कॉन्ग्रेस पार्टी ने अरावली पहाड़ियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वीकार की गई संशोधित 100 मीटर वाली परिभाषा पर कड़ा विरोध जताया है। कॉन्ग्रेस का आरोप है कि मोदी सरकार इस नई परिभाषा के जरिए अरावली क्षेत्र के लगभग 90% हिस्से को संरक्षण से बाहर कर रही है, जिससे इस पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील इलाके में बड़े पैमाने पर खनन का रास्ता खुल सकता है।
इस मुद्दे पर कॉन्ग्रेस नेता और राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला करते हुए इसे एक सुनियोजित साजिश बताया। गहलोत ने कहा कि अरावली की परिभाषा को 100 मीटर तक सीमित करना कोई अलग फैसला नहीं है, बल्कि यह संस्थानों पर कब्जा कर अरावली को खनन माफिया के हवाले करने की बड़ी योजना का हिस्सा है।
गहलोत ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव के उस दावे को भी खारिज किया, जिसमें कहा गया है कि केवल 0.10% अरावली क्षेत्र ही खनन के लिए खुलेगा। उन्होंने इसे भ्रामक और तथ्यहीन बताया।
साथ ही, उन्होंने सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC) पर भी सवाल उठाए और कहा कि 2002 में सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में बनी यह समिति अब केंद्र सरकार के नियंत्रण में आकर रबर स्टैम्प बन चुकी है, जिससे अरावली के संरक्षण पर गंभीर खतरा पैदा हो गया है।
VIDEO | Jaipur: Former Rajasthan CM and Congress leader Ashok Gehlot, on changing definition of Aravalli Hills and Ranges, said, "27,200 new legal and illegal mines may open in 0.19 percent of Aravallis, govt’s decision will destroy 90 percent of the range."
— Press Trust of India (@PTI_News) December 23, 2025
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2002 में अरावली खनन का समर्थन, अब कॉन्ग्रेस का यू-टर्न
कॉन्ग्रेस पार्टी पर लंबे समय से यह आरोप लगता रहा है कि वह सरकार में रहते हुए जिन नीतियों और फैसलों का समर्थन करती है, विपक्ष में आते ही उन्हीं का विरोध करने लगती है। राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत इस दोहरे रवैये की एक और मिसाल पेश कर रहे हैं।
आज गहलोत केंद्र और राजस्थान की बीजेपी सरकारों पर अरावली पहाड़ियों को खनन माफिया के हवाले करने की साजिश का आरोप लगा रहे हैं और केंद्र सरकार के सिर्फ 0.019% क्षेत्र में खनन वाले तर्क पर सवाल उठा रहे हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि 2002 में गहलोत के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार खुद अरावली क्षेत्र को खनन के लिए खोलना चाहती थी।
यानी जो फैसला उस समय कॉन्ग्रेस सरकार को सही लग रहा था, वही आज बीजेपी सरकार के दौर में गलत और जनविरोधी बताया जा रहा है। इसी वजह से कॉन्ग्रेस और अशोक गहलोत पर मौका देखकर रुख बदलने और राजनीतिक पाखंड का आरोप लगाया जा रहा है।
आज मैं अपनी प्रोफाइल पिक्चर (DP) बदलकर #SaveAravalli अभियान का हिस्सा बन रहा हूँ। यह सिर्फ एक फोटो नहीं, एक विरोध है उस नई परिभाषा के खिलाफ जिसके तहत 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को 'अरावली' मानने से इंकार किया जा रहा है। मेरा आपसे अनुरोध है कि अपनी प्रोफाइल पिक्चर बदलकर… pic.twitter.com/pt9u1O8UpX
— Ashok Gehlot (@ashokgehlot51) December 18, 2025
