Home Blog Page 1384

शेहला रशीद ने कबूला देश विरोधी ताकतों ने किया उनका इस्तेमाल, कहा- अमित शाह की आभारी रहेंगी कश्मीरी माताएँ

जेएनयू छात्र संघ की उपाध्यक्ष रहीं शेहला रशीद को कभी मोदी विरोधी चेहरे के तौर पर जाना जाता था। अब वो पिछले काफी समय से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की तारीफ कर रही हैं। अचानक वो क्यों बदलीं और कश्मीर में ऐसा क्या देखा कि शेहला राशिद मोदी विरोधी की जगह मोदी समर्थक हो गई? ऐसे कई सारे सवालों के जवाब उन्होंने एक पॉडकास्ट में दिया है। उन्होंने बताया है कि कश्मीर में अगर शांति वापस लौटी है तो पीएम मोदी के फैसले और अमित शाह की इच्छाशक्ति की वजह से। इसके लिए कश्मीर की माताएँ हमेशा दोनों की आभारी रहेंगी।

शेहला रशीद ने ANI की संपादक स्मिता प्रकाश के साथ पॉडकास्ट में चर्चा के दौरान कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की जमकर तारीफ की। उन्होंने पीएम मोदी को सेल्फलेस मैन (स्वार्थहीन व्यक्ति) कहा। राशिद ने कहा, “अभी हम सबने देखा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने देश की जनता के हित में तमाम बेहतरीन फैसले किए। उन्होंने कभी खुद को ऊपर नहीं रखा। उन्होंने जो भी काम किया, उसमें उन्होंने सिर्फ जनता के हित को ध्यान में रखा। वो सिर्फ राष्ट्र हित में काम करते हैं। उन्होंने कश्मीर को हमेशा के लिए बदलने का काम किया।”

रशीद ने मुक्तकंठ से की गृहमंत्री अमित शाह की प्रशंसा

शेहला राशिद ने पॉडकास्ट में कहा, “कश्मीर को बदलने के लिए गृहमंत्री अमित शाह की तारीफ करनी होगी। उन्होंने बाकी चीजों की परवाह न करते हुए कश्मीर की बेहतरी के लिए काम किया। कश्मीरी माताएँ राज्य में शांति स्थापना के लिए अमित शाह को हमेशा आशीर्वाद देंगी। जिन माताओं ने अपने बच्चों को आतंकवाद में खोया है, वो अमित शाह की हमेशा तारीफ करेंगी। उन्होंने कश्मीर में शांति लौटाई है। पीढ़ियों तक उनकी तारीफ होगी।” शेहला ने कहा कि जिस तरह की वादियों में शांति लौटी है, वो हमेशा बनी रहे।

भारत विरोधी तत्वों ने किया इस्तेमाल, मैं नहीं चाहती कि कोई और युवा फँसे: रशीद

शेहला रशीद ने बताया कि उन्हें किस तरह इस्तेमाल किया गया। कैसे देश विरोधी ताकतों ने उनसे वो बातें कहलवाईं, जो सच थी ही नहीं। शेहला ने कहा, “मैंने जो बातें कभी गलती से कही थी, उसका इस्तेमाल एंटी-इंडिया एलिमेंट्स ने चुनिंदा तरीके से किया। इसीलिए जब मुझे उसकी सच्चाई का पता चला तो मैंने उन बातों को हटा दिया और सही बातें सामने रखी।”

शेहला रशीद ने आगे कहा, “मैंने कभी आर्मी की तरफ से परेशानी नहीं झेली। हालाँकि, आर्मी के खिलाफ एक नैरेटिव बनाया जा चुका है कि आर्मी ऐसी है, आर्मी वैसी है। कुछ ऐसी घटनाएँ भी हुईं तो आतंकवाद के समय की थीं। ये नैरेटिव बनाया गया था। ऐसे में मैंने सच्चाई सामने रखने की अपनी जिम्मेदारी निभाई।”

पूर्व छात्र नेता ने आगे कहा, “मेरे ऊपर सेकंड हैंड इन्फॉरमेशन थोपा गया। मैंने अब सभी चीजों से दूरी बना ली। आज भारत बहुत तेजी से आगे बढ़ रहा है। मैं नहीं चाहती हूँ कि युवा उन चीजों में फँसे, जिनमें मैं फँसी थी। आज मेरे साथ पढ़ने वाले लोग कॉरपोरेट वर्ल्ड में सीनियर पदों पर हैं, लेकिन मैं क्रांति करती रही। हालाँकि, अब मैं सही रास्ते पर लौट आई हूँ।”

शेहला रशीद से जब सवाल किया गया कि क्या उनके ऊपर किसी तरह का कोई दबाव है? इस साल के जवाब में उन्होंने कहा, “मैं किसी के दबाव में नहीं हूँ। मैं जो कुछ भी कर पा रही हूँ, इस देश में मिली आजादी की वजह से कर पा रही हूँ। हालाँकि, इस देश में मेरे साथ किसी तरह का कोई भेदभाव नहीं हुआ। हाँ, मैं फिर से कहूँगी कि पहले मैं भी गुमराह की गई थी, मुझ तक आधी-अधूरी जानकारियाँ पहुँचती थी, उसके लिए मैं माफी भी चाहूँगी।

वर्ल्ड कप के लिए नरेंद्र मोदी स्टेडियम में भिड़ेंगे भारत और ऑस्ट्रेलिया, जानिए अहमदाबाद के स्टेडियम में जब पहली बार टकराई दोनों टीम तो क्या हुआ

भारत और ऑस्ट्रेलिया वनडे विश्व कप-2023 के फाइनल में अहमदाबाद के मोटेरा के नरेंद्र मोदी स्टेडियम में एक-दूसरे का सामना करने वाले हैं। दुनिया का सबसे बड़ा क्रिकेट स्टेडियम जो अब नरेंद्र मोदी स्टेडियम के नाम से लोकप्रिय है, उसे कभी सरदार पटेल स्टेडियम के नाम से जाना जाता था। इसे पहले मोटेरा स्टेडियम और गुजरात स्टेडियम भी कहा जाता था।

दरअसल, स्टेडियम का निर्माण पहली बार 1982 में पूरा हुआ था। इस मैदान पर पहला एक दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय मैच 1984 में खेला गया था, इसके निर्माण के ठीक दो साल बाद और भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच महत्वपूर्ण मुकाबला हुआ था। यह 92 ओवर का मैच था और प्रत्येक टीम ने क्रमशः 46 ओवर तक बल्लेबाजी की थी।

पहली बार भारतीय टीम ने 1983 क्रिकेट विश्व कप जीता था और उसे उस समय प्रबल दावेदार माना गया था। उनका हौसला बुलंद था और उन्हें घरेलू मैदान के साथ-साथ बड़ी संख्या में भारतीय दर्शकों के समर्थन का भी फायदा मिला, हालाँकि, आस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों ने मैच में शानदार जीत हासिल करके सभी को गलत साबित कर दिया।

उस समय ऑस्ट्रेलियाई टीम का नेतृत्व किम ह्यूज ने जबकि गावस्कर ने टीम इंडिया का नेतृत्व किया। ऑस्ट्रेलिया ने टॉस जीता था और भारत को पहले बल्लेबाजी करने के लिए आमंत्रित किया था, लेकिन उनके कप्तान द्वारा लिया गया निर्णय अच्छा नहीं रहा क्योंकि भारतीय सलामी जोड़ी ने पहले विकेट के लिए ही शतकीय साझेदारी की। रवि शास्त्री और रोजर बिन्नी ने 104 रनों की मजबूत साझेदारी की, लेकिन बाद में टॉम होगन का शिकार बन गए और 57 रन बनाकर पवेलियन लौट गए। उस पहले विकेट के बाद भारतीय टीम ताश के पत्तों की तरह ढह गई।

