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इंग्लैंड के क्रिकेटर शोएब बशीर को नहीं मिला वीजा तो रोने-धोने पर उतरा ब्रिटिश मीडिया, रोहित शर्मा बोले – मैं वीजा ऑफिस में नहीं बैठता

इंग्लैंड के पाकिस्तानी मूल के गेंदबाज शोएब बशीर को भारत में टेस्ट खेलने के लिए वीजा मिलने में हुई देरी पर ब्रिटिश मीडिया रो रहा है। कुछ ब्रिटिश संस्थान भारत के साथ टेस्ट ना खेलने की अपील भी कर रहे हैं। वहीं भारतीय टीम के कप्तान रोहित शर्मा ने इस मुद्दे पर करारा जवाब दिया है।

इंग्लैंड की टीम भारत में 5 टेस्ट मैच खेलने के लिए आई है। यह टीम बेन स्टोक्स की कप्तानी में आई है। इसका भारत से पहला टेस्ट मैच कल (24 जनवरी, 2024) से हैदराबाद में होना है। इंग्लैंड के दौरे के लिए स्पिनर शोएब बशीर को टीम में शामिल किया गया था। यह उन डेब्यू मैच होता। अभी तक वह जूनियर लेवल का क्रिकेट खेलते थे।

20 वर्षीय शोएब बशीर को बाकी टीम के साथ भारत आना था। हालाँकि, उनको भारत में वीजा मिलने में कुछ दिक्कतें आईं। उनका वीजा अभी तक जारी नहीं हो पाया है। शोएब का वीजा जारी ना हो पाने के पीछे बताया जा रहा है कि वह लंदन में नहीं थे इसलिए उनका वीजा रुका है। बताया जा रहा है कि शोएब बशीर के वीजा पर लंदन स्थित भारतीय दूतावास में मोहर लगनी थी लेकिन उन्हें इंग्लैंड क्रिकेट बोर्ड ने दुबई भेज दिया इसलिए उनके वीजा में देरी हुई।

शोएब बशीर स्वयं तो ब्रिटिश नागरिक हैं लेकिन उनके माता-पिता पाकिस्तान से इंग्लैंड आए थे। शोएब अभी तक अबूधाबी में थे लेकिन वीजा में आ रही दिक्कतों के कारण अब वह वापस इंग्लैंड चले गए हैं। उन्हें पहले मैच के लिए इंग्लैंड की टीम से बाहर कर दिया गया है।

शोएब बशीर के वीजा ना मिलने पर इंग्लैंड के कप्तान बेन स्टोक्स ने कहा, “मैं नहीं चाहूँगा कि उसका (शोएब बशीर) का इंग्लैंड टीम में होने का पहला अनुभव इस प्रकार का हो, यह एक नए लड़के के लिए अच्छा नहीं है।” बेन स्टोक्स ने वीजा ना मिलने पर हैरानी भी जताई। वहीं भारतीय कप्तान रोहित शर्मा ने इस मामले में सवाल पूछे जाने पर कहा, “मैं शोएब का दर्द समझता हूँ लेकिन मैं वीजा ऑफिस में तो नहीं बैठता ना। मुझे उम्मीद है कि उसे वीजा मिल जाएगा और वह भारत खेलने आएगा।”

ब्रिटिश मीडिया ने भी इस मुद्दे में टिप्पणियाँ की हैं। ब्रिटिश मीडिया ने अपील की है कि इंग्लैंड भारत में अपना पहला मैच ना खेले क्योंकि उसके एक खिलाड़ी को वीजा ना मिले। यह अपील औपनिवेशिक मानसिकता रखने वाले ‘द टेलीग्राफ’ ने की है। अन्य ब्रिटिश मीडिया संस्थानों ने भी इसी तरह का प्रलाप किया है।

वहीं पूर्व भारतीय क्रिकेटर वेंकटेश प्रसाद ने असली कारण को उजागर करते हुए ब्रिटेन के रोने-धोने पर हमला बोला है। वेंकटेश प्रसाद ने लिखा, “ब्रिटेन में उनके (शोएब बशीर के) वीज़ा पर मोहर लगनी ज़रूरी थी। ECB ने यह सोचकर शोएब बशीर को UAE भेजा कि किसी तीसरे देश में इस पर मुहर लग जाएगी। बुनियादी प्रक्रियाओं का पालन न करना, चीजो को अपने हिसाब से मान लेना और फिर रोना-धोना अंग्रेजों की पुरानी आदत है। यदि यहाँ को दोषी है तो ECB है।”

न शादी की चिंता न शिक्षा की… राष्ट्रीय बालिका दिवस पर जानें मोदी सरकार की वो योजनाएँ जिनसे बेटियों को मिला मान

1ं.खेल की दुनिया में भारत की बेटियों ने रचा इतिहास…
2.बोर्ड परीक्षा में लड़कियों ने मारी बाजी…
3.भारत को चाँद तक ले गईं महिला वैज्ञानिक…
4.वीरांगना को मिली सेना की कमान…

ये चंद शीर्षक हैं जो आजकल समाचार में हर दूसरे दिन पढ़ने को मिलते हैं। कहीं से पता चलता है कि लड़कियाँ अपने शारीरिक बल से देश का गौरव खेल जगत में बढ़ा रही हैं तो कहीं मानसिक बल से अकादमिक क्षेत्रों में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रही हैं। उनका अस्तित्व, उनकी उपलब्धियाँ देश से लेकर विदेश में चर्चा का कारण है। आज लोग गौरवान्वित हैं क्योंकि भारत का नाम रौशन हो रहा है। यही वजह है कि 24 जनवरी को दिन राष्ट्र बालिका दिवस को खुशहाली से जगह-जगह मनाया जा रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इसकी शुभकामनाएँ दी हैं। उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा, “हम बालिकाओं की अदम्य भावना और उपलब्धियों को सलाम करते हैं। हम सभी क्षेत्रों में प्रत्येक बालिका की समृद्ध क्षमता को भी पहचानते हैं। वे परिवर्तन-निर्माता हैं, जो हमारे देश और समाज को बेहतर बनाती हैं। हमारी सरकार एक ऐसे राष्ट्र के निर्माण के लिए कई प्रयास कर रही है, जहाँ प्रत्येक बालिका को सीखने, बढ़ने और फलने-फूलने का अवसर मिले।”

इसके अलावा, अन्य बड़ी हस्तियाँ और राजनेता भी इस दिवस की शुभकामनाएँ देकर इसकी महत्ता बता रही हैं। स्कूल हो या कॉलेज, लड़कियों को उनकी पढ़ाई, उनके पोषण, उनके कानूनी अधिकार, चिकित्सा सेवा, उनकी सुरक्षा जैसे मुद्दों पर जागरूक किया जा रहा है। सोशल मीडिया पर रील्स बेटियों को लेकर ऐसी डल रही हैं जो कभी सोची भी नहीं जा सकती थी कि बेटियों का इस प्रकार स्वागत होगा।

कन्या भ्रूण हत्या

ज्यादा वक्त नहीं बीता जब भारत को लेकर मीडिया खबरें छापता था कि भारत में कन्या भ्रूण हत्या सामान्य हो गई है। 24 मई 2011 को लैंसेट में प्रकाशित एक शोध की बात करें तो उसमें निकलकर आया था कि भारत के कई परिवार अपने दूसरे बच्चे का लिंग पता चलने पर उसे अबॉर्ट करवा देते थे। टोरंटो यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया था कि भारत में एक दशक में (2011 के हिसाब से) 3.1 से 6 मिलियन गर्भपात हुए, जिनमें अधिकाँश शिक्षित और धनी परिवारों ने कराए।

ऐसा नहीं था कि भारत कन्या भ्रूण हत्या के कारण सिर्फ विदेशी मीडिया में बदनाम हो रहा था। भारत की महिला नेता मेनका गाँधी ने खुद इस बात को 2015 में मीडिया में कहा था कि भारत में 2000 लड़कियाँ प्रतिदिन मारी जाती हैं। गार्जियन की रिपोर्ट में तो यहाँ तक अनुमान थे कि अगर इसी तरह चयनात्मक गर्भपात चलता रहा 2030 तक तो भारत में 6.8 मिलियन कम लड़कियों का जन्म दर्ज किया जाएगा।

