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फिलीस्तीन समर्थक को दिया जवाब, बौखला उठी इस्लामी जमात: शैरन वर्मा की कॉमेडी से बिलबिलाए कट्टरपंथी, मुनव्वर के समय याद आ रहा था- अभिव्यक्ति का अधिकार

‘इंडियाज गॉट लेटेंट’ शो से चर्चित स्टैंड अप कॉमेडियन शैरन वर्मा का एक वीडियो इस समय सोशल मीडिया पर बहस का मुद्दा बना हुआ है। इस वायरल वीडियो में शैरन वर्मा दर्शकों के सोशल मीडिया कमेंट्स पढ़ रही थीं। कमेंट्स पढ़ते हुए उन्होंने एक ऐसे यूजर का जिक्र किया, जिसके प्रोफाइल बायो में ‘Free Palestine’ लिखा था। शैरन ने बताया कि उसी यूजर ने उन्हें कमेंट में रसोई में जाकर बर्तन धोने जैसी बात कही थी।

इस विरोधाभास पर शैरन ने तंज कसते हुए एक जोक किया और महिलाओं के प्रति ऐसी सोच पर कटाक्ष किया। उनका मजाक उस मानसिकता को लेकर था, जिसमें खुद को प्रगतिशील दिखाने वाले लोग भी महिलाओं के लिए अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करते हैं।

वीडियो सामने आते ही क्यों भड़का विवाद?

यह वीडियो जैसे ही सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, वैसे ही विवाद शुरू हो गया। कुछ यूजर्स ने आरोप लगाया कि शैरन ने ‘Free Palestine’ जैसे संवेदनशील नारे को मजाक का हिस्सा बना दिया है। इसके बाद उनके खिलाफ पोस्ट्स की बाढ़ आ गई और मामला X पर ट्रेंड करने लगा। कई लोगों ने इसे राजनीतिक और धार्मिक भावनाओं से जोड़कर देखा, जबकि कुछ अकाउंट्स की ओर से तीखी भाषा और ट्रोलिंग भी देखने को मिली।

विरोध करने वालों की आपत्ति क्या है?

वहीं, विरोध करने वाले लोग इस बात पर आपत्ति जता रहे हैं कि अंतरराष्ट्रीय और संवेदनशील मुद्दों से जुड़े शब्दों को कॉमेडी में शामिल करना ठीक नहीं है। उनका कहना है कि ऐसे संदर्भ भावनाओं को ठेस पहुँचा सकते हैं, भले ही इरादा कुछ और हो।

एक यूजर ने लिखा, “वह बिहार की रहने वाली है, लेकिन उसने अपनी पूरी जिंदगी मुंबई में आराम और अमीरी में बिताई है। शुरू में, उसने ध्यान खींचने और फॉलोअर्स पाने के लिए ‘पारिवारिक संघर्षों’  का कार्ड खेला। अब? उसने सारी हदें पार कर दी हैं, खुलेआम नरसंहार का मजाक उड़ा रही है और अकल्पनीय इंसानी दुख को एक तमाशा बना रही है। यह सोची-समझी परफॉर्मेंस है, इज्जत और इंसानियत की भावना की कीमत पर एक खास ऑडियंस को खुश करने की रणनीति है।”

वहीं एक अन्य यूजर ने लिखा, “नरसंहार को मजाक बनाना कॉमेडी नहीं है, यह घटियापन है। शैरन वर्मा ने दर्शकों को खुश करने के लिए फिलिस्तीनियों की मौत का मजाक उड़ाया। इतिहास ऐसे लोगों को याद रखता है।”

एक अन्य ने लिखा, “वह शैरन वर्मा हैं, जो मूल रूप से बिहार की रहने वाली हैं। कोई बुरा न माने, लेकिन जोकरों के ग्रुप से समझदारी या हमदर्दी की उम्मीद करना बेकार है।
वह पूरी जिंदगी मुंबई में रही हैं, उन्हें सारी सुविधाएँ मिली हैं, वह अमीर और आरामदायक जिंदगी जीती हैं।”

शैरन के समर्थन में क्या कह रहे यूजर्स?

शैरन वर्मा के समर्थन में उतरे लोगों का कहना है कि इस पूरे जोक को गलत संदर्भ में देखा जा रहा है। उनके मुताबिक, शैरन ने न तो फिलिस्तीन पर कोई टिप्पणी की और न ही किसी समुदाय या धर्म को निशाना बनाया।

समर्थकों का तर्क है कि शैरन का इशारा केवल उस दोहरी मानसिकता की ओर था, जिसमें एक व्यक्ति समानता और इंसानियत की बात करता है, लेकिन महिलाओं को लेकर पुरानी और अपमानजनक सोच रखता है। इसी पाखंड को उजागर करना उनके जोक का असली मकसद था।

एक यूजर ने शैरन का समर्थन करते हुए पोस्ट में लिखा, “शैरन वर्मा ने फिलिस्तीन का मजाक नहीं उड़ाया, उन्होंने ‘फ्री फिलिस्तीन’ बायो के पाखंड को उजागर किया। @Muslim_ITCell जैसे इस्लामी ट्रोलर्स ने उसी तरीके से जवाब दिया जो वे जानते हैं, यानी गाली-गलौज, धमकियाँ, सिर्फ नफरत। याद है जब मुनव्वर फारुकी ने गोधरा दंगों पर मजाक बनाया था लेकिन मुनव्वर फारुकी एक सेलिब्रिटी हैं, शैरन वर्मा लगातार खतरे में हैं। इस्लाम का अपमान करना ईशनिंदा है, हिंदू धर्म का अपमान करना कॉमेडी है। सभ्य दुनिया को उनके समर्थन में आना चाहिए, नहीं तो कोई सभ्यता नहीं बचेगी याद रखें नूपुर शर्मा के साथ क्या हुआ था।”

इसी तरह एक अन्य यूजर ने शैरन का समर्थन करते हुए लिखा, “शैरन वर्मा ने अपने वीडियो में किसी भी समुदाय का मजाक नहीं उड़ाया। वह बस उन नेगेटिव कमेंट्स के खिलाफ़ अपना स्टैंड ले रही हैं जो उन्हें रोजाना अपने वीडियो पर मिलते हैं। लेकिन लेफ्ट लॉबी के अकाउंट्स और पेड आईटी सेल ने उस हिस्से को एडिट किया और बिना किसी वजह के उनका मजाक उड़ाना शुरू कर दिया।”

एक यूजर ने लिखा, “इस्लामवादी उसे निशाना बना रहे हैं लेकिन शैरन वर्मा ने कभी फिलिस्तीन का मजाक नहीं उड़ाया, उसने बस बायो में ‘फ्री फिलिस्तीन’ का पाखंड उजागर किया, जो महिलाओं को कोसने वाले महिला विरोधी लूजर हैं।”

इस पूरे मामले में दिलचस्प बात यह है कि शैरन वर्मा के पीछे वो इस्लामी कट्टरपंथी पड़े है, जिन्हें मुनव्वर फारूकी की हिंदू घृणा से सनी बातें कभी कॉमेडी लगा करती थी। इसी इकोसिस्टम ने मुनव्वर फारूकी को तब सपोर्ट किया था, जब उसने सरेआम गोधरा पर कारसेवकों के नरसंहार पर मजाक उड़ाया और जब माता सीता को लेकर अभद्र बातें कही थी।

उस वक्त इन्हें फ्रीडम ऑफ स्पीच जैसे अधिकार याद आ रहे थे, लेकिन शैरन के मामले में जहाँ उन्होंने किसी का मजाक नहीं उड़ाया। सिर्फ एक ट्रोलर को अपनी भाषा में पलटकर जवाब दिया है, वहाँ इस भीड़ को ऐसा लग रहा है कि उन्होंने गाजा में मारे जा रहे लोगों का मखौल उड़ा दिया।

शेख हसीना पर किया हमला, मनी लॉन्ड्रिंग केसों में फरार: जानिए कौन है 17 साल बाद बांग्लादेश लौटा तारिक रहमान, कट्टरपंथ से है कट्टर रिश्ता

कट्टरपंथी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के 60 साल के कार्यकारी चेयरमैन तारिक रहमान की वतन वापसी हुई है। रहमान को इस्लामी ग्रुप जमात-ए-इस्लामी का समर्थन मिल रहा है। देश में फरवरी 2026 के चुनाव में बीएनपी उनके नेतृत्व में चुनाव लड़ने जा रही है। इसको देखते हुए 25 दिसंबर 2025 को वे ढाका पहुँच गए हैं। वह लगभग 17 साल तक लंदन में अपनी इच्छा से ‘निर्वासन’ की जिंदगी जीते रहे हैं।

तारिक रहमान बांग्लादेश एयरलाइंस की फ्लाइट BG-202 से हीथ्रो एयरपोर्ट से बांग्लादेश पहुँचे। उनकी पत्नी डॉ. जुबैदा रहमान और बेटी जैमा रहमान भी उनके साथ थी। उनके स्वागत के लिए बड़ी संख्या में समर्थक एयरपोर्ट पर मौजूद थे। हालाँकि तारिक ने 16 दिसंबर को लंदन में विक्ट्री डे इवेंट में लोगों से आग्रह किया था कि वे एयरपोर्ट पर न आएँ। उन्होंने कहा था कि जो लोग इस रिक्वेस्ट का सम्मान करेंगे, वे पार्टी और देश का सम्मान करेंगे।”

बांग्लादेश की राजनीति का ‘क्राउन प्रिंस’

तारिक देश के आर्मी कमांडर और पूर्व राष्ट्रपति जियाउर रहमान और पूर्व प्राइम मिनिस्टर खालिदा ज़िया के सबसे बड़े बेटे हैं। खालिदा तीन बार प्रधानमंत्री बनीं और फिलहाल BNP की चेयरमैन हैं। तारिक को बांग्लादेशी पॉलिटिक्स का ‘क्राउन प्रिंस’ कहा जाता है।

तारिक का जन्म 20 नवंबर 1967 को हुआ था। उस वक्त बांग्लादेश पूर्वी पाकिस्तान के नाम से जाना जाता था। 1971 की आज़ादी की लड़ाई के दौरान उन्हें बचपन में कुछ समय के लिए जेल में रखा गया था। BNP अक्सर उनकी तारीफ में बचपन में जेल जाने पर जोर देती है। उन्हें ‘सबसे कम उम्र के युद्धबंदियों में से एक’ कहती है।

उनके पिता जियाउर रहमान 1975 में बांग्लादेश में हुए तख्तापलट के बाद सत्ता में आए। उस वक्त वे सेना प्रमुख थे। उन्होंने शेख हसीना के पिता और राष्ट्रपिता शेख मुजीबुर रहमान की तख्तापलट की थी। इस दौरान उनकी हत्या की गई थी। इस हत्या ने जिया और शेख हसीना के बीच दशकों से चली आ रही दुश्मनी को जन्म दिया। इस दुश्मनी को ‘बैटल ऑफ द बेगम्स’ भी कहा जाता है।

जिया उर रहमान 1977 से 1981 तक राष्ट्रपति रहे। उन्होंने बीएनपी की स्थापना की थी। 1981 में चटगाँव के एक सैन्य विद्रोह के दौरान उनकी हत्या कर दी गई।

