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जिसके पास परमाणु बम, वो देश सुरक्षित?: जानें- बेडरूम से घुसकर मादुरो को पकड़ने वाला अमेरिका, किम जोंग उन से क्यों नहीं टकराता

दुनिया ने हमेशा ताकत को सलाम किया है, लेकिन आज की दुनिया में कमजोरों को सजा भी दी जाती है। ऐसे समय में जब संसाधनों को हड़पने की होड़ और बड़ी ताकतों के बीच दुश्मनी जगजाहिर है, यूएन चार्टर और नैतिकता की बात करना बेमानी है।

जो बचा है वह एक लेन-देन वाली सच्चाई है। ताकतवर देश, छोटे देशों को बर्बाद कर सकते हैं। लेकिन जो मजबूत देश हैं, उनका कुछ खास नहीं बिगाड़ सकते। उन पर हमला नहीं कर सकते। उन्हें झुकने के लिए मजबूर भी नहीं किया जा सकता। यहाँ तक कि यूएन भी कुछ नहीं बिगाड़ पाता। इस क्रम में सबसे ऊपर न्यूक्लियर पावर वाले देश हैं।

वेनेजुएला में US मिलिट्री एक्शन

वेनेजुएला में US का ऑपरेशन, जिसका परिणाम प्रेसिडेंट निकोलस मादुरो की किडनैपिंग के रूप में सामने आया, लैटिन अमेरिकन जियोपॉलिटिक्स में सिर्फ़ एक घटना नहीं है। यह एक केस स्टडी है कि आज की दुनिया में ताकत का इस्तेमाल कैसे किया जाता है? कैसे न्यूक्लियर पावर नहीं होना देश की संप्रभुता के लिए नुकसानदायक है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 3 जनवरी को ऐलान किया कि यूनाइटेड स्टेट्स की सेना ने मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को पकड़ लिया है और उन्हें देश से बाहर ले जाया गया है। यह ऑपरेशन बिना किसी शर्मिंदगी के एकतरफ़ा किया गया।

लोकल टाइम के हिसाब से सुबह करीब 2 बजे काराकास जोरदार धमाकों से दहल उठा। आसमान में काफी नीचे उड़ रहे फाइटर प्लेन की आवाज से लोग दहशत में थे। बिजली चली गई थी। चारों तरफ मची अफरा-तफरी के बीच नेशनल इमरजेंसी घोषित कर दिया गया, लेकिन इतनी देर में ही आजाद देश वेनेजुएला पर अमेरिकी प्रभुत्व स्थापित हो चुका था।

वॉशिंगटन ने इस कार्रवाई को कैरिबियन और पूर्वी प्रशांत महासागर के रास्ते कथित तौर पर नशीली दवाओं की तस्करी का हवाला देते हुए, एक बड़े ‘ड्रग्स के खिलाफ युद्ध’ का हिस्सा बताया। न तो अमेरिकी कॉन्ग्रेस से सलाह ली गई और न ही यूनाइटेड नेशंस से पूछा गया। लॉजिक आसान था- यूनाइटेड स्टेट्स मादुरो को सजा देना चाहता था, उसने ऐसा किया भी। नशीली दवाएँ और ड्रग्स शायद राष्ट्रपति मादुरो और वेनेजुएला के खिलाफ गैर-कानूनी सैन्य कार्रवाई को सही ठहराने के सिर्फ बहाने हैं।

वेनेज़ुएला को जिस चीज ने खास तौर पर कमजोर बनाया, वह सिर्फ आर्थिक, अंदरूनी नाराज़गी या डिप्लोमैटिक अकेलापन नहीं था। वह था न्यूक्लियर छतरी का न होना। अगर वेनेजुएला के पास न्यूक्लियर छतरी होती, तो अमेरिका किसी भी हाल में अपने पड़ोसी देश के साथ ऐसा व्यवहार नहीं करता।

वेनेज़ुएला की तुलना नॉर्थ कोरिया से करें तो ये और भी साफ हो जाता है। सालों से नॉर्थ कोरिया को एक ऐसा दुष्ट देश कहा जाता रहा है जिसे सुधारा नहीं जा सकता। इसके नेता किम जोंग पर कई आरोप हैं। बिना किसी कानूनी कार्रवाई के हत्याएँ करने, टॉर्चर करने और दमनकारी नीति अपनाने के आरोप हैं।

न्यूक्लियर पॉवर होना शांति लाता है या तबाही

नॉर्थ कोरिया ने बार-बार अमेरिका और उसके साथी देशों, मसलन साउथ कोरिया और जापान को धमकी दी है। इनदोनों ही देशों में अमेरिका के बड़े मिलिट्री बेस हैं। इसके जवाब में नॉर्थ कोरिया ने जापानी इलाके के ऊपर मिसाइलों का टेस्ट किया है और दावा किया है कि उसके पास अमेरिका के वेस्ट कोस्ट पर हमला करने की काबिलियत है। नॉर्थ कोरिया ने रेगुलर ICBM का टेस्ट किया है। इस दौरान उसने जापान के ऊपर से ले जाकर प्रशांत महासागर में क्रैश कर दिया। इसके बाद अमेरिका को चुनौती देते हुए कहा कि वह अमेरिका की सिलिकॉन वैली के दिल, सैन फ्रांसिस्को पर हमला करने की क्षमता रखता है।

ट्रंप और अमेरिका लंबे समय से नॉर्थ कोरिया के राष्ट्राध्यक्ष किम जोंग उन को एक क्रूर तानाशाह कहता आ रहा है, जो सिर्फ सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए अपने ही लोगों पर ज़ुल्म करता है।

फिर भी उकसावे के बावजूद, नॉर्थ कोरिया पर अमेरिका ने कोई हमला नहीं किया। प्योंगयांग पर आधी रात को कोई रेड नहीं हुई। किम जोंग उन को पकड़कर किसी इंटरनेशनल ट्रिब्यूनल के सामने पेश करने की कोई कोशिश नहीं हुई। इसका कारण नॉर्थ कोरिया पर अमेरिकी मेहरबानी नहीं है, बल्कि बदले की कार्रवाई का डर है।

वेनेजुएला पर आक्रमण, न्यूक्लियर हथियारों से लैस नॉर्थ कोरिया पर नहीं

नॉर्थ कोरिया के पास न्यूक्लियर हथियार हैं। एक छोटा जवाबी हमला भी सियोल पर हमलों की बौछार कर सकता है, पैसिफिक में US सेना को कमजोर कर सकता है, और किसी के भी कंट्रोल से बाहर तनाव बढ़ा सकता है। यह अकेली बात वाशिंगटन को नॉर्थ कोरिया की सरकार बदलने के सपने छोड़ने के लिए मजबूर करती है। वह सिर्फ पाबंदियाँ ही लगा सकता है।

यही लॉजिक चीन पर भी लागू होता है, जिसके पास दुनिया में न्यूक्लियर हथियारों का तीसरा सबसे बड़ा स्टॉक है। चीन में अक्सर मानवाधिकार का उल्लंघन, मिलिट्री दबाव और आक्रामक विस्तार का रवैया अपनाता रहा है। साउथ चाइना सी में, चीन ने अपने हर पड़ोसी देश के साथ टकराव की स्थिति में है।

उसने आर्टिफिशियल आइलैंड बनाना शुरू कर दिया है, दुनिया के सबसे बिज़ी समुद्री कॉरिडोर में से एक को सैनिक छावनी में तब्दील कर दिया है। इंटरनेशनल पानी में चलने वाले मछली पकड़ने वाले जहाजों को परेशान करता रहा है। ताइवान के साथ उसका हमेशा से झगड़ा रहा है और उसने गलत तरीके से भारतीय इलाकों पर अपना दावा किया है।

ट्रेड वॉर, डिप्लोमैटिक दबाव, ताइवान पर कब्ज़ा करने की धमकियों और नौसेना की खतरनाक चालों के बावजूद, US ने अभी तक सीधी मिलिट्री कार्रवाई नहीं की है। चीन ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हाउस भी है, जो इलेक्ट्रिक गाड़ियाँ बनाने में इस्तेमाल होने वाले रेयर-अर्थ मिनरल से लेकर हाई-एंड इलेक्ट्रॉनिक्स सामान तक, हर प्रोडक्ट के लिए ग्लोबल सप्लाई चेन को लगभग कंट्रोल करता है।

न्यूक्लियर पावर होना देश के लिए जरूरी

जून 2025 में ईरान पर US और इजराइली हमलों को देखें तो अंतर और भी साफ हो जाता है। 21 जून को ट्रंप ने घोषणा की कि यूनाइटेड स्टेट्स ने ईरान की तीन न्यूक्लियर ठिकानों, फोर्डो, नतांज और एस्फाहान पर हमला किया है। इस दौरान पहाड़ों के अंदर बने ठिकानों को निशाना बनाया गया। GBU-57 मैसिव ऑर्डनेंस पेनेट्रेटर्स, 30,000 पाउंड के बंकर-बस्टर बमों से लैस B-2 स्टेल्थ बॉम्बर्स पहाड़ों के नीचे जाकर उन जगहों को नष्ट किया।

ट्रंप का मैसेज साफ था, “दुनिया में कोई दूसरी मिलिट्री नहीं है जो ऐसा कर सकती थी। अब शांति का समय है।” यह डिप्लोमेसी नहीं थी। यह ज़बरदस्ती थी जिसे अमेरिका ने अंजाम दिया। इससे साफ जाहिर होता है कि ताकत, ताकत का सम्मान करती है।

ईरान की फोर्डो संवर्धन सुविधा (Fordo enrichment facility) जमीन के नीचे 80-90 मीटर की गहराई पर स्थित है। तेहरान के दक्षिण में एक पहाड़ी के अंदर स्थित यह ईरान की सबसे सुरक्षित परमाणु ठिकानों में एक है।

ईरान ने लगातार कहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है, जबकि पश्चिमी देशों ने चिंता व्यक्त की है कि इसका उपयोग हथियार विकसित करने के लिए किया जा सकता है। इस आशंका के मद्देजनर यूनाइटेड स्टेट्स ने एयर अटैक किया। यह एक युद्ध जैसा काम था, जिसे पश्चिमी देशों ने सही ठहराया, क्योंकि ईरान वेपन-ग्रेड यूरेनियम के करीब पहुँच रहा था।

न्यूक्लियर युग की यही उलझन है: कब्ज़ा करने से संयम आता है; पीछा करने से मिलिट्री हमले होते हैं।

इज़राइल ने पहले ही ईरान के खिलाफ ‘ऑपरेशन राइजिंग लायन’ शुरू कर दी थी। ईरान ‘ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस 3’ से इसका जवाब दे रहा था। इस दौरान ड्रोन और मिसाइल से इजरायली एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाया, लेकिन ईरान के पास मिडिल ईस्ट में US बेस पर हमला करने और होर्मुज स्ट्रेट को बाधित करने की क्षमता नहीं थी, जिससे दुनिया भर की तेल सप्लाई का लगभग 30% गुजरता है।

ऐसे में अमेरिका को बढ़त मिली हुई थी। वॉशिंगटन ने ध्यान से हिसाब लगाया। ईरान के पास अभी न्यूक्लियर हथियार नहीं हैं। इसलिए अमेरिका ने सीधे तौर पर ईरान के ठिकानों को निशाना बनाया।

इसकी तुलना नॉर्थ कोरिया से करें तो साफ होता है कि न्यूक्लियर छतरी जरूरी है, साथ ही अमेरिका को नुकसान पहुँचाने की क्षमता। इकॉनमी टूटी हुई है, डिप्लोमेसी पसंद नहीं है, ये मायने नहीं रखता।

यूनाइटेड नेशंस, जिसपर सभी देशों की रक्षा करने की जिम्मेदारी है, उसके सेक्रेटरी-जनरल एंटोनियो गुटेरेस ने ईरान पर US के हमलों पर ‘गंभीर चिंता’ जताई। खतरनाक नतीजों की चेतावनी दी और डिप्लोमेसी की अपील की। लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा। UN नैतिकता की बात करता है, लेकिन नतीजा ताकत के बल पर मिलती है।

वेनेजुएला के बाद कोलंबिया को ट्रंप की धमकियाँ

वेनेजुएला और मादुरो को जबरन उठा ले जाने के ऑपरेशन के बाद लैटिन अमेरिका अस्थिर हो चुका है। ट्रंप ने खुलेआम अब कोलंबिया को धमकी दी है। उसके प्रेसिडेंट गुस्तावो पेट्रो को ‘सुधरने’ को कहा वरना वेनेजुएला वाला हश्र होने की बात कही। यहाँ एक बार फिर कोलंबिया की संप्रुभता को चुनौती दी गई।

खास बात यह है कि वेनेजुएला पर हुए अमेरिकी हमले की कोलंबिया ने निंदा की और इसे लैटिन अमेरिका की संप्रभुता पर हमला करार दिया। इससे अमेरिका बिदक गया और ट्रंप ने ‘अपने पीछे देखने’ के लिए कहा।

वेनेजुएला और राष्ट्रपति मादुरो के साथ हुए बदसलूकी ने दुनिया को परेशान कर दिया है। न्यूक्लियर हथियार अब सिर्फ़ स्ट्रेटेजिक एसेट नहीं रहे, बल्कि देश की ढाल हैं। ये दुनिया के सबसे ताकतवर देश को भी रुकने, हिसाब लगाने और फिर से सोचने पर मजबूर करते हैं। इसके बिना देश की संप्रभुता की कीमत नहीं रह जाती। ताकतवर देश अपने फायदा-नुकसान के हिसाब से ट्रीट करते हैं।

यह सच्चाई यह भी बताती है कि देशों में न्यूक्लियर पावर बनने का दबाव क्यों बढ़ रहा है, कम क्यों नहीं हो रहा है। दुनिया के छोटे-छोटे देश देख रहे हैं कि लीबिया के साथ क्या हुआ, जब उसने अपना न्यूक्लियर प्रोग्राम छोड़ दिया। वे देखते हैं कि इराक के साथ क्या हुआ, जिसके पास कभी न्यूक्लियर प्रोग्राम नहीं था। वे देखते हैं कि वेनेज़ुएला के साथ क्या हुआ। और वे देखते हैं कि नॉर्थ कोरिया के साथ क्या नहीं हुआ।

नतीजा लॉजिकल होता है, आइडियोलॉजिकल नहीं।

ऐसी दुनिया में जहाँ मानवाधिकार की बात सेलेक्टिव होता है, जहाँ ‘रूल्स-बेस्ड ऑर्डर’ सिर्फ कमजोर लोगों पर लागू होता है और जहाँ अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ मूकदर्शक बन जाती है, उनकी सोच कोई मायने नहीं रखता, वहाँ न्यूक्लियर पॉवर होना संप्रभुता की आखिरी गारंटी बन जाती है।

यह न्यूक्लियर वॉर का सपोर्ट नहीं है। बल्कि शांति और संतुलन के लिए ‘न्यूक्लियर’ का होना जरूरी है। ये तबाही मचा सकता है, लेकिन शांति भी यही लाता है।

अजीब बात है कि आज शांति अच्छी नीयत या ग्लोबल नियमों से नहीं, न्यूक्लियर ताकत की मोहताज बन गई है। क्योंकि बदले की कार्रवाई का डर इतना खतरनाक है कि ताकतवर देश भी खौफ खाते हैं।

उस डर ने नॉर्थ कोरिया को बचाया। इसने चीन को बचाया। इसने अमेरिका को ईरान में ‘हिसाब लगाने’ पर मजबूर किया और इसकी गैरमौजूदगी ने काराकास को बर्बाद कर दिया।

(ये लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

विकास के बाद अब जातिवाद की राजनीति की ओर धकेला जा रहा गुजरात, कौन हर मुद्दे में जबरन जोड़ रहा जाति का गणित