साल 2002 में राजस्थान में अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा (एफिडेविट) दाखिल किया था। इस हलफनामे में राज्य सरकार ने कोर्ट को बताया था कि उसने खनन के लिए जंगल (वन) भूमि के उपयोग की अनुमति लेने के लिए केंद्र सरकार को 1543 मामलों में प्रस्ताव भेजे थे। यानी उस समय कॉन्ग्रेस सरकार खुद अरावली और वन क्षेत्रों में खनन की इजाजत देने की प्रक्रिया में शामिल थी और इसके लिए उसने औपचारिक रूप से केंद्र से मंजूरी माँगी थी।

वर्तमान में अशोक गहलोत और कॉन्ग्रेस पार्टी अरावली पहाड़ियों में खनन पर पूरी तरह प्रतिबंध की माँग कर रहे हैं। लेकिन इसके उलट, साल 2002 में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने हलफनामे में राजस्थान की कॉन्ग्रेस सरकार ने खनन क्षेत्र के महत्व को रेखांकित किया था।
उस समय सरकार ने कोर्ट को बताया था कि राज्य में बड़ी संख्या में लोगों की रोज़ी-रोटी खनन पर निर्भर है और अगर अरावली क्षेत्र में पूरी तरह खनन पर रोक लगा दी जाती है, तो इससे हजारों लोगों की आजीविका छिन जाएगी। यानी आज जिस मुद्दे पर कॉन्ग्रेस सख्त रुख अपना रही है, उसी पर वह पहले विपरीत और व्यावहारिक तर्क दे चुकी है।

साल 2002 में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में अशोक गहलोत की सरकार ने साफ तौर पर कहा था कि खनन क्षेत्र राज्य में बड़ी संख्या में लोगों को रोज़गार देता है। सरकार ने बताया था कि अगर पूरी अरावली पहाड़ियों में खनन पर रोक लगा दी जाती है, तो इस कठिन समय में हजारों लोग अपनी रोजी-रोटी नहीं चला पाएँगे।
हलफनामे में यह भी कहा गया था कि अरावली क्षेत्र में बड़ी संख्या में जनजातीय आबादी रहती है, जिनकी आजीविका का एक बड़ा स्रोत खनन है। खनन बंद होने से जनजातीय समुदाय सबसे ज्यादा प्रभावित होगा।
राज्य सरकार ने आगे बताया कि सभी खनन गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध से राज्य की अर्थव्यवस्था को गंभीर नुकसान पहुँचेगा, क्योंकि इन क्षेत्रों से निकलने वाले खनिज और उनसे जुड़ी आर्थिक गतिविधियाँ राजस्थान की अर्थव्यवस्था में अहम भूमिका निभाती हैं।
हलफनामे के अनुसार, अरावली क्षेत्र में 5,000 से अधिक खनन पट्टे और 641 खदान के पास लाइसेंस थे। इनसे सीधे तौर पर करीब 1.75 लाख लोगों को रोज़गार मिलता था। इसके अलावा, खनन से जुड़े कामों जैसे खनिज परिवहन, मशीनरी संचालन, खनिज प्रसंस्करण और व्यापार के जरिए 14 जिलों में लगभग 6 लाख लोगों को रोजगार मिलता था।
सरकार ने यह भी चेतावनी दी थी कि अगर अरावली में खनन बंद किया गया, तो करीब 9,700 औद्योगिक इकाइयाँ, जिनमें लगभग 884 करोड़ रुपए का निवेश है और जो 64,000 लोगों को सीधा रोजगार देती हैं, वे गंभीर रूप से प्रभावित होंगी। साथ ही, राज्य की अन्य खनिज-आधारित उद्योग इकाइयाँ, जो इन खदानों से कच्चा माल लेती हैं, उन पर भी नकारात्मक असर पड़ेगा।

आज कॉन्ग्रेस और अशोक गहलोत पर्यावरण और अरावली संरक्षण की बात कर रहे हैं, लेकिन 2002 में सत्ता में रहते हुए उनकी सरकार का रुख बिल्कुल अलग था। उस समय कॉन्ग्रेस सरकार ने अरावली क्षेत्र में मौजूद रॉक फॉस्फेट, जिंक, वोलास्टोनाइट और अन्य खनिजों के बड़े भंडार को प्राथमिकता दी थी और दलील दी थी कि खनन पर रोक लगाने से कई उद्योगों को नुकसान होगा। यानी तब कॉन्ग्रेस ने अरावली की पारिस्थितिकी नहीं, बल्कि राज्य की अर्थव्यवस्था को ज्यादा जरूरी माना।
उस दौर में अशोक गहलोत ने खनन से मिलने वाले राजस्व को प्राथमिकता दी, न कि उस पर सख्त प्रतिबंध को। आज गहलोत यह दावा कर रहे हैं कि 2002 में उनकी सरकार ने CEC द्वारा सुझाई गई 100 मीटर की परिभाषा को रोज़गार के नजरिये से अपनाया था। लेकिन यह सवाल उठता है कि जो रोज़गार का तर्क तब सही था, वह आज अचानक गलत कैसे हो गया?
