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‘ब्रीफकेस में अखिलेश यादव को भेजा गया मेरे भाई का सिर’: ऑपइंडिया से बोले नीरज मिश्रा के भाई, 2004 में सपाइयों से विवाद के बाद BJP बूथ एजेंट का मिला था शव

ब्राह्मण हितैषी होने की छवि गढ़ने की कोशिश कर रहे समाजवादी पार्टी के मुखिया और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का असली चरित्र समय-समय पर सामने आता रहा है। इस कथित ब्राह्मण प्रेम का इतिहास खूनी रहा है। कन्नौज के नीरज मिश्रा का नाम शायद बहुत से लोग नहीं जानते हों लेकिन नीरज वो शख्स थे जिन्होंने कभी अखिलेश यादव से टक्कर ली और 24 घंटों के भीतर उनकी सिर कटी लाश मिली थी। नीरज के भाई मुनीष मिश्रा ने ऑपइंडिया से बातचीत में अपने भाई की हत्या का सीधा आरोप अखिलेश यादव पर लगाया है।

आज तक नहीं मिला नीरज का कटा हुआ सिर

मामले की शुरुआत 5 मई 2004 से होती है, जब उत्तर प्रदेश के कन्नौज लोकसभा क्षेत्र में आम चुनाव के लिए मतदान हो रहा था। उस चुनाव में समाजवादी पार्टी की ओर से उम्मीदवार थे तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के बेटे अखिलेश यादव जबकि उनके मुकाबले में भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार रामानंद यादव मैदान में थे। ऑस्ट्रेलिया से पढ़ाई कर लौटे अखिलेश यादव के लिए यह पहला लोकसभा चुनाव था।

मतदान के दौरान कन्नौज के छिबरामऊ क्षेत्र के कसावां गाँव में स्थित बाबा हरिपुरी इंटर कॉलेज के बूथ पर स्थिति अचानक तनावपूर्ण हो गई। बूथ लूटने को लेकर भाजपा और सपा कार्यकर्ताओं के बीच तीखी बहस शुरू हुई जो जल्द ही हिंसा में बदल गई। इसी दौरान भाजपा के बूथ प्रमुख नीरज मिश्रा अचानक लापता हो गए।

अगले दिन यानी 6 मई 2004 को नीरज मिश्रा का धड़ ईशन नदी से बरामद किया गया जबकि उनका सिर कभी नहीं मिल सका। नीरज मिश्रा कसावां गाँव के ही निवासी थे और मतदान के दिन उसी बूथ पर तैनात थे, जहाँ विवाद हुआ था। इस हत्याकांड में आरोपियों के खिलाफ लंबी कानूनी लड़ाई चली। बाद में अदालत ने दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई लेकिन समय के साथ सभी आरोपी जमानत पर रिहा हो गए।

नीरज मिश्रा के परिजनों का आरोप था कि तत्कालीन सांसद से जुड़े लोग बूथ पर कब्जा करने के इरादे से वहाँ पहुँचे थे। जब नीरज मिश्रा ने पोलिंग बूथ पर कब्जा करने का विरोध किया, तो दोनों पक्षों के बीच धक्का-मुक्की शुरू हो गई। आरोप है कि इसी दौरान नीरज ने एक नेता को धक्का दे दिया जिसके बाद उनके साथ मौजूद लोगों ने नीरज मिश्रा को जबरन उठा लिया। अगले दिन उनकी बिना सिर की लाश मिली।

अखिलेश यादव ने कराई मनीष की हत्या: ऑपइंडिया से बोले मुनीष मिश्रा

मुनीष मिश्रा ने अपनी भाई की भयावह हत्या को लेकर ऑपइंडिया के अर्पित त्रिपाठी से बातचीत की है। मुनीष ने बातचीत में ही कहा, “अखिलेश ने भाई का सर कटवा दिया था।” मुनीष बताते हैं “कसावा गाँव में बूथ था और नीरज मिश्रा भाजपा के बूथ एजेंट थे। पहले वहाँ आसपास के यादव गाँवों के लोग भी वोट डालने आते थे लेकिन अब वो बूथ हटा दिया गया है।”

इस पूरे घटनाक्रम को लेकर मुनीष मिश्रा ने विस्तार से बताया, “अखिलेश जी ने बटेला, जाफराबाद आसपास की पोलिंग लूटते हुए कसावा में 25-30 गाड़ियों के काफिले से साथ एंट्री ली। एक पीठासीन अधिकारी से बदतमीजी की गई जिस पर उन्होंने रिएक्ट कर दिया। (अखिलेश यादव ने) रुतबे में एक आदमी को हाथ मार दिया। मेरे भाई ने उसका विरोध किया और उनकी अखिलेश यादव से धक्का मुक्की हो गई।”

‘जिंदा या मुर्दा- नीरज मिश्रा मुझे चाहिए’

मुनीष ने आगे कहा, “धक्का-मुक्की ज्यादा हुई तो युवराज को ये नागवार गुजरा कि किसी ने मेरे हाथ क्यों लगा दिया। पुलिस बल, सीईओ, उमाशंकर यादव इंस्पेक्टर इनके साथ चल रहा था। यह इतना बौखला गया कि अखिलेश यादव ने वहीं से अपने पिताजी को फोन किया और चिल्ला कर कहा कि नीरज मिश्रा मुझे जिंदा या मुर्दा चाहिए।”

भाई की हत्या को लेकर मुनीष बताते हैं, “शाम को जैसे ही पोलिंग खत्म हुई तो इन्होंने (सपा कार्यकर्ताओं) तांडव शुरू किया। हमारा खेती-बाड़ी देखने वाले एक बसपा कार्यकर्ता के घर तोड़-फोड़ कर दी। उसकी माताजी मौके पर थी, महिलाओं के सामने अभद्रता की। इन कार्यकर्ताओं ने उनकी योनि में पंखे की डंडी डाल दी।” उन्होंने कहा, “इसके बाद फायरिंग में एक सपा कार्यकर्ता मारा गया। जिसमें नीरज का कहीं कोई इन्वॉल्वमेंट नहीं था।”

सपा कार्यकर्ताओं ने नीरज की बेरहमी से क्रूरतम हत्या कर दी: मुनीष

मुनीष ने आगे कहा, “इसके बाद फिर इन्होंने हमारे घर पर चढ़ाई की। नीरज ट्यूबवेल की तरफ निकल गया। वो अकेला था, निहत्था था और सिपाही ने उसकी घेराबंदी कर दी। नीरज मिश्रा को पुलिसवालों ने पकड़ा और बाद में सपा के कार्यकर्ताओं को दे दिया। फिर वो अपने गाँव की तरफ मारते-पीटते, बाद में घसीटते हुए ले गए। और बेरहमी से सपा के कार्यकर्ताओं ने क्रूरतम, निर्मम तरीके से उसकी मारते-मारते हत्या कर दी।”

मुनीष ने अपनी बातचीत में हत्या करने वालों में मुख्य तौर पर अशोक यादव, अवनीश यादव, राम शरण उर्फ मुन्नू सिंह, पप्पू सिंह, सुनील यादव और राम विलास यादव का नाम लिया। उन्होंने कहा, “ये अखिलेश के बिल्कुल राइट आर्म थे। अखिलेश से फोन से बात हो रही थी। आसपास लोगों की हिम्मत नहीं पड़ी किसी की भी उनसे बोलने की। क्योंकि पूरे जनपद की फोर्स चल रही थी। मारने के बाद सीओ ने इंस्पेक्टर से कहा कि इसको अब तुम लाश गायब कर दो और फिर हम देख लेंगे।”

मुनीष ने आगे कहा, “इन लोगों ने उसका सिर काट दिया और अखिलेश को खुश करने के लिए सिर को अपने पास रख लिया। सिर कटे शव को नदी में डाल दिया। जब शव मिला तो सपा के कार्यकर्ता लाश छीनने के लिए आगे बढ़े क्योंकि ये लाश गायब करना चाहते थे ताकि केस खत्म हो जाए। सिर आज तक नहीं मिला वो ब्रीफकेस में रख के अखिलेश यादव के पास लखनऊ भेजा गया था। 10 साल तक केस लड़ते रहे और 2014 में अशोक, अवनीश और मुन्नू, पप्पू-विलास को आजीवन कारावास हुआ।”

कोर्ट केस लड़ते वक्त भी मुनीष को धमकियाँ मिलती रहीं, उन्हें झूठे मुकदमे तक में फँसाया गया। मुनीष ने बताया कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सत्ता संभालने के बाद उन्हें बुलाया और सुरक्षा के लिए उन्होंने गनर दिया है।

‘किसी ने नहीं सुना क्योंकि हमारा सच असुविधाजनक था’: क्या है उन्नाव रेप केस जिसमें कुलदीप सेंगर की रिहाई पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक, क्यों एक बेटी ने लिखा- थकी हूँ, डरी हूँ

सुप्रीम कोर्ट ने 2017 के उन्नाव रेप केस में उत्तर प्रदेश के पूर्व MLA कुलदीप सिंह सेंगर को जमानत देने के दिल्ली हाई कोर्ट के फ़ैसले पर रोक लगा दी। 29 दिसंबर 2025 को सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की खंडपीठ ने हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सीबीआई की अपील पर सुनवाई करते हुए यह रोक लगाई।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि इस मामले में कई सवाल उठ रहे हैं। कोर्ट ने देखा कि प्रोटेक्शन ऑफ़ चिल्ड्रन फ़्रॉम सेक्सुअल ऑफ़ेंस (POCSO) एक्ट के सेक्शन 5 के तहत ‘पब्लिक सर्वेंट’ शब्द का दिल्ली हाई कोर्ट का मतलब गलत हो सकता है। कोर्ट ने कहा कि इस तरह के मतलब से लेजिस्लेटर गंभीर सेक्सुअल असॉल्ट के नियमों के तहत जिम्मेदारी से बच सकते हैं।

दिल्ली हाई कोर्ट के बेल ऑर्डर पर रोक लगाते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने सेंगर को नोटिस जारी किया और निर्देश दिया कि उसे जेल से रिहा न किया जाए। बेंच ने कहा, “हमें पता है कि जब किसी दोषी को रिहा किया जाता है, तो ऐसे ऑर्डर पर आमतौर पर रोक नहीं लगाई जाती है। लेकिन खास बातों के मद्देनजर हम 23 दिसंबर के हाई कोर्ट के ऑर्डर पर रोक लगाते हैं।” खास बात यह है कि सेंगर को बेल तो मिल गई, लेकिन दूसरे मामलों में शामिल होने की वजह से वह जेल में ही रहा।

CBI की तरफ से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि हाई कोर्ट ने यह मानकर गलती की कि POCSO एक्ट के सेक्शन 5(c) के तहत अपराध नहीं बनता, क्योंकि सेंगर पब्लिक सर्वेंट नहीं था। उन्होंने बताया कि सेंगर MLA के तौर पर पब्लिक ट्रस्ट की पोजीशन पर था और उसे पीड़िता के पिता की मौत के लिए पहले ही दोषी ठहराया जा चुका था। SG मेहता ने POCSO एक्ट के सेक्शन 42A का भी जिक्र किया।

सेंगर की तरफ से सीनियर वकील सिद्धार्थ दवे और एन हरिहरन ने हाई कोर्ट के आदेश का बचाव करते हुए कहा कि सजा सिर्फ इसलिए दी गई क्योंकि ट्रायल कोर्ट ने उन्हें पब्लिक सर्वेंट के तौर पर वर्गीकृत किया था। और ऐसा वर्णीकरण कानूनी तौर पर शक के दायरे में आता है।