गुजरात के बाहर पत्रकारों और राजनीतिक हस्तियों से बात करते समय एक शिकायत हमेशा सुनने को मिलती है कि गुजरात राजनीतिक रूप से बहुत ‘हैपनिंग’ राज्य नहीं रहा है। यह शिकायत काफी हद तक सही है। हम इन सभी मामलों में मूल रूप से शांतिप्रिय लोग हैं। चुनाव 5 साल में एक बार होते हैं और चुनाव के दौरान ही कुछ हंगामा होता है। एक बार नई सरकार बन जाती है तो हमारा ध्यान काम पर लौट आता है। जब चुनाव 5 साल बाद आते हैं, तो उस पर बात करने का समय होता है। पिछले कुछ वर्षों से ऐसा ही हो रहा था। अब यह ट्रेंड बदल रहा है। हालाँकि, हमाम में सब नंगे हैं लेकिन इस सब में एक बड़ा योगदान विपक्ष और उनके इकोसिस्टम का है। क्योंकि तीन दशकों तक सत्ता से अलग-थलग रहने के बाद शायद उनके लिए सत्ता तक पहुँचने का यही एकमात्र रास्ता है।

कुछ राज्यों में अभी भी जाति की राजनीति हावी है। हालाँकि, वहाँ भी जाति की राजनीति धीरे-धीरे अपना असर खो रही है और दूसरे मुद्दे ज्यादा अहम होते जा रहे हैं। समीकरण धीरे-धीरे बदल रहे हैं। इसके उल्ट गुजरात पिछले कुछ सालों में गलत दिशा में जाने लगा है। बल्कि, चीजों को गलत दिशा में ले जाने के लिए सिस्टमैटिक, प्लान्ड कोशिशें चल रही हैं।

अगर हम इतिहास पढ़ें तो हमें पता चलता है कि गुजरात में एक समय ऐसा रहा था। माधव सिंह की ‘खाम’ थ्योरी बहुत मशहूर है। यह सब 2001 तक चलता रहा लेकिन नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद राजनीति के केंद्र ‘जाति’ धीरे-धीरे हटती गई और विकास, अर्थव्यवस्था आदि केंद्र में आते गए। यही एक वजह है कि मोदी के 13 साल के ऐतिहासिक शासन में गुजरात का कायापलट हो गया। मोदी जानते थे कि नतीजे तभी मिल सकते हैं जब हम इन सभी विषयों से ध्यान हटाकर उन पर ध्यान दें जो करने की जरूरत है। जब सरकार और समाज का ध्यान एक ही मुद्दे पर होता है, तो विपक्ष को न चाहते हुए भी उसी पिच पर खेलते रहना पड़ता है और वह कहीं भी बराबरी नहीं कर पाता।

2014 में मोदी के गुजरात छोड़ने के बाद अलग पिच पर खेलने के मौके तलाशने शुरू हो गए। 2014 के लोकसभा चुनाव के ठीक अगले साल यानी 2015 में गुजरात में आंदोलनों का एक सिलसिला शुरू हुआ जिसके केंद्र में समुदाय और जातियाँ थीं। सामाजिक मुद्दों पर शुरू हुए इन आंदोलनों के बाद कई और आंदोलन हुए और आखिर में वही हुआ जो ऐसे आंदोलनों में होता है: सरकार पर खतरा मंडराने लगा। अंतत: आनंदीबेन पटेल को इस्तीफा देना पड़ा और विजय रूपाणी के नेतृत्व में नई सरकार बनी।

इस सरकार के सामने भी कई चुनौतियाँ थीं। जाति की राजनीति अभी भी हावी थी। दो साल बाद 2017 के विधानसभा चुनाव आए और उनमें BJP सत्ता से बाहर होने से सिर्फ 7 सीट दूर थी। 99 सीटों ने सरकार बचा ली लेकिन हालात अच्छे नहीं थे। विपक्ष दो दशकों में सत्ता के सबसे करीब था।

BJP 99 सीटों के साथ सत्ता में तो रही लेकिन उसकी पकड़ मजबूत नहीं थी। 2015 में अलग-अलग समुदायों को आगे करके राज्य में अस्थिरता और अराजकता लाने के बाद से ही सरकार के लिए परिस्थितियाँ मुश्किल होती गई हैं। 2017 में उन्हें इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ा। यह कहना ज्यादा नहीं होगा कि अगर 2017 के चुनाव के नतीजे अलग होते तो केंद्र में हालात अलग होते लेकिन अब यह सब ‘अगर-मगर’ की बात है।

2017 के इन नतीजों के बाद BJP ने नए सिरे से काम करना शुरू किया और पार्टी लगातार मजबूत होती गई। दूसरी तरफ, कॉन्ग्रेस पूरी तरह से कमजोर हो गई थी इसलिए 2017 से पहले चल रही जबरदस्त लड़ाई पूरी तरह से बंद हो गई। 2022 आते-आते माहौल वैसा ही रहा। पिछले अनुभवों से सीखते हुए बीजेपी ने अपने समीकरणों को फिर से ठीक किया, कई दूसरे मुद्दों ने भी भूमिका निभाई और 2022 के चुनावों में ऐसा नतीजा आया जो पहले कभी नहीं देखा गया था। बीजेपी ने 156 सीटें जीतीं और यह संख्या अब कुल 182 सीटों में से बढ़कर 162 हो गई है।

अगर ध्यान से देखें तो गुजरात में यह पैटर्न काफी समय से देखने को मिल रहा है। जब भी कोई मामला पूरे राज्य में चर्चा का विषय बनता है या जानबूझकर बनाया जाता है, तो उसके साथ जाति का एंगल भी जोड़ दिया जाता है। समाज के कुछ नेता सामने आ जाते हैं। इंसान की यह स्वाभाविक आदत होती है कि वह खुद को आगे दिखाना चाहता है, यह साबित करना चाहता है कि वह समाज के लिए काम कर रहा है। इसलिए इसमें सिर्फ उन लोगों की गलती नहीं होती लेकिन इसका नुकसान पूरे समाज को उठाना पड़ता है। ऐसे नेता बीच में कूद पड़ते हैं, राजनीति घुस जाती है और आखिरकार पूरा माहौल खराब हो जाता है।

अगर कोई मुद्दा वास्तव में जाति से जुड़ा हो तो उस पर बात करना समझ में आता है। लेकिन कई बार ऐसे मामलों में भी जाति का रंग चढ़ा दिया जाता है जिनका जाति से कोई लेना-देना नहीं होता। कुछ दिन पहले अंबाजी मंदिर ट्रस्ट और राज परिवार के बीच विवाद में हाईकोर्ट ने फैसला दिया और नवरात्रि में राज परिवार के विशेष पूजा अधिकार को खत्म करने का आदेश दिया। इस मामले में भी सोशल मीडिया पर कुछ जगह इसे जाति से जोड़ने की कोशिश की गई।

हाल ही में सौराष्ट्र के बगदाणा में एक सरपंच पर हमला हुआ और ऐसा माहौल बना दिया गया कि दो जातियाँ आमने-सामने आ गईं। इसके बाद सुरेंद्रनगर में एक जमीन घोटाला पकड़ा गया जिसमें कलेक्टर की गिरफ्तारी हुई तो उस पर ED की कार्रवाई को भी उसकी जाति से जोड़ दिया गया। यहाँ तक कि शादी-ब्याह, प्रेम संबंध जैसे छोटे-छोटे मामलों को भी पूरे राज्य का मुद्दा बना दिया गया और उनमें भी समाज को घसीटा गया। कुछ समय पहले गोंडल के मामलों में भी यही देखने को मिला था।

समाज, जाति जैसे मुद्दे ऐसे होते हैं, जिन पर सरकार और राजनीतिक दल बहुत संभल-संभलकर चलते हैं। अब गुजरात में अगर किसी का नुकसान होना है, तो वह सत्ताधारी पार्टी का ही होना है। विपक्षी दलों के पास इस समय खोने के लिए कुछ खास बचा नहीं है। इसी वजह से वे समय-समय पर ऐसे मुद्दों को हवा देने की कोशिश करते रहते हैं।

विपक्षी दल और उनका पूरा इकोसिस्टम अच्छी तरह जानता है कि विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर अगले दस साल तक गुजरात में बीजेपी को हराना आसान नहीं है। ऐसे में उनके पास एक ही आखिरी रास्ता बचता है- समाज और जातियों को आगे रखकर राजनीति करना। यही कारण है कि हर मुद्दे में किसी न किसी तरह जाति का एंगल जोड़ दिया जाता है और किसी भी तरह से उस मुद्दे को जिंदा रखने की कोशिश की जाती है।

यूट्यूब के पत्रकारों से लेकर तथाकथित इन्फ्लुएंसर्स तक पूरा इकोसिस्टम लगातार ऐसा माहौल बनाने में लगा हुआ है। किसी न किसी रूप में उनकी ज्यादातर खबरें जातियों के इर्द-गिर्द ही घूमती हैं। किसी न किसी तरीके से हमें इन्हीं मुद्दों पर चर्चा करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। चर्चा करना गलत नहीं है लेकिन इसके नतीजों और साइड इफेक्ट्स को समझना भी उतना ही जरूरी है। क्योंकि 2027 तक इस तरह की गतिविधियाँ और ज्यादा देखने को मिलेंगी।

डोनाल्ड ट्रंप के खेल से अमेरिका के कब्जे में वेनेजुएला का ‘काला सोना’, भारत को सस्ता तेल मिलेगा या मिलेगी नई मुसीबत?

सारी दुनिया हैरान है। जनवरी 2026 की शुरुआत में अमेरिका ने वेनेजुएला पर बड़ा सैन्य ऑपरेशन किया। अमेरिकी फोर्सेस ने राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को गिरफ्तार कर न्यूयॉर्क ले जाया। ट्रंप प्रशासन ने साफ कहा कि यह कार्रवाई नार्को-टेररिज्म और ड्रग तस्करी के आरोपों पर हुई, लेकिन असल नजर वेनेजुएला के विशाल तेल भंडार पर है। दुनिया के सबसे बड़े प्रमाणित कच्चे तेल भंडार (करीब 303 अरब बैरल) वाले इस देश पर अब अमेरिका का नियंत्रण हो गया है।

डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की कि अमेरिकी तेल कंपनियाँ वहाँ अरबों डॉलर निवेश करेंगी, खराब हो चुके इंफ्रास्ट्रक्चर को ठीक करेंगी और उत्पादन बढ़ाएँगी। सवाल यह है कि वेनेजुएला के तेल का अब क्या होगा? अमेरिका इसे कैसे निकालेगा और बेचेगा? भारत जैसे देशों को क्या फायदा या नुकसान होगा? आइए विस्तार से समझते हैं।

वेनेजुएला के पास तेल का खजाना, लेकिन बदहाली का शिकार

वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा कच्चा तेल भंडार है, जो करीब 303 अरब बैरल का है। यह सऊदी अरब (267 अरब) और ईरान (208 अरब) से भी ज्यादा है। ज्यादातर तेल ओरिनोको बेल्ट में है, जो एक्स्ट्रा-हेवी क्रूड है। यह गाढ़ा और सल्फर युक्त होता है, इसलिए निकालना और रिफाइन करना महँगा पड़ता है। फिर भी यह डीजल, जहाजों के ईंधन और हेवी इंडस्ट्री के लिए बेहतरीन है।

लेकिन तेल होने के बावजूद वेनेजुएला गरीब और अस्थिर है। ह्यूगो चावेज और मादुरो के शासन में भ्रष्टाचार, गलत नीतियाँ और अमेरिकी प्रतिबंधों ने देश को खोखला कर दिया। कभी रोज 32 लाख बैरल उत्पादन करने वाला देश अब मुश्किल से 8-10 लाख बैरल निकाल पाता है। PDVSA (सरकारी तेल कंपनी) का बुरा हाल है, इंफ्रास्ट्रक्चर जर्जर है, कुशल कर्मचारी भाग गए हैं। अमेरिका ने 2017-2019 से सख्त प्रतिबंध लगाए, जिससे वेनेजुएला ने डिस्काउंट पर चीन, रूस और ईरान को तेल बेचा। इससे अमेरिका नाराज हुआ और तनाव बढ़ा गया।

निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी और तेल पर अमेरिकी कब्जे की कार्रवाई

अमेरिकी स्पेशल फोर्सेस ने 3 जनवरी 2026 को वेनेजुएला की राजधानी काराकास में ऑपरेशन किया। मादुरो दंपति को उनके घर से पकड़ा और न्यूयॉर्क लाया गया। ट्रंप ने कहा कि यह नार्को-टेररिज्म के आरोपों पर हुआ, लेकिन जल्दी ही तेल की बात सामने आई। डोनाल्ड ट्रंप ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “हमारी बड़ी अमेरिकी तेल कंपनियाँ वहाँ जाएँगी, अरबों डॉलर खर्च करेंगी, खराब हो चुके तेल ढाँचे को ठीक करेंगी और देश के लिए पैसा कमाना शुरू करेंगी। हम तेल के कारोबार में हैं, हम जानते हैं कैसे कंपनियां मुनाफे में आती हैं।”

डोनाल्ड ट्रंप ने आगे कहा, “जमीन से निकलने वाला तेल और पैसा बहुत महत्वपूर्ण है। हम जो खर्च करेंगे, उसकी भरपाई हो जाएगी।” उन्होंने चीन को भी आश्वासन दिया कि सप्लाई जारी रहेगी- “उन्हें तेल मिलेगा, हम लोगों को तेल लेने देंगे।” अमेरिका ने अंतरिम सरकार में डेल्सी रोड्रिगेज को रखा है, लेकिन साफ है कि वाशिंगटन ही फैसले लेगा।

अमेरिका वेनेजुएला का तेल कैसे निकालेगा?

वेनेजुएला का तेल ज्यादातर हेवी क्रूड है, जिसे निकालने के लिए विशेष तकनीक चाहिए। पुराना इंफ्रास्ट्रक्चर (पाइपलाइन, पंप, रिफाइनरी) सालों से खराब है। अमेरिकी कंपनियाँ जैसे एक्सॉनमोबिल, शेवरॉन, कोनोकोफिलिप्स अरबों डॉलर निवेश करेंगी। पहले चरण में सर्वे और रिपोर्ट बनेगी, फिर पुराने कुओं को ठीक किया जाएगा, नए ड्रिलिंग शुरू होंगे।

अमेरिका की गल्फ कोस्ट रिफाइनरियाँ इसी हेवी क्रूड के लिए बनी हैं, इसलिए यह उनके लिए परफेक्ट मैच है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि 1-2 साल में उत्पादन 20-25 लाख बैरल रोज तक पहुँच सकता है। लेकिन चुनौतियाँ भी बहुत हैं, खासकर वेनेजुएला से जुड़े पुराने कानूनी विवाद, राष्ट्रीयकरण के पुराने केस, स्थानीय विरोध और राजनीतिक अस्थिरता। अगर सब ठीक रहा तो 5-10 साल में पूरा भंडार सक्रिय हो सकता है। निवेश की भरपाई भविष्य की बिक्री से होगी।

अमेरिका तेल कैसे और किसे बेचेगा?

डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि तेल वैश्विक बाजार में बेचा जाएगा। मुख्य रूप से डॉलर में ट्रेड होगा, जो अमेरिकी डॉलर की ताकत बढ़ाएगा। अमेरिका खुद आयात करेगा, क्योंकि उनकी रिफाइनरियाँ ठप पड़ी हैं। बाकी तेल यूरोप, एशिया (चीन, भारत) को जाएगा। चीन पहले बड़ा खरीदार था, ट्रंप ने कहा कि सप्लाई जारी रहेगी, शायद बेहतर शर्तों पर।

बिक्री का तरीका: अमेरिकी कंपनियां प्रोडक्शन कंट्रोल करेंगी, PDVSA को साइडलाइन कर। तेल स्पॉट मार्केट, लॉन्ग-टर्म कॉन्ट्रैक्ट्स या नए ऑक्शन से बेचा जाएगा। अगर उत्पादन बढ़ा तो वैश्विक कीमतें गिरेंगी (अभी 57-60 डॉलर प्रति बैरल), जो अमेरिकी उपभोक्ताओं को फायदा देगा, लेकिन उनकी शेल इंडस्ट्री को नुकसान। ट्रंप का प्लान है कि सस्ता तेल रूस और ओपेक की कमाई घटाएगा।

रूस-चीन-ओपेक पर कितना असर पड़ेगा?

