भारतीय संसद में महिलाओं को आरक्षण देने की कोशिश तब नाकाम हो गई, जब साल 2023 का महिला आरक्षण कानून (106वाँ संशोधन) संसद की कार्यवाही में अटक गया। अगर आज के हालात देखें, तो देश चलाने में महिलाओं की हिस्सेदारी बहुत कम है। लोकसभा में केवल 14% और राज्यसभा में 17% महिलाएँ हैं।
यह संख्या दुनिया के औसत (26%) से भी काफी कम है। सच तो यह है कि बड़े पदों पर महिलाओं का न होना सिर्फ भारत नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की एक पुरानी समस्या है। कहने को तो भारत ने नया कानून पास करके महिलाओं को बराबरी का हक देने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है, लेकिन हकीकत यह है कि यह कानून दो साल से सिर्फ कागजों पर ही है और इसके लागू होने का इंतजार खत्म ही नहीं हो रहा।
राजनीति और समाज में महिलाओं को पुरुषों के बराबर हक देने की यह बहस किसी एक देश की नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की है। संयुक्त राष्ट्र ने भी 2030 तक जो लक्ष्य तय किए हैं, उनमें ‘लैंगिक समानता’ (स्त्री-पुरुष को बराबर हक) एक मुख्य लक्ष्य है। यह साफ है कि जब तक देश के नियम बनाने में महिलाओं की बराबर की भागीदारी नहीं होगी, तब तक समानता की बात करना बेकार है।
अच्छी बात यह है कि भारत अकेला ऐसा देश नहीं है जो इसके लिए कानूनी कोशिश कर रहा है। दुनिया के कई अन्य देशों ने भी महिलाओं को राजनीति में आगे लाने के लिए कड़े कदम उठाए हैं। कुछ देशों ने संसद में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित कर दी हैं, तो कुछ ने राजनीतिक पार्टियों के लिए यह जरूरी कर दिया है कि वे चुनाव में एक तय संख्या में महिलाओं को टिकट जरूर दें।
यहाँ उन देशों की लिस्ट दी गई है जिन्होंने महिलाओं को राजनीति में बराबर का हक देने के लिए ठोस कदम उठाए हैं। इन देशों ने अपनी संसद या स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित की हैं या चुनाव में उम्मीदवारों के लिए कोटा तय किया है।
नेपाल
नेपाल में महिलाओं के लिए संसद की 33% सीटें आरक्षित हैं। यहाँ के निचले सदन (Lower House) में महिलाओं के लिए 33% और ऊपरी सदन (Upper House) में 2% कोटा तय है। इसके अलावा, स्थानीय स्तर (नगर निकाय/पंचायत) पर भी महिलाओं के लिए 33% भागीदारी अनिवार्य की गई है।
पाकिस्तान
पाकिस्तान में महिलाओं के लिए कोटा तय करने की शुरुआत तो 1965 में ही हो गई थी। लेकिन साल 2002 के बाद से वहाँ की नेशनल असेंबली (संसद) में महिलाओं की कम से कम भागीदारी 17% तय कर दी गई है।
बांग्लादेश
बांग्लादेश की संसद (जातीय संसद) के निचले सदन में कम से कम 14% सीटें महिला उम्मीदवारों के लिए रखी गई हैं। वहीं, स्थानीय स्तर के चुनावों में महिलाओं के लिए यह कोटा 33% तय किया गया है।
श्रीलंका
श्रीलंका ने भी महिलाओं को राजनीति में आगे लाने के लिए कदम उठाए हैं। यहाँ स्थानीय स्तर (Sub-national level) के निकायों में महिलाओं के लिए 25% कोटा तय किया गया है।
संयुक्त अरब अमीरात (UAE)
इस खाड़ी देश ने अपनी नेशनल काउंसिल के निचले सदन में महिलाओं के लिए 50% कोटा तय किया है, जो समानता की दिशा में एक बहुत बड़ा कदम है।
इंडोनेशिया
यहाँ संसद के निचले सदन और स्थानीय स्तर, दोनों ही जगह महिलाओं के लिए कम से कम 30% भागीदारी तय की गई है।
यूनान (ग्रीस)
यूनान की संसद के निचले सदन और स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए 40% सीटें आरक्षित रखी गई हैं।
इटली
इटली में संसद के दोनों सदनों (ऊपरी और निचले) में महिलाओं के लिए 40% सीटें तय हैं। साथ ही, स्थानीय स्तर पर भी 40% आरक्षण दिया गया है। यहाँ की राजनीतिक पार्टियों ने खुद आगे बढ़कर महिलाओं को टिकट देने का कोटा अपनाया है।
स्पेन
स्पेन में निचले सदन में 40% और ऊपरी सदन में 50% सीटें महिलाओं के लिए हैं। स्थानीय स्तर पर भी 40% सीटें आरक्षित हैं। इटली की तरह यहाँ की पार्टियों ने भी चुनाव में महिलाओं को करीब 44% टिकट देने का नियम खुद बनाया है।
नार्वे
इस देश ने स्थानीय स्तर के चुनावों में महिलाओं के लिए 40% कोटा तय कर रखा है।
दुनिया भर के मौजूदा हालात
हैरानी की बात यह है कि अमेरिका, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी और स्वीडन जैसे बड़े पश्चिमी देशों में महिलाओं के लिए संसद में कोई सीटें आरक्षित नहीं हैं। अगर 1 जनवरी 2026 तक के आँकड़ों को देखें, तो दुनिया के सिर्फ 28 देशों में 30 महिलाएँ सरकार या देश की प्रमुख (जैसे राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री) के तौर पर काम कर रही हैं। संयुक्त राष्ट्र (UN Women) के डेटा के मुताबिक, दुनिया भर के मंत्रालयों में केवल 22.4% महिलाएँ ही कैबिनेट मंत्री के पद पर हैं।
समानता अभी भी कोसों दूर
एक अनुमान के मुताबिक, जिस रफ्तार से अभी सुधार हो रहा है, उस हिसाब से राजनीति में महिलाओं को पुरुषों के बराबर हक मिलने में 2063 तक का समय लग सकता है। भले ही दुनिया के अमीर और गरीब दोनों तरह के देशों में बराबरी का यह लक्ष्य अभी दूर है, लेकिन सीटों का आरक्षण इस दिशा में एक बड़ा और जरूरी कदम साबित हुआ है।
क्यों जरूरी है महिलाओं की भागीदारी?
राजनीति में महिलाओं का आना सिर्फ दिखावे के लिए नहीं है। इसका गहरा असर देश की नीतियों और शासन पर पड़ता है। जब महिलाओं की भागीदारी बढ़ती है, तो नियम-कानून ज्यादा समावेशी और सबके भले के लिए बनते हैं। यह समाज के उन पुराने ढांचों को भी तोड़ता है जहाँ ताकत सिर्फ पुरुषों के हाथ में रही है, और महिलाओं को सार्वजनिक जीवन में अपना हक माँगने के लिए प्रेरित करता है।
(ये रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है। अंग्रेजी की रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)
लोकसभा में शुक्रवार (17 अप्रैल 2026) को मोदी सरकार ने महिला आरक्षण कानून और डीलिमिटेशन से जुड़ा 131वाँ संवैधानिक संशोधन विधेयक पेश किया। लेकिन ये बिल पास नहीं हो सका। इसके समर्थन में 298 वोट पड़े और विरोध में 230 वोट। समाजवादी पार्टी के सांसदों ने इस बिल का जबरदस्त विरोध किया। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने जोर देकर कहा कि मुस्लिम महिलाओं को भी आरक्षण मिलना चाहिए। गृह मंत्री अमित शाह ने साफ जवाब दिया कि संविधान में मुस्लिमों के लिए कोई आरक्षण का प्रावधान नहीं है।
ये पार्टी हमेशा से महिला विरोधी ही रही है। समाजवादी पार्टी ने महिला आरक्षण बिल का विरोध पहली बार नहीं किया। पहले भी यूपीए सरकार के समय और उससे पहले अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में सपा ने इसी तरह विरोध किया था। वाजपेयी सरकार के दौरान 1998 से 2004 तक सपा सांसदों ने संसद में बिल की प्रतियाँ फाड़ डाली थीं। उस समय भी उनकी चिंता मुसलमानों को लेकर थी। सपा का कहना था कि ये बिल मुसलमानों के खिलाफ जा सकता है और अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व कम हो जाएगा।
सपा और आरजेडी सांसदों ने सदन की गरिमा की थी तार-तार
13 जुलाई 1998 को दोपहर करीब 2 बजे तत्कालीन कानून मंत्री एम. थंबी दुरई 12वीं लोकसभा में 81वें संविधान संशोधन विधेयक यानी महिला आरक्षण बिल पेश करने के लिए खड़े हुए। उन्होंने बोलना शुरू किया ही था कि विपक्ष के सांसदों ने विरोध शुरू कर दिया। आरजेडी और सपा के सांसद स्पीकर की तरफ बढ़ आए। सदन में धक्का-मुक्की शुरू हो गई। माहौल गरम हो गया। बिल की प्रतियाँ हवा में उछाली जाने लगीं।
लोकसभा स्पीकर शांत करने की कोशिश कर रहे थे लेकिन कोई नहीं मान रहा था। बीच सदन में हो रही इस धक्का-मुक्की में कानून मंत्री एम. थंबी दुरई की कमीज भी फट गई। संसद की मर्यादा तार-तार हो रही थी। आरजेडी के सांसद सुरेंद्र प्रसाद यादव पर आरोप है कि उन्होंने लालकृष्ण आडवाणी से बिल की कॉपी छीनकर फाड़ दी थी।
वाजपेयी सरकार महिला आरक्षण बिल को लेकर पूरी तैयारी के साथ आई थी। उन्हें विपक्ष के विरोध का अंदाजा था लेकिन इतना नहीं कि सदन की गरिमा भंग हो जाएगी। सपा और आरजेडी के सांसदों ने मिलकर बिल को फाड़ने का तीखा विरोध जताया। ये घटना सपा के महिला आरक्षण के प्रति रवैये को साफ दिखाती है।
यूपीए शासन में सस्पेंड हुए थे सपा के 4 सांसद, रवैया वही पुराना
यूपीए शासन में भी सपा ने महिला आरक्षण बिल का विरोध किया था। मार्च 2010 में जब ये बिल पेश किया गया तो सपा और आरजेडी के सांसदों ने उग्र विरोध किया। सदन की कार्यवाही बाधित हुई। सभापति की टेबल से कागजात छीनने की कोशिश की गई। सपा के चार सांसद नंद किशोर यादव, कमाल अख्तर, वीरपाल सिंह यादव और आमिर आलम खान सहित कुल सात सांसदों को निलंबित करना पड़ा।
इन पर आरोप था कि उन्होंने तत्कालीन सभापति हामिद अंसारी की मेज से बिल की कॉपी छीनने की कोशिश की। निलंबन के बाद भी ये सांसद सदन से बाहर जाने को तैयार नहीं हुए। मार्शलों को इन्हें जबरन बाहर निकालना पड़ा। ध्यान देने वाली बात ये है कि उस समय सपा यूपीए को बाहर से समर्थन दे रही थी फिर भी महिला आरक्षण बिल का विरोध नहीं छोड़ा।
मुलायम वाला ही है अखिलेश यादव का भी रुख
आज भी सपा का रुख वैसा ही है जैसा मुलायम सिंह यादव के समय में था। अखिलेश यादव ने लोकसभा में बहस के दौरान मुस्लिम और पिछड़ी वर्ग की महिलाओं के लिए अलग आरक्षण की माँग दोहराई। लोग इसे सपा के वोट बैंक के समीकरण से जोड़कर देख रहे हैं। सपा हमेशा से कहती रही है कि बिल से सिर्फ बड़े घर की शहर की महिलाएँ फायदा उठाएँगी। गाँव की गरीब महिलाएँ इससे बाहर रह जाएँगी। लेकिन हकीकत ये है कि सपा ने महिला आरक्षण को लेकर बार-बार अड़ंगा लगाया है।
सपा के इस पुराने रवैये को देखते हुए लोकसभा में 17 अप्रैल को बिल गिरने की घटना कोई नई बात नहीं लगती। 1998 में वाजपेयी सरकार के समय सदन में जो हंगामा हुआ था वो आज भी याद किया जाता है। कानून मंत्री की कमीज फटने जैसी घटना संसद की तस्वीर को कलंकित करती है। 2010 में यूपीए के समय भी सपा ने बिल को पास नहीं होने दिया। हर बार सपा ने मुस्लिम महिलाओं का हवाला दिया लेकिन असल में महिला आरक्षण को रोकने की कोशिश की।
अखिलेश यादव आज भी वही पुरानी लाइन दोहरा रहे हैं। उन्होंने कहा कि बिना मुस्लिम और पिछड़ी महिलाओं को आरक्षण दिए बिल अधूरा है। जबकि गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट कर दिया कि संविधान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। सपा का ये रुख दिखाता है कि पार्टी महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने के बजाय अपने वोट बैंक को बचाने में ज्यादा इंट्रेस्टेड है।
