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यूँ ही नहीं PM मोदी ने सेहत के लिए चेताया, कमजोर पड़तीं एंटीबायोटिक हैं शरीर के लिए बड़ा खतरा: जानें क्या कहती है ICMR और WHO की रिपोर्ट

पीएम मोदी ने साल 2025 के आखिरी ‘मन की बात’ कार्यक्रम के दौरान एंटी बायोटिक के कम होते असर को लेकर चिंता जताई है। इस दौरान उन्होंने आईसीएमआर की रिपोर्ट का जिक्र किया। रिपोर्ट में कहा गया है कि कई बीमारियों के खिलाफ एंटीबायोटिक कमजोर पड़ रही हैं।

पीएम मोदी ने जनता से की अपील

पीएम ने कहा कि मेडिसिन के लिए गाइडेंस और एंटीबायोटिक के लिए डॉक्टर की जरूरत है। अपनी मनमर्जी से दवाओं का इस्तेमाल न करें, इससे रोगाणुओं पर इसका असर कम हो जाता है। इस दौरान उन्होंने निमोनिया और यूटीआई जैसी बीमारियों का जिक्र किया और कहा कि इन बीमारियों पर एंटीबायोटिक का असर कम होता जा रहा है, जो बेहद चिंता की बात है। पीएम ने जनता से अनुरोध किया कि किसी भी तरह की दवाई डॉक्टर से बगैर पूछे न खाएँ। ये बेहद खतरनाक है।

दरअसल ICMR रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि शरीर में प्रतिरोधक क्षमता में कमी का एक बड़ा कारण लोगों द्वारा बिना सोचे-समझे antibiotic दवाओं का सेवन है। एंटीबायोटिक दवाएँ ऐसी नहीं हैं, जिन्हें यूँ ही ले लिया जाए। इनका इस्तेमाल डॉक्टर की सलाह से ही करना चाहिए। इसे कितने दिनों तक सेवन करना है, किन परिस्थितियों में खाना है और कितनी मात्रा लेनी है, ये डॉक्टर ही बता सकते हैं।

ICMR रिपोर्ट में कई संक्रमण को लेकर खुलासा

ICMR (Indian Council of Medical Research या भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद ) ने हाल ही में एक report जारी किया है। इसमें बताया गया है कि भारत में रोगाणु लगातार एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति प्रतिरोधी क्षमता विकसित कर रहे हैं। इसका असर ये हो रहा है कि ये दवाएँ इन रोगाणुओं को खत्म करने में सक्षम नहीं रहीं। इससे संक्रमण को रोकना मुश्किल होता जा रहा है। इससे मृत्यु का खतरा भी बढ़ रहा है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि खून में होने वाले संक्रमण यानी ब्लडस्ट्रीम इंफेक्शन के लिए जिम्मेदार एक अहम रोगाणु क्लेबसिएला निमोनिया है। यह फेफड़ों को संक्रमित करके निमोनिया का कारण बन सकता है। इसके अलावा रक्त, त्वचा में घाव और मस्तिष्क की परत को संक्रमित करके मेनिन्जाइटिस से ग्रसित करता है। इसे रोकने के लिए इस्तेमाल होने वाले एंटीबायोटिक्स की क्षमता कमजोर साबित हो रही है। इससे बीमारी से निपटना मुश्किल होता जा रहा है। आईसीएमआर की रिपोर्ट के अनुसार, स्थिति इतनी चिंताजनक है कि निमोनिया संक्रमणों में से केवल 43% का ही 2021 में प्राथमिक एंटीबायोटिक दवाओं से इलाज किया जा सका, जबकि 2016 में यह आंकड़ा 65% था।

कमजोर पड़ने लगी हैं एंटीबायोटिक मेडिसिन

रिपोर्ट में एक और रोगाणु एसिनेटोबैक्टर बाउमानी के संक्रमण को लेकर कहा गया है कि सबसे चिंताजनक बात यह है कि ये रोगाणु बहु-दवा प्रतिरोधी क्षमता प्राप्त कर चुका है। ये आईसीयू में जीवन रक्षक उपकरणों पर रखे गए रोगियों के फेफड़ों पर हमला करता है। इससे मरीज की हालत और खराब हो जाती है। UTI जैसी कई बीमारियों के खिलाफ antibiotic दवाएँ कमजोर साबित हो रही हैं। अस्पताल में होने वाला ये सबसे आम इंफेक्शन है।

ई. कोलाई (E coli) एक ऐसा रोगाणु है, जो दूषित भोजन के सेवन के बाद मनुष्यों और जानवरों की आंतों में आमतौर पर पाया जाता है। ये भारत में आम बीमारी है। इसके अलावा क्लेबसिएला न्यूमोनिया (K pneumoniae) स्यूडोमोनास एरुगिनोसा (Pseudomonas aeruginosa), एसिनेटोबैक्टर बाउमानी (Acinetobacter baumannii) और स्टैफिलोकोकस ऑरियस (Staphylococcus aureus) जैसे रोगाणु आते हैं, जिसका संक्रमण सबसे ज्यादा फैलता है।

इनके लिए इस्तेमाल होने वाले फ़्लोरोक्विनोलोन (Fluoroquinolones), थर्ड जनरेशन सेफलोस्पोरिन (third generation cephalosporins), कार्बापेनेम्स (carbapenems), और पिपेरासिलीन टैज़ोबैक्टम (piperacillin tazobactam) जैसे एंटीबायोटिक लगातार अपना असर कम करते जा रहे हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि हेल्थकेयर से जुड़े ब्लडस्ट्रीम इन्फेक्शन (BSI) 72.1% मामलों के लिए जिम्मेदार हैं।

एसिनेटोबैक्टर बाउमानी, क्लेबसिएला न्यूमोनिया, और स्यूडोमोनास एरुगिनोसा वेंटिलेटर-एसोसिएटेड न्यूमोनिया (VAP) के लिए लगभग 80% कारण बनने वाले पैथोजन थे, इसलिए ज़्यादातर क्लिनिकल स्थितियों में वैनकोमाइसिन, टेकोप्लानिन, और लाइनज़ोलिड के इस्तेमाल को लेकर सावधानी बरतने की जरूरत है।

WHO ने भी जताई चिंता

ये सिर्फ भारत की स्थिति नहीं है। दुनियाभर में भी इसको लेकर चिंता व्यक्त की जा रही है। WHO की रिपोर्ट में एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस के फैलाव और ट्रेंड का ग्लोबल एनालिसिस पेश किया गया है, जिसमें ब्लडस्ट्रीम इन्फेक्शन, यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन, गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल इन्फेक्शन और यूरोजेनिक गोनोरिया के 23 मिलियन से ज़्यादा बैक्टीरियोलॉजिकली कन्फर्म्ड मामलों को शामिल किया गया है। 2023 में 104 देशों और 2016 से 2023 के बीच 110 देशों ने डेटा रिपोर्ट किया था।

यही वजह है कि PM मोदी ने ‘मन की बात’ में एंटीबायोटिक के इस्तेमाल का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि अब बहुत से लोग मानते हैं कि सिर्फ एक गोली लेने से सभी हेल्थ प्रॉब्लम ठीक हो सकती हैं। यही वजह है कि इन एंटीबायोटिक्स से बीमारियाँ और इन्फेक्शन ज्यादा हो रहे हैं।

लोगों से ज्यादा जिम्मेदार बनने की अपील करते हुए PM ने कहा कि वे आग्रह करना चाहते हैं कि प्लीज अपनी मर्जी से दवाएँ लेने से बचें। एंटीबायोटिक्स के मामले में, इस बात का ध्यान रखना बहुत जरूरी है कि बगैर डॉक्टरी सलाह के इसका इस्तेमाल न करें। दवाओं के लिए गाइडेंस की ज़रूरत होती है और एंटीबायोटिक्स के लिए डॉक्टर की। यह आदत आपकी हेल्थ को दुरुस्त बनाने में बहुत मददगार साबित होगी।

कौन हैं पार्वती गिरी? जिन्हें मन की बात में PM मोदी ने किया याद: 16 साल की उम्र में स्वतंत्रता के लिए गईं जेल, ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का हिस्सा बन अंग्रेजों को सिखाया सबक

‘मन की बात’ के 129वें एपिसोड में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आजादी के आंदोलन का हिस्सा बनने वाली ओडिशा की वीरांगना पार्वती गिरी को याद किया। पीएम ने कहा कि जनवरी 2026 में पार्वती गिरी की जन्म शताब्दी मनाई जाएगी। पार्वती गिरी के संघर्ष और समर्पण कार्यों का जिक्र करते हुए पीएम नरेंद्र मोदी ने उड़िया भाषा में उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।

साल 2026 के आखिरी एपिसोड में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, “आजादी के आंदोलन में देश के हर हिस्से के लोगों ने अपना योगदान दिया है। लेकिन दुर्भाग्य से आजादी के अनेकों नायक-नायिकाओं को वो सम्मान नहीं मिला, जो उन्हें मिलना चाहिए था। ऐसी ही एक स्वतंत्रता सेनानी हैं- ओडिशा की पार्वती गिरी जी। जनवरी 2026 में उनकी जन्म-शताब्दी मनाई जाएगी।”

पार्वती गिरी के योगदान को याद करते हुए प्रधानमंत्री ने आगे कहा, “उन्होंने 16 वर्ष की आयु में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में हिस्सा लिया था। आजादी के आंदोलन के बाद पार्वती गिरी जी ने अपना जीवन समाज सेवा और जनजातीय कल्याण को समर्पित कर दिया था। उन्होंने कई अनाथालयों की स्थापना की। उनका प्रेरक जीवन हर पीढ़ी का मार्गदर्शन करता रहेगा।”

अंत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता सेनानी पार्वती गिरी को श्रद्धांजलि देते हुए उड़िया भाषा में कहा, “मैं पार्वती गिरी जिंकु श्रद्धांजलि अर्पण करुछी।”

कौन हैं वीरांगना पार्वती गिरी?

भारत को आजादी दिलाने में कई स्वतंत्रता सेनानियों का योगदान है। इनमें से ही एक हैं पार्वती गिरी। उनका नाम अक्सर किताबों या सार्वजनिक कार्यक्रमों में नहीं लिया जाता है। लेकिन उनका समर्पण और संघर्ष आजादी के पन्नों में अहम है। बावजूद उनके बारे में आज देश इतना नहीं जानता है, जितना बाकी स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष को जानता है।

पार्वती गिरी का जन्म 19 जनवरी 1926 को ओडिशा के संबलपुर जिले में हुआ। उनके पिता धनंजल गिरी गाँव के प्रमुख थे और चाचा रामचंद्र गिरी कॉन्ग्रेस नेता थे। इसीलिए वे आजादी के दौरान की राजनीति और स्वतंत्रता सेनानियों के बीच पली-बढ़ी थी। घर में भारत की आजादी को लेकर बाते होतीं, तो उनके पार्वती गिरी को साहस मिलता।

यही वजह है कि उन्होंने 11 साल की छोटी उम्र से ही आजादी के आंदोलन का हिस्सा बनीं। शुरुआत में पार्वती गिरी कॉन्ग्रेस के लिए प्रचार-प्रसार करती थीं। पार्टी की बैठकों में भी वे हिस्सा लेने लगीं।

महात्मा गाँधी के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का बनी हिस्सा

पार्वती गिरी ने 11 साल की उम्र में तीसरी कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी। तभी से वे महात्मा गाँधी के विचारों से प्रेरित होकर आजादी की लड़ाई के लिए आंदोलनों का हिस्सा बनने लगीं। महज 16 साल में उन्होंने महात्मा गाँधी के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में भाग लिया। पार्वती गिरी ने पश्चिमी ओडिशा के इलाकों में लोगों को एकत्रित किया और अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन तेज करने में अहम भूमिका निभाई।

वे गाँव-गाँव जाकर लोगों को अंग्रेजी शासन की अन्यायपूर्ण नीतियों के बारे में बताती थीं और उन्हें आंदोलन से जुड़ने के लिए प्रेरित करती थीं। उन्होंने खादी पहनने, विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और अंग्रेजी प्रशासन के आदेशों को न मानने का खुला आह्वान किया।

16 साल की उम्र में जेल जाना पड़ा

भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान पार्वती गिरी का जज्बा देख अंग्रेज प्रशासन बुरी तरह घबरा गया। आंदोलन को दबाने के लिए ब्रिटिश सरकार ने बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियों शुरू की। सिर्फ 16 साल की पार्वती गिरि को भी गिरफ्तार कर संबलपुर जेल भेज दिया गया, जहाँ उन्हें लगभग दो साल तक कैद में रखा गया।

जेल में रहते हुए भी उनका साहस नहीं टूटा। कम उम्र होने के बावजूद उन्होंने जेल प्रशासन के सामने झुकने से इनकार किया। बताया जाता है कि वे जेल में अन्य महिला बंदियों को भी आजादी के संघर्ष के लिए प्रेरित करती थीं। हालाँकि, नाबालिग होने के चलते ब्रिटिश सरकार को घुटने टेकने पड़े और दो साल बाद उन्हें रिहा कर दिया गया।

इस दौरान उन्होंने बरगढ़ की अदालत में सरकार विरोधी नारे लगाए, जिसके चलते उन्हें दो साल को जेल भी जाना पढ़ा था। लेकिन नाबालिग होने के चलते उन्हें छोड़ दिया गया। इसके बावजूद उनका हौसला नहीं टूटा, साल 1942 के बाद से देशभर में बड़े पैमाने पर अंग्रेजों के खिलाफ भारत छोड़ो आंदोलन अभियान को तेजी से चलाया।

ब्रिटिश अदालतों के बहिष्कार का किया आह्वान

भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जब अंग्रेज सरकार ने आंदोलनकारियों पर मुकदमे चलाने किए, तब ब्रिटिश अदालतें भी दमन का एक औजार बन गई थीं। इसी दौर में पार्वती गिरी ने एक बेहद साहसीय कदम उठाया और इन ब्रिटिश अदालतों का विरोध किया।

संबलपुर और बरगढ़ इलाके में जब स्वतंत्रता सेनानियों को अंग्रेजी अदालतों में पेश किया जाने लगा, तब पार्वती गिरी ने खुलकर कहा कि ये अदालतें न्याय के लिए नहीं, बल्कि अंग्रेजी हुकुमत को बचाने के लिए काम कर रही है। उन्होंने स्थानीय लोगों और खासकर वकीलों से अपील की कि वे इन अदालतों में पेश होना और काम करना बंद करें।