यह डोनाल्ड ट्रंप की बड़ी रणनीति है। रूस की अर्थव्यवस्था तेल पर निर्भर है, सस्ता तेल होने से उसकी कमाई घटेगी। ऐसे में यूक्रेन युद्ध पर असर पड़ेगा। ओपेक (सऊदी सहित) की कीमत कंट्रोल करने की ताकत कम होगी। चीन को तेल मिलता रहेगा, लेकिन अमेरिकी कंट्रोल में.. जो चीन को परेशान करेगा। कुल मिलाकर अमेरिका ऊर्जा बाजार में सुपरपावर बनेगा।

भारत को क्या फायदा या नुकसान?

भारत दुनिया का तीसरा बड़ा तेल आयातक है, 85% तेल बाहर से लाता है। पहले वेनेजुएला से सस्ता हेवी क्रूड मिलता था (रिलायंस, नायरा एनर्जी प्रोसेस करती थीं)। लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों की वजह से वेनेजुएला से होने वाला आयात रुक गया। हालाँकि भारत के पास रूसी तेल की खरीदी का जब तक मौका था, इन कंपनियों को ज्यादा दिक्कत नहीं हुई, लेकिन आने वाले समय में अगर उत्पादन बढ़ा और भारतीय कंपनियों के लिए सप्लाई आसान होगी, तो भारत के लिए अच्छा मौका बन भी सकता है। हालाँकि इन सबमें अभी काफी समय है।

फायदा: वैश्विक कीमतें गिरेंगी तो भारत को सस्ता तेल मिलेगा। हेवी क्रूड भारत की रिफाइनरियों के लिए अच्छा है, इससे डीजल सस्ता होगा। फर्क ट्रांसपोर्ट-कृषि और कृषि पर सकारात्मक रूप से पड़ेगा। भारत के लिए सप्लाई अच्छी होगी, तो मिडिल ईस्ट-रूस पर से निर्भरता भी घट जाएगी।

नुकसान: शुरुआती अस्थिरता से कीमतें ऊपर जा सकती हैं। अगर अमेरिका प्राथमिकता खुद और सहयोगियों को दे तो भारत को देरी। पुराने कॉन्ट्रैक्ट्स प्रभावित हो सकते हैं। लेकिन कुल मिलाकर लंबे समय में फायदा ज्यादा है, जिसमें महँगाई कंट्रोल में रहेगी और जीडीपी को भी बूस्ट मिलेगा।

वेनेजुएलन तेल के साथ जोखिम और चुनौतियाँ क्या हैं?

वेनेजुएला के तेल संसाधनों पर भले ही अमेरिका ने कब्जा कर लिया हो, लेकिन अभी ये सब आसान बिल्कुल भी नहीं है। सबसे बड़ी समस्या तो अभी वेनेजुएला की अस्थिरता ही है। लोग भी विरोध पर उतर सकते हैं। वेनेजुएला के पुराने फैसलों के कानूनी रास्ते निकालने होंगे। बहुत बड़े पैमाने पर निवेश करना होगा।

ऐसे में अमेरिकी तेल कंपनियों को मुनाफे में आने में लंबा समय लग सकता है। फिर, ट्रंप का कार्यकाल बामुश्किल 3 साल बचा है, ऐसे में अमेरिका में अगर सरकार बदलती है, तो सारे इक्वेशन भी बदल सकते हैं। वेनेजुएला के तेल संसाधनों पर कब्जे के मामले में यूएन में भी बहस चल ही रही है, वहीं अमेरिका का अपना इतिहास भी इतना अच्छा नहीं रहा है कि दुनिया उस पर आँख बंद करके भरोसा कर ले।

नया ऊर्जा युग या नया संकट?

डोनाल्ड ट्रंप का यह कदम दुनिया की ऊर्जा राजनीति बदल देगा। वेनेजुएला का तेल अमेरिकी हाथ में आया तो अमेरिका अजेय हो जाएगा। उसके सस्ते तेल से न सिर्फ रूस बल्कि ओपेक पर भी दबाव बढ़ेगा, ऐसे में डॉलर मजबूत होता जाएगा। हालाँकि भारत जैसे देशों को सस्ती ऊर्जा मिलेगी, तो अर्थव्यवस्था को भी बूस्ट मिलेगा, लेकिन इसके साथ जोखिम भी बढ़ जाएगा। फिलहाल दुनिया नजर रखे हुए है कि यह खेल कैसे खत्म होता है। तेल आज भी दुनिया का सबसे बड़ा हथियार है और वेनेजुएला उसका सबसे बड़ा खजाना।

आरक्षित उम्मीदवार ओपन मेरिट से अधिक नंबर लाने पर जनरल सीट के हकदार, बशर्ते ना लिया हो रिजर्वेशन का अतिरिक्त लाभ: जानें- ‘डबल बेनिफिट’ और ‘माइग्रेशन’ पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि अगर कोई उम्मीदवार SC, ST या OBC जैसे आरक्षित वर्ग से है लेकिन उसके नंबर जनरल कैटेगरी की कट-ऑफ से अधिक हैं, तो उसे जनरल (ओपन) कैटेगरी में ही माना जाएगा। हालाँकि, कोर्ट ने इसमें एक शर्त भी बताई है।

कोर्ट का कहना है कि सिर्फ इसलिए कि कोई शख्स आरक्षित वर्ग से आता है उसे जनरल सीट से बाहर नहीं किया जा सकता। यह नियम चयन की शॉर्टलिस्टिंग के चरण में भी लागू होता है। कोर्ट ने जो शर्त बताई है, उसे समझना बहुत जरूरी है। इस शर्त का आधार अतिरिक्त आरक्षण लाभ के तर्क पर रखा गया है, जिसे नीचे डिटेल में बताया गया है।

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने राजस्थान हाईकोर्ट प्रशासन की अपील खारिज करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराया। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि जनरल या ओपन कैटेगरी किसी खास जाति या वर्ग की नहीं होती बल्कि काबिलियत के आधार पर सभी के लिए खुली होती है।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा अगस्त 2022 में शुरू की गई भर्ती प्रक्रिया से जुड़ा है। यह भर्ती राजस्थान हाईकोर्ट स्टाफ सर्विस रूल्स 2002 और राजस्थान जिला न्यायालय मंत्रिस्तरीय स्थापना नियम 1986 के तहत निकाली गई थी। इसमें कुल 2,756 पदों पर भर्ती होनी थी जिनमें जूनियर ज्यूडिशियल असिस्टेंट और क्लर्क ग्रेड-II के पद शामिल थे। ये पद राजस्थान हाई कोर्ट, जिला न्यायालयों और न्यायिक अकादमी जैसी संस्थाओं के लिए थे।

यह भर्ती प्रक्रिया दो चरणों में तय की गई थी। पहले चरण में 300 अंकों की लिखित परीक्षा हुई और दूसरे चरण में 100 अंकों की कंप्यूटर आधारित टाइपिंग परीक्षा रखी गई थी। नियम यह था कि लिखित परीक्षा में न्यूनतम तय अंकों से ऊपर अंक लाने वाले उम्मीदवारों में से हर कैटेगरी में पदों की संख्या के 5 गुना उम्मीदवारों को टाइपिंग टेस्ट के लिए शॉर्टलिस्ट किया जाएगा। अंतिम चयन लिखित परीक्षा और टाइपिंग टेस्ट के कुल अंकों के आधार पर होना था।

लिखित परीक्षा का परिणाम मई 2023 में घोषित हुआ। इसके बाद भर्ती प्राधिकरण ने कैटेगरी टाइपिंग टेस्ट के लिए शॉर्टलिस्ट तैयार की। इसमें सामान्य वर्ग का कट-ऑफ लगभग 196 अंक रहा लेकिन अनुसूचित जाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, अति पिछड़ा वर्ग और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग जैसी कई आरक्षित कैटेगरी का कट-ऑफ इससे काफी ज्यादा रहा। कुछ मामलों में तो यह 230 अंकों से भी ऊपर चला गया। इसका असर यह हुआ कि कुछ रिजर्व वर्ग के उम्मीदवार जिन्होंने सामान्य वर्ग के कट-ऑफ से ज्यादा अंक हासिल किए थे लेकिन अपनी ही कैटेगरी के कट-ऑफ से कम अंक लाए थे, उन्हें टाइपिंग टेस्ट के लिए बुलाया ही नहीं गया।

अलग-अलग श्रेणी के लिए कट-ऑफ मार्क्स

इन उम्मीदवारों की शिकायत यह थी कि वे कई ऐसे सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों से बेहतर अंक लाने के बावजूद आगे की प्रक्रिया से बाहर कर दिए गए। वहीं, सामान्य वर्ग के कम अंक वाले उम्मीदवार टाइपिंग टेस्ट में शामिल हो गए। इससे उन्हें टाइपिंग टेस्ट देने का मौका ही नहीं मिला। इसी आधार पर इससे प्रभावित हुए उम्मीदवारों ने राजस्थान हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और तर्क दिया कि इस तरह की शॉर्टलिस्टिंग प्रक्रिया सामान्य या ओपन कैटेगरी को अनारक्षित उम्मीदवारों के लिए ही मानती है। उम्मीदवारों ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत समानता और समान अवसर के अधिकार का उल्लंघन बताया था।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

इस मामले में राजस्थान हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने साफ किया कि कैटेगरी के हिसाब से शॉर्टलिस्ट करना गलत नहीं है लेकिन उसका तरीका और समय बहुत अहम है। अदालत ने कहा कि अगर कोई आरक्षित वर्ग का उम्मीदवार बिना किसी विशेष छूट या रियायत के सामान्य वर्ग के कट-ऑफ से अधिक अंक लाता है, तो उसे उसी स्तर पर ओपन या सामान्य श्रेणी की सूची में शामिल किया जाना चाहिए।

अदालत ने यह भी आदेश दिया कि पूरी मेरिट लिस्ट को दोबारा तैयार किया जाए और जिन उम्मीदवारों को गलत तरीके से टाइपिंग टेस्ट से बाहर कर दिया गया था, उन्हें टाइपिंग टेस्ट में शामिल होने का मौका दिया जाए। साथ ही, कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि वह न तो आरक्षण व्यवस्था को खत्म कर रही है और न ही यह कह रही है कि श्रेणीवार शॉर्टलिस्टिंग हमेशा गलत है। समस्या इस बात की थी कि श्रेणी का इस्तेमाल किस चरण पर और किस तरीके से किया गया।

हाईकोर्ट ने माना कि रिजर्व कैटेगरी के उम्मीदवार को जनरल/ओपन कैटेगरी के कट-ऑफ मार्क्स से अधिक नंबर लाने के बाद भी कैटेगरी की वजह से बाहर करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन होगा। हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 16(1), 16(4) और अनुच्छेद 14 की व्याख्या करते हुए कहा कि अनुच्छेद 16(1) सरकारी नौकरी में समान अवसर की गारंटी देता है जबकि अनुच्छेद 16(4) सामाजिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए आरक्षण की अनुमति देता है। इन दोनों का आधार अनुच्छेद 14 है, जो मनमाने और भेदभावपूर्ण वर्गीकरण को रोकता है।

हाईकोर्ट ने कैटेगरी-वाइज लिस्ट को रिवाइज करने का निर्देश दिया जिसमें सबसे पहले जनरल/ओपन कैटेगरी की लिस्ट मेरिट के आधार पर तैयार की जाएगी। कोर्ट ने कहा कि इसमें आरक्षित कैटेगरी के उन उम्मीदवारों को शामिल किया जाएगा जिन्होंने अनारक्षित कट-ऑफ से ज्यादा नंबर हासिल किए थे, बशर्ते उन्होंने किसी विशेष लाभ (उम्र या अटेम्प्ट आदि में छूट भी शामिल) का फायदा न उठाया हो।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले में राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले की चर्चा

सुप्रीम कोर्ट के सामने सवाल?

इस मामले में जब राजस्थान हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई तो हाई कोर्ट प्रशासन की ओर से तीन मुख्य दलीलें रखी गईं। दावा किया गया कि काबिल रिजर्व कैटेगरी के कैंडिडेट को जनरल कैटेगरी में एडजस्ट करने का नियम फाइनल सिलेक्शन के स्टेज पर लागू होना चाहिए यानी जब फाइनल मेरिट लिस्ट तैयार हो, न कि परीक्षा के दूसरे स्टेज के लिए शॉर्टलिस्टिंग के बीच के स्टेज पर। अगर ऐसा होता है तो उन्हें दोहरा लाभ मिला जाएगा।

दूसरी दलील दी गई कि आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों के ओपन कैटेगरी में आने से जुड़ा जो न्यायिक सिद्धांत पहले से मौजूद है और वह केवल अंतिम चयन के चरण पर लागू होता है, बीच के चरणों पर नहीं। तीसरी दलील यह थी कि जो उम्मीदवार भर्ती प्रक्रिया में शामिल हुए वे बाद में उसी प्रक्रिया को चुनौती नहीं दे सकते क्योंकि उन्होंने भाग लेकर उसे स्वीकार कर लिया था। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस सभी दलीलों को खारिज कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कई फैसले बताते हैं कि जो उम्मीदवार सिलेक्शन प्रोसेस में हिस्सा लेते हैं, वे बाद में अपनाए गए तरीके को सिर्फ इसलिए चुनौती नहीं दे सकते क्योंकि नतीजा उनके मन मुताबिक नहीं है। हालाँकि, यह नियम पक्का नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “एडवर्टाइजमेंट सरकारी नौकरी के उम्मीदवारों के लिए एक रिप्रेजेंटेशन था कि कैटेगरी के हिसाब से लिस्ट तैयार की जाएँगी। कोई भी ऐसी शर्त पर सवाल नहीं उठाएगा। लेकिन इस बात का कोई संकेत नहीं था कि काबिल रिजर्व कैटेगरी के कैंडिडेट को जनरल/ओपन कैटेगरी के कैंडिडेट नहीं माना जाएगा।”

सुप्रीम कोर्ट ने दोहरे लाभ के सवालों को भी खारिज कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “आवेदन में अपनी आरक्षित श्रेणी बताने से उम्मीदवार अपने-आप आरक्षित पद पर चयनित नहीं हो जाता बल्कि इससे उसे अन्य आरक्षित उम्मीदवारों के बीच अपनी आपसी (इंटर-से) मेरिट के आधार पर दावा करने का अवसर मिलता है।”

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को ‘डबल लाभ’ मिलने की जो आशंका जताई जाती है, वह इस गलत धारणा पर आधारित है कि आरक्षित वर्ग का उम्मीदवार कई स्तरीय चयन प्रक्रिया के हर या एक से अधिक चरणों में आरक्षण का लाभ ले रहा है। ‘डबल लाभ’ की आशंका गलत और निराधार है।”

माइग्रेन के मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “हमने निष्कर्ष निकाला है कि ‘ओपन’ शब्द का अर्थ केवल और केवल ‘खुला’ ही है यानि जिन रिक्त पदों को ‘ओपन’ के रूप में चिह्नित करके भरा जाना है, वे किसी भी श्रेणी में नहीं आते। इन पर किसी भी उपयुक्त उम्मीदवार की नियुक्ति की जा सकती है चाहे उसकी जाति, जनजाति, वर्ग या लिंग कुछ भी हो।”

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “आरक्षित वर्ग का कोई उम्मीदवार अगर ‘बिना किसी छूट या रियायत के’ केवल अपनी मेहनत के दम पर प्रारंभिक या स्क्रीनिंग परीक्षा में ना केवल आरक्षित उम्मीदवारों बल्कि बल्कि सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों से भी अधिक अंक ले आता है तो ऐसे उम्मीदवार को आगे की परीक्षा (दूसरे चरण) में जाने का हक मिलता है तो वहाँ ‘माइग्रेशन’ की जरूरत ही नहीं है।”

