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बिहार में बीजेपी का CM, नीतीश NDA के संयोजक… फाॅर्मूला तो है तैयार, पर सहमति बनने की संभावना कितनी

अल्ताफ राजा के एक लोकप्रिय गाने के बोल कुछ इस तरह हैं,
जब तुम से इत्तेफ़ाकन मेरी नज़र मिली थी
अब याद आ रहा है शायद वो जनवरी थी
तुम यूं मिलीं दुबारा फिर माह-ए-फ़रवरी में
जैसे कि हमसफ़र हो तुम राह-ए-ज़िंदगी में

वैसे तो इसे आशिकों का गाना माना जाता है। लेकिन बिहार के लिए लग रहे राजनीतिक कयासों से ऐसा लगता है कि इस ‘अमर गीत’ की रचना किसी ऐसे ही दिन के लिए की गई होगी।

पटना से लेकर दिल्ली तक राजनीतिक गलियारे में हलचल मची हुई है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के एक बार फिर से पाला बदलने की अटकलें जोरों पर है। सूत्र तरह-तरह के शिगूफे छोड़ रहे हैं। ऐसे ही एक शिगूफों में से एक यह है कि इस बार जदयू के एनडीए में लौटने के बाद बिहार का मुख्यमंत्री बीजेपी कोटे से होगा। फिलहाल नीतीश कुमार एनडीए की संयोजक की भूमिका में आ जाएँगे। जिस सूत्र ने यह जानकारी दी है उसने ऑपइंडिया को यह भी बताया है कि इस पर नीतीश कुमार और बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व के बीच सहमति बननी शेष है। इस पर अंतिम निर्णय दिल्ली में होगा।

जब राजनीति में सारे पक्ष ‘कोई मतभेद नहीं है, सब कुछ ठीक है’ जैसा रटा-रटाया जवाब देने लगे तो सूत्र बेहद महत्वपूर्ण हो जाते हैं। क्योंकि सूत्र से तार हाथ लगने के कुछ घंटों के बाद यह खबर सामने आती है कि नीतीश कुमार पटना से दिल्ली के लिए उड़ान भर चुके हैं। उसी विमान से बीजेपी के बिहार अध्यक्ष सम्राट चैधरी सहित पार्टी के अन्य नेता भी दिल्ली आ रहे हैं। बिहार से आने वाले कैबिनेट मंत्रियों को भी दिल्ली तलब कर लिया गया है।

बीजेपी और नीतीश कुमार के बीच कोई खिचड़ी पकती है या नहीं? खिचड़ी किन शर्तों पर पकती है? इन सवालों के जवाब समय के गर्भ में हैं। लेकिन पिछले कई दिनों से ऐसे संकेत दिए जा रहे हैं जिनसे यह तो पता चलता ही है कि बिहार की सत्ता में बदलाव की बयार यूँ ही नहीं बही है।

‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ पर निकले काॅन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी की पूर्णिया रैली से नीतीश कुमार के कन्नी काटने की खबर भले अब आई हो पर INDI गठबंधन से उनकी नाराजगी की खबरें काफी पहले से चल रही हैं। शुरुआत में कहा गया कि विपक्षी गठबंधन का संयोजक नहीं बनाए जाने से नीतीश कुमार नाराज हैं। हालाँकि बाद में यह प्रस्ताव आया पर नीतीश ने उसे ठुकरा दिया। इसके बाद बिहार में अचानक से जदयू लोकसभा सीटों की संख्या को लेकर मुखर हो गई। बार-बार राजद, काॅन्ग्रेस सहित अन्य साझेदारों को यह बताने की कोशिश की गई कि JDU अपने हिस्से की सीटें कम नहीं करेगी।

फिर एक इंटरव्यू में जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से नीतीश कुमार को लेकर सवाल किया गया तो उन्होंने दरवाजे खुले होने के संकेत दिए। ध्यान रखने योग्य बात यह है कि अगस्त 2022 में जब एनडीए को छोड़ नीतीश कुमार राजद के साथ गए थे, उसके बाद इस तरह के सवाल कई बार बीजेपी नेताओं से पूछे गए थे। लेकिन जवाब में वे दोबारा नीतीश के साथ किसी तरह के गठबंधन को खारिज करते रहे।

इसके बाद से नीतीश कुमार की घर वापसी को लेकर संकेतों का सिलसिला चल पड़ा। रामचरितमानस को लेकर लगातार विवादित बयान देने वाले राजद कोटे से मंत्री प्रोफेसर चंद्रशेखर का विभाग बदला गया। कैबिनेट बैठक मिनटों में समाप्त की गई। लालू यादव के कृपा पात्र माने जाने वाले कई अधिकारी इधर से उधर किए गए। कर्पूरी ठाकुर को ‘भारत रत्न’ दिए जाने का श्रेय नीतीश कुमार के हिस्से में भी जाए इसका ख्याल रखा गया। नीतीश कुमार ने भी ट्वीट डिलीट कर इसका श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देने में कंजूसी नहीं की।

कर्पूरी ठाकुर की जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में नीतीश कुमार ने यह कहकर कि कुछ लोग राजनीति में केवल अपने परिवार को आगे बढ़ाते हैं घर वापसी की कयासों को और बल दिया। फिर लालू यादव की बेटी रोहिणी आचार्य ने चंद मिनटों के भीतर तीन ऐसे ट्वीट किए जिन्हें नीतीश कुमार पर निशाना माना गया। हालाँकि बाद में रोहिणी ने ये ट्वीट डिलीट कर दिए। लेकिन इसने राजद और जदयू की निकाह के दिन पूरे होने के संकेत दे दिए। बता दिया कि तलाक तलाक तलाक कभी भी मुमकिन है।

यही कारण है कि भले बीजेपी के सूत्र बताते हैं कि नीतीश कुमार की घर वापसी की शर्ते अभी फाइनल नहीं हुई हैं, लेकिन राजद की तरफ से खुद लालू प्रसाद यादव ने मोर्चा सँभाल लिया है। उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव पार्टी नेताओं के साथ बैठकों में व्यस्त हैं, वहीं लालू के लिए कहा जा रहा है कि वे बिना नीतीश कुमार के भी सरकार बनाने की संभावनाओं को टटोल रहे हैं।

बिहार विधानसभा की जो मौजूदा स्थिति है उसमें राजद, काॅन्ग्रेस, वाम दल और निर्दलीय मिलाकर 115 विधायक होते हैं। बहुमत का आँकड़ा 122 है। यदि असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के इकलौते विधायक का समर्थन भी राजद को मिल जाए तो भी उसे सरकार बनाने के लिए कम से कम 6 विधायकों का जुगाड़ करना ही होगा। दूसरी ओर सहमति बनने पर बीजेपी, जदयू और जीतनराम मांझी की पार्टी HUM 127 विधायकों के साथ आसानी से सरकार बना सकती है।

जाहिर है कि बिहार के सारे समीकरणों के केंद्र में अभी भी नीतीश कुमार और उनकी पार्टी जदयू ही है। इसी हुनर ने उन्हें डेढ़ दशक से ज्यादा समय से बिहार की राजनीति में प्रासंगिक बना रखा। इसी हुनर के कारण 2020 विधानसभा चुनावों के नतीजे आने के बाद बड़ी पार्टी होने के बाद भी बीजेपी ने उन्हें मुख्यमंत्री के तौर पर स्वीकार कर लिया था। लेकिन सूत्रों का कहना है कि इस बार बीजेपी शायद ही राज्य में उनकी सदारत में सरकार कबूल करने को तैयार होगी।

पर नीतीश कुमार की सियासत को समझना इतना भी आसान नहीं है। खुद लालू यादव कहते रहे हैं कि नीतीश कुमार के पेट में दाँत है। 2017 में जब नीतीश राजद को छोड़ एनडीए में चले गए थे तब लालू यादव ने कहा था, “नीतीश साँप है। जैसे साँप केंचुल छोड़ता है, वैसे ही नीतीश भी केंचुल छोड़ता है और हर 2 साल में साँप की तरह नया चमड़ा धारण कर लेता है। किसी को शक?”

अचानक से जिस तरह पटना से दिल्ली तक का मौसम एक जैसा होता दिख रहा है, उससे लालू यादव के शब्दों में कहें तो लगता नहीं कि नीतीश कुमार इस बार नया चमड़ा धारण करने के लिए 2 साल की प्रतीक्षा नहीं करेंगे। केंचुल छोड़ने में वे अधिक से अधिक दो दिनों का समय लें। किसी को शक?

