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हरियाणा में BJP फिर से बना सकती है सरकार, निर्दलीय विधायक और चौटाला के MLA संपर्क में: JJP-BJP का टूटा गठबंधन, सीएम खट्टर ने पद से दिया इस्तीफा

हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने मंगलवार (12 मार्च 2024) को अपने पद से इस्तीफा दे दिया। खट्टर के साथ ही उनके मंत्रीमंडल के सभी साथियों ने भी इस्तीफा दे दिया है। वहीं, विधायक दल की बैठक के बाद नेता का चुनाव किया जाएगा और नए मुख्यमंत्री की शपथ आज ही राजभवन में आयोजित किया जाएगा। इसकी तैयारियाँ भी शुरू हो चुकी हैं।

दरअसल, हरियाणा में भाजपा और दुष्यंत चौटाला की अगुवाई वाली जननायक जनता पार्टी (JJP) की सरकार थी। खट्टर के इस्तीफा सौंपने के बाद माना जा रहा है कि हरियाणा में यह गठबंधन टूट जाएगा। वहीं, भाजपा राज्य के निर्दलीय विधायकों के संपर्क में है। कई निर्दलीय विधायक भाजपा के समर्थन में आगे आए हैं।

कहा जा रहा है कि लोकसभा चुनाव 2024 में दोनों दलों के बीच गठबंधन नहीं होने के बाद यह स्थिति आई है। हरियाणा के डिप्टी सीएम दुष्यंत चौटाला ने सोमवार (11 मार्च) को भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा से मुलाकात हुई थी। लगभग 45 मिनट चली इस मुलाकात में उन्होंने लोकसभा चुनावों में भाजपा से 2 लोकसभा सीटों की माँग की थी। उन्होंने भिवानी-महेंद्रगढ़ और हिसार सीट पर दावा किया था।

हालाँकि, नड्डा ने दुष्यंत की बात मानने से इनकार कर दिया था। नड्डा ने कहा था कि भाजपा राज्य में अपने दम पर राज्य की सभी 10 लोकसभा सीटें जीतने में सक्षम है। इसके बाद दुष्यंत चौटाला राज्य के गठबंधन से भी अलग हो गए। अब, उनकी पार्टी में भी टूट की अटकलें लगाई जा रही हैं। कहा जा रहा है कि JJP के देवेंद्र बबली समेत 5 से 6 विधायक भाजपा के साथ जा सकते हैं।

खट्टर के इस्तीफा के देने के बाद भाजपा ने अपने विधायक दल की बैठक बुलाई है। वहीं, दुष्यंत चौटाला ने भी अपने विधायकों की बैठक बुलाई है। कहा जा रहा है कि इस बैठक में चौटाला की पार्टी के तीन विधायक बैठक से गायब रहे। इसको देखते हुए पार्टी में टूट की अटकलें लगाई जा रही हैं। वहीं, राज्य में फिर से गैर-जाट सीएम बनाने की बात की जा रही है।

वहीं, भाजपा की ओर से कौन नया मुख्यमंत्री होगा, इसको लेकर अटकलें लगाई जा रही हैं। मीडिया रिपोर्ट में कहा जा रहा है कि मुख्यमंत्री की रेस में नायब सिंह सैनी, संजय भाटिया और अनिल विज सबसे आगे हैं। यह भी कहा जा रहा है कि मनोहर लाल खट्टर ही दोबारा सीएम पद की शपथ लेंगे। हालाँकि, भाजपा चौंकाने में विश्वास रखती है।

दरअसल, साल 2019 में हरियाणा विधानसभा की कुल 90 सीटों के लिए चुनाव हुए थे। इसमें भाजपा को 41 सीटें मिली थीं। जबकि, कॉन्ग्रेस को 30 और JJP को 10 सीटें मिली थीं। इसके अलावा, राज्य में 7 निर्दलीय विधायक भी हैं। INLD और हरियाणा लोकहित पार्टी के पास एक-एक विधायक हैं।

चुनाव के बाद भाजपा और JJP ने गठबंधन सरकार बनाई थी। राज्य में बहुमत के लिए 46 का आँकड़ा होना चाहिए। इस तरह भाजपा के 41 और जेजेपी के 10 विधायकों ने मिलकर राज्य में सरकार बनाई। अब दुष्यंत चौटाला के अलग हो जाने के बाद भाजपा निर्दलीय विधायकों और जेजेपी के बागी विधायकों के साथ मिलकर सरकार बनाएगी।

राज्य में ऐसे समय में बदलाव हुआ है, जब पीएम मोदी ने सोमवार (11 मार्च 2024) को सीएम खट्टर की तारीफ की थी। पीएम मोदी ने कहा था, “हम दोनों का साथ तब का है, जब दरी का जमाना था। हम लोग एक ही मोटरसाइकिल से घूमा करते थे। मनोहर लाल खट्टर बाइक चलाते थे और मैं पीछे बैठता था। कई बार हम कठिन रास्तों से होते हुए रोहतक से गुरुग्राम तक बाइक से जाते थे।”

मतुआ, राजबंशी, नामशूद्र: पश्चिम बंगाल में रहने वाले 4 करोड़ प्रताड़ित हिंदुओं पर नहीं जागी ‘ममता’, PM मोदी बने आवाज – मना रहे दूसरा स्वतंत्रता दिवस

पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में तमाम प्रताड़नाएँ झेलने के बाद वहाँ के अल्पसंख्यक भारत में एक आस लेकर आए थे। उन्हें लगा था कि जो अत्याचार उनपर इस्लामी मुल्क में हुए वो अत्याचार उनपे भारत में नहीं होंगे और ससम्मान जीने का अधिकार मिलेगा। हालाँकि तुष्टिकरण की राजनीति में फँसे रहने के चलते कई पार्टियाँ ऐसा नहीं कर पाईं और इन लोगों की हालत वैसी की वैसी रही। लेकिन, 2019 में जब मोदी सरकार ‘नागरिकता संशोधन अधिनियम’ लाई तो इन सबकी एक बार फिर से उम्मीद जगी।

आज जिस बंगाल में रहकर ममता बनर्जी इस CAA का विरोध करती हैं उसी बंगाल में वो समुदाय भी बड़ी तादाद है जिन्हें मोदी सरकार के इस फैसले ने अपार खुशी दी है। ये समुदाय मतुआ, राजबंशी और नामसूद्र हैं। सालों से ये लोग नागरिकता मिलने के इंतजार में हैं। 2019 में जब सरकार ने इसे लाने की घोषणा की थी उसके बाद से इन्हें इसके लागू होने का इंतजार था।