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हिस्सा

हालाँकि, कोर्ट ने कहा कि ऊपर बताई गई हमारी बातें सिर्फ इसी सिलेक्शन प्रोसेस पर लागू होती हैं। अगर किसी भर्ती के नियम कुछ और बताते हैं तो भर्ती नियमों को प्राथमिकता मिलेगी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “शॉर्टलिस्टिंग के चरण में किसी आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार का ओपन मेरिट लिस्ट में शामिल होना ‘माइग्रेशन’ नहीं माना जा सकता क्योंकि इसमें आरक्षण से जुड़ी किसी भी तरह की छूट या लाभ नहीं लिया गया है। अपीलकर्ताओं के तर्क को स्वीकार कर लिया जाए तो इसका न केवल वंचित वर्गों के उम्मीदवारों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा बल्कि संविधान में निहित मूल सिद्धांतों को भी कमजोर करेगा।”

हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में एक कावेयट भी दर्ज कराई है। कोर्ट ने कहा, “इन सिद्धांतों से ऐसी स्थिति पैदा हो सकती है कि कोई आरक्षित वर्ग का उम्मीदवार अपने प्रदर्शन के आधार पर सामान्य/ओपन वर्ग के उम्मीदवारों से बेहतर हो जाए और सामान्य मेरिट सूची में आ जाए लेकिन उसके पास विकल्प सीमित रह जाएँ। ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि उसे सामान्य वर्ग का उम्मीदवार मान लिया गया हो और जिस सेवा या पद को वह चाहता हो, वह आरक्षित कोटे के लिए निर्धारित हो।”

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए अपीलों को खारिज कर दिया है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता उम्मीदवारों के मामलों पर विचार करते समय हाईकोर्ट को यह प्रयास करना चाहिए कि पहले से नियुक्त कर्मचारियों को उनके पदों से न हटाया जाए।

फैसले के बड़े मायने

यह सुप्रीम कोर्ट का फैसला सिर्फ राजस्थान हाईकोर्ट की एक भर्ती से जुड़ा तकनीकी निर्णय नहीं है बल्कि यह उस सामाजिक और संवैधानिक बहस को भी स्पष्ट करता है, जो वर्षों से ‘जनरल बनाम रिजर्व कैटेगरी कट-ऑफ’ को लेकर चलती रही है। सोशल मीडिया पर बार-बार ऐसे स्क्रीनशॉट्स दिखाए जाते हैं जिसमें यह दावा किया जाता है कि किसी परीक्षा में SC, ST या OBC का कट-ऑफ जनरल से ज्यादा चला गया है। इसे सहारे मैरिट की बहस शुरू करने की कोशिश की जाती है। यह जजमेंट दरअसल बताता है कि ऐसी स्थिति कैसे पैदा होती है, क्यों पैदा होती है और सबसे महत्वपूर्ण बात कि यह क्यों पूरी तरह वैध और संवैधानिक है।

इस फैसले का दूसरा पहलू और भी ज्यादा महत्वपूर्ण है, जिसे नजरअंदाज कर दिया जाता। इसमें कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि कोई भी उम्मीदवार जो बिना किसी रियायत के परीक्षा में बैठा है उसके लिए यह नियम पूरी तरह लागू होगा। यानी अगर कोई आरक्षित वर्ग का उम्मीदवार किसी प्रकार की रियायत लेकर परीक्षा में बैठा होता जैसे- उम्र में छूट, अटेम्पट में छूट या फिजिकल छूट तो शायद स्थिति बदल जाती। ऐसे उम्मीदवार के ज्यादा अंक होने के बावजूद, वह जनरल सीट के लिए दावा नहीं कर सकता।

आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को सामान्य श्रेणी के पदों पर नियुक्त इस शर्त के साथ किया जाता कि आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार ने परीक्षा में आरक्षण से जुड़ी अन्य सुविधाओं का लाभ ना लिया हो। चूँकि अधिकांश आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार इन सुविधाओं का लाभ लेते हैं और इसलिए भले ही वे सामान्य वर्ग के कट-ऑफ से अधिक अंक क्यों न ले आए हों, उन्हें सामान्य श्रेणी के लिए पात्र नहीं माना जाता। यही वह वजह हैं जिनके चलते सामान्य वर्ग का कट-ऑफ से आरक्षित वर्ग का कट-ऑफ से ऊपर चला जाता है।

असल में होता यह है कि कुछ आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार उम्र या अन्य रियायत लेकर परीक्षा देते हैं और अच्छा स्कोर करते हैं। लेकिन क्योंकि उन्होंने रियायत ली है इसलिए कानून उन्हें जनरल मेरिट में गिनने की अनुमति नहीं देता। वे अपनी ही श्रेणी में गिने जाते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि आरक्षित श्रेणी की मेरिट लिस्ट ऊपर खिसक जाती है और उसका कट-ऑफ कभी-कभी जनरल से भी ज्यादा हो जाता है।

यह जजमेंट इस बात को रेखांकित करता है कि आरक्षण व्यवस्था को दंड या विशेषाधिकार के चश्मे से नहीं बल्कि समावेशन के संतुलन के रूप में समझा जाना चाहिए। आरक्षित वर्ग का अधिक कट-ऑफ दिखना इस संतुलन के टूटने का नहीं बल्कि उसके सही ढंग से लागू होने का ही संकेत है। यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी स्थिति को न केवल स्वीकार्य माना बल्कि उसे पूरी तरह वैध और संवैधानिक ठहराया।

हिंदू मंदिर की जमीन 30 साल पहले अवैध तरीके से बेची, मुस्लिमों ने खड़ी कर दी 2-2 मस्जिदें: मद्रास HC ने सौदे को किया रद्द, देवता को वापस मिलेगी ₹110 करोड़ की संपत्ति

मद्रास हाईकोर्ट ने 15 दिसंबर 2025 को अरुलमिगु अन्नामलाईनाथर मंदिर की 3.93 एकड़ जमीन की बिक्री को रद्द कर दिया। कोर्ट ने माना कि 1990 के दशक में हुई यह बिक्री अवैध थी, प्रक्रिया में गंभीर खामियाँ थीं और धार्मिक संपत्तियों की सुरक्षा के मकसद के पूरी तरह खिलाफ थी।

इस मामले में कई पक्षकार थे, जिनमें करीब 90 लोग मुस्लिम थे और इसमें कम से कम दो मस्जिदें भी शामिल थीं। ऑपइंडिया के पास मद्रास हाई कोर्ट के फैसले की कॉपी मौजूद है।

मद्रास हाई कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि मंदिर की जमीन को निजी संपत्ति की तरह बेचा नहीं जा सकता। इसे देवता और भक्तों के फायदे के लिए संरक्षित रखना जरूरी है। कोर्ट ने आगे आदेश दिया कि यह जमीन मंदिर को वापस लौटाई जाए। इस फैसले के साथ करीब 30 साल से चल रहा विवाद खत्म हो गया।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्त विभाग (HR&CE) के तहत काम करने वाले ट्रस्टी और अधिकारी मंदिर की संपत्ति के मालिक नहीं, बल्कि सिर्फ उसके संरक्षक होते हैं। अगर कानून में तय सुरक्षा प्रावधानों का उल्लंघन किया गया हो, तो बाद में सरकार के आदेश भी ऐसी अवैध बिक्री को वैध नहीं बना सकते।

फैसले में कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ संपत्ति विभाग (एचआरएंडसीई) के ट्रस्टी और अधिकारी सिर्फ मंदिर संपत्ति के संरक्षक हैं। कानूनी सुरक्षा प्रावधानों से कोई विचलन, भले ही बाद में सरकारी आदेशों से समर्थित हो, अवैध बिक्री को वैध नहीं बना सकता। फैसले ने दोहराया कि एचआरएंडसीई एक्ट के अनिवार्य प्रावधान सिर्फ औपचारिकताएँ नहीं हैं। ये धार्मिक संपत्तियों के दुरुपयोग और क्षरण को रोकने के लिए ठोस सुरक्षा हैं।

कौन सी जमीन थी शामिल और वह मंदिर की क्यों थी?

यह विवाद कडयनल्लूर में स्थित 3.93 एकड़ जमीन को लेकर था। यह जमीन लंबे समय से अरुलमिगु अन्नामलाईनाथर मंदिर की दर्ज थी। यह मंदिर की दान में दी गई संपत्तियों का हिस्सा थी और धार्मिक व धर्मार्थ कार्यों के लिए आय या उपयोग उत्पन्न करने के लिए थी। खास बात यह है कि ये दान देवता के नाम पर होते हैं, न कि किसी व्यक्तिगत ट्रस्टी या प्रशासक के नाम पर।

कोर्ट ने कहा कि मंदिर की जमीनों को विशेष कानूनी दर्जा प्राप्त है। इन्हें मनमाने ढंग से बेची जाने वाली व्यावसायिक संपत्ति नहीं माना जा सकता। ये धार्मिक संपत्तियां हैं जिन्हें कानून, परंपरा और सार्वजनिक विश्वास से संरक्षण मिला है। ऐसी जमीन बेचने का फैसला जरूरत, पारदर्शिता और मंदिर को स्पष्ट लाभ के सख्त परीक्षणों से गुजरना पड़ता है।

इसी पृष्ठभूमि में 30 साल पहले हुई बिक्री की जाँच की गई। सुनवाई में कोर्ट ने देखा कि जमीन कैसे बेची गई और क्या किसी चरण में कानून का पालन हुआ। ऐसी किसी भी भूमि की बिक्री तभी संभव है, जब वह अत्यंत आवश्यक हो, पूरी तरह पारदर्शी हो और उससे मंदिर को स्पष्ट और प्रत्यक्ष लाभ हो। इस तथ्य पर ये सौदा खरा नहीं उतरा।

ट्रस्टी ने मंदिर की जमीन बेचने का निर्णय कैसे लिया?

इस विवाद की शुरुआत 1990 के शुरुआती वर्षों में हुई जब मंदिर के वंशानुगत ट्रस्टी वी सुब्रमण्या अय्यर ने मंदिर की कुछ जमीन बेचने का फैसला लिया। बिक्री का तर्क दिया गया कि पैसा जमा कराया जाएगा और उसका ब्याज मंदिर के खर्चों के लिए इस्तेमाल होगा। लेकिन बाद में इस तर्क की गहराई से जाँच हुई क्योंकि मंदिर संपत्तियों का कानून बिक्री की इजाजत सिर्फ तभी देता है जब वह अनिवार्य हो और संस्था को स्पष्ट लाभ हो।

कोर्ट ने देखा कि रिकॉर्ड में कोई सामग्री नहीं थी जो दिखाती कि मंदिर को ऐसी आर्थिक तंगी थी कि जमीन बेचनी पड़ी। बल्कि प्रस्ताव प्रशासनिक सुविधा से प्रेरित लगता था, न कि वास्तविक जरूरत से। कोर्ट ने जोर दिया कि ट्रस्टी का काम अल्पकालिक नकदी बढ़ाना नहीं बल्कि भावी पीढ़ियों के भक्तों के लिए मंदिर संपत्ति संरक्षित रखना है।

इसी पृष्ठभूमि में कोर्ट ने करीब 30 साल पहले हुई इस जमीन की बिक्री की जाँच की। सुनवाई के दौरान यह परखा गया कि जमीन किन परिस्थितियों में बेची गई, किस प्रक्रिया का पालन किया गया और क्या किसी भी स्तर पर कानून का सही तरीके से अनुपालन किया गया था या नहीं।

1995 की सार्वजनिक नीलामी और कम मूल्यांकन के आरोप

ट्रस्टी द्वारा जमीन बेचने का फैसला लेने के बाद वर्ष 1995 में एक सार्वजनिक नीलामी कराई गई। कागजों में यह प्रक्रिया नियमों के अनुसार दिखाई गई, लेकिन इसके तरीके पर जल्द ही गंभीर सवाल खड़े हो गए। नीलामी में सबसे अधिक बोली लगाने वाला आर सुब्रमणियम निकला, जो मंदिर के वंशानुगत ट्रस्टी का भतीजा था। यह बात सामने आते ही हितों के टकराव (कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट) के आरोप लगने लगे।

उस समय यह जमीन करीब 10.17 लाख रुपए में बेच दी गई, जबकि कई संबंधित लोगों का कहना था कि यह कीमत बाजार मूल्य से बहुत कम थी। आज उसी जमीन की कीमत लगभग 110 करोड़ रुपए आँकी जा रही है। बाद में कोर्ट ने टिप्पणी की कि जब मंदिर की जमीन बेची जाती है, तो अधिकारियों की जिम्मेदारी होती है कि संस्था को सबसे बेहतर और उचित कीमत मिले। यदि किसी बिक्री से मंदिर को नुकसान पहुँचता है और निजी लोगों को फायदा होता है, तो यह HR&CE एक्ट के तहत मंदिर की संपत्तियों की रक्षा के उद्देश्य के खिलाफ है।

नीलामी के बाद आपत्तियाँ कानूनी समस्या क्यों बन गईं?

पूरी जमीन बिक्री प्रक्रिया में एक गंभीर खामी थी, खासकर आपत्तियाँ आमंत्रित करने के समय को लेकर। नियमों के अनुसार, मंदिर की संपत्ति की नीलामी को अंतिम रूप देने से पहले भक्तों, किराएदारों और अन्य हितधारकों से आपत्तियाँ माँगी जानी चाहिए थीं। इसका उद्देश्य यह होता है कि नीलामी की आवश्यकता, जमीन का सही मूल्य और प्रक्रिया की निष्पक्षता पर पहले ही विचार किया जा सके।

लेकिन इस मामले में अधिकारियों ने पहले नीलामी कर दी और उसके बाद आपत्तियाँ आमंत्रित कीं। यह पूरी प्रक्रिया को उल्टा करने जैसा था। मद्रास हाई कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि नीलामी के बाद आपत्तियाँ बुलाना कोई छोटी या सुधारी जा सकने वाली गलती नहीं है, बल्कि यह कानून में तय सुरक्षा प्रावधानों का गंभीर उल्लंघन है।

कोर्ट के अनुसार, आपत्तियाँ पहले बुलाने का मकसद ही यही होता है कि कोई भी चिंता या आपत्ति समय रहते सुनी जाए, ताकि कोई गलत या नुकसानदेह फैसला होने से रोका जा सके। जब यह मौका ही नहीं दिया गया, तो संबंधित लोगों को अपनी बात रखने का वास्तविक अधिकार नहीं मिला। इसी वजह से पूरी बिक्री प्रक्रिया को अवैध और कानून के खिलाफ माना गया।

2001 में दीवानी अदालत के फैसले में बिक्री को घोषित किया गया अमान्य

नीलामी में हुई गड़बड़ियों के कारण यह मामला अंततः सिविल कोर्ट तक पहुँचा। वर्ष 2001 में सिविल कोर्ट ने नीलामी के जरिए खरीदार के पक्ष में बनाए गए सभी बिक्री विलेखों को अमान्य और शून्य घोषित कर दिया। कोर्ट ने साफ कहा कि यह बिक्री कानून की अनिवार्य शर्तों का उल्लंघन करके की गई थी और केवल इसे ‘सार्वजनिक नीलामी’ बताकर वैध नहीं ठहराया जा सकता।

यह फैसला इसलिए भी अहम था क्योंकि इसे न तो खरीदारों ने और न ही संबंधित अधिकारियों ने कभी चुनौती दी। परिणामस्वरूप यह निर्णय अंतिम (फाइनल) हो गया। कानूनी रूप से इसका अर्थ यह हुआ कि बिक्री स्वतः रद्द मानी गई और वह जमीन मंदिर की ही संपत्ति बनी रही।

बाद में हाई कोर्ट ने भी स्पष्ट किया कि जब एक सक्षम सिविल कोर्ट पहले ही इस लेन-देन को अवैध घोषित कर चुका है, तो उसे किसी प्रशासनिक या कार्यकारी आदेश के जरिए दोबारा जीवित या वैध करने का कोई कानूनी आधार नहीं है।

सिविल कोर्ट के मौजूदा फैसले के बावजूद यह मामला दोबारा कैसे आया सामने?