पार्वती गिरी खुद अदालत परिसर के आसपास जाकर लोगों को समझाती थीं कि अगर भारतीय ही अंग्रेजों की अदालतों को वैधता देते रहेंगे, तो आजादी की लड़ाई कमजोर पड़ जाएगी। कहा जाता है कि उनके आह्वान के बाद कई जगहों पर वकीलों ने मुकदमों से दूरी बनाई और आम लोग भी अदालतों में जाने से कतराने लगे थे।

इससे अंग्रेजी प्रशासन को काफी परेशानी हुई, क्योंकि बिना भारतीय सहयोग के अदालतें चलाना मुश्किल हो गया। एक कम उम्र की महिला द्वारा ब्रिटिश न्याय व्यवस्था को इस तरह खुली चुनौती देना उस समय असाधारण माना गया। यही वजह थी कि अंग्रेज अधिकारी पार्वती गिरी को खतरनाक मानने लगे और उनकी गतिविधियों पर कड़ी निगरानी रखी जाने लगी।

पार्वती गिरी का आजादी के बाद समाजसेवा को बनाया जीवन

देश को स्वतंत्रता मिलने के बाद पार्वती गिरी ने देखा कि देश तो आजाद हो गया, लेकिन समाज का एक बड़ा हिस्सा अब भी गरीबी, अशिक्षा और उपेक्षा में जी रहा है। उन्होंने तय किया कि उनकी लड़ाई अब सत्ता से नहीं, बल्कि सामाजिक अन्याय से होगी। वे खासतौर पर अनाथ बच्चों, बेसहारा महिलाओं, कैदियों और गरीब परिवारों के लिए काम करने लगीं।

पार्वती गिरी ने पश्चिमी ओडिशा में अनाथालय और आश्रम बनाए, जहाँ बेसहारा बच्चों को रहने, पढ़ने और आगे बढ़ने का मौका मिला। वे खुद बच्चों की देखभाल करती थीं और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने पर जोर देती थीं। महिलाओं के लिए उन्होंने सुरक्षित आश्रय और रोजगार दिया।

इसके अलावा जेल की जिंदगी का अनुभव रखने के कारण पार्वती गिरी को कैदियों की पीड़ा का गहरा एहसास था। उन्होंने ‘जेल सुधार’ के लिए आवाज उठाई। वे जेलों में जाकर कैदियों से मिलती थीं, उनके परिवारों की मदद करती थीं और उनके पुनर्वास के लिए प्रयास करती थीं।

उन्होंने गरीब इलाकों में जाकर बीमार लोगों की मदद करती थीं। इलाज के लिए सहयोग जुटाती थीं और बच्चों की पढ़ाई की व्यवस्था भी करती थीं। उनका जीवन बेहद सादा था, लेकिन दूसरों की मदद के लिए वे कभी पीछे नहीं हटीं।

पार्वती गिरी के सामाजिक योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें 1984 में राष्ट्रीय सामाजिक सेवा पुरस्कार से सम्मानित किया। इसके अलावा संबलपुर विश्वविद्यालय ने उन्हें डॉक्टरेट की उपाधि दी। वे आखिरी समय तक समाज के सबसे कमजोर लोगों के साथ खड़ी रहीं। 17 अगस्त 1995 को उन्होंने आखिरी सांस ली।

हैदराबाद जितनी आबादी वाले सोमालीलैंड को इजरायल ने नए देश के तौर पर दी मान्यता: समझिए मायने, क्यों ये ‘जमीन’ से ज्यादा ‘समुद्र’ के लिए अहम

इज़राइल ने 26 दिसंबर 2025 को सोमालीलैंड को एक स्वतंत्र देश के रूप में आधिकारिक मान्यता देने वाला पहला देश बन गया है। यह पहली बार है जब किसी देश ने सोमालीलैंड को उसकी 1991 की स्वतंत्रता घोषणा के बाद आधिकारिक रूप से मान्यता दी है। सोमालिया से 34 साल पहले इसने खुद को आजाद घोषित किया था। इजरायल का ये निर्णय न केवल अफ्रीका के हॉर्न क्षेत्र में कूटनीतिक समीकरणों को प्रभावित करेगा, बल्कि इजराइल की विदेश नीति में भी एक बड़े बदलाव को यह दर्शाता है।

इजरायल और सोमालीलैंड के बीच औपचारिक समझौता

प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने विदेश मंत्री गिदोन सा’आर के साथ मिलकर एक वीडियो कॉल के जरिए सोमालीलैंड के राष्ट्रपति अब्दिरहमान मोहम्मद अब्दुल्लाही के साथ एक जॉइंट डिक्लेरेशन पर साइन किए। नेतन्याहू ने इस घटनाक्रम को ‘ऐतिहासिक और निर्णायक’ बताते हुए कहा कि यह दोनों देशों के बीच औपचारिक द्विपक्षीय संबंधों की शुरुआत है।

इस समझौते के तहत दोनों देशों में दूतावास खोले जाएँगे और राजदूत नियुक्त किए जाएँगे। इससे राजनयिक संबंध स्थापित होंगे। सोमालीलैंड की आबादी लगभग 6.2 मिलियन यानी 62 लाख है। भारत में हैदराबाद की आबादी करीब 67 लाख है यानी हैदराबाद से भी इस देश की जनसंख्या थोड़ी कम है।

इजराइल और सोमालीलैंड के बीच हुई फोन बातचीत में नेतन्याहू ने आर्थिक विकास, कृषि और सामाजिक क्षेत्रों में सहयोग का वादा किया। उन्होंने सोमालीलैंड के राष्ट्रपति को इज़राइल की आधिकारिक यात्रा के लिए आमंत्रित किया और संकेत दिया कि वे अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से ‘अब्राहम समझौते में’ सोमालीलैंड को शामिल करने का अनुरोध करेंगे।

सोमालीलैंड की सरकार ने इस मान्यता का स्वागत किया है और समझौते पर साइन होते ही देश में जश्न मनाया जाने लगा। हजारों लोग राजधानी हरगेसा के फ़्रीडम स्क्वायर में इकट्ठा हुए और सोमालीलैंड के झंडे लहराने लगे। इजराइल द्वारा आजाद देश के रूप में दी गई मान्यता का इन्होंने जमकर जश्न मनाया।

सोमाालीलैंड को औपचारिक मान्यता मिलने का अफ्रीका और मिडिल ईस्ट के देशों ने विरोध किया है। सऊदी अरब ने इस कदम की निंदा की। इसके अलावा अफ्रीकन यूनियन, सोमालिया, मिस्र, तुर्की, जिबूती और दूसरे देशों ने भी इजरायल के इस कदम की निंदा की है।

सऊदी अरब ने एक बयान जारी कर कहा कि उन्हें “सोमालिया के फेडरल रिपब्लिक की एकता और अखंडता का पूरा समर्थन करता है। सऊदी अरब इजरायल की सोमालीलैंड को देश के रूप में दी गई मान्यता को खारिज करता है और इसे एक ऐसा कदम मानता है, जो अलगाववाद को बढ़ावा देता है और इंटरनेशनल कानूनों का उल्लंघन करता है।”

अफ्रीकन यूनियन ने पोस्ट किया, “अफ्रीकन यूनियन सोमालीलैंड को दी गई किसी भी मान्यता को खारिज करता है और सोमालिया की एकता और अखंडता का समर्थन करता है।”

सोमालीलैंड क्या है और यह कैसे बना?

सोमालीलैंड एक ब्रिटिश उपनिवेश था, जिसने पहली बार 1960 में गृहयुद्ध के बाद आजादी की घोषणा की थी। उस समय इजराइल समेत 34 देशों ने उसे मान्यता दी थी। हालाँकि बाद में वह स्वेच्छा से सोमालिया के साथ मिल गया। 1991 में सोमालिया की केंद्र सरकार के पतन के बाद सोमालीलैंड ने पुनः स्वतंत्रता की घोषणा की।

तब से अब तक, सोमालीलैंड ने राजनीतिक स्थिरता, लोकतांत्रिक संस्थाएँ, स्वतंत्र मुद्रा और प्रशासनिक ढाँचा विकसित किया है, लेकिन वैश्विक मान्यता उसे नहीं मिल सकी थी। कुछ देशों जैसे ब्रिटेन, इथियोपिया, तुर्की, यूएई, डेनमार्क, केन्या और ताइवान ने वहाँ संपर्क कार्यालय बनाए, लेकिन आधिकारिक मान्यता नहीं दी। अभी तक यह हॉर्न ऑफ अफ्रीका में एक ‘स्वघोषित’ आजाद देश है। यह सोमालिया के उत्तर-पश्चिमी इलाके में है। इसकी सीमा उत्तर-पश्चिम में जिबूती, दक्षिण और पश्चिम में इथियोपिया और पूर्व में सोमालिया के बाकी हिस्सों से मिलती है।

लेकिन इस देश के पास जमीनी बॉर्डर नहीं है, बल्कि अदन की खाड़ी में 850 किलोमीटर लंबी तटीय सीमा है, जो लाल सागर को अरब सागर से जोड़ता है और दुनिया का सबसे व्यस्त वॉटरवे ट्रेड मार्ग है। यहाँ से दुनिया भर के बड़े व्यापार पर नजर रखा जा सकता है। इस क्षेत्र का सामरिक महत्व काफी है इसलिए यहाँ सदियों से लड़ाईयाँ होती रही हैं।

सोमालीलैंड का जियोपॉलिटिकल महत्व ‘ज़मीन’ नहीं ‘समुद्र’ है

ब्रिटिश उपनिवेश से अलग होकर 26 जून 1960 को सोमालीलैंड अलग राष्ट्र बन गया। 4-5 दिनों बाद ही 1 जुलाई 1960 को अपनी मर्ज़ी से यह इटैलियन सोमालीलैंड में शामिल होकर सोमाली रिपब्लिक बन गया, लेकिन यह यूनियन ज्यादा दिनों तक नहीं चल सका। उत्तरी इलाकों के सोमाली लोग दक्षिणी ग्रुप्स के पॉलिटिकल दबदबे की वजह से अलग-थलग पड़ गए और उन्हें किनारे कर दिया गया। सियाद बर्रे की तानाशाही में इथियोपिया के साथ सोमालिया का 1977-1978 में ओगाडेन युद्ध हुआ। इसके बाद तनाव और बढ़ गया। बर्रे ने उत्तरी इलाकों पर बमबारी की, हरगेसा को तबाह कर दिया और हजारों लोगों को मार डाला।

सोमाली नेशनल मूवमेंट (SNM) ने बर्रे के शासन के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध शुरू किया। 1991 में बर्रे शासन के गिरने के समय, SNM पहले से ही उत्तर-पश्चिमी इलाकों पर कंट्रोल कर रहा था। 1991 में बुराओ में नॉर्दर्न क्लैन्स के ग्रैंड कॉन्फ्रेंस में, SNM नेताओं ने 1960 के यूनियन को रद्द कर दिया और एक आज़ाद सोमालीलैंड की घोषणा की, जिसमें पुराने ब्रिटिश उपनिवेश के दौरान तय सीमाओं के आधार पर सोमालीलैंड को नए आजाद देश के तौर पर मान्यता दी गई।

सोमालीलैंड कैसे काम करता है?

UN से देश के तौर पर पहचान न होने के बावजूद सोमालीलैंड शासन और कानून के मामले में एक देश की तरह रहा है। यह मॉडर्न डेमोक्रेसी को पारंपरिक कबीले-आधारित शासन के साथ मिलाकर एक काम करने वाला, शांतिपूर्ण शासन सिस्टम बनाता है। यहाँ सत्ता का शांतिपूर्ण ट्रांसफर होता है, जो सोमालिया से बिल्कुल अलग है। सोमालिया सालों से सिविल वॉर की वजह से तबाह हो चुका है। सोमालीलैंड में कई पार्टियाँ चुनाव लड़ती हैं और फ्रीडम हाउस ने इसे ‘आंशिक रूप से आजाद’ माना है।

सोमालीलैंड में काफी स्थिर और कानूनी शासन है, जहाँ पायरेसी और आतंकवाद के मामले कम हैं। इसकी अपनी पुलिस और मिलिट्री है और यह इलाके में अपनी जमीन बनाए रखता है।

इसके विपरीत सोमालिया को UN से देश के तौर पर पहचान मिली है, वह अराजकता, सिविल वॉर, आतंकवाद और हिंसा से ग्रसित रहा है। अल शबाब इसके बड़े हिस्से पर कब्जा कर चुका है। यहाँ बड़े पैमाने पर अपराध, नरसंहार और पायरेसी आम है। इसकी इकॉनमी खत्म हो गई है और यह मदद पर जिंदा है। सोमालिया का एक ‘देश’ के तौर पर जो भी महत्व है, वह अफ्रीकन यूनियन और दूसरी क्षेत्रीय ताकतों से मिली मान्यता की वजह से है।

हकीकत यह है कि सोमालीलैंड एक ‘देश’ है, जहाँ डेमोक्रेसी, काम करने वाली सरकार और तुलनात्मक रूप से स्थिरता है। इसकी एक डेवलपिंग इकॉनमी भी है। लेकिन अभी तक UN ने इसे ‘देश’ के तौर पर मान्यता नहीं दी है। सोमालिया में ऐसा कुछ नहीं है, लेकिन UN ने इसे एक ‘देश’ के तौर पर मान्यता दी है।

इजराइल का सोमालीलैंड को मान्यता देने का मतलब क्या है

जैसा की हम पहले की बता चुके हैं कि सोमालीलैंड का जियोपॉलिटिकल महत्व ‘ज़मीन’ से नहीं समुद्र में स्थित होने की वजह से है।

अदन की खाड़ी में सोमालीलैंड का समुद्र तट काफी अहम है। यहाँ ईरान के सपोर्ट वाले हूथी शिपिंग लेन पर हमला कर रहे हैं और इस इलाके का इस्तेमाल इजराइल पर मिसाइल लॉन्च करने के लिए कर रहे हैं। रेड सी शिपिंग लेन कई महीनों से पश्चिमी जहाजों के लिए खतरनाक रही हैं, क्योंकि हूथी उन पर हमला करते रहते हैं। सोमालीलैंड के साथ दोस्ताना रिश्ते होने से, इज़राइल को समुद्री इंटेलिजेंस के लिए सपोर्ट मिलता रहेगा और इस इलाके में ईरानी असर का मुकाबला करने में मदद मिलेगी। साथ ही, जिबूती में चीन की बढ़ती मौजूदगी के बीच सोमालीलैंड का बरबेरा पोर्ट का अपना महत्व है।

बरबेरा पोर्ट बाब अल मंडेब स्ट्रेट के पास एक गहरे पानी वाली जगह है। इसे UAE के DP वर्ल्ड ने $442 मिलियन से ज़्यादा इन्वेस्ट करके मॉडर्न बनाया है। इसके पड़ोसी देश इथियोपिया ने समुद्री ट्रेड के लिए जिबूती पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए बरबेरा पोर्ट का इस्तेमाल करता है। इसलिए सोमालीलैंड के साथ फ्रेंडली रिश्ते बना कर रखा है। भले ही उसने पूरी ऑफिशियल मान्यता की घोषणा नहीं की है।

अफ्रीका में दुनिया भर की दिलचस्पी बढ़ रही है। जैसे-जैसे बड़ी ताकतें ट्रेड को कंट्रोल करने की कोशिश कर रही हैं और हिंद महासागर से लेकर अटलांटिक महासागर तक में अपनी मिलिट्री दबदबा बना रही हैं, ऐसे में इजराइल का सोमालीलैंड को मान्यता देना, एक बड़ी घटना है।

सोमालीलैंड को अभी UN से मान्यता नहीं मिली है। लेकिन एक देश बनने के लिए जो जरूरी मान्यताएँ हैं, वह सब सोमालीलैंड के पास मौजूद है। किसी देश को ‘पहचान’ दूसरे देशों से मिलती है, फिलहाल इजरायल ने कदम बढ़ाया है। उम्मीद की जा सकती है कि बाकी देश भी सोमालीलैंड को मान्यता देने के लिए आगे आएँगे। एक देश की पहचान उसके लोगों, एक फंक्शनल गवर्निंग बॉडी और अपनी पावर दिखाने की उसकी अपनी इच्छा से होती है। सोमालीलैंड पिछले तीन दशकों से ऐसा ही रहा है।
इस ख्याल से सोमालीलैंड, सोमालिया से ज़्यादा एक ‘देश’ है, चाहे UN इसे पसंद करे या नहीं।

(मूल रूप से यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

शेख हसीना की विदाई के बाद पाकिस्तान की राह चला बांग्लादेश, दिसंबर 2025 में 9 हिंदुओं की नृशंस हत्याएँ: जानें कौन थे पीड़ित और हालात कैसे हुए भयावह?