सपा का इतिहास महिला आरक्षण विरोध का रहा है। मुलायम सिंह यादव से लेकर अखिलेश यादव तक एक ही रवैया दिखता है। हर बार मुस्लिम आरक्षण का मुद्दा उठाकर बिल को रोकने की कोशिश की गई। गाँव की गरीब महिलाओं को आरक्षण नहीं मिलेगा ऐसा बहाना बनाया जाता रहा। लेकिन असल में पार्टी की मंशा महिलाओं की 33 प्रतिशत भागीदारी को सीमित रखने की रही है।
कभी मुलायम सिंह यादव ने कहा था- गरीब महिलाएँ आकर्षक नहीं होती
इससे पहले, लोकसभा में सपा सांसद धर्मेंद्र यादव ने 16 अप्रैल 2026 को दावा किया कि सपा महिलाओं का सबसे ज्यादा सम्मान करने वाली पार्टी है। एनसीआरबी रिपोर्ट्स बताती हैं कि 2012-2017 में अखिलेश सरकार के समय यूपी में महिला अपराधों में भारी बढ़ोतरी हुई। 2013 में बलात्कार के 3050 मामले दर्ज हुए। 2017 में यूपी पूरे देश में महिला अपराधों में टॉप पर रहा।
आपको एक बार फिर से याद दिला दें कि सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने बदायूं गैंगरेप के बाद कहा कि लड़कियाँ दोस्ती करती हैं फिर रेप का नाम दे देती हैं। यही नहीं, उन्होंने यहाँ तक कह दिया था कि ग्रामीण और गरीब महिलाएँ आकर्षक नहीं होती।
अमेरिका में इन दिनों एक ऐसा मुद्दा तेजी से चर्चा में है जिसे कभी सिर्फ रहस्यमयी कहानियों या साजिश की थ्योरी मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता था- UFO यानी अनपहचाने उड़ने वाले ऑब्जेक्ट (Unidentified Flying Object)। अब हालात बदल चुके हैं। यह विषय सिर्फ बंद फाइलों या गुप्त रिपोर्ट्स तक सीमित नहीं रहा बल्कि अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खुले मंच पर लाकर इसे बहस का हिस्सा बना दिया है।
डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि UFO से जुड़ी दिलचस्प फाइलों को जल्द सार्वजनिक किया जाएगा। वहीं, दूसरी ओर कुछ ऐसे बयान भी सामने आए हैं जो यह इशारा करते हैं कि इस मामले की हकीकत जितनी दिलचस्प है, उतनी ही संवेदनशील और खतरनाक भी हो सकती है।
UFO को लेकर इस चर्चा के बीच एक और चौंकाने वाला पहलू सामने आया है। पिछले कुछ वक्त में अमेरिका में NASA, परमाणु और रक्षा क्षेत्र से जुड़े कई वैज्ञानिकों की रहस्यमयी गुमशुदगी और अचानक हुई मौतें। इन घटनाओं ने इस पूरे मुद्दे को और ज्यादा उलझा दिया है और कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर अमेरिका में इस समय UFO को लेकर अचानक इतनी हलचल क्यों है? क्या यह सिर्फ तकनीकी रहस्य है, या इसके पीछे कोई बड़ी और छिपी हुई सच्चाई है, जिसे अब सामने लाया जा रहा है? यही समझने की कोशिश इस लेख में की जाएगी।
राष्ट्रपति ट्रंप का बयान और UFO फाइलों के खुलासे की शुरुआत
इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए उस बयान से शुरुआत करनी होगी जिसने बहस को अब अचानक तेज कर दिया। ट्रंप ने एक बड़े सार्वजनिक कार्यक्रम में कहा है कि उन्होंने रक्षा विभाग को UFO और अनआईडेंटिफाइड एरियल फिनॉमिना (UAP) से जुड़ी सरकारी फाइलों को जारी करने का निर्देश दिया है।
उन्होंने कहा, “आप लोग इस विषय में काफी दिलचस्पी रखते हैं, इसलिए मैंने सोचा कि यही सही मंच है यह बताने के लिए कि प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। सरकार को कई बेहद दिलचस्प दस्तावेज मिले हैं और अब उनकी रिलीज जल्द शुरू होगी। इससे आप देख सकते हैं कि क्या वह घटना सही है।”
JUST IN: President Trump has directed Secretary of Defense Pete Hegseth to release government documents related to UFOs:
“We found many very interesting documents, I must say. And the first releases will begin very, very soon. So you can go out and see if that phenomena is… pic.twitter.com/rDqUF8iPJk
यह बयान कई वजहों से अहम है। पहली तो ये कि यह सीधे-सीधे इस बात को स्वीकार करता है कि सरकार के पास UFO से जुड़ी जानकारी बड़ी मात्रा में मौजूद है। दूसरी ये कि यह संकेत देता है कि इन फाइलों को अब सार्वजनिक करने का एक सुनियोजित प्रयास चल रहा है। इतिहास को देखें तो अमेरिकी सरकार ने हमेशा UFO से जुड़े मामलों को सीमित तरीके से ही साझा किया है।
20वीं सदी में Project Blue Book जैसे प्रोग्राम चलाए गए, जिनमें हजारों मामलों की जाँच हुई लेकिन अंत में यही कहा गया कि एलियन से जुड़ा कोई ठोस सबूत नहीं मिला। अब अगर दशकों बाद फिर से फाइलें खोलने की बात हो रही है, तो यह अपने आप में बड़ा बदलाव है।
पेंटागन, संसद और UFO वीडियो: जिज्ञासा नहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा का बना मुद्दा
ट्रंप के बयान के बाद अमेरिकी संसद की एक टास्क फोर्स ने पेंटागन को पत्र लिखकर 45 से अधिक वीडियो और दस्तावेज माँगे। ये वीडियो 2019 के बाद की घटनाओं से जुड़े हैं और इनमें कथित तौर पर ऐसे ऑब्जेक्ट्स दिखाई देते हैं जो पारंपरिक तकनीक से मेल नहीं खाते।
इनमें ‘सिगार आकार’ की लंबी वस्तुएँ, गोलाकार उड़ती संरचनाएँ और समूह में उड़ने वाले अज्ञात ऑब्जेक्ट्स शामिल हैं। कई मामलों में यह भी दावा किया गया है कि ये वस्तुएँ हवा में स्थिर रह सकती हैं, बिना आवाज के चलती हैं और अचानक तेज गति से दिशा बदल सकती हैं। ऐसी क्षमताएँ जो मौजूदा सार्वजनिक तकनीक से मेल नहीं खातीं।
सबसे गंभीर पहलू यह है कि इन घटनाओं को सामान्य इलाकों में नहीं बल्कि संवेदनशील क्षेत्रों, जैसे सैन्य ठिकानों, अमेरिकी एयरस्पेस और मिडिल ईस्ट में तैनात बेस के पास देखा गया। यही वजह है कि अब सांसदों ने इसे केवल रहस्य या जिज्ञासा का विषय नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा माना है।
अगर कोई अज्ञात तकनीक अमेरिकी सैन्य क्षेत्रों के आसपास सक्रिय है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि वह किसकी है और उसका उद्देश्य क्या है। हालाँकि, पेंटागन की एजेंसी AARO पहले यह कह चुकी है कि ज्यादातर UFO sightings गलत पहचान का परिणाम हैं।
लेकिन फिर भी इतने बड़े पैमाने पर वीडियो माँगे जाना और उन्हें सार्वजनिक करने की तैयारी, यह एक ऐसा विरोधाभास है जो इस पूरे मामले को और रहस्यमयी बना देता है।
‘आप मर भी सकते हैं’: UFO की सच्चाई को लेकर चौंकाने वाले दावे
UFO पर चर्चा को और सनसनीखेज बनाने वाले कुछ बयान भी सामने आए हैं। एक अमेरिकी सांसद ने चेतावनी देते हुए कहा कि UFO से जुड़ी जानकारी इतनी संवेदनशील हो सकती है और इसके बारे में जानना लोगों के लिए बहुत खतरनाक हो सकता है और जो इसको जानता है वो निशाने पर आ जाता है।
उन्होंने एक्स पर लिखा, “मैंने ऐसे सबूत देखे हैं जो इतने ज्यादा गोपनीय हैं कि सिर्फ यह जानना भी कि वे मौजूद हैं, आपको एक निशाना बना देता है।”
ऐसे बयान आधिकारिक रिपोर्ट का हिस्सा नहीं होते लेकिन वे यह जरूर दिखाते हैं कि इस विषय को लेकर अंदरखाने किस स्तर की गंभीरता या चिंता हो सकती है। इस तरह के दावे दो तरह के संकेत देते हैं। पहला ये कि जानकारी की चौंकाने वाली हो सकती है और दूसरा यह कि उसका असर केवल वैज्ञानिक नहीं, बल्कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक भी हो सकता है।
इसी बीच बराक ओबामा जैसे नेताओं के पुराने बयान भी फिर चर्चा में आ गए हैं, जिनमें उन्होंने UFO के अस्तित्व को पूरी तरह खारिज नहीं किया था लेकिन किसी बड़े एलियन षड्यंत्र से इनकार किया था। यानी एक तरफ आधिकारिक संस्थाएँ सावधानी बरत रही हैं, तो दूसरी तरफ राजनीतिक बयान इस विषय को और रहस्यमयी बना रहे हैं।
वैज्ञानिकों की गुमशुदगी और Daily Mail की रिपोर्ट से बढ़ा संदेह
UFO बहस के बीच जो दूसरी बड़ी कहानी उभरकर आई है, वह है वैज्ञानिकों की रहस्यमयी गुमशुदगी और मौत। Daily Mail की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले कुछ महीनों में करीब 11 ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें NASA, एयरफोर्स, न्यूक्लियर और हाई-टेक रिसर्च से जुड़े लोग या तो अचानक गायब हो गए या संदिग्ध परिस्थितियों में उनकी मौत हो गई। इनमें UFO से जुड़े लोग भी शामिल थे।
इनमें रिटायर्ड जनरल विलियम नील मैककासलैंड का मामला सबसे चर्चित है। वे एयर फोर्स रिसर्च लेबोरेटरी के पूर्व प्रमुख रहे हैं और अचानक बिना फोन, बिना ट्रैकिंग डिवाइस के घर से निकलने के बाद लापता हो गए। इसी तरह एयरोस्पेस इंजीनियर मोनिका जैसिंटो रेजा जो एडवांस एयरोस्पेस प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही थीं, एक हाइकिंग ट्रिप के दौरान गायब हो गईं थीं।
आज तक उनका कोई सुराग नहीं मिला। इसके अलावा फ्यूजन एनर्जी, केमिकल बायोलॉजी और अंतरिक्ष अनुसंधान से जुड़े कई वैज्ञानिक या तो मारे गए या रहस्यमयी हालात में उनकी मौत हुई। हर केस में अलग-अलग परिस्थितियाँ बताई जा रही हैं, लेकिन जब इन्हें एक साथ देखा जाता है, तो सवाल उठता है कि यह सिर्फ संयोग है या फिर किसी बड़े पैटर्न का हिस्सा।
इनमें UFO क्षेत्र से जुड़ीं 34 साल की उम्र में मृत मिलीं एमी एस्क्रिड्ज भी शामिल हैं। एंटी-ग्रेविटी टेक पर एक्सपेरिमेंट कर रही एमी ने कहा था कि उनकी जान खतरे में पड़ सकती है। एमी की जून 2022 में अलबामा में कथित तौर पर उनके सिर में गोली लगने से उनकी मौत हो गई। हालाँकि, न तो पुलिस और न ही मेडिकल जाँच करने वालों ने कभी हुई जाँच की कोई जानकारी सबके सामने जारी की है।
अपनी मौत से पहले वह एंटी-ग्रेविटी टेक्नोलॉजी पर रिसर्च कर रही थीं और उसे डेवलप करने की कोशिश कर रही थीं जो ग्रेविटी को कंट्रोल करने या कैंसल करने का एक तरीका है। UFO रिसर्चर्स ने एंटी-ग्रेविटी प्रोपल्शन पर भी काफी चर्चा की और उन्होंने दावा किया है कि यह एडवांस्ड टेक्नोलॉजी ही एलियन स्पेसक्राफ्ट को नामुमकिन स्पीड तक पहुँचने में मदद करती है। कॉन्स्पिरेसी थ्योरिस्ट्स ने यह भी दावा किया है कि US मिलिट्री सालों से इस टेक्नोलॉजी पर एक्सपेरिमेंट कर रही है लेकिन सरकार ने इस बात से इनकार किया है कि एलियन टेक्नोलॉजी मौजूद है।
अमेरिका की सीक्रेट लैब की सीक्रेट फाइल्स
डेली मेल की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि अमेरिका की सबसे गुप्त परमाणु प्रयोगशालाओं में शामिल लॉस एलामोस नेशनल लेबोरेटरी (LANL) के एक वरिष्ठ साइबर सुरक्षा अधिकारी की मौत के बाद उनके पीछे कुछ सीक्रेट फाइलें मिली हैं। इन फाइलों में यह दिखाया गया है कि अमेरिकी सरकार लंबे समय से UFO का अध्ययन कर रही है।