बिहार के कटिहार में हिंदू मंदिरों पर हमला, मूर्तियों को किया खंडित: आक्रोशित लोगों ने रेलवे ट्रैक-हाइवे किया जाम, भाजपा नेता ने दी चेतावनी

बिहार के कटिहार जिले में दो जगहों पर बजरंग बली की मूर्ति क्षतिग्रस्त कर सांप्रदायिक माहौल बिगाड़ने की कोशिश की गई है। इन घटनाओं से स्थानीय लोगों में आक्रोश भड़क गया है। लोगों ने दोषियों की पहचान कर उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की माँग की और इसको लेकर बड़े स्तर पर प्रदर्शन भी किया। वहीं, बिहार के बड़े नेताओं ने भी इसका संज्ञान लिया है।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, कटिहार के मनिहारी थाना क्षेत्र में बजरंग बली की मूर्तियों को क्षतिग्रस्त करने की घटनाएँ हुई हैं। एक घटना मनिहारी थाने के जगावटी गाँव में हुई, जबकि दूसरी घटना महियारपुर रेलवे स्टेशन में स्थापित मूर्ति के साथ हुई। दोनों जगह पर उपद्रवियों ने बजरंग बली की मूर्ति को खंडित कर दिया।

इस घटना को मंगलवार (23 जनवरी 2024) की रात को अंजाम दिया गया। अगले दिन लोगों ने बजरंग बली की मूर्तियाँ क्षतिग्रस्त देखी तो इसके खिलाफ प्रदर्शन शुरू कर दिया। गुस्साई भीड़ ने रेलवे ट्रैक और हाइवे को जमा कर दिया। भड़के लोग मूर्ति तोड़ने वालों को तुरंत गिरफ्तार करने की माँग कर रहे थे।

घटना के बाद गुस्साई भीड़ को शांत करने के लिए दोनों घटनास्थलों पर भारी संख्या में पुलिस बल की तैनात कर दी गई। पुलिस ने लोगों को समझाने की कोशिश की। आखिरकार, घंटों मशक्कत करने के बाद पुलिस ने लोगों को समझा-बुझाकर उन्हें वापस भेजा। इसके बाद ट्रेनों और गाड़ियों का आवागमन शुरू हुआ।

ग्रामीणों को मनाने के लिए क्षेत्र के एसडीएम ने एक समिति का गठन किया है। यह धार्मिक स्थलों पर सुरक्षा को लेकर काम करेगी। उन्होंने आश्वासन भी दिया कि मूर्तियों को क्षतिग्रस्त करने वालों को तीन दिन के भीतर गिरफ्तार कर लिया जाएगा। पुलिस ने इस घटना पर FIR दर्ज कर लिया है।

इस मामले में केन्द्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने जल्द कार्रवाई की माँग की है। उन्होंने कहा, “हनुमान जी की मूर्तियों को तोड़ा गया है। अगर इसको गंभीरता से नहीं लिया गया और राज्य सरकार ने कार्रवाई नहीं की तो नीतीश बाबू और लालू जी… मैं दोनों को चेताना चाहता हूँ। यह मात्र हनुमान जी की मूर्ति नहीं टूटी है, बल्कि बिहार में आपने सनातनियों का गर्दन कटवाने का काम किया है। अगर अपराधी नहीं पकड़े गए और कार्रवाई नहीं हुई तो इस का खामियाजा आपको भुगतना पड़ेगा।”

राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा को नहीं पचा पाए मुस्लिम कट्टरपंथी: बिहार-झारखंड से लेकर कर्नाटक और महाराष्ट्र तक हिंदुओं पर हुए हमले

अयोध्या के राम मंदिर में 22 जनवरी 2024 को रामलला की प्राण प्रतिष्ठा हो गई। इसको लेकर देश भर के हिन्दू हर्षोल्लास में मना रहे थे। हालाँकि, कट्टरपंथी मुस्लिमों को हिंदुओं का यह उत्साह पसंद नहीं आया। प्राण प्रतिष्ठा का उत्सव मनाते हुए हिन्दुओं पर कई जगह हमले किए गए। कहीं शोभायात्रा पर पथराव हुआ तो कहीं भगवा ध्वज का अपमान किया गया। ऑपइंडिया ने इन घटनाओं को संकलित किया है।

21 जनवरी: मीरा रोड में हिन्दुओं पर हमला, ध्वज का अपमान

प्राण प्रतिष्ठा से एक दिन पहले यानी 21 जनवरी 2024 की रात को महाराष्ट्र स्थित ठाणे के मीरा रोड में कुछ हिन्दू युवक गाड़ियों पर शोभा यात्रा निकाल रहे थे। यात्रा जैसे ही भायंदर इलाके में मीरा रोड पर पहुँची, मुस्लिमों ने इसे निशाना बनाया दिया। उपद्रवियों ने गाड़ियों में तोड़फोड़ की और यात्रा में शामिल महिलाओं के साथ मारपीट और अभद्रता की। जिहादियों ने भगवान हनुमान के पोस्टर पर उलटी तक कर दी। इसके बाद पुलिस ने कार्रवाई करके कुछ उपद्रवियों को गिरफ्तार किया है।

21 जनवरी: मेहसाणा में हिन्दुओं पर हमला

गुजरात के मेहसाणा के खेड़ालू में हिन्दू श्रद्धालुओं पर मुस्लिमों ने पथराव किया। यहाँ राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के उपलक्ष्य में शोभा यात्रा का आयोजन किया गया था। यात्रा पर पथराव करने में मुस्लिम महिलाएँ भी शामिल थीं। यात्रा को देखते हुए कट्टरपंथी मुस्लिमों ने पहले से ही छतों पर पत्थर जमा कर लिए थे। जब श्रद्धालु इलाके में पहुँचे तो उन पर हमला कर दिया। पुलिस ने अब तक 15 आरोपितों को गिरफ्तार किया है।

21 जनवरी: वडोदरा में हिन्दुओं पर हुआ हमला

गुजरात के वडोदरा स्थित भोज गाँव में 22 जनवरी के दिन मुस्लिमों ने हिन्दुओं पर उस समय हमला कर दिया, जब वे प्रभु श्रीराम की शोभायात्रा निकाल रहे थे। इस मामले में पुलिस ने 16 लोगों के विरुद्ध FIR दर्ज की है। FIR की कॉपी ऑपइंडिया के पास है। यह यात्रा लगभग डेढ़ घंटे के बाद नगीना मस्जिद पहुँची। यहीं पर मुस्लिमों ने हिन्दुओं पर हमला कर दिया।

नगीना गली पहुँचने के बाद कट्टरपंथियों ने शोभायात्रा को रोक लिया और हिंदुओं से कहा, “दोबारा ऐसा करने की कोशिश मत करना, क्योंकि आज हम 2-4 हिन्दुओं को काटेंगे। जितने भी हिन्दू सामने पड़े मार दो।” इसके बाद कट्टरपंथी यात्रा पर हमला करने के लिए आगे बढ़ गए और चिल्लाने लगे कि किसी को जिन्दा नहीं छोड़ना है।

22 जनवरी: शिवमोगा में अल्लाहु अकबर के नारे, अपमानजनक बातें

कर्नाटक हिन्दू अयोध्या के राम मंदिर में भगवान राम की प्राण प्रतिष्ठा को लेकर उत्सव मनाने के लिए इकट्ठा हुए थे। यह कार्यक्रम शिवमोगा के शिवप्पा नायक चौक पर हो रहा था। यहाँ एकत्रित हुए हिन्दू ‘जय श्रीराम’ के नारे लगा रहे थे। इसी दौरान एक बुर्के वाली महिला आई और लोगों से बहस करने लगी। महिला ने इस दौरान भक्तों के बीच में अल्लाह-हू-अकबर के नारे लगाए और उल्टी-सीधी बातें कीं। बताया गया कि यह महिला एक बाइक पर यहाँ पहुँची थी और साथ में एक बच्चे को लिए हुए थी।

22 जनवरी: दरभंगा में रामलला की शोभायात्रा पर पथराव

बिहार के दरभंगा में रामलला की शोभा यात्रा पर भी पथराव किया गया। दरभंगा जिले के सिंहवाड़ा थाने के भपुरा गाँव में श्रीराम शोभायात्रा पर पथराव किया गया। उपद्रवियों ने दो बाइक सहित डीजे वाहन को बुरी तरह से क्षतिग्रस्त कर दिया। अचानक हुए हमले से शोभायात्रा में शामिल रामभक्तों में अफरा-तफरी मच गई। पुलिस ने मौके पर पहुँचकर स्थिति को नियंत्रित किया।

