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धुरंधर-2 में ‘अतीक अहमद’ का पाकिस्तानी कनेक्शन दिखाए जाने पर छाती पीट रहे प्रोपेगेंडाबाज, माफिया के लिए उमड़ा प्रेम: जानें- क्या है पूरा सच

फिल्म ‘धुरंधर: द रिवेंज’ में करीब 7-9 मिनट का यूपी के माफिया डॉन का किरदार है। उसका नाम है अतीफ अहमद। फिल्म में उसके आईएसआई कनेक्शन, हथियारों की तस्करी और जाली नोट का धंधा करने वाला दिखाया गया है। इसको लेकर एसपी- कॉन्ग्रेस और तमाम वामपंथियों की भौहें चढ़ गई हैं।

इनका कहना है कि ये पूर्व एसपी सांसद और माफिया अतीक अहमद को दिखाया गया है। लेकिन उसकी हत्या के बाद उसे इस तरह से पाकिस्तान से कनेक्शन दिखाना गलत है। जबकि सच यह है कि अतीक अहमद का पाकिस्तान से न सिर्फ संबंध था बल्कि उसके सारे काले कारनामे पाकिस्तान की मदद से चलते थे। अपना खौफ पैदा करने के लिए वह जिन हथियारों का इस्तेमाल करता था, वह पाकिस्तान से आते थे।

ISI और आतंकियों से कनेक्शन

फिल्म में इलाहाबाद और यूपी का जिक्र करते हुए अतीफ का आईएसआई से कनेक्शन दिखाया गया है। आईएसआई से हथियारों की तस्करी, नकली नोट नेपाल के रास्ते भारत में लाकर खपाना और यूपी में किसकी सरकार बनेगी, इसमें हस्तक्षेप करना। फिल्म में उसका मर्डर भी लगभग उसी तरह दिखाया गया है, जैसा रियल में हुआ था।

हालाँकि, फिल्म में ये दिखाया गया है कि उसकी हत्या की योजना भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजय सान्याल ने की थी। जबकि असल मे अतीक और उसके भाई अशरफ की हत्या 15 अप्रैल 2023 को प्रयागराज में पुलिस कस्टडी में गोली मारने से हुई थी। सीएम योगी के कानून व्यवस्था सख्त किए जाने के बाद यूपी में माफिया राज का खात्मा हुआ।

इसको लेकर फिल्म में दिखाया गया है कि जेल में अतीफ की आईएसआई के हेड से बात होती है, वह 60000 करोड़ जाली नोट लाने के लिए तैयार हो जाता है। यूपी चुनाव को प्रभावित करने के लिए इन जाली नोटों का इस्तेमाल करने का प्लान था। इस बीच उसकी हत्या हो जाती है। इस वजह से कॉन्ग्रेस और समाजवादी पार्टी फिल्म को प्रोपेगेंडा बता रही है।

समाजवादी पार्टी के नेता पूर्व सांसद एसटी हसन का कहना है कि अतीक के मामले में किसी भारतीय जाँच एजेंसी ने आईएसआई कनेक्शन का खुलासा नहीं किया था। लेकिन फिल्म में अतीफ अहमद के नाम के किरदार का कनेक्शन दिखाया गया है। जबकि हकीकत ये है कि अतीक अहमद का कनेक्शन आईएसआई के साथ साथ जम्मू कश्मीर के आतंकी संगठन लश्कर ए तैयबा से था। अतीक अहमद के ISI से सीधे जुड़ाव को दिखाए जाने पर अगर समाजवादी पार्टी के नेता अतीक अहमद की पैरवी कर रहे हैं, तो ये काफी शर्म की बात है।

उसकी हत्या से कुछ दिनों पहले प्रयागराज पुलिस ने अप्रैल 2023 में उमेश पाल हत्याकांड का चार्जशीट दाखिल किया था। इसमें अतीक अहमद और उसके भाई अशरफ अहमद को हथियार तस्करी का भी आरोपी बनाया गया था। चार्जशीट के मुताबिक, उसके आईएसआई और लश्कर ए तैयबा से सीधे संबंध थे। आईएसआई के एजेंट से फोन पर बात होती थी। पंजाब में पाकिस्तान से हथियार ड्रोन के माध्यम से गिराए जाते थे। कोई लोकल एजेंट इसे उठाता था और अतीक अहमद गैंग तक पहुँचाता था। लश्कर ए तैयबा और दूसरे आतंकियों को भी ये हथियार सप्लाई किए जाते थे।

चार्जशीट में कहा गया है कि अगर पुलिस अतीक को उन जगहों पर ले जाए, तो वह हथियार और गोला बारूद तक बरामद करवा सकता है। पुलिस ने इसी बयान पर एफआईआर दर्ज की थी। पुलिस ने जब उसके घर की तलाशी ली थी तो पाकिस्तानी कारतूस और हथियार भी बरामद हुई थी।

पूर्व DGP विक्रम सिंह के मुताबिक, “इस बारे में कोई शक नहीं होना चाहिए। जब ​​अतीक अहमद जिंदा था, तो उसके गैंग को IS-277 (इंटरस्टेट-277) के तौर पर लिस्ट किया गया था। अपने कबूलनामे में उसने माना था कि 0.45 कैलिबर की पिस्तौल, AK-47 और RDX आदि पाकिस्तान से ड्रोन के जरिए पंजाब पहुँचते थे और वहाँ से उस तक पहुँचते थे। उसके संबंध लश्कर-ए-तैयबा और ISI से भी थे। जब अतीक के घर की तलाशी ली गई थी तो पाकिस्तानी कारतूस और हथियार बरामद हुए थे। “

जेल से चलाता था अपना साम्राज्य

फिल्म में दिखाया गया है कि जेल में बंद अतीफ अहमद अपना काम जेल से आराम से चलाता था। उसे फोन मिल जाते थे और वह आईएसआई से बात करता था। सारी प्लानिंग हो जाती थी। हकीकत में भी अतीक अहमद जेल में रहे या बाहर। उसके काले कारनामें चलते रहते थे।

इसमें तो किसी को शक नहीं होना चाहिए कि जब समाजवादी पार्टी की सरकार यूपी में थी, तो अतीक अहमद की तूती बोलती थी। इलाहाबाद और आसपास के इलाकों में वह खौफ का पर्याय हुआ करता था। यहाँ तक कि जब सरकार ने अवैध कब्जा की गई जमीन की नीलामी करने की कोशिश की, तो उसे लेने कोई सामने नहीं आया।

लोगों की जमीनों पर कब्जा करना, गुंडागर्दी, किसी को भी उठवा कर मार देना जैसी हरकतें आज भी लोगों की जुबान पर हैं। फिल्म में जिस तरह से अतीफ अहमद का आईएसआई कनेक्शन दिखाया गया है।

असल में वह भी उसकी मौत से पहले बाहर आ चुका था। खुद उसने इसे स्वीकार किया था। अब फिल्म में अतीफ के किरदार पर सवाल उठाने वालों का कहना है कि अगर उसका पाकिस्तान से कनेक्शन था तो फिर उसकी हत्या पर संसद में क्यों दुख जताया गया। अतीक अहमद पूर्व सांसद था और उसकी मौत पर संसद में श्रद्धांजलि एक सांसद को दिया गया था, न की पाकिस्तानी कनेक्शन वाले माफिया को।

यूपी सरकार में दखल रखता था अतीक अहमद

फिल्म में दिखाया गया है कि यूपी सरकार में अतीफ का अच्छा खासा दखलंदाजी है। नोटबंदी के बाद आईएसआई के चीफ और आतिफ के बीच बातचीत होती है। अतीफ कहता है कि यूपी गया अपने हाथ से…हार जाएँगे चुनाव, आगे अल्लाह की मर्जी..। इसको देखकर बताया जा सकता है कि ये किस वक्त की बात है।

दरअसल माफिया अतीक अहमद ने 1989 में पहली बार इलाहाबाद पश्चिम सीट से विधानसभा चुनाव जीतकर राजनीतिक में सक्रिय हुआ था। उसके बाद वह लगातार चुनाव जीतता रहा। 2004 में वह एसपी की टिकट पर फूलपुर से लोकसभा चुनाव जीता। उसकी समाजवादी पार्टी के सत्ता पर काबिज रहने के दौरान तूती बोलती थी।

1971 में पाकिस्तानी फौज ने चुन-चुनकर मारे हिंदू, अमेरिकी संसद में ‘बांग्लादेश’ के नरसंहार पर आया प्रस्ताव: जानें- क्या हैं माँग

अमेरिकी संसद ‘सीनेट’ में 1971 में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में पाकिस्तानी फौज द्वारा की गई हत्याओं को नरसंहार के रूप में मान्यता देने को लेकर प्रस्ताव पेश किया गया है। शुक्रवार (20 मार्च 2026) को अमेरिकी कॉन्ग्रेस के सांसद ग्रेग लैंड्समैन ने निचले सदन में यह प्रस्ताव पेश किया, जिसमें कहा गया कि पाकिस्तान का यह ऑपरेशन संयुक्त राष्ट्र (UN) की नरसंहार की परिभाषा को पूरा करता है।

लैंड्समैन ने पाकिस्तान का साथ देने के लिए इस्लामी कट्टरपंथी राजनीतिक संगठन ‘जमात-ए-इस्लामी’ को कठघरे में लाने की बात कही। सांसद ने यह भी कहा कि अमेरिका को बहुत पहले ही इसे नरसंहार घोषित कर देना चाहिए था।

उन्होंने बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने की भी माँग की। प्रस्ताव में कहा गया है कि 25 मार्च 1971 को घोषित ऑपरेशन सर्चलाइट के दौरान पागकिस्तानी फौज और उनके इस्लामी सहयोगियों ने अत्याचार किए। उस समय सभी धर्मों के बंगाली मूल के लोगों को हमलों में निशाना बनाया गया था। हिंदुओं का सफाया किया गया और उनका नरसंहार किया गया।

प्रस्ताव में क्या कहा गया?

