राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में प्रस्तावित 450 करोड़ रुपए की एथेनॉल फैक्ट्री अब नहीं लगेगी। चंडीगढ़ की कंपनी ड्यून एथेनॉल प्राइवेट लिमिटेड द्वारा लगाई जानी यह परियोजना एक समय राजस्थान के औद्योगिक विकास की मिसाल बनने वाली थी। लेकिन कॉन्ग्रेस पार्टी की विध्वंसक नीतियों और राजनीतिक खेल ने इसे विवाद की भेंट चढ़ा दिया।
पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार ने इस परियोजना को मंजूरी दी थी, लेकिन सत्ता से बाहर होते ही कॉन्ग्रेस नेताओं ने इसे राजनीतिक हथियार बना लिया। नतीजा यह हुआ कि किसानों के नाम पर हिंसक विरोध प्रदर्शन हुए, तोड़फोड़ हुई और अब यह बड़ा निवेश राजस्थान से भाग गया। इससे न केवल हनुमानगढ़ का इंडस्ट्रियल हब बनने का सपना टूट गया, बल्कि पूरे राज्य के विकास को गहरा झटका लगा है।
कॉन्ग्रेस की नीतियों से ₹450 करोड़ का प्रोजेक्ट राजस्थान से बाहर
यह परियोजना हनुमानगढ़ के टिब्बी क्षेत्र के राठीखेड़ा गाँव (चक 5 आरके राठीखेड़ा) में लगभग 45 एकड़ भूमि पर स्थापित होने वाली थी। कंपनी का प्लान था कि यहाँ 1,320 किलोलीटर प्रति दिन (केएलपीडी) क्षमता वाला अनाज-आधारित एथेनॉल संयंत्र और 24.5 मेगावाट का बिजली संयंत्र लगेगा।
यह फैक्ट्री चावल के भूसे से एथेनॉल बनाती, जो पर्यावरण के लिए फायदेमंद है क्योंकि एथेनॉल पेट्रोल का साफ-सुथरा विकल्प माना जाता है। इससे स्थानीय किसानों को भूसा बेचने का अच्छा दाम मिलता, सैकड़ों नौकरियाँ पैदा होतीं और क्षेत्र में आर्थिक समृद्धि आती। लेकिन कॉन्ग्रेस की राजनीति ने सब कुछ बर्बाद कर दिया।
कॉन्ग्रेस सरकार से शुरू हुआ प्रोजेक्ट, कॉन्ग्रेस की राजनीति ने निगला
यह पूरी कहानी 2022 से शुरू होती है। उस समय अशोक गहलोत की कॉन्ग्रेस सरकार सत्ता में थी। ‘राइजिंग राजस्थान’ अभियान के दौरान इस परियोजना के लिए समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर हुए। 2023 में कॉन्ग्रेस सरकार ने ही सभी कानूनी औपचारिकताएँ पूरी कीं। औद्योगिक रूपांतरण, भूमि पंजीकरण और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड समेत सभी विभागों से मंजूरी ली गई। सब कुछ ठीक चल रहा था। कंपनी ने निवेश की तैयारी शुरू कर दी थी। लेकिन जैसे ही 2023 के अंत में भाजपा सरकार आई, कॉन्ग्रेस ने अपना असली रंग दिखाना शुरू कर दिया।
विपक्ष में बैठी कॉन्ग्रेस ने इस परियोजना को किसानों के खिलाफ बताकर विरोध शुरू करवा दिया। अगस्त 2024 से राठीखेड़ा गाँव में किसानों ने विरोध प्रदर्शन शुरू किए। लेकिन असल में यह विरोध किसानों की वाजिब चिंताओं से ज्यादा कॉन्ग्रेस की राजनीति से प्रेरित था। 19 नवंबर 2025 को प्रशासन और पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर किया, तो तनाव बढ़ गया। कुछ लोग गिरफ्तार हुए।
फिर 10 दिसंबर 2025 को टिब्बी में एक महापंचायत हुई, जो हिंसक हो गई। प्रदर्शनकारियों ने वाहनों में आग लगाई, तोड़फोड़ की। पुलिस के साथ झड़प हुई। इस घटना में कॉन्ग्रेस के विधायक, सांसद और सीपीआई के पूर्व विधायक समेत 100 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई।
कॉन्ग्रेस नेता जैसे संगरिया के विधायक अभिमन्यु पूनिया और बलवान पूनिया ने इस घटना को ‘सरकारी साजिश’ बताकर भाजपा सरकार पर हमला बोला। उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कहा कि भाजपा कॉरपोरेट्स की गुलाम है और किसानों पर लाठियाँ चलवा रही है। लेकिन सच्चाई यह है कि कॉन्ग्रेस खुद इस एथेनॉल फैक्ट्री प्रोजेक्ट की जड़ है। गहलोत सरकार ने मंजूरी दी और फिर सत्ता खोते ही इसे राजनीतिक मुद्दा बना दिया। बाहरी तत्वों और कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने मिलकर आंदोलन को हिंसक बनाया, ताकि भाजपा सरकार बदनाम हो।
किसानों को पानी और हवा के प्रदूषित होने का डर, लेकिन समाधान भी मौजूद
किसान विरोध के मुख्य कारण बताते हैं पानी की कमी और प्रदूषण का खतरा। हनुमानगढ़ सूखाग्रस्त क्षेत्र है। यहाँ भूजल स्तर 100 फीट से नीचे चला गया है। किसान कुओं और नहरों पर निर्भर हैं। फैक्ट्री को रोजाना 50-60 लाख लीटर पानी की जरूरत पड़ती। चावल आधारित एथेनॉल प्लांट में प्रति लीटर एथेनॉल के लिए काफी पानी खर्च होता है। किसानों का डर है कि इससे खेत सूख जाएँगे, फसलें मरेंगी।
दूसरा मुद्दा प्रदूषण का। एथेनॉल प्लांट्स को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने ‘रेड कैटेगरी’ में रखा है। प्रक्रिया में ‘स्पेंट वॉश’ नाम का जहरीला तरल निकलता है, जो अगर ठीक से ट्रीट न हो तो भूजल और मिट्टी को बर्बाद कर सकता है। बॉयलर से धुआँ और राख निकलती है, किण्वन से दुर्गंध फैलती है। किसान कहते हैं कि हवा में जहर घुलेगा, साँस की बीमारियाँ और कैंसर बढ़ेगा। उनका आरोप है कि पर्यावरण जाँच (ईआईए) में गड़बड़ी हुई।
न खेती खराब होगी, न जल दूषित होगा- बस योजनाओं के सही से लागू होने की जरूरत
लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि ये समस्याएँ हल हो सकती हैं। सरकार ने एथेनॉल प्लांट्स के लिए जीरो लिक्विड डिस्चार्ज (जेडएलडी) तकनीक अनिवार्य कर दी है। इसका मतलब है कि फैक्ट्री से एक बूँद भी गंदा पानी बाहर नहीं निकलेगा। पानी को रिसाइकिल किया जाएगा, बचा ठोस कचरा पशु आहार बनाकर बेचा जाएगा। हवा के लिए इलेक्ट्रोस्टैटिक प्रेसिपिटेटर्स (ईएसपी) लगाए जाते हैं, जो