अगर मैं आपको बताऊँ कि बिहार के 2025 विधानसभा चुनाव में जंगल राज वापस आ गया था तो क्या आप मानेंगे? क्या आप यह मानेंगे कि बिहार में जंगल राज चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा था?
दरअसल, जंगल राज को बिहार से बाहर लोग सिर्फ अपराध के राज तक सीमित करके कई बार देखते हैं। लेकिन बिहार में लालू प्रसाद यादव का पर्याय जंगलराज है। 2025 के विधानसभा चुनाव में जितनी बार महागठबंधन के लोग इस बात का दावा करते थे कि उनकी सरकार बनने जा रही है उतनी बार लोगों को लगता था कि जंगलराज आने वाला है। महागठबंधन का अहम हिस्सा राष्ट्रीय जनता दल और राष्ट्रीय जनता दल का मतलब लालू प्रसाद यादव। और जिसने भी पिछले 20 वर्षों का बिहार देखा है वह लालू प्रसाद यादव की सरकार के आने की आहट से भी डरता है।
हालाँकि, विधानसभा चुनाव से दो महीने पहले यह लगने लगा था कि एक ऐसी पीढ़ी भी अब मतदाता बन चुकी है जिसे उसे (जंगलराज का) दूर का कुछ भी नहीं मालूम है। उसे फर्क नहीं पड़ता है कि कितना बड़ा चारा घोटाला हुआ, कितनी महिलाओं का सुहाग लुटा, कितनों का घर और कितनों की इज्जत।
तेजस्वी प्रसाद यादव ने अपने प्रचार के माध्यम से यह कोशिश की कि राष्ट्रीय जनता दल के साथ एक फील गुड फैक्टर जोड़ा जाए। लेकिन तेजस्वी यादव जिस सियासत के वारिस है, उसका वसीयतनामा ही उनका सियासी मर्सिया भी है। और बिहार विधानसभा चुनाव में वही हुआ। तेजस्वी यादव जिन फर्स्ट टाइम वोटर्स के साथ कनेक्ट बनाने के चक्कर में रील बनाने लगे थे, वही ऐन वक्त पर पलट गया।
जंगलराज की वापसी
बिहार विधानसभा चुनावों की कवरेज के लिए ऑपइंडिया की टीम एक महीने बिहार में थी। हमारी यात्रा की शुरुआत गोपालगंज जिले से हुई। वहाँ से निकालकर हम सिवान पहुँचे। उसी दिन राष्ट्रीय जनता दल ने अपना टिकट बाँटते हुए सिवान की रघुनाथपुर विधानसभा सीट से मृतक माफिया शहाबुद्दीन के बेटे ओसामा शाहब को टिकट दिया। सिवान शहर में ही घूमते हुए आई लव मोहम्मद के कई पोस्टर दिखाई दिए। और बगल में ही एक बड़ा सा शहाबुद्दीन का भी पोस्टर लगा था।
लोगों से बात करनी शुरू की तो अधिकतर लोग मुसलमान थे और वह राष्ट्रीय जनता दल के समर्थक थे। पोस्टर क्यों लगा, कैसे लगा? इस तरह का सवाल पूछ ही रहे थे कि एक नौजवान मुसलमान लड़के ने बोलते हुए यहाँ तक कह दिया कि अगर किसी ने पोस्टर को हाथ लगाने की भी कोशिश की तो भइया(ओसामा) ने कहा कि उसे लेकर आओ बाँधकर मारेंगे। उसने आगे कहा कि अगर साहब (शहाबुद्दीन) होते तो पोस्टर को छूने वाले को जिंदा जला देते।
इतना सुनने के बाद मुझे अंदाजा हो गया कि मैं किस तरह के इलाके में खड़ा हूँ। और लोगों से बात करते हुए मैं बाहर की तरफ निकल गया। जब यह रिपोर्ट हमारे यूट्यूब चैनल पर पब्लिश हुई तो इसकी क्लिप निकल कर सर्कुलेट होना शुरू हुई। हजारों लोगों ने निजी फेसबुक और इंस्टाग्राम आईडी से इसको शेयर किया। कुछ क्लिप्स मेरे सामने भी आई तो मैं उनके कमेंट पढ़ने लगा। और यह पहला मौका था जब मुझे समझ में आया कि बिहार के लोगों के मन से अभी भी 90 के दशक के जंगलराज का खौफ गया नहीं है।
देखिए, सिवान से ऑपइंडिया ग्राउंड रिपोर्ट
इसके बाद आपइंडिया की टीम आगे की बिहार यात्रा के लिए बढ़ गई। रास्ते में यूँ ही यूट्यूब शॉर्ट में एक क्लिप आई। उस क्लिप में लालू प्रसाद यादव के चारा घोटाले को विजय शंकर दुबे नामक एक IAS अधिकारी के द्वारा पहली बार पकड़े जाने की कहानी बताई जा रही थी। बोलने वाले व्यक्ति का नाम था मृत्युंजय शर्मा। मैंने इनकी पुस्तक Broken Promises: Caste, Crime and Politics in Bihar भी पढ़ी हुई थी। एक पत्रकार के तौर पर इंटरव्यू भी किया था, लेकिन मुझे ये अंदाजा नहीं था कि ये पुस्तक अब इंटरव्यू के क्लिप के तौर पर बिहार के युवा देख रहे हैं।
एक बड़े यूट्यूब चैनल को मृत्युंजय शर्मा का दिया गया इंटरव्यू और उसमें बोली गई हर एक बात पूरे बिहार में वायरल थी। लालू प्रसाद यादव के जंगल राज पर एकेडमिक रूप से सबसे अच्छी लिखी गई किताबों में से एक ही किताब थी। लेकिन किताब की अपनी सीमा होती है। लेकिन लेखक ने इस किताब के कंटेंट को इंटरव्यूज में जिस तरह से एक्सप्लेन किया हो बिहार की युवाओं के लिए इतिहास के सबक जैसा था।
जब मैंने इंटरनेट पर देखना शुरू किया कि यह वीडियो कहाँ तक जा रहा है तो सुदूर बिहार के रहने वाले लोगों की निजी फेसबुक आईडी पर वीडियो के क्लिप तैरते हुए मिले। और नीचे कमेंट में युवा जिस तरह से इन बातों से स्तब्ध हो रहे थे और उम्र दराज लोग समर्थन कर रहे थे कि इसी तरह का सच बोलने की जरूरत है। यह देखकर मुझे दूसरी बार यकीन हुआ कि जंगलराज कहीं नहीं गया है।
मोदी, गमछा, कट्टा, भड़काऊ गीत और जंगलराज
इन सब के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी रैलियों में लालू प्रसाद यादव के दौर की कट्टा उद्योग की चर्चा करनी शुरू की। 24 अक्टूबर 2025को प्रधानमंत्री मन नरेंद्र मोदी ने समस्तीपुर और बेगूसराय की चुनावी रैली जिसमें मैं खुद भी मौजूद था। वहाँ अपने भाषण में 30 बार जंगलराज शब्द का उपयोग किया। उन्होंने नारा दिया कि ‘फिर एक बार एनडीए सरकार, फिर एक बार सुशासन सरकार, जंगल राज वालों को दूर रखेगा बिहार।’
मुजफ्फरपुर की रैली में भी मैं मौजूद था, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यहाँ अलग ही तैयारी के साथ आए हुए थे। उन्होंने राजद समर्थकों द्वारा गाए गए गीतों के बोल के साथ तंज कसना शुरू किया। पहला गाना था ‘जब तेजस्वी सरकार बनतो, यादव रंगदार बन तो’ इसपर एक वायरल रील का भी जिक्र प्रधानमंत्री ने किया। दूसरे गाने के बारे में जिक्र करते हुए उसके भी बोल पढ़े ‘भैया के आवे दे सत्ता में, रे उठा लेब सटा के कट्टा घरा से रे।’आगे प्रधानमंत्री ने कहा कि आप राजद और कॉन्ग्रेस के खतरनाक नारे सुन रहे होंगे उनके गानों में छर्रा कट्टा और दुनाली शामिल है। यह इनकी सोच का प्रतिबिंब है।
भारतीय जनता पार्टी के बाकी नेताओं और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी अपने मंचों से जंगलराज का जिक्र करना नहीं भूल रहे थे। पूरे बिहार में भाजपा ने चुनाव की आखिरी कुछ दिनों में जंगल राज का नैरेटिव इतना मजबूत कर दिया कि राजद के रंगा सियार वाले चोले का चीथड़ा बन गया।
राजनीतिक अभियानों की अपनी ताकत होती है, पर बिहार के 2025 चुनाव में ‘जंगलराज’ केवल एक चुनावी जुमला नहीं रह गया था। यह एक भावना बन चुकी थी- एक ऐसी भावना जो 20–25 साल पुराने दौर की यादों से बनी, नए मतदाताओं तक वायरल क्लिप्स के जरिए पहुँची और नेताओं के भाषणों से गूँजते हुए पूरे चुनाव को संचालित करती चली गई।
जैसे-जैसे चुनाव नज़दीक आ रहे थे, सोशल मीडिया पर 90 के दशक के वीडियो, शहाबुद्दीन के किस्से, किडनैपिंग की खबरें और लालू-राबड़ी के दौर की कहानियाँ लगातार घूम रही थीं। आपइंडिया की टीम के द्वारा पकड़ा गया वह सिवान वाला क्लिप- जिसमें पोस्टर छूने पर ‘ज़िंदा जला देने’ वाले बयान जैसा माहौल था- वह सिर्फ़ एक वीडियो भर नहीं था। वह बहुत से लोगों के लिए 90 का भय फिर से जी उठने जैसा था। हजारों लोगों ने इसे अपने फेसबुक वॉल पर शेयर किया।
और आपको पता है, यह सब कुछ बहस नहीं थे- ये यादें और डर थे, जिन्हें किसी तथ्य-जाँच की जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि लोग इन्हें अपने अनुभवों से पहचानते हैं।
उधर मृत्युंजय शर्मा के इंटरव्यू क्लिप बिहार भर में वायरल हो गए। चारा घोटाले का ब्यौरा, अफ़सरों का ट्रांसफ़र, डर का वातावरण- ये सब बातें पहली बार बिहार के नए मतदाताओं ने इतने विस्तार से सुनीं। किताबें सीमित पाठकों तक पहुँचती हैं, लेकिन इंटरव्यूज़ लाखों के मोबाइल में पहुँच जाते हैं।
इतिहास का यह ‘रीटेल’ वर्जन जंगलराज की छवि को और मजबूत करता गया।
इसके बाद जब प्रधानमंत्री मोदी अपनी रैलियों में कट्टा, छर्रा, गमछा और रंगदारों के दौर का तंज कसने लगे और हर सभा में 25–30 बार जंगलराज शब्द को दोहराने लगे, तो माहौल पूरी तरह बदल गया।
नीतीश कुमार ने भी पहली सभा से ही रात में घर से न निकल पाने वाले दिनों को याद दिलाना शुरू कर दिया।
अमित शाह ने भीड़ से पूछा- “विकास चाहिए या जंगलराज?”
और हर तरफ़ से उठी आवाज़- ‘विकास’ ने संकेत साफ़ कर दिया कि यह मुद्दा अब केवल भाषणों का हिस्सा नहीं, बल्कि जनता की प्राथमिक चिंता बन चुका है।
AI से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI_ChatGPT)
2025 का चुनाव एक अजीब विरोधाभास था-नए युवाओं ने वायरल वीडियो देखकर जंगलराज को जाना और बूढ़ी पीढ़ी ने अपने अनुभवों की पुष्टि पाई।
दोनों की आशंकाएँ एक जगह आकर मिलीं और यही वह क्षण था जब जंगलराज सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बन गया।
दुनियाभर में हजारों उड़ानों पर असर पड़ने की आशंका है क्योंकि यूरोपीय एयरोस्पेस कंपनी एयरबस ने शुक्रवार (28 नवंबर 2025) को बताया कि उसकी सबसे ज्यादा बिकने वाली A320 फैमिली के विमानों को तुरंत सॉफ्टवेयर अपडेट और कुछ मामलों में हार्डवेयर बदलाव की जरूरत है।
दुनिया में सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाली जेट सीरीज Airbus A320 को एक गंभीर तकनीकी समस्या का सामना करना पड़ रहा है, जिससे वैश्विक एविएशन सेक्टर में हड़कंप मच गया है। भारत समेत कई देशों की एयरलाइंस इस संकट का सामना कर रही हैं। एयरबस ने अचानक A320 मॉडल के लगभग 6,000 विमानों को तुरंत रिपेयर के लिए बुलाने का आदेश दिया है।
यह एविएशन इतिहास में सबसे बड़े रीकॉल में से एक माना जा रहा है। इंडिगो, एअर इंडिया और दुनिया की कई अन्य एयरलाइंस को अपनी फ्लाइटें रद्द करनी पड़ीं और कई हवाई अड्डों पर अफरातफरी की स्थिति बन गई।
#WATCH | Delhi: Several airlines, including IndiGo and Air India, will face disrupted operations as Airbus' analysis of a recent event involving an A320 Family aircraft has revealed that intense solar radiation may corrupt data critical to the functioning of flight controls.… pic.twitter.com/UFOLklFGyJ
एयरबस के अनुसार, सूर्य से आने वाली तेज रेडिएशन (Solar Radiation) फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम के अहम कंप्यूटर में डेटा को नष्ट कर सकती है। इससे विमान के ‘नोज एंगल’ को नियंत्रित करने वाली प्रणाली गलत संकेत दे सकती है, जो उड़ान के दौरान गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है।
हालिया जाँच में पता चला कि A320 के फ्लाइट कंट्रोल डेटा में गड़बड़ी (data corruption) सौर विकिरण के कारण हो सकता है। यह समस्या मुख्यतः विमान के क्रूजिंग फेज के दौरान सामने आती है।
एयरबस ने तुरंत सभी प्रभावित विमानों के लिए सॉफ्टवेयर अपडेट अनिवार्य कर दिया है। एयरलाइंस और ऑपरेटर्स को निर्देश दिया गया है कि वे अपडेटेड सॉफ्टवेयर इंस्टॉल करें और उड़ान के दौरान अतिरिक्त सावधानी बरतें। इस अपडेट के कारण कुछ समय के लिए वैश्विक उड़ानों में व्यवधान हो सकता है लेकिन एयरबस का कहना है कि यह कदम सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बेहद जरूरी है।
कंपनी ने चेतावनी दी है कि यह अपडेट अगली उड़ान से पहले करना जरूरी होगा, क्योंकि हाल ही में सामने आई जानकारी के मुताबिक तेज सौर विकिरण (Solar Radiation) उड़ान नियंत्रण से जुड़े महत्वपूर्ण डेटा को प्रभावित कर सकता है। शुरुआती अनुमान के अनुसार यह फैसला दुनियाभर में हजारों विमानों और भारत में लगभग 300 विमानों को प्रभावित करेगा।
भारत में असर: IndiGo और Air India की सबसे ज्यादा उड़ानें प्रभावित
भारत में A320 फैमिली का सबसे बड़ा ऑपरेटर IndiGo है, जिसके पास लगभग 370 विमान हैं। वहीं Air India के पास 127 और उसकी सस्ती सेवा Air India Express के पास 40 A320 विमान हैं। इनका बड़ा हिस्सा अपडेट की जरूरत वाली सूची में शामिल है।
चूँकि, यह विमान एक दिन में कई उड़ानें संचालित करते हैं, इसलिए कुछ घंटों की ग्राउंडिंग का असर तुरंत शेड्यूल पर पड़ेगा। भारतीय एयरलाइंस का अनुमान है कि सभी प्रभावित विमानों में सॉफ्टवेयर बदलाव 2–3 दिनों में पूरा हो जाएगा।
सौर विकिरण से उड़ान नियंत्रण सिस्टम पर खतरा
Airbus के अनुसार, हाल ही में एक A320 विमान में अचानक अनचाहे तरीके से विमान के पिच (Pitch) में गिरावट दर्ज की गई, हालाँकि ऑटोपायलट चालू था और विमान सुरक्षित लैंड हो गया। जाँच के दौरान यह पाया गया कि ELAC (Elevator Aileron Computer) में खराबी आई थी, जो उड़ान के दौरान पायलट के नियंत्रण आदेशों को प्रोसेस करता है।
Airbus ने चेतावनी दी कि यह समस्या अगर ठीक नहीं की गई, तो किसी उड़ान में अनचाहे तरीके से विमान के पिछले हिस्से की मूवमेंट हो सकती है, जिससे विमान की संरचनात्मक सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।
दुनियाभर की एयरलाइंस पर कितना असर?