इन सीक्रेट फाइल्स में आंतरिक मेमो, वैज्ञानिक रिपोर्ट और तस्वीरें शामिल हैं। यह लैब उत्तरी न्यू मैक्सिको में स्थित है जो सांता फे से लगभग 35 मील उत्तर-पश्चिम में है। यह जगह UFO से जुड़ी कहानियों के कारण भी चर्चा में रहती है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि अधिकारी की मौत के बाद जब उनके बेटे जॉनी जब उनका सामान देख रहे थे तब उन्हें कुछ फाइलें मिलीं जिन पर ‘एटमॉस्फेरिक एनॉमलीज’ (वायुमंडलीय असामान्य घटनाएँ) लिखा हुआ था। इसके बाद एक खोजी पत्रकार जेरेमी कॉर्बेल ने इनका अध्ययन किया और उन्होंने डेली मेल से कहा, “यह हमारे सैन्य तंत्र के अंदर UFO पर किया गया एक असली और उच्च स्तर का वैज्ञानिक अध्ययन है।”
कॉर्बेल ने दावा किया कि इन दस्तावेजों में सरकार के उच्च स्तरीय बैठकों के रिकॉर्ड और UFO के प्रोपल्शन सिस्टम (उड़ान तकनीक) से जुड़े वैज्ञानिक अध्ययन शामिल हैं। कॉर्बेल ने कहा, “लॉस एलामोस हमेशा से एक ऐसी जगह रही है, जहां UFO से जुड़े अध्ययन के तत्व मौजूद थे… ये दस्तावेज 100 प्रतिशत सबूत हैं कि लॉस एलामोस इस विषय को बहुत गंभीरता से ले रहा था।”
साइबर सिक्योरिटी अधिकारी की सीक्रेट फाइल्स का एक हिस्सा (फोटो साभार: डेली मेल/जेरेमी कॉर्बेल)
FBI ने शुरू की जाँच, व्हाइट हाउस की सक्रियता और विदेशी साजिश की आशंका
इन घटनाओं के बाद अमेरिकी सरकार ने जाँच तेज कर दी है और फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (FBI) को इसमें शामिल किया गया है। व्हाइट हाउस ने साफ कहा है कि सभी मामलों को एक साथ जोड़कर देखा जाएगा ताकि यह समझा जा सके कि क्या इनके बीच कोई संबंध है।
पूर्व FBI अधिकारी क्रिस स्वेकर ने यह संभावना जताई है कि विदेशी ताकतें अमेरिकी वैज्ञानिकों को निशाना बना सकती हैं, ताकि संवेदनशील जानकारी हासिल की जा सके। यह थ्योरी पूरी तरह नई नहीं है। कोल्ड वॉर (शीत युद्ध) के समय से ही वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों को टारगेट करने के मामले सामने आते रहे हैं।
हालाँकि अभी तक इस बात का कोई ठोस सबूत नहीं है कि मौजूदा घटनाएँ इसी तरह की किसी साजिश का हिस्सा हैं, लेकिन जिन लोगों को निशाना बनाया गया, उनका काम और प्रोफाइल इस आशंका को पूरी तरह खारिज भी नहीं होने देता।
UFO साइटिंग्स, वायरल वीडियो और सच्चाई बनाम कल्पना की जंग
इसी दौरान UFO साइटिंग्स के कुछ नए वीडियो भी सामने आए हैं, जिनमें सबसे ज्यादा चर्चा राइट-पैटर्सन एयरफोर्स बेस के पास देखी गई रोशनियों की हो रही है। वीडियो में ट्रैंगल पैटर्न में उड़ती लाइट्स दिखाई देती हैं, जो बाद में अलग-अलग दिशाओं में बँट जाती हैं।
(फोटो साभार: Reddit)
कुछ लोगों ने इसे एलियन गतिविधि बताया जबकि विशेषज्ञों का कहना है कि यह पैराशूट फ्लेयर्स या सैन्य अभ्यास का हिस्सा हो सकता है। एक तरफ वैज्ञानिक और सैन्य विशेषज्ञ तार्किक स्पष्टीकरण देते हैं, तो दूसरी तरफ सोशल मीडिया और कुछ स्वतंत्र शोधकर्ता इसे एलियन या अज्ञात तकनीक से जोड़ते हैं।
अगर आने वाले समय में UFO से जुड़ी फाइलें वास्तव में सार्वजनिक होती हैं और FBI की जाँच में कोई कड़ी सामने आती है, तो यह मामला दुनिया के सबसे बड़े खुलासों में बदल सकता है। फिलहाल यह कहानी एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ सच्चाई और रहस्य के बीच की दूरी अभी भी बनी हुई है।
लोकसभा में समाजवादी पार्टी के सांसद धर्मेंद्र यादव ने शुक्रवार (16 अप्रैल 2026) को कहा कि समाजवादी पार्टी महिलाओं का सबसे अधिक सम्मान करने वाली पार्टी है। उन्होंने दावा किया कि सपा महिलाओं की सुरक्षा, सम्मान और हक की सबसे बड़ी हितैषी रही है। लेकिन जैसे ही यह दावा सदन में गूँजा, सत्ता पक्ष की बेंचों से हंसी की लहर उठी। ये बयान उन्होंने उस समय दिया, जब संसद में नारी शक्ति वंदन (संसोधन) अधिनियम 2026 पर चर्चा चल रही थी। महिला आरक्षण से जुड़ा ये बिल लोकसभा में गिर गया, क्योंकि सपा, डीएमके, कॉन्ग्रेस जैसी पार्टियों ने इसका खुला विरोध किया।
बहरहाल, धर्मेंद्र यादव ने जब सपा को सबसे बड़ी महिला हितैषी पार्टी बताया, उसके तुरंत बाद सोशल मीडिया पर पुरानी खबरें, न्यायालय के फैसले और उन दिनों की रिपोर्ट्स वायरल हो गईं। लोग पूछने लगे कि क्या सचमुच सपा महिलाओं की हितैषी है? या फिर यह सिर्फ एक राजनैतिक चेहरा है, जिसके पीछे 2012 से 2017 तक अखिलेश यादव की सरकार में उत्तर प्रदेश की महिलाओं की जो दर्दनाक हालत थी, वह आज भी काले धब्बे की तरह सपा के चेहरे पर चिपकी हुई है।
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) और ह्यूमन राइट्स कमीशन की रिपोर्ट्स इस सवाल का जवाब साफ-साफ देती हैं। 2012-2017 के दौरान उत्तर प्रदेश में महिला अपराधों का आँकड़ा चौंकाने वाला रहा। साल 2012 में राज्य में बलात्कार के 1963 मामले दर्ज हुए थे। 2013 में यह संख्या अचानक बढ़कर 3050 हो गई, यानी महज एक साल में 55 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोतरी। कुल महिला अपराध (क्राइम अगेंस्ट वुमेन) 2013 में 32,546 रहे।
साल 2014 में यह संख्या 38,467 तक पहुँच गई। इसके बाद तो 2016 और 2017 में यूपी पूरे देश में महिला अपराधों में सबसे ऊपर रहा। साल 2017 में अकेले यूपी में 56,011 मामले दर्ज हुए, जो पूरे देश के कुल महिला अपराधों का बड़ा हिस्सा था। एनसीआरबी के मुताबिक, उस दौरान यूपी न सिर्फ कुल संख्या में टॉप पर था, बल्कि बलात्कार, अपहरण, दहेज हत्या और छेड़छाड़ जैसे मामलों में भी अग्रणी रहा।
इटावा की घटना है जंगलराज की गवाह
ये आँकड़े सिर्फ कागज पर नहीं थे। ये असल जिंदगियों के टूटने की कहानियाँ थीं। अखिलेश यादव के गृह जिले इटावा में यादवों का आतंक ऐसा था कि बच्चियाँ और महिलाएँ अकेले घर से बाहर निकलने से काँपती थीं। गाँवों में दबंगों का राज था। पुलिस निष्क्रिय थी। न्याय की उम्मीद खत्म हो चुकी थी।
इसी दरमियान 11 मई 2014 को इटावा के सिविल लाइन थाना क्षेत्र के गौरापुरा गाँव में 15 साल की नाबालिग लड़की के साथ हुई घटना ने पूरे प्रदेश को शर्मसार कर दिया। मुख्य आरोपित सनी यादव (शादीशुदा) ने पीड़िता के घर घुसकर उसके साथ दुष्कर्म किया। लड़की ने रोते-रोते अपनी माँ को बताया। पीड़िता की माँ ने तुरंत थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई। पुलिस ने सनी यादव को गिरफ्तार कर लिया। लेकिन यहीं से दबाव शुरू हुआ।
आरोपित के परिवार ने पीड़िता की माँ पर केस वापस लेने का भारी दबाव बनाया। धमकियाँ दी गईं कि अगर जुबान खोली तो बेटी जैसा हाल किया जाएगा। लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। हालाँकि इसके बाद जब वो शौच के लिए खेत में गईं, तो उन्हें खेत में ही घेर लिया गया। आरोपित के पिता बसंतलाल यादव और उसके साथियों ने उसे निर्वस्त्र कर दिया। धारदार हथियारों से लहूलुहान कर दिया। महिला को गंभीर हालत में अस्पताल पहुँचाया गया।
उस समय अखिलेश यादव मुख्यमंत्री थे और इटावा उनका पैतृक जिला। फिर भी दबंगों का साहस ऐसा था कि किसी की परवाह नहीं की। पीड़िता की माँ की चीखें आज भी यूपी की महिलाओं के मन में गूंजती हैं, क्या वो राज्य की सरकार थी या सपा का जंगलराज था?
मुलायम सिंह यादव के बयानों को भूले तो नहीं?
इसी तरह की घटनाएँ सपा शासन में आम थीं। लेकिन सपा के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के बयानों ने महिलाओं के घावों पर नमक छिड़क दिया। अप्रैल 2014 में बदायूँ में दो बहनों के साथ गैंगरेप और हत्या के बाद मुलायम ने मुरादाबाद में कहा, “लड़कियाँ पहले दोस्ती करती हैं। फिर लड़के-लड़की में मतभेद हो जाता है। वे इसे रेप का नाम दे देती हैं। लड़कों से गलती हो जाती है। क्या रेप केस में फाँसी दी जाएगी? लड़के हैं, नादानी में रेप हो जाता है।”
यह बयान पूरे देश में आग की तरह फैला। महिलाएँ सड़कों पर उतर आईं। लेकिन मुलायम ने पीछे हटने की बजाय और विवादित बयान दिए। अगस्त 2015 में उन्होंने कहा, “एक महिला से चार लोग रेप नहीं कर सकते। रेप तो एक ही आदमी करता है, लेकिन एफआईआर में चार लोगों के नाम लिख दिए जाते हैं, जो गलत है। यूपी में तो केवल दो फीसदी रेप होते हैं।” यही नहीं, जुलाई 2014 में उन्होंने कहा, “21 करोड़ की आबादी की तुलना में यूपी में कम रेप होते हैं।” और फिर नवंबर 2014 में बाराबंकी में उन्होंने कहा, “गाँव की गरीब महिलाएँ ज्यादा आकर्षक नहीं होतीं।” उनके कहने का मतलब था कि गाँव की महिलाओं से कौन रेप करेगा?
आजम खान ने बताया था जयप्रदा की चड्ढी का रंग
मुलायम के साथी सपा के वरिष्ठ नेता आजम खान भी महिलाओं के अपमान में आगे रहे हैं। जयाप्रदा (तत्कालीन सपा सहयोगी) के बारे में उन्होंने कहा, “उनकी (जयाप्रदा की) चड्डी का रंग खाकी है।” यह टिप्पणी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता में दी गई, लेकिन महिलाओं की गरिमा को तार-तार कर गई।
यही नहीं, इससे पहले साल 2010 में महिला आरक्षण बिल पर मुलायम ने कहा था कि यह बिल नौजवानों को संसद में सीटी बजाने के लिए उकसाएगा। उन्होंने दावा किया कि बिल से सिर्फ बड़े घर की और शहर की लड़कियाँ फायदा उठाएँगी, गाँव की गरीब महिलाएँ तो आकर्षक नहीं होतीं। सपा ने 2010 में बिल का तीखा विरोध किया और सदन में हंगामा किया।
अखिलेश यादव ने भी बाद में ‘कोटा के भीतर कोटा’ की माँग करते हुए बिल का विरोध किया। उन्होंने कहा कि ओबीसी, दलित और मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग आरक्षण नहीं तो बिल अधूरा है। सपा की यह रणनीति महिलाओं की 33 प्रतिशत भागीदारी को सुनिश्चित नहीं होने देने में अहम रही।
गायत्री प्रसाद प्रजापति केस में कोर्ट ने लगाई थी फटकार, उम्रकैद की सजा
सपा सरकार में मंत्रियों और विधायकों के खिलाफ भी गंभीर मामले सामने आए। गायत्री प्रसाद प्रजापति सपा सरकार में खनन मंत्री थे। 2017 में चित्रकूट की एक महिला ने शिकायत की कि प्रजापति ने अपने सरकारी आवास पर उसे और उसकी नाबालिग बेटी के साथ गैंगरेप किया। वीडियो बनाया और धमकाया। पुलिस ने कुछ नहीं किया।
पीड़िता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट ने एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया। 2021 में लखनऊ की स्पेशल कोर्ट ने प्रजापति समेत दो अन्य को उम्रकैद की सजा सुनाई। कोर्ट ने कहा कि आरोपित ने सरकारी पद का दुरुपयोग कर नाबालिग की गरिमा लूटी। पीड़िता की बेटी की आँखों में आज भी वह रात घूमती होगी, जब उसके घर का माहौल ही उसे सबसे बड़ा खतरा बन गया। वह सोचती होगी कि क्या मंत्री का पद इतना ताकतवर था कि न्याय भी चुप रह गया?