22 जनवरी: झारखंड के गिरिडीह में हिन्दुओं पर हमला

शोभायात्रा पर हमले को लेकर गिरिडीह में तनाव के कई मामले दर्ज किए गए हैं। ऐसे ही एक मामले में आजाद नगर के पास बिरनी के RSS कार्यकर्ता रोहित महतो पर जानलेवा हमला किया गया। इससे वे गंभीर रूप से घायल हो गए। वहीं, मुफस्सिल थाना क्षेत्र के चुंजका के पास जमकर पथराव हुआ।

बताया गया कि पूर्णानगर राम मंदिर के पास से लोग जुलूस निकालकर चुंजका ‘बजरंग बली’ मंदिर जा रहे थे। मंदिर के पास पहुँचने के बाद कट्टरपंथी मुस्लिमों की एक भीड़ ने अपने-अपने घरों की छतों से पथराव शुरू कर दिया। इसमें कई लोग घायल हो गए हैं। घायलों में पुलिसकर्मी भी शामिल हैं।  

22 जनवरी: झारखंड के लोहरदगा में बवाल

झारखंड के लोहरदगा में भी तनाव की खबरें सामने आईं। यहाँ कैरो थाना क्षेत्र के हनहट गाँव में 22 जनवरी को अयोध्या में प्राण प्रतिष्ठा अनुष्ठान को लेकर उत्सव मनाया जा रहा था। इसी बीच मंदिर में गाना बजाने के दौरान दोनों पक्ष के लोग आमने-सामने हो गए और लाठी डंडे के साथ भीड़ ने मंदिर को घेर लिया। एसपी हारिस बिन जमा ने घटना की पुष्टि करते हुए कहा कि तनावपूर्ण स्थिति को देखते हुए पुलिस बल की तैनाती की गई है।

22 जनवरी: झारखंड के धनबाद में भी बवाल

धनबाद के टुंडी थाना इलाके में कदैयाँ में रविवार को तनाव फैला था, इसके बाद 22 जनवरी 2024 की शाम को छाताबाद में जुलूस निकालने के दौरान कट्टरपंथी बाहर निकल आए और हिंदुओं से भिड़ गए। कट्टरपंथियों ने ना सिर्फ बहस की, बल्कि मारपीट भी की। वहीं, 21 जनवरी 2024 को कदैयाँ में धार्मिक झंडा लगाने को लेकर दो पक्षों के बीच भिड़ंत हुई, जिसमें कई लोग जख्मी हो गए थे। इस मामले में दोनों पक्षों की ओर से टुंडी थाना में लिखित शिकायत की गई है।

22 जनवरी: नांदेड़ में प्राण प्रतिष्ठा का उत्सव मनाते हिन्दुओं पर हमला

महाराष्ट्र के नांदेड़ में मुस्लिमों ने हिंदू श्रद्धालुओं पर हमला कर दिया। नांदेड़ के चिखली गाँव के मंदिर में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा का कार्यक्रम मनाने पर मुस्लिमों ने हिंदुओं के साथ धक्का-मुक्की की और धमकी दी। पुलिस ने इस मामले का संज्ञान लिया है और असलम खान और गफ्फार खान के खिलाफ मामला दर्ज किया। बताया गया है कि यह दोनों हिन्दू आस्था के विरुद्ध उलटी सीधी बातें कर रहे थे।

22 जनवरी: पनवेल में हिंदू बाइक रैली पर हमला

नवी मुंबई के पनवेल में प्राण प्रतिष्ठा का जश्न मनाने के लिए एक बाइक रैली का आयोजन किया गया था। इस पर कट्टरपंथी मुस्लिमों ने हमला कर दिया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, भीड़ ने पीछे से हमला कर तीन हिंदुओं को गंभीर रूप से घायल कर दिया। इस दौरान वाहनों में तोड़फोड़ की गई और एक व्यक्ति की पीठ और एक के सिर में चाकू मारा गया।

22 जनवरी: नागपुर में हिन्दू युवकों पर हमला

नागपुर के मोमिनपुरा इलाके से गुजरते समय ‘जय श्रीराम’ का नारा लगा रहे कुछ हिंदू लड़कों पर हमला किया गया। बताया गया कि लड़के छोटी खदान में हनुमान मंदिर की ओर जा रहे थे। जब लड़के यह पूछने के लिए रुके कि चप्पल किसने फेंकी तो 30 से अधिक मुस्लिमों की भीड़ इकट्ठा हो गई और 14 वर्षीय हिंदू लड़के की बेरहमी से पिटाई कर दी। इसी तरह का दृश्य संभाजी नगर के पडेगाँव इलाके से सामने आया, जहाँ दो समूहों के बीच लाठियां और पत्थर फेंके गए। इस मामले में 64 लोगों को गिरफ्तार किया गया है।

22 जनवरी: कुशीनगर में शोभायात्रा पर हमला

कुशीनगर में भगवान राम की शोभा यात्रा के आयोजन पर मुस्लिम समुदाय ने विवाद पैदा कर दिया। इस दौरान पथराव भी किया गया। इसमें कुछ मोटरसाइकिलें क्षतिग्रस्त हो गईं और कई लोग घायल हो गए। हालाँकि, पुलिस ने दावों का खंडन किया है। आपसी झगड़े का एक ऐसा ही मामला आज़मगढ़ जिले के जहानाबाद पुलिस थाना क्षेत्र में सामने आया, जब इस्लामी कट्टरपन्थियों ने बड़ी संख्या में सड़कों पर इकट्ठा होकर जुलूस को रोक दिया और साथ में चल रहे डीजे को बंद कर दिया।

22 जनवरी: बिहार के मुजफ्फरपुर में हिन्दुओं पर हमला

बिहार के मुजफ्फरपुर में एक विवाद के बाद हिंदू और मुस्लिमों के बीच जमकर पथराव हुआ। रिपोर्टों के मुताबिक, मुस्लिमों ने न केवल यात्रा में शामिल युवाओं पर पथराव किया बल्कि कई घरों को भी निशाना बनाया। इसके अलावा तलवारों से भी हमले की खबरें हैं।

22 जनवरी: कर्नाटक के बेलगावी में जय श्रीराम कहने पर पथराव

कर्नाटक के बेलगावी में भी प्राण प्रतिष्ठा का उत्सव मना रहे हिन्दुओं पर पथराव किया गया। यहाँ मुस्लिमों ने यात्रा निकाल रहे हिन्दुओं के ऊपर पत्थरबाजी की। यह घटना भी 22 जनवरी 2024 की ही है। बताया गया कि जहाँ पथराव हुआ, वे मुस्लिम जनसंख्या वाले इलाके हैं। यहाँ उत्सव मना रहे हिन्दू ‘जय श्री राम’ के नारे लगा रहे थे, जो कट्टरपंथियों को पसंद नहीं आया।

24 जनवरी: बरेली में आतिशबाजी करते हिन्दुओं पर हमला

बरेली के सिरौली में 24 जनवरी 2024 को वरुण रस्तोगी अपने परिवार के साथ घर के बाहर गली में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा का उत्सव मना रहे थे। इस दौरान वे आतिशबाजी कर रहे थे। इसी दौरान सिरौली के ही रहने वाले शावेज, वसीम, सुहैल, कय्यूम, दानिश और सहाना ने वरुण और उनके बच्चों पर लाठी डंडों से हमला बोल दिया।

कट्टरपंथी मुस्लिम हमलावरों ने उन पर हमला करते हुए कहा कि ‘बहुत रामभक्त बनते हो, आज तुम्हें जान से मार देंगे’। इस दौरान उन्हें बचाने आई उनकी पत्नी पर भी मुस्लिम हमलावरों ने हमला कर दिया। इस हमले में वरुण, उनकी पत्नी और दो बच्चे घायल हो गए। उन्होंने इसको लेकर पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है।

ट्रैक्टर चढ़ा गिरा दी सरदार पटेल की मूर्ति, उज्जैन में भीम आर्मी और पाटीदार समाज भिड़े: पत्थरबाजी-आगजनी के बाद थाना प्रभारी पर गिरी गाज

उज्जैन में लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल की मूर्ति ट्रैक्टर चढ़ाकर गिरा दी गई। इसके बाद भीम आर्मी और पाटीदार समाज के बीच भिड़ंत हो गई। पत्थरबाजी और आगजनी के बाद माकड़ोन थाना प्रभारी भीम सिंह देवड़ा को निलंबित कर दिया गया है।