अब जब 11 मार्च को मोदी सरकार ने इसे लेकर अधिसूचना जारी कर दी है तो इनकी खुशी का ठिकाना नहीं है। ये लोग देर रात हाथ में झंडा लिए सड़कों पर आए। मंदिर के सामने नाच गाकर यह अपनी खुशी जाहिर की। ढोल-नगाड़े बजाए। इस दौरान महिलाओं से लेकर बच्चे सब साथ दिखे। समुदाय के लोगों ने कहा कि आज उनकी इच्छा पूरी हो गई है। उनके समुदाय के लिए ऐसा शांतनु ठाकुर और पीएम मोदी के अलावा ऐसा कोई नहीं सोच सकता था।

ये सारा नजारा देखते हुए बंगाल के भाजपा नेता व नेता प्रतिपक्ष सुवेंदु अधिकारी ने इस फैसले के लिए पीएम मोदी का आभार व्यक्त किया। उन्होंने एक्स पर कहा ये मोदी की गारंटी है। संसद से पारित हुआ सीएए अब पूरे देश में लागू हो जाएगा। मतुआ समुदाय की लंबे समय से चली आ रही माँग अब पूरी होगी और उन्हें नागरिकता मिलेगी। सुवेंदु ने कहा कि अब कोई भी उन्हें (मतुआ को) उनके अधिकारों से वंचित नहीं कर सकता, यहाँ तक कि ममता बनर्जी भी नहीं।

मतुआ, राजबंशी और नामशूद्र

मालूम हो कि जो मतुआ समुदाय सीएए लागू होने की खुशियाँ मना रहा है वो एक हिंदू शरणार्थी समूह है जो विभाजन के दौरान और उसके बाद के वर्षों में भारत आया था। इनके कोई सटीक आँकड़े तो उपलब्ध नहीं हैं लेकिन मतुआओं की अनुमानित संख्या बंगाल की पूरी आबादी का लगभग 10 से 15 प्रतिशत बताई जाती है। वहीं, मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, बंगाल में मतुआ समुदाय की अनुमानित संख्या 3 करोड़ कही गई है। ये पूरा समुदाय बंगाल के उत्तरी और दक्षिणी 24 परगना के सीमाई इलाके जैसे कूचबिहार, दक्षिणी-उत्तरी दीनाजपुर, मालदा और नादिया में बड़ी संख्या में है। इसके अलावा इनकी उपस्थिति दक्षिण बंगाल में जिन 5 लोकसभा क्षेत्रों में है वहाँ 2 (बोनगाँव और राणाघाट) में 2019 में जीत हासिल हुई थी।

2011 की जनगणना के अनुसार पश्चिम बंगाल में अनसूचित जाति की कुल जनसंख्या 2 करोड़ 10 लाख से ज्यादा है। वहीं राजबंशी समुदाय की बात करें तो ये बंगाल में सबसे बड़ा अनुसूचित जाति समुदाय है। 2011 की जनसंख्या के अनुसार अनसूचित जाति की कुल जनसंख्या का यह 18.4 फीसद हैं। मतलब 2011 की जनसंख्या के हिसाब से 39,37,600 लोग। इनका समुदाय को कूच बिहार, जलपाईगुड़ी जैसे क्षेत्रों में ज्यादा प्रभावशाली माना जाता है।

इसके बाद आते हैं नामशूद्र। इनकी जनसंख्या, पूरे राज्य की अनुसूचित जातियों में- 17.4 फीसद है। मतलब 2011 की जनसंख्या के हिसाब से 37,23,600 लोग। नामशूद्र दलित हिंदुओं का समूह उस पलायन का एक छोटा सा हिस्सा था, जो बांग्लादेश में प्रताड़ित होने के बाद भारत के अलग-अलग हिस्सों में बसे। लेकिन बंगाल में इनकी संख्या ज्यादा है। वामपंथियों ने जहाँ इनको और इनकी माँगों को समय-समय पर नकारा है तो वहीं मोदी सरकार ने इनकी सुनवाई की। 2019 के लोकसभा चुनाव में हों, या 2021 के विधानसभा चुनाव… हर बार भाजपा ने इनका उल्लेख करके इन्हें सम्मान दिलाने का वादा किया और 2024 आते-आते इनकी वो माँग सुन ली जिसे सालों से अनसुना किया जा रहा था।

गौरतलब है कि इन तीनों समुदायों की प्रमुख माँगें नागरिकता अधिकार और शरणार्थी पुनर्वास थीं। अब जब भारतीय जनता पार्टी ने सीएए को लेकर अधिसूचना जारी कर दी है तो जाहिर है इन समुदायों पर इसका प्रभाव पड़ेगा। शायद इस समुदाय के जो लोग पहले कभी तृणमूल कॉन्ग्रेस पर विश्वास दिखा चुके हों उनका मत भी अब भाजपा के पक्ष में आए। इनकी खुशी का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि मतुआ समुदाय के लोगों ने 11 मार्च को उनका दूसरा स्वतंत्रता दिवस बताया है। साथ ही आध्यात्मिक गुरु श्री श्री हरिचंद व गुरुचंद ठाकुर के मंदिर के सामने इक्ट्ठा होकर ढ़ोल-नगाड़ों के साथ नाच-गाकर जश्न मनाया।

बता दें कि बंगाल के इन समुदायों की यह खुशी केवल इसीलिए इतनी है क्योंकि अभी तक की पिछली सरकारों में उनकी सुनवाई नहीं हुई और न ही उन्हें पहचान दिलाने के प्रयास हुए लेकिन अब ये स्थिति बदलने जा रही है। शर्णार्थी के तौर पर भारत में आए इन दलित हिंदुओं की सुनवाई भी होगी और उन्हें पहचान दिलाने का काम भी होगा।

CAA के तहत नागरिकता के लिए कैसे करें आवेदन, चाहिए होंगे कौन-कौन से दस्तावेज? यहाँ समझिए पूरी प्रक्रिया, गृह मंत्रालय ने बना दिया है ऑनलाइन

भारत सरकार ने सोमवार (11 मार्च, 2024) को CAA (नागरिकता संशोधन कानून) को देश भर में लागू करते हुए इसके नियमों की अधिसूचना जारी कर दी। इसके बाद जहाँ देश भर में आम लोगों में जश्न का माहौल रहा, इस्लामी कट्टरपंथियों ने वातावरण को बिगाड़ने की कोशिश की। इस कानून के तहत पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में प्रताड़ित हुए अल्पसंख्यकों (हिन्दू, सिख, जैन, ईसाई, बौद्ध एवं पारसी) को भारत की स्थायी नागरिकता मिलेगी। जो 31 दिसंबर, 2014 तक विस्थापित होकर भारत आ गए थे, ये कानून उनके लिए है।