रवि शास्त्री भी 45 रन बनाकर वापस लौटे जिसके बाद दिलीप वेंगसरकर को 14 रन बनाकर पवेलियन लौटना पड़ा। संदीप पाटिल और सुनील गावस्कर ने क्रमश: 3 और 4 रन बनाए। भारत ने 145 रन पर पाँच विकेट खो दिए थे। एक छोर पर कपिल देव तेजी से बल्लेबाजी कर रहे थे लेकिन वह भी 28 रन बनाकर आउट हो गए. 161 रनों पर भारतीयों के छह विकेट गिर गए थे। हालाँकि, इसके बाद कीर्ति आज़ाद ने 39 रन बनाए और मदनलाल ने 6 रन और जोड़कर 45 रनों की नाबाद साझेदारी करके अपनी टीम को छह विकेट के नुकसान पर 206 रनों के सम्मानजनक स्कोर तक पहुँचा दिया था।

ऑस्ट्रेलियाई टीम ने भी उतनी ही शानदार शुरुआत की. पहले विकेट के लिए 67 रन बनाने के बाद ग्रीम वुड 32 के स्कोर पर रन आउट हो गए। उनके बल्लेबाजी साथी केपलर वेसल्स ने 89 के कुल स्कोर पर पवेलियन लौटने से पहले 42 रन बनाए। इसके बाद एलन बॉर्डर ने जिम्मेदारी संभाली और किम ह्यूजेस के साथ 73 रनों की साझेदारी करके अपनी टीम की स्थिति मजबूत की, जिन्होंने 29 रन बनाए।

बाद में, उन्होंने ग्राहम येलोप के साथ साझेदारी करते हुए स्कोरबोर्ड पर 32 रन जोड़े और अपनी टीम को अभूतपूर्व जीत दिलाई। एलन बॉर्डर ने 90 गेंदों पर 62 रनों की नाबाद पारी खेली और ऑस्ट्रेलियाई टीम 44वें ओवर में 7 विकेट से जीत गई। 25 रन देकर तीन विकेट लेने वाले ज्योफ लॉसन को ‘प्लेयर ऑफ द मैच’ घोषित किया गया।

वहीं भारत अब 19 नवंबर को विश्व कप फाइनल में ऑस्ट्रेलिया से भिड़ने पर उसी पिच पर नया इतिहास बनाकर जीत हासिल करना चाहेगा। भारत ने अब तक अच्छा खेला है, सभी मैच जीते हैं और 15 नवंबर को पहले सेमीफाइनल में न्यूजीलैंड के खिलाफ शानदार ऑल-राउंड प्रदर्शन करते हुए 70 रनों की जोरदार जीत दर्ज की है। साथ ही ऑस्ट्रेलिया ने भी 16 नवंबर को दक्षिण अफ्रीका को तीन विकेट के अंतर से हरा कर सेमीफाइनल में जगह बनाई। 

गौरतलब है कि भारत और ऑस्ट्रेलिया आखिरी बार 2003 में विश्व कप के फाइनल में भिड़े थे। ऑस्ट्रेलिया ने उस मैच को 125 रनों के अंतर से जीतकर तीसरी बार विश्व कप की ट्रॉफी पर कब्जा किया था। इसने 2007 में भी जीत दर्ज की थी।

भारत नरेंद्र मोदी स्टेडियम में तीसरी बार विश्व कप विजेता बनने को बेताब है। भारत ने इससे पहले 2011 में मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में श्रीलंका को हराकर वर्ल्डकप चैंपियनशिप जीती थी। टीम इंडिया ने अपना पहला विश्व कप 1983 में कपिल देव की कप्तानी में जीता था।

बता दें कि भारत ने 2013 के बाद से कोई अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) ट्रॉफी नहीं जीती है। इससे पहले एमएस धोनी की अगुवाई वाली भारतीय टीम ने चैंपियंस ट्रॉफी जीती थी। उम्मीद है कि 1.4 अरब लोगों का एक दशक का इंतजार खत्म होगा और भारत फाइनल में ट्रॉफी जीतकर चैंपियनशिप का शानदार अंत करेगा।

‘बंगालियों के साथ मत करो बहस, वे आपके ऊपर चिपका देंगे कुछ’: KBC के मंच से अमिताभ बच्चन ने बताया क्यों वे पत्नी जया के सामने रहते हैं ‘चुप’

बॉलीवुड अभिनेता अमिताभ बच्चन इन दिनों कौन बनेगा करोड़पति 15 को होस्ट कर रहे हैं। वह शो में अक्सर अपनी निजी और प्रोफेशनल जिंदगी से जुड़े किस्सों को शेयर करते रहते हैं। कुछ दिन पहले उन्होंने बताया था कि उन्होंने किचन के बर्तन-बेसिन भी साफ किया है। इस बार उन्होंने बताया है कि वो अपनी पत्नी से बहस ही नहीं करते। ये बात उन्होंने बंगालियों पर टिप्पणी करते हुए अप्रत्यक्ष ढंग से कही।

दरअसल, ये सब शुरू होता है ‘कौन बनेगा करोड़पति 15’ के सेट पर जहाँ अमिताभ बच्चन के सामने कंटेस्टेंट होती हैं, जिनसे वह 1 लाख 60 हजार का सवाल पूछते हैं। इसका भी जवाब वह लाइफलाइन के जरिए देती हैं। फिर अमिताभ बताते हैं कि अब उनका नया पड़ाव शुरू होगा। इस पर कंटेस्टेंट कहती हैं कि उसके बाद वह घर जाएंगी। आगे नहीं खेलेंगी।

अमिताभ ऐसी बात सुन कहते हैं, ” मैं दर्शकों से पूछूँगा कि आज की तारीख में आपने किसी ऐसे कंटेस्टेंट को देखा है जो गेम को छोड़ना चाहता है? आप अविश्वसनीय हैं। लोग यहाँ आने के लिए संघर्ष करते हैं और ज्यादा से ज्यादा कमाकर जाने की कोशिश करते हैं लेकिन आप घर जाना चाहती हैं।”

इस पर कंटेस्टेंट अलोलिका जवाब देती हैं, “मुझे ऐसा लगता है कि आपके सामने जो भी कंटेस्टेंट बैठते हैं, वो सभी करोड़पति होते हैं। आप करोड़ों में एक हैं तो सभी करोड़पति हैं।”

फिर अमिताभ कहते हैं, “मैं आपके अपने पर्सनल एक्सपीरियंस से कुछ बताना चाहूँगा। बंगालियों के साथ कभी बहस नहीं करना चाहिए। हमारे घर की अवस्था हमको मालूम है। ऐसे ही है बिल्कुल। आप कभी बंगाली से बहस कर ही नहीं सकते। उनसे पास फट से कुछ न कुछ उत्तर होता है। उल्टा आपके ऊपर चिपका देंगे कुछ। आज ऐसे ही किसी से पाला पड़ गया है हमारा।”

बता दें कि अभिताभ बच्चन अपनी इस बात के जरिए अपनी पत्नी जया बच्चन की ओर इशारा कर रहे थे। दोनों की शादी 1973 में हुई थी। इसके बाद से अक्सर अमिताभ बच्चन सोशल प्लेटफॉर्म्स पर भी जया बच्चन के आगे शांत ही नजर आते हैं।

सरकार नहीं, पुजारी ही चलाएँगे कामाख्या मंदिर: सुप्रीम कोर्ट का फैसला, असम की BJP सरकार ने भी पुरानी परंपरा का किया था समर्थन

असम के कामाख्या मंदिर में दान को लेकर दिए गए गुवाहाटी हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया है। साल 2017 में गुवाहाटी हाईकोर्ट ने इस मंदिर में भक्तों से प्राप्त दान को डिप्टी कमिश्नर को देने और दान की राशि के लिए अलग खाता खोलने का निर्देश दिया था। इस फैसले से मंदिर के विकास कार्यों की देखरेख मंदिर के मुख्य पुजारी, जिसे डोलोई कहा जाता है, के हाथों से प्रशासन के हाथ में आ गई थी।