बांग्लादेश में अगस्त 2024 में शेख हसीना की सत्ता से विदाई के बाद से देश की राजनीतिक और सामाजिक स्थिति लगातार अस्थिर बनी हुई है। अंतरिम शासन और आने वाले संघीय चुनावों के बीच, अल्पसंख्यक हिंदुओं पर हिंसा, उत्पीड़न और हत्याओं की घटनाएँ दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही हैं।

संघीय चुनाव नजदीक होने के कारण, मुहम्मद यूनुस शासन ने हिंसक मुस्लिम भीड़ और कट्टरपंथी तत्वों को देश में अराजकता और अशांति फैलाने की खुली छूट दे दी है। दिसंबर 2025 में ही हिंदुओं की कम से कम 9 नृशंस हत्याएँ सामने आ चुकी हैं।

स्थानीय मीडिया और सोशल मीडिया पर सामने आए मामलों के अनुसार, हालात इतने गंभीर हैं कि यह आँकड़ा वास्तविक संख्या से कहीं अधिक हो सकता है। नीचे दिसंबर में सामने आए 9 प्रमुख मामलों का विवरण दिया जा रहा है, जो बांग्लादेश में हिंदुओं की मौजूदा स्थिति को उजागर करता है।

नरसिंदी में प्रांतोस कर्मकार की हत्या

2 दिसंबर को नरसिंदी जिले में 42 वर्षीय हिंदू व्यवसायी प्रांतोस कर्मकार की गोली मारकर हत्या कर दी गई। वह एक ज्वेलरी की दुकान के चलाते थे। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, नकाबपोश हमलावरों ने उन्हें घर से बाहर बुलाया, स्कूल के मैदान में ले जाकर सीने में गोली मार दी और फरार हो गए।

प्रांतोष कर्मकार (फोटो साभार: देशशक्ल न्यूज)

बाद में इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। पुलिस अब तक न तो हत्यारों की पहचान कर पाई है और न ही हत्या के मकसद का खुलासा हुआ है।

फरीदपुर में उत्पल सरकार की हत्या

5 दिसंबर की सुबह फरीदपुर जिले में 35 वर्षीय हिंदू मछली व्यापारी उत्पल सरकार की चाकू मारकर हत्या कर दी गई। हमलावरों ने उनकी वैन रोकी, सीने में वार किया और नकदी लूटकर फरार हो गए।

दिलचस्प बात यह है कि हमलावरों ने वैन चालक फिरोज मोल्ला को कोई नुकसान नहीं पहुँचाया। उन्हें केवल आँखों पर पट्टी बाँधकर पुल से बाँध दिया गया था। बाद में स्थानीय लोगों ने मोल्ला को बचाया और पुलिस को सूचना दी।

इसके बाद पुलिस ने हिंदू मछली व्यापारी के रक्तरक्त से लथपथ शव को फरीदपुर मेडिकल कॉलेज अस्पताल भेज दिया। पुलिस के अनुसार, उत्पल सरकार की हत्या में 2-3 लोग शामिल थे और मामले की जाँच की जा रही है।

रंगपुर में जोगेश चंद्र रॉय और सुबर्णा रॉय की हत्या

7 दिसंबर की रात रंगपुर जिले में 75 वर्षीय जोगेश चंद्र रॉय और उनकी 60 वर्षीय पत्नी सुबर्णा रॉय की बेरहमी से हत्या कर दी गई। जोगेश रॉय 1971 के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। पड़ोसियों ने सुबह उनके शव (गले कटे हुए) बरामद किए। अवामी लीग ने इस हत्याकांड के पीछे जमात-ए-इस्लामी का हाथ होने का आरोप लगाया है।

जोगेश चंद्र रॉय शव (फोटो साभार:ढाका ट्रिब्यून)

जोगेश चंद्र रॉय का शव डाइनिंग रुम में मिला जबकि सुबर्णा रॉय का शव रसोई में मिला। बता दें कि जोगेश चंद्र रॉय और सुबर्णा रॉय के दो बच्चे बांग्लादेश पुलिस बल में काम करते हैं।

कोमिल्ला में शांतो दास की हत्या

12 दिसंबर को कोमिल्ला जिले के होमना उपजिला में शांतो दास नामक एक हिंदू युवक का शव मकई के खेत से बरामद हुआ। वह ऑटो-रिक्शा चालक और ग्राम पुलिस बल के सदस्य थे। इस घटना के बारे में बात करते हुए उनके पिता अरुण चंद्र दास ने कहा था, “मेरा बेटा शांतो ऑटो रिक्शा चलाता था। गुरुवार शाम के बाद से हम उससे संपर्क नहीं कर पा रहे थे।”

(फोटो साभार: बीडीन्यूज24)

उन्होंने आगे कहा, “सुबह हमें पता चला कि उसका शव एक खेत में मिला है। हमने सुना है कि उसका ऑटो रिक्शा अभी तक नहीं मिला है। मुझे लगता है कि उन्होंने मेरे बेटे की हत्या उसका ऑटो रिक्शा चुराने के लिए की।”

पीड़ित का गला कटा हुआ था और गर्दन पर चाकू के कई घाव थे। पुलिस ने शांतो दास का शव बरामद कर पोस्टमार्टम के लिए कोमिला मेडिकल कॉलेज अस्पताल भेज दिया।

मयमनसिंह में दीपू चंद्र दास की हत्या

18 दिसंबर को बांग्लादेश के मयमनसिंह जिले के भालुका गाँव में एक हिंसक मुस्लिम भीड़ ने एक हिंदू युवक की पीट-पीटकर हत्या कर दी । मृतक की पहचान 27 वर्षीय दीपू चंद्र दास के रूप में हुई है। पीड़ित को बुरी तरह पीटा गया, पेड़ से बाँध दिया गया और फिर आग लगा दी गई। इस घटना का दिल दहला देने वाला वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया था।

दीपू चंद्र दास एक कपड़ा कारखाने में मजदूर के रूप में काम करते थे। विवाद के बाद, उन पर ईशनिंदा का झूठा आरोप लगाया गया।

(फोटो साभार: इंडिया टूडे)

फैक्ट्री के मैनेजर ने दास को इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया और उसे एक हिंसक मुस्लिम भीड़ के हवाले कर दिया जिसने उसकी हत्या कर दी। हिंदू व्यक्ति की निर्मम लिंचिंग की घटना पाकिस्तान में हुई भीड़ हिंसा की एक ऐसी ही घटना की याद दिलाती है।

बोगुरा में पिंटू अकांडा की हत्या

23 दिसंबर को बांग्लादेश के बोगुरा जिले के आदमदिघी उपजिला में एक माइक्रोबस से पिंटू अकांडा नामक 35 वर्षीय हिंदू व्यक्ति का शव बरामद किया गया। उन्हें एक दिन पहले चार अज्ञात हमलावरों ने बंदूक की नोक पर अगवा कर लिया था। पीड़ित एक व्यवसायी और लॉटरी शोरूम के मालिक थे।

पिंटू अकांडा (फोटो साभार: प्रोथोम अलो)

प्रारंभिक रिपोर्टों के अनुसार, पिंटू अकांडा की गला घोंटकर हत्या की गई थी। एक बयान में, एएसपी आसिफ हुसैन ने कहा, “हमारा प्राथमिक संदेह है कि पिंटू को बंदूक की नोक पर अगवा करने के बाद गला घोंटकर मार डाला गया था। हम फिलहाल जाँच कर रहे हैं।”

पीड़ित परिवार ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है। अपहरण का सीसीटीवी फुटेज अब सोशल मीडिया पर सामने आया है। वीडियो में चार नकाबपोश लोग पिंटू पर हथियार ताने हुए और उसे उसके शोरूम से बाहर ले जाते हुए दिखाई दे रहे हैं। इसके बाद पीड़ित को जबरन गाड़ी में बैठाया गया।

राजबाड़ी में अमृत मंडल की हत्या

24 दिसंबर को अमृत मंडल नामक एक अन्य हिंदू व्यक्ति को उन्मादी भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला। यह घटना बांग्लादेश के राजबारी जिले के पांग्शा उपजिला में घटी। पीड़ित की उम्र महज 29 वर्ष थी। वह होसेनडांगा गाँव का निवासी था। अमृत मंडल को गंभीर हालत में अस्पताल ले जाया गया लेकिन चोटों के कारण उसकी मृत्यु हो गई।

मृत मंडल (फोटो साभार: एनडीटीवी)

बाद में उनके शव को पोस्टमार्टम के लिए राजबारी सदर अस्पताल के मुर्दाघर भेजा गया। हिंदू व्यक्ति की हत्या के बाद, मोहम्मद यूनुस ने अमृत मंडल को ‘अपराधी’ बताकर उसकी पीट-पीटकर हत्या को उचित ठहराने की कोशिश की। इसके अलावा अंतरिम सरकार के ‘मुख्य सलाहकार’ ने भी इस मामले में ‘सांप्रदायिक पहलू’ को कम करके आँका।

हबीगंज में कामदेव दास की हत्या

हबीगंज जिले में 18 वर्षीय हिंदू युवक कामदेव दास की हत्या ने इलाके में दहशत फैला दी। वह 25 दिसंबर से लापता था और 27 दिसंबर को उसका शव तालाब से मिला। उसके गले पर निशान भी मिले हैं। परिजनों और स्थानीय लोगों ने इस हत्या के पीछे इस्लामी कट्टरपंथियों का आरोप लगाया है।

मृतक कामदेव दास (फोटो साभार: एक्स @colchaubey)

स्थानीय लोगों के अनुसार, कामदेव गुरुवार (25 दिसंबर 2025) से लापता था। उसके पिता ने थाने में गुमशुदगी की शिकायत दर्ज कराई थी, लेकिन परिवार का आरोप है कि पुलिस ने मामले को गंभीरता से नहीं लिया।

उत्पीड़न और हमलों की अन्य घटनाएँ

हत्याओं के अलावा दिसंबर में हिंदुओं पर हमले और उत्पीड़न की कई घटनाएँ सामने आईं। 19 दिसंबर को सिलहट में एक हिंदू पत्रकार सुशांत दासगुप्ता के घर पर हमला किया गया, वहीं एक रिक्शा चालक को कलावा पहनने पर पीटा गया। उस पर RA&W एजेंट होने का आरोप लगाया गया और पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया।

दिसंबर 2025 में सामने आए ये 9 हत्याकांड बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों की लगातार बिगड़ती स्थिति की एक भयावह तस्वीर पेश करते हैं। ये सभी मामले स्थानीय मीडिया में रिपोर्ट हुए हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इससे कहीं अधिक गंभीर मानी जा रही है।

कई घटनाएँ ऐसी भी हैं, जिनके वीडियो सोशल मीडिया पर तो सामने आए हैं, लेकिन वे अब तक आधिकारिक रिकॉर्ड का हिस्सा नहीं बन सकी हैं। इससे यह आशंका और गहरी हो जाती है कि वास्तविक आँकड़े कहीं अधिक हो सकते हैं।

गौरतलब है कि इससे पहले जून 2025 में OpIndia ने कम से कम 13 ऐसे मामलों की रिपोर्ट की थी, जिनमें हिंदुओं को झूठे ईशनिंदा आरोपों, भीड़ की हिंसा और सुनियोजित हमलों का शिकार बनाया गया। यानी यह हिंसा कोई अचानक पैदा हुई स्थिति नहीं बल्कि लंबे समय से चल रही एक गंभीर समस्या का हिस्सा है जो अब और अधिक उग्र रूप लेती जा रही है।

राजनीतिक अस्थिरता, कमजोर कानून-व्यवस्था और कट्टरपंथी तत्वों को मिल रही खुली छूट ने हिंदू समुदाय को भय और असुरक्षा के माहौल में जीने के लिए मजबूर कर दिया है। अंतरिम सरकार द्वारा कई मामलों में सांप्रदायिक एंगल को नकारना या हिंसा को सामान्य अपराध बताकर टाल देना स्थिति की गंभीरता को और बढ़ाता है। यदि इस बढ़ती कट्टरता पर समय रहते सख्त कार्रवाई नहीं की गई, तो बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की स्थिति और भी चिंताजनक हो सकती है।

(यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में दिवाकर दत्ता ने लिखी है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

पड़ोस का कट्टर इस्लाम ही नहीं, भारत को दीमक की तरह चाट रहे देश में बने ‘मिनी पाकिस्तान और मिनी बांग्लादेश’

बांग्लादेश में दीपू चंद्र दास की अमानवीय यातना की तस्वीर दिल दहलाने वाली है। इस यातना की हृदयविदारक तस्वीरें देखकर भारत का हर व्यक्ति, खासकर सनातनी हिन्दू, आक्रोश व्यक्त कर रहा है। 1971 में भारत ने पाकिस्तान से अलग बांग्लादेश के वजूद को स्थापित करने में अपनी भूमिका निभाई थी और आज 2025 में अंतत: यह देश भी पाकिस्तान की राह पर चला गया।

अब स्थिति यह है कि आज भारत के विरूद्ध पाकिस्तान और बांग्लादेश के मजहबी कट्टरपंथी और जिहादी एक मंच पर आ चुके हैं। पाकिस्तान में फौज- कठमुल्ला- मौलाना एवं मजहबी कट्टरपंथी- जेहादी गठजोड़ के आगे कभी ठीक से लोकतंत्र खड़ा ही नहीं हो पाया। ये दोनों पड़ोसी देश मिलकर भारत के लिए गंभीर धार्मिक-उन्मादी चुनौतियाँ पेश कर रही हैं।

भारत-पाकिस्तान-बांग्लादेश का यह द्वंद्व आखिर है क्या?

