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ED की कस्टडी में हेमंत, झारखंड के नए मुख्यमंत्री चुने गए चम्पई सोरेन: सीता भाभी की बगावत से पत्नी को CM बनाने का प्लान बिगड़ा

झारखंड में चम्पई सोरेन को सत्ताधारी विधायक दल का नेता चुना गया है। वो राज्य के नए मुख्यमंत्री होंगे। वहीं हेमंत सोरेन ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है। पहले चर्चा थी कि वो अपनी पत्नी कल्पना सोरेन को CM बना सकते हैं, लेकिन उनकी भाभी और 3 बार की विधायक सीता सोरेन ने बगावत कर दी थी। हेमंत सोरेन ने राजभवन पहुँच कर राज्यपाल को अपना इस्तीफा सौंप दिया है। चर्चा है कि ED (प्रवर्तन निदेशालय) उन्हें कभी भी गिरफ्तार कर सकती है।

उससे पहले JMM, RJD और कॉन्ग्रेस के विधायक भी राजभवन पहुँचे। राजद और कॉन्ग्रेस ने पहले ही साफ़ कर दिया था कि वो हेमंत सोरेन के फैसले का समर्थन करेंगे। चम्पई सोरेन सरायकेला से विधायक हैं। चम्पई सोरेन अब तक हेमंत कैबिनेट में परिवहन के अलावा SC-ST, अल्पसंख्यक एवं पिछड़ा कल्याण मंत्री थे। उन्होंने सरायकेला से 2019 में लगातार चौथी बार जीत दर्ज की। एक दिन पहले ही सत्ताधारी विधायकों के हस्ताक्षर एक खली कागज पर ले लिए गए थे।

हेमंत सोरेन को विधायकों ने नए CM के नाम पर निर्णय लेने के लिए अधिकृत कर दिया था। चम्पई के पिता का नाम सिमल सोरेन था, जो सरायकेला-खरसावाँ जिले के जिलिंगगोड़ा गाँव में किसान थे। उनके बड़े बेटे चम्पई ने भी कई दिनों तक खेती-किसानी में उनका हाथ बँटाया। चम्पई सोरेन की शादी कम उम्र में ही हो गई थी। उनके 4 बेटे और 3 बेटियाँ हैं। उन्होंने सरकारी स्कूल से 10वीं तक की पढ़ाई की है। उन्होंने 90 के दशक में अलग झारखंड के लिए तत्कालीन बिहार में शिबू सोरेन के साथ मिल कर आंदोलन चलाया था।

उसके बाद उन्हें कई लोग ‘झारखंड टाइगर’ भी कहा जाने लगा था। अर्जुन मुंडा की भाजपा-JMM गठबंधन सरकार में भी वो मंत्री हुआ करते थे। वहीं जब पहली बार हेमंत सोरेन की सरकार बनी तो उन्हें फ़ूड एन्ड सिविल सप्लाइज के अलावा ट्रांसपोर्ट मिनिस्ट्री दी गई। हेमंत सोरेन पर जमीन घोटाले और मनी लॉन्ड्रिंग का मामला चल रहा है। JMM सांसद महुआ माजी का कहना है कि हेमंत सोरेन ED की हिरासत में हैं और वो जाँच एजेंसी की टीम के साथ ही इस्तीफा देने गए थे।

Paytm के रिचार्ज से लेकर वॉलेट सर्विस तक पर रोक: जानिए क्या है RBI का आदेश, कब तक निकाल सकते हैं पैसा

‘भारतीय रिजर्व बैंक’ (RBI) ने पेटीएम पेमेंट्स बैंक (PPBL) पर कई प्रतिबंध लगाए हैं। इन प्रतिबंधों के तहत, Paytm पेमेंट्स बैंक अब नए ग्राहकों को जोड़ नहीं पाएगी, किसी भी ग्राहक के खाते में जमा नहीं ले पाएगी, मोबाइल रिचार्ज, वॉलेट सेवाओं और फास्टैग टॉप-अप जैसी सेवाओं को प्रदान नहीं कर पाएगी। इन प्रतिबंधों से पेटीएम पेमेंट्स बैंक को काफी नुकसान होगा। कंपनी के नए ग्राहक आधार में वृद्धि रुक जाएगी और मौजूदा ग्राहकों को भी कई सेवाओं से वंचित होना पड़ेगा।

आरबीआई के निर्देशों के अनुसार, 29 फरवरी 2024 के बाद किसी भी ग्राहक खाते, प्रीपेड उपकरण, वॉलेट, फास्टैग, एनसीएमसी कार्ड इत्यादि में किसी भी ब्याज, कैशबैक के अलावा कोई और जमा या क्रेडिट लेनदेन या टॉप अप की अनुमति नहीं दी जाएगी। हालाँकि, इसके ग्राहकों द्वारा बचत बैंक खाते, चालू खाते, प्रीपेड उपकरण, FASTags, नेशनल कॉमन मोबिलिटी कार्ड आदि सहित अपने खातों से शेष राशि की निकासी या उपयोग की अनुमति उनके उपलब्ध शेष राशि तक बिना किसी प्रतिबंध के दी जाएगी। इसके अलावा, कोई भी अन्य बैंकिंग सेवाएँ, जैसे फंड ट्रांसफर, BBPOU और UPI सुविधा 29 फरवरी, 2024 के बाद पेटीएम पेमेंट्स बैंक द्वारा प्रदान नहीं की जा सकेंगी।

आरबीआई ने वन97 कम्युनिकेशंस लिमिटेड और पेटीएम पेमेंट्स सर्विसेज लिमिटेड के नोडल खातों को जल्द से जल्द समाप्त करने का भी निर्देश दिया, जो 29 फरवरी से पहले किया जाना चाहिए। RBI के बयान में कहा गया है, “सभी पाइपलाइन लेनदेन और नोडल खातों (29 फरवरी, 2024 को या उससे पहले शुरू किए गए सभी लेनदेन के संबंध में) का निपटान 15 मार्च, 2024 तक पूरा किया जाएगा और उसके बाद किसी और लेनदेन की अनुमति नहीं दी जाएगी।”