इसके बाद पुजारी समाज ने गुवाहटी हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। इस मामले पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अभय एस ओक और जस्टिस पंकज मित्तल की बेंच ने 10 नवंबर 2023 के आदेश में कहा कि कामाख्या मंदिर के प्रबंधन की मौजूदा व्यवस्था पर गुवाहाटी HC का आदेश लागू नहीं होगा। इस मामले में असम सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट में अपनी रखी थी।

अपने हलफनामे में असम सरकार ने कहा, “डोलोई (पुजारी समाज) स्थानीय प्रशासन के साथ गहरे तालमेल के साथ मंदिर प्रशासन के मामलों को संतोषजनक ढंग देख रहा है और ये व्यवस्था जारी रह सकती है।” असम सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि राज्य सरकार प्रधानमंत्री डिवाइन योजना के तहत माँ कामाख्या मंदिर के विकास के लिए बड़े पैमाने पर काम कर रही है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया।

गौरतलब है कि गुवाहाटी हाईकोर्ट ने साल 2015 में डिप्टी कमिश्नर को मंदिर में जनता और भक्तों से मिले दान को लेने का निर्देश दिया था। इसके साथ ही इस तरह के दान के लिए अलग बैंक खाता खोलकर इस पैसे को मंदिर के विकास के कामों में खर्च करने के लिए कहा था। बाद में हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ एक समीक्षा याचिका दाखिल की गई।

इसके बाद मंदिर के पुजारियों ने एक समीक्षा याचिका दाखिल की और कहा कि मंदिर के प्रशासन और धार्मिक गतिविधियों पर उसका अधिकार है। इसके बाद साल 2017 में गुवाहटी हाईकोर्ट ने उस समीक्षा याचिका का निस्तारण कर दिया। उस निस्तारण याचिका के फैसले में गुवाहाटी हाईकोर्ट ने कहा था श्रद्धालुओं से प्राप्त दान केवल मंदिर की विकास के लिए होगा। आदेश के मुताबिक यह पैसा पूजा अर्चना पर खर्च नहीं किया जा सकता था।

पुजारी समाज हाईकोर्ट के फैसले से संतुष्ट नहीं हुआ और उसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट ने असम सरकार से भी राय माँगी। सुप्रीम कोर्ट में 3 सितंबर 2023 को दायर अपने हलफनामे में असम सरकार ने बताया कि माँ कामाख्या कॉरिडोर से संबंधित मामलों पर चर्चा के लिए असम के मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में 13 अगस्त 2023 को एक बैठक हुई थी। इसके बाद असम सरकार ने 8 नवंबर 2023 को एक और हलफनामा दायर किया था।

दरअसल, माँ कामख्या देवी के मुख्य मंदिर के पुजारियों के परिवार को बोर्डेउरिस और सहायक मंदिरों के पुजारियों के परिवारों को देउरिस कहा जाता है। ये नौ सहायक मंदिर उसी नीलांचल पहाड़ी पर स्थित हैं, जहाँ माँ कामाख्या का मंदिर है। कामाख्या मंदिर के मुख्य पुजारी को डोलोई कहा जाता है। डोलोई का चुनाव बोर्डेउरी और देउरिस द्वारा किया जाता है। साल 2021 में हुए चुनाव के बाद से कबींद्र प्रसाद सरमा कामाख्या देवी मंदिर के मुख्य पुजारी (डोलोई) हैं।

मंदिर पर कब्जे को लेकर सत्ता संघर्ष

कामाख्या मंदिर के प्रबंधन के अधिकार को लेकर 1990 के दशक में एक लंबा सत्ता संघर्ष देखा गया था। ये संघर्ष पुजारियों के परिवार के व्यक्तियों के साथ-साथ उन वर्गों के प्रतिनिधियों के बीच था, जिनका मंदिर चलाने में कोई भूमिका नहीं थी। विरोधियों ने कामाख्या डेब्यूटर बोर्ड का गठन किया था।

इस बोर्ड ने पुजारी समाज के अधिकारों और विशेषाधिकारों को अपने अधिकार में ले लिया। वहीं, पुजारी समाज ने आरोप लगाया कि डेबटर बोर्ड ने 1998 में सत्ता में आने के लिए हेरफेर किया था। बोर्ड ने कहा था कि उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि पुजारी समाज मंदिर को ‘अलोकतांत्रिक’ तरीके से चला रहा था।

साल 2012 में एक अंतरिम आदेश द्वारा सुप्रीम कोर्ट ने कामाख्या देवी मंदिर में जिम्मेदारियों को विभाजित कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने डेबुटर बोर्ड को मंदिर का प्रशासन चलाने के लिए कहा, जबकि डोलोई (पुजारियों) की भूमिका को धार्मिक गतिविधियों तक सीमित कर दिया। हालाँकि, जुलाई 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य पुजारी समाज के पारंपरिक अधिकारों को बहाल कर दिया। साथ ही यह भी कह दिया कि डोलोई एवं अन्य पदों के लिए चुनाव होना चाहिए।

अक्टूबर 2022 में शीर्ष अदालत ने टिप्पणी की कि मंदिर का रखरखाव ठीक से नहीं किया जा रहा है। पूजा स्थल में स्वच्छता मानकों पर कोई समझौता नहीं किया जाना चाहिए। उस समय, राज्य सरकार के साथ-साथ डोलोई समाज ने अदालत को आश्वासन दिया था कि मंदिर परिसर के आसपास स्वच्छता के साथ-साथ बुनियादी ढांचे के विकास को प्राथमिकता पर लिया जा रहा है।

‘जो अयोध्या के राम मंदिर में जाएगा मुसलमान बनकर निकलेगा’: जावेद मियांदाद की पुरानी घृणा वायरल, नेटिजन्स बोले- तोतले की खुशी (म​थुरा-काशी) और बढ़ेगी

क्रिकेट वर्ल्ड कप से बोरिया-बिस्तर समेटकर जा चुकी पाकिस्तान के मौजूदा क्रिकेटर हो या पूर्व, वे अपने ऊल-जलूल हरकतों और बयानों को लेकर चर्चा में बने रहते हैं। उनकी भारत और हिंदू घृणा भी बाहर आती रहती है। पाकिस्तान के पूर्व कप्तान जावेद मियांदाद का एक वीडियो वायरल हो रहा है। इसमें वे कह रहे हैं कि अयोध्या के राम मंदिर में जो भी जाएगा वह मुस्लिम बनकर बाहर निकलेगा।

वीडियो में मियांदाद को कहते सुना जा सकता है, “इंडिया में जो कुछ हो रहा है और जिस तरह से भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बड़ा अच्छा काम किया है। उनके लिहाज से अच्छा है, हमारे लिए नहीं है। मैं उसकी गहराइयों में जाकर बताता हूँ। एक मस्जिद को मंदिर बनाया है। इंशाअल्लाह मेरा ईमान है कि जो भी उस मंदिर में जाएगा वो मुसलमान बनकर निकलेगा। क्योंकि उसके अंदर हमारी जड़ें हमेशा रहती है, हमारे बुजुर्गों ने जहाँ कही भी तब्लीग की है वहाँ पर आपने देखा होगा, वो चीजें वहाँ से जन्म लेती है। मुझे बड़ी खुशी होती है आपने काम तो गलत किया, मगर लोगों को समझ नहीं आएगी। इंशाअल्लाह वहाँ से मुसलमानों की तंजीमें निकलेंगी।”

वायरल हो रहा वीडियो क्लिप तीन करीब तीन साल पुराने एक आठ मिनट के वीडियो का हिस्सा है। मियांदाद ने यह वीडियो 8 अगस्त 2020 को जारी किया था। उल्लेखनीय है कि इससे तीन दिन पहले ही अयोध्या में भव्य राम मंदिर निर्माण के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने भूमिपूजन किया था। मियांदाद का पूरा वीडियो आप नीचे देख सकते हैं।