तारिक 15 साल के थे जब जियाउर रहमान की हत्या हुई थी। 1980 के दशक में BAF शाहीन कॉलेज से अपनी अंडरग्रेजुएट पढ़ाई पूरी करने के बाद ढाका यूनिवर्सिटी के उन्होंने इंटरनेशनल रिलेशंस डिपार्टमेंट में एडमिशन लिया। फिर वह 23 साल की उम्र में BNP में शामिल हो गए। उन्होंने हुसैन मुहम्मद इरशाद के मिलिट्री शासन के खिलाफ प्रदर्शनों में हिस्सा लिया। हालाँकि उनका करियर काफी विवादों में रहा और कई गंभीर आरोप भी लगे।

2006 के यूनाइटेड स्टेट्स एम्बेसी केबल के मुताबिक, तारिक को BNP का ‘उत्तराधिकारी’ कहा गया था, जिससे पार्टी का ही एक धड़ा सहमत नहीं था। क्योंकि तारिक रहमान को ‘बहुत ज्यादा भ्रष्ट’ और ‘पीछे से सरकार चलाने वाला’ कहा जाता था। देश में हुए हिंसक वारदातों में भी उसका नाम आया।

1991 के नेशनल इलेक्शन कैंपेन में तारिक ने माँ खालिदा जिया के लिए काफी मेहनत की और जीत में अहम भूमिका निभाई थी। शेख हसीना के शासनकाल में 1996 से 2001 तक अवामी लीग के शासन के दौरान दबे-कुचले लोगों को न्याय दिलाने के बहाने सरकार के खिलाफ़ कई रैलियाँ कीं।

खुद से ‘देश निकाला देने वाला’ राजनीतिक वारिस

तारिक BNP के कार्यकारी चेयरपर्सन हैं। 2000 के दशक की शुरुआत से ही उन्हें अपनी मां का राजनीतिक वारिस माना जाता है। हालाँकि बांग्लादेश के राजनीतिक उथल-पुथल की वजह से उनका करियर बिखर गया था। 2007 में भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के दौरान उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें 18 महीने जेल में रहना पड़ा। BNP नेता को 3 सितंबर 2008 को जमानत मिली, जिसके बाद वह तुरंत इलाज के लिए UK चले गए और तब से अपने परिवार के साथ वहीं रह रहे हैं। उन्हें कई मामलों में दोषी माना गया।

मनी लॉन्ड्रिंग से लेकर शेख हसीना की रैली में ग्रेनेड फेंकने का आरोप

2016 में बांग्लादेश के हाई कोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग के लिए उन पर 200 मिलियन टका यानी 14.50 करोड़ से ज्यादा का जुर्माना लगाया गया और 7 साल जेल की सजा हुई। इस फ़ैसले ने ढाका कोर्ट के 2013 के उस फ़ैसले को पलट दिया, जिसमें तारिक को बरी कर दिया गया था। उन पर आरोप था कि सिंगापुर में उन्होंने और उनके एक साथी ने 2003 और 2007 के बीच $2.5 मिलियन यानी करीब 20 करोड़ रुपए से ज्यादा का गबन किया था।

एंटी-करप्शन कमीशन ने उनके और उनके करीबी दोस्त गियासुद्दीन अल मामून के ख़िलाफ़ 12 शिकायतें दर्ज की थीं। ढाका की एक स्पेशल कोर्ट ने 10 अक्टूबर 2018 को उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई थी। कोर्ट ने उन्हें 21 अगस्त 2004 को ढाका में हुए एक ग्रेनेड धमाके के सिलसिले में मर्डर और क्रिमिनल कॉन्सपिरेसी के कई आरोपों में दोषी पाया था, इसमें 24 लोग मारे गए थे और शेख हसीना घायल हो गई थीं। यह हमला उस समय हुआ जब खालिदा जिया देश की प्रधानमंत्री थीं।

दिलचस्प बात यह है कि बांग्लादेश सुप्रीम कोर्ट के अपील डिवीज़न ने पिछले साल 5 अगस्त को हसीना सरकार गिरने के एक महीने से भी कम समय में तारिक और दूसरों को इस मामले में बरी करने वाले हाई कोर्ट के फैसले को सही ठहराया।

हिंदुओं से नफ़रत और भारत में आतंकियों को हथियार सप्लाई में भूमिका

लंदन में रहते हुए तारिक रहमान ने सोशल मीडिया और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए BNP के कामकाज में बतौर कार्यकारी चेयरपर्सन, अहम भूमिका निभाते रहे हैं।

BNP के इस वारिस ने अपनी राजनीति कार्यकलाओं में हिंदूफोबिया दिखाया है और पवित्र ग्रंथों का अपमान किया है। उन्होंने 2023 में एक फेसबुक लाइव में कहा, “हिंदू धर्म के ग्रंथ कोई नैतिक शिक्षा नहीं देते… सभी धार्मिक ग्रंथ अश्लील हैं।” तारिक के गोनो अधिकार परिषद के संयोजक नूरुल हक नूर के साथ अच्छे रिश्ते थे। नुरुल हर हाल में शेख हसीना को हटाना चाहते थे।

नूर ने सऊदी अरब से एक Facebook Live में कहा था, “हाँ, मैंने मोसाद समेत विदेशी इंटेलिजेंस एजेंसियों के साथ मिलकर साज़िश की है। सरकार को हटाने की अपनी कोशिश में, मैंने मोसाद के एजेंट मेंडी एन सफादी के साथ मीटिंग की, ताकि इस सरकार को हटाने की साजिश रची जा सके।” शेख हसीना की सरकार के खिलाफ षड़यंत्र करने और अमेरिका की भूमिका पर अक्सर सवाल उठते हैं।

भारत की डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी (DIA) के रिटायर्ड डिप्टी डायरेक्टर जनरल मेजर जनरल गगनजीत सिंह ने खुलासा किया कि अप्रैल 2004 में चटगाँव में हथियारों से भरे दस ट्रक ज़ब्त किए गए। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) और जमात गठबंधन भारत में मिलिटेंट ग्रुप्स की इन हथियारों से मदद कर रहे थे।

ढाका जेल में बंद ULFA लीडर अनूप चेतिया उर्फ़ गोलाप बरुआ ने खुलासा किया कि यह भारी गोला-बारूद बैन यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ़ असम (ULFA) और उत्तर-पूर्वी भारत में इसी तरह के दूसरे संगठनों के लिए देश को अस्थिर करने के लिए था।

इंडिया टुडे से बात करते हुए सिंह ने कहा कि चेतिया ‘डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ़ फोर्सेज़ इंटेलिजेंस’ (DGFI) और कुछ नेशनल सिक्योरिटी इंटेलिजेंस (NSI) अधिकारियों के साथ मिलकर काम कर रहा था। चेतिया के तारिक रहमान (BNP के मौजूदा एक्टिंग चेयरमैन) और उनके साथियों के साथ करीबी रिश्ते थे।

2001-2006 के बीच बीएनपी सत्ता में थी। उस वक्त भारत विरोधी गतिविधियों को बांग्लादेश में अंजाम दिया गया। आतंकवादियों को पनाह देने की वजह से भारत-बांग्लादेश के रिश्तों में खटास आई थी। दरअसल 2004 में जो 10 ट्रक चटगाँव में मिले थे। उनमें हथियार भरे हुए थे।

BNP-जमात गठबंधन सरकार (2001–2006) के दौरान हवा भवन (BNP का पॉलिटिकल ऑफिस) आतंकियों की मदद के लिे सबसे सुरक्षित, ताकतवर और दूसरे पावरहाउस के तौर पर जाना जाता था। तारिक ने अपने बहुत ध्यान से चुने हुए ‘धोखेबाज़’ भरोसेमंद लोगों के ग्रुप के साथ मिलकर कई गलत योजनाओं को अंजाम दिया, जिसमें उस समय विपक्ष की नेता शेख हसीना पर ग्रेनेड हमला भी शामिल था।

इसके अलावा लश्कर-ए-तैयबा के आतंकवादियों की मदद करने और उन्हें हथियारों की खेप पहुँचाने के लिए पाकिस्तानी आईएसआई के साथ मिलकर काम किया था। प्लानिंग स्टेज की मीटिंग्स में भी बीएनपी नेता मौजूद थे।

भारत समेत पूरी दुनिया की नजर

अशांति के बीच 17 साल बाद तारिक रहमान की वापसी से बांग्लादेश की पॉलिटिक्स में बड़े बदलाव की झलक दिख रही है। भारत समेत पूरी दुनिया देख रही है कि इलेक्शन के बाद बांग्लादेश की फॉरेन पॉलिसी में कितना बदलाव हो सकता है। उस्मान हादी की मौत के बाद बांग्लादेश में राजनीति हालात काफी खराब हैं। हादी के परिवार और समर्थकों ने भी उसकी मौत के लिए यूनुस प्रशासन को जिम्मेदार ठहराया है।

कई पॉलिटिकल एनालिस्ट्स के मुताबिक, अगले साल बांग्लादेश इलेक्शन में BNP की वापसी लगभग तय है। अगर BNP जीतती है तो तारिक रहमान प्राइम मिनिस्टर होंगे। हालाँकि, राजनीतिक, आर्थिक और संस्थागत तनावों के बीच बांग्लादेश को आगे ले जाने में उन्हें कई मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा।

तारिक रहमान की वतन वापसी को देखते हुए बांग्लादेश में काफी हलचल है। अपने तीन दिवसीय कार्यक्रम में तारिक अपनी बीमार माँ और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया से मिलने जाएँगे। इसके अलावा उस्मान हादी की कब्र पर भी जा सकते हैं। इसलिए राजनीतिक विश्लेषक तारिक रहमान की इस वापसी को चुनावी रणनीति के तौर पर भी देख रहे हैं।

(मूल रूप से ये लेख अंग्रेजी में लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

अशोक गहलोत सरकार लाई जो एथेनॉल फैक्ट्री, उसी को पर्यावरण के नाम पर करा दिया बंद: जानें- कैसे राजस्थान की इंडस्ट्रीज को बर्बाद कर रही कॉन्ग्रेस

राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में प्रस्तावित 450 करोड़ रुपए की एथेनॉल फैक्ट्री अब नहीं लगेगी। चंडीगढ़ की कंपनी ड्यून एथेनॉल प्राइवेट लिमिटेड द्वारा लगाई जानी यह परियोजना एक समय राजस्थान के औद्योगिक विकास की मिसाल बनने वाली थी। लेकिन कॉन्ग्रेस पार्टी की विध्वंसक नीतियों और राजनीतिक खेल ने इसे विवाद की भेंट चढ़ा दिया।

पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार ने इस परियोजना को मंजूरी दी थी, लेकिन सत्ता से बाहर होते ही कॉन्ग्रेस नेताओं ने इसे राजनीतिक हथियार बना लिया। नतीजा यह हुआ कि किसानों के नाम पर हिंसक विरोध प्रदर्शन हुए, तोड़फोड़ हुई और अब यह बड़ा निवेश राजस्थान से भाग गया। इससे न केवल हनुमानगढ़ का इंडस्ट्रियल हब बनने का सपना टूट गया, बल्कि पूरे राज्य के विकास को गहरा झटका लगा है।

कॉन्ग्रेस की नीतियों से ₹450 करोड़ का प्रोजेक्ट राजस्थान से बाहर

यह परियोजना हनुमानगढ़ के टिब्बी क्षेत्र के राठीखेड़ा गाँव (चक 5 आरके राठीखेड़ा) में लगभग 45 एकड़ भूमि पर स्थापित होने वाली थी। कंपनी का प्लान था कि यहाँ 1,320 किलोलीटर प्रति दिन (केएलपीडी) क्षमता वाला अनाज-आधारित एथेनॉल संयंत्र और 24.5 मेगावाट का बिजली संयंत्र लगेगा।