इस घटना के वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हैं। बवाल के बाद बड़ी संख्या में मौके पर पुलिस की तैनाती की गई है। रिपोर्ट के अनुसार उज्जैन के माकड़ोन मंडी गेट और बस स्टैंड पर पड़ी खाली जमीन पर मूर्ति लगाने को लेकर भीम आर्मी और पाटीदार समाज के बीच मतभेद है। भीम आर्मी यहाँ डाॅक्टर भीमराव आंबेडकर की लगाने की पक्षधर है, वहीं पाटीदार समाज सरदार पटेल की मूर्ति स्थापित करना चाहता है।

दोनों पक्षों के बीच का ये विवाद पंचायत में विचाराधीन है। लेकिन 24 जनवरी 2024 की रात इस जगह किसी ने सरदार पटेल की मूर्ति लगा दी। इसकी जानकारी मिलते ही दूसरे पक्ष के लोगों ने मूर्ति पर ट्रैक्टर चढ़ा। मौके पर जमा हुए लोगों ने लाठी और पत्थर मार मूर्ति तोड़ दी।

इसकी सूचना मिलते ही पाटीदार समाज के लोग भी मौके पर जमा हो गए। दोनों पक्षों ने पत्थरबाजी की। वाहनों को फूँक दिया। मौके पर पहुँच कर पुलिस ने दोनों पक्षों को शांत करवाया। कलेक्टर नीरज सिंह का कहना है कि पुलिस ने इस मामले में कुछ लोगों को पकड़ा है। एडिशनल SP नीतेश भार्गव ने कहा कि है कि जाँच जारी है और सुबूतों के आधार पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

उन्होंने बताया कि मूर्ति किसकी लगेगी इसका निर्णय नगर परिषद करेगी। वहीं नगर परिषद अध्यक्ष गोकुल राठौर के मुताबिक बीते साल दोनों पक्षों की तरफ से मूर्ति लगाने का प्रस्ताव आया था। राठौर ने बताया, “हमने दोनों पक्षों को मूर्ति लगाने से मना कर दिया और दोनों को बातचीत कर समाधान निकालने को कहा था। रात में क्या हुआ, यह पता नहीं।”

नासिक में बैठकर इस्लामिक स्टेट को पैसे भेज रहा था इंजीनियर: एक्सपोर्ट-इंपोर्ट की आड़ में ISIS की विचारधारा को फैला रहा था

महाराष्ट्र के आतंकवाद निरोधक दस्ते (ATS) ने बुधवार (24 जनवरी 2024) को नासिक शहर से एक 32 साल के एक इंजीनियर को गिरफ्तार किया है। इस पर सीरिया-ईराक सहित विभिन्न जगहों से अपनी आतंकी गतिविधियों को संचालित करने वाले खूँखार आतंकी संगठन ‘इस्लामिक स्टेट ऑफ ईराक एंड सीरिया (ISIS)’ या ‘इस्लामिक स्टेट (IS)’ को फंडिंग करने का आरोप है।

आरोपित इंजीनियर को गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) की कोर्ट में पेश किया गया। वहाँ से उसे 31 जनवरी 2024 तक 7 दिनों की पुलिस रिमांड में भेज दिया गया है। हालाँकि, ATS टीम ने इस आरोपित का नाम एवं अन्य पहचान को अभी उजागर नहीं किया है। वहीं, उसके सहयोगियों की पहचान की कोशिश जारी है।

महाराष्ट्र ATS अब देश के अन्य राज्यों में इससे जुड़े लोगों के बारे में खोजबीन कर रही है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, आरोपित इंजीनियर देश की आर्थिक राजधानी मुंबई से लगभग 200 किलोमीटर दूर स्थित शहर नासिक में आयात-निर्यात का व्यवसाय करता था। ATS के मुताबिक, आरोपित शख्स पिछले दिनों कट्‌टरपंथी पोस्ट भी कर चुका था।

ATS के एक अधिकारी के मुताबिक, अब तक की जाँच से पता चला है कि आरोपित ने सीरिया में तीन बार वैश्विक आतंकवादी समूह इस्लामिक स्टेट को पैसा भेजा था। आरोपित के कुछ सहयोगियों की पहचान का ATS ने खुलासा नहीं किया, लेकिन वो कई राज्यों में इनकी जाँच की जा रही है।

ATS ने आरोपित के ठिकाने से आपत्तिजनक दस्तावेजों के साथ मोबाइल फोन, सिम कार्ड, लैपटॉप और पेन ड्राइव सहित कई इलेक्ट्रॉनिक गैजेट भी जब्त किए। महाराष्ट्र आतंकवाद निरोधक दस्ते के अधिकारी के मुताबिक, महाराष्ट्र ATS की एक टीम को संदिग्ध आरोपित के बारे में इनपुट मिला था।

इसके बाद से ही उनकी एक टीम बीते कई दिनों से इसकी हरकतों और गतिविधियों पर नजर रख हुए थी। आतंकवाद रोधी एजेंसी ने एक बयान में कहा कि आरोपित इंजीनियर ISIS से जुड़ी एक विदेशी यूनिट के साथ लगातार संपर्क बनाए हुए था। आतंकी आरोपित को पूछताछ के बाद गिरफ्तार कर UAPA अदालत में पेश किया गया था।

‘परिवार-तोड़ू फेमिनिस्ट और न्याय-विरोधी वामपंथी’ को भगवान राम से नफरत क्यों? क्योंकि ‘शबरी के बेर, ताड़का को ढेर, सौतेली माँ का मान’ टाइप आदर्श पुरुष कहीं और नहीं

अयोध्या में भगवान श्रीराम की मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के बाद से ही भारत में फेमिनिस्ट और लिब्रल्स का रुदन जारी है। लगातार ही किसी न किसी बहाने से रोना चलता चला आ रहा है। आरफा खानम से लेकर रवीश कुमार तक इनका रोना चालू है।

राहुल देव जैसे पत्रकार कई चैनलों पर जा-जा कर अपना रोना रो रहे हैं और हर बार यही लोग कह रहे हैं कि भारत का संविधान हार गया। सबसे हैरान करने वाला तो यह था कि कुछ ही समय पहले सुष्मिता सेन को ललित मोदी के साथ सम्बन्धों के आधार पर कोसने वाले लोग सुष्मिता सेन की इन्स्टाग्राम स्टोरी की प्रशंसा कर रहे थे, जिसमें सुष्मिता ने संविधान की बात की थी।

यह बहुत हैरान करने वाली बात है कि आखिर यह कैसे हो गया है या हो जाता है? आखिर संविधान के अनुसार ही तो यह मंदिर बना है। क्या इस मंदिर के निर्माण की यात्रा में कानून का सहारा नहीं लिया गया? क्या न्याय के लिए भारत के संविधान में प्रदत्त न्यायपालिका का सहारा नहीं लिया गया? क्या इतने वर्षों तक अदालत का मुँह हिन्दू समाज ने नहीं ताका था?

अरे, हिन्दू समाज तो इतना सहिष्णु समाज है कि अपने आराध्य की आराधना के लिए कभी न्यायालय का मार्ग ताकता था, तो कभी मीडिया में चल रहे विमर्श का मुँह ताकता था। मगर यह नहीं समझ पा रहा था कि आखिर अपने आराध्य के घर का मामला उठाने पर उसे पिछड़ा, पुरुषवादी, साम्प्रदायिक क्यों बताया जा रहा है? क्या उसके पास यह भी अधिकार नहीं था कि वह अपने आराध्य के घर के विषय में बात कर सके?

