धर्म से नफरत करते हैं, जिसे कभी उनके खुद के पूर्वज मानते थे।
पाकिस्तान का दोहरापन देखिए, एक तरफ तो वे पाणिनी, आचार्य चाणक्य और राजा पोरस जैसी प्राचीन हिंदू सनातन हस्तियों पर अपना हक जताते हैं। दूसरी तरफ, वे अपनी मिसाइलों के नाम गजनवी, घोरी और अब्दाली जैसे क्रूर इस्लामिक आक्रमणकारियों के नाम पर रखते हैं। ये वही हमलावर थे जिन्होंने भारतीय जमीनों को बेरहमी से लूटा और उजाड़ा। उन्होंने उस इलाके की धन-दौलत भी लूटी जो आज पाकिस्तान का हिस्सा है। इन लुटेरों ने आज के भारतीयों और पाकिस्तानियों के सांझे हिंदू, बौद्ध, सिख और जैन पूर्वजों पर भयंकर जुल्म ढाए थे, उनका कत्लेआम किया था।
आखिर पाकिस्तानी मुसलमान बिना उसकी ‘हिंदू पहचान’ को स्वीकार किए अपने पुराने हिंदू इतिहास को अपना कैसे कह सकते हैं? विदेशी हमलावरों के खिलाफ भारत की रक्षा करने वाले राजा पोरस (राजा पुरुषोत्तम) उनके हीरो कैसे हो सकते हैं? खासकर तब, जब उनके असली हीरो घोरी और गजनवी जैसे विदेशी इस्लामिक हमलावर हैं, जिन्होंने उनके ही हिंदू पूर्वजों पर जुल्म ढाए थे।
लंबे समय तक पाकिस्तानियों ने अपने इस्लाम-पूर्व के इतिहास को छोटा दिखाया और उसे नकारा। वे खुद को समाज में ऊँचा दिखाने के लिए झूठा दावा करते रहे कि वे अरब, तुर्क या फारसी नस्ल के हैं। वे यह मानने से भागते रहे कि उनके पूर्वज हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख थे। आज भी कई पाकिस्तानी खुद को ‘मुस्लिम राजपूत’ कहते हैं, क्योंकि उनके पूर्वज हिंदू क्षत्रिय राजपूत थे। लेकिन सोचने वाली बात यह है कि बिना कुलदेवी की पूजा के कोई राजपूत कैसे हो सकता है?
जैसे ‘मुस्लिम राजपूत’ शब्द अपने आप में ही उल्टा और बेतुका है, ठीक वैसे ही ‘प्राचीन पाकिस्तान’ कहना भी पूरी तरह से बेतुका और मजाक है।
पाकिस्तान के इस्लामिक जनरलों ने वहाँ की मुस्लिम बहुसंख्यक आबादी को कट्टर बनाने के लिए हर मुमकिन पैंतरा चला। उन्होंने देश का पूरी तरह इस्लामीकरण कर दिया। वहीं दूसरी तरफ, हिंदू और बाकी गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों का जबरन धर्म परिवर्तन कराया गया।
सालों से पाकिस्तानी मुसलमान उस संस्कृति से दूरी बनाते आए हैं जिसे वे हिकारत से ‘हिंदूआना संस्कृति’ कहते हैं। स्कूल की किताबों से लेकर, नेताओं के भाषणों और टीवी सीरियलों तक, पाकिस्तान का एक बड़ा हिस्सा हर उस चीज को ‘हिंदूआना’ कहकर खारिज कर देता है जो इस्लामिक नहीं है। उनकी नजर में जो इस्लामिक नहीं, वो खराब है।
साड़ी पर पाबंदी से लेकर ‘ताजमहल’ पर दावे तक: अपनी पहचान के संकट से जूझ रहा पाकिस्तान