हकीकत यह है कि अगर अरावली में सिर्फ 0.019% क्षेत्र, वह भी गैर-संरक्षित जोन में खनन की अनुमति दी जाती है, तो इससे बड़े पैमाने पर रोज़गार पैदा हो सकता है। लेकिन चूँकि आज कॉन्ग्रेस सत्ता में नहीं है, इसलिए वही खनन उसे गलत और खनन माफिया को अरावली सौंपने की साजिश नजर आ रहा है।
दरअसल, कॉन्ग्रेस का नजरिया इस बात पर बदलता दिखता है कि वह सत्ता में है या विपक्ष में जो कदम सत्ता में रहते हुए सही लगता है, वही विपक्ष में जाकर विनाश की साजिश बताया जाता है।
यह भी अहम है कि अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार ने अरावली की 100 मीटर परिभाषा के आधार पर सबसे ज्यादा 700 से अधिक खनन अनुमतियाँ दी थीं, जिसका वह आज विरोध कर रहे हैं।
इंडिया टुडे को दिए एक इंटरव्यू में केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने बताया कि राजस्थान में चल रही 1,008 खदानों में से करीब 700 खदानें अशोक गहलोत के कार्यकाल में शुरू हुईं। उन्होंने यह भी कहा कि कॉन्ग्रेस सरकार के समय बिना रोक-टोक खनन पट्टे दिए गए, जिस पर बाद में सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप कर रोक लगानी पड़ी।
इसके अलावा, मार्च 2024 की CEC रिपोर्ट में यह सामने आया कि अरावली क्षेत्र में अवैध खनन सालों से एक गंभीर समस्या बना हुआ है। रिपोर्ट में यह भी याद दिलाया गया कि 2010 में कोर्ट ने पाया था कि कई खनन पट्टाधारक, लीज़ खत्म होने के बाद भी खनन जारी रखे हुए थे। अरावली को लेकर कॉन्ग्रेस का रुख सिद्धांत से ज्यादा सत्ता की स्थिति पर निर्भर करता दिखाई देता है।

अशोक गहलोत के दोहरे रवैये पर सवाल उठाते हुए बीजेपी नेता अरुण चतुर्वेदी ने कहा, “मुझे हैरानी है कि 2002 में जब अशोक गहलोत खुद मुख्यमंत्री थे और उनकी सरकार सत्ता में थी, तब उन्होंने इसी मुद्दे पर अपनी सहमति दी थी। लेकिन आज वही गहलोत इस मुद्दे को फिर से उठा रहे हैं और बेवजह विवाद खड़ा कर रहे हैं।”
#WATCH | Ajmer: On court order regarding Aravalli mountain range, Rajasthan State Finance Commission Chairman Arun Chaturvedi says, "A few days ago, former Rajasthan CM Ashok Gehlot tweeted about granting permission for mining within a 100-meter radius, turning this judicial… pic.twitter.com/15AQHBnGLb
— ANI (@ANI) December 21, 2025
बीजेपी नेता अरुण चतुर्वेदी ने आगे कहा कि जब अरावली के लगभग 98% क्षेत्र में पहले से ही खनन पर प्रतिबंध है, तो इस मुद्दे पर अब राजनीति करने का कोई औचित्य नहीं है।