मोदी सरकार ने स्थिति सुधारने के लिए चलाई कई योजनाएँ

2008 में इस दिन को राष्ट्रीय बालिका दिवस को मनाए जाने के ऐलान के बावजूद भी देश में लड़कियों की स्थिति नहीं सुधरी थी। समाज का कुंठित वर्ग अपनी कुंठा में उनके विकास को रोक रहा था, उनके जीने के अधिकार को छीन रहा था। तर्क दिए जाते थे कि उनके बड़े होने पर उन्हें पढ़ाना पड़ेगा और उनकी शादी करवानी पड़ेगी, जिसमें खर्चा आएगा।

2014 में जब मोदी सरकार आई तो उन्होंने इस मुद्दे को गंभीरता से लिया और शुरुआत से ही लड़कियों को लेकर नई नई योजनाओं की घोषणा की ताकि समाज की यह सोच बदली जा सके कि लड़कियाँ उनपर शिक्षा, शादी जैसे कारणों की वजह से भार बिलकुल नहीं हैं।

इनमें कुछ का जिक्र हम यहाँ कर रहे हैं

बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ: साल 2015 में प्रधानमंत्री मोदी ने हरियाणा के पानीपत में इस योजना का शुभारंभ किया था। इसका उद्देश्य ही था कि लिंग अनुपात को सुधारा जा सके और समाजिक कुरीतियों से बेटियों को बचाया जा सके। इस योजना में था कि माता-पिता द्वारा बेटी का खाता खुलवाना होगा। फिर 14 वर्ष की आयु पूरी होने तक इसमें निरंतर निर्धारित राशि जमा की शर्त है। ये राशि 168000 रूपए तक होगी। इसके बाद बेटी के 18 वर्ष पूरे होने पर वह जमा राशि का 50% निकाल सकेंगे और 21 वर्ष पूरे होने पर कुल राशि निकाली सकेगी। 21 साल की उम्र तक ये राशि 607128 रूपए हो जाएगी।

सुकन्या समृद्धि योजना: सुकन्या समृद्धि योजना की शुरुआत भी 2015 में हुई थी। इस स्कीम में था कि 10 वर्ष से कम उम्र की लड़की का खाता खोलकर इसमें 1000 की धनराशि 15 वर्ष तक जमा की जाती है। यह पैरसा बिना टैक्स कटे 7.6 प्रतिशत के दर पर बेटी के शादी के वक्त मिलेगा जिससे आराम से उसका विवाह किया जा सके।

बालिका समृद्धि योजना: यह योजना एक स्कॉलरशिप स्कीम है जो गरीबी रेखा से नीचे वाली युवा लड़कियों और उनकी माताओं को आर्थिक सहायता प्रदान करने के लिए बनाई गई है। इसका लाभ शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में मिलता है। इसमें बालिका के जन्म के बाद बालिका की माँ को 500 रुपए दिए जाते हैं। इसके अलावा स्कूल जाते समय, उस बालिका को 300 रुपए से 1000 रू तक की वार्षिक छात्रवृत्ति मिलने की बात है जिसे बालिका 18 वर्ष की आयु के बाद निकाल सकती है।

CBSE उड़ान स्कीम: लड़कियों के लिए CBSE उड़ान योजना केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा चलाई जाती है। इस योजना का उद्देश्य भारत में प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग और तकनीकी कॉलेजों में लड़कियों के एडमिशन को बढ़ाना है।

इसमें 11 वीं और 12 वीं कक्षा में छात्राओं के लिए मुफ्त पढ़ाई के सामान / ऑनलाइन जैसे वीडियो अध्ययन सामग्री आदि उपलब्ध कराई जाती है। वीकेंड पर ऑनलाइन क्लास की सुविधा उपलब्द होती है। करियर को लेकर सलाह दी जाती है। उनकी प्रगति की निरंतर निगरानी और ट्रैकिंग की जाती है।

राष्ट्रीय बालिका दिवस क्यों जरूरी

बता दें कि ‘राष्ट्रीय बालिका दिवस’ के मौके पर आज इस तरह बालिकाओं के लिए शुरू की गई स्कीमों को जानना और ये समझना कि लोगों की सोच लड़कियों के प्रति क्या रही है, ये बेहद जरूरी है। कोई भी समाज बेहतर तभी होता जब उसे पता हो कि इतिहास में शोषण क्या कहकर और कैसे किया गया…।

एक समय तक लड़कियों का अनुपात लड़कों के मुकाबले घटना देश के कई राज्यों के लिए काफी चिंता का विषय था। हालाँकि सरकार के प्रयासों का असर ये देखा गया कि धीरे-धीरे भारत का कुल लिंगानुपात बढ़कर 1020 कन्या हो गया।

सरकार आज बेटियों के लिए बाकी योजनाओं को मजबूत करने पर भी काम कर रही है। कोशिश है कि एक बालिका के जीवन में आने वाले संघर्षों को हर स्तर पर कम किया जा सके। उसे समाज के शोषण से बचाने के लिए कानून लाए जा रहे हैं। उसे उसके अधिकारों के प्रति जागरूक किया जा रहा है। उसे उसकी महत्वता से अवगत कराया जा रहा है। उसे बताया जा रहा है कि केवल उसकी सीमा घर तक नहीं है। वो इसरो की वो महिला साइंटिस्ट भी बन सकती हैं जिन्होंने चंद्रयान को चाँद तक पहुँचाया और देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू भी।

देहरादून-शाहजहाँपुर में फेंके भगवा ध्वज, पुणे FTII में ‘बाबरी को याद रखो’ वाले पोस्टर: राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा पर जगह-जगह दिखी घृणा, कर्नाटक में पुलिस ने ही रोकी शोभा यात्रा

अयोध्या में सोमवार (22 जनवरी, 2024) को राम मंदिर में हुई प्राण प्रतिष्ठा के बाद कई जगह पर असामाजिक तत्वों ने विवाद की स्थिति पैदा की। कहीं हिन्दुओं के उत्सव पर पत्थर बरसाए गए तो कहीं विवादित पोस्ट डाली गईं। इसके अलावा सोशल मीडिया पर भी राम मंदिर को लेकर घृणा देखने को मिली। कहीं कहीं से हिन्दू ध्वजों को फाड़ने की घटनाएँ सामने आई हैं। यह घटनाएँ कर्नाटक से लेकर उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र से लेकर छत्तीसगढ़ में हुई हैं।

कर्नाटक में माहौल गर्म, लगा दी धारा 144

कर्नाटक में कई जगह से गड़बड़ी की खबरें आई हैं। जानकारी के अनुसार, कर्नाटक के कलबुर्गी में राम उत्सव समिति द्वारा निकाली जा रहे भगवान श्रीराम की शोभा यात्रा को पुलिस ने रोका। इसके बाद यहाँ मुस्लिम युवक भी बड़ी संख्या में इकट्ठा हो गए और हंगामा करने लगे। यात्रा को रोके के बाद सोमवार (22 जनवरी, 2024) को यहाँ के तहसीलदार सैय्यद शाश्वाली ने धारा 144 लगा दी, जिससे लोग एकत्र ना हों।

इसके अलावा कर्नाटक के बेलगावी में भी प्राण प्रतिष्ठा का उत्सव मना रहे हिन्दुओं पर पथराव किया गया। यहाँ मुस्लिम इलाके में यात्रा निकाल रहे हिन्दुओं के ऊपर पत्थरबाजी हुई। यह घटना भी सोमवार (22 जनवरी, 2024) की ही है। बताया गया कि जहाँ पथराव हुआ वह मुस्लिम जनसंख्या वाले इलाके हैं और यहाँ उत्सव मना रहे हिन्दू ‘जय श्री राम’ के नारे लगा रहे थे जो उन्हें पसंद नहीं आया।

पुणे में सामने आए पोस्टर, लिखा – बाबरी को याद रखो

राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के कार्यक्रम के साथ ही पुणे के ‘भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान’ (FTII) में कुछ पोस्टर सामने आए। इन पोस्टर में ‘बाबरी को याद रखो’ लिखा हुआ था। इसके अलावा इन पोस्टर में अन्य कई भड़काऊ बातें भी लिखी हुई थी। पोस्टर की जानकारी मिलने पर पुलिस ने कार्रवाई चालू कर दी है। पुलिस ने पोस्टर भी हटवाए हैं।