अयोध्या के राम मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा 22 जनवरी 2024 को होनी है। श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के सदस्य कामेश्वर चौपाल ने ऑपइंडिया को बताया था कि राम मंदिर के अनुष्ठान का कार्यक्रम अयोध्या में 16 जनवरी 2024 से ही शुरू हो जाएगा।

राम मंदिर को लेकर मियांदाद की घृणा देखने के बाद सोशल मीडिया पर उन्हें लताड़ भी लग रही है। एक यूजर ने लिखा है कि इसको सुनकर बहुत मजा आता है। मेरा भतीजा भी ऐसे ही तुतलाता था बचपन में। दूसरे ने मथुरा और काशी का जिक्र करते हुए लिखा है कि तोतले की खुशी और बढ़ेगी।

पत्नी के साथ न्यूयॉर्क जा रहे थे अशनीर ग्रोवर, दिल्ली एयरपोर्ट पर रोके गए: भारतपे में फ्रॉड से जुड़ा है मामला, होनी है पूछताछ

भारतपे के पूर्व प्रबंध निदेशक अशनीर ग्रोवर और उनकी पत्नी माधुरी जैन को गुरुवार (16  नवंबर, 2023) की शाम को इंदिरा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर रोक दिया गया, जब वे न्यूयॉर्क के लिए रवाना हो रहे थे।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, “अश्नीर और उनकी पत्नी न्यूयॉर्क में छुट्टियाँ मनाने जा रहे थे और दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने उन्हें रोक लिया।” दरअसल अशनीर ग्रोवर पर भारतपे में मामले में कथित धोखाधड़ी के आरोप हैं।  वहीं आर्थिक अपराध से जुड़े अधिकारियों ने बताया कि भारत पे मामले में दोनों के खिलाफ चल रही है। उनके खिलाफ एक लुकआउट सर्कुलर जारी किया गया है।

संयुक्त पुलिस आयुक्त (ईओडब्ल्यू) सिंधु पिल्लई ने इस मामले में जानकारी देते हुए बताया, “उन्हें सुरक्षा जाँच से पहले ही हिरासत में लिया गया था और उन्हें अपने दिल्ली आवास पर लौटने और अगले सप्ताह ईओडब्ल्यू कार्यालय में जाँच में शामिल होने के लिए कहा गया।”

दिल्ली हाई कोर्ट में जमा स्टेट्स रिपोर्ट में पुलिस ने कहा कि ग्रोवर की पत्नी माधुरी जैन से जुड़ी 8 HR फर्म्स ने भारतपे से 7.6 करोड़ रुपए की साइफनिंग की है। ये सभी 8 फर्म माधुरी जैन के रिश्तेदारों से जुड़े हुए हैं। इनमें उनके पिता सुरेश जैन और भाई श्वेतांक जैन भी शामिल हैं। दिल्ली पुलिस की जाँच के मुताबिक इन आठ फर्मों पर आरोप है कि इन्होंने गलत इन्होंने भारतपे से HR सर्विसेज के लिए झूठे इनवॉइस के जरिए पैसे निकाले हैं। बता दें कि माधुरी जैन पहले भारतपे की डायरेक्टर ऑफ पे रह चुकी हैं। 

बता दें कि भारतपे में कथित थोखाधड़ी को लेकर, फाउंडर अशनीर ग्रोवर और कैपिटलमाइंड फाउंडर दीपक शेनॉय के बीच बहस सोशल मीडिया एक्स पर एक दिन पहले ही बुधवार को शुरू हो गई थी। ये छींटाकशी उस रिपोर्ट के बाद हुई है, जिनमें ग्रोवर और उनके परिवार से जुड़ी कंपनियों पर भारतपे से फंड चुराने के आरोप लगे हैं। इस मामले में दिल्ली पुलिस की इकोनॉमिक विंग द्वारा दिल्ली हाई कोर्ट में दाखिल की गई स्टेट्स रिपोर्ट में ये फंड साइफनिंग के आरोप सामने आए हैं। 

दीपक शेनॉय से तकरार

इस मामले में दीपक शेनॉय ने लिखा, “अशनीर ग्रोवर ने रिक्रूटमेंट सर्विसेज के नाम पर अपने परिवार के पास फंड की साइफनिंग की, ये पैसे निकालने का बहुत जाना-पहचाना तरीका है। इसे बहुत बेवकूफी के साथ अंजाम दिया गया- उन्होंने बैकडेट पर उन बैंक अकाउंट्स के साथ इन्वॉइस बनाए, जो उस तारीख को खुले भी नहीं थे।”

उन्होंने आगे लिखा, ‘उस समय के हिसाब से करीब 53 करोड़ का ऐसी कंपनियों में भुगतान किया गया था। ये कंपनियाँ GST तक जमा नहीं कर रही थीं। जिसके चलते ये पूरा भंडाफोड़ हुआ। मैं सोचता हूँ कि स्टार्टअप्स के इन्वेस्टर्स को कम से कम एक पॉलिसी बनानी चाहिए, जिसके तहत कहा जाए कि रिक्रूटमेंट रिलेटेड पेमेंट्स और फाउंडर्स से संबंधों का साल में एक बार इंडिपेंडेंट रिव्यू जरूर किया जाएगा। इस तरह पैसा बाहर निकालना बहुत आम है।”

अशनीर ग्रोवर ने दिया रिएक्शन

वहीं इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए अशनीर ग्रोवर ने अपना पुराना ट्वीट फिर से शेयर किया, जिसमें उन्होंने दावा किया था कि अंत में वे निर्दोष साबित होंगे। 

 जवाब में दीपक शेनॉय ने ग्रोवर को अमेरिका स्थित एनर्जी कंपनी एनरॉन का मामला याद दिलाया, जिसमें फाउंडर को 24 साल की जेल हुई थी।  उन्होंने लिखा, ‘एनरॉन का स्किलिंग भी जेल जाने से पहले किसी को ‘Ass**le’ बोल रहा था। जब तक पूरा मामला नहीं खुला जाता, अपने वक्त का मजा लो।”

काले वस्त्र, नग्न पैर, सिर पर इरुमुडी… भगवान अयप्पा के दर्शन करने पहुँचीं मोदी की मंत्री, सबरीमाला की परंपराओं को बचाने के लिए भी लड़ चुकी हैं शोभा करंदलाजे

मोदी सरकार में कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय की राज्य मंत्री शोभा करंदलाजे कल (16 नवंबर 2023) सबरीमाला मंदिर में दर्शन करके आईं। मंदिर में प्रवेश करने के दौरान उन्होंने काले रंग का कपड़ा धारण किया हुआ था और नंगे पैर मंदिर में दर्शन के लिए जा रही थीं।

साल 2018 में जब सबरीमाला मंदिर में हर उम्र की महिलाओं के मंदिर में प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट में केस चल रहा था, उस समय शोभा करंदलाजे उन महिलाओं में से थीं, जिन्होंने मंदिर के नियमों को बदलने का विरोध किया था और सबरीमाला की जारी प्रथा का समर्थन किया था।

उनका मत था कि सबरीमाला हिंदुओं की आस्था का विषय है ऐसे में जो परंपरा रही है उसी का अनुसरण होना चाहिए। यानी कि वह लड़कियाँ जिन्हें माहवारी शुरू हो गई वो भगवान अयप्पा के दर्शन करने सबरीमाला में प्रवेश न करें। इसके पीछे मंदिर का एक सीधा सा तर्क था कि भगवान अयप्पा ब्रह्मचारी थे। ऐसे में मंदिर के जो नियम हैं उन्हें माना जाना चाहिए।