आरबीआई ने पेटीएम पेमेंट्स बैंक के खिलाफ ये एक्शन बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट-1949 के सेक्शन 35A के तहत लिया है। यह पहली बार नहीं है जब आरबीआई ने PPBL पर प्रतिबंध लगाए हैं। मार्च 2022 में भी आरबीआई ने PPBL पर नए ग्राहकों को जोड़ने पर रोक लगा दी थी।

राम जन्मभूमि से मुगलों को खदेड़ा, शुरू करवाई पूजा, करा रहे थे बाड़ेबंदी… जिस गर्भगृह के ‘अंगरक्षक’ थे राजा रणविजय सिंह, वहीं हुए बलिदान

अयोध्या में सोमवार (22 जनवरी, 2024) को एक भव्य समारोह के बीच भगवान राम के विग्रह की प्राण प्रतिष्ठा उनकी जन्मभूमि पर बन रहे मंदिर के गर्भगृह में हो गई। इस अवसर पर देश और दुनिया भर के हिन्दू समाज ने उन तमाम ज्ञात-अज्ञात बलिदानियों को शीश नवाया जिन्होंने राम मंदिर के लिए मुगल से मुलायम काल तक चले संघर्ष में अपने आप को स्वाहा कर दिया। इन तमाम अमर बलिदानियों में अम्बेडकरनगर के हंसवर राजपरिवार का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।

यहाँ के राजा रणविजय सिंह ने मुगल फ़ौज से लोहा लिया था और वीरगति पाई थी। ऑपइंडिया की टीम हंसवर के उस महल तक पहुँची जहाँ बलिदानी राजा अपनी सेना के साथ जन्मभूमि बचाने निकले तो लेकिन लौट कर वापस नहीं आ पाए।

खंडहर में तब्दील हो चुका है महल

हंसवर पहुँच कर ऑपइंडिया ने यह पाया कि राजा रणविजय सिंह का महल खँडहर जैसा हो चुका है। लम्बे समय से यहाँ रंग-रोशन नहीं हुआ। बाहर की दीवालों में भी दरारें आ चुकी हैं। महल के आसपास मुस्लिम आबादी बहुलता में बस चुकी है। जहाँ कभी महल की बाउंड्री थी, वहाँ अब तमाम दुकानें खुल चुकी हैं। मैदान में आसपास के बच्चे क्रिकेट खेलते हैं। बाहरी हिस्से में चारों तरफ गंदगी का अम्बार दिखा। एक हिस्से पर तो कालिख भी पुती हुई है। महल के आंतरिक हिस्से में वो चबूतरा अभी भी मौजूद है जहाँ कभी राजा रणविजय पूजा-पाठ करते थे।

राजा रणविजय सिंह का महल

राजा रणविजय सिंह के वंशज संजय फ़िलहाल भारतीय जनता पार्टी के नेता है। वो इस समय हंसवर के ब्लॉक प्रमुख हैं। जब हम पहुँचे तब वो महल पर मौजूद नहीं थे। राम जन्मभूमि प्राण प्रतिष्ठा में संजय सिंह भी मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित किए गए थे। संजय सिंह राजा रणविजय की 7वीं पीढ़ी हैं।

महताब सिंह और देवीदीन के बाद तीसरा आक्रमण रणविजय सिंह का

अम्बेडकरनगर के इतिहासकार और सामाजिक कार्यकर्ता बलराम मिश्रा हमें हंसवर महल पर ही मिल गए। वो राम जन्मभूमि के लिए किए गए हिन्दुओं के संघर्ष पर लम्बे समय से शोध कर रहे हैं। बलराम मिश्रा ने हमें बताया कि महाराज रणविजय सिंह बाबर की फ़ौज द्वारा हिन्दुओं के नरसंहार, राम मंदिर पर हमला और राजा महताब के साथ पंडित देवीदीन की हत्या से काफी व्यथित थे। इसी बीच अयोध्या से स्वामी महेश्वरनंद हंसवर आए और उन्होंने राजा रणविजय सिंह से तब तक युद्ध न छेड़ने को ले कर सवाल किया।

राजा रणविजय सिंह के महल के भीतर का दृश्य

इस पर राजा रणविजय सिंह ने आँखों में आँसू भर के कहा, “महात्मा जी। मैं मुगल फ़ौज के खिलाफ पूरी तैयारी में जुटा हूँ क्योंकि मैं कोई कोर-कसर नहीं छोड़ना चाहता।” यह समय काल सन 1526-27 का था।

भाई और साले भी थे संघर्ष में शामिल

बलराम मिश्रा आगे बताते हैं कि आखिरकार राजा रणविजय सिंह अपनी सेना के साथ अयोध्या की तरफ कूच कर गए। राजा रणविजय सिंह की सेना में उनकी ससुराल के सैनिक ले कर उनके साले कुँवर वीरभानु प्रताप भी शामिल हुए थे। राजा रणविजय की ससुराल गोरखपुर के पास जयराज नगर में थी। तब यह स्थान एक छोटा सा रजवाड़ा हुआ करता था। इसी जगह के नाम पर राजा रणविजय सिंह की पत्नी का नाम रानी जयराज कुँवर पड़ा था।

राजा रणविजय सिंह की कहानी बताते बलराम मिश्रा

राम के नाम पर संघर्ष करने के लिए हंसवर से सटे मकरही रजवाड़े के राजा संग्राम सिंह भी रणविजय सिंह के साथ अपने सैनिक ले कर महल छोड़ कर निकल चल पड़े थे। संग्राम सिंह राजा रणविजय के ही पारिवारिक सदस्य थे।

मकरही राजमहल, जहाँ के राजा ने युद्ध में दिया था रणविजय सिंह का साथ

8 दिनों तक चले युद्ध में वापस ली थी रामजन्मभूमि

बलराम मिश्रा के साथ स्वर्गीय राम गोपाल ‘शरद’ द्वारा लिखी गई पुस्तक में भी राजा रणविजय सिंह के बलिदान का उल्लेख मिलता है। अयोध्या से हंसवर की दूरी लगभग 80 किलोमीटर है। जब तक राजा रणविजय सिंह अपनी सेना के साथ अयोध्या धर्मक्षेत्र की सीमाओं पर पहुँचे तब तक वहाँ मुगल फ़ौज रामजन्मभूमि पर अपनी छावनी बना चुकी थी। अयोध्या पहुँच कर राजा रणविजय ने जन्मभूमि पर काबिज़ मुगल फ़ौज पर हमला किया। यह युद्ध लगभग 7 दिनों तक चला था।

