Thursday, October 28, 2021
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तबरेज हो या अखलाक, जैनब जैसों को दो पैसा फर्क नहीं पड़ता, सारा ज्ञान वामपंथी विचार के लिए है

द प्रिंट के इस लेख में भी उसके द्वारा यह कुत्सित कार्य सिर्फ और सिर्फ केरल में हुई गर्भवती हथिनी के हत्यारों को बचाना है, ठीक उन्हीं इस्लामिक कट्टरपंथी फैक्ट चेकर्स की तरह, जिनके फर्जी ज्ञान के आधार पर वह वास्तविकता से परे पूरा लेख लिख डालती हैं।

केरल में गर्भवती हथिनी को अनानास में पटाखे रखकर खिलाकर हत्या करने की घटना ने जहाँ इंसानियत को शर्मसार कर दिया वहीं मीडिया में बैठे हिन्दूफ़ोबिया के आधार पर अपनी दुकान चला रहे ‘तथाकथित बौद्धिक उदारवादियों’ द्वारा इस एक घटना को हिन्दुओं के खिलाफ ही इस्तेमाल किया जा रहा है।

इसमें सबसे वाहियात यह देखना है कि अपने फर्जी ‘ज्ञान’ को सही साबित करने के लिए वो अपने पूर्वजों, यानी बाबर और अकबर तक के हवाले से गलत और झूठी जानकारी को बेहद तार्किक तरीके से पूरी बेशर्मी के साथ पेश करते हुए भी नजर आ रहे हैं।

इन्हीं प्रपंचकारियों में एक नाम है ज़ैनब सिकंदर (Zainab Sikander) का। हालाँकि, तथ्य और तर्कों से ज़ैनब सिकंदर हमेशा से ही एक निश्चित दूरी बनाकर चलती आई हैं, लेकिन जब आप झूठ के जरिए सत्ता के खिलाफ माहौल बनाने की वकालत करने वाले शेखर गुप्ता के ‘द प्रिंट’ का इस्तेमाल अपने विचारों को सत्यापित करने के लिए कर रहे हों, तब आपको समझ आ जाता है कि यह झूठ किस स्तर पर समाज को हानि पहुँचाने में सक्षम है।

द प्रिंट के ही एक ‘लेख’ में ज़ैनब सिकंदर ने लिखा है कि हिन्दुओं को जानवरों की हत्या से कोई फर्क नहीं पड़ता, जब तक कि हत्यारा कोई दलित, मुस्लिम और ईसाई ना हो और हत्याएँ राजनीतिक होती हैं।

ज़ैनब सिकंदर का फर्जी तथ्यों पर आधारित ‘लेख’

हालाँकि, ज़ैनब सिकंदर ने यह नहीं बताया है कि वो इस निष्कर्ष पर व्यक्तिगत रूप से पहुँची हैं या फिर हमेशा की तरह ही यह भी एक और आसमानी कल्पना के सहारे ही उन्होंने सस्ती लोकप्रियता के लिए यह कारनामा किया है।

यूँ तो ऐसे लेख, हेडलाइन और लिखने वाले के नाम के कारण पढ़ने योग्य नहीं होते, लेकिन इससे इनके मन के चोर को पकड़ने का रास्ता मिल जाता है। और यह तब अधिक प्रमाणित हो जाता है जब उसे पढने पर आप देखते हैं कि एक तथ्यविहीन लेख को ऐसे आदमी के आधार पर रचा गया है, जो कट्टरपंथी इस्लामिक विचारधारा के समर्थक फैक्ट चेकर्स के आधार पर लिखा गया हो।

ज़ैनब सिकंदर के लेख के आधार मजहबी फैक्ट चेकर्स

ज़ैनब शायद यह नहीं जानना चाहेंगी कि उनके यह फैक्ट चेकर पिछले सात दिन से अभी तक भी गर्भवती हथिनी की मौत की रिपोर्ट को ‘डेवलपिंग स्टोरी’ बता रहे हैं और किसी भी निष्कर्ष पर सिर्फ इस कारण नहीं पहुँच पा रहे हैं क्योंकि इस ह्त्या में एक समुदाय विशेष के आरोपितों का नाम निकल आया है।

यानी, जिस ‘रिसर्च’ का आधार जुबैर जैसे कट्टरपंथी ‘रीवर्स इमेज रीसर्चर’ हों, जो हिन्दुओं की हत्या पर चुप रहते हैं और ऑल्टन्यूज के ज़रिए कट्टरपंथियों और आतंकियों तक का बचाव करते रहते हैं, उन्हें गम्भीरता से बिलकुल भी नहीं लेना चाहिए फिर भी, उनके झूठ और प्रपंचों का पर्दाफ़ाश करना आवश्यक होता है।

लेकिन तीन साल पुरानी तस्वीरों को आज की बताकर, क्रिश्चियनों की तस्वीरों को भारत का बताकर निरंतर प्रोपेगेंडा में शामिल ज़ैनब सिकंदर को तथ्यों से क्या वास्ता हो सकता है? उन्हें तो पहचान ही हिन्दू विरोधी मानसिकता पर कायम रहकर मिलती है।

‘द प्रिंट’ की पत्रकार जैनब सिकंदर कितनी तथ्यपरक बातें करती हैं इसके ट्विटर पर कई उदाहरण मौजूद हैं, उनमें से कुछ सबसे ज्यादा दुखद फर्जी प्रपंच-

पाकिस्तान की तस्वीर को भारत का बताती ज़ैनब
तस्वीर की हकीकत
ज़ैनब का EVM पर आक्रोश
जैनब की तस्वीर की हकीकत

हिन्दुओं को जानवरों का हत्यारा साबित करने के लिए बाबर के फर्जी इतिहास की शरण में ज़ेनब