सेंगर के परिवार ने कोर्ट के आदेश पर निराशा जताई

मीडिया से बात करते हुए, सेंगर की बेटी ऐश्वर्या सेंगर ने कहा कि वे “केस के मेरिट पर बहस भी शुरू नहीं कर सकते”। उन्होंने बताया कि केस में विक्टिम ने कई बार अपना बयान बदला था और तीन मौकों पर कहे गए क्राइम का समय बदला था।

उन्होंने कहा, “आज हम केस के मेरिट पर बहस भी शुरू नहीं कर पाए, कि उसने कई बार अपना बयान बदला है, तीन बार टाइम बदला है, दोपहर 2 बजे से शुरू करके, शाम 6 बजे और फिर आखिर में रात 8 बजे। AIIMS मेडिकल बोर्ड ने कहा है कि वह 18 साल से ज्यादा की थी… मैं पिछले 8 सालों से इंसाफ़ के लिए लड़ रही हूँ, लेकिन शायद मेरे और मेरे परिवार के दुखों का कोई मतलब नहीं है। हमसे हमारी इज्जत, हमारी शांति और यहाँ तक कि सुने जाने का हमारा बुनियादी हक भी छीन लिया गया है। अभी भी इंसाफ की उम्मीद है। मैं मीडिया से आग्रह करती हूँ कि कोई गलत जानकारी न फैलाए।”

सेंगर की दूसरी बेटी, इशिता ने भी एक पब्लिक स्टेटमेंट जारी करके पिछले आठ सालों में केस पर कोर्ट और पब्लिक के रिस्पॉन्स से अपनी परेशानी और निराशा जाहिर की। उन्होंने कहा कि उनका परिवार चुप रहा, इंस्टीट्यूशन और सही प्रोसेस पर भरोसा किया, लेकिन उसे लगातार धमकियाँ मिली। सोशल मीडिया पर मौत और रेप तक की धमकियाँ दी गई।

उन्होंने अपने परिवार पर पड़े आर्थिक, सामाजिक और इमोशनल असर के बारे में बताया। उसके मुताबिक पब्लिक प्रेशर में सबूतों और कानूनी प्रक्रिया को दबा दिया गया। उन्होंने अधिकारियों से बगैर किसी दबाव के कानून के मुताबिक काम करने की अपील करते हुए अपनी बात खत्म की। साथ ही कोर्ट पर अपना भरोसा जताया।

हाई कोर्ट ने गंभीर अपराध न होने का हवाला देते हुए जमानत दी

इससे पहले 23 दिसंबर 2025 को, दिल्ली हाई कोर्ट ने सेंगर की उम्रकैद की सजा सस्पेंड कर दी थी और अपील पेंडिंग रहने तक उन्हें सशर्त जमानत दे दी थी। जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद और जस्टिस हरीश वैद्यनाथन शंकर की डिवीजन बेंच ने फैसला सुनाया कि सेंगर POCSO एक्ट के सेक्शन 5(c) के तहत ‘पब्लिक सर्वेंट’ की परिभाषा में नहीं आते, जो पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट के अपराध को बढ़ाता है।

दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि POCSO एक्ट के सेक्शन 2(2) के अनुसार, डेफिनिशन इंडियन पीनल कोड (IPC), CrPC, जुवेनाइल जस्टिस एक्ट या IT एक्ट से ली जानी चाहिए और IPC के सेक्शन 21 के तहत, एक MLA को पब्लिक सर्वेंट नहीं माना जाता है।

इस आधार पर कोर्ट ने माना कि सेक्शन 5 के तहत गंभीर अपराध लागू नहीं होता है। इसके अलावा, कुलदीप सिंह सेंगर पहले ही 7 साल और 5 महीने से ज़्यादा कस्टडी में बिता चुका है, जो सेक्शन 4 POCSO के तहत बेस अपराध के लिए कम से कम 7 साल की सज़ा से ज़्यादा है, इसलिए अपील पेंडिंग रहने तक बेल दिया जा सकता है।

गौरतलब है कि दिल्ली हाई कोर्ट ने उसे बेल तो दे दी, लेकिन किसी भी अपराध से बरी नहीं किया। उसे केस की टेक्निकैलिटी के आधार पर बेल दी गई थी, मेरिट के आधार पर नहीं।

सोशल मीडिया पर आरोप और गड़बड़ियों के दावे

कई सोशल मीडिया यूजर्स और कमेंट करने वालों ने उन्नाव रेप केस में कथित गड़बड़ियों को लेकर चिंता जताई है, और दावा किया है कि कुलदीप सिंह सेंगर को शायद गलत तरीके से फँसाया गया है। इन दावों में कोर्ट के रिकॉर्ड और मीडिया रिपोर्ट्स से लिए गए कई पॉइंट्स का हवाला दिया गया है।

एक बात जो उठाई गई है, वह है घटना के कथित समय में अंतर। कोर्ट के डॉक्यूमेंट्स में बताई गई समरी के अनुसार, पीड़िता ने घटना के तीन अलग-अलग समय बताए हैं, 17 अगस्त 2017 को मुख्यमंत्री को लिखे लेटर में दोपहर 2:00 बजे, 12 सितंबर 2017 को मीडिया इंटरव्यू में शाम 6:00 बजे, और प्रॉसिक्यूशन की थ्योरी में रात 8:00 बजे से 8:30 बजे के बीच।

एक और मुद्दा पीड़िता की उम्र को लेकर है। स्कूल एडमिशन रजिस्टर और मेडिकल राय सहित अलग-अलग सोर्स से जमा किए गए डॉक्यूमेंट्स में उसकी जन्मतिथि 17 अगस्त 2001, 5 जुलाई 1998 और अगस्त 2002 दर्ज है। RML हॉस्पिटल, CMO उन्नाव और AIIMS के मेडिकल असेसमेंट से पता चलता है कि कथित अपराध के समय उसकी उम्र 18 साल से ज़्यादा थी, जबकि स्कूल रिकॉर्ड और कोर्ट की गवाही से पता चलता है कि वह नाबालिग थी।

यूज़र्स ने सर्वाइवर की रिपोर्टिंग की टाइमलाइन के आधार पर आरोपों की क्रेडिबिलिटी पर भी सवाल उठाए हैं। यह देखा गया है कि उसने कथित घटना की तुरंत रिपोर्ट नहीं की और बाद में अपनी कंप्लेंट में नए नाम जोड़े, जिनमें से कुछ को बाद में यह कहकर हटा दिया गया कि उसे वकीलों ने ‘गुमराह’ किया था।

एक अलग वायरल दावे से पता चलता है कि एक महिला आरोपी का नाम बाद में बयान में डाला गया था, जिसमें कैरेट मार्क का इस्तेमाल करके ‘बराबर’ शब्द शामिल किया गया था। इसका मतलब है कि मुख्य आरोपी से मेल खाने के लिए उसकी भूमिका को बदला गया था। आलोचकों का तर्क है कि इस तरह की एडिटिंग से आरोप तय करने के तरीके पर सवाल उठते हैं।

जमानत आदेश के खिलाफ विरोध प्रदर्शन

23 दिसंबर 2025 को कुलदीप सेंगर को जमानत देने के दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले के बाद नई दिल्ली में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। उन्नाव पीड़िता की माँ और ऑल-इंडिया डेमोक्रेटिक विमेंस एसोसिएशन (AIDWA) के सदस्यों सहित लगभग 30 कार्यकर्ताओं ने हाई कोर्ट के बाहर 26 दिसंबर को प्रदर्शन किया। उनके हाथों में तख्तियां थीं और वे ‘बलात्कारियों को बचाना बंद करो’ जैसे नारे लगा रहे थे।

इंडियन यूथ कॉन्ग्रेस (IYC) ने जमानत आदेश की निंदा करते हुए एक कैंडललाइट मार्च निकाला। 27 दिसंबर को एक्टिविस्ट योगिता भयाना और कांग्रेस लीडर मुमताज पटेल ने पार्लियामेंट के पास एक धरना दिया। उन्हें पुलिस हिरासत में भी लिया गया। अधिकारियों ने उस इलाके को नॉन-परमिटेड प्रोटेस्ट जोन घोषित कर दिया है।

सेंटर फॉर स्ट्रगलिंग वीमेन, प्रगतिशील महिला संगठन, और ऑल इंडिया महिला सांस्कृतिक संगठन समेत कई महिला अधिकार संगठनों ने 28 दिसंबर को स्टूडेंट ग्रुप्स के साथ जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन किया। उन्नाव पीड़िता और उसकी माँ भी इसमें शामिल हुईं।

उन्नाव केस टाइम लाइन

2017 – शुरुआती आरोप और FIR

4 जून 2017 को, माखी गाँव की एक 17 साल की लड़की ने दावा किया कि सेंगर ने नौकरी दिलाने के बहाने उसे अपने घर पर बुलाकर उसके साथ रेप किया। उसने दावा किया कि सेंगर ने उसे मुंह न खोलने की धमकी दी। 11 से 20 जून 2017 के बीच, कथित तौर पर पीड़िता को अगवा कर लिया गया और स्थानीय लोगों ने उसके साथ गैंगरेप किया। 20 जून को IPC की धारा 363, 366 और 376 के तहत आरोपितों पर FIR दर्ज की गई। FIR में सेंगर का नाम नहीं था।

अगस्त 2017 में पीड़िता ने सेंगर के खिलाफ शिकायत दर्ज करने की कोशिश की। पुलिस ने कथित तौर पर उसका नाम शामिल करने से इनकार कर दिया। फरवरी 2018 में उसने सेंगर का नाम आरोपित के तौर पर शामिल करने के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

2018 – कस्टोडियल डेथ और CBI जांच

3 अप्रैल 2018 को, पीड़िता के पिता को सेंगर के भाई अतुल और दूसरों ने पीटा। 5 अप्रैल को, पिता को आर्म्स एक्ट के झूठे आरोपों में जेल भेज दिया गया। जाँच के दौरान पता चला कि पीड़िता के पिता के पास मिली देसी पिस्तौल प्लांट की हुई थी। 8 अप्रैल को पीड़िता ने विरोध में मुख्यमंत्री के घर के बाहर खुद को आग लगाने की कोशिश की।

9 अप्रैल को, उसके पिता की ज्यूडिशियल कस्टडी में मौत हो गई। पोस्टमॉर्टम में चोट के 14 निशान मिले। 10 अप्रैल को, अतुल सेंगर को गिरफ्तार किया गया और इस मामले ने पूरे देश का ध्यान खींचा। 12 अप्रैल को ये मामला CBI को सौंप दिया गया, जिसने कुलदीप सेंगर के खिलाफ FIR दर्ज की।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने देरी की आलोचना की और उनकी गिरफ्तारी का आदेश दिया। 13 अप्रैल को सेंगर को CBI ने गिरफ्तार कर लिया। 15 अप्रैल को लड़की को सेंगर के घर ले जाने के आरोप में शशि सिंह को गिरफ्तार किया गया। 18 अप्रैल को, पीड़िता ने मजिस्ट्रेट के सामने अपना बयान दर्ज कराया; पीड़िता की उम्र विवाद का मुद्दा बन गई।