महिलाओं के प्रवेश को लेकर मंदिर की परंपरा

उनके मत के कारण हो सकता है कि उन्हें मंदिर में देख कई लोग हैरान हों, लेकिन ऐसी हैरानी से पहले जानना जरूरी हैं कि सबरीमाला की परंपरा महिलाओं के प्रवेश को क्या कहती है। सबरीमाला में परंपरागत रूप से 10 से 50 वर्ष की लड़कियों और महिलाओं का प्रवेश निषेध है। इस आयु सीमा की नीचे और ऊपर की महिलाएँ मंदिर में जा सकती हैं। शोभा करंदलाजे की वर्तमान में उम्र 57 वर्ष है। ऐसे में वो बाकी नियमों का पालन करके मंदिर में जा सकती हैं।

सबरीमाला मंदिर में प्रवेश से पहले करनी होती है कड़ी साधना

बता दें कि सबरीमाला मंदिर में भगवान अयप्पा के दर्शन करने से पहले कुछ नियम पालन करने होते हैं। इनमें से सबसे पहले तो भक्तों को 41 दिन तक सभी मोह-माया से दूर रहते हुए ब्रह्मचर्य का पालन करना होता। इसके बाद उन्हें नीले या काले कपड़े ही पहनने पड़ते हैं। गले में तुलसी की माला रखनी होती है और पूरे दिन में केवल एक बार ही साधारण भोजन करना होता है। इन 41 दिनों में शाम को पूजा करनी होती है और जमीन पर ही सोना पड़ता है।

इस व्रत की पूणार्हूति पर एक गुरु स्वामी के निर्देशन में पूजा करनी होती है। मंदिर यात्रा के दौरान उन्हें सिर पर इरुमुडी रखनी होती है यानी दो थैलियाँ और एक थैला। इनमें से एक में घी, नारियल व पूजा सामग्री होती है तथा दूसरे में भोजन सामग्री। ये लेकर उन्हें शबरी पीठ की परिक्रमा भी करनी होती है, तब जाकर अठारह सीढियों से होकर मंदिर में प्रवेश मिलता है। शोभा करंदलाजे की जो फोटो सामने आई है उसमें वो इसी भेष में मंदिर में ऊपर बढ़ती दिखाई दे रही हैं।

2018 में सुप्रीम कोर्ट ने दिया फैसला

गौरतलब है कि साल 2018 में सबरीमाला मंदिर को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए वहाँ हर उम्र की महिलाओं के प्रवेश को अनुमति दे दी थी। इसके बाद इस मामले पर कई पुनर्विचार याचिकाएँ दर्ज हुईं। इसके बाद अदालत ने ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए बड़ी संवैधानिक पीठ का गठन करने की बात कही और कहा था कि वो ऐसे मामलों में हिंसा नहीं चाहते।

वजीहुद्दीन ही ISIS का ‘अमीर’, अलीगढ़-पुणे-दिल्ली सारे आतंकी मॉड्यूल इससे ही जुड़े: दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों और शरजील इमाम से भी जुड़े हुए हैं तार

भारत में कुख्यात आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट (ISIS) की कमर तोड़ दी गई है। इस्लामिक स्टेट का स्वघोषित खलीफा वजीहुद्दीन अब यूपी एटीएस की गिरफ्त में आ चुका है। उससे पूछताछ हो रही है। अब यूपी एटीएस ने उसे कोर्ट के माध्यम से 10 दिन की रिमांड पर लिया है।

यूपी एटीएस न सिर्फ उसकी पूरी कुंडली खंगाल रही है, बल्कि उसके आसपास के लोगों की भी पूरी पड़ताल कर रही है। यूपी एटीएस ने ऑपइंडिया की उस रिपोर्ट पर भी मुहर लगा दी है, जिसमें ऑपइंडिया ने बताया था कि वजीहुद्दीन ही भारत में ISIS का मुखिया है। संगठन के लोग इसे ‘अमीर’ कहते थे।

भास्कर ने यूपी एटीएस के सूत्रों के हवाले से कहा है कि वजीहुद्दीन ही आईएसआईएस का ‘भारतीय अमीर’ है। वो विदेशी हैंडलर के सहयोग से पुणे मॉड्यूल और दिल्ली मॉड्यूल के साथ मिलकर कई हमलों की साजिश रच रहा था। उसके गुर्गों ने उसके आदेश पर गाजियाबाद के यति नरसिम्हा सरस्वती जैसे ‘निशानों’ की पहचान की थी।

इतना ही नहीं, आईएसआईएस के पुणे मॉड्यूल के सदस्य शहनवाज के साथ मिलकर वो धमाकों की ट्रेनिंग भी शुरू कर चुका था। वजीहुद्दीन उत्तर प्रदेश के रामपुर, संभल, अलीगढ़ से लेकर प्रयागराज तक अलग-अलग गुर्गों के माध्यम से भारत के खिलाफ ‘जेहाद’ के लिए ‘इस्लामिक फौज’ तैयार कर रहा था।

ऑपइंडिया ने बताया था कि कैसे वजीहुद्दीन ‘हया’ के माध्यम से युवाओं को कट्टरता और हिंसा की तरफ लेकर जाता था। वो स्कूलों, कॉलेजों और अन्य संस्थानों में बाकायदा ‘हया’ के माध्यम से भारत विरोधी माहौल तैयार करता था और ‘अति उत्साही’ नौजवानों को भारत के खिलाफ हथियार उठाने के लिए उकसाता था।

ओजीडब्ल्यू से लेकर ‘अमीर’ तक सफर

ऑपइंडिया ने अपनी रिपोर्ट में यह भी बताया था कि कैसे वजीहुद्दीन सामू (SAMU) से लेकर एएमयू (AMU) तक, दिल्ली से लेकर प्रयागराज तक आईएसआईएस से जुड़े लोगों के लिए ‘अमीर’ की तरह था। उसके गुर्गे सोशल मीडिया पर भी उसका गुणगान करते थे और उसे ‘अमीर’ कहकर संबोधित करते थे। मुस्लिम देशों में ‘अमीर’ का मतलब शासक होता है।

वजीहुद्दीन ने शुरुआत में आईएसआईएस के ओजीडब्ल्यू (ओवर ग्राउंड वर्कर) के तौर पर काम शुरू किया और फिर सामू (SAMU- Students of AMU) जैसे संगठनों में खुद को ‘अमीर’ के तौर पर स्थापित कर लिया। वो ‘हया’ कार्यक्रम के जरिए बाकायदा मजलिसों का आयोजन करता था और इस्लामिक भाषण देता था।

इन भाषमों में वो शरजील इमाम जैसे गिरफ्तार आतंकियों की बातों का भी सहारा लेता था और लोकतंत्र विरोधी बात करके शरिया शासन को सही साबित करने का प्रयास करता था। इन्हीं मजलिसों के माध्यम से उसने अब्दुल्ला अर्शलान और माज बिन तारिक जैसे गुर्गों को आईएसआईएस में शामिल होने के लिए तैयार किया था।

दिल्ली से लेकर एएमयू तक सीएए विरोधी आंदोलनों का आयोजक, हिंसा में भी हाथ

खास बात ये है कि वजीहुद्दीन लंबे समय से सुरक्षा एजेंसियों की रडार पर था। वो इतना शातिर है कि अपने खिलाफ बहुत कम ही चीजें छोड़ता था। इस बार दिल्ली, मुरादाबाद और अलीगढ़ से शहनवाज, अरसद वारसी और रिजवान की दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच द्वारा गिरफ्तारी के बाद उसे पकड़ने के लिए यूपी एटीएस को बाकायदा विशेष अभियान चलाना पड़ा।

यूपी एटीएस ने अब्दुला और माज की गिरफ्तारी के बाद वजीहुद्दीन को छत्तीसगढ़ के दुर्ग से गिरफ्तार किया था। यूपी एटीएस द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक, यूपी एटीएस को सूचना मिल रही थी कि कुछ लोग अलीगढ़ में आईएसआईएस की विचारधारा से प्रेरित होकर अन्य लोगों को भी प्रभावित कर रहे हैं।