दरअसल समस्या दूसरी है। समस्या है कथित फेमिनिस्ट और कम्युनिस्ट लोगों को, प्रभु श्रीराम के आदर्श पुरुष होने से! प्रभु श्रीराम फालतू के पुरुष-विरोधी स्त्री विमर्श पर नहीं चलते। महिला होने के नाते हजार अपराध समाज के प्रति माफ़ है, ऐसा प्रभु श्रीराम नहीं स्थापित करते। वह अपने कर्मों से यह स्थापित करते हैं कि अपराधी का कोई लिंग नहीं होता।

वह अपराध करने पर ताड़का को भी दंड देते हैं और शूपर्णखा को दिए गए दंड को भी सही ठहराते हैं। मगर भारत की परिवार-तोड़ू फेमिनिस्ट चूँकि इस सीमा तक पुरुषों से घृणा करती हैं कि वह प्रभु श्रीराम के उस रूप को देख ही नहीं पाती हैं, जिनमें स्त्रियों के लिए आदर है। जो पति अकेले ही अपनी पत्नी को खोजने की यात्रा आरम्भ करता है और जो बेटा अपनी सौतेली माँ के वचनों का मान रख कर अपना राजपाट त्याग कर वन में निकल जाता है, उससे कम्युनिस्ट फेमिनिस्ट घृणा करती हैं क्योंकि वह केवल उन्हीं स्त्रियों का आदर करते हैं, जिनमें स्त्रियोचित गुण हैं।

जो स्त्रियाँ अपराध करती हैं, भगवान राम उन्हें मात्र अपराधी की दृष्टि से देखते हैं। प्रभु श्रीराम इसलिए ताड़का को छोड़ नहीं देते हैं कि वह महिला है और कथित अबला है। हालाँकि वह आरम्भ में संकोच करते हैं कि ताड़का पर कैसे प्रहार करें क्योंकि वह महिला है और महिला पर अस्त्र नहीं प्रयोग किया जाता।

इस द्वंद्व को लेकर विश्वामित्र उन्हें आश्वस्त करते हैं कि अपराध देखा जाना चाहिए, अपराधी नहीं। इसके बाद प्रभु श्रीराम की झिझक दूर होती है और फिर वह ऋषियों के यज्ञ में बाधा उत्पन्न करने वाली ताड़का का वध करते हैं। यह हो सकता है कि ताड़का को उसकी शारीरिक बनावट के अनुसार महिला कह दिया जाए, मगर यह देखा जाना चाहिए कि वह क्या कर रही थी। वह तो सृष्टि के कार्यों के संचालन में बाधा उत्पन्न कर रही थी। वह सृष्टि के कल्याण के लिए किए जा रहे यज्ञों का विध्वंस कर रही थी, जिसके चलते ऋषि जन कल्याण के कार्यों को नहीं कर पा रहे थे।

जब जन कल्याण के कार्यों में कोई बाधा उत्पन्न करेगा, तो उसका लिंग कोई भी हो, उसे मृत्यु का ही सामना करना पड़ेगा, उसे दंड का भागी होना ही होगा। यही प्रभु श्रीराम सन्देश देते हैं। इसलिए फेमिनिस्ट डरती हैं, वह विलाप करती हैं, कम्युनिस्ट प्रभु श्रीराम का विरोध करते हैं, क्योंकि प्रभु श्रीराम जहाँ शबरी के बेर खाते हैं, वहीं वो यज्ञ विध्वंस करने वाली ताड़का को दंड भी देते हैं।

प्रभु श्रीराम मर्यादा निर्धारित करते हैं और वे स्त्री विमर्श की यह सीमा भी निर्धारित करते हैं कि अपराध लिंग निरपेक्ष होता है तो दंड भी लिंग निरपेक्ष ही होना चाहिए। तभी फेमिनिस्ट भगवान श्रीराम से घृणा करती हैं! मगर यह भारत है, जिसे यह अच्छी तरह से पता है कि उसके लिए कैसे पुरुष उत्तम हैं। तभी भारत में हर जगह गूँज रहा है – “जय श्री राम” और इसी कारण परिवार-तोड़ू और पुरुषों से घृणा करने वाली फेमिनिस्ट अपनी कुंठा निकाल रही हैं।

डियर आरफा, एक बार तेल लगाकर डाबर का DNA निकाल लो बाबर का, फिर सीने में नहीं चुभेगा भगवा

अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के बाद घर-घर भगवा पताका का दिखना पिछले कुछ समय में सामान्य हो गया है। हर हिंदू इस माहौल को देख जहाँ गौरवान्वित हैं तो हर आरफा खानम शेरवानी जैसे इसे देख रो रहे हैं। संविधान और लोकतंत्र की आड़ में नैरेटिव बनाने के लिए अलग-अलग मंच ढूँढे जा रहे हैं ताकि समझाया जा सके कि राम मंदिर का बनना कितना गलत है और हिंदुओं का जय श्रीराम कहना उससे भी बड़ा अपराध… इनका पूछना है कि हिंदुओं के घर भगवा झंडा क्यों लगा है और क्यों वो प्राण-प्रतिष्ठा से खुश हैं।

आरफा खानम ने अपनी ये पीड़ा जाहिर करने के लिए उस मंच को चुना जहाँ राहुल गाँधी पर लिखी गई किताब का विमोचन हो रहा था। यहाँ आरफा कारसेवकों को अपराधी बोलती दिखीं। मंदिर के परिसर में मस्जिद न बनने पर नाराजगी दिखाती दिखीं। साथ ही ये बताती दिखीं कि आज के समय में जब वह हिंदुओं के घरों पर भगवा ध्वज लहरते देखती हैं तो उनको ऐसा लगता है जैसे उनके सीने पर किसी ने उसे लगा दिया हो। 

ये सारी बातें कहते हुए उनकी आवाज में इतना दर्द होता है कि कोई भी समझ सकता है कि वो सिर्फ राम मंदिर बनने से दहाड़े मारकर रो नहीं रहीं है वरना भीतर से उनकी दुर्गत हो चुकी है। हास्यास्पद यह है कि आजीवन इस्लामी पत्रकारिता और इस्लामी कट्टरपंथियों के अपराधों को धो पोछने में लगीं आरफा खानम जब-जब अपनी हिंदू घृणा निकालती हैं तो खुद को सच्चा पत्रकार और भारतीय नागरिक कहने से नहीं चूँकतीं।

इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में खुद को बाबर की औलाद से जोड़ते हुए उन्होंने कहा, “मैं जिस सोसायटी में रहती हैं वहाँ हिंदू-मुस्लिम-सिख सभी समुदाय के लोग हैं लेकिन फिर भी वहाँ भगवा झंडा लगा दिया गया है जिसे देख ऐसा लगता है जैसे वो मेरे सीने पर लगा हो।” उन्होंने कहा कि वह, उनके पिता, उनके पिता, उनके पिता के पिता और बाबर की औलादों तक सब इसी देश में पैदा हुए हैं…।

अपनी राष्ट्रभक्ति दिखाते समय वो बिलकुल स्पष्ट बता देती हैं कि ‘बाबर की औलाद’ (वीडियो में 2:48 मिनट के स्लॉट पर इस शब्द को सुना जा सकता है) के बाद से ही उनकी पीढ़ियाँ इस देश में हुईं। लेकिन, इस दौरान उनका विवेक इतना काम नहीं करता कि सोच सकें कि बाबर की औलादों से पहले भी हिंदुस्तान में लोग रहते थे, जिनका धर्म सनातन था, जो राम को मानते थे उनको पूजते थे, उनका आखिर क्या हुआ? आज वही सनातनी अपने धर्म का प्रदर्शन कर रहे हैं तो इसमें गलत क्या है। उनकी आस्था को अगर समझना है तो आरफा को न कि ‘बाबर की औलाद’ का टैग लगाकर सहानुभूति बटोरने की बजाए राम से जुड़ना होगा।

लाउडस्पीकर पर अजान, सड़क पर नमाज से क्यों नहीं दिक्कत थी आरफा को

भगवा देख घबराने वाली आरफा को देश के सेकुलरिज्म की बहुत चिंता है। लेकिन आरफा खानम शेरवानी का ये डर आजतक तब नहीं जागा जब रोड किनारे नमाज पढ़ने का चलन सामान्य था। क्या तब हिंदुओं को ये नहीं लगता होगा कि नमाज उसी स्थान को ब्लॉक करके पढ़ी जा रही है जहाँ आने-जाने का अधिकार उनका भी है? आज भी यदि को मजहब के नाम पर सड़क ब्लॉक करके बैठ जाए तो वह उसे उनका अधिकार कहेंगी और अगर कोई भगवा पहनकर घर से निकल जाए तो वह लोकतंत्र पर खतरा बताएँगी। आरफा बताएँ कि ये कैसी हिपोक्रेसी है जहाँ दंगा करने वाली इस्लामी कट्टरपंथी भीड़ के उन्माद को प्रदर्शन कहा जाता है और शोभा यात्रा निकालने वाले हिंदुओं पर पथराव की घटनाओं पर चुप्पी साधी जाती है?