छतीसगढ़ में विवादित ढाँचे को लेकर आपत्तिजनक पोस्ट, हिन्दू संगठन गुस्सा

छतीसगढ़ के राजनांदगाँव में मुस्लिम युवक युवतियों ने राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा को लेकर विवादित बातें की। उन्होंने सोशल मीडिया पर विवादित ढाँचे बाबरी की तस्वीर को सोशल मीडिया पर पोस्ट किया और उसको लेकर आपत्तिजनक बातें लिखीं। इन विवादित पोस्ट करने वालों के नाम चिंटू खान, चमन खान और सालिका खान (युवती) हैं। यह घटना भी 22 जनवरी की बताई जा रही है। इनमें से दोनों युवकों को गिरफ्तार कर लिया गया है। युवती अभी फरार है। हिन्दू संगठन इस पोस्ट के कारण आहत हैं और उन्होंने स्थानीय थाने खैरागढ़ पर प्रदर्शन भी किया है।

देहरादून और शाहजहाँपुर में धर्म ध्वजाओं का अपमान

उत्तराखंड के देहरादून और उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर से हिन्दू धर्म ध्वजाओं के अपमान की भी खबर सामने आई है। जानकारी के अनुसार, 22 जनवरी को देहरादून के कुंजाग्रांट में बड़ी स्क्रीन लगाकर प्राण प्रतिष्ठा देखने का कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इस दौरान यहाँ सजावट की गई थी जिसमें भगवा झंडे भी लगाए गए थे।

जब कार्यक्रम खत्म हो गया और लोग अपने घरों को चले गए तो तीन मुस्लिम युवकों फिरोज, शाबत और शोएब ने झंडों को यहाँ से उठा लिया और अमर्यादित कृत्य किया। इस मामले की जानकारी होने पर हिन्दू संगठनों ने पुलिस से कार्रवाई की मांग की और प्रदर्शन किया। पुलिस ने अब इन तीनों को गिरफ्तार कर लिया है।

वहीँ उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर में भी भगवा ध्वज का अपमान किया गया। जानकारी के अनुसार, शाहजहाँपुर के बतलैया गाँव में 22 जनवरी को प्राण प्रतिष्ठा के उपलक्ष्य में यात्रा निकाली गई थी। इसमें गाँव को सजाया गया था और जगह जगह पर भगवा झंडे लगाए गए थे। गाँव के कुछ मुस्लिम व्यक्तियों ने यह झंडे उतार कर फेंक दिए और इन पर गंदगी भी डाली। हिन्दू कार्यकर्ताओं ने इस मामले में ताज्जु, शाहनवाज, इकबाल, अजमल समेत 17 लोगों के विरुद्ध मुकदमा दर्ज करवाया।

मीरा रोड के जिस इलाके में हिंदुओं पर हुआ हमला, वहाँ लगा रखे हैं बैरिकेड, आधार कार्ड चेक कर देते हैं एंट्री: बीजेपी MLA का खुलासा

मुंबई से सटे ठाणे के मीरा रोड-भायंदर इलाके में अब भी तनाव है। 21 जनवरी 2024 को यहाँ राम मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा को लेकर निकाली गई हिंदुओं की रैली पर इस्लामी कट्टरपंथियों ने हमला किया था। भायंदर की बीजेपी विधायक गीता भरत जैन ने पुलिस कमिश्नर से मिलकर घटना की शिकायत की है।

जैन का कहना है कि पुलिसिया कार्रवाई के बाद भी मीरा रोड इलाके में हिंदुओं को लेकर नफरत देखी जा रही है। मीडिया से बातचीत में उन्होंने जो दावे किए उसके अनुसार इस्लामी कट्टरपंथियों ने इस इलाके में बैरिकेड लगा रखे हैं और आधार कार्ड चेक कर एंट्री देते हैं।

गीता भरत जैन ने कहा, “कमिश्नर साहब को हमने कहा कि उस दिन महिलाओं के साथ अभद्रता हुई। एक सामान्य फैमिली अगर अपने धर्म की ध्वजा लेकर जा रही है तो ये उसका अधिकार है। अगर कोई एक इलाका ये कहता है कि यहाँ ये पताका नहीं चलेगी। उस परिवार को गिरा दिया जाता है। उस पर थूका जाता है। उस पर उल्टी की जाती है। महिलाओं को खींचा जाता है और कहा जाता है कि अब तुम्हारा राम बचाने आएगा क्या। अब आप ‘अल्लाह हू अकबर बोलो’ तभी हम छोड़ेंगे। ये स्वतंत्रता छीनने की बात है। लोकशाही के खिलाफ जाने की बात है। यह हम सहन नहीं करेंगे।”

विधायक जैन ने कहा, “दूसरा एक बैरिकेड लगाया है। उस इलाके से हमें जाना है तो हमारा आधार कार्ड बताकर जाना है। ये कौन सी लोकशाही है? ऐसा कौन सा इलाका है? ऐसे कोई इलाके नहीं होते। ये हमारा इलाका, ये आपका इलाका। यहाँ से मत जाइए तो ये जो चल रहा है, उससे हमने कमिश्नर साहब को अवगत कराया है और उन्होंने बैरीकेड हटाने के लिए कहा है।”

जैन के अनुसार उनकी ही पार्टी के एक अन्य विधायक नीतेश राणे भी इससे अवगत हैं। उन्होंने 24 घंटे में बैरिकेड नहीं हटाने पर खुद से कार्रवाई की बात कही है।

उन्होंने कहा, “नीतेश राणे ने कहा है कि अगर 24 घंटे में बैरिकेड नहीं हटा तो सब फिर आएँगे। बैरिकेड अपने आप हटाएँगे और वहाँ से ही निकलेंगे। तब देखते हैं कि किसका इलाका है। आज पहला बुलडोजर चला है। आगे देखते हैं कि ये कार्रवाई कंटीन्यू होती है कि नहीं। हम चाहते हैं कि जितना अवैध कब्जा है, वे तोड़े जाएँ और जल्द से जल्द ये कार्रवाई पूरी हो।”

विधायक गीता जैन ने शांतिनगर का उदाहरण देते हुए कहा कि प्रशासन ने उनसे हटने को कहा है। लेकिन उनकी दादागिरी देखिए कि वो वहीं बैठे हैं। प्रशासन के अधिकारियों को मारना, पुलिस वालों पर हाथ उठान ये सब नहीं सहा जाएगा। लोकशाही है। हम सहिष्णु हैं। कायर नहीं हैं।

बताते चलें कि मीरा रोड में इस्लामी दंगाइयों ने हिन्दू भावनाओं को ठेस पहुँचाने के लिए बजरंग बली की छवि वाले पोस्टर भी फाड़े। इन झंडों पर इस्लामी कट्टरपंथियों ने उल्टी तक की। इस केस में पुलिस ने अब तक 13 लोगों को गिरफ्तार किया।

पुलिस ने ये कार्रवाई हिंसा पीड़ित विनोद जायसवाल की शिकायत पर दर्ज FIR के तहत की है। FIR में कहा गया है कि 21 जनवरी की रात को 10:30 बजे जायसवाल की कार को मीरा रोड पर 50-60 लोगों ने घेरकर हमला किया। उनकी गाड़ी पर लाठी-डंडों से हमला किया और उस पर लगा रामलला झंडा भी उखाड़ दिया। बताते चलें कि जिन इस्लामी कट्टरपंथियों ने हिन्दुओं पर हमला बोला था उनके अवैध निर्माणों पर बुलडोजर कार्रवाई भी की गई है।

घसीट कर सड़क पर ले गए, एक के सीने और एक के सिर में मारी गोली: राम मंदिर के लिए बलिदान हो गए कोठारी बंधु, सेवा कार्यों से अब भी उनके मिशन को आगे बढ़ा रही बहन

अयोध्या में सोमवार (22 जनवरी, 2024) को रामलला अपने भव्य मंदिर में विराजमान हो गए हैं। 500 वर्षों के संघर्ष के बाद हुई प्राण प्रतिष्ठा से भाव विभोर लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए अयोध्या की तरफ कूच कर गए हैं। इस अवसर पर देश और दुनिया का हिन्दू समाज उन कारसेवकों को श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा है जिन्होंने मुगल से मुलायम काल तक चली जद्दोजहद में खुद को राम के नाम पर न्योछावर कर दिया। उन तमाम ज्ञात और अज्ञात बलिदानियों में कोठारी बंधुओं का नाम सबसे प्रमुखता से लिया जाता है।