पूर्व विधायक विजय मिश्रा पर 93 केस, रेप केस में सजा
सपा के पूर्व विधायक विजय मिश्रा पर 93 आपराधिक मामले दर्ज हैं। 2023 में भदोही की स्पेशल कोर्ट ने उन्हें 2014 के बलात्कार मामले में 15 साल की सजा सुनाई। पीड़िता एक गायिका थीं। मिश्रा ने उन्हें कार्यक्रम के बहाने बुलाया और बार-बार बलात्कार किया। कोर्ट ने उन्हें दोषी ठहराया। आज वे आगरा सेंट्रल जेल में बंद हैं। इन मामलों ने सपा की ‘महिला हितैषी’ छवि को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया।
अपने अतीत को सुधारे समाजवादी पार्टी
आज जब सपा के सांसद लोकसभा में महिलाओं का सम्मान करने का दावा करते हैं, तो पुरानी घटनाएँ और न्यायालय के फैसले उनकी पोल खोल देते हैं। सपा का इतिहास महिला आरक्षण का विरोध, विवादित बयानों और अपराधियों को संरक्षण देने का रहा है। 33 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित न हो पाने में सपा की भूमिका अहम रही। मुलायम और अखिलेश दोनों ने ‘कोटा के भीतर कोटा’ को बहाना बनाया, लेकिन असल में इनकी मंशा महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को सीमित रखने की रही।
ये घटनाएँ सिर्फ आँकड़े नहीं, बल्कि उन माँ-बेटियों की चीखें हैं, जिन्हें सपा शासन ने कभी सुरक्षा नहीं दी। आज भी जब कोई सपा नेता महिलाओं का सम्मान करने का दावा करता है, तो इटावा की पीड़िता माँ-बेटी, चित्रकूट की नाबालिग और भदोही की गायिका की याद आ जाती है। सपा को अगर वाकई महिलाओं का सम्मान करना है, तो पहले अपने इतिहास का सामना करे।
उत्तर प्रदेश के लखनऊ और गाजियाबाद में एक के बाद एक लगी आग ने झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों को भारी नुकसान पहुँचाया। लखनऊ में इस दुर्घटना में 2 मासूम बच्चों की जीवनलीला समाप्त हो गई। वहीं, दोनों ही घटनाओं में लोगों का घर-बार उजड़ गया।
लखनऊ के विकास नगर में बुधवार (15 अप्रैल 2026) शाम को झुग्गियों में सिलेंडर फटने से आग लगी, जबकि गाजियाबाद के कनवानी गाँव में गुरुवार दोपहर (16 अप्रैल 2026) भड़की आग ने सैकड़ों परिवारों को बेघर कर दिया। इन आपदाओं में प्रशासन की त्वरित कार्रवाई ने बड़ी जनहानि को रोका।
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने दोनों मामलों में पीड़ितों के लिए तत्काल प्रभाव से रिलीफ फंड जारी किया। साथ ही उनके लिए तात्कालिक रहने के इंतजाम समेत अन्य सुविधाओं का भी आदेश दिया।
हालाँकि, इन दोनों घटनाओं को आपस में जोड़कर विपक्ष और वामपंथियों ने इसे योगी सरकार की साजिश बताया और लोगों को भड़काने की कोशिश की।
लखनऊ विकास नगर अग्निकांड से हुई विपदा की शुरुआत
लखनऊ के रिंग रोड स्थित विकास नगर सेक्टर-12 के पास बुधवार शाम को एक छोटी चिंगारी ने भयानक रूप धारण कर लिया। गैस सिलेंडरों के धमाकों के साथ आग की लपटें इतनी तेजी से फैलीं कि 200 से अधिक झुग्गियाँ कुछ ही मिनटों में राख हो गईं। 30 से 50 सिलेंडर फटने से धमाकों की गूंज दूर-दूर तक सुनाई दी।
इस आगजनी में दो साल और महज दो महीने की दो सगी बहनें आग की चपेट में आ गईं। इसके अलावा आग से बचने और आग को बुझाने के प्रयास में लगभग 500 लोग झुलस गए। आसपास के 30 से अधिक घरों को खाली कराना पड़ गया।
हादसे की खबर पर दमकल विभाग, पुलिस, एसडीआरएफ, नगर निगम और नागरिक सुरक्षा की 400 से अधिक सदस्यीय टीम ने त्वरित मोर्चा संभाला और कार्रवाई की। प्रशासन की फौरी कार्रवाई ने सैकड़ों जिंदगियों को बचाया।
आग ने विकास नगर की झुग्गी बस्ती को पूरी तरह तबाह कर दिया। सैकड़ों परिवारों का सब कुछ जलकर राख हो गया। खाने-पीने का सामान, कपड़े, नगदी, दस्तावेज और बच्चों के खिलौने तक सब कुछ खत्म हो गया।
योगी सरकार ने लिया संज्ञान, संभाला मोर्चा
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने घटना की सूचना मिलते ही केंद्रीय स्तर पर निर्देश जारी कर दिए। उन्होंने अधिकारियों को मौके पर पहुँचकर राहत कार्य युद्ध स्तर पर चलाने का आदेश दिया। यह योगी सरकार की उस शासन शैली का प्रमाण है, जो विपत्ति के क्षणों में कभी पीछे नहीं हटती है।
उप-मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने खुद घटनास्थल का जायजा लिया और उच्च स्तरीय जाँच के आदेश दिए। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी स्थानीय प्रशासन को हरसंभव सहायता के निर्देश दिए। विधायक ओम प्रकाश श्रीवास्तव ने पीड़ित परिवारों से मुलाकात की और सहानुभूति जताई।
यह सब कुछ कुछ ही घंटों के अंदर हुआ, जो कि असल में सरकार की संवेदनशीलता को सामने ला रहा है। विपक्ष अक्सर योगी सरकार पर लापरवाही का आरोप लगाता है लेकिन यह घटना उनके दावों को खोखला साबित करती है। योगी सरकार ने मृतक दो बच्चों के परिजनों को 4-4 लाख रुपए की सहायता राशि तुरंत सौंपी। विधायक ओपी श्रीवास्तव ने चेक सौंपे और हर संभव मदद का भरोसा दिलाया।
विधायक ओम प्रकाश श्रीवास्तव ने बच्चों के परिजनों से मुलाकात कर सहायता राशि का चेक सौंपा
घायलों के लिए मेडिकल खर्च की व्यवस्था की गई और बीमा योजनाओं के तहत लाभ पहुँचाया गया। पिछले वर्षों में योगी जी ने ऐसी कई घटनाओं में त्वरित मुआवजा दिया। यह सहायता न केवल आर्थिक मदद है, बल्कि पीड़ितों के मनोबल को मजबूत करने का एक जरिया भी है।
कम्युनिटी सेंटर में मिली पीड़ितों को छाँव
घायलों को नजदीकी अस्पतालों में भर्ती किया गया। उनके निःशुल्क इलाज और दवाइयों की व्यवस्था सुनिश्चित की गई। एम्बुलेंस की कतारें लगी रहीं और विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीमें तैनात की गईं। बच्चों और बुजुर्गों को प्राथमिकता दी गई। आग बुझाने में दमकल की 20 से अधिक गाड़ियाँ लगीं और पुलिस ने ट्रैफिक नियंत्रण किया। एसडीआरएफ की भूमिका सराहनीय रही।
पीड़ित परिवारों के लिए नजदीकी कम्युनिटी सेंटर और मिनी स्टेडियम में अस्थायी आवास की व्यवस्था की गई। यहाँ भोजन, पीने का पानी, शौचालय और बिजली की सुविधा उपलब्ध कराई गई। घटनास्थल पर नगर निगम और रेरा की टीमों ने खाने के पैकेट बाँटे। बच्चों को किताबें और स्टेशनरी बाँटी गई।
विकास नगर में झुग्गी में रहने वाले बच्चों को प्रशासन की ओर से किताबें बाँटी गई
यह पूरी व्यवस्था सीएम के स्पष्ट निर्देश पर युद्ध स्तर पर चल रही है। सैकड़ों परिवारों को तत्काल आश्रय मिला। जहाँ विपक्ष हमेशा सरकार को नाकाम बताता है लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है।
सरकार ने अग्निकांड की उच्च स्तरीय जाँच के आदेश दिए हैं। झुग्गी बस्तियों में गैस सिलेंडरों का अवैध उपयोग, कबाड़ के ढेर और बिजली चोरी पर सख्ती बढ़ेगी। विकास नगर को पक्की बस्ती में तब्दील करने की योजना पर काम तेज होगा। योगी जी की ‘सुरक्षित यूपी’ अभियान के तहत ऐसी बस्तियों का कायाकल्प होगा। यह घटना एक सबक है, जिससे सरकार सीख रही है।
गाजियाबाद कनवानी अग्निकांड: दूसरी विपत्ति
लखनऊ की घटना के ठीक अगले दिन, गुरुवार दोपहर इंदिरापुरम के कनावनी गाँव में बिजली शॉर्ट सर्किट या कबाड़ गोदाम से आग भड़क उठी। यहाँ 150 से 200 झुग्गियाँ जलकर खाक हो गईं। सिलेंडर फटने से अफरा-तफरी मच गई, हालाँकि गनीमत ये रही कि कोई मौत नहीं हुई।
घटना में 7 से 22 दमकल गाड़ियों ने घंटों के संघर्ष के बाद आग पर काबू पाया। सैकड़ों बेघर हो गए, संपत्ति का भारी नुकसान हुआ। पुलिस और प्रशासन की त्वरित कार्रवाई ने जनहानि रोकी। यह घटना लखनऊ वाली आग से मिलती-जुलती थी। कनवानी की झुग्गी बस्ती में आग ने सब कुछ लील लिया।
अनुमान के अनुसार, परिवारों के घर, सामान, दस्तावेज सबकुछ जल गया। सिलेंडर ब्लास्ट्स के कारण यहाँ भी आग फैली। कोई हताहत न होने से राहत रही, लेकिन बेघर परिवारों का दर्द गहरा है। इलाका घनी आबादी वाला होने से यहाँ खतरा भी अधिक बढ़ गया था।
कनवानी पीड़ितों के लिए राहत पैकेज
सीएम योगी ने कनवानी घटना पर भी तुरंत संज्ञान लिया। उन्होंने हर संभव सहायता के आदेश दिए। डीएम रविंद्र मांदड़ ने मौके पर पहुँचकर जायजा लिया। प्रशासन ने एम्बुलेंस तैनात कीं और अतिरिक्त टीमें लगाईं। स्थिति ससमय नियंत्रित हो गई।
#WATCH | Ghaziabad, Uttar Pradesh: Ghaziabad District Magistrate Ravindra Kumar Mandad says, "There is Kanavani village in the Indirapuram police station area, and here there are about 150 more slum dwellings where a fire had broken out. Scrap work was being done here… 7 fire… https://t.co/P85pjry3Xkpic.twitter.com/iIOvGidFwM
बेघर परिवारों को अस्थायी आश्रय, भोजन और चिकित्सा उपलब्ध कराई गई। मुआवजे की प्रक्रिया शुरू हो गई है। नगर निगम राहत सामग्री बांट रहा है। घायलों का इलाज मुफ्त चल रहा है। यहाँ पर भी योगी सरकार की सक्रियता सराहनीय है।
दोनों अग्निकांड उत्तर प्रदेश की झुग्गी बस्तियों में भले ही एक के बाद एक हुए हों, लेकिन योगी सरकार की प्रतिक्रिया ने साबित किया कि मजबूत नेतृत्व विपदाओं पर विजय पा सकता है।
दोनों घटनाओं में त्वरित राहत, आर्थिक सहायता और जाँच से सरकार ने लोगों का विश्वास जीता। विपक्ष के आरोप खोखले साबित हुए। सरकार मे भविष्य में सुरक्षा मानकों को सशक्त करने की ओर भी काम करना सुनिश्चित किया है। योगी जी का ‘सबका साथ, सबका विकास’ इसी तरह काम कर रहा है।
झुग्गियों में रह कर गुजर बसर करने वालों को विपत्ति ने दुख दिया लेकिन योगी सरकार ने उम्मीद जगाई। उनके लक्ष्य के अनुसार, पीड़ितों का पुनर्वास होगा और यूपी सुरक्षित बनेगा। यह घटनाएँ शासन के लिए एक परीक्षा रहीं, जिसमें योगी मॉडल पूरी तरह से पास हो गया।
आज के डिजिटल दौर में मोबाइल फोन अब सिर्फ कॉल या मैसेज करने का साधन नहीं रह गया है, बल्कि यह हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का केंद्र बन चुका है। सुबह उठते ही सबसे पहले फोन देखना, रात को सोने से पहले आखिरी बार स्क्रीन स्क्रॉल करना ये आदतें अब इतनी आम हो गई हैं कि हम इन्हें सामान्य मानने लगे हैं।
खासकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स जैसे फेसबुक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब ने हमारे समय, ध्यान और मानसिक ऊर्जा पर गहरा असर डाला है। यही वह जगह है जहाँ ‘डोपामाइन स्क्रॉलिंग’ और ‘डूम स्क्रॉलिंग’ जैसी अवधारणाएँ सामने आती हैं।
डोपामाइन स्क्रॉलिंग एक ऐसी स्थिति है, जब हम बार-बार फोन उठाकर ऐसे कंटेंट को देखते रहते हैं जो हमें तुरंत खुशी या मनोरंजन देता है। दरअसल, हमारे दिमाग में एक केमिकल होता हैडोपामाइन, जो हमें अच्छा महसूस कराता है और यही हमें लगातार स्क्रॉल करते रहने के लिए प्रेरित करता है।
वहीं दूसरी तरफ ‘डूम स्क्रॉलिंग’ एक अलग लेकिन उतनी ही खतरनाक आदत है। इसका मतलब होता है बार-बार मोबाइल या सोशल मीडिया पर नकारात्मक खबरें, डराने वाली जानकारी या बुरी घटनाओं से जुड़ा कंटेंट लगातार देखते रहना भले ही उससे हमें तनाव, डर या चिंता ही क्यों न हो रही हो।
क्या होता है डोपामाइन का असर?