Airbus की घोषणा के तुरंत बाद European Union Aviation Safety Agency (EASA) ने एक आपात निर्देश जारी कर सभी ऑपरेटरों को यह बदलाव अगली उड़ान से पहले लागू करने का आदेश दिया। दुनियाभर में 11,000 से अधिक A320 फैमिली विमान सेवा में हैं और अनुमान है कि इनमें से आधे से ज्यादा प्रभावित होंगे।
भारत से लेकर यूरोप, अमेरिका और न्यूजीलैंड तक एयरलाइंस इस प्रक्रिया में शामिल हैं। एअर इंडिया ने स्वीकार किया है कि उनके कई विमानों में अपडेट किए जा रहे हैं, जिससे turnaround time बढ़ेगा और शेड्यूल प्रभावित होगा।
अमेरिका की सबसे बड़ी ऑपरेटर अमेरिकन एयरलाइंस ने बताया कि उसके 480 A320 में से 340 विमान जल्द अपडेट हो जाएँगे। वहीं दक्षिण अमेरिका की एवियांका एयरलाइन ने बताया कि उसका 70% बेड़ा प्रभावित है और उसने कुछ तारीखों पर टिकट बिक्री रोक दी है।
लुफ्थांसा, ईजीजेट और अन्य एयरलाइंस भी अपडेट के दौरान अस्थायी रूप से विमान ग्राउंड कर रही हैं। यह पूरी स्थिति ऐसे समय में सामने आई है जब कुछ हफ्ते पहले ही A320 ने बोइंग 737 को पीछे छोड़ते हुए दुनिया में सबसे ज्यादा डिलीवर किए जाने वाले विमान का खिताब हासिल किया था। अब यह समस्या वैश्विक विमानन उद्योग के लिए एक बड़ी परीक्षा बन चुकी है।
एयरलाइंस की प्रतिक्रिया: सुरक्षा सर्वोच्च, यात्रियों से माफी
एयरलाइंस ने स्थिति पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सुरक्षा सर्वोपरि है और वे Airbus के निर्देशों का पालन कर रही हैं। IndiGo ने कहा कि वह Airbus के साथ मिलकर सभी तकनीकी प्रक्रियाओं को लागू कर रहा है और कोशिश की जा रही है कि यात्रियों को कम से कम असुविधा हो।
कंपनी ने बताया कि यह स्थिति अप्रत्याशित है और इससे कुछ उड़ानों में देरी संभव है, लेकिन यात्रियों की सुरक्षा किसी भी अन्य चीज से पहले आती है। इसी तरह Air India ने भी बताया कि यह तकनीकी बदलाव उनकी फ्लीट के एक हिस्से को प्रभावित करेगा और इससे turnaround समय बढ़ेगा, जिसके कारण देरी और शेड्यूल प्रभावित होना तय है।
हालाँकि कंपनी ने कहा कि वह स्थिति को सँभालने और यात्रियों को अपडेट रखने के लिए सभी कदम उठा रही है और जितनी जल्दी हो सके बदलाव पूरे किए जाएँगे। Air India Express ने भी कहा कि उसने तुरंत तकनीकी जाँच और अपडेट की प्रक्रिया शुरू कर दी है और जहाँ जरूरत होगी वहाँ उड़ानों में बदलाव या उसे अस्थाई रुप से रद्द किया जाएगा।
यह स्थिति अस्थाई है लेकिन जब तक सभी विमान अपडेट नहीं हो जाते, तब तक वैश्विक और भारतीय उड़ानों पर असर जारी रहने की संभावना है।
चक्रवात ‘दितवाह’ (Cyclone Ditwah) एक शक्तिशाली तूफानी चक्रवात है जो बंगाल की खाड़ी में बना है। इसने सबसे पहले पड़ोसी देश श्रीलंका को बुरी तरह प्रभावित किया, जहाँ इसने अभूतपूर्व तबाही मचाई है। श्रीलंका में 120 से ज्यादा लोगों की जान गई है और बहुत बड़ा नुकसान हुआ है।
जानकारी के अनुसार, अब यह तूफान भारत के तटीय इलाकों यानी तमिलनाडु, पुडुचेरी और दक्षिण आंध्र प्रदेश की ओर बढ़ रहा है। भारत के मौसम विभाग (IMD) ने इन राज्यों में भारी बारिश और तूफानी हवाओं का रेड अलर्ट जारी किया है और लोगों को सुरक्षित रहने की सलाह दी गई है।
#WATCH | Rameswaram, Tamil Nadu | Strong winds, rain and rough sea conditions in Pamban as a result of cyclonic storm 'Ditwah' moving north-northwest across Sri Lanka and the southwest Bay of Bengal.
चक्रवात को अंग्रेजी में साइक्लोन कहते हैं, असल में समंदर के ऊपर पैदा होने वाला एक बहुत बड़ा और ताकतवर तूफान होता है जो हवा के तेजी से गोल घूमने के कारण बनता है। आप इसे एक विशाल, घूमती हुई हवा की मशीन समझ सकते हैं, जो अपने साथ तेज हवा, मूसलाधार बारिश और ऊँची लहरें लेकर आती है। यह तूफान ख़ासतौर पर हिंद महासागर जैसे गर्म पानी वाले इलाकों में बनता है और जमीन पर आकर भारी तबाही मचाता है।
चक्रवात बनने के लिए कुछ खास चीजों का एक साथ होना बहुत जरूरी है और यह सब समंदर के ऊपर ही शुरू होता है। सबसे पहले, चक्रवात बनने के लिए समंदर की सतह का पानी बहुत ज्यादा गर्म होना चाहिए (करीब 26.5°C या उससे ज़्यादा)। यह गर्मी ही तूफान की ताकत होती है।
जब पानी गर्म होता है, तो उसके ऊपर की हवा भी गर्म होकर हल्की हो जाती है और तेजी से ऊपर उठने लगती है। हवा के ऊपर उठने से समंदर की सतह के पास एक खाली जगह बन जाती है। इस जगह पर हवा का दबाव (Pressure) बहुत कम हो जाता है। यही वह ‘केंद्र’ है जहाँ तूफान बनता है।
इस खाली जगह (कम दबाव वाले केंद्र) को भरने के लिए आस-पास की ठंडी हवा बहुत तेजी से दौड़कर अंदर आती है। जब ये हवाएँ केंद्र की तरफ आती हैं, तो पृथ्वी के घूमने की ताकत (जिसे कोरिओलिस बल कहते हैं) के कारण ये सीधा न आकर, गोल-गोल घूमने लगती हैं। यह गोल घूमना ठीक वैसा ही होता है जैसे आप वॉश बेसिन से पानी निकालते हैं तो वह गोल घूमता है।
यह गोल घूमती हुई हवा लगातार ऊपर उठती रहती है और भाप बनकर बड़े-बड़े बादल बनाती है। जब हवा की रफ्तार 119 किलोमीटर प्रति घंटा से ऊपर पहुँच जाती है, तो यह एक पूरा चक्रवाती तूफान (साइक्लोन) कहलाता है। चक्रवात ‘दितवाह’ भी बंगाल की खाड़ी में ऐसे ही बना है, और अब यह श्रीलंका के पास से घूमते हुए भारत के तटों की तरफ आ रहा है।
चक्रवात इतना खतरनाक क्यों होता है?
चक्रवात सिर्फ हवा या बारिश नहीं होते, बल्कि ये तीन चीजों से मिलकर सबसे ज्यादा नुकसान पहुँचाते हैं। तूफान में हवा की रफ्तार इतनी ज्यादा होती है कि यह पेड़ों को जड़ से उखाड़ देती है, मकानों और इमारतों को तोड़ देती है। इससे बिजली के खंभे भी गिर जाते हैं, जिससे सब जगह अंधेरा छा जाता है।
चक्रवात अपने साथ बहुत ज्यादा बारिश लाते हैं। यह बारिश इतनी होती है कि कुछ ही घंटों में बाढ़ आ जाती है। बाढ़ का पानी घरों और खेतों को डुबो देता है, जिससे बहुत नुकसान होता है। यह सबसे बड़ा खतरा होता है। तेज हवाएँ समंदर के पानी को बहुत ऊँचा उठा देती हैं और ये ऊँची लहरें (जैसे एक चलती हुई दीवार) तेजी से जमीन की तरफ आती हैं। इससे तटीय इलाके पल भर में पानी में डूब जाते हैं, जिससे जान-माल का सबसे ज्यादा नुकसान होता है।
चक्रवात इन तीनों चीजों से मिलकर खेती को, जानवरों को और पूरे इलाके की अर्थव्यवस्था को बहुत बुरी तरह बर्बाद कर देते हैं। इसलिए, जैसे ही मौसम विभाग ‘रेड अलर्ट’ जारी करे, हमें तुरंत सुरक्षित जगह पर चले जाना चाहिए।
श्रीलंका पर चक्रवात ‘दितवाह’ का भयानक असर
साइक्लोन ‘दितवाह’ श्रीलंका के लिए एक बड़ी आफत बनकर आया। वहाँ की सरकार ने इसे ‘ऐसी तबाही जो पहले कभी नहीं देखी’ बताया है। इस तूफान की वजह से 120 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और 130 लोग अभी भी लापता हैं। जोरदार बारिश के कारण कई जगहों पर बाढ़ आ गई और पहाड़ों या मिट्टी वाली जगहों पर जमीन खिसकने (Landslides) की घटनाएँ हुईं।
हालात इतने खराब थे कि सरकार को करीब 44 हजार लोगों को उनके घरों से निकालकर स्कूलों और दूसरी सुरक्षित जगहों पर बने कैंपों में पहुँचाना पड़ा। राजधानी कोलंबो और उसके आस-पास के इलाकों में पानी बहुत बढ़ गया था, इसलिए लोगों को तुरंत सुरक्षित जगह जाने को कहा गया। तूफान के कारण वहाँ स्कूल बंद कर दिए गए, ट्रेनें रोक दी गईं, और यहाँ तक कि शेयर बाजार को भी जल्दी बंद करना पड़ा।
PM मोदी के विजन ‘SAGAR’ से जुड़ा ‘ऑपरेशन सागर बंधु’
‘ऑपरेशन सागर बंधु’ सिर्फ श्रीलंका को मदद पहुँचाने का काम नहीं है, बल्कि यह दिखाता है कि भारत अपने पड़ोसियों के लिए कितना भरोसेमंद दोस्त है। भारत यह दिखाना चाहता है कि वह हिंद महासागर में ‘सबसे पहले’ खड़ा होने वाला देश और सुरक्षा देने वाला है।
मुश्किल समय में मदद करके भारत ने श्रीलंका के साथ अपने रिश्ते को और मजबूत किया है। यह दुनिया को दिखाता है कि भारत के पास आपदा में सहायता (HADR) पहुँचाने की कितनी अच्छी क्षमता है। भारत ने इस राहत काम में INS विक्रांत जैसे अपने बड़े-बड़े और आधुनिक युद्धपोतों को लगाया। इससे दुनिया भर में यह संदेश गया कि भारत की समुद्री ताक़त कितनी ज्यादा है और वह कितनी तेजी से किसी भी हालात में काम कर सकता है।
#OperationSagarBandhu unfolds. @IAF_MCC C-130 J plane carrying approx 12 tons of humanitarian aid including tents, tarpaulins, blankets, hygiene kits, and ready-to-eat food items lands in Colombo.
जब भी किसी पड़ोसी देश पर संकट आता है तो चीन भी वहाँ अपनी पैठ बनाने की कोशिश करता है। लेकिन भारत ने तेजी से और बिना किसी स्वार्थ के मदद भेजकर यह साबित किया कि वह इस क्षेत्र में सबसे ज्यादा भरोसेमंद दोस्त है। यह चीन के बढ़ते असर को भी संतुलित करता है। यह ऑपरेशन प्रधानमंत्री मोदी के एक बड़े विजन ‘SAGAR’ (क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास) से जुड़ा है। इसका मतलब है कि भारत पूरे हिंद महासागर क्षेत्र की सुरक्षा और तरक्की के लिए हमेशा तैयार है।
चक्रवात ‘दितवाह’ का भारत पर क्या असर होगा?
श्रीलंका में तबाही मचाने के बाद, चक्रवात ‘दितवाह’ अब भारत की तरफ बढ़ रहा है। मौसम विभाग (IMD) का कहना है कि यह 30 नवंबर 2025 की सुबह तक हमारे किनारे वाले इलाकों यानी उत्तरी तमिलनाडु, पुडुचेरी और दक्षिण आंध्र प्रदेश के पास पहुँच सकता है। तूफान के खतरे को देखते हुए, मौसम विभाग ने तमिलनाडु के कई जिलों जैसे कुड्डालोर में ‘रेड अलर्ट’ यानी सबसे बड़ी चेतावनी जारी की है।
इसका मतलब है कि यहाँ बहुत-बहुत ज्यादा बारिश हो सकती है। इन इलाकों में अगले दो दिनों (शनिवार और रविवार) तक बाढ़ आ सकती है और निचले इलाके पानी में डूब सकते हैं। हवा की रफ्तार 70 से 90 किलोमीटर प्रति घंटा तक जा सकती है, जिससे पेड़ गिर सकते हैं, बिजली के खंभे टूट सकते हैं, और मकानों को नुकसान हो सकता है।
इसके अलावा, चेन्नई और आसपास के जिलों में भी तेज बारिश होगी, जिससे फ्लाइट सेवाएँ रुक गई हैं और रोजमर्रा के काम पर बुरा असर पड़ेगा, इसलिए ‘ऑरेंज अलर्ट’ जारी कर दिया गया है। इस खतरे से निपटने के लिए, प्रशासन ने पूरी तैयारी कर ली है। अकेले कुड्डालोर जिले में 1.5 लाख लोगों को रखने के लिए 233 राहत कैंप तैयार किए गए हैं। पानी निकालने के लिए मोटर और टीमें भी तैयार हैं और सभी सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर 24 घंटे काम कर रहे हैं।
#WATCH कुड्डालोर, तमिलनाडु: चक्रवात 'दितवाह' पर जिला कलेक्टर सिबी अधित्या सेंथिल कुमार ने कहा, "चक्रवात दितवाह को देखते हुए IMD ने कुड्डालोर जिले के लिए बहुत भारी बारिश की चेतावनी जारी की है। जिला प्रशासन ने तैयारी के लिए कई कदम उठाए हैं…हमने 233 राहत सेंटर भी पहचाने हैं जहां… pic.twitter.com/YOMBX4DZ0S
लोगों को बहुत जरूरी सलाह दी गई है कि वे अगले कुछ दिनों तक घर के अंदर ही रहें। समंदर में जाने वाले मछुआरों को 1 दिसंबर 2025 तक समंदर में जाने से साफ मना किया गया है। साथ ही, चेन्नई और श्रीलंका के बीच की फ्लाइटों पर असर पड़ा है। अगर किसी को कोई परेशानी हो तो वे सरकार के हेल्पलाइन नंबर 1077 पर फोन कर सकते हैं।
पहलगाम हमला हो या दिल्ली कार ब्लास्ट भारत में जब भी किसी इस्लामिक आतंकी हमले की बात होती है, आम लोग जब हमले के मजहबी उद्देश्यों पर सवाल उठाते हैं, तो इसे इस्लामोफोबिया कहकर मुद्दा बदलने की कोशिश की जाती है। इस बीच, संयुक्त राष्ट्र के आठ विशेष प्रतिवेदकों (UN Special Rapporteurs) ने एक संयुक्त बयान जारी कर जम्मू-कश्मीर में भारत की आतंकवाद-रोधी कार्रवाइयों पर चिंता जताई है।
UN मानवाधिकार परिषद द्वारा नियुक्त इन स्वतंत्र विशेषज्ञों ने पाकिस्तान समर्थित पहलगाम आतंकी हमले की निंदा की और पीड़ितों व भारत सरकार के प्रति संवेदना जताई। उन्होंने कहा, “हम इस जघन्य आतंकवादी हमले की स्पष्ट शब्दों में निंदा करते हैं लेकिन आतंकवाद से लड़ते समय सरकारों को अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून का सम्मान करना चाहिए।”
इन विशेषज्ञों ने भारत द्वारा किए गए कदम जैसे अस्थायी मीडिया प्रतिबंध, इंटरनेट बंद करना और 8,000 सोशल मीडिया अकाउंट ब्लॉक करने को ‘असंगत’ और अभिव्यक्ति, संगठन और शांतिपूर्ण तरीके से इकट्ठा होने की की स्वतंत्रता का उल्लंघन बताया है।
संयुक्त बयान में दावा किया गया कि पहलगाम हमले के बाद चलाए गए व्यापक अभियान में भारतीय अधिकारियों ने 2,800 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया, जिनमें पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता भी शामिल बताए गए।
कई लोगों को PSA और UAPA जैसे कठोर कानूनों में बुक किया गया, जिन्हें UN ने लंबे समय तक बिना मुकदमे के हिरासत की अनुमति देने वाले और आतंकवाद की अस्पष्ट परिभाषाएँ रखने वाले कानून कहा है।
रिपोर्ट में यह भी आरोप लगाया गया कि कई बंदियों को परिवार और वकीलों से मिलने नहीं दिया गया, कुछ को प्रताड़ित किया गया, हिरासत में संदिग्ध मौतें हुईं, भीड़ द्वारा उग्रवादियों या उनके समर्थकों की हत्या हुई और कश्मीरी व मुस्लिम समुदाय के खिलाफ भेदभावपूर्ण कार्रवाई की गई।
UN-OHCHR की इस रिपोर्ट में शामिल विशेषज्ञों में बेन सॉल, मॉरिस टिडबाल-बिन्ज, नजीला घनेआ, बालकृष्णन राजगोपाल, निकोलस लेव्राट, पाउला गवीरिया, मैरी लॉरल, गैब्रिएला सिट्रोनी (चेयर-रिपोर्टर), ग्राजीना बरानोव्स्का (वाइस-चेयर), आउआ बाल्डे, एना लोरेना डेलगाडिलो पेरेज, मोहम्मद अल-ओबैदी और ऐलिस जिल एडवर्ड्स शामिल हैं।
हिंदुओं पर हुए आतंकी हमले के बावजूद UN विशेषज्ञों की चिंता इस्लामोफोबिया पर ज्यादा
UN विशेषज्ञों ने अपने पुराने इस्लामो-लेफ्ट नैरेटिव को दोहराते हुए दावा किया कि भारतीय अधिकारियों ने संदिग्ध आतंकियों से जुड़े परिवारों के घर, दुकानें और संपत्तियाँ बिना कोर्ट आदेश और कानूनी प्रक्रिया के तोड़ दीं। उन्होंने इसे सामूहिक सजा करार दिया।
UN रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि पहलगाम हमले के बाद कई कश्मीरी छात्रों को निगरानी और उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। उनके अनुसार, विश्वविद्यालयों द्वारा सरकार के निर्देश पर छात्रों की जानकारी माँगना भी हैरासमेंट है।