यूपी एटीएस ने ये भी बताया कि दिल्ली पुलिस द्वारा गिरफ्तार आतंकियों के संबंध अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्र संगठन स्टूडेंट्स ऑफ अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (SAMU) से हैं। ये लोग आईएसआईएस की विचारधारा से प्रभावित हैं। ऐसे में एटीएस ने जाँच का दायरा बढ़ाया और साक्ष्य जुटाकर अपनी कार्रवाई को अंजाम दिया।

वजीहुद्दीन मूल रूप से छत्तीसगढ़ के दुर्ग का रहने वाला है। वो एएमयू में पीएचडी करने के साथ ही जूनियर छात्रों को सामाजिक विज्ञान विषय (इतिहास, भूगोल और नागरिक शास्त्र) पढ़ाता था। उसके छात्रों में हिंदू छात्र भी शामिल हैं।

वजीहुद्दीन को 10 दिनों की रिमांड

यूपी एटीएस ने गुरुवार को NIA ATS के विशेष जज दिनेश कुमार मिश्र की अदालत में वजीहुद्दीन को पेश किया। यूपी एटीएस ने उसे ISIS का मुख्य चेहरा बताते हुए उसकी 10 दिनों की रिमांड माँगी। कोर्ट ने एटीएस की माँग को मंजूर कर लिया। अब यूपी पुलिस वजीहुद्दीन के सभी संपर्कों की पड़ताल कर रही है और ये जानने की कोशिश कर रही है कि वो अब तक कितने लोगों को रेडिकल बना चुका है।

भगवान सूर्य, ऊषा और प्रत्यूषा को समर्पित चार दिन: क्यों होता है छठ, कैसे होती है पूजा, क्या हैं इसके मायने; जानिए सब विस्तार से

लोक आस्था का महापर्व छठ भगवान सूर्य और उनकी दो पत्नियों ऊषा और प्रत्यूषा को समर्पित है। ‘छठ’ नामकरण के पीछे इसका अमावस्या के छठे दिन या षष्ठी को होना है। इस बार आज शुक्रवार (17 नवंबर, 2023) से नहाय-खाय के साथ सूर्योपासना के महापर्व छठ का चार दिवसीय अनुष्ठान की शुरुआत हो चुकी है। 19 तारीख को डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा। 20 नवंबर को उगते सूर्य को अर्घ्य देने के साथ ही 4 दिन के महापर्व का समापन हो जाएगा।

पहले दिन छठ व्रतियों ने सुबह-सुबह नदियों में स्नान किया। शनिवार को खरना पर पूरे दिन उपवास कर शाम में सूर्य देव की पूजा कर प्रसाद ग्रहण किया जाएगा। वहीं 19 नवंबर रविवार की शाम डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा। इसके बाद सोमवार 20 नवंबर को उगते सूर्य को अर्घ्य देकर आयु-आरोग्यता, यश, संपदा का आशीष लेते हुए पर्व संपन्न होगा।

सूर्य देव और छठी मईया (ऊषा देवी के लिए प्रयुक्त नाम) इस पर्व के आराध्य हैं। इसकी तैयारी अत्यंत श्रमसाध्य और सघन होती है। ऊषा और प्रत्यूषा सूर्य देव की दो शक्ति मानी जाती हैं और उन्हें अर्घ्य दिया जाता है। संध्या काल में दिया जाने वाला पर्व का प्रथम अर्घ्य उनकी अंतिम किरण प्रत्यूषा को दिया जाता है और प्रातः काल का अर्घ्य सूर्य की प्रथम किरण ऊषा को।

छठ पर्व और सूर्य देव की पूजा का उल्लेख भारत के दोनों महाकाव्यों महाभारत और रामायण में है। श्रीराम के वनवास से लौटने के बाद देवी सीता के अयोध्या के राजपरिवार के कुल देवता के रूप में सूर्योपासना और महाभारत में इंद्रप्रस्थ की महारानी द्रौपदी के इस पर्व को मनाने के बारे में लिखित प्रमाण हैं। सूर्य पुत्र कर्ण महाभारत के प्रमुखतम किरदारों में एक है। यही नहीं, देवी ऊषा स्वयं वैदिक काल की देवी मानी गईं हैं, जिनकी उपासना में कई वेद मन्त्र और ऋचाएँ हैं।

समकालीन परम्परा की बात करें तो दीवाली खत्म होते ही विभिन्न राज्यों में बसे आस्थावानों के साथ ही खास तौर से बिहार के लोग 6 दिन बाद होने वाले छठ की तैयारियों में लग जाते हैं। राज्य के हर कोने में छठी मईया के गीत गाए जाते हैं। सबसे प्रचलित गीत बिहार की अपनी बेटी और पद्मश्री से सम्मानित शारदा सिन्हा के होते हैं। “उग हो सुरुज देव” से लेकर “मारबो रे सुगवा धनुष से” तक इन गीतों का जुड़ाव हर बिहारी से होता है।

गाँव-कस्बों में साफ़-सफाई चालू हो जाती है, जो एक सामुदायिक प्रक्रिया होती है। केवल पगार पाने वाले सफाई कर्मचारी ही नहीं, छठ के दौरान साफ़-सफाई पूरे बिहार का जिम्मा होता है। घर से लेकर घाट तक, जहाँ पानी के किनारे अर्घ्य देना होता है, कंकड़-पत्थर, गंदगी, घास-फूस का नामोनिशान मिटा दिया जाता है।

पहला दिन: नहाय-खाय

इस दिन व्रतिन (व्रती महिलाएँ) सुबह-सवेरे नहा कर मौसमी सब्ज़ियों, चावल और दाल का भोजन करती हैं। दाल में अमूमन चना सबसे अधिक प्रचलित है, जबकि सब्ज़ियों में लौकी (जिसे ‘कद्दू’ के नाम से जाना जाता है); साथ में चने का साग भी होता है। व्रतिन का बिना नमक का भोजन प्रसाद होता है, जिसे बाद में पूरा परिवार ग्रहण करता है।

इसी दिन (या अगले दिन, सुविधानुसार) व्रतिन अपने घर के अन्य लोगों की मदद से सूर्य देवता को चढ़ाए जाने वाले प्रसाद को बनाने में प्रयुक्त होने वाले गेहूँ को धोकर सूखने के लिए फैला देती हैं। घर के बच्चों की ज़िम्मेदारी होती है ध्यान रखना कि गेहूँ में कोई गंदगी न गिर जाए या चिड़िया जूठा न कर दे या बीट न कर दे।

इस दिन सबसे चर्चित मिठाई ठेकुआ की भी तैयारी जम कर होती है। गेहूँ को या तो घर ही में जाँते में पिसा जाता है या पास की चक्की से पिसवाया जाता है। इसी आटे से मिठाइयाँ, रोटी, पूड़ी आदि बनती हैं।

दूसरा दिन: खरना

व्रतिन का पूरे दिन उपवास होता है- वह भी निर्जला। इसके अलावा उन्हें स्वच्छता, शौच-अशौच के भी कठोर नियमों का पालन करना होता है। शाम को वही घर वालों के लिए भोजन भी बनाती हैं, जिसमें पूड़ी और तस्मई (गुड़ या शक़्कर की खीर) प्रमुख होते हैं। तस्मई में एक बूँद पानी का प्रयोग नहीं होता है और दूध उसी गाय का इस्तेमाल किया जाता है जिसका बछड़ा जीवित रहता है।

शाम को भोजन बनाने से खाली होकर व्रतिन पूजा पर बंद कमरे में बैठती हैं। विभिन्न देवताओं, जिनमें ग्राम और कुल के भी देवी-देवता शामिल होते हैं, को नैवेद्य का भोग लगता है। इस नैवेद्य में रोटी, तस्मई और केला होता है, और यह भोग केले के पत्ते पर ही लगता है।