2019 के इस कानून को लागू करते हुए एक ऑनलाइन पोर्टल भी जारी किया गया है, जिसका इस्तेमाल कर के आवेदन दाखिल किया जा सकेगा। लोकसभा चुनाव के लिए अचार संहिता लागू होने से पहले ये कदम उठाया गया है। जिन शरणार्थियों को भारत की नागरिकता चाहिए, उन्हें ‘https://indiancitizenshiponline.nic.in/‘ वेबसाइट पर जाना होगा। केंद्रीय गृह मंत्रालय स्पष्ट कर चुका है कि इसके लिए सारे आईदान पूर्णरूपेण ऑनलाइन माध्यम से ही स्वीकृत किए जाएँगे।

आइए, सबसे पहले जानते हैं कि अप्लीकेशन दायर करने के लिए आपके पास कौन-कौन से दस्तावेज होने चाहिए:

  • पाकिस्तान, अफगानिस्तान या बांग्लादेश की सरकारों द्वारा जारी किए गए पासपोर्ट की प्रति
  • FRRO (फॉरेनर्स रीजनल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर) या FRO (फॉरेनर्स रजिस्ट्रेशन ऑफिसर) द्वारा जारी किया गया रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट या रेजिडेंशियल परमिट
  • पाकिस्तान, अफगानिस्तान या बांग्लादेश के प्रशासन द्वारा जारी किया गया जन्म प्रमाण-पत्र
  • इन तीनों देशों के स्कूल-कॉलेजों द्वारा जारी किया गया शैक्षिक सर्टिफिकेट
  • इन मुल्कों की सरकारों या सरकारी एजेंसियों द्वारा जारी किया गया किसी भी प्रकार का पहचान-पत्र
  • कोई भी सरकारी लाइसेंस या सर्टिफिकेट जो इन तीनों देशों में जारी किया गया हो
  • वहाँ जमीन, संपत्ति या किराए से संबंधित दस्तावेज
  • कोई भी ऐसा दस्तावेज जो दिखाता हो कि आवेदक के माता-पिता, दादा-दादी या परदादा-परदादी पाकिस्तान, अफगानिस्तान या बांग्लादेश के नागरिक थे
  • कोई भी ऐसा सरकारी दस्तावेज जो दिखाता हो कि आवेदन इन तीनों देशों का नागरिक है

आवेदन ने 31 दिसंबर, 2014 से पहले भारत में शरण ली है, ये दिखाने के लिए उसके पास निम्न दस्तावेज होने चाहिए:

  • भारत में आने पर जारी किए गए वीजा या इमीग्रेशन स्टाम्प की प्रति
  • FRRO या FRO द्वारा जारी किया गया रेजिडेंशियल परमिट या रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट
  • जनगणना विभाग द्वारा जारी की गई स्लिप
  • भारत में जारी किया गया राशन कार्ड
  • सरकार या अदालत द्वारा जारी किया गया कोई आधिकारिक पत्र
  • भारत में बनाया गया जन्म प्रमाण-पत्र
  • भारत में जमीन, संपत्ति या किराए से संबंधित दस्तावेज
  • PAN कार्ड, उसके जारी किए जाने की तारीख़ के साथ
  • स्थानीय अधिकारियों या जनप्रतिनिधियों द्वारा जारी किया गया कोई दस्तावेज
  • सरकारी-प्राइवेट बैंकों या डाकघर द्वारा जारी किया गया पासबुक
  • भारत में आवेदक के नाम पर इन्सुरेंस पॉलिसी के डिटेल्स
  • इलेक्ट्रिसिटी कनेक्शन या अन्य यूटिलिटी बिल का रसीद व अन्य दस्तावेज जो आवेदक के नाम और हो
  • कोर्ट या ट्रिब्यूनल की प्रक्रिया के दस्तावेज में आवेदक का नाम
  • भारत में EPF/पेंशन से संबंधित दस्तावेज, जिससे पता चले कि आवेदक भारत में काम कर रहा था
  • ESIC (स्टेट इन्सुरेंस कॉर्पोरेशन) से संबंधित दस्तावेज
  • भारत में जारी किया गया स्कूल लीविंग सर्टिफिकेट
  • स्कूल-कॉलेज-यूनिवर्सिटी या अन्य शैक्षिक एजेंसियों द्वारा जारी किया गया प्रमाण-पत्र
  • आवेदक को जारी किया गया म्युनिसिपेलिटी का ट्रेड लाइसेंस
  • मैरिज सर्टिफिकेट

इस वेबसाइट का नाम ‘भारतीय नागरिकता ऑनलाइन पोर्टल’ रखा गया है। नागरिकता के आवेदन के लिए इसमें कई विकल्प दिए गए हैं। इसमें नीचे CAA का विकल्प दिया गया है। CAA, 2019 के जरिए आवेदन के लिए एक लिंक दिया गया है, जिस पर क्लिक करते ही आपसे ईमेल आईडी या फोन नंबर माँगा जाएगा, जिसके बाद फॉर्म भरने के लिए बाकी डिटेल्स आपके सामने खुल जाएँगे। इसमें आपसे जो-जो डिटेल्स माँगे जा रहे हैं उन्हें भरना होगा और साथ ही ज़रूरी दस्तावेज अपलोड करने होंगे।

गृह मंतालय के अंतर्गत ऑनलाइन पोर्टल पर CAA आवेदन के लिए लिंक

साथ ही CAA-2019 नामक मोबाइल अप्लीकेशन के जरिए भी ये काम किया जा सकता है। फॉर्म भरने के लिए जिला स्तर की कमिटी द्वारा उसका निरीक्षण किया जाएगा और आगे की प्रक्रिया के संबंध में ईमेल-SMS के जरिए सूचित किया जाएगा। फिर उसे निष्ठा की शपथ दिलाई जाएगी। ऑनलाइन पोर्टल पर नंबर-ईमेल डालने पर OTP आएगा, जिसे सबमिट करने के बाद फॉर्म के बाकी के डिटेल्स खुलेंगे। सिर्फ कुछ सीधे सवालों का जवाब देने के बाद अप्लीकेशन सबमिट किया जा सकता है।

कर्नाटक में रमजान के लिए बदल दिया स्कूलों का टाइम, हनुमान ध्वज के लिए यहीं की पुलिस ने बरसाई थी हिंदुओं पर लाठियाँ, आँध्र प्रदेश में भी यही आदेश

रमजान को देखते हुए कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार ने स्कूलों की टाइमिंग में बदलाव का आदेश जारी किया है, ताकि माह-ए-रमजान में पढ़ाई और नमाज साथ-साथ चल रहे। स्कूलों से बच्चे गायब भी न रहें और वो अपनी ‘धार्मिक’ कार्यकलापों को भी अंजाम दे सकें। कर्नाटक के उर्दू और अन्य अल्पसंख्यक भाषा स्कूल निदेशालय ने आदेश जारी कर रमजान के दौरान स्कूलों का समय बदल दिया है। ये आदेश 6 मार्च को ही जारी किया जा चुका है।