8वें दिन राजा रणविजय सिंह की सेना ने जन्मभूमि परिसर पर अपना अधिकार जमा लिया था। तब मुगल फ़ौज को पीछे खिसकना पड़ा था। मुगल सेनापति मीर बाकी तब भाग खड़ा हुआ था।

राजा रणविजय जन्मभूमि को बनाना चाहते थे अभेद्य

इतिहासकार बलराम मिश्रा जब हमें यह इतिहास बता रहे थे तब वहाँ आसपास हंसवर के तमाम हिन्दू संगठन के लोग भी जमा हो गए थे। इसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े अशोक कुमार भी शामिल हैं। हंसवर महल से जुड़े कई अन्य लोग भी वहाँ मौजूद थे। वो सभी इन ऐतिहासिक तथ्यों से पूरी तरह से सहमत थे। बलराम मिश्रा ने आगे बताया कि जन्मभूमि को वापस पाने के बाद राजा रणविजय सिंह और उनके साथ हिन्दू योद्धाओं की सेना ने वहाँ आसपास के संतों-महंतों को बुलवाया। इस जगह फिर पूजा-पाठ शुरू हो गई।

हालाँकि राजा रणविजय सिंह को मुगलों की क्रूरता और धूर्तता का पूरा आभास पहले से था। रणविजय सिंह रामजन्मभूमि को अभेद्य बनाना चाहते थे। उन्होंने परिसर के चारों तरफ बाड़ बनवाई। गहरी खाइयाँ भी खुदवानी शुरू कर दी। कम समय और संसाधन में उन्होंने अधिकतम प्रयास किए कि मीर बाकी फिर से जन्मभूमि के आसपास न फटक सके।

मुगलों फ़ौज ने फिर किया तोपों से हमला

इतिहासकार बलराम मिश्रा बताते हैं कि राजा रणविजय सिंह का अनुमान सही साबित हुआ। 10 दिनों बाद ही मुगल फ़ौज फिर से लौट कर आई। दिल्ली से भी बैकअप सिपाही भेजे गए जो कहीं अधिक क्रूर थे। मुगल फ़ौज ने तोपों से सबसे पहले बाउंड्री बाड़ों को तोड़ा। फिर जन्मभूमि परिसर में घुस गई। महाराजा रणविजय सिंह अपने रिश्तेदारों और सैनिकों के साथ अधिकतम सामर्थ्य से इस हमले का मुकाबला करते रहे। आखिरकार संख्या बल अधिक होने और अधर्म पूर्वक से लड़ने की वजह से मुगल फ़ौज की जीत हुई।

गर्भगृह पर ही मिला था राजा रणविजय का पार्थिव शव

बलराम मिश्रा बताते हैं कि गर्भगृह के जिस स्थान पर आज रामलला विराजमान हैं उसी जगह राजा रणविजय सिंह का शव क्षत-विक्षत हालत में मिला था। उनके साले वीरभानु प्रताप और भाई संग्राम सिंह को पहले ही वीरगति मिल गई थी। भगवान राम से अत्यधिक प्रेम करने की वजह से राजा रणविजय सिंह ने गर्भगृह की रखवाली के लिए खुद को तैनात किया था। यहीं पर उन्होंने अंतिम साँस ली थी। हालाँकि, वीरगति से पहले राजा और उनके साथियों ने कई मुगल कमांडर और सैनिक मार गिराए थे।

मुगल फ़ौज छीनना चाहती थी राजा की लाश

राजा रणविजय सिंह के बलिदान का उल्लेख अयोध्या के उस स्थान पर भी मिलता है जहाँ राम मंदिर निर्माण के लिए तराशे गए पत्थरों की कार्यशाला मौजूद है। तमाम गुमनाम बलिदानियों की याद दिलाने वाली इस कार्यशाला का संचालन ‘विश्व हिन्दू परिषद’ (VHP) द्वारा किया जाता है। राजा की वीरगति के बाद मुगल फ़ौज ने वहाँ बने पूजा स्थल को छिन्न-भिन्न कर डाला। मंदिर क्षेत्र को पाशविक हरकतों से अपवित्र भी किया गया। इसी के साथ एक बार फिर से हिन्दुओं के इस तीर्थस्थल पर पूजा-पाठ बंद हो गई।

राजा रणविजय सिंह के महल के कुछ हिस्से अब हैं बदहाल

इतिहासकार बलराम मिश्रा आगे बताते हैं कि मुगल फ़ौज किसी भी हालत में राजा रणविजय सिंह के शव को छीनना चाहती थी। ऐसा करने के पीछे उनका मकसद शव के साथ निर्ममता कर के उसकी प्रदर्शनी बना कर हिन्दुओं का मनोबल गिराने की थी। साथ ही वो लगातार लड़ कर मारी जा रही अपनी फ़ौज को नई ताकत देना चाहते थे।

सरयू नदी में कूद गए अपने राजा शव ले कर बचे-खुचे सैनिक

इतिहासकार बलराम मिश्रा भी जल्द ही अयोध्या रामजन्मभूमि पर लिखी अपनी एक नई पुस्तक को सार्वजनिक करेंगे। उन्होंने ऑपइंडिया को आगे बताया कि हंसवर से युद्ध करने गए राजा के महज मुट्ठी भर सैनिक वापस अपने राज्य लौट पाए थे। अपने राजा के बलिदान के बाद हंसवर राज्य के सैनिकों ने उनके शव की तरफ मुगल फ़ौज को बढ़ते देखा। बहुत कम संख्या में बचे होने के बावजूद उन सैनिकों में से कुछ ने मुगलों को थोड़े समय के लिए रोका। कुछ सैनिकों ने इतना समय पा कर अपने राजा का शव ले कर सरयू नदी में छलाँग लगा दी। वो काफी दूर तक तैर कर गए और बाद में कहीं किनारे सुरक्षित स्थान पर निकले।