ऑपइंडिया ने बलिदानी रामकुमार और शरद कोठारी की बहन पूर्णिमा से मिल कर वर्तमान हालातों की जानकारी जुटाई। पूर्णिमा कोठारी राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा में आमंत्रित थीं। वो इस ऐतिहासिक समय की साक्षी बन कर बेहद खुश हैं। फिलहाल वो और उनके सहयोगी अयोध्या में टेढ़ी बाजार के पास एक कैम्प लगा कर दूर-दराज से आ रहे श्रद्धालुओं की सेवा में व्यस्त हैं। यहाँ वो न सिर्फ श्रद्धालुओं बल्कि आसपास तैनात पुलिस के जवानों को अपने खर्च पर चाय-नाश्ता करवा रहीं हैं। यह कैम्प ‘राम शरद कोठारी स्मृति मंच’ के बैनर तले हो रहा है।

श्रद्धालुओं और पुलिसकर्मियों को जलपान कराते ‘राम शरद स्मृति मंच’ के सदस्य

मूलतः राजस्थान के, व्यापार के चलते बसे कोलकाता में

कोठारी परिवार मूल रूप से राजस्थान के बीकानेर का रहने वाला है। पूर्णिमा के पिता अपनी युवावस्था में ही व्यापार के सिलसिले में पश्चिम बंगाल चले गए थे। यहाँ पर उन्होंने छोटा सा आयरन प्लांट खोला था। परिवार की आजीविका का साधन वही था। कालांतर में वो 3 बच्चों के पिता बने। इसमें रामकुमार और शरद नाम के 2 बेटे और एक बेटी पूर्णिमा शामिल हैं। शरद और राम कुमार अपनी ग्रेजुएशन की पढ़ाई करने के साथ पिता के कारोबार में हाथ बँटा रहे थे। पूर्णिमा भी पढ़ाई करने के साथ घर के कार्यों में अपनी माता का हाथ बँटाती थीं।

किशोरावस्था में ही जुड़ गए थे ‘बजरंग दल’ से

पूर्णिमा कोठारी ने ऑपइंडिया को बताया कि हिन्दू संगठन से जुड़ने वाली उनकी पहली पीढ़ी उनके बलिदानी भाई ही थे। रामकुमार और शरद की आरंभिक शिक्षा-दीक्षा मध्य प्रदेश के बैतूल जिले में हुई थी। यहाँ दोनों भाई विद्या भारती द्वारा संचालित भारत भारती स्कूल के छात्र थे। ‘भारत भारती विद्यालय’ की शिक्षा-दीक्षा से प्रभावित होकर दोनों भाई कोलकाता में भी ‘राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ’ (RSS) की शाखाओं में जाने लगे थे। रामकुमार और शरद अपने साथ चचेरे भाई को भी शाखाओं में ले जाते थे और पढ़ाई व कारोबार के बाद मिले समय में धर्म प्रचार किया करते थे।

अयोध्या की ट्रेन में खुद बिठा कर आए थे माता-पिता

पूर्णिमा बताती हैं कि जब 1990 में अयोध्या में कारसेवा का ऐलान हुआ तो रामकुमार और शरद वहाँ जाने की तैयारी करने लगे। परिजनों को उन दोनों ने खुद ही तैयार किया था। बचपन से ही साथ रहने की वजह से दोनों भाई हर कहीं एक साथ ही जाते थे। आखिरकार 22 अक्टूबर, 1990 को रामकुमार और शरद कोठारी अयोध्या के लिए ट्रेन पकड़ कर निकल गए। बकौल पूर्णिमा, उनके माता-पिता अपने दोनों बेटों को छोड़ने रेलवे स्टेशन तक गए थे।

पानी माँगने के बहाने पुलिस ने मारी गोली

पूर्णिमा कोठारी ने बताया कि उन्हें घटना की जानकारी 2 नवंबर, 1990 को अयोध्या में मौके पर मौजूद एक पत्रकार से मिली थी। तब कोठारी बंधु अन्य कारसेवकों के साथ लाल कोठी के पास एक मकान में छिपे हुए थे। इस दौरान किसी मुस्लिम अधिकारी का नाम लिया जा रहा था जो रामभक्तों पर बड़ी क्रूरता से पेश आ रहा था। जिस घर में रामकुमार और शरद छिपे थे, उसमें थोड़ी देर बाद दरवाजे पर दस्तक हुई। किसी ने बाहर से पानी माँगा तो 19 वर्षीय शरद को लगा कि शायद कोई कारसेवक बाहर फँस गया है।

पूर्णिमा ने हमें आगे बताया कि शरद ने पानी माँग रहे व्यक्ति के कारसेवक होने के भ्रम में दरवाजा खोला दिया। बाहर से पुलिस वालों द्वारा शरद को गिरेबान पकड़ कर खींच लिया गया और घसीट कर सड़क पर ले जाया गया। यहाँ शरद के सीने में गोली मार दी गई और वो तड़पने लगे। छोटे भाई को तड़पता देख कर लगभग 23 वर्षीय रामकुमार भी बाहर निकल गए। वो और गोलियाँ लगने से बचाने के लिए अपने भाई के ऊपर लेट गए। तभी आसपास खड़े जवानों ने रामकुमार कोठारी के भी सिर में सटा कर बंदूक से फायर कर दिया। छोटे और बड़े भाई ने एक साथ ही एक ही जगह प्राण त्याग दिए।

अयोध्या में ही हुआ अंतिम संस्कार

भावुक हो कर पूर्णिमा कोठारी ने हमें बताया कि 1 नवंबर, 1990 को उनके भाइयों ने घर के पास लगे एक लैंडलाइन पर अयोध्या से कॉल किया गया था। तब उन्होंने खुद को सुरक्षित बताते हुए जल्द लौट आने का वादा किया था। 2 नवंबर, 1990 को दोनों भाइयों के बलिदान होने के कुछ ही देर बाद उनके साथी संगठन वालों ने फोन पर पूर्णिमा को सूचित कर दिया था। हालाँकि, पूर्णिमा ने अपनी माँ को अगले दिन बहुत संकोच के बाद 3 नवंबर को अपने भाइयों की वीरगति के बारे में बताया था। कोलकाता से अयोध्या आ कर परिजनों ने दोनों रामभक्त भाइयों का अंतिम संस्कार अयोध्या में करवाया।

माता-पिता भी चल बसे, कारोबार भी बंद

अपने 2 बेटों के एक साथ बलिदान होने के बाद उनके माता-पिता मानसिक तौर पर काफी व्यथित रहते थे। आखिरकार 16 जनवरी, 2002 को पूर्णिमा के पिता का देहांत हो गया। ऐसे में घर में सिर्फ पूर्णिमा और उनकी माँ बचीं। पूर्णिमा का विवाह हुआ और अब वो 1 बेटी की माँ हैं। राम मंदिर की बाट जोहते साल 2016 में पूर्णिमा की माता का भी देहांत हो गया। हालाँकि, अंतिम समय में उन्होंने इस आशा से प्राण त्यागे थे कि नरेंद्र मोदी आज नहीं तो कल राम मंदिर ज़रूर बनवाएँगे।

कोठारी परिवार की आजीविका का साथ रही आयरन फैक्ट्री भी कोरोना काल में बंद हो गई है। फिलहाल पूर्णिमा की बेटी की जॉब से परिवार का गुजारा चल रहा है।

भाई का दुःख निजी, पर मंदिर की ख़ुशी सामूहिक

अपने बलिदान हुए दोनों भाइयों को याद कर के पूर्णिमा कोठारी थोड़े समय के लिए भावुक हो गईं। खुद को संभाल कर बोलीं, “मेरे दोनों भाई अब नहीं रहे। ये मेरा निजी दुःख है जो जीवन भर रहेगा पर भगवान राम का मंदिर मैं बनते देख कर बेहद खुश हूँ। ये सामूहिक ख़ुशी पूरे देश और दुनिया के हिन्दू समाज की है। मेरे भाइयों के इसी के लिए तो बलिदान दिया था जो अब सार्थक हो गया।” पूर्णिमा को इस बात का भी बेहद संतोष है कि जब तक इतिहास में भगवान राम और अयोध्या जन्मभूमि आंदोलन का जिक्र होगा तब तक रामकुमार और शरद कोठारी को लोग याद करेंगे।

बकौल पूर्णिमा, मुलायम सिंह का चैलेन्ज कि ‘अयोध्या में परिंदा भी पर नहीं मार सकता’ ही रामभक्तों को सबसे ज्यादा अखरा था और आखिरकार रामभक्तों ने मुलायम के अहंकार को तोड़ दिया था।