अमेरिकी संसद में पेश किए गए प्रस्ताव में 1971 में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम को इतिहास की दर्दनाक घटनाओं में से एक बताया है, जिसे न्याय और वैश्विक मान्यता नहीं मिल सकी है। इस प्रस्ताव में उस दौर की घटनाओं को याद करते हुए न सिर्फ नरसंहार के रूप में पहचान देने की बात कही गई है, बल्कि बांग्लादेश के अल्पसंख्यक हिंदुओं की सुरक्षा पर भी जोर दिया गया है।

प्रस्ताव में कहा गया कि इस दौरान पश्चिम पाकिस्तान की सरकार में पंजाबी नेताओं की संख्या अधिक थी, जिन्होंने पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) को नजरअंदाज किया। पूर्वी पाकिस्तान के बंगालियों को कमतर समझा गया।

ऑपरेशन सर्चलाइट और नरसंहार की शुरुआत

1970 के चुनाव में शेख मुजिबुर रहमान के नेतृत्व वाली अवामी लीग को बहुमत हासिल होने के बाद भी हालात नहीं सुधरे। रहमान ने पूर्वी पाकिस्तान को अधिक स्वायत्तता देने का वादा किया था, लेकिन पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति आगा मोहम्मद याह्या खान, जुलफिकर अली भुट्टो के साथ उनकी बातचीत विफल हो गई और 25 मार्च 1971 की रात पाकिस्तानी सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया।

इसके बाद ही जमात-ए-इस्लामी की विचारधारा से प्रेरित इस्लामी समूहों के साथ मिलकर पाकिस्तानी फौज ने ‘ऑपरेशन सर्चलाइट’ नाम से पूर्वी पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई शुरू की। इस दौरान आम नागरिकों का नरसंहार किया गया।

प्रस्ताव में माना गया कि इस नरसंहार का एक बेहद दर्दनाक पहलू महिलाओं के साथ हुई हिंसा है। अनुमान है कि 2 लाख से अधिक महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ। सामाजिक कलंक के कारण असली संख्या शायद कभी सामने नहीं आ पाएगी और कई पीड़ितों की पहचान इतिहास में दर्ज नहीं हो सकी।

हिंदुओं को बनाया गया निशाना

प्रस्ताव में कहा गया कि नरसंहार में विशेष तौर पर हिंदुओं को निशाना बनाया गया। 28 मार्च 1971 को ढाका में अमेरिकी कौंसुल जनरल आर्चर ब्लड ने वॉशिंगटन को भेजे संदेश में इसे ‘चयनात्मक नरसंहार’ बताया और कहा कि पाकिस्तानी फौज के समर्थन से गैर-बंगाली मुस्लिम समूह गरीब इलाकों में बंगालियों और हिंदुओं पर हमले कर रहे हैं। 6 अप्रैल 1971 को भेजे गए ‘ब्लड टेलीग्राम’ में अमेरिकी अधिकारियों ने अपनी सरकार की चुप्पी पर आपत्ति जताई और इस स्थिति को नरसंहार बताया। 8 अप्रैल के एक अन्य संदेश में ब्लड ने साफ कहा कि हिंदुओं को विशेष रूप से निशाना बनाया जा रहा है।

अमेरिकी सीनेटर एडवर्ड एम. केनेडी की अध्यक्षता वाली समिति ने 1 नवंबर 1971 को अपनी रिपोर्ट में कहा कि 25 मार्च 1971 से पाकिस्तानी फौज ने सुनियोजित आतंकी अभियान चलाया, जिसमें सबसे ज्यादा नुकसान हिंदू समुदाय को हुआ। उनकी जमीनें छीनी गईं, उन्हें चिन्हित कर मार डाला गया और यह सब इस्लामाबाद से लागू मार्शल लॉ के तहत किया गया। 1972 में इंटरनेशनल कमीशन ऑफ जूरिस्ट्स की एक रिपोर्ट में भी कहा गया कि हिंदुओं को सिर्फ उनके धर्म के कारण मारा गया और उनके गाँव तबाह कर दिए गए।

प्रस्ताव में संयुक्त राष्ट्र (UN) का रुख भी साफ किया कि UN ने नरसंहार रोकथाम और सजा संबंधी कन्वेंशन के अनुसार, किसी राष्ट्रीय, जातीय, नस्लीय या धार्मिक समूह को पूरी तरह या आंशिक रूप से खत्म करने की मंशा से किए गए कृत्य नरसंहार माने जाते हैं।

प्रस्ताव में क्या है माँगें?

प्रस्ताव में कहा गया है कि संसद का निचला सदन 25 मार्च 1971 को पाकिस्तानी सुरक्षाबलों द्वारा बांग्लादेश के लोगों पर किए गए अत्याचारों की कड़ी निंदा करता है। इसमें माना गया है कि पाकिस्तानी फौज और उसके इस्लामी सहयोगियों ने बिना भेदभाव के बंगाली लोगों की बड़े पैमाने पर हत्या की, चाहे उनका धर्म या लिंग कुछ भी हो।

उन्होंने राजनीतिक नेताओं, बुद्धिजीवियों, पेशेवरों और छात्रों को मार डाला और हजारों महिलाओं को जबरन यौन दासी बनाया। खासतौर पर हिंदू अल्पसंख्यकों को निशाना बनाते हुए उनके खिलाफ नरसंहार, सामूहिक बलात्कार, जबरन धर्म परिवर्तन और उन्हें उनके घरों से निकालने जैसे अत्याचार किए गए।

प्रस्ताव में यह भी स्वीकार किया गया कि किसी भी पूरे समुदाय या धार्मिक समूह को कुछ लोगों के अपराधों के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। प्रस्ताव में अपील की गई कि वे 1971 में पाकिस्तानी फौज और उसके सहयोगी जमात-ए-इस्लामी द्वारा बंगाली हिंदुओं के खिलाफ किए गए इन अत्याचारों को मानवता के खिलाफ अपराध, युद्ध अपराध और नरसंहार के रूप में मान्यता दें।

प्रस्ताव पास होने का माफी माँगेगा पाकिस्तान?

अगर यह प्रस्ताव पास हो जाता है तो सबसे पहले पाकिस्तान पर कूटनीतिक दबाव बढ़ेगा। अमेरिकी संसद का यह कदम भले की प्रतीकात्मक हो, लेकिन इससे दुनिया भर में 1971 की घटनाओं को नरसंहार के रूप में देखने की सोच मजबूत होगी। इसके बाद पाकिस्तान को अमेरिकी अधिकारियों से मानवाधिकार से जुड़े सवालों का सामना करना पड़ेगा।

इससे दोनों देशों के बीच बातचीत में यह मुद्दा बार-बार उठेगा और रिश्तों में तनाव आएगा। साथ ही बांग्लादेश और हिंदू समुदाय की आवाज भी मजबूत होगी, जिससे वैश्विक मीडिया में पाकिस्तान की छवि खराब हो सकती है।

इसके अलावा अमेरिका की विदेश नीति में पाकिस्तान को लेकर ज्यादा सावधानी बरती जाएगी। इससे आर्थिक मदद और सैन्य सहयोग जैसे मुद्दों पर बहस तेज हो सकती है। आगे चलकर यह प्रस्ताव दूसरे देशों को भी प्रेरित कर सकता है, जैसे यूरोपीय संघ और कनाडा, जहाँ ऐसे ही प्रस्ताव लाए जा सकते हैं। इससे पाकिस्तान पर माफी माँगने या जवाब देने का दबाव बढ़ेगा। कुल मिलाकर पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय छवि को नुकसान होगा और भविष्य में होने वाले समझौतों में यह पुराना मुद्दा परेशानी खड़ी कर सकता है।

NIA ने म्यांमार में आतंकियों को ड्रोन ट्रेनिंग देने आए विदेशियों को पकड़ा, पढ़ें- जब कुकी आतंकियों ने मणिपुर के गाँवों पर ड्रोन से गिराए थे बम

NIA ने आतंकवाद के खिलाफ बड़ी कार्रवाई करते हुए इस महीने की शुरुआत में 7 विदेशी नागरिकों को गिरफ्तार किया। इनमें छह यूक्रेन के नागरिक और एक अमेरिकी भाड़े का लड़ाका मैथ्यू एरन वैनडाइक शामिल है। यूक्रेनी नागरिकों को दिल्ली और लखनऊ से पकड़ा गया जबकि अमेरिकी नागरिक वैनडाइक को कोलकाता से गिरफ्तार किया गया।

पटियाला हाउस कोर्ट की विशेष NIA अदालत ने सभी आरोपितों को पूछताछ के लिए NIA की हिरासत में भेज दिया है। यह मामला इसलिए भी खास माना जा रहा है क्योंकि पहली बार किसी आतंकी साजिश की जाँच में यूरोप और अमेरिका के नागरिकों को इस तरह गिरफ्तार किया गया है।

NIA के मुताबिक, ये सभी विदेशी नागरिक टूरिस्ट वीजा पर भारत आए थे। इसके बाद ये लोग बिना जरूरी अनुमति (Restricted Area Permit) के अवैध तरीके से मिजोरम पहुँच गए। वहाँ से ये म्यांमार गए और वहाँ के जातीय सशस्त्र समूहों से संपर्क किया। जाँच एजेंसी ने यह भी बताया कि ये विदेशी नागरिक अपने साथ बड़ी मात्रा में ड्रोन लेकर आए थे और यूरोप से हथियार और हार्डवेयर भारत के रास्ते सप्लाई कर रहे थे।

खास बात यह है कि अमेरिकी नागरिक मैथ्यू एरन वैनडाइक ने साल 2014 में ‘Sons of Liberty International’ (SOLI) नाम की एक नॉन-प्रॉफिट सिक्योरिटी कंपनी शुरू की थी। वैनडाइक खुद 2011 में लीबिया में मुअम्मर गद्दाफी की सरकार के खिलाफ लड़ रहे विद्रोहियों के साथ भी लड़ चुका है। उसकी कंपनी अलग-अलग सशस्त्र समूहों को सैन्य ट्रेनिंग देने का काम करती है।

केंद्रीय एजेंसी ने अदालत को बताया कि ये विदेशी नागरिक म्यांमार के जातीय सशस्त्र समूहों को ड्रोन वॉरफेयर की ट्रेनिंग देने की साजिश रच रहे थे। इसमें ड्रोन ऑपरेशन, असेंबली, जैमिंग तकनीक और इससे जुड़ी अन्य चीजें सिखाने की योजना शामिल थी।

2024 में कुकी आतंकियों द्वारा ड्रोन से हमले

पहली नजर में इन घटनाओं को देखकर ऐसा लग सकता है कि ये विदेशी नागरिक सिर्फ पड़ोसी देश म्यांमार में चल रही उग्रवादी गतिविधियों की मदद कर रहे थे और उनका भारत से कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन इस फैसले पर पहुँचने से पहले सितंबर 2024 में कुकी-मैतेई संघर्ष के बीच मणिपुर में हुए ड्रोन हमलों को याद करना भी जरूरी है।

1 सितंबर 2024 को कुकी आतंकी समूहों ने ड्रोन का इस्तेमाल करके मैतेई गांवों पर हमला किया। ये हमले बेहद खतरनाक थे क्योंकि पहली बार देश के अंदर किसी आतंकी या उग्रवादी समूह ने ड्रोन के जरिए हमले किए थे।

इस घटना से सुरक्षा एजेंसियाँ सतर्क हो गई थीं। कुकी आतंकियों ने ड्रोन के जरिए 40 से ज्यादा बम गिराए थे। इम्फाल वेस्ट के काउट्रुक और कदंगबंद जैसे मैतेई गाँवों को निशाना बनाया गया। इन ड्रोन हमलों में कई आम नागरिकों की मौत हो गई और कई लोग गंभीर रूप से घायल हो गए।

ड्रोन के जरिए बम गिराने की इस घटना ने इलाके में चल रहे जातीय संघर्ष को और ज्यादा खतरनाक बना दिया। यह संघर्ष मई 2023 में शुरू हुआ था और करीब एक साल बाद इस तरह का बड़ा घटनाक्रम देखने को मिला। मणिपुर पुलिस ने इन ड्रोन हमलों को ‘अभूतपूर्व’ बताया यानी ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। पुलिस के मुताबिक, कुकी आतंकियों ने हाई-टेक ड्रोन का इस्तेमाल करके रॉकेट-प्रोपेल्ड ग्रेनेड (RPG) भी दागे और मैतेई गाँवों को निशाना बनाया।

खुफिया एजेंसियों ने यह भी पुष्टि की कि काउट्रुक गाँव पर हमले में कुकी आतंकियों ने लंबी दूरी की स्नाइपर राइफल्स का भी इस्तेमाल किया। खासतौर पर RPG जैसे एडवांस हथियारों का इस्तेमाल सुरक्षा एजेंसियों के लिए चिंता की बात बन गया। ड्रोन से बम गिराने के लिए थोड़े बहुत बदलाव करके काम चल सकता है लेकिन RPG दागने के लिए पूरी तरह मिलिट्री-ग्रेड ड्रोन और खास तकनीकी जानकारी की जरूरत होती है जो स्थानीय स्तर पर आसानी से संभव नहीं है।