2018 – चार्जशीट और ट्रायल

11 जुलाई 2018 को CBI ने सेंगर और शशि सिंह के खिलाफ रेप और किडनैपिंग के लिए चार्जशीट फाइल की। ​​13 जुलाई को पीड़िता के पिता की कस्टोडियल डेथ के मामले में दूसरी चार्जशीट फाइल की गई। इसमें अतुल सेंगर और दूसरों का नाम भी था।

2019 – सुप्रीम कोर्ट का दखल और सजा

28 जुलाई 2019 को पीड़िता और उसके परिजन कार दुर्घटना में बुरी तरह घायल हुए। दो रिश्तेदारों की मौत भी इस दुर्घटना में हो गई। पीड़िता और उसका वकील गंभीर रूप से घायल हो गए। 29 जुलाई को, सेंगर और दूसरों के खिलाफ मर्डर और साज़िश के लिए FIR दर्ज की गई।

31 जुलाई को, सुप्रीम कोर्ट ने सभी संबंधित केस दिल्ली ट्रांसफर कर दिए और पीड़िता और उसके परिवार के लिए CRPF प्रोटेक्शन का ऑर्डर दिया। 5 अगस्त 2019 को, दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट में रेप का ट्रायल शुरू हुआ। 11 सितंबर को, पीड़िता ने AIIMS हॉस्पिटल में एक स्पेशल इन-कैमरा हियरिंग में गवाही दी।

16 दिसंबर 2019 को, सेंगर को IPC और POCSO के तहत नाबालिग से रेप का दोषी ठहराया गया। 20 दिसंबर 2019 को सैंगर को उम्रकैद की सजा सुनाई गई और 25 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया।

2020 – हिरासत में डेथ का दोषी

4 मार्च 2020 को सेंगर और दूसरों को कस्टोडियल डेथ केस में गैर-इरादतन हत्या का दोषी ठहराया गया। 13 मार्च 2020 को इस मामले में भी 10 साल जेल की सज़ा सुनाई गई।

2021-2024 – अपील और सुरक्षा

सेंगर इस दौरान जेल में ही रहा। कई जमानत अर्जी खारिज कर दी गईं। पीड़िता अपने परिवार के साथ CRPF प्रोटेक्शन में रहती रही। 23 मई 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने पीड़िता के रिश्तेदारों की सिक्योरिटी कम करने की इजाजत दी, लेकिन निर्देश दिया कि पीड़ित की प्रोटेक्शन जारी रहनी चाहिए।

2025 – हाई कोर्ट बेल और सुप्रीम कोर्ट स्टे

23 दिसंबर 2025 को, दिल्ली हाई कोर्ट ने सेंगर की उम्रकैद की सजा सस्पेंड कर दी और उसे बेल दे दी। कोर्ट ने कहा कि वह POCSO एक्ट के तहत पब्लिक सर्वेंट नहीं है और उसने काफी समय जेल में काटा है। कोर्ट ने तर्क दिया कि गंभीर जुर्म के प्रोविज़न उस पर लागू नहीं होते, और चूंकि वह पहले ही सात साल से ज़्यादा कस्टडी में बिता चुका था, जो एक्ट के सेक्शन 4 के तहत मिनिमम सज़ा से ज़्यादा था, इसलिए अपील पेंडिंग रहने तक बेल सही थी।

29 दिसंबर 2025 को, सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के ऑर्डर पर स्टे लगा दिया और जेल से उसकी रिहाई पर रोक लगा दी। बेंच ने POCSO के तहत लेजिस्लेटर को ‘पब्लिक सर्वेंट’ स्टेटस से बाहर रखने के कानूनी असर पर गंभीर चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि इस तरह के मतलब से लेजिस्लेटर को एग्रेवेटेड असॉल्ट के प्रोविज़न से छूट मिल सकती है और वह मामले की डिटेल में जाँच करने के लिए तैयार हो गया।

उन्नाव केस पर पूरे देश की नजर है। इसमें कानूनी कार्रवाई अभी भी चल रही है। दिल्ली हाई कोर्ट ने कुलदीप सेंगर को बेल दे दी है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने ऑर्डर पर रोक लगा दी है और मामले की डिटेल में सुनवाई करेगा। बेल ऑर्डर के बाद कई शहरों में प्रोटेस्ट हुए हैं। इस केस ने कानूनी और प्रोसेस से जुड़े सवाल खड़े किए हैं जो आगे कोर्ट के सामने आएँगे।

(ये लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

कोडिन कांड का सपा कनेक्शन: सिपाही आलोक के बाद अखिलेश यादव के पूर्व MLA का भी आया नाम, जानें- मास्टरमाइंड शुभम जायसवाल और उसके बाप ने कैसे खड़ा किया रैकेट

उत्तर प्रदेश के कोडिन युक्त कफ सिरप विवाद में बीते दिनों वाराणसी में पुलिस ने नई गिरफ्तारियाँ की हैं। वाराणसी पुलिस ने खुलासा किया कि गिरफ्तार किए गए 5 अभियुक्तों के जरिए 23 करोड़ रुपए का अवैध कारोबार किया गया है।

इस मामले में भी सेल कंपनियों के जरिए इस अवैध कारोबार को अंजाम दिया जा रहा था। ये सभी आरोपित अपने सरगना शुभम जायसवाल के इशारे पर फर्जी कंपनियाँ बनाकर पैसे और सिरप को रूट करते थे। कफ सिरप की तस्करी बांग्लादेश की जाती थी और पैसे को सोने और हवाला के माध्यम से बनारस लाया जाता था।

इसके अलावा मिर्जापुर पुलिस के द्वारा 25,000 रुपए के एक इनामी को गिरफ्तार किया गया है। गिरफ्त में आए आरोपी का नाम कृष्ण कुमार यादव है। इसकी मेसर्स सिटी मेडिसेल्स के जरिए दिल्ली की फर्मों से 4.5 लाख से ज्यादा 100ML वाला कोडिन युक्त कफ सिरप खरीदा गया। इसके अन्य साथियों को पुलिस पहले ही पकड़ चुकी है। कंपनियों के खातों की जाँच करने पर सामने आया कि इनसे 15 करोड़ रुपए का व्यापार किया जा चुका है।

मुख्यमंत्री का जीरो टॉलरेंस का आदेश

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश के पुलिस-प्रशासन को सीधा आदेश दिया हुआ है कि इस कोडिन युक्त कफ सिरप के कारोबार में शामिल किसी भी आरोपित को बख्शा नहीं जाना चाहिए। इसीलिए पुलिस के द्वारा पहले मुख्य आरोपितों पर नकेल कसी गई। अब पुलिस जिला स्तर पर ऑपरेट करने वाले गुनहगारों को भी पकड़ रही है। तेजी के साथ इस पूरे नेटवर्क पर नकेल कसी जा रही है।

कफ सिरप मामले का सपा कनेक्शन

इस मामले की जाँच करते हुए पुलिस के सामने समाजवादी पार्टी के पूर्व विधायक का जिक्र भी बार बार उठ रहा है। News18 की रिपोर्ट के अनुसार, STF अभी तक उस विधायक का नाम नहीं बता रही है लेकिन बताया जा रहा है कि वो पूर्व विधायक पूर्वांचल में समाजवादी पार्टी का बड़ा चेहरा है। सूत्रों के अनुसार, ED अभी उस विधायक के बैंक खातों और संपर्कों की जाँच कर रही है।

आपको याद होगा कि विधानसभा के शीतकालीन सत्र के दौरान जब समाजवादी पार्टी के नेताओं की तरफ से सदन में हंगामा किया गया तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तरफ से कफ सिरप कांड के एक मुख्य आरोपित आलोक सिंह (पूर्व सिपाही) का जिक्र किया गया था। मुख्यमंत्री ने कहा था कि आलोक सिपाही है, पक्का सपाई। सपा मुखिया अखिलेश यादव के साथ आलोक सिंह की एक तस्वीर सामने आने के बाद प्रदेश में मामला पहले से ही गरम था।

इसके बाद जब आलोक सिंह के पूर्व अपराधों की फाइल खुली तो 2006 में हुए 3 किलो सोने के लूटकांड का मामला भी उछल गया। 2006 में राज्य में मुलायम सिंह यादव की सरकार थी और आलोक सिंह की तैनाती लखनऊ क्राइम ब्रांच में थी। 19 सितंबर 2006 को प्रयागराज के एक व्यापारी ने उत्तर प्रदेश पुलिस के कई कर्मचारियों पर आरोप लगाया कि उन्होंने उसका 3 किलो सोना लूट लिया है। इसके बाद 2019 में लखनऊ में माफिया मुख्तार अंसारी के एक करीबी पर गोली चली तो आलोक सिंह का नाम भी सामने आया। इस मामले में तत्कालीन SSP कला निधि नैथानी ने आलोक सिंह को बर्खास्त कर दिया था।

अब STF की जाँच में एक और समाजवादी पार्टी के नेता का नाम उठने के बाद फिर से बहस शुरू हो गई है कि आखिर इस हजारों करोड़ के अवैध कारोबार के पीछे का असली मास्टरमाइंड कौन है? फिलहाल जाँच में सीधे तौर पर जो नाम सामने आ रहा है वो है शुभम जायसवाल का।

कौन है कोडिन युक्त सिरप मामले का मास्टरमाइंड शुभम जायसवाल?

शुभम जायसवाल वाराणसी का रहने वाला है और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से ग्रेजुएट करने के बाद अपने परिवार के कथित फार्मास्यूटिकल बिजनेस में उतरा था। ज्यादा पैसे कमाने के लालच में कोडिन युक्त कफ सिरप का नेटवर्क बनाया। 2018 के आसपास उसने पिता भोला प्रसाद के साथ दवा कारोबार को तेजी से फैलाया और 2022–23 में रांची की मेसर्स शैली ट्रेडर्स व वाराणसी की न्यू वृद्धि फार्मा जैसी 93 फर्मों के जरिए भारी मात्रा में कफ सिरप खरीदना शुरू किया। इसे कागजों पर उत्तर प्रदेश और दूसरे राज्यों में दिखाकर असल में बांग्लादेश, नेपाल व पूर्वी भारत के इलाकों में सप्लाई करने के आरोप हैं।

जाँच एजेंसियाँ के मुताबिक, शुभम ने फर्जी ड्रग लाइसेंस, शेल कंपनियाँ और फर्जी ई‑बिल बनवाकर करीब 100 करोड़ रुपए से ज्यादा कीमत की लाखों बोतलें रूट कराईं जिनसे कमाया गया पैसा हवाला और सोने के जरिए वापस बनारस लाया जाता था। इस मामले में शुभम के पिता भोला जायसवाल को भी STF के द्वारा गिरफ्तार किया गया है।

भोला जायसवाल खुद को सिर्फ साइनिंग अथॉरिटी बताकर सारी जिम्मेदारी बेटे और चार्टर्ड अकाउंटेंट पर डाल रहा है। इस पूरे मामले में शुभम पर कई जिलों में NDPS और आर्थिक धाराओं में केस दर्ज हैं, वह अभी फरार है और पुलिस, STF व ED उसे इस अवैध धंधे का मास्टरमाइंड बता रही हैं।

कौन है भोला प्रसाद जिसने 7000 की नौकरी की आड़ में बनाया हजारों करोड़ का कारोबार?