इस बीच, यह भी कहा जा रहा है कि वोट चोरी का मुद्दा, जिसे कॉन्ग्रेस खासतौर पर राहुल गाँधी, जोर-शोर से उठा रही थी, जब जनता में असर नहीं दिखा पाया, तो अब कॉन्ग्रेस ने अरावली पहाड़ियों के नाम पर एक नया डर पैदा करने वाला नैरेटिव गढ़ना शुरू कर दिया है, ताकि बीजेपी को घेरा जा सके।
इस मुद्दे पर इस बार सोनिया गाँधी खुद सामने आईं। उन्होंने 3 दिसंबर को द हिंदू अखबार में एक लेख लिखकर दावा किया कि मोदी सरकार ने अरावली पहाड़ियों के लिए मृत्युदंड पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। सोनिया गाँधी ने आरोप लगाया कि 100 मीटर से कम ऊँचाई वाली पहाड़ियाँ खनन से सुरक्षित नहीं रहेंगी, और इससे अरावली का करीब 90% हिस्सा अवैध खनन और माफिया के लिए खुल जाएगा।
सोनिया गाँधी ने अपने लेख में लिखा कि, “मोदी सरकार ने अब लगभग इन पहाड़ियों के लिए मृत्यु वारंट पर दस्तखत कर दिए हैं, जो पहले ही अवैध खनन से उजड़ चुकी हैं। सरकार ने यह घोषित कर दिया है कि 100 मीटर से कम ऊँचाई वाली पहाड़ियों पर खनन रोक के नियम लागू नहीं होंगे। यह अवैध खनन करने वालों और माफिया के लिए खुला न्योता है कि वे अरावली के उस 90% हिस्से को खत्म कर दें, जो सरकार द्वारा तय ऊँचाई सीमा से नीचे आता है।”

कॉन्ग्रेस नेता और उनसे जुड़े वैचारिक रूप से समर्थक मीडिया व सोशल मीडिया इकोसिस्टम अरावली पहाड़ियों के भविष्य को लेकर डर फैलाने वाला नैरेटिव लगातार बढ़ा रहे हैं।
इस पूरे विवाद की शुरुआत 20 नवंबर 2025 को हुई, जब सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय द्वारा दी गई अरावली की ऑपरेशनल परिभाषा को मंजूरी दी।
संशोधित परिभाषा के अनुसार, अरावली पहाड़ी वह भू-आकृति होगी जो अरावली जिलों में स्थित हो और स्थानीय भू-स्तर से 100 मीटर या उससे अधिक ऊँची हो।
वहीं, अरावली रेंज की परिभाषा यह तय की गई कि 100 मीटर या उससे अधिक ऊँचाई वाली दो या अधिक अरावली पहाड़ियाँ, जो एक-दूसरे से 500 मीटर के भीतर स्थित हों, उन्हें मिलाकर अरावली रेंज माना जाएगा।
इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह पूरे क्षेत्र की सटीक मैपिंग करे और सस्टेनेबल माइनिंग के लिए एक मैनेजमेंट प्लान (MPSM) तैयार करे।
इसके बाद लेफ्ट लिबरल इकोसिस्टम ने #SaveAravalli अभियान चलाया, मानो केंद्र सरकार कुछ ही दिनों में अरावली को खत्म कर देने वाली हो। इस पर मोदी सरकार ने साफ किया कि न तो अरावली को खनन माफिया के हवाले किया जा रहा है, न ही 90% अरावली अपनी पहचान खोने वाली है। सरकार ने यह भी खारिज किया कि मौजूदा पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों को कमजोर किया जा रहा है।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि 100 मीटर का नियम पहाड़ियों की ऊँचाई के ऊपरी 100 मीटर से नहीं, बल्कि स्थानीय भू-स्तर से ऊँचाई से जुड़ा है, जिसे लेकर भ्रम फैलाया जा रहा है।