मणिपुर 2024 ड्रोन हमलों में विदेशी साजिश के संकेत

सुरक्षा एजेंसियों को 2024 में मणिपुर में हुए ड्रोन हमलों में विदेशी हाथ होने के संकेत मिले। एजेंसियों के मुताबिक, इन हमलों को अंजाम देने में ऐसे लोगों की भूमिका दिखी जो ड्रोन के जरिए विस्फोट करने में ट्रेनड और एक्सपर्ट थे। साथ ही, किसी विदेशी एजेंसी की मदद या समर्थन की संभावना से भी इनकार नहीं किया गया। हमलों के बाद जारी बयान में मणिपुर पुलिस ने कहा कि इस तरह से ड्रोन के जरिए बम गिराने की घटना पहले कभी इस क्षेत्र के लंबे समय से चल रहे जातीय संघर्ष में नहीं देखी गई थी।

पुलिस ने अपने बयान में कहा, “इम्फाल वेस्ट के काउट्रुक में हुए हमले में कुकी आतंकियों ने हाई-टेक ड्रोन के जरिए कई RPG दागे। आम युद्ध में ड्रोन से बम गिराने की घटनाएँ देखी जाती रही हैं लेकिन सुरक्षा बलों और आम नागरिकों पर इस तरह ड्रोन का इस्तेमाल इस संघर्ष को एक नए और खतरनाक स्तर पर ले जाता है।

हमले के बाद भविष्य में ऐसे खतरों से निपटने के लिए असम राइफल्स ने मणिपुर में एंटी-ड्रोन सिस्टम तैनात किए। जाँच के दौरान NIA ने उस सप्लाई चेन का भी पता लगा लिया जिसके जरिए ये ड्रोन मणिपुर तक पहुँचे थे। एजेंसी ने मोटबुंग के गामंगाई गाँव के रहने वाले खैगौलेन किपजेन उर्फ डेविड को इस मामले में अहम कड़ी के तौर पर पहचाना जिसने ड्रोन और उससे जुड़े सामान को इकट्ठा करके मणिपुर तक पहुँचाया था।

जाँच में यह भी सामने आया कि उसे ये ड्रोन और उपकरण नई दिल्ली के रमेश नगर के रहने वाले मयंक शर्मा और हरियाणा के रोहतक के विक्रम चौधरी ने सप्लाई किए थे। किपजेन ने इन दोनों को ड्रोन देने के बदले बड़ी रकम भी चुकाई थी। इसके अलावा लाइकांगबाम अल्बर्ट सिंह का नाम भी सामने आया जिसने इनसे ड्रोन और बैटरियाँ खरीदी थीं।

भारत-म्यांमार बॉर्डर: हथियार और ड्रग्स तस्करी का आसान रूट

सितंबर 2024 में कुकी आतंकियों ने जिन ड्रोन का इस्तेमाल किया उन्हें ग्रेनेड ले जाने और दागने के लिए मॉडिफाई किया गया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह तरीका 2021 में म्यांमार में हुए तख्तापलट के दौरान वहाँ के उग्रवादी समूहों जैसा ही था। भारत-म्यांमार की असुरक्षित सीमा लंबे समय से हथियार, ड्रग्स की तस्करी का रास्ता है। NIA के अनुसार, म्यांमार के जातीय उग्रवादी समूह पूर्वोत्तर भारत के स्थानीय संगठनों को समर्थन देते रहे हैं।

यह बॉर्डर ड्रग्स तस्करी का भी बड़ा रास्ता है। अफीम, हेरोइन और बड़े पैमाने पर बनने वाली मेथ जैसी ड्रग्स इसी रास्ते से भारत पहुँचती हैं। UNODC के मुताबिक, म्यांमार के शान और चिन राज्य दुनिया में अवैध ड्रग्स के सबसे बड़े केंद्र बन चुके हैं। 2023 में म्यांमार ने अफगानिस्तान को पीछे छोड़ते हुए सबसे बड़ा अवैध अफीम उत्पादक देश बन गया। 2025 तक अफीम की खेती में 17% की बढ़ोतरी हुई, खासकर भारत से सटे इलाकों में।

भारत में इसका असर साफ दिखा और एम्फेटामिन ड्रग्स की बरामदगी 2023 के 34 क्विंटल से बढ़कर 2024 में 80 क्विंटल हो गई। नवंबर 2024 में कोस्ट गार्ड ने 5,500 किलो मेथ के साथ म्यांमार की नाव पकड़ी जो अब तक की सबसे बड़ी जब्ती थी। NCB के मुताबिक, ड्रग्स का पैसा अब आतंकवाद और उग्रवाद को फंड कर रहा है। गृह मंत्री अमित शाह ने भी इस खतरे को लेकर चेताया है।

NIA ने कोर्ट को बताया कि इसी बॉर्डर के जरिए भारतीय उग्रवादी समूह यूरोप से ड्रोन तकनीक हासिल कर रहे हैं। एजेंसी इन विदेशियों की फंडिंग का सोर्स पता करने के लिए उनकी हिरासत चाहती है।

कड़ियाँ जोड़ने पर क्या सामने आता है?

इन सभी तथ्यों को जोड़कर देखें तो मामला काफी गंभीर नजर आता है। लड़ाई का अनुभव रखने वाले विदेशी नागरिक अगर म्यांमार के उग्रवादी समूहों को ट्रेनिंग दे रहे हैं और भारत की जमीन का इस्तेमाल कर रहे हैं तो यह क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा है। भारत के पूर्वोत्तर में सक्रिय कई उग्रवादी समूह पहले से ही म्यांमार की तरफ से हथियार और फंडिंग ले रहे हैं जिसमें ड्रग्स का पैसा और संदिग्ध विदेशी संगठनों की भूमिका बताई जाती है।

ऐसे में भारत में इन विदेशी नागरिकों की मौजूदगी को सिर्फ एक साधारण घटना नहीं माना जा सकता कि वे यहाँ से होकर म्यांमार जा रहे थे। यह मामला कहीं ज्यादा बड़ा और गंभीर दिखता है। यह पूरी घटना इस ओर इशारा करती है कि भारत के अंदरूनी हालात और कमजोरियों का फायदा उठाकर कुछ विदेशी ताकतें देश को अस्थिर करने की कोशिश कर रही हैं जिसमें एक बड़ी साजिश की आशंका नजर आती है।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ा जा सकता है)

साधना से मर्यादा तक: चैत्र नवरात्र और रामनवमी की शक्ति संस्कृति

जिस सभ्यता की कालगणना का प्रथम उच्चार ही शक्ति साधना से होता है, वह सभ्यता स्वभाव से कभी भीरु नहीं हो सकती। किंतु इतिहास की विडंबना देखिए कि निरंतर आक्रमणों और वैचारिक उपनिवेशवाद ने उसी समाज के मन में ऐसी मानसिक जड़ता भर दी कि शक्ति उपासना का जीवंत दर्शन कर्मकांड में सिमटता चला गया। शस्त्र पूजन प्रतीक बनकर रह गया। शौर्य के संस्कार क्षीण पड़ते गए।

शक्ति केवल देवी का स्वरूप नहीं है। वह जीवन के प्रत्येक आयाम में सक्रिय चेतना है। इसी दृष्टि से भारत में स्त्री को ‘शक्ति’, मातृभूमि को ‘भारत माता’ और प्रकृति को पूज्य माना गया। यह वह सांस्कृतिक दृष्टि है, जिसमें आध्यात्म, समाज और प्रकृति परस्पर एक सूत्र में बँधे हैं।

नवरात्र का अर्थ है- अंधकार पर चेतना का विजय अभियान। इन नौ दिनों में जिस आदिशक्ति की आराधना होती है, वह ऐसी ऊर्जा है जो सृजन भी हैं और संहार भी। करुणा भी हैं और पराक्रम भी। भारतीय परंपरा ने इसी शक्ति को ‘देवी’ रूप में प्रतिष्ठित किया है।

देवी दुर्गा मातृत्व का ही नहीं, अन्याय के विनाश का भी प्रतीक हैं। उनके हाथों में शस्त्र इसलिए हैं, क्योंकि भारतीय दर्शन अन्याय के समक्ष निष्क्रिय सहिष्णुता को धर्म नहीं मानता। शक्ति उपासना का संदेश स्पष्ट है- धर्मरक्षा के लिए सामर्थ्य अनिवार्य है।

भीरुता वाली इसी मानसिक जड़ता को तोड़ने का पर्व है- नवरात्र। यह आत्मरक्षा, आत्मसम्मान और धर्मनिष्ठ साहस का जागरण है। यह स्मरण कराता है कि सज्जनता का अर्थ समर्पण नहीं होता। सहिष्णुता का अर्थ आत्मविस्मृति नहीं है।

नवरात्र की पूर्णता रामनवमी पर होती है। भगवान श्रीराम भारतीय मानस के केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि आचरण की मर्यादा, शासन की नैतिकता और सामाजिक संतुलन के आदर्श हैं। यदि नवरात्र शक्ति का प्रतीक है तो रामनवमी मर्यादा का संदेश।

शक्ति बिना मर्यादा, विनाशकारी होती है और मर्यादा बिना शक्ति दुर्बलता का प्रतीक। भारतीय दर्शन इन दोनों के संतुलन की शिक्षा देता है।

यही संतुलन भारत की सांस्कृतिक आत्मा का मूल है। इसमें साहस भी है और संवेदनशीलता भी। पराक्रम भी है और करुणा भी।

चैत्र नवरात्र और रामनवमी भारतीय आत्मा के दो आयाम हैं- शक्ति और मर्यादा। एक साहस देती है, दूसरी दिशा। एक अन्याय के विरुद्ध खड़ा करती है, दूसरी संयम सिखाती है। बताती हैं कि हिंदुत्व किसी संकीर्ण धार्मिक पहचान का नाम नहीं, बल्कि भारत की जीवन पद्धति का वह सांस्कृतिक स्वरूप है, जिसमें अनेक देवपरंपराएँ, भाषाएँ और लोकाचार समाहित हैं। यही सांस्कृतिक चेतना भारत को केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि जीवंत सभ्यता बनाती है।

यह संतोष की बात है कि आधुनिक भारत में अपनी जड़ों की ओर लौटने की प्रवृत्ति तेज हुई है। मंदिरों में बढ़ती श्रद्धा, तीर्थयात्राओं का विस्तार और पारिवारिक परंपराओं का पुनर्जीवन संकेत देते हैं कि भारत अपनी सांस्कृतिक अस्मिता के प्रति पुनः सजग हो रहा है। अब परंपरा पिछड़ेपन का प्रतीक नहीं, बल्कि आत्मविश्वास का आधार मानी जा रही है।

स्मरण रहे कि शक्ति साधना से विमुख समाज अपनी पहचान खो देता है। मर्यादा त्यागने वाला समाज अराजकता में डूब जाता है। भारत का मार्ग इन दोनों के संतुलन में है।

सनातन की एकजुटता पर उठाओ सवाल ताकि ‘उम्माह’ का रहे बोलबाला: जानें- क्यों तरुण हत्याकांड में वामपंथी हिंदुओं में ही भर रहे ‘ग्लानि’, क्या है स्ट्रैटेजी

दिल्ली के उत्तम नगर में होली के दौरान एक हिंदू दलित परिवार की खुशियाँ मातम में बदल गईं। एक बच्ची के पानी के गुब्बारे की छींटें मुस्लिम महिला पर पड़ने के बाद शुरू हुआ विवाद इतना बढ़ा कि तरुण को भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला। परिवार माफी माँगता रहा लेकिन इसकी कीमत उसकी जान देकर चुकानी पड़ी। घटना के दौरान भीड़ में शामिल लोग ‘खूनी होली’ की बात करते दिखे।