पाकिस्तान समर्थित जिहादियों ने इस हमले में स्पष्ट रूप से हिंदू और अन्य गैर-मुस्लिम पर्यटकों को ही निशाना बनाया, जिसके कारण सोशल मीडिया पर हमले के धार्मिक उद्देश्य पर खुलकर चर्चा हुई। कई लोगों ने कहा कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता जैसे घिसे-पिटे तर्कों से जिहादी आतंकवाद की जड़ तक पहुँचना संभव नहीं।
UN विशेषज्ञों ने इन चर्चाओं को ही मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाने और हिंसा के लिए उकसाने की श्रेणी में रखा है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि यह माहौल सत्ता पक्ष के राजनीतिक नेताओं की टिप्पणियों से और भड़काया गया।
UN प्रतिवेदकों ने असम-गुजरात के अतिक्रमण विरोधी अभियान को भी पहलगाम की आतंक विरोधी कार्रवाई से जोड़ दिया
UN प्रतिवेदकों ने यह दावा भी किया कि असम और गुजरात में चले अवैध अतिक्रमण विरोधी अभियान को अधिकारियों ने पहलगाम हमले के बाद हुई देशव्यापी कार्रवाई से जोड़ दिया, ताकि यह दिखाया जा सके कि आतंकवाद से असंबंधित मुसलमान भी केवल धर्म के आधार पर निशाना बनाए जा रहे हैं।
आठ UN विशेषज्ञों के संयुक्त बयान में कहा गया, “गुजरात और असम में बड़ी संख्या में मुस्लिमों के घर, मस्जिदें और कारोबार तोड़े जाने की खबरें मिलीं।” उन्होंने यह भी दावा किया कि करीब 1,900 मुस्लिमों और रोहिंग्या शरणार्थियों को बिना कानूनी प्रक्रिया के बांग्लादेश और म्यांमार भेज दिया गया।
UN प्रतिवेदकों के अनुसार, ऐसे निष्कासन अंतरराष्ट्रीय कानून में तय नॉन-रिफाउलमेंट सिद्धांत का उल्लंघन हैं, जो किसी व्यक्ति को उस देश में वापस भेजने से रोकता है जहाँ उसे उत्पीड़न, मौत, यातना या किसी गंभीर खतरे का सामना करना पड़ सकता है।
असम और गुजरात में पिछले एक साल से अवैध अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई चल रही है, जिसमें सरकारी जमीन पर कब्जा कर बनाए गए मजार-दरगाह, अवैध बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों द्वारा कब्जाई गई जमीन तथा अन्य गैरकानूनी निर्माणों को हटाया जा रहा है।
ये अभियान पाहलगाम हमले से काफी पहले शुरू हो चुके थे और इनका उससे कोई सीधा संबंध नहीं था। गुजरात में हमले के कुछ दिन बाद जो एकमात्र बड़ी कार्रवाई हुई, वह चांडोला झील के आसपास अवैध ढाँचों को हटाने की थी, वह भी इसलिए क्योंकि गुजरात हाई कोर्ट ने इसकी अनुमति दी थी।
UN रिपोर्ट में यह दावा किया गया कि निर्दोष कश्मीरी नागरिकों के घर गिराए गए, जबकि जमीन पर हुई कार्रवाई केवल प्रमाणित आतंकियों के घरों पर थी, जैसे अहमद कुट्टे का शोपियाँ वाला घर, कुलगाम के सक्रिय आतंकी जाकिर का घर, पुलवामा के अहसान-उल-हक शेख का घर जो 2018 में पाकिस्तान गया था, 90 के दशक में पाकिस्तान भागा और कभी लौटा नहीं फारूक टिवडा का घर और लश्कर से जुड़े आदिल हुसैन ठोकर (बिजबेहड़ा) तथा आसिफ शेख (त्राल) का घर, जिन्हें सुरक्षा बलों ने विस्फोटकों की मदद से उड़ा दिया।
इनमें से कोई भी साधारण नागरिक नहीं था। पहलगाम हमले के बाद अवैध विदेशी नागरिकों की पहचान, हिरासत और निर्वासन की प्रक्रिया तेज जरूर हुई लेकिन इसे मुसलमानों के खिलाफ प्रतिशोध बताना तथ्यहीन और पक्षपातपूर्ण है।
रोहिंग्या मुद्दे पर भी UN की बात वास्तविकता से मेल नहीं खाती, क्योंकि भारत में UNHCR कार्ड को कानूनी मान्यता नहीं है और म्यांमार रोहिंग्याओं को अपना नागरिक नहीं मानता, इसलिए ड्यू प्रोसेस का पालन वैसा संभव नहीं जैसा UN चाहता है।
भारत रोहिंग्याओं को स्थायी रूप से बसाने के लिए बाध्य नहीं है, क्योंकि वे बांग्लादेश के रास्ते भारत आते हैं और यहाँ आकर उत्पीड़ित समूह की श्रेणी में नहीं रहते। ऑपइंडिया ने ऐसे बहुत से केस का खुलासा किया है जिनमें बांग्लादेशी मुस्लिम अवैध घुसपैठिए भी शरणार्थी नहीं बल्कि आर्थिक लाभ या अवैध गतिविधियों के लिए भारत आने वाले घुसपैठिए हैं, जो कई बार फर्जी दस्तावेज बनाकर सरकारी योजनाओं का लाभ लेते, अपराधों में भी शामिल पाए गए हैं।
ऐसी स्थिति में इनका पता लगाना, हिरासत में लेना और देश से बाहर भेजना ही एकमात्र उचित उपाय है और गैर-वापसी (non-refoulement) सिद्धांत का मतलब यह नहीं है कि भारत उन्हें हमेशा अपने देश में रखे या नागरिकता दे।
UN एक्सपर्ट्स ने टेरर फंडिंग आरोपितों इरफान मेहराज और खुर्रम परवेज को ‘ह्यूमन राइट्स डिफेंडर’ बताकर उनकी बिना शर्त रिहाई माँगी
अपने संयुक्त बयान में UN एक्सपर्ट्स ने कहा कि तथाकथित ‘ह्यूमन राइट्स डिफेंडर’ इरफान मेहराज और खुर्रम परवेज को कड़े कानूनों के तहत सालों से मनमाने तरीके से हिरासत में रखा गया है। उन्होंने माँग की, “जम्मू-कश्मीर में मनमाने ढंग से हिरासत में लिए गए सभी लोगों को तुरंत और बिना शर्त रिहा किया जाए।”
UN मानवाधिकार विशेषज्ञों में से एक, मैरी लॉरल, एक वीडियो बयान में खुर्रम परवेज की खुलकर तारीफ करती दिखीं और उन्हें बेहतरीन मानवाधिकार रक्षक बताया।
हालाँकि, इन विशेषज्ञों ने यह नहीं बताया कि इरफान मेहराज और खुर्रम परवेज को मानवाधिकार बचाने के लिए गिरफ्तार नहीं किया गया था। इरफान मेहराज, जो टू सर्कल्स से जुड़ा हैं, उनको अवार्ड-विनिंग पत्रकारिता के लिए नहीं, बल्कि आतंकवादी फंडिंग मामले में कथित संलिप्तता के कारण गिरफ्तार किया गया था।
UNHCR के रिपोर्टर्स द्वारा जारी बयान से लिया गया अंश
इरफान मेहराज का नजदीकी संबंध एक्टिविस्ट खुर्रम परवेज से था और वह जम्मू-कश्मीर कोएलिशन ऑफ सिविल सोसायटीज (JKCCS) का सदस्य भी था। NIA ने कहा था कि JKCCS घाटी में आतंकवादी गतिविधियों को फंडिंग कर रहा था और मानवाधिकार संरक्षण का बहाना करके अलगाववादी एजेंडा भी चला रहा था। जून 2020 में फेसबुक पोस्ट में इरफान मेहराज ने विवादित एक्टिविस्ट खुर्रम परवेज की सराहना की और लिखा, आप हमें हर दिन प्रेरित करते रहते हैं।
UN विशेषज्ञों ने भारतीय सरकार से कहा कि वह अपने आतंकवाद विरोधी कानून और कार्रवाई को अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून के अनुरूप बनाए और सभी कथित उल्लंघनों की स्वतंत्र जाँच कर जवाबदेही सुनिश्चित करे। उन्होंने भारत और पाकिस्तान से जम्मू-कश्मीर विवाद को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाने की भी अपील की।
UN मानवाधिकार विशेषज्ञों ने अपने बयान में पाकिस्तान की निंदा नहीं की और न ही पाकिस्तान स्थित इस्लामी आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) का नाम लिया, जिसका ही एक ग्रुप पाहलगाम हमले के पीछे था। साफ है कि UN विशेषज्ञ सीमा पार हिंसा के विनाशकारी चक्र को खत्म करना चाहते हैं, लेकिन जिहादी हिंसा के पाकिस्तान समर्थित अपराधियों, उनके मददगारों और संरक्षकों का नाम लेने से बच रहे हैं।
कारवाँ मैगजीन ने UN रिपोर्टर्स के बयान से महीनों पहले के प्रोपेगैंडा को सही ठहराया
हिन्दुओं और भारत के खिलाफ प्रोपेगैंडा के लिए कुख्यात कारवाँ मैगज़ीन ने बुधवार (26 नवंबर 2025) को X पर एक पोस्ट में UN मानवाधिकार विशेषज्ञों के बयान का हवाला दिया। मैगजीन ने लिखा कि इस साल जून में उसने वही रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जो अब UN विशेषज्ञों ने हाइलाइट की है।
कारवाँ ने लिखा, “कम से कम आठ संयुक्त राष्ट्र विशेष Rapporteurs ने सोमवार (24 नवंबर 2025) को चेतावनी दी कि 22 अप्रैल 2025 को पाहलगाम में हुए घातक हमले के बाद भारतीय अधिकारियों ने कश्मीर में गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन किए।”
कारवाँ ने जून 2025 में ‘कस्टोडियल किलिंग्स, हिरासत और ध्वंस ने शोकग्रस्त कश्मीर को कैसे प्रभावित किया’ शीर्षक से रिपोर्ट प्रकाशित की थी। @jatinder_tur ने लिखा कि कथित आतंकियों के घरों का ध्वंस कश्मीर में नया अभ्यास है जबकि हिरासत, गुमशुदगी और संदिग्ध फौजी हत्याएँ समाज ने धीरे-धीरे स्वीकार करना सीख लिया था।”
मैगजीन ने आगे लिखा, “यह एक घटिया तौर पर इस्तेमाल की गई रणनीति है, जो मुख्यभूमि की राजनीति से आयातित है और पहलगाम हमले के बाद कश्मीर में अपनाई गई। फर्क इतना था कि कश्मीर में यह ध्वंस पुलिस या नगरपालिका अधिकारियों ने नहीं किया, बल्कि सेना ने किया और घरों को बुलडोजर से नहीं बल्कि सैन्य स्तर के विस्फोटकों से ढहाया गया।”
कारवाँ और UN के कुछ रिपोर्टर्स द्वारा फैलाए गए दावों के विपरीत, भारतीय सुरक्षा एजेंसियाँ किसी भी मुस्लिम व्यक्ति को यूँ ही पकड़कर प्रताड़ित नहीं करतीं और न ही बदले की भावना से कार्रवाई करती हैं।
पहलगाम हमले की जाँच जब राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) को सौंपी गई, तो उसने सबूतों के आधार पर गिरफ्तारियाँ कीं। जून में दो ओवरग्राउंड वर्कर्स (OGWs) बशीर अहमद जोठात और परवेज अहमद को पकड़ा गया था, जो पाकिस्तान के लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े तीन आतंकियों को पनाह देने के आरोप में पकड़े गए। नवंबर में NIA की विशेष कोर्ट ने उनकी रिमांड बढ़ाई और कानूनी सहायता देने में किसी तरह की रुकावट नहीं हुई।
कारवाँ की रिपोर्ट, जिसे जतिंदर कौर तुर ने लिखा था, इसमें तीन कश्मीरी महिलाओं दिलशादा और अमीना का मामला उठाया गया है। रिपोर्ट ने दावा किया कि इन्हें पुलिस की ओवरग्राउंड वर्कर्स वाली वॉचलिस्ट में एक दशक से भी पहले जोड़ा गया था।
यह कार्रवाई तब हुई थी जब दिलशादा के पति तालीब लाली और अमीना के पति अल्ताफ लाली को सुरक्षा बलों ने गिरफ्तार किया था। उन पर हिजबुल मुजाहिदीन को फंडिंग देने का आरोप था।
कारवाँ ने अपने लेख में इन लोगों को इस तरह पेश किया जैसे वे किसी अन्याय के शिकार हों। उसमें लिखा है कि तालीब लाली की गिरफ्तारी बारह साल पहले हुई थी और जाँच एजेंसियों ने उसे हिजबुल मुजाहिदीन का बड़ा फाइनेंसर बताया था।
तब से तालीब दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद है और मामला अभी भी चल रहा है। लेख में इस बात को ‘संवेदनात्मक शैली’ में लिखा गया है, मानो वह किसी निर्दोष व्यक्ति की पीड़ा बता रहा हो जबकि मामला गंभीर आतंकी फंडिंग के आरोपों से जुड़ा है।
कारवाँ ने अपनी रिपोर्ट में यह नहीं बताया कि अल्ताफ लाली भी आतंकियों का सहयोगी था। पहलगाम हमले के कुछ दिनों बाद बांदीपोरा में सुरक्षाबलों और आतंकियों के बीच मुठभेड़ में वह मारा गया था। इस दौरान दो सुरक्षा कर्मी भी घायल हुए थे। सर्च ऑपरेशन के दौरान आतंकियों ने गोलीबारी शुरू की, जिसके जवाब में पुलिस ने कार्रवाई की और अल्ताफ लाली ढेर हुआ।
कारवाँ ने यह भी नहीं बताया कि तालीब लाली केवल आतंकी फंडिंग का आरोपित नहीं था बल्कि 2013 में मुठभेड़ में मारे जाने से पहले वह कश्मीर का सबसे लंबे समय तक जीवित रहने वाला आतंकी और हिजबुल मुजाहिदीन का टॉप कमांडर था। जब किसी परिवार के दो सदस्य आतंक में लिप्त हों वह भी एक टॉप कमांडर तो सुरक्षा एजेंसियाँ स्वाभाविक रूप से सतर्क रहती हैं।
कारवाँ पहले भी भारतीय सुरक्षा बलों की छवि खराब करने की कोशिश कर चुका है। उसने इससे पहले भी एक भ्रामक और आपत्तिजनक लेख छापा था, जिसमें भारतीय सेना पर यातना और हत्या के आरोप लगाए गए थे। यह लेख भी जतिंदर कौर तुर ने लिखा था और बाद में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) के आदेश पर हटा दिया गया। यह मामला अब अदालत में लंबित है।
पहलगाम हमले की शुरुआती जाँच में जम्मू-कश्मीर पुलिस ने करीब एक हजार से अधिक लोगों से पूछताछ और हिरासत में लिया था। ये कार्रवाइयाँ अंधाधुंध नहीं थीं बल्कि खुफिया इनपुट और आतंकियों की सप्लाई चेन तोड़ने के उद्देश्य से की गई थीं। बाद में कई लोगों को छोड़ भी दिया गया।
इस्लामो-वामपंथी मीडिया और अब UN के कुछ प्रतिनिधि UAPA और PSA जैसी कानूनों को कठोर बता रहे हैं जबकि कोर्ट कई मामलों में इन्हें सही ठहरा चुकी हैं।
कस्टोडियल किलिंग के दावे भी झूठे साबित हुए। पहलगाम हमले के बाद कुछ मीडिया समूहों और श्रीनगर के सांसद रुहुल्ला मेहदी ने कहा था कि इम्तियाज अहमद मागरे को सेना ने उठा लिया था और बाद में उसकी लाश मिली। बाद में पता चला कि 23 साल मागरे खुद आतंकियों की मदद करता था और हाईड आउट दिखाने के दौरान उसने खुद ही नदी में छलांग लगाकर आत्महत्या की। न उसे सेना ने मारा, न यातना दी।
कारवाँ का यह दावा भी गलत है कि मारे गए आतंकियों के शव परिवारों को न देना मानवाधिकार उल्लंघन है। पहले आतंकियों के अंतिम संस्कार में भारी भीड़ जमा होती थी, जहाँ उन्हें बलिदानियों, हीरो और मासूम बताकर महिमामंडित किया जाता था, जिससे नए लड़कों की भर्ती बढ़ती थी और पत्थरबाजी भी होती थी।
सरकार ने इन उग्र भीड़-एकत्रीकरण को रोकने के लिए शव परिवारों को न देने का निर्णय लिया, जिससे आतंकी महिमा-मंडन काफी कम हुआ है। फिर भी शवों को मजहबी रीति-रिवाजों के अनुसार, परिवार, मौलवी और प्रशासन की उपस्थिति में दफनाया जाता है। इसके बावजूद कारवाँ इस नीति को दंडात्मक बताकर आतंकियों के प्रति सहानुभूति दिखाता है।
(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में श्रद्धा पांडे ने लिखी है, जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे)
नेपाल राष्ट्र बैंक (NRB) ने गुरुवार (27 नवंबर 2025) को नया 100 रुपए का नोट जारी किया, जिसमें नेपाल का संशोधित नक्शा शामिल किया गया है। इस नक्शे में भारत के तीन क्षेत्रों, कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को नेपाल का हिस्सा बताकर गलत तरीके से दिखाया गया है। यह डिजाइन नेपाल सरकार के पुराने फैसले के अनुसार बदला गया है और पहली बार नोट पर लागू हुआ है।
नए नोट पर पूर्व गवर्नर महाप्रसाद अधिकारी के हस्ताक्षर हैं और जारी वर्ष 2081 विक्रम संवत (2024) दर्ज है। नोट के बाईं तरफ माउंट एवरेस्ट की तस्वीर है और दाईं तरफ नेपाल के राष्ट्रीय फूल लालीगुराँस (Rhododendron) का वॉटरमार्क दिया गया है। बीच में हल्के हरे रंग में नेपाल का नक्शा और उसके पास अशोक स्तंभ की छवि छपी है, जबकि नीचे ‘लुम्बिनी, भगवान बुद्ध की जन्मस्थली’ लिखा है।
गौरतलब है कि नक्शे का डिजाइन नहीं बदला गया है, यह कई सालों से प्रचलन में है। लेकिन नोट पर दिए गए नक्शे को नेपाल सरकार द्वारा देश के नक्शे में संशोधन करके उसमें तीन भारतीय क्षेत्रों को शामिल करने के फैसले के तहत बदल दिया गया है।
नोट के पीछे की ओर एक-सींग वाला गैंडा और उसका बच्चा छपा हुआ है। इसके साथ ही सिक्योरिटी थ्रेड और दृष्टिबाधित लोगों के लिए उभरा हुआ काला बिंदु भी दिया गया है।