यह भी अहम है कि राजस्थान सरकार ने खुद 2002 की समिति रिपोर्ट के आधार पर अरावली की परिभाषा तय की थी, जो रिचर्ड मर्फी की लैंडफॉर्म क्लासिफिकेशन पर आधारित थी। इसके तहत स्थानीय भू-स्तर से 100 मीटर ऊँची सभी संरचनाओं को पहाड़ी माना गया और उन पर तथा उनकी ढलानों पर खनन प्रतिबंधित किया गया। राजस्थान 9 जनवरी 2006 से इसी परिभाषा का पालन कर रहा है।
केंद्र सरकार पहले ही यह कह चुकी है कि 100 मीटर या उससे अधिक ऊँची पहाड़ियों को घेरने वाली सबसे निचली कंटूर लाइन के भीतर आने वाला पूरा क्षेत्र, उसकी ऊँचाई या ढलान चाहे जो हो, खनन पट्टे से बाहर रहेगा।
सरकार ने यह भी साफ किया कि जब तक ICFRE द्वारा MPSM को अंतिम रूप नहीं दिया जाता, तब तक कोई नया खनन पट्टा नहीं दिया जाएगा। भविष्य में भी खनन केवल उन्हीं क्षेत्रों में होगा, जहाँ वैज्ञानिक आधार पर सस्टेनेबल माइनिंग संभव होगी।
यह साफ है कि कॉन्ग्रेस अनावश्यक विवाद खड़ा करने की कोशिश कर रही है, जबकि यह परिभाषा सिर्फ प्रशासनिक (ऑपरेशनल) है और सुप्रीम कोर्ट ने नए खनन पट्टों पर रोक लगाकर पर्यावरण की सुरक्षा सुनिश्चित कर दी है। 21 दिसंबर को पर्यावरण मंत्रालय (MoEFCC) ने साफ कहा था कि संरक्षित क्षेत्र, इको-सेंसिटिव जोन, टाइगर रिजर्व, वेटलैंड और CAMPA प्लांटेशन क्षेत्रों में खनन पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा। इसके बावजूद विपक्ष के शोर को देखते हुए मंत्रालय ने 24 दिसंबर को एक और बयान जारी कर अरावली में किसी भी नए खनन पट्टे पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया।
मंत्रालय ने कहा कि यह प्रतिबंध पूरी अरावली श्रृंखला पर समान रूप से लागू होगा, जिसका उद्देश्य गुजरात से लेकर दिल्ली-NCR तक फैली अरावली की भौगोलिक अखंडता को बचाना और अवैध व अनियंत्रित खनन को रोकना है।
MoEFCC ने ICFRE को यह जिम्मेदारी भी दी कि वह पूरे अरावली क्षेत्र में ऐसे अतिरिक्त इलाके चिन्हित करे, जहाँ पर्यावरण, भू-गर्भीय संरचना और लैंडस्केप के आधार पर खनन पर पूरी तरह रोक लगनी चाहिए, भले ही वे पहले से प्रतिबंधित क्षेत्रों में न आते हों।
इतना ही नहीं, ICFRE द्वारा तैयार किया गया MPSM भी सीधे लागू नहीं किया जाएगा। उसे पहले सार्वजनिक किया जाएगा, ताकि सभी हितधारकों से सुझाव लिए जा सकें। यानी जब तक वैज्ञानिक अध्ययन, पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन, इकोलॉजिकल क्षमता, संरक्षण योग्य क्षेत्रों की पहचान और पुनर्स्थापन की स्पष्ट योजना तैयार नहीं हो जाती, तब तक कोई नया खनन पट्टा नहीं मिलेगा। इसके बाद भी सिर्फ गैर-संरक्षित क्षेत्रों में ही सीमित खनन की अनुमति दी जाएगी।