घटना के बाद वामपंथियों का प्रोपेगेंडा पैटर्न देखने को मिला। इसमें पहले इसे सामान्य झगड़ा बताने की कोशिश हुई। कहा गया कि दोनों पक्षों में मारपीट हुई और एक व्यक्ति की गलती से मौत हो गई। जब यह नैरेटिव नहीं चला तो सोशल मीडिया पर तरुण पर ही आरोप लगाए जाने लगे कि वही उकसा रहा था और वही मारने गया था। लेकिन स्थानीय लोगों और तथ्यों ने इन दावों को खारिज कर दिया।

इसके बाद फोकस पूरी तरह बदल दिया गया। तरुण के लिए न्याय की माँग कर रहे हिंदुओं के गुस्से को ही सवालों के घेरे में लाया गया। हिंदू संगठनों के प्रदर्शन को साजिश और हिंसा से जोड़ने की कोशिश की गई जबकि हत्या के मुद्दे को पीछे धकेला गया। यह पूरा मामला अब केवल एक हत्या तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह उस नैरेटिव की लड़ाई का उदाहरण बन गया है जिसमें घटना से ज्यादा उसकी कहानी को प्रभावित करने की कोशिश होती है।

हिंदुओं को ‘अपराधी बनाने’ की सिस्टेमेटिक कोशिश

इस हिंसा में लेफ्ट-लिबरल गिरोह ने तरुण के लिए न्याय की माँग करना तो छोड़िए, हिंदुओं को ही अपराधी बताने की सिस्टेमेटिक कोशिशें शुरू कर दी। सबसे पहले ‘अस्वीकार’- इस गिरोह और इससे जुड़े पत्रकारों ने सबसे पहले इस घटना को सही रूप में दिखाने के बजाय इसे मामूली झगड़े को तौर पर पेश करनी कोशिश की। ऐसा दिखाया गया है कि दोनों पक्षों ने एक-दूसरे को मारा और उनमें एक आदमी ‘गलती’ से मर गया। यह दिखानी कोशिश की गई कि स्थानीय झगड़े को सांप्रदायिक रंग दिया जा रहा है।

सोशल मीडिया पर भी आपको कई ऐसे वीडियो दिखेंगे, जिसमें यह बताने की कोशिश की गई कि यह स्थानीय लोगों का झगड़ा था। हालाँकि, तथ्य सामने थे तो यहाँ इस गिरोह की दाल नहीं गली।

इसके बाद यह कोशिश शुरू की गई कि तरुण पर ही इल्जाम लगा दिया जाए। सोशल मीडिया पर दावे वायरल होने लगे कि तरुण ही छेड़छाड़ कर रहा था और वही इन कट्टरपंथियों को मारने गया था लेकिन ये दावे भी नहीं टिके और पड़ोसियों और अन्य लोगों ने इस गिरोह का यह प्रोपेगेंडा भी फेल कर दिया।

इसके बाद एक और कोशिश शुरू की गई, इस बार निशाने पर तरुण की जगह पूरा हिंदू समाज था। इस हत्या के बाद हिंदू समुदाय ने तरुण कुमार की हत्या के लिए न्याय की माँग की। विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल जैसे हिंदूवादी संगठनों ने खुलेआम प्रदर्शन का ऐलान किया जिसके बाद भारी संख्या में न्याय की माँग के लिए लोग सड़कों पर उतर गए। लोग सड़कों पर उतरे तो उनमें से कई आक्रोशित भी थे और इसी आक्रोश की आड़ में हत्या को ढकने की साजिश शुरू कर दी गई। बताया जाना लगा कि तरुण की हत्या तो मामूली बात है असल दिक्कत हिंदुओं से ही है।

कॉन्ग्रेस के नेता भी इसी प्रोपेगेंडा को हवा देने लगे, पवन खेड़ा जैसे वरिष्ठ नेता तक यह दावा करने लगे कि तरुण की हत्या तो महज दो लोगों का झगड़ा थी, लेकिन RSS-BJP ने इस मामले को उग्र कर दिया। यानी हिंदू अगर न्याय माँगते हुए आक्रोशित भी हो जाएँ तो यह हिंदुओं के लिए गुनाह है। हत्या भी उन्हीं की होगी, आरोप भी उनपर लगेगा और अंत में अगर संभलकर नहीं बोले तो अपराधी भी वही ठहरा दिए जाएँगे।

यह पैटर्न कोई अभी का नहीं है। इसी दिल्ली में 2020 के दंगों को देखिए, शरजील इमाम जैसे लोगों के भड़काऊ भाषण दिए पैटर्न के तहत रोड ब्लॉक की गईं, जिसे जाँच में साजिश करार दिया गया। लेकिन यह गिरोह अंकित शर्मा की हत्या को छिपाकर इस मामले में सिर्फ इस पीड़ित को दिखाता है और वो है शरजील इमाम। उदयपुर में कन्हैयालाल की निर्मम हत्या को आइसोलेटेड घटना बताकर हिंदू एकजुटता पर ही सवाल उठा दिए गए। केरल, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में लव जिहाद के सैकड़ों मामले सामने आने के बावजूद इन्हें मिथ करार दिया जाता रहा है।

विरोध प्रदर्शनों का पैटर्न: हिंदुओं की उदारता ही उनका अपराध है?

हिंदू समाज को हमेशा से सहिष्णु और उदार माना जाता है। यह समाज अलग-अलग मतों को स्वीकार करता है और इसी से जुड़कर भी रहता है। लेकिन कई बार ऐसा लगता है कि ज्यादा सहन करना कमजोरी समझ लिया जाता है। हिंदुओं की ‘उदारता’ ही उनका ‘अपराध’ बन जाती है। इसे प्रदर्शनों के पैटर्न के जरिए भी समझा जा सकता है। हिंदू संगठनों के प्रदर्शन का पैटर्न भी आम तौर पर यही रहता है कि लोग प्रदर्शन के लिए लोगों को बुलाने का आह्वान करते हैं, अपनी माँगों के लिए सड़कों पर उतरते हैं, पुलिस-प्रशासन तक अपनी बात पहुँचाते हैं और फिर न्याय का इंतजार करते हैं। यही दिल्ली में भी हुआ। इसे के लिए हिंदुओं को अपराधी बनाया जा रहा है।

अब दूसरी तरफ कट्टरपंथियों के इस प्रदर्शन के पैटर्न को देखिए। कई बार तो किसी को भनक तक नहीं लगती कि यहाँ कोई प्रदर्शन होने वाला है। ना कोई सार्वजनिक पोस्टर, ना सोशल मीडिया पर चर्चा। बस गुप्त बैठकें होती हैं, बंद कमरों में प्लानिंग होती है, वॉट्सऐपर पर कोडेड मेसेज चलते हैं और अचानक दंगा भड़क जाता है, हिंसा शुरू हो जाती है और सड़कों पर पत्थरबाजी देखने को मिलती है।

2020 दिल्ली दंगे इसका सबसे खतरनाक उदाहरण हैं। दिखावे के लिए महीनों तक ‘शांतिपूर्ण’ प्रदर्शन चल रहे थे लेकिन असली खेल पर्दे के पीछे खेला जा रहा था। दिल्ली में देखते ही देखते प्रदर्शन हिंसक हो गया और दर्जनों हिंदू मारे गए। इसके अलावा आगजनी और मंदिरों पर हमले की घटनाएँ भी हुई। मुस्लिमों की घरों से पत्थरबाजी की गई तो जाहिर है कि ये पत्थर एक दिन में नहीं इकट्ठा हुए होंगे। यह साजिश लंबे समय से रची जा रही थी। ताहिर हुसैन की छत पर बाहुबली गुलेल और पेट्रोल बम जैसी चीजें मिलीं जो हिंसक प्रदर्शनों के सुनियोजित होने पर सवाल उठा रही थीं।

उत्तर प्रदेश के बरेली में सितंबर 2025 को जुमे की नमाज के बाद ‘आई लव मोहम्मद‘ को लेकर हुई हिंसा भी इसी तरह का उदाहरण है। लोगों को जो आम विरोध प्रदर्शन लग रहा था, वो अचानक हिंसक हो गया और पुलिस पर पत्थरबाजी की गई। जाँच में पता चला कि यह आम या विरोध भी पूरी प्लानिंग के तहत अंजाम दिया जा रहा था।

बरेली में कुछ लोग इस्लामिया मैदान में जाने की जिद कर रहे थे और पुलिस ने उन्हें रोकने की कोशिश की थी तो कट्टरपंथियों ने पुलिस पर पथराव कर दिया। इस दंगे के लिए करीब 5000 उपद्रवियों की फौज तैयार की गई थी। ये उपद्रवी शहर की 390 मस्जिदों में ठहराए गए थे और उनके पास पहले से ईंट, पत्थर और पेट्रोल बम जैसे हथियार मौजूद थे। अगर ये कट्टरपंथी अपनी इस साजिश में सफल हो जाते तो शायद सैकड़ों लोगों की जान जाती लेकिन पुलिस ने इन्हें काबू कर लिया।

राम नवमी, हनुमान जयंती और अन्य धार्मिक जुलूसों के कार्यक्रमों पर हमलों की खबरें हम सब सुनते हैं। अचानक मस्जिदों और घरों की छतों से पत्थरबाजी होने लगती है, ऐसी दर्जनों घटनाएँ हैं। बीते दिनों शिवाजी महाराज की जयंती के मौके जुलूस पर हमला हुआ और मस्जिद से पत्थरबाजी की गई।

अब पत्थरबाजी के लिए ये पत्थर कैसे और क्यों इकट्ठा होते होंगे ये सवाल ही इन प्रदर्शनों की आड़ में होने वाली साजिश का सबसे बड़ा जवाब है। इन पैटर्न से आपको अंदाजा होगा कि दिल्ली के जिन हिंदुओं को अपराधी बताया जा रहा है वो असल में सिर्फ अपने बेटे-भाई को होने से ही पीड़ित नहीं है बल्कि वो उस प्रोपेगेंडाबाज गिरोह से भी पीड़िता है जो उनकी आवाज तक उठाने पर उन्हें अपराधी घोषित कर देता है।

तरुण पर चुप्पी, रिजवान के लिए दर्द?