सिविल कोर्ट के फैसले को कभी चुनौती नहीं दी गई थी और वह अंतिम रूप ले चुका था, फिर भी विवाद खत्म नहीं हुआ। कई वर्षों बाद नीलामी में जमीन खरीदने वाले व्यक्ति ने HR&CE कानून के तहत सरकार से हस्तक्षेप की माँग की। हैरान करने वाली बात यह रही कि सरकार ने एक आदेश जारी कर विभाग को बिक्री विलेख (सेल डीड) के निष्पादन की प्रक्रिया आगे बढ़ाने का निर्देश दे दिया। इस तरह सरकार ने उस लेन-देन को फिर से जीवित करने की कोशिश की, जिसे सिविल कोर्ट पहले ही अवैध घोषित कर चुका था।

इस पर हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया। कोर्ट ने साफ कहा कि कोई भी कार्यपालिका या सरकारी प्राधिकारी न्यायालय के फैसले के ऊपर अपील की तरह काम नहीं कर सकता, खासकर तब जब वह फैसला अंतिम हो चुका हो। यदि किसी सरकारी आदेश को सिविल कोर्ट के निर्णय पर हावी होने दिया जाए, तो यह न केवल कानून के शासन को कमजोर करेगा, बल्कि धार्मिक संपत्तियों के प्रबंधन के लिए एक खतरनाक मिसाल भी कायम करेगा।

धारा 34 के तहत सरकारी हस्तक्षेप और इसके कानूनी निहितार्थ

सरकार ने अपने आदेश को HR&CE अधिनियम की धारा 34 का सहारा लेकर सही ठहराने की कोशिश की। इस धारा के तहत विशेष परिस्थितियों में मंदिर की संपत्ति बेचने की अनुमति दी जा सकती है। लेकिन हाई कोर्ट ने इस तर्क को साफ तौर पर खारिज कर दिया।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 34 कोई खुली छूट नहीं देती। इस अधिकार का प्रयोग कड़े नियमों और शर्तों के तहत ही किया जा सकता है। इसका इस्तेमाल न तो कानून में तय सुरक्षा प्रावधानों को दरकिनार करने के लिए किया जा सकता है और न ही किसी न्यायिक फैसले को अनदेखा या निष्प्रभावी करने के लिए।

कोर्ट ने यह भी कहा कि धारा 34 के तहत सरकार पहले से अवैध घोषित की जा चुकी बिक्री को बाद में वैध नहीं बना सकती। किसी भी तरह की सरकारी मंजूरी से पहले यह अनिवार्य है कि सभी जरूरी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया जाए।

इनमें यह साबित करना शामिल है कि बिक्री वास्तव में आवश्यक थी, संबंधित लोगों को पहले से नोटिस दिया गया हो और उनकी आपत्तियों पर विचार किया गया हो। मौजूदा मामले में कोर्ट ने पाया कि इनमें से कोई भी बुनियादी कानूनी प्रक्रिया सही तरीके से पूरी नहीं की गई थी, इसलिए धारा 34 का सहारा लेकर सरकारी आदेश को सही नहीं ठहराया जा सकता।

हाई कोर्ट ने HR&CE अधिनियम में कानूनी खामियों को भी किया दूर

कोर्ट ने इस मामले की जाँच करते हुए HR&CE अधिनियम में बनाए गए सुरक्षा उपायों का विस्तार से विश्लेषण किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ये नियम इसलिए बनाए गए हैं ताकि मंदिर की संपत्तियों का दुरुपयोग उन लोगों द्वारा न हो जो उनकी देखभाल के लिए जिम्मेदार हैं।

ट्रस्टी और अधिकारी इस बात के लिए जिम्मेदार हैं कि वे मंदिर और भक्तों के हित की रक्षा करें, न कि मंदिर की संपत्ति को अपनी मर्जी से बेचने या इस्तेमाल करने के लिए। कोर्ट ने कहा कि कानून में तय किया गया क्रम पूरी तरह उलट दिया गया था।

सार्वजनिक सूचना देना, आपत्तियों पर विचार करना और आवश्यकताओं का मूल्यांकन करना या तो नहीं किया गया, या केवल औपचारिकता के रूप में किया गया। ऐसे उल्लंघन मामूली गलती नहीं हैं, बल्कि वे उस लेन-देन की वैधता की जड़ को ही कमजोर कर देते हैं।

ट्रस्टी की शक्तियों की आवश्यकता, लाभ और दुरुपयोग पर कोर्ट के निष्कर्ष

कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या मंदिर की जमीन को बेचना वास्तव में आवश्यक था या उससे मंदिर को कोई वास्तविक लाभ होने वाला था। ट्रस्टी ने यह तर्क दिया कि जमीन बेचकर जो धन मिलेगा, उसे जमा कर दिया जाएगा और उस पर मिलने वाले ब्याज से मंदिर के खर्च चलाए जाएँगे। लेकिन कोर्ट ने इस तर्क को पूरी तरह अपर्याप्त और अस्वीकार्य माना।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि इस तरह की दलील को स्वीकार कर लिया जाए, तो किसी भी मंदिर की जमीन को केवल ब्याज कमाने के बहाने बेचा जा सकता है। ऐसा होने पर मंदिर संपत्तियों की रक्षा के लिए बनाए गए कानूनों और सुरक्षा प्रावधानों का कोई अर्थ ही नहीं रह जाएगा।

फैसले में यह भी कहा गया कि ट्रस्टियों को मंदिर की संपत्ति बेचने की खुली छूट नहीं है। मंदिर की जमीन धार्मिक और परोपकारी उद्देश्यों के लिए ट्रस्ट के रूप में रखी जाती है, इसलिए उसके प्रबंधन पर सख्त कानूनी नियंत्रण होता है। बिना किसी ठोस और अनिवार्य आवश्यकता के ऐसी संपत्ति को बेचना, जिससे उसका स्थायी नुकसान हो, ट्रस्ट की जिम्मेदारी का उल्लंघन माना जाएगा।

मंदिर की भूमि पर कब्जा करने वालों की स्थिति और अधिकारियों द्वारा उठाए गए कदम

अपने फैसले में कोर्ट ने इस तथ्य पर ध्यान दिया कि विवाद के अंतिम चरण तक पहुँचते-पहुँचते जमीन के कुछ हिस्सों पर कई लोग कब्जा कर चुके थे। कोर्ट ने सीधे सभी को हटाने का आदेश देने के बजाय एक व्यावहारिक रास्ता अपनाया। कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद प्रशासन ने कब्जाधारियों को दो विकल्प दिए, या तो वे मंदिर के अधीन किराएदार बनकर जमीन को नियमित करें, या फिर उसे खाली करें।

कोर्ट के सामने रखे गए अभिलेखों के अनुसार, कई लोगों ने मंदिर प्रशासन के तहत किराएदार के रूप में बने रहने पर सहमति जताई। जिन लोगों ने सहयोग करने से इनकार किया, उनके खिलाफ स्थानीय प्रशासन की मदद से बेदखली की कार्यवाही शुरू की गई।

हाई कोर्ट ने इन तथ्यों का उल्लेख यह दिखाने के लिए किया कि मंदिर की संपत्ति की बहाली केवल कागजी प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि उसे जमीन पर वास्तव में लागू किया जा रहा था।

इस संदर्भ में जमीन पर कब्जा किए लोगों की पहचान का भी उल्लेख हुआ, हालाँकि यह बात कोर्ट के कानूनी निर्णय का आधार नहीं बनी। मामले के रिकॉर्ड से पता चलता है कि जिन लोगों को प्रतिवादी बनाया गया था, वे वही थे जिन्होंने मूल बिक्री के बाद जमीन खरीदी थी या बाद में खरीद के जरिए कब्जे में आए थे।

कार्यवाही में दर्ज नामों से यह भी सामने आया कि इनमें से अधिकांश लोग स्थानीय मुस्लिम समुदाय से थे और विवादित भूमि पर कम से कम दो मस्जिदें भी मौजूद थीं, जिन्हें भी मुकदमे में पक्षकार बनाया गया था। हालाँकि इन धार्मिक ढाँचों की मौजूदगी या कब्जा करने वालों की पहचान को कोर्ट ने निर्णायक नहीं माना।

हाई कोर्ट ने खुद को केवल इस प्रश्न तक सीमित रखा कि मूल बिक्री कानूनी थी या नहीं और जिन अनुमतियों के आधार पर बिक्री की गई थी वे वैध थीं या नहीं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जमीन पर बाद में हुए निर्माण या कब्जा करने वाले लोगों की पहचान, मंदिर की संपत्ति से जुड़े वैधानिक संरक्षणों और कानूनी प्रावधानों को निष्प्रभावी नहीं कर सकती।

कोर्ट द्वारा जारी अंतिम निर्देश और उनका व्यावहारिक प्रभाव

मामले का निपटारा करते हुए हाई कोर्ट ने बिक्री को रद्द करने के फैसले को बरकरार रखा और स्पष्ट किया कि संबंधित भूमि मंदिर के पास ही बनी रहेगी। कोर्ट ने उन सरकारी आदेशों को भी रद्द कर दिया, जिनके माध्यम से अवैध लेन-देन को दोबारा जीवित करने की कोशिश की गई थी।

कोर्ट ने दो टूक कहा कि कोई भी कार्यपालिका आदेश न तो कानून में तय प्रावधानों से ऊपर हो सकता है और न ही कोर्ट के अंतिम निर्णय को निष्प्रभावी कर सकता है।

कोर्ट ने यह भी साफ संदेश दिया कि धार्मिक न्यासों (मंदिर संपत्ति) के मामलों में समय बीत जाने से अवैधता वैध नहीं हो जाती। यदि कोई लेन-देन कानून का उल्लंघन करके किया गया है, तो भले ही वह कई दशकों पुराना क्यों न हो, उसकी जाँच की जा सकती है और उसे निरस्त किया जा सकता है।

निष्कर्ष

यह फैसला इस बात को स्पष्ट करता है कि मंदिर की संपत्ति कोई साधारण सरकारी या प्रशासनिक संपत्ति नहीं होती। यह एक पवित्र न्यास (ट्रस्ट) है, जिसे कानून के अनुसार और श्रद्धालुओं के हित में ही संचालित किया जाना चाहिए। कोर्ट ने लगभग तीन दशक पुराने एक अवैध बिक्री सौदे को रद्द करके यह दोहराया कि HR&CE अधिनियम में जो कानूनी सुरक्षा प्रावधान दिए गए हैं, उनका उद्देश्य मंदिर संपत्तियों को धीरे-धीरे और चुपचाप खत्म होने से बचाना है।

ये प्रावधान इसलिए बनाए गए हैं ताकि प्रक्रियाओं के नाम पर मंदिर की जमीन या संपत्ति का दुरुपयोग न हो सके। इस निर्णय में कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि मंदिर के ट्रस्टी हों या सरकार, सभी देवी-देवता और भक्तों के प्रति जवाबदेह हैं। कोई भी गैरकानूनी काम केवल समय बीत जाने से वैध नहीं बन जाता। यदि कोई लेन-देन कानून के खिलाफ है, तो उसे वर्षों बाद भी रद्द किया जा सकता है।

यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

इराक से वेनेजुएला तक हर ऑपरेशन में NYT, WaPo और दूसरे US मीडिया के बड़े चैनल फैलाते रहे प्रोपेगैंडा: करते रहे अमेरिका के लिए काम, जानिए कैसे

US मिलिट्री ने वेनेजुएला के खिलाफ 3 जनवरी 2026 की सुबह, ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिज़ॉल्व नाम का एक बड़ा ऑपरेशन चलाया। इस दौरान US एयरक्राफ्ट ने वेनेजुएला के अहम सैन्य ठिकानों पर गोला-बारूद बरसाए, जबकि डेल्टा फोर्स की एक टीम वेनेजुएला के प्रेसिडेंट निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को पकड़ कर ले गई।

मादुरो और फ्लोरेस को कस्टडी में लेकर वेनेजुएला से न्यूयॉर्क ले जाया गया, और US प्रेसिडेंट ट्रंप ने जल्द ही घोषणा की कि उन पर नार्को-टेररिज्म और दूसरे आपराधिक मामले चलेंगे।

इस ऑपरेशन ने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया, सिर्फ इसलिए नहीं कि यह अचानक हुआ, बल्कि इसलिए कि ये एक देश की संप्रुत्ता के खिलाफ आक्रमण था।

ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिज़ॉल्व में एलीट डेल्टा फोर्स कमांडो, 150 से ज़्यादा एयरक्राफ्ट, एयरस्ट्राइक के अलावा महीनों से CIA द्वारा की जा रही निगरानी का परिणाम था। मादुरो को हथकड़ी पहनाकर US फोर्स द्वारा घुमाए जाने की तस्वीरें दशकों तक लोगों को अमेरिकी दादागिरी की याद दिलाती रहेगी। इसके जियोपॉलिटिकल असर को अभी पूरी तरह से समझना बाकी है।

ट्रंप प्रशासन की दुस्साहस के बीच, कई सवाल उठ रहे हैं। कई देशों ने इस घटना की निंदा की है। मादुरो चाहे कितने भी बड़े तानाशाह क्यों न हों, वह एक आज़ाद देश के मुखिया थे। US का मादुरो को पकड़ना उस आज़ादी की अनदेखी थी।

मजे की बात यह है कि US मीडिया, जो ह्यूमन राइट्स, डेमोक्रेसी और जस्टिस का ग्लोबल चैंपियन है और नियमित रूप से पूरी दुनिया को उपदेश देता है, इस काम की तारीफ कर रहा है।

एक रिपोर्ट के मुताबिक, US मीडिया के कुछ बड़े मीडिया को मादुरो को पकड़ने के प्लान के बारे में पहले से पता था, लेकिन उन्होंने ‘नेशनल सिक्योरिटी’ के लिए चुप रहना पसंद किया। सेमाफोर की एक एक्सक्लूसिव रिपोर्ट से पता चला है कि NYT और वाशिंगटन पोस्ट दोनों को रेड शुरू होने से पहले ही इसकी जानकारी थी, लेकिन उन्होंने चुप रहना चुना और ट्रंप एडमिनिस्ट्रेशन के ‘रिक्वेस्ट’ पर इसके बारे में कुछ भी पब्लिश करने में देरी की।

NYT और वॉशिंगटन पोस्ट का यह फैसला साफ तौर पर उनकी ‘पत्रकारिता की परंपराओं’ के हिसाब से था। सेमफ़ोर लिखते हैं, “ यह अमेरिकी नेशनल सिक्योरिटी के कुछ सबसे बड़े मुद्दों पर संपर्क और यहाँ तक कि सहयोग की एक अनोखी झलक दिखाता है।”

NYT और वॉशिंगटन पोस्ट ने जो बात मानी है, वह अहम है। असल में USA का पुराना मीडिया पहले दिन से ही ट्रंप के खिलाफ आवाज उठाता रहा है। साथ ही, क्योंकि USA का वही पुराना मीडिया पूरी दुनिया के लिए न्याय, नैतिकता और डेमोक्रेटिक मूल्यों का खुद को उपदेशक बताता है।

लेकिन, ये ​​कोई नई बात नहीं है। ऐसे कई उदाहरण हैं, जब US के पुराने मीडिया ने US प्रोपेगैंडा की तरह काम किया है, US के फ़ायदे के लिए US का ढिंढोरा पीटा है और जब अमेरिका को सबसे अच्छा लगा तो चुप रहा, जबकि वे आम तौर पर बोलने की आज़ादी और मीडिया की आज़ादी के पक्ष में होने का दिखावा करते थे।

बे ऑफ़ पिग्स पर हमला: 1961 में, NYT को कथित तौर पर क्यूबा से निकाले गए लोगों के क्यूबा पर हमला करने के CIA के सपोर्ट वाले प्लान के बारे में पहले से पता था। उस समय के व्हाइट हाउस अधिकारियों के कहने पर, NYT ने पहले पेज की स्टोरी को हल्का कर दिया और CIA के शामिल होने को कम दिखाने की पूरी कोशिश की।

NYT और WaPo का यह फैसला साफ तौर पर उनकी ‘पत्रकारिता की परंपराओं’ के हिसाब से था। सेमफ़ोर लिखते हैं, “ यह अमेरिकी नेशनल सिक्योरिटी के कुछ सबसे बड़े मुद्दों पर सहमति और यहाँ तक कि सहयोग की एक अनोखी झलक दिखाता है।”