अंत में, केंद्र सरकार ने गुजरात, राजस्थान और हरियाणा की राज्य सरकारों को सख्त निर्देश दिए हैं कि जो भी वैध खनन चल रहा है, वह सुप्रीम कोर्ट के आदेश और सभी पर्यावरणीय नियमों का पूरी तरह पालन करते हुए ही किया जाए।
माइनिंग माफिया से अरावली को बचाने वाले अशोक गहलोत ने अपने रिश्तेदारों को माइनिंग के ठेके दिए
विडंबना यह है कि कॉन्ग्रेस ने अरावली खनन नीति को लेकर बीजेपी पर हमला करने के लिए अशोक गहलोत को आगे किया। हालाँकि, गहलोत खुद कई करोड़ के खनन घोटाले में संदेह के दायरे में रहे हैं।
2015 में, गहलोत और उनके एक रिश्तेदार का नाम एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) की चार्जशीट में आया था, हालाँकि उन्हें आरोपित नहीं बनाया गया। इसमें कहा गया कि IAS अधिकारी अशोक सिंहवी ने एक अन्य आरोपित को बताया कि गहलोत का रिश्तेदार एक खनन कारोबारी के लिए काम करता था ताकि राजनीतिक वर्ग से लाभ लिया जा सके। सिंहवी और तीन खनन अधिकारियों पर किकबैक गिरोह चलाने का आरोप था। ये लोग अनुबंधों को मनमाने ढंग से रद्द कर खनन रोककर मालिकों से पैसे वसूलते थे।
2013 में, गहलोत पर यह आरोप था कि उन्होंने सैंडस्टोन खनन के ठेके अपने रिश्तेदारों को दिए थे और कुल 37 खदानों में से 19 खदानें अपने रिश्तेदारों को आवंटित कीं।
2022 में, गहलोत के नेतृत्व में राजस्थान के माइन डिपार्टमेंट ने चूना पत्थर की खदानों को मार्बल ग्रेड में बदल दिया, जिससे राज्य को लगभग 1,000 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ।
इसके अलावा, 2014 में रिपोर्ट हुई कि गहलोत के रिश्तेदारों की कंपनी गोटन लाइमस्टोन खनिज उद्योग लिमिटेड (GKUPL) ने नागौर जिले के गोतन क्षेत्र में 10 वर्ग किलोमीटर खनन क्षेत्र को अल्ट्रा टेक सीमेंट को अवैध रूप से बेच दिया। गहलोत के रिश्तेदारों में राम वल्लभ चौहान, सुरेश चौहान, रमेश चौहान और राम अवतार चौहान (चौहान ब्रदर्स) शामिल थे।
ACB ने पाया कि यह खनन पट्टा नियमों का उल्लंघन था। पहले, 1997 में 2 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र जेके सीमेंट को बेचा गया था और जब इसका स्थानांतरण आवेदन खान विभाग में लंबित था, तब 2012 में गहलोत के रिश्तेदारों ने पूरा 10 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र अल्ट्रा टेक को बेच दिया। सार यह है कि अशोक गहलोत ने खुद खनन से जुड़े कई विवादों और आरोपों के बीच, अब बीजेपी पर अरावली खनन नीति को लेकर हमला करने का नेतृत्व लिया है।
अरावली पहाड़ियाँ क्यों जरूरी हैं?