मुलायम सिंह के बयान का दिया जवाब

तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव द्वारा ‘ज़रूरी होता तो और कारसेवकों को मारते’ वाले बयान को याद दिलाते ही पूर्णिमा कोठारी को गुस्सा आ गया। उन्होंने कहा, “उनके अपने खुद के घर में आज तक कोई देश या धर्म के लिए जान देने वाला नहीं जन्मा। अगर अपनों को खोने का दुःख खुद उन्होंने कभी सहा होता तो शायद वो हमारी पीड़ा को महसूस कर पाते।” मुलायम सिंह के बुढ़ापे में हुई हालत, पारिवारिक कलह और उनकी पार्टी की वर्तमान हालत को पूर्णिमा रामभक्तों के परिजनों का शाप मानती हैं।

ऑपइंडिया से बात करतीं पूर्णिमा कोठारी

भाइयो की याद में रक्तदान सहित कई अन्य कार्य करती हैं बहन

कोठारी बंधुओ की याद में उनकी बहन रक्तदान सहित कई अन्य सामाजिक कार्य करती हैं। ‘राम शरद कोठारी स्मृति मंच’ के अंतर्गत यह परिवार जरूरतमंदों को रक्तदान, गरीबों को यथासंभव मदद, उनके बच्चों की पढ़ाई और देश या धर्म के लिए अच्छा कार्य करने वाली विभूतियों को समय-समय पर सम्मानित करता है। इन सभी कामों में आने वाले खर्चों को खुद पूर्णिमा कोठारी अपने शुभचिंतकों और सहयोगियों सहित उठाती हैं।

बाप तो बाप बेटी सुभानअल्लाह: राम मंदिर के विरोध में 3 दिन तक अनशन पर बैठी मणिशंकर अय्यर की बेटी, कहा- ये मैंने मुस्लिमों के लिए किया

कॉन्ग्रेस के वयोवृद्ध नेता मणिशंकर अय्यर अक्सर अपनी अनर्गल बयानबाजी के कारण जाने जाते रहे हैं। अब उनकी बेटी सुरन्या भी चर्चा में हैं। असल में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के खिलाफ सुरन्या अय्यर ने उपवास किया था। उन्होंने फेसबुक पर एक लंबा-चौड़ा पोस्ट लिख कर इस बारे में बताया भी है। प्राण प्रतिष्ठा के अगले दिन उनकी माँ ने एक चम्मच शहद पिला कर उनका अनशन तुड़वाया। उन्होंने दावा किया कि हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई एक दिन अपना खोया हुआ लहलहाता वसंत फिर से प्राप्त करेंगे।

अनशन शुरू करते हुए उन्होंने लिखा था कि पहले से ही प्रदूषित दिल्ली की हवा में उग्र हिंदूवाद, दुर्भावना और जोर-जबरदस्ती भर गई है, और इसमें ‘आध्यात्मिक ज़हर’ घुल गया है। उन्होंने लिखा था कि वो ये अनशन भारत के मुस्लिम नागरिकों के लिए कर रही हैं। उन्होंने कहा था कि अयोध्या में हिन्दू राष्ट्रवाद के नाम पर जो भी हो रहा है उसकी वो निंदा करती हैं। उन्होंने इस दौरान ‘मुग़ल विरासतों’ से प्यार की बात करते हुए कहा था कि मुगलिया संरचनाओं के बिना वो दिल्ली की कल्पना भी नहीं कर सकतीं।

फेसबुक पर सुरन्या ने लिखा था, “दिल्ली सल्तनत ने भी भारत को बेशकीमती चीजें दी हैं, क्योंकि सूफी और अमीर खुसरो के अब्बा उनके साथ ही आए थे। उत्तर भारत की भाषा और संस्कृति खुसरो की एहसानमंद है। मुग़ल यहाँ मुस्लिमों को ही हरा कर आए थे। बाबर ने पंजाब में दौलत खान और दिल्ली में इब्राहिम लोदी को हराया। मुगलों ने राजपूतों के साथ वैवाहिक संबंध बनाए। मुगलों की नीति मंदिर तोड़ने की नहीं थी, उन्होंने तो मंदिर बनवाए। झूठ, हिंसा, द्वेष और प्रतिशोध पर बने मंदिर पर कोई कैसे ख़ुशी बना सकता है?”

सुरन्या अय्यर की बहन यामिनी ने भी ‘X’ पर भारतीय संविधान की प्रति शेयर की, कुछ ऐसा ही अभिनेत्री सुष्मिता सेन ने किया था। सुरन्या खुद को बैरिस्टर बताती हैं और कहती हैं कि वो विदेशी एजेंसियों द्वारा प्रताड़ित किए जा रहे बच्चों को बचाती हैं, उनके अधिकार के लिए लड़ती हैं। सुरन्या अय्यर ने ‘यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफ़ोर्ड’ से कानून की पढ़ाई की है, वहीं उन्होंने सेंट स्टीफेंस कॉलेज से गणित में BA की डिग्री ली। सुरन्या ने अब भरोसा जताया है कि एक दिन ‘दयालु सूर्य’ समान रूप से अपनी चमक बिखेरेगा और ये जगह फिर से हमारी अपनी होगी।

‘जब वक्त हमारा आएगा, सर धड़ से अलग हो जाएगा’: हमजा, फैजान और जुनैद ने ‘राम मंदिर तोड़ने’ की दी धमकी, पुलिस ने शुरू की जाँच

गुजरात के वडोदरा में तीन मुस्लिम युवकों ने राम मंदिर को लेकर धमकी भरी पोस्ट की है। उन्होंने इसे गिराने की धमकी दी है। इसके अलावा ‘सर तन से जुदा’ वाली धमकियाँ भी पोस्ट की हैं। पुलिस ने इस मामले की जाँच चालू कर दी है। इससे पहले गुजरात के ही मेहसाणा और वडोदरा में राम मंदिर के लिए निकाली गई हिन्दू शोभा यात्रा पर मुस्लिमों ने पथराव किया था।

जानकारी के अनुसार वडोदरा के साधली गाँव के मुस्लिम युवक हमजा खत्री, फैजान नानियो और जुनेद कुरैशी ने 22 जनवरी 2024 को राम मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा के साथ ही इन्स्टाग्राम पर धमकी भरे पोस्ट किए। उन्होंने इन्स्टाग्राम पर एक पोस्ट में लिखा, “जब वक्त हमारा आएगा, तब सर धड़ से अलग किया जाएगा।”

इसके साथ ही इन मुस्लिम युवकों ने विवादित बाबरी ढाँचे की फोटो लगा रखी थी। पोस्ट सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद पुलिस ने संज्ञान लेकर मामले की जाँच शुरू कर दी है। ऑपइंडिया ने पुलिस से बात करने का प्रयास किया, लेकिन सम्पर्क नहीं हो पाया। पुलिस से बात होते ही खबर अपडेट की जाएगी।

वडोदरा में इससे पहले हिन्दुओं की शोभा यात्रा पर हमला भी हुआ था। यहाँ के भोज गाँव में राम मंदिर में होने वाली प्राण-प्रतिष्ठा को लेकर शोभा यात्रा निकाली जा रही थी। इस पर पथराव किया गया था। इसमें कई लोग घायल हुए थे। घायलों में महिलाएँ भी हैं। इस मामले में 26 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है।

इससे पहले गुजरात के मेहसाणा से भी हिंसा की खबर आई थी। मेहसाणा के खेड़ालू में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा से पहले भगवान राम की निकाली गई शोभा यात्रा पर छतों से पत्थरबाजी हुई थी। हिंदुओं पर ये हमले इतनी तेजी से हो रहे थे कि पुलिस को स्थिति काबू करने के लिए आँसू गैस के छोड़ने पड़े थे।

गुजरात के अलावा मुंबई के नयानगर इलाके में भी 21 जनवरी 2024 को शोभा यात्रा निकाल रहे हिन्दुओं पर इस्लामी भीड़ ने हमला कर दिया था। यहाँ शोभा यात्रा निकाल रहे हिन्दुओं की गाड़ियों को रोक कर उन पर हमला किया गया और बजरंग बली के पोस्टर फाड़े गए। इस मामले में पुलिस ने बुलडोजर कार्रवाई की है।