NYT और WaPo ने जो बात मानी है, वह ज़रूरी है, क्योंकि असल में USA का पुराना मीडिया पहले दिन से ही ट्रंप के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाता रहा है। साथ ही, क्योंकि USA का वही पुराना मीडिया पूरी दुनिया के लिए न्याय, नैतिकता और डेमोक्रेटिक मूल्यों का खुद को उपदेशक बताता है।

हालाँकि, यह बात मानना ​​कोई नई बात नहीं है। ऐसे कई उदाहरण हैं जहाँ US के पुराने मीडिया ने US प्रोपेगैंडा की तरह काम किया है, US के फ़ायदे के लिए US का ढिंढोरा पीटा है और जब व्हाइट हाउस को सबसे अच्छा लगा तो चुप रहा, जबकि वे आम तौर पर बोलने की आज़ादी और मीडिया की आज़ादी के चैंपियन होने का दिखावा करते थे।

बे ऑफ़ पिग्स पर हमला: 1961 में, NYT को कथित तौर पर क्यूबा से निकाले गए लोगों के क्यूबा पर हमला करने के CIA के सपोर्ट वाले प्लान के बारे में पहले से पता था। उस समय के व्हाइट हाउस अधिकारियों के कहने पर, NYT ने पहले पेज की स्टोरी को हल्का कर दिया और CIA के शामिल होने को कम दिखाने की पूरी कोशिश की।

इराक पर US का हमला और ‘बड़े पैमाने पर तबाही मचाने वाले हथियार’ का झूठ: US में पुराने मीडिया ने न सिर्फ व्हाइट हाउस के लिए ‘सीक्रेट कीपर’ का रोल निभाया है, बल्कि वे US सरकार के लिए भी बहुत एक्टिव होकर ढोल पीटने वाले रहे हैं।

2000 के दशक की शुरुआत में, USA में पुराने मीडिया ने दुनिया में हर किसी को उस दशक के सबसे बड़े झूठ के बारे में समझाने के लिए अपने सारे रिसोर्स लगा दिए, कि इराक बड़े पैमाने पर तबाही मचाने वाले हथियार छिपा रहा था, और सद्दाम हुसैन को सत्ता से हटाना बहुत ज़रूरी था।

कवरेज इतना वफ़ादार था कि US मीडिया के बड़े नामों ने कभी भी US सरकार से उन दावों की सच्चाई पर सवाल उठाने की जहमत नहीं उठाई।

उन्होंने इराक में जिन लोगों को सद्दाम हुसैन ने ‘देश निकाला’ दे दिया था, उनके हवाले से अमेरिका ने जो कुछ भी कहा, उसका समर्थन किया। वॉशिंगटन पोस्ट ने तो ऐसी स्टोरीज़ भी चलाईं जिनमें रोकी गई एल्युमिनियम ट्यूब्स को इराक के न्यूक्लियर प्रोग्राम का ‘सबूत’ बताया गया। दूसरे बड़े नाम, जैसे फॉक्स वगैरह, पूरे जोश में देशभक्ति दिखाते हुए चिल्लाने लगे कि USA के लिए इराक पर हमला करना और ‘दुनिया को बचाना’ कितना जरूरी है।

ऊपर दिए गए उदाहरण तो बस एक सैंपल हैं। US मीडिया के बड़े नाम, जैसे NYT और WaPo असल में US सरकार के प्रोपेगैंडा के हथियार रहे हैं। उनका यकीन और पत्रकारिता का स्टैंड अक्सर US की सुविधा, US के हितों और यहाँ तक कि व्हाइट हाउस की शॉर्ट और लॉन्ग टर्म प्राथमिकताओं के मुताबिक होता है।

ऑपरेशन मॉकिंगबर्ड के दौरान, CIA ने कोल्ड वॉर की कहानी बनाने में मदद के लिए पत्रकारों को हायर किया। COVID के सालों में, बड़ी चिंताओं और एक्सपर्ट एनालिसिस के बावजूद, पुराने मीडिया ने बस वही दोहराया जो बाइडेन एडमिनिस्ट्रेशन ने कहा। इसने न सिर्फ लैब-लीक की बात को खारिज कर दिया, बल्कि कुछ नामों को बचाने के लिए गलत जानकारी फैलाने में भी लग गया, वुहान में US सरकार की चल रही गेन-ऑफ-फंक्शन रिसर्च में फौसी और पीटर दासजक के शामिल होने के किसी भी दावे को खारिज कर दिया। साथ ही सभी विरोधियों को झूठा करार दे दिया।

एलन मस्क के ट्विटर, जिसे अब X के नाम से जाना जाता है, को खरीदने के बाद, कई खुलासों ने पूरी दुनिया को बताया कि कैसे बड़े सोशल मीडिया दिग्गज बाइडेन एडमिनिस्ट्रेशन से सीधे ऑर्डर ले रहे थे। यहाँ तक ​​कि अपने ही देश के नागरिकों को गुमराह भी किया जा रहा था।

इन बड़े मीडिया हाउस के विदेशी कवरेज भी US के हितों का ध्यान रखते थे। जबकि दूसरे देशों को ‘पिछड़ा’ करार देते थे। भारत को अक्सर इन मीडिया हाउस ने बदनाम करने की कोशिश की। इसके लिए कैंपेन चलाया गया। भारत अमेरिका की हाँ में हाँ मिलाने के बजाए खुद की फॉरेन पॉलिसी पर चलना जारी रखा। ये अमेरिका को नागवार गुजरा।

इराक, लीबिया, वेनेजुएला, सीरिया जैसे देशों में सरकार बदलने वाले ऑपरेशन्स अमेरिका ने सीधी तौर पर चलाए। इसमें तथाकथित ‘फ्री प्रेस’ का सपोर्ट इन्हें मिला।

शब्दोत्सव: भारत अभ्युदय की वैचारिक क्रांति का प्रारंभ, एक नया साहित्यिक मंच-एक स्पष्ट दिशा

नई दिल्ली के मेजर ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम में 02 से 04 जनवरी 2026 तक आयोजित ‘दिल्ली शब्दोत्सव 2026’ केवल तीन दिनों का सांस्कृतिक-साहित्यिक आयोजन नहीं था। यह भारत की सांस्कृतिक और वैचारिक चेतना के पुनर्जागरण का शंखनाद था। दिल्ली सरकार तथा सुरुचि प्रकाशन के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस महोत्सव ने साहित्यिक उत्सवों की दुनिया में एक नया मानदंड स्थापित किया।

जहाँ दशकों से कुछ साहित्यिक मंचों पर एक विशेष विचारधारा का वर्चस्व रहा है, वहाँ शब्दोत्सव ने राष्ट्रप्रेम, भक्ति, एकता और भारतीयता को केंद्र में रखकर एक वैकल्पिक दृष्टि प्रस्तुत की। यह न जश्न-ए-रेख्ता की नकल था, न जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की, न ही अन्य किसी मौजूदा आयोजन की। यह अपना स्वतंत्र शब्दोत्सव था – एक स्पष्ट दिशा और मंशा वाला मंच।

इस आयोजन की थीम ‘भारत अभ्युदय’ थी, जो वैदिक काल से डिजिटल युग तक भारत की यात्रा का प्रतीक बनी। उद्घाटन समारोह में दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा कि यह भारत के बौद्धिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का समय है।

मंच से गूँजी राष्ट्रप्रेम और हिंदुत्व की पुकार

शब्दोत्सव की सबसे बड़ी विशेषता थी इसकी स्पष्ट दिशा। यहाँ कोई विभाजनकारी स्वर नहीं गूँजा, कोई देशविरोधी एजेंडा नहीं था। बच्चे और युवा ‘दम मारो दम’ जैसे गीतों पर नहीं, बल्कि श्रीराम, शिव और राधा रानी के भक्ति गीतों पर झूमते नजर आए। साधो बैंड और हंसराज रघुवंशी जैसे कलाकारों की प्रस्तुतियों ने स्टेडियम को भक्ति और देशप्रेम की लहर से भर दिया। लोकगीतों और नृत्यों ने भारतीय संस्कृति की विराटता को जीवंत किया।

कार्यक्रम में शामिल हुए सुनील आंबेकर, दिल्ली मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, दिल्ली मंत्री कपिल मिश्रा और हर्षवर्धन त्रिपाठी

पहले दिन का मुख्य सत्र ‘संघे शक्ति कलियुगे’ था, जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने भाग लिया। उन्होंने वंदे मातरम को बंगाल विभाजन के समय का मंत्र बताते हुए कहा कि डॉ. हेडगेवार ने संघ की स्थापना सामाजिक सुधार और एकता के लिए की थी। हिंदुत्व को भारत को एकता के सूत्र में बाँधने वाला बताया। आंबेकर जी ने स्पष्ट किया कि संघ सबसे बड़ा संगठन बनने की लालसा नहीं रखता, बल्कि समाज में समरसता स्थापित करना चाहता है। पंच परिवर्तन के माध्यम से सामाजिक सुधार पर जोर दिया।

शब्दोत्सव में पहुँचे वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णु जैन

अन्य सत्रों में न्यायिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर गहन विमर्श हुआ। ‘ऑब्जेक्शन मी लॉर्ड’ सत्र में वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन, विक्रमजीत बनर्जी, अमन लेखी और सिद्धार्थ लूथरा ने भाग लिया। विष्णु शंकर जैन ने मथुरा जन्मभूमि और ज्ञानवापी जैसे मुद्दों पर बात की, साथ ही संविधान में आपातकाल के दौरान जोड़े गए ‘धर्मनिरपेक्षता’ शब्द को सबसे बड़ा छल बताया। अमन लेखी ने हिंदुत्व को विराट विचार करार दिया। विक्रमजीत बनर्जी ने समान नागरिक संहिता की वकालत की।

‘जनरेशन जी: विकसित भारत के सारथी’ सत्र में चंद्रप्रकाश द्विवेदी, विशाल चौरसिया, भाषा संभाली और अभिलिप्सा पांडा जैसे युवा हस्तियों ने भाग लिया। द्विवेदी जी ने प्राचीन युवा नायकों जैसे प्रहलाद और ध्रुव का उदाहरण दिया। विशाल चौरसिया ने आदि शंकराचार्य को पहला इंटरप्रेन्योर बताया। अभिलिप्सा पांडा ने भक्ति और लक्ष्य निर्धारण पर जोर दिया।

कपिल मिश्रा ने बताया- वैचारिक आतंकवाद पर सर्जिकल स्ट्राइक

दिल्ली सरकार के कला, संस्कृति, भाषा एवं पर्यटन मंत्री कपिल मिश्रा की प्रमुख भूमिका रही।। वे इस उत्सव के मुख्य सहयोगी एवं संरक्षक थे। कपिल मिश्रा ने इसे वैचारिक आतंकवाद पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की संज्ञा दी तथा राष्ट्रवाद को मजबूत करने वाले आयोजन के रूप में प्रस्तुत किया।

उन्होंने उद्घाटन समारोह में सक्रिय भागीदारी निभाई तथा युवाओं को नक्सली एवं जिहादी विचारधारा से दूर रखने की बात कही। उन्होंने कहा,

“जब कोई पत्थर उठता है सेना के ऊपर, पुलिस के ऊपर या मंदिर के ऊपर, वो पत्थर हाथ में बाद में आता है दिमाग में पहले आता है। कोई नक्सलवादी, जिहादी जब बंदूक उठाता है या कोई डॉक्टर फट जाता है, तो उनके पास बम हाथ में बाद में दिमाग में पहले आता है। इस वैचारिक आतंकवाद पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की जरूरत है।”

धर्मरक्षक धामी के साथ संवाद

एक सत्र में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी मुख्य अतिथि थे। ‘धर्मरक्षक धामी’ विषय पर संवाद में उन्होंने देवभूमि की सांस्कृतिक चेतना और लैंड जिहाद के खिलाफ कार्रवाई की बात की। 600 से अधिक अवैध ढांचों को हटाने और समान नागरिक संहिता लागू करने का उल्लेख करते हुए कहा कि शब्दोत्सव भारतीय संस्कृति का संवाहक बनेगा।

शब्दोत्सव में शामिल हुए उत्तराखंड मुख्यमंत्री पुष्कर धामी

कुतुब मीनार पर नया विमर्श सनातन विरासत की पुकार

शब्दोत्सव में एक महत्वपूर्ण चर्चा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के पूर्व निदेशक धर्मवीर शर्मा के दावों पर केंद्रित रही। उन्होंने कुतुब मीनार को प्राचीन विष्णु वेदशाला बताया। आधार आयताकार होने, 27 खिड़कियों, दक्षिणायन सूर्य की छाया और छठी शताब्दी के श्लोकों का हवाला देते हुए कहा कि यह सनातन वास्तुकला का प्रमाण है। मरम्मत के दौरान मिली गणेश जी की आकृति जैसे प्रमाणों ने दर्शकों को चकित किया।

इस दावे के बाद काशी के संतों ने माँग उठाई कि कुतुब मीनार सनातनियों को सौंपा जाए और वहाँ भव्य विष्णु मंदिर का निर्माण हो। पातालपुरी मठ के पीठाधीश्वर बालक देवाचार्य महाराज ने कहा कि मुस्लिम शासन में मंदिर तोड़कर संरचनाएँ बनाई गईं, लेकिन आज भी हिंदू देवताओं के चिह्न मौजूद हैं। सरकार से सनातन भावनाओं का सम्मान करने की अपील की। यह विमर्श शब्दोत्सव की वैचारिक गहराई को दर्शाता है, जहाँ इतिहास के मिथकों को तोड़कर नया विमर्श मुखर हुआ।

युवाओं का उत्साह और भविष्य की चुनौती

शब्दोत्सव में युवाओं की बड़ी भागीदारी देखी गई। ओपन माइक ने उन्हें अपनी रचनाएँ प्रस्तुत करने का मंच दिया। दिल्ली-एनसीआर के 40 विश्वविद्यालयों के छात्र-छात्राओं ने उत्साह दिखाया। यह आयोजन साबित करता है कि सोशल मीडिया के युग में भी युवा अपनी जड़ों से जुड़ना चाहते हैं, बशर्ते उन्हें सकारात्मक और राष्ट्रवादी मंच मिले।

शब्दोत्सव में शामिल हुए बड़ी तादाद में लोग

कुछ आलोचक ऐसा कह सकते हैं कि इसके पीछे कोई स्पष्ट योजना या दृष्टि नहीं है। लेकिन यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा। शब्दोत्सव दिशाहीन नहीं है; इसकी दिशा बिल्कुल साफ और स्पष्ट है। जब कोई आयोजन अपनी निर्धारित दिशा में आगे बढ़ता है, तो उस पर विश्वास स्वतः जागृत हो जाता है। यदि चुना हुआ रास्ता सही है, तो यात्रा अवश्य मंजिल तक पहुँचेगी। अभी उत्सव अपनी शैशवावस्था में है।

यदि यह आयोजन बिना बाधा के पाँच वर्ष तक जारी रहता है, तो यह अन्य साहित्यिक उत्सवों के लिए मिसाल बनेगा। लोग जयपुर या अन्य फेस्टिवलों की तुलना शब्दोत्सव से करेंगे।

एक नई शुरुआत, एक मजबूत विकल्प

शब्दोत्सव केवल आयोजन नहीं, बल्कि एक दिशा है। यह साबित करता है कि साहित्य और संस्कृति का उत्सव विभाजनकारी स्वरों के बिना, राष्ट्रप्रेम और भक्ति के साथ मनाया जा सकता है। आने वाले वर्षों में यह अन्य आयोजनों के लिए प्रेरणा और प्रतिस्पर्धी मानक बनेगा। यह किसी की नकल नहीं, बल्कि अपनी स्वतंत्र पहचान वाला मंच है। यदि चुना रास्ता सही है, तो मंजिल अवश्य मिलेगी। शब्दोत्सव भारत अभ्युदय का प्रतीक बनकर उभरा है – एक वैचारिक परिवर्तन का आरंभ।