कर्नाटक में स्कूलों के समय में बदलाव रमजान के पहले दिन से लागू हो गया। ये आदेश 10 अप्रैल, 2024 तक प्रभावी रहेगा। आधिकारिक आदेशों के अनुसार, स्कूल 8 से 12.45 तक चलेंगे और एक छात्रों को 15 मिनट का ब्रेक (सुबह 10 बजे से 10.15 बजे तक) प्रदान किया जाएगा। बताया जा रहा है कि इस तरह के आदेश पहले भी जारी होते रहे हैं। हालाँकि कर्नाटक में एक तरफ हिंदू छात्रों के साथ भेदभाव की घटनाएँ सामने आती हैं, जिसमें बच्चों को हनुमान चालीसा पाठ करने से भी रोका जाता है, तो दूसरी तरफ रमजान को देखते हुए स्कूलों के समय में ही परिवर्तन कर दिया गया है।

स्कूलों की टाइमिंग में बदलाव के आदेश (फोटो साभार : टाइम्स ऑफ इंडिया)

सोशल मीडिया एक्स पर मिस्टर सिन्हा नाम के यूजर ने लिखा, “कॉन्ग्रेस शासित कर्नाटक राज्य में रमजान के लिए स्कूलों की टाइमिंग बदल दी गई। यही सरकार हिंदुओं को हनुमान ध्वज तक लहराने से रोकती है। बता दें कि जनवरी महीने में ही कॉन्ग्रेस के राज वाले कर्नाटक में हिन्दुओं द्वारा लगाया गया 108 फीट का भगवा हनुमान ध्वज पुलिस जबरदस्ती उतार दिया गया था। ये मामला कर्नाटक के मंड्या जिले के केरागोडू गाँव की था, जहाँ ग्रामीणों ने आपस में चंदा इकट्ठा करके एक 108 फीट लंबा पोल स्थापित किया था। इस पर भगवा ध्वज लगा था और आंजनेय (हनुमान जी को यहाँ आंजनेय कहा जाता है) की छवि थी। इसे गाँव के रंगमंदिर के पास लगाया गया था। बताया जा रहा है कि इसके लिए ग्राम पंचायत की भी अनुमति ले ली गई थी। इसके बावजूद सरकार ने ये झंडा जबरदस्ती उतरवा दिया।

कर्नाटक के साथ ही आंध्र प्रदेश स्कूल शिक्षा विभाग ने भी उर्दू माध्यम स्कूलों के लिए समय में फेरबदल किया है। आंध्र प्रदेश में आज (12 मार्च 2024) से 10 अप्रैल तक स्कूल सुबह 8 बजे से दोपहर 1:30 बजे तक संचालित होंगे। यह निर्णय अल्पसंख्यक शिक्षक संघ के प्रतिनिधियों द्वारा सरकार से कई गई माँग के बाद लिया गया है। यह आदेश राज्य भर में उर्दू माध्यम के प्राथमिक, उच्च प्राथमिक, उच्च विद्यालयों, समानांतर वर्गों पर लागू होता है।

हिंदू पत्नी की सलाह पर डॉ. साजिद ने की घरवापसी: निकाह के बजाय सनातनी शादी करने पर मुस्लिम परिवार-समाज मारता था ताना

सहारनपुर के डॉक्टर साजिद ने रमजान से पहले इस्लाम को त्याग दिया और सनातन धर्म अपना लिया। वो अब सतबीर सिंह राणा बन गए हैं। साजिद सहारनपुर के नकुड़ कोतवाली क्षेत्र के रहने वाले हैं। उन्होंने चार साल पहले अनीता नाम की हिंदू महिला से शादी की थी। उनकी पत्नी ने ही उन्हें सनातन अपनाने की सलाह दी। हालाँकि साजिद ने कहा कि वो बचपन से ही सनातन को पसंद करते हैं, लेकिन पारिवारिक लगाव व अन्य जिम्मेदारियों के चलते वो कभी हिम्मत नहीं कर पाए। हालाँकि अब वो साजिद से सतबीर सिंह राणा बनकर खुश हैं।

जानकारी के मुताबिक, सहारनपुर के आवास विकास स्थित हरि मंदिर में सोमवार (11 मार्च 2024) को साजिद अपनी पत्ती और बच्चे के साथ सनातन परंपरा को अपना लिया। उन्होंने परिवार के साथ हवन-यज्ञ भी किया। इसके बाद उन्हें सतवीर सिंह राणा नाम दिया गया।

डॉ. साजिद अहमद (36) पेशे से बीयूएमएस डॉक्टर हैं। वह नकुड़ के धलापड़ा गाँव के रहने वाले साजिद कस्बे में ही प्रैक्टिस करते हैं। साजिद ने बताया कि उसने अलीगढ़ की रहने वाली अनीता राणा से प्रेम विवाह किया था, जिसके बाद मुस्लिम समाज के लोग उसे बोलने लगे कि वह हिंदू बन गया है। उसे परिवार ने भी अपनी संपत्ति से बेदखल कर दिया था। इसके बाद उनकी पत्नी अनीता ने समझाया कि जब लोग ही नहीं चाहते कि आप इस्लाम में रहो, तो क्यों न सनातन परंपरा को अपना लिया जाए?

दरअसल, अनीता से शादी के दौरान दोनों ने अपने-अपने धर्मों के निर्वहन की बात कही थी। हालाँकि ये शादी हिंदू रीति-रिवाजों से हुई थी। इसकी वजह से परिवार साजिद को पसंद नहीं करता था। दोनों एक ही घर में रह कर दो अलग-अलग धर्मों को मानते थे। इनके बीच आपस में कोई दिक्कत नहीं हुई, लेकिन साजिद अपने समाज में अलग-थलग कर दिए गए। साजिद ने कहा कि उन्हें हिंदू धर्म से जुड़ी चीजें पसंद हैं, इसीलिए उन्होंने कभी अनीता को इस्लाम अपनाने की सलाह नहीं दी। अनीता पहले से शादीशुदा थी और दो बच्चों की माँ भी। हिसार में काम करने के दौरान उनका साजिद से संपर्क हुआ, फिर दोनों ने शादी कर ली थी।

बजरंग दल के पदाधिकारियों की मौजूदगी में उन्होंने सनातन परंपरा को अपनाया। इस दौरान सतबीर सिंह राणा ने जय श्री राम के नारे भी लगाए। सतबीर सिंह राणा ने कहा कि उनके पूर्वज भी कभी हिंदू ही हुआ करते थे, किन्हीं कारणों से वो लोग इस्लाम में चले गए। हालाँकि अब वो सनातन धर्म में आकर बेहद खुश हैं। उन्होंने बताया कि वो लंबे समय से सनातनी बनने के बारे में सोच रहे थे। अपनी पत्नी की सलाह के मुताबिक उन्होंने हिंदूवादी संगठनों से संपर्क किया। उन्होंने पहले हिंदू धर्म को समझने की सलाह दी। मैंने 6 माह तक चीजों को समझा और फिर अपनी मर्जी से सनातन को स्वीकार किया।