यह फैक्ट्री चावल के भूसे से एथेनॉल बनाती, जो पर्यावरण के लिए फायदेमंद है क्योंकि एथेनॉल पेट्रोल का साफ-सुथरा विकल्प माना जाता है। इससे स्थानीय किसानों को भूसा बेचने का अच्छा दाम मिलता, सैकड़ों नौकरियाँ पैदा होतीं और क्षेत्र में आर्थिक समृद्धि आती। लेकिन कॉन्ग्रेस की राजनीति ने सब कुछ बर्बाद कर दिया।

कॉन्ग्रेस सरकार से शुरू हुआ प्रोजेक्ट, कॉन्ग्रेस की राजनीति ने निगला

यह पूरी कहानी 2022 से शुरू होती है। उस समय अशोक गहलोत की कॉन्ग्रेस सरकार सत्ता में थी। ‘राइजिंग राजस्थान’ अभियान के दौरान इस परियोजना के लिए समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर हुए। 2023 में कॉन्ग्रेस सरकार ने ही सभी कानूनी औपचारिकताएँ पूरी कीं। औद्योगिक रूपांतरण, भूमि पंजीकरण और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड समेत सभी विभागों से मंजूरी ली गई। सब कुछ ठीक चल रहा था। कंपनी ने निवेश की तैयारी शुरू कर दी थी। लेकिन जैसे ही 2023 के अंत में भाजपा सरकार आई, कॉन्ग्रेस ने अपना असली रंग दिखाना शुरू कर दिया।

विपक्ष में बैठी कॉन्ग्रेस ने इस परियोजना को किसानों के खिलाफ बताकर विरोध शुरू करवा दिया। अगस्त 2024 से राठीखेड़ा गाँव में किसानों ने विरोध प्रदर्शन शुरू किए। लेकिन असल में यह विरोध किसानों की वाजिब चिंताओं से ज्यादा कॉन्ग्रेस की राजनीति से प्रेरित था। 19 नवंबर 2025 को प्रशासन और पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर किया, तो तनाव बढ़ गया। कुछ लोग गिरफ्तार हुए।

फिर 10 दिसंबर 2025 को टिब्बी में एक महापंचायत हुई, जो हिंसक हो गई। प्रदर्शनकारियों ने वाहनों में आग लगाई, तोड़फोड़ की। पुलिस के साथ झड़प हुई। इस घटना में कॉन्ग्रेस के विधायक, सांसद और सीपीआई के पूर्व विधायक समेत 100 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई।

कॉन्ग्रेस नेता जैसे संगरिया के विधायक अभिमन्यु पूनिया और बलवान पूनिया ने इस घटना को ‘सरकारी साजिश’ बताकर भाजपा सरकार पर हमला बोला। उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कहा कि भाजपा कॉरपोरेट्स की गुलाम है और किसानों पर लाठियाँ चलवा रही है। लेकिन सच्चाई यह है कि कॉन्ग्रेस खुद इस एथेनॉल फैक्ट्री प्रोजेक्ट की जड़ है। गहलोत सरकार ने मंजूरी दी और फिर सत्ता खोते ही इसे राजनीतिक मुद्दा बना दिया। बाहरी तत्वों और कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने मिलकर आंदोलन को हिंसक बनाया, ताकि भाजपा सरकार बदनाम हो।

किसानों को पानी और हवा के प्रदूषित होने का डर, लेकिन समाधान भी मौजूद

किसान विरोध के मुख्य कारण बताते हैं पानी की कमी और प्रदूषण का खतरा। हनुमानगढ़ सूखाग्रस्त क्षेत्र है। यहाँ भूजल स्तर 100 फीट से नीचे चला गया है। किसान कुओं और नहरों पर निर्भर हैं। फैक्ट्री को रोजाना 50-60 लाख लीटर पानी की जरूरत पड़ती। चावल आधारित एथेनॉल प्लांट में प्रति लीटर एथेनॉल के लिए काफी पानी खर्च होता है। किसानों का डर है कि इससे खेत सूख जाएँगे, फसलें मरेंगी।

दूसरा मुद्दा प्रदूषण का। एथेनॉल प्लांट्स को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने ‘रेड कैटेगरी’ में रखा है। प्रक्रिया में ‘स्पेंट वॉश’ नाम का जहरीला तरल निकलता है, जो अगर ठीक से ट्रीट न हो तो भूजल और मिट्टी को बर्बाद कर सकता है। बॉयलर से धुआँ और राख निकलती है, किण्वन से दुर्गंध फैलती है। किसान कहते हैं कि हवा में जहर घुलेगा, साँस की बीमारियाँ और कैंसर बढ़ेगा। उनका आरोप है कि पर्यावरण जाँच (ईआईए) में गड़बड़ी हुई।

न खेती खराब होगी, न जल दूषित होगा- बस योजनाओं के सही से लागू होने की जरूरत

लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि ये समस्याएँ हल हो सकती हैं। सरकार ने एथेनॉल प्लांट्स के लिए जीरो लिक्विड डिस्चार्ज (जेडएलडी) तकनीक अनिवार्य कर दी है। इसका मतलब है कि फैक्ट्री से एक बूँद भी गंदा पानी बाहर नहीं निकलेगा। पानी को रिसाइकिल किया जाएगा, बचा ठोस कचरा पशु आहार बनाकर बेचा जाएगा। हवा के लिए इलेक्ट्रोस्टैटिक प्रेसिपिटेटर्स (ईएसपी) लगाए जाते हैं, जो राख रोकते हैं। ऑनलाइन मॉनिटरिंग सिस्टम से केंद्रीय बोर्ड सीधे निगरानी करता है। अगर ईमानदारी से नियम मानें तो न खेती खराब होगी, न पानी दूषित होगा।

समस्या यह है कि कॉन्ग्रेस ने इन समाधानों पर बात करने की बजाय विरोध को भड़काया। अगर स्थानीय लोग निगरानी समिति बनाते और कंपनी से स्थानीय नौकरियाँ माँगते, तो यह परियोजना सफल हो सकती थी। लेकिन राजनीति ने सब बिगाड़ दिया।

सत्ता में मंजूरी, विपक्ष में विरोध: कॉन्ग्रेस की दोहरी नीति उजागर

अशोक गहलोत की कॉन्ग्रेस सरकार ने 2023 में इस परियोजना को पूरी मंजूरी दी। तब कॉन्ग्रेस इसे विकास का प्रतीक बताती थी। लेकिन चुनाव हारते ही रुख बदल गया। कॉन्ग्रेस नेता अब कहते हैं कि भाजपा किसानों की दुश्मन है। लेकिन एफआईआर में कॉन्ग्रेसियों के ही नाम हैं। यह साफ दिखाता है कि कॉन्ग्रेस ने बाहरी तत्वों के साथ मिलकर आंदोलन को हिंसक बनाया। उनका मकसद सिर्फ भाजपा सरकार को बदनाम करना था, विकास नहीं।

इस राजनीति की वजह से कंपनी ने फैक्ट्री कहीं और लगाने का फैसला किया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, परियोजना अब राजस्थान से बाहर जा रही है।

एक फैक्ट्री गई, दस नहीं आएँगी… ये राजस्थान का ही बड़ा नुकसान

यह सिर्फ एक फैक्ट्री का मामला नहीं है। उद्योग जगत में कहावत है कि एक फैक्ट्री आने से दस और आती हैं। हनुमानगढ़ इंडस्ट्रियल हब बन सकता था। यहाँ कृषि अवशेष भरपूर हैं, एथेनॉल प्लांट के लिए परफेक्ट जगह। इससे हजारों नौकरियाँ, किसानों को अतिरिक्त आय और राज्य को राजस्व मिलता। लेकिन कॉन्ग्रेस की विध्वंसक नीतियों ने सब चौपट कर दिया।

टिब्बी के प्रधान का दावा है कि इसी जगह पर कोको-कोला या पेप्सी जैसी बड़ी कंपनी भी फैक्ट्री लगाने वाली थी। इसके लिए हनुमानगढ़ के डीएम से संपर्क हुआ था। एथेनॉल फैक्ट्री के प्रोजेक्ट की फाइल पर भी इन्हीं प्रधान का नाम और नंबर दर्ज है। लेकिन एथेनॉल फैक्ट्री के बवाल की वजह से प्रशासन ने हाथ खड़े कर दिए। ऐसे में जो कंपनियाँ हनुमानगढ़ आने वाली थी, अब वो कंपनियाँ भी नहीं आएंगी। इस एक प्रोजेक्ट के बाहर जाने से कई अन्य निवेश रुक जाएँगे। इससे पूरे राजस्थान की अर्थव्यवस्था को झटका लगेगा। राज्य में बेरोजगारी बढ़ेगी तो युवा भी पलायन को मजबूर होंगे

राजनीति छोड़कर विकास पर दें ध्यान

हनुमानगढ़ एथेनॉल फैक्ट्री विवाद कॉन्ग्रेस की राजनीतिक महत्वाकांक्षा का शिकार बना है। अशोक गहलोत और उनकी पार्टी ने सत्ता में रहते मंजूरी दी, बाहर रहते विरोध भड़काया। नतीजा यह निकला कि ₹450 करोड़ का निवेश चला गया। राजस्थान को इंडस्ट्रियल ग्रोथ का मौका खोना पड़ा।

जरूरत है कि राजनीतिक पार्टियाँ किसानों की वाजिब समस्याओं का समाधान निकालें, न कि उन्हें भड़काएँ। निगरानी समिति बनाकर, नियमों का सख्त पालन सुनिश्चित करके ऐसे प्रोजेक्ट्स को सफल बनाया जा सकता है। लेकिन कॉन्ग्रेस जैसी विध्वंसक सोच जबतक ताकतवर बनी रहेगी, तबतक राजस्थान का इंडस्ट्रियल ग्रोथ पीछे जाता रहेगा।

यह घटना सबक है कि राजनीति विकास के रास्ते में रोड़ा न बने। उम्मीद है कि राज्य सरकार इस नुकसान से सीख लेगी और भविष्य में ऐसे निवेशों को सुरक्षित रखेगी।

दलित अस्मिता की पहचान, सनातन संस्कृति के संरक्षक: जानिए कौन थे महाराजा बिजली पासी, जिनके किलों का पुनरुद्धार कराने में जुटी योगी सरकार

महाराजा बिजली पासी की जयंती हर साल 25 दिसंबर को धूम-धाम से मनाई जाती है। उन्हें उत्तर प्रदेश समेत पूरे देश में बहुजन नायक और दलित गौरव का प्रतीक माना जाता है। उनकी जयंती पर लोग उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके शौर्य, पराक्रम और सनातन परंपरा की रक्षा में दिए गए योगदान को याद करते हैं।

लखनऊ के महान योद्धा महाराजा बिजली पासी ने विदेशी आक्रांताओं और हुकूमतों के खिलाफ डटकर संघर्ष किया और सनातन संस्कृति को अक्षुण्ण बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई। अब यूपी सरकार महाराजा बिजली पासी के किलों के पुनरुद्धार के लिए निरंतर कार्य कर रही है और उनसे जुड़ी वीर परंपरा को आगे बढ़ाने वाले सभी महापुरुषों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त कर रही है।

अवध के स्वतंत्र शासक: 12वीं सदी के स्वाभिमानी राजा

इतिहासकारों के अनुसार, महाराजा बिजली पासी 12वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में अवध प्रांत के बिजनौरगढ़ के शक्तिशाली और स्वतंत्र शासक थे। उनका शासनकाल लगभग 1148 ईस्वी से 1184 ईस्वी तक माना जाता है। उस समय अवध का यह क्षेत्र राजनीतिक और सैन्य दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था।