NRB के एक प्रवक्ता के अनुसार, नए 100 रुपए के नोट पर नेपाल का नक्शा पहले से ही मौजूद था और सरकार के निर्णय के अनुसार इसे संशोधित किया गया है। उन्होंने आगे बताया कि 10 रुपए, 50 रुपए, 500 रुपए और 1,000 रुपए जैसे विभिन्न मूल्यवर्ग के बैंक नोटों में से केवल 100 रुपए के नोट पर ही नेपाल का नक्शा अंकित है।
नेपाल ने ओली के नेतृत्व वाली सरकार के तहत अपने मानचित्र को किया था संशोधित
जून 2020 में, उस समय की नेपाल की के पी शर्मा ओली सरकार ने संसद की मंजूरी के बाद देश का नया नक्शा जारी किया था। इस नए नक्शे में भारत के तीन क्षेत्रों, कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को नेपाल की सीमा में दिखाया गया था।
भारत ने इस कदम पर कड़ी प्रतिक्रिया दी और भारत के विदेश मंत्रालय ने इस बदले हुए नक्शे को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि नेपाल द्वारा की गई यह ‘कृत्रिम सीमा विस्तार’ ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित नहीं है, इसलिए मान्य नहीं है।
नेपाल का यह कदम उस समय आया जब भारत ने मई 2020 में उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग को जोड़ने वाली लिपुलेख लिंक रोड का उद्घाटन किया था। नेपाल ने इस पर आपत्ति जताई और दावा किया कि यह सड़क नेपाल की भूमि से होकर गुजरती है।
नेपाल लंबे समय से इन क्षेत्रों को लेकर भारत से कूटनीतिक बातचीत की माँग करता रहा है, जबकि भारत यह मानता है कि इन इलाकों को लेकर कोई विवाद नहीं है और नेपाल का दावा ऐतिहासिक प्रमाणों से साबित नहीं होता।
इसके बाद अगस्त में जब भारत ने चीन के साथ लिपुलेख व्यापार मार्ग को फिर से शुरू करने की घोषणा की, तो नेपाल ने एक बार फिर इस मामले को उठाया और अपना दावा दोहराते हुए कड़ी प्रतिक्रिया दी।
नेपाल अपने मूल्यवान पड़ोसी से कर रहा है झगड़ा
हाल ही में पूर्व हिंदू राष्ट्र नेपाल ने राजनीतिक अस्थिरता का दौर देखा, जिसके चलते ओली सरकार को सत्ता से बाहर होना पड़ा। वर्तमान में देश का संचालन एक गैर-निर्वाचित सरकार द्वारा किया जा रहा है। ऐसे समय में भारत के साथ काल्पनिक सीमा विवाद उठाना नेपाल का बेहद कमजोर और असफल कूटनीतिक कदम माना जा रहा है।
जब देश भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़े पैमाने पर हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद धीरे-धीरे सामान्य स्थिति में लौट रहा है, तब नेपाल को अपनी राजनीतिक स्थिरता और विकास पर ध्यान देना चाहिए था। इसके बजाय वह भारत जैसे पड़ोसी और सहयोगी देश के साथ अनावश्यक तनाव पैदा कर रहा है, एक ऐसा देश जिसने हमेशा संकट की घड़ी में नेपाल का साथ दिया है।
नेपाल की भौगोलिक स्थिति और भारत के साथ साझा सुरक्षा हितों को देखते हुए, उसे घरेलू शांति और द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करना चाहिए। लेकिन पारंपरिक, सांस्कृतिक और सभ्यतागत संबंधों को नज़रअंदाज करते हुए नेपाल की मौजूदा सरकार भारत के प्रति आक्रामक रवैया अपना रही है। माना जा रहा है कि यह रुख अमेरिका के दबाव में अपनाया गया है।
क्या है लिपुलेख विवाद?
लिपुलेख दर्रा भारत, नेपाल और चीन के संगम क्षेत्र में स्थित है और इस क्षेत्र को लेकर भारत और नेपाल के बीच विवाद बना हुआ है। नेपाल अपने आधिकारिक नक्शों और संविधान में लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को शामिल करता है।
नेपाल का दावा है कि 1815 के सुगौली संधि के अनुसार काली नदी सीमा तय करती है और यह विवादित क्षेत्र काली नदी के पश्चिम में आता है, इसलिए यह नेपाल का हिस्सा होना चाहिए। लेकिन भारत नेपाल के दावे को अस्वीकार करता है।
भारत का कहना है कि काली नदी का वास्तविक उद्गम स्थान नेपाल द्वारा बताए गए स्थान से नीचे है, इसलिए यह क्षेत्र उत्तराखंड का हिस्सा है।
भारत का यह भी कहना है कि नेपाल के दावे ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित नहीं हैं और वह बातचीत के माध्यम से समाधान चाहता है, जबकि इस क्षेत्र पर नियंत्रण भारत के पास बना हुआ है। रणनीतिक दृष्टि से लिपुलेख दर्रा बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारत और चीन को जोड़ने वाला मार्ग है, जो दोनों देशों की संवेदनशील हिमालयी सीमा के पास स्थित है।
इसके अलावा, लिपुलेख भारत और चीन के बीच प्राचीन व्यापार मार्ग का हिस्सा रहा है और इस व्यापार समझौते को हाल ही में फिर से नवीनीकृत किया गया है। सुगौली संधि 2 दिसंबर 1815 को नेपाल राजशाही और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हस्ताक्षरित हुई और 4 मार्च 1816 को लागू हुई थी।
इस संधि के तहत नेपाल ने अपने कई क्षेत्र, खासकर काली नदी के पश्चिम में आने वाले इलाके, जिनमें आज विवादित क्षेत्र भी शामिल हैं, सौंप दिए थे। नेपाल अब संधि की अपनी व्याख्या के आधार पर काली नदी के पश्चिम में स्थित कालापानी, लिपुलेख और लिंपियाधुरा के क्षेत्रों पर अपना दावा ठोक रहा है।
यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में अदिति ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
अपनी इस्लामी पत्रकारिता के लिए कु्ख्यात आरफा खानम शेरवानी एक बार फिर सोशल मीडिया पर रोना-धोना मचाए हुए हैं। आरफा खानम का दुख ये है कि आखिर ये जो टीवी पर दिखने वाले पत्रकार हैं इनका चेहरा क्यों बदल रहा है। क्यों ये लोग हिंदू त्योहारों पर भारतीय परिधान पहन पहनकर टीवी कार्यक्रम करने लगे हैं। क्यों इनके माथे पर तिलक, हाथ में कलावा दिखाई देता है…?
आरफा ने इस दुख के बारे में अब तक कई लोगों के साथ साझा कर दिया है। वो खुलकर बता रही हैं कि पत्रकारों का ‘हिंदू’ रूप देखकर उन्हें कितनी पीड़ा है। कभी वो संविधान की तस्वीर साझा करके अपने जख्म पर मलहम लगा रही हैं। कभी वामपंथी ‘बुद्धिजीवियों’ से चर्चा करके।
दिलचस्प बात ये है कि आरफा खानम जिन्हें समस्या इस बात से है कि अन्य पत्रकार आखिर क्यों हिंदुत्व की ओर झुकाव दिखाने लगे हैं, उन आरफा को ये एहसास ही नहीं है कि उनकी पत्रकारिता कितनी एकतरफा है। पिछले कुछ सालों में अगर आरफा खानम द्वारा उठाए मुद्दों का विश्लेषण किया जाए तो समझ आएगा कि आरफा खानम सोते-जागते सिर्फ इस्लाम और मुसलमान करती हैं। और ऐसा करता देख जो लोग उनपर सवाल उठाते हैं उन्हें वो कम्युनल मानती है, उनके सेकुलर होने पर सवाल उठाती हैं।
आप आरफा का एक्स हैंडल देखेंगे तो पता चलेगा कि इस बार वह राम मंदिर के ध्वजारोहण कार्यक्रम की कवरेज देखकर बिलबिलाई हैं। उनकी प्रतिक्रिया देखकर समझ ये नहीं आ रहा कि उनकी समस्या मुसलमानों का दुख है या हिंदुओं के प्रति घृणा।
देख सकते हैं कि शुभांकर मिश्रा के एक पोस्ट जिसमें उन्होंने बताया था कि अयोध्या में 500 वर्ष बाद राम मंदिर पर केसरिया फहरा है। उन्होंने खुशी जताई थी कि वो उस युग में जन्मे हैं जब रामललाल को टेंट से निकलकर सिंहासन पर बैठते देखा गया। इस ट्वीट ने आरफा को ऐसा जख्म दिया कि उन्होंने शुभांकर के लिए लानत भेज दी। उन्होने लिखा “और देखते-ही-देखते हिंदी पत्रकारिता, ‘हिंदू पत्रकारिता’ में बदल गई। पत्रकार, क़लम के सिपाहियों से धर्म के सैनिक बन बैठे। और देखते-ही-देखते… लानत है!”
इसके बाद द वायर का एक वीडियो देखिए। आरफा रोने वाले अंदाज में भारतीय नागरिकों को बता रही हैं कि देखिए अयोध्या में ध्वाजारोहण हो रहा है लेकिन हमेशा इस बात को याद रखा जाए कि भारत का झंडा केसरिया नहीं बल्कि तिरंगा है। और संविधान की प्रस्तावना वो कसम है जो हम लोगों ने खाई थी जब देश आजाद हुआ था।
आरफा खानम
राम मंदिर ध्वजारोहण के दिन सविधान की बात कर रही थी
एक अन्य वायरल होती क्लिप में आरफा हिंदी मीडिया को टारगेट करती इसलिए नजर आ रही हैं क्योंकि वो राममंदिर की कवरेज करता है। वह सिद्धार्थ वरदराजन और सीमा चिश्ती से बात करते हुए अपनी पीड़ा जाहिर करती हैं। उनका कहना कि जो महिल पत्रकार स्टूडियो में कोट पेंट पहनकर आती थीं वो भगवा पहनकर और तिलक लगाकर क्यों आ रही हैं। वो गीता के श्लोक और भक्ति के भजन पढ़ रही हैं।
वह इस वीडियो में साफ बोल रही हैं कि जो कुछ हो रहा है उनसे वो देखा नहीं जा रहा। उनसे भजन श्लोक नहीं सुने जा रहे। उन्हें पता नहीं चल रहा कि वो कैसे इस वक्त को काटें। आरफा के ये चेहरे के भाव हो सकता है उन लोगों को भावुक कर रहे हों जिनके लिए असल में वह पत्रकारिता करती हैं, मगर बाकियों के लिए ये सब सिर्फ हास्यासपद है। कारण- आरफा की पत्रकारिता ही है।
आज आपको संविधान की प्रस्तावना पढ़कर सुनाने वाली आरफा खानम के बारे में कोई सेकुलर राय बनाने से पहले याद रखिएगा कि आरफा सालों से इस्लामी की कुरीतियों को मजहबी अधिकार दिखाकर उन्हें सपोर्ट करती रही हैं। उनके लिए पत्रकारिता निष्पक्ष सिर्फ तब तक है जब वो इस्लामी पक्ष रखे, अगर देश की हिंदू आबादी की कोई चर्चा होगी तो उससे हिंदी पत्रकारिता के हिंदू पत्रकारिता में तब्दील हो जाने का डर रहेगा।
मेरे साथ पढ़िये – हम, भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने तथा उसके समस्त नागरिकों को: सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय; विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, आस्था और उपासना की स्वतंत्रता; प्रतिष्ठा और अवसर की समता सुनिश्चित… pic.twitter.com/0SJ0tKhDxw
उनके लिए हलाला, पॉलीगेमी और तीन तलाक जैसे मुद्दे कभी भी चर्चा लायक नहीं लगे। उन्हें दिक्कत हुई तो सिर्फ अयोध्या में राम मंदिर से, वहाँ फहराते केसरिया झंडे से और भगवा कपड़ों में वहाँ पहुँचे भक्तों। अजीब बात ये है कि अपने आपको निष्पक्ष प याद करिए यही वो आरफा खानम हैं जिन्होने कर्नाटक में जब स्कूलों में हिजाब पहनने का मुद्दा गरमाया था उस समय स्कूल के यूनिफॉर्म कोड की जगह हिजाब पहनने वाली लड़कियों का समर्थन किया था। जो जायरा वसीम के एक्टिंग छोड़ने के फैसले पर सवाल उठाने वालों पर भड़की थीं।
क्या उस समय पर उन्हें याद नहीं आया कि देश का शैक्षणिक संस्थान अपने नियम मानने को अगर कह भी रहा है तो उसमें समस्या क्या है। तब क्यों नहीं आरफा ने ये रोना रोया मुस्लिम छात्राएँ क्यों हिजाब पहन-पहनकर स्कूल-कॉलेज को मदरसा जैसा बनाने का प्रयास कर रही हैं।
इसी तरह राम मंदिर पर जो आरफा रह रहकर अपना दुख बयान करती हैं क्या आप जानते हैं कि यही आरफा बामियान बुद्ध के विनाश को जस्टिफाई कर चुकी हैं। साल 2021 में आरफा ने ये बताना चाहा था कि तालिबान ने ‘हिन्दुत्व के गुंडों’ से प्रेरित होकर बामियान बुद्ध की विशाल मूर्ति को विस्फोटक से उड़ा दिया था। शेरवानी ने ट्वीट में लिखा कि बाबरी मस्जिद के विध्वंस ने ही अफगानिस्तान में बौद्ध स्मारक के तालिबान द्वारा विनाश को प्रेरित किया था।
सोचकर देखिए कि जिन आरफा को बामिया बुद्ध की मूर्ति उड़ाने वालों के कृत्य का बचाव करने के लिए तक तर्क मिल रहा है। उन्हें कभी ये समझ क्यों नहीं आया कि राम मंदिर हिंदू के लिए क्या था? उनके लिए बाबरी का वह ढाँचा देश में सेकुलरिज्म,लोकतंत्र और संविधान के होने का प्रतीक था जिसे करोड़ों सनातनियों की भावना रौंदते हुए खड़ा किया गया था। हैरानी नहीं है कि आज जब उसी जगह, एक लंबी कानूनी लड़ाई जीतकर हिंदुओं ने अपने रामलला का मंदिर बना लिया है तो आरफा को क्यों सेकुलरिज्म,लोकतंत्र और संविधान खतरे में लगते हैं।
वित्त वर्ष 2025-26 की दूसरी तिमाही (जुलाई-सितंबर) में भारत की अर्थव्यवस्था ने वैश्विक मंदी की चुनौतियों को करारा जवाब देते हुए 8.2% की रिकॉर्ड वृद्धि दर्ज की। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO), सांख्यिकी एवँ कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने शुक्रवार (28 नवंबर 2025) को जारी प्रेस नोट में बताया कि यह ग्रोथ पिछले वर्ष की समान अवधि के 5.6% से काफी बेहतर है। स्थिर मूल्यों (2011-12 आधार) पर जीडीपी 48.63 लाख करोड़ रुपए रही, जो एक साल पहले ₹44.94 लाख करोड़ थी।
NSO द्वारा जारी रिपोर्ट के मुताबिक, नॉमिनल जीडीपी में 8.7% की बढ़ोतरी हुई, जो 85.25 लाख करोड़ रुपये पर पहुँच गई। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा, “यह आँकड़े मोदी सरकार की सुधार-केंद्रित नीतियों की जीत हैं, जो निवेश और उपभोग को गति दे रही हैं। भारत अब वैश्विक विकास का इंजन बन चुका है।”
इस तिमाही में द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रों ने मुख्य भूमिका निभाई। द्वितीयक क्षेत्र में 8.1% की वृद्धि दर्ज हुई, जिसमें मैन्युफैक्चरिंग 9.1% और कंस्ट्रक्शन 7.2% आगे बढ़ा। तृतीयक क्षेत्र ने 9.2% की उछाल दिखाई, खासकर फाइनेंस, रियल एस्टेट और प्रोफेशनल सर्विसेज में 10.2% की मजबूत ग्रोथ।
फोटो साभार: PIB
प्राइवेट फाइनल कंजम्पशन एक्सपेंडिचर (PFCE) में 7.9% की वृद्धि हुई, जो पिछले साल के 6.4% से बेहतर है। यह असमान मानसून के बावजूद घरेलू माँग की मजबूती को दर्शाता है। अर्थशास्त्री अरुण कुमार ने कहा, “PFCE की यह रफ्तार उपभोक्ता विश्वास का प्रमाण है, जो अर्थव्यवस्था को स्थिरता दे रही है।”
हालाँकि, प्राथमिक क्षेत्र कुछ कमजोर रहा। कृषि एवं संबद्ध क्षेत्र में केवल 3.5% की वृद्धि हुई, जबकि बिजली, गैस, जल आपूर्ति एवं अन्य उपयोगिता सेवाओं में 4.4% दर्ज किया गया। ये आँकड़े मौसमी चुनौतियों का नतीजा हैं।
सेक्टर के हिसाब से आँकड़े, पोटो साभार: PIB
अप्रैल-सितंबर (H1) की आधी अवधि में रियल जीडीपी 8.0% बढ़ी, जो पिछले वर्ष के 6.1% से ऊंची है। H1 में रियल जीडीपी 96.52 लाख करोड़ रुपये रही। रियल GVA में 7.9% की ग्रोथ हुई। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा, “इन्फ्लेशन ऐतिहासिक निचले स्तर पर स्थिर है, और मजबूत बाहरी बफर्स ग्लोबल वोलेटिलिटी से रक्षा कर रहे हैं।”
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आर्थिक दृष्टि ने भारत को वैश्विक मंदी से अलग कर दिया। जीएसटी रेशनलाइजेशन, सतर्क राजकोषीय अनुशासन और समन्वित मौद्रिक नीति ने निवेश-उपभोग का सकारात्मक चक्र चला दिया। पीएम मोदी ने कहा, “भारत की विकास गाथा न सिर्फ स्थिर है, बल्कि त्वरित हो रही है। हम आत्मनिर्भर भारत की ओर अग्रसर हैं।”
The 8.2% GDP growth in Q2 of 2025-26 is very encouraging. It reflects the impact of our pro-growth policies and reforms. It also reflects the hard work and enterprise of our people. Our government will continue to advance reforms and strengthen Ease of Living for every citizen.