साजिद की पत्नी अनीता ने कहा, “हम जहाँ भी जाते थे, हिंदू-मुस्लिम वाली बात आती थी। मैं चार साल से पति के साथ हूँ लेकिन मुझे इस्लाम धर्म का कुछ नहीं आता, अब मैं अपने हिंदू धर्म में लौटकर खुश हूँ।” साजिद से सतवीर राणा बने सतवीर का कहना है कि अब उसने अपनी घर वापसी कर ली है। यह मुस्लिम समाज के लोगों को अच्छा नहीं लगेगा, इसलिए उसे और उसके परिवार को जान का भी खतरा हो सकता है। उसने बताया कि वह पुलिस को भी अपनी जान की सुरक्षा के लिए प्रार्थना पत्र देंगे।

CAA के खिलाफ प्रदर्शन में 1 पैसे का भी नुकसान, इंसानी जान को खतरा हुआ तो… पाई-पाई चुकाना होगा पार्टियों को: एक्शन मूड में असम की हिमंता सरकार

असम में सीएए के विरोध में ‘सरबतमक हड़ताल’ का ऐलान किया गया है। इसका शाब्दिक अर्थ है ‘संपूर्ण बंद।’ सड़क से लेकर जमीन तक, रेल से लेकर हाईवे तक रोकने का आह्वान विपक्षी दलों ने किया है। साल 2019 में हुए सीएए के विरोध में हुए प्रदर्शनों को देखते हुए असम सरकार ने सख्त रवैया अपनाया है। एक तरफ तो मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा चेतावनी दे रहे हैं, तो दूसरी तरफ गुवाहाटी पुलिस ने कानूनी नोटिस जारी कर ऐसे विरोध प्रदर्शनों को वापस लेने की सलाह दी है। साथ ही कहा है कि इस तरह के विरोध प्रदर्शन और हड़ताल से अगर किसी को शारीरिक या संपत्ति का नुकसान होता है, तो प्रदर्शनकारियों और बवालियों से ही नुकसान की भरपाई कराई जाएगी।

दऱअसल, सीएए के विरोध में भी कई पार्टियों के बयान सामने आ रहे हैं और प्रदर्शन का ऐलान हो रहा है। इस बीच सीएए के विरोध में असम में कई राजनीतिक दलों ने ‘सरबतमक हड़ताल (संपूर्ण बंद या हड़ताल)’ का ऐलान किया है। असम में 16 दलों के संयुक्त विपक्षी मंच-असम (यूओएफए) ने मंगलवार (12 मार्च 2024) को पूरे राज्य में हड़ताल की घोषणा की है। इन दलों की कोशिश इस विरोध प्रदर्शन को चरण बद्ध तरीके से लंबे समय तक चलाने की है। बता दें कि साल 2019 में इस कानून को लाए जाने के बाद लंबे समय तक विरोध प्रदर्शन और हिंसा का दौर चला था। इस बार ऐसा न हो, इसके लिए सुरक्षा एजेंसियाँ व्यापक कदम उठा रही हैं।

गुवाहाटी पुलिस की ओर से जारी नोटिस में कहा गया है कि हड़ताल के कारण रेलवे और राष्ट्रीय राजमार्ग संपत्तियों सहित सार्वजनिक/निजी संपत्ति को कोई नुकसान या किसी भी नागरिक को चोट लगने पर भारतीय दंड संहिता और सार्वजनिक संपत्ति क्षति निवारण अधिनियम, 1984 सहित कानून के उचित प्रावधानों के तहत कानूनी कार्रवाई की जाएगी। नोटिस में कहा गया है कि आपके खिलाफ कार्रवाई शुरू की जाएगी और सार्वजनिक और निजी संपत्तियों को नुकसान की कुल लागत आपसे और आपके संगठन से वसूली जाएगी।

बता दें कि केंद्र सरकार ने सोमवार (11 मार्च) को देश में नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (सीएए) को लागू कर दिया। इस बिल को साल 2019 में ही संसद से पास करवा लिया गया था लेकिन इसके लागू होने में काफी लंबा समय लगा। सीएए के माध्यम से केंद्र सरकार बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से 31 दिसंबर, 2014 तक आए प्रताड़ित गैर-मुस्लिम प्रवासियों, जिसमें हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध, पारसी और ईसाइयों को भारतीय नागरिकता देगी। सरकार ने साफ कर दिया है कि सीएए किसी की नागरिकता लेने के लिए नहीं, बल्कि धार्मिक पीड़ित अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने का कानून है।

गृह मंत्रालय ने आवेदकों की सुविधा के लिए एक पोर्टल तैयार किया है और पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन होगी। एक अधिकारी ने बताया कि आवेदकों को घोषित करना होगा कि वे किस वर्ष बिना यात्रा दस्तावेजों के भारत में आए थे। आवेदकों से कोई दस्तावेज नहीं मांगा जाएगा। कानून के अनुसार सीएए के तहत तीनों पड़ोसी देशों के बिना दस्तावेज वाले अल्पसंख्यकों को लाभ मिलेगा।

CAA के विरोध में वामपंथी-इस्लामी कट्टरपंथी नेता, जामिया में फिर से आग वाला प्रदर्शन: ‘मुस्लिमों को दोयम दर्जे की नागरिकता’ पर भड़काने का खेल

देश में नागरिकता संशोधन कानून लागू होने के बाद अब इस्लामी कट्टरपंथियों और लेफ्ट लिबरलों ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया है। मोदी सरकार के इस फैसले के खिलाफ विपक्षी नेताओं का कहना है कि ये विभाजनकारी कानून है और गोडसे की सोच से प्रेरित है। इससे मुस्लिमों को दोयम दर्जे का नागरिक माना जाएगा। वहीं जामिया इस्लामिया जैसे संस्थानों में इसका विरोध भी देखने को मिला है। केरल और तमिलनाडु सरकार ने भी इस भी इसका विरोध जताया है।

जामिया मिलिया इस्लामिया में सीएए का विरोध

मकतूब मीडिया नाम के एक्स अकॉउंट से एक वीडियो शेयर की गई है। इस वीडियो में दिखाया गया है कि कैसे जब सरकार ने सीएए के लिए नोटिफिकेशन जारी किया, उसके बाद जामिया मिलिया इस्लामिया में एमएसएफ और एनएसयूआई ने मिलकर देर रात वहाँ प्रदर्शन किया। इस दौरान उनके हाथ में पोस्टर भी थे जिसमें सीएए लिखा हुआ था और उसमें आग लगाई जा रही थी।