इसको समझने के लिए इन तीनों देशों के विभाजन एवं निर्माण की पृष्ठभूमि के साथ जनसांख्यिकी के आँकड़े की ओर ध्यान देना होगा। पाकिस्तान की स्थापना का सबसे बुरा दु:स्वप्न यह रहा कि मुस्लिम राष्ट्र की परिकल्पना को साकार करने के लिए बने इस नये मुल्क में सिर्फ आधे मुस्लिम गए जबकि शेष भारत में ही रह गए।

अविभाजित भारत में 7.44 करोड़ मुस्लिम थे और 1947 में भारत-पाकिस्तान विभाजन के वक्त 3.90 करोड़ मुस्लिम ही पाकिस्तान गए जबकि 3.54 करोड़ भारत में रह गए। दिलचस्प बात यह है कि विभाजन के बाद भारतीय क्षेत्र में मौजूद 4.25 करोड़ मुस्लिमों में से सिर्फ 72 लाख मुसलमान ही पाकिस्तान गए, वहीं पाकिस्तान से 83 लाख हिन्दू-सिख भारत आए।

आँकड़ों के अनुसार, 1947 में पश्चिमी पाकिस्तान यानि वर्तमान पाकिस्तान में हिन्दू आबादी 20% थी तो पूर्वी पाकिस्तान यानि वर्तमान बांग्लादेश में हिन्दू आबादी 28-30 प्रतिशत थी। 1947 में भारत की जनसंख्या 33-34 करोड़ के लगभग थी जिसमें लगभग 9.8% मुस्लिम थे।

अब 1951 की जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या 36 करोड़ थी, जिसमें हिन्दू 84.1% और मुसलमान 9.8% थे। 1951 में पाकिस्तान की कुल जनसंख्या 7.5 करोड़ थी, जिसमें से पश्चिमी पाकिस्तान की आबादी 3.37 करोड़ थी और पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) की जनसंख्या 4.2 करोड़ थी।

इसमें पश्चिमी पाकिस्तान में 98.4% मुस्लिम के अलावे कुल 2.9% गैर-मुस्लिम थे, जिसमें 1.6% हिन्दू आबादी थी। उसी प्रकार पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) में 78% मुस्लिमों के अलावे 23.2% गैर-मुस्लिम थे, जिसमें 22% हिन्दू आबादी थी।

वर्तमान संदर्भ में भारत-पाकिस्तान-बांग्लादेश की जनसंख्या पर गौर करें तो 2023 में जारी पाकिस्तान सरकार के आँकड़ों के अनुसार देश की कुल जनसंख्या 24 करोड़ में 23.12 करोड़ यानि 96.35% मुसलमान थे। इसके अलावा हिन्दू आबादी 38 लाख यानि 1.61%, ईसाई आबादी 26 लाख यानि 1.37%, सिख आबादी सिर्फ 15,998 और पारसी 2348 बचे थे।

2022 में जारी बांग्लादेश सरकार के आँकड़ों के अनुसार देश की कुल जनसंख्या 16.5 करोड़ थी, जिसमें 15.03 करोड़ यानि 91% मुसलमान थे। इसके अलावा 1.31 करोड़ यानि 7.95% हिन्दू, बौद्ध 10 लाख यानि 0.61 प्रतिशत, 4.95 लाख यानि 0.30 प्रतिशत ईसाई बांग्लादेश में रहते हैं।

वहीं, भारत में 2024 के अनुमानित आँकड़ों के अनुसार जनसंख्या 145 करोड़ है, जिसमें हिन्दू 115.71 करोड़ यानि 79.8% संभावित हैं। वहीं मुस्लिम 20.59 करोड़ यानि 14.2%, ईसाई 3.33 करोड़ यानि 2.3%, सिख 2.46 करोड़ यानि 1.7%, बौद्ध 1.01 करोड़ यानि 0.7 प्रतिशत, जैन 0.58 करोड़ यानि 0.4 प्रतिशत और पारसी लगभग 50 हजार अनुमानित है।

1947 के बाद मुस्लिम आबादी बढ़ी, हिंदू आबादी घटी

उपर्युक्त आँकड़ों से भारत-पाकिस्तान-बांग्लादेश में 1947 से अबतक के हिन्दू एवं मुस्लिम आबादी की संरचना में बदलाव को आसानी से समझा जा सकता है। भारत में हिन्दू आबादी 84.1% से घटकर 79.8% हो गई तो मुस्लिम आबादी 9.8% से बढ़कर 14.2% हो गई।

पाकिस्तान में हिन्दू आबादी 20% से घटकर 1.61% हो गई तो बांग्लादेश की हिन्दू आबादी 28-30 प्रतिशत से घटकर 7.95 प्रतिशत हो गई। दिलचस्प बात यह है कि पश्चिमी पाकिस्तान (वर्तमान पाकिस्तान) में 1947 से 1951 के बीच ही हिन्दू आबादी 9.8% से घटकर 1.61 प्रतिशत हो गई थी और पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) में इस दौरान हिन्दू आबादी 28-30 प्रतिशत से घटकर 22 प्रतिशत हो गई थी।

हालाँकि, पाकिस्तान के आँकड़ें हमेशा थोड़े संदेह के घेरे में रहे हैं। लेकिन जारी आँकड़ों पर ही भरोसा करना होगा। यह भी जानना जरूरी है कि 1971 में बांग्लादेश के जन्म के वक्त बांग्लादेश की कुल आबादी लगभग 7.10 करोड़ थी, जिसमें अनुमानित हिन्दू आबादी 1.7 करोड़ यानि 20-22 प्रतिशत के लगभग थी।

भारत-पाकिस्तान-बांग्लादेश के द्वंद्व की पृष्ठभूमि में धर्म निश्चित तौर पर रहा है क्योंकि राष्ट्र विभाजन का मुख्य कारण और आधार ही हिन्दू-मुस्लिम धार्मिक विभाजन रहा है। यह भी कम दिलचस्प नहीं कि धर्म के आधार पर बँटे इन देशों में पाकिस्तान और बांग्लादेश जहाँ घोषित तौर पर इस्लामिक देश बने, वहीं भारत को धर्मनिरपेक्ष घोषित किया गया।

सबसे बुरी स्थिति यह रही कि हिन्दू-मुस्लिम के धार्मिक भेदभाव के आधार पर बने पाकिस्तान के वजूद में आने के बाद भी भारत में 3.50 करोड़ से ज्यादा मुसलमान रह गए थे। सवाल भी यही है कि भारत का विभाजन पूरी तरह धार्मिक आधार पर जिन्ना ने स्वीकार कर पाकिस्तान बना लिया तो फिर गाँधी-नेहरू ने भारत में इसको पूरी तरह साकार क्यों नहीं होने दिया?

हकीकत है कि धार्मिक आधार पर बँटवारे के बावजूद गाँधी-नेहरू तो मुसलमानों को पाकिस्तान जाने से रोकने में लगे थे और यहाँ तक की पाकिस्तान गए लोगों के वापस भारत आने का आह्वान भी कर दिया था। भारत ने मुसलमानों को भारत में रूकने का खुल्लम-खुल्ला विकल्प दिया, जिससे बड़ी संख्या में मुसलमान भारत में रूक भी गए।

क्या यह कम दुर्भाग्यपूर्ण नहीं कि धार्मिक आधार पर देश का बँटवारा हुआ और भारतीय हिस्से में रह रहे कुल मुसलमानों की सिर्फ 18% आबादी ही पाकिस्तान गई। यही नहीं, बँटवारे के बाद बड़ी संख्या में जो मुसलमान पाकिस्तान के बुरे हालात से निराश होकर भारत लौटे उन्हें तत्कालीन भारत सरकार ने नीतिगत निर्णय लेकर दुबारा भारत की नागरिकता प्रदान की।

साम्राज्यवादी ब्रिटेन द्वारा भारत के विभाजन की सबसे बड़ी दलील थी कि दो अलग-अलग धार्मिक समुदायों के लोग एक साथ मिलकर नहीं रह सकते। लेकिन गाँधी-नेहरू जैसे नेताओं ने भारत का विभाजन तो करा ही दिया, विभाजन के कारणों को विफल कराकर भारत के समाज-राजनीति में मुस्लिम परस्ती एवं मुस्लिम तुष्टीकरण का स्थायी भाव जोड़ दिया।

समय के अंतराल में भारत के भीतर लंबे समय तक सफल होती रही तथाकथित धर्मनिरपेक्षता की राजनीति ने देश को सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक एवं मनोवैज्ञानिक तौर पर खोखला करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है।

स्वाभाविक सी बात है कि जब 1947 में लगभग 4 करोड़ मुस्लिम आबादी वाला पाकिस्तान आजतक लोकतांत्रिक नहीं बन पाया और 1971 में लगभग 5.5 करोड़ मुस्लिम आबादी वाले बांग्लादेश में भी लोकतंत्र ने दम तोड़ दिया है तो आज की तारीख में भारत लगभग 21 करोड़ मुस्लिम आबादी के साथ लोकतंत्र और समाज-राजनीति की किन गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा होगा, समझा जा सकता है।

पाकिस्तान एवं बांग्लादेश में इस्लामिक धार्मिक कट्टरता ही राष्ट्रवाद का प्रयाय है, लेकिन इन दोनों देशों की उत्पत्ति जिस भारत के विभाजन से हुई है वहाँ हिन्दू सनातन धार्मिक चेतना को ही आजादी के बाद से ही संदेह एवं सवालों घेरे में डालने की कोशिश सामाजिक-राजनीतिक तौर पर होती रही है।

इन सबका मनोवैज्ञानिक तौर पर इतना बुरा प्रभाव पड़ा है कि एक आम सनातनी हिन्दू भी मौलाना टोपी लगाने में जितना गौरवान्वित महसूस करता है, उतना ही टीका लगाने एवं धार्मिक प्रतीकों के उपयोग से परहेज करने लगा है। यह कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं होनी चाहिए कि श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन की बड़ी भूमिका भारत में सनातन हिन्दू धार्मिक चेतना को जीवंत करने में रही है।

भारत में लिबरल सॉफ्ट डेमोक्रेसी यानि नरम लोकतंत्र की जो नींव गाँधी-नेहरू ने डाली उसके कारण भारतीय राजनीति में मुस्लिम परस्ती या मुस्लिम तुष्टीकरण को धर्मनिरपेक्षता का नाम दिया गया। लेकिन साथ ही, भारत की सांस्कृतिक विरासत, सनातन हिन्दू धार्मिक चेतना, राष्ट्रवादी विचाधारा को प्रकट करने वालों को सांप्रदायिक घोषित किया गया।

हाल के दिनों में पूरी दुनिया जिसमें अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, इटली, जापान सहित यूरोप के लगभग सभी देश बढ़ते इस्लामिक कट्टरपंथ एवं जिहादी मानसिकता के गिरफ्त में आता जा रहा है। पश्चिमी देशों में ग्रुमिंग गैंग इस मानसिकता की निम्नतम घटिया स्तर है जो भारत जैसे देश में बुर्का नकाबपोशी, लव जिहाद, लैंड जिहाद, धर्म परिवर्तन, आतंकवाद के सहारे अपने पैर पसार रहा है और पूरी रणनीति के साथ इस्लाम साजिशन विस्तार कर रहा है, जिसकी गिरफ्त में अपार्टमेंट- सोसाइटी, गली- मुहल्ले, गाँव- शहर, राज्य और देश आता जा रहा है।

भारत में लगभग 1 करोड़ रोहिंग्या, बांग्लादेशी एवं अन्य घुसपैठियों के कारण अनेकों राज्य में स्थानीय जनसांख्यिकी में बड़ा बदलाव हुआ है, जिसने समाज-राजनीति-अर्थव्यवस्था सभी पर प्रभाव डाला है। अब भारत के भीतर ही अनगिनत मिनी पाकिस्तान और मिनी बांग्लादेश बने हुए हैं जो देश को दीमक की तरह चाट कर खोखला बनाने में लगे हैं। भारत के भीतर मौजूद इन तत्वों को विदेशी ताकतों के साथ वामपंथी, नरमपंथी, चरमपंथी, धर्मनिरपेक्ष, हिन्दू सनातन विरोधी एवं राष्ट्र-विरोधी ताकतों से मजबूती मिल रही है।

दक्षिण एशिया विशेषकर पाकिस्तान और बांग्लादेश में जिस तरह से इस्लामिक कट्टरपंथी प्रवृत्तियाँ तेजी से बढ़ रही हैं, उसने वैश्विक लोकतांत्रिक ताकतों को झकझोर कर रख दिया है। बांग्लादेश में हिन्दुओं के नरसंहार ने संयुक्त राष्ट्र, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार, अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम सहित वैश्विक समुदाय को बेनकाब कर दिया है, जो मूकदर्शक की तरह चुप बैठा है।

भारत के भीतर मौजूद और पड़ोस से उभरे धार्मिक कट्टरपंथी एवं जिहादी चुनौतियों से न सिर्फ सतर्क और जागरूक रहने की जरुरत है, बल्कि मुस्तैदी से मुकाबला करने का वक्त आ गया है। भारत के भीतर एवं बाहर मौजूद सनातन हिन्दू विरोधी-भारत विरोधी ताकतों के मंसूबों को हरसंभव रणनीति से करारा जवाब देने की जरूरत है। फिलहाल बांग्लादेश की घटना पर भारत के हर एक राष्ट्रवादी एवं सनातन हिन्दू धर्म मानने वालों का खून खौल रहा है।

(डॉ निखिल आनंद बिहार से भाजपा के नेता हैं और वर्तमान में भाजपा ओबीसी मोर्चा के राष्ट्रीय महामंत्री हैं।)

अंबाजी मंदिर में दांता शाही परिवार का विशेष पूजा का अधिकार खत्म, गुजरात हाईकोर्ट ने ट्रस्ट को ठहराया वैध: जानें क्या था पूरा मामला और अदालत ने फैसले में क्या कहा?