मजेदार बात यह है कि हाल के सालों में पाकिस्तानियों ने ‘साड़ी’ को फिर से अपनाना शुरू कर दिया है। साड़ी एक ऐसा हिंदू पहनावा है जिसे भारत के धार्मिक बँटवारे से बहुत पहले से महिलाएँ पहनती आ रही हैं। लेकिन जिया-उल-हक के तानाशाही शासन के दौरान पाकिस्तान में साड़ियों पर एक अघोषित पाबंदी लगा दी गई थी। उस समय मुस्लिम महिलाओं को साड़ी पहनने से रोका जाता था, क्योंकि इसे विशुद्ध रूप से भारतीय और हिंदू संस्कृति से जुड़ा पहनावा माना जाता था।
ये वही पाकिस्तानी हैं जो भारत के ‘ताजमहल’ पर भी अपना हक जताता है। उनका तर्क है कि मुसलमान होने के नाते वे मुगलों की ‘विरासत’ के असली वारिस या रखवाले हैं। उनमें से बहुत से लोग तो आज भी इसी मुगालते में जीते हैं कि उनके पूर्वज मुगल थे। इसी वजह से वे सोशल मीडिया पर ‘हमने हिंदुओं पर 800 साल राज किया है’ जैसा बेहद झूठा और हास्यास्पद दावा करते फिरते हैं।
पाकिस्तानी लोग आज दोहरी चाल चल रहे हैं। वे भौगोलिक आँकड़ों को तोड़-मरोड़कर प्राचीन भारत के महान हिंदुओं पर अपना हक जताना चाहते हैं। साथ ही, वे मध्यकालीन भारत के क्रूर इस्लामिक लुटेरों का भी गुणगान करते हैं ताकि वे अपनी जबरन थोपी गई मुस्लिम पहचान को सही ठहरा सकें। यह सब कुछ वे सिर्फ इसलिए कर रहे हैं ताकि दुनिया के सामने पाकिस्तान को एक ‘ऐतिहासिक सभ्यता वाला देश’ (सिविलाइजेशनल स्टेट) साबित कर सकें।
पाकिस्तान ने यह पैंतरा असल में इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान की किताब से सीखा है। ईरान के मुल्ला शासन ने शुरुआती तीन दशकों तक अपने प्राचीन राजा सायरस (Cyrus) को कभी याद नहीं किया। लेकिन जब उनके देश पर वजूद का संकट मंडराने लगा, तो उन्हें अचानक अपनी इस्लाम से पहले की प्राचीन विरासत याद आ गई और वे उसका गुणगान करने लगे। आज पाकिस्तान भी ठीक उसी तरह अपने वजूद के संकट से बचने के लिए भारत के प्राचीन इतिहास को चुराने की कोशिश कर रहा है।
यह बात और भी ज्यादा मजेदार हो जाती है जब भारतीय हिंदू पूरी दुनिया के सामने प्राचीन भारतीय सभ्यता के असली रखवाले होने का दावा करते हैं। इस पर पाकिस्तानी मुसलमान अचानक भड़क जाते हैं और गुस्सा दिखाने लगते हैं। भारत का यह दावा पूरी तरह सही है, चाहे उस प्राचीन सभ्यता के अवशेष आज की किसी भी भौगोलिक सीमा के अंदर क्यों न आते हों।
अचानक पाकिस्तान को संस्कृत, पाणिनी, सिंधु घाटी सभ्यता और वैदिक सनातन सभ्यता से जुड़ी हर चीज से प्यार हो गया है। वे इसे गले लगाना चाहते हैं। लेकिन वे भूल जाते हैं कि यह भारत के हिंदू ही हैं और कुछ हद तक पाकिस्तान और बांग्लादेश के बचे हुए हिंदू, जिन्होंने इस भाषा, सभ्यता, धर्म, संस्कृति और ग्रंथों की परंपरा को हजारों साल से जिंदा रखा है। हिंदुओं के लिए संस्कृत एक ‘देवभाषा’ यानी देवताओं की भाषा है। हिंदू शुरू से भारत को अपनी मातृभूमि मानकर पूजते आए हैं, जबकि इस्लाम में ऐसी कोई सोच मौजूद ही नहीं है।