कोडिन कफ सिरप तस्करी के इस बड़े रैकेट में शुभम जायसवाल के पिता भोला प्रसाद ने फर्जी बिल और ड्रग लाइसेंसों के जरिए शेल कंपनियाँ बनाने का जाल बिछाकर मुख्य भूमिका निभाई है। भोला ने झारखंड में शैली ट्रेडर्स का गोदाम 3 लाख रुपए मासिक किराए पर लिया। इसके साथ-साथ ड्रग विभाग से लाइसेंस प्राप्त करने के लिए एक मेडिकल फर्म में मात्र 7000 रुपए प्रति माह की नौकरी का अपना एक नकली अनुभव प्रमाण-पत्र भी हासिल कर लिया।

इसी शैली ट्रेडर्स के जरिए अमित टाटा, आलोक सिंह सिपाही और अन्य आरोपितों ने फर्जी फर्में खड़ी कर उत्तर प्रदेश की 100 से ज्यादा फार्मों के माध्यम से कफ सिरप की फर्जी बिक्री दिखाकर तस्करी के अवैध कारोबार को चलता रहा। फिलहाल झारखंड में भोला प्रसाद के नाम पर दो FIR दर्ज हैं जिनमें फर्जी दस्तावेजों से गोदाम शुरू करने का खुलासा हुआ है।

दरअसल, भोला प्रसाद ने उस गोदाम को किराए पर हासिल कर लिया था जिसे रांची इंडस्ट्रियल अथॉरिटी ने भिलाई केमिकल्स के जगन्नाथ साहू को लीज पर दिया था। उसे अवैध रूप से किराए पर हासिल करके सरकारी संपत्ति का दुरुपयोग किया। राँची के दुर्गा हटिया थाने में ड्रग इंस्पेक्टर ने NDPS के तहत शुभम-भोला के खिलाफ FIR दर्ज कराई, जिसमें अमित सिंह, टाटा आलोक प्रताप सिंह की फर्मों समेत आठ अन्य फार्मों का जिक्र है। सोनभद्र SIT जांच में सामने आया कि शैली ट्रेडर्स के ज़रिए सिलीगुड़ी-दार्जिलिंग तक कोडिन सिरप की तस्करी हुई।

हालाँकि, मामला खुलने के बाद भोला प्रसाद खुद को केवल साइनिंग अथॉरिटी बताकर बचाना चाह रहा है। विदेश में छुपकर बैठे अपने बेटे शुभम जायसवाल के ऊपर सारे आरोपों को डाल देना चाह रहा है। लेकिन पुलिस की मंशा है कि सिरप को नशे का मध्यम बना देने वाले अपराधियों के पूरे नेक्सस को ही खत्म कर दिया जाए। ED की तरफ़ से फ़िलहाल जायसवाल परिवार की 30 करोड़ की संपत्ति को कुर्क करने की तैयारी की जा रही है।

शाहदरा में मुस्लिम शोहदों ने किया नाबालिग हिंदू लड़कियों से छेड़छाड़, विरोध करने पर बहनों-भाइयों को दौड़ा कर पीटा: जमकर किया पथराव, पढ़ें- FIR की अहम बातें

दिल्ली के शाहदरा जिले के फर्श बाजार इलाके में 27 दिसंबर 2025 की शाम एक दर्दनाक घटना हुई। बिहारी कॉलोनी के पास दो नाबालिग बहनें (एक 16 साल की और दूसरी 14 साल की) घर जा रही थीं। तभी एक 17 साल का नाबालिग मुस्लिम लड़का जुबैर (परिवर्तित नाम) उनके पास आया और अभद्र टिप्पणी करने लगा। लड़कियों ने इसका विरोध किया तो वह आक्रामक हो गया और उनके साथ धक्का-मुक्की शुरू कर दी। FIR की कॉपी ऑपइंडिया के पास मौजूद है, जिसमें सभी घटनाक्रम विस्तार से दर्ज हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, शोर सुनकर लड़कियों के दो चचेरे भाई (दोनों नाबालिग) मौके पर पहुँचे और बीच-बचाव करने की कोशिश की। लेकिन आरोपित ने फोन करके अपने दोस्तों को बुला लिया। देखते ही देखते आधा दर्जन लड़के वहाँ जमा हो गए। उन्होंने लाठी-डंडों और पत्थरों से बहनों के भाइयों पर हमला कर दिया। मारपीट इतनी जबरदस्त थी कि दोनों भाई घायल हो गए। हमलावरों ने गली में खड़ी एक स्कूटी और बाइक को भी तोड़ डाला। जब एक भाई जान बचाने के लिए पड़ोसी के घर में घुसा, तो बदमाशों ने उस घर पर भी पत्थरबाजी की।

स्थानीय लोग बताते हैं कि हमलावरों ने हत्या की धमकी भी दी और डंडे लहराते हुए भाग गए। सबसे दुखद बात यह कि इतनी बड़ी मारपीट हो रही थी, लेकिन आसपास के लोग डर के मारे आगे नहीं आए। कोई हिंदू युवकों को बचाने के लिए सामने नहीं आया। इलाके में डर का माहौल है।

लोग कहते हैं कि शाम होते ही कुछ लड़के गलियों में घूमते हैं और लड़कियों पर फब्तियाँ कसते हैं। विरोध करने पर मारपीट कर देते हैं। फर्श बाजार और बिहारी कॉलोनी जैसे इलाकों में मुस्लिम बहुल आबादी होने की वजह से कुछ लोग विशेष समुदाय के लड़कों का आतंक बताते हैं। लड़कियाँ अकेले निकलने से डरती हैं।

घटना की सूचना मिलते ही फर्श बाजार पुलिस मौके पर पहुँची। पीड़ित ने शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज देखकर तीन नाबालिग आरोपितों को पकड़ लिया। इनमें मुख्य आरोपित जुबैर (परिवर्तित नाम) भी शामिल है। उसके खिलाफ पहले से भी शिकायतें थीं। लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि सीसीटीवी में छह से ज्यादा लड़के दिख रहे हैं, जो लाठी-डंडे लेकर आए थे। पुलिस सिर्फ तीन नाबालिगों को पकड़कर मामले को निपटाने की कोशिश कर रही है। बड़े आरोपितों की तलाश अभी तक नहीं हुई।

एफआईआर नंबर 0645/2025 में भारतीय न्याय संहिता की कई धाराएँ लगाई गई हैं, जिनमें छेड़खानी, यौन शोषण, मारपीट, संपत्ति को नुकसान और आपराधिक धमकी शामिल है। घायल भाइयों को हेडगेवार अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ उनकी हालत स्थिर बताई जा रही है।

पुलिस उपायुक्त प्रशांत गौतम ने कहा कि सभी आरोपित नाबालिग हैं और कड़ी कार्रवाई की जा रही है। लेकिन इलाके के लोग असंतुष्ट हैं। वे कहते हैं कि नाबालिग बताकर ऐसे मामलों को हल्का कर दिया जाता है, जिससे बदमाशों का हौसला बढ़ता है।

यह घटना दिल्ली में महिलाओं की सुरक्षा पर बड़ा सवाल उठाती है। फर्श बाजार जैसे घनी आबादी वाले इलाकों में शाम के समय लड़कियाँ सुरक्षित नहीं महसूस करतीं। स्थानीय निवासियों का कहना है कि विशेष समुदाय के कुछ युवक अक्सर उत्पात मचाते हैं, लेकिन पुलिस कार्रवाई में ढिलाई बरतती है। सीसीटीवी फुटेज सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें हमलावरों की दबंगई साफ दिख रही है।

पाकिस्तान वाले साबरी ने नहीं, बॉलीवुड वाले साहिर लुधियानवी की लिखी है ‘न तो कारवाँ की तलाश है’, ‘धुरंधर’ से पहले ‘बरसात की रात’ में भी थी यह कव्वाली

बॉलावुड की ब्लॉक बस्टर फिल्म धुरंधर में जिस कव्वाली ‘न तो कारवाँ की तलाश है, न तो हमसफर की तलाश है’ का इस्तेमाल हुआ है, वह 1960 की हिंदी फ़िल्म ‘बरसात की रात’ में फिल्माई गई कव्वाली से मिलती है।

ऐपल म्यूजिक स्टोर के स्क्रीन शॉट से भी इसकी जानकारी मिलती है। फिल्मी दस्तावेजों और आधिकारिक क्रेडिट के अनुसार, ये गीत साहिर लुधियानवी ने लिखे थे और इसका संगीत रौशन ने दिया था। इस कव्वाली में कई गायक-गायिकाओं की आवाज हैं। इसे एक समूह-प्रस्तुति के रूप में रिकॉर्ड की गई थी। मन्ना डे, मोहम्मद रफी, आशा भोंसले, सुधा मल्होत्रा और एसडी बातिश शामिल थे। रिकॉर्ड्स के मुताबिक, यही इसका पहला प्रकाशित और व्यापक रूप से मान्यता प्राप्त फिल्मी वर्जन है।

इसी आधार पर कहा जाता है कि इस कव्वाली का आधिकारिक फिल्मी origin भारतीय सिनेमा और बॉलीवुड से जुड़ा है। संगीत कंपनियों, फ़िल्म आर्काइव्स में लेखक, संगीतकार और गायकों के नाम स्पष्ट रूप से दर्ज हैं। इसलिए जब ‘क्रेडिट किसे जाता है’ जैसे सवाल उठते हैं, तो ये 1960 की फिल्म ‘बरसात की रात’ को याद कर रहे हैं।

हालाँकि कव्वाली एक शास्त्रीय या निजी विधा नहीं है। यह सूफी परंपरा से निकली एक साझा और मौखिक संगीत परंपरा है। इसकी जड़ें पंजाब क्षेत्र में फैली हुई हैं। यही वजह है कि कुछ संगीत प्रेमी और इतिहासकार यह तर्क देते हैं कि ‘बरसात की रात’ की कव्वाली की धुन और भाव लाहौर-केंद्रित सूफी कव्वाली परंपरा से प्रेरित लगते हैं। अक्सर इस संदर्भ में मुबारक अली खान और फतह अली खान द्वारा 1950 के दशक में गाई गई कव्वाली ‘न तो बुतकदे की तलब मुझे’ का जिक्र किया जाता है। इस गाने को आमिर सावरी ने लिखा था।

लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण फर्क समझना ज़रूरी है। प्रेरणा या सांस्कृतिक समानता का दावा ऐतिहासिक चर्चा का विषय हो सकता है। हालाँकि अब तक ऐसा कोई ठोस, प्रकाशित ऑडियो या दस्तावेज उपलब्ध नहीं है, जो यह सिद्ध करे कि ‘न तो कारवाँ की तलाश है’ के पूरे बोल उसी रूप में 1960 से पहले रिकॉर्ड होकर जारी किए गए थे। इसलिए समानता को प्रमाण नहीं, बल्कि सांस्कृतिक प्रभाव के रूप में देखा जाता है। मौखिक परंपराओं में ऐसे प्रभाव आम होते हैं, लेकिन क्रेडिट तय करने के लिए दस्तावेजी साक्ष्य जरूरी हैं।

‘बरसात की रात’ का ये गाना सिर्फ कव्वाली भी नहीं है। लगभग 13 मिनट लंबा यह गीत सूफी और निर्गुण परंपरा से शुरू होकर भक्ति आंदोलन की ओर बढ़ता है। इसमें राधा-कृष्ण और मीरा की झलक मिलती है, फिर बुद्ध के बोधि वृक्ष तक पहुँचता है और आगे मसीह की करुणा का प्रतीक बनता है। और यही वजह है कि इसे गंगा-जमुनी तहजीब और भारत की बहुधार्मिक सांस्कृतिक चेतना का एक सिनेमाई दस्तावेज भी माना जाता है।

