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आशीष नौटियाल

पहाड़ी By Birth, PUN-डित By choice

कॉन्ग्रेस के सस्ते ध्रुव राठी (जो स्वंय ही सस्ता है) बन कर रह गए हैं राहुल गाँधी!

जिस राहुल गाँधी को अपने पार्टी के भीतर ही आए दिन खिसक रहे विधायकों की कानों कान खबर नहीं लगती, वह भी रोज विदेश नीति और फॉरेन पॉलिसी पर ज्ञान दे रहे हैं।

गहलोत ने सचिन पायलट को कहा हैंडसम: धरने पर बैठे नाराज साइंटिस्ट सिसोदिया, युवा राहुल का भी छलका दर्द

मनीष सिसोदिया ने कहा कि इस देश में एक समय में सिर्फ एक ही हैंडसम व्यक्ति हो सकता था और वो निर्विवाद रूप से स्वयं मनीष सिसोदिया हैं।

केजरीवाल शिक्षा मॉडल: ‘योग्यतम की उत्तरजीविता’ के सिद्धांत की भेंट चढ़ते छात्रों का भविष्य चर्चा में क्यों नहीं आता

आँकड़े बताते है कि वर्ष 2008-2015 तक दिल्ली के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों का परीक्षा परिणाम कभी भी 85% से कम नही हुआ। लेकिन राजनीतिक लाभ और मीडिया मैनेजमेंट के लिए बच्चों को आक्रामक रूप से 9वीं और 11वीं में रोक दिया जाना कितना उचित है?

ब्रिटिशर्स के खिलाफ सशस्त्र आदिवासी विद्रोह के नायक थे अल्लूरी सीताराम राजू

अल्लूरी को सबसे अधिक अंग्रेजों के खिलाफ रम्पा विद्रोह का नेतृत्व करने के लिए याद किया जाता है, जिसमें उन्होंने ब्रिटिशर्स के खिलाफ विद्रोह करने के लिए विशाखापट्टनम और पूर्वी गोदावरी जिलों के आदिवासी लोगों को संगठित किया था।

गणित शिक्षक रियाज नायकू की मौत से हुआ भयावह नुकसान, अनुराग कश्यप भूले गणित

यूनेस्को ने अनुराग कश्यप की गणित को विश्व की बेस्ट गणित घोषित कर दिया है और कहा है कि फासिज़्म और पैट्रीआर्की के समूल विनाश से पहले ही इसे विश्व धरोहर में सूचीबद्द किया जाएगा।

वामपंथी मीडिया गिरोह आतंकियों को क्लीन चिट देने के लिए 3 साल के बच्चे का इस्तेमाल कर रहा है

"CRPF ने एक नागरिक को वाहन से बाहर निकाला और गोली मार दी। यह पूरी तरह से असत्य है।" CRPF के एडीजी ने इस घटना के प्रोपेगेंडा को खारिज कर...

स्वदेशी आन्दोलन के बीच मोतीलाल ने खरीदी विदेशी कार, जवाहर को लिखा – ‘भारत में गाड़ी बनने तक इन्तजार करूँ?’

जब पूरा भारत स्वदेशी आन्दोलन का हिस्सा बना था, ठीक उसी समय मोतीलाल नेहरू इलाहाबाद में विदेशी गाड़ी खरीदने वाले पहले भारतीय थे।

जब चीनी मीडिया नेहरू को ‘साम्राज्यवाद का दौड़ता कुत्ता’ कहती थी, तब नेहरू लोकसभा में अक्साई चीन को लेकर झूठ बोल रहे थे

'चाऊ-माओ' के बीच अपने लिए वैश्विक छवि तलाश रहे नेहरू ने कभी सीमा पर हो रही सैनिकों की मौत को लेकर जुबान नहीं खोली। उन्हें यह स्वीकार करते दशक बीत गए कि सीमा पर कुछ चिंताजनक हो रहा है।