अगर सिर्फ आज के भूगोल या जमीन के टुकड़े के आधार पर ही इतिहास के हर हीरो या जगह पर हक जताया जा सकता है, तो पाकिस्तानियों को सबसे पहले अपने हिंदू पूर्वजों को स्वीकार करना चाहिए। उन्हें गजनवी और घोरी जैसे क्रूर लुटेरों की तारीफ करना तुरंत बंद कर देना चाहिए, जिन्होंने उनके ही हिंदू पूर्वजों पर जुल्म किए और उन्हें जबरन मुसलमान बनाया। इस सोच का आखिरी और स्वाभाविक नतीजा तो यही होगा कि वे अपनी ऐतिहासिक गलती को सुधारें और वापस अपने मूल हिंदू धर्म में लौट आएँ।
प्राचीन भारतीय इतिहास पर हिंदुओं का यह दावा भाषा, पवित्र ग्रंथों, दर्शन और पुरातत्व के मजबूत सबूतों पर टिका है। यह एक ऐसी अटूट सभ्यता है जो हजारों सालों से लगातार चली आ रही है। यह इतिहास सिर्फ आज के भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका विस्तार दूर अफगानिस्तान तक फैला हुआ है।
आतंक की छवि सुधारने और वजूद बचाने के लिए पाकिस्तान की नई चाल
पाकिस्तान इस समय जो कुछ भी कर रहा है, वह इतिहास का एक चुनिंदा इस्तेमाल है। वह सिर्फ राष्ट्रीय गर्व के लिए इस्लाम से पहले के इतिहास को एक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है। लेकिन वह अपनी उस बुनियादी सोच को नहीं छोड़ रहा जो नफरत भरे द्वि-राष्ट्र सिद्धांत (टू-नेशन थ्योरी) पर टिकी है। इसी सोच के तहत बँटवारे को सही ठहराने के लिए कभी हिंदू इतिहास को पूरी तरह नकार दिया गया था।
पिछले कुछ दशकों में पाकिस्तान ने दुनिया भर में इस्लामिक आतंकवाद के गढ़ के रूप में बदनामी कमाई है। आप किसी भी जिहादी आतंकी संगठन का नाम लीजिए, उसका पाकिस्तान से कनेक्शन अपने आप सामने आ जाएगा। पाकिस्तान के सरकारी संरक्षण में चलने वाले इस आतंकवाद ने देश की छवि को पूरी दुनिया में बर्बाद कर दिया है। अब अपनी इस साख को सुधारने के लिए यह इस्लामिक देश मोहनजोदड़ो, तक्षशिला और सिंधु घाटी सभ्यता का सहारा ले रहा है। वह इनके जरिए दुनिया में अपनी ‘सॉफ्ट पावर’ बढ़ाना चाहता है, राष्ट्रीय गर्व दिखाना चाहता है और विदेशी पर्यटकों को लुभाना चाहता है।
‘प्राचीन पाकिस्तान’ का यह पूरा मनगढ़ंत नाटक सिर्फ इसलिए रचा जा रहा है ताकि एक कड़वे सच का मुकाबला किया जा सके। दुनिया भर में यह माना जाता है कि ‘पाकिस्तान एक अप्राकृतिक और बनावटी देश है।’ इसी हकीकत को झुठलाने के लिए वे भारत के प्राचीन इतिहास को अपना बता रहे हैं।
आज पाकिस्तान के भीतर ही बलूच, पश्तून, सिंधी और कई अन्य जातीय समूह पंजाब के दबदबे वाले पाकिस्तान से आजादी माँग रहे हैं। देश अंदर से पूरी तरह टूट रहा है। ऐसे में कट्टर इस्लामिक नैरेटिव या खुद को ‘शुद्ध अरबी खून’ बताने वाले झूठे दावे भी देश को एक रखने में नाकाम साबित हो रहे हैं। यही वजह है कि अब वे अपनी एकता बनाए रखने के लिए प्राचीन भारत के इतिहास को चुराने की कोशिश कर रहे हैं।
वसंत पंचमी से माँ सरस्वती का नाम हटाने वाला मुल्क कैसे बनेगा सेक्युलर?