महाराजा बिजली पासी ने किसी भी बड़े साम्राज्य या राजा की अधीनता स्वीकार नहीं की और एक स्वतंत्र सत्ता के रूप में अपने राज्य का संचालन किया। उनका शासन इस बात का प्रमाण है कि उस दौर में दलित समाज केवल शोषण का शिकार नहीं था, बल्कि उसने शासन किया, युद्ध जीते और अपनी राजनीतिक पहचान बनाई।

माता-पिता की स्मृति में नगर और किलों की स्थापना

महाराजा बिजली पासी के पिता का नाम नथावन देव और माता का नाम बिजना था। उन्होंने सबसे पहले अपनी माता की स्मृति में ‘बिजनागढ़’ की स्थापना की, जो आगे चलकर बिजनौरगढ़ कहलाया और आज के बिजनौर क्षेत्र के रूप में जाना जाता है।

इसके बाद उन्होंने अपने पिता की याद में बिजनौरगढ़ से लगभग तीन किलोमीटर उत्तर दिशा में ‘नथवागढ़’ की स्थापना की। यह केवल नगर निर्माण नहीं था, बल्कि अपने वंश, परिवार और सांस्कृतिक जड़ों को सम्मान देने की उनकी सोच को दर्शाता है। इन नगरों और किलों के माध्यम से उन्होंने अपने राज्य को संगठित और सुदृढ़ किया।

12 किले और सैन्य शक्ति का विस्तार

इतिहास में उल्लेख मिलता है कि महाराजा बिजली पासी ने अपने शासनकाल में कुल 12 किलों का निर्माण कराया था। ये किले उनकी मजबूत सैन्य रणनीति और दूरदर्शिता का प्रमाण थे। उस दौर में किलों का निर्माण किसी भी राज्य की शक्ति, सुरक्षा और प्रभाव का प्रतीक माना जाता था।

राजा बिजली पासी किला, कर्नल हडसन द्वारा बनाया गया चित्र (फोटो साभार: everybodywiki)

इन किलों ने न केवल उनके राज्य की सीमाओं की रक्षा की, बल्कि आसपास के क्षेत्रों में उनके प्रभाव को भी स्थापित किया। आज भी इन किलों के अवशेष पासी समाज और दलित वर्ग के लिए स्वाभिमान और गौरव का केंद्र हैं।

राजा जयचंद को चुनौती और वीरगति की कथा

महाराजा बिजली पासी की वीरता का सबसे चर्चित अध्याय कन्नौज के शक्तिशाली राजा जयचंद के साथ हुए युद्ध हैं। लोक कथाओं और ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, उन्होंने जयचंद की विशाल सेना को दो बार पराजित किया था। उस समय जयचंद ने कौशांबी के कड़ा क्षेत्र में किले का निर्माण कर कुछ समय तक वहाँ निवास भी किया था।

इसके बावजूद महाराजा बिजली पासी ने अपनी स्वतंत्रता बनाए रखी। माना जाता है कि वर्ष 1184 ईस्वी में गांजर के युद्ध के दौरान उन्होंने मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति प्राप्त की, हालाँकि इस विषय पर इतिहासकारों में मतभेद भी हैं। फिर भी उनका संघर्ष और पराक्रम आज भी प्रेरणा का स्रोत है।

दलित अस्मिता का प्रतीक और सरकारी सम्मान

महाराजा बिजली पासी का महत्व केवल एक योद्धा तक सीमित नहीं है। वह दलित समाज के गौरवशाली अतीत और आत्मसम्मान के प्रतीक हैं। बहुजन नायक कांशीराम के सुझाव और प्रयासों से उनकी योद्धा छवि को राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर नई पहचान मिली।

भारत सरकार ने वर्ष 2000 में उनके सम्मान में एक स्मारक डाक टिकट जारी किया, जो उनके योगदान की राष्ट्रीय मान्यता का प्रतीक है। इसके अलावा योगी आदित्यनाथ सरकार ने 27 अगस्त 2024 को निहालगढ़ रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर ‘महाराजा बिजली पासी रेलवे स्टेशन’ कर दिया था। यह कदम उनके इतिहास और योगदान को नई पीढ़ी तक पहुँचाने की दिशा में महत्वपूर्ण है।

हर वर्ष 25 दिसंबर को महाराजा बिजली पासी की जयंती पर उनके किलों और ऐतिहासिक स्थलों पर श्रद्धांजलि सभाएँ, सांस्कृतिक कार्यक्रम और सामाजिक आयोजन होते हैं। यह दिन न केवल अतीत को याद करने का अवसर है, बल्कि यह संदेश भी देता है कि स्वाभिमान, साहस और स्वतंत्रता की लड़ाई हर दौर में प्रासंगिक रहती है। महाराजा बिजली पासी की विरासत आज भी वंचित और दलित समाज को अपने अधिकारों और सम्मान के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा देती है।

हिंदुओं के लिए CM योगी ने उठाई आवाज तो पीछे पड़ी कट्टरपंथी जमात: AI वीडियो वायरल करके पाकिस्तानी-बांग्लादेशी अकॉउंट फैला रहे झूठ, जानें क्या है पूरी हकीकत

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर कुछ सोशल मीडिया हैंडल झूठ फैलाने का काम कर रहे हैं। एक वीडियो शेयर करते हुए कहा जा रहा है कि सीएम योगी ने विधानसभा में अखंड भारत राष्ट्र की माँग की है और डर दिखाया है कि आसिम मुनीर के रहते ऐसा नहीं हो सकता। इसके साथ इस वीडियो में उन्हें बांग्लादेश और आसिम मुनीर को धमकाते व प्रधानमंत्री मोदी से इस्तीफा माँगते दिखाया गया है।

देख सकते हैं कि वायरल वीडियो में योगी आदित्यनाथ का चेहरे के साथ ऑडियो चल रही है जिसमें ऐसे दिखाया जाता है जैसे वह कह रहे हैं-

“अगर बंगलादेश पाकिस्तान नहीं बना होता इस तरीके से हिंदूओं को नहीं जलाया गया होता और अगर ऐसा करता तो उसकी क्या दुर्गति होती ये वो भी जानता है। प्रधानमंत्री मोदी जी अगर आप बंगलादेश पर आक्रमण नहीं कर सकते तो प्रधानमंत्री के पद को छोड़ दीजिए। हम धर्म सैनिक अपने धर्म युद्ध से बंगलादेश को वापस अखंड भारत का हिस्सा बनाएँगे। ये सब पाकिस्तान का मुल्ला आसिम मुनीर करवा रहा है जब तक आसिम मुनीर पाकिस्तान में रहेगा तब तक भारत संकट में है हमारा आदेश है कि आसिम मुनीर को किसी भी तरह से हानी भी जानी चाहिए ताकि पाकिस्तान अपनी औकात में रहेगा”

हकीकत ये है कि योगी आदित्यनाथ ने बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार का मुद्दा उठाया जरूर था लेकिन उन्होंने इस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया ही नहीं। न उन्होंने अखंड हिंदू राष्ट्र पर कुछ कहा, न पीएम को लेकर ऐसी भाषा बोली। अब सवाल ये है कि जब सीएम योगी आदित्यनाथ ने ऐसा कहा ही नहीं, तो फिर इसे एडिट करके कौन वायरल कर रहा है?

ट्वीट और अकॉउंट की लोकेशन

असल में ये हरकत पाकिस्तानी और बांग्लादेशी नेटीजन्स की है। ऊपर की वीडियो जिस अकॉउंट से शेयर हुई है उसका नाम Global Conflict Watch है। अगर इस अकॉउंट की लोकेशन पर क्लिक करके देखेंगे तो पता चलता है कि इसे पाकिस्तान से संचालित किया जा रहा था।

इसी तरह से अन्य कट्टरपंथियों के भी ट्वीट हैं। नीचे ट्वीट पाकिस्तान के ही मुहम्मद अली तुराल का है। देख सकते हैं कि ये अकॉउंट भी सीएम योगी की एडिट वीडियो शेयर करके कैसे झूठ और भ्रम फैलाता है। तुराल लिखता है कि योगी ने कहा है कि आसिम मुनीर के रहते भारत ‘अखंड हिंदू राष्ट्र’ नहीं बन सकता।

तुराल का ट्वीट और उसके अकॉउंट की लोकेशन

एक अगला ट्वीट इगल क्लॉ का है। ये अकॉउंट भी पाकिस्तान से संचालित होता है। इसने सीएम योगी की फर्जी वीडियो साझा करके कहा है कि योगी आदित्यनाथ के बयान से पता चल रहा है कि आसिम मुनीर के कारण दिल्ली दबाव में है।

इसी तरह एक अन्य ट्वीट जाशिम का देखिए। जाशिम इस वीडियो को शेयर करते हुए इल्जाम लगाता है कि सीएम योगी सरेआम सदन में अखंड हिंदू भारत की माँग कर रहे हैं। ये जाशिम है कहाँ का, इसे भी अकॉउंट की लोकेशन से जाना जा सकता है।

ट्वीट और अकॉउंट की लोकेशन

योगी आदित्यनाथ ने कहा क्या था?

बता दें कि एक तरफ ये पाकिस्तानी और बांग्लादेशी सोशल मीडिया हैंडल्स सीएम योगी आदित्यनाथ के बयान को एडिट करके झूठ फैलाकर इस्लामी कट्टरपंथियों को केवल और अधिक उकसाने का काम कर रहे हैं। वहीं हकीकत में सीएम ने हिंदुओं का मुद्दा उठाते हुए क्या कहा है इसे लेकर भारतीय मीडिया में व्यापक रिपोर्टिंग हो चुकी है।

सीएम योगी ने विधानसभा में बांग्लादेश के हिंदुओं का मुद्दा उठाते हुए अपने भाषण में कुछ लोगों की चुप्पी पर सवाल उठाए थे। उन्होंने कहा- “गाजा के मुद्दे पर कैंडल मार्च निकालते हैं, लेकिन पाकिस्तान, बांग्लादेश में हिंदू मारा जाता है तो आपका मुँह बंद हो जाता है। मरने वाला हिंदू है इसीलिए आप नहीं बोलेंगे। बल्कि आपके लोगों को निंदा का प्रस्ताव लाना चाहिए था।”

सीएम योगी ने आगे कहा था, “नोट कर के रख लेना और याद रखिएगा जब बांग्लादेशी और रोहिंग्या को यहाँ से निकालेंगे तो उनके समर्थन में मत आना। बहुत से बांग्लादेशियों के आधार कार्ड आप लोगों ने बनवाने का पाप किया है। बहुत प्रभावी कार्रवाई करेंगे। हमारे ही देश में रहकर हमारे लोगों के ही खिलाफ अपराध और वहाँ निर्दोष हिंदू, सिखों के साथ अत्याचार हो रहा है।”

AI जनरेट है वीडियो

अब इस बयान को सुन ये तो साफ है कि वायरल वीडियो में झूठे बयान जोड़े गए हैं। इसमें अखंड भारत की बात के साथ हिंसा, युद्ध की धमकी, प्रधानमंत्री से इस्तीफ़ा की माँग, और असीम मुनीर से डर जैसी कोई बात है ही नहीं। कृत्रिम वीडियो की भाषा और अंदाज़ साफ़ बताते हैं कि यह वीडियो एआई से बदला गया है। इस कुत्सित प्रयास का मकसद सिर्फ बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों से ध्यान हटाना है।