इस घटना में वामपंथी प्रोपेगेंडाबाजों ने तरुण की हत्या से ध्यान हटाने के लिए ‘रिजवान कहाँ है‘ का नैरेटिव भी चलाया था। इस घिनौने नैरेटिव को हवा देने में तथाकथित सेकुलर और पत्रकारिता का चोला पहनने वाले लोग खुलकर सामने आ गए। आरजे सायमा से लेकर जहीर इकबाल की पत्नी सोनाक्षी सिन्हा और वारिस पठान समेत कई इस्लामी कट्टरपंथी इन्फ्लुएंसर्स ने यह प्रोपेगेंडा फैलाया था। लेकिन दिल्ली पुलिस ने उनके इस प्रोपेगेंडा की हवा निकाल दी।

इसका मकसद बिल्कुल साफ था कि तरुण की हत्या वाले मुद्दे से लोगों का ध्यान भटका दिया जाए। यह धारणा बना दी जाए कि इस घटना में सिर्फ हिंदू परिवार ही नहीं बल्कि मुस्लिम परिवार ने भी अपना बच्चा खो दिया है। पुलिस को बार-बार टैग करके इसे गंभीरता का रंग देने की रणनीति अपनाई गई ताकि आम आदमी सोचे कि शायद पुलिस कुछ छुपा रही है। लेकिन सच सामने आया तो इन सब प्रोपेगेंडाबाजों की पोल खुल गई।

हिंदुओं के लिए सच को पहचानने का समय

तरुण की हत्या के अपराध को छिपाने के लिए उस अपराध पर खड़ा किया गया दोहरा नैरेटिव भी कम अपराध नहीं है। न्याय माँगने वालों को ही साजिशकर्ता या हिंसक बता देना असल में पूरे देश में एक डर का माहौल खड़ा करने की साजिश है। यह केवल शब्दों का खेल नहीं है बल्कि यह इस गिरोह द्वारा हिंदू विरोध की धारणा बनाने की प्रक्रिया है।

यह गिरोह बस यही तय करता है कि कैसे अपने पर हुए अपराध के बाद भी हिंदुओं को आक्रामक और अपराधी की तरह दिखाया जाए जबकि दूसरे पक्ष को बेबस और पीड़ित की तरह पेश किया जाए। यह वक्त इस पूरे नैरेटिव को चुनौती देने का है। क्योंकि अगर आज भी हम यह नहीं समझ पाए कि हमारे सामने जो परोसा जा रहा है वो पूरी सच्चाई नहीं है तो आने वाले समय में हर घटना इसी तरह किसी एजेंडे की भेंट चढ़ाया जाता रहेगा। तब न कोई तरुण याद रहेगा, न उसकी हत्या केवल इस गिरोह के द्वारा बनाई एक कहानी बची रहेगी जिसे बार-बार दोहराकर सच साबित किया जाएगा।

नजरिया: ‘विक्टिम’ को ‘विलेन’ बनाने का खतरनाक इकोसिस्टम

उत्तम नगर के तरुण हत्याकांड ने एक बार फिर उस ‘नैरेटिव वॉर’ को सतह पर ला दिया है, जहाँ अपराधी के मजहब को ढाल बनाने के लिए पीड़ित के अस्तित्व को ही मिटाने की कोशिश की जाती है। यह महज एक स्थानीय झगड़ा या गुब्बारे से शुरू हुई हिंसा नहीं है, बल्कि एक सोची-समझी ‘मनोवैज्ञानिक युद्धनीति’ का हिस्सा है।

दिल्ली से लेकर बरेली तक, पैटर्न एक ही है। जहाँ एक पक्ष की ‘सुनियोजित हिंसा’ को ‘हताशा’ बताकर डिफेंड किया जाता है, वहीं दूसरे पक्ष की ‘प्रतिक्रिया’ को ‘आतंक’ करार दिया जाता है। सनातन समाज को यह समझना होगा कि यह लड़ाई केवल सड़कों पर नहीं, बल्कि मोबाइल की स्क्रीन और अखबारों की सुर्खियों में लड़ी जा रही है।

अगर आज तरुण के लिए न्याय की माँग को ‘गुंडागर्दी’ मानकर हिंदू पीछे हटा, तो कल हर घर का दरवाजा इसी कट्टरता की दस्तक सुनेगा। यह ‘ग्लानि’ से बाहर निकलकर ‘सत्य’ को पहचानने और संगठित होने का समय है, क्योंकि नैरेटिव की इस जंग में चुप रहना ही पराजय स्वीकार करना है।

X पर सक्रिय ट्रोल पर हुई कार्रवाई तो भड़क गई कॉन्ग्रेस, मोदी सरकार को बनाने लगे निशाना: पढ़ें कैसे इन हैंडल्स से फैलाया जा रहा था एंटी इंडिया प्रोपगेंडा

केंद्र सरकार ने IT एक्ट की धारा 69ए का इस्तेमाल करते हुए बुधवार (18 मार्च 2026) को कई ऐसे एक्स हैंडल्स पर कार्रवाई की है, जिनके माध्यम से सोशल मीडिया पर एंटी-इंडिया प्रोपगेंडा फैलाया जा रहा था। ये एक्स हैंडल अधिकतर विपक्षी पार्टियों और उसके इकोसिस्टम से जुड़े थे, जिन्हें भारत में अब ‘Withheld’ कर दिया गया है। इस कार्रवाई का मकसद ऐसे कटेंट का प्रसार रोकना है, जो समाज में अव्यवस्था और देश की सुरक्षा को खतरे में डाल सकते हैं।

इस घटना के तुरंत बाद भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस ने सरकार पर अभिव्यक्ति की आजादी छीनने का आरोप लगाते हुए अभियान शुरू कर दिया। दिल्ली में पार्टी की सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म विभाग की प्रमुख सुप्रिया श्रीनेत ने इस मुद्दे पर प्रेस कॉन्फ्रेंस की।

श्रीनेत ने इस कदम को बढ़ती सेंसरशिप की संस्कृति बताया और केंद्र पर आरोप लगाया कि वो असहमति को दबा रही है डिजिटल चर्चा पर अपना कब्जा मजबूत कर रही है और अपनी नीतियों की आलोचना करने वालों पर हमला कर रही है। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार ने सभी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर स्वतंत्र असहमति वाली आवाजों को चुप कराने का पैटर्न अपनाया है।

श्रीनेत ने कहा कि ऐसे कदम दरअसल नौकरशाहों को खुली जानकारी तक पहुँचने के फैसले पर पावर दे देते हैं। सुप्रिया ने कहा, “यह सिर्फ कहानी गढ़ने की बात नहीं है बल्कि अभिव्यक्ति की आजादी की आत्मा पर हमला है।” उन्होंने यह भी दावा किया कि सरकार मुख्यधारा के मीडिया में दखल के बाद अब सोशल मीडिया की दुनिया में भी अपना दखल बढ़ा रही है।

श्रीनेत ने आगे लिखा, “जिन लोगों पर असर पड़ा है उनमें से कई कॉन्ग्रेस के साथ नहीं हैं। कुछ तो हमारी फैसलों की आलोचना भी करते हैं लेकिन हम उनके समर्थन में आवाज उठाते हैं। हमने राहुल गाँधी से सीखा है कि किसी भी अन्याय का सामना करने वाले का साथ दें चाहे वो हमारे खिलाफ रहे हों और वो हमारे आधिकारिक सिस्टम का हिस्सा न हों बावजूद इसके कि भाजपा और उसके ट्रोल्स क्या कहते हैं।”

श्रीनेत यहीं नहीं रुकी, बल्कि कहा कि अकाउंट्स ब्लॉक करने से सवाल नहीं रुकेंगे। उन्होंने यह भी शिकायत की कि यह मुद्दा एक बड़ी समस्या का हिस्सा है और सरकार को बढ़ते संसदीय आर्थिक चुनौतियों और विदेश नीति की कमियों से ध्यान हटाने का आरोप लगाया।

श्रीनाते ने इसी तरह के तर्कों वाला एक वीडियो भी अपलोड किया और बैन किए गए अकाउंट्स के समर्थन में ट्वीट किया जिसमें उन्होंने फैसले को ‘अस्वीकार्य’ बताया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘कायर’ कहा।

दिलचस्प बात यह है कि यह पुरानी बड़ी पार्टी असहमति कुचलने का लंबा इतिहास रखती है और अक्सर अभिव्यक्ति की आजादी का उल्लंघन करती रही है। फिर भी वह इन लोगों के पीछे खड़ी हो गई है न कि ऊँचे आदर्शों की सच्ची चिंता से बल्कि इसलिए कि वे विपक्ष की कहानी फैलाते हैं। बेशक यह उनके खिलाफ कार्रवाई का एकमात्र कारण नहीं हो सकता क्योंकि उनकी ऑनलाइन गतिविधियों में काफी कुछ शामिल है।

फेक न्यूज फैलाने में माहिर हैं ये अकाउंट

नेहर_हू 2 लाख 42 हजार 300 फॉलोअर्स वाला एक पॉपुलर अकाउंट है जो इस्लामो-लिबरल गुट का है जिसपर रोक लगी है। इसने बार-बार न सिर्फ झूठी खबरें फैलाईं बल्कि नस्लवाद दिखाया और भारतीय सेना पर आरोप लगाए। उसने न्यायपालिका की भी निंदा की क्योंकि उसने मशहूर जिम मालिक ‘मोहम्मद’ दीपक कुमार को सुरक्षा नहीं दी जो पहलगाम आतंकी हमले के शिकारों का मजाक उड़ा रहा था और कह रहा था ‘केवल भारत में हीरो को विलेन बना दिया जाता है।’

उसने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर का भाषण शेयर किया जिसमें ब्रिटेन की विविधता का जश्न था और कहा कि ‘भारत में ठीक उलटा है’ देश की निंदा करने का कोई मौका नहीं छोड़ा भले ही झूठ बोलकर। यह अकाउंट ‘अल्पसंख्यक खतरे में’ वाली बनाई गई कहानियाँ फैलाने में सबसे आगे रहा जबकि हिंदुओं पर हमलों को साफ कर दिया या उनके नरसंहार का मजाक उड़ाया।

साल 2024 में उसने ओपइंडिया के हिंदूफोबिया ट्रैकर का हवाला देकर कहा कि कश्मीर में हिंदू उत्तर प्रदेश से ज्यादा सुरक्षित हैं ताकि अपनी आश्चर्यजनक अपमानजनक और असंवेदनशील सोच दिखा सके। वह कश्मीरी पंडितों के जिहादियों के कारण पलायन को जानता है लेकिन फिर भी उनके दर्द का मजाक उड़ाता है।

इसी महीने अमेरिका के भारत राजदूत सर्जियो गोर और इंडो-पैसिफिक कमांड के कमांडर सैमुअल जे पापारो भारत की वेस्टर्न आर्मी कमांड के चंडीगढ़ मुख्यालय गए। बातचीत पश्चिमी थिएटर की गंभीर सुरक्षा मुद्दों पर केंद्रित थी जो पाकिस्तान से सैन्य गतिरोध और दुश्मनी के कारण महत्वपूर्ण है।

लेकिन इस मीटिंग का इस्तेमाल प्रधानमंत्री मोदी को समझौता करने का आरोप लगाने के लिए किया गया जो कॉन्ग्रेस पार्टी अक्सर लगाती है और इससे रक्षा बलों की ईमानदारी पर सवाल उठाए गए।

नेहर_हू ने बिहार के लोगों पर उनके वोटिंग चॉइस के लिए नस्लवादी हमला किया और कहा ‘टॉयलेट में माइग्रेशन का मजा लो अगले 5 साल’ मेहनतकश मजदूर वर्ग का अपमान करने के लिए सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्होंने उसकी पसंदीदा पार्टियों को वोट नहीं दिया।

“उत्तर प्रदेश और बिहार से लाखों प्रवासी त्योहार पर घर जाने के लिए भयानक तकलीफ झेलते हैं। कुछ तो मर भी जाते हैं” उसने 2024 में इसी तरह कहा और उन्हें केसरिया पार्टी को सपोर्ट करने के लिए कोसा और आरोप लगाया कि उसकी सरकार ने वंदे भारत अमीरों के लिए शुरू किया। उसने इसमें ‘जैसा बोया वैसा काटा’ जैसे तंज भी खुशी खुशी जोड़े। इस आदमी ने लगातार राज्य और उसके रहने वालों को स्वच्छता और दूसरी चीजों पर नीचा दिखाया है।