यद्यपि यह कव्वाली पाकिस्तान और पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में संगीत प्रेमियों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है, लेकिन इसका निर्माण और मूल भारत से ही है।

सार यही है कि यह कव्वाली सांस्कृतिक रूप से साझा विरासत का हिस्सा हो सकती है, क्योंकि सूफी संगीत की जड़ें आधुनिक भारत-पाकिस्तान की सीमाओं से पहले की हैं। लेकिन जब सवाल गीत की पैदाइश, लेखक और क्रेडिट का आता है, तो उपलब्ध ऐतिहासिक और फिल्मी रिकॉर्ड यह स्पष्ट करते हैं कि इसका प्रामाणिक, प्रकाशित और मान्यता प्राप्त 1960 में भारत में बनी फ़िल्म ‘बरसात की एक रात’ से ही सामने आता है। यही वजह है कि मौजूदा बहस में सांस्कृतिक साझेदारी को स्वीकार करते हुए भी आधिकारिक क्रेडिट भारतीय सिनेमा को दिया जाता है।

भारत को ब्लू इकोनॉमी का पावर हाउस बनाने की दिशा में मोदी सरकार का बड़ा कदम, ₹44000 करोड़+ से शिपबिल्डिंग पर फोकस: जानें- देश को मिलेगा क्या फायदा

भारत एक ऐसा देश है जिसकी 7,517 किलोमीटर लंबी तटरेखा है और तीन तरफ से समुद्र घिरा हुआ है। यहाँ की अर्थव्यवस्था में समुद्री व्यापार की बड़ी भूमिका है। लगभग 95 प्रतिशत विदेशी व्यापार समुद्र के रास्ते होता है। लेकिन अब तक भारत जहाज निर्माण में बहुत पीछे रहा है। इसे बढ़ाने के लिए मोदी सरकार ने ₹44700 करोड़ खर्च करने की तैयारी कर ली है।

वैश्विक स्तर पर जहाज निर्माण में चीन, दक्षिण कोरिया और जापान का दबदबा है और ये तीन देश मिलकर 95 प्रतिशत से ज्यादा जहाज बनाते हैं। भारत का हिस्सा सिर्फ 0.1 प्रतिशत से भी कम है और वैश्विक रैंकिंग में 20वें स्थान के आसपास है।

मोदी सरकार इसे बदलना चाहती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में सरकार ब्लू इकोनॉमी को मजबूत बनाने पर जोर दे रही है। ब्लू इकोनॉमी का मतलब है समुद्र के संसाधनों का टिकाऊ इस्तेमाल। जैसे मछली पकड़ना, बंदरगाह, जहाजरानी, समुद्री ऊर्जा, पर्यटन और जहाज निर्माण। इससे अर्थव्यवस्था बढ़ेगी, रोजगार बनेगा और पर्यावरण सुरक्षित रहेगा।

सरकार का लक्ष्य है कि 2047 तक भारत जहाज निर्माण में विश्व के टॉप-5 देशों में शामिल हो जाए। इसके लिए हाल ही में दो बड़ी योजनाओं के दिशानिर्देश जारी किए गए हैं, 1- शिपबिल्डिंग फाइनेंशियल असिस्टेंस स्कीम (SBFAS) और दूसरा – शिपबिल्डिंग डेवलपमेंट स्कीम (SbDS)। इन पर कुल 44,700 करोड़ रुपए खर्च होंगे।

केंद्रीय बंदरगाह, जहाजरानी और जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने कहा, “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की अगुवाई में जहाज निर्माण क्षेत्र को नई नीति मिली है। ये दिशानिर्देश पारदर्शी और स्थिर ढाँचा बनाएँगे, जिससे घरेलू जहाज निर्माण फिर से जीवित होगा। इससे मेक इन इंडिया को बल मिलेगा, बड़े निवेश आएँगे और विश्व स्तरीय क्षमता बनेगी। भारत विकसित भारत और आत्मनिर्भर भारत की राह पर एक बड़ी समुद्री राष्ट्र बनेगा।”

मोदी सरकार की दोनों योजनाओं की खास बातें

मोदी सरकार की SBFAS और SbDS योजनाएँ सितंबर 2025 में कैबिनेट से मंजूर 69,725 करोड़ रुपए के पैकेज का हिस्सा हैं। दिसंबर 2025 में इनके ऑपरेशनल गाइडलाइंस जारी हुए। दोनों योजनाएँ 31 मार्च 2036 तक चलेंगी और 2047 तक बढ़ाई जा सकती हैं।

शिपबिल्डिंग फाइनेंशियल असिस्टेंस स्कीम (SBFAS): इसका बजट 24,736 करोड़ रुपये है। इसमें भारतीय जहाज निर्माण कंपनियों को हर जहाज पर 15 से 25 प्रतिशत तक वित्तीय मदद मिलेगी। यह मदद जहाज के प्रकार पर निर्भर करेगी, जिसमें छोटे सामान्य जहाज, बड़े सामान्य या विशेष जहाज होंगे। सरकार की ओर से मदद चरणबद्ध तरीके से मिलेगी, स्टेप-दर-स्टेप काम पूरा होने के आधार पर। इसके साथ ही सीरीज ऑर्डर पर अतिरिक्त प्रोत्साहन भी दिया जाएगा।

  • एक नई सुविधा है शिपब्रेकिंग क्रेडिट नोट। अगर कोई पुराना जहाज भारतीय यार्ड में तोड़ा जाता है, तो मालिक को स्क्रैप वैल्यू का 40 प्रतिशत क्रेडिट मिलेगा। इसे नए जहाज बनाने में इस्तेमाल कर सकते हैं। इससे सर्कुलर इकोनॉमी को बढ़ावा मिलेगा और पुराने जहाज से नए बनेंगे।
  • अगले दशक में यह योजना 96,000 करोड़ रुपए के जहाज निर्माण प्रोजेक्ट सपोर्ट करेगी। इससे घरेलू विनिर्माण बढ़ेगा और लाखों रोजगार बनेगे।

शिपबिल्डिंग डेवलपमेंट स्कीम (SbDS): मोदी सरकार की इस योजना का बजट 19,989 करोड़ रुपये है। यह लंबे समय की क्षमता बनाने पर फोकस करती है। इसमें नए ग्रीनफील्ड जहाज निर्माण क्लस्टर बनेंगे। केंद्र और राज्य मिलकर 50:50 स्पेशल पर्पज व्हीकल बनाएँगे, जो सामान्य इंफ्रास्ट्रक्चर पर 100 प्रतिशत पूँजी मदद देगा।

  • पुराने ब्राउनफील्ड यार्ड्स को आधुनिकीकरण के लिए 25 प्रतिशत मदद मिलेगी, जैसे ड्राई डॉक, शिपलिफ्ट, फैब्रिकेशन सुविधाएँ और ऑटोमेशन अपनाने पर।
  • इंडियन मैरीटाइम यूनिवर्सिटी के तहत इंडिया शिप टेक्नोलॉजी सेंटर बनेगा, जो रिसर्च, डिजाइन, इनोवेशन और स्किल डेवलपमेंट करेगा।
  • क्रेडिट रिस्क कवरेज फ्रेमवर्क से प्री-शिपमेंट, पोस्ट-शिपमेंट और वेंडर डिफॉल्ट रिस्क पर सरकारी इंश्योरेंस मिलेगा। इससे प्रोजेक्ट आसानी से फाइनेंस हो सकेंगे।

इन योजनाओं से 2047 तक भारत की व्यावसायिक जहाज निर्माण क्षमता 4.5 मिलियन ग्रॉस टनेज प्रति वर्ष हो जाएगी। इससे रोजगार बढ़ेगा, स्वदेशी तकनीक विकसित होगी और समुद्री सुरक्षा मजबूत होगी।

ब्लू इकोनॉमी और जहाज निर्माण का महत्व

ब्लू इकोनॉमी भारत की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। फिलहाल यह जीडीपी में 4 प्रतिशत योगदान देती है, लेकिन संभावना बहुत ज्यादा है। सरकार का लक्ष्य है कि 2030 तक यह 1 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँचे। सागरमाला प्रोजेक्ट इसके केंद्र में है। सागरमाला से बंदरगाह आधुनिक हो रहे हैं, तटीय आर्थिक जोन बन रहे हैं और लॉजिस्टिक्स लागत कम हो रही है। अब तक 839 प्रोजेक्ट्स की पहचान हुई है, जिनकी लागत 5.8 लाख करोड़ रुपए है।

मैरिटाइम इंडिया विजन 2030 और अमृत काल विजन 2047 में जहाज निर्माण को प्रमुख स्थान दिया गया है। विजन 2030 में 150 से ज्यादा पहल हैं, जिन पर 3-3.5 लाख करोड़ निवेश होगा। अमृत काल विजन 2047 में 80 लाख करोड़ निवेश का प्लान है। इससे भारत टॉप-10 से टॉप-5 जहाज निर्माण देश बनेगा।

जहाज निर्माण के फायदे कई

आर्थिक विकास: जहाज निर्माण भारी इंजीनियरिंग की माँ (Mother of Heavy Engineering) कहलाता है। इससे स्टील, इलेक्ट्रॉनिक्स, इंजीनियरिंग जैसी सहायक इंडस्ट्रीज बढ़ती हैं। विदेशी जहाज खरीदने पर हर साल अरबों डॉलर खर्च होते हैं, इसे बचाया जा सकता है। निर्यात बढ़ेगा और व्यापार घाटा कम होगा।

रोजगार सृजन: ये योजनाएँ लाखों नौकरियाँ बनाएँगी, खासकर जहाज यार्ड में, सहायक उद्योगों में और स्किल डेवलपमेंट से। तटीय इलाकों में लोग लाभान्वित होंगे।

समुद्री सुरक्षा: स्वदेशी जहाज से नौसेना और कोस्ट गार्ड मजबूत होंगे। विदेशी निर्भरता कम होगी। भारतीय झंडे वाले जहाज बढ़ेंगे, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी है।

पर्यावरण और टिकाऊ विकास: योजनाओं में ग्रीन शिपिंग पर जोर है। हाइब्रिड, इलेक्ट्रिक या ग्रीन फ्यूल वाले जहाजों को ज्यादा मदद मिलेगी। इससे कार्बन उत्सर्जन कम होगा।

वैश्विक संदर्भ में भारत की स्थिति

विश्व में जहाज निर्माण तेजी से बढ़ रहा है। 2025 में ग्लोबल मार्केट 155 अरब डॉलर का है। चीन अकेला 50 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा रखता है, उसके बाद दक्षिण कोरिया और जापान। ये देश सब्सिडी, आधुनिक तकनीक और बड़े क्लस्टर से आगे हैं। भारत अब उसी रास्ते पर है- क्लस्टर बनाकर, फाइनेंशियल मदद देकर और रिस्क कवर देकर।

पहले भारत की क्षमता बहुत कम थी, सिर्फ 0.1 मिलियन ग्रॉस टनेज प्रति वर्ष। कोचिन शिपयार्ड और हिंदुस्तान शिपयार्ड जैसे सार्वजनिक यार्ड मुख्य थे, लेकिन व्यावसायिक जहाज कम बनते थे। अब निजी क्षेत्र भी सक्रिय हो रहा है।