आयोजन की सफलता में सुरुचि प्रकाशन के प्रमुख राजीव तुली का विशेष योगदान रहा, जिन्होंने समन्वय एवं संगठन की जिम्मेदारी संभाली। इसके अलावा दिल्ली सरकार में विधायक राजकुमार भाटिया, सामाजिक कार्यकर्ता अनिल पांडेय तथा वरिष्ठ पत्रकार हर्षवर्धन त्रिपाठी ने आयोजन समिति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसमें कार्यक्रमों की रूपरेखा, वक्ताओं का चयन एवं सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का प्रबंधन शामिल था। इनके समर्पित प्रयासों से शब्दोत्सव दिल्ली की सांस्कृतिक राजधानी के रूप में स्थापित होने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हुआ।

तीन दिनों में 100 से अधिक वक्ताओं ने भाग लिया, 40 से ज्यादा पुस्तकों का विमोचन हुआ, लोकनृत्य, भक्ति संगीत और ओपन माइक जैसे कार्यक्रमों ने युवाओं को आकर्षित किया। हजारों दर्शकों की उपस्थिति ने साबित किया कि राष्ट्रवादी और आध्यात्मिक मूल्यों पर आधारित आयोजन भी व्यापक स्वीकार्यता प्राप्त कर सकता है।

बिहार में किया पैसे देने का विरोध अब खुद ₹3000-₹3000 बाँट रहे स्टालिन, पोंगल गिफ्ट के नाम पर दे रहे पैसा: जानें- कैसे DMK ने ‘रेवड़ी कल्चर’ से बर्बाद की तमिलनाडु की अर्थव्यवस्था

चुनाव आते ही राज्यों में योजनाओं की बाढ़ आ जाती है। तमिलनाडु सरकार ने भी 2026 शुरू होते ही कई योजनाओं का ऐलान कर जनता को ‘खुश’ करने की कोशिश की है। डीएमके सरकार ने नई पेंशन योजना से लेकर पोंगल पर 3000 रुपए नकद, छात्रों को लैपटॉप और परिवार की महिला मुखिया को 1000 रुपए नकद खाते में डालने की योजना का विस्तार करने का ऐलान किया है। मुफ्त की ये योजनाएँ सरकार की नाकामी को छिपाने का अच्छा तरीका है।

INDI गठबंधन ने बिहार चुनाव से ऐन पहले जब महिलाओं के खातों में 10 हजार रुपए डाले थे, तो उसका विरोध किया था, लेकिन डीएमके सरकार जब तमिलनाडु में एक के बाद एक रेवड़ियाँ बाँटती रही है, तो उन्हें ये समाज कल्याण नजर आता है। देश में सबसे ज्यादा सब्सिडी पर खर्च तमिलनाडु में है। इसके अलावा देश में सबसे ज्यादा मुफ्त रेवड़ी देने वाले राज्यों में ये अव्वल है।

यहाँ तक कि सीएम स्टालिन ने बिहार में महिलाओं को 10000 रुपए देने की आलोचना करते हुए इसे ‘वोट खरीदने’ का तरीका बताया था। उनका कहना था कि ये आदर्श चुनाव संहिता का उल्लंघन है। लेकिन चुनाव के ऐन पहले भले ही चुनाव के तारीख का ऐलान नहीं हुआ है, लेकिन ऐन पहले जनता को पोंगल के नाम पर 3000 रुपए हर परिवार को ‘गिफ्ट’ के नाम पर देना और एक अन्य योजना में परिवार की महिला मुखिया को 1000 रुपए देना क्या वोट खरीदने का तरीका नहीं है।

डीएमके ने तमिलनाडु में शुरू किया था मुफ्त रेवड़ी बांटना

तमिलनाडु में डीएमके के संस्थापक अन्नादुरई ने ही 1 रुपए में 1 किलो चावल देने की शुरुआत की थी। लेकिन 2006 में पार्टी ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में कलर टीवी देना का वादा किया। इसका फायदा चुनाव में मिला और डीएमके सत्ता पर काबिज हो गई। इसके बाद मुफ्त की रेवड़ियाँ बांटने की परंपरा चल पड़ी। 2011 में डीएमके ने छात्रों को मुफ्त लैपटॉप देने का वादा किया। 2021 के बाद तो डीएमके ने जमकर रेवड़ियाँ बांटी हैं।

हाल में सीएम स्टालिन ने सभी सरकारी कर्मचारियों के लिए नई पेंशन योजना लागू करने का ऐलान किया। इसके अलावा पोंगल पर 22 लाख आरसी फैमिली कार्ड धारकों को पोंगल पर 3000 रुपए कैश दिए जाएँगे। इससे पहले पोंगल पर 1 किलो भूरा चावल, 1 किलो चीनी और साबुत गन्ने को बतौर गिफ्ट देने की घोषणा की गई थी।

मुख्यमंत्री स्टालिन चेन्नई में 20 लाख कॉलेज छात्रों को लैपटॉप उपलब्ध कराने की योजना भी शुरू की। पहले चरण में सरकारी इंजीनियरिंग, कला, विज्ञान, चिकित्सा, कृषि, विधि, पॉलिटेक्निक और आईटीआई के 10 लाख छात्र-छात्राओं को लैपटॉप दिया जा रहा है। इस दौरान डेल, एसर, एचपी जैसी बड़ी कंपनियों के लैपटॉप भी छात्रों को दिए जाएँगे।

तमिलनाडु पर देनदारी का बोझ

मुफ्त की योजनाओं पर होने वाला खर्च राजकोषीय घाटे का अहम कारण है। आरबीआई की रिपोर्ट के अनुसार, तमिलनाडु की कुल बकाया देनदारी काफी अधिक हैं। मार्च 2025 के अंत में ₹9,55,690.5 करोड़ की देनदारी का अनुमान लगाया गया था।

मुफ्त की रेवड़ियों का विरोध इसलिए होता है, क्योंकि यह अर्थव्यवस्था पर बोझ डालती हैं। इससे लोगों की न्यूनतम जरूरतें पूरी हो जाती हैं और लोग काम नहीं करने की ओर प्रोत्साहित होते हैं। यही वजह है कि अर्थशास्त्री से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ने रेवड़ी कल्चर पर चिंता जताई है और इसे लंबे वक्त के लिए नुकसानदायक बताया है।

दरअसल इससे राजनीतिक लाभ तो सीधा मिलता है, लेकिन राज्य का भला नहीं हो सकता। राज्य पर पड़ने वाला आर्थिक बोझ उसके आत्मनिर्भर बनने की दिशा में बड़ी बाधा है।

मिटाने की मानसिकता वाले खत्म हो जाते हैं, मंदिर पूरे गौरव के साथ खड़ा: सोमनाथ मंदिर पर हमले के 1000 साल पर PM मोदी, कहा- पुनर्निमाण से उत्साहित नहीं थे नेहरू

सोमनाथ… ये शब्द सुनते ही हमारे मन और हृदय में गर्व और आस्था की भावना भर जाती है। भारत के पश्चिमी तट पर गुजरात में, प्रभास पाटन नाम की जगह पर स्थित सोमनाथ, भारत की आत्मा का शाश्वत प्रस्तुतिकरण है। द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम में भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों का उल्लेख है। ज्योतिर्लिंगों का वर्णन इस पंक्ति से शुरू होता है…”सौराष्ट्रे सोमनाथं च…यानि ज्योतिर्लिंगों में सबसे पहले सोमनाथ का उल्लेख आता है। ये इस पवित्र धाम की सभ्यतागत और आध्यात्मिक महत्ता का प्रतीक है। 

शास्त्रों में ये भी कहा गया है:
“सोमलिङ्गं नरो दृष्ट्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते।
लभते फलं मनोवाञ्छितं मृतः स्वर्गं समाश्रयेत्॥”

अर्थात्, सोमनाथ शिवलिंग के दर्शन से व्यक्ति अपने सभी पापों से मुक्त हो जाता है। मन में जो भी पुण्य कामनाएं होती हैं, वो पूरी होती हैं और मृत्यु के बाद आत्मा स्वर्ग को प्राप्त होती है।

दुर्भाग्यवश, यही सोमनाथ, जो करोड़ों लोगों की श्रद्धा और प्रार्थनाओं का केंद्र था, विदेशी आक्रमणकारियों का निशाना बना, जिनका उद्देश्य विध्वंस था।

वर्ष 2026 सोमनाथ मंदिर के लिए बहुत महत्व रखता है क्योंकि इस महान तीर्थ पर हुए पहले आक्रमण के 1000 वर्ष पूरे हो रहे हैं। जनवरी 1026 में गजनी के महमूद ने इस मंदिर पर बड़ा आक्रमण किया था, इस मंदिर को ध्वस्त कर दिया था। यह आक्रमण आस्था और सभ्यता के एक महान प्रतीक को नष्ट करने के उद्देश्य से किया गया एक हिंसक और बर्बर प्रयास था।

सोमनाथ हमला मानव इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में शामिल है। फिर भी, एक हजार वर्ष बाद आज भी यह मंदिर पूरे गौरव के साथ खड़ा है। साल 1026 के बाद समय-समय पर इस मंदिर को उसके पूरे वैभव के साथ पुन:निर्मित करने के प्रयास जारी रहे। मंदिर का वर्तमान स्वरूप 1951 में आकार ले सका। संयोग से 2026 का यही वर्ष सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के 75 वर्ष पूरे होने का भी वर्ष है। 11 मई 1951 को इस मंदिर का पुनर्निर्माण सम्पन्न हुआ था। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की उपस्थिति में हुआ वो समारोह ऐतिहासिक था, जब मंदिर के द्वार दर्शनों के लिए खोले गए थे।

1026 में एक हजार वर्ष पहले सोमनाथ पर हुए पहले आक्रमण, वहाँ के लोगों के साथ की गई क्रूरता और विध्वंस का वर्णन अनेक ऐतिहासिक स्रोतों में विस्तार से मिलता है। जब इन्हें पढ़ा जाता है तो हृदय काँप उठता है। हर पंक्ति में क्रूरता के निशान मिलते हैं, ये ऐसा दुःख है जिसकी पीड़ा इतने समय बाद भी महसूस होती है।

हम कल्पना कर सकते हैं कि इसका उस दौर में भारत पर और लोगों के मनोबल पर कितना गहरा प्रभाव पड़ा होगा। सोमनाथ मंदिर का आध्यात्मिक महत्व बहुत ज्यादा था। ये बड़ी संख्या में लोगों को अपनी ओर खींचता था। ये एक ऐसे समाज की प्रेरणा था जिसकी आर्थिक क्षमता भी बहुत सशक्त थी। हमारे समुद्री व्यापारी और नाविक इसके वैभव की कथाएं दूर-दूर तक ले जाते थे।

सोमनाथ पर हमले और फिर गुलामी के लंबे कालखंड के बावजूद आज मैं पूरे विश्वास के साथ और गर्व से ये कहना चाहता हूं कि सोमनाथ की गाथा विध्वंस की कहानी नहीं है। ये पिछले 1000 साल से चली आ रही भारत माता की करोड़ों संतानों के स्वाभिमान की गाथा है, ये हम भारत के लोगों की अटूट आस्था की गाथा है।

1026 में शुरू हुई मध्यकालीन बर्बरता ने आगे चलकर दूसरों को भी बार-बार सोमनाथ पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित किया। यह हमारे लोगों और हमारी संस्कृति को गुलाम बनाने का प्रयास था। लेकिन हर बार जब मंदिर पर आक्रमण हुआ, तब हमारे पास ऐसे महान पुरुष और महिलाएं भी थीं जिन्होंने उसकी रक्षा के लिए खड़े होकर सर्वोच्च बलिदान दिया। और हर बार, पीढ़ी दर पीढ़ी, हमारी महान सभ्यता के लोगों ने खुद को संभाला, मंदिर को फिर से खड़ा किया और उसे पुनः जीवंत किया।

महमूद गजनवी लूटकर चला गया लेकिन सोमनाथ के प्रति हमारी भावना को हमसे छीन नहीं सका। सोमनाथ से जुड़ी हमारी आस्था, हमारा विश्वास और प्रबल हुआ। उसकी आत्मा लाखों श्रद्धालुओं की भीतर साँस लेती रही। साल 1026 के हजार साल बाद आज 2026 में भी सोमनाथ मंदिर दुनिया को संदेश दे रहा है, कि मिटाने की मानसिकता रखने वाले खत्म हो जाते हैं जबकि सोमनाथ मंदिर आज हमारे विश्वास का मजबूत आधार बनकर खड़ा है। वो आज भी हमारी प्रेरणा का स्रोत है, वो आज भी हमारी शक्ति का पुंज है।

ये हमारा सौभाग्य है कि हमने उस धरती पर जीवन पाया है, जिसने देवी अहिल्याबाई होलकर जैसी महान विभूति को जन्म दिया। उन्होंने ये सुनिश्चित करने का पुण्य प्रयास किया कि श्रद्धालु सोमनाथ में पूजा कर सकें।

1890 के दशक में स्वामी विवेकानंद भी सोमनाथ आए थे, वो अनुभव उन्हें भीतर तक आंदोलित कर गया। 1897 में चेन्नई में दिए गए एक व्याख्यान के दौरान उन्होंने अपनी भावना व्यक्त की।

उन्होंने कहा, “दक्षिण भारत के प्राचीन मंदिर और गुजरात के सोमनाथ जैसे मंदिर आपको ज्ञान के अनगिनत पाठ सिखाएँगे। ये आपको किसी भी संख्या में पढ़ी गई पुस्तकों से अधिक हमारी सभ्यता की गहरी समझ देंगे। इन मंदिरों पर सैकड़ों आक्रमणों के निशान हैं, और सैकड़ों बार इनका पुनर्जागरण हुआ है। ये बार बार नष्ट किए गए और हर बार अपने ही खंडहरों से फिर खड़े हुए। पहले की तरह सशक्त। पहले की तरह जीवंत। यही राष्ट्रीय मन है, यही राष्ट्रीय जीवन धारा है। इसका अनुसरण आपको गौरव से भर देता है। इसको छोड़ देने का मतलब है, मृत्यु। इससे अलग हो जाने पर विनाश ही होगा।”

ये सर्वविदित है कि आजादी के बाद सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का पवित्र दायित्व सरदार वल्लभभाई पटेल के सक्षम हाथों में आया। उन्होंने आगे बढ़कर इस दायित्व के लिए कदम बढ़ाया। 1947 में दीवाली के समय उनकी सोमनाथ यात्रा हुई। उस यात्रा के अनुभव ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया, उसी समय उन्होंने घोषणा की कि यहीं सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण होगा। अंततः 11 मई 1951 को सोमनाथ में भव्य मंदिर के द्वार श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए।

उस अवसर पर तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद उपस्थित थे। महान सरदार साहब इस ऐतिहासिक दिन को देखने के लिए जीवित नहीं थे लेकिन उनका सपना राष्ट्र के सामने साकार होकर भव्य रूप में उपस्थित था।

तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू इस घटना से अधिक उत्साहित नहीं थे। वो नहीं चाहते थे कि माननीय राष्ट्रपति और मंत्री इस समारोह का हिस्सा बनें। उन्होंने कहा कि इस घटना से भारत की छवि खराब होगी लेकिन राजेंद्र बाबू अडिग रहे, और फिर जो हुआ, उसने एक नया इतिहास रच दिया।

सोमनाथ मंदिर का कोई भी उल्लेख के.एम. मुंशी जी के योगदानों को याद किए बिना अधूरा है। उन्होंने उस समय सरदार पटेल का प्रभावी रूप से समर्थन किया था। सोमनाथ पर उनका कार्य, विशेष रूप से उनकी पुस्तक ‘सोमनाथ, द श्राइन इटरनल’ अवश्य पढ़ी जानी चाहिए।

जैसा कि मुंशी जी की पुस्तक के शीर्षक से स्पष्ट होता है, हम एक ऐसी सभ्यता हैं जो आत्मा और विचारों की अमरता में अटूट विश्वास रखती है। हम विश्वास करते हैं- नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। सोमनाथ का भौतिक ढांचा नष्ट हो गया लेकिन उसकी चेतना अमर रही।