NSO ने बताया कि ये अनुमान बेंचमार्क-इंडिकेटर विधि से तैयार किए गए, जिसमें पिछले वर्ष के आंकड़ों को प्रासंगिक संकेतकों से एक्सट्रापोलेट किया गया। डेटा स्रोतों में कृषि उत्पादन लक्ष्य, लिस्टेड कंपनियों के वित्तीय परिणाम, IIP, रेलवे ट्रैफिक, GSTN डेटा और सरकारी खाते शामिल हैं।
टैक्स राजस्व में जीएसटी और गैर-जीएसटी दोनों शामिल हैं। उत्पाद सब्सिडी के अनुमान खाद्य, यूरिया और पेट्रोलियम सब्सिडी पर आधारित हैं। व्यय घटकों के लिए वाणिज्य मंत्रालय और RBI के आयात-निर्यात डेटा का उपयोग हुआ। असंगति (डिस्क्रेपेंसी) उत्पादन और व्यय दृष्टिकोण के बीच अंतर को दर्शाती है।
NSO ने स्पष्ट किया कि डेटा कवरेज सुधार और इनपुट संशोधनों से आगे के अनुमान बदल सकते हैं। राष्ट्रीय लेखा का बेस ईयर 2011-12 से 2022-23 में संशोधित हो रहा है, जिससे Q4 अनुमान 27 फरवरी 2026 को नए सीरीज में जारी होंगे।
विशेषज्ञों का मानना है कि FY26 में समग्र ग्रोथ 7.5-8% रहेगी। यह आँकड़े भारत को दुनिया की सबसे तेज बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बनाते हैं। अमेरिका और यूरोप की सुस्ती के बीच भारत का डिकपलिंग मॉडल प्रेरणा स्रोत है।
सरकार का फोकस लंबी अवधि की रिफॉर्म्स पर है, जो इंफ्रास्ट्रक्चर और डिजिटल अर्थव्यवस्था को मजबूत करेगी। यह विकास न केवल आर्थिक, बल्कि सामाजिक उत्थान का माध्यम बनेगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की टूरिज्म क्रांति ने विदेशी सैलानियों की संख्या में जबरदस्त इजाफा किया है, जिसने तमाम राज्यों को फायदा पहुँचाया है। इस कड़ी में बंगाल जो 2023-2024 में पर्यटन के मामले में तीसरे नंबर पर था वो 2025 में दूसरे नंबर पर आ गया है। भारत के लिए जाहिर है कि ये गर्व की बात है लेकिन इस ग्रोथ का सारा क्रेडिट अब अकेले मुख्यमंत्री ममता बनर्जी लेती दिख रही हैं।
उन्होंने इस संबंध में ट्वीट कर खुद अपनी पीठ थपथपाई है। जबकि सच्चाई ये है कि 2011 से सत्तासीन ममता बनर्जी का प्रयास कहीं नजर नहीं आता है। वहीं मोदी सरकार आने के बाद शुरू किए गए प्रयास जैसे- इनक्रेडिबल इंडिया, ई वीजा, मेडिकल वीजा के साथ-साथ क्रूज से लेकर सड़क तक किए गए विकास का फायदा बंगाल को मिला है।
बंगाल बना दूसरा पसंदीदा स्पॉर्ट
विदेशी पर्यटकों के लिए बंगाल पहले तीसरा और अब दूसरा सबसे पसंदीदा टूरिस्ट स्पॉट बन गया है। पूर्व में सबसे आगे महाराष्ट्र और उसके बाद गुजरात था। मगर, अब लिस्ट में बंगाल ने गुजरात, राजस्थान और दिल्ली को पीछे छोड़ते हुए दूसरे स्थान पर आ गया है।
Proud to share that West Bengal has emerged as one of the most favoured international tourist destinations in the country, and has achieved another great milestone!!
In the recently released India Tourism Data Compendium 2025 by Ministry of Tourism, Government of India , West…
बंगाल को लेकर इस साल के शुरुआत में ही खबरें आ रही थी कि इस वर्ष बंगाल में आने वाले टूरिस्टों की पहले के मुकाबले ज्यादा हो सकती हैं। अब ये रिपोर्ट देखकर लगता है कि इस वर्ष हुआ भी यही। बता दें कि केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय के ‘भारत पर्यटन डेटा संग्रह 2025’ ने राज्य को अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों की संख्या के मामले में देश भर में दूसरे स्थान पर रखा है। देख सकते हैं बंगाल विदेशी टूरिस्टों की लुभाने में नंबर 2 पर आया है। संख्या 3.12 मिलियन रही।
अब ये वृद्धि अचानक से बंगाल में कैसे देखने को मिली। इसके पीछे के कारण मोदी सरकार के अथक प्रयास हैं।
सांस्कृतिक समृद्धि और त्यौहारों ने विदेशी पर्यटकों को आकर्षित किया है। कोलकाता में होने वाले दुर्गापूजा को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिल गई है। दुर्गा पूजा वह समय है जब बंगाल में बड़ी संख्या में विदेशी पर्यटक आते हैं। लेकिन, यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार की मेहनत का नतीजा है कि दिसंबर 2021 में यूनेस्को ने कोलकाता में होने वाले दुर्गा पूजा को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सूची में शामिल किया। इसे ‘धर्म और कला के समन्वय का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण’ माना। जाहिर है इससे शिल्पकारों, कलाकारों को भी प्रोत्साहन मिला, जो सालभर माँ दुर्गा की प्रतिमा बनाने में मशगूल रहते हैं।
ई वीजा और मेडिकल वीजा
बंगाल के प्राइवेट अस्पतालों में बांग्लादेशी मेडिकल विज़िटर्स बड़ी संख्या में आते हैं। इसकी वजह बंगाल का सीमा से सटा होना और आसानी से मेडिकल वीजा मिलना है। ये लोग ममता के गिरते हुए हेल्थ सिस्टम को भी नजरअंदाज कर यहाँ पहुँचते हैं।
पीएम मोदी की ‘हील इन इंडिया’ पहल निजी क्षेत्र के साथ मिलकर स्वास्थ्य सेवा को वैश्विक स्तर पर पहुँचाने का कार्यक्रम है। इसका फायदा बंगाल को भी हो रहा है। केन्द्र सरकार ने मेडिकल वीजा मिलना भी आसान कर दिया है। इसलिए बांग्लादेशी मेडिकल विजिटर्स रिकॉर्ड संख्या में बंगाल पहुँचे। ई वीजा की वजह से लोगों को वीजा मिलना भी सुलभ हो गया है। इसलिए पर्यटकों की संख्या में काफी बढोतरी हुई है।
इनक्रेडिबल इंडिया
भारत में रिकॉर्ड तोड़ विदेशी टूरिस्ट आने का कारण इनक्रेडिबल इंडिया है, जिसे अटल बिहारी वाजपेयी ने शुरू किया था और PM नरेंद्र मोदी ने ई-वीज़ा, मेडिकल वीज़ा, ग्लोबल कैंपेन और आसान एंट्री से इसे सुपरचार्ज किया है। अतिथि देवो भव: अवधारणा के साथ शुरू इस योजना को 2017 में नई जान आ गई। ‘इनक्रेडिबल इंडिया 2.0’ को डिजिटल और सोशल मीडिया पर काफी प्रोत्साहित किया गया। सरकार ने तो ‘वन स्टेट, वन ग्लोबल डेस्टिनेशन’ भी शुरू करने जा रही है। इसका लक्ष्य 2047 तक हर राज्य के एक डेस्टिनेशन को दुनिया में मशहूर करना है। जाहिर से इसका फायदा हर राज्य को होगा।
अतुल्य भारत डिजिटल पोर्टल शुरू किया गया। इसे भारत में आने वाले पर्यटकों के लिए खास तौर पर बनाया गया। यह यात्रियों को पर्यटन स्थलों को ढूँढने और शोध से लेकर योजना बनाने, बुकिंग करने, यात्रा करने और वापस लौटने तक सभी जरूरी जानकारी और सेवाएँ देता है। ‘बुक योर ट्रैवल’ फीचर उड़ानों, होटलों, कैब की बुकिंग की सुविधा प्रदान करता है, जिससे यात्रियों की पहुँच बेहतर होती है। जाहिर से इसका फायदा भी बंगाल को मिला।
अतुल्य भारत होमस्टे योजना
पर्यटकों की सुविधा के लिए केन्द्र सरकार ने स्वैच्छिक होमस्टे योजना शुरू की, ताकि पर्यटकों को कहीं ठहरने में दिक्कत न हो और स्थानीय जनता को भी आमदनी हो। योजना के तहत 5 से 6 गाँव में 5 से 10 होम स्टे हो सकता है जिसके लिए 5 करोड़ रुपए तक की सहायता की जा रही है।
जनजातीय पर्यटन सर्किट का विकास
स्वदेश दर्शन योजना के तहत थीम आधारित सर्किट विकसित की जा रही है। रामायण सर्किट, बौद्ध सर्किट आदि। इस योजना के तहत जनजातीय होम स्टे परियोजना भी शुरू किया गया है। ताकि पर्यटकों के आने जाने वाली जगहों का विकास किया जा सके। इसके लिए केन्द्र सरकार धन मुहैया कराती है।
तीर्थयात्रा को बढ़ावा देने के लिए प्रशाद योजना
इसके तहत राज्य के अहम तीर्थस्थलों को संरक्षित करना और उन तक पहुँचने के लिए सुविधाएँ बढ़ाया गया है। जैसे त्रिपुरा संदुरी मंदिर, चामुंडेश्वरी देवी मंदिर, पटना साहिब की विकास योजनाएँ।
घरेलू पर्यटकों को अपने देश के पर्यटन स्थलों को देखने के लिए सरकार ने प्रोत्साहित किया। इसके लिए ‘देखो अपना देश’ पहल की गई
विशिष्ट पर्यटन उपक्षेत्रों को विकसित किया गया है जैसे उत्सव पर्यटन, साहसिक पर्यटन, विवाह पर्यटन और क्रूज पर्यटन। इसमें भारत के त्यौहारों, आयोजनों से लेकर पर्वतारोहण को बढ़ावा देने, ‘इंडिया सेज आई डू’ के तहत मैरिज डेस्टिनेशन सेंटर को बढ़ावा देना शामिल है।
क्रूज पर्यटन का विकास
क्रूज पर्यटन का फायदा भी कोलकाता को मिला है। बंगाल में कई तरह की क्रूज सेवाएं शुरू हो गई हैं, जिनमें ‘बंगाल गंगा क्रूज’ अहम है। इसके अतिरिक्त, भारत और आसियान देशों के बीच बंगाल की खाड़ी में एक नए क्रूज पर्यटन कॉरिडोर भी विकसित किया जा रहा है। कोलकाता से शुरू होने वाली एक लग्जरी क्रूज सेवा भी है, जो हुगली नदी के किनारे बंगाल की संस्कृति और वास्तुकला को दर्शाती है।
बीजेपी ने ममता बनर्जी के पर्यटकों की संख्या में इजाफे को लेकर सवाल किया है। बीजेपी नेता अमित मालवीय ने ट्वीट कर सीएम ममता बनर्जी से पूछा है कि आखिर किस काम का वे क्रेडिट ले रही हैं, जबकि पर्यटन को मोदी सरकार की प्राथमिकता में एक है।
Mamata Banerjee’s shameless “proud milestone” for Bengal tourism?