गुजरात हाईकोर्ट ने बुधवार (24 दिसंबर 2025) को शक्तिपीठ अंबाजी मंदिर से जुड़े लंबे समय से चल रहे विवाद पर अपना फैसला सुनाया। इस मामले का मुख्य मुद्दा मंदिर के स्वामित्व को लेकर था, हालाँकि इससे जुड़े कई सवाल कोर्ट के सामने थे।

कोर्ट ने अपने फैसले में उस ट्रस्ट को वैध ठहराया, जिसके तहत फिलहाल अंबाजी मंदिर को चलाया जा रहा है। इसके साथ ही कोर्ट ने दांता के शाही परिवार को नवरात्रि के आठवें दिन विशेष पूजा करने और उस दौरान श्रद्धालुओं के प्रवेश पर रोक लगाने के अधिकार को भी समाप्त कर दिया। इस फैसले के बाद अंबाजी मंदिर के प्रबंधन और पूजा से जुड़े विशेष अधिकारों को लेकर चला आ रहा विवाद खत्म हो गया।

शक्तिपीठ अंबाजी मंदिर के मालिकाना हक के विवाद का इतिहास

यह मामला दांता के शाही परिवार के हाईकोर्ट में दायर अपील से शुरू हुआ। इस याचिका में 2008 के बनासकांठा जिला कोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी। याचिका में कहा गया कि अंबाजी मंदिर उनके पूर्वजों से उन्हें विरासत में मिला है, इसलिए यह उनका निजी/व्यक्तिगत संपत्ति है। अगर यह निजी संपत्ति है, तो मंदिर का संचालन सार्वजनिक ट्रस्ट द्वारा नहीं किया जा सकता, इसलिए ट्रस्ट को गैरकानूनी घोषित किया जाना चाहिए।

साल 2011 में मंदिर ट्रस्ट ने आपत्ति याचिका दायर की। ट्रस्ट ने कहा कि मंदिर ट्रस्ट पूरी तरह से वैध है। साथ ही, दांता के शाही परिवार की परंपरा नवरात्रि के आठवें दिन मंदिर में पूजा करने और इस दौरान श्रद्धालुओं के प्रवेश पर रोक लगाने को भी बंद किया जाना चाहिए क्योंकि अब सभी लोग बराबर हैं।

आखिरकार, यह मामला हाईकोर्ट तक पहुँचा। हाईकोर्ट ने अपना फैसला देते समय मामले को दो हिस्सों में बाँटा आजादी से पहले की स्थिति और आजादी के बाद की स्थिति।

हाईकोर्ट ने कहा कि इसमें कोई शक नहीं है कि 1948 से पहले उस क्षेत्र में राजनीतिक शक्ति दांता के महाराजा के पास थी लेकिन ऐतिहासिक दस्तावेज, जमीन के रिकॉर्ड और गजट से पता चलता है कि मंदिर की मालिक माता जी (माँ अंबाजी) हैं और महाराजा केवल उनके सेवक या प्रशासक थे।

यहाँ यह उल्लेख करना जरूरी है कि भारतीय कानून के अनुसार, मंदिर में रहने वाली देवी ही मंदिर की मालिक मानी जाती हैं। कोर्ट ने स्वतंत्रता से पहले के 1934 और 1937 के सिविल कोर्ट के फैसलों का हवाला दिया। इन फैसलों में भी यह स्पष्ट किया गया कि महाराजा केवल मंदिर के प्रबंधक थे क्योंकि वह वहाँ के शासक थे, ना कि मालिक।

1934 और 1937 के फैसलों में सिविल कोर्ट ने लिखा कि महाराजा मंदिर का मालिक नहीं थे बल्कि केवल प्रशासक थे और संपत्ति देवी (माँ अंबाजी) की थी। हाईकोर्ट के अनुसार, यह तथ्य कि इन फैसलों को बाद में किसी भी कोर्ट में चुनौती नहीं दी गई, यह स्पष्ट करता है कि स्वतंत्रता से पहले भी शाही परिवार का मंदिर पर कोई मालिकाना हक नहीं था।

आजादी के बाद विवाद की समय-सीमा

भारत ने 1947 में ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता हासिल की और 1948 तक सभी रियासतों को भारतीय संघ में शामिल कर लिया गया। 5 अक्टूबर 1948 को दांता के महाराजा ने सरकार के साथ विलय समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते के अनुसार, राजा अपनी निजी संपत्ति रख सकते थे और राज्य या सार्वजनिक संपत्ति सरकार को दी जाती।

महाराजा ने विलय के बाद जो सूची प्रस्तुत की, उसमें अंबाजी मंदिर और उससे जुड़े अन्य संपत्ति को निजी संपत्ति के रूप में बताया। सरकार ने इसे स्वीकार नहीं किया और कई पत्रों में स्पष्ट किया कि महाराजा मंदिर के सेवक हैं और मंदिर एक धार्मिक संस्था है, इसलिए इसका प्रबंधन सार्वजनिक ट्रस्ट द्वारा किया जाएगा। उस समय की बॉम्बे सरकार ने महाराजा को ट्रस्ट का अध्यक्ष बनने का भी आमंत्रण दिया लेकिन उन्होंने इसे अस्वीकार कर दिया और अड़े रहे कि मंदिर उनकी संपत्ति में आता है और इसका पूरा प्रबंधन उन्हें सौंपा जाए।

1954 में महाराजा बॉम्बे हाईकोर्ट गए और मंदिर पर सरकार के कब्जे को रोकने के लिए स्थगन की माँग की। हाईकोर्ट ने अस्थायी राहत दी और सरकार की कार्रवाई रोक दी। इसी बीच मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा और 1957 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया।

सुप्रीम कोर्ट का 1957 का फैसला एक अहम मोड़ था

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दांता के महाराजा मंदिर पर अपने मालिकाना हक को साबित नहीं कर पाए हैं और यह संपत्ति एक धार्मिक संस्था है। कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 363 का हवाला देते हुए कहा कि विलय समझौते से जुड़े मामलों की दोबारा सुनवाई कोर्ट नहीं कर सकती। इसलिए मंदिर के स्वामित्व का सवाल यहीं खत्म हो जाता है।

संविधान का अनुच्छेद 363 यह स्पष्ट करता है कि देश की कोई भी कोर्ट रियासतों के विलय के समय किए गए समझौतों में दखल नहीं दे सकती और न ही ऐसे मामलों को दोबारा खोलकर सुन सकती है। यह प्रावधान इसलिए किया गया था ताकि विलय के समय हुए समझौतों को बाद में कोर्ट में चुनौती न दी जाए और कोर्ट पर बिना मतलब का बोझ न पड़े।

कोर्ट के आदेश पर सरकार ने मंदिर को अपने कब्जे में ले लिया, लेकिन विवाद जारी रहा

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पालन करते हुए सरकार ने अंबाजी मंदिर का प्रबंधन अपने हाथ में ले लिया। गुजरात राज्य की स्थापना 1960 में हुई और इसके बाद 1961 में सरकार ने मंदिर के लिए एक प्रशासक नियुक्त किया। इस प्रशासक ने बॉम्बे पब्लिक ट्रस्ट एक्ट के तहत ‘श्री अंबाजी माता देवस्थान’ के नाम से सार्वजनिक ट्रस्ट बनाने के लिए आवेदन किया। दांता के महाराजा ने इसका विरोध किया।

महाराजा के विरोध के बाद जॉइंट चैरिटी कमिश्नर ने मामले की जाँच की, दोबारा आवेदन हुए और मामला जिला अदालत तक पहुँचा। कई सालों तक चली कानूनी प्रक्रिया के बावजूद सभी संस्थाओं और अदालतों का यही रुख रहा कि मंदिर का स्वामित्व शाही परिवार के पास नहीं है।

हालाँकि, 1979 में एक अहम मोड़ आया। जॉइंट चैरिटी कमिश्नर ने महाराजा की मालिकाना हक की माँग को खारिज कर दिया लेकिन उन्हें नवरात्रि के दौरान कुछ विशेष पूजा करने की अनुमति दे दी। यही से एक नया विवाद शुरू हो गया।

जॉइन चैरिटी कमिश्नर ने शाही परिवार को यह खास अधिकार दिया, जिसे बाद में बनासकांठा कोर्ट ने भी बरकरार रखा

महाराजा ने मंदिर के स्वामित्व का दावा करते हुए बनासकांठा जिला कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। इसी बीच 1981 में मंदिर ट्रस्ट ने याचिका दायर कर शाही परिवार को मिले विशेष पूजा अधिकार पर आपत्ति जताई।

आखिरकार 2008 में बनासकांठा जिला कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया। कोर्ट ने एक बार फिर मंदिर ट्रस्ट को वैध ठहराया और महाराजा के स्वामित्व संबंधी दावों को खारिज कर दिया। हालाँकि, कोर्ट ने जॉइंट चैरिटी कमिश्नर द्वारा दिए गए नवरात्रि पूजा के विशेष अधिकार को बरकरार रखा।

इसके बाद महाराजा ने फिर से गुजरात हाईकोर्ट का रुख किया और बनासकांठा कोर्ट के फैसले को पलटने की माँग की। उन्होंने ट्रस्ट को अवैध घोषित करने और मंदिर का स्वामित्व अपने नाम करने की माँग की। इसके जवाब में मंदिर ट्रस्ट ने भी आपत्ति याचिका दायर कर शाही परिवार को मिले विशेष पूजा अधिकार को चुनौती दी।

गुजरात उच्च न्यायालय का फैसला

गुजरात हाईकोर्ट के सामने मुख्य रूप से दो सवाल थे पहला, क्या बनासकांठा जिला कोर्ट का 2008 का फैसला कानूनन सही था और दूसरा, क्या चैरिटी कमिश्नर या किसी अन्य प्राधिकरण द्वारा शाही परिवार को दिया गया विशेष पूजा अधिकार सही था।

कोर्ट ने कहा कि पहले सवाल पर उसके पास ज्यादा गुंजाइश नहीं है क्योंकि इस मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने 1957 में ही तय कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर कोई भी निचली कोर्ट दोबारा विचार नहीं कर सकती। इसके अलावा, अगर कोर्ट ऐसा करना भी चाहे, तो संविधान का अनुच्छेद 363 इसमें बाधा बनता है। यह अनुच्छेद साफ तौर पर कहता है कि 1948 के विलय समझौते को बाद में किसी भी कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि शाही परिवार कभी भी मंदिर पर अपने मालिकाना हक को साबित नहीं कर पाया। सभी दस्तावेजों में उन्हें केवल संरक्षक या प्रबंधक बताया गया है, मालिक नहीं। मंदिर की संपत्ति देवी की मानी जाती है। इसलिए कोर्ट ने माना कि अंबाजी मंदिर कभी भी निजी संपत्ति नहीं रहा है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि सिर्फ इस वजह से कि ऐतिहासिक रूप से मंदिर का प्रबंधन महाराजाओं के हाथ में था, उन्हें मालिक नहीं माना जा सकता। प्रबंधन एक सीमित जिम्मेदारी है, इससे संपत्ति पर मालिकाना अधिकार सिद्ध नहीं होता।

नवरात्रि के दौरान पूजा करने के शाही परिवार के विशेषाधिकार पर कोर्ट का फैसला

नवरात्रि के आठवें दिन अंबाजी मंदिर में शाही परिवार को मिलने वाले विशेष पूजा अधिकार के मुद्दे पर गुजरात हाईकोर्ट ने साफ सवाल उठाया, “जब किसी व्यक्ति का किसी संपत्ति पर मालिकाना हक ही नहीं है, तो उसे वहाँ विशेष अधिकार कैसे मिल सकता है?” कोर्ट ने कहा कि चैरिटी कमिश्नर और अन्य प्राधिकरणों द्वारा दिया गया यह विशेष अधिकार कानूनी रूप से गलत है और इसमें सुधार जरूरी है।

हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे यह साबित हो कि 1947 के बाद भी शाही परिवार को मिले ये विशेष अधिकार जारी रहने थे। न तो बॉम्बे सरकार और न ही गुजरात सरकार के किसी दस्तावेज में ऐसी कोई बात दर्ज है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि स्वतंत्रता से पहले अगर कोई परंपरा थी, तो जरूरी नहीं कि उसे स्वतंत्रता के बाद भी कानूनी संरक्षण मिले और इस मामले में ऐसा कोई आधार नहीं है।

कोर्ट ने कहा कि कुछ समय के लिए भी श्रद्धालुओं को मंदिर में प्रवेश से रोकना संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 का उल्लंघन है। यह एक धार्मिक संस्था है, जहाँ सभी बराबर हैं। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि जब शाही परिवार के पास मंदिर का स्वामित्व ही नहीं है, तो चैरिटी कमिश्नर के पास उन्हें कोई विशेष पूजा अधिकार देने का कोई कानूनी अधिकार नहीं था।

वहीं, शाही परिवार ने अनुच्छेद 25 और 26 का हवाला देते हुए दलील दी कि परंपरा खत्म होने से उनकी धार्मिक स्वतंत्रता प्रभावित होगी। इस पर कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 25 और 26 धार्मिक स्वतंत्रता जरूर देते हैं लेकिन यह सार्वजनिक व्यवस्था और नैतिकता के अधीन हैं।

सार्वजनिक मंदिर में लोगों को प्रवेश से रोकना धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर सही नहीं ठहराया जा सकता। हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि पूर्व शासक रहे हों या कोई और किसी को भी विशेष दर्जा नहीं दिया जा सकता और कानून सभी पर समान रूप से लागू होता है।

इसी आधार पर गुजरात हाईकोर्ट ने बनासकांठा जिला कोर्ट के 2008 के फैसले के खिलाफ शाही परिवार की पहली अपील खारिज कर दी और सार्वजनिक ट्रस्ट को वैध ठहराया। साथ ही कोर्ट ने ट्रस्ट की आपत्ति याचिका स्वीकार करते हुए शाही परिवार को दिए गए सभी विशेष पूजा अधिकार रद्द कर दिए और श्रद्धालुओं को मंदिर से बाहर रखने की अनुमति भी समाप्त कर दी।

फैसले पर मिली-जुली प्रतिक्रियाएँ, शाही परिवार जल्द ही सुप्रीम कोर्ट का खटखटा सकता है दरवाजा