डोपामाइन (Dopamine) मस्तिष्क में बनने वाला एक प्रमुख न्यूरोट्रांसमीटर (केमिकल मैसेंजर) है, जिसे ‘फील-गुड’ हार्मोन भी कहा जाता है। यह हमें खुशी, उत्साह और संतुष्टि का एहसास कराता है। जब हम कोई मजेदार वीडियो देखते हैं, कोई दिलचस्प पोस्ट पढ़ते हैं या कोई नोटिफिकेशन आता है, तो दिमाग में डोपामाइन रिलीज होता है। यही हमें बार-बार फोन उठाने और स्क्रॉल करते रहने के लिए प्रेरित करता है।
शुरुआत में यह सब बहुत सामान्य लगता है और हम सोचते है, “बस 5 मिनट के लिए इंस्टाग्राम खोलता हूँ” या “एक-दो वीडियो देखकर बंद कर दूँगा।” लेकिन धीरे-धीरे यह 5 मिनट 30 मिनट में और फिर कई घंटों में बदल जाता है।
बिना किसी खास मकसद के स्क्रीन पर अंगुली चलाते रहना, एक वीडियो से दूसरे वीडियो पर जाना और समय का पता ही न चलना यही डोपामाइन स्क्रॉलिंग की असली पहचान है।
सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें यूजर को लगता है कि वह कुछ कर रहा है, लेकिन वास्तव में वह सिर्फ कंटेंट को देख रहा होता है। न कोई सीख, न कोई ठोस फायदा बस दिमाग को बार-बार छोटी-छोटी खुशी की खुराक मिलती रहती है। यही वजह है कि इसे डिजिटल लत भी कहा जाने लगा है।
इस आदत का असर सिर्फ समय की बर्बादी तक सीमित नहीं है। धीरे-धीरे यह हमारे फोकस को कमजोर करता है। लंबे समय तक किसी काम पर ध्यान लगाना मुश्किल हो जाता है।
पढ़ाई, काम या यहाँ तक कि आम बातचीत में भी ध्यान भटकने लगता है। इसके अलावा, लगातार दूसरों की परफेक्ट लाइफ देखकर खुद की जिंदगी से असंतोष बढ़ सकता है, जिससे तनाव, चिंता और कभी-कभी डिप्रेशन जैसी समस्याएँ भी सामने आती हैं।
एक और दिलचस्प पहलू यह है कि यह आदत अक्सर तब बढ़ती है जब हम खाली होते हैं या मानसिक रूप से थके हुए होते हैं। दिमाग तुरंत आसान और त्वरित खुशी चाहता है और सोशल मीडिया उसे वही देता है। लेकिन यह खुशी अस्थायी होती है और इसके खत्म होते ही हम फिर उसी जगह फंस जाते हैं।
बच्चों और युवाओं पर गहरा असर
हालाँकि यह समस्या हर उम्र के लोगों को प्रभावित करती है, लेकिन बच्चों और बड़ों पर इसका असर सबसे ज्यादा गंभीर रूप में सामने आ रहा है। आज के समय में बच्चे बहुत कम उम्र में ही स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के संपर्क में आ जाते हैं। ऐसे में उनका दिमाग, जो अभी पूरी तरह विकसित नहीं हुआ होता, इस तरह के डिजिटल रिलेशन से जल्दी प्रभावित हो जाता है।
लगातार स्क्रीन देखने की आदत बच्चों के फोकस को कमजोर कर सकता है। पढ़ाई के दौरान ध्यान भटकना, नींद का प्रभावित होना और परिवार के साथ समय कम बिताना जैसी समस्याएँ आम होती जा रही हैं।
इसके साथ ही मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर पड़ता है, जिसमें चिंता, तनाव और अकेलेपन की भावना शामिल हैं। कई बार बच्चे वास्तविक दुनिया से ज्यादा डिजिटल दुनिया में जुड़ाव महसूस करने लगते हैं, जो उनके सामाजिक विकास के लिए ठीक नहीं है।
मामला क्यों उठा और क्या बोले ब्रिटेन के प्रधानमंत्री
इस बढ़ती समस्या को लेकर अब सरकारें भी सतर्क हो गई हैं। हाल ही में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने इस मुद्दे को गंभीरता से उठाया और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर सवाल खड़े किए। उनका कहना है कि ये प्लेटफॉर्म्स ऐसे एल्गोरिद्म का इस्तेमाल करते हैं, जो यूजर्स को लंबे समय तक स्क्रीन पर बनाए रखने के लिए डिजाइन किए गए हैं।
उन्होंने यह भी संकेत दिया कि 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने जैसे कदमों पर विचार किया जा रहा है। साथ ही उन्होंने एंडलेस स्क्रॉलिंग जैसे फीचर्स को हटाने की जरूरत पर जोर दिया, क्योंकि ये बच्चों को बिना सोचे-समझे घंटों तक स्क्रीन से चिपकाए रखते हैं। उनके अनुसार माता-पिता भी सरकार से इस दिशा में हस्तक्षेप की माँग कर रहे हैं।
दुनिया भर में बढ़ती सख्ती और बदलते नियम
यह मुद्दा अब केवल एक देश तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि दुनिया के कई देशों में इस पर सख्त कदम उठाए जा रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर बैन लागू कर दिया है। इसके अलावा ग्रीस और इंडोनेशिया जैसे देश भी बच्चों के सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर काबू पाने के लिए नियम लागू कर रहे हैं।
यूरोप के कई देशों जैसे फ्रांस, स्पेन और डेनमार्क में भी न्यूनतम उम्र तय करने और पैरेंटल कंट्रोल को मजबूत करने की दिशा में काम हो रहा है। चीन ने तो पहले ही माइनर मोड लागू कर दिया है, जिसके तहत बच्चों के स्क्रीन टाइम को सीमित किया जाता है।
भारत में भी इस दिशा में कदम उठने लगे हैं, जहाँ कर्नाटक जैसे राज्य ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लागू किया है, जबकि अन्य राज्य भी इस पर विचार कर रहे हैं।
यूट्यूब का नया फीचर
इस बढ़ती चिंता के बीच यूट्यूब ने एक नया फीचर पेश किया है, जो खासतौर पर उसके शॉर्ट वीडियो सेक्शन को लेकर है। इस फीचर के जरिए यूजर अपने शॉर्ट्स देखने के समय को सीमित कर सकता है और चाहें तो इसे पूरी तरह बंद करने जैसा अनुभव भी बना सकता है।
हालाँकि यह पूरी तरह से सख्त प्रतिबंध नहीं है। अगर यूजर चाहे, तो वह एक क्लिक में उस लिमिट को नजरअंदाज कर सकता है और फिर से वीडियो देखना शुरू कर सकता है। यानी यह फीचर ज्यादा एक रिमाइंडर की तरह काम करता है, न कि पक्के तौर पर कंट्रोल की तरह।
लेकिन बच्चों के लिए स्थिति थोड़ी अलग है। अगर उनका अकाउंट गूगल फैमिली लिंक से जुड़ा है, तो इस लिमिट को हटाया नहीं जा सकता। ऐसे में माता-पिता बच्चों के स्क्रीन टाइम पर ज्यादा प्रभावी नियंत्रण रख सकते हैं।
इसकी पूरी प्रक्रिया नीचे विस्तार से दी गई है। सबसे पहले आप अपने फोन/टैबलेट/कंप्युटर में यूट्यूब को खोल लेंगे,
फिर अपने फोन में You पर क्लिक करें,
इसके बाद सेटिंग पर क्लिक करे।
सेटिंग ओपन होने के बाद चौथे ऑप्शन यानी टाइम मैनेजमेंट पर जाएँ।
उसमे लास्ट में डेली लिमिट का ऑप्शन होगा उसमे शॉर्ट्स फीड लिमिट पर क्लिक करे।
फिर आपको वह समय का ऑप्शन देगा, जिसे आप अपने हिसाब से फिक्स कर सकते हैं।
समाधान क्या हो सकता है?
इस पूरी समस्या का समाधान केवल टेक्नोलॉजी या कानून से संभव नहीं है। यह एक ऐसी स्थिति है। जहाँ समाज, परिवार और सरकार तीनों को मिलकर काम करना होगा। बच्चों को शुरू से ही डिजिटल दुनिया के सही उपयोग के बारे में सिखाना जरूरी है।
स्कूलों में भी इंटरनेट के इस्तेमाल का सही ढंग सीखना चाहिए , ताकि बच्चे यह समझ सकें कि सोशल मीडिया कैसे काम करता है और उसका उनके दिमाग पर क्या असर पड़ता है। वहीं कंपनियों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी और ऐसे फीचर्स विकसित करने होंगे, जो यूजर की भलाई को ध्यान में रखें।
लगातार तीन लोकसभा चुनावों में हार झेलने के बाद कॉन्ग्रेस पार्टी की बेचैनी अब साफ नजर आने लगी है। केंद्र की सत्ता से एक दशक से बाहर रहने के बाद पार्टी के नेताओं के बयानों में आक्रामकता और हताशा दोनों दिख रही हैं।
आरोप लग रहे हैं कि कॉन्ग्रेस अब आत्ममंथन की बजाय सड़क पर असंतोष खड़ा कर राजनीतिक जमीन तलाशने में जुटी है। यही वजह है कि नोएडा में मजदूरों के प्रदर्शन के नाम पर हुई हिंसा और आगजनी भी कॉन्ग्रेस को गलत नहीं लग रही। पार्टी प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत का रुख ही देख लीजिए।
उन्होंने उपद्रवियों की भूमिका पर सवाल उठाने के बजाय सीधे मोदी मॉडल को जिम्मेदार ठहरा दिया। यह तब है जब जाँच एजेंसियाँ साफ संकेत दे रही हैं कि हिंसा में मजदूरों के साथ-साथ बाहरी तत्व भी शामिल हो सकते हैं और बड़ी साजिश की आशंका से इनकार नहीं किया जा रहा।
सुप्रिया श्रीनेत का सरकार पर हमला
श्रीनेत ने कहा, “क्या यह सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था सिर्फ अरबपतियों के लिए है? क्या यही नरेंद्र मोदी का क्रूर अमृत काल है, जहाँ देश को लूटकर कुछ लोगों को अमीर बनाया जा रहा है और जो लोग देश बनाते हैं उन्हें बदहाल छोड़ा जा रहा है?”
नरेंद्र मोदी और BJP यह बताते नहीं थकते कि भारत दुनिया की Fastest growing इकॉनमी है, चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, हम विश्वगुरु हैं, वगैरह वगैरह…
इसके साथ ही देश का मीडिया – हर टीवी चैनल, रेडियो, अखबार तुरंत सरकार के सुर में सुर मिलाने लग जाते हैं, लेकिन इसी गाने-बजाने और… pic.twitter.com/WSOui7EQmv
उन्होंने आगे कहा, “मोदी सरकार ने नवंबर 2025 में 4 लेबर कोड बिना किसी चर्चा के लागू कर दिए, जिससे काम के घंटे 12 घंटे तक बढ़ गए। आज उसी आधार पर शोषण हो रहा है। सरकार जब भी कोई नीति लाती है, उसका नुकसान कर्मचारियों और मजदूरों को होता है, जबकि अडानी जैसे लोगों के लिए सब ठीक रहता है।”
उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा, “अगर सरकार समय रहते ध्यान नहीं देगी तो आने वाले दिनों में हालात और खराब होंगे क्योंकि भाषण से पेट नहीं भरता और नारे से घर नहीं चलते।”
हैरानी की बात यह रही कि कॉन्ग्रेस ने इस पूरी घटना को एक सकारात्मक संकेत की तरह पेश किया। पार्टी की ओर से कहा गया कि “देश कम से कम अब हिलना शुरू हो गया है।”
श्रीनेत ने कहा, “लेकिन इस सबके बीच एक उम्मीद की किरण भी है। लोगों का सब्र टूट चुका है और अब वे अपने हक की माँग कर रहे हैं। आप कुछ भी कहिए, लेकिन देश अब हिलना शुरू हो गया है।”
जाँच एजेंसियों का दावा, साजिश की आशंका
दूसरी तरफ जाँच एजेंसियों का कहना है कि नोएडा हिंसा में बाहरी तत्वों की भूमिका है। मामले में संगठित दुष्प्रचार, अशांति फैलाने की साजिश, यहाँ तक कि पाकिस्तान और नक्सली कनेक्शन तक की जाँच की जा रही है।
लेकिन कॉन्ग्रेस ने इन दावों को खारिज करने की कोशिश की। श्रीनेत ने कहा, “सरकार समाधान ढूँढने की बजाय इसे अंतरराष्ट्रीय साजिश बता रही है। वे पाकिस्तान का हाथ बता रहे हैं। मतलब अपने हक के लिए आवाज उठाना भी अब साजिश हो गया है?”