लगभग 2.5 अरब साल पुराने अरावली पहाड़ गुजरात से शुरू होकर राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक फैले हुए हैं। माउंट आबू का गुरु शिखर (1,722 मीटर) इसकी सबसे ऊँची चोटी है। दिल्ली की रिज, जिसे अक्सर राजधानी की हरी दीवार या हरी फेफड़े कहा जाता है, उसे भी अरावली श्रृंखला का ही हिस्सा है।
अरावली पहाड़ियों के बिना, थार रेगिस्तान धीरे-धीरे पूर्व की ओर बढ़ सकता है, जो हरियाणा, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक फैल सकता है। यही वजह है कि अरावली को मरुस्थलीकरण के खिलाफ प्राकृतिक ढाल माना जाता है।

अरावली की पहाड़ियाँ और पहाड़ों की कतारे जीवन देने वाली हैं। ये गर्म हवाओं के प्रवाह को नियंत्रित करती हैं और भूजल स्तर बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती हैं। अरावली क्षेत्र खनिज संपदा का भंडार है, जहाँ सैंडस्टोन, लाइमस्टोन, मार्बल, ग्रेनाइट के साथ-साथ सीसा, जिंक, तांबा, सोना और टंग्स्टन जैसे खनिज पाए जाते हैं।
इसके अलावा, अरावली में अलग-अलग वनस्पति और जीव-जंतु पाए जाते हैं, जो जैव विविधता को समृद्ध बनाते हैं। यही नहीं, चंबल, साबरमती और लूणी जैसी महत्वपूर्ण नदियों का उद्गम भी अरावली क्षेत्र से होता है। इन सभी कारणों से अरावली पहाड़ियाँ पर्यावरण, जल और जीवन के लिए बेहद जरूरी मानी जाती हैं।
कॉन्ग्रेस की सुविधा की राजनीति
इसलिए यह साफ है कि अरावली के संरक्षित क्षेत्रों में अवैध खनन और गैर-वन गतिविधियों की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। लेकिन अरावली की संशोधित परिभाषा और खनन नीति को लेकर विपक्ष जिस तरह डर फैलाने की राजनीति कर रहा है, उससे यह संकेत मिलता है कि कॉन्ग्रेस के लिए अरावली न तो भावनात्मक मुद्दा है और न ही कोई वास्तविक चिंता। यह सिर्फ राजनीतिक विरोधियों पर हमला करने का एक और मौका बन गया है।
यह पहली बार नहीं है जब सत्ता से बाहर होने के बाद कॉन्ग्रेस उसी फैसले पर नाराज़गी जता रही है, जिसे वह खुद सत्ता में रहते हुए मंजूरी दे चुकी थी। खासतौर पर अशोक गहलोत इस राजनीति के माहिर खिलाड़ी रहे हैं। इसका उदाहरण न सिर्फ 2002 के हलफनामे में खनन के समर्थन से आज पूर्ण प्रतिबंध की माँग में दिखता है, बल्कि हनुमानगढ़ एथेनॉल प्लांट विवाद में भी साफ नजर आता है।
ध्यान देने वाली बात है कि हनुमानगढ़ का एथेनॉल प्लांट 2023 में अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार ने ही मंजूर किया था। लेकिन जब सत्ता बदली और बीजेपी सरकार ने उसी परियोजना का निर्माण जारी रखा, तो वही गहलोत और कॉन्ग्रेस उसके खिलाफ खड़े हो गए।
यह विवाद तब शुरू हुआ था जब कॉन्ग्रेस सरकार ने 2023 में पंजाब की कंपनी ड्यून एथेनॉल प्राइवेट लिमिटेड के एथेनॉल प्लांट प्रोजेक्ट को करीब 450 करोड़ रुपए की फंडिंग के लिए चुना। चुनाव तक सब कुछ ठीक चलता रहा, लेकिन जैसे ही कॉन्ग्रेस सत्ता से बाहर हुई, वही परियोजना, जो रोजगार पैदा करने और अर्थव्यवस्था को मजबूत करने वाली बताई जा रही थी, कॉन्ग्रेस के लिए बीजेपी की कॉरपोरेटपरस्ती की योजना बन गई। कुल मिलाकर, आलोचकों का कहना है कि कॉन्ग्रेस के विरोध नीति या पर्यावरण के आधार पर नहीं, बल्कि सत्ता में होने या न होने पर आधारित नजर आता है।
(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)