बंगाल में बज गया INDI गठबंधन का बाजा: ममता बनर्जी ने अकेले लोकसभा चुनाव लड़ने का किया ऐलान, कहा- काॅन्ग्रेस का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ऐलान किया है कि तृणमूल कॉन्ग्रेस पार्टी आगामी लोकसभा चुनाव में अकेले लड़ेगी। इस ऐलान से विपक्ष के इंडी गठबंधन को करारा झटका लगा है। बताया जा रहा है कि टीएमसी ने कॉन्ग्रेस को दो सीटें देने की बात कही थीं जबकि कॉन्ग्रेस ने उनसे 10-12 सीट माँगी थी। सहमति न बनने पर ममता बनर्जी ने रास्ते अलग करने की बात कही।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ममता बनर्जी ने बताया कि उन्होंने गठबंधन की बैठक में कॉन्ग्रेस को जो भी प्रस्ताव दिया, उन सब पर कॉन्ग्रेस नहीं मानी। इसके बाद ही उन्होंने निर्णय लिया कि वो बंगाल में अकेले ही चुनाव लड़ेंगे।

उन्होंने कहा, “हमने सीट शेयरिंग को लेकर बात नहीं की। लेकिन हमारी पार्टी ने उन्हें (कॉन्ग्रेस) को प्रपोजल दिया था जो नकार दिया गया। इसलिए हमने अकेले जाने का निर्णय लिया है। कॉन्ग्रेस को 300 सीट पर लड़ने दो। क्षेत्रीय पार्टी एक होकर लड़ेंगी। हम कॉन्ग्रेस का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं करेंगे।”

उन्होंने राहुल गाँधी की न्याय यात्रा पर भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा, “शिष्टाचार के नाते उन्होंने मुझे ये जानकारी भी नहीं दी कि वह बंगाल में यात्रा करने जा रहे हैं। मैं इंडी गठबंधन का पार्ट हूँ। उन्हें मुझे कहना चाहिए था- दीदी मैं आपके राज्य में आ रहा हूँ।”

उन्होंने इंडी गठबंधन में वामपंथी दलों के होने पर भी नाराजगी जताई। उन्होंने कहा विपक्षी समूह की बैठक के दौरान उन्होंने INDIA नाम का सुझाव दिया था। हालाँकि जब वह बैठक में शामिल हुईं तो देखा लेफ्ट इसे कंट्रोल करने की कोशिश कर रही है। उन्होंने इस स्थिति को अस्वीकार्य बताया और कहा जिन लोगों से उन्होंने 34 सालों से लड़ाई लड़ी है उससे वो अब सहमत नहीं हो सकते।

गौरतलब है कि ममता के इस बयान से पहले कॉन्ग्रेस और टीएमसी में खटास की खबरें आ गई थीं। कॉन्ग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने मीडिया में ममता को अवसरवादी कह दिया था। उन्होंने कहा था, “हम ममता बनर्जी की दया पर चुनाव नहीं लड़ेंगे। कॉन्ग्रेस अपने दम पर चुनाव लड़ना जानती है और हमने जो दो सीटें (पश्चिम बंगाल में 2019 के लोकसभा चुनाव में) जीती हैं, वे ममता और भाजपा को हराकर जीती हैं। ममता अवसरवादी हैं; वह स्वयं कॉन्ग्रेस की कृपा से 2011 में सत्ता में आईं।”

जो थे ‘जननायक’ उसे लालू कहते थे ‘कपटी ठाकुर’, भारत रत्न मिलते ही बना लिया ‘गुरु’: जो आज बनते हैं सामाजिक न्याय के ‘मसीहा’ उन्हें मिला था ‘लंपट’ का तमगा

मोदी सरकार ने बिहार के दिवंगत पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर को ‘भारत रत्न’ सम्मान दिए जाने की घोषणा की है। कर्पूरी ठाकुर को सामाजिक न्याय के लिए ‘जननायक’ कहा गया। वो बिहार में पहली गैर-कॉन्ग्रेसी सरकार के मुखिया थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी बताया है कि उन्हें कभी कर्पूरी ठाकुर के साथ कार्य करने का मौका तो नहीं मिला, लेकिन उन्होंने भाजपा के दिवंगत नेता कैलाशपति मिश्र से उनके बारे में काफी सुना था। कैलाशपति मिश्र बिहार के वित्त मंत्री रहे थे और बाद में गुजरात एवं राजस्थान के राज्यपाल भी बने।

कर्पूरी ठाकुर की सरल जीवनशैली और विनम्र स्वभाव की चर्चा करते हुए पीएम नरेंद्र मोदी ने याद किया कि कैसे वे इस बात पर जोर देते थे कि उनके किसी भी व्यक्तिगत कार्य में सरकार का एक पैसा भी इस्तेमाल ना हो। नेताओं के लिए कॉलोनी बनाने का निर्णय हुआ तो उन्होंने जमीं तक नहीं ली। उनके निधन के बाद श्रद्धांजलि देने उनके गाँव पहुँचे नेताओं ने जब उनका घर देखा तो उनकी आँखों में आँसू आ गए। पीएम मोदी ने बताया कि कर्पूरी ठाकुर वे स्थानीय भाषाओं में शिक्षा देने के बहुत बड़े पैरोकार थे, ताकि गाँवों और छोटे शहरों के लोग भी अच्छी शिक्षा प्राप्त करें।

इसी बीच कर्पूरी ठाकुर को मरणोपरांत ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किए जाने के बाद इसका श्रेय लूटने के लिए बिहार के अवसरवादी नेता पिल पड़े। इसमें सबसे आगे रहे बिहार की गठबंधन सरकार में शामिल राजद के मुखिया लालू प्रसाद यादव। वही लालू यादव, जिन्होंने जीते-जी कर्पूरी ठाकुर का जम कर विरोध किया, लेकिन अब खुद को उनके लिए लड़ाई लड़ने वाला बता रहे हैं। बिहार को ‘जंगलराज’ में धकेलने वाले लालू यादव के चेहरे पर चढ़ा ये नकाब भी हम उतारेंगे, लेकिन उससे पहले जानते हैं कि कर्पूरी ठाकुर कौन थे।

कौन थे बिहार के कर्पूरी ठाकुर, जिन्हें मिला ‘भारत रत्न’

कर्पूरी ठाकुर की जन्मतिथि को लेकर काफी संशय है, लेकिन माना जाता है कि 24 जनवरी, 1924 को उनका जन्म हुआ था। समस्तीपुर जिले के पितौंझिया में गोकुल ठाकुर और रामदुलारी देवी के बेटे के रूप में उनका जन्म हुआ था। उस गाँव को अब ‘कर्पूरी ग्राम’ के नाम से जाना जाता है। कर्पूरी ठाकुर एक नाई परिवार से ताल्लुक रखते थे, जो पिछड़े समाज में आता है। दरभंगा स्थित CM कॉलेज में उनकी उच्च शिक्षा हुई, जो अधूरी रही। इसका कारण था – 1942 में वो महात्मा गाँधी के ‘करो या मारो’ आंदोलन में कूद पड़े थे और भारत के स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया।

कर्पूरी ठाकुर के परिवार की बात करें तो उनके दादाजी का नाम था प्यारे ठाकुर। कर्पूरी ठाकुर 6 भाई और 2 बहन थे। उनके एक भाई का नाम था – रामस्वारथ ठाकुर। उनकी बहनें थीं – गाल्हो, सिया, राजो, सीता, पार्वती और शैल। जमीन-जायदाद के नाम पर एक फूस का घर और 3 एकड़ खेत थे। 1938 में उन्होंने अपने गाँव में ही ‘नवयुवक संघ’ की स्थापना की थी। 1940 में उन्होंने मैट्रिक पास की। वो आज़ादी से पहले जेपी-लोहिया की ‘कॉन्ग्रेस सोशलिस्ट पार्टी’ के सदस्य थे।=

महात्मा गाँधी और सुभाष चंद्र बोस के व्यक्तित्व का उन पर प्रभाव था। कर्पूरी ठाकुर ने समाजवाद के प्रखर नेता राम मनोहर लोहिया के शिष्य के रूप में अपना राजनीतिक जीवन शुरू किया था। 1952 से लेकर अपनी मृत्यु तक कर्पूरी ठाकुर लगातार विधानसभा या लोकसभा के लिए चुने जाते थे। बिहार के शिक्षा मंत्री के रूप में कर्पूरी ठाकुर ने मैट्रिक की परीक्षा तक अंग्रेजी की अनिवार्यता ख़त्म कर दी। इससे कई गरीब छात्रों को पास होने का मौका मिला, जो अंग्रेजी न आने के कारण पीछे रह जाते थे।