A blatant CREDIT THEFT from the tourism revolution unleashed under Prime Minister Narendra Modi, while the only “international visitors” she seems most invested in facilitating are those who conveniently bolster… https://t.co/oeR8OeZQ7h
जाहिर है विधानसभा चुनाव को देखते हुए ममता सरकार हर क्रेडिट लेना चाहेगी। पर्यटन से न सिर्फ राज्य की आय बढ़ती है बल्कि आम नागरिक को काफी फायदा होता है। करीब 15 सालों से ममता बनर्जी ने पर्यटन के विकास के लिए कुछ खास नहीं किया। सांस्कृतिक तौर पर समृद्ध बंगाल को इन सालों में काफी फायदा पहुँचाया जा सकता था।
दिल्ली में इंडिया गेट के पास C-हेक्सागन में 23 नवंबर 2025 को तथाकथित ‘एंटी-पॉल्यूशन’ प्रोटेस्ट की सच्चाई तब सामने आ गई जब नक्सलवाद का महिमामंडन करते हुए नक्सली माडवी हिड़मा के समर्थन में नारे लगे। इसका आयोजन लेफ्ट-विंग स्टूडेंट संगठन भगत सिंह छात्र एकता मंच (bsCEM) और द हिमखंड ने किया। प्रदर्शन के दौरान पुलिसवालों पर पेपर स्प्रे से हमला भी किया।
हिंसा को देखते हुए 22 लोगों पर केस दर्ज किया गया। पुलिस ने उनमें से 16 आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया है। इनमें से 15 को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है जबकि एक नाबालिग को जुवेनाइल सेफ हाउस भेज दिया गया है। जैसे-जैसे इन लोगों और ग्रुप्स के खिलाफ कानूनी कार्रवाई तेज हुई, उनका कच्चा चिट्ठा सामने आ गया।
अधिकारियों ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 197 भी लागू की है। ये धारा तब लागू की जाती है, जब देश की सुरक्षा, एकता और अखंडता को नुकसान पहुँचने का खतरा हो।
bsCEM उन 40+ संगठनों में से एक है, जिन्होंने ‘कैंपेन अगेंस्ट स्टेट रिप्रेशन’ या CASR नाम का एक ग्रुप बनाया है। इंस्टाग्राम पर ये लोग ‘किस किस को कैद करोगे’ नाम का एक पेज चलाते हैं। संगठन तथाकथित ‘राजनीतिक कैदियों’ की रिहाई के लिए कैंपेन करते हैं।
यह ग्रुप 2018 से एक्टिव हुआ है। सोशल मीडिया पर उनकी मौजूदगी 2022 से देखी जा सकती है, जब उन्होंने अब गुजर चुके नक्सली प्रोफेसर गोकरकोंडा नागा साईबाबा (GN साईबाबा) की रिहाई के लिए एक कैंपेन शुरू किया था। वे नक्सल ऑर्गनाइज़ेशन से जुड़े होने की वजह से जेल में थे। GN साईबाबा की जेल में मौत हो गई थी।
(स्रोत-इंस्टाग्राम)
इससे पहले, इसका हिंदी शीर्षक ‘किस किस को कैद करोगे’ वाला एक गाना था, जो 2018 में रिलीज हुआ था।
CASR के बैनर तले जो संगठन एक्टिव हैं, इनका इतिहास विवादास्पद रहा है। इनमें से कई संगठनों ने मार्च 2023 में ‘लेट कश्मीर स्पीक’ प्रोपेगैंडा इवेंट का समर्थन किया था। हंगामे के बाद दिल्ली पुलिस ने इवेंट की परमिशन रद्द कर दी, जिसके बाद इवेंट कैंसिल कर दिया गया।
ऑल इंडिया रिवोल्यूशनरी स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन (AIRSO)
ऑल इंडिया रिवोल्यूशनरी स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन (AIRSO) कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) की स्टूडेंट विंग है, जो 2009 में बनी थी। AIRSO खुद को एक स्टूडेंट ऑर्गनाइजेशन के तौर पर दिखाता है, लेकिन इसका अपना लिटरेचर इसकी आइडियोलॉजी को साफ करता है। यह संगठन 1960 और 70 के दशक के हिंसक विद्रोहों का समर्थन करता है। यह नक्सलवाद को एक ‘महान संघर्ष’ के तौर पर देखता है और उस दौर के खून-खराबे को भारत के युवाओं को ‘जागृति’ करने के लिए जरूरी बताता है।
(स्रोत- फेसबुक)
इसका मकसद देशभर में एक ‘ताकतवर और व्यापक’ स्टूडेंट्स फ्रंट बनाना है, जो नक्सली हिंसा को हवा दे सके। AIRSO कोई स्टूडेंट्स बॉडी नहीं है, यह एक सोच को बढ़ावा देने वाला प्लेटफॉर्म है, जो स्टूडेंट एक्टिविज्म की आड़ में नक्सलवाद को बढ़ावा देता है।
ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA)
ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) एक रेडिकल स्टूडेंट्स मूवमेंट है। यह 1990 में बना था और यह ‘क्रांतिकारी बदलाव’ और ‘एक नई दुनिया’ के बारे में बड़ी-बड़ी बातें करता है। हालाँकि यूनिवर्सिटी कैंपस में, खासकर जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) में इसकी सोच जगजाहिर है। जहाँ हर साल गर्व से लाल झंडा लहराया जाता है। यह कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन की स्टूडेंट विंग है। उन्होंने भारत के मोस्ट वांटेड नक्सली माडवी हिड़मा की हत्या की निंदा की थी।
AISA का लिटरेचर नियो-लिबरल हमलों, इंपीरियलिस्ट हमलों से भरा हुआ है। यह टकराव वाली ‘स्ट्रीट पॉलिटिक्स’ का जश्न मनाता है और अपने एक्टिविज्म को फीस बढ़ाने से लेकर अमेरिकन इंपीरियलिज़्म तक हर चीज के खिलाफ लड़ाई के तौर पर दिखाता है।
यह स्टूडेंट्स का संगठन कम और कैंपस में चलने वाली रेडिकल मशीनरी ज्यादा है, जो लगातार शिकायतों और विरोध पर चलती है। स्टूडेंट अधिकारों की आड़ में शिक्षण संस्थान में अस्थिरता का माहौल पैदा करती है।
ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन (AISF)
1936 में बनी ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन (AISF) कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया यानी सीपीआई की स्टूडेंट विंग है। यह अक्सर खुद को भारत की आजादी के लिए काम करने वाला पहला स्टूडेंट फेडरेशन बताती है। इसे कैंपस में CPI के राजनीतिक हितों को पूरा करने के लिए जिंदा रखा गया है।
(स्रोत फेसबुक)
AISF की खुद की तारीफ करने वाली कहानी में जवाहरलाल नेहरू, APJ अब्दुल कलाम और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नामों का ज्यादा जिक्र किया जाता है। यह संगठन अभी भी आज़ादी से पहले वाले दौर से निकल नहीं पाया है। दरअसल AISF बहुत पहले ही स्टूडेंट-सेंट्रिक मुद्दों से भटक गया है और अब CPI की पुरानी पॉलिटिक्स का एक थका हुआ, सिद्धांतवादी हिस्सा बनकर काम करता है। संगठन आज के स्टूडेंट्स की असली चिंताओं को दूर करने के बजाय पुरानी यादों से ही चिपका रहता है।
एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स (APCR)
एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स (APCR) खुद को एक नॉन-प्रॉफिटेबल संगठन के तौर पर दिखाता है जो ‘कानून और न्याय के बीच की खाई को पाटने’ का दावा करता है। लेकिन इसका ट्रैक रिकॉर्ड कुछ और ही कहानी बयाँ करता है। 2006 में बना और सोसाइटीज़ रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत रजिस्टर्ड यह संगठन वर्कशॉप और सेमिनार के जरिए मुफ्त कानूनी मदद, फाइनेंशियल मदद और कानूनी साक्षरता प्रोग्राम चलाने का दावा करता है।
लेकिन APCR का नाम बार-बार विवादित मामलों में सामने आया है। संभल हिंसा और हिंदू-विरोधी दिल्ली दंगों जैसी हिंसक घटनाओं में आरोपी लोगों को कानूनी मदद दी है। इसकी तथाकथित ‘फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट’ न्यूट्रल डॉक्यूमेंटेशन से ज़्यादा एकतरफा प्रोपेगैंडा लगती हैं, जो कुछ ग्रुप्स को बचाने और दूसरों को बदनाम करने के लिए बनाई गई हैं।
APCR में सीनियर वकील और एक्टिविस्ट शामिल हैं, फिर भी यह संगठन सिविल राइट्स बॉडी के तौर पर कम और एक ‘एडवोकेसी फ्रंट’ के तौर पर ज्यादा काम करता है। सांप्रदायिक मामलों के आरोपितों को बचाने के लिए सामने आता रहा है।
APCR के हर्ष मंदर और सबा नकवी जैसे लोगों के साथ भी मज़बूत रिश्ते हैं। हर्ष मंदर अपनी भारत-विरोधी गतिविधियों के लिए जाने जाते हैं। इस साल मई में, उन्होंने ‘ऑपरेशन कगार’ के तहत आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों की तरफ से सरकार से बातचीत करने की कोशिश की। CAA के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों के दौरान, उन्हें सिटीजन (अमेंडमेंट) एक्ट के बारे में झूठ और फर्जी जानकारी का इस्तेमाल करके केंद्र सरकार के खिलाफ मुस्लिमों को भड़काते देखा गया था। 2023 में, मिनिस्ट्री ऑफ़ होम अफेयर्स ने उनके NGO के खिलाफ जाँच की सिफारिश की थी और 2024 में सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन ने FCRA उल्लंघन मामले में उनसे जुड़े ठिकानों पर छापेमारी की थी।
सबा नकवी अपनी विवादित टिप्पणियों और लगातार हिंदू विरोधी रवैये के लिए जानी जाती हैं। जून 2022 में, उन्होंने ज्ञानवापी में मिले शिवलिंग का अपमान किया था। इस साल मई में, जब भारत ने पहलगाम में हुए जानलेवा आतंकवादी हमले के बाद पाकिस्तान पर जवाबी हमला किया, तो नकवी भारत और पाकिस्तान के बीच शांति की अपील करते नजर आए।
इमरान भी APCR से जुड़े हैं। मसूद ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘बोटी बोटी काटने’ की धमकी दी थी। उनकी जहरीली टिप्पणियों ने उन्हें इस्लामी कट्टरपंथियों की आँखों का तारा बना दिया।
भीम आर्मी
सतीश कुमार, विनय रतन सिंह और चंद्रशेखर आज़ाद द्वारा 2015 में शुरू की गई भीम आर्मी खुद को दलित अधिकारों के लिए काम करने वाले एक अंबेडकरवादी संगठन के रूप में पेश करती है। दरअसल यह एक बहुत ज्यादा टकराव वाला संगठन बन गया है, जो सड़कों पर भीड़ जुटाने, आक्रामक तेवर दिखाने और पहचान की राजनीति को बांटने पर फलता-फूलता है।
हालाँकि यह उत्तर प्रदेश में सैकड़ों मुफ्त स्कूल चलाने का दावा करता है, लेकिन ये संगठन लोगों को उकसाना, रैलियाँ करना और दलित-मुस्लिम राजनीतिक गठबंधन बनाने की कोशिशों में लगा रहता है।
इसका मिशन ‘टकराव वाली सीधी कार्रवाई’ है। चंद्रशेखर आज़ाद के नेतृत्व वाला यह संगठन अक्सर खुद को ‘बहुजन पहचान’ से जोड़ता है। संगठन खुल कर BJP को अपना मुख्य राजनीतिक दुश्मन कहता है। पिछले कुछ सालों में भीम आर्मी का नाम कई हिंसक घटनाओं में सामने आया। 2017 के सहारनपुर झड़पों से लेकर CAA के खिलाफ प्रदर्शनों में इसकी आक्रामक भूमिका रही।
बार-बार संवैधानिक वफादारी का दावा करने के बावजूद, इस ग्रुप ने लगातार कंस्ट्रक्टिव एंगेजमेंट के बजाय उग्र आंदोलनों का सहारा लिया। असल में यह राजनीतिक फायदे के लिए जातिगत दरारों का फायदा उठाने की कोशिश करता है।
सांसद चंद्रशेखर आजाद ‘रावण’ पर रोहिणी घावरी नाम की एक महिला ने कई लड़कियों की ज़िंदगी बर्बाद करने का आरोप लगाया है। इस साल जून में, आजाद के संगठन के लोगों ने प्रयागराज में हंगामा किया। ये लोग निजी क्षेत्रों में आरक्षण की माँग कर रहे हैं।
फरवरी 2024 में, उन पर प्रशासनिक अधिकारियों को धमकी देने का आरोप लगा। उल्टे उन्होंने अधिकारियों पर SC/ST एक्ट के तहत केस किया, जबकि यह एक्ट हाशिए पर पड़े समुदायों को ज़ुल्म से बचाने के लिए इस्तेमाल होना चाहिए, ना कि राजनीतिक फायदे के लिए। हाल ही में लखनऊ की स्पेशल SC/ST कोर्ट ने एक महिला को फर्जी SC/ST केस करने पर 3.5 साल जेल की सजा सुनाई थी।
भीम आर्मी स्टूडेंट फ़ेडरेशन (BASF) BASF भीम आर्मी की स्टूडेंट विंग है।
भगत सिंह छात्र एकता मंच (bsCEM)
भगत सिंह छात्र एकता मंच (bsCEM) खुद को स्टूडेंट्स ‘डेमोक्रेटिक’ ग्रुप के तौर पर दिखाता है, लेकिन इसका आइडियोलॉजिकल झुकाव कुछ और बयाँ कर रहा है। 2018 में दिल्ली यूनिवर्सिटी में bsCEM बना। ये खुद को भगत सिंह और चारु मजूमदार के क्रांतिकारी सिद्धांतों को मानने वाला बताता है। संगठन का मानना है कि स्टूडेंट्स को ‘वर्ग संघर्ष’ का हिस्सा बनना चाहिए और ‘पुराने को तोड़कर एक नया समाज बनाना चाहिए।’
यह स्टूडेंट एक्टिविज़्म नहीं है, यह DU कैंपस के लिए रीपैकेज किया गया पुराने जमाने का मार्क्सवादी आंदोलन है।
इसके बैनर और पर्चों में बार-बार माओ का जिक्र आता है। एजुकेशन सिस्टम को ‘सड़ा हुआ’ कह कर स्टूडेंट्स को ‘दबे-कुचले लोगों’ के साथ जुड़ने का आह्वान करते हैं। ये ‘हिन्दू आइडियोलॉजी’ के सख्त खिलाफ हैं। यह संगठन CAA-NRC, किसान आंदोलन, कैंपस में उत्पीड़न के मामलों पर विरोध प्रदर्शनों में शामिल होने का दावा करता है, और यहाँ तक कि एक मैगज़ीन भी निकालता है जो खुद को ‘क्रांतिकारी नजरिया’ बताता है।
bsCEM एक स्टूडेंट सपोर्ट बॉडी की तरह कम और दिल्ली यूनिवर्सिटी के अंदर काम करने वाली एक रेडिकल मोबिलाइज़ेशन यूनिट की तरह ज्यादा काम करता है। यह आंदोलन, विचारधारा को बढ़ावा देने और व्यवस्था के खिलाफ बयानबाजी पर फलता-फूलता है।
कलेक्टिव
कलेक्टिव खुद को एक स्टूडेंट-यूथ मूवमेंट बताता है जो ‘इंडिया के लिए एक सोशलिस्ट फ्यूचर बना रहा है’, लेकिन इसका प्रोग्राम स्टूडेंट-सेंट्रिक होने के बजाय एक अनफिल्टर्ड आइडियोलॉजिकल मैनिफेस्टो जैसा लगता है।
मार्च 2021 में अपने पहले दिल्ली स्टेट कॉन्फ्रेंस के दौरान इसकी सोच सामने आ गई। इसमें पूँजीवाद के खत्मे, सर्वहारा क्रांति की बात की गई। इसमें कहा गया कि स्टूडेंट्स और ‘मेहनतकश लोगों’ की लीडरशिप में एक क्रांतिकारी बगावत ही देश को बचा सकती है।