इन्हीं विचारों ने हमें हर कालखंड में, हर परिस्थिति में फिर से उठ खड़े होने, मजबूत बनने और आगे बढ़ने का सामर्थ्य दिया है। इन्हीं मूल्यों और हमारे लोगों के संकल्प की वजह से आज भारत पर दुनिया की नजर है। दुनिया भारत को आशा और विश्वास की दृष्टि से देख रही है। वो हमारे इनोवेटिव युवाओं में निवेश करना चाहती है। हमारी कला, हमारी संस्कृति, हमारा संगीत और हमारे अनेक पर्व आज वैश्विक पहचान बना रहे हैं। योग और आयुर्वेद जैसे विषय पूरी दुनिया में प्रभाव डाल रहे हैं। ये स्वस्थ जीवन को बढ़ावा दे रहे हैं। आज कई वैश्विक चुनौतियों के समाधान के लिए दुनिया भारत की ओर देख रही है।

अनादि काल से सोमनाथ जीवन के हर क्षेत्र के लोगों को जोड़ता आया है। सदियों पहले जैन परंपरा के आदरणीय मुनि कलिकाल सर्वज्ञ हेमचंद्राचार्य यहाँ आए थे और कहा जाता है कि प्रार्थना के बाद उन्होंने कहा कि वबीजाङ्कुरजनना रागाद्याः क्षयमुपगता यस्य। अर्थात्, उस परम तत्व को नमन जिसमें सांसारिक बंधनों के बीज नष्ट हो चुके हैं। जिसमें राग और सभी विकार शांत हो गए हैं।

आज भी दादा सोमनाथ के दर्शन से ऐसी ही अनुभूति होती है। मन में एक ठहराव आ जाता है, आत्मा को अंदर तक कुछ स्पर्श करता है, जो अलौकिक है, अव्यक्त है।

1026 के पहले आक्रमण के एक हजार वर्ष बाद 2026 में भी सोमनाथ का समुद्र उसी तीव्रता से गर्जना करता है और तट को स्पर्श करती लहरें उसकी पूरी गाथा सुनाती हैं। उन लहरों की तरह सोमनाथ बार-बार उठता रहा है।

अतीत के आक्रमणकारी आज समय की धूल बन चुके हैं। उनका नाम अब विनाश के प्रतीक के तौर पर लिया जाता है। इतिहास के पन्नों में वे केवल फुटनोट हैं, जबकि सोमनाथ आज भी अपनी आशा बिखेरता हुआ प्रकाशमान खड़ा है। सोमनाथ हमें ये बताता है कि घृणा और कट्टरता में विनाश की विकृत ताकत हो सकती है, लेकिन आस्था में सृजन की शक्ति होती है। करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए सोमनाथ आज भी आशा का अनंत नाद है। ये विश्वास का वो स्वर है, जो टूटने के बाद भी उठने की प्रेरणा देता है।

अगर हजार साल पहले खंडित हुआ सोमनाथ मंदिर अपने पूरे वैभव के साथ फिर से खड़ा हो सकता है, तो हम हजार साल पहले का समृद्ध भारत भी बना सकते हैं। आइए, इसी प्रेरणा के साथ हम आगे बढ़ते हैं। एक नए संकल्प के साथ, एक विकसित भारत के निर्माण के लिए। एक ऐसा भारत, जिसका सभ्यतागत ज्ञान हमें विश्व कल्याण के लिए प्रयास करते रहने की प्रेरणा देता है।

जय सोमनाथ!

(प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह लेख अपने ब्लॉग पर लिखा है, आप इस लिंक पर क्लिक कर इसे पढ़ सकते हैं)

‘भारत के सबसे स्वच्छ शहर’ से हेल्थ इमरजेंसी तक: जानें- इंदौर में कैसे दूषित जल ने लोगों की सेहत पर खड़ा किया संकट

कई वर्षों से भारत का सबसे स्वच्छ शहर होने का खिताब जीत रहा मध्य प्रदेश का इंदौर 2026 की शुरुआत में गंभीर स्वास्थ्य संकट की स्थिति में पहुँच गया है। जिले के भगीरथपुरा इलाके में पानी दूषित होने के कारण कम से कम 15 लोगों की मौत हो चुकी है और 200 से ज्यादा लोग अब भी अस्पतालों में भर्ती हैं।

लोगों ने बताया कि नगर निगम के नल से आने वाला पानी बदबू मार रहा था और दिखने में भी गंदा था। इसी पानी को पीने के बाद लोगों की तबीयत खराब होने लगी। बीमार लोगों में उल्टी, दस्त, बुखार और शरीर में पानी की कमी जैसे लक्षण देखे गए। दूषित पानी पीने की वजह से यह बीमारी तेजी से फैली और कई लोगों को इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।

संकट कैसे बढ़ा: जानें पूरी टाइमलाइन

दिसंबर 2025 के मध्य में सबसे पहले भगीरथपुरा इलाके के लोगों को अपने नल के पानी में गड़बड़ी महसूस हुई। करीब 15 हजार आबादी वाले इस इलाके में नल का पानी रंग बदला हुआ था, उसमें सीवर जैसी बदबू आ रही थी और स्वाद भी कड़वा था। लोगों ने नगर निगम के अधिकारियों से लगातार शिकायत की लेकिन समय पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। 25 दिसंबर तक भी मजबूरी में कई परिवार इसी पानी का इस्तेमाल खाना बनाने और पीने के लिए करते रहे।

27 और 28 दिसंबर को हालात तेजी से बिगड़ गए। दूषित पानी पीने से लोगों को पेट से जुड़ी गंभीर बीमारियाँ होने लगीं। स्थानीय क्लीनिकों में कमजोरी और डिहाइड्रेशन से जूझते मरीज पहुँचने लगे। इसके बाद स्वास्थ्य विभाग की टीमों ने घर-घर जाकर जाँच करनी शुरू की। इसके बाद 29 दिसंबर को मामलों में अचानक भारी बढ़ोतरी हुई। मेयर पुष्यमित्र भार्गव ने बताया कि खराब पानी से फैले दस्त के कारण कम से कम तीन लोगों की मौत हुई जबकि बड़ी संख्या में मरीजों को बड़े अस्पतालों में भर्ती कराया गया।

30 दिसंबर तक 100 से ज्यादा लोगों को अस्पताल में भर्ती करना पड़ा और रिपोर्ट्स के अनुसार कुल मिलाकर 1,100 से ज्यादा लोग बीमार हो चुके थे। मरीजों के लक्षण साफ तौर पर पानी से फैलने वाली बीमारियों की ओर इशारा कर रहे थे। इसके बाद घर-घर सर्वे और तेज कर दिए गए। 31 दिसंबर तक मौतों की संख्या को लेकर स्थिति साफ नहीं थी। अधिकारियों ने 4 से 7 मौतों की बात कही जबकि कुछ परिवारों ने छह महीने के एक बच्चे की मौत को भी उसी दूषित पानी से बने दूध से जोड़कर देखा।

राज्य सरकार ने मृतकों के परिजन को 2 लाख रुपए मुआवजा देने की घोषणा की। प्रशासनिक स्तर पर भी कार्रवाई हुई। एक जोनल अधिकारी और एक सहायक इंजीनियर को निलंबित किया गया जबकि एक सब-इंजीनियर को बर्खास्त कर दिया गया।

1 और 2 जनवरी को लैब की रिपोर्ट से स्थिति पूरी तरह साफ हुई। पानी की सप्लाई में ई. कोलाई, साल्मोनेला और विब्रियो कॉलरा जैसे खतरनाक बैक्टीरिया पाए गए। जाँच में पता चला कि पास के पुलिस चौकी के नजदीक एक सार्वजनिक शौचालय के नीचे से गुजर रही करीब 30 साल पुरानी पाइपलाइन टूट गई थी, जिससे सीवर का गंदा पानी सप्लाई लाइन में मिल गया।

इसके बाद टूटी पाइपलाइन को ठीक किया गया, उस हिस्से को अलग कर सफाई का काम शुरू हुआ। इलाके में रोजाना 20 से ज्यादा टैंकरों से साफ पानी की आपूर्ति की गई। अधिकारियों ने लोगों को सलाह दी कि जाँच पूरी तरह साफ होने तक नल का पानी उबालकर ही इस्तेमाल करें या उसका उपयोग न करें। कुल मिलाकर 1,400 से 2,000 लोग इस संकट से प्रभावित हुए और लोगों को राज्यभर में पानी की व्यवस्था को ठीक करने का का भरोसा दिया गया।

NHRC ने लिया संज्ञान

1 जनवरी 2026 को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने मीडिया में आई खबरों के आधार पर इस मामले का स्वतः संज्ञान लिया। आयोग ने कहा कि अगर खबरें सही हैं, तो यह पीड़ितों के स्वास्थ्य और जीवन के अधिकार का गंभीर उल्लंघन है। एनएचआरसी ने मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव को नोटिस जारी करते हुए दो हफ्ते के भीतर पूरी रिपोर्ट माँगी है। आयोग ने माना कि इस तरह की लापरवाही ने लोगों उनमें भी खासकर कमजोर वर्गों के ‘सुरक्षित जीवन’ के अधिकार को नुकसान पहुँचाया है।

जल जीवन मिशन की रिपोर्ट से बढ़ी चिंता

इसी बीच केंद्र सरकार की जल जीवन मिशन के तहत जारी एक नई रिपोर्ट ने मध्य प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में पेयजल की स्थिति को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। रविवार (4 जनवरी 2026) को जारी इस रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रामीण क्षेत्रों से लिए गए पानी के सैंपल में से 36.7% पीने के लायक नहीं पाए गए। यह रिपोर्ट ऐसे समय आई है, जब इंदौर में शहर की जल आपूर्ति से जुड़ी समस्या के कारण अब तक 15 मौतों की पुष्टि हो चुकी है।

इंदौर जिले के ग्रामीण इलाकों में केवल 33% घरों तक ही सुरक्षित पीने का पानी पहँच रहा है और यह तय मानकों से काफी कम है। कुछ जिलों जैसे अलीराजपुर में स्थिति बेहतर रही और 100% घरों में पानी मिला जबकि अनूपपुर में यह आँकड़ा शून्य रहा। ग्वालियर में 20.9%, मुरैना में 25.2% घरों को ही पीने लायक पानी मिला। भोपाल में यह आँकड़ा 56.9% और जबलपुर में 54.3% रहा।

रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि करीब 23.4% घरों को नियमित जल आपूर्ति नहीं मिल रही थी। जाँच के दौरान 36.7 प्रतिशत जगहों पर नल खराब पाए गए। हालाँकि सिर्फ 3.7% लोगों ने पानी के स्वाद की शिकायत की लेकिन 22% लोगों ने कहा कि उन्हें पर्याप्त मात्रा में पानी नहीं मिलता।

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की चेतावनियाँ वर्षों तक रहीं अनसुनी

यह संकट अचानक नहीं आया। मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने साल 2016-17 में इंदौर में 60 जगहों पर भूजल की जाँच की थी, जिनमें भगीरथपुरा भी शामिल था। जाँच में लगभग सभी जगहों पर टोटल कोलिफॉर्म बैक्टीरिया की मात्रा 100 मिलीलीटर में 10 MPN से ज्यादा पाई गई। यह साफ संकेत था कि खराब पाइपलाइन और ड्रेनेज के जरिए मल-मूत्र से जुड़ा सीवर का पानी पीने के पानी में मिल रहा है।

बोर्ड ने इंदौर नगर निगम को साफ निर्देश दिए थे कि इन हैंडपंपों और कुओं को असुरक्षित घोषित किया जाए, वहाँ चेतावनी बोर्ड लगाए जाएँ और सीवर के पानी को सप्लाई लाइन में मिलने से रोका जाए। इसके बावजूद शहर के बड़े हिस्से में लगातार दिक्कतें बनी रहीं।

इंदौर की जल व्यवस्था पर चिंता 2019 में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट में भी सामने आई थी। यह रिपोर्ट इंदौर और भोपाल के जल प्रबंधन पर थी। इसमें बताया गया कि 2004 में एशियन डेवलपमेंट बैंक से 200 मिलियन डॉलर का कर्ज मंजूर किया गया था ताकि भोपाल, इंदौर, जबलपुर और ग्वालियर में पानी और स्वच्छता ढाँचे को सुधारा जा सके और सभी को साफ व नियमित पानी मिले।

2019 की कैग रिपोर्ट ने हालात की पोल खोल दी। रिपोर्ट के मुताबिक, इंदौर में रोजाना सिर्फ 4 जोन में ही पानी की सप्लाई होती थी, जबकि भोपाल में यह संख्या 5 जोन तक सीमित थी। कुल 9.41 लाख परिवारों में से करीब 5.30 लाख परिवारों के पास ही नल कनेक्शन था।

रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि पानी की लीकेज ठीक करने में 22 से लेकर 108 दिन तक लग जाते थे। साल 2013 से 2018 के बीच 4,481 पानी के सैंपल खराब पाए गए। इसी दौरान भोपाल में 3.62 लाख और इंदौर में 5.33 लाख परिवारों को साफ पानी नहीं मिला। इन वर्षों में पानी से फैलने वाली बीमारियों के करीब 5.45 लाख मामले दर्ज हुए।

पानी की भारी बर्बादी भी सामने आई। नगर निकायों की टैक्स वसूली भी कमजोर रही और बकाया राशि 470 करोड़ रुपए तक पहुँच गई। पानी की उपलब्धता भी बेहद कम थी। भोपाल में प्रति व्यक्ति रोजाना सिर्फ 9 से 20 लीटर और इंदौर में 36 से 62 लीटर पानी की सप्लाई हो रही थी।

कैग रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि पानी की टंकियों की नियमित सफाई नहीं होती थी और न ही पानी की बर्बादी रोकने के लिए कोई ऑडिट किया गया। विशेषज्ञों ने इसे आपराधिक लापरवाही बताया। उनका कहना है कि सीवर लाइनों को पीने के पानी की पाइपलाइनों के बेहद पास और लापरवाही से बिछाया गया। एक सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा कि अगर सिर्फ एक भी पाइपलाइन सही हालत में होती, तो शायद किसी की जान नहीं जाती।

सरकारी कार्रवाई और आधिकारिक प्रतिक्रिया

मुख्यमंत्री मोहन यादव ने इस पूरे मामले की जिम्मेदारी लेते हुए X पर सख्त कार्रवाई की जानकारी दी। उन्होंने इंदौर नगर निगम आयुक्त और अतिरिक्त आयुक्त को कारण बताओ नोटिस जारी करने के आदेश दिए। साथ ही अतिरिक्त आयुक्त को पद से हटा दिया गया और जल कार्य विभाग के अधीक्षण अभियंता (सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर) को भी उनके पद से हटा दिया गया। खाली हुए पदों पर तुरंत अधिकारियों की तैनाती कर व्यवस्था सुधारने के निर्देश दिए गए।

31 दिसंबर को शुरुआती स्तर पर ही मृतकों के परिजनों को 2 लाख रुपए मुआवजा देने की घोषणा की गई। मुख्य चिकित्सा अधिकारी माधव प्रसाद हसानी ने कहा कि मरीजों को बेहतर से बेहतर इलाज देना सरकार की प्राथमिकता है। दूषित पाइपलाइन को तुरंत ठीक किया गया और रोजाना 20 से ज्यादा टैंकरों के जरिए सुरक्षित पानी की सप्लाई शुरू की गई। घर-घर जाकर जाँच करने पर सैकड़ों नए मरीज सामने आए जबकि अस्पतालों में अब भी करीब 200 मरीज भर्ती हैं और उनका इलाज जारी है।

हसानी ने ANI से कहा, “फिलहाल वरिष्ठ डॉक्टर और जिला प्रशासन के अधिकारी लगातार अस्पतालों में हालात पर नजर रखे हुए हैं और यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि मरीजों को सही इलाज मिले। अभी रिकॉर्ड के अनुसार चार मौतें हुई हैं। हालाँकि, अगर आगे कोई अतिरिक्त डेटा या सबूत मिलता है तो आँकड़ों को अपडेट किया जाएगा।”

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में श्रीति सागर ने लिखी है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।)