उधर मुगलों को रोके सैनिक एक-एक कर के बलिदान हो गए। अपने राजा के शव के साथ नदी में कूदे सैनिकों ने किसी सुरक्षित जगह पहुँच कर एक नाव का प्रबंध किया। यहाँ से वो जल मार्ग से अधिक से अधिक दूरी तक राज रणविजय सिंह का शव ले कर गए। बाद में वो सड़क मार्ग से कई खतरों को मोल लेते हुए हंसवर पहुँचे। उनके शव को देखते ही प्रजा में थोड़े समय के लिए कोहराम मच गया था। बाद में परिजनों ने शव का विधि-विधान से अंतिम संस्कार किया।

हंसवर के हर परिवार से बलिदान हुआ था एक रामभक्त सिपाही

हंसवर महल पर मौजूद हिन्दू संगठन के सदस्यों ने हमें बताया कि राजा रणविजय के शव को देखते ही पूरे हंसवर में पहले दुःख और बाद में आक्रोश की लहर दौड़ गई थी। इस आक्रोश की वजह यह थी कि अपने राजा के साथ रामजन्मभूमि की रक्षा के लिए हंसवर के हर घर से कम से कम एक जवान सैनिक अयोध्या गया था। इस युद्ध के चलते हर घर से एक चिराग बुझा था। हंसवर के निवासियों ने वामपंथी इतिहासकारों द्वारा गढ़े गए जातिवाद के जाल को भी साजिश बताया।

उन्होंने कहा कि राजा रणविजय के सैनिक सभी जातियों के साथ जिन्हें एक साथ एक तरह का सम्मान मिलता था। उन सभी ने सामूहिक तौर पर बताया कि तब जातिगत या वर्णगत घृणा जैसा कभी कुछ भी नहीं था।

आज भी हंसवर के कुछ लोग पुराने श्लोकों की पंक्तियों को याद करते हैं। इन्ही में से एक श्लोक है, “हंसवरराज्ये राजा सिद्धिरामो यद्धिती राजत, चिंतने रामो रामराज्यम वय वीर प्रज्ञा समन्वितः”। (सम्भवतः श्लोक सुनने में कुछ सुधार सम्भव)। अर्थात, “हंसवर राजा के हृदय में स्वयं भगवान राम विराजते थे। उन प्रज्ञावान राजा रणविजय के चिंतन में रामराज्य था।” यह पंक्तियाँ 500 साल पहले की हैं जब किसी समकालीन विद्वान ने राजा रणविजय सिंह के लिए लिखीं थीं।

झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन ने ED अधिकारियों के खिलाफ SC/ST एक्ट में दर्ज कराया मामला, कहा- पूरे समुदाय को बदनाम करने की कोशिश की

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) अधिकारियों के खिलाफ ST/SC एक्ट में एफआईआर दर्ज कराई है। सोरेन ने उन अधिकारियों के खिलाफ शिकायत दी है, जिन्होंने दिल्ली स्थित उनके आवास पर छापेरमारी की थी। उन्होंने आरोप लगाया है कि ईडी के अधिकारियों ने उनके दिल्ली स्थित घर में छापेमारी के दौरान बवाल किया और कर्मचारियों के साथ बदतमीजी की।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, हेमंत सोरेन ने ईडी अधिकारी कपिल राज, देवव्रत झा, अनुपम कुमार, अमन पटेल सहित अन्य अधिकारियों के खिलाफ शिकायत दी थी। उन्होंने अपनी शिकायत में कहा, “अधिकारियों ने 29 जनवरी 2024 को दिल्ली स्थिति मेरे आवास पर छापेमारी करके मुझे और मेरे पूरे समुदाय को परेशान एवं बदनाम करने की कोशिश की।”

जानकारी के मुताबिक, हेमंत सोरेन ने ईमेल से राजधानी राँची के धुर्वा थाने में एफआईआर दर्ज करने के लिए शिकायत दी थी। इस शिकायत के आधार पर एसटी-एससी थाने में एफआईआर दर्ज की गई है। मीडिया से बातचीत में राँची के एसएसपी चंदन कुमार सिन्हा ने इस एफआईआर की पुष्टि की है। हेमंत सोरेन का कहना है कि ईडी के अधिकारी शारीरिक और मानसिक रूप से लगातार प्रताड़ित कर रहे हैं।

बीजेपी ने दी ये प्रतिक्रिया

इस पूरे मामले को लेकर बीजेपी नेता और झारखंड के पहले मुख्यमंत्री रहे बाबूलाल मरांडी ने एक्स पर लिखा, “हेमंत सोरेन ने ईडी के अधिकारियों पर एससी-एसटी एक्ट के तहत एससी-एसटी थाने में खुद ही मुकदमा दर्ज कराया है। एससी/एसटी एक्ट का इससे बड़ा दुरुपयोग और मजाक का दूसरा कोई उदाहरण नहीं हो सकता है। अपने ‘कर्मों’ से हेमंत सोरेन अपनी एवं सोरेन परिवार की प्रतिष्ठा पहले ही धूमिल कर चुके हैं। अब भगवान उन्हें कुछ सुबुद्धि दें।”

झारखंड में पैदा हो सकता है राजनीतिक तनाव

सोरेन झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के प्रमुख हैं और झारखंड के मुख्यमंत्री हैं। हेमंत सोरेन के खिलाफ ईडी की जाँच एवं कार्रवाई जमीन घोटाले से संबंधित है। ईडी ने आरोप लगाया है कि हेमंत सोरेन ने अपने परिवार के सदस्यों और सहयोगियों के साथ मिलकर जमीनों को अवैध रूप से हड़प लिया।

हालाँकि, हेमंत सोरेन ने बाबूलाल मरांडी ने इन आरोपों से इनकार किया है। सोरेन के खिलाफ ईडी की जाँच और उनके द्वारा ईडी अधिकारियों के खिलाफ दर्ज कराई गई प्राथमिकी, दोनों ही झारखंड की राजनीति में नए तनाव पैदा कर सकती हैं। यह देखना होगा कि इस मामले का आगे क्या होता है।