तमिलनाडु मुख्यमंत्री ने किया विरोध

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने इसे केंद्र का विभाजनकारी एजेंडा बताया। उन्होंने कहा कि सीएए को हथियार बनाया जा रहा है। मुस्लिमों और श्रीलंकाई तमिलों को धोखा देकर विभाजन के बीज बोए गए। DMK के कड़े विरोध के बावजूद AIDMK की मदद से सीएए पास हुआ। लोगों ने विरोध किया तो इसे ठंडे बस्ते में रख दिया गया। लेकिन जैसे जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं पीएम मोदी राजनीतिक लाभ के लिए धार्मिक भावनाओं का इस्तेमाल चाहते हैं। लेकिन भारत के लोग इस विभाजनकारी नागरिकता संशोधन अधिनियम के लिए उनको कभी माफ नहीं करेंगे और उनको एक कड़ा सबक सिखाएँगे।

AIMIM चीफ और प्रवक्ता क्रोनोलॉजी समझाने उतरे

ऐसे ही AIMIM के चीफ असदुद्दीन ओवैसी लिखते हैं, “आप क्रोनोलॉजी समझिए। पहले चुनाव सत्र आएगा फिर सीएए नियम आएँगे। हमारा सीएए के लिए विरोध आज भी वही है। ये विभाजनकारी है और गोडसे की सोच पर आधारित है। ये लोग मुस्लिमों को दोयम दर्जे की नागरिकता देना चाहते हैं।”

ओवैसी आगे कहते हैं, “आप सताए गए किसी भी व्यक्ति को शरण दें लेकिन नागरिकता धर्म या राष्ट्रीयता पर आधारित नहीं होनी चाहिए। सरकार को बताना चाहिए कि उसने इन नियमों को पाँच साल तक क्यों लंबित रखा और अब इसे क्यों लागू कर रही है। एनपीआर-एनआरसी के साथ, सीएए का उद्देश्य केवल मुसलमानों को लक्षित करना है, इसका कोई अन्य उद्देश्य नहीं है। सीएए एनपीआर एनआरसी का विरोध करने के लिए सड़कों पर उतरे भारतीयों के पास फिर से इसका विरोध करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होगा।”

ऐसे ही AIMIM के राष्ट्रीय प्रवक्ता वारिस पठान ने कहा, “क्रोनोलॉजी को समझिए। समय को देखिए। तारीखों की घोषणा होने वाली है, 2024 के लोकसभा चुनाव होने वाले हैं और सरकार अचानक इसे अधिसूचित करने के बारे में सोचती है। वह 5 साल तक क्या कर रही थी? इसे पहले क्यों नहीं लाया गया? इसीलिए हम कहते हैं, सरकार चुनाव से पहले ध्रुवीकरण करने की कोशिश कर रही है। वे विकास के मोर्चे पर विफल रहे हैं… उनके पास सवालों के जवाब नहीं हैं। इसलिए, वे इसे लेकर आए हैं। हमने पहले भी इस पर आपत्ति जताई थी और हम आज भी यही कहते हैं ठीक है कि यह कानून असंवैधानिक है…हमें इस पर आपत्ति है।”

पिनराई विजयन सरकार पुराने स्टैंड पर कायम

केरल में भी पिनराई विजयन सरकार ने इसे सांप्रदायिक और विभाजनकारी बताया है। इसी तरह सीएए अधिसूचना पर केरल के मंत्री पी राजीव कहते हैं, “11 दिसंबर, 2019 को लोकसभा ने इस अधिनियम को पारित किया, फिर 2019 में (केरल) विधानसभा ने एक विशेष सत्र बुलाया और सर्वसम्मति से राज्य में सीएए के खिलाफ एक प्रस्ताव पारित किया। हमने सीएए के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया था क्योंकि यह संविधान विरोधी है और हमारे संविधान की मूल संरचना के खिलाफ है… हमारे मुख्यमंत्री ने सही कहा था कि इसे केरल राज्य में लागू नहीं किया जाना चाहिए। आज, जब दोबारा वही स्थिति है तो सरकार का भी वही स्टैंड है।”

गौरतलब है कि कल केंद्र सरकार ने CAA (नागरिकता संशोधन कानून) की अधिसूचना जारी की। इस कानून को बनाए जाने के 4 वर्षों बाद इसे नोटिफाई किया गया। ऐसा लोकसभा चुनाव 2024 से कुछ ही सप्ताह हुआ, क्योंकि आचार संहिता लागू होने के बाद ये संभव नहीं हो पाता। इसके लिए ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन पोर्टल बनाया गया है, जिसका प्रशिक्षण पहले ही पूरा कर लिया गया है। जिलों के प्रशासन को लॉन्ग टर्म वीजा देने के लिए अधिकृत कर दिया गया है।

इसके लिए अप्लीकेशन भी बड़ी संख्या में आए हैं, जिसमें सबसे ज्यादा पाकिस्तान से हैं। इसके तहत पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के अल्पसंख्यकों (हिन्दू, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और पारसी) को भारत की नागरिकता दी जा सकेगी, जिन पर वहाँ इस्लामी अत्याचार होता रहा है। दिसंबर 2014 तक इनमें से जो पीड़ित भारत में शरणार्थी बन कर रह रहे हैं, उन्हें अब यहाँ की स्थायी नागरिकता मिलेगी। 

कहीं ‘जय श्री राम’ के नारे तो कहीं मनाई जा रही है दीवाली, CAA लागू होने पर पाकिस्तानी हिन्दुओं ने मोदी को बताया देवता का अवतार: बंगाल में महिलाओं ने बजाए ढोल-नगाड़े

भारत सरकार ने सोमवार (11 मार्च, 2024) को ‘नागरिकता संशोधन कानून’ (CAA) का नोटिफिकेशन जारी कर दिया है। इस कानून के लागू होने के बाद अब अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश में किसी भी कारण से सताये जाने वाले अल्पसंख्यकों को भारत में नागरिकता मिलना आसान हो जाएगा। पुलिस और प्रशासन पूरी तरह से मुस्तैद है और कई इलाकों में फ्लैग मार्च किया जा रहा है। देश के कई शरणार्थी कैम्पों में जश्न मनाया जा रहा है। वहीं ओवैसी ने इसे बँटवारे वाली सोच बताया है।

CAA नोटिफिकेशन जारी करने से पहले देश के विभिन्न हिस्सों में पुलिस को हाई अलर्ट पर रखा गया था। कई संवेदनशील इलाकों में फ्लैग मार्च भी किया गया था। हर किसी से शाँति बनाए रखने और अफवाहों पर ध्यान न देने की अपील की गई थी। सोशल मीडिया पर भी पुलिस और अन्य एजेंसियों ने पैनी नजर रखी है। नोटिफिकेशन जारी होते ही सोशल मीडिया पर CAA ट्रेंड करने लगा है। ‘X’ हैंडल पर CAARules हैशटैग टॉप ट्रेंड बना हुआ है जबकि शीर्ष 5 में ‘Citizenship Amendment Act’ भी लीड कर रहा है।

CAA लागू होते ही देश के विभिन्न हिस्सों के अलावा राजधानी दिल्ली के हिन्दू शरणार्थी कैम्पों में भी ख़ुशी की लहर दौड़ पड़ी। वायरल हो रहे फुटेज में शरणार्थी हिन्दुओं को नाचते-गाते देखा जा सकता है। ख़ुशी मना रहे लोगों में बच्चे, युवा, बुजुर्ग और महिलाएँ भी शामिल हैं। कैम्पों में मिठाइयाँ बाँट कर ख़ुशी का इजहार किया जा रहा है। इस मौके पर इन शरणार्थियों को बधाई देने वालों का भी ताँता लगा हुआ है। कई मीडिया संस्थानों ने ख़ुशी के इस मौके को कवर किया है।

दिल्ली की आदर्श नगर शरणार्थी बस्ती में तमाम लोग ख़ुशी से रात में ही सड़कों पर निकल आए हैं। बजरंग बली की प्रतिमा के आगे वो ख़ुशी प्रकट कर रहे हैं। कुछ शरणार्थियो को ‘भारत माता की जय’ और ‘जय श्री राम’ का उद्घोष करते भी सुना जा सकता है। दीपक को जला कर माहौल दीपावली जैसा बना दिया गया है। लोग ख़ुशी में नरेंद्र मोदी जिंदाबाद बोलते भी सुने जा सकते हैं।

पश्चिम बंगाल में महिलाओं के एक समूह को ढोल, ताशे, घंटे और नगाड़े बजा कर ख़ुशी जाहिर करते हुए देखा जा सकता है। ये महिलाएँ पारम्परिक तौर पर बँगाली वेशभूषा में दिख रहीं हैं। वीडियो को शेयर करते हुए कंचन गुप्ता ने खुद को एक बंगाली शरणार्थी बताया है। उन्होंने कहा कि CAA लागू करने के बाद उनके पास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को धन्यवाद कहने के लिए शब्द कम हैं।

ऑपइंडिया ने राजस्थान के जोधपुर स्थित पाकिस्तानी हिन्दू शरणार्थी शिविर में रहने वाले भूरालाल भील से बात की। भूरालाल भील ने अपने साथ लाखों शरणार्थी हिन्दुओं के लिए इसे ऐतिहासिक दिन बताते हुए इसका पूरा श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दिया। उन्होंने मोदी को पाकिस्तानी हिन्दुओं के देवता का अवतार बताया। भूरालाल भील ने बताया कि अब वो और उनका परिवार बेहद सुरक्षित महसूस कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि उनके शिविर में हर कोई जश्न मना रहा है। इस जश्न में स्थानीय हिन्दू संगठन से जुड़े लोग भी शामिल हैं।

साल 1955 में बने इस कानून में बदलाव के लिए इसे साल 2016 में संसद में पेश किया गया था। 10 दिसंबर 2019 में यह बिल लोकसभा में पास हो गया। अगले दिन 11 दिसंबर को इसे राज्यसभा ने भी पारित कर दिया। दोनों सदनों द्वारा पारित होने के बाद 12 दिसंबर 2019 को CAA बिल को राष्ट्रपति की भी मंजूरी मिल गई थी। आखिरकार 11 मार्च, 2024 को केंद्र सरकार द्वारा इस बिल का नोटिफिकेशन जारी कर दिया गया है।

मंदिरो में तोड़फोड़, दुकानों और घरों में लूटपाट: जिस हाजी नुरुल इस्लाम पर है हिन्दू विरोधी दंगों का आरोप उसे ममता बनर्जी ने दिया टिकट, संदेशखाली वाले इलाके से लड़ेगा

लोकसभा चुनाव 2024 के लिए रविवार (10 मार्च) को ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कॉन्ग्रेस पार्टी ने 42 उम्मीदवारों की लिस्ट जारी की है। ये सभी कैंडिडेट पश्चिम बंगाल की अलग-अलग लोकसभा सीटों पर चुनावी ताल ठोंकेंगे। इसमें सबसे अधिक चर्चा बशीरहाट लोकसभा सीट की है। यहाँ से TMC ने मौजूदा सांसद नुसरत जहाँ को हटा कर पूर्व सांसद हाजी नुरुल इस्लाम को टिकट दिया है। वर्तमान समय में तृणमूल नेता शाहजहाँ शेख और उसके गुंडों द्वारा महिलाओं के बलात्कार और जमीन हड़पने जैसे आरोपों के चलते देश भर में चर्चित संदेशखाली इलाका बशीरहाट लोकसभा क्षेत्र में आता है।

हाजी नुरुल इस्लाम का जन्म 1964 में हुआ था। वो 2009 से 2014 तक टीएमसी के टिकट पर पश्चिम बंगाल में बशीरहाट लोकसभा सीट से सांसद रहे। उनकी गिनती TMC के बड़े मुस्लिम चेहरों में होती है।बशीरहाट से TMC प्रत्याशी हाजी नुरुल इस्लाम साल 2010 के देगंगा दंगों का मुख्य आरोपी है। आरोप है कि यह दंगे दुर्गापूजा में अड़ंगा डालने के लिए करवाए गए थे। कभी वामपंथ का गढ़ माने जाने वाले देगंगा में साल 2009 के चुनावों में हाजी नुरुल इस्लाम TMC के टिकट पर जीत कर आए थे।

तब उन्होंने सीपीआई नेता अजय चक्रवर्ती को हराया था। माना जाता है कि तब से कभी हिन्दू बहुल रहा देगंगा मज़हबी तौर पर विभाजन का शिकार होता जा रहा है। अब यहाँ की डेमोग्राफी काफी बदल गई है। फिलहाल यहाँ के हालत ठीक नहीं बताए जा रहे हैं।

TMC नेता हाजी नुरुल इस्लाम वही हैं जिन्होंने चुनाव के दौरान अपने समर्थकों से कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ जाने का एलान किया था। तब उन्होंने देगंगा बाजार की एक मस्जिद के ऊपर माइक लगाने और क्षेत्र के एक कब्रिस्तान के विस्तार का वादा किया था। साल 2010 के हिन्दू विरोधी दंगो में विवाद की मुख्य वजह चट्टल पल्ली गाँव में बना एक शिव मंदिर था। यह गाँव स्वामी विवेकानन्द के गुरु रामकृष्ण परमहंस की संरक्षिका प्रसिद्ध रानी राशमोनी का था। यहाँ के शिव मंदिर के बगल कब्रिस्तान बना हुआ है। इस शिव मंदिर पर 39 वर्षों से हिंदू समाज हर साल हिंदू सामूहिक तौर पर दुर्गा पूजा मानते रहे हैं।