एक महिला ने बताया कि उसने उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में समाजवादी पार्टी को वोट दिया था लेकिन उसे भाजपा का स्लिप मिल गया। हालाँकि उसने ये भी कहा कि मेरे साथ छोटा बच्चा था वोटिंग के समय जिस वजह से गलत बटन दब गया और मुझे ईवीएम से कोई समस्या नहीं है।” लेकिन उसकी झूठी बात का इस्तेमाल करके उसने भारत के चुनाव आयोग की निंदा की।

उसने और अल्ट न्यूज के मोहम्मद जुबैर ने पत्रकार निशा पाल को निशाना बनाने की कोशिश की क्योंकि उन्होंने पहलगाम आतंकी घटना ऑपरेशन सिंदूर और इजराइल-हमास युद्ध के बारे में कुछ मुस्लिम बच्चों से सवाल पूछे थे।

उसने एक वीडियो भी अपलोड किया जिसमें कथित पाकिस्तानी आदमी भारतीय क्रिकेट टीम की जीत का जश्न मना रहा था और कह रहा था कि इस्लामिक रिपब्लिक भारत से बेहतर देश है जबकि अपने देश के खिलाफ आतंकवाद समेत सभी बड़े अपराधों को नजरअंदाज कर रहा था।

मोदी सरकार के खिलाफ नाराजगी के रूप में छिपा एंटी इंडिया प्रोपगेंडा

डॉ निमो यादव 2.0 एक और प्रमुख अकाउंट जो भारत में बैन हो गया है उसने दो केंद्रीय मंत्रियों को राष्ट्र विरोधी गतिविधियों से जोड़ने तक की हद पार कर दी। उसने कहा, “क्या यह सच है कि एन सीतारमण का ऑफिस और राजीव चंद्रशेखर ट्विटर पर उस व्यक्ति को फॉलो कर रहे थे जो भारत में आतंकियों को ट्रेनिंग दे रहा था।” इसने इन नेताओं की जाँच NIA से कराने की डिमांड तक रख डाली।

इस बीच जिन पार्टियों को ये लोग सपोर्ट करते हैं वे वोट बैंक के लिए माफिया और गैंगस्टरों को बढ़ावा दे रही हैं और अपनी एजेंडा थोपने के लिए मानवीय सीमाओं को पार कर रही हैं। उसने भारतीय सेना के अधिकारियों के दिखने पर मजाक भी किया और कहा, “यह तब होता है जब मिड-डे मील में अंडे बैन कर दो।” इस तरह से वो वर्दीधारी सैनिकों का सम्मान करता है, जिन्होंने युद्धक्षेत्र में पाकिस्तान और चीन जैसे दुश्मनों से लड़ते हुए अद्भुत शौर्य का प्रदर्शन किया।

इन हैंडल्स पर निखिल गुप्ता की गिरफ्तारी पर मजा लिया जो खालिस्तानी आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू के असफल हत्या षड्यंत्र में शामिल था और चाहा कि उसकी कहानी धुरंधर 2 में दिखाई जाए, जिसमें आर माधवन भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का रोल करते हैं। यह भारतीय खुफिया एजेंसियों का मजाक उड़ाने का उसका दयनीय प्रयास था।

डॉ निमो यादव 2.0 ने एक और पोस्ट में दावा किया कि ‘भारत के लिए चीजें अच्छी नहीं लग रही’ क्योंकि ‘रूस ने पाकिस्तान को सस्ते दाम पर कच्चा तेल ऑफर किया’ जिसे उसने सरकार की बड़ी असफलता बताया। दूसरी तरफ भारत रूस से बहुत सस्ते दाम पर तेल खरीद रहा है खासकर 2022 में अमेरिका की धमकियों और टैरिफ के बावजूद।

वह जानता है कि रूस का पाकिस्तान को ऑफर भारत की इजराइल से निकटता की तरह दोनों देशों के रिश्तों में बाधा नहीं डालता फिर भी उसने अपनी प्रचार से मुँह नहीं मोड़ा।

अलग-अलग अकाउंट्स लेकिन काम एक जैसा

इसी तरह की पाबंदी मनीष आरजे के अकाउंट पर भी लगी है। उसने दावा किया था कि बिहारी वोटरों ने अपनी आत्मा 10 हजार में बेच दी क्योंकि उन्होंने भाजपा को सपोर्ट किया। यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया इस गुट को तभी स्वीकार्य लगती है जब उनकी पसंदीदा पार्टियाँ जीतती हैं।

उसने भी बाकियों की तरह झूठी जानकारी फैलाने से खुद को नहीं रोका और इजराइल को ‘फादरलैंड’ कहा गलत तरीके से प्रधानमंत्री मोदी को इसका श्रेय देते हुए जबकि मोदी ने भारतीय यहूदियों के बारे में कहा था कि वे पश्चिम एशिया के उस देश को अपना पिता मानते हैं जबकि भारत को मातृभूमि।

आरजे ने कोलकाता मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में हुई भयानक बलात्कार और हत्या की घटना में पीड़िता की माँ को भी अपनी छोटी राजनीति में घसीट लिया और आरोप लगाया कि न्याय की उनकी गुहार दरअसल भाजपा टिकट पर चुनाव लड़ने की इच्छा से थी। उसने शोक संतप्त महिला की बेइज्जती की, जबकि उसे सत्तारूढ़ तृणमूल कॉन्ग्रेस सरकार से जवाब माँगना चाहिए था।

उसने लगातार उन पोस्ट्स को रीट्वीट किया जो भू-राजनीतिक संकट से भारतीयों पर पड़ने वाले नुकसान का मजाक उड़ाती हैं।

‘एक्टिविस्ट और सोशल वर्कर’ संदीप सिंह लिस्ट में एक और नाम है जो कॉन्ग्रेस का खासकर हरियाणा यूनिट का खुलकर समर्थन कर रहा है कई पोस्ट्स के जरिए जो श्रीनेत के दावे का खंडन करता है कि ये अकाउंट उनकी पार्टी को सपोर्ट नहीं करते।

इसके अलावा वह भारत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध चाहता है जैसा कि हालिया विवादित रिपोर्ट में अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग ने कहा है धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर और भेदभाव रोकने के लिए। रिपोर्ट ने रिसर्च एंड एनालिसिस विंग पर टारगेटेड सैंक्शंस की भी सिफारिश की।

डॉ रंजन जिनके अकाउंट का भी यही हाल हुआ। उसने एक कार्यक्रम का वीडियो पोस्ट किया और गलत दावा किया कि मोदी सरकार के प्रभाव में भारतीय मीडिया नागरिकों से संकट और आपदाएँ छिपा रही है। उसका साफ मकसद है लोगों में डर पैदा करना और सरकार के खिलाफ नफरत भड़काना, बिना देश पर पड़ने वाले असर को सोचे।

उसने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बयान को भी तोड़ मरोड़ कर पोस्ट किया और जातीय विभाजन पैदा करने की कोशिश की।

कुछ लोगों ने घटना के बाद अपने ट्वीट्स लॉक कर लिए जिससे कई सवाल उठे।

ये वही लोग हैं, जो हिंदू एक्टिविस्ट विजय पटेल के अकाउंट सस्पेंड होने पर खुश थे और मालाबार गोल्ड चाहता था कि उन्हें जेल भेजा जाए क्योंकि उन्होंने उनके पाकिस्तानी इन्फ्लुएंसर्स को हायर करने की आलोचना की थी जो ऑपरेशन सिंदूर की निंदा कर रहे थे। वे ‘सेंसरशिप’ का मजा लेते हैं जब तक वो उनके विरोधियों पर अन्यायपूर्ण तरीके से लगे। पाखंड और दोहरे मापदंड वाकई हैरान करने वाले हैं।

गौरतलब है कि अप्रैल 2024 में लोकसभा चुनाव से ठीक पहले अमित शाह ने कॉन्ग्रेस को उसके एडिटेड वीडियो का इस्तेमाल करने के लिए फटकार लगाई जिसमें आरोप था कि भाजपा की सत्ता आने पर आरक्षण खत्म हो जाएगा। यह वीडियो कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाले इंडिया गठबंधन और उनके पूरे नेटवर्क द्वारा असली बताकर फैलाया गया था। इस तरह नुकसान पहुँचाने के इरादे से गलत सूचना फैलाने को हल्के में नहीं लिया जा सकता। ठीक वैसे ही देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी जो ऐसी तकनीकें इस्तेमाल करती रही है उसके इन अकाउंट्स के खिलाफ कार्रवाई के बाद नाराज होना आश्चर्य की बात नहीं है।

मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

तेल के खेल में मात खाता अमेरिका, रूस के बाद ईरान को देनी पड़ी छूट: जानें- क्या है ‘तेल संकट’ का चीन कनेक्शन?

अमेरिका-इजरायल और ईरान के युद्ध से ना केवल मिडिल ईस्ट के देशों में संकट पनप रहा है बल्कि दुनियाभर में हलचल मची हुई है। दुनियाभर में ऊर्जा संकट मंडरा रहा है और तेल-गैस की कीमतें आसमान की और भागने को तैयार हैं। इस तेल संकट को लेकर अमेरिका खुद भी घबराया हुआ है। उसने पहले रूसी तेल खरीद पर तले प्रतिबंधों में ढील दी थी तो अब ईरान के तेल पर लगे प्रतिबंधों में भी छूट देने का एलान किया है।

अमेरिका ने क्या कहा?

इसके छूट के तहत 20 मार्च तक जहाजों पर लादा गया तेल 19 अप्रैल तक उतारा जा सकता है। यह युद्ध शुरू होने के बाद तीसरी बार है जब इस तरह की अस्थायी राहत दी गई है। अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर इसकी जानकारी दी। उन्होंने कहा कि इस कदम से वैश्विक ऊर्जा सप्लाई बढ़ेगी। स्कॉट बेसेंट ने लिखा, “ईरान वैश्विक आतंकवाद का मुख्य केंद्र है और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ के जरिए अमेरिका इस लड़ाई में पहले से भी तेजी से आगे बढ़ रहा है।”

बेसेंट ने लिखा, “ईरान द्वारा वैश्विक ऊर्जा ढाँचों पर किए गए हमलों के जवाब में ट्रंप प्रशासन ने फैसला किया है कि वह अमेरिका की आर्थिक और सैन्य ताकत का इस्तेमाल करके दुनिया में ऊर्जा की सप्लाई को बढ़ाएगा, उसे मजबूत करेगा और बाजार को स्थिर बनाए रखेगा। इसी के तह, अमेरिकी वित्त विभाग ने एक सीमित और थोड़े समय के लिए अनुमति दी है जिससे समुद्र में फँसे हुए ईरानी तेल को बेचा जा सके।”

चीन जमा कर रहा है तेल: अमेरिका

स्कॉट बेसेंट का कहना है कि इस युद्ध और प्रतिबंधों के बीच ईरान के तेल को खरीदकर चीन जमा कर रहा है। उन्होंने कहा, “अभी की स्थिति यह है कि प्रतिबंधों के कारण ईरान का तेल सस्ता खरीदकर चीन जमा कर रहा है। अब इस फँसे हुए तेल को अस्थायी रूप से वैश्विक बाजार में लाकर, अमेरिका करीब 14 करोड़ (140 मिलियन) बैरल तेल दुनिया को उपलब्ध कराएगा। इससे वैश्विक ऊर्जा सप्लाई बढ़ेगी और जो अस्थायी कमी आई है उसे कम करने में मदद मिलेगी।”

किस तेल को मिली छूट?