व्रतिन जब पूजा करतीं हैं तो पूरा घर दम साधे बैठे रहता है ताकि उनका ध्यान भंग न हो जाए। उसके बाद वे प्रसाद ग्रहण कर अपने उपवास का पारण करती हैं। वे अपने थाल में कुछ खाना छोड़ कर उठतीं हैं, जिसे घर के बाकी सदस्य प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। कई बार तो घरों में इस प्रसाद को ग्रहण करने के लिए आपस में होड़ लग जाती है, क्योंकि यह माँ के प्रसादों में सबसे अनुपम माना जाता है। इस नैवेद्य के प्रसाद के बाद पूरा घर तस्मई और पूड़ी ग्रहण करता है।

तीसरा दिन: संध्या अर्घ्य

तीसरे दिन व्रतिन का उपवास फिर शुरू हो जाता है जो लगभग 36 घंटे चलता है। यह भी निर्जला ही होता है। इस दिन परिवार के बच्चे या युवा डलिया और सूप तैयार करते हैं जिनमें ठेकुआ, लडुआ, साँच और घर के पास उगने वाली कोई भी फसल (गन्ना, संतरा, सेब से लेकर मूली, केला, मूँगफली, मकई तक) हो सकते हैं। घर के पुरुष इन डलियों को सिर पर लेकर घर से घाट तक जाते हैं। रास्ते भर में सफाई, पानी के छिड़काव आदि से स्वच्छता और शुचिता बरकरार रखे जाते हैं।

डलिया को घाट पर खोल कर रख दिया जाता है। व्रतिन जल में स्नान कर ढलते सूर्य और प्रत्यूषा की वंदना करती हैं। इसके बाद वे हर डलिया को एक दिए के साथ हाथ में लेतीं हैं और वे और परिवार के अन्य सदस्य डलिया में जल और दूध द्वारा अर्घ्य देते हैं।

इसके बाद व्रतिन फिर एक बार स्नान करतीं हैं और उसके बाद घाट पर पूजा होती है। इसमें आराधना, पुष्पांजलि, धूप चढ़ाना और अगरबत्ती जलाना शामिल होते हैं। डलिया को पुरुष सदस्य वापिस घर ले आते हैं और इसे सहेज कर रात भर के लिए ऐसी जगह स्थापित किया जाता है जहाँ गलती से स्पर्श, पैरों का लगना आदि न हो।

चौथा दिन: ऊषा अर्घ्य

शाम के अर्घ्य की ही प्रक्रिया इसमें दोहराई जाती है। डलिया लेकर घाट पर पहुँचा जाता है, जहाँ व्रतिन पानी में उतर कर सूर्योदय का इंतज़ार करतीं हैं। जैसे सूर्य देव देवी ऊषा के साथ प्रकट होते हैं, युगल को जल और दूध का अर्घ्य शाम की ही भाँति पहली किरण के साथ दिया जाता है।

इसके बाद डलिया को वापिस घर ले जा कर परिवार के लोगों और पड़ोसियों में प्रसाद वितरित होता है। व्रतिन के जलाशय से बाहर आने तक पूरा परिवार भी उनके साथ खाली पेट प्रतीक्षा करता है।

व्रतिन जलाशय से बाहर आकर नए वस्त्र धारण करतीं हैं और घर की अन्य महिलाओं के साथ वापिस घर जातीं हैं। रास्ते में खेतों में वे मृदा (मिट्टी) की भी पूजा करतीं हैं। इसे भूमि की उर्वरा शक्ति के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन माना जाता है।

जब व्रतिन घर पहुँचती हैं तो घर के सभी सदस्य उनके चरण स्पर्श कर उनसे आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। उन क्षणों में जब वे अपनी सभी इन्द्रियों और अंगों के आवेश को स्थिर किए हुए होतीं हैं, तो उनकी वाणी में माता उषा या छठी मईया का निवास माना जाता है।

डलिया के प्रसाद के अलावा इस वक्त का मुख्य भोजन कद्दू (लौकी)-भात होता है।

डलिया की सामग्री की महत्ता

हर परिवार में अलग-अलग संख्या में डलिया होती हैं। एक, दो, तीन से लेकर किसी-किसी परिवार में संख्या दस के परे भी जा सकती है। यह संख्या इस पर निर्भर करती है कि घर के लोगों ने छठी मईया से कितनी डलिया की मनौती मानी थी।

कई बार मान लीजिए कि कोई अगर गंभीर रूप से बीमार है तो घर की वयोवृद्ध दादी-नानी कुछ वर्षों (या हो सकता है हमेशा के लिए भी) एक निश्चित बड़ी संख्या की मनौती मान लें। इसमें कई बार तो ऐसा भी होता है कि लोग अपने ही नहीं, आस-पड़ोस के लोगों के लिए मनौती मान लेते हैं, जैसे, “हे छठी मईया, मेरा ये बेटा (गाँव का मुखिया, जिसका मान लीजिए एक्सीडेंट हो गया था) बिस्तर से उठ खड़ा हो, तो मैं जब तक ये जिएगा, एक डलिया फल हर साल चढ़ाऊँगी।”

‘कष्ट लेना’

यह अर्घ्य के दो दिनों की शाम और सुबह में काफी आम है। कई लोग, अमूमन पुरुष, छोटी चाकू या ऐसी ही किसी धातु वाली वस्तु के साथ सूर्य की ओर चेहरा कर दंड प्रणाम करते हुए घाट तक जाते हैं।

असल में वे क्या कर रहे होते हैं:

वे अपने घर से निकल कर सूर्य को प्रणाम करते हैं, और ज़मीन पर लेट कर अपने शरीर की लम्बाई जितनी दूरी नापते हैं। इस दूरी का वे ज़मीन पर कील या चाकू आदि से निशान लगा देते हैं। उसके बाद वे उठ कर फिर से सूर्य को प्रणाम करते हैं, निशान वाली जगह पैर जमा कर फिर ज़मीन पर लेट जाते हैं, सिर की जगह पर निशान लगाते हैं… यह प्रक्रिया घाट पहुँचने तक जारी रहती है।

यह केवल सुनने में ही नहीं, करने में भी बहुत ही कठिन प्रक्रिया है। इसे करने वाला या तो खुद इसकी मन्नत माना होता है, या उसके लिए उसकी माँ, दादी-नानी ने उसके कल्याण के लिए यह मन्नत मानी होती है। इस आराधना विधि को ‘कष्ट लेना’ कहा जाता है।

यह इतना दुष्कर और जटिल है कि इस मन्नत का उपयोग केवल बहुत ही बड़ी विपत्ति के उपाय में किया जाता है- जैसे अगर किसी का एक्सीडेंट हो गया है, या किसी अन्य कारण से प्राण संकट में पड़ गए हों। तभी इस कष्ट के अर्पण के बदले देवताओं से सहायता माँगी जाती है।

हालाँकि यह ‘कष्ट लेना’ क्रिया अमूमन केवल पुरुष ही करते हैं, लेकिन इससे मिलता-जुलता एक संस्करण स्त्रियों के लिए भी होता है। उन्हें उसके लिए जलाशय में सबसे पहले पहुँच जाना होता है, उन महिलाओं के पहले जो ‘कष्ट’ वाली मनौती नहीं किए होतीं हैं और अर्घ्य की प्रक्रिया समाप्त होने पर उनसे बाद में निकलना होता है। अक्टूबर अंत-नवंबर के कड़ाके की ठंड में सूर्योदय के पहले से ऐसा करना बेहद मुश्किल होता है।

बिहार में सबसे प्रचलित छठी मईया से मॉं, दादी, नानी हमेशा ही प्रार्थना करती रहती हैं। ऐसी मान्यता है कि माँ उषा अपने बच्चों का सदैव ध्यान रखतीं हैं। यह ‘कष्ट’ माँ उषा की संतान होने के प्रति आभार प्रकट करने का एक ज़रिया है।

विश्वास ही हम सब को एक सूत्र में पिरोता है। छठ पूजा पूरे परिवार को साथ ले आती है। व्रतिन को घर में सबसे अधिक सम्मान दिया जाता है और बच्चों में उनके थके हाथ-पैर दबाकर, सिर पर मालिश कर उनका आशीर्वाद लेने की होड़ लगी रहती है।