हाल ही में बांग्लादेश में एक हिंदू व्यक्ति, दीपु दास, को झूठे ईशनिंदा के आरोप में मार दिया गया। ऐसे मामले मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार के लिए एक गंभीर शर्म की बात हैं। इसीलिए अब इस तरह के फर्जी वीडियो इसलिए फैलाए जा रहे हैं ताकि इस्लामी हिंसा से लोगों का ध्यान हटकर भारत पर आ टिके।

दीनदयाल जैसे 3 मिल जाएँ तो राजनीति बदल दूँगा, फिर मुखर्जी को मिले अटल: कहानी ‘प्रेरणा स्थल’ पर प्रज्वलित राष्ट्रवाद के तीन प्रकाश पुंज की

आज 25 दिसंबर यानी सुशासन दिवस (Good Governance Day) है। भारत रत्न पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी (Atal Bihari Vajpayee) की 101वीं जयंती है। इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘राष्ट्र प्रेरणा स्थल (Rashtra Prerna Sthal, Lucknow) देश को समर्पित किया। इस जगह पर राष्ट्रवाद के तीन प्रकाश पुंज डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पंडित दीनदयाल उपाध्याय और अटल बिहारी वाजपेयी की प्रतिमा स्थापित की गई है।

राष्ट्र प्रेरणा स्थल के बारे में जानिए

लखनऊ में गोमती नदी के तट पर राष्ट्र प्रेरणा स्थल 65 एकड़ में फैला है। इसके निर्माण पर लगभग ₹230 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं। तीनों हुतात्मा की 65 फीट ऊँची कांस्य प्रतिमा स्थापित की गई हैं। प्रत्येक प्रतिमा का वजन लगभग 42 टन है और इनके चारों ओर जल निकाय बनाए गए हैं। इस परिसर में एक अत्याधुनिक संग्रहालय कमल के फूल के आकार में बनाया गया है। य​​ह लगभग 98,000 वर्ग फुट में फैला हुआ है। इसमें कुल 5 गैलरी और 12 इंटरप्रिटेशन वॉल्स हैं, जो तीनों नेताओं के जीवन, संघर्ष और विचारधारा को समर्पित हैं।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सुशासन दिवस की पूर्व संध्या पर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को स्मरण करते हुए उन्हें भारतीय राजनीति का अजातशत्रु बताया। कहा कि अटल जी ने छह दशक तक भारतीय राजनीति को नई ऊँचाई दी। उसे मूल्यों और आदर्शों के साथ जोड़ा। ट्विटर/X पर एक पोस्ट में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राष्ट्र प्रेरणा स्थल के उद्घाटन कार्यक्रम का जिक्र करते हुए कहा है कि यह अटल बिहारी वाजपेयी, डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचारों, आदर्शों और राष्ट्रहित में समर्पित जीवन को नमन करने के साथ ही ‘नए भारत’ के निर्माण में प्रेरणादायी नेतृत्व व राष्ट्रनिष्ठा के शाश्वत मूल्यों को और अधिक सुदृढ़ करेगा।

भारत की राजनीति में डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पंडित दीनदयाल उपाध्याय और अटल बिहारी वाजपेयी का योगदान सर्वविदित है। आज जिस भारतीय जनता पार्टी को हम देखते हैं, उसकी वैचारिक जड़ें भारतीय जनसंघ में निहित हैं, जिसकी स्थापना 1951 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने की थी।

तीन दीनदयाल चाहते थे श्यामा प्रसाद मुखर्जी, मिले एक अटल

उस दौर में उनके साथ जिन प्रमुख कार्यकर्ताओं ने संगठन और विचार को दिशा दी, उनमें पंडित दीनदयाल उपाध्याय का नाम प्रमुखता से आता है। स्वयं श्यामा प्रसाद मुखर्जी सार्वजनिक रूप से कहा करते थे कि यदि उन्हें दीनदयाल उपाध्याय जैसे तीन लोग मिल जाएँ, तो वे देश की राजनीति का चेहरा बदल सकते हैं। हालाँकि श्यामा प्रसाद मुखर्जी को दीनदयाल उपाध्याय जैसे तीन तो नहीं, पर अटल बिहारी वाजपेयी के रूप में एक ऐसा व्यक्तित्व अवश्य मिला, जिसकी वैचारिक स्पष्टता और संगठन क्षमता ने जनसंघ और बाद में बीजेपी को मजबूती दी।

किंग्शुक नाग की पुस्तक Atal Bihari Vajpayee: A Man for All Seasons के 28वें पृष्ठ पर य​ह कहानी दर्ज है

इसी वैचारिक यात्रा में अटल बिहारी वाजपेयी का उदय होता है। 1950 के दशक में अटल जी ‘पांचजन्य’ और ‘राष्ट्रधर्म’ जैसी पत्रिकाओं में संपादक के रूप में कार्य कर रहे थे। पंडित दीनदयाल उपाध्याय उनके लेखन और वैचारिक परिपक्वता को निकटता से देखते-परखते थे। जैसे हीरे की पहचान जौहरी करता है, वैसे ही अटल बिहारी वाजपेयी जैसे हीरे को दीनदयाल उपाध्याय ने पहचाना और उनका परिचय श्यामा प्रसाद मुखर्जी से कराया। इसके बाद अटल जी ने लंबे समय तक श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सहायक के रूप में कार्य किया, और वह भी कश्मीर जैसे संवेदनशील विषय पर।

किंग्शुक नाग की पुस्तक Atal Bihari Vajpayee: A Man for All Seasons के 18वें पृष्ठ पर य​ह कहानी दर्ज है

यही कारण है कि आगे चलकर जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने, तो कश्मीर का प्रश्न उनके कार्यकाल का सबसे गंभीर और संवेदनशील मुद्दा रहा। उनका दृष्टिकोण टकराव नहीं, संवाद और समाधान पर आधारित था, जो उनकी वैचारिक परवरिश और राजनीतिक अनुभव का परिणाम था।

अटल जी पर पंडित दीनदयाल उपाध्याय के ‘एकात्म मानववाद’ दर्शन का भी गहरा प्रभाव रहा। समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुँचाने की सोच, चाहे वह ग्रामीण भारत को मुख्यधारा से जोड़ना हो, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना हो या सर्व शिक्षा अभियान, अटल बिहारी वाजपेयी की इन सभी पहलों में दीनदयाल उपाध्याय के विचारों की स्पष्ट छाप दिखाई देती है।

श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दीनदयाल उपाध्याय और अटल बिहारी वाजपेयी, इन तीनों ने जिस भारत का सपना देखा, उसके लिए उन्होंने अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया। आज का ‘नया भारत’ न केवल उनके आदर्शों पर आगे बढ़ रहा है, बल्कि उनके अधूरे सपनों को भी साकार कर रहा है। आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में कश्मीर का भारत के साथ सशक्त और स्थायी एकीकरण इस बात का प्रमाण है कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जिस राष्ट्रीय चेतना का बीज अपने जीवनकाल में बोया था, वह आज अपने स्वाभाविक निष्कर्ष तक पहुँची है।

बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहा अत्याचार, डेढ़ साल से मौन है यूनुस सरकार: समझिए ‘दीपू चंद्र दास’ को इंसाफ दिलाने का क्यों चल रहा दिखावा, भीतर बसा है ‘कट्टरपंथ’

बांग्लादेश में हिंदुओं के घरों पर हमला हुआ यूनुस सरकार कुछ नहीं कर सकी। बांग्लादेश में हिंदू महिलाओं का रेप हुआ यूनुस सरकार कुछ नहीं कर सकी। बांग्लादेश में हिंदुओं के देवी-देवताओं का अपमान हुआ, मंदिर टूटे युनूस सरकार कुछ नहीं कर सकी। बांग्लादेश में एक हिंदू युवक को सरेआम जलाकर फूँक दिया गया तब भी यूनुस सरकार कुछ नहीं कर सकी…।

यूनुस सरकार हर उस मुद्दे पर चुप रही जो हिंदुओं के उत्पीड़न से जुड़े हुए थे, मगर, अब दुनिया को दिखाने के लिए अचानक उन्हें दीपू चंद्र दास याद आ रहे हैं। कारण- जग में हो रही थू-थू है।

16-17 दिसंबर 2025 को बांग्लादेश में जब उस्मान हादी की हत्या की नाराजगी लेकर इस्लामी कट्टरपंथी सड़कों पर उतरे तो उनका ये गुस्सा 18 दिसंबर 2025 को एक दीपू चंद्र दास नाम के हिंदू युवक को मारकर, उसका शव पेड़ पर बाँधकर, शरीर जलाकर शांत हुआ।

घटना के बाद दीपू का जला हुआ धड़ और खोपड़ी देखकर उसका परिवार रोता रहा, इंसाफ माँगता रहा लेकिन यूनुस सरकार के कान पर जूँ तक नहीं रेंगी। बाद में मीडिया में खबर आई, भारत में विरोध हुआ, सोशल मीडिया पर आवाज उठी, विदेशों से मानवाधिकारों पर प्रश्न हुए तब जाकर अपनी इज्जत बचाने के लिए यूनुस सरकार ने इस पर प्रतिक्रिया देनी उचित समझी।

मीडिया में पहले दो दिन कहा गया कि आरोपितों की गिरफ्तारी हो गई है। करीबन दो दिन तक यही बताया जाता रहा कि कब 7 लोग गिरफ्तार हुए और कब 12। आज इसी दिखावे के क्रम में एक खबर ये भी आई है कि वहाँ यूनुस सरकार के मंत्री अबरार ने दीपू चंद्र दास के परिजनों से मुलाकात की है। कुल मिलाकर मीडिया में माहौल ऐसे बनाया जा रहा है जैसे यूनुस सरकार दीपू चंद्र दास की हत्या को लेकर बहुत चिंतित है और जितना हो सकेगा कार्रवाई करेगी।

हालाँकि इस सरकार की सच्चाई क्या है इसे इन खबरों से मत समझिए… समझना है तो याद करिए बांग्लादेश का बीता डेढ़ साल

शेख हसीना सरकार को हटाने के लिए कैसे इस्लामी कट्टरपंथियों ने बांग्लादेश की व्यवस्था को पैरों तले रौंद दिया था और खबरें आई थी कि बांग्लादेश में 2000+ से ज्यादा हिंदुओं का उत्पीड़न हुआ है। उस समय भी यही बात सामने आई थी कि एक्शन लिया जाएगा, कार्रवाई होगी, दोषियों को छोड़ा नहीं जाएगा।

कुछ दिन तक यही राग चला और बाद में एक खबर आई कि अगस्त 2024 में छात्र प्रदर्शन के दौरान जिन लोगों पर केस हुए उनपर से मामले को वापस लिया जा रहा है।

ये खबर उन हिंदुओं के लिए बड़ा आघात था जो इस्लामी भीड़ के बीच रहते हुए इस्लामी कट्टरपंथियो से इंसाफ की उम्मीद लगाए बैठे थे। यूनुस सरकार ने एक पल में उस हिंसा को छात्र प्रदर्शन का नाम देकर सब अपराध धो-पोंछकर साफ कर दिया। वहीं उस कथित छात्र प्रदर्शन में शामिल लोगों को कानूनी संरक्षण देने तक की बात कही।

दीपू चंद्र दास के पिता से मिले यूनुस सरकार के मंत्री

बकायदा बांग्लादेश के गृह मंत्रालय की ओर से आधिकारिक बयान जारी हुआ- “एक नए गैर-भेदभावपूर्ण बांग्लादेश की यात्रा शुरू हो गई है। जो छात्र और नागरिक इस उथल-पुथल में शामिल थे, उन्हें 15 जुलाई से 8 अगस्त के बीच उनके कार्यों के लिए दंड, गिरफ्तारी या परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ेगा।”

अब बताइए क्या सच में बांग्लादेश की यूनुस सरकार जो दिखावा कर रही है कि उन्होंने दीपू चंद्र दास के हत्यारों को पकड़ लिया है, मंत्री उनके परिवार से मिल रहे हैं, उसके कोई भी मायने हैं…?