इस मामले में गुजरात हाईकोर्ट के फैसले को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं। एक वर्ग का मानना है कि अब रियासतों का दौर खत्म हो चुका है, इसलिए पुराने विशेष अधिकारों का खत्म होना स्वाभाविक है। उनका कहना है कि शाही परिवार को पूजा करने से कोई रोक नहीं है, लेकिन अब मंदिर में सभी श्रद्धालुओं के साथ समान व्यवहार होना चाहिए और सबको प्रवेश मिलना चाहिए।

वहीं दूसरी ओर, शाही परिवार के समर्थकों और कुछ लोगों का कहना है कि यही एक परंपरा थी, जो शाही परिवार और अंबाजी मंदिर को जोड़ती थी और भावनात्मक महत्व के कारण इसे जारी रहना चाहिए था।

उनका तर्क है कि कई लोगों की आस्था और भावनाएँ शाही परिवार और मंदिर से जुड़ी हुई हैं। भले ही रियासतें खत्म हो चुकी हों लेकिन लोगों की भावनाएँ आज भी कई पूर्व रियासतों में शाही परिवारों के साथ जुड़ी हुई हैं।

इसी वजह से अब यह माँग उठने लगी है कि शाही परिवार इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाए। मामले के लंबे इतिहास और इसके महत्व को देखते हुए यह तय माना जा रहा है कि यह मामला अंततः देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुँचेगा।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से गुजराती में मेघल सिंह परमार ने लिखी है, जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे)

चारे का लालच देकर ले गए और काट दी गर्भवती गाय, गौ रक्षकों पर तलवार से किया हमला: सद्दाम और उसके नाबालिग साथी को गुजरात पुलिस ने पकड़ा

गुजरात के वलसाड जिले के उमरगाम तालुका के सारिगाम इलाके में बुधवार (24 दिसंबर 2025) की रात एक गर्भवती गाय को काटे जाने का मामला सामने आया है। यह घटना सारिगाम के रोहितवास क्षेत्र में एक फैक्ट्री के पीछे हुई है। घटना की सूचना मिलने के बाद पुलिस मौके पर पहुँची और मामले की जाँच शुरू कर दी है।

पुलिस के अनुसार, इस मामले में दो युवकों पर गाय काटने का आरोप है। इनमें से एक नाबालिग और दूसरा बालिग है। गौ रक्षकों ने घटनास्थल पर मौजूद नाबालिग आरोपित को पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया। जाँच के दौरान पुलिस को मौके से गर्भवती गाय का कटा हुआ सिर और गोमांस के अवशेष बरामद हुए।

जानकारी के मुताबिक, आरोपित युवक गाय को चारा खिलाने के बहाने वहाँ लाए और उसकी हत्या की। बताया जा रहा है कि वे मांस बेचने की तैयारी में थे। इस दौरान एक आरोपित सद्दाम शाहबुद्दीन खान मौके से फरार हो गया था।

आरोप है कि एक आरोपित सद्दाम ने तलवार से गौ रक्षकों पर हमला करने की कोशिश भी की। पुलिस ने बाद में फरार आरोपित को भी गिरफ्तार कर लिया है। मामले में केस दर्ज कर लिया गया है और आगे की कानूनी कार्रवाई जारी है।

भीलाड पुलिस ने घटनास्थल से गोमाँस के अवशेष, छर्रे और अन्य जरूरी सामान जब्त कर लिया है। पुलिस इस मामले में कानूनी और फोरेंसिक जाँच कर रही है। ऑपइंडिया से बातचीत में भीलाड पुलिस स्टेशन के PI पवार ने बताया कि पहले फरार दूसरा आरोपित भी अब गिरफ्तार कर लिया गया है और दोनों आरोपितों से पूछताछ जारी है।

एक स्थानीय हिंदू संगठन के नेता ने ऑपइंडिया को बताया कि पुलिस ने दोनों आरोपितों को हिरासत में ले लिया है, जिनमें से एक नाबालिग है। पुलिस ने मामले की गंभीरता और संवेदनशीलता को देखते हुए फिलहाल ज्यादा जानकारी साझा नहीं की है। पुलिस ने खुद शिकायतकर्ता बनकर मामला दर्ज किया है और आगे की कार्रवाई शुरू कर दी है।

घटना के बाद सारिगाम ग्राम पंचायत कार्यालय में एक बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में हिंदू और मुस्लिम समुदायों के प्रतिनिधि, विश्व हिंदू परिषद के पदाधिकारी, स्थानीय लोग, पुलिस अधिकारी और उमरगाम विधायक रमनभाई पाटकर मौजूद थे।

बैठक में गर्भवती गाय की हत्या को लेकर गौरक्षकों ने नाराजगी और चिंता जताई। पुलिस ने दोनों समुदायों से शांति बनाए रखने की अपील की है। फिलहाल मामले की जाँच और आगे की कानूनी कार्रवाई जारी है।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से गुजराती टीम के भार्गव राज्यगुरु ने लिखी है जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे)

2026: जब भारत के नेतृत्व में पश्चिमी प्रभुत्व की विश्व व्यवस्था दरकने लगेगी

जब परिधि में खड़े देश केंद्र की भाषा बोलने लगते हैं, तभी वैश्विक शक्ति संतुलन बदलता है। 2026 वही वर्ष है, क्योंकि 1 जनवरी से भारत ब्रिक्स (BRICS) की अध्यक्षता सँभालने जा रहा है।

औपचारिक रूप से यह दायित्व एक वर्ष- यानी 31 दिसंबर 2026 तक भारत के पास रहेगा। लेकिन इसे केवल कैलेंडर आधारित जिम्मेदारी समझना भारी भूल होगी। भारत की यह अध्यक्षता कोई रूटीन कूटनीतिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि सभ्यतागत और भू-राजनीतिक नेतृत्व परिवर्तन है। यह दायित्व भारत को उस समय मिल रहा है, जब वह वैश्विक शक्ति संतुलन के खेल में मूकदर्शक नहीं, बल्कि नियम लिखने की स्थिति में खड़ा है।

वह समय बीत चुका है जब पश्चिमी मीडिया ‘ढीला-ढाला क्लब’ कहकर ब्रिक्स का उपहास करता था। अब वह केवल ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका तक सीमित नहीं है। सऊदी अरब, यूएई, ईरान और मिस्र जैसे देशों के प्रवेश ने इसे पेट्रो-डॉलर व्यवस्था के वास्तविक विकल्प के रूप में खड़ा कर दिया है। इस समूह ने 2024 में दुनिया का लगभग 42 प्रतिशत तेल का उत्पादन किया है।

आज वैश्विक GDP में ब्रिक्स का लगभग 40 प्रतिशत योगदान है, जो पश्चिम के कथित एलीट क्लब G-7 से काफी अधिक है। यह समूह दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी का घर है। ऊर्जा, कच्चा माल, मैन्युफैक्चरिंग और उपभोक्ता बाजार- चार मोर्चों पर निर्णायक भूमिका निभा रहा है। ब्रिक्स देशों के पास दुनिया का 20 प्रतिशत स्वर्ण भंडार है।

भारत: ध्रुवों के बीच की धुरी

इस ऐतिहासिक मोड़ पर ब्रिक्स का नेतृत्व सँभालने जा रहा भारत किसी एक धड़े का प्रतिनिधि नहीं है। यही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। वह रूस का भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार है। अमेरिका के साथ उसके गहरे आर्थिक और तकनीकी संबंध हैं। वह चीन का प्रतिस्पर्धी भी है और उसे उसकी औकात में रखने की ताकत भी। सबसे बढ़कर भारत आज ग्लोबल साउथ की स्वाभाविक आवाज है।

लंबे समय तक पश्चिम भारत को एक ‘सॉफ्ट स्टेट’ के रूप में देखता रहा। निर्धन, अव्यवस्थित और वैश्विक सहायता पर निर्भर देश के तौर पर। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीते एक दशक में भारत ने इस भ्रम को पूरी तरह चकनाचूर कर दिया है।

आज का भारत आत्मनिर्भर है। उसके पास विश्व-स्तरीय डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर है। वैक्सीन डिप्लोमेसी के जरिए उसने वैश्विक भरोसा अर्जित किया है। G20 में उसने ग्लोबल साउथ को केंद्र में रखा और अब वही दृष्टि BRICS तक पहुँच रही है।

यह वस्तुतः भारतीय राष्ट्रवाद का वैश्विक विस्तार है। अब भारत का राष्ट्रवाद सीमाओं में कैद नहीं। यह सभ्यतागत नेतृत्व का दावा है।

पश्चिमी प्रभुत्व पर सबसे बड़ा प्रहार

यह केवल भारत की कहानी नहीं है। विश्व व्यवस्था के केंद्र से बाहर खड़े देश अब सवाल पूछ रहे हैं- हमारी नीतियाँ वॉशिंगटन क्यों तय करे? हमारी संस्कृति पिछड़ी क्यों कहलाए? हमारी संप्रभुता IMF की फाइलों में क्यों कैद रहे?

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत इन प्रश्नों का उत्तर बनकर खड़ा है- बिना झुके, बिना पश्चिमी प्रमाण पत्र माँगे।

पश्चिम यह जानता है कि भारत के बिना ब्रिक्स न तो विस्तार पा सकता है, न विश्वसनीयता। चीन की वैश्विक छवि आक्रामक है। बेल्ट रोड इनिशिएटिव (BRI) के जरिए उस पर कर्ज जाल में कई देशों को फँसाने के आरोप हैं। दक्षिण एशिया और इंडो-पैसिफिक में उसे संदेह की दृष्टि से देखा जाता है।

डॉलर की अनिवार्यता टूट रही है

पश्चिम को किसी सेना से सबसे अधिक डर नहीं लगता। उसे डर लगता है डॉलर के विकल्प से। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, वैकल्पिक भुगतान तंत्र और ऊर्जा लेन-देन में डॉलर से दूरी- ये सभी उस व्यवस्था को कमजोर कर रहे हैं, जिस पर अमेरिकी शक्ति टिकी है।

याद रखिए, अमेरिका की ताकत उसकी सेना से नहीं, डॉलर की अनिवार्यता से आती है। भारत के नेतृत्व में BRICS उसी अनिवार्यता को खत्म करने की प्रक्रिया को गति देगा। इसी साल अगस्त में भारत ने अमेरिकी डॉलर (USD) के प्रभुत्व को चुनौती देने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए एक आधिकारिक परिपत्र जारी किया है, जिसके तहत ब्रिक्स देशों को अपना 100% व्यापार भारतीय रुपए में करने की अनुमति दी गई है।

2026: केवल भारत की BRICS अध्यक्षता ही नहीं, दिशा-निर्धारण का भी वर्ष

2026 केवल भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता का वर्ष नहीं है। यह वह समय है जब अमेरिका आंतरिक ध्रुवीकरण से जूझ रहा होगा, यूरोप ऊर्जा और जनसांख्यिकीय संकट में होगा और ग्लोबल साउथ पश्चिमी मॉडल पर निर्णायक प्रश्न खड़े कर चुका होगा।

इस पृष्ठभूमि में यदि भारत ब्रिक्स को विकास, संप्रभुता और बहुध्रुवीयता के साझा मंच के रूप में स्थापित करता है, तो अमेरिका की ‘हम ही नियम बनाएँगे’ वाली मोनोपॉली स्वतः कमजोर होगी। यह अमेरिका-विरोध नहीं, बल्कि अमेरिका-केंद्रित विश्व व्यवस्था के अंत की प्रक्रिया है।

आज भारत न सफाई देता है, न प्रमाण पत्र माँगता है, न उधार के नैरेटिव पर निर्भर है। BRICS की अध्यक्षता भारत को यह अवसर देगी कि वह विकासशील देशों को बताए- आधुनिकता का रास्ता पश्चिम की नकल नहीं, अपनी शर्तों पर आगे बढ़ना है।

भारत अब उभरती शक्ति नहीं, निर्धारक शक्ति बनने की ओर

2026 में भारत ब्रिक्स का अध्यक्ष होगा, लेकिन असल प्रश्न यह नहीं है कि वह कितने सम्मेलन कराएगा। असल प्रश्न यह है कि- क्या भारत वैश्विक विमर्श को दिशा देगा? क्या वह डॉलर के विकल्पों को वैधता देगा? क्या वह चीन की आक्रामकता और पश्चिम के दंभ- दोनों के बीच संतुलन बना पाएगा?

उत्तर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत का वैश्विक उभार देता है। यह बताता है कि अब वह उभरती शक्ति नहीं, निर्धारक शक्ति बनने की ओर है। यही तथ्य दुनिया के पुराने प्रभुओं को असहज कर रहा है।

2026 के बाद सवाल यह नहीं रहेगा कि पश्चिम गिरेगा या नहीं। सवाल यह होगा- वह इस गिरावट को कितनी गरिमा से स्वीकार करता है? क्योंकि भारत इतिहास के उस मोड़ पर खड़ा है, जहाँ राष्ट्रवाद पहली बार मानवता के साथ खड़ा दिखाई देता है। यही भारत का उभार है। यही BRICS का अर्थ है।

वाम-लिबरल विमर्श से गढ़े गए पश्चिमी प्रभुत्व के नैरेटिव को भले यह सत्य असहज लगे, पर 2026 का सत्य यही है।

कौन है शमाइल नदवी, लोग क्यों बता रहे अगला जाकिर नाईक: ‘ईश्वर के अस्तित्व’ पर जावेद अख्तर के साथ चर्चा के बाद सुर्खियों में है यह मुफ्ती

भारत हमेशा से धार्मिक चर्चाओं का देश रहा है और ‘ईश्वर के अस्तित्व’ जैसे विषय पर एक हाई-प्रोफाइल बहस लोगों को आकर्षित करने का सबसे मारक हथियार मानी जा सकती है। बीते 20 दिसंबर 2025 को गीतकार, लेखक और घोषित ‘इस्लामिक नास्तिक’ जावेद अख्तर ने इस्लामी विद्वान मुफ्ती शमाइल नदवी के साथ एक लाइव चर्चा में हिस्सा लिया, जिसका शीर्षक था ‘क्या ईश्वर का अस्तित्व है?’। करीब 2 घंटे की इस डिबेट के मॉडरेटर ‘द लल्लनटॉप’ के एडिटर सौरभ द्विवेदी थे।

इस बहस ने नदवी को स्पॉटलाइट में ला दिया। उनके समर्थकों ने सोशल मीडिया पर उनके रील्स खूब शेयर किए और दावा किया कि जावेद अख्तर को नदवी ने हरा दिया है। जैसा कि प्रोपेगेंडा होता है, यह भी दावा किया जाना लगा कि इस बहस के बाद लोग इस्लाम की और आने लगे हैं। हालाँकि, प्रोपेगेंडा ज्यादा देर तक टिकता नहीं है और ऐसा ही नदवी के साथ भी हुआ। सोशल मीडिया पर नदवी के पुराने वीडियो शेयर होने लगे। इन वीडियो में नदवी किसी इस्लामी कट्टरपंथी की तरह भाषण देते दिखे और सोशल मीडिया पर लोगों ने उन्हें ‘अगला जाकिर नाईक’ तक बता दिया।

कौन हैं शमाइल नदवी?

