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संसद में परिसीमन बिल से लेकर महिला आरक्षण बिल पर विपक्षी नेताओं ने मचाया बवाल: 207 vs 126 की वोटिंग के बाद 131वें संविधान संशोधन विधेयक पर हुई चर्चा, जानें क्या बदलेगा

संसद में 207 बनाम 126 की इस लड़ाई में एक तरफ सरकार इसे 'सशक्त भारत और सशक्त नारी' का कदम बता रही है, तो दूसरी तरफ विपक्ष इसे 'चुनावी फायदा और संवैधानिक धांधली' कह रहा है। 131वाँ संविधान संशोधन विधेयक केवल सीटों की संख्या नहीं बढ़ाएगा, बल्कि यह भारत के क्षेत्रीय संतुलन, महिला प्रतिनिधित्व और आने वाले दशकों की राजनीति की दिशा भी तय करेगा।

संसद के विशेष सत्र में गुरुवार (16 अप्रैल 2026) को भारी हंगामे, तीखी नोकझोंक और विपक्षी घेराबंदी के बीच मोदी सरकार ने 131वाँ संविधान संशोधन विधेयक, 2026 लोकसभा में पेश कर दिया है। इस बिल को सदन के पटल पर रखने की प्रक्रिया ही किसी बड़े राजनीतिक संग्राम से कम नहीं रही।

विपक्ष द्वारा मत विभाजन (वोटिंग) की माँग के बाद जब आँकड़े सामने आए, तो सरकार के पक्ष में 207 वोट पड़े, जबकि बिल को पेश करने के विरोध में 126 सदस्यों ने मतदान किया। इस मतदान के साथ ही साफ हो गया कि सरकार न केवल संख्या बल में मजबूत है, बल्कि वह देश के लोकतांत्रिक ढांचे में अब तक का सबसे बड़ा बदलाव करने के लिए पूरी तरह तैयार है। केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल द्वारा बिल पेश किए जाने के साथ ही भारत में लोकसभा की सीटों को 543 से बढ़ाकर 850 करने और महिलाओं को 33% आरक्षण देने की दिशा में विधिवत कार्यवाही शुरू हो गई है।

अमित शाह बनाम विपक्ष: मुस्लिम आरक्षण और जनगणना पर तीखी बहस

बिल पेश होने के दौरान समाजवादी पार्टी के सांसदों ने आरक्षण के भीतर आरक्षण का मुद्दा उठाया। सपा सांसद धर्मेंद्र यादव ने कहा कि जब तक मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग से कोटा तय नहीं होता, इस महिला आरक्षण का कोई औचित्य नहीं है। इस पर गृह मंत्री अमित शाह ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट कर दिया कि ‘भारत का संविधान धर्म के आधार पर आरक्षण की अनुमति नहीं देता, और यह पूरी तरह गैर-संवैधानिक है।’

जब अखिलेश यादव ने इस पर सवाल उठाए, तो अमित शाह ने पलटवार करते हुए कहा कि ‘अगर समाजवादी पार्टी को मुस्लिम महिलाओं की इतनी ही चिंता है, तो वे अपने कोटे की सभी सीटें उन्हें दे दें, हमें इसमें कोई आपत्ति नहीं है।’ अखिलेश यादव ने सरकार पर जनगणना को लेकर ‘धोखा’ देने का आरोप लगाया, जिस पर अमित शाह ने सदन को आश्वस्त किया कि जनगणना का कार्य जारी है और सरकार पहले ही निर्णय ले चुकी है कि यह जनगणना जातिगत आधार पर ही संपन्न हो रही है।

क्या है 131वाँ संविधान संशोधन बिल? 543 से 850 सीटों का सफर

इस विधेयक का मूल उद्देश्य लोकसभा की सीटों की संख्या में 56% का भारी इजाफा करना है। सरकार का तर्क है कि मौजूदा 543 सीटों का ढांचा 1971 की जनगणना पर आधारित है, जो आज की आबादी के हिसाब से अप्रासंगिक हो चुका है। 1971 में एक सांसद लगभग 10 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करता था, लेकिन आज यह संख्या बढ़कर 25 से 30 लाख तक पहुँच गई है।

इस बिल के माध्यम से सरकार एक शक्तिशाली परिसीमन आयोग का गठन करेगी। इस आयोग की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान या पूर्व न्यायाधीश करेंगे। इसमें चुनाव आयुक्तों के साथ-साथ राज्यों के प्रतिनिधि भी शामिल होंगे। यह आयोग जनसंख्या के ताजा आंकड़ों के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से तय करेगा और सीटों की संख्या को 850 तक ले जाएगा।

अनुच्छेद 82 में बदलाव: जनगणना और परिसीमन का नया लिंक

अब तक के नियम के अनुसार, परिसीमन केवल 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के आँकड़े प्रकाशित होने के बाद ही संभव था। लेकिन इस नए बिल में अनुच्छेद 82 में संशोधन का प्रस्ताव है। इसके तहत ‘जनगणना’ की परिभाषा को लचीला बनाया जा रहा है ताकि सरकार को यह अधिकार मिले कि वह संसद द्वारा निर्धारित किसी भी जनगणना (जैसे जारी जनगणना 2024-25) के आधार पर परिसीमन की प्रक्रिया शुरू कर सके।

विपक्ष इसी बात का विरोध कर रहा है। कॉन्ग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल और सपा नेताओं का आरोप है कि सरकार जनगणना और परिसीमन को अलग-अलग करके संवैधानिक परंपराओं को तोड़ रही है। हालाँकि, सरकार का कहना है कि यह बदलाव इसलिए जरूरी है ताकि महिला आरक्षण को 2029 के लोकसभा चुनावों से ही लागू किया जा सके, न कि 2034 तक इंतजार किया जाए।

महिला आरक्षण: ‘सुपरफास्ट’ मोड में 33% कोटा

इस बिल की सबसे बड़ी विशेषता महिलाओं के लिए संसद और विधानसभाओं में 33% सीटों का आरक्षण सुनिश्चित करना है। अब तक यह माना जा रहा था कि महिला आरक्षण जनगणना और परिसीमन की लंबी प्रक्रिया के बाद ही लागू हो पाएगा, जिसमें 10 साल भी लग सकते थे।

लेकिन इस नए संशोधन के जरिए सरकार ने इसे ‘फास्ट-ट्रैक’ पर डाल दिया है। बिल के प्रावधानों के अनुसार, सीटों के विस्तार के साथ ही महिला आरक्षण को प्रभावी बना दिया जाएगा, जिससे 2029 में देश की संसद का स्वरूप पूरी तरह बदला हुआ नजर आएगा।

दक्षिण भारत का कड़ा विरोध: ‘काला कानून’ और क्षेत्रीय शक्ति का डर

विधेयक के पेश होने से पहले ही इसके खिलाफ दक्षिण (साउथ) भारत के राज्यों में भारी रोष देखने को मिला। DMK सांसद टीआर बालू ने इन बिलों को ‘सैंडविच बिल’ कहा, जो आपस में गुंथे हुए हैं और दक्षिण की आवाज दबाने के लिए लाए गए हैं। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने बिल के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए इसकी कॉपी जलाई और इसे ‘काला कानून’ करार दिया।

दक्षिण के राज्यों (तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना) का तर्क है कि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण के राष्ट्रीय लक्ष्य को सफलतापूर्वक हासिल किया, लेकिन अब उन्हें इसकी ‘सजा’ मिल रही है। उनका डर है कि अगर आबादी के आधार पर सीटें बढ़ीं, तो उत्तर भारत की सीटों में भारी उछाल आएगा और संसद में दक्षिण का प्रभाव नगण्य हो जाएगा। स्टालिन ने चेतावनी दी है कि यदि दक्षिण की ताकत कम की गई, तो पूरा राज्य सड़कों पर होगा। तेलंगाना के CM रेवंत रेड्डी ने भी प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर इस प्रक्रिया पर रोक लगाने की माँग की।

उत्तर बनाम दक्षिण: राजनीतिक असंतुलन की चुनौती

वर्तमान आँकड़ों के अनुसार, दक्षिण के पाँच राज्यों के पास 129 सीटें हैं। परिसीमन के बाद, उत्तर भारत के राज्यों (जैसे यूपी, बिहार, राजस्थान) की सीटें दक्षिण के मुकाबले कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ेंगी। विपक्ष इसे ‘फेडरलिज्म’ (संघवाद) पर हमला बता रहा है। वहीं, बीजेपी नेता के अन्नामलाई ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा है कि प्रधानमंत्री यह सुनिश्चित करेंगे कि दक्षिण की किसी भी सीट में कटौती न हो, बल्कि वहाँ भी सीटों की संख्या बढ़ेगी (जैसे तमिलनाडु की सीटें 39 से बढ़कर 59 होने का अनुमान है)।