हिंसा 6 सितंबर 2010 को भड़की थी। तब हर साल की तरह हिंदू समुदाय शिव मंदिर के बगल दुर्गापूजा बनवा रहा था। इसी दिन मुस्लिमों ने कब्रिस्तान के चारों तरफ बॉउंड्री बनवानी शुरू कर दी थी। यह बॉउंड्री मंदिर की जमीन तक पहुँच गई तो हिन्दुओं ने विरोध शुरू किया। आरोप है कि इस दौरान हाजी नुरुल इस्लाम ने इस मौके पर वोटों के ध्रुवीकरण के लिए मुस्लिमों को हिन्दुओं के खिलाफ भड़काया था। तब हाजी नुरुल ने 500 मुस्लिओं की भीड़ के साथ सड़क जाम कर दी थी और थाने तक में हंगामा किया था।

बताया यह भी गया था कि तब नुरुल ने एक हिंसक भीड़ के साथ थाने से लौटते हुए राह में पड़ने वाले हिन्दुओं के घरों और दुकानों में तोड़फोड़ की थी। कई वाहनों साथ में आगजनी हुई थी जिसमें पुलिस की भी गाड़ियाँ शामिल थीं। इसके अलावा मंदिर को भी अपवित्र कर दिया गया था। डेली पायनियर के एक पत्रकार ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि हिंसक भीड़ ने सड़क के किनारे काली मंदिर में रखी मूर्ति को तोड़ कर सड़क पर फेंक दिया था। इस दौरान 3 दिनों चल चली हिंसा में 250 से अधिक दुकानें लूटी गईं थी और 50 से अधिक घर जले थे। 5 मंदिरों में तोड़फोड़ हुई थी। हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ देगंगा बाजार की मस्जिदों पर माइक भी लगा दिए गए थे।

देगंगा दंगों में कुल 24 लोग घायल हुए थे। एक युवक की गोली लगने से मौत भी हो गई थी। हालात काबू करने के लिए अर्धसैनिक बलों को तैनात करना पड़ा था। तब दर्ज हुई FIR में हाजी नुरुल इस्लाम को हिंसा का मुख्य आरोपित बनाया गया था। TMC नेता ने तब हिंसा में अपनी संलिप्तता से इंकार किया था। उलटे उन्होंने दावा किया था कि वो बवाल को रोकने की कोशिश कर रहे थे। हाजी नुरुल को प्रत्याशी बनाने पर सोशल मीडिया पर तृणमूल कॉन्ग्रेस की काफी आलोचना हो रही है।

शाहनवाज बने राहुल, बीवी अर्शी का नाम हुआ पूनम: दंपति ने की घर-वापसी, अयोध्या की मिट्टी का तिलक लगा लिया संकल्प – हमेशा सनातन पद्धति से जिएँगे

उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर जिले में एक मुस्लिम दम्पति ने घर वापसी की है। हिन्दू धर्म स्वीकार करने के बाद शामली निवासी शाहनवाज अब राहुल बन चुके हैं जबकि उनकी बीवी अर्शी का नाम पूनम हो गया है। मूल रूप से उत्तराखंड की रहने वाली पूनम पहले हिन्दू हुआ करती थीं जिन्होंने 3 साल पहले शाहनवाज से निकाह कर के अर्शी नाम से इस्लाम कबूल कर लिया था। रविवार (10 मार्च, 2024) को हुए इस कार्यक्रम के बाद पति-पत्नी ने अयोध्या से आई मिट्टी को माथे पर लगा कर तिलक किया और भविष्य में हमेशा सनातन पद्धति से जीने का संकल्प लिया।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक घर वापसी का यह कार्यक्रम तितावी थानाक्षेत्र में मौजूद मुज़फ्फरनगर के बघरा स्थित योग साधना यशवीर आश्रम में हुआ। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, लगभग 3 साल पहले पूनम गुर्जर नाम की लड़की और शाहनवाज नाम से युवक में कथित तौर पर प्यार हुआ था। पूनम मूलतः उत्तराखंड के रुड़की की रहने वाली हैं जबकि शाहनवाज शामली जिले के कैराना का निवासी है। थोड़े समय मिलने-मिलाने के बाद दोनों ने इस्लामी तौर-तरीके से निकाह कर लिया था। पूनम ने भी हिन्दू धर्म त्याग कर अपना नाम अर्शी रख लिया था।

बताया जा रहा है कि निकाह के बाद पूनम को इस्लामी तौर-तरीके बिलकुल पसंद नहीं आए। वो बचपन से ही शाकाहारी थीं लेकिन उनको माँस-मछली खाने के लिए कहा जाता था। इस मतभेद की वजह से पूनम की शाहनवाज के घर में नहीं बनी। वो फिर से सनातन में लौटना चाहती थीं। इसके लिए पूनम ने अपने शौहर शाहनवाज को भी समझाना शुरू कर दिया। तब तक घेरलू कलह के चलते पूनम अपने शौहर शाहनवाज के साथ उसके परिवार से अलग रहना शुरू कर चुकी थीं।

कुछ दिनों बाद शाहनवाज को भी हिन्दू तौर-तरीके पसंद आने लगे। वह सनातनी पद्धति से जीना शुरू किया। घर वापसी के लिए इस दम्पति ने मुज़फ्फरनगर के स्वामी यशवीर आश्रम से सम्पर्क किया। आखिरकार उन्हें रविवार का समय मिला। घर वापसी के कार्यक्रम के दौरान शाहनवाज और अर्शी ने वैदिक विधि-विधान से हवन किया। दोनों ने देवी-देवताओं की जयकार की। इस दौरान इन दोनों ने अयोध्या से आई मिट्टी से तिलक किया। विधिवत पूजापाठ के बाद अर्शी ने पुनः अपना मूल नाम पूनम रख लिया जबकि शाहनवाज राहुल बन गए।

पूरे कार्यक्रम के दौरान शाहनवाज ने जय श्री राम प्रिंट लिखा गमछा ओढ़ रखा था। उन्होंने जय श्री राम का नारा लगाते हुए कहा कि उनको इस्लाम में अच्छा नहीं लगता था और पहले भी वो पूजापाठ किया करते थे। पूनम और राहुल ने भविष्य में सनातन पद्धति से ही जीने का संकल्प लिया। इस अवसर पर स्वामी यशवीर आश्रम में मौजूद संतों और हिन्दू संगठन के अन्य सदस्यों ने घर वापसी करने वाले दम्पति को आशीर्वाद दिया।