हिंसा को आंदोलन की तरह पेश करने का आरोप
आलोचकों का कहना है कि कॉन्ग्रेस इस तरह की घटनाओं को एक बड़े जनआंदोलन या क्रांति की शुरुआत के रूप में पेश कर रही है। यानी सड़क पर हो रही हिंसा और तोड़फोड़ को एक राजनीतिक अवसर के रूप में देखा जा रहा है।
उदाहरण के लिए 2019 में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ आंदोलन के दौरान सोनिया गाँधी ने ‘आर या पार की लड़ाई’ का नारा दिया था। उन्होंने लोगों से सड़कों पर उतरने और कुर्बानी देने तक की बात कही थी।
शुरुआती शांतिपूर्ण प्रदर्शन जल्द ही चक्का जाम और हिंसा में बदल गए। शरजील इमाम जैसे लोगों ने देश को बांटने और रास्ते जाम करने की बात कही, वहीं उमर खालिद जैसे लोगों पर दंगों के लिए गुप्त बैठकों के जरिए लोगों को भड़काने के आरोप लगे।
बाद में इन प्रदर्शनों ने कई जगह हिंसक रूप ले लिया था। वही 2025 में वक्फ संशोधन बिल के खिलाफ भी विरोध प्रदर्शन हुए, जिनमें कई जगह हिंसा देखने को मिली खासकर पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में उस समय भी कॉन्ग्रेस और अन्य विपक्षी दल सरकार के खिलाफ हमलावर थे।
राहुल गाँधी के चुनावी आरोप
कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी पिछले कुछ समय से लगातार EVM, VVPAT, वोटर लिस्ट और फर्जी वोटरों को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। उन्होंने चुनाव आयोग पर भी आरोप लगाए, लेकिन इन दावों का अब तक कोई ठोस असर नहीं दिखा।
कॉन्ग्रेस ने ‘जितनी आबादी उतना हक’ जैसे नारे के जरिए जाति आधारित राजनीति को भी हवा देने की कोशिश की है। इसमें आरक्षण बढ़ाने और संपत्ति के बंटवारे जैसे मुद्दे शामिल हैं। अब कॉन्ग्रेस मजदूरों के वेतन और अधिकारों के मुद्दे के साथ-साथ लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने यानि डिलिमिटेशन जैसे मुद्दों को लेकर सरकार के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश कर रही है।
सड़क से सत्ता तक का रास्ता?
कॉन्ग्रेस का मौजूदा रुख यह संकेत देता है कि पार्टी सरकार के खिलाफ जन असंतोष को एक बड़े आंदोलन में बदलने की कोशिश कर रही है। ‘देश हिलना शुरू हो गया है’ जैसे बयान इसी रणनीति की तरफ इशारा करते हैं, जहाँ सड़क पर हो रही हलचल को राजनीतिक बदलाव के अवसर के रूप में देखा जा रहा है जैसा हुमए नेपाल और बांग्लादेश में देखने को मिला भले ही उसमें हिंसा और अराजकता के तत्व क्यों न शामिल हों।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
हिंदू लड़कियों के साथ लगातार सामने आ रही लव जिहाद की खबरें थमने का नाम नहीं ले रही हैं। सबसे बड़ी बात ये है कि कट्टरपंथी इसको अंजाम देने के लिए अब जिम जैसी जगहों का सहारा लेने लगे हैं, जहाँ शक की गुंजाइश कम हो और भोली-भाली हिंदू लड़कियों को फँसाया जा सके।
जाहिर सी बात है कि वर्कआउट के लिए जाने वाले लोग रेग्युलर भी होंगे तो ब्रेनवॉश करने और झूठे प्रेमजाल में फँसाने में मदद मिलेगी क्योंकि एक ही बात दिमाग में रोज डाली जाएगी, शोषण भी हर दिन होगा और कट्टरपंथियों के अपने घटिया उद्देश्य में सफल होने के चांसेज ज्यादा होंगे।
जिम जिहाद का ताजा मामला उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद से सामने आया है, जहाँ ग्लोबल जिम के संचालक सुहैल मलिक पर एक हिंदू युवती ने रेप, अश्लील वीडियो बनाने और चार लाख रुपए वसूलने का आरोप लगाया है। पुलिस ने सुहैल मलिक और उसके साथी सादान सैफी के खिलाफ दुष्कर्म, ब्लैकमेल कर वसूली, आईटी एक्ट एवं धमकी की धारा में FIR लिखी है।
UP के मुरादाबाद में जिम छोड़ने पर भी सुहेल ने नहीं छोड़ा पीछा, 4 साल तक किया प्रताड़ित
पीड़िता के अनुसार, उसने 4 मार्च 2022 से हिमगिरी स्थित एक जिम में जाना शुरू किया था। कुछ ही समय बाद जिम संचालक सुहैल मलिक ने उसका पीछा करना शुरू कर दिया। एक दिन जिम के अंदर ही उसे रोककर आरोपित ने डराया-धमकाया और उसके साथ दुष्कर्म किया। इस दौरान उसने अश्लील वीडियो भी बना लिया।
इसके बाद आरोपित ने उसी वीडियो के जरिए युवती को ब्लैकमेल करना शुरू कर दिया। वीडियो वायरल करने की धमकी देकर उससे धीरे-धीरे चार लाख रुपए से अधिक की रकम वसूल ली गई। पीड़िता ने बताया कि विरोध करने पर आरोपित उसे इंटरनेट पर बदनाम करने की धमकी देता था, जिससे वह लगातार मानसिक दबाव में रही।
पीड़िता ने बताया कि आरोपित की हरकतें यहीं नहीं रुकीं। जिम में ट्रेनिंग के दौरान वह गलत तरीके से छूता था और विरोध करने पर धमकाता था। डर के कारण युवती लंबे समय तक चुप रही, लेकिन आरोपित लगातार उसे परेशान करता रहा।
यहाँ तक कि जब पीड़िता ने जिम जाना बंद कर दिया, तब भी आरोपित ने उसका पीछा नहीं छोड़ा। रास्ते में रोककर उसे धमकाया जाता और ब्लैकमेल जारी रखा गया। करीब चार साल तक इस प्रताड़ना को झेलने के बाद जब स्थिति असहनीय हो गई, तब पीड़िता ने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के पास जाकर पूरी घटना की जानकारी दी। पीड़िता ने पुलिस को यह भी बताया कि आरोपित इससे पहले भी कई हिंदू युवतियों को इसी तरह फँसा चुका है। जिम में पहले कई युवतियाँ आती थीं, लेकिन ब्लैकमेलिंग शुरू होने के बाद उन्होंने आना बंद कर दिया। इस खुलासे के बाद पुलिस ने इस एंगल से भी जाँच शुरू कर दी है कि कहीं यह एक संगठित गिरोह तो नहीं।
प्रारंभिक जाँच में यह भी सामने आया है कि जिम संचालक युवतियों से संपर्क बनाए रखने के लिए उन्हें लगातार मैसेज करते थे और धीरे-धीरे उनसे नजदीकियाँ बढ़ाते थे। इसके बाद योजनाबद्ध तरीके से उन्हें अपने जाल में फँसाकर ब्लैकमेल किया जाता था।
बता दें कि मुरादाबाद की तरह ही गुजरात से लेकर कर्नाटक से जिम जिहाद के केस सामने आए हैं। आगे इस रिपोर्ट में हम आपको उन्हीं के बारे में बताएँगे।
गुजरात में जिम ट्रेनर शब्बीर ने 7 साल से फँसा रखी थी अरबपति हिंदू की पत्नी
गुजरात के सूरत में जिम ट्रेनर शब्बीर असगर ट्रंकवाला ने हाई-प्रोफाइल हिंदू परिवार की महिला को अपने प्रेमजाल में फँसाया। सात साल तक बहला-फुसलाकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। फिर महिला की निजी तस्वीर ब्लैकमेल करने की धमकी दी और महिला के पति से ₹5 लाख ऐंठे।
दरअसल अरबपति परिवार से ताल्लुक रखने वाली महिला सिटीलाइट इलाके के ‘पूजा L1 जिम’ में जाती थी। वहाँ शब्बीर असगर नाम का एक जिम ट्रेनर था, जिसकी महिला के पैसों पर नजर थी। उसने महिला से दोस्ती करनी शुरू की, फिर धीरे-धीरे उसे अपने प्रेमजाल में फँसा लिया। यहाँ तक कि महिला को उसके पति से अलग करने की भी कोशिश की।
यह सिलसिला सात साल तक चला। महिला पूरे तरीके से जिम ट्रेनर की बातों में आ चुकी थी और अपने पति से दूरी बनाने लगी। वहीं उसका पति अपनी पत्नी के लिए चिंतित था। लेकिन जिम ट्रेनर यहाँ नहीं रुका। जिम ट्रेनर शब्बीर ब्लैकमेलिंग पर उतर आया। सात सालों में उसने महिला के साथ शारीरिक संबंध बनाए और महिला की प्राइवेट तस्वीरें खींच ली।
तस्वीरों के सहारे वह उसे लगातार ब्लकैमेल करता रहा। उसने महिला के पति को भी जान से मारने की धमकी दी थी। मामले में पुलिस ने आरोपित सब्बीर को गिरफ्तार कर लिया है।
कर्नाटक में जिम ट्रेनर समीर मुल्ला ने 10 बार कराया हिंदू युवती का गर्भपात, बहन की मदद से फँसाता था ‘काफिर’ लड़कियाँ
कर्नाटक के हुबली में जिम ट्रेनर समीर मुल्ला से जुड़ा लव जिहाद का मामला सामने आया था। समीर मुल्ला ने हिंदू पीड़िता का 10 बार गर्भपात करवाया था। इस मामले में पुलिस ने तीन अलग-अलग FIR दर्ज कर की। आरोप है कि जिम ट्रेनर समीर लड़कियों को प्यार और भरोसे के नाम पर अपने करीब लाता था।
इसके बाद उनके साथ दुष्कर्म करता और अश्लील वीडियो बनाकर उन्हें ब्लैकमेल करता था। एक पीड़िता का यह भी कहना है कि आरोपित ने उसे नशीला पदार्थ देकर अपने घर ले जाकर शोषण किया। साथ ही उसने यह आरोप भी लगाया कि उसे गर्भवती कर दिया गया और 10 बार जबरन गर्भपात की दवाइयाँ लेने के लिए मजबूर किया गया।
इतना ही नहीं इन प्रक्रियाओं के वीडियो रिकॉर्ड कर आरोपित को भेजने का दबाव भी बनाया गया। पीड़िता की शिकायत में यह भी कहा गया कि आरोपित की बहन और कुछ अन्य लोगों ने भी इस पूरे मामले में उसका साथ दिया। इन सभी आरोपों के बाद समीर को पुलिस के हवाले कर दिया गया था।
यूपी के सहारनपुर में जिम ट्रेनर शहजाद ने छात्रा के साथ किया रेप
उत्तर प्रदेश के सहारनपुर के थाना बिहारीगढ़ क्षेत्र में जिम ट्रेनर शहजाद पर एक छात्रा को नशीला पदार्थ देकर दुष्कर्म करने का गंभीर मामला सामने आया था। पुलिस ने पीड़िता की शिकायत पर त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपित शहजाद और उसके सहयोगी मुकर्रम उर्फ थाप्पुल को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था।
इटावा जिले की रहने वाली पीड़िता ने बताया था कि करीब एक साल पहले उसने बिहारीगढ़ के एक जिम में जाना शुरू किया था। इसी दौरान जिम ट्रेनर शहजाद ने उसे प्रोटीन ड्रिंक में नशीला पदार्थ मिलाकर पिला दिया और उसके साथ दुष्कर्म किया गया। पीड़िता का कहना है कि इस घटना के बाद आरोपित ने उसे धमकाकर लंबे समय तक उसका शोषण किया।
पीड़िता के अनुसार, इस पूरे मामले में मुकर्रम उर्फ थाप्पुल ने भी शहजाद का सहयोग किया। मानसिक रूप से परेशान छात्रा ने इस घटना की जानकारी हिंदू रक्षा दल के उत्तराखंड प्रदेश अध्यक्ष ललित शर्मा को दी। मामले की गंभीरता को देखते हुए ललित शर्मा ने पुलिस अधिकारियों को इसकी सूचना दी, जिसके बाद पीड़िता ने थाना बिहारीगढ़ में लिखित तहरीर दी।
यूपी के मिर्जापुर में जिम की आड़ में धर्मांतरण और ब्लैकमेलिंग का नेटवर्क
उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में धर्म परिवर्तन और नमाज पढ़ने का दबाव डालकर युवतियों के शोषण की घटना सामने आई थी, जहाँ जिम की आड़ में यह पूरा नेटवर्क चल रहा था। मामले में मो शेख अली आलम, फैजल खान, जहीर खान और शादाब को गिरफ्तार किया। बाद में पुलिस ने आरोपित जिम मालिक/ट्रेनर फरीद को एनकाउंटर के बाद गिरफ्तार किया।
पीड़ित युवतियों के अनुसार, शहर के अलग-अलग इलाकों में संचालित KGN और आयरन फायर नामक जिमों में वे व्यायाम के लिए जाती थीं। यहाँ जिम संचालक और ट्रेनर पहले उनसे दोस्ती करते, फिर प्रेम जाल में फँसाकर धीरे-धीरे धर्म परिवर्तन और नमाज पढ़ने का दबाव बनाने लगते थे।