मंदिर में मस्जिद क्यों नहीं बनाया: आरफा का सवाल

बुत पूजा को खुलेआम कुफ्र कहने वाले लोगों की आवाज बन आरफा खानम ये रो रही हैं कि कोर्ट ने ऑर्डर में कहा था मंदिर के साथ रहम के तौर पर वहाँ एक छोटी मस्जिद भी बन जाए लेकिन ऐसा नहीं किया गया… अजीब बात ये है कि 5 साल पहले जब राम मंदिर पर फैसला आया था तो एक जमीन मस्जिद के लिए भी मिली थी। मुस्लिम पक्ष द्वारा उसका निर्माण तो दूर उसकी एक ईंट तक नहीं रखवाई गई। लेकिन आरफा खानम के सवाल किससे हैं? हिंदुओं से। उनके लिए देश में सौहार्द तभी आएगा जब हिंदू उन्हें उनके धर्मस्थल पर मस्जिद बनाने देंगे और सेकुलरिज्म तब जीवित रहेगा जब वो भूल जाएँगे कि किसी समय में जहाँ मजहबी स्थल हैं वहाँ भव्य मंदिर हुआ करते थे।

वरना आप ही सोचिए, अगर सोसायटी में किसी के भगवा झंडा लगा ही है तो इससे आरफा को इतनी पीड़ा क्यों हुई कि उन्हें लगे कि वो उनकी छाती पर लगा दिया गया है। हिंदुओं ने तो इतने सालों से कभी आवाज नहीं उठाई थी कि लाउडस्पीकर पर अजान सुबह-सुबह उन इलाकों में क्यों बजाई जा रही है जहाँ की जनसंख्या में हिंदू भी उतने हैं जितने की मुस्लिम…आज अगर रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा के बाद लोग अपने प्रभु की जय-जयकार कर रहे हैं तो इससे सोचने वाली बात है कि आरफा चिंता में है या ‘बाबर की औलादों (आरफा के शब्द)’ के आने के बाद भारत में घुसा कट्टरपंथ, जिसने लाखों मंदिरों को तोड़ा और हिंदुओं पर धर्मांतरण का दबाव बनाया।

आरफा को आज चाहिए कि भारत में हिंदू धर्म को महत्व न दिया जाए लेकिन आरफा को ये नहीं बताना है कि भारत में बैठकर वो गाजा का रोना क्यों रोती हैं, क्या उसकी वजब उम्माह नहीं है। अगर कारण ‘इंसानियत’ होती तो क्या उन्हें सिर्फ इजरायल की कार्रवाई दिखी, हमास द्वारा की गई बर्बरता पर उन्होंने क्यों आँख मूँदी।

स्कूलों में भक्ति गीत गाने से लोकतंत्र खतरे में, हिजाब पहनने की जिद्द सही?

स्कूली छात्राओं द्वारा हिजाब पहनने की जिद्द को समर्थन देने वाली आरफा को चिंता है कि स्कूल-कॉलेजों में लोकतंत्र-संविधान नहीं पढ़ाया जा रहा, बल्कि भक्ति वाले गानों पर टीचर अपने साथ बच्चों को नचा रहे हैं। वो बताती हैं कि संसद धर्म की धुरी पर घूम रहा है और मंदिर में राजनीति हो रही है। उनसे यदि कोई पूछे कि संसद में नमाज का समय देना और इफ्तार पार्टी में राजनेताओं का पहुँचना आखिर क्या था? तो इसका जवाब होगा। क्या तब मजहब संसद में नहीं घुस रहा था क्या तब मजहब के नाम पर राजनीति नहीं चल रही थी। आरफा टीवी पर राम मंदिर की दिखाई जाने वाली खबरों को रामलीला बताती हैं। वहीं अपने भाषण को और राहुल गाँधी पर लिखी किताब के विमोचन कार्यक्रम को वो क्रांति बताती हैं।

कारसेवकों बलिदानी कहने से भी दिक्कत

आरफा की छटपटाहट ये है कि आखिर आज कारसेवकों के बलिदान लोग क्यों याद कर रहे हैं जबकि उन्होंने तो उनके मस्जिद को तोड़ा है। क्या आरफा को इस बात का जवाब नहीं देना चाहिए कि जब उन्हें कारसेवकों से इतनी समस्या है तो फिर उन हिंदुओं पर क्या बीती होगी जिनके धर्मस्थलों पर बाबर की औलादों ने अपने राज में हथौड़े मारे। उनके भगवान की मूर्तियाँ खंडित की। क्यों आखिर टीपू सुल्तान को नायक मानें, क्यों औरंगजेब को राजा समझें।

आरफा खानम अपने भाषण में प्रधानमंत्री मोदी पर सवाल उठाती हैं। कहती हैं कि नरेंद्र मोदी एक धर्म के प्रधानमंत्री बन गए हैं और बाकी विकास नहीं कर रहे। आरफा की विकास की परिभाषा शायद केवल एक मजहब के ईर्द-गिर्द होकर गुजरती है क्योंकि उन्हें न देश में बना अटल सेतु दिखाई देता है न ही अयोध्या का वो अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा जो राम मंदिर बनने के साथ हुआ। उनके लिए विकास ये भी नहीं है कि सदियों से चली आ रही तीन तलाक की कुरीति को पीएम मोदी ने खत्म किया, जिसकी हिम्मत पुरानी सरकारों ने कभी नहीं दिखाई। उन्हें वो रौशन घर भी नहीं दिखते जो पीएम मोदी की योजनाओं से जगमगाए, न वो गरीब परिवार दिखते हैं जिनके आवास का इंतजाम पीएम मोदी ने किया।

आरफा खानम के लिए विकास का क्या अर्थ

आरफा के लिए शायद विकास यही है कि सड़कों पर नमाज हो, हिंदुओं के इलाकों में अजान हो मुस्लिम बच्चियाँ हिजाब पहनी दिखें और उनके जैसे इस्लामी कट्टरपंथियों का नैरेटिव फिर से चलना शुरू हो जाए। मीडिया में राम मंदिर की कवरेज को कोसने वाली आरफा को चाहिए वो वामपंथी पत्रकार वापस लौट आएँ जो लच्छेदार शब्दों से हिंदुओं को हिंदू होने पर शर्म महसूस कराएँ और भाजपा की हार पर स्टूडियो में डांस दिखाएँ। उन्हें शायद पर्दों पर उन फिल्मों की वापसी भी चाहिए जहाँ महिमामंडन मुगलों का होता हो, उनसे ये दौर नहीं बर्दाश्त नहीं हो रहा जहाँ मराठाओं की गौरवगाथा, सनातन का स्वर्णिम इतिहास उभर का आता है; प्रधानमंत्री अपने हिंदू होने को छिपाते नहीं, बल्कि त्रिपुंड और तिलक गर्व से लगाते हैं।

सरकार पर प्रोपेगेंडा का इल्जाम लगाने वाली आरफा खुद को एक तरफ निष्पक्ष पत्रकार भी कहती हैं और दूसरी तरफ राहुल गाँधी की पीआर बनकर उनकी किताब का प्रचार भी करती हैं। उनके हिजाब से लोकतंत्र को पुनर्जीवित करने का शायद यही माध्यम है राहुल को प्रधानमंत्री बनाया जाए, कॉन्ग्रेस की वापसी हो, भगवा झंडे हिंदुओं के घर से उतर जाएँ।

एक तरह से दे दिक्कत उनकी है भी नहीं… उनकी सोच और बौद्धिकता और इस्लामी कट्टरपंथियों की है जो उन्हें मजबूर कर रही है खुद को सिर्फ बाबर की औलाद से जोड़ने के लिए। जब तक वो खुद को बाबर से जोड़कर देखेंगी तब तक तो जाहिर है कि उनके सीने में भगवा चुभेगा ही चुभेगा। भारत को समझने के लिए, भगवा और राम मंदिर के महत्व को जानने के लिए तो उन्हें राम से जुड़ना होगा, जो उनसे हो नहीं पा रहा।

स्वामी प्रसाद मौर्य ने कहा था- बकवास है रामचरितमानस, सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस ने कहा- ये उनका मत, यह अपराध कैसे: कार्रवाई पर लगाई रोक

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (25 जनवरी 2024) को समाजवादी पार्टी के नेता एवं उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य स्वामी प्रसाद मौर्या के ऊपर चल रही कार्रवाई पर रोक लगा दी है। मौर्या के खिलाफ उत्तर प्रदेश में रामचरितमानस पर विवादित बयान देने के कारण कई मामले दर्ज किए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इन्हीं मामलों में उन्हें राहत दी है।

सुप्रीम कोर्ट में स्वामी प्रसाद मौर्या की तरफ से उनके खिलाफ दर्ज FIR रद्द करने की माँग की गई थी। इस पर सुनवाई करते हुए जस्टिस बीआर गवई ने कहा, “आप इतने संवेदनशील क्यों हैं?” उनके साथ ही इस मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस संदीप मेहता ने कहा, “यह तो सिर्फ रामचरितमानस की व्याख्या का मामला है। सीधे और साफ़ तौर पर। यह अपराध कैसे है?”