‘बिना अधिकार मुलायम सरकार ने ज्ञानवापी में रोक दिया पूजा-पाठ’: जानिए वाराणसी कोर्ट के आदेश में क्या-क्या, तहखाने में मूर्ति और पूजा सामग्री भी

काशी में जब मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब का कहर बरपा था, तब उसने बाबा विश्वनाथ के मंदिर को तोड़ कर उसके ऊपर एक ढाँचा बना दिया और उसे मस्जिद कहा जाने लगा। इसकी संरचना में स्पष्ट देखा जा सकता है कि ये कभी मंदिर हुआ करता था, लेकिन इसके ऊपर मस्जिद बना दी गई। भीतर वजूखाना के नाम पर शिवलिंग के ऊपर हाथ-पाँव धोए गए। अब कोर्ट ने हिन्दुओं को ज्ञानवापी के भीतर पूजा-पाठ करने की अनुमति दे दी है। इसे हिन्दू पक्ष की एक बड़ी जीत के रूप में देखा जा रहा है।

इस संबंध में शैलेन्द्र कुमार पाठक ने मस्जिद कमिटी के विरुद्ध याचिका दायर की थी। वाराणसी के जिला न्यायाधीश अजय कृष्ण विश्वेश ने इस मामले में फैसला सुनाया। बता दें कि अदालत ने 17 जनवरी, 2024 को ही वाराणसी के DM को ज्ञानवापी ढाँचे के दक्षिण की तरफ स्थित इस तहखाने का सिसीवर नियुक्त किया था। इसी संपत्ति को लेकर याचिका दायर की गई थी। जिलाधीश को आदेश दिया गया कि वो इस तहखाने को अपनी अभिरक्षा एवं नियंत्रण में लें।

साथ ही उसे सुरक्षित रखने और अंतिम फैसला आने तक उसकी यथास्थिति बनाए रखने के लिए भी अदालत ने उन्हें कहा था। याचिका में कहा गया था कि उक्त तहखाने में मूर्तिपूजा की जाती थी। अदालत ने माना कि दिसंबर 1993 में पुजारी सोमनाथ व्यास को तहखाने में घुसने से रोक दिया गया था और इसकी बैरिकेडिंग कर दी गई थी। ब्रिटिश काल से ही वो वहाँ पूजा करते आ रहे थे। उन्हें रोके जाने के बाद राग-भोग आदि संस्कार भी रुक गए। बाद में तहखाने का दरवाजा रोक दिया गया।

अदालत ने ये भी माना है कि हिन्दू धर्म से संबंधित कई सामग्रियाँ एवं प्रतिमाएँ आज भी उक्त तहखाने में मौजूद हैं। मूर्तियों की नियमित रूप से पूजा की जानी आवश्यक है। अदालत ने बड़ी बात ये कही कि राज्य सरकार और जिला प्रशासन ने बिना किसी विधिक अधिकार के दिसंबर 1993 में पूजा बंद करवा दी थी। उसी महीने में मुलायम सिंह यादव ने बसपा सुप्रीमो कांशीराम के समर्थन से सरकार बनाई थी और मुख्यमंत्री बने थे। ‘मिले मुलायम-कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्री राम’ का नारा लगाया गया था।

जबकि मुस्लिम पक्ष का दावा है कि व्यास द्वारा उक्त तहखाने में कभी पूजा की ही नहीं गई। साथ ही वहाँ कोई मूर्ति होने की बात भी नकार दी गई। अदालत ने आदेश दिया कि 7 दिनों के भीतर वहाँ लोहे के बाड़ में पूजा-पाठ की व्यवस्था की जाए। कोर्ट को ये भी बताया गया था कि परिक्रमा वाले मार्ग पर मस्जिद कमिटी वालों ने लोहे की बैरिकेडिंग कर रखी है। साथ ही कोर्ट ने व्यास परिवार की वंशावली और वसीयत का भी जिक्र किया। इस फैसले के बाद काशी विश्वनाथ कॉरिडोर में महादेव का दर्शन करने जाने वाले भक्त ज्ञानवापी में भी पूजा-पाठ कर सकेंगे।

मुकदमे की सुनवाई के दौरान भी कई बार पूछा गया कि ज्ञानवापी में बैरिकेडिंग किसके आदेश पर हुई और श्रृंगार गौरी का पूजन बंद हुआ, लेकिन कोई स्पष्ट जवाब नहीं आया। दिसंबर 1993 में जब पूजा रुकी, तब केंद्र में कॉन्ग्रेस की सरकार थी और नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री थे। उत्तर प्रदेश सरकार का कहना था कि इस संबंध में कोई लिखित आदेश नहीं मिला है। पहले बाँस, फिर लोहे की बैरिकेडिंग की। स्वयंभू विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग की तरफ से वादमित्र विजय शंकर रस्तोगी ने 1991 में बताया था कि बैरिकेडिंग से पहले चारों तरफ 4 फ़ीट का परिक्रमा पथ था।

न सिर्फ माँ श्विंगर गौरी की पूजा होती थी, बल्कि ज्ञानवापी मंदिर की परिक्रमा भी करते थे। हिन्दुओं के प्रवेश पर रोक लगने के बाद अदालत का रुख किया गया। अब माँग है कि शिवलिंग को नुकसान पहुँचाए बिना ASI द्वारा सर्वे कराया जाए। फ़िलहाल ये क्षेत्र सील है और इसे छोड़ कर बाकी के ढाँचे का सर्वे हो चुका है। मस्जिद पक्ष ने हिन्दू पक्ष की माँगों को चुनौती देते हुए भी याचिकाएँ दायर कर रखी हैं। वाराणसी की जिला अदालत से लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक में इससे जुड़े मामले चल रहे हैं।

बिहार में ‘सुशासन’ लौटते ही पकड़ा गया ‘साहेबगंज का रावण’, गुजरात से लेकर दिल्ली तक थी तलाश: हत्या से लेकर तस्करी तक में वांछित