बेसेंट ने बताया है कि यह अनुमति केवल उस तेल के लिए है जो पहले से रास्ते में है। उन्होंने कहा, “इससे नए तेल की खरीद या उत्पादन की इजाजत नहीं दी गई है। साथ ही, ईरान के लिए इस बिक्री से होने वाली कमाई तक पहुँच बनाना भी मुश्किल रहेगा। अमेरिका ईरान पर आर्थिक दबाव बनाए रखेगा और उसे अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सिस्टम से दूर रखने की कोशिश जारी रखेगा।”

अमेरिका का कहना है कि अब तक ट्रंप प्रशासन ने करीब 44 करोड़ (440 मिलियन) बैरल अतिरिक्त तेल वैश्विक बाजार में लाने की दिशा में काम किया है। अमेरिका इसके जरिए ईरान की उस रणनीति को कमजोर करने की कोशिश कर रहा है जिसके जरिए ईरान ‘स्ट्रेट ऑफ हार्मुज’ में रुकावट डालकर दबाव बनाने की कोशिश में है।

क्यों तेल के खेल में मात खा रहा अमेरिका?

28 फरवरी से ईरान के खिलाफ शुरू हुईं अमेरिका और इजरायल की एयरस्ट्राइक के बाद ईरान ने जवाबी हमले किए हैं। इसमें मिडिल ईस्ट में तेल डिपो और गैस डिपो जैसी महत्वपूर्ण जगह भी शामिल हैं। इसके बाद ईरान ने स्ट्रेट ऑफ हार्मुज से ईंधन लेकर गुजरने वाले जहाजों की आवाजाही को भी लगभग रोक दिया है। इस स्ट्रेट से दुनिया के ईंधन का करीब 20% हिस्सा गुजरता है और इसके बंद होने से वैश्विक ऊर्जा बाजार को बड़ा झटका लगा है।

इसके बाद दुनिया में ऊर्जा संकट खड़ा हो रहा है और जाहिर है कि इसके लिए दुनियाभर के देश अमेरिका को जिम्मेदार ठहराएँगे जिससे दुनिया में उसकी थू-थू होगी। अमेरिका इसी थू-थू से बचने की कोशिश में लगा है। CNN की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि ट्रंप प्रशासन के अधिकारी ऊर्जा संकट से निपटने के लिए हर कोशिश आजमा रहे हैं और इसके लिए भले ही उन्हें उसी देश पर लगे प्रतिबंधों में ढील क्यों न देनी पड़े, जिससे वे लड़ रहे हैं।

हालाँकि, ईरान के साथ युद्ध के तीन हफ्ते बाद ही प्रशासन के बाद आसमान छूती कीमतों को काबू करने के विकल्प तेजी से कम हो रहे हैं। अधिकारी मान रहे हैं कि इस युद्ध के चलते बढ़ी कीमतें कई महीनों तक बनी रह सकती हैं। अब अमेरिका सरकार ने अपने सारे हथियार इस्तेमाल कर लिए हैं और सरकार के पास जो विकल्प बचे हैं वे या तो ज्यादा असरदार नहीं हैं या फिर इतने कठोर हैं कि उन्हें लागू करना मुश्किल है।

ट्रंप के प्रशासन ने पहले ही रणनीतिक भंडार से करोड़ों बैरल तेल जारी करने का फैसला लिया है। रूसी तेल पर कुछ प्रतिबंधों में ढील दी है और अमेरिका के भीतर तेल की सप्लाई तेज करने के कदम उठाए हैं। ट्रंप प्रशासन में ऊर्जा विभाग के वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि यह तेल बाजार में अब तक की सबसे बड़ी बाधा है। उन्होंने कहा, “कमी इतनी ज्यादा है कि जो कदम उठाए जा रहे हैं, वे उस कमी के सामने बहुत छोटे पड़ रहे हैं।”

दोधारी तलवार पर अमेरिका

इस फैसले की छवि (optics) थोड़ी उलझी हुई लगती है। एक तरफ अमेरिका सैन्य रूप से ईरान की सरकार को कमजोर करने की कोशिश कर रहा है लेकिन दूसरी तरफ उसी ईरान को आर्थिक फायदा भी मिलने दे रहा है। इससे साफ संकेत मिलता है कि स्ट्रेट ऑफ हार्मुज को बंद करके ईरान ने अमेरिका पर कितना बड़ा आर्थिक और राजनीतिक दबाव बना दिया है।

फिर भी अमेरिका के अंदर यह माना जा रहा है कि इस फैसले के फायदे, नुकसान से ज्यादा हैं। करीब 14 करोड़ (140 मिलियन) बैरल तेल बाजार में लाने से सप्लाई की कमी कुछ हद तक कम हो सकती है और कीमतों को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।

ट्रंप प्रशासन के अधिकारी यह भी कह रहे हैं कि इससे ईरान को बहुत बड़ा फायदा नहीं होगा क्योंकि यह वही तेल है जो पहले से ही समुद्र में मौजूद था। यानि कोई नई कमाई नहीं हो रही सिर्फ पहले से उपलब्ध तेल को बाजार में लाया जा रहा है।

क्या भारत खरीदेगा ईरानी तेल?

अमेरिका द्वारा प्रतिबंधों में ढील दिए जाने के बाद एशिया के दूसरे देशों के साथ-साथ भारत की रिफाइनरियाँ भी ईरान से कच्चा तेल खरीदने की तैयारी कर रही हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की 3 रिफाइनिंग कंपनियों के सूत्रों ने कहा है कि वे ईरानी तेल खरीदना चाहती हैं लेकिन इसके लिए उन्हें सरकार के निर्देशों और वॉशिंगटन से कुछ अहम बातों पर स्पष्टता का इंतजार है। कंपनियाँ जानना चाहती हैं कि इस तेल का भुगतान कैसे किया जाएगा।

ब्रज के गौरक्षक चंद्रशेखर महाराज, जिनकी ट्रक से कुचलकर गई जान: जानिए कैसे मिला था उन्हें ‘फरसा वाले बाबा’ का नाम

धर्मनगरी मथुरा में गौरक्षा के सबसे बड़े नायक माने जाने वाले संत चंद्रशेखर, जिन्हें ब्रज के लोग सम्मान से ‘फरसा वाले बाबा’ पुकारते थे, अब हमारे बीच नहीं रहे। शुक्रवार (20 मार्च 2026) तड़के करीब 4 बजे, जब पूरा इलाका नींद में था, तब बाबा अकेले ही गोतस्करों के एक काल बनकर उनका पीछा कर रहे थे।

इसी दौरान एक हादसे में उन्हें ट्रक ने कुचल दिया, जिससे मौके पर ही उनकी मृत्यु हो गई। इस घटना ने पूरे उत्तर प्रदेश को झकझोर कर रख दिया है और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने खुद इस मामले का संज्ञान लेते हुए आरोपितों के खिलाफ पाताल से ढूँढकर कड़ी कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं।

कौन थे ‘फरसा वाले बाबा’ संत चंद्रशेखर?

संत चंद्रशेखर महाराज मथुरा के कोसीकलां क्षेत्र के एक समर्पित गौ सेवक और संत थे, जो पिछले कई वर्षों से ब्रज की गायों को तस्करों से बचाने के लिए एक दीवार की तरह खड़े थे। उन्हें ‘फरसा वाले बाबा’ इसलिए कहा जाता था क्योंकि वे हमेशा अपने साथ एक छोटा फरसा रखते थे, जो उनके साहस और अधर्म के प्रति कड़े विरोध का प्रतीक था। वे केवल प्रवचन देने वाले संत नहीं थे, बल्कि वे जमीन पर उतरकर आधी रात को भी तस्करों की सूचना मिलते ही अपनी बाइक से उनका मुकाबला करने निकल पड़ते थे।

ब्रज के गाँवों में उनकी छवि एक रक्षक की थी, जो गोवंश की सुरक्षा के लिए अपनी जान हथेली पर लेकर चलते थे। उनके अनुयायियों का मानना है कि उन्होंने अपना पूरा जीवन श्री कृष्ण की लाडली गायों की सेवा में समर्पित कर दिया था। स्थानीय गौरक्षा संगठनों में उनकी बात पत्थर की लकीर मानी जाती थी और वे युवाओं के लिए प्रेरणा के सबसे बड़े स्रोत थे। उनके जाने से गौरक्षा आंदोलन को एक ऐसी क्षति हुई है, जिसकी भरपाई कभी नहीं की जा सकेगी।

साजिश के तहत हुई निर्मम हत्या

घटनाक्रम के अनुसार, शुक्रवार (20 मार्च 2026) तड़के बाबा को गुप्त सूचना मिली थी कि तस्कर गायों से भरा एक ट्रक लेकर नवीपुर गाँव के पास से गुजरने वाले हैं। बिना किसी डर के, बाबा ने अपनी बाइक उठाई और अकेले ही उस ट्रक को रोकने के लिए निकल पड़े। पीछा करने के दौरान जब तस्करों को लगा कि वे पकड़े जा सकते हैं, तो उन्होंने अपनी गाड़ी रोकने के बजाय जानबूझकर बाबा की बाइक में जोरदार टक्कर मारी और उन्हें रौंदते हुए फरार हो गए।

टक्कर इतनी जबरदस्त थी कि बाबा चंद्रशेखर की मौके पर ही मौत हो गई। हालाँकि, मौके पर मौजूद कुछ स्थानीय लोगों ने हिम्मत दिखाते हुए ट्रक का पीछा किया और भाग रहे एक मुस्लिम आरोपित को दबोचकर पुलिस के हवाले कर दिया, जबकि उसके तीन अन्य साथी अंधेरे का फायदा उठाकर भागने में सफल रहे। इस घटना को लोग महज एक हादसा नहीं, बल्कि गोतस्करों द्वारा रची गई एक सोची-समझी साजिश और प्रतिशोध का हिस्सा मान रहे हैं।

हालाँकि बाद में पुलिस ने बताया कि बाबा चंद्रशेखर की मौत हादसे में हुई थी। पुलिस ने बताया कि वो जिस ट्रक को रुकवा कर तलाशी रहे थे, उस पर किराने का सामान लदा था और बाबा को कुचलने वाला ट्रक दूसरा था, जिसपर सरिया लदा था। हादसे में ट्रक ड्राइवर गंभीर रूप से घायल हो गया था, जिसकी अस्पताल में मौत हो गई थी।

हाईवे पर संग्राम और सुलगता आक्रोश

बाबा की हत्या की खबर जैसे ही मथुरा और आसपास के जिलों में फैली, हजारों की तादाद में गौरक्षक और ग्रामीण दिल्ली-आगरा हाईवे पर जमा हो गए। लोगों का गुस्सा इतना ज्यादा था कि उन्होंने हाईवे को पूरी तरह ठप कर दिया, जिससे गाड़ियों की कई किलोमीटर लंबी कतारें लग गईं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि जब तक फरार तीनों हत्यारों की गिरफ्तारी नहीं होती और पीड़ित परिवार को न्याय नहीं मिलता, वे पीछे नहीं हटेंगे।

हालात उस समय और बिगड़ गए जब भीड़ और पुलिस के बीच तीखी नोकझोंक हुई। आक्रोशित लोगों ने हाईवे पर खड़े वाहनों पर पथराव शुरू कर दिया, जिसमें कई गाड़ियाँ क्षतिग्रस्त हो गईं और कुछ पुलिसकर्मी भी घायल हुए। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन को आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े और पूरे इलाके को छावनी में तब्दील करना पड़ा। वर्तमान में मथुरा के चप्पे-चप्पे पर सुरक्षा बल तैनात है, लेकिन बाबा के समर्थकों की आँखों में आँसू और दिल में सुलगता गुस्सा अभी भी बना हुआ है।