नदवी की बहस और वायरल वीडियो पर चर्चा से पहले जानते हैं कि शमाइल नदवी का बैकग्राउंड क्या है। मुफ्ती शमाइल नदवी का पूरा नाम शमाइल अहमद अब्दुल्ला है। उनका जन्म जून 1998 में पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में हुआ। उनकी शुरुआती तालीम कोलकाता में ही हुई, जहाँ अपने अब्बू की सरपरस्ती और रहनुमाई में उन्होंने इस्लामी उलूम की बुनियादी शिक्षा हासिल की।

कोलकाता में कुरआन की शुरुआती तालीम पूरी करने के बाद शमाइल ने 2014 में उत्तर प्रदेश के लखनऊ स्थित प्रसिद्ध इस्लामी शिक्षण संस्था दारुल उलूम नदवतुल उलेमा में दाखिला लिया। यहाँ से उन्होंने मुफ्ती की डिग्री हासिल की। इस दौरान उन्होंने कुरआन, हदीस और फिक्ह यानी इस्लामी कानून जैसे विषयों की पढ़ाई की थी।

दारुल उलूम नदवतुल उलेमा से तालीम हासिल करने के कारण शमाइल अब्दुल्ला ने अपने नाम के साथ नदवी उपनाम जोड़ा। नदवा से पढ़ने वाले छात्रों के लिए अपने नाम के साथ नदवी लिखना एक परंपरागत पहचान मानी जाती है।

नदवा से इस्लामी शरीयत की उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद शमाइल नदवी ने आगे की तालीम के लिए मलेशिया का रुख किया। वे वर्तमान में वहाँ इस्लामी शिक्षा के विषय में पीएचडी कर रहे हैं। मलेशिया वही देश है जहाँ भगोड़ा इस्लामी कट्टरपंथी जाकिर नाईक रह रहा है।

शमाइल नदवी मरकज-अल-वहयैन नामक एक ऑनलाइन शैक्षिक संस्थान के संस्थापक और प्रधानाचार्य हैं। इसके अलावा वर्ष 2024 में उन्होंने वाहियान फाउंडेशन नाम से एक धार्मिक ट्रस्ट की स्थापना की। उनके ट्रस्ट द्वारा अरबी भाषा और बुनियादी इस्लामी शिक्षा जैसे कुरआन, हदीस और फिक्ह की ऑफलाइन पढ़ाई भी कराई जाती है।

क्यों शमाइल नदवी की जाकिर नाईक से हो रही तुलना?

शमाइल नदवी के बहस के वीडियो तो खूब वायरल हुए ही, साथ ही उनके कुछ पुराने वीडियो भी सोशल मीडिया पर सामने आए। इन पुरानी वीडियो में इस्लाम के कट्टरपंथी रुख को लेकर नदवी के विचार खूब वायरल है और इन्हीं के कारण उनकी तुलना सोशल मीडिया पर जाकिर नाईक के साथ की जा रही है।

सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में शमाइल नदवी देश को सबसे ऊपर रखने और सेक्युलर व्यवस्था के खिलाफ इस्लामी लोगों को भड़का रहे हैं। मेजर सुरेंद्र पूनिया ने X पर यह वीडियो शेयर किया है। पूनिया ने लिखा, “भारत का नया जाकिर नाईक, यह भी कह रहा है कानून संविधान कुछ नहीं…शरीयत ही सब कुछ है। एक दिन यह भी देश छोड़ कर भाग जाएगा।”

इस वीडियो में शमाइल नदवी कह रहे हैं, “अगर हम चाहते हैं कि हमारे मौजूदा हालात सही हो जाएँ तो हालात का हल किसी सियासी पार्टी के पास नहीं है। हालात का हल दीन (इस्लाम) में है। इस मुल्क में हमारा अप्रोच गलत रहा। हम ये कहते फिरते रहे कि हमारा वतन, हमारे दीन से ज्यादा मुकद्दस (पाक-पवित्र) है। हमने ये एहतराफ किया कि सेक्युलर निजाम (व्यवस्था-शासन), हमारे निजाम से ज्यादा मुकद्दस है।”

नदवी आगे कहते हैं, “हम कुफ्रिया अल्फाज कहते रहे। हम ऐसे जुमले अपनी जुबान से निकालते रहे कि फलाँ दरबार से जो फैसला हो जाएगा, हम खामोशी से तस्लीम कर लेंगे। क्या फलाँ दरबार अगर शरीयत के खिलाफ हुक्म दे, क्या तुम तस्लीम करोगे? किसी भी मुस्लिम मर्द या औरत के लिए यह जायज नहीं है कि अगर अल्लाह ने किसी मामले में फैसला कर दिया तो अब अल्लाह को छोड़कर गैर-अल्लाह को हुक्म बनाएँ।”

इस वीडियो को मोटे तौर पर समझें तो नदवी दरअसल ये बता रहे हैं कि हर समस्या का हल इस्लाम के भीतर है और किसी भी मुस्लिम को खुद को सेक्युलर या देश को मजहब से पहले रखने की जरूरत नहीं है। साथ ही वो शरीयत को किसी भी फैसले से ऊपर बता रहे हैं। यहाँ उन्होंने सीधे तौर पर नाम नहीं लिया लेकिन सोशल मीडिया पर लोग दावा कर रहे हैं कि असल में वो अदालतों या किसी संस्था के फैसला को शरीयत की कसौटी पर कसने और अगर फैसला शरीयत के हिसाब से ना हो तो उसका विरोध करने के लिए कह रहे हैं।

इस्लाम में हराम है म्यूजिक: नदवी

नदवी के ऐसे वीडियो की भरमार है। जिसमें वो इस्लामिक कायदों की जानकारी दे रहे हैं। एक वीडियो में उन्होंने म्यूजिक सुनने को हराम बताया है। इस वीडियो में वह कह रहे हैं, “जिस नशीद में हल्का-हल्का म्यूजिक आता है उसे सुनना जायज है क्या? वह कहते हैं कि म्यूजिक तेज हो या हल्का हो इससे फर्क नहीं पड़ता है। जो चीज शरीयत में हराम है, वो हराम है। म्यूजिक को सुनना जायज नहीं है, चाहे वो म्यूजिक किसी भी चीज में इस्तेमाल किया जाए।”

‘भगवा लव ट्रैप’ से लेकर ‘इस्लाम ही इकलौता सच’ तक का प्रोपेगेंडा

शमाइल नदवी ने कथित ‘भगवा लव ट्रैप’ को लेकर भी प्रोपेगेंडा फैलाया था और उसके वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं। यह लव जिहाद के खिलाफ इस्लामी कट्टरपंथियों का प्रोपेगेंडा का एक प्रयास था। वायरल वीडियो में नदवी कह रहे हैं, “तुम अपनी मुस्लिम औरतों को मुशरिकीन (मूर्तिपूजक या अल्लाह के अलावा किसी और को मानने वाले) के निकाह में ना दो। एक गुलाम मुस्लिम वो मुशरिक से बेहतर है अगर वो मुशरिक तुम्हें पसंद ही क्यों ना आ रहा हो।”

शमाइल नदवी ने इस वीडियो में मुस्लिम लड़कियों को यह कहकर भी भड़काने की कोशिश की कि मुशरिकीन से निकाह जायज नहीं है और यह जहन्नम यानी नर्क का रास्ता है।

एक अन्य वायरल वीडियो में सिर्फ इस्लाम को सच्चा बताते हुए नजर आ रहे हैं। सर्वधर्म समभाव की भारतीय अवधारणा से इतर मुफ्ती कह रहे हैं, “ये जो दीन-ए-इस्लाम है, ये वाहिद वो दीन है। जो बरहक (‘सच्चा’) है और इसके अलावा जो भी नजरिया है दुनिया में वो सब बातिल (असत्य-झूठ) हैं। उन्होंने आगे कहा, “कोई भी शख्स तब तक कामयाब नहीं हो सकता है, जब तक वो दीन-ए-इस्लाम में दाखिल ना हो। इस बात को दिमाग में बैठा लें।”

‘नमस्ते’ कहना भी इस्लाम में नाजायज: नदवी

नदवी एक वीडियो में नमस्ते कहने को भी नाजायज बता रहे हैं। नदवी ने कहा कि नमस्ते संस्कृत भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है ‘मैं आपके सामने झुकता हूँ’ और एक मुसलमान अल्लाह के अलावा किसी का आगे नहीं झुकता है। वो कहते हैं कि यह शब्द कहना जायज नहीं है। एक अन्य वीडियो में वो हिजाब को लेकर कह रहे हैं कि मुस्लिम महिलाओं को लिए पूरे शरीर को ढँकना जरूरी है। उन्होंने साफ कहा कि हिजाब कोई विकल्प नहीं है बल्कि इसे पहनना जरूरी है।

शमाइल नदवी की छवि शुरू में एक पढ़े-लिखे, तार्किक इस्लामी विद्वान की बनाई गई लेकिन उनके पुराने और लगातार सामने आ रहे बयानों ने इस छवि की परतें खोल दीं। जिन वीडियो में वे संविधान, सेक्युलर व्यवस्था और न्यायिक फैसलों को शरीयत के अधीन मानने की बात करते हैं, वे सीधे-सीधे लोकतांत्रिक ढाँचे को नकारने की सोच को दर्शाते हैं। किसी भी देश में कानून से ऊपर किसी धार्मिक व्यवस्था को रखने की वकालत अपने आप में कट्टरपंथ का स्पष्ट संकेत है।

नदवी का यह कहना कि देश या संविधान को दीन से ऊपर रखना ‘गलत अप्रोच’ है, यह बताता है कि वे नागरिक पहचान से पहले धार्मिक पहचान थोपना चाहते हैं। यही सोच आगे चलकर सामाजिक विभाजन और टकराव की जमीन तैयार करती है। म्यूजिक को हराम बताना, नमस्ते जैसे सामान्य अभिवादन को नाजायज कहना, या यह दावा करना कि इस्लाम के अलावा सभी धर्म ‘बातिल’ हैं, ये बयान केवल आस्था नहीं बल्कि सांस्कृतिक असहिष्णुता को बढ़ावा देते हैं।

स्वतंत्रता संग्राम का विरोध, चीन का समर्थन और सैंकड़ों सुरक्षाकर्मियों की हत्या: भारत में वामपंथ के पूरे हुए 100 साल, पढ़ें कैसे कम्युनिस्टों की ‘विदेशी विचारधारा’ ने देश को हिंसा की आग में जलाया

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के 100 साल पूरे होने पर इसके नेता और समर्थक जश्न और पुरानी यादों के साथ इस मौके को मना रहे हैं। हालाँकि, सौ साल का सफर सिर्फ यादें ताजा करने के लिए नहीं होता, बल्कि यह समय आत्म-मंथन और गंभीर मूल्यांकन का भी है। राजनीतिक आंदोलन केवल अपनी उम्र से प्रासंगिक नहीं बनते, बल्कि वे अपने परिणामों (कामयाबियों) से अपनी अहमियत साबित करते हैं।

पिछली एक सदी में, भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन ने खुद को गरीबों, मजदूरों और किसानों की आवाज के रूप में पेश किया है। इसने हमेशा यह दावा किया कि वह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक लंबी अवधि का समाधान है और नैतिक रूप से अन्य राजनीतिक परंपराओं से बेहतर है। हालाँकि, अपनी इस छवि के बावजूद, आज कम्युनिस्ट आंदोलन चुनावी रूप से सिमट गया है, विचारधारा के मामले में काफी सख्त (जड़) हो गया है और भारत की सामाजिक व आर्थिक सच्चाइयों से पूरी तरह कटता जा रहा है।

इससे एक ऐसा अनिवार्य सवाल खड़ा होता है जिसे महज नारों या अतीत की पुरानी यादों के सहारे टाला नहीं जा सकता:

क्या भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन ने वाकई भारत की सेवा की, या फिर इसने देश के राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुँचाया?

यह लेख इस सवाल का जवाब किसी खोखली बयानबाजी या वैचारिक भेदभाव के आधार पर नहीं, बल्कि ऐतिहासिक रिकॉर्ड, राजनीतिक व्यवहार और ठोस परिणामों के जरिए देने की कोशिश करता है। क्योंकि 100 साल बीत जाने के बाद, कोई भी विचारधारा न तो बिना सोचे-समझे सम्मान की हकदार है और न ही बिना सोचे-समझे तिरस्कार की, बल्कि वह एक ईमानदार ऑडिट (सच्चे मूल्यांकन) की हकदार है।

साम्यवाद का क्षेत्र: भारतीय नहीं, स्वदेशी कभी नहीं

कम्युनिज्म (Communism) का उदय भारत की सामाजिक, सांस्कृतिक या आर्थिक हकीकत से नहीं हुआ था। यह एक यूरोपीय वैचारिक उत्पाद था, जो 19वीं सदी के यूरोप की खास परिस्थितियों में पैदा हुआ था। वे परिस्थितियाँ थीं- तेजी से होता औद्योगिकीकरण, फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूर और पूंजीपतियों व औद्योगिक श्रमिकों के बीच गहरी वर्गीय खाई।

इस सिद्धांत को कार्ल मार्क्स ने विकसित किया था, जिन्होंने यूरोपीय पूंजीवाद का विश्लेषण किया, और बाद में इसे व्लादिमीर लेनिन ने अपनाया, जिन्होंने सत्ता हथियाने के लिए एक कड़े नियंत्रण वाले और ‘हरावल दस्ते’ (vanguard) के नेतृत्व वाली क्रांति की वकालत की थी।

इन दोनों विचारकों (मार्क्स और लेनिन) ने ऐसे समाजों में काम किया जो एक जैसे थे और जहाँ उद्योग मुख्य थे। वहाँ इंसान की असली पहचान उसकी आर्थिक स्थिति या ‘क्लास’ से होती थी। उनके काम करने का तरीका इन तीन बातों पर टिका था।

शोषक और शोषित की साफ पहचान: यानी समाज में एक पक्ष हमेशा जुल्म करने वाला और दूसरा जुल्म सहने वाला होता है।