संविधान और 1971 के ‘फ्रीज’ का असली सच

संविधान का नियम बहुत सीधा है, जिस राज्य में जितनी ज्यादा आबादी, वहाँ उतनी ज्यादा लोकसभा सीटें होनी चाहिए। लेकिन 1976 में सरकार ने एक अस्थायी रोक लगा दी थी कि सीटें 1971 की आबादी के हिसाब से ही रहेंगी, ताकि राज्यों में जनसंख्या कंट्रोल करने का डर न रहे। बाद में इस रोक को 2026 तक के लिए बढ़ा दिया गया।

अब दिक्कत यह है कि उत्तर भारत में आबादी बहुत बढ़ गई है, जिससे वहाँ का एक सांसद करीब 30 लाख लोगों की जिम्मेदारी संभाल रहा है, जबकि दक्षिण में एक सांसद पर सिर्फ 15 लाख लोगों का बोझ है। इस रोक को हमेशा के लिए जारी रखना उन वोटर्स के साथ अन्याय होगा जिनकी आबादी बढ़ी है, क्योंकि यह ‘हर वोट की बराबर कीमत’ के लोकतांत्रिक नियम के खिलाफ है।

क्या दक्षिण को वाकई ‘सजा’ मिल रही है?

विपक्ष का कहना है कि यह दक्षिण के राज्यों के साथ नाइंसाफी है, लेकिन केंद्र सरकार ने साफ कर दिया है कि किसी भी राज्य की पुरानी सीटें कम नहीं की जाएँगी। सच तो यह है कि नई जनगणना के हिसाब से सभी राज्यों की सीटें बढ़ेंगी। हाँ, यह जरूर है कि उत्तर भारत की आबादी ज्यादा है, इसलिए वहाँ सीटें दक्षिण के मुकाबले ज्यादा बढ़ेंगी, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि दक्षिण को कुछ नहीं मिलेगा।

कुछ दल इसे इलाके के सम्मान और ताकत से जोड़कर विरोध कर रहे हैं, पर कानून में ऐसा कोई नियम नहीं है कि आबादी कम रखने के बदले ज्यादा सीटें दी जाएँ। आखिर किसी भी राज्य का बजट, सरकारी योजनाएँ और खर्चे भी तो वहाँ की आबादी के हिसाब से ही तय होते हैं।

मोदी सरकार का ‘हाइब्रिड फॉर्मूला’ और समाधान

2026 की जनगणना के बाद भी उत्तर और दक्षिण के बीच आबादी का अंतर 2011 के अनुमानों के मुताबिक ही रहने वाला है। केंद्र सरकार ने इस बिल में आबादी की परिभाषा में बदलाव का प्रस्ताव दिया है, जिससे संसद को यह तय करने का अधिकार मिलेगा कि किस जनगणना को आधार बनाया जाए।

इससे मोदी सरकार को वह कानूनी रास्ता मिल गया है जिससे लोकसभा का विस्तार भी हो सके और दक्षिण की सीटों को नुकसान पहुँचाए बिना अनुच्छेद 81 का पालन भी हो। संभव है कि सरकार एक ‘हाइब्रिड फॉर्मूला’ लेकर आए जिससे दक्षिण की सीटें कम न हों और प्रतिनिधित्व का संतुलन भी बना रहे।

संसद में 207 बनाम 126 की इस लड़ाई ने साफ कर दिया है कि आगामी दिन भारतीय राजनीति के लिए बहुत गहमागहमी वाले होंगे। एक तरफ सरकार इसे ‘सशक्त भारत और सशक्त नारी’ का कदम बता रही है, तो दूसरी तरफ विपक्ष इसे ‘चुनावी फायदा और संवैधानिक धांधली’ कह रहा है। 131वाँ संविधान संशोधन विधेयक केवल सीटों की संख्या नहीं बढ़ाएगा, बल्कि यह भारत के क्षेत्रीय संतुलन, महिला प्रतिनिधित्व और आने वाले दशकों की राजनीति की दिशा भी तय करेगा।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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