पाकिस्तान के आर्मी चीफ आसिम मुनीर ने शिया मौलवियों को घंटों सुनाया, फिर कहा- ईरान से मोहब्बत है तो वहीं जाओ: भड़के मौलवियों ने जिया-उल-हक के दौर से की तुलना

पाकिस्तान में गुरुवार (19 मार्च 2026) को हुई एक हाई-प्रोफाइल इफ्तार बैठक के बाद शिया मौलवी, फौज के मुखिया आसिम मुनीर पर भड़के हुए हैं। रावलपिंडी स्थित फौज के जनरल हेडक्वार्टर (GHQ) में आयोजित इस बैठक में पाकिस्तान के आर्मी चीफ आसिम मुनीर ने शिया मौलवियों से बातचीत की। इस दौरान मुनीर ने मौलानाओं से कहा, “अगर आपको ईरान से इतनी मोहब्बत है तो आप ईरान चले जाओ, मैं आपको बता दूँ कि जिन्ना एक शिया थे।”

शिया समुदाय ने मुनीर के इस लेक्चर को अपने अपमान के रूप में लेते हुए कड़ी प्रतिक्रिया दी है। इस बैठक में एक दर्जन से अधिक शिया उलेमा शामिल हुए थे। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बातचीत का माहौल शुरुआत से ही संतुलित नहीं रहा।

शिया मौलवियों ने कहा कि आर्मी चीफ मुनीर ने लंबे समय तक केवल अपनी बात रखी और उलेमा को बीच में बोलने या अपनी बात विस्तार से रखने का मौका ही नहीं दिया गया। इससे बैठक धीरे-धीरे एकतरफा होती चली गई और कई मुद्दों पर असहमति उभरकर सामने आई।

शिया धर्मगुरुओं की प्रतिक्रिया और आरोप

शुक्रवार (20 मार्च 2026) को इस्लामाबाद में शिया धर्मगुरु अल्लामा आगा शिफा नजफी ने खुलासा किया कि बैठक के दौरान असीम मुनीर का रवैया काफी सख्त और आपत्तिजनक था। उन्होंने आरोप लगाया कि बातचीत के दौरान फील्ड मार्शल ने शिया समुदाय को लेकर ऐसी टिप्पणी की, जिससे उन्हें अपमानित महसूस हुआ।

नजफी ने बताया कि बैठक की शुरुआत में ही असीम मुनीर ने अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत के बाद इस्लामाबाद और पाकिस्तान के कब्जे वाले गिलगिट-बाल्टिस्तान में हुए प्रदर्शनों पर नाराजगी जताई। उन्होंने खासतौर पर फौज की एक इमारत को जलाए जाने की घटना को अस्वीकार्य बताया।

नजफी के अनुसार, माहौल काफी तनावपूर्ण हो गया तो उन्होंने खुद हस्तक्षेप करते हुए मुनीर को याद दिलाया कि पाकिस्तान की फौज में बड़ी संख्या में शिया अधिकारी भी सेवा दे रहे हैं। उन्होंने अपने परिवार का उदाहरण देते हुए बताया कि उनके मामा अमीर हयात को ‘सितारा-ए-जुर्रत’ से सम्मानित किया जा चुका है और उनके अन्य परिजन भी फौज में रह चुके हैं।

नजफी का कहना है कि इस पर असीम मुनीर का लहजा कुछ नरम पड़ा लेकिन इसके बाद उन्होंने फिर वही टिप्पणी दोहराई कि अगर शिया समुदाय को ईरान से इतना लगाव है, तो उन्हें वहाँ चले जाना चाहिए। इस पर नजफी ने गहरी नाराजगी जताते हुए सवाल उठाया कि क्या कभी किसी शिया व्यक्ति ने इस्लामाबाद या कराची में किसी फौजी की हत्या की है?

उन्होंने यह भी कहा कि जिन तत्वों ने फौजियों के साथ बर्बरता की घटनाएँ कीं, क्या उनसे कभी यह कहा गया कि वे अफगानिस्तान चले जाएँ? लेकिन आज शिया समुदाय को इस तरह की बातें सुननी पड़ रही हैं। नजफी ने कहा कि असीम मुनीर ने बैठक में बताया कि पाकिस्तान का सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौता है। ऐसे में यदि ईरान सऊदी अरब पर हमला जारी रखता है तो पाकिस्तान को सऊदी की रक्षा के लिए कदम उठाने पड़ सकते हैं।

जिया-उल-हक दौर से तुलना, शिया समुदाय के हालात पहले से ही खराब

शिया मौलवी सैयद जवाद नकवी ने पूरे घटनाक्रम की तुलना जिया-उल-हक के दौर से की। उनका कहना है कि उस समय की तरह अब भी एक खास सोच को थोपने का माहौल बनता दिख रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि देशभक्ति की परिभाषा को सीमित किया जा रहा है और ईरान जैसे देशों से मजहबी या भावनात्मक जुड़ाव को संदेह की नजर से देखा जा रहा है।

पाकिस्तान में मजहबी अल्पसंख्यकों, खासकर शिया, अहमदिया और हजारा समुदाय स्थिति चिंताजनक है। एक ताजा रिपोर्ट में सामने आया है कि ये समुदाय लगातार सांप्रदायिक हिंसा का शिकार हो रहे हैं और सरकार उन्हें पर्याप्त सुरक्षा देने में नाकाम रही है।

एथेंस स्थित संस्था डायरेक्टस के अनुसार, कट्टरपंथी संगठन ना केवल अल्पसंख्यकों को निशाना बना रहे हैं बल्कि सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठ रहे हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इन एजेंसियों द्वारा होने वाले दुरुपयोग के खिलाफ प्रभावी कदम नहीं उठाए जा रहे जिससे स्थिति और गंभीर हो गई है।

रिपोर्ट में हाल ही में इस्लामाबाद में शिया मस्जिद पर हुए आत्मघाती हमले का उल्लेख किया गया है जिसमें 36 लोगों की मौत और करीब 170 लोग घायल हुए थे। पाकिस्तान में शिया आबादी कुल आबाद की करीब 10-15% है और यह बहुसंख्यक सुन्नी समुदायों के निशाने पर रहते हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, शिया, हजारा, अहमदिया, इस्माइली, दाऊदी बोहरा, जिक्रि, सूफी और बरेलवी समुदाय न केवल हिंसा बल्कि भेदभावपूर्ण कानूनों और कमजोर कानूनी सुरक्षा का भी सामना कर रहे हैं। इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप के हवाले से यह भी कहा गया है कि कई मामलों में आरोपितों के खिलाफ सख्त कार्रवाई न होने से ऐसे हमलों को बढ़ावा मिल रहा है।

‘गंगा किसकी है?’: इफ्तार के नाम पर नाव में मीट पार्टी करने वाले मुस्लिम युवकों को ‘The Wire’ ने दिया कवर फायर

हरीश की भी गंगा है, हारिस की भी गंगा है, हरकीरत की भी गंगा है और हैरी की भी गंगा है- इनशॉर्ट गंगा या कोई भी नदी सबकी साझा होती है। वो जाति, रंग मजहब देखे बिना सबका भरण-पोषण करती है- सुनने में ये बात कितनी तार्किक मालूम पड़ती है… है ना? The Wire की हेडिंग भी कुछ ऐसी ही है। इसमें उर्दू शायरी और शायरों का जिक्र भी है जिन्होंने गंगा के बारे में लिखा है। यानी ये साबित करने की कोशिश की जा रही है कि भाई हमारे वालों ने तो गंगा पर साहित्य भी लिखा है इसलिए गंगा हमारी है।

उनकी और उनके पुरखों की भावनाओं का क्या… जो पीढ़ियों से गंगा किनारे रहते आए हैं। यह सवाल पूछते हुए लेखिका आगे लिखती हैं कि क्या अब हम नदियों और पहाड़ों पर भी पहले अधिकार तय करने वाले हैं? 

रखशंदा जलील ये आर्टिकल लिखती हैं और पुरानी वामपंथन सीमा चिश्ती इसे शेयर करती हैं। गंगा सबकी है ये बात सही है लेकिन यहाँ कुछ फेक न्यूज फैलाई जा रही है इसलिए सबसे पहले फैक्ट्स जानने जरूरी हैं।

मुस्लिमों को यह बताया जा रहा है कि गंगा में इफ्तारी मनाने वालो को इसलिए पकड़ा गया क्योंकि वो गंगा नदी में अपना रोजा खोल रहे थे। विक्टिम कार्ड खेला जा रहा है कि उन्हें गंगा नदी में जाने से रोका जा रहा है। जबकि सच्चाई ये है कि वो उस गंगा नदी में मीट खा रहे थे। नॉनवेज बिरयानी खा रहे थे और वो भी जानबूझकर बिंदुमाधव मंदिर के पास खा रहे थे जहाँ नॉनवेज बैन है। 

सच्चाई ये है कि कोर्ट में जब इन 14 आरोपितों को पेश किया गया तो ये रोने लगे। जज के सामने कान पकड़कर माफी माँगने लगे कि उन्हें अपने किए का पछतावा है। नाव चालकों का तो आरोप है कि इन मुस्लिम युवकों ने डरा-धमकाकर और उनकी इच्छा के खिलाफ नाव को बीच गंगा में ले जाकर इस काम को अंजाम दिया। 

अब आपने वो वीडियो तो देखे होंगे कि कुछ नशेड़ी गंगा में शराब और हुक्का पीने लगते हैं। जब ये पकड़े जाते हैं तो प्रशासन एक्शन लेते हैं और फिर कानूनी कार्रवाई होती है। ऐसा इसलिए क्योंकि गंगा आपकी अय्याशी का अड्डा नहीं है, इससे हिंदुओं की धार्मिक भावनाएँ जुड़ी हुई है।

ऐसे में अगर ये नियम नदी की पवित्रता बनाए रखने के लिए अगर ये बात शराबियों पर लागू होती है तो गंगा नदी में चिकन बिरयानी से रोजा खोलने और हड्डियों को गंगा में फेंकने वालों को सहानुभूति की नजर से क्यों देखा जाए। क्यों ना इसे षड्यंत्र की नजर से देखा जाए। 

ये लोग गंगा को केवल एक नदी के तौर पर देखते हैं लेकिन हिंदुओं के लिए गंगा हिमवान की पुत्री और माँ पार्वती की बहन है। गंगा स्कंद यानी कार्तिकेय की धाय माँ है। गंगा विष्णुपदी है। गंगा शांतनु की पत्नी और भीष्म पितामह की माँ है। गंगा को भगवान शिव ने अपनी जटाओं में धारण किया है। गंगा राजा भगीरथ के 60 हजार पूर्वजों की उद्धारक है। इसीलिए गंगा हमारे लिए केवल एक बहता पानी नहीं है, वह पाप-नाशिनी है, पूजनीय है। गंगा हर एक हिंदू के जीवन में रची बसी है, चाहे वह गंगा के किनारे रहता हो या गंगा नदी से दूर।

रही बात मुस्लिमों को बैन की तो हमारा दिल बड़ा है इसलिए हम बैन तो मुस्लिमों को नहीं कर रहे हैं, लेकिन सवाल ये है कि आखिर ये सवाल ही कहा से आया कि गंगा किसकी है? हर चीज पर अधिकार जमाने का जो कॉन्सेप्ट है वो इस्लाम का ही है। काबा हमारा है, कुतुब भी हमारा है, कश्मीर हमारा है और हिंदुस्तान हमारे अब्बू का है। ये सब तो इस्लाम की भाषा है जबकि हिंदुओं ने तो कभी भी किसी तरह के कब्जे की बात ही नहीं की है।