जिस मुल्क की सत्ता आसिम मुनीर जैसे मदरसा-छाप जनरल के हाथों में हो, जो हर भाषण में पाकिस्तानियों को द्वि-राष्ट्र सिद्धांत (टू-नेशन थ्योरी) न भूलने की नसीहत देता है, वहाँ बदलाव की उम्मीद करना ही बेकार है। वहाँ इतिहास या संस्कृति को इस्लाम से अलग दिखाने की कोई भी कोशिश सिर्फ दिखावा, भ्रष्ट और स्वार्थ से भरी हुई है।
इसी साल (2026) फरवरी में जब पूरी दुनिया के हिंदुओं ने पतंगबाजी का त्योहार ‘वसंत पंचमी’ मनाया, तो पाकिस्तान ने भी इस त्योहार को ‘बसंत’ के नाम से दोबारा शुरू किया। वहाँ के नेताओं ने इसे दुनिया के सामने आजादी और सहनशीलता के सबूत के रूप में पेश किया। लेकिन कट्टरपंथियों के डर या अपनी खुद की खराब सोच की वजह से उन्होंने इस त्योहार से हिंदू धर्म और माँ सरस्वती की पूजा को पूरी तरह अलग कर दिया। उन्होंने वसंत पंचमी को सिर्फ एक ‘सांस्कृतिक’ या ‘क्षेत्रीय’ त्योहार बताकर पेश किया।
इस साल की शुरुआत में पाकिस्तान की पंजाब सरकार ने लाहौर के कुछ इलाकों के पुराने हिंदू और सिख नाम वापस रखने का प्रस्ताव दिया था। इसके तहत ‘इस्लामपुरा’ का नाम बदलकर फिर से ‘कृष्ण नगर’ और ‘बाबरी मस्जिद चौक’ का नाम ‘जैन मंदिर चौक‘ किया जाना था। इस फैसले पर वहाँ की सरकार और सोशल मीडिया पर कई पाकिस्तानी ढिंढोरा पीटने लगे। वे कहने लगे कि ‘एक तरफ भारत सांप्रदायिकता में डूब रहा है, तो दूसरी तरफ पाकिस्तान धर्मनिरपेक्षता और सहनशीलता की मिसाल बन रहा है।’ लेकिन जैसे ही इस्लामिक चरमपंथी संगठनों ने इसका थोड़ा सा भी विरोध किया, सरकार तुरंत डरकर पीछे हट गई।
जो मुल्क अपने शहरों के हिंदू इतिहास से जुड़े पुराने नाम तक वापस रखने की हिम्मत नहीं जुटा सका, वह आज प्राचीन भारत के पूरे हिंदू इतिहास पर अपना हक जताना चाहता है। यह पाकिस्तान के खोखले दावों और उनकी लाचारी को पूरी तरह बेनकाब करता है।
ऑपरेशन सिंदूर में पिटने के बाद अब प्रोपेगेंडा के सहारे भारत को घेरने की फिराक में पाकिस्तान
ये सारे सोची-समझी कोशिशें, खासकर सिंधु घाटी सभ्यता पर हक जताना और ‘प्राचीन पाकिस्तान’ का हौव्वा खड़ा करना, असल में सिंधु जल समझौते (IWT) से जुड़े हुए हैं। पिछले साल पहलगाम में पाकिस्तान समर्थित इस्लामिक आतंकी हमले के जवाब में भारत सरकार ने इस सिंधु जल समझौते को फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया है।
इस समझौते को बचाने के लिए पाकिस्तान दुनिया के हर अंतरराष्ट्रीय मंच का दरवाजा खटखटा चुका है। उसने भारत को ‘युद्ध’ की धमकियाँ तक दीं और फिर भारत से इस समझौते को दोबारा शुरू करने की भीख भी माँगी। लेकिन मोदी सरकार ने बिल्कुल साफ कर दिया है कि जब तक पाकिस्तान भारत के खिलाफ इस्लामिक आतंकवाद को बढ़ावा देना और जिहादियों को पालना पूरी तरह बंद नहीं करता, तब तक यह समझौता रद्दी के डिब्बे में ही रहेगा।