कलेक्टिव के मुताबिक, आज इंडिया ‘ दक्षिणपंथी फासीवादी ताकतों के दबदबे’ में है, जिन्हें नियो-लिबरल कैपिटलिज्म, ग्लोबल फाइनेंस, और कथित तौर पर एंटी-साइंटिफिक, एंटी-सेक्युलर ट्रेंड्स से ताकत मिली है। यह ऑर्गनाइजेशन RSS और BJP को मेन विलेन बताता है। शासन पर ‘असहमति की हर आवाज को क्रिमिनलाइज करने’ का आरोप लगाता है। NEP से लेकर इकोनॉमिक रिफॉर्म्स तक हर पॉलिसी को इंपीरियलिस्ट इंटरेस्ट्स से सपोर्टेड एक कॉर्पोरेट कॉन्सपिरेसी के तौर पर दिखाया जाता है।
यह ग्रुप स्टूडेंट्स को सीखने वालों के तौर पर नहीं, बल्कि दुनिया भर में चल रहे एंटी-कैपिटलिस्ट संघर्ष में सबसे आगे रहने वाले लोगों के तौर पर दिखाता है। यह नक्सलवाद का महिमामंडन करता है और भगत सिंह से लेकर लैटिन अमेरिकी आंदोलनकारियों तक के क्रांतिकारियों को याद करता है। इसकी नजर में, आधुनिक शिक्षा ‘पूंजीवादी सोच का तंत्र’ है, जिसका विरोध किया जाना चाहिए। स्टूडेंट्स को ‘वर्ग संघर्ष’ की जानकारी दी जानी चाहिए।
हाल ही में कश्मीर टाइम्स के ऑफिस पर रेड पड़ने के बाद कलेक्टिव उसके सपोर्ट में आया था। पुलिस ने ऑफिस से गोला-बारूद बरामद किया था।
22 जनवरी 2024 को रामलला प्राण प्रतिष्ठा के वक्त राम मंदिर निर्माण को लेकर कलेक्टिव ने एक्स पर लिखा, ” भारत में बीजेपी-आरएसएस ने पर्यटन बढ़ाया”
COLLECTIVE कोई छात्र संगठन नहीं है। बल्कि ये मार्क्सवादी सोच के लोगों का प्लेटफॉर्म है। क्रांतिकारी बदलाव के लिए जोर दे रहा है। इसका लिटरेचर सरकार के खिलाफ बयानबाजी और विचारधारा की चिंता से भरा है। स्टूडेंट एंगेजमेंट के नाम पर, यह कैपिटलिज़्म, पेट्रियार्की, जाति के ढाँचे, चुनावी पॉलिटिक्स और यहाँ तक कि इंडियन स्टेट के मौजूदा आइडिया को भी खत्म करने की माँग करता है। फिलहाल यह कैंपस में काम करने वाले सबसे चरमपंथी ग्रुप्स में से एक बन गया है।
कमेटी फॉर रिलीज ऑफ पॉलिटिकल प्रिजनर्स (CRPP)
कमेटी फॉर द रिलीज ऑफ पॉलिटिकल प्रिजनर्स (CRPP) का गठन 2003 में हुआ था। रोना विल्सन, अमित भट्टाचार्य और SAR गिलानी ने इसे बनाया था। मिनिस्ट्री ऑफ़ होम अफेयर्स ने प्रतिबंधित CPI (माओवादी) का एक फ्रंट बताया है।
‘सिविल लिबर्टीज़’ के बैनर तले काम करते हुए, यह उन लोगों की बिना शर्त रिहाई के लिए कैंपेन चलाता है जिन्हें यह ‘राजनीतिक कैदी’ कहता है।
इसके संस्थापकों में विवादास्पद रोना विल्सन भी शामिल हैं। पुणे पुलिस को पहले उनके दिल्ली घर से एक सनसनीखेज लेटर मिला था, जिसमें कहा गया था कि माओवादी लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को टारगेट करने के लिए ‘राजीव गाँधी-टाइप’ योजना बनाने की सोच रहे हैं।
इसके लिए M4 राइफल और दूसरी चीजें खरीदने के लिए 8 करोड़ रुपये माँगे गए थे। विल्सन को भीमा कोरेगांव-एल्गार परिषद केस में गिरफ्तार किया गया था। जाँच कर्ताओं ने आरोप लगाया कि वह शहरी नेटवर्क और जंगल में रहने वाले माओवादी कैडर के बीच कोऑर्डिनेट करता था और दोषी नक्सल विचारक जीएन साईबाबा का करीबी सहयोगी था।
छह साल से ज़्यादा जेल में रहने के बाद, विल्सन को बॉम्बे हाई कोर्ट ने 8 जनवरी 2025 को ट्रायल में लंबी देरी के कारण बेल दे दी थी और 24 जनवरी को सख्त शर्तों पर रिहा कर दिया गया था, जिसमें अपना पासपोर्ट सरेंडर करना और NIA के सामने रेगुलर पेश होना शामिल था। हालाँकि उन्होंने किसी तरह के माओवादी लिंक से इनकार किया है, लेकिन विल्सन से SAR गिलानी जैसे लोगों के साथ उनके कनेक्शन को लेकर बार-बार पूछताछ की गई है।
दयार-ए-शौक स्टूडेंट्स चार्टर (DISSC)
दयार-ए-शौक स्टूडेंट्स चार्टर (DISSC) खुद को जामिया मिल्लिया इस्लामिया में एक ‘प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटिक’ मास ऑर्गनाइज़ेशन बताता है, लेकिन असल में यह कैंपस में लेफ्ट-विंग पॉलिटिकल ग्रुप के तौर पर काम करता है।
2015 में बना यह ग्रुप बहस और असहमति को आवाज देने दावा करता है। इसका एक्टिविज़्म लगातार जामिया में बड़े लेफ्ट-इस्लामिस्ट इकोसिस्टम के साथ जुड़ा रहा है। यह स्टूडेंट मुद्दों को एकेडमिक चिंताओं के बजाय आइडियोलॉजिकल लड़ाइयों को आगे बढ़ाने के लिए एक गेटवे के तौर पर इस्तेमाल करता है।
कैंपस में होने वाले टकराव के दौरान ग्रुप का बर्ताव खुद ही सब कुछ बताता है। जून 2022 में, DISSC ने ABVP द्वारा ऑर्गनाइज़ किए गए एक एनवायरनमेंटल अवेयरनेस इवेंट को फिजिकली ब्लॉक करने के लिए कैंपस फ्रंट ऑफ़ इंडिया (अब बैन हो चुके पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया की स्टूडेंट विंग) जैसे इस्लामिस्ट ग्रुप्स के साथ हाथ मिलाया।
प्रोटेस्ट करने वालों ने जामिया के गेट बंद कर दिए, ‘नारा-ए-तकबीर अल्लाह-हू-अकबर’, ‘ABVP मुर्दाबाद’ और ‘ABVP कैंपस छोड़ो’ के नारे लगाए। पर्यावरणविद इम्तियाज अली और DUSU प्रेसिडेंट अक्षित दहिया को कैंपस में घुसने से रोका। ABVP को ‘इस्लामोफोबिक’ और ‘नफरत फैलाने वाला’ कहा गया।
दरअसल DISSC एक स्टूडेंट बॉडी कम और लेफ्ट-इस्लामिस्ट कोएलिशन का फ्रंटलाइन पार्टिसिपेंट ज़्यादा है जो नियमित जामिया के कैंपस में पुलिसिंग का काम करता है, विरोधी विचारों को दबाता है और गैर-पॉलिटिकल घटनाओं को भी अग्रेसिव तरीके से आइडियोलॉजिकल बैटलग्राउंड के तौर पर दिखाता है।
डेमोक्रेटिक स्टूडेंट यूनियन (DSU)
डेमोक्रेटिक स्टूडेंट्स यूनियन (DSU) जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी और दिल्ली यूनिवर्सिटी में एक्टिव चरमपंथी स्टूडेंट ऑर्गनाइज़ेशन है। यह ऑल इंडिया रिवोल्यूशनरी स्टूडेंट्स फेडरेशन (AIRSF) का हिस्सा है और साफ़ तौर पर तथाकथित ‘न्यू डेमोक्रेटिक रेवोल्यूशन’ के लक्ष्यों के लिए काम करता है, जो किसी स्टूडेंट-सेंट्रिक मकसद के बजाय कट्टर लेफ्ट एक्सट्रीमिस्ट आइडियोलॉजी पर आधारित है।
DSU को 2016 में JNU की बदनामी के लिए सबसे ज़्यादा जाना जाता है। 9 फरवरी 2016 को DSU के सदस्यों और सहयोगियों ने संसद हमले के दोषी अफ़ज़ल गुरु और कश्मीरी अलगाववादी मकबूल भट की फाँसी दिए जाने का विरोध करते हुए विरोध प्रदर्शन किया था। कैंपस में ‘अफ़ज़ल हम शर्मिंदा हैं, तेरे क़ातिल ज़िंदा हैं’ जैसे नारे लगाए गए थे। DSU के पूर्व लीडर उमर खालिद को कन्हैया कुमार और अनिर्बान भट्टाचार्य के साथ गिरफ्तार किया गया था।
उमर खालिद का रास्ता DSU के आइडियोलॉजिकल इकोसिस्टम को और दिखाता है। बाद में उसे UAPA के तहत 2020 के हिंदू-विरोधी दिल्ली दंगों से जुड़े साजिश के मामले में गिरफ्तार किया गया। जाँचकर्ताओं ने हिंसा की साजिश में उसके शामिल होने का आरोप लगाया। खालिद के बैकग्राउंड पर भी सवाल उठे हैं, क्योंकि उसके पिता, सैयद कासिम रसूल इलियास, अब बैन हो चुके आतंकवादी संगठन SIMI के सदस्य थे।
DSU एक स्टूडेंट संगठन के तौर पर कम और एक कट्टर-लेफ्ट पॉलिटिकल ग्रुप के तौर पर ज़्यादा काम करता है, जिसने एक्टिविज़्म की आड़ में बार-बार कैंपस में कट्टरपंथी बातों को आगे बढ़ाया है।
डेमोक्रेटिक टीचर्स फ्रंट (DTF)
डेमोक्रेटिक टीचर्स फ्रंट (DTF) दिल्ली यूनिवर्सिटी में लेफ्ट-विंग टीचर्स का एक संगठन है जो खुद को ‘डेमोक्रेटिक’ एकेडमिक स्पेस का डिफेंडर मानता है। यह लंबे समय से कैंपस में होने वाले आंदोलनों में शामिल रहा है, जिसमें मोदी सरकार की शिक्षा पहल, नेशनल एजुकेशन पॉलिसी और पंजाब यूनिवर्सिटी में सीनेट को खत्म करने के कदम जैसे केंद्रीय सुधारों का विरोध किया गया है।
फ्रेटरनिटी मूवमेंट
फ्रेटरनिटी मूवमेंट, वेलफेयर पार्टी ऑफ इंडिया की स्टूडेंट विंग है और ‘डेमोक्रेसी, सोशल जस्टिस और फ्रेटरनिटी’ के नारे के साथ काम करती है। नरम सोच के बावजूद, ग्रुप ने बार-बार खुद को कट्टरपंथी सोच के साथ जोड़ा है। फैटरमिटी दिल्ली में तथाकथित एंटी-पॉल्यूशन प्रोटेस्ट में मौजूद संगठनों में से एक था।
दिसंबर 2019 में एंटी-CAA प्रदर्शन के दौरान, इसके मेंबर्स ने कालीकट इंटरनेशनल एयरपोर्ट को भी ब्लॉक कर दिया था। वेलफेयर पार्टी ऑफ़ इंडिया को खुद सैयद कासिम रसूल इलियास जैसे लोग लीड करते हैं, जो SIMI के पूर्व मेंबर और उमर खालिद के पिता हैं, और लंबे समय से इस्लामिस्ट झुकाव वाले एक्टिविज़्म से जुड़े रहे हैं।
कई विवादित एक्टिविस्ट फ्रेटरनिटी मूवमेंट से जुड़े हैं, जिनमें आफरीन फातिमा और आयशा रैना शामिल हैं। फातिमा ने पार्लियामेंट अटैक के दोषी अफजल गुरु का पब्लिकली बचाव किया है, और बार-बार फैसले पर ‘दोबारा सोचने’ की अपील की। उन्होंने राम मंदिर के फैसले को लेकर सुप्रीम कोर्ट पर भी सवाल उठाए। मीडिया में मशहूर रैना ने शरजील इमाम का खुलकर सपोर्ट किया, उसके खिलाफ पुलिस एक्शन को ‘विच हंट’ कहा और भड़काऊ अलगाववादी भाषणों के बावजूद उसके खिलाफ केस हटाने की माँग की।
इसलिए, फ्रेटरनिटी मूवमेंट स्टूडेंट राइट्स प्लेटफॉर्म के तौर पर नहीं, बल्कि वेलफेयर पार्टी के आइडियोलॉजिकल इकोसिस्टम के पॉलिटिकल एक्सटेंशन के तौर पर काम करता है, जो अक्सर कैंपस एक्टिविज्म की आड़ में एक्सट्रीमिस्ट, पोलराइजिंग और एंटी-एस्टैब्लिशमेंट नैरेटिव को सपोर्ट करता है।
इंडियन एसोसिएशन ऑफ पीपल्स लॉयर्स (IAPL)
इंडियन एसोसिएशन ऑफ पीपल्स लॉयर्स (IAPL) खुद को न्याय, बराबरी और ह्यूमन राइट्स के लिए कमिटेड ‘आम लोगों के वकील’ के तौर पर दिखाता है। इसका कॉन्स्टिट्यूशन इंडियन स्टेट को इंपीरियलिस्ट और दमनकारी दिखाना है। एंटी-इंपीरियलिस्ट संघर्षों को सपोर्ट करने का वादा करता है। कागज़ पर यह वकीलों और लीगल एक्टिविस्ट्स की एक नेशनल बॉडी है। हालाँकि, नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी की फाइंडिंग्स बिल्कुल अलग तस्वीर दिखाती हैं।
एल्गार परिषद केस में NIA चार्जशीट के मुताबिक, IAPL बैन CPI (माओवादी) का एक फ्रंटल ऑर्गनाइजेशन है। इन्वेस्टिगेटर्स ने गवाहों के बयान रिकॉर्ड किए, जिसमें बताया गया कि ग्रुप की एक्टिविटीज़, फैक्ट-फाइंडिंग मिशन, लीगल सपोर्ट नेटवर्क और मीटिंग्स में अक्सर ऐसे लोग शामिल होते थे, जिन पर माओवादी होने का शक है।
एक गवाह ने 2018 में कश्मीर में फैक्ट-फाइंडिंग विज़िट के बारे में बताया कि यहाँ माओवादी सोच वाले वकील के अलावा भी लोग थे। जब यह बात आरोपित अरुण फरेरा को बताई गई, तो कथित तौर पर वह ‘बस मुस्कुराया’।
NIA ने इस बात पर जोर दिया कि IAPL का काम कानूनी एक्टिविज़्म की आड़ में लगातार माओवादी एजेंडा को आगे बढ़ाना था। माओवादी मामलों से जुड़े कई एक्टिविस्ट इसके जरिए काम करते थे। हालाँकि कुछ सदस्यों ने विचारधारा के मतभेदों का हवाला देते हुए इस्तीफा दे दिया, लेकिन एजेंसी का कहना है कि इस संगठन ने माओवादी नेटवर्क को सपोर्ट देने वाले एक कवर स्ट्रक्चर के तौर पर काम किया है।
मानवाधिकारों की सुरक्षा के अपने दावों के बावजूद, यह संगठन CPI (माओवादी) के बड़े शहरी सपोर्ट सिस्टम के हिस्से के तौर पर बार-बार जाँच में सामने आया है। ऑपरेटिव को बचाने, बातों पर असर डालने और चरमपंथी मकसदों को आगे बढ़ाने के लिए कानूनी राय, वकालत और फैक्ट-फाइंडिंग मिशन का इस्तेमाल करता है। हालाँकि, संगठन ने दावा किया है कि उसका CPI (माओवादी) से कोई लेना-देना नहीं है।
नज़रिया मैगज़ीन
नज़रिया मैगज़ीन खुले तौर पर मार्क्सवादी-लेनिनवादी-माओवादी पब्लिकेशन है जो भारत को ‘ब्राह्मणवादी हिंदुत्व फासीवाद’ देश के तौर पर दिखाता है और खुद को ‘क्रांतिकारी पॉलिटिक्स’ के लिए एक आइडियोलॉजिकल हथियार के तौर पर पेश करता है। यह जोर देता है कि मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद ही ‘वर्ग संघर्ष’ को खत्म कर एक नई सोशलिस्ट व्यवस्था बनाने का एकमात्र रास्ता है।
2024 में, नज़रिया उस वक्त एक बड़े स्कैंडल में फँस गया, जब उसके समर्थक ने मुकुंदन नायर पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया। उसका सपोर्ट करने के बजाय, नज़रिया ने एक इंटरनल कमेटी बनाई जिसने आरोपी के खिलाफ ही सिफारिश की। जब सर्वाइवर ने एतराज़ किया, तो ऑर्गनाइज़ेशन ने उसे नवंबर 2024 में निकाल दिया और उस पर ‘इंपीरियलिस्ट आइडियोलॉजी’ और ‘कम्युनिस्ट मोरैलिटी’ का उल्लंघन करने के आरोप लगाते हुए बयान जारी कर दिया। ये हमले सर्वाइवर को बदनाम करने और आरोपी को बचाने के लिए किए गए।
बाद में सर्वाइवर ने बताया कि bsCEM से जुड़े एक्टिविस्ट ने उसे बदनाम करने और झूठे दावे फैलाने में हिस्सा लिया था। तस्वीरें सामने आईं जिनमें bsCEM के सदस्य मुकुंदन के साथ मिलते-जुलते दिखे, जबकि उन्होंने निजी तौर पर माना था कि उन्हें आरोपों के बारे में पता था।
इस मामले में नज़रिया, bsCEM, FACAM और यहाँ तक कि SfPD ने पूरे घटनाक्रम को आइडियोलॉजिकल लड़ाई में बदल दिया, कमेंट्स डिलीट कर दिए, आलोचना करने वालों को ब्लॉक कर दिया और सर्वाइवर के ट्रॉमा का इस्तेमाल पॉलिटिकल पॉइंट बनाने के लिए किया।
इस एपिसोड ने नज़रिया के दोगलेपन को सामने ला दिया, जिसमें एक ऐसे ग्रुप का खुलासा हुआ जो एक यौन उत्पीड़न के आरोपित को बचाता है, जबकि आइडियोलॉजिकल शुद्धता बनाए रखने के लिए अपने ही कर्मचारी को बदनाम करता है।
रिहाई मंच
यह एक पॉलिटिकल फ्रंट है जो दमन का विरोध करने का दावा करता है। यह एंटी-CAA और किसान विरोध प्रदर्शनों सहित कई विरोध प्रदर्शनों में शामिल था।