दीपू चंद्र दास पर सिर्फ इसलिए बोला जा रहा है क्योंकि उसे दिखाकर सवाल खड़े हो रहे हैं। वरना हमेशा याद रखिएगा कि यही सरकार डेढ़ साल से हिंदुओं के हर उत्पीड़न पर सिर्फ चुप है। ये सरकार तब भी मौन थी जब 5 अगस्त 2024 को हुए तख्तापलट के बाद से हिंदुओं पर 2000+ हमलों की खबर आई। ये सरकार तब भी चुप थी जब मोरक्को से इनके खुद के राजदूत हारून अल रशीद ने ये बात स्वीकार की थी कि शेख हसीना की सरकार में बोलने की आजादी का फायदा उठाकर बांग्लादेश में भारत के खिलाफ भड़काया गया। इस सरकार ने उस समय भी एक शब्द नहीं बोला था

  • जब इसी साल बांग्लादेश में 26 साल के अर्नब कुमार सरकार की चाय पीते समय सरेआम गोली मारकर हत्या कर दी गई थी…।
  • जब मोबाइल की दुकान चलाने वाले सुदेब हलदर को बेवजह गला रेतकर मार दिया गया।
  • जब कॉक्स बाजार के चकरिया में 8-10 लोगों ने 14 साल की लड़की से गैंगरेप कर दिय।
  • जब नरैल में हिंदू महिला बसना मलिक के साथ ऐसी दरिंदगी की गई थी क वह बाद में उल्टियाँ कर करके मर गई।
  • जब एक हिंदू पत्रकार सौगात बोस के घर पर हमला हुआ। उसके घरवालों की खोपड़ी फोड़ दी गई। हड्डियाँ तोड़ दी गई और सबको बुरी तरह घायल करके अपराधी फरार हो गए।

1 साल में सैंकड़ों नहीं हजारों घटनाएँ ऐसी हुई हैं जब बांग्लादेश की यूनुस सरकार चाहती तो हिंदुओं के लिए मुखर होकर कड़े एक्शन ले सकती थी, लेकिन ये कभी नहीं हुआ। लगातार हिंदू की हत्याओं की खबरों से मीडिया भरा रहा, मंदिर टूटने की घटनाएँ आती रहीं… मगर यूनुस सरकार शांत रही। इसलिए इस बार मीडिया में आ रहे बयानों से भ्रमित मत होइए।

आपको बरगलाने का, ध्यान भटकाने का ये सिर्फ एक तरीका है। इस्लामी कट्टरपंथियों के आगे झुक चुके बांग्लादेश और उसकी सरकार से हिंदुओं को उम्मीद नहीं लगाना चाहिए। उम्मीद होनी चाहिए तो सिर्फ इतनी कि बांग्लादेश में जो हिंदू शेष हैं वो इन कट्टरपंथियों की आतंक से हमेशा बचे रहें। इन परिवारों पर ऐसी मानसिकता की कभी नजर न पड़े।

बांग्लादेश में हिंदुओं की घटती संख्या

ये चिंता सिर्फ इसलिए है क्योंकि 1971 के बाद से बांग्लादेश में हिंदुओं की आबादी सिर्फ और सिर्फ घटी ही है। 1974 में हुई जनगणना के अनुसार बांग्लादेश में हिंदू कुल आबादी का 13.5% फीसद थे। 1981 2001 में 9.3% और 2011 की जनगणना में 8.5% हो गई।

सिर्फ मीडिया में आती खबरें ही नहीं, आँकड़े भी यही बताते हैं कि बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथ से अल्पसंख्यक हिंदू वैसे ही परेशान है जैसे पाकिस्तान में है। इस इस्लामी मुल्क में एक तरफ जहाँ लगातारा हिंदुओं की आबादी घटी है वहीं मुस्लिमों की आबादी में लगातार इजाफा हुआ है। 1974 में इनकी आबादी 85.4% थी और अब ये 91.5% हो गई

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में चल रही थी ‘आतंकवाद’ पर बहस, पाकिस्तानी ‘मंत्री’ के बेटे को भारतीय छात्र ने हराया: जानिए कौन है ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के मायने समझाने वाला वीरांश भानुशाली

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में भारत का डंका बज रहा है। यहाँ भारत के छात्र वीरांश भानुशाली ने एक डिबेट के दौरान पूरी दुनिया के सामने पाकिस्तानी प्रोपेगेंडा ध्वस्त कर दिया है। पाकिस्तान को करारा जवाब देते हुए भानुशाली ने आतंकवाद पर भारत की सख्त नीतियों को दोहराया। इस डिबेट का वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रहा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह डिबेट 26 नवंबर 2025 के अगले दिन ऑक्सपोर्ड यूनियन द्वारा आयोजित की गई थी, जिसका वीडियो अब सामने आया है। डिबेट का विषय था- ‘सदन मानता है कि पाकिस्तान के प्रति भारत की नीति एक लोकलुभावन रणनीति है, जिसे सुरक्षा नीति के नाम पर बेचा जा रहा है।’ डिबेट में वीरांश भानुशाली विषय के विपक्ष में बोलते हुए पाकिस्तानी टीम से मूसा हरराज को हराकर शानदार प्रदर्शन किया। मूसा पाकिस्तान के पूर्व संघीय मंत्री मुहम्मद रजा हयात हरराज के बेटे हैं।

26/11 हमले पर मुंबईकर की पीड़ा जाहिर कर पाकिस्तान को धोया

ऑक्सफॉर्ड यूनियन में यह डिबेट उस दिन हुई, जिस दिन को पूरा भारत कभी नहीं भूल सकता है। 26 नवंबर को, जब पाकिस्तान ने मुंबई में आतंकी हमला कराया था। इस हमले में 250 लोगों की मौत हुई थी। वहीं पूरा मुंबई उस समय डर के साए में था। उनमें से एक मुंबई के रहने वाले वीरांश भानुशाली भी थे। डिबेट में अपनी व्यक्तिगत पीड़ा को साझा करते हुए वीरांश ने पाकिस्तान पर जमकर प्रहार किया।

वीरांश भानुशाली ने डिबेट में अपनी बात ही मुंबई के उस 26/11 हमले के निजी अनुभव से शुरू की। भानुशाली ने कहा, “जिन लक्ष्यों को निशाना बनाया गया था, उनमें से एक छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनल (CSMT) था, वही स्टेशन जिससे मेरी चाची लगभग हर शाम गुजरती थीं। संयोगवश या ईश्वर की कृपा से उस रात उन्होंने घर जाने के लिए दूसरे ट्रेन पकड़ी और उन 166 लोगों की जान बाल-बाल बचाई जो मारे गए।”

भानुशाली ने आगे कहा, “मैं तब स्कूली में पढ़ने वाला छात्र था और अपने शहर को जलते हुए देखने के लिए टेलीविजन से चिपका हुआ था। मुझे फोन पर अपनी माँ की आवाज में डर और अपने पिता के कसे हुए जबड़े में तनाव याद है। तीन रातों तक मुंबई सोया नहीं और मैं भी नहीं सोया।”

भानुशाली ने स्पष्ट किया कि वह इस घटना का जिक्र माहौल खराब करने के लिए नहीं, बल्कि डिबेट को वास्तविक्ता के दायरे में लाने के लिए साझा कर रहे हैं। वीरांश भानुशाली ने बताया कि उपनगरीव रेलवे स्टेशन उनके घर से महज 200 मीटर की दूरी पर था, जिसमें 1993 में बम धमाकों में 250 लोगों की जानें गईं। उन्होंने कहा, “मैं इन त्रासदियों की छाया में पला-बढ़ा हूँ।”

पाकिस्तान को जवाब देते हुए कहा, “इसीलिए जब कोई कहता है कि पाकिस्तान के प्रति भारत का कड़ा रुख सिर्फ लोकलुभावनवाद है, जिसे सुरक्षा नीति का नाम दिया जा रहा है, तो ऐसे में आप समझ सकते हैं कि मुझे इतना गुस्सा क्यों आता है।”

पाकिस्तान की करतूतें गिनाते हुए भानुशाली ने दिया करारा जवाब

पाकिस्तान की करतूतें गिनाते हुए भानुशाली ने डिबेट को अपने पक्ष में किया और कहा, “मुझे यह डिबेट जीतने के लिए बयानबाजी की जरूरत नहीं है। मुझे बस एक कैलेंडर का इस्तेमाल करना है।”

उन्होंने अपने पड़ोस में हुए 1993 के धमाकों का जिक्र करते हुए कहा, “मार्च 1993 में RDX विस्फोटकों ने प्लाजा सिनेमा को तहस-नहस कर दिया। 257 लोग मारे गए। क्या मार्च 1993 में चुनाव थे? नहीं। वह चुनाव तीन साल बाद होने थे। आतंकवाद इसलिए नहीं आया कि हमें वोट चाहिए थे। यह इसलिए आया क्योंकि दाऊद और ISI भारत की आर्थिक रीढ़ को तोड़ना चाहते थे। वह लोकलुभावनवाद नहीं था। वह युद्ध का एक कृत्य था।”

मुंबई 26/11 आतंकी हमले का जिक्र करते हुए कहा, “26/11 के बाद एक लोकलुभावन सरकार क्या करती? जनता का गुस्सा परमाणु बम जैसा था। एक लोकलुभावन नेता अगले चुनाव जीतने के लिए सीधे जेट विमानों को लॉन्च कर देता लेकिन तत्कालीन सरकार कॉन्ग्रेस पार्टी ने रणनीतिक संयम चुना।”

उन्होंने आगे कहा कि भारत ने कूटनीति का रास्ता चुना, दस्तावेज भेजे और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की। भानुशाली ने कहा, “क्या गैर-लोकप्रिय दृष्टिकोण ने हमें शांति दिलाई? नहीं। इसने हमें पठानकोट दिलाया। इसने हमें उरी दिलाया। इसने हमें पुलवामा दिलाया।”

विश्व स्तर पर ऑपरेशन सिंदूर का अर्थ समझाया

वीरांश भानुशाली ने समझाया कि ऑपरेशन सिंदूर का नाम कैसे रखा गया। भानुशाली ने कहा, “उस नरसंहार में मारी गई विधवाओं के लिए हिंदू पत्नी के सिंदूर का चिन्ह चुना गया था। इस ऑपरेशन में 9 लॉन्चपैडों को सटीक रूप से नष्ट किया गया। हमने दोषियों को सजा दी। और फिर क्या हुआ? हम रुक गए। हमने आक्रमण नहीं किया। हमने कब्जा नहीं किया। यह लोकलुभावनवाद नहीं है। यह पेशेवर रवैया है।”

उन्होंने आगे कहा, “अपने नागरिकों को हत्या से बचाना लोकप्रिय है? इसका मतलब यह नहीं कि यह कोई चाल है।” उन्होंने कहा, “लेकिन अगर आप सुरक्षा के नाम पर असली लोकलुभावनवाद देखना चाहते हैं, तो रेडक्लिफ लाइन के उस पार देखिए। जब ​​भारत युद्ध लड़ता है, तो हम पायलटों से जानकारी लेते हैं। पाकिस्तान में वे कोरस को ऑटो-ट्यून करते हैं। आप अपने लोगों को रोटी नहीं दे सकते, इसलिए आप उन्हें तमाशा दिखाते हैं। यह युद्ध के डर से सार्वजनिक गरीबी को निजी शक्ति में बदलने की कला है।”

कौन हैं वीरांश भानुशाली?