पाकिस्तानी नेतृत्व अच्छे से जानता है कि वे सैन्य ताकत के दम पर भारत को कभी नहीं हरा सकते। खासकर ‘ऑपरेशन सिंदूर‘ में भारत से बुरी तरह पिटने के बाद वे सीधे मुकाबले की हिम्मत नहीं खो चुके हैं। इसलिए अब पाकिस्तान अपने सबसे पुराने और पसंदीदा हथियार यानी ‘प्रोपेगेंडा और नैरेटिव’ के खेल पर उतर आया है।
यह असल में दुनिया के सामने रोना रोने और भारत के खिलाफ दूसरे देशों का समर्थन जुटाने की एक लंबी प्लानिंग है। पाकिस्तान भविष्य में वैश्विक मंचों पर यह तर्क देना चाहता है कि सिंधु नदी का सीधा संबंध सिंधु घाटी सभ्यता से है। चूंकि सिंधु घाटी सभ्यता पाकिस्तान की ऐतिहासिक विरासत है, इसलिए भारत का उसे इस नदी के पानी से महरुम करना कानूनी और नैतिक रूप से बिल्कुल गलत है। इसी झूठे नैरेटिव को सेट करने के लिए वे आज इतिहास चुराने की कोशिश कर रहे हैं।
‘अगर पाकिस्तानी इस्लाम छोड़ेंगे तो वे भारतीय बन जाएँगे’: पहचान के सबसे बड़े संकट से जूझ रहा पड़ोसी मुल्क
अगर पाकिस्तान पूरी तरह से अपनी इस्लामिक कट्टरपंथी सोच और घमंड को छोड़ दे, तो वह ‘इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ पाकिस्तान’ नहीं रह जाएगा। तब उसे भारत के हिंदू इतिहास को चुराने की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी, बल्कि वह सीधे अपनी पुरानी हिंदू जड़ों में वापस लौट आएगा। आज प्राचीन सभ्यता की इस अटूट कड़ी और पाकिस्तान के बीच केवल एक ही दीवार खड़ी है और वह है उनकी जबरन थोपी गई इस्लामिक पहचान।
लेकिन पाकिस्तान का जिहादी सैन्य नेतृत्व वहाँ की आम जनता को कभी भी अपने इस्लाम-पूर्व के इतिहास और असली पहचान को अपनाने नहीं देगा। इसके पीछे एक मशहूर कहावत है, “अगर तुर्क लोग इस्लाम छोड़ दें, तब भी वे तुर्क ही रहेंगे; अगर अरब लोग इस्लाम छोड़ दें, तब भी वे अरब ही रहेंगे; लेकिन अगर पाकिस्तानी इस्लाम छोड़ देंगे, तो वे वापस भारतीय बन जाएँगे।”
यही वजह है कि पाकिस्तानी लोग आज भी उसी जिहादी इस्लामिक सोच से चिपके हुए हैं, जिसने कभी उनके इस इलाके के हिंदू इतिहास को मिटाने और उसे विलेन दिखाने का काम किया था। लेकिन अब वे अपनी ही बात से पलटकर उसी इतिहास का चुनिंदा हिस्सा चुराने की कोशिश कर रहे हैं।
पाकिस्तानी समाज का दोहरापन यहीं नहीं रुकता। वे अपनी शादियों में हिंदू रीति-रिवाजों की नकल करते हैं और भारत के क्लासिकल डांस फॉर्म्स को भी अपनाते हैं। इसके बाद वे पूरे भारतीय उपमहाद्वीप (Indian Subcontinent) के हिंदू इतिहास को ‘साउथ एशिया’ का नाम देकर नया रूप देना चाहते हैं। हकीकत यह है कि केवल 78 साल पुराने इस मुल्क (पाकिस्तान) का अपना खुद का इतिहास और संस्कृति सिर्फ इस्लामिक आतंकवाद, कज़िन-मैरिज (भाई-बहनों में शादी) पर बने टीवी सीरियलों और जिहादी मानसिकता के इर्द-गिर्द ही सिमट कर रह गई है।
(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है। अंग्रेजी की रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)