यह पर्व पृथ्वी पर साक्षात् दिखने वाले एकमात्र देवता को धन्यवाद करने का एक तरीका है, जिनके अनुग्रह से पृथ्वी पर जीवन और प्राण का संचार होता है। यह उन सूर्य देव के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का तरीका है, जिनकी किरणों के बिना पूरा ब्रह्माण्ड मृत हो जाएगा। वे केवल जीवन ही नहीं देते। अपनी किरणों से व्याधियों का नाश कर पालन भी करते हैं। छठ पर हम उन्हें और उनकी शक्तियों ऊषा और प्रत्यूषा को अपना आभार ज्ञापित करते हैं।

(पहली बार मूलतः अंग्रेजी में प्रकाशित पूर्व संपादक अजीत भारती के इस लेख में जरुरी एडिटोरियल बदलाव किए गए हैं।)

उत्तरकाशी की सुरंग में कैसे फँसे 40 मजदूर, अब तक क्यों नहीं निकाले जा सके हैं बाहर: रेस्क्यू ऑपरेशन के बारे में जानिए सब कुछ

उत्तरकाशी के सिल्कयारा सुरंग के भीतर 40 मजदूरों को फँसे हुए आज 6 दिन हो गए हैं। घटना वाले दिन के बाद से अब तक लगातार उनके रेस्क्यू के लिए काम किया जा रहा है। देश-विदेश से मशीनें मँगाकर मलबा हटाने का प्रयास चल रहा है। इन्हीं कोशिशों का फल है कि अब खबर आ रही है कि हो सकता है मजदूरों को सुरंग से 48 घंटे में निकाल लिया जाए। तब तक उन्हें पाइप से ही खाना-पानी और ऑक्सीजन दी जाएगी।

एक ओर जहाँ प्रशासन ने मजदूरों की जान बचाने के लिए दिन-रात को एक किया हुआ है। वहीं सोशल मीडिया से लेकर मीडिया में हल्ला मच रहा है कि आखिर मजदूरों को निकालने में इतना समय क्यों लगा दिया…कुछ लोग इस पर राजनीति करने से भी बाज नहीं आ रहे। लेकिन हकीकत तो ये है कि ऐसी घटना अगर कहीं भी घटती हैं तो उसके बचाव कार्य में समय लगता ही है। 2018 में थाईलैंड में हुई ऐसी घटना के वक्त 18 दिन बाद जाकर लोगों को टनल से निकाला गया था।

कहाँ तक पहुँचा रेस्क्यू का काम

उत्तरकाशी टनल हादसे के बाद एयरलिफ्ट कराकर उत्तरकाशी पहुँचाई गई ‘अमेरिकी ऑगर मशीन’ ने शुक्रवार (17 नवंबर 2023) सुबह तक ड्रिलिंग की। इसके बाद 900mm व्यास वाले 6-6 मीटर के 5 पाइप मलबे के अंदर डाल दिए। बताया जा रहा है कि अब भी 30 मीटर तक की खुदाई बाकी है। इसके बाद जल्द से जल्द मजदूरों को पाइप के जरिए निकाला जाएगा। इस प्रक्रिया को ‘ट्रेंचलैस तकनीक’ कहते हैं। जहाँ मजदूर पाइप से रेंगते हुए बाहर आएँगे।

उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य का ख्याल रखते हुए सुरंग के बाहर टनल के बाहर 6 बिस्तरों वाला एक अस्थायी हॉस्पिटल भी तैयार किया गया है। टनल से मजदूरों के निकलने के बाद उन्हें तुरंत मेडिकल सुविधाएँ मिल सकें इसलिए टनल के बाहर 10 एंबुलेंस भी तैनात की गई हैं।

खाना पहुँचाने का काम कैसा चल रहा

कुछ वीडियोज सामने आई हैं जिसमें दिखाया गया है कि किस तरह से मजदूरों के लिए पाइपलाइन से खाना पहुँचाया जा रहा है। इस प्रक्रिया में कई मजदूर जुटे हैं जो चना जैसी खाने की चीजें पाइप में डालते हैं फिर उसमें पीछे से एक और पाइप लगाते हैं और प्रेशर से उसे टनल में फँसे मजदूरों तक पहुँचाते हैं।

रेस्क्यू के दौरान आ रही मुश्किलें

उत्तरकाशी में हुई इस घटना में मजदूरों को निकालने में इतने दिन लग गए, इसे लेकर हर जगह प्रश्न किया जा रहा है। जबकि हकीकत यह है कि सुरंग में मशीन से लगातार काम नहीं हो पा रहा है। वहाँ भूस्खलन के कारण सुरंग में मलबा भरा और 40 मजदूर फँस गए। इसी के बाद वहाँ के पत्थर भी कमजोर हो गए। अब रेस्क्यू ऑपरेशन में इसी वजह से दिक्कत आ रही है।

मंगलवार को वहाँ एक और भूस्खलन हुआ था। तब रेस्क्यू में लगे 2 अन्य मजदूर भी घायल हो गए, जिनका अस्पताल में इलाज किया गया। हिमालय के क्षेत्र में सामान्यत: सॉफ्ट रॉक ही मिलते हैं। जिस इलाके में ये घटना हुई वहाँ के पत्थर कमजोर हैं और टूटे-फूटे हैं। इस कारण खुदाई में समस्या आती है।

ऐसी चुनौतियों के बावजूद स्टील के बड़े बड़े पाइप मलबे के अंदर डालकर मजदूरों तक पहुँचाने का काम चल रहा है। आज सुबह की ही बात है सुबह खुदाई के वक्त भी मिशन एक पत्थर आने से मिशन में रुकावट आई थी। लेकिन तब डायमंड कटर व डायमंट बिट मशीन की मदद से उसे काट दिया गया और आगे का काम शुरू हुआ। लेकिन जितनी देर ये समस्या आई उतने समय तक खुदाई का काम रुका रहा।

थाईलैंड की एक्सपर्ट टीम रख रही नजर, झेल चुके हैं ऐसी स्थिति

बता दें कि निर्माणाधीन टनल में फँसे मजदूरों को बचाने के लिए जहाँ दिन-रात मेहनत की जा रही है। उन्हें भोजन और ऑक्सीजन सप्लाई हो रही है। वहीं उन्हें सकुशल सुरंग से निकाल लेने के लिए नॉर्वे-थाईलैंड से भी एक टीम को घटनाक्रम पर नजर बनाए रखने को कहा गया है।

ऐसा इसलिए क्योंकि उन्होंने उत्तरकाशी जैसी स्थिति का 2018 में सामना किया था। उस समय सुरंग में फँसे लोग 18 दिन बाद जाकर बाहर निकाले गए थे। इन लोगों में थाइलैंड में एसोसिएशन फुटबॉल टीम के 11 से 16 साल की उम्र के 12 बच्चे और एक कोच था।

थाईलैंड में इन बच्चों को निकाललने के लिए रेस्क्यू ऑपरेशन में 10 हजार लोगों ने हिस्सा लिया था। अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, चीन, रूस जैसे देश मदद को आगे आए थे, तब जाकर बच्चों की और कोच की जान बच पाई थी।

उस वक्त टनल से बच्चों को निकालने के लिए एक बेस तैयार किया गया था। चूँकि उस टनल में पानी भी था तो हर बच्चे को निकालने के लिए 2 गोताखोर लगाए गए थे। इन सबके पास ऑक्सीजन टैंक था। जब ये बच्चों को रेस्क्यू करने गए तो निकालने से पहले उनको बेहोश किया। इस घटना से जितन विकट स्थिति थाईलैंड के सामने आई थी उससे लग रहा था रेस्क्यू में 4 माह लग जाएँगे। हालाँकि तीन दिन में ही गोताखोरो ने बच्चों को निकाल दिया। दुर्भाग्यवश रेस्क्यू के दौरान दो बचाव कार्य में लगे 2 कर्मचारियों की मौत भी हो गई थी।