दिल्ली पुलिस ने एक ऐसे अपराधी को गिरफ्तार किया है जिसे ‘साहेबगंज का रावण’ के नाम से जाना जाता है। इसका असली नाम राम नरेश सहनी है। उसके खिलाफ 25 से अधिक आपराधिक मामले दर्ज हैं। राम नरेश सहनी लम्बे समय से फरार चल रहा था। वह वर्तमान में 50 से अधिक बदमाशों का गैंग चला रहा है।

सहनी 2005 से लगातार अपराध करता आ रहा है। उसने गुजरात, दिल्ली और बिहार में तमाम अपराध कर रखे थे। इसके कारण पुलिस उसे ढूंढ रही थी। सहनी बिहार के मुजफ्फरपुर का रहने वाला है। उसे हाल ही में बिहार में गिरफ्तार किया गया था, जिसके बाद दिल्ली पुलिस उसे ट्रांजिट रिमांड पर दिल्ली ले आई।

सहनी ने वर्ष 2005 में गुजरात के सूरत शहर में दशहरा के त्यौहार में कुमोद नाम के एक व्यक्ति की हत्या कर दी थी। इसके बाद वह फरार हो गया था। इसके बाद वर्ष 2012 में उसे दिल्ली में गाँजा बेचते हुए पकड़ा गया था। इस मामले में उसे 2013 में जमानत मिली थी। वह जमानत के बीच से ही फरार हो गया। तबसे उसकी तलाश थी।

सहनी के खिलाफ लूट, हत्या, फिरौती के लिए अपहरण, रंगदारी, गाँजा बेचने समेत 25 आपराधिक मामले दर्ज हैं। यह भी सामने आया है कि वह वर्तमान में मुजफ्फरपुर में अवैध शराब का कारोबार कर रहा था। उसने इसके लिए उसने गैंग बना रखा था। उसके गैंग में 50 से अधिक बदमाश थे। उसको ढूँढने के लिए पुलिस लम्बे समय से सक्रिय थी।

राम नरेश सहनी उर्फ ‘साहेबगंज का रावण’ लगातार अपना हुलिया और पता-ठिकाना भी बदलता रहता था। उसे कोर्ट ने भी भगोड़ा घोषित कर रखा था। इस इलाके में इतना खौफ था कि उसके विषय में कोई खुलकर नहीं बोलता था। उसने बिहार में शराबबंदी के बाद से अवैध शराब बेचनी शुरू कर दी और इससे काफी सम्पत्ति भी अर्जित की है।

दिल्ली पुलिस ने बताया है कि सहनी को पकड़ने के लिए 5 जनवरी 2024 को दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच की एक टीम बिहार के मुजफ्फरपुर भेजी गई थी। दिल्ली पुलिस ने स्थानीय पुलिस के सहयोग से मोतीपुर थाना क्षेत्र से उसे पकड़ा। सहनी से शुरुआती पूछताछ के बाद उसे ट्रांजिट रिमांड पर दिल्ली लाया गया है।

सरकारी माल बाजार में बेचा: इमरान खान और बीवी बुशरा को 14 साल की जेल, करोड़ों का जुर्माना भी; चुनाव से 8 दिन पहले पूर्व PM की मुश्किलें और बढ़ी

पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान और उनकी पत्नी बुशरा बीबी को एक अदालत ने तोशाखाना मामले में 14 साल जेल की सजा सुनाई है। दोनों पर ₹78-78 करोड़ का जुर्माना भी लगाया गया है। यह निर्णय पाकिस्तान में आम चुनावों से मात्र 8 दिन पहले आया है। इससे पहले 30 जनवरी 2024 को इमरान खान को साइफर मामले में 10 वर्ष की सजा सुनाई गई थी। अब जिस मामले में सजा सुनाई गई है वह सरकारी गिफ्ट की गड़बड़ियों से जुड़ा है।

यह निर्णय इस्लामाबाद की एक NAB (नेशनल अकाउंटीबिलिटी ब्यूरो) कोर्ट ने सुनाया। इमरान खान के साथ ही उनकी बीवी बुशरा को भी इस मामले में दोषी करार देते हुए सजा सुनाई गई है। दोनों अगले 10 वर्षों तक किसी भी सरकारी पद लेने पर रोक लगा दी गई है। बुशरा बीबी को भी इस मामले में गिरफ्तार कर लिया गया है। इस मामले की सुनवाई के दौरान इमरान के वकीलों ने और समय माँगा जिसे अदालत ने नकार दिया।

गौरतलब है कि इमरान खान और उनकी बीवी को जिस मामले में आज सजा सुनाई गई है, वह उनके प्रधानमंत्री रहते हुए विदेशों से गिफ्ट प्राप्त करने का है। उन पर आरोप है कि उन्होंने अपने कार्यकाल में 108 गिफ्ट लिए, लेकिन उन्हें कोषागार (तोशाखाना) में नहीं जमा करवाया। इनमें से कुछ गिफ्ट बाजार में बेच दिए, जिससे कथित तौर पर इमरान दंपती को करीब 14 करोड़ रुपए मिले थे।

इमरान खान की पाकिस्तान तहरीक ए इन्साफ पार्टी (PTI) ने कोर्ट के आदेश का विरोध किया है। इसे एक कंगारू कोर्ट का निर्णय बताया है और कहा है कि यह नवाज शरीफ के इशारे पर दिया गया फैसला है। PTI ने एक्स/ट्विटर पर लिखा, “2 दिन में पाकिस्तान में मौजूद हर कानून को पूरी तरीके से बर्बाद कर दिया गया है। इमरान खान और बुशरा बीबी को एक और फर्जी मुकदमे का सामना करना पड़ा है, जिसमें दोनों को खुद को बचाने का कोई अधिकार नहीं दिया गया। साइफर की तरह इस मामले का भी किसी ऊँची अदालत में टिकने का कोई आधार नहीं है। यह शर्मनाक है कि कानून को नजरअंदाज किया जा रहा है।”

इमरान खान को इससे पहले कल भी एक मामले में 10 वर्ष की सजा सुनाई गई थी। इस मामले में इमरान सरकार में विदेश मंत्री रहे शाह महमूद कुरैशी को भी 10 वर्ष की सजा सुनाई गई थी। यह मामला अमेरिका में मौजूद पाकिस्तान के राजदूत द्वारा भेजे गए एक नोट की जानकारियाँ सार्वजनिक करने को लेकर था। इससे पहले 5 अगस्त 2023 को भी इमरान खान को एक मामले में सजा सुनाई गई थी। इमरान वर्तमान में अडियाला जेल में बंद हैं।