आरोप है कि युवतियों के निजी फोटो और वीडियो बनाए गए, जिनके जरिए उन्हें ब्लैकमेल कर मानसिक, शारीरिक और आर्थिक रूप से प्रताड़ित किया गया। विरोध करने पर बदनाम करने और नुकसान पहुँचाने की धमकियाँ दी जाती थीं। पुलिस जाँच में सामने आया है कि आरोपित युवतियों से अलग-अलग मौकों पर पैसे भी वसूलते थे।
बरेली के एयू फिटनेस में ‘जिम जिहाद’ का मामला
बरेली में सामने आए जिम ट्रेनर से जुड़े मामले में महिला के भाई ने गंभीर और सनसनीखेज आरोप लगाए थे, जिनको लेकर इलाके में तनाव की स्थिति बनी थी। यह पूरा मामला उस समय उजागर हुआ था, जब एक विवाहित महिला अपने पति और पाँच साल के बेटे को छोड़कर जिम में काम के दौरान बने संबंधों के चलते जिम ट्रेनर शोएब के साथ रहने लगी थी।
महिला के भाई का आरोप था कि उसकी बहन को जिम ट्रेनर शोएब ने योजनाबद्ध तरीके से फँसाया था। भाई के अनुसार, एयू फिटनेस जिम में ‘जिम जिहाद’ चलाया जा रहा था, जहाँ मुस्लिम ट्रेनरों के जरिए हिंदू लड़कियों को प्रेम जाल में फँसाया जाता था और बाद में उन पर धर्मांतरण का दबाव बनाया जाता था।
MP के होटल में पकड़ा गया जिम ट्रेनर, पहचान छिपाने के आरोप
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में जिम ट्रेनर और युवती के होटल में पकड़े जाने का मामला सामने आया था। आरोप लगा कि युवक ने अपनी असली पहचान छिपाकर युवती से दोस्ती की थी। पकड़ा गया मजहर खान नाम का ये युवक जिम ट्रेनर था। अपनी पहचान छिपाकर हिंदू युवती को हबीबगंज इलाके के एक होटल में लेकर पहुँचा था।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, होटल में मजहर की जगह उसने अपना नाम बंटी बताया था। खबर हिंदू संगठनों को लगी तो बड़ी संख्या में कार्यकर्ता होटल पहुँच गए। युवक को पकड़कर उसकी पिटाई कर दी। इसी बीच सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुँची और युवक को पकड़कर अपने साथ थाने लेकर आई।
आरोपित मजहर, विशाल फिटनेस सेंटर में जिम ट्रेनर था। उसने अपना नाम बंटी बताकर युवती से दोस्ती बढ़ाई थी। दोनों की मुलाकात जिम में ही हुई थी। दोस्ती बढ़ने के बाद मजहर युवती को लेकर होटल गया था।
MP के जबलपुर में जिम ट्रेनर अमन खान करता था बैड टच
मध्य प्रदेश के जबलपुर की एक जिम में लव जिहाद और धर्मांतरण की कोशिश का मामला सामने आया। मामला आधारताल थाना क्षेत्र में स्थित साईं फिटनेस जिम का था। यहाँ रिसेप्शनिस्ट की जॉब करने वाली 21 वर्षीय युवती ने जिम के ट्रेनर के खिलाफ केस दर्ज करवाया।
युवती का आरोप था कि आरोपित जिम ट्रेनर अपना नाम अमन राज बताता था जबकि उसका असली नाम अमन खान था। शिकायत के अनुसार, अमन जिम में आने वाली युवतियों से बैड टच करता था और धर्मांतरण के लिए उनका ब्रेन वॉश करता था।
युवती ने आरोप लगाया कि आरोपित उसे भी बैड टच करते हुए टॉर्चर करता था, युवती हिन्दू टाईगर फोर्स नाम के संगठन के कार्यकर्ताओं के साथ आधारताल पहुँची थी जिसकी शिकायत पर पुलिस ने अमन खान पर FIR दर्ज की। पुलिस ने साईं फिटनेस जिम पहुँचकर भी जाँच की और जिम ट्रेनर अमन खान को गिरफ्तार कर लिया।
जिम ट्रेनर और युवती के साथ पकड़े जाने पर विवाद, हिंदू संगठनों ने लगाए गंभीर आरोप
मध्य प्रदेश के इंदौर के भंवरकुआँ इलाके में एक जिम ट्रेनर को युवती के साथ घूमते हुए बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने पकड़ा और उसकी पिटाई कर उसे थाने ले जाया गया। मामले में जिम ट्रेनर के खिलाफ प्रतिबंधात्मक धाराओं में कार्रवाई की और उसे जेल भी भेज दिया गया। आरोपित ट्रेनर का नाम शादाब मंसूरी था, जो पेशे से एक जिम ट्रेनर था।
बजरंग दल के जिला संयोजक विजय कलखोर ने दावा किया कि शादाब का पहले से निकाह हो चुका है और उसके दो बच्चे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि शादाब जिम में आने वाली हिंदू युवतियों से नजदीकियाँ बढ़ाकर उन्हें इस्तेमाल करता और बाद में धोखा देकर निकल लेता था।
लगातार सामने आ रहे ऐसे मामले चिंताजनक है। गौरतलब है कि ऐसे मामलों में बढ़ोतरी को देखते हुए कई अन्य राजनीतिक नेताओं के बयान भी सामने आए, जिनमें महिलाओं से सतर्क रहने और जिम चुनते समय ट्रेनरों की जानकारी रखने की अपील की गई। BJP के विधायक रामेश्वर शर्मा ने हिंदू महिलाओं से अपील की कि वे मुस्लिम ट्रेनर से सावधान रहें।
नासिक TCS कांड को लेकर पिछले दिनों पूरे देश में हल्ला मचा, लेकिन वामपंथियों की कान में जूं तक नहीं रेंगी। उन्होंने पहले इस मामले में लंबे समय तक चुप्पी साधे रखी और फिर जब बोले तो सीधा मुस्लिम आरोपितों के बचाव पर उतर आए। अब स्थिति ये है कि इस मामले को दबाने के लिए एक नई जमात को एक्टिव किया गया है जो इस खबर में नए-नए एंगल लाकर लोगों को भ्रमित कर रही है। कैसे आइए बताते हैं?
अभी तक मीडिया में आप हिंदू पीड़ितों के साथ हुए अत्याचार की खबरों को पढ़ रहे थे। मगर अब इस केस को ऐसा बनाया जा रहा है कि आपके मन में या तो मुस्लिमों आरोपितों की पीड़ित वाली छवि बने या फिर आपको ये लगे कि कहीं हिंदू ही इस मामले को बेवजगह तूल देकर किसी बेचारे को फँसा तो नहीं रहे है।
प्रेग्नेंसी और संवेदना का पुराना खेल: निदा खान और सफूरा जरगर का ‘विक्टिम’ कनेक्शन
नासिक कांड में कथित तौर पर निदा खान को HR हेड कहा जा रहा है, जिसकी भूमिका सबसे संदिग्ध मानी जा रही है। आरोप है कि निदा खान न केवल इस पूरे गिरोह की जानकारी रखती थी, बल्कि जब पीड़ित हिंदू महिलाओं ने उसके पास शिकायतें भेजीं, तो उसने कोई एक्शन लेने के बजाय उन्हें यह कहकर चुप करा दिया कि ‘ऑफिसों में यह सब चलता है।’ अब जब पुलिस का शिकंजा कसा, तो निदा खान फरार हो गई और अचानक कोर्ट में अग्रिम जमानत के लिए ‘प्रेग्नेंसी’ का तर्क सामने रख दिया। सोशल मीडिया पर एक विशेष जमात ने तुरंत यह शोर मचाना शुरू कर दिया कि एक ‘गर्भवती महिला’ को पुलिस और मीडिया परेशान कर रहा है।
Here comes the lawyer of Nida Khan: TCS Nashik Jihad Case
From the "Relationship gone wrong" article, to the wife of one of the accused saying "Her husband is innocent and is being falsely accused," to the statement of the accused’s father saying "We are educated and my son is a… pic.twitter.com/QxVObYYN7H
यह ठीक वैसा ही नैरेटिव है जैसा 2020 के दिल्ली हिंदू विरोधी दंगों के समय देखा गया था। उस वक्त मुख्य साजिशकर्ताओं में शामिल सफूरा जरगर ने भी जेल से बचने के लिए अपनी प्रेग्नेंसी का हवाला दिया था। तब भी लिबरल गिरोह ने छाती पीटते हुए सफूरा को ‘बेचारी छात्रा’ और ‘स्कॉलर’ बताया था, जबकि उस पर UAPA जैसी गंभीर धाराओं के तहत सांप्रदायिक हिंसा भड़काने का आरोप था। निदा खान हो या सफूरा, ये लोग जानते हैं कि भारतीय समाज में प्रेग्नेंसी एक संवेदनशील विषय है, इसलिए वे अपने अपराधों की गंभीरता को कम करने के लिए इसे ढाल की तरह इस्तेमाल करते हैं।
‘मेरी बहू सुंदर है तो बेटा क्यों भटकेगा?’: आरोपित की अम्मी का इमोशनल ड्रामा
नासिक TCS कांड के मुख्य आरोपित दानिश शेख की गिरफ्तारी के बाद उसकी अम्मी का एक इंटरव्यू वायरल हो रहा है जिसमें वह फूट-फूटकर रोते हुए अपने बेटे को ‘बेगुनाह’ साबित करने पर तूली है। आरोपित की अम्मी ने तर्क दिया कि उनका बेटा बहुत अच्छा इंसान है और उसका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है।
सबसे अजीबोगरीब दलील जो उन्होंने दी, वो यह थी कि ‘मेरी बहू इतनी सुंदर है, मेरा बेटा किसी और के पीछे क्यों जाएगा?’ यह तर्क देकर उन्होंने उन सभी महिलाओं के आरोपों को सिरे से खारिज करने की कोशिश की जिन्होंने दानिश पर गंभीर यौन शोषण और रेप के आरोप लगाए हैं।
आरोपित दानिश की अम्मी का कहना है कि उनका परिवार पूरी तरह टूट चुका है और उनकी बहू डिप्रेशन में है। वह धर्मांतरण के आरोपों पर कहती हैं कि ‘धर्मांतरण ऐसे नहीं होता, ये काम तो सिर्फ मौलवी करते हैं।’ लेकिन पुलिस की जाँच और दर्ज की गई 9 FIR कुछ और ही कहानी बयाँ करती हैं। जाँच में सामने आया है कि यह एक संगठित नेटवर्क था जहाँ हिंदू लड़कियों पर मानसिक दबाव बनाया गया, उन्हें बीफ खाने को मजबूर किया गया और धार्मिक टिप्पणियाँ की गईं। अम्मी के आँसू अपनी जगह हो सकते हैं, लेकिन वे उन पीड़ित लड़कियों के आँसुओं का जवाब नहीं हैं जिनका शोषण ऑफिस की आड़ में किया गया।
मौलाना और ‘स्क्रिप्टेड’ साजिश: जब कुछ न मिले तो बजरंग दल को कोस दो
इस मामले में एक और एंगल आरोपितों के रिश्तेदारों और मौलानाओं की तरफ से सामने आया। आरोपित रजा मेमन के चाचा रजाक काजी का दावा है कि यह सब कुछ एक ‘साजिश’ है और इसमें बजरंग दल शामिल है। उनका कहना है कि लड़कियों के परिवारों ने बजरंग दल को बुलाया और उनके दबाव में आकर पुलिस ने यह पूरा ‘स्क्रिप्ट’ तैयार किया।
#WATCH | Maharashtra | Nashik TCS alleged religious conversion and sexual harassment | Accused Raza Memon's uncle Razak Kazi says, "All the families are troubled. Everything is happening as per a conspiracy… The Bajrang Dal are involved in this… The girl's family called… pic.twitter.com/RcyI4ZPwHS
यह एक जाना-पहचाना पैंतरा है, जब भी कोई मुस्लिम आरोपित पकड़ा जाता है, तो उसे ‘मुस्लिम होने की सजा’ या ‘दक्षिणपंथी संगठनों की साजिश’ करार देकर असल अपराध से ध्यान भटकाने की कोशिश की जाती है। काजी का कहना है कि पुलिस ने पहले एक व्यक्ति को छोड़ा और फिर दोबारा गिरफ्तार कर लिया, जिससे साबित होता है कि सबकुछ पहले से तय था।
लेकिन वे इस बात का जवाब नहीं देते कि अगर सबकुछ स्क्रिप्टेड था, तो मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज हुए उन बयानों का क्या, जिनमें महिलाओं ने आपबीती सुनाई है? नासिक पुलिस कमिश्नर संदीप कर्णिक के अनुसार, यह मामला एक संगठित नेटवर्क जैसा है जिसमें 18 से 25 साल की लड़कियों को निशाना बनाया गया। मौलानाओं और आरोपितों के रिश्तेदारों द्वारा बजरंग दल का नाम लेना केवल मामले को सांप्रदायिक मोड़ देने की कोशिश है ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘मुस्लिम उत्पीड़न’ का रोना रोया जा सके।