फ़र्जी इतिहासकार ज़ैनब सिकन्दर ने अपने इस लेख में लिखा है कि हिन्दुओं में पशु हत्या की प्रवृत्ति की मुगलों को जानकारी थी और यही कारण है कि गाय की सुरक्षा और गोहत्या पर प्रतिबंध लगाने का उल्लेख बाबर के शासनकाल के दौरान भी मिलता है।

बकौल ज़ैनब, बाबर मुग़ल अधिकृत इलाकों में गोहत्या पर प्रतिबंध सुनिश्चित करने के लिए अपने बेटे हुमायूँ को सलाह देने के लिए जाना जाता है और अकबर ने भी यह प्रतिबंध जारी रखा, जैसा कि उनके 1586 के ‘फरमान’ में पाया गया..आदि आदि।

हिस्ट्री ग्रेजुएट ज़ैनब का व्हाट्सएप आधारित दावा

बाबर द्वारा हुमायूँ को लिखे गए ‘सहिष्णु’ खत की वास्तविकता

लेकिन क्या वास्तव में इतिहास की किताबें और साक्ष्य ज़ैनब सिकंदर के दावे से मेल खाते हैं? जवाब है नहीं। ज़ैनब सिकंदर मुगल आक्रान्ता बाबर के इस फरमान के बारे में यह बताना भूल गईं या शायद उन्हें मालूम तक ना हो, कि बाबर ने हुमायूँ को यह नसीहत व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी में दी थी।

वास्तविकता यह है कि जिस हिंडोल सेनगुप्त द्वारा कल्पना के आधार पर लिखी गई किताब में बाबर के हुमायूँ को लिखे ऐसे किसी पत्र का जिक्र किया गया है, उसे मुग़ल और मराठा इतिहास पर कई ग्रन्थ लिखने वाले ख्यातिप्राप्त इतिहासकार जादूनाथ सरकार, आरसी मजूमदार से लेकर रोमिला थापर तक फर्जी साबित कर चुके हैं।

यह तथाकथित ‘बाबर का पत्र’ पहली बार वर्ष 1930 में सामने आया था, जब भोपाल के नवाब ने ये पत्र सामने लाकर कहा कि बाबर बहुत धर्म निरपेक्ष और सहिष्णु था। लेकिन जब भारतीय ऐतिहासिक अभिलेख आयोग ने पत्र की जाँच करनी चाही, तो नवाब ने उसे सौंपने से इनकार कर दिया था। इस बारे में शेखर गुप्ता की स्तम्भकार ज़ैनब सिकंदर शायद ही जानती हों, या फिर जानने में रूचि रखीं हों।

जब भारत के राष्ट्रीय अभिलेखागार ने ‘बाबर के इस पत्र’ की एक फोटो प्रति हासिल की तो उन्होंने घोषणा की कि यह एक ‘बेहद अनाड़ी जालसाजी’ थी। इस पत्र की ‘रॉयल सील’ में ‘गाजी’ शब्द तक को गलत लिखा गया था, पत्र में लिखी गई तारीखें झूठी पाईं गईं थीं और यहाँ तक ​​कि इस पर लगी सील भी झूठी थी।

ट्विटर पर ‘ट्रू इंडोलोजी’ भी इसका जिक्र कर चुके हैं –

इसके अलावा जिस अकबर द्वारा गोहत्या पर प्रतिबंध लगाने का जिक्र ज़ैनब ने अपनी इस रिपोर्ट में लिखा है, वह उसके पीछे के राजनीतिक कारणों से भी परिचित होंगी ही और यह भी जानती ही होंगी कि वास्तविकता के धरातल पर मुगलों ने कभी भी गोहत्या पर नियंत्रण नहीं लगाया।

मुगलों द्वारा लिया गया एकमात्र फैसला, जिस पर मुगलों द्वारा काम भी किया गया वह सिर्फ और सिर्फ हिन्दुओं की आस्था और मंदिरों का विध्वंश था, इसके अलावा हिन्दुओं के प्रति शायद ही उनका कोई फैसला लेने के बारे में सोचा भी गया हो और ऐसे में ‘मुग़ल’ और ‘सहिष्णुता’ शब्द एक साथ लिए जाने तक बेवकूफाना ही है।

ज़ैनब सिकंदर एक लाइन का कुछ लिखें या हजार शब्दों का कुछ लिखें, उसका एक ही मकसद है अपनी हिन्दूघृणा को साकार रूप देना और अपने ‘मजहबी टार’ को अपनी कल्पनाओं के साहित्य से सींचना।

गर्भवती हथिनी की मौत तो छोड़िए, आखिर में सिर्फ यही साबित होता है कि ज़ैनब सिकन्दर जैसे ‘इन्टरनेट जीवियों’ को अखलाक और तबरेज की मौत से भी फर्क नहीं पड़ता, उनका सम्बन्ध सिर्फ और सिर्फ वामपंथी विचारधारा के पोषण के लिए इसी प्रकार के सिलसिलेवार तरीके से भ्रामक लेख लिखने मात्र से होता है, जिसे तब तक लिखा जाता रहा, जब तक वह समाज के कम से कम एक प्रतिशत लोगों को भी सच लगना शुरू ना हो जाए।

और द प्रिंट के इस लेख में भी उसके द्वारा यह कुत्सित कार्य सिर्फ और सिर्फ केरल में हुई गर्भवती हथिनी के हत्यारों को बचाना है, ठीक उन्हीं इस्लामिक कट्टरपंथी फैक्ट चेकर्स की तरह, जिनके फर्जी ज्ञान के आधार पर वह वास्तविकता से परे पूरा लेख लिख डालती हैं।

 

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आशीष नौटियाल
पहाड़ी By Birth, PUN-डित By choice

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