गौरतलब है कि इमरान को सजा देने के निर्णय तब आए हैं, जब पाकिस्तान में आम चुनाव चल रहे हैं। 8 फरवरी को मतदान होना है। इन चुनावों में लड़ने से भी PTI को अप्रत्यक्ष तरीके से रोक दिया गया है। उसका चुनाव चिन्ह बैट छीन लिया गया है और उसके उम्मीदवारों को अब निर्दलीय बनकर लड़ना पड़ रहा है। इमरान के अलावा भी पार्टी के कई नेता जेलों में बंद हैं। इमरान की पार्टी इसे पाकिस्तानी फ़ौज की साजिश करार देती रही है।

नाबालिग दूल्हे, बाल-बच्चेदार दुल्हनें… 500+ महिलाओं की फर्जी शादी करा के सरकारी योजना में बंदरबाँट की थी साजिश, वीडियो के बाद एक्शन में प्रशासन

उत्तर प्रदेश के बलिया से एक ऐसा मामला सामने आया, जिसके बाद राज्य सरकार को कार्रवाई करनी पड़ी। असल में ‘मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना’ से गुरुवार (25 जनवरी, 2024) को 568 जोड़ों की शादी हुई। लेकिन, इसमें कुछ ऐसा हो गया जिस पर प्रशासन को हरकत में आना पड़ा। दूल्हे का अता-पता भी नहीं था और बड़ी संख्या में दुल्हनों को माला पहना दिया गया। इनमें से कई ऐसी महिलाएँ भी हैं, जिनकी शादी वर्षों पूर्व भी हो चुकी है।

वहीं इनमें कुछ ऐसी जोड़ियाँ भी थीं, जो आपस में भाई-बहन भी हैं। दिखावे के लिए उनकी भी फर्जी शादी करा दी गई। ये सब इसीलिए किया गया, ताकि फोटो-वीडियो के जरिए सिर्फ कागज पर दिखाया जा सके कि शादी हुई है और सरकार योजना के तहत आने वाले पैसों का बँटाधार हो। इस मामले में स्थानीय ADO समेत 9 लोगों पर FIR दर्ज कराई गई है। बता दें कि इस योजना के तहत गरीब कन्या को शादी के लिए राज्य सरकार की तरफ से 51,000 रुपए दिए जाते हैं।

इसी राशि में बंदरबाँट के लिए ये सब किया गया। इसके जो वीडियो सामने आए हैं, उसमें देखा जा सकता है कि जहाँ कुछ पुरुष कुछ महिलाओं को माला पहना रहे हैं वहीं कई ऐसी हैं जिनके गले में माला डली हुई है लेकिन उनके दूल्हे का कोई अता-पता नहीं है। नकली दूल्हे-दुल्हन वाले इस फैसले के बाद एक्शन में आए प्रशासन ने मामला दर्ज कर करवाया। घटना मनियार नगर पंचायत की है। शादी में आई कई महिलाएँ बाल-बच्चेदार भी थीं।

इस समारोह को देखने आए कुछ नाबालिग लड़कों को भी दूल्हा बना कर बिठा दिया गया। उन्हें इसके लिए 2-3 हजार रुपयों का लालच दिया गया था। इन नाबालिग फर्जी दूल्हों को अपना चेहरा गमछे से छिपाते हुए भी देखा जा सकता है। बलिया के CDO ओजस्वी राज ने बताया कि लाभार्थियों के लिए भेजी गई राशि रोक दी गई है। जाँच के लिए 20 सदस्यीय टीम गठित की गई है। बाँसडीह के भाजपा विधायक केतकी सिंह ने भी कार्रवाई की माँग की है।

₹15000 दो, तार के नीचे से भारत में घुसो: अजमेर के दरगाह क्षेत्र से पकड़े गए भाई-बहन, बांग्लादेश से घुसपैठ का मॉडल आया सामने

बांग्लादेश से भारत में अवैध रूप से घुसने का सिलसिला जारी है। बांग्लादेशी सिर्फ 15 हजार रुपए देकर भारत में एंट्री पा लेते हैं और फिर फर्जी दस्तावेज के सहारे पहचान बदलकर यहाँ बस जाते हैं और काम-धंधा करते रहते हैं। हालाँकि, अवैध बांग्लादेशियों के खिलाफ सरकार लगातार अभियान चला रही है। ऐसे ही एक मामले में राजस्थान के अजमेर से पुलिस ने एक बांग्लादेशी भाई-बहन को गिरफ्तार किया है।

ये दोनों भाई-बहन अजमेर के दरगाह क्षेत्र में फर्जी पहचान पत्र बनाकर किराए पर रह रहे थे। ये दोनों दूसरी बार भारत में घुसे थे। इनके पास से फर्जी आधार कार्ड मिला है। इसमें दोनों को पश्चिम बंगाल के चौबीस परगना इलाके का निवासी बताया गया है। दोनों करीब दो महीने से अजमेर में रहकर कपड़ों का कारोबार कर रहे थे। सीआईडी ने शक के आधार पर इन्हें गिरफ्तार किया है।

युवती महमूदा अख्तर पहले दो बार वीजा लेकर भारत आ चुकी है। उस दौरान महमूदा ने हैदराबाद, कलकत्ता, अजमेर सहित भारत के अलग-अलग जगहों पर घूम-घूमकर काम किया था। हालाँकि, जब कोविड का प्रकोप फैला तो वह वापस बांग्लादेश लौट गई थी। महमूदा ने पुलिस को बताया कि इस बार वीजा नहीं मिला तो वह एजेंटों के जरिए अवैध रूप से भारत में घुस आई। 

महज 15 हजार में एंट्री!