आरोपित की बीवी का हिंदू पीड़िता पर वार
TCS के गिरफ्तार कर्मचारियों में से एक की बीवी ने अब मीडिया के सामने आकर नया दावा किया है। उनका कहना है कि दानिश शेख और शिकायतकर्ता महिला के बीच पहले से ‘रिलेशनशिप’ था और सब कुछ आपसी सहमति से हो रहा था। आरोपित की बीवी के अनुसार, “ऑफिस में हर कोई जानता था कि वह महिला दानिश की दीवानी थी और वह घंटों उसके काम खत्म होने का इंतजार करती थी।”
आरोपित की बीवी का कहना है कि उस महिला ने दानिश के लिए रोजा रखना और उसकी पसंद के कपड़े पहनना भी शुरू कर दिया था। अब जब उनके रिश्ते में कड़वाहट आई, तो उसने रेप और धर्मांतरण का आरोप लगा दिया। इस तर्क के जरिए आरोपित की बीवी न केवल दानिश को बचाने की कोशिश कर रही है, बल्कि अन्य 7 गिरफ्तार पुरुषों को भी निर्दोष बता रही है।
आरोपित की बीवी का कहना है कि पुलिस ने अलग-अलग मामलों को जानबूझकर एक साथ जोड़ दिया है। बीवी यह भी सवाल उठाती है कि ‘अगर उसका शौहर घर से शाकाहारी खाना ले जाता था, तो वह किसी को मांसाहार के लिए कैसे मजबूर कर सकता है?’ लेकिन यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि पुलिस ने केवल एक नहीं, बल्कि कई महिलाओं के बयानों के आधार पर केस दर्ज किया है।
एक महिला के साथ ‘रिलेशनशिप’ का तर्क देकर उन अन्य पीड़ितों के यौन शोषण और धार्मिक उत्पीड़न के आरोपों को नहीं झुठलाया जा सकता जिन्होंने इस संगठित नेटवर्क के खिलाफ आवाज उठाई है।
वामपंथी-लिबरल इकोसिस्टम की निर्लज्जता: अपराधियों के लिए आँसू, पीड़ितों के लिए खामोशी
नासिक के इस कांड ने एक बार फिर ‘लिबरल और वामपंथी’ गिरोह के दोहरे चरित्र को नंगा कर दिया है। जब तक पीड़ित हिंदू महिलाएँ अपनी गरिमा के लिए लड़ रही थीं, तब तक इन लोगों को ‘साँप सूँघ’ गया था। लेकिन जैसे ही मुस्लिम आरोपितों की गिरफ्तारी हुई, राजदीप सरदेसाई से लेकर अरफा खानम शेरवानी तक, पूरा इकोसिस्टम सक्रिय हो गया। इनके लिए यह ‘यौन शोषण’ नहीं बल्कि ‘रिलेशनशिप में कड़वाहट’ है। इनके लिए यह ‘धर्मांतरण’ नहीं बल्कि ‘मुस्लिम युवाओं को टारगेट’ करने की साजिश है। अरफा खानम ने तो यहाँ तक कह दिया कि मुस्लिमों को जो गिने-चुने रोजगार मिले हैं, उन्हें भी छीना जा रहा है।
नसरीन खान जैसे लोग तो इसे ‘स्मार्ट मुस्लिम लड़कों से हिंदुओं की जलन’ का मामला बता रहे हैं। ये वही लोग हैं जो आतंकियों के मानवाधिकारों के लिए आधी रात को कोर्ट खुलवाते हैं, लेकिन जब हिंदू लड़कियों को ऑफिस के भीतर नमाज पढ़ने या बुर्का पहनने के लिए मजबूर किया जाता है, तो इनके मुँह से एक शब्द नहीं निकलता। यह गिरोह जानता है कि कब कहाँ रोना है, कब विक्टिम कार्ड खेलना है और कब पीड़ित महिला का ही चरित्र हनन करना है। इनकी यह ‘चुनिंदा संवेदनशीलता’ ही भारत के सामाजिक ताने-बाने के लिए सबसे बड़ा खतरा है।
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने गुरुवार (16 अप्रैल 2026) को लोकसभा में महिला आरक्षण संशोधन विधेयक (नारी वंदन अधिनियम) की चर्चा के दौरान मेरठ के शास्त्री नगर सेंट्रल मार्केट का मुद्दा उठाया। उन्होंने भावुक अंदाज में कहा, “महिलाओं का दर्द क्या होता है, ये मेरठ के दुकानदारों की महिलाओं से पूछो।” अखिलेश ने सुझाव दिया कि अगर यह बिल इतना सही है तो इसे मेरठ और नोएडा के परिवारों के बीच घोषित किया जाए।
अखिलेश यादव ने ये बयान लोकसभा में दिया, जोकि पूरी तरह से राजनीतिक स्टंट ही है। क्योंकि सच्चाई इससे कोसों दूर है। दरअसल, मेरठ शास्त्री नगर सेंट्रल मार्केट में जो ध्वस्तीकरण और सीलिंग चल रही है, वह सपा सरकार (2012-2017) की भ्रष्टाचार, लापरवाही और राजनीतिक संरक्षण की देन है। यह कोई अचानक संकट नहीं, बल्कि 2012-17 में बोए गए बीजों का वटवृक्ष है। जबकि योगी आदित्यनाथ सरकार सुप्रीम कोर्ट में आम व्यापारियों की रोजी-रोटी और आशियाने बचाने के लिए लगातार लड़ रही है। ऐसे में अखिलेश यादव का संसद में रोना-धोना बेशर्मी का चरम है, जिसमें सौ बिल्लियाँ खाकर चूहा हज को निकला है।
क्या है मामला? कैसे सपा सरकार ने दिया भ्रष्ट लोगों को संरक्षण
मेरठ के शास्त्री नगर सेंट्रल मार्केट में 859 आवासीय प्लॉट 1978 में उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद (AEVP) द्वारा आवंटित किए गए थे। मास्टर प्लान और बिल्डिंग बायलॉज के अनुसार, ये प्लॉट स्पष्ट रूप से आवासीय उपयोग के लिए थे। मास्टर प्लान और बिल्डिंग बायलॉज के अनुसार इन पर व्यावसायिक निर्माण या सेटबैक का अतिक्रमण अवैध था। दशकों तक इन प्लॉटों पर दुकानें, कॉम्प्लेक्स, स्कूल, अस्पताल और बैंक बनते गए। लेकिन असली समस्या 2012-2017 के सपा शासन में उभरी।
सपा सरकार के दौरान आवास विकास परिषद ने बार-बार शिकायतें कीं कि आवासीय प्लॉटों पर अवैध व्यावसायिक निर्माण हो रहे हैं। परिषद ने मास्टर प्लान उल्लंघन, बिना अनुमति के निर्माण और भ्रष्ट तरीके से कब्जे की रिपोर्ट भी दी। लेकिन सपा सरकार ने न केवल परिषद की नहीं सुनी, बल्कि भ्रष्टाचार और राजनीतिक दबाव के जरिए इन अतिक्रमणों को संरक्षण दिया। स्थानीय सपा नेताओं और अधिकारियों के बीच साँठ-गाँठ से पैसे लेकर अवैध निर्माणों को छूट मिली। जब परिषद ने कार्रवाई की कोशिश की तो धमकियाँ दी गईं और सरकार का दबाव डाला गया।
ये रहा 13-18 अगस्त 2013 का आधिकारिक दस्तावेजी सबूत
यह दस्तावेज उत्तर प्रदेश आवास एवँ विकास परिषद, निर्माण खंड-8, मेरठ का है (पत्रांक 1716/अधि0अभि0/नि0ख0-8/मेरठ/4-8, दिनांक 17-8-2013)। यह शास्त्री नगर, सो-661/6 (सेंट्रल मार्केट क्षेत्र) के आवासीय प्लॉट पर अवैध व्यावसायिक निर्माण की शिकायत है।
परिषद ने लिखा-
प्लॉट के फ्रंट भाग पर पूर्व से ही अवैध निर्माण हो रहा था।
23.7.2013 को फील्ड स्टाफ को धमकी दी गई।
29.7.2013 को नोटिस जारी किया गया।
30.7.2013 को थाना नौचंदी में रिपोर्ट दर्ज की गई।
6.8.2013 को निर्माणकर्ता विनोद अरोड़ा ने फिर अवैध निर्माण शुरू किया।
7.8.2013 को वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक और नगर मजिस्ट्रेट को लिखा गया।
13.8.2013 को शाम 5 बजे 4-5 लड़के असिस्टेंट इंजीनियर के घर पहुँचे और उसे धमकाया। उन्होंने कहा कि हम देख लेंगे।
17.8.2013 को फिर मोबाइल पर धमकी दी गई (नंबर 9997949798)।
इस मामले में परिषद ने जिलाधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक से सख्त कार्रवाई की माँग की और निर्माणकर्ता विनोद अरोड़ा को जिम्मेदार ठहराया। दस्तावेज़ पर अरबिंद कुमार (अधिशासी अभियंता) के हस्ताक्षर हैं।
यह पत्र सपा शासन (अखिलेश यादव सरकार) के बीच का है। परिषद ने कानून के अनुसार कार्रवाई की माँग की गई, लेकिन सपा सरकार ने परिषद की नहीं सुनी। अवैध निर्माण नहीं रुके। जो कि भ्रष्टाचार और लापरवाही का प्रमाण है। एक तरफ परिषद के अधिकारियों को धमकियाँ मिलती रही, तो दूसरी तरफ सपा सरकार ने मौन साधे रखा और अपराधियों को खुला संरक्षण दिया जाता रहा।
बता दें कि साल 2013 में ही इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इन अवैध निर्माणों पर ध्वस्तीकरण का आदेश दिया था, लेकिन सपा सरकार ने उसे लागू नहीं किया। परिणामस्वरूप 2017 तक सैकड़ों अवैध कॉम्प्लेक्स खड़े हो गए। सपा ने व्यापारियों को भ्रम में रखा कि सब ठीक है। उन पर कोई कार्रवाई नहीं होगी, क्योंकि सरकार उनके साथ है।
योगी सरकार ने साल 2025 में की सुधार की कोशिश
इन घटनाक्रमों के बाद साल 2017 में योगी सरकार सत्ता में आई। इसके बाद मेरठ में आवास विकास परिषद ने फिर से शिकायतें बढ़ाईं। इन शिकायतों को ध्यान में रखते हुए साल साल 2025 में यूपी सरकार ने मास्टर प्लान में संशोधन (बाय-लॉ) लाकर इन क्षेत्रों को नियमित करने का प्रयास किया। उद्देश्य था पुरानी गलतियों को सुधारते हुए आम लोगों का आशियाना बचाना।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया। दिसंबर 2024 और सितंबर 2025 के आदेशों में कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि आवासीय प्लॉटों पर व्यावसायिक उपयोग अवैध है। सुप्रीम कोर्ट ने AEVP को 859 संपत्तियों पर कार्रवाई के निर्देश दिए, जिसके बाद अक्टूबर 2025 में 22 दुकानों का कॉम्प्लेक्स ध्वस्त कर दिया गया। इसके अगले चरण में अप्रैल 2026 में 44 संपत्तियों को सील किया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व कमिश्नर हृषिकेश भास्कर यशोद को ‘पब्लिक ह्यू एंड क्राई’ का हवाला देकर ध्वस्तीकरण रोकने पर फटकार लगाई और अवमानना की कार्यवाही चलाई। कोर्ट का रुख था कि कानून का राज सर्वोपरि है, दशकों की अनदेखी अब नहीं चलेगी।
लेकिन योगी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में आम लोगों की लड़ाई लड़ी। सरकार ने कोर्ट से गुहार की कि सपा काल की लापरवाही से भ्रमित व्यापारियों को अचानक बर्बाद न किया जाए। वैकल्पिक व्यवस्था, मुआवजा और सीमित राहत की दलीलें दीं। कोर्ट ने स्कूलों को सामान निकालने का समय दिया। यूपी सरकार आज भी सुप्रीम कोर्ट में पीड़ितों की रोजी-रोटी बचाने के लिए लड़ रही है।
मेरठ में आज आज 1400+ दुकानें प्रभावित हैं, लेकिन जिम्मेदार सपा की 2012-17 की भ्रष्ट नीति है, न कि योगी सरकार। अखिलेश यादव संसद में BJP को दोषी ठहरा रहे हैं, जबकि उनकी सरकार ने ही बीज बोए।
योगी सरकार ने पीड़ितों की मदद के लिए किए मानवीय प्रयास
योगी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में बार-बार कहा कि हम कानून का पालन करेंगे, लेकिन आम आदमी का आशियाना भी बचाना हमारा कर्तव्य है। इसके लिए व्यापारियों को वैकल्पिक बाजार, मुआवजा पैकेज और पुनर्वास की योजनाएँ शुरू की जा रही हैं। यह योगी सरकार का मानवीय चेहरा है। जो सपा की तरह दबाव या भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि कानून और जनहित का संतुलन बनाकर चल रही है।
मेरठ सेंट्रल मार्केट का मामला केस स्टडी है। यह दिखाता है कि भ्रष्टाचार कैसे दशकों बाद आम आदमी को संकट में डालता है। भले ही लोकसभा में अखिलेश यादव इस मामले में राजनीतिक रोटियाँ सेंकने के लिए बयान दे रहे हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि मेरठ के व्यापारी सपा की देन से जूझ रहे हैं और योगी सरकार उन्हें बचाने की कोशिश कर रही है।