वीरांश भानुशाली इंग्लैंड के ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में कानून के छात्र हैं। वे ऑक्सफोर्ड के सेंट पीटर कॉलेज से BA ज्यूरिस्प्रूडेंस (LLB), अंग्रेजी कानून और यूरोप में कानून अध्ययन की पढ़ाई कर रहे हैं। मुंबई में जन्मे भानुशाली ने कथित तौर पर मुंबई के NES इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ाई की। बाद में वे उच्च शिक्षा के लिए ब्रिटेन चले गए।

वे वर्तमान में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में छात्रों द्वारा संचालित वाद-विवाद समिति, ऑक्सफोर्ड यूनियन के चीफ ऑफ स्टाफ के रूप में कार्यरत हैं। इससे पहले कानून के छात्र ऑक्सफोर्ड यूनियन में अंतर्राष्ट्रीय अधिकारी और सचिव समिति के सदस्य के रूप में भी कार्य कर चुके हैं। उन्होंने अक्टूबर 2023 में द ऑक्सफोर्ड मजलिस की सह-स्थापना की, जो सांस्कृतिक और बौद्धिक चर्चाओं पर केंद्रित छात्रों की एक पहल है।

इनकम टैक्स रिफंड होल्ड पर मैसेज आया? फिर तो रिस्क मैनेजमेंट प्रक्रिया में फँस गई आपकी ITR: जानें- कैसे इस आफत से छुड़ाएँ जान, वर्ना लग सकती है पेनल्टी

इनकम टैक्स रिफंड का इंतजार कर रहे लाखों करदाताओं के लिए बुरी खबर है। आयकर विभाग ने रिस्क मैनेजमेंट प्रक्रिया के तहत बड़ी संख्या में ITR को होल्ड पर डाल दिया है। कई लोगों के फोन पर SMS और ईमेल आ रहे हैं कि उनका रिफंड रुका हुआ है और डिस्क्रेपेंसी के कारण जाँच चल रही है। विभाग ने स्पष्ट किया है कि यह एक तरह की चेतावनी है, ताकि करदाता अपनी गलतियाँ सुधार सकें।

आयकर विभाग के प्रवक्ता ने कहा, “विभाग ने AY 2025-26 के लिए एक डेटा-ड्रिवन कैम्पेन शुरू किया है, जिसमें करदाताओं को स्वेच्छा से अपनी अमान्य रिफंड क्लेम्स की समीक्षा करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।”

यह कैम्पेन उन करदाताओं को टारगेट कर रही है जिनके रिटर्न में डेटा मिसमैच पाया गया है। विभाग ने करदाताओं से अपील की है कि वे 31 दिसंबर 2025 तक रिवाइज्ड ITR फाइल करें, अन्यथा जनवरी 2026 से अपडेटेड रिटर्न पर अतिरिक्त टैक्स और पेनल्टी लग सकती है।

क्या कह रहे हैं एक्सपर्ट?

टैक्स एक्सपर्ट्स के मुताबिक, यह पहली बार है जब इतने बड़े पैमाने पर प्री-रिफंड वेरिफिकेशन हो रहा है। पहले ऐसे अलर्ट सिर्फ राजनीतिक दलों को दान देने वाले मामलों में आते थे, लेकिन अब हाई रिफंड क्लेम वाले हर रिटर्न की जाँच हो रही है।

एक एक्सपर्ट ने बताया, “एडवांस सिस्टम और डेटा एनालिटिक्स अब बारीकी से रिटर्न चेक कर रहे हैं।” अगर बैंक ब्याज, डिविडेंड या कैपिटल गेन्स की जानकारी AIS से मैच नहीं कर रही, तो रिफंड रुक सकता है।

रिफंड रुकने की मुख्य वजहें क्या हैं?

आयकर विभाग के अनुसार, TDS/TCS मिसमैच, AIS vs ITR आय मिसमैच, पिछले सालों से ज्यादा रिफंड क्लेम, 80C/80D/80G के बड़े दावे बिना बैकिंग डेटा के और गलत इनकम हेड क्लासिफिकेशन शामिल हैं। कई नौकरीपेशा लोग HRA का दावा बिना टीडीएस काटे कर देते हैं, जो अब आसानी से पकड़ा जा रहा है।

मैसेज को लेकर लोग हो रहे परेशान

सोशल मीडिया पर लोग पोस्ट कर रहे हैं कि मैसेज तो आया लेकिन डिटेल्स नहीं मिलीं। एक यूजर ने लिखा, “हजारों करदाताओं को अचानक यह मैसेज आ रहा है कि ITR रिफंड होल्ड पर है रिस्क मैनेजमेंट की वजह से। रिवाइज्ड रिटर्न एक हफ्ते में फाइल करें। विभाग को समस्या पता करने में 4 महीने लगे और करदाताओं को सुधारने के लिए कुछ दिन!”

कई लोगों ने यह भी बताया कि ईमेल स्पैम में जा रहा है या पुराने आईडी पर आ रहा है।

IT विभाग बोला- ये गलती सुधार का मौका

विभाग का कहना है कि यह अलर्ट नोटिस नहीं, बल्कि सुधार का मौका है। प्रेस रिलीज में लिखा है, “यह सलाह पहल उन करदाताओं से रिवाइज्ड आयकर रिटर्न फाइल करने को कहती है जिनकी पहचान की गई है, 31 दिसंबर 2025 तक। जो इस डेडलाइन को मिस करेंगे, वे 1 जनवरी 2026 से अपडेटेड रिटर्न फाइल कर सकते हैं, लेकिन लागू फीस और ब्याज के साथ।”

करदाताओं को क्या करना चाहिए?

सबसे पहले ITR पोर्टल पर लॉगिन करें, AIS और 26AS से डेटा मैच करें। अगर गलती मिले, तो रिवाइज्ड रिटर्न फाइल करें। अगर सही है, तो इंतजार करें, रिफंड रिलीज होगा। समय-समय पर e-Proceedings/Worklist चेक करें।

Revised Income Tax Return कैसे फाइल करें?

आयकर की ई-फाइलिंग वेबसाइट https://www.incometax.gov.in/iec/foportal/ पर जाएँ। इसके बाद PAN, पासवर्ड और कैप्चा डालकर लॉगिन करें। अगले चरण में e-File मेन्यू पर क्लिक करें और Income Tax Return चुनें। इसके बाद संबंधित असेसमेंट ईयर और ITR फॉर्म नंबर चुनें। फिर Filing Type में Original/Revised Return चुनें। आगे बढ़ते हुए Submission Mode में Prepare and Submit Online सेलेक्ट करें और फिर ऑनलाइन ITR फॉर्म के General Information टैब में Return Filing Section में Revised return under section 139(5) चुनें।

इस प्रोसेस में आगे बढ़ते हुए Return filing type में Revised चुनें और ओरिजिनल रिटर्न का Acknowledgement Number और Date of filing दर्ज करें।

Revised ITR फाइल करने पर कोई पेनल्टी नहीं लगती। हालाँकि अगर आपकी असली टैक्स देनदारी पहले दिखाई गई रकम से ज्यादा निकलती है, तो आपको ब्याज के तौर पर कुछ अतिरिक्त रकम चुकानी पड़ सकती है।

हालाँकि यह कदम लंबे समय में टैक्स सिस्टम को मजबूत बनाएगा, लेकिन फिलहाल भ्रम फैला रहा है। सरकार का कहना है कि यह स्वैच्छिक समीक्षा है, ताकि भविष्य में जाँच से बचा जा सके। कुल मिलाकर अगर आपको ऐसा मैसेज मिला है, तो घबराएँ नहीं, लेकिन एक्शन लें। ईमानदारी से टैक्स भरना ही सुरक्षित है।

अब स्किल-सैलरी के आधार पर मिलेगा US का H-1B वीजा, ट्रंप प्रशासन ने खत्म किया लॉटरी सिस्टम: जानिए- इससे कौन और कैसे होंगे प्रभावित

अमेरिका के ट्रंप प्रशासन ने H-1B वीजा प्रोग्राम में एक बड़ा बदलाव का ऐलान किया है। यह वीजा मुख्य रूप से विदेशी स्किल्ड वर्कर्स, खासकर टेक्नोलॉजी सेक्टर में काम करने वालों के लिए होता है। अब तक इस वीजा को लॉटरी सिस्टम से दिया जाता था, लेकिन अब इसे खत्म कर दिया गया है।

नई व्यवस्था में ज्यादा स्किल्ड और ज्यादा सैलरी वाले विदेशी वर्कर्स को प्राथमिकता मिलेगी। अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग (DHS) ने 23 दिसंबर 2025 को इसकी घोषणा की। यह बदलाव 27 फरवरी 2026 से लागू होगा और अगले H-1B कैप रजिस्ट्रेशन सीजन पर असर डालेगा।

डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन का कहना है कि इससे अमेरिकी वर्कर्स की नौकरियाँ और सैलरी सुरक्षित रहेंगी, क्योंकि पुराने सिस्टम में कंपनियाँ कम सैलरी पर विदेशी वर्कर्स हायर करके अमेरिकियों को नुकसान पहुँचा रही थीं।

यह बदलाव ऐसे समय में आया है जब अमेरिका में इमिग्रेशन पॉलिसी को लेकर बहस तेज है। H-1B वीजा मुख्य रूप से इंडियन प्रोफेशनल्स के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि 71 प्रतिशत H-1B होल्डर्स भारत से होते हैं। लेकिन नई पॉलिसी से इंडियंस पर भी असर पड़ेगा, खासकर उन पर जो एंट्री लेवल जॉब्स या कम अनुभव वाले हैं।

आइए- इस बदलाव को विस्तार से समझते हैं। पहले जानते हैं कि पुराना सिस्टम कैसा था, फिर नए बदलाव के फायदे-नुकसान और अमेरिका में लगने वाले आरोपों पर चर्चा करेंगे।

लॉटरी पर आधारित था पुराना H-1B वीजा सिस्टम

H-1B वीजा अमेरिका का एक नॉन-इमिग्रेंट वर्क वीजा है, जो स्पेशल ऑक्यूपेशन में काम करने वाले विदेशियों को दिया जाता है। यह मुख्य रूप से आईटी, इंजीनियरिंग, मेडिसिन और अन्य हाई-स्किल्ड फील्ड्स के लिए होता है। हर साल अमेरिका में 85,000 H-1B वीजा जारी किए जाते हैं। इनमें से 65,000 रेगुलर कैप के तहत और 20,000 अमेरिकी यूनिवर्सिटी से एडवांस्ड डिग्री (मास्टर्स या पीएचडी) वाले कैंडिडेट्स के लिए रिजर्व होते हैं।

पुराने सिस्टम में प्रोसेस कुछ इस तरह था: सबसे पहले अमेरिकी कंपनियाँ (जैसे अमेजन, माइक्रोसॉफ्ट, गूगल या टीसीएस) विदेशी वर्कर के लिए पेटिशन फाइल करती थीं। हर साल अप्रैल में रजिस्ट्रेशन ओपन होता था, और अगर अप्लिकेशंस कैप से ज्यादा आतीं (जो हमेशा आती थीं, क्योंकि डिमांड बहुत ज्यादा होती है), तो USCIS (यूएस सिटिजनशिप एंड इमिग्रेशन सर्विसेज) रैंडम लॉटरी चलाती थी। लॉटरी में सिलेक्ट होने पर ही आगे प्रोसेसिंग होती थी, जिसमें बैकग्राउंड चेक, इंटरव्यू और अप्रूवल शामिल था।