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, राजस्थान पुलिस की गिरफ्त में आए बांग्लादेशी भाई-बहन के नाम नाहिद हुसैन (21) और महमूदा अख्तर (30) हैं। ये बांग्लादेश के मुंशीगंज जिले के रहने वाले हैं। बांग्लादेश की राजधानी ढाका से सटे मुंशीगंज जिले में कामकाज की कमी को देखते हुए दोनों भाई-बहन ने भारत में आने की योजना बनाई थी। दोनों दो माह से अजमेर में रह रहे थे।

पुलिस से पूछताछ में उन्होंने बताया है कि सिर्फ 15 हजार रुपए में बांग्लादेश के लोगों को भारत में एंट्री मिल जाती है। ये कोई मुश्किल काम नहीं है। उनका कहना है कि बॉर्डर पर भारत और बांग्लादेश के लोग मिले हुए होते हैं। बॉर्डर इलाके में कई दलाल सक्रिय हैं, जो रुपए लेकर बॉर्डर पार कराने का काम करते हैं। 

बाड़ के नीचे से मिलती है एंट्री

बांग्लादेशी घुसपैठियों ने बताया कि उन्हें बाड़ के नीचे से एंट्री मिल जाती है। ऐसा किसी एजेंट के जरिए ही किया जाता है। भारत में आने के बाद वो फर्जी कागज और पहचान पत्रों के दम पर अपनी आगे की जिंदगी जीते हैं। दोनों ने बताया कि लॉकडाउन से पहले भी वे भारत में ही थे। इस बार वो दूसरी बार भारत आए हैं।

दोनों भाई-बहन अजमेर के नाला बाजार में किराए पर कमरा लेकर रहते थे। दोनों ने नाम भी बदल लिया था। इस तरह सुरक्षा एजेंसियों की आँखों में धूल झोंक कर दोनों भाई-बहन अजमेर में रहकर बिजनेस कर रहे थे। हालाँकि, उनकी पोल खुल गई और पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। उन्हें अलवर स्थित डिडक्शन सेंटर पर भेज दिया है।

अजमेर बना हुआ है घुसपैठियों का अड्डा

बता दें कि अजमेर के भाजपा नेताओं और पदाधिकारियों ने कई बार जिला पुलिस और इंटेलिजेंस को दरगाह के साथ ही अजमेर के अलग-अलग इलाकों में बांग्लादेशियों के अवैध रूप से रहने की शिकायत दर्ज कराई थी। हालाँकि, कॉन्ग्रेस सरकार की तुष्टिकरण की नीतियों के कारण इन पर कोई कार्रवाई नहीं हो पाई। अब सरकार बदलते ही कार्रवाई शुरू हो गई।

माना जाता है कि राजस्थान के अजमेर में अवैध रूप से रहने वाले बांग्लादेशियों की एक बड़ी संख्या है। पिछले कई सालों में यहाँ कई बांग्लादेशी घुसपैठिए गिरफ्तार किए गए हैं। इस समस्या को देखते हुए राजस्थान सरकार ने पुलिस उपाधीक्षक गौरी शंकर को नोडल अधिकारी बनाया गया है। उन पर बांग्लादेशियों को योजनाबद्ध तरीके से दबोचने का जिम्मा दिया गया है।

अब ज्ञानवापी में भी करिए पूजा-पाठ: कोर्ट ने व्यास तहखाने में दिया पूजा का अधिकार, कहा – 7 दिन में करो व्यवस्था; मुलायम ने लगाई थी रोक

वाराणसी स्थित ज्ञानवापी ढाँचे के मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बुधवार (31 जनवरी, 2024) को ‘अंजुमन इंतजामिया मस्जिद कमिटी’ को नोटिस जारी किया है। असल में हिन्दू पक्ष ने उस क्षेत्र के वैज्ञानिक सर्वे की माँग की थी, जिसे मुस्लिम वजूखाना बताते हैं लेकिन वहाँ शिवलिंग मिला था। इसी पर हाईकोर्ट ने वजूखाना से जवाब माँगा था। उधर ज्ञानवापी के व्यास तहखाने में पूजा-पाठ की अनुमति हिन्दुओं को मिल गई है। वाराणसी की जिला अदालत ने ये फैसला सुनाया है।

जिला प्रशासन को आदेश दिया गया है कि बैरिकेडिंग लगाया जाए और और एक सप्ताह के भीतर पूजा-पाठ की व्यवस्था की जाए। ये तहखाना ढाँचे के नीचे है। मुस्लिम पक्ष इसे मस्जिद बताता है। अब यहाँ नियमित पूजा-अर्चना के लिए मार्ग प्रशस्त हो गया है। हिन्दू पक्ष ने इसे बड़ी जीत करार दिया है। बता दें कि नवंबर 1993 तक पूजा होती थी। मुलायम सिंह यादव की सरकार ने पूजा-पाठ पर रोक लगा दी थी। शैलेन्द्र कुमार पाठक ने इस संबंध में याचिका दाखिल की थी, जिस पर अब फैसला आया है।

वहीं मुस्लिम पक्ष इस मामले में ‘वर्शिप एक्ट’ का हवाला देते हुए कह रहा था कि पूजा-पाठ की अनुमति यहाँ नहीं दी जा सकती है। लेकिन, कोर्ट ने हिन्दू पक्ष की याचिका स्वीकार कर ली। 17 जनवरी को ही ‘व्यास तहखाने’ को जिला प्रशासन ने अपने नियंत्रण में ले लिया था। ASI ने यहाँ सर्वे किया था, साथ ही साफ़-सफाई भी की गई थी। इसे ‘व्यास तहखाना’ कहा जाता है, क्योंकि सोमनाथ व्यास नामक पुजारी और उनका परिवार यहाँ 1993 तक पूजा-अर्चना करता आ रहा था।

हिन्दू पक्ष के वकील विष्णु शंकर जैन ने कहा कि जिला प्रशासन व्यवस्था करेगा, वहाँ पूजा-पाठ शुरू हो जाएगी। इस फैसले के बाद ‘हर-हर महादेव’ के नारे भी लगे। उन्होंने इस घटना की तुलना 1986 के उस आदेश से की, जब केएम पांडेय ने यहाँ का ताला खुलवाया था। उन्होंने कहा कि वजूखाने का सर्वे अगला लक्ष्य है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होगी। राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के बाद लोगों में उम्मीद जगी है कि काशी विश्वनाथ में भी उन्हें जीत मिलेगी।