कर्पूरी ठाकुर पंचायती राज व्यवस्था के हिमायती थे। जब वो 1971 में और फिर 1978 में मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने बिहार में पंचायत चुनाव कराया। इसके बाद 2 दशक तक राज्य में पंचायत चुनाव ही नहीं हुए। उन्होंने आरक्षण के भीतर आरक्षण को लागू किया, जिसके तहत पिछड़ों को 8% और अत्यंत पिछड़ों को 12% आरक्षण दिया गया। गरीब सवर्णों और महिलाओं के लिए भी उन्होंने 3-3 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया।

कर्पूरी ठाकुर ने 1952 में ताजपुर से पहली बार विधानसभा चुनाव जीता। 1957 में उन्होंने यहीं से प्रजा-सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर कॉन्ग्रेस प्रत्याशी को हराया। 50 के दशक में उन्होंने पश्चिमी एशिया और यूरोप के कई देशों का दौरा किया। 1962 में भी वो यहीं से जीते। 1967 में उन्होंने ‘संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी’ के टिकट पर चुनाव जीता। 1967 में जब महामाया प्रसाद के नेतृत्व में सरकार बनी, तब कर्पूरी ठाकुर उप-मुख्यमंत्री बने। उन्हें शिक्षा और वित्त जैसे बड़े विभाग मिले।

1969 में बिहार में मध्यावधि चुनाव हुए और कर्पूरी ठाकुर फिर ताजपुर से ही जीते। 22 दिसंबर, 1970 को बिहार का मुख्यमंत्री बनने से पहले उन्होंने जमशेदपुर के मजदूरों के लिए 28 दिनों का आमरण अनशन किया था। टाटा फैक्ट्री के माँगें मंजूर की, जिसके बाद मजदूरों ने कर्पूरी ठाकुर को अपना नेता माना। गोमिया की एक्सप्लोसिव फैक्ट्री के मजदूरों के लिए भी उन्होंने अनशन किया। 1972 में भी उन्होंने ताजपुर से जीत दर्ज की। हालाँकि, तब तक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में छात्र आंदोलन उग्र हो चुका था और विरोधी नेताओं के इस्तीफे के क्रम में मई 1974 में उन्होंने भी विधायकी छोड़ दी

फिर आपातकाल लगा। इंदिरा गाँधी के तानाशाही वाले काल में उन्होंने नेपाल से ही आपातकाल विरोधी गतिविधियाँ चालू कीं। 1977 के लोकसभा चुनाव में कर्पूरी ठाकुर ने ‘जनता पार्टी’ के टिकट पर समस्तीपुर से बड़ी जीत दर्ज की। जून 1977 में वो फिर से बिहार के मुख्यमंत्री बने। उन्होंने मधुबनी के फुलपरास से कॉन्ग्रेस के रामजयपाल सिंह यादव को मात दी और विधायक बने, क्योंकि मुख्यमंत्री का 6 महीने के भीतर CM अनिवार्य है। 1980 में जब ताजपुर क्षेत्र को बाँट दिया गया तो वो समस्तीपुर से खड़े हुए और जीत दर्ज की।

बिहार में कॉन्ग्रेस की सरकार बनी और कर्पूरी ठाकुर नेता प्रतिपक्ष बने। चौधरी चरण सिंह से मतभेद के बाद उन्होंने ‘लोक दल (क)’ का गठन किया। 1985 के संसदीय चुनाव में कर्पूरी ठाकुर इंदिरा गाँधी के निधन की सहानुभूति लहर में हार गए, लेकिन जो जीवन में उनकी पहली हार थी, लेकिन 2 महीने बाद ही विधानसभा चुनाव में सीतामढ़ी के सोनबरसा से उन्होंने बड़ी जीत दर्ज की। ‘लोक दल’ और ‘जनता पार्टी’ का विलय न हो सका, लेकिन फिर भी उस चुनाव में कर्पूरी ठाकुर ने 47 सदस्यों को जिता कर अपने ‘लोक दल’ को सबसे बड़ी विरोधी पार्टी बनाया।

लालू यादव ने कर्पूरी ठाकुर को कहा था ‘कपटी’

अब आते हैं लालू यादव पर। आपातकाल के दौरान जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में हुए छात्र आंदोलन ने लालू यादव को भी बड़ा नेता बना दिया था। गोपालगंज के फुलवरिया में जन्मे लालू यादव बचपन से ही ड्रामा करने में दक्ष थे और गाँव में होने वाले छोटे-मोटे कार्यक्रमों में अभिनय करते थे। भले ही अब वो 75 वर्ष के हो गए हैं, लेकिन बचपन में भैंस पर बैठ कर करने वाली नाटकबाजी वाला खेल अब भी वो खेल लेते हैं, लेकिन दूसरे रूप में। अब वो कर्पूरी ठाकुर को ‘भारत रत्न’ दिए जाने का श्रेय ले रहे हैं।

लालू यादव ने एक ट्वीट कर के लिखा, “मेरे राजनीतिक और वैचारिक गुरु कर्पूरी ठाकुर जी को भारत रत्न अब से बहुत पहले मिलना चाहिए था। हमने सदन से लेकर सड़क तक ये आवाज़ उठाई, लेकिन केंद्र सरकार तब जागी जब सामाजिक सरोकार की मौजूदा बिहार सरकार ने जातिगत जनगणना करवाई और आरक्षण का दायरा बहुजन हितार्थ बढ़ाया। डर ही सही राजनीति को दलित बहुजन सरोकार पर आना ही होगा।” लालू यादव ने मोदी सरकार को न सिर्फ ‘डरा हुआ’ बता दिया, बल्कि कर्पूरी ठाकुर को अपना गुरु घोषित कर दिया।

क्या कोई व्यक्ति अपने गुरु को ‘कपटी’ कह सकता है? लालू यादव आज जिन्हें अपना गुरु बता रहे हैं और मोदी सरकार पर आरोप लगा रहे हैं कि उसने ‘डर कर’ जिन्हें सम्मान दिया, उन्हीं कर्पूरी ठाकुर को लालू यादव ने ‘कपटी’ कहा था। संकर्षण ठाकुर ने अपनी पुस्तक ‘द ब्रदर्स बिहारी‘ और अरुण सिन्हा की किताब ‘नीतीश कुमार और उभरता बिहार‘ में इसका स्पष्ट जिक्र है। फरवरी 1988 में कर्पूरी ठाकुर के निधन को लालू यादव ने अपने लिए मौके के रूप में लिया था और बिहार में लगभग मृतप्राय विपक्ष के सबसे बड़े नेता के रूप में खुद को उभारा।

लालू यादव भले ही छात्र नेता थे और आपातकाल में जेल भी गए थे, लेकिन मुख्यधारा की राजनीति में उन्हें लेन का श्रेय कर्पूरी ठाकुर को ही जाता है। 1977 में कर्पूरी ठाकुर ही थे, जिन्होंने मात्र 29 साल के लालू यादव को ‘भारतीय लोक दल’ के टिकट पर छपरा से लोकसभा का टिकट दिलाया था। लालू यादव को इस चुनाव में 85% वोट मिले और जीत का अंतर 77% रहा। इसके बाद उन्हें पार्टी से विधानसभा चुनाव का टिकट भी कर्पूरी ठाकुर ने ही दिलवाया।

1980 में कॉन्ग्रेस की बड़ी जीत के बावजूद बिहार में समाजवादी राजनीति को जीवित रखने वाले कर्पूरी ठाकुर ने ऐसे कई युवाओं को उस दौर में आगे बढ़ाया। लालू यादव ने भले ही खुद को कर्पूरी ठाकुर के निधन के बाद उनका उत्तराधिकारी भले ही घोषित कर दिया, लेकिन कर्पूरी ठाकुर खुद ऐसा कभी नहीं चाहते थे। पत्रकार संकर्षण ठाकुर अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि कर्पूरी ठाकुर अक्सर लालू को ‘लम्पट’ (आवारा) कहते थे। इसी किताब में जिक्र है कि कैसे लालू यादव अक्सर कर्पूरी ठाकुर को ‘कपटी’ कहा करते थे (सार्वजनिक तौर पर नहीं)।