शिप-बिल्डिंग के क्षेत्र में चुनौतियाँ

भारत के लिए इस राह में आगे बढ़ने को लेकर काफी चुनौतियाँ हैं, जिसमें लागत ज्यादा होना, पुरानी तकनीकी, स्किल की कमी और महँगा फाइनेंस, लेकिन मोदी सरकार की योजनाएँ इन समस्याओं को दूर करेंगी। इस काम में नेशनल शिपबिल्डिंग मिशन समन्वय करेगा। स्वतंत्र मूल्यांकन और मीलस्टोन बेस्ड पेमेंट से पारदर्शिता आएगी।

सरकार का विजन स्पष्ट है कि आत्मनिर्भर भारत में समुद्र महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। सागरमाला, डीप ओशन मिशन और पीएम मत्स्य संपदा योजना से ब्लू इकोनॉमी मजबूत हो रही है। जहाज निर्माण इसमें केंद्र है। अंत में ये योजनाएं सिर्फ जहाज बनाने की नहीं, बल्कि भारत को समुद्री महाशक्ति बनाने की हैं। इससे अर्थव्यवस्था बुलंद होगी, युवाओं को रोजगार मिलेगा और देश सुरक्षित रहेगा। 2047 तक विकसित भारत का सपना समुद्र से भी पूरा होगा।

हिंदू देवी-देवताओं पर आपत्तिजनक टिप्पणी कर ब्रेनवॉश, विरोध करने पर पैसे देकर चुप कराने की कोशिश: फतेहपुर में ईसाई धर्मांतरण का रैकेट ध्वस्त, पादरी डेविड ग्लेडविन समेत 8 पर FIR

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले में पुलिस ने 28 दिसंबर को एक पादरी डेविड ग्लेडविन और उनके बेटे अभिषेक ग्लेडविन को गिरफ्तार किया। आरोप है कि दोनों बाप-बेटे गरीब हिंदुओं को लालच और धमकी देकर ईसाई धर्म अपनाने के लिए मजबूर कर रहे थे।

यह गिरफ्तारी बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं के विरोध प्रदर्शन के बाद हुई। संगठनों ने आरोप लगाया कि पादरी और उनके साथियों द्वारा जबरन धर्मांतरण कराया जा रहा था। बताया गया है कि ये धर्मांतरण गतिविधियाँ फतेहपुर के राधानगर थाना क्षेत्र के देविगंज इलाके में स्थित इंडिया प्रेस्बिटेरियन चर्च में हो रही थीं। इस मामले में पुलिस ने FIR दर्ज की है, जिसकी कॉपी ऑपइंडिया के पास है।

FIR में क्या लिखा है?

इस मामले में FIR देवप्रकाश पासवान की शिकायत पर दर्ज की गई है। पुलिस ने यह FIR भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की धारा 299 और 351(3) के तहत दर्ज की है। इसके साथ ही उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्मांतरण प्रतिषेध अधिनियम, 2021 की धारा 3 और 5(1) भी लगाई गई हैं।

FIR में पादरी डेविड ग्लेडविन, उनके बेटे अभिषेक ग्लेडविन और जोहान विश्वास उर्फ केके बंगाली को आरोपी बनाया गया है। इनके अलावा 5-6 अज्ञात लोगों के खिलाफ भी मामला दर्ज किया गया है।

फोटो साभार: यूपी पुलिस

अपनी शिकायत में देवप्रकाश ने बताया कि 28 दिसंबर को सुबह करीब 10 बजे उन्हें और उनके साथियों नीरज पासवान तथा सुशील रैदास को देवीगंज स्थित चर्च में बुलाया गया था। जब वे लोग चर्च के अंदर पहुँचे तो वहाँ प्रार्थना सभा चल रही थी। इस दौरान ईसा मसीह की प्रेयर की जा रही थी।

फोटो साभार: यूपी पुलिस

शिकायत में आगे कहा गया है कि प्रार्थना सभा के दौरान हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियाँ की गईं। चर्च में मौजूद लोगों पर ईसाई धर्म अपनाने का दबाव बनाया जा रहा था। देवप्रकाश के अनुसार, वहाँ यह भरोसा दिलाया जा रहा था कि जो भी व्यक्ति ईसाई धर्म स्वीकार करेगा उसे पैसे, घरेलू सामान, रोजगार और बच्चों की मुफ्त शिक्षा की सुविधा दी जाएगी।

फोटो साभार: यूपी पुलिस

जब देवप्रकाश और उनके साथियों ने इन गतिविधियों का विरोध किया तो उन्हें 1,100 रुपए देकर चुप रहने को कहा गया। आरोप है कि पादरी और उसके साथियों ने चुप रहने के बदले और ज्यादा पैसे देने की पेशकश भी की।

शिकायत के अनुसार, आरोपी लगातार उनके गाँव में आ-जा रहे थे और ग्रामीणों पर अपने घरों में ईसा मसीह की तस्वीर लगाने तथा हर रविवार चर्च आने का दबाव बना रहे थे। पादरी और उसके साथी यह भी कहते थे कि जो व्यक्ति किसी नए व्यक्ति को चर्च लेकर आएगा, उसे आर्थिक इनाम दिया जाएगा। वहीं, इनकार करने वालों को गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी जाती थी।

पासवान ने कहा कि इन गतिविधियों के कारण ग्रामीण इलाकों में डर का माहौल बन गया है। लोगों को मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है, कुछ लोग घर छोड़ने को मजबूर हुए हैं और कई लोग अत्यधिक मानसिक तनाव में आकर आत्महत्या जैसे कदम उठाने की स्थिति तक पहुँच गए हैं।

चर्च के बाहर विरोध प्रदर्शन

चर्च में धर्मांतरण कार्यक्रम होने की सूचना मिलते ही हिंदू संगठनों में आक्रोश फैल गया। इसके बाद बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद (VHP) के कार्यकर्ता चर्च परिसर पहुँचे और विरोध प्रदर्शन शुरू किया।

मीडिया से बातचीत में कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया कि चर्च के अंदर बड़ी संख्या में हिंदू महिलाएँ मौजूद थीं और उन्हें रोजगार, आस्था के नाम पर इलाज, पैसे तथा बच्चों की शिक्षा का लालच देकर निशाना बनाया जा रहा था।

कार्यकर्ताओं ने चर्च के बाहर निकलने के रास्तों को रोक दिया और पुलिस कार्रवाई की माँग की। उन्होंने पुलिस से माँग करते हुए कि चर्च के अंदर मौजूद सभी लोगों से पूछताछ की जाए और उसके बाद ही उन्हें बाहर जाने दिया जाए।

आरोपितों की गिरफ्तारी

इस मामले की शिकायत मिलने के बाद थरियांव के DSP वीर सिंह कई थानों की पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुँचे। पुलिस ने स्थिति को नियंत्रित किया और प्रदर्शन कर रहे लोगों को भरोसा दिलाया कि सबूतों के आधार पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी। इस दौरान पुलिस ने पादरी डेविड ग्लेडविन को पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया।

बाद में पुलिस ने पुष्टि की कि पादरी सहित दो आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया गया है। वहीं, FIR में नामजद और अज्ञात बताए गए अन्य आरोपितों की तलाश के लिए पुलिस की कार्रवाई जारी है।

पुलिस और हिंदू संगठनों ने क्या कहा?

मीडिया से बातचीत में DSP वीर सिंह ने बताया कि कुछ हिंदू महिलाएँ चर्च में गई थीं। उन्होंने कहा कि महिलाएँ किन परिस्थितियों में वहाँ पहुँचीं इसकी जाँच की जा रही है। DSP के अनुसार, पादरी से पूछताछ की जा रही है और जाँच में जो सामने आएगा उसके आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

राधानगर थाने के इंस्पेक्टर विनोद मौर्य ने बताया कि चर्च के अंदर मौजूद महिलाओं के बयान दर्ज किए जा रहे हैं। जाँच का मुख्य फोकस इस बात पर है कि कहीं धर्मांतरण के लिए लालच या दबाव तो नहीं बनाया गया।

वहीं, हिंदू संगठनों के नेताओं ने कहा कि यह कोई अकेली घटना नहीं है। उनका आरोप है कि गरीब और हाशिए पर रहने वाले हिंदुओं को बार-बार निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि ‘चंगाई सभा’ के नाम पर प्रार्थना सभाओं की आड़ में धर्मांतरण की गतिविधियाँ चल रही हैं और यहाँ लोगों को लालच और धमकियों के जरिए धर्म बदलने के लिए मजबूर किया जाता है। फिलहाल, इस पूरे मामले में पुलिस की आगे की जाँच जारी है।

‘उन शहजादियों को पता नहीं होता कि कटुआ है’: लव जिहाद पर ‘टीना’ बनकर हिंदू लड़कियों को गालियाँ देने वाली ‘सलमा’ के खिलाफ FIR, पहले भी जा चुकी है जेल

उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में मुस्लिम महिला सलमा सोशल मीडिया पर ‘टीना’ नाम से अकाउंट बनाकर लगातार सनातन के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करती है। हाल ही में सलमा ने लव जिहाद मामले पर हिंदू लड़कियों को गालियाँ और अभद्र भाषा का प्रयोग करते हुए वीडियो बनाई है। इस वीडियो पर अखिल भारत हिंदू महासभा की अध्यक्ष शिखा वर्मा ने सलमा के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है।

सलमा की इंस्टाग्राम पर ‘टीना हिंदुस्तानी’ नाम से आईडी है, जिस पर वह लगातार हिंदू और सनातन के मामलों पर वीडियो पोस्ट करती है। हाल ही में पोस्ट किए गए वीडियो में सलमा ने ‘लव जिहाद’ में हिंदू लड़कियों पर कमेंट किया है। वह कहती है कि हिंदू लड़कियों को पहले से नहीं पता होता कि उनके साथ क्या हो रहा है। वह हिंदू लड़कियों के लिए काफी अभद्र भाषा का इस्तेमाल करती है। वही लव जिहाद के आरोपित मुस्लिम लड़को को प्रताड़ित भी बताती है।

इसी वीडियो पर हिंदू महासभा की अध्यक्ष शिखा वर्मा ने सलमा के खिलाफ पुलिस शिकायत की है। पुलिस ने तुरंत संज्ञान लेते हुए गंभीर धाराओं में FIR भी दर्ज कर ली है। ऑपइंडिया के पास FIR की कॉपी भी उपलब्ध है।

सलमा के खिलाफ दर्ज FIR का विवरण

FIR के मुताबिक, अखिल भारत हिंदू महासभा की अध्यक्ष शिखा वर्मा ने शिकायत करते हुए कहा है कि सलमा की सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर teena-hindustani-up31 नाम से आईडी है। इस आईडी पर सलमा आए दिन हिंदू महिलाओं पर अभ्रद्र टिप्पणी करती है, जिससे हिंदू समाज में भारी आक्रोश है।

शिखा वर्मा ने बताया कि पहले भी सलमा ने हिंदू समाज की भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाली टिप्पणी कर चुकी हैं। शिखा वर्मा ने कहा कि सलमा एक मुस्लिम महिला है, जो हिंदू नाम से अपना नाम बदलकर सोशल मीडिया पर हिंदू महिलाओं को बदनाम करती है। शिखा वर्मा ने माँग की है आरोपित मुस्लिम महिला के खिलाफ कड़ी कार्यवाही की जानी चाहिए।

शिकायत के आधार पर मुस्लिम महिला सलमा के खिलाफ लखीमपुर खीरी के कोतवाली सदर थाने में 27 दिसंबर 2025 को FIR दर्ज की गई। सलमा पर भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 299 और सूचना प्रौद्योगिकी (संशोधन) अधिनियम 2008 की धारा 66 के तहत मामला दर्ज किया गया है।

विवादित वीडियो में क्या कहा?