स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI)
स्टूडेंट्स फेडरेशन इन इंडिया एक लेफ्ट-विंग स्टूडेंट ऑर्गनाइजेशन है। ऑपइंडिया ने इस ऑर्गनाइजेशन को बड़े पैमाने पर कवर किया है। इसे यहाँ चेक किया जा सकता है।
यूनाइटेड पीस अलायंस
यूनाइटेड पीस अलायंस एक पॉलिटिकल फ्रंट है जिसे मीर शाहिद सलीम लीड कर रहे हैं, जिसे कश्मीर में ‘दमन के खिलाफ विरोध’ के लिए एक प्लेटफॉर्म के तौर पर बनाया गया है। हालाँकि यह शांति और अधिकारों की भाषा का इस्तेमाल करता है, लेकिन यह ग्रुप लगातार भारत सरकार के खिलाफ बयानबाजी करता है, खासकर आर्टिकल 370 के हटने के बाद।
संगठन के चेयरमैन सलीम अक्सर कहते हैं कि केंद्र सरकार ने 5 अगस्त, 2019 से कश्मीरियों को ‘डराया’ और ‘दबाया’ है। उनके नेतृत्व में, यूनाइटेड पीस अलायंस ने कॉन्फ्रेंस की हैं। 5 अगस्त को जश्न मानने का विरोध किया और इसे ‘ब्लैक डे’ के तौर पर मनाने की वकालत की।
ग्रुप की गतिविधियां 370 विरोधी भावनाओं को बढ़ाने, संवैधानिक बदलावों को दमन के तौर पर दिखाने और इन दावों के इर्द-गिर्द पॉलिटिकल लामबंदी करने के इर्द-गिर्द घूमती हैं। शांति में योगदान देने के बजाय, यूनाइटेड पीस अलायंस एक और प्रेशर ग्रुप के तौर पर काम करता है, जो अधिकारों की वकालत की आड़ में अलगाववादी बयानबाजी को जिंदा रखता है।
यूथ 4 स्वराज (Y4S)
यूथ 4 स्वराज (Y4S) योगेंद्र यादव की पॉलिटिकल पार्टी, स्वराज इंडिया की स्टूडेंट-यूथ विंग है। हालाँकि यह खुद को ‘अल्टरनेटिव पॉलिटिक्स’ और सूखा राहत से लेकर कैंपस एक्टिविज्म तक के मुद्दों पर युवाओं को इकट्ठा करने के लिए एक प्लेटफॉर्म के तौर पर दिखाता है, लेकिन इस ऑर्गनाइजेशन पर सेक्शुअल असॉल्ट और इंस्टीट्यूशनल उदासीनता के गंभीर आरोप लगे हैं।
2020 में, Y4S की एक पुरानी मेंबर ने यूथ 4 स्वराज के उस समय के प्रेसिडेंट मनीष कुमार पर सबके सामने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया। उसने कहा कि उसने योगेंद्र यादव और दूसरे सीनियर नेताओं को इस गलत काम के बारे में बताया था, लेकिन उसकी शिकायतों को नज़रअंदाज़ कर दिया गया। उसके बयान के मुताबिक, स्वराज इंडिया के मेंबर्स ने उसे मेंटली ट्रॉमा दिया और आखिरकार उसे इस्तीफा देने पर मजबूर होना पड़ा। असॉल्ट की रिपोर्ट करने के बाद भी, मनीष कुमार किसानों के प्रोटेस्ट के दौरान सिंघु बॉर्डर पर Y4S को रिप्रेजेंट करते रहे।
सर्वाइवर ने यह भी आरोप लगाया कि जब उसने सीधे योगेंद्र यादव से बात की, तो उन्होंने चुप्पी साध ली, जबकि स्वराज इंडिया के वाइस प्रेसिडेंट अविक साहा ने उसे सिर्फ पुलिस के पास जाने के लिए कहा। इंस्टाग्राम पर शेयर किए गए अपने इस्तीफे में उन्होंने लिखा कि संगठन ने गलत काम करने वालों को बचाया, जबकि आवाज उठाने वाली महिलाओं को बदनाम किया गया।
दूसरे संगठनों में ASA, BSM, CEM, CSM, CTF, LAA, फोरम अगेंस्ट रिप्रेशन तेलंगाना, कर्नाटक जनशक्ति, मजदूर अधिकार संगठन, मजदूर पत्रिका, NAPM, निशांत नाट्य मंच, न्यू ट्रेड यूनियन इनिशिएटिव (NTUI), पीपल्स वॉच, समाजवादी जनपरिषद, समाजवादी लोक मंच, बहुजन समाजवादी मंच, वीमेन अगेंस्ट सेक्सुअल वायलेंस एंड स्टेट रिप्रेशन (WSS), नौरोज, इनोसेंस नेटवर्क और दूसरे शामिल हैं।
कुल मिलाकर, इंडिया गेट पर हुए इवेंट्स और इन संगठनों की प्रोफाइल से यह साफ है कि ‘एंटी-पॉल्यूशन’ प्रोटेस्ट एयर क्वालिटी इंडेक्स के ‘बेहद गंभीर’ श्रेणी में जाने को लेकर नहीं था। बल्कि यह एक कोऑर्डिनेटेड आइडियोलॉजिकल एजेंडा को आगे बढ़ाने के बारे में था, जो नक्सलियों को महिमामंडित करता है, भारतीय संस्थानों को कमजोर करता है और देश के खिलाफ कैंपस, कोर्ट और ‘सिविल राइट्स’ की भाषा को हथियार बनाता है।
स्टूडेंट्स की संस्थाओं और ‘अधिकारों’ के ग्रुप्स से लेकर वकीलों के फ्रंट और कश्मीर प्रेशर ग्रुप्स तक, bsCEM और CASR के आस-पास का नेटवर्क कोई अचानक नहीं बना है। यह एक ऐसा इकोसिस्टम है जो भारत विरोधी बयानबाजी को नॉर्मल मानता है। गंभीर आरोपों का सामना कर रहे लोगों को सजा से बचाता है। यह रिपोर्ट OpIndia सीरीज की बस शुरुआत है, जो सिलसिलेवार तरीके से नक्सल समर्थक, लेफ्ट-झुकाव वाले ग्रुप्स के ऑर्गनाइज़ेशनल जाल को सामने लाएगी। उनके भारत विरोधी गतिविधियों का पर्दाफाश करेगी।
दिल्ली के रेड फोर्ट के पास 10 नवंबर 2025 को हुए भयानक कार ब्लास्ट ने पूरे राष्ट्र को स्तब्ध कर दिया। एक सफेद ह्युंडई i20 कार में भारी मात्रा में अमोनियम नाइट्रेट और अन्य विस्फोटक लादकर सुसाइड बॉम्बर डॉक्टर उमर उन नबी ने धमाका किया। इस धमाके में 15 निर्दोष लोग मारे गए और 20 से अधिक घायल हुए।
दिल्ली पुलिस ने तत्काल यूएपीए और एक्सप्लोसिव्स एक्ट के तहत केस दर्ज किया, जबकि केंद्र सरकार ने इसे साफ तौर पर आतंकी हमला घोषित कर दिया। एनआईए की जाँच में सामने आया कि उमर पुलवामा का डॉक्टर था, जो फरीदाबाद के अल-फलाह यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर था और जैश-ए-मोहम्मद और अंसार गजवात-उल-हिंद जैसे इस्लामिक मिलिटेंट ग्रुप्स से जुड़ा था।
उसके सहयोगी डॉक्टर मुजम्मिल अहमद गनई, अदील मजीद राथर, शकील और शाहीन सईद भी गिरफ्तार हुए, जो ‘टेरर डॉक्टर्स’ के नेटवर्क का हिस्सा थे। इस घटना ने ‘व्हाइट-कॉलर टेररिज्म’ को सबके सामने उजागर किया।
इसके बाद तो इसे आतंकी हमला कहने में कोई भी गुंजाइश भी नहीं बची। केंद्र सरकार की कैबिनेट ने भी इसे ‘एंटी-नेशनल फोर्सेस’ द्वारा किया गया हेसियन टेरर एक्ट करार दिया। जाँच में सीसीटीवी फुटेज से ये भी सामने आया कि उमर ने कार को रेड फोर्ट मेट्रो स्टेशन के पास पार्क किया और ट्रैफिक सिग्नल पर विस्फोट किया।
डीएनए टेस्ट से उमर की पहचान हुई, जो फरीदाबाद रेड्स के बाद घबराकर दिल्ली की ओर भागा था। एनआईए ने 2900 किलो विस्फोटक बरामद किए, जो जैश के हैंडलरों से जुड़े थे। यह साफ हो गया था कि पाकिस्तान में पल रहे टेरर मॉड्यूल एक्टिव हैं और उन्होंने ही देश में अशांति फैलाने की कोशिश की।
आतंकी शब्द से परहेज करता ‘द हिंदू’
ऐसे स्पष्ट प्रमाणों के बावजूद ‘द हिंदू’ जैसे वामपंथी मीडिया हाउस अपने पुराने ढर्रे पर चल रहे हैं। उन्होंने अपनी रिपोर्ट्स में ‘आतंकी’ शब्द लिखने से पूरी तरह परहेज किया।
द हिंदू ने ब्लास्ट के बाद से लेकर अब तक उमर को ‘डॉक्टर’, ‘आरोपित’, ‘संदिग्ध’ या ‘मैन’ ही लिखा है। 17 दिन बीतने के बाद भी उनकी हेडलाइंस अब तक अस्पष्ट हैं। हेडलाइन्स में ‘डॉक्टर उमर की कार में ब्लास्ट’, ‘आरोपित डॉक्टर गिरफ्तार’, ‘रेड फोर्ट ब्लास्ट में संदिग्ध की भूमिका’ लिखा गया है।
यहाँ तक कि जहाँ ‘टेररिस्ट’ लिखा, वहाँ इस शब्द को सिंगल कोट्स में डाल दिया, मानो अब तक उन्हें संदेह ही है। और ये वह पाठक के मन में भी पैदा कर रहे हैं। सोशल मीडिया पोस्ट्स में भी ‘कार ब्लास्ट’, ‘एक्सप्लोडिंग कार’ आदि का पैटर्न रहा बिना ‘आतंकवादी हमला’ लिखे।एक तरह से यह पत्रकारिता नहीं बल्कि टेरर सिम्पैथी कहा जाना चाहिए।
पहले भी दिखा वामपंथ का नैरेटिव पैटर्न
यह कोई पहली बार नहीं है। द हिंदू की रिपोर्टिंग में अक्सर यह पैटर्न दिखता है कि जब भी किसी घटना को धो-पोंछना होता है, किसी आरोपित को पाक साफ दिखाना होता है को तो शब्दों से खेला जाता है। दिल्ली ब्लास्ट में भी द हिंदू की अब तक रिपोर्ट्स की हेडलाइंस इसी पैटर्न को दर्शाती हैं।
पहली– ‘रेड फोर्ट के पास कार ब्लास्ट, डॉक्टर संदिग्ध’- पर आतंकी नहीं।
ये हेडलाइंस द हिंदू की दुविधा साफ तौर पर दिखाती हैं। सरकार आतंकी कह रही, NIA यूएपीए (UAPA) लगा रही, लेकिन द हिंदू 27 नवंबर 2025 तक भी ‘टेररिस्ट’ बोलने से हिचक रही। उनकी रिपोर्ट्स में अक्सर ‘terrorist’ की जगह ‘militant’, ‘gunman’, ‘accused’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है। यह वही अप्रोच है जो अल-जजीरा जैसे अंतरराष्ट्रीय मीडिया में दिखती है। वहाँ भी आतंकी कहने से बचा जाता है और भाषा को इस तरह गढ़ा जाता है कि पाठक के मन में संदेह पैदा हो।
पुराने ढर्रे पर चल रहा द हिंदू
द हिंदू जैसे वामपंथी मीडिया हाउसेज का ये पुराना हथकंडा है। पुलवामा अटैक, 26/11 या ऑपरेशन सिंदूर के बाद भी इन्होंने टेररिस्ट को ‘मिलिटेंट’, ‘आरोपित’ कहा। शब्दों से खेलकर ये वामपंथी मीडिया हाउस अलग नैरेटिव बनाने की कोशिश में लगे रहते हैं- आतंकवादी हमले को ‘इंसिडेंट’ और हमलावर को आतंकी के बजाय ‘डॉक्टर’ और आरोपित लिखते हैं जैसे उसने लोगों को मारा नहीं बल्कि सिर्फ चप्पल चुराई हो।
द हिंदू, अल जजीरा की तर्ज पर ही काम करता है। जैसे अल-जजीरा हमास को ‘मिलिटेंट’ कहता है वैसे ही द हिंदू भी आतंकी को मानवीकरण करता दिखता है। इसके पीछे उसका उद्देश्य साफ है- पाठकों में संदेह डालना कि ‘क्या बंदा सच में टेररिस्ट था?’
वामपंथी मीडिया की कलाबाजी अब भी जारी है, भले आम जनता जाग चुकी हो। सोशल मीडिया पर ट्रोल्स इन्हें आड़े हाथों ले रहे हैं, लेकिन ये अपनी लाइन नहीं छोड़ते। इनकी कोशिश यही रहती है कि किसी भी घटना को इस तरह पेश किया जाए कि पाठक के मन में सरकार और एजेंसियों की बात पर सवाल उठे।
द हिंदू की यह मानसिकता कहीं न कहीं राष्ट्रीय सुरक्षा पर भी सवाल खड़े करती है। जब NIA जैश लिंक बता रही, तो ‘डॉक्टर नेटवर्क’ कहना आंतक को ग्लोरिफाई करता है फरीदाबाद में 2900 किलो आईईडी बरामद हुए, जो कार बॉम्ब में इस्तेमाल किए गए, फिर भी द हिंदू उसे ‘ब्लास्ट’ लिखता है। यह पत्रकारिता नहीं, प्रोपगैंडा है।
ऐतिहासिक संदर्भों को देखा जाए तो ‘द हिंदू’ का वामपंथी झुकाव साफ है। नेहरू युग से ये कॉन्ग्रेस-समर्थक रहे। इमरजेंसी में भी चुप्पी साधे रखी। अब मोदी सरकार के खिलाफ नैरेटिव बुनते रहते हैं।
जाँच में दिखा जैश से संपर्क, द हिंदू ने छिपाया
रेड फोर्ट ब्लास्ट पर भी पाकिस्तान से जुड़ा लिंक और तथ्यों को छिपाया और जैश-ए-मोहम्मद को महज एक ‘ग्रुप’ कहा। दिल्ली ब्लास्ट में पकड़े गए सभी आरोपितों का सीधा जुड़ाव पाकिस्तान-स्थित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद से था।
जाँच एजेंसियों ने पाया कि ‘हंजुल्ला’ नामक जैश हैंडलर ने डॉक्टरों और छात्रों को बम बनाने के वीडियो भेजे और उन्हें कट्टरपंथी बनाया। डॉक्टर उमर उन नबी, मुजफ्फर अहमद राठर और शहीन शाहिद जैसे आरोपितों ने छात्रों को भर्ती कर ‘व्हाइट कॉलर टेरर मॉड्यूल’ तैयार किया।
2019 में हुए पुलवामा हमलों में आरोपित तुफैल अहमद भी इसी नेटवर्क का हिस्सा था और दिल्ली हमलों में भी इसका हाथ था। इस मॉड्यूल को 26 लाख रुपये की फंडिंग मिली थी। इस लिहाज से ये पूरी तरह साफ है कि यह हमला कोई स्थानीय घटना या दुर्घटना नहीं थी बल्कि जैश का संगठित आतंकी ऑपरेशन था। इसके बावजूद द हिंदू संशय में दिख रहा है।
अल जजीरा फिलिस्तीन कवरेज में इजरायल को ‘ऑक्यूपायर’ कहता है वैसे ही द हिंदू भारत को ‘ऑप्रेसर’। दोनों का पैटर्न विक्टिम कार्ड खेलना है। लेकिन राष्ट्रहित में पत्रकारिता होनी चाहिए, न कि संदेह फैलाना।
जनता को दिख रहा द हिंदू का सच
जब किसी को संदिग्ध कहा जाता हो तो इसका अर्थ है कि वह व्यक्ति जिसके बारे में शक हो कि उसने अपराध किया है, लेकिन उसके खिलाफ औपचारिक आरोप या सबूत अभी तक पुख्ता नहीं हुए। संदिग्ध शब्द पाठक के मन में और भी ज्यादा अनिश्चितता पैदा करता है। यह बताता है कि व्यक्ति पर शक है, लेकिन यह पक्का नहीं कि उसने अपराध किया।
इसके अलावा जब हम किसी को अक्यूज्ड या आरोपित लिखते हैं तो इसका मतलब है कि उसके ऊपर अपराध का महज आरोप लगा है। वह आतंकी नहीं हो सकता या कोर्ट ने उसे दोषी नहीं ठहराया तो वह सही भी हो सकता है।
इसके अलावा द हिंदू का ‘मैन’ शब्द का उपयोग अपराध की गंभीरता को कम करने जैसा है। यह व्यक्ति को सिर्फ एक आम इंसान की तरह पेश करता है, न कि आतंकी या अपराधी की तरह। इससे पाठक के मन में यह सवाल उठ सकता है कि क्या वह सच में आतंकी था या सिर्फ एक आम आदमी जिसे फँसाया गया।
अब पाठकों के सोचने का तरीका बदल चुका है। वे सही और गलत लिखने का फर्क समझने लगे हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पहले ट्विटर) पर #HinduHidesTerror ट्रेंड हुआ। इस पर लोग द हिंदू की हेडलाइंस को साझा कर रहे थे।
ज्यादातर पाठक अब डिजिटल न्यूज पढ़ते हैं, जिसमें स्पष्ट रिपोर्टिंग और बात शामिल हो। मीडिया की भूमिका लोकतंत्र का चौथा खंभा है, लेकिन द हिंदू इसे तोड़ रहा। अगर आतंकी को ‘डॉक्टर’ कहा/लिखा जाएगा तो युवाओं में रेडिकलाइजेशन/ कट्टरपंथ को बढ़ावा मिलेगा। द हिंदू को आईना देखना चाहिए कि 17 दिन बाद भी वह किस दुविधा में है कि आतंकी को आतंकी लिखने में डर रहा है।
भले ही आज पाठक ज्यादा जागरूक हो गए हैं और उनके सोचने का तरीका बदल गया है, लेकिन द हिंदू जैसे वामपंथी मीडिया हाउस अब भी अपने पैंतरे दिखाने से बाज नहीं आते। इनकी कोशिश यही रहती है कि लोगों के दिमाग में शक की परत छोड़ दी जाए।