लोहियावादी लक्ष्मी साहू, जो कर्पूरी ठाकुर क लाइफ-टाइम प्राइवेट सेक्रेटरी थीं, जिन्होंने एक वाकया सुनाया था। उस समय कर्पूरी ठाकुर नेता प्रतिपक्ष थे, लेकिन वो काफी बीमार थे। घर में आराम कर रहे थे। लेकिन, विधानसभा में एक महत्वपूर्ण मुद्दे पर चर्चा आन पड़ी और उन्हें उसमें जाना था। उन्होंने शिवनंदन पासवान से गाड़ी का जुगाड़ करने को कहा। उस दौरान लालू यादव सेकेण्ड हैण्ड Willys जीप का इस्तेमाल करते थे, जिसे वो खुद ड्राइव करते थे।

किस्सा कुछ यूँ है कि जब शिवनंदन पासवान ने लालू यादव से कहा कि वो कर्पूरी ठाकुर को उनके घर से विधानसभा लेकर जाएँ, तब लालू यादव ने कहा, “मेरी गाड़ी में तेल नहीं है। आप कर्पूरी जी को एक कार खरीद लेने के लिए क्यों नहीं कहते? वो इतने बड़े नेता हैं!” लक्ष्मी साहू बताती हैं कि लालू यादव ने सीएम बनने के बाद कर्पूरी ठाकुर का नाम तक लेना बंद कर दिया था, क्योंकि उन्हें लगता था कि ऐसे में वो हमेशा उनकी छाया में रहेंगे। उन्होंने कर्पूरी ठाकुर की याद में मेमोरियल बनाने का वादा भी पूरा नहीं किया।

लालू यादव ने देशरत्न मार्ग स्थित जिस घर में कर्पूरी ठाकुर का निधन हुआ वहाँ बाहर सिर्फ एक दीवार बनवाई, और कुछ नहीं। वो हमेशा कर्पूरी ठाकुर मेमोरियल के निर्माण की माँग को टालते रहे। लालू यादव उन दिनों VP सिंह और देवी लाल के दरबार में हाजिरी लगाते थे और शायद इसीलिए पटना में बीमार कर्पूरी ठाकुर के करीब रहने में या उनकी मदद करने में उन्हें कोई फायदा नहीं दिखता था। आखिरकार इन दोनों के आशीर्वाद से ही लालू यादव ने कर्पूरी ठाकुर के निधन के अगले वर्ष मार्च 1989 में उनका पद ग्रहण किया, बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बने।

अरुण सिन्हा अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि लालू यादव को ये पसंद नहीं था कि कर्पूरी ठाकुर पिछड़े समाज की सभी जातियों को हिस्सेदारी देना चाहते थे और अपनी योजनाओं के बारे में सबको खुल कर नहीं बताते थे। इसीलिए, उन्होंने कर्पूरी ठाकुर को ‘कपटी ठाकुर’ कहना शुरू कर दिया था। उसी समय एक अन्य युवा नेता नीतीश कुमार ने लालू यादव के समर्थन के लिए गैर-यादव विधायकों को मनाया और इस तरह लालू यादव नेता प्रतिपक्ष बने। आज अवसरवादी लालू यादव खुद को कर्पूरी ठाकुर का शिष्य बता रहे।

अवसरवादी लालू यादव ने समाजवादी के लिए क्या किया?

लालू यादव के समर्थक भले ही उन्हें ‘सामाजिक न्याय’ और समाजवाद के पुरोधा के रूप में पेश करते हों और उनकी गिनती राम मनोहर लोहिया व कर्पूरी ठाकुर के क्रम में करते हों, लेकिन लालू यादव ने ‘भूरा बाल साफ़ करो’ (कुछ विशेष जातियों के सफाये के लिए) का नारा लगाने और जातीय जनगणना की बातें कर के हिन्दुओं को बाँटने की कोशिश करने के अलावा और किया ही क्या है? श्रेय लेने की होड़ में वो जिस तरह की हरकत कर रहे हैं, उससे ‘जियति ना दिहिन कौरा, मरे डोलावय चौरां’ वाली कहावत चरितार्थ हो जाती है।

अवसरवादी लालू यादव कहते थे कि नीतीश कुमार के पेट में दाँत है, आज उनकी पार्टी उन्हीं की सरकार का हिस्सा है। कारण? कारण ये कि लालू यादव के एक बेटे तेजस्वी इस सरकार में उप-मुख्यमंत्री हैं, दूसरे बेटे तेज प्रताप भी मंत्री हैं। बिहार में श्रेय लेने की होड़ में नीतीश कुमार भी शामिल हैं, जिन्होंने इसे अपनी पुरानी माँग करार दिया। कइयों को इसमें चुनावी फायदे के लिए लिया गया फैसला दिख रहा है, तो कुछ मोदी सरकार को झुका लेने के दावे कर रहे हैं।

अब देखना ये है कि 2024 के लोकसभा चुनावों और 2025 के विधानसभा चुनावों में बिहार में कर्पूरी ठाकुर का नाम उनके निधन के 36-37 वर्ष बाद किस तरह फिर से प्रासंगिक बनता है। लालू-नीतीश इसे अपने ‘गुरु’ को मिला सम्मान दिखा कर मोदी सरकार को झुका लेने का दम भरेंगे, वहीं भाजपा समाजवाद के एक पुरोधा को सम्मान दिए जाने की बात कहेगी। हालाँकि, बिहार की राजनीति पारंपरिक राजनीति व देश के अन्य क्षेत्रों की राजनीति से अलग है, यहाँ कब क्या हो जाए किसी को अंदाज़ा नहीं।

असम में शांति का नया अध्याय, खत्म हो गया का ULFA का अस्तित्वः अब करेंगे समाज सेवा, मोदी सरकार ने डलवाए थे हथियार

44 साल बाद असम में उग्रवादी समूह यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (ULFA) का अस्तित्व समाप्त हो गया है। इसकी स्थापना 1979 में की गई थी। उग्रवादी संगठन ने अपने लड़का विंग को भंग करने का फैसला असम और भारत सरकार के साथ हुए हालिया समझौते के बाद किया है।

उल्फा के लड़ाका विंग को खत्म करने का निर्णय असम के दारांग जिले के चमुआपाड़ा गाँव में हुई बैठक में लिया गया। इस दौरान उल्फा के 900 लड़ाके मौजूद थे। अब ये लड़ाके सामान्य जीवन में लौट कर समाज सेवा का काम करेंगे।

उल्फा के संस्थापक सदस्यों में से एक अनूप चेतिया ने मीडिया से बातचीत में कहा, “यह हमारे लिए एक भावुक और पीड़ादायक दिन है। हमने 1979 में जिस संगठन को जन्म दिया उसे इस तरह से खत्म किया गया जबकि यह अपना उद्देश्य भी नहीं पूरा कर पाया। हमें अपनी सशस्त्र लड़ाई परिस्थितियों के कारण छोड़नी पड़ी। हमारे पास इस समझौते से लोगों को जो मिला वह स्वीकार करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था।” चेतिया ने बताया है कि वह अब अहोम विकास मोर्चा नामसे संगठन बनाएँगे।

उल्फा का समाप्त करने का निर्णय दिसम्बर 2023 में उग्रवादी समूह द्वारा भारत सरकार और असम सरकार के साथ समझौते करने के बाद हुआ है। 29 दिसंबर 2023 को नई दिल्ली में केंद्र सरकार, असम सरकार और उल्फा के बीच एक त्रिपक्षीय समझौता हुआ था। इस समझौते के तहत उल्फा ने अपने सभी हथियार और गोला-बारूद सरकार को सौंप दिए थे। उल्फा के 750 कैडर ने भी हथियार डाल दिए थे। अब तक उल्फा के 9000 से अधिक कैडर हथियार डाल चुके हैं।

उल्फा के मुख्यधारा में जुड़ने के बाद अब असम में शान्ति का माहौल बनने की उम्मीद है। हालाँकि, उल्फा एक अन्य गुट, जिसका मुखिया परेश बरुआ है, अब भी सशस्त्र लड़ाई में जुटा हुआ है। वह भारत सरकार के साथ बातचीत का भी विरोधी है। वह लम्बे समय से फरार है और बाहर से ही अपनी उग्रवादी गतिविधियों को चला रहा है।

केंद्र सरकार ने बताया था कि 1979 में उल्फा के गठन के बाद से इसकी हिंसा से 10 हजार लोगों की मौत हो चुकी है। इसके अलावा उल्फा के हमलों में सुरक्षा बलों को भी काफी नुकसान उठाना पड़ा। केंद्र सरकार ने बताया था कि उल्फा के हमलों में चार दशक में सुरक्षाबलों के करीब 700 जवान बलिदान हुए थे।