मुस्लिम महिला सलमा पर जो FIR दर्ज हुई है, वह एक विवादित वीडियो को लेकर की गई है। इस वीडियो में सलमा ने हिंदू लड़कियों के लिए अभद्र बातें कही हैं। यह वीडियो सलमा ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट ‘टीना हिंदुस्तानी’ पर शेयर किया है। वीडियो लव जिहाद से संबंधित है।

वीडिया में सलमा कहती है, “जो लड़िकयाँ कहती हैं, मैं लव जिहाद में फँस गई। बाद में खूब चर्चा होती है। उस लड़की को मारा-पीटा जाता है। पीटते-पीटते जान से भी मार देते हैं। उसके घर पर बुलडोजर चलवा देते हैं। घरवालों को मारते पीटते हैं।”

सलमा अभद्र टिप्पणी करते हुए बोलती है, “मेरी समझ में यह नहीं आता कि वो जो शहजादियाँ होती हैं। जो लव जिहाद में फँसती है, उस मुस्लिम लड़के के साथ जब सोती हैं। खूब लॉलीपॉप चू*ती हैं। तब भी उनको ये नहीं पता होता है कि ये कटुआ है। लॉलीपॉप चू*के लव जिहाद पूरा करती हैं। और फिर बाद में फँसा देती हैं कि लव जिहाद हो गया। हमे तो पता नहीं चला।”

उसने आगे कहा, “लड़िकयाँ कहती हैं हमे तो मालूम था कि इसने अपना नाम संदीप बताया, राहुल बताया, राज बताया, मोहन बताया… और था ये अब्दुल्लाह। इसने मुझे लव जिहाद में फँसाया कि हम हिंदू हैं और बाद में मालूम चला कि ये मुस्लिम हैं। खूब लॉलीपॉप तुमने चू** और तुम्हें ये नहीं पता चला कि ये हिंदू है या मुस्लिम है।”

गाय पर अपमानजनक टिप्पणी कर जा चुकी जेल

सलमा पहले भी हिंदू और सनातन के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी कर जेल तक जा चुकी है। इससे पहले सलमा ने सनातन में गाय को ‘माता’ बोलने पर आपत्ति जताते हुए वीडियो बनाई थी। वीडियो को लेकर भी बवाल हुआ और मुकदमा दर्ज किया गया, जिसके बाद सलमा दो दिन तक जेल में रही।

गाय पर बनाई गई वीडियो में सलमा ने कहा था, “अंधभक्तों तुम अपने पिता जी के नाम से इतना क्यों चिढ़ते हो। जब गाय तुम्हारी माता हैं, तो उसका शौहर…धर्म पति तो तुम्हारा पापा होगा। अगर गाय तुम्हारी माता है, तो बैल तुम्हारा पापा होगा न। क्यों चिढ़ते हो? मतलब पापा तुम्हारा कोई है नहीं, माँ तुम्हारी है तो तुम पैदा कैसे हुए। ये बताओ।”

वह आगे कहती है, “क्यों चिढ़ते हो। सही बात का बुरा मत माना करो। अंधभक्त मुझे गालियाँ देते हैं। क्यों कि ये ऐसी प्रजाति है जो खुद अंधभक्ति में लीन है। लेकिन अगर कोई कह देगा तो मिर्ची लग जाती है। सही तो कह रही हूँ। तुम्हारे पापा मुस्लिम मोहल्ले में घूम रहे हैं। और तुम्हारी अम्मा का पता नहीं। सच्चाई जिसे कड़वी लगी वही अंधभक्त होता है।”

माफी माँगते हुए बनाया वीडियो

सलमा ने लव जिहाद मामले में हिंदू लड़कियों पर अभद्र टिप्पणी करने वाले वीडियो पर आलोचना और आक्रोश के कुछ घंटो बाद ही माफी माँगते हुए वीडियो भी बनाया। इस माफी वाले वीडियो में वह गिड़गिड़ाते हुए कहती है कि उसे माफ कर दिया जाए। सलमा कहती है कि वह पहले जेल जा चुकी है और आगे से ऐसा नहीं करेगी।

वीडियो में सलमा कहती है, “मैंने एक लव जिहाद पर वीडियो बनाया, जिसमें कहा कि हिंदू लड़कियाँ पहले नहीं जानती है कि ये मुस्लिम था। मुझसे गलती हो गई। मैंने बिना सोचे वह वीडियो बना दिया। मुझे माफ कर दो। मैं बहुत शर्मिंदा हूँ।”

वह आगे कहती है, “मुझसे फिर से यह गलती हो गई। अभी तो मैं जेल काटकर आई हूँ। उसका भुगतान ही नहीं हो पाया है। इसीलिए अब माफी माँग रही हूँ। जो भी हिंदू ये वीडियो देखे, वो प्लीज इधर से उधर नहीं करना। मुझे माफ करना गलती हो गई। अब कभी भी ऐसा कोई भी वीडियो नहीं बनाऊँगी।”

जिस पूर्व फौजी के लिए पाक कर रहा था रेपिस्टों की सौदेबाजी, अब उसे घोषित किया आतंकवादी: जानें क्यों आसिम मुनीर के लिए सिरदर्द बना UK में बैठा आदिल राजा

पाकिस्तान सरकार ने फौज के पूर्व अफसर और यूट्यूबर आदिल फारूक राजा को आतंकवाद निरोधक अधिनियम 1997 (Anti-Terrorism Act, 1997) के तहत ‘प्रोस्क्राइब्ड पर्सन’ यानी प्रतिबंधित व्यक्ति घोषित कर दिया है। आसान भाषा में कहें तो पाकिस्तान ने आदिल को आतंकवादी घोषित कर दिया है। पाकिस्तान के गृह मंत्रालय ने शनिवार (27 दिसंबर 2025) को इसे लेकर अधिसूचना भी जारी कर दी है।

पाकिस्तान ने क्या कहा है?

‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान लगातार फौज के मुखिया आसिम मुनीर और पाक फौज की पोल खोलने वाले आदिल को लेकर पाकिस्तान ने कहा है कि सरकार के पास यह मानने के ठोस कारण हैं कि आदिल की गतिविधियाँ पाकिस्तान की सुरक्षा, संप्रभुता, अखंडता और सार्वजनिक व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा पैदा कर रही हैं। सरकार के अनुसार, राजा लगातार ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स का दुरुपयोग कर रहे थे और ऐसे कंटेंट का प्रचार-प्रसार कर रहे थे, जो पाकिस्तान विरोधी नैरेटिव को बढ़ावा देता है।

अधिसूचना में आदिल पर यह भी आरोप लगाया गया है कि उन्होंने प्रतिबंधित आतंकवादी संगठनों से जुड़े प्रचार और प्रोपेगेंडा को न केवल बढ़ावा दिया बल्कि उसे बड़े स्तर पर प्रसारित भी किया। सरकार का कहना है कि इस तरह की गतिविधियाँ पाकिस्तान की संप्रभुता और राष्ट्रीय रक्षा के खिलाफ हैं।

यह फैसला केंद्रीय कैबिनेट की मंजूरी के बाद लिया गया। गृह मंत्रालय ने 23 दिसंबर को इसका प्रस्ताव कैबिनेट में भेजा था जिसे मंजूरी मिलने के बाद 27 दिसंबर को अधिसूचना जारी कर दी गई।

पाक के गृह मंत्रालय की नोटिफिकेशन (साभार: X/Adil Raja)

इस कार्रवाई से कुछ दिन पहले गृह मंत्री मोहसिन नकवी ने आदिल राजा के प्रत्यर्पण (UK से वापस लाने) से जुड़े कागजात ब्रिटेन हाई कमिश्नर को सौंपे थे। नकवी पहले ही कह चुके हैं कि सरकार फेक न्यूज फैलाने वाले यूट्यूबर्स और राज्य संस्थानों को निशाना बनाने वालों के खिलाफ सख्त कदम उठाएगी।

सरकारी अधिसूचना के बाद अब उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई का रास्ता और साफ हो गया है। विशेषज्ञों के अनुसार, ‘प्रोस्क्राइब्ड पर्सन’ घोषित किए जाने के बाद संबंधित व्यक्ति की संपत्तियों, वित्तीय लेन-देन और पाकिस्तान से जुड़े संपर्कों पर कड़ी निगरानी और प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।

असली लोकतंत्र की लड़ाई लड़ता रहूँगा: आदिल राजा

आदिल ने पाकिस्तान की इस कायराना हरकत पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। आदिल ने X पर लिखा, “पाकिस्तान की सरकार मुझे UK से प्रत्यर्पित कराने में नाकाम रही। इसके बाद उसने मेरे परिवार के घर पर हमला करवाया और अब मुझे ‘आतंकवादी’ घोषित कर दिया है। यह फैसला इसलिए लिया गया है क्योंकि मैं पत्रकारिता करता हूँ और सच लिखता-बोलता हूँ।”

उन्होंने आगे लिखा, “यह सब पाकिस्तानी सेना के इशारे पर चल रहे उस अभियान का हिस्सा है, जिसका मकसद देश के बाहर रहकर आवाज उठाने वालों को डराना और चुप कराना है। यह लगातार हो रहा उत्पीड़न मुझे चुप नहीं करा सकता। उल्टा, इससे मेरा हौसला और मजबूत हुआ है।”

आदिल ने लिखा, “मैं पाकिस्तान के गरीबों की आवाज उठाता रहूँगा, असली लोकतंत्र की लड़ाई लड़ता रहूँगा। चाहे फासीवाद का अंधेरा कितना ही गहरा क्यों न हो, इतिहास गवाह है कि आखिरकार सच की ही जीत होती है।”

कौन है आदिल राजा?