उदाहरण के लिए FY 2025 में लाखों अप्लिकेशंस आईं, लेकिन सिर्फ 85,000 को ही वीजा मिला। अमेजन को सबसे ज्यादा 10,000 से अधिक अप्रूवल मिले, उसके बाद टीसीएस, माइक्रोसॉफ्ट, ऐपल और गूगल। कैलिफोर्निया में सबसे ज्यादा H-1B वर्कर्स रहते हैं। इस लॉटरी सिस्टम की वजह से कई बार कम स्किल्ड या कम सैलरी वाले भी सिलेक्ट हो जाते थे, जबकि हाई स्किल्ड वाले बाहर रह जाते थे। यूजर के शब्दों में कहें तो “लॉटरी में गधे भी चले जाते थे”, मतलब किस्मत पर निर्भर था, स्किल पर नहीं।

अमेरिका में लगते थे H-1B वीजा के गलत इस्तेमाल के आरोप

ट्रंप प्रशासन ने पुराने सिस्टम पर कई आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि अमेरिकी कंपनियाँ H-1B का दुरुपयोग कर रही थीं। वे कम सैलरी पर विदेशी वर्कर्स हायर करके अमेरिकी लोगों को निकाल देती थीं। USCIS स्पोक्सपर्सन मैथ्यू ट्रैगेसर ने कहा, “मौजूदा रैंडम सिलेक्शन प्रक्रिया का दुरुपयोग हो रहा था। अमेरिकी नियोक्ता कम वेतन पर विदेशी कर्मचारियों को लाने के लिए इसका फायदा उठा रहे थे, जबकि अमेरिकी कर्मचारियों को ज्यादा वेतन देना पड़ता।”

उदाहरण के तौर पर सितंबर 2025 में ट्रंप ने एक प्रेसिडेंशियल प्रोक्लेमेशन साइन किया, जिसमें कहा गया कि आईटी फर्म्स अमेरिकी वर्कर्स को लेऑफ करके H-1B पर कम सैलरी वाले विदेशियों को हायर कर रही हैं। एक रिपोर्ट में बताया गया कि एक आईटी फर्म ने FY 2025 में 1,700 H-1B वर्कर्स अप्रूव कराए, लेकिन जुलाई में 2,400 अमेरिकी वर्कर्स को निकाल दिया। इससे अमेरिकी वर्कर्स की सैलरी दबती है और जॉब मार्केट में अनफेयर कॉम्पिटिशन होता है। ट्रंप ने इसे ‘अमेरिका फर्स्ट’ पॉलिसी के खिलाफ बताया।

इसके अलावा आउटसोर्सिंग कंपनियाँ (जैसे इंडियन आईटी फर्म्स) पर आरोप लगे कि वे एंट्री लेवल जॉब्स के लिए H-1B यूज करती हैं, जो अमेरिकी ग्रेजुएट्स के लिए होनी चाहिए। इससे यूएस वर्कफोर्स की क्वॉलिटी गिर रही थी।

स्किल और सैलरी पर आधारित वेटेड सिलेक्शन अब नया सिस्टम

अब नया नियम क्या है? DHS ने रैंडम लॉटरी को रिप्लेस करके ‘वेटेड सिलेक्शन प्रोसेस’ लागू किया है। इसमें ज्यादा स्किल्ड और हाई सैलरी वाले कैंडिडेट्स की सिलेक्शन की प्रॉबेबिलिटी बढ़ जाएगी। मतलब, जो पेटिशन हाई वेज लेवल पर फाइल की जाएँगी, उन्हें ज्यादा वेटेज मिलेगा।

ट्रैगेसर ने कहा, “नई वेटेड सिलेक्शन प्रक्रिया कॉन्ग्रेस के इरादे को बेहतर तरीके से पूरा करेगी और अमेरिका की प्रतिस्पर्धात्मकता को मजबूत बनाएगी। इससे अमेरिकी कंपनियों को ज्यादा वेतन और ज्यादा कुशल विदेशी कर्मचारियों के लिए आवेदन करने की प्रेरणा मिलेगी। इन नियामक बदलावों और भविष्य में आने वाले अन्य बदलावों से हम H-1B कार्यक्रम को अपडेट करते रहेंगे, ताकि अमेरिकी व्यवसायों की मदद हो सके, लेकिन अमेरिकी कर्मचारियों को नुकसान पहुंचाने वाले दुरुपयोग को रोका जा सके।”

वीजा की सालाना लिमिट वही रहेगी-65,000 + 20,000। लेकिन अब सिलेक्शन रैंडम नहीं, बल्कि मेरिट बेस्ड होगा। कंपनियों को हाई सैलरी ऑफर करनी पड़ेगी, ताकि सिलेक्शन चाँस बढ़े। यह बदलाव FY 2027 की रजिस्ट्रेशन से लागू होगा।

ट्रंप प्रशासन के फैसले से किन्हें होगा फायदा?

यह बदलाव मुख्य रूप से हाई स्किल्ड और अनुभवी वर्कर्स को फायदा देगा। जो लोग ज्यादा सैलरी वाली जॉब्स के लिए अप्लाई करेंगे, जैसे सीनियर सॉफ्टवेयर इंजीनियर्स, डेटा साइंटिस्ट्स या मैनेजमेंट रोल्स, उन्हें आसानी से वीजा मिल सकता है। अमेरिकी वर्कर्स को भी फायदा होगा, क्योंकि कंपनियाँ अब कम सैलरी पर विदेशियों को नहीं हायर कर पाएँगी, जिससे लोकल जॉब्स सुरक्षित रहेंगी।

ट्रंप प्रशासन का कहना है कि इससे अमेरिका की इकोनॉमी मजबूत होगी, क्योंकि सिर्फ ‘बेस्ट ऑफ द बेस्ट’ टैलेंट आएगा। यूजर के अनुसार, अब अमेरिका ‘घोड़े’ लेगा, मतलब सिर्फ स्किल्ड और अनुभवी लोगों को।

ट्रंप सरकार का फैसला अच्छा है या बुरा

यह बदलाव अच्छा भी है और बुरा भी, निर्भर करता है किस नजरिए से देखें। अच्छा इसलिए कि यह अनफेयर प्रैक्टिस को रोकेगा। अमेरिकी वर्कर्स की सैलरी बढ़ेगी और जॉब मार्केट फेयर बनेगा। हाई स्किल्ड प्रोफेशनल्स के लिए यह मेरिट बेस्ड सिस्टम है, जहाँ किस्मत नहीं, काबिलियत मायने रखेगी। इससे अमेरिका ग्लोबल कॉम्पिटिशन में आगे रहेगा।

लेकिन बुरा इसलिए कि न्यू ग्रेजुएट्स या कम अनुभव वाले विदेशियों के लिए मुश्किल हो जाएगी। इंडियन आईटी प्रोफेशनल्स, जो एंट्री लेवल पर आते हैं, उन्हें नुकसान होगा। कंपनियाँ अब ज्यादा सैलरी ऑफर करने से कतराएंगी, जिससे ओवरऑल H-1B अप्लिकेशंस कम हो सकती हैं। आउटसोर्सिंग फर्म्स पर असर पड़ेगा। इसके अलावा यह बदलाव कंट्रोवर्शियल है, क्योंकि कुछ लोग इसे प्रोटेक्शनिस्ट पॉलिसी कहते हैं, जो ग्लोबल टैलेंट को रोकती है।

ट्रंप प्रशासन के इस फैसले से अन्य क्या असर होंगे

ट्रंप प्रशासन ने H-1B पर और भी सख्ती की है। सितंबर 2025 में नई H-1B अप्लिकेशंस पर 100,000 डॉलर एक्स्ट्रा फीस लगाई गई। इसका मकसद कम सैलरी वाली हायरिंग रोकना था। कैलिफोर्निया समेत 20 स्टेट्स ने इसके खिलाफ मुकदमा दायर किया, लेकिन एक फेडरल जज ने इसे बरकरार रखा।

इसके अलावा दिसंबर 2025 से सोशल मीडिया वेटिंग को एक्सपैंड किया गया। अब सभी H-1B और H-4 अप्लिकेंट्स की ऑनलाइन प्रेजेंस चेक की जाएगी, ताकि सिक्योरिटी थ्रेट्स पता चलें। इससे वीजा इंटरव्यू में देरी हो रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, दिसंबर में इंडिया में H-1B रिन्यूअल के लिए गए कई लोग फँसे रह गए। उनके अपॉइंटमेंट्स कैंसल हो गए और नए डेट्स मार्च 2026 तक मिले। इमिग्रेशन लॉयर्स का कहना है कि इससे कंपनियाँ इंतजार नहीं कर पाएँगी और रिलेशनशिप्स खराब होंगे।

ट्रंप ने $1 मिलियन ‘गोल्ड कार्ड’ वीजा भी इंट्रोड्यूस किया, जो वेल्थी इंडिविजुअल्स को सिटिजनशिप का रास्ता देता है, लेकिन यह H-1B से अलग है।

ट्रंप प्रशासन के फैसले से भारतीयों पर पड़ेगा कितना असर?

भारत के लिए H-1B बहुत महत्वपूर्ण है। 71% H-1B होल्डर्स इंडियन हैं। नई पॉलिसी से एंट्री लेवल इंडियंस को मुश्किल होगी, लेकिन सीनियर प्रोफेशनल्स को फायदा हो। हालाँकि अब अमेरिका पर निर्भर इंडियन आईटी इंडस्ट्री को रिस्ट्रक्चरिंग करनी पड़ेगी। स्ट्रैंडेड वर्कर्स की समस्या से फैमिलीज प्रभावित हो रही हैं।

पॉइंट्स में समझें बदलाव…

पुराना vs नया प्रोसेस: पुराना – रैंडम लॉटरी; नया – वेटेड सिलेक्शन (हाई वेज को ज्यादा चांस)।
वीजा लिमिट: पहले की तरह 85,000 सालाना।
कम से लागू होगा सिस्टम: 27 फरवरी 2026 से।
फायदे: अमेरिकी जॉब्स सुरक्षित होंगी, हाई टैलेंट को आकर्षित करने पर फोकस।
नुकसान: न्यूकमर्स के लिए मुश्किल होगा वीजा पाना।
अन्य रोक: 100,000 डॉलर फीस, सोशल मीडिया चेक।
भविष्य: H-1B और L-1 वीजा रिफॉर्म एक्ट 2025 में और बदलाव, जैसे यूएस वर्कर्स को डिस्प्लेसमेंट से 180 दिन प्रोटेक्शन।

कुल मिलाकर यह बदलाव अमेरिका की इमिग्रेशन पॉलिसी को ‘अमेरिका फर्स्ट’ की दिशा में ले जा रहा है। जबकि कुछ इसे जरूरी सुधार मानते हैं, दूसरों को लगता है कि इससे इनोवेशन प्रभावित होगा। इंडिया जैसे देशों को अब ज्यादा स्किल डेवलपमेंट पर फोकस करना पड़ेगा। हालाँकि इसका अमेरिका पर भी बुरा असर पड़ सकता है, क्योंकि स्किल्ड लोगों की जरूरत पड़ने पर अब अमेरिकी कंपनियों को भी मोटी रकम चुकानी पड़ेगी।