इसके जवाब में उत्तर प्रदेश सरकार के वकील ने कहा कि उनके बयान के बाद रामचरितमानस की प्रतियाँ जलाई जा रही हैं। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि स्वामी प्रसाद मौर्या इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं। इसी के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ कार्रवाई पर रोक लगा दी। इससे पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट में उन्होंने FIR रद्द करने की याचिका डाली थी, लेकिन हाई कोर्ट ने उसे खारिज कर दिया था।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रामचरितमानस जलाए जाने का प्रथम दृष्टया जिम्मेदार मौर्या के बयानों को माना था। बता दें कि मौर्या ने जनवरी 2023 में प्रतापगढ़ में तुलसीदास रचित रामचरितमानस पर विवादित बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि भले ही वो सभी धर्मों का सम्मान करते हैं, लेकिन जाति के नाम पर जो भी विशेष वर्ग को अपमानित करे उस पर आपत्ति जताते हैं।

स्वामी प्रसाद मौर्या ने रामचरितमानस का नाम लेते हुए था कहा कि अब करोड़ों लोग इस किताब को नहीं पढ़ते हैं, क्योंकि इसमें सब बकवास लिखा गया है। स्वामी प्रसाद ने रामचरितमानस के कुछ हिस्से को आपत्तिजनक बताते हुए सरकार से उसे हटाने की माँग की थी। उन्होंने आगे कहा था कि अगर वो अंश ना हट पाए तो पूरी किताब को ही बैन कर देना चाहिए।

मौर्या ने यहाँ तक कहा था कि वह रामचरितमानस को धर्मग्रंथ मानते ही नहीं हैं, क्योंकि इस किताब को तुलसीदास ने अपनी खुद की ख़ुशी के लिए लिखा था। स्वामी प्रसाद ने आरोप लगाया था कि रामचरितमानस में कुछ ऐसी चौपाइयाँ हैं, जिनमें शूद्रों को अधम होने का सर्टिफिकेट दिया गया है। उन्होंने उन चौपाइयों को एक वर्ग के लिए गाली जैसे बताया था।

स्वामी प्रसाद मौर्या ने कहा था कि रामचरितमानस के हिसाब से ब्राह्मण कितना गलत करे वो पूजनीय है और शूद्र कितना भी सही करे वो अपमान का अधिकारी होता है। उनके इस बयान के बाद लखनऊ में उनके समर्थकों ने रामचरितमानस की प्रतियाँ जलाई थीं। यह भी सामने आया था कि प्रतियाँ जलाने में मुस्लिम भी शामिल थे।

रामचरितमानस की प्रतियाँ जलाने की घटना सामने आने के बाद उत्तर प्रदेश पुलिस ने कार्रवाई की थी। इसमें कुछ लोगों की गिरफ्तारी भी हुई थी। रामचरितमानस जलाने के बाद उत्तर प्रदेश में कई जगह पर स्वामी प्रसाद मौर्य के खिलाफ FIR दर्ज करवाई गई थी। इन FIR से बचने के लिए स्वामी प्रसाद मौर्य कोर्ट के चक्कर काट रहे हैं।

‘उस दिन गोली भी चलती तो नहीं बचता ढाँचा’: 6 दिसंबर के उस चश्मदीद से जानिए क्या-कब-कैसे हुआ जिसे CBI ने सबसे पहले किया था गिरफ्तार

अयोध्या में रामजन्मभूमि पर नवनिर्मित मंदिर में भगवान रामलला की मूर्ति का 22 जनवरी 2024 को प्राण प्रतिष्ठा भव्य तरीके से संपन्न हुआ। इस दिन देश और दुनिया भर के हिन्दुओं ने अपनी-अपनी जगह पर दीवाली मनाई। 500 वर्षों के संघर्ष के बाद आए इस दिन के पीछे अनगिनत रामभक्तों का बलिदान और त्याग है। उसमें से कई वीरगति को प्राप्त हो चुके हैं जबकि कुछ आँखों देखी घटना को बताने के लिए आज जीवित हैं। उन जीवित रामभक्तों में से एक हैं रामजी गुप्ता। रामजी गुप्ता 6 दिसंबर 1992 में विवादित ढाँचे के ध्वंस के बाद CBI द्वारा गिरफ्तार किए गए पहले कारसेवक हैं।

अयोध्या में मौजूद ऑपइंडिया की टीम ने रामजी गुप्ता से मिलकर तब और अब के हालातों के बारे में जानकारी ली। रामजी गुप्ता मूल रूप से पहले फैज़ाबाद और अब अम्बेडकरनगर जिले के मुस्लिम बहुल इलाके टांडा के निवासी हैं। रामजी गुप्ता युवा अवस्था में ही विश्व हिन्दू परिषद (VHP) से जुड़ गए थे। रामजी गुप्ता का कभी टांडा में हैंडलूम का बड़ा कारोबार हुआ करता था। इनका परिवार अभी भी कस्बे के प्रतिष्ठित व्यापारियों में गिना जाता है।

हाँ ध्वंस के दौरान मैं वहाँ मौजूद था

रामजी गुप्ता की उम्र 70 वर्ष से अधिक हो चुकी है। इसके बावजूद वो पूरी तरह से फिट हैं। उन्होंने हमें बताया कि साल 1990 की कारसेवा में वे भी मौजूद थे। 6 दिसंबर 1992 को उन्होंने अपनी आँखों के आगे ढाँचा गिरते देखा था। उनका दावा है कि तब कारसेवकों के जोश के आगे शासन और प्रशासन सबको झुकना पड़ा था। विश्व हिन्दू परिषद की तरफ से रामभक्तों को सरयू से रेत लाकर विवादित ढाँचे पर चढ़ाने के निर्देश दिए गए थे। हालाँकि, बीच में कई रामभक्त जोश में आ गए और गुंबद कुछ घंटों में ढह गया।

कारसेवकों ने नहीं मानी किसी की भी बात

रामजी गुप्ता के मुताबिक, साल 1990 में रामभक्तों के नरसंहार का लोगों में गुस्सा था। तब प्रशासन ने विवादित ढाँचे के चारों तरफ लोहे के बैरिकेड किए थे। कुछ कारसेवकों ने विवादित ढाँचे को देखकर आक्रोश प्रकट किया। इस दौरान मौके पर मौजूद अन्य लोग भी आंदोलित हो उठे।

रामजी के अनुसार, VHP और RSS के पदाधिकारियों ने उनको रोकने की काफी कोशिश की, लेकिन वो नाकाम रहे। मौके पर मौजूद प्रशासन ने भी खुद को भीड़ के गुस्से के आगे पंगु पाया। उनका मानना है कि अगर पहले की तरह गोली भी चला दी गई होती तो भी विवादित ढाँचे का बच पाना लगभग नामुमकिन था। हालाँकि तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने गोली चलाने का आदेश देने से मना कर दिया था।

रामलला की मूर्ति खुले में कैसे छोड़ देता ?

रामजी गुप्ता के मुताबिक, 6 दिसंबर 1992 को शाम होते-होते लगभग तमाम कारसेवक विवादित ढाँचे को ध्वस्त करके चले गए थे। तब भगवान राम की मूर्ति खुले में पड़ी थी, जिसे सुरक्षा बलों ने घेर रखा था। ऐसे में रामजी गुप्ता ने अपने साथ मौके पर बचे कुछ साथियों संग एक अस्थाई तम्बू बनाया।

इसी तम्बू में भगवान राम की मूर्ति को कुछ स्थानीय साधु-संतों के साथ विधि-विधान से कड़ी सुरक्षा में स्थापित करवाया गया। यही वो तम्बू था जिसमें भगवान राम की विग्रह 1992 से 2024 तक रही थी। मूर्ति स्थापना के बाद रामजी गुप्ता और उनके साथी देर रात अपने-अपने घरों को चले गए। इस बीच कल्याण सिंह की सरकार गिर गई। फैज़ाबाद (अब अयोध्या) के जिलाधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को जिम्मेदार बताते हुए सस्पेंड कर दिया गया था।

CBI पकड़ कर ले गई लखनऊ

रामजी गुप्ता दावा करते हैं कि 11 दिसंबर 1992 को अचानक उनके टांडा स्थित घर पर CBI की टीम आ धमकी। इस टीम के साथ स्थानीय पुलिस भी मौजूद थी। CBI ने उन्हें पूछताछ के लिए अपने साथ चलने को कहा। उनको पहले तत्कालीन फैज़ाबाद जिला मुख्यालय लाया गया। यहाँ से टीम लखनऊ रवाना हो गई। लखनऊ में उनसे कई अधिकारियों ने लम्बी पूछताछ की। इस दौरान रामजी गुप्ता ने सब कुछ होना ‘भगवान राम की इच्छा’ बताया। आखिरकार रामजी गुप्ता को लखनऊ जिला कारागार भेज दिया गया।

महीने भर बाद हाईकोर्ट ने दे दी थी जमानत

रामजी गुप्ता ने हमें बताया कि CBI ने उनको एक मीडिया रिपोर्ट के आधार पर फ्रेम किया था। किसी वीडियो में उन्होंने विवादित ढाँचे को गिराए जाने की जिम्मेदारी खुद ले ली थी। वो जेल में भी भगवान का भजन करते रहे। रामजी गुप्ता ने अपनी जमानत के लिए हाईकोर्ट में अर्जी लगाई थी। हाईकोर्ट ने महज 1 माह बाद रामजी गुप्ता को जमानत दे दी थी। महज मीडिया के आगे जिम्मेदारी ले लेने की दलील और कोई ठोस सबूत न मिल पाने को हाईकोर्ट ने जमानत योग्य बताया था। तब से रामजी गुप्ता लगातार तारीखों पर अदालतों के चक्कर लगाते रहे।

सितंबर 2020 में सभी आरोपित हुए बरी

विवादित ढाँचे का केस लखनऊ सीबीआई कोर्ट में लगभग 27 वर्षों तक चला। इसी केस में लालकृष्ण आडवाणी, उमा भारती, साध्वी ऋतम्भरा, जय भगवान गोयल, विनय कटियार, कल्याण सिंह, महंत नृत्य गोपाल दास, चम्पत राय, मुरली मनोहर जोशी, साक्षी महराज, बृजभूषण शरण सिंह और सतीश प्रधान आदि नामजद आरोपित थे। रामजी गुप्ता केस में कुल 32 आरोपित शामिल थे।

रामजी गुप्ता के मुताबिक, उनके अलावा इस मामले में साक्षी महराज और बृजभूषण शरण सिंह की भी गिरफ्तारी हुई थी। सितंबर 2020 को इन सभी को पर्याप्त सबूतों के अभाव में लखनऊ की सीबीआई कोर्ट ने बरी कर दिया था। इस दौरान अदालत ने अपनी टिप्पणी में यह भी कहा था कि विवादित ढाँचे को गिराया जाना कोई पूर्व सुनियोजित घटना नहीं थी।

व्यापर में लाखों का घाटा, खुद के खर्च से लड़े मुकदमा

रामजी गुप्ता ने हमें बताया कि उनके कारखाने में अधिकतर मुस्लिम समुदाय के ही लोग मजदूरी करते थे। साथ ही उनका माल खरीदने के लिए भी अधिकतर मुस्लिम समुदाय के छोटे व्यापारी आते थे। जब उनको सीबीआई विवादित ढाँचे के ध्वंस केस में गिरफ्तार करके ले गई, तब कइयों ने उनके बकाया पैसे रोक लिए।

इसी के साथ ही मुस्लिम मजदूरों ने भी काम करने से मना कर दिया। 1992-93 को याद करते हुए रामजी ने कहा कि तब के समय में उनके परिवार को कारोबार में लगभग 50 लाख रुपए का घाटा हुआ था। मुकदमे से लेकर जमानत आदि का पूरा खर्च रामजी गुप्ता के परिजनों ने अपनी जेब से भरा था।

बचपन से ही किया कट्टरपंथ से संघर्ष

रामजी गुप्ता ने अपने बचपन को याद किया। उन्होंने कहा कि जब वो किशोरावस्था में थे तब से उनके टांडा बाजार में अक्सर साम्प्रदायिक तनाव हो जाया करते थे। 80 के दशक में एक घटना लव जिहाद को ले कर घटी थी। तब हालत दंगों जैसे बन गए थे जिसमें रामजी गुप्ता को भी हिन्दुओं को बचाने के लिए सक्रिय होना पड़ा था। रामजी गुप्ता ने हमें यह भी बताया कि वो आज भी 70 वर्ष की अवस्था में भी धर्म के लिए किसी भी प्रकार की कुर्बानी देने को तैयार हैं।

अब दुनिया को ब्रह्मोस पावर से लैस करेगा भारत: DRDO सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल का निर्यात करने को तैयार, कई देशों से डिमांड

मार्च 2024 तक सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस (BrahMos) का निर्यात शुरू हो जाने की उम्मीद है। पहली डिलिवरी फिलीपींस को की जाएगी। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने बताया है कि अगले 10 दिन में वह इस मिसाइल की ग्राउंड सिस्टम्स का निर्यात शुरू कर देगा। फिलीपींस के अलावा कई अन्य देशों ने भी इस मिसाइल को खरीदने में दिलचस्पी दिखाई है।

डीआरडीओ के अध्यक्ष डॉ. समीर वी कामत ने न्यूज एजेंसी ANI को बताया, “ग्राउंड सिस्टम को बहुत जल्द, अगले 10 दिनों में भेजा जाना चाहिए। उम्मीद है कि क्रूज मिसाइलें मार्च 2024 तक फिलीपींस चली जाएँगी। एडवांस्ड टोड आर्टिलरी गन सिस्टम (ATAGS) ने पहले ही सभी परीक्षण पूरे कर लिए हैं। मेरा अनुमान है कि 307 तोपों के लिए ऑर्डर इस वित्तीय वर्ष में 31 मार्च से पहले दिया जाना चाहिए।”

बता दें कि फिलीपींस ने ब्रह्मोस की खरीद को 2022 में मंजूरी दी थी। भारत और फिलीपींस के बीच यह सौदा लगभग 37.49 करोड़ डॉलर में तय हुआ था। ब्रह्मोस मिसाइल के लिए ये पहला विदेशी ऑर्डर है। इसके अलावा कुछ और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ ब्रह्मोस के एक्सपोर्ट पर बातचीत चल रही है।

फिलीपींस ने दक्षिण चीन सागर में चीन के साथ तनाव को देखते हुए इस मिसाइल को खरीदने का निर्णय लिया था। इन मिसाइलों की फिलीपींस सबसे पहले नौसेना के तटीय रक्षा रेजिमेंट में तैनाती करेगा।

डीआरडीओ द्वारा विकसित रक्षा उत्पादों को लेकर कामत ने बताया, “लगभग 4.94 लाख करोड़ रुपए कीमत के DRDO विकसित उत्पादों को या तो शामिल कर लिया गया है या उन्हें डीएसी (रक्षा अधिग्रहण काउंसिल) से एओएन (जरूरत की मंजूरी) मिली हुई है। अब पहले की तुलना में बहुत तेजी से विकास हो रहा है। मेरा अनुमान है कि बीते 5-7 साल में सशस्त्र बलों में शामिल किए गए प्रोडेक्ट की तुलना में 60% या 70% से अधिक प्रोडेक्ट शामिल होंगे। यह दर नाटकीय रूप से बढ़ने वाली है, जैसे-जैसे हम आगे बढ़ेंगे।”

कामत ने यह भी बताया कि एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) का इंजन विकसित करने के लिए सफ्रान (Safran) के साथ बातचीत चल रही है। हालाँकि साझेदारी को लेकर आखिरी फैसला अभी तक नहीं लिया गया है।

ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल बढ़ी हुई रेंज का परीक्षण

भारतीय भारतीय नौसेना ने 24 जनवरी 2024 को ही अपने जंगी जहाज से ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल का बढ़ी हुई रेंज (Extended Range) का कामयाब परीक्षण किया। मिसाइल के इस संस्करण में फायर पावर बढ़ाई गई है। इसकी स्टेल्थ (खुफिया) टेक्नोलॉजी को बेहतर किया गया है।

यह मिसाइल जंगी पोत से जमीन पर हमला करती है। अभी इसकी मारक क्षमता को 800 किलोमीटर से अधिक है। पहले नौसैनिक वर्जन मिसाइल की रेंज 200 किलोमीटर थी जिसे बीते साल बढ़ाकर 500 किलोमीटर किया गया था। अब इसकी रेंज बढ़कर 800 किमी तक जा पहुँची है।

बता दें कि भारत और रूस द्वारा मिलकर बनाए गए ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल सिस्टम को दुनिया के सबसे कामयाब मिसाइल कार्यक्रमों में से एक माना जाता है। ब्रह्मोस मिसाइल हवा में ही रास्ता बदलकर दुश्मन के चलते-फिरते टारगेट को बेधने में सक्षम है। ये मिसाइल 10 मीटर की ऊँचाई पर उड़ान भर सकती है, इसलिए दुश्मन के राडार से बच निकलती है। यही नहीं ये अमेरिका के टोमाहॉक मिसाइल से दोगुना तेज उड़ती है।