न्याय के लिए हिंसा का रास्ता: यानी इंसाफ पाने के लिए पुरानी व्यवस्था को हिंसक तरीके से तोड़ना जरूरी है।

कड़ा सरकारी नियंत्रण: यानी गैर-बराबरी को खत्म करने के लिए सारी ताकत एक जगह (सरकार के हाथ में) रखना ही समाधान है।

लेकिन भारत की बनावट कभी ऐसी नहीं रही। भारतीय समाज हजारों साल पुरानी एक सभ्यता है, जो विविधताओं (अलग-अलग तरह के लोगों) से भरी हुई है। यहाँ समाज सिर्फ अमीर-गरीब (आर्थिक क्लास) से नहीं, बल्कि समुदायों, क्षेत्रों, धर्मों, भाषाओं और परंपराओं से बना है। इतिहास गवाह है कि भारत में सामाजिक बदलाव हमेशा सुधार आंदोलनों और आपसी तालमेल से आए हैं, न कि पुरानी व्यवस्था को पूरी तरह तबाह करके।

भारत की इसी खूबी और कम्युनिस्ट विचारधारा के बीच मेल न होना ही वह कारण है, जिसकी वजह से कम्युनिज्म को यहाँ गहराई से नहीं अपनाया गया। एक ऐसी विचारधारा जो केवल ‘दो पक्षों’ (शोषक और शोषित) की लड़ाई पर टिकी हो, वह उस सभ्यता में नहीं टिक सकती जो विविधता और सबको साथ लेकर चलने में विश्वास रखती है। भारतीय समाज लचीला और सबको साथ जोड़ने वाला है, जबकि कम्युनिज्म सख्त और बँटा हुआ है। यही विरोध भारत में कम्युनिज्म की असफलता की सबसे बड़ी वजह है।

देश से ऊपर विचारधारा: भारत छोड़ो आंदोलन और चीन युद्ध

नतीजे देने में फेल होने के साथ-साथ, भारतीय कम्युनिस्टों पर यह आरोप भी लगता है कि उन्होंने हमेशा देश के हित से ऊपर अपनी विचारधारा को रखा। इस विरोधाभास के दो बड़े उदाहरण गौर करने लायक हैं।

भारत छोड़ो आंदोलन (1942): जब CPI देश के साथ खड़ी नहीं हुई

अगस्त 1942 में, भारत ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ अब तक का सबसे बड़ा जन-आंदोलन देखा, जिसे ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ कहा गया। महात्मा गाँधी के नेतृत्व में शुरू हुए इस आंदोलन में देश के हर कोने और हर समुदाय के लोग शामिल हुए थे। लेकिन ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी’ (CPI) ने इस आंदोलन का विरोध करने का फैसला किया।

CPI ने इस आंदोलन का साथ क्यों नहीं दिया? इसकी वजह जानकर आपको हैरानी हो सकती है। यह फैसला भारत के लिए नहीं, बल्कि उनकी विचारधारा से जुड़ा था। उस समय दूसरे विश्व युद्ध के दौरान सोवियत संघ (रूस) पर जर्मनी ने हमला कर दिया था, जिसके बाद रूस ने ब्रिटेन के साथ हाथ मिला लिया। चूंकि ब्रिटेन अब रूस का साथी बन चुका था, इसलिए CPI ने इस युद्ध को फासीवाद के खिलाफ ‘जनता का युद्ध‘ (People’s War) घोषित कर दिया।

उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया कि वे अंग्रेजों के खिलाफ कोई रुकावट पैदा न करें और हड़ताल या विरोध प्रदर्शनों को रोकें। यहाँ तक कि कई मामलों में कम्युनिस्ट नेताओं ने ब्रिटिश सरकार का सहयोग भी किया। जब लाखों भारतीय अंग्रेजों की गोलियाँ खा रहे थे और जेल जा रहे थे, तब CPI हाथ पर हाथ धरे बैठी रही। ऐसा इसलिए नहीं था कि भारत आजादी के लिए तैयार नहीं था, बल्कि इसलिए था क्योंकि उनकी प्राथमिकता भारत नहीं, बल्कि ‘मॉस्को’ (रूस) के हित थे।

1962 का चीन युद्ध: चुप्पी, उलझन और चीन के प्रति लगाव

ठीक 20 साल बाद 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान फिर से वही पुरानी बात दोहराई गई। जब चीनी सेना ने लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश में भारतीय सीमाओं को पार किया, तब पूरे देश को राजनीतिक एकता और स्पष्टता की उम्मीद थी। लेकिन इसके बजाय, कम्युनिस्ट आंदोलन के एक बड़े हिस्से ने चीन के प्रति हमदर्दी दिखाई और इस मामले पर गोल-मोल बात की। इसी विवाद की वजह से आगे चलकर CPI के दो टुकड़े हो गए और चीन का समर्थन करने वाले गुट ने अलग होकर ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी)’ यानी CPM बना ली

देशहित से अलग हटकर सोचना तो कम्युनिज्म की असफलता का सिर्फ एक हिस्सा था। इससे भी ज्यादा नुकसानदेह वह तरीका था, जिसमें कम्युनिस्ट आंदोलन के कुछ हिस्सों ने लोकतांत्रिक राजनीति का रास्ता ही छोड़ दिया और हथियारों के दम पर बगावत शुरू कर दी। 1960 के दशक के आखिर से, भारत में कम्युनिस्ट विचारधारा ने न केवल सरकार का विरोध किया, बल्कि उसके खिलाफ युद्ध छेड़ दिया।

इसके बाद जो कुछ हुआ, वह मजदूरों के अधिकारों की लड़ाई नहीं थी, बल्कि हिंसा का एक लंबा दौर था। इसमें हत्याएँ की गईं, नरसंहार हुए, सरकारी संपत्तियों को तबाह किया गया और आम जनता को डराया-धमकाया गया। इस हिंसा के शिकार कोई विदेशी शासक या बड़े पूंजीपति नहीं थे, बल्कि भारत के आम लोग थे। जनजातीय (आदिवासी), किसान, जनप्रतिनिधि, पुलिसकर्मी और दिहाड़ी मजदूर। भारतीय कम्युनिज्म की असली मानवीय कीमत को समझने के लिए नारों या किताबों को नहीं, बल्कि कम्युनिस्ट उग्रवाद द्वारा छोड़े गए खून के निशानों को देखना होगा।

भारत में कम्युनिस्ट उग्रवादियों द्वारा किए गए 10 सबसे बड़े नरसंहार

दंतेवाड़ा नरसंहार (2010), छत्तीसगढ़– 6 अप्रैल 2010 को, ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (नक्सली)’ के लड़ाकों ने छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में बहुत ही सोची-समझी साजिश के तहत हमला किया। इस हमले में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के 76 जवान शहीद हो गए थे। उग्रवादियों ने पहले बारूदी सुरंगों (landmines) का इस्तेमाल किया और फिर ऑपरेशन से लौट रहे जवानों पर अँधाधुँध गोलियाँ बरसा दीं। आजादी के बाद भारतीय सुरक्षा बलों पर हुआ यह अब तक का सबसे बड़ा और भयानक हमला माना जाता है। इस घटना के बाद देश में ‘नक्सलवाद’ के खिलाफ लड़ने के तरीके में बड़ा बदलाव आया।

झीरम घाटी नरसंहार (2013), छत्तीसगढ़- 25 मई 2013 को, नक्सली उग्रवादियों ने बस्तर के झीरम घाटी इलाके में कॉन्ग्रेस पार्टी के काफिले पर हमला किया था। इस हमले में वरिष्ठ राजनेताओं समेत 27 लोगों की जान चली गई। नक्सलियों ने यह हमला उस समय किया जब नेता जनता के बीच जा रहे थे। इस घटना ने यह साफ कर दिया कि माओवादी चुनाव लड़ने या लोकतंत्र में भरोसा रखने के बजाय, जनता द्वारा चुने गए नेताओं को खत्म करने की रणनीति पर काम करते हैं। इस हमले की पूरी देश में निंदा हुई और इसे भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सीधा हमला माना गया।

नयागढ़ शस्त्रागार हमला (2008), ओडिशा- फरवरी 2008 में, नक्सली लड़ाकों ने ओडिशा के नयागढ़ में पुलिस के शस्त्रागार (जहाँ हथियार रखे जाते हैं) पर एक साथ मिलकर रात में हमला बोला। इस हमले में 15 पुलिसकर्मी मारे गए, भारी मात्रा में हथियार लूट लिए गए और सरकारी इमारतों को तबाह कर दिया गया। इस घटना ने दिखाया कि उग्रवादी कितने खतरनाक और बड़े हमले करने की ताकत रखते हैं। इस लूट के बाद उस इलाके में नक्सलियों के पास हथियारों की ताकत काफी बढ़ गई।

सुकमा हमला (2017), छत्तीसगढ़- 24 अप्रैल 2017 को, सुकमा जिले के चिंतालनार इलाके में नक्सलियों ने CRPF की एक टीम पर अचानक हमला कर दिया, जिसमें 25 जवान शहीद हो गए। उग्रवादियों ने इस हमले में देशी बमों (IED) और बहुत करीब से गोलीबारी का इस्तेमाल किया। उन्होंने वहाँ के मुश्किल रास्तों और खुफिया जानकारी के लीक होने का फायदा उठाया। इस घटना ने यह दिखाया कि सालों से चल रहे अभियानों के बावजूद, नक्सली उग्रवाद की ताकत अभी भी खत्म नहीं हुई है।

अरनपुर IED हमला (2023), छत्तीसगढ़- अप्रैल 2023 में, नक्सली उग्रवादियों ने दंतेवाड़ा के अरनपुर इलाके में एक प्रेशर IED (बारूदी सुरंग) में धमाका किया। इस हमले में ‘डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड’ (DRG) के 10 जवान और एक नागरिक ड्राइवर की जान चली गई। उग्रवादियों ने एक ऐसे वाहन को निशाना बनाया जो उग्रवाद विरोधी अभियान से लौट रहा था। यह घटना एक बार फिर नक्सलियों की उस रणनीति को दिखाती है, जिसमें वे सार्वजनिक सड़कों पर बिना सोचे-समझे बमों का इस्तेमाल करते हैं।

सेनारी गाँव नरसंहार (1999), बिहार- मार्च 1999 में, ‘माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर’ (MCC) ने बिहार के सेनारी गाँव में 34 आम लोगों की बेरहमी से हत्या कर दी थी। मरने वाले ज्यादातर लोग आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के थे। उग्रवादियों ने इन लोगों को कतार में खड़ा करके गोलियों से भून दिया था और इसे ‘अमीर-गरीब की लड़ाई’ (क्लास स्ट्रगल) बताकर सही ठहराया। इस घटना ने नक्सलियों के नारों और उनकी असलियत के बीच के अंतर को साफ कर दिया।

बारा नरसंहार (1992), बिहार- फरवरी 1992 में, नक्सली उग्रवादियों ने गया जिले के बारा गाँव पर हमला किया और 37 ग्रामीणों की जान ले ली। निहत्थे ग्रामीणों के खिलाफ वामपंथी चरमपंथी हिंसा की यह शुरुआती बड़ी घटनाओं में से एक थी। इसी घटना के बाद बिहार में हिंसा और बदले का एक लंबा दौर शुरू हुआ जिसने राज्य को अस्थिर कर दिया।

लातेहार पुलिस वैन ब्लास्ट (2016), झारखंड- जुलाई 2016 में, नक्सलियों ने झारखंड के लातेहार जिले में एक लैंडमाइन धमाका किया, जिसमें गश्ती वाहन में सवार आठ पुलिस अधिकारी शहीद हो गए। यह हमला ग्रामीण इलाकों में पुलिस और सरकारी व्यवस्था को कमजोर करने की उनकी सोची-समझी कोशिश का हिस्सा था।

सुकमा रोड-ओपनिंग पार्टी हमला (2018), छत्तीसगढ़- मार्च 2018 में, सुकमा जिले में नक्सलियों ने CRPF की उस टीम पर हमला किया जो सड़क निर्माण की सुरक्षा में लगी थी। इस हमले में नौ जवान शहीद हुए। उग्रवादियों ने विकास के कामों को रोकने के लिए जानबूझकर सुरक्षा बलों को निशाना बनाया, क्योंकि वे जनजातीय क्षेत्रों में सड़कों और बुनियादी ढाँचे के विस्तार के खिलाफ हैं।

गिरिडीह लैंडमाइन ब्लास्ट (2007), झारखंड- अक्टूबर 2007 में, नक्सलियों ने गिरिडीह जिले में एक आम नागरिक वाहन के नीचे लैंडमाइन धमाका किया, जिसमें 14 लोग मारे गए। इस घटना ने दिखाया कि नक्सली हिंसा कितनी अंधी है, जहाँ सरकार को निशाना बनाने के चक्कर में अक्सर आम नागरिक अपनी जान गँवा देते हैं।

निष्कर्ष: सौ साल, कोई सुधार नहीं

100 साल पूरे होने के बाद, भारतीय कम्युनिज्म का मूल्यांकन सिर्फ उनके इरादों, सिद्धांतों या भाषणों से नहीं किया जा सकता। इसका फैसला उनके रिकॉर्ड से होना चाहिए। वह रिकॉर्ड बताता है कि यह एक ऐसी विचारधारा है जो भारत के बाहर से आई, जिसने भारतीय समाज को कभी नहीं समझा, देश के हितों से ऊपर विदेशी ताकतों को रखा और देश से ऊपर हमेशा अपनी विचारधारा को चुना। जब चुनावों में उनकी ताकत कम हुई, तो इस आंदोलन के कुछ हिस्सों ने लोकतंत्र का रास्ता छोड़ दिया और हिंसा अपना ली। पीछे रह गए हजारों मृत नागरिक, शहीद जवान और तबाह हुए परिवार।

यह कहानी किसी ऐसी विचारधारा की नहीं है जो परिस्थितियों की वजह से हार गई। यह उस विचारधारा की कहानी है जो इसलिए फेल हो गई क्योंकि वह भारत की हकीकत, यहाँ की विविधता और लोकतांत्रिक सोच के साथ तालमेल नहीं बिठा सकी। इसलिए, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के 100 साल पूरे होना जश्न का नहीं, बल्कि हिसाब-किताब का मौका है। इन 100 सालों में कम्युनिज्म ने न तो गरीबों को आजाद किया, न लोकतंत्र को मजबूत किया और न ही देश की रक्षा की। इसने सिर्फ एक बात साबित की है, एक बाहर से आई विचारधारा जो खुद को देश से ऊपर रखती है, वह आखिर में देश और खुद- दोनों को नुकसान ही पहुँचाती है।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में ध्रुव मिश्रा ने लिखी है, जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे)