ऑक्सफोर्ड यूनियन में 27 नवंबर 2025 को हुई एक डिबेट में एक भारतीय छात्र ने पाकिस्तानी प्रोपेगेंडा को सटीक और करारे तथ्यों (Hard-Hitting Facts) से चूर-चूर कर दिया। इस डिबेट के कुछ क्लिप अब इंटरनेट पर वायरल हो रहे हैं।
भारतीय छात्र विरांश भानुशाली मुंबई के रहने वाले हैं और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में कानून की पढ़ाई कर रहे हैं। वे इस डिबेट में भारत का पक्ष रखने वाली टीम का हिस्सा थे। यह डिबेट 26 नवंबर यानी 26/11 मुंबई आतंकी हमलों की बरसी के ठीक एक दिन बाद आयोजित की गई थी।
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में भारतीय छात्र विरांश भानुशाली ने बेनकाब किया कांग्रेस का असली चेहरा
कहा- 26/11 मुंबई आतंकी हमलों के बाद जब देश चाहता था बदला तब कांग्रेस सरकार पाकिस्तान को भेज रही थी Dossiers pic.twitter.com/wAwuQJEeGX
26/11 मुंबई हमलों के सर्वाइवर विरांश भानुशाली ने पाकिस्तान पर हमला बोलते हुए कहा, “आप उस देश को शर्मिंदा नहीं कर सकते जिसमें खुद कोई शर्म ही नहीं है।” ऑपइंडिया ने विरांश भानुशाली से बात की, जिसमें उन्होंने डिबेट का अपना अनुभव साझा किया और भारत-पाकिस्तान संघर्ष और भारत की वैश्विक छवि पर भी अपने विचार रखे।
मैं खुद को मानता हूँ भारत का राजदूत: विरांश भानुशाली
ऑपइंडिया की पत्रकार रितिका चंदोला ने विरांश से पूछा कि विदेशी जमीन पर पाकिस्तान के खिलाफ भारत का पक्ष रखने का अनुभव कैसा रहा। जवाब में विरांश ने कहा कि वे खुद को देश का राजदूत मानते हैं और भारत की तरफ से बोलकर उन्हें गर्व महसूस हुआ।
दिलचस्प बात यह है कि विरांश ऑक्सफोर्ड यूनियन के अध्यक्ष मूसा हर्राज के दोस्त हैं, जो पाकिस्तान के रक्षा उत्पादन मंत्री मुहम्मद रजा हयात हर्राज के बेटे हैं। मूसा ने डिबेट में पाकिस्तान का पक्ष रखा था।
डिबेट के बाद के हालात पर पूछे जाने पर ऑक्सफोर्ड यूनियन में चीफ ऑफ स्टाफ विरांश ने कहा, “मूसा और मेरा रिश्ता ऐसा है कि हम दोनों अच्छी तरह जानते हैं कि मैं भारतीय हूँ और वह पाकिस्तानी। हम दोनों संस्थान में इतने अहम पद पर हैं कि घर में सुर्खियाँ बन सकती हैं। इसलिए जहाँ जरूरी है हम सहयोग करते हैं, लेकिन अपनी सीमाएँ तय करते हैं और कहते हैं कि इस पर हमें गर्व है, इस पर समझौता नहीं करेंगे और हमारे अपने विचार हैं। मैं एक फ्री स्पीच सोसाइटी से हूँ। मुझ पर फ्री स्पीच को बढ़ावा देने की जिम्मेदारी है।”
मुझे उम्मीद नहीं थी कि मेरा भाषण वायरल होगा: भानुशाली
डिबेट के क्लिप वायरल होने और भारत में मिल रहे प्यार पर विरांश ने कहा कि उन्हें ऐसी प्रतिक्रिया की उम्मीद नहीं थी। उन्होंने कहा कि उन्हें तो उल्टा लग रहा था क्योंकि डिबेट को पाकिस्तानी चैनल जियो न्यूज और एआरवाई ने कवर किया था। विरांश को अपने हिस्से के बाद चुनाव की वजह से डिबेट छोड़नी पड़ी थी। पाकिस्तानी मीडिया ने इसे भारतीय पक्ष का वॉकआउट बता दिया।
विरांश ने कहा, “हमारे पास जियो न्यूज और एआरवाई के प्रतिनिधि थे, जिन्होंने इसे लाइव दिखाया या अगले दिन टेलीकास्ट किया और बड़े हेडलाइन में लिखा कि भारतीय पक्ष ने वॉकआउट किया, जो सच नहीं है।” उन्होंने आगे कहा, “लेकिन लोग यह नहीं देखते कि हमारे वीडियो आने से पहले पूरे महीने कवरेज सिर्फ पाकिस्तानी पक्ष की थी। भारतीय पक्ष ने तो कवरेज ही नहीं की थी। मुझे अपने भाषण पर भरोसा था। मुझे पता था कि लोग सुनेंगे, लेकिन इतना वायरल होने की कल्पना नहीं थी।”
हम दुनिया के सामने सबसे बेहतर प्रतिनिधि भेजने में पीछे: भानुशाली
विरांश ने कहा कि पाकिस्तान ग्लोबल फोरम पर अपनी बात रखने में कामयाब रहा है, लेकिन भारत का पक्ष अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ठीक से नहीं रखा जा रहा।
भानुशाली ने कहा, “मैंने देखा है कि हमें अपनी कम्युनिकेशन में बदलाव करना चाहिए। हम पाकिस्तान के साथ नहीं जोड़े जाना चाहते, हमारे मुकाबले चीन, अमेरिका और विकसित देश हैं। लेकिन जब हम अपने सबसे अच्छे प्रतिनिधि नहीं भेजते और ऐसे फोरम होते हैं जिनका दूसरा पक्ष इस्तेमाल करता है, तो सिर्फ एक ही कहानी चलती है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय प्रतिनिधित्व नहीं हुआ है।”
पाकिस्तान भारत के साथ लड़ाई को बहाना बनाता है: भानुशाली
ऑपइंडिया की पत्रकार के सवाल पर कि भारत का मुकाबला पाकिस्तान से नहीं है, विरांश ने सहमति जताई। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के लिए भारत से लगातार संघर्ष में रहना फायदेमंद है क्योंकि इसी बहाने वहाँ की गरीबी और महंगाई को जायज ठहराया जाता है।
विरांश ने कहा, “पाकिस्तान के लिए भारत से संघर्ष में रहना फायदेमंद है, क्योंकि भारत बिना पाकिस्तान के भी जी सकता है, लेकिन मौजूदा पाकिस्तानी सत्ता बिना भारत के शायद टिक न पाए। कम से कम भारतीय खतरे के बिना नहीं। अगर पॉपुलिज्म देखना है तो दूसरी तरफ है, क्योंकि उन्हें भारतीय खतरे की जरूरत है। इसी से वे आटे की कीमत, बड़ी गरीबी और हत्याओं को जायज ठहराते हैं।”
26/11 मुंबई आतंकवादी हमलों की याद के बारे में पूछे जाने पर, भानुशाली ने कहा कि उन्हें उस समय का डर और घबराहट अभी भी याद है। भानुशाली उस समय केवल 4 साल के थे। उन्होंने कहा कि वह अपने हिस्सेदार और सुरक्षित पीढ़ी का हिस्सा होने के लिए आभारी हैं, जिसने बड़े आतंकवादी हमले नहीं देखे।
भानुशाली ने याद किया, “मैं चार साल का था। लेकिन वे कहानियाँ और यादें, जो अभी भी मेरे दिमाग में हैं, हमें यह सिखाती हैं कि सीमा पार आतंकवाद जैसी समस्याओं से कैसे निपटा जाए।” उन्होंने जोड़ा कि आतंकवाद समाज को व्यापक रूप से प्रभावित करता है, चाहे व्यक्ति किसी भी वर्ग या स्थिति का हो।
कुछ समुदाय धर्म को शोषण का जरिया बनाते हैं: भानुशाली
इस्लामिक कट्टरता और पश्चिम में मल्टीकल्चरलिज्म के खिलाफ बढ़ते मूड पर विरांश ने कहा कि कुछ लोग धर्म को निजी फायदे के लिए इस्तेमाल करते हैं। उन्होंने शशि थरूर का हवाला देते हुए कहा कि भारत ने दुनिया को सिर्फ सहनशीलता नहीं बल्कि स्वीकृति सिखाई है।
यूके में इस्लामोफोबिया पर विरांश ने कहा कि यह जटिल मुद्दा है। कुछ समुदायों ने धर्म को सामाजिक शोषण का जरिया बनाया है, जैसे ग्रूमिंग गैंग्स। उन्होंने मल्टीकल्चरलिज्म का समर्थन किया लेकिन कहा कि अगर कोई इसका निजी फायदा उठाता है तो गलत है।
Oxford University Union Debate से चर्चा में आए Viraansh Bhanushali ने OpIndia पर @RitikaChandola को दिए गए Exclusive Interview में कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर बड़ी बेबाकी से अपनी राय रखी है।
उनके अनुसार Multicultural Society होना अच्छी बात है लेकिन सभी को उसका सम्मान करना चाहिए।… pic.twitter.com/KaNi4hbvQt
मल्टीकल्चरलिज्म के साथ आत्मसात भी होना चाहिए: भानुशाली
यूके में बहुसांस्कृतिकता (मल्टीकल्चरलिज्म) के सामने चुनौतियों के बारे में बात करते हुए, भानुशाली ने कहा कि इस्लाम को यूके में कभी-कभी प्रचार का जरिया बनाया गया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि बहुसांस्कृतिकता को टिकाऊ बनाने के लिए समाज में एकीकरण जरूरी है।
भानुशाली ने कहा, “मैं हमेशा यह कहता रहा हूँ कि कुछ लोग इस्लाम को प्रचार के लिए इस्तेमाल करते हैं। कुछ लोग राजनीतिक बदलाव के लिए जलवायु परिवर्तन जैसी चीजों का इस्तेमाल करते हैं। यह सब दबाव बनाने के लिए होता है। बहुसांस्कृतिकता जैसी अच्छी चीज का इस्तेमाल जब दबाव बनाने के लिए किया जाता है तो समस्या होती है। भारत एक बहुत ही बहुसांस्कृतिक समाज है और हम इसकी स्थापना से ही ऐसे रहे हैं, बल्कि उससे पहले भी। हम बहुसांस्कृतिकता की आलोचना तब नहीं करते जब यह हमें एक पहचान में जोड़ती है। लेकिन अगर लोग एकीकरण नहीं करते, अपनी पहचान में शामिल नहीं होते, तो यह एक समस्या बन जाती है।”
बांग्लादेश में हिंदुओं की हत्या भयानक और निंदनीय: भानुशाली
ऑपइंडिया की पत्रकार ने भानुशाली से पूछा कि वह बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों और हाल ही में हुए हिंदू व्यक्ति की लिंचिंग के बारे में क्या सोचते हैं। भानुशाली ने बांग्लादेश में हिंदू समुदाय के उत्पीड़न की निंदा की और कहा, “मैंने बांग्लादेश में हिंदू जनता पर किए जा रहे अत्याचारों के कुछ बहुत ही भयानक वीडियो देखे हैं। लिंचिंग, किसी को जिंदा जलाया जाना। मुझे ऐसे वीडियो भी दिखे जिनमें किसी को भीड़ के हवाले किया गया, जो उन्हें मार देती। यह पूरी तरह निंदनीय और भयानक है।”
भानुशाली ने कहा कि बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए देश में लोकतंत्र लौटना जरूरी है, ताकि ऐसे कामों के लिए जवाबदेही हो। उन्होंने बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की माँग की।
मैं मोदी से प्यार करता हूँ लेकिन उनकी आलोचना भी करता हूँ: भानुशाली
पीएम मोदी पर विरांश ने कहा कि उन्हें मोदीजी से बहुत लगाव है लेकिन कुछ मतभेद भी हैं। उन्होंने कहा कि सरकार की आलोचना घरेलू मामला है, बाहर देश को पहले रखना जिम्मेदारी है।
भानुशाली ने कहा, “मुझे मोदी जी के बारे में अपनी आलोचनाएँ हैं। मैं उन्हें कई तरीकों से पसंद करता हूँ। मेरी अपनी आलोचनाएँ भी हैं, लेकिन मैं उन्हें केवल देश में ही रखता हूँ, क्योंकि यह हमारा मामला है। हम लोकतंत्र में रहते हैं और यहाँ अपनी आलोचना व्यक्त कर सकते हैं। जब आप बाहर होते हैं, तो आपकी जिम्मेदारी होती है कि देश को पहले रखें। मेरे भाषण में भी देखें, आपत्तियाँ किसी ने मोदी के लिए नहीं कीं, बल्कि भारत के लिए कीं।”
(मूल रूप से यह खबर अंग्रेजी टीम की अदिति ने लिखी है, जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)
भारत के लिए वर्ष 2026 केवल एक कैलेंडर वर्ष नहीं, बल्कि वैश्विक मंच पर उसकी आर्थिक और कूटनीतिक ताकत के नए अध्याय की शुरुआत है। इसकी बुनियाद उस फैसले से पड़ी है, जिसके तहत भारत को संयुक्त राष्ट्र समर्थित किम्बर्ली प्रोसेस (Kimberley Process – KP) का अध्यक्ष चुना गया है।
यह निर्णय ऐसे समय आया है, जब वैश्विक हीरा व्यापार भूराजनैतिक तनावों, प्रतिबंधों और नैतिक व्यापार की बढ़ती माँग के दौर से गुजर रहा है। ऐसे में भारत का नेतृत्व सँभालना अंतरराष्ट्रीय समुदाय के भरोसे और भारत की साख का स्पष्ट संकेत है।
किम्बर्ली प्रोसेस के अध्यक्ष के रूप में भारत का चयन क्यों है खास?
किम्बर्ली प्रोसेस की प्लेनरी बैठक में यह तय किया गया कि भारत 1 जनवरी 2026 से इस वैश्विक मंच का अध्यक्ष बनेगा, जबकि गुरुवार (25 दिसंबर 2025) से वह उपाध्यक्ष की भूमिका निभाएगा। यह भारत के लिए तीसरा अवसर है, जब उसे किम्बर्ली प्रोसेस की अध्यक्षता सौंपी जा रही है।
इससे यह स्पष्ट होता है कि भारत केवल एक बड़ा हीरा प्रोसेसिंग केंद्र नहीं, बल्कि नियम आधारित वैश्विक व्यापार व्यवस्था को आगे बढ़ाने वाला जिम्मेदार देश भी है। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने इस फैसले को अंतरराष्ट्रीय हीरा व्यापार में भारत की नेतृत्व क्षमता का प्रमाण बताया है।
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल के अनुसार, यह चयन वैश्विक स्तर पर मोदी सरकार की पारदर्शी और ईमानदार व्यापार नीति पर बढ़ते भरोसे को दर्शाता है। भारत की यह भूमिका इसलिए भी अहम मानी जा रही है, क्योंकि दुनिया के लगभग 90 प्रतिशत कच्चे हीरों की कटिंग और पॉलिशिंग भारत में होती है, जिससे भारत वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का केंद्रीय स्तंभ बन चुका है।
आखिर क्या है किम्बर्ली प्रोसेस और क्यों पड़ी इसकी जरूरत ?
किम्बर्ली प्रोसेस एक अंतरराष्ट्रीय और बहुपक्षीय पहल है, जिसमें सरकारें, अंतरराष्ट्रीय हीरा उद्योग और सिविल सोसाइटी एक साथ मिलकर काम करती हैं। इसकी स्थापना का मुख्य उद्देश्य ‘संघर्ष हीरों’ (Conflict Diamonds) यानी अवैध हीरों के व्यापार पर रोक लगाना है। संघर्ष हीरे (Conflict Diamonds) वे कच्चे हीरे होते हैं, जिनका इस्तेमाल विद्रोही समूह या सशस्त्र संगठन युद्ध, हिंसा और अस्थिरता को वित्तपोषित करने के लिए करते हैं।
1990 के दशक में अफ्रीका के कई देशों में गृहयुद्ध और विद्रोह के पीछे हीरों से होने वाली अवैध कमाई एक बड़ी वजह बनी। इसी पृष्ठभूमि में संयुक्त राष्ट्र के समर्थन से किम्बर्ली प्रोसेस की नींव रखी गई, ताकि हीरों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार को नियंत्रित किया जा सके और यह सुनिश्चित हो सके कि हीरा हिंसा और रक्तपात का माध्यम न बने।
किम्बर्ली प्रोसेस सर्टिफिकेशन स्कीम की भूमिका और प्रभाव
किम्बर्ली प्रोसेस सर्टिफिकेशन स्कीम यानी KPCS को 1 जनवरी 2003 से लागू किया गया। इसके तहत यह अनिवार्य किया गया कि किसी भी देश से दूसरे देश में निर्यात या आयात होने वाले कच्चे हीरों के साथ प्रमाणपत्र होना चाहिए, जो यह साबित करे कि वे संघर्ष-रहित हैं। समय के साथ यह व्यवस्था इतनी प्रभावी हो गई कि आज यह दुनिया के 99 प्रतिशत से अधिक कच्चे हीरा व्यापार को नियंत्रित करती है।
वर्तमान में किम्बर्ली प्रोसेस में 60 प्रतिभागी शामिल हैं, जिनमें यूरोपीय संघ और उसके सदस्य देशों को एक इकाई के रूप में गिना जाता है। यह व्यवस्था हीरा उद्योग के लिए सबसे व्यापक और संगठित अंतरराष्ट्रीय नियामक ढाँचा बन चुकी है, जिसने अवैध हीरों की बाजार में एंट्री को काफी हद तक रोका है।
हीरा उद्योग के लिए किम्बर्ली प्रोसेस क्यों है इतना जरूरी?
हीरा उद्योग केवल लग्जरी या गहनों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कई देशों की अर्थव्यवस्था और लाखों लोगों की रोजी-रोटी से जुड़ा हुआ है। यदि संघर्ष हीरे खुले बाजार में प्रवेश कर जाते हैं, तो इससे न केवल युद्ध और हिंसा को आर्थिक मदद मिलती है, बल्कि उपभोक्ताओं का भरोसा भी टूटता है। किम्बर्ली प्रोसेस ने यह सुनिश्चित किया है कि ग्राहक जो हीरा खरीद रहा है, वह खून और हिंसा से सना हुआ न हो।
किम्बर्ली प्रोसेस के प्रयासों के चलते सिएरा लियोन, अंगोला, लाइबेरिया, कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य और कोट डी’वोआर जैसे देशों में संघर्ष हीरों की भूमिका काफी हद तक समाप्त हुई है। KP के अनुसार, आज संघर्ष हीरे वैश्विक उत्पादन का 0.1 प्रतिशत से भी कम रह गए हैं, जो इस पहल की सफलता को दर्शाता है।
2026 में भारत की अध्यक्षता से क्या बदल सकता है?
2026 में अध्यक्ष बनने के बाद भारत का फोकस किम्बर्ली प्रोसेस को और आधुनिक, पारदर्शी और प्रभावी बनाने पर रहेगा। भारत शासन और नियमों के सख्त अनुपालन के साथ-साथ डिजिटल सर्टिफिकेशन और हीरों की ट्रेसबिलिटी को बढ़ावा देने की दिशा में काम करेगा। डेटा आधारित निगरानी तंत्र के जरिए यह सुनिश्चित किया जाएगा कि हीरों की सप्लाई चेन में किसी भी तरह की गड़बड़ी को समय रहते पकड़ा जा सके।
इसके साथ ही भारत उपभोक्ताओं के बीच संघर्ष-रहित हीरों को लेकर भरोसा और मजबूत करने पर जोर देगा। भारत यह भी प्रयास करेगा कि किम्बर्ली प्रोसेस को अधिक समावेशी बहुपक्षीय मंच बनाया जाए, जहाँ सभी प्रतिभागियों और पर्यवेक्षकों की आवाज सुनी जाए और निर्णय प्रक्रिया अधिक विश्वसनीय बने।
वैश्विक तनाव, रूस-यूक्रेन युद्ध और भारत की परीक्षा
भारत की अध्यक्षता ऐसे दौर में आने वाली है, जब वैश्विक हीरा व्यापार कई संवेदनशील मुद्दों से घिरा हुआ है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद रूसी हीरों पर G7 और यूरोपीय संघ द्वारा लगाए गए प्रतिबंध, मानवाधिकार उल्लंघन, जबरन श्रम और पर्यावरणीय नुकसान जैसे मुद्दों ने किम्बर्ली प्रोसेस की भूमिका को और जटिल बना दिया है।
रूसी कच्चे हीरे वैश्विक आपूर्ति का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा हैं, जबकि उनकी कटिंग-पॉलिशिंग का बड़ा केंद्र भारत है। ऐसे में भारत से अपेक्षा की जा रही है कि वह संतुलित और निष्पक्ष नेतृत्व के जरिए नियम आधारित वैश्विक व्यवस्था को मजबूत करे और किम्बर्ली प्रोसेस की साख को बनाए रखे।
भारत का किम्बर्ली प्रोसेस का अध्यक्ष बनना केवल एक औपचारिक उपलब्धि नहीं, बल्कि यह इस बात का संकेत है कि भारत अब वैश्विक व्यापार व्यवस्था में नियम बनाने और दिशा तय करने की स्थिति में है। 2026 में भारत की भूमिका यह तय करेगी कि आने वाले समय में हीरा उद्योग कितना पारदर्शी, नैतिक और भरोसेमंद बनता है। यही वजह है कि पूरी दुनिया की नजरें भारत के नेतृत्व पर टिकी होंगी।
क्रिसमस के दौरान देश के कई हिस्सों में इस पार्टी के नाम पर चल रही गतिविधियों पर गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं। बीते कुछ दिनों में राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों से लगातार ऐसी खबरें आई हैं, जहाँ क्रिसमस कार्यक्रमों के दौरान धर्मांतरण के आरोप लगे, विरोध हुए और हालात तनावपूर्ण हो गए। कहीं लोगों को भोजन, इलाज या आर्थिक मदद का लालच देकर बुलाया गया, तो कहीं महिलाओं और बच्चों को हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ भड़काने की बातें सामने आईं।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ये आयोजन केवल मजहबी प्रार्थनाएँ थीं, या फिर इनके पीछे कोई एजेंडा काम कर रहा था? क्या गरीब, अशिक्षित और जरूरतमंद लोगों को उनकी मजबूरी का फायदा उठाकर धर्म परिवर्तन के लिए प्रेरित किया जा रहा है? हिंदू संगठनों का दावा है कि यह धार्मिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि लोगों की मजबूरी का उनकी गरीबी और उनके लालच का फायदा उठाना है।
राजस्थान के बूंदी में बढ़ा तनाव
राजस्थान के बूंदी जिले में चित्तौड़ रोड के एक चर्च के बाहर उस समय तनाव फैल गया, जब विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने धर्मांतरण की घटना का विरोध करते हुए प्रदर्शन शुरू कर दिया। संगठनों का कहना था कि चर्च में आयोजित कार्यक्रम के दौरान मिशनरी गतिविधियों के तहत लोगों का धर्म परिवर्तन कराया जा रहा था। सूचना मिलते ही बड़ी संख्या में कार्यकर्ता मौके पर पहुँचे और चर्च का घेराव कर नारेबाजी की।
स्थिति बिगड़ती देख पुलिस मौके पर पहुँची और समझा कर हालात पर काबू पाया और दोनों पक्षों से शांति बनाए रखने की अपील की। संगठनों ने प्रशासन को चेतावनी दी कि यदि ऐसे कार्यक्रम नहीं रुके, तो आंदोलन और तेज किया जाएगा।
बीकानेर में धर्मांतरण, 34 लोग हिरासत में
इसी तरह बीकानेर के श्रीडूंगरगढ़ क्षेत्र के मोमासर गाँव में क्रिसमस की रात एक घर में चल रही मजहबी गतिविधि पर पुलिस ने दबिश दी। सूचना थी कि बाहर से आए लोग बाइबल पाठ और धर्मांतरण में शामिल हैं। पुलिस ने 34 लोगों को हिरासत में लिया और चार गड़िया जब्त की। प्रशासन यह जाँच कर रहा है कि यह सामान्य प्रार्थना सभाथी या सोची समझी धर्मांतरण की कोशिश।
मध्य प्रदेश के विदिशा में क्रिसमस कार्यक्रम में धर्मांतरण की कोशिश
मध्य प्रदेश के विदिशा में एक होटल में आयोजित क्रिसमस कार्यक्रम के दौरान धर्मांतरण की कोशिश की। संगठन का कहना था कि लोगों को खाना और अन्य सुविधाओं का लालच देकर बुलाया गया और बाइबल के जरिए ईसाई बनने के लिए प्रेरित किया गया। मंत्री सारंग ने कहा कि धर्मांतरण की कोशिशें पूरी नहीं हो पाएँगी। ऐसे लोगों पर कार्रवाई का जाएगी।
जबलपुर में दिव्यांग बच्चों का धर्मांतरण, विरोध के बाद मारपीट
वहीं जबलपुर के कटंगा में हवाबाग चर्च परिसर में दिव्यांग बच्चों के लिए आयोजित भोज कार्यक्रम के दौरान गुपचुप धर्मांतरण का कार्यक्रम चलाया जा रहा था। दोनों पक्षों में मारपीट हुई, कई लोग घायल हुए और पुलिस को सख्ती करनी पड़ी।
हरियाणा के फतेहाबाद में धर्मांतरण
हरियाणा के भूना शहर में क्रिसमस पर्व के दौरान धर्म परिवर्तन के आरोप लगने से तनाव की स्थिति बन गई। वार्ड नंबर 5 और 3 में आयोजित कार्यक्रमों का पड़ोसियों ने विरोध किया, जिसके बाद पुलिस ने हस्तक्षेप किया। एक स्थान पर कार्यक्रम रोकना पड़ा, जबकि दूसरे स्थान पर पुलिस की मौजूदगी में शांतिपूर्वक कार्यक्रम संपन्न हुआ। पुलिस ने स्थिति को नियंत्रण में किया और निवासियों ने धर्म परिवर्तन की गतिविधियों पर रोक लगाने की मांग की।
उत्तर प्रदेश के घरों में धर्मांतरण कार्यक्रम, मोहल्लों में विरोध
उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में क्रिसमस के दौरान घरों में आयोजित कार्यक्रमों में धर्मांतरण कराया जा रहा था, जिसका पड़ोसियों ने विरोध किया, जिसके बाद पुलिस मौके पर पहुँची। कहीं कार्यक्रम रोकने पड़े, तो कहीं पुलिस की मौजूदगी में उन्हें पूरा कराया गया। स्थानीय लोगों का कहना है कि इन घरों में लंबे समय से संदिग्ध गतिविधियाँ चल रही थीं और महिलाओं को निशाना बनाया जा रहा था।
धर्मांतरण का वीडियो वायरल, महिला ने पोंछ दिया माँग का सिंदूर
धर्मांतरण के ऐसे ही एक खुलासे का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। वायरल वीडियो में सुजीत मुखिया नाम के एक शख्स बताते हुए कह रहे है, “यहाँ पर जो भी महिलाएँ और बच्चियाँ दिख रहीं हैं इनलोगों का ऐसा माइंडवॉश किया गया है कि ये लोग कहते हैं कि हमारा जीवन परिवर्तन हो रहा है।” वे कह रहे हैं, “हमारे पंचायत में एक भी ईसाई समुदाय से नहीं हैं तो यहाँ चर्च हम नहीं चलने देंगे।”
पोछ दिए। हमारे पति को क्या हो गया। हम सिंदूर नहीं लगाएंगे। सिंदूर लगाने से क्या होता है।
ब्रेनवॉश का स्तर देखिए और कपार पीटिए। उम्मीद है इन मुखिया से और भी जन प्रतिनिधियों को प्रेरणा मिलेगी।
वह एक महिला से धर्मांतरण के नाम पर सवाल करते हैं कि ने सिंदूर क्यों लगाया है फिर, इस पर वह तुरंत अपना सिंदूर पोंछ लेती है। महिला कहती है, “पोछ दिए, पोछ दिए तो हमारे पति को क्या हो गया? सिंदूर लगाने से होता क्या है हम सिंदूर नहीं लगाएँगे”? वे बाकि महिलाओं से सवाल करते हुए कहते हैं हम भी बड़े कष्ट में हैं क्या धर्मांतरण करने से हमारा कष्ट दूर हो जाएगा?” इस पर वे सब कहने लगती हैं कि हाँ दूर हो जाएगा। सुजित साफ-साफ कहते हैं कि वे यहाँ चर्च नहीं चलने देंगे और वे सभी को वहाँ से निकलने के लिए कहते हैं, लेकिन महिलाएँ अड़ी रहती हैं।
नजर अंदाज नहीं की जा सकती ये घटनाएँ
क्रिसमस के नाम पर देश के अलग-अलग हिस्सों से सामने आई घटनाएँ अब महज गलतफहमी या स्थानीय विवाद कहकर टाली नहीं जा सकतीं। जब बार-बार एक ही पैटर्न सामने आए, जिसमें भोजन, इलाज, आर्थिक मदद या मनोरंजन के नाम पर लोगों को बुलाया जाए और फिर धर्मांतरण की घटनाएँ सामने आए, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। राजस्थान के बूंदी-बीकानेर से लेकर मध्य प्रदेश के विदिशा और जबलपुर तक और उत्तर प्रदेश के मोहल्लों तक हर जगह तस्वीर लगभग एक जैसी दिखाई देती है।
हिंदू संगठनों का आरोप है कि समाज के सबसे कमजोर वर्ग गरीब, महिलाएँ, बच्चे और दिव्यांग को निशाना बनाया जा रहा है। अगर यह सच है, तो यह धार्मिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि मजबूरी का शोषण है। धर्म वह होना चाहिए जिसे व्यक्ति बिना लालच, डर या दबाव के अपनाए। खाना, दवा या किसी अन्य सुविधा के बदले आस्था बदल वाना न सेवा है, न ही संवैधानिक अधिकारों की सही व्याख्या।
यदि आयोजन पूरी तरह पारदर्शी और नियमों के भीतर हैं, तो फिर विरोध और पुलिस कार्रवाई की नौबत क्यों आ रही है? बार-बार पुलिस का दखल, हिरासत और झड़पें इस बात का संकेत हैं कि जमीनी हकीकत कुछ और है।
बॉलीवुड अभिनेत्री जाह्नवी कपूर ने हाल में बांग्लादेश में हो रहे हिंदुओं के उत्पीड़न मामले पर आवाज उठाई तो इससे वामपंथी धड़ा और कट्टरपंथी जमात उनसे नाराज हो बैठी। कुछ ने सोशल मीडिया पर उनकी होती तारीफ के लिए निशाना बनाया तो वहीं ध्रुव राठी जैसे प्रोपगेंडाबाजों ने तो उन्हें फेक ब्यूटी के नाम पर घेरने का प्रयास किया।
क्या कहा था जाह्नवी कपूर ने?
जाह्नवी कपूर ने बांग्लादेश में हिंदू व्यक्ति दीपू चंद्र दास की भीड़ द्वारा हत्या की निंदा करते हुए इंस्टाग्राम स्टोरी पोस्ट की थी। गुरुवार (25 दिसंबर 2025) की रात जाह्नवी कपूर ने अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी में बांग्लादेश में हुई इस हत्या को ‘बर्बर’ बताया। उन्होंने कहा कि सांप्रदायिक हिंसा और कट्टरता के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए और इसमें किसी तरह की नाराजगी नहीं होनी चाहिए।
जाह्नवी की स्टोरी का स्क्रीनशॉट
जाह्नवी कपूर ने इस घटना का जिक्र करते हुए कहा कि ऐसी हिंसक घटनाएँ कोई अकेली या अलग-थलग घटना नहीं हैं। उन्होंने लोगों को दोहरे मापदंड (मोरल हिपोक्रेसी) से सावधान रहने को कहा और यह सवाल उठाया कि जब अपने ही भाई-बहनों के साथ अत्याचार होता है, तो उस पर चुप्पी क्यों रहती है, जबकि दुनिया के दूसरे हिस्सों के मुद्दों पर जोर-शोर से आवाज उठाई जाती है।
इस पूरी घटना पर जाह्नवी कपूर के पोस्ट के कुछ ही घंटों बाद, ध्रुव राठी ने इंस्टाग्राम पर एक स्टोरी शेयर की। इसमें उसने अपने यूट्यूब वीडियो ‘Dark Side of Beauty’ का प्रचार किया, जिसकी थंबनेल में जाह्नवी कपूर की तस्वीर को प्रमुखता से दिखाया गया। वीडियो में ध्रुव राठी ने बॉलीवुड एक्टर-एक्ट्रेस द्वारा करवाए जाने वाले कॉस्मेटिक ट्रीटमेंट पर भले फोकस किया था लेकिन उनके थंबनेल से साफ समझा जा सकता था कि उन्होंने उसमें जाह्नवी कपूर को ही क्यों चुना। राठी ने इसमें जाह्नवी के पहले और अब के चेहरे को दिखाकर मजाक उड़ाने की कोशिश की।
ध्रुव राठी की वीडियो का थंबनेल
ध्रुव राठी ने जाह्नवी के इंस्टा स्टोरी के चंद घंटे बाद ही ये वीडियो पब्लिक की तो लोगों को ध्रुव का प्रोपगेंडा समझने में समय नहीं लगा। उन्होंने इस तरह की हरकत करने के लिए ध्रुव को खूब लताड़ा। कई यूजर्स ने आरोप लगाया कि ध्रुव राठी, जाह्नवी कपूर द्वारा हिंदुओं के खिलाफ इस्लामी हिंसा की निंदा किए जाने से ध्यान हटाने के लिए उनसे जुड़ा हुआ कोई और, असंबंधित कंटेंट फैलाने की कोशिश कर रहे हैं।
एक यूजर ने लिखा, “जाह्नवी कपूर ने बांग्लादेशी हिंदुओं के समर्थन में पोस्ट किया और तुरंत मैक्रोहार्ड ध्रुव राठी ने उन पर हमला करना शुरू कर दिया। मुझे पूरा यकीन है कि वह हिंदू बनकर छिपा हुआ एक कटवा है।”
Jhanvi Kapoor posted in support of Bangladeshi Hindus and immediately MACROHARD @dhruv_rathee started attacking her.
एक यूजर ने लिखा, “जाह्नवी कपूर ने बांग्लादेशी हिंदुओं के समर्थन में पोस्ट किया। जर्मन यूट्यूबर ध्रुव राठी ने उन पर हमला करना शुरू कर दिया। अब यह कोई राज नहीं रहा कि वह जिहादियों के लिए काम कर रहा है। वह अब इसे छिपाने की कोशिश भी नहीं कर रहा है….और उसके फॉलोअर्स भी जिहादी हैं।”
Janhvi Kapoor posted in support of Bangladeshi Hindus. German Youtuber #DhruvRathee started attacking her It’s not a secret anymore that he is working for Jihadis. He isn’t even trying to hide it now….and his followers are also jihadis ? #BangladeshViolence#JhanviKapoorpic.twitter.com/zHi9cHMTyc
एक यूजर ने लिखा, “जाह्नवी कपूर ने बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ नरसंहार और अपराधों की निंदा की, कुछ घंटों बाद ध्रुव राठी ने जाह्नवी को टारगेट करते हुए एक वीडियो बनाया, क्या ये संकेत नेशनैलिटी साबित करने के लिए काफी हैं?”
Janhvi Kapoor calls out the slaughter and crimes against Hindus in Bangladesh ? hours later Dhruv Rathee made a video targeting Janhvi, this signs are enough to prove nationality? pic.twitter.com/nOrK7QRUH5
इसी तरह एक अन्य यूजर ने लिखा, “जाह्नवी कपूर ने अभी-अभी बांग्लादेशी हिंदुओं के मुद्दे पर एक स्टोरी पोस्ट की, और यह मैक्रोहार्ड जर्मन शेफर्ड ध्रुव राठी ने अपने अब्दुल फैन बेस को खुश करने के लिए तुरंत उन्हें इंसानियत से गिरा दिया।”
Jahnavi Kapoor just posted a story on Bangladeshi Hindus issue and this Macrohard German Shepherd @dhruv_rathee was quick to dehumanise her just to appease his Abdul fan base pic.twitter.com/wmpyo4ya3n
इन यूजर्स के अलावा बीजेपी नेता राधिका खेड़ा ने भी जाह्नवी के समर्थन में पोस्ट करते हुए लिखा, “जाह्नवी कपूर के बांग्लादेशी हिंदुओं पर दो शब्द ध्रुव राठी को काँटे जैसे चुभे और जाह्नवी की तस्वीर का घटिया आपत्तिजनक वीडियो बना डाला। इस ध्रुव राठी के वीडियों कॉन्ग्रेस अपने प्रचार में चलाती है। राहुल-प्रियंका गाँधी उन्हें पसंद करते है, जो महिला को नीचा दिखाते और हिंदुओं से नफरत।”
राधिका खेड़ा का ट्वीट और शमीम इकबाल की प्रतिक्रिया
राधिका की तरह तमाम नामी यूजर्स ने भी सोशल मीडिया पर वीडियो थंबनेल के स्क्रीनशॉट शेयर किए। आखिर में स्थिति ये आई कि आलोचनाओं से किनारा करने के लिए ध्रुव राठी ने अपना थंबनेल ही बदल दिया। अब इस वीडियो के ऊपर टाइगर श्रॉफ की पुरानी और अब की तस्वीर है। मगर, लोग प्रोपगेंडा करने की आदत के कारण ध्रुव को लताड़ रहे हैं। वहीं इस्लामी कट्टरपंथी हैं जो ध्रुव के समर्थन में हैं और जाह्नवी के पोस्ट पर अपनी घृणा दिखा रहे हैं। जाह्नवी को ट्रोल करते हुए उनका चेहरा देखने और मुस्लिमों के लिए आवाज उठाने को बोला जा रहा है।
सोशल मी़डिया पर शेयर होती तस्वीर
इस्लामी कट्टरपंथी भी पड़े पीछे
नीचे के पोस्टों में देख सकते हैं कि जब लोगों ने जाह्नवी ने पोस्ट की सराहना की तो इस्लामी कट्टरपंथियों ने यहाँ मजहब को घुसा दिया। राधिका के ट्वीट के नीचे ही शमीम इकबाल ने कमेंट किया कि जाह्नवी से दिक्कत इसलिए हुई है क्योंकि उन्होंने भारत में होने वाली मुस्लिमों की मॉब लिंचिंग को लेकर कभी कुछ नहीं कहा।
इसी तरह एक पोस्ट जहाँ पर जाह्नवी कपूर को सराहने की बात कही जा रही थी। वहाँ एक यूजर ने लिखा, “जब भारत में मुस्लिमों को लगभग रोज लिंचिंग का शिकार बनाया जा रहा था, तब वह गुस्सा और हिम्मत कहाँ थी?”
इसी तरह एक यूजर ने जाह्नवी के समर्थन में पोस्ट किया तो उसके कमेंट में एक वामपंथी ने लिखा, “उसने बस यह कोड क्रैक कर लिया है कि अंधभक्त को अपने साथ कैसे लाया जाए।”
मोहम्मद फुरकानुद्दीन ने लिखा, “जब इंडिया में मुस्लिमों के साथ मॉब लिंचिंग हुई थी तब तेरी जुबान क्यों बंद थी ???? बात अपने धर्म के लोगों की आई तब बहुत पुकार रहा है तू।”
इस पूरे घटनाक्रम ने साफ कर दिया है कि जब भी हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों की बात होती है, तो इस्लामी कट्टरपंथी, वामपंथी सोच और उनके समर्थक तंत्र को असहजता होने लगती है। जाह्नवी कपूर ने मानवता के पक्ष में खड़े होकर बांग्लादेश में हुई बर्बर हत्या की निंदा की, लेकिन सच के समर्थन के बजाय उन्हें निशाना बनाया गया। वहीं ध्रुव राठी जैसे लोग इसको और बढ़ावा देते हैं। बता दें कि इससे पहले जाह्नवी कपूर ने फिल्म धुरंधर की भी सराहना की थी, जबकि ध्रुव राठी ने इस फिल्म को लेकर भी जहर घोलने और मुस्लिमों को खुश करने की कोशिश की थी। उनके अपराध को धो-पोंछने का प्रयास किया था।
कॉन्ग्रेस पार्टी ने अरावली पहाड़ियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वीकार की गई संशोधित 100 मीटर वाली परिभाषा पर कड़ा विरोध जताया है। कॉन्ग्रेस का आरोप है कि मोदी सरकार इस नई परिभाषा के जरिए अरावली क्षेत्र के लगभग 90% हिस्से को संरक्षण से बाहर कर रही है, जिससे इस पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील इलाके में बड़े पैमाने पर खनन का रास्ता खुल सकता है।
इस मुद्दे पर कॉन्ग्रेस नेता और राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला करते हुए इसे एक सुनियोजित साजिश बताया। गहलोत ने कहा कि अरावली की परिभाषा को 100 मीटर तक सीमित करना कोई अलग फैसला नहीं है, बल्कि यह संस्थानों पर कब्जा कर अरावली को खनन माफिया के हवाले करने की बड़ी योजना का हिस्सा है।
गहलोत ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव के उस दावे को भी खारिज किया, जिसमें कहा गया है कि केवल 0.10% अरावली क्षेत्र ही खनन के लिए खुलेगा। उन्होंने इसे भ्रामक और तथ्यहीन बताया।
साथ ही, उन्होंने सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC) पर भी सवाल उठाए और कहा कि 2002 में सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में बनी यह समिति अब केंद्र सरकार के नियंत्रण में आकर रबर स्टैम्प बन चुकी है, जिससे अरावली के संरक्षण पर गंभीर खतरा पैदा हो गया है।
VIDEO | Jaipur: Former Rajasthan CM and Congress leader Ashok Gehlot, on changing definition of Aravalli Hills and Ranges, said, "27,200 new legal and illegal mines may open in 0.19 percent of Aravallis, govt’s decision will destroy 90 percent of the range."
2002 में अरावली खनन का समर्थन, अब कॉन्ग्रेस का यू-टर्न
कॉन्ग्रेस पार्टी पर लंबे समय से यह आरोप लगता रहा है कि वह सरकार में रहते हुए जिन नीतियों और फैसलों का समर्थन करती है, विपक्ष में आते ही उन्हीं का विरोध करने लगती है। राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत इस दोहरे रवैये की एक और मिसाल पेश कर रहे हैं।
आज गहलोत केंद्र और राजस्थान की बीजेपी सरकारों पर अरावली पहाड़ियों को खनन माफिया के हवाले करने की साजिश का आरोप लगा रहे हैं और केंद्र सरकार के सिर्फ 0.019% क्षेत्र में खनन वाले तर्क पर सवाल उठा रहे हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि 2002 में गहलोत के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार खुद अरावली क्षेत्र को खनन के लिए खोलना चाहती थी।
यानी जो फैसला उस समय कॉन्ग्रेस सरकार को सही लग रहा था, वही आज बीजेपी सरकार के दौर में गलत और जनविरोधी बताया जा रहा है। इसी वजह से कॉन्ग्रेस और अशोक गहलोत पर मौका देखकर रुख बदलने और राजनीतिक पाखंड का आरोप लगाया जा रहा है।
आज मैं अपनी प्रोफाइल पिक्चर (DP) बदलकर #SaveAravalli अभियान का हिस्सा बन रहा हूँ। यह सिर्फ एक फोटो नहीं, एक विरोध है उस नई परिभाषा के खिलाफ जिसके तहत 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को 'अरावली' मानने से इंकार किया जा रहा है। मेरा आपसे अनुरोध है कि अपनी प्रोफाइल पिक्चर बदलकर… pic.twitter.com/pt9u1O8UpX
साल 2002 में राजस्थान में अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा (एफिडेविट) दाखिल किया था। इस हलफनामे में राज्य सरकार ने कोर्ट को बताया था कि उसने खनन के लिए जंगल (वन) भूमि के उपयोग की अनुमति लेने के लिए केंद्र सरकार को 1543 मामलों में प्रस्ताव भेजे थे। यानी उस समय कॉन्ग्रेस सरकार खुद अरावली और वन क्षेत्रों में खनन की इजाजत देने की प्रक्रिया में शामिल थी और इसके लिए उसने औपचारिक रूप से केंद्र से मंजूरी माँगी थी।
वर्तमान में अशोक गहलोत और कॉन्ग्रेस पार्टी अरावली पहाड़ियों में खनन पर पूरी तरह प्रतिबंध की माँग कर रहे हैं। लेकिन इसके उलट, साल 2002 में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने हलफनामे में राजस्थान की कॉन्ग्रेस सरकार ने खनन क्षेत्र के महत्व को रेखांकित किया था।
उस समय सरकार ने कोर्ट को बताया था कि राज्य में बड़ी संख्या में लोगों की रोज़ी-रोटी खनन पर निर्भर है और अगर अरावली क्षेत्र में पूरी तरह खनन पर रोक लगा दी जाती है, तो इससे हजारों लोगों की आजीविका छिन जाएगी। यानी आज जिस मुद्दे पर कॉन्ग्रेस सख्त रुख अपना रही है, उसी पर वह पहले विपरीत और व्यावहारिक तर्क दे चुकी है।
साल 2002 में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में अशोक गहलोत की सरकार ने साफ तौर पर कहा था कि खनन क्षेत्र राज्य में बड़ी संख्या में लोगों को रोज़गार देता है। सरकार ने बताया था कि अगर पूरी अरावली पहाड़ियों में खनन पर रोक लगा दी जाती है, तो इस कठिन समय में हजारों लोग अपनी रोजी-रोटी नहीं चला पाएँगे।
हलफनामे में यह भी कहा गया था कि अरावली क्षेत्र में बड़ी संख्या में जनजातीय आबादी रहती है, जिनकी आजीविका का एक बड़ा स्रोत खनन है। खनन बंद होने से जनजातीय समुदाय सबसे ज्यादा प्रभावित होगा।
राज्य सरकार ने आगे बताया कि सभी खनन गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध से राज्य की अर्थव्यवस्था को गंभीर नुकसान पहुँचेगा, क्योंकि इन क्षेत्रों से निकलने वाले खनिज और उनसे जुड़ी आर्थिक गतिविधियाँ राजस्थान की अर्थव्यवस्था में अहम भूमिका निभाती हैं।
हलफनामे के अनुसार, अरावली क्षेत्र में 5,000 से अधिक खनन पट्टे और 641 खदान के पास लाइसेंस थे। इनसे सीधे तौर पर करीब 1.75 लाख लोगों को रोज़गार मिलता था। इसके अलावा, खनन से जुड़े कामों जैसे खनिज परिवहन, मशीनरी संचालन, खनिज प्रसंस्करण और व्यापार के जरिए 14 जिलों में लगभग 6 लाख लोगों को रोजगार मिलता था।
सरकार ने यह भी चेतावनी दी थी कि अगर अरावली में खनन बंद किया गया, तो करीब 9,700 औद्योगिक इकाइयाँ, जिनमें लगभग 884 करोड़ रुपए का निवेश है और जो 64,000 लोगों को सीधा रोजगार देती हैं, वे गंभीर रूप से प्रभावित होंगी। साथ ही, राज्य की अन्य खनिज-आधारित उद्योग इकाइयाँ, जो इन खदानों से कच्चा माल लेती हैं, उन पर भी नकारात्मक असर पड़ेगा।
संबंधित एफिडेविट से लिए गए कुछ हिस्से
आज कॉन्ग्रेस और अशोक गहलोत पर्यावरण और अरावली संरक्षण की बात कर रहे हैं, लेकिन 2002 में सत्ता में रहते हुए उनकी सरकार का रुख बिल्कुल अलग था। उस समय कॉन्ग्रेस सरकार ने अरावली क्षेत्र में मौजूद रॉक फॉस्फेट, जिंक, वोलास्टोनाइट और अन्य खनिजों के बड़े भंडार को प्राथमिकता दी थी और दलील दी थी कि खनन पर रोक लगाने से कई उद्योगों को नुकसान होगा। यानी तब कॉन्ग्रेस ने अरावली की पारिस्थितिकी नहीं, बल्कि राज्य की अर्थव्यवस्था को ज्यादा जरूरी माना।
उस दौर में अशोक गहलोत ने खनन से मिलने वाले राजस्व को प्राथमिकता दी, न कि उस पर सख्त प्रतिबंध को। आज गहलोत यह दावा कर रहे हैं कि 2002 में उनकी सरकार ने CEC द्वारा सुझाई गई 100 मीटर की परिभाषा को रोज़गार के नजरिये से अपनाया था। लेकिन यह सवाल उठता है कि जो रोज़गार का तर्क तब सही था, वह आज अचानक गलत कैसे हो गया?
हकीकत यह है कि अगर अरावली में सिर्फ 0.019% क्षेत्र, वह भी गैर-संरक्षित जोन में खनन की अनुमति दी जाती है, तो इससे बड़े पैमाने पर रोज़गार पैदा हो सकता है। लेकिन चूँकि आज कॉन्ग्रेस सत्ता में नहीं है, इसलिए वही खनन उसे गलत और खनन माफिया को अरावली सौंपने की साजिश नजर आ रहा है।
दरअसल, कॉन्ग्रेस का नजरिया इस बात पर बदलता दिखता है कि वह सत्ता में है या विपक्ष में जो कदम सत्ता में रहते हुए सही लगता है, वही विपक्ष में जाकर विनाश की साजिश बताया जाता है।
यह भी अहम है कि अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार ने अरावली की 100 मीटर परिभाषा के आधार पर सबसे ज्यादा 700 से अधिक खनन अनुमतियाँ दी थीं, जिसका वह आज विरोध कर रहे हैं।
इंडिया टुडे को दिए एक इंटरव्यू में केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने बताया कि राजस्थान में चल रही 1,008 खदानों में से करीब 700 खदानें अशोक गहलोत के कार्यकाल में शुरू हुईं। उन्होंने यह भी कहा कि कॉन्ग्रेस सरकार के समय बिना रोक-टोक खनन पट्टे दिए गए, जिस पर बाद में सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप कर रोक लगानी पड़ी।
इसके अलावा, मार्च 2024 की CEC रिपोर्ट में यह सामने आया कि अरावली क्षेत्र में अवैध खनन सालों से एक गंभीर समस्या बना हुआ है। रिपोर्ट में यह भी याद दिलाया गया कि 2010 में कोर्ट ने पाया था कि कई खनन पट्टाधारक, लीज़ खत्म होने के बाद भी खनन जारी रखे हुए थे। अरावली को लेकर कॉन्ग्रेस का रुख सिद्धांत से ज्यादा सत्ता की स्थिति पर निर्भर करता दिखाई देता है।
अशोक गहलोत के दोहरे रवैये पर सवाल उठाते हुए बीजेपी नेता अरुण चतुर्वेदी ने कहा, “मुझे हैरानी है कि 2002 में जब अशोक गहलोत खुद मुख्यमंत्री थे और उनकी सरकार सत्ता में थी, तब उन्होंने इसी मुद्दे पर अपनी सहमति दी थी। लेकिन आज वही गहलोत इस मुद्दे को फिर से उठा रहे हैं और बेवजह विवाद खड़ा कर रहे हैं।”
#WATCH | Ajmer: On court order regarding Aravalli mountain range, Rajasthan State Finance Commission Chairman Arun Chaturvedi says, "A few days ago, former Rajasthan CM Ashok Gehlot tweeted about granting permission for mining within a 100-meter radius, turning this judicial… pic.twitter.com/15AQHBnGLb
बीजेपी नेता अरुण चतुर्वेदी ने आगे कहा कि जब अरावली के लगभग 98% क्षेत्र में पहले से ही खनन पर प्रतिबंध है, तो इस मुद्दे पर अब राजनीति करने का कोई औचित्य नहीं है।
इस बीच, यह भी कहा जा रहा है कि वोट चोरी का मुद्दा, जिसे कॉन्ग्रेस खासतौर पर राहुल गाँधी, जोर-शोर से उठा रही थी, जब जनता में असर नहीं दिखा पाया, तो अब कॉन्ग्रेस ने अरावली पहाड़ियों के नाम पर एक नया डर पैदा करने वाला नैरेटिव गढ़ना शुरू कर दिया है, ताकि बीजेपी को घेरा जा सके।
इस मुद्दे पर इस बार सोनिया गाँधी खुद सामने आईं। उन्होंने 3 दिसंबर को द हिंदू अखबार में एक लेख लिखकर दावा किया कि मोदी सरकार ने अरावली पहाड़ियों के लिए मृत्युदंड पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। सोनिया गाँधी ने आरोप लगाया कि 100 मीटर से कम ऊँचाई वाली पहाड़ियाँ खनन से सुरक्षित नहीं रहेंगी, और इससे अरावली का करीब 90% हिस्सा अवैध खनन और माफिया के लिए खुल जाएगा।
सोनिया गाँधी ने अपने लेख में लिखा कि, “मोदी सरकार ने अब लगभग इन पहाड़ियों के लिए मृत्यु वारंट पर दस्तखत कर दिए हैं, जो पहले ही अवैध खनन से उजड़ चुकी हैं। सरकार ने यह घोषित कर दिया है कि 100 मीटर से कम ऊँचाई वाली पहाड़ियों पर खनन रोक के नियम लागू नहीं होंगे। यह अवैध खनन करने वालों और माफिया के लिए खुला न्योता है कि वे अरावली के उस 90% हिस्से को खत्म कर दें, जो सरकार द्वारा तय ऊँचाई सीमा से नीचे आता है।”
कॉन्ग्रेस नेता और उनसे जुड़े वैचारिक रूप से समर्थक मीडिया व सोशल मीडिया इकोसिस्टम अरावली पहाड़ियों के भविष्य को लेकर डर फैलाने वाला नैरेटिव लगातार बढ़ा रहे हैं।
इस पूरे विवाद की शुरुआत 20 नवंबर 2025 को हुई, जब सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय द्वारा दी गई अरावली की ऑपरेशनल परिभाषा को मंजूरी दी।
संशोधित परिभाषा के अनुसार, अरावली पहाड़ी वह भू-आकृति होगी जो अरावली जिलों में स्थित हो और स्थानीय भू-स्तर से 100 मीटर या उससे अधिक ऊँची हो।
वहीं, अरावली रेंज की परिभाषा यह तय की गई कि 100 मीटर या उससे अधिक ऊँचाई वाली दो या अधिक अरावली पहाड़ियाँ, जो एक-दूसरे से 500 मीटर के भीतर स्थित हों, उन्हें मिलाकर अरावली रेंज माना जाएगा।
इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह पूरे क्षेत्र की सटीक मैपिंग करे और सस्टेनेबल माइनिंग के लिए एक मैनेजमेंट प्लान (MPSM) तैयार करे।
इसके बाद लेफ्ट लिबरल इकोसिस्टम ने #SaveAravalli अभियान चलाया, मानो केंद्र सरकार कुछ ही दिनों में अरावली को खत्म कर देने वाली हो। इस पर मोदी सरकार ने साफ किया कि न तो अरावली को खनन माफिया के हवाले किया जा रहा है, न ही 90% अरावली अपनी पहचान खोने वाली है। सरकार ने यह भी खारिज किया कि मौजूदा पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों को कमजोर किया जा रहा है।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि 100 मीटर का नियम पहाड़ियों की ऊँचाई के ऊपरी 100 मीटर से नहीं, बल्कि स्थानीय भू-स्तर से ऊँचाई से जुड़ा है, जिसे लेकर भ्रम फैलाया जा रहा है।
यह भी अहम है कि राजस्थान सरकार ने खुद 2002 की समिति रिपोर्ट के आधार पर अरावली की परिभाषा तय की थी, जो रिचर्ड मर्फी की लैंडफॉर्म क्लासिफिकेशन पर आधारित थी। इसके तहत स्थानीय भू-स्तर से 100 मीटर ऊँची सभी संरचनाओं को पहाड़ी माना गया और उन पर तथा उनकी ढलानों पर खनन प्रतिबंधित किया गया। राजस्थान 9 जनवरी 2006 से इसी परिभाषा का पालन कर रहा है।
केंद्र सरकार पहले ही यह कह चुकी है कि 100 मीटर या उससे अधिक ऊँची पहाड़ियों को घेरने वाली सबसे निचली कंटूर लाइन के भीतर आने वाला पूरा क्षेत्र, उसकी ऊँचाई या ढलान चाहे जो हो, खनन पट्टे से बाहर रहेगा।
सरकार ने यह भी साफ किया कि जब तक ICFRE द्वारा MPSM को अंतिम रूप नहीं दिया जाता, तब तक कोई नया खनन पट्टा नहीं दिया जाएगा। भविष्य में भी खनन केवल उन्हीं क्षेत्रों में होगा, जहाँ वैज्ञानिक आधार पर सस्टेनेबल माइनिंग संभव होगी।
यह साफ है कि कॉन्ग्रेस अनावश्यक विवाद खड़ा करने की कोशिश कर रही है, जबकि यह परिभाषा सिर्फ प्रशासनिक (ऑपरेशनल) है और सुप्रीम कोर्ट ने नए खनन पट्टों पर रोक लगाकर पर्यावरण की सुरक्षा सुनिश्चित कर दी है। 21 दिसंबर को पर्यावरण मंत्रालय (MoEFCC) ने साफ कहा था कि संरक्षित क्षेत्र, इको-सेंसिटिव जोन, टाइगर रिजर्व, वेटलैंड और CAMPA प्लांटेशन क्षेत्रों में खनन पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा। इसके बावजूद विपक्ष के शोर को देखते हुए मंत्रालय ने 24 दिसंबर को एक और बयान जारी कर अरावली में किसी भी नए खनन पट्टे पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया।
मंत्रालय ने कहा कि यह प्रतिबंध पूरी अरावली श्रृंखला पर समान रूप से लागू होगा, जिसका उद्देश्य गुजरात से लेकर दिल्ली-NCR तक फैली अरावली की भौगोलिक अखंडता को बचाना और अवैध व अनियंत्रित खनन को रोकना है।
MoEFCC ने ICFRE को यह जिम्मेदारी भी दी कि वह पूरे अरावली क्षेत्र में ऐसे अतिरिक्त इलाके चिन्हित करे, जहाँ पर्यावरण, भू-गर्भीय संरचना और लैंडस्केप के आधार पर खनन पर पूरी तरह रोक लगनी चाहिए, भले ही वे पहले से प्रतिबंधित क्षेत्रों में न आते हों।
इतना ही नहीं, ICFRE द्वारा तैयार किया गया MPSM भी सीधे लागू नहीं किया जाएगा। उसे पहले सार्वजनिक किया जाएगा, ताकि सभी हितधारकों से सुझाव लिए जा सकें। यानी जब तक वैज्ञानिक अध्ययन, पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन, इकोलॉजिकल क्षमता, संरक्षण योग्य क्षेत्रों की पहचान और पुनर्स्थापन की स्पष्ट योजना तैयार नहीं हो जाती, तब तक कोई नया खनन पट्टा नहीं मिलेगा। इसके बाद भी सिर्फ गैर-संरक्षित क्षेत्रों में ही सीमित खनन की अनुमति दी जाएगी।
अंत में, केंद्र सरकार ने गुजरात, राजस्थान और हरियाणा की राज्य सरकारों को सख्त निर्देश दिए हैं कि जो भी वैध खनन चल रहा है, वह सुप्रीम कोर्ट के आदेश और सभी पर्यावरणीय नियमों का पूरी तरह पालन करते हुए ही किया जाए।
माइनिंग माफिया से अरावली को बचाने वाले अशोक गहलोत ने अपने रिश्तेदारों को माइनिंग के ठेके दिए
विडंबना यह है कि कॉन्ग्रेस ने अरावली खनन नीति को लेकर बीजेपी पर हमला करने के लिए अशोक गहलोत को आगे किया। हालाँकि, गहलोत खुद कई करोड़ के खनन घोटाले में संदेह के दायरे में रहे हैं।
2015 में, गहलोत और उनके एक रिश्तेदार का नाम एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) की चार्जशीट में आया था, हालाँकि उन्हें आरोपित नहीं बनाया गया। इसमें कहा गया कि IAS अधिकारी अशोक सिंहवी ने एक अन्य आरोपित को बताया कि गहलोत का रिश्तेदार एक खनन कारोबारी के लिए काम करता था ताकि राजनीतिक वर्ग से लाभ लिया जा सके। सिंहवी और तीन खनन अधिकारियों पर किकबैक गिरोह चलाने का आरोप था। ये लोग अनुबंधों को मनमाने ढंग से रद्द कर खनन रोककर मालिकों से पैसे वसूलते थे।
2013 में, गहलोत पर यह आरोप था कि उन्होंने सैंडस्टोन खनन के ठेके अपने रिश्तेदारों को दिए थे और कुल 37 खदानों में से 19 खदानें अपने रिश्तेदारों को आवंटित कीं।
2022 में, गहलोत के नेतृत्व में राजस्थान के माइन डिपार्टमेंट ने चूना पत्थर की खदानों को मार्बल ग्रेड में बदल दिया, जिससे राज्य को लगभग 1,000 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ।
इसके अलावा, 2014 में रिपोर्ट हुई कि गहलोत के रिश्तेदारों की कंपनी गोटन लाइमस्टोन खनिज उद्योग लिमिटेड (GKUPL) ने नागौर जिले के गोतन क्षेत्र में 10 वर्ग किलोमीटर खनन क्षेत्र को अल्ट्रा टेक सीमेंट को अवैध रूप से बेच दिया। गहलोत के रिश्तेदारों में राम वल्लभ चौहान, सुरेश चौहान, रमेश चौहान और राम अवतार चौहान (चौहान ब्रदर्स) शामिल थे।
ACB ने पाया कि यह खनन पट्टा नियमों का उल्लंघन था। पहले, 1997 में 2 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र जेके सीमेंट को बेचा गया था और जब इसका स्थानांतरण आवेदन खान विभाग में लंबित था, तब 2012 में गहलोत के रिश्तेदारों ने पूरा 10 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र अल्ट्रा टेक को बेच दिया। सार यह है कि अशोक गहलोत ने खुद खनन से जुड़े कई विवादों और आरोपों के बीच, अब बीजेपी पर अरावली खनन नीति को लेकर हमला करने का नेतृत्व लिया है।
अरावली पहाड़ियाँ क्यों जरूरी हैं?
लगभग 2.5 अरब साल पुराने अरावली पहाड़ गुजरात से शुरू होकर राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक फैले हुए हैं। माउंट आबू का गुरु शिखर (1,722 मीटर) इसकी सबसे ऊँची चोटी है। दिल्ली की रिज, जिसे अक्सर राजधानी की हरी दीवार या हरी फेफड़े कहा जाता है, उसे भी अरावली श्रृंखला का ही हिस्सा है।
अरावली पहाड़ियों के बिना, थार रेगिस्तान धीरे-धीरे पूर्व की ओर बढ़ सकता है, जो हरियाणा, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक फैल सकता है। यही वजह है कि अरावली को मरुस्थलीकरण के खिलाफ प्राकृतिक ढाल माना जाता है।
अरावली की पहाड़ियाँ और पहाड़ों की कतारे जीवन देने वाली हैं। ये गर्म हवाओं के प्रवाह को नियंत्रित करती हैं और भूजल स्तर बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती हैं। अरावली क्षेत्र खनिज संपदा का भंडार है, जहाँ सैंडस्टोन, लाइमस्टोन, मार्बल, ग्रेनाइट के साथ-साथ सीसा, जिंक, तांबा, सोना और टंग्स्टन जैसे खनिज पाए जाते हैं।
इसके अलावा, अरावली में अलग-अलग वनस्पति और जीव-जंतु पाए जाते हैं, जो जैव विविधता को समृद्ध बनाते हैं। यही नहीं, चंबल, साबरमती और लूणी जैसी महत्वपूर्ण नदियों का उद्गम भी अरावली क्षेत्र से होता है। इन सभी कारणों से अरावली पहाड़ियाँ पर्यावरण, जल और जीवन के लिए बेहद जरूरी मानी जाती हैं।
कॉन्ग्रेस की सुविधा की राजनीति
इसलिए यह साफ है कि अरावली के संरक्षित क्षेत्रों में अवैध खनन और गैर-वन गतिविधियों की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। लेकिन अरावली की संशोधित परिभाषा और खनन नीति को लेकर विपक्ष जिस तरह डर फैलाने की राजनीति कर रहा है, उससे यह संकेत मिलता है कि कॉन्ग्रेस के लिए अरावली न तो भावनात्मक मुद्दा है और न ही कोई वास्तविक चिंता। यह सिर्फ राजनीतिक विरोधियों पर हमला करने का एक और मौका बन गया है।
यह पहली बार नहीं है जब सत्ता से बाहर होने के बाद कॉन्ग्रेस उसी फैसले पर नाराज़गी जता रही है, जिसे वह खुद सत्ता में रहते हुए मंजूरी दे चुकी थी। खासतौर पर अशोक गहलोत इस राजनीति के माहिर खिलाड़ी रहे हैं। इसका उदाहरण न सिर्फ 2002 के हलफनामे में खनन के समर्थन से आज पूर्ण प्रतिबंध की माँग में दिखता है, बल्कि हनुमानगढ़ एथेनॉल प्लांट विवाद में भी साफ नजर आता है।
ध्यान देने वाली बात है कि हनुमानगढ़ का एथेनॉल प्लांट 2023 में अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार ने ही मंजूर किया था। लेकिन जब सत्ता बदली और बीजेपी सरकार ने उसी परियोजना का निर्माण जारी रखा, तो वही गहलोत और कॉन्ग्रेस उसके खिलाफ खड़े हो गए।
यह विवाद तब शुरू हुआ था जब कॉन्ग्रेस सरकार ने 2023 में पंजाब की कंपनी ड्यून एथेनॉल प्राइवेट लिमिटेड के एथेनॉल प्लांट प्रोजेक्ट को करीब 450 करोड़ रुपए की फंडिंग के लिए चुना। चुनाव तक सब कुछ ठीक चलता रहा, लेकिन जैसे ही कॉन्ग्रेस सत्ता से बाहर हुई, वही परियोजना, जो रोजगार पैदा करने और अर्थव्यवस्था को मजबूत करने वाली बताई जा रही थी, कॉन्ग्रेस के लिए बीजेपी की कॉरपोरेटपरस्ती की योजना बन गई। कुल मिलाकर, आलोचकों का कहना है कि कॉन्ग्रेस के विरोध नीति या पर्यावरण के आधार पर नहीं, बल्कि सत्ता में होने या न होने पर आधारित नजर आता है।
(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)
जर्मनी दौरे के वक्त भारत विरोधी तत्वों से मुलाकात करने के कारण राहुल गाँधी इस समय हर जगह से घिरे हुए हैं। ऐसे में गाँधी परिवार के वफादार व सैम पित्रौदा ने उनके बचाव में मीडिया में बयान दिया है। पित्रौदा ने कहा कि कॉन्ग्रेस को इससे फर्क ही नहीं पड़ता कि उनके नेता जहाँ जा रहे हैं वहाँ उनसे कौन लोग मिलेंगे। पित्रौदा ने यह बयान इंडिया टुडे की पत्रकार मौसमी सिंह के साथ बातचीत में दिया।
पित्रौदा से ऑन कैमरा पत्रकार ने जब पूछा कि जर्मनी में राहुल गाँधी सेंट्रल यूरोपियन यूनिवर्सिटी (CEU) में कॉर्नलिया वोल से मिले, जो संस्थान की ट्रस्टी हैं और इस यूनिवर्सिटी को जॉर्ज सोरोस की फंडिंग भी है। उस समय पित्रौदा भड़क गए। इस बातचीत को 12.00 मिनट पर देख सकते हैं। आगे मौसमी सिंह ने यह भी पूछा कि अक्सर कॉन्ग्रेस का जॉर्ज सोरोस से नाम जुड़ता है।
सवाल पूरा होने से पहले ही सैम पित्रौदा कहते हैं, “सब बकवास है। बिल्कुल बकवास है।” राहुल गाँधी के बचाव में पित्रौदा कहते हैं, “जब हम यूनिवर्सिटी जाते हैं, तो हम नहीं देखते कि कौन-किसके साथ जुड़ा हुआ है। इससे हमारा कोई मतलब नहीं है। हम यूनिवर्सिटी जाते हैं, हम एक सार्वजनिक जगह जाते हैं। अगर उनका जोर्ज सोरोस के साथ संबंध हुआ भी, तो हमे पता नहीं है। और हमे कोई फर्क भी नहीं पड़ता है।”
मौसमी सिंह फिर सीधे तौर पर पूछती हैं कि राहुल गाँधी अक्सर भारत-विरोधी लोगों से मुलाकात करते हैं, यह कितना सही है? सवाल पर सैम पित्रौदा चिढ़ जाते हैं और कहते हैं कि सब ‘झूठ’ है। वह कहते हैं, “हम ऐसा क्यों ही करेंगे, हमे इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है।” पित्रौदा यहाँ तक कहते हैं कि ऐसा कौन ही करेगा। वह फिर दोहराते हैं, “अगर हम किसी यूनिवर्सिटी जाते हैं, तो वहा बैठे दर्शक का किसी से ऐसे किसी व्यक्ति से कनेक्शन है, तो हमारा उस पर नियंत्रण नहीं है। हमें फर्क नहीं पढ़ता है।”
सैम पित्रौदा का जॉर्ज सोरोस के समर्थन में बयान
1984 में हुए सिखों के नरसंहार को भी ‘हुआ तो हुआ’ कह कर जायज ठहरा चुके सैम पित्रौदा ने जॉर्ज सोरोस और कॉन्ग्रेस कनेक्शन के आरोपों का बचाव पहली बार नहीं किया है। जॉर्ज सोरोस, जिसपर भारत-विरोधी गतिविधियों को फंड करने वाले लोगों से जुड़े होने के आरोप है, वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के खिलाफ नैरेटिव फैलाता है। इसके बावजूद कॉन्ग्रेस के सैम पित्रौदा ने पहले भी कई बार सार्वजनिक तौर पर जॉर्ज सोरोस के समर्थन में बयान दे चुके हैं।
04 जनवरी 2025 को ओवरसीज कॉन्ग्रेस के वेस्ट कोस्ट महासचिव शन्मुगवेल शंकरन द्वारा आयोजित एक वर्चुएल बैठक में सैम पित्रौदा ने कहा कि भारत में ‘सिविल सोसाइटी’ यानी सामाजिक संगठनों को काम करने की आजादी नहीं दी जा रही है। उन्होंने दावा किया कि कई मामलों में सिविल सोसाइटी को काम करने से रोका जाता है।
पित्रौदा ने कहा कि अगर अमेरिका से भारत के किसी NGO को दान भेजना हो, तो यह बहुत मुश्किल काम बन गया है। उन्होंने कहा कि उन्हें समझ नहीं आता कि यह प्रक्रिया इतनी जटिल क्यों है, लेकिन ऐसा इसलिए है क्योंकि हर कोई डरा हुआ है।
यहाँ जॉर्ज सोरोस पर हो रहे हमलों का जिक्र करते हुए पित्रौदा ने कहा कि उन्हें यह सब समझ में नहीं आता। उनके मुताबिक, सोरोस अपना काम कर रहे हैं और बाकी लोग अपना काम करें। अगर किसी को उनसे सहमति नहीं है तो यह ठीक है, लेकिन यह कहना कि वह भारत में दखल दे रहे हैं, सही नहीं है। पित्रौदा ने कहा कि भारत में इस तरह की बहस और चर्चा का माहौल बन गया है।
यहाँ सैम पित्रौदा की बातों से लगता है कि वे चाहते हैं कि भारत जॉर्ज सोरोस को भारत-विरोधी गतिविधियों की फंडिंग करने और भारत-विरोधी नैरेटिव को बेरोकटोक आगे बढ़ाने की अनुमति दे दें। साथ ही लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई मोदी सरकार के शासन को कमजोर करने की भी अनुमति दी जानी चाहिए।
जर्मनी में जाकर राहुल गाँधी का भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं पर हमला
जॉर्ज सोरोस का कॉन्ग्रेस से कनेक्शन पर सवाल एक बार फिर राहुल गाँधी की हाल ही में पाँच दिवसीय जर्मनी यात्रा के बाद उठने शुरू हुए हैं। जहाँ राहुल गाँधी भारत-विरोधी जॉर्ज सोरोस की फंडेड यूनिवर्सिटी पहुँचते हैं और उस अंतरराष्ट्रीय मंच का इस्तेमाल वह भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं पर तीखी बयानबाजी के लिए करते हैं।
बर्लिन और बाद में हर्टी स्कूल में संबोधित करते हुए राहुल गाँधी भारत में ‘निष्पक्ष’ चुनाव न होने का दावा करते हैं। वे कहते हैं कि हरियाणा विधानसभा चुनाव कांग्रेस ने जीता था और 2024 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में गड़बड़ी की गई। इन बयानों से विदेश की धरती का इस्तेमाल कर भारत को ही निशाना बनाते हैं।
हालाँकि, राहुल गाँधी के ये दावे कई बार गलत साबित हो चुके हैं। खास तौर पर ऑपइंडिया चुनाव आयोग के आधिकारिक आँकड़ों और रिकॉर्ड के आधार पर इन दावों को विस्तार से खारिज कर चुकी है। जर्मनी में वही पुराने दावे दोहराते हैं, क्योंकि वहाँ की जनता भारत की चुनावी प्रक्रिया से परिचित नहीं है।
जॉर्ज सोरोस और कॉन्ग्रेस का कनेक्शन
सैम पित्रौदा ने जॉर्ज सोरोस के साथ कॉन्ग्रेस के जिस कनेक्शन का इनकार किया है, उसकी सच्चाई जगजाहिर है। हंगरी-अमेरिकी अरबपति जॉर्ज सोरोस भारत-विरोधी नैरेटिव, खासकर मोदी सरकार के खिलाफ नैरेटिव बनाने में सक्रिय है और इस पूरे मामले में कॉन्ग्रेस के कुछ नेताओं की भूमिका भी सामने आती है। लेकिन कॉन्ग्रेस इसे मानने को तैयार ही नहीं है।
जॉर्ज सोरोस की संस्था ओपन सोसायटी फाउंडेशन (OSF) दुनिया के कई देशों में NGO, मीडिया संस्थानों और सामाजिक संगठनों को फंडिंग देती रही है। इनमें से ही भारत में भी कुछ ऐसे संगठन और मीडिया प्लेटफॉर्म्स हैं, जिन्हें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सोरोस नेटवर्क से फंडिंग मिली है। और ये भारत सरकार के खिलाफ प्रोपेगेंडा रचने में सक्रिय हैं।
हंगरी-अमेरिकी सोरोस खुद भी कई बार सार्वजनिक मंचों से भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार पर सवाल उठा चुका है। संसद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कई बीजेपी नेताओं ने भी OCCRP की रिपोर्ट के हवाले से बताया कि इनमें भारत के उद्योगपतियों के खिलाफ नैगेटिव नैरेटिव होते हैं।
BJP का आरोप है कि कॉन्ग्रेस, खास तौर पर राहुल गाँधी इन OCCRP रिपोर्टों का राजनीतिक फायदा उठाते हैं और उन रिपोर्टों को आधार बना कर सरकार को बदनाम करते हैं। इसका उदाहरण उन्होंने अडानी समूह और कोविड-19 जैसे मुद्दों पर उठाई गई रिपोर्टों को बताया।
संसद हंगामे के दौरान BJP ने यह भी कहा कि OCCRP की रिपोर्टों का समय-समय पर संसद सत्र के साथ तालमेल है, जिससे लगता है कि जैसे विदेशी प्रभाव और कॉन्ग्रेस मिलकर सरकार के कामकाज को रोकने की कोशिश कर रहे हैं। विपक्ष पर यह आरोप लगाया गया कि राहुल गाँधी और OCCRP के बयानों में एक ‘त्रिकोणीय गठजोड़’ (Triangle Nexus)- सोरोस, OCCRP और कॉन्ग्रेस। इसका लक्ष्य भारत की राजनीति और अर्थव्यवस्था को प्रभावित करना है।
क्रिसमस पर अमेरिका ने नाइजीरिया में आतंकवादियों के ठिकानों को निशाना बनाते हुए घातक एयर स्ट्राइक की। अमेरिकी सेना का दावा है कि इस स्ट्राइक में कई ISIS आतंकवादी मारे गए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के मुताबिक, यह स्ट्राइक नाइजीरिया के आग्रह पर की गई है, जहाँ लगातार ईसाइयों को निशाना बनाया जा रहा था। इससे पहले डोनाल्ड ट्रंप ने नाइजीरिया में ईसाइयों की लगातार हत्या को लेकर नाइजीरिया को चेतावनी दी थी।
नाइजीरिया के विदेश मंत्रालय ने शुक्रवार (26 दिसंबर 2025) को कहा कि अमेरिका के सटीक हमलों में देश के उत्तर-पश्चिम में ‘आतंकवादी ठिकानों’ को निशाना बनाया है। साथ ही कहा कि नाइजीरिया वॉशिंगटन के साथ संरचित सुरक्षा सहयोग में लगा हुआ है। अमेरिकी सेना के अफ्रीका कमांड ने भी बताया कि यह हमला नाइजीरियाई अधिकारियों के अनुरोध पर किया गया था और इसमें कई ISIS आतंकवादी मारे गए हैं।
एयर स्ट्राइक पर डोनाल्ड ट्रंप का बयान
स्ट्राइक की जानकारी देते हुए डोनाल्ड ट्रंप ने एक्स पर कहा, “आज रात कमांडर इन चीफ के रूप में मेरे निर्देश पर अमेरिका ने उत्तर-पश्चिम नाइजरिया में ISIS के आतंकवादी कचरे पर एक शक्तिशाली और घातक हमला किया, जो मुख्य रूप से निर्दोष ईसाइयों को निशाना बना रहे थे और उनकी क्रूरता से हत्या कर रहे थे, जो कई वर्षों और सदियों में नहीं देखी गई थी।”
— Commentary Donald J. Trump Posts From Truth Social (@TrumpDailyPosts) December 25, 2025
डोनाल्ड ट्रंप ने आगे कहा, “मैंने पहले भी इन आतंकवादियों को चेतावनी दी थी कि अगर उन्होंने ईसाइयों का नरसंहार नहीं रोका तो उन्हें इसका भारी खामियाजा भुगतना पड़ेगा और आज रात वही हुआ।” आतंकवाद पर सख्त नीति को लेकर उन्होंने कहा, “अमेरिकी सेना ने कई सटीक हमले किए, जैसा कि केवल अमेरिका की कर सकता है। मेरे नेतृत्व में हमारा देश कट्टरपंथी इस्लामी आतंकवाद को पनपने नहीं देगा।”
अंत में डोनाल्ड ट्रंप ने कहा, “सभी को क्रिसमस की हार्दिक शुभकामनाएँ, जिनमें मारे गए आतंकवादी भी शामिल हैं, जिनकी संख्या और भी अधिक होगी अगर वे ईसाइयों का नरसंहार जारी रखते हैं।”
डोनाल्ड ट्रंप की नाइजीरिया को चेतावनी
नाइजीरिया में ईसाइयों के नरसंहार पर डोनाल्ड ट्रंप पहले भी आतंकवादियों को चेतावनी दे चुके हैं। दो महीने पहले ही अक्टूबर 2025 में अमेरिकी राष्ट्रपति ने नाइजीरियन सरकार पर ईसाइयों के खिलाफ हो रहे सामूहिक नरसंहार को नहीं रोक पाने का आरोप लगाते हुए सैन्य संघर्ष के संकेत दिए थे।
उन्होंने साफ शब्दों में कहा था, “अगर नाइजीरियाई सरकार ईसाइयों की हत्या की इजाजत देती रही, तो अमेरिका नाइजीरिया को दी जाने वाली सभी तरह की मदद तुरंत बंद कर देगा, और हो सकता है कि उस बदनाम देश में ‘गोलियाँ बरसाकर’ उन इस्लामी आतंकवादियों का सफाया कर दे, जो ये भयानक अत्याचार कर रहे हैं।”
US President Donald Trump posts, "If the Nigerian Government continues to allow the killing of Christians, the U.S.A. will immediately stop all aid and assistance to Nigeria, and may very well go into that now disgraced country, 'guns-a-blazing,' to completely wipe out the… pic.twitter.com/7mn9vG7aM3
डोनाल्ड ट्रंप ने यह भी कहा था कि अगर नाइजीरियन सरकार इन आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करती है, तो अमेरिका घातक हमले के लिए तैयार है। उन्होंने कहा, “मैं अपने युद्ध विभाग को संभावित कार्रवाई के लिए तैयार रहने का निर्देश दे रहा हूँ। अगर हम हमला करेंगे, तो वह तेज, क्रूर और तीखा होगा, ठीक वैसे ही जैसे आतंकवादी गुंडे हमारे प्यारे ईसाइयों पर हमला करते हैं।”
नाइजीरिया में ईसाइयों का नरसंहार
डोनाल्ड ट्रंप नाइजीरिया में ईसाइयों के नरसंहार की जो बात कर रहे हैं, उसकी असलियत जानते हैं। नाइजीरिया में बोको हराम और फुलानी चरवाहों जैसे इस्लामी कट्टरपंथी संगठन सक्रिय हैं, जो लगातार ईसाइयों के गाँवों और चर्च को निशाना बना रहे हैं। ईसाइयों और इस्लामी कट्टरपंथियों के बीच यह टकराव साल 1950 के दशक से चला आ रहा है।
साल 2025 की बात करें तो 14 अक्टूबर को नाइजीरिया के प्लेटू राज्य के रचास और रावुरु गाँव में फुलानी मिलिटेंट्स ने हमला कर 13 लोगों को मौत के घाट उतार दिया।
23 सितंबर 2025 को बोको हराम ने अदमवा राज्य के वाग्गा मोंगारो गाँव में 4 ईसाइयों की हत्या कर दी, घरों और चर्च को नेस्तनाबूद कर दिया। इस हमले में कई लोग घायल भी हुए। वहीं 5 सितंबर को इसी संगठन ने बोर्नो राज्य के दरुल जमाल गाँव में हमला कर 63 लोगों को मार डाला।
13-14 जून की रात बेन्युए राज्य के इएलेवाटा गाँव में फुलानी चरवाहों ने 100 से ज्यादा ईसाइयों की हत्या कर दी और उनके घरों में आग लगा दी। इससे पहले 24 मई को फुलानी चरवाहों ने ही ताराबा राज्य के करिम लामिदो पर हमला कर 42 ईसाइयों की हत्या कर दी और 60 से ज्यादा घर जला दिए।
गाँव के आसपास के करीब 5000 लोग अपना घर-बार छोड़ कर विस्थापित होने के लिए मजबूर हुए हैं। अमेरिका स्थित काउंसिल ऑफ फॉरेन रिलेशन की रिपोर्ट के मुताबिक, 2011 से अब तक अलग-अलग वजहों से 60000 लोगों की मौत हो चुकी है।
बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, 2009 से बोको हराम ने 40000 से ज्यादा ईसाइयों की यहाँ हत्या कर दी। हजारों बच्चे मारे गए हैं और करोड़ों लोग विस्थापित हुए हैं। 2011 से अभी तक बोको हराम और इस्लामिक स्टेट इन वेस्ट अफ्रीका प्रोविंस ने 37500 से अधिक लोगों की हत्या कर दी।
अल-कायदा का कनेक्शन और इस्लामी कट्टरपंथ पर पकड़
ईसाइयों को निशाना बना रहा ये इस्लामी संगठन बोको हराम का अल-कायदा और उत्तरी अफ्रीका के कई आतंकी संगठन के साथ कनेक्शन है। नाइजीरिया में इसने राजनीतिक रूप से पैर पहले ही जमा लिए हैं। यहीं वजह है कि ईसाइयों की हत्या करने वाले इस संगठन के समर्थक नाईजीरिया में ऊँचे पदों पर हैं।
करीब 22 करोड़ की आबादी वाले इस देश में करीब करीब आधी-आधी आबादी मुस्लिम और ईसाइयों की है। जनमत सर्वेक्षणों से पता चलता है कि नाइजीरियाई आबादी का बड़ा हिस्सा इस्लामी कट्टरपंथ का समर्थक है । प्यू ग्लोबल एटीट्यूड्स प्रोजेक्ट द्वारा 2009 में किए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक नाइजीरिया में 43 फीसदी मुसलमान आत्मघाती बम विस्फोट को सही मानते हैं। सर्वेक्षण में शामिल आधे से ज्यादा मुसलमानों ने आतंकी ओसामा बिन लादेन पर ‘विश्वास’ था।
इस्लामी कट्टरपंथियों ने नाइजीरिया में दो रास्ते अपनाए हैं- पहला, बोको हराम जैसे कट्टरपंथियों द्वारा चलाया गया मार काट का रास्ता। इसका मकसद गैर इस्लामी जनसंख्या को कम करना है। दूसरा, कानूनी और संवैधानिक रास्ता यानी शरिया कानून लागू करने की कोशिश करना। ऐसा उत्तरी राज्यों में हो रहा है।
1999 और 2002 के बीच, 12 उत्तरी नाइजीरियाई राज्यों में शरिया कानून लागू किया गया था। इसका असर इन राज्यों में दिखता है। नाइजीरिया की सरकार भले ही इससे इनकार करे, लेकिन इस्लामिक कट्टरवाद नाइजीरिया की हकीकत बन गई है और गैरमुस्लिमों के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है।
नाइजीरिया में मस्जिद में फटा बम
डोनाल्ड ट्रंप की क्रिसमस पर एयर स्ट्राइक से एक दिन पहले ही नाइजीरिया में मस्जिद में विस्फोटक बम फटने की खबर सामने आई थी। नाइजीरिया के उत्तर-पूर्वी शहर मैदुगुरी में बुधवार (24 दिसंबर 2025) की शाम नमाज के दौरान एक मस्जिद में हुए जोरदार विस्फोट में कम से कम 7 लोगों की मौत, जबकि 35 से ज्यादा लोग घायल हुए।
हमले के बाद सामने आए वीडियो में खून से लथपथ लोग और चादरों से ढके शव देखे गए हैं। हालाँकि, हमले की किसी भी संगठन ने जिम्मेदारी नहीं ली। पुलिस की शुरुआती जाँच में इसे आत्मघाती बम हमला बताया गया, क्योंकि मौके पर आत्मघाती जैकेट के टुकड़े मिले।
उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले में रविवार (21 दिसंबर 2025) को पुलिस ने एक बड़े धर्मांतरण रैकेट का खुलासा किया। यह मामला रोजा थाना क्षेत्र की कैलाशनगर कॉलोनी का है, जहाँ एक मकान में ईसाईयत में धर्मांतरण कराने के लिए गुप्त रूप से सभा आयोजित की जा रही थी। पुलिस ने इस मामले में एक महिला समेत चार लोगों को गिरफ्तार किया है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस मकान में करीब 200 लोग इकट्ठा हुए थे, जिन्हें पैसों और शादी का लालच देकर बुलाया गया था। विश्व हिंदू परिषद (VHP) के कार्यकर्ताओं की शिकायत के बाद पुलिस ने मौके पर छापा मारा। छापेमारी के दौरान वहाँ चंगाई सभा के नाम पर प्रार्थना सभा चल रही थी, जिसका उद्देश्य हिंदू धर्म के लोगों को ईसाई बनाना था।
इस पूरे मामले से जुड़ी FIR की एक कॉपी ऑपइंडिया के पास मौजूद है, जिसमें धर्मांतरण से जुड़े गंभीर आरोप दर्ज किए गए हैं। पुलिस अब इस नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों और इसके पीछे की पूरी साजिश की जाँच में जुटी हुई है।
FIR में क्या लिखा है?
इस मामले में विश्व हिंदू परिषद (VHP) के पदाधिकारी अशनील सिंह की शिकायत पर FIR दर्ज की गई है। पुलिस ने यह FIR भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 131, 197, 352 और 351(3) के तहत दर्ज की है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म परिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3 और 5(1) भी लगाई गई हैं।
इस FIR में एंजेल, विवेक, विपिन, मोनू और रमादेवी को आरोपी बनाया गया है। आरोप है कि ये सभी मिलकर अवैध तरीके से धर्म परिवर्तन कराने की गतिविधियों में शामिल थे। पुलिस मामले की जाँच कर रही है और आगे की कानूनी कार्रवाई की जा रही है।
स्रोत: यूपी पुलिस
अपनी शिकायत में अशनील सिंह ने बताया कि रविवार दोपहर करीब 1 बजे वह मोहम्मदी रोड से गुजर रहे थे। इसी दौरान उन्होंने रोजा थाना क्षेत्र की कैलाशनगर कॉलोनी में रमादेवी के घर पर भारी भीड़ देखी। शक होने पर जब वह वहाँ पहुँचे, तो पाया कि रमादेवी के मकान में ईसाई प्रार्थना सभा चल रही थी।
शिकायत के अनुसार, वहाँ मौजूद लोग हिंदू धर्म के खिलाफ आपत्तिजनक बातें कर रहे थे और हिंदू देवी-देवताओं के बारे में अपमानजनक और अभद्र भाषा का इस्तेमाल कर रहे थे। अशनील सिंह ने इसे धार्मिक भावनाएँ ठेस पहुँचाने वाला मामला बताया और इसकी शिकायत पुलिस से की।
स्रोत: यूपी पुलिस
शिकायत में आगे बताया गया है कि जब अशनील सिंह ने इस गतिविधि का विरोध किया, तो एंजेल, विवेक, विपिन, मोनू और रमादेवी उन पर गाली-गलौज करने लगे और आक्रामक हो गए। आरोप है कि इन लोगों ने अशनील सिंह के साथ मारपीट करने की कोशिश की और उन्हें जान से मारने की धमकी भी दी।
किसी तरह अशनील सिंह वहाँ से जान बचाकर निकलने में सफल रहे और उन्होंने तुरंत पुलिस को इसकी सूचना दी। पुलिस के मौके पर पहुँचते ही वहाँ मौजूद करीब 150 महिलाएँ वहाँ से भाग गईं। अशनील सिंह ने इस पूरी सभा का एक वीडियो भी पुलिस को सबूत के तौर पर सौंपा है।
स्रोत: यूपी पुलिस
जब अशनील सिंह ने सभा में मौजूद लोगों से सवाल किया, तो उन्होंने बताया कि उन्हें धर्म बदलने पर मोटी रकम देने और शादी कराने में मदद का लालच दिया गया था।
मीडिया से बातचीत में पुलिस ने बताया कि रमादेवी के घर में एक मंच बना हुआ था, जिस पर क्रॉस और ईसाईयत से जुड़ी अन्य सामग्री रखी हुई थी। इस मामले में अब तक चार लोगों को गिरफ्तार किया गया है, जबकि मुख्य आरोपित रमादेवी मौके से फरार हो गई। पुलिस उसकी तलाश में लगातार दबिश दे रही है।
पुलिस इस पूरे मामले में कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) की जाँच कर रही है और फंडिंग के स्रोतों की भी पड़ताल की जा रही है। इसमें विदेशी फंडिंग की आशंका भी जताई गई है। पुलिस अधिकारियों ने बताया कि इससे पहले जुलाई महीने में भी शाहजहांपुर में इसी तरह का एक नेटवर्क पकड़ा गया था, जिसमें कई लोगों की गिरफ्तारी हुई थी।
उस मामले में करीब 4 करोड़ रुपए की फंडिंग सामने आई थी, जिसमें विदेश से आने वाला पैसा भी शामिल था। पुलिस के अनुसार, उस केस में मुख्य आरोपित को रोजाना लगभग 48 हजार रुपए (अमेरिकी डॉलर में) की विदेशी फंडिंग मिल रही थी।
शाहजहांपुर में 5 FIR, 4 करोड़ की विदेशी फंडिंग, तमिलनाडु से जुड़े ईसाई धर्मांतरण रैकेट का भंडाफोड़
शाहजहांपुर के सिंधौली क्षेत्र में 13 जुलाई को इसी तरह का एक और मामला सामने आया था। संदिग्ध गतिविधियों की सूचना मिलने पर हिंदू युवा वाहिनी के कार्यकर्ताओं ने एक गुरुद्वारे के पास एक मकान पर छापा मारा। वहाँ पहुँचने पर पता चला कि उस जगह पर धर्म परिवर्तन कराने की गतिविधियाँ चल रही थीं।
हिंदू युवा वाहिनी के कार्यकर्ताओं के पहुँचते ही कई लोग मौके से फरार हो गए, लेकिन छह लोगों को पकड़ लिया गया, जिन्हें बाद में पुलिस के हवाले कर दिया गया। इस मामले की पुष्टि करते हुए तत्कालीन पुलिस अधीक्षक (SP) राजेश द्विवेदी ने बताया कि हिरासत में लिए गए लोगों से पूछताछ की गई और उनके बैंक खातों की जाँच की गई, ताकि पैसों के लेन-देन और संभावित विदेशी फंडिंग का पता लगाया जा सके।
पुलिस की शुरुआती जाँच में सामने आया कि लोगों को धार्मिक आधार पर संगठित किया जा रहा था और लालच देकर धर्म परिवर्तन के लिए प्रेरित किया जा रहा था। इसके बाद मामले की गहराई से जाँच शुरू की गई।
13 जुलाई का यह मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। इसके बाद जुड़े मामलों में अगले कुछ दिनों के भीतर कम से कम पाँच FIR दर्ज की गईं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस पूरे रैकेट के मुख्य आरोपित को करीब 4 करोड़ रुपए की फंडिंग मिली थी और यह धर्मांतरण नेटवर्क तमिलनाडु से चलाया जा रहा था।
ऑपइंडिया ने इस मामले से जुड़ी तीन FIR और कोर्ट के दस्तावेज हासिल किए थे और उस समय हिंदू युवा वाहिनी के जिला संयोजक ठाकुर राघवेंद्र सिंह से बातचीत भी की थी।
केस कैसे सामने आया – FIRs की पड़ताल
इस पूरे मामले की शुरुआत 13 जुलाई 2025 को सिंधौली थाना क्षेत्र में दर्ज पहली FIR से हुई थी। यह FIR राघवेंद्र सिंह की शिकायत पर दर्ज की गई थी। पुलिस ने उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म परिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3 और 5(1) के तहत मामला दर्ज किया।
अपनी शिकायत में राघवेंद्र सिंह ने बताया कि उन्हें सूचना मिली थी कि सिंधौली गुरुद्वारे के सामने, पूर्व दिशा की ओर स्थित एक मकान में ईसाई मिशनरियों द्वारा धर्म परिवर्तन की गतिविधियाँ चलाई जा रही हैं। शिकायत के आधार पर पुलिस ने मामले की जाँच शुरू की, जिसके बाद पूरे धर्मांतरण नेटवर्क का खुलासा होना शुरू हुआ।
स्रोत: यूपी पुलिस
मिली सूचना के आधार पर राघवेंद्र सिंह तुरंत हिंदू युवा वाहिनी के कार्यकर्ताओं के साथ मौके पर पहुँचे और इसकी जानकारी पुलिस को दी। सूचना मिलते ही पुलिस भी मौके पर पहुँची और उस मकान के अंदर से धर्म परिवर्तन कराने या उसमें सहयोग करने वाले कई लोगों को पकड़ लिया।
इस मामले में दर्ज FIR में प्रह्लाद सिंह, मुकेश बाल्मीकि, गुरदास बाल्मीकि, अंशनीत कुमार राठौर, किरण, अंशी देवी, सना, बिमला देवी, आरती, राजवती सहित अन्य लोगों को आरोपी बनाया गया है। पुलिस सभी आरोपियों की भूमिका की जाँच कर रही है और आगे की कानूनी कार्रवाई की जा रही है।
स्रोत: यूपी पुलिस
राघवेंद्र सिंह ने बताया कि आरोपित अंशनीत के पास से बरामद बैग में एक बाइबिल, ईसाईयत से जुड़ी अन्य सामग्री, आधार कार्ड और कुछ फोटो मिले थे। मौके से कई अन्य सहयोगी आरोपित भागने में सफल हो गए।
हालाँकि इस FIR में पद्मनमन का नाम सीधे तौर पर आरोपी के रूप में दर्ज नहीं है, लेकिन वह आरोपित किरण का पति और अंशी देवी का पिता है। पुलिस ने पद्मनमन को गिरफ्तार किया, क्योंकि जाँच में सामने आया कि वह तमिलनाडु स्थित ईसाई मिशनरी संगठनों से फंडिंग प्राप्त कर रहा था।
FIR दर्ज होने के बाद इस मामले में जमानत से जुड़ा एक आदेश भी सामने आया है, जिसमें पद्मनमन की भूमिका और धर्मांतरण से जुड़ी फंडिंग का पूरा विवरण विस्तार से बताया गया है।
स्रोत: यूपी पुलिस
दूसरी FIR
इस क्रम की दूसरी FIR 27 जुलाई को खुटार थाना क्षेत्र में दर्ज की गई। यह FIR हिंदू युवा वाहिनी के सदस्य अवनीश मिश्रा की शिकायत पर दर्ज हुई थी। पुलिस ने यह मामला भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 352 और 351(3) के साथ-साथ उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म परिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3 और 5(1) के तहत दर्ज किया। इस FIR में हरिश्चंद्र जाटव और उसके बेटे शैलेश को आरोपित बनाया गया है।
स्रोत: यूपी पुलिस
अपनी शिकायत में अवनीश मिश्रा ने बताया कि उन्हें सूचना मिली थी कि कुंबिया माफी गाँव के एक मकान में धर्म परिवर्तन की गतिविधियाँ चल रही हैं। जानकारी के अनुसार, वहाँ हिंदू महिलाओं और पुरुषों को पैसों का लालच देकर ईसाईयत अपनाने के लिए उकसाया जा रहा था।
सूचना मिलते ही अवनीश मिश्रा अपने संगठन के अन्य सदस्यों के साथ मौके पर पहुँचे। वहाँ उन्होंने देखा कि हरिश्चंद्र अपने घर पर प्रार्थना सभा आयोजित कर रहा था। इस सभा में करीब 30 से 40 हिंदू महिलाएँ और पुरुष मौजूद थे। आरोप है कि इन लोगों को हिंदू धर्म छोड़कर ईसाईयत अपनाने के लिए प्रेरित किया जा रहा था।
स्रोत: यूपी पुलिस
जब अवनीश और उनके साथियों ने इसका विरोध किया, तो आरोपी उन्हें गाली देने लगे और जान से मारने की धमकी दी। अवनीश ने बताया कि आरोपी खुद कह रहे थे कि उन्हें धर्मांतरण कराने के लिए विदेशी फंडिंग मिल रही है और उन्होंने पहले ही कई सैकड़ों हिंदू लोगों को धर्मांतरित कर दिया है। स्थानीय निवासी ने भी अवनीश को बताया कि उसे ईसाईयत अपनाने के लिए 50,000 रुपये की पेशकश की गई थी।
स्रोत: यूपी पुलिस
छापेमारी के दौरान पुलिस ने मौके से बाइबिल, ईसाई प्रार्थना सामग्री और ईसाईयत से जुड़ी अन्य किताबें और साहित्य बरामद किया। मामले की जाँच शुरू कर दी गई है, जिसमें आरोपित से जुड़े संभावित बाहरी या विदेशी फंडिंग की भी छानबीन की जा रही है।
तीसरी FIR
इस मामले की तीसरी FIR भी 27 जुलाई को दर्ज की गई। यह FIR राघवेंद्र सिंह की शिकायत पर दर्ज की गई थी। पुलिस ने यह FIR भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 131 और 351(3) और उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म परिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3 और 5(1) के तहत दर्ज की। इस FIR में हेमराज पासी, ओम पाल, लौंगश्री, लाडली और 20 से 25 अज्ञात व्यक्तियों को आरोपित बनाया गया है।
स्रोत: यूपी पुलिस
राघवेंद्र सिंह के अनुसार, उन्हें चेना रुरिया क्षेत्र में धर्म परिवर्तन की गतिविधियों के बारे में सूचना मिली थी। सूचना मिलने के बाद वह अपने संगठन के अन्य सदस्यों के साथ मौके पर पहुँचे। वहाँ उन्होंने देखा कि हेमराज, ओम पाल, लौंगश्री, लाडली और अन्य लोग हिंदू लोगों को लालच और दबाव देकर ईसाईयत में परिवर्तित कर रहे थे।
स्रोत: यूपी पुलिस
जब राघवेंद्र और उनके साथियों ने इसका विरोध किया, तो आरोपित लकड़ी से हमला करने लगे और हिंदू युवा वाहिनी के कई सदस्यों को घायल कर दिया। आरोपित यह भी दावा कर रहे थे कि उन्हें 2 लाख से 3 लाख रुपए मिल रहे हैं और भविष्य में और अधिक कमाने का वादा किया गया है।
उन्होंने उन ग्रामीणों को धमकी दी जो हिंदू युवा वाहिनी के सदस्यों के साथ थे, कि उन्हें झूठे मुकदमों में फंसाया जाएगा। आरोपित खुलेआम कह रहे थे कि उनका पुलिस के साथ सेटिंग है और कोई उन्हें कुछ नहीं कर सकता। इन सभी आरोपों के आधार पर पुलिस ने FIR दर्ज की और नामजद और अज्ञात सभी आरोपित के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी।
स्रोत: यूपी पुलिस
राघवेंद्र ने ऑपइंडिया को क्या बताया
ऑपइंडिया से बातचीत में राघवेंद्र सिंह ने बताया कि सिंधौली में हो रहे धर्मांतरण के मामले हाल ही के नहीं हैं, बल्कि यह लंबे समय से संगठित तरीके से चल रहे हैं। उन्होंने कहा, “यह कोई अचानक शुरू हुआ मामला नहीं है। यह लगभग एक साल से चल रहा है और कुछ मामलों में तो चार से छह साल से भी अधिक समय से चल रहा है।”
राघवेंद्र के अनुसार, शुरुआत में आरोपित किराए के स्थानों पर बैठकें आयोजित करते थे। लेकिन बाद में उन्होंने जमीन खरीदकर खास तौर पर इस उद्देश्य के लिए मकान बना लिया। उन्होंने कहा, “लोगों को बताया जाता था कि यह एक सत्संग है। गरीब और कम पढ़े-लिखे मजदूर परिवारों, खासकर महिलाओं को जानबूझकर चुना जाता था क्योंकि उन पर आसानी से असर किया जा सकता था।”
उन्होंने आगे बताया कि इन बैठकों में महिलाओं को जुटाने के लिए उन्हें पैसे का लालच दिया जाता था। राघवेंद्र ने कहा, “महिलाओं को बैठकों में आने के लिए 500 रुपए दिए जाते थे और जो अन्य महिलाओं को लाती थीं उन्हें भी 500 रुपए मिलते थे।” इसके अलावा, इन बैठकों में महिलाओं से कहा जाता था कि यीशु मसीह की पूजा करने से उन्हें संतान की प्रापति होगी। उन्होंने बताया, “जब बच्चा पैदा होता था, तो इसे उस विश्वास का प्रमाण बताया जाता था।”
‘एंटरटेनमेंट क्लासेस’ का चौंकाने वाला आरोप
राघवेंद्र सिंह ने इस क्षेत्र में धर्मांतरण नेटवर्क के बारे में एक चौंकाने वाला खुलासा भी किया। उन्होंने बताया कि युवाओं को मनोरंजन क्लास या एंटरटेनमेंट क्लास में बुलाया जाता था, जहाँ उन्हें डांस और इसी तरह की गतिविधियों में भाग लेने के लिए कहा जाता था, ताकि धीरे-धीरे उनका मानसिक दृष्टिकोण बदल सके। उन्होंने कहा, “जो जानकारी हमें शुरू में मिली थी, वह इन एंटरटेनमेंट क्लास के बारे में थी।” ये क्लासें धर्मांतरण प्रक्रिया का हिस्सा थीं।
राघवेंद्र ने बताया कि ये सत्र प्रार्थना सभाओं से अलग आयोजित किए जाते थे और केवल युवा प्रतिभागियों के लिए होते थे। लड़कों और लड़कियों को नृत्य करने के लिए कहा जाता था और उन्हें यह बताया जाता था कि वे कपड़े या शिष्टाचार की चिंता किए बिना स्वतंत्र रूप से डांस करें।
उनके अनुसार, प्रतिभागियों को अपनी रोक-टोक छोड़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था, जिससे भावनात्मक और नैतिक रूप से वे कमजोर हो जाते थे। राघवेंद्र ने कहा, “एक बार जब वह अवस्था पहुँच जाती थी, तो उन्हें बताया जाता था कि वे जो चाहें वह करें। यह पूरी तरह गलत और अस्वीकार्य था।”
उन्होंने बताया कि इन गतिविधियों का उद्देश्य धीरे-धीरे उपस्थित लोगों को प्रभावित करना और उन्हें नियंत्रित करना था। हालाँकि, जब पुलिस ने उस स्थान पर छापा मारा, तो इस तरह की गतिविधियाँ उस समय नहीं चल रही थीं और न ही इनका जिक्र FIR या कोर्ट के दस्तावेजों में था। ऑपइंडिया यह स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं कर पाया कि इन गतिविधियों का आयोजन उन लोगों की गिरफ्तारी से पहले हो रहा था या नहीं।
करोड़ों की फंडिंग का खुलासा
राघवेंद्र सिंह ने आगे बताया कि गिरफ्तार व्यक्तियों के बैंक खातों की जाँच में लगभग 4.25 करोड़ रुपए के लेन-देन का पता चला। उन्होंने कहा, “जैसे-जैसे हम गहराई में गए, यह सामने आया कि ऐसे गतिविधियाँ जिले के लगभग 200 स्थानों पर हो रही थीं।” उन्होंने यह भी बताया कि मामला फिलहाल अदालत में विचाराधीन है, लेकिन “ऐसी गतिविधियों की जानकारी समय-समय पर लगातार सामने आती रहती है।”
राघवेंद्र ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की भी प्रशंसा की और कहा कि उन्होंने अवैध धर्मांतरण के खिलाफ प्रशासनिक और राजनीतिक रूप से मजबूत रुख अपनाया है। उन्होंने कहा, “यह केवल महाराज योगी आदित्यनाथ जी की वजह से संभव हुआ। उनका स्पष्ट रुख जमीनी स्तर पर कार्रवाई को मजबूत बनाता है।” उन्होंने यह भी कहा कि पहले ऐसे मामलों को नजरअंदाज किया जाता था, लेकिन अब जाँच एजेंसियाँ इन्हें गंभीरता से ले रही हैं।
हाल ही की न्यायिक टिप्पणियों का जिक्र करते हुए राघवेंद्र ने बताया कि उच्च न्यायालय ने राज्य में धर्मांतरण के मुद्दे पर भी कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने कहा, “हाई कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि यदि कोई धर्मांतरण करता है, तो उसे आरक्षण या सरकारी सुविधाओं का हक नहीं होना चाहिए। उन्हें कोई सुविधा नहीं दी जानी चाहिए।”
राघवेंद्र के अनुसार, इन घटनाओं और न्यायिक रुख की वजह से लोग आगे आकर जानकारी देने और ऐसी गतिविधियों का विरोध करने के लिए प्रेरित हुए हैं। उन्होंने कहा, “संदेश अब स्पष्ट है। सनातन धर्म की रक्षा प्राथमिकता है और जहाँ भी उल्लंघन पाया जाएगा, कार्रवाई की जाएगी।”
कोर्ट ने पद्मनाभन उर्फ पादरी जोशुआ को जमानत देने से इनकार कर दिया
ऑपइंडिया को एक जमानत आदेश भी मिला, जिसमें शाहजहांपुर जिला और सत्र न्यायालय ने पद्मनमन उर्फ पास्टर जोशुआ को जमानत देने से इनकार किया। यह जमानत 11 अगस्त 2025 को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश आशिष वर्मा, शाहजहांपुर की कोर्ट ने खारिज की।
कोर्ट ने नोट किया कि जमानत अर्जी पद्मनमन उर्फ पद्मनवन उर्फ पास्टर जोशुआ और उनकी पत्नी किरण जोशुआ ने दाखिल की थी, जो इस मामले में जिला जेल में बंद हैं। आदेश में दर्ज अभियोजन मामले के अनुसार, यह मामला सीधे 13 जुलाई 2025 को हिंदू युवा वाहिनी जिला अध्यक्ष राघवेंद्र सिंह की शिकायत पर दर्ज पहली FIR से शुरु हुआ है।
FIR में बताया गया था कि सिंधौली गुरुद्वारे के सामने स्थित एक मकान में ईसाई मिशनरियों द्वारा पैसों का लालच देकर धर्मांतरण कराया जा रहा था। इसके बाद पद्मनमन, उनकी पत्नी किरण और कई अन्य लोगों को मौके से गिरफ्तार किया गया था।
जमानत आदेश में दर्ज है कि छापेमारी के दौरान पद्मनमन और उनकी पत्नी किरण के पास से एक बैग बरामद हुआ, जिसमें बाइबिल, अन्य ईसाईयत से जुड़ी सामग्री, आधार कार्ड और कुछ फोटो थे।
कोर्ट ने केस डायरी पर भी भरोसा किया, जिसमें बताया गया कि तमिलनाडु निवासी पद्मनमन ने धर्मांतरण से जुड़ी गतिविधियों के लिए काफी फंडिंग प्राप्त की थी। बैंक रिकॉर्ड से पता चला कि पद्मनमन के बैंक ऑफ बड़ौदा खाते में कुल ₹25,75,642.99 जमा हुए, जो जीजस रिडीम्स मिशनरी, मिशनरी यूपी होल्डर ट्रस्ट और द पॉकेट टेस्टामेंट लीग जैसी संस्थाओं से आए। आदेश में कई हाई-वैल्यू लेन-देन का भी जिक्र है, जिसमें मुंबई स्थित डिजिटल खातों से UPI ट्रांसफर भी शामिल हैं।
स्रोत: शाहजहांपुर जिला न्यायालय
इसके अलावा, कोर्ट ने यह भी नोट किया कि पद्मनमन की पत्नी किरण जोशुआ के बैंक खाते में भी इन मिशनरी संस्थाओं से ₹4,76,029 जमा हुए थे। आदेश में यह भी दर्ज है कि किरण मूल रूप से एक हिंदू महिला थीं और पद्मनमन से संपर्क में आने के बाद उन्होंने ईसाईयत अपनाया। यह तथ्य केस डायरी और सहायक दस्तावेजों में भी दर्ज है।
आदेश में उद्धृत स्वतंत्र गवाहों के बयानों के अनुसार, पद्मनमन, किरण और अन्य आरोपित अंशनीत कुमार राठौर सप्ताहिक प्रार्थना सभाओं का आयोजन हिंदू बहुलता वाले क्षेत्रों में कर रहे थे, जिसका उद्देश्य गरीब और कमजोर ग्रामीणों को लालच देकर धर्मांतरित करना था।
आरोपों की गंभीरता, वित्तीय लेन-देन का रिकॉर्ड और कथित गतिविधियों के सामाजिक प्रभाव को देखते हुए अदालत ने यह माना कि अपराध गंभीर प्रकृति का है। मामले की सार्थकता पर जाए बिना, कोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि आरोपितों को जमानत देने के पर्याप्त आधार नहीं हैं और इसलिए पद्मनमन उर्फ पास्टर जोशुआ और किरण जोशुआ की जमानत अर्जी को खारिज कर दिया।
किन संगठनों से फंडिंग मिली?
शाहजहांपुर के धर्मांतरण मामलों में फंडिंग ट्रेल में एक संगठन का नाम सामने आया है, जो है जीजस रिडीम्स मिनिस्ट्रीज। यह एक ईसाई प्रचारक संगठन है, जिसका नेतृत्व तमिलनाडु स्थित प्रचारक मोहन सी लाजरस करते हैं।
संगठन की अपनी साहित्यिक सामग्री में दावा किया गया है कि लाजरस ने ईसाईयत अपनाने के बाद चमत्कारिक रूप से स्वस्थ होने का अनुभव किया। यह कथा संगठन के प्रचार और अभियान की विचारधारा की नींव बनाती है।
संगठन की सामग्री बार-बार बीमारी, कष्ट, इलाज और मुक्ति जैसे विषयों को प्रमुखता से प्रस्तुत करती है, जो कई धर्मांतरण मामलों में कमजोर और संवेदनशील लोगों को भावनात्मक रूप से प्रभावित करने के लिए इस्तेमाल किए गए हैं।
संगठन का दावा है कि वह बड़े पैमाने पर प्रार्थना अभियान, उपवास प्रार्थनाएँ, रातभर प्रार्थना सत्र और तथाकथित मुक्ति महोत्सव आयोजित करता है और ईसाईयत का प्रचार पत्रिकाओं, टीवी प्रसारण, ईमेल और अन्य आयोजनों के माध्यम से करता है।
संगठन खासकर बच्चों, किशोरों, युवाओं और महिलाओं को अपने प्रचार के लक्षित समूह के रूप में चुनता है। बच्चों को धर्मांतरण केंद्रित अभियानों में शामिल करना उनकी सहमति, संवेदनशीलता और नैतिक सीमाओं पर गंभीर सवाल उठाता है, खासकर ऐसे देश में जहाँ धार्मिक स्वतंत्रता कानून स्पष्ट रूप से लालच, दबाव या अल्पसंख्यकों का शोषण करके धर्मांतरण को निषिद्ध करता है।
शाहजहांपुर मामले में पुलिस रिकॉर्ड और कोर्ट के दस्तावेज दिखाते हैं कि जीजस रिडीम्स मिनिस्ट्रीज से जुड़े फंड उन लोगों के बैंक खातों में आए, जो अवैध धर्मांतरण में शामिल थे।
संगठन का दावा है कि वह पूरे भारत में वर्ल्ड रिवाइवल प्रेयर सेंटर का एक व्यापक नेटवर्क चलता है। इसका नेटवर्क आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, झारखंड, पंजाब, पुडुचेरी, दिल्ली और तमिलनाडु तक फैला हुआ है।
इसके केंद्र चित्तूर और तिरुपति, सिकंदराबाद, बेंगलुरु के कई स्थान, हासन, मैसूरु, तुमकुर, KGF, कोट्टायम, तिरुवनंतपुरम, मुंबई के धारावी और मलाड, रांची, चंडीगढ़, पुडुचेरी और नई दिल्ली जैसी जगहों में हैं।
केवल तमिलनाडु में ही संगठन के कम से कम दस केंद्र हैं, जिनमें आदम्बक्कम, अंबत्तूर, चेंगलपट्टू, कांचीपुरम, एग्मोर, पुरासावल्कम, रॉयपुरम, शांति निलयम, ताम्बरम और तिरुवल्लूर शामिल हैं।
मिशन अपहोल्डर्स ट्रस्ट
शाहजहांपुर के धर्मांतरण मामलों की जाँच के दौरान एक और संगठन सामने आया है, जो है मिशन अपहोल्डर्स ट्रस्ट। यह तमिलनाडु स्थित संगठन वेलोर में मुख्यालय रखता है। ट्रस्ट खुद को मिशनरियों और पादरियों का समर्थन करने वाला संगठन बताता है और अपने मिशन बयान में कहता है कि यह मिशनरी समुदाय की जरूरतों को पूरा करने का काम करता है।
इनमें स्वास्थ्य देखभाल, परेशान और संकट की देखभाल, भावनात्मक और नए अध्यात्म से जुड़ना,आराम, तथा मिशनरियों के बच्चों और सेवानिवृत्त मिशनरियों के सामाजिक और आध्यात्मिक सुदृढ़ीकरण शामिल हैं।
अपने उद्देश्यों के अनुसार, मिशन अपहोल्डर्स ट्रस्ट का लक्ष्य है कि मिशनरियों को सुसज्जित, सक्रिय और प्रोत्साहित किया जाए ताकि वे हमेशा समाज में नमक और प्रकाश की तरह काम कर सकें।
हालाँकि भाषा कल्याणकारी दिखाई देती है, लेकिन जब ऐसे संगठन अवैध धर्मांतरण मामलों के वित्तीय ट्रेल में सामने आते हैं, तो यह सवाल उठता है कि इसका उद्देश्य केवल मिशनरी गतिविधियों को बढ़ावा देना और उन्हें मजबूत करना है। ट्रस्ट का ध्यान आम जन कल्याण पर नहीं है, बल्कि मिशनरियों को उनके धार्मिक प्रचार को जारी रखने और गहराई तक पहुँचाने में सक्षम बनाना है।
आधिकारिक रिकॉर्ड दिखाते हैं कि मिशन अपहोल्डर्स ट्रस्ट FCRA पंजीकृत है, जिससे यह कानूनी रूप से विदेशी योगदान प्राप्त कर सकता है। वित्तीय विवरणों के अनुसार, ट्रस्ट ने वित्तीय वर्ष 2023–24 में ₹49,52,936 और 2022–23 में ₹56,53,856.76 की विदेशी फंडिंग प्राप्त की।
कुल मिलाकर, गिरफ्तारियाँ, कई FIR, कोर्ट के फैसले और वित्तीय ट्रेल यह दर्शाते हैं कि यह केवल एक धर्मांतरण का मामला नहीं है, बल्कि एक गहन और संगठित ऑपरेशन है।
शाहजहांपुर के मामलों से यह पैटर्न सामने आता है कि इसमें लालच, बार-बार आयोजित सभा, विभिन्न थाना क्षेत्रों में समन्वित गतिविधियाँ और तमिलनाडु स्थित मिशनरी संगठनों से विदेशी फंडिंग के जरिए पैसा शामिल है।
जिले में धर्मांतरण नेटवर्क में शामिल मिशनरियों के खिलाफ अधिकारियों द्वारा त्वरित कार्रवाई की जा रही है, लेकिन इतने बड़े पैमाने पर हो रहे धर्मांतरण गंभीर चिंता का विषय हैं और इसके जाँच की आवश्यकता है।
(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)
क्रिसमस ईसाईयों का अहम त्यौहार है, जो जीसस क्राइस्ट के जन्म की याद में मनाया जाता है। दुनिया भर में फैले ईसाइयत को मानने वाले इस त्योहार को पूरे जोर-शोर से मनाते हैं। जब पतझड़ की जगह सर्दी आ जाती है और जमीन बर्फ से ढक जाता है, तो दुनियाभर में क्रिसमस का माहौल बनने लगता है।
इस दौरान शॉपिंग, घूमना-फिरना, खाना-पीना और सजावट पर होने वाले खर्च में बढ़ोतरी होती है। इसका पर्यावरण पर असर पड़ता है।
इस लेख में क्रिसमस पर होने वाले पर्यावरण के नुकसान का आंकलन किया गया है। साथ ही जंगलों की कटाई, कचरे का पहाड़ और खाने पीने की बर्बादी पर चर्चा की गई है। यहाँ क्रिसमस के जश्न पर सवाल उठाने के बजाय, फोकस इस बात पर है कि क्रिसमस से जुड़ी कंजम्पशन-ड्रिवन प्रैक्टिस कैसे इकोसिस्टम को बर्बाद कर रही हैं।
क्रिसमस और पेड़ों की कटाई का दबाव
क्रिसमस के जिन असर पर कम बात होती है, उनमें से एक है पेड़ों की कटाई में इसका अप्रत्यक्ष योगदान। त्योहारों के मौसम में नैचुरल क्रिसमस ट्री, पेपर-बेस्ड प्रोडक्ट, गिफ्ट पैकेजिंग, फर्नीचर और सजावटी चीज़ों की बढ़ती माँग के साथ, पेड़ों को सबसे ज़्यादा नुकसान होता है। जब पेड़ बागानों से लिए जाते हैं, तब भी इन कामों के लिए जमीन, पानी, खाद और ज्यादा एनर्जी वाले ट्रांसपोर्ट की जरूरत होती है। पेड़ों के अलावा, कार्डबोर्ड, पेपर बैग और रैपिंग मटीरियल की बढ़ती माँग से दुनिया भर में जंगल के संसाधनों पर दबाव पड़ता है।
अमेरिकन फार्म ब्यूरो के अनुसार, यूनाइटेड स्टेट्स में हर साल लगभग 25 मिलियन नैचुरल क्रिसमस ट्री काटे और बेचे जाते हैं। इसके अलावा, UK सरकार के अनुसार, हर साल लगभग 6-8 मिलियन क्रिसमस ट्री काटे और बेचे जाते हैं।
अकेले नॉर्थ अमेरिका और यूरोप में, क्रिसमस मनाने के लिए हर साल लाखों पेड़ काटे जाते हैं। वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर (WWF) ने अपनी लिविंग फॉरेस्ट्स रिपोर्ट में, बढ़ती कंज्यूमर डिमांड और लाइफस्टाइल को दुनिया भर में जंगलों की कटाई के लिए जिम्मेदार बताया है।
कचरा बनना और प्लास्टिक प्रदूषण
क्रिसमस के साथ सॉलिड वेस्ट भी तेज़ी से बढ़ता है। त्योहारों के समय डिस्पोजेबल डेकोरेशन, बहुत ज़्यादा पैकेजिंग और रैपिंग पेपर की वजह से घरेलू और कमर्शियल कचरा काफी बढ़ जाता है। यूनाइटेड किंगडम में एनवायरनमेंटल ऑडिट के मुताबिक, हर क्रिसमस पर लगभग 227,000 मील रैपिंग पेपर इस्तेमाल होता है, जो धरती को लगभग 9 बार लपेटने के लिए काफी है, और इसमें से ज़्यादातर नॉन-रीसायकल होता है।
त्योहारों में रैप करने में इस्तेमाल सामान नॉन-रीसायकल होता है क्योंकि वे लैमिनेटेड, डाई किए हुए या प्लास्टिक और ग्लिटर से कोट किए हुए होते हैं। इन्हें फेंका या जलाया जाता है, तो दोनों से ही प्रदूषण होता है और ग्रीनहाउस गैस निकलते हैं।
प्लास्टिक की समस्या
क्रिसमस पर गिफ्ट देना भी कचरे को बढ़ाता है। UK सरकार और वेस्ट- मैनेजमेंट डेटा से पता चलता है कि त्योहारों के समय साल के बाकी समय की तुलना में लगभग 30% ज़्यादा कचरा पैदा होता है, जिसमें से ज़्यादातर पैकेजिंग और कम समय तक चलने वाले कंज्यूमर गुड्स से जुड़ा होता है।
डिपार्टमेंट फॉर एनवायरनमेंट, फूड एंड रूरल अफेयर्स के अनुसार, UK में £40 मिलियन से ज़्यादा के फालतू क्रिसमस गिफ्ट फेंक दिए जाते हैं, जिनमें से कई ट्रेड होने के कुछ ही महीनों बाद लैंडफिल में चले जाते हैं। पैकेजिंग इस समस्या को और बढ़ा देती है।
WRAP के डेटा के अनुसार, प्लास्टिक कोटिंग, ग्लिटर, रिबन और मिले-जुले मटीरियल से होने वाले कंटैमिनेशन के कारण हर साल लगभग 114,000 टन रीसायकल पैकेजिंग गलत तरीके से फेंक दी जाती है।
कंज्यूमर सर्वे के अनुसार, सोशल गिफ्ट देना खास तौर पर बेकार है। काम करने वालों और जान-पहचान वालों से मिले गिफ्ट को नापसंद किए जाने की संभावना ज्यादा होती है। ये इस्तेमाल भी नहीं किए जाते और पर्यावरण को भी अंत में नुकसान पहुँचाते हैं।
पेड़ों का कटना और सड़ना दोनों पर्यावरण के लिए नुकसानदेह
क्रिसमस का पर्यावरण पर असर दिखने वाले कचरे से कहीं ज्यादा है। पेडों को काट कर उन्हें बर्बाद होने के लिए छोड़ दिया जाता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, UK में हर साल लगभग 7-8 मिलियन असली क्रिसमस ट्री बर्बाद होते हैं, जिन्हें फेंक दिया जाता है, जिससे लगभग 12000 टन ग्रीन वेस्ट पैदा होता है।
मीथेन (CH₄) एक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है, जो कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) की तुलना में कम समय में कहीं अधिक ग्लोबल वार्मिंग की क्षमता रखती है। लैंडफिल में जैविक सामग्री, जैसे कि पेड़ जब सड़ती है, तो बड़ी मात्रा में मीथेन उत्पन्न होती है, जिससे हर साल हज़ारों टन एमिशन हो सकता है।
खाने की बर्बादी इस समस्या को और बढ़ा देती है। WRAP के मुताबिक, अनुमान है कि क्रिसमस के दौरान UK में 200,000 टन से ज्यादा खाना बर्बाद हो जाता है। यह बर्बादी न सिर्फ खाने की होती है, बल्कि प्रोडक्शन में इस्तेमाल होने वाले संसाधनों की भी है। जब बचे खाने को लैंडफिल में फेंका जाता है, तो यह मीथेन गैस छोड़ती है।इसका जलवायु पर असर पड़ता है।
कुल मिलाकर जंगलों की कटाई, बायोडायवर्सिटी के नुकसान और क्लाइमेट में अस्थिरता पैदा करती है। क्रिसमस जैसे त्यौहारों में उत्सव कई दिनों तक चलते हैं। इस दौरान सामानों का इस्तेमाल ज्यादा होती है और बर्बादी भी ज्यादा होती है। हर साल इनमें बढ़ोतरी हो रही है, जिससे पर्यावरण को नुकसान पहुँच रहा है।
पर्यावरण और उपभोक्तावाद में संतुलन जरूरी
क्रिसमस से जुड़ी पर्यावरण की चिंता का सेलिब्रेशन या सांस्कृतिक परंपरा से कोई लेना देना नहीं है। बल्कि ये उपभोक्तावाद को उजागर करता है। पर्यावरण की कीमत पर कई ग्लोबल त्यौहार मनाए जा रहे हैं। रिसर्च से पता चलता है कि जंगल, जलवायु परिवर्तन और इकोसिस्टम को दुरुस्त रखने के लिए हाई मानदंड बनाने की जरूरत है। दुनिया के चकाचौध में ये काफी पीछे छूटते जा रहे हैं। कम कचरा, खपत की जरूरत और पर्यावरण के प्रति जागरूकता पर फोकस करने वाले उत्सवों पर बल दिया जाना चाहिए ताकि संतुलन बना रहे।
(ये लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। मूल लेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
मान लीजिए एक शिक्षक है, जो कक्षा में सबसे शांत और सहनशील बच्चे को बार-बार समझाता है कि उसे और सहनशील बनना चाहिए, उसे और झुकना चाहिए और चुप रहना चाहिए। लेकिन वही शिक्षक कक्षा में दूसरे कोने में हो रहे शोर पर आँखे मूँद लेता है। वजह यह नहीं कि उसे दिखता नहीं, बल्कि इसलिए कि वहाँ बोलना असहज है। यही रवैया सार्वजनिक विमर्श में भी दिखता है, जहाँ उपदेश हमेशा सहनशील पक्ष को ही दिए जाते हैं।
यहाँ शिक्षक का उदाहरण देना जरूरी हो गया था। क्योंकि ‘सेकुलर’ सागरिका घोष की भूमिका उसी शिक्षक की हो गई है। जो ईसाइयों का मसीहा बनकर कक्षा के सबसे शांत बच्चे ‘हिंदू धर्म’ पर उपदेश दे रही हैं। इन्होंने क्रिसमस पर ईसाइयों की हक की लड़ाई लड़ने का प्रण लिया है। तो अब जहाँ भी ईसाइयों पर बदसलूकी होती देखती है, पहुँच जाती अपना ट्विटर/एक्स अकाउंट लेकर ‘शांत बच्चे’ को डाँटने। आप देख सकते हैं कि 24 से 25 दिसंबर के उनके पोस्ट केवल ईसाइयों के हित को लेकर ही हैं।
हमे क्या ही करना? यह जरूर कहा जा सकता था। अगर बात केवल सागरिका घोष और ईसाइयों (शोर) की होती। लेकिन ईसाइयों के लिए लड़ते हुए सागरिका घोष बार-बार ‘शांत बच्चे’ को घसीट रही हैं। सागरिका ने हिंदू धर्म को मानने वाले लोगों को ‘गुंडा’ बताया है। क्योंकि सागरिका को लगता है कि इसे सुनकर सहिष्णु धर्म का ‘शांत बच्चा’ क्या ही कर लेगा? इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ थोड़ी है, जो बेरहमी से पीट-पीटकर पेड़ पर टाँगकर जिंदा जला देगा।
सागरिका घोष ने क्रिसमस पर यजुर्वेद का दिया ज्ञान
तो इस ‘सहिष्णु धर्म’ को सागरिका घोष ‘गुंडे’ समझती हैं। यह उनके क्रिसमस की संध्या पर ईसाइयों की हक की लड़ाई लड़ते हुए किए गए एक पोस्ट में लिखा हुआ है। सागरिका कहती हैं, “प्रिय हिंदुत्व के गुंडो, आज दूसरे धर्मों पर हिंसा करने से पहले मुझे बताइए कि क्या आपने यजुर्वेद का शांति मंत्र पढ़ा है? अगर नहीं, तो इसे आज जरूर पढ़ें।”
Dear Hindutva thugs . Before you wreak violence on other religions today tell me if you’ve read the peace chant from the Yajur Veda. If not make it your essential reading for the day. #MerryChristmas2025
यहाँ सागरिका घोष ने यजुर्वेद के शांति मंत्र को एक समुदाय को नीचा दिखाने के लिए इस्तेमाल किया है। सागरिका को जानना होगा कि यह मंत्र सभी के लिए शांति की कामना करता है। बावजूद यजुर्वेद के शांति मंत्र को तंज और दूसरे धर्म के लोगों को अपमान करने के लिए इस्तेमाल किया।
अगर सागरिका घोष सच में यजुर्वेद की भावना को समझतीं, तो शांति की यह सीख केवल क्रिसमस तक सीमित नहीं रहती। तब यह शांति बांग्लादेश में मंदिरो पर हो रहे हमलों पर भी दिखाई देती, हिंदुओं पर अत्याचार और पलायन पर भी उनकी आवाज उठती। लेकिन वहाँ यजुर्वेद नहीं आता, वहाँ शांति मंत्र की जरूरत महसूस नहीं होती।
क्रिसमस पर सागरिका घोष की हिंदू-विरोधी और ईसाई-हित की लड़ाई
सिर्फ यह अकेला पोस्ट नहीं है, जिसका इस्तेमाल सागरिका घोष ईसाइयों के हित की लड़ाई में इस्तेमाल कर रही है। बल्कि उनके ट्विटर/एक्स अकाउंट पर ऐसे पोस्ट की भरमार लगी हुई है। खुद को ‘सेकुलर’ बताने वालीं सागरिका घोष खुलकर ईसाइयों की आवाज बन रही हैं, वो भी हिंदुओं को निशाना बनाते हुए।
यहाँ सागरिका घोष भारतीय कैथोलिक बिशप सम्मेलन (CBCI) के संदेश का हवाला देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर फोटो खींचने को लेकर तंज कस कर रही हैं। उन्हें लगता है कि केवल क्रिसमस ही शांति और मिलने-बाँटने का संदेश देने वाला त्योहार है। वह कहती हैं, ” पीएम मोदी, फोटो खिंचवाने से समुदाय एक साथ नहीं आएँगे।” पीएम से ईसाइयों के लिए न्याय भी माँगा।
A Christmas message that every Indian should embrace. This is a land that embraces ALL and embraces Christmas with its unique message of love and goodwill. This Christmas is not for photo ops by @narendramodi . Posing for photos will NOT bring communities together only STERN…
इसके बाद सागरिका घोष को पीएम नरेंद्र मोदी का क्रिसमस पर चर्च जाना भी पसंद नहीं आया। जबकि क्रिसमस की बधाई देते हुए, उन्होंने खुद कहा कि यह त्योहार सबके लिए और त्योहार का संदेश सब तक पहुँचना चाहिए। तो पीएम मोदी के क्रिसमस पर चर्च जाने से तो यह संदेश और ज्यादा फैलेगा।
पीएम मोदी की एक्स पोस्ट पर सागरिका घोष के कमेंट का स्क्रीनशॉट (फोटो साभार: X-sagarikaghose)
लेकिन सागरिका घोष को देश के प्रधानमंत्री का चर्च जाना इसीलिए पसंद नहीं आया, क्योंकि यह उनके नैरेटिव पर पानी फेरने वाला काम हो गया। सागरिका को मुद्दा नहीं मिला, तो वो प्रधानमंत्री की तस्वीरें खिंचाने को लेकर ही बरस गईं। भाषा की मर्यादा लाँघते हुए सागरिका कहती हैं, “पीएम मोदी पाखंड और छल को एक कला की तरह पेश कर रहे हैं।”
यहाँ सागरिका किस पाखंड और छल की बात कर रही हैं? वही पाखंड, जिसमें ईसाई मिशनरी हिंदुओं को धर्मांतरण का लालच देती हैं या वही छल जहाँ मिशनरी स्कूलों में हिंदुओं का कलावा काट दिया जाता है। क्या सागरिका को यह नहीं पता था? इसके बावजूद एक सेकुलर देश का प्रधानमंत्री क्रिसमस पर चर्च जाते है पर इसमें भी सागरिका को परेशानी हो रही है।
इतना ही नहीं सागरिका घोष ने अपने ‘प्रोपेगेंडा पत्रकार’ पति राजदीप सरदेसाई के साथ मिलकर अपने नैरेटिव की खबरों को हवा भी दी। क्रिसमस से पहले राजदीप सरदेसाई के वीडियो को रीशेयर करते हुए दावा करती हैं कि BJP की नेता अंजू भार्गव एक दृष्टिबाधित लड़की पर चिल्ला रही हैं। लेकिन इस तथ्य को नजरअंदाज कर दिया कि BJP ने उन्हें कारण बताओ नोटिस भी जारी कर दिया है।
Why is the Church leadership in India not speaking out on these horrifying attacks? https://t.co/KEt3LuTWId
राजदीप सरदेसाई का कहना है कि क्रिसमस के आसपास ईसाइयों को धमकाया जा रहा है, बल्कि वह भूल गए कि ईसाई धर्मांतरण का मुद्दा सालभर रहता है। यहाँ सरदेसाई ने सालभर के मुद्दे को तो नजरअंदाज कर दिया, लेकिन क्रिसमस पर ईसाइयों के प्रति प्रेम दिखाने में कोई कमी नहीं छोड़ी।
सागरिका घोष का दूसरे धर्म पर ज्ञान और हिंदू-विरोधी बयान
क्रिसमस पर जो सागरिका घोष ईसाइयों का मसीहा बनकर हिंदुओं को निशाना बना रही हैं, यह उनका कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी वह कई बार हिंदुओं और हिंदू परंपराओं को लेकर ऐसे निचले स्तर के बयान दे चुकी हैं।
लव जिहाद के मुद्दे पर सागरिका घोष का रवैया जानिए। इसे गंभीर सामाजिक चिंता को खारिज करते हुए ‘मानसिक उन्माद‘ की तरह दुनिया के सामने पेश करती हैं। और इससे निपटने का नया तरीका इजाद करते हुए इसका हल तुर्की के टीवी शो ‘एर्टुग्रेल’ को बताती हैं। मानो यह कोई सीरियल देखने से पैदा हुआ भ्रम हो, न कि जमीनी हकीकत।
यही नहीं, जब सेना से जुड़े एक जवाब पर लोगों ने सवाल उठाए, तो सागरिका घोष ने उस सैनिक को ही ‘मूर्ख‘ बता दिया। लेकिन हैरानी की बात यह है कि जिन इस्लामी आक्रांताओं ने इतिहास में हिंदुओं का नरसंहार किया, मंदिर तोड़े और जबरन धर्मांतरण कराए, वही सागरिका घोष को ‘देशभक्त’ और ‘नायक’ नजर आते हैं।
दिलचस्प यह है कि जब दूसरे धर्म से जुड़े संवेदनशील मुद्दे सामने आते हैं, तो या तो सागरिका पूरी तरह चुप्पी साध लेती हैं या दुनिया के सामने महान और शांति का प्रतीक बताकर पेश करती हैं। उनके लिए समस्या तभी समस्या है, जब उसमें हिंदू शामिल हों।
यजुर्वेद का शांति मंत्र हिंदुओं को नहीं, सागरिका घोष को पढ़ने की जरूरत
आखिर में सागरिका घोष को यह बताने की जरूरत है कि हिंदुओं ने यजुर्वेद का शांति मंत्र पहले से पढ़ रखा है। उसे पढ़ने और समझने की जरूरत आपको है, जो शांति का अर्थ भी अपने नैरेटिव के हिसाब से तय करती हैं। आज जब क्रिसमस के नाम पर हिंदुओं को यह समझ आने लगा है कि क्रिसमस उन पर थोपा जा रहा है, और वे इसके खिलाफ जागरुक हो रहे हैं, तो इससे सागरिको घोष को इतनी परेशानी क्यों हो रही है?
सागरिका घोष को यह समझना होगा कि हिंदू अब जान चुका है, यह वही शुरुआती दबाव का हिस्सा होता है, जो पहले त्योहार मनवाने से शुरू होता है और धीरे-धीरे धर्मांतरण की ओर आकर्षित करता है। फिर गरीब हिंदू परिवारों को निशाना बनाते हैं। कहीं दवा के लालच में तो कहीं इलाज के नाम पर। यह सब पैसों से होता है। हाल ही में शाहजहाँपुर में सामने आए ईसाई धर्मांतरण के मामलों से यह साफ है, जिसमें मिशनरियों को विदेशों से फंडिंग मिलती थी।
क्रिसमस पर हिंदुओं को सागिरका घोष का ज्ञान खूब दिखता है, लेकिन यह ज्ञान तब सामने नहीं आता जब बांग्लादेश में एक हिंदू युवक को इस्लामी कट्टरपंथी बेरहमी से पीट-पीटकर पेड़ से लटका कर जिंदा जला देते हैं। तब आपके ट्विटर अकाउंट पर न्याय की माँग करती एक भी पोस्ट नहीं दिखती। तब आपकी संवेदना अचानक गायब हो जाती है।
यही आपकी चयनात्मक न्याय के लिए आवाज है। कब हिंदुओं को निशाना बनाना है और कब ईसाइयों के लिए मसीहा बनकर खड़ा होना है। इसी चयन के सहारे देश में सेकुलरिज्म की एक नकली मानसिकता फैलानी की कोशिश की जाती है। इसीलिए यजुर्वेद का शांति मंत्र सागिरका घोष आप भी जरूर पढ़ें, ताकि शांति की बात हर धर्म के त्योहार पर की जा सके।