पाकिस्तान के पंजाब प्रांत से ताल्लुक रखने वाले आदिल राजा की उम्र लगभग 45 वर्ष है। वह पाकिस्तान फौज में मेजर रह चुके हैं। अपने सैन्य करियर के दौरान उन्होंने इंटेलिजेंस और ऑपरेशनल यूनिट्स में काम किया। वर्ष 2017 में सेना से इस्तीफा देने के बाद वे ब्रिटेन चले गए। वहीं से उन्होंने एक यूट्यूब चैनल शुरू किया, जिस पर वे पाकिस्तान की राजनीति, सेना और इमरान खान से जुड़े मुद्दों पर टिप्पणी करने लगे। उनके चैनल के 5 लाख से अधिक सब्सक्राइबर हैं और उनके वीडियो लाखों बार देखे जाते हैं।

वे लगातार यह कहते रहे हैं कि पाकिस्तानी सेना राजनीति में दखल देती है, लोकतंत्र को दबाती है और आम लोगों, खासकर बलूचों और गरीबों पर जुल्म करती है। उनके वीडियो में सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर और शीर्ष अफसरों पर सीधे आरोप लगाए जाते हैं, इसलिए वे पाकिस्तान की सत्ता के लिए एक बड़ी परेशानी बन गए।

राजा यह दावा भी कर चुके हैं कि आसिम मुनीर खुद को फील्ड मार्शल का रैंक दे चुके हैं और सिविल सत्ता को पीछे धकेलकर सेना को आगे लाने की कोशिश कर रहे हैं। आदिल राजा के खिलाफ यूके की अदालत में भी केस किया गया है। आदिल इसे सोची-समझी योजना बताते हैं। वह कहते हैं कि पाकिस्तानी मिलिट्री और ISI यूके की कानूनी प्रणाली का दुरुपयोग कर विरोधियों को चुप कराने की कोशिश कर रहे हैं।

वह Ex-Servicemen Society के पूर्व प्रवक्ता रहे हैं। आदिल राजा एक पर्सनल ब्लॉग भी लिखते हैं, जिसमें वो पाकिस्तान की राजनीति, सेना के फैसलों और अंतरराष्ट्रीय मामलों पर खुलकर टिप्पणी करते हैं। उन्हें पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान का समर्थक माना जाता है।

रेपिस्टों के बदल में किया था आदिल का सौदा

कुछ दिनों पहले सामने आई रिपोर्ट्स में दावा किया गया था कि पाकिस्तान ने UK से आदिल की वापसी के बदले पाकिस्तानी ग्रूमिंग गैंग के अपराधियों को वापस देने की बात कही थी। इनमें से अब्दुल रऊफ ने 13 साल की लड़की का रेप किया जबकि आदिल खान ने 15 साल की लड़की का रेप किया और भाग कर पाकिस्तान आ गए। इन दोनों बलात्कारियों के बदले में पाकिस्तान सरकार आदिल और एक अन्य राजनीतिक विरोधी को वापस लाना चाहती थी। नकवी ने इसके लिए ब्रिटेन के राजदूत को बुलाकर बात की थी। जिस दूसरे आदमी को पाकिस्तान माँग रहा था वो बैरिस्टर मिर्जा शहजाद अकबर हैं।

मीटिंग के बाद जारी आधिकारिक बयान में नकवी ने कहा कि दोनों लोगों का पाकिस्तान में होना जरूरी है और उन्हें जल्द से जल्द पाकिस्तान को सौंपा जाना चाहिए। उन्होंने यह भी दावा किया कि प्रत्यर्पण के लिए पाकिस्तान की ओर से पर्याप्त सबूत दिए गए हैं और विदेश में बैठकर देश को बदनाम करने वालों को किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

क्लब के माहौल में सनातन वाला भाव: Gen-Z की ‘भजन क्लबिंग’ बन रही आधुनिकता और आस्था के बीच सेतु

सोचिए…रंग-बिरंगी लाइट्स, तेज म्यूजिक, DJ की धुन और उस पर गूँजता ‘हरे राम, हरे कृष्ण’ या ‘शिव तांडव स्तोत्र’। देखने में यह नाइट क्लब जैसा लगता है लेकिन असल में यह Gen-Z की ‘भजन नाइट’ है।

नया साल मनाने का आज के युवाओं का यह नया तरीका है। यहाँ शोर है लेकिन भक्ति का। न शराब है, न नॉन-वेज। खाने में सात्विक भोजन है और हाथों में ड्रिंक की जगह कंठी माला। कोई राधा-कृष्ण बना है तो कोई शिव का रूप धारण किए हुए है। DJ की बीट्स पर झूमते हुए ये युवा अपने अंदाज में भगवान को याद कर रहे हैं।

सोशल मीडिया पर इन ‘भजन नाइट्स’ के वीडियो खूब वायरल हो रहे हैं और इन्होंने धार्मिक और सांस्कृतिक बहस को एक नई दिशा दी है। पहली नजर में यह दृश्य पारंपरिक भक्ति की छवि से बिल्कुल अलग लगता है। हालाँकि, Gen-Z के लिए यह किसी दूसरे तरीक से टकराव नहीं बल्कि वह इसे अपने समय, अपनी भाषा और अपनी संवेदना के अनुसार आस्था से जुड़ने का तरीका मान रही है। उनके लिए आध्यात्म का मतलब किसी तय ढाँचे में बंधना नहीं बल्कि उस आध्यात्मिक अनुभव को जीना है, जो मन और आत्मा को सुकून दे।  

यह ट्रेंड ‘भजन क्लबिंग’ या ‘मॉडर्न भजन नाइट’ के नाम से जाना जा रहा है। जहाँ कुछ लोग इसे भक्ति का बाजारीकरण मानते हैं तो वहीं युवा पीढ़ी इसे नए साल में सकारात्मक शुरुआत, आत्मिक जुड़ाव और मानसिक शांति का माध्यम बता रही है। दिलचस्प बात यह है कि इस स्पेस में सिर्फ युवा ही नहीं बल्कि हर उम्र के लोग शामिल हो रहे हैं। क्योंकि तरीका भले नया हो लेकिन भाव वही पुराना है और भगवान से जुड़ने वाला है।

परंपरा से अलग, लेकिन पूरी तरह अनजान नहीं

भारतीय समाज में भजन संध्या की एक गहरी परंपरा रही है। मंदिरों, घरों या मोहल्लों में शांत वातावरण, सीमित वाद्य यंत्र और सामूहिक भक्ति यही इसकी पहचान रही है। इसका उद्देश्य मनोरंजन नहीं, बल्कि मन की एकाग्रता और अनुशासन था।

इससे अलग, भजन क्लबिंग में वही भजन तेज बीट्स, DJ म्यूजिक और लाइट शो के साथ सुनाई देते हैं। मंच पर परफॉर्मेंस होती है, मोबाइल कैमरे चलते हैं और पूरा आयोजन किसी म्यूजिक इवेंट जैसा लगता है।

लेकिन Gen-Z के लिए यह बदलाव डराने वाला नहीं है। उनके अनुसार, भक्ति का अर्थ केवल एक तय ढाँचे में बंधा होना नहीं है। इतिहास भी बताता है कि भक्ति का स्वरूप समय के साथ बदलता रहा है। कभी यज्ञ, कभी संतों की पदावली, कभी कव्वाली। ऐसे में डिजिटल युग में DJ और मिक्सिंग के साथ भजन आना उन्हें स्वाभाविक विकास लगता है।

Gen-Z और धर्म: अनुभव-आधारित जुड़ाव

समाजशास्त्रियों के अनुसार Gen-Z धर्म को डर, पाप-पुण्य या कठोर नियमों के चश्मे से नहीं देखती। यह पीढ़ी अनुभव को प्राथमिकता देती है। भजन क्लबिंग उनके लिए ऐसा स्पेस है, जहाँ बिना किसी दबाव के वे आध्यात्मिक ध्वनियों से जुड़ पाते हैं।

न कोई लंबा अनुष्ठान, न सही-गलत की फेहरिस्त बस संगीत, माहौल और मन का जुड़ाव। कई युवाओं का कहना है कि उन्होंने पहली बार किसी मंत्र या भजन को ध्यान से सुना, जब वह उनके पसंदीदा म्यूज़िक फॉर्म EDM यानि (Electronic dance music), ट्रैप या टेक्नो बीट्स में आया। उनके लिए यह किसी धार्मिक कक्षा जैसा नहीं, बल्कि एक फील-गुड अनुभव है। Gen-Z मानती है कि अगर इस बहाने वे ईश्वर का नाम ले रहे हैं, तो यह पूरी तरह नकारने योग्य नहीं होना चाहिए।

सुकून बनाम अनुशासन: आलोचना का दूसरा पक्ष

हालाँकि आलोचक इस तर्क से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि धर्म केवल भावनात्मक सुकून का माध्यम नहीं बल्कि एक सांस्कृतिक और बौद्धिक अनुशासन भी है। उदाहरण के तौर पर, ‘शिव तांडव स्तोत्र’ को गहरे दार्शनिक अर्थ और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि वाला स्तोत्र माना जाता है। जब इसे क्लब बीट्स के साथ प्रस्तुत किया जाता है, तो सवाल उठता है, क्या श्रोता इसके अर्थ को समझ रहा है, या केवल उसकी ऊर्जा का उपभोग कर रहा है? जिसे युवा पीढ़ी वाइब कहती है।

फोटो साभार – keshavamband

Gen-Z इस आलोचना को पूरी तरह खारिज नहीं करती, लेकिन इसे एकतरफा भी नहीं मानती। उनके अनुसार, हर किसी की यात्रा अलग होती है। भजन क्लबिंग अंतिम पड़ाव नहीं, बल्कि शुरुआत हो सकती है।

अगर कोई युवा पहले DJ बीट्स पर भजन सुनता है और बाद में उसके अर्थ को जानने को जिज्ञासु होता है, तो यह प्रक्रिया गलत नहीं कही जा सकती। बल्कि इसे हम उनका अपना तरीका कह सकते है भक्ति भाव से जुड़ने का जानने का और उसमें लीन होने का।

सोशल मीडिया, ट्रेंड और दिखावटी भक्ति का सवाल

भजन क्लबिंग ट्रेंड को सोशल मीडिया ने तेजी से फैलाया है। रील्स, स्टोरीज और वायरल वीडियो इसे कूल और ट्रेंडिंग बना रहे हैं। आलोचक इसे दिखावटी भक्ति कहते हैं, जहाँ ईश्वर से ज्यादा कैमरे पर ध्यान होता है।

लेकिन Gen-Z इसे अपनी पहचान और अभिव्यक्ति का हिस्सा मानती है। उनके लिए अपने निजी अनुभव को लोगों से बाटना उनके जीवन का हिसा है बस तरीका अलग है उनका वो सोशल मीडिया के जरिया लोगों से अपने अनुभव को लोगों से साझा कर रहे है। उनका मानना हैं कि अगर किसी वीडियो के जरिये कोई और युवा भजन या मंत्र से जुड़ता है, तो इसमें बुराई नहीं है।

हाँ, Gen-Z भी इस बात को मानती है कि अगर भक्ति केवल कंटेंट बनकर रह जाए, तो आत्ममंथन जरूरी है। सवाल यह नहीं है कि वीडियो बनाया गया या नहीं बल्कि यह है कि उस अनुभव के बाद मन को क्या मिला, खालीपन या शांति।

Gen-Z कर रहा शोर में शांति की तलाश

Gen-Z के नजरिये से भजन क्लबिंग न तो परंपरा का अपमान है, न ही धर्म का अंत। यह उस पीढ़ी की कोशिश है, जो अपने तरीके से, अपने स्पेस में और अपने समय की भाषा में आस्था से जुड़ना चाहती है।

तरीका नया है, ट्रेंडिंग है और हर किसी को पसंद आए यह जरूरी नहीं। लेकिन यह भी सच है कि इस माध्यम से कई युवा पहली बार भजन, मंत्र और आध्यात्मिकता की ओर आकर्षित हो रहे हैं।

इससे उन्हें जुड़ाव महसूस हो रहा है और भक्ति का मतलब ही है आजादी आप अपने हिसाब से भक्ति कर सके इसकी स्वतंत्रता जो अपने हिसाब से अपने भक्ति भाव को व्यक्त करने का अवसर दे जैसे मीरा अपने तरीके से कृष्ण की उपासना करती थी, उनका तरीका अलग था पर भाव वही भक्ति वाला ही था। उसी तरह आज की युवा पीढ़ी अपने तरीके से भगवान की भक्ति करना चाहती है तरीका अलग सकता है पर भाव वही है।      

अंततः एक Gen-Z के तौर पर देखा जाए तो सवाल यह नहीं है कि भजन क्लब में बज रहा है या मंदिर में। असली सवाल यह है कि भजन सुनकर मन कहाँ पहुँच रहा है। अगर तेज DJ बीट्स के बीच भी किसी को सुकून, ठहराव और भीतर झाँकने का मौका मिल रहा है, तो Gen-Z के लिए यही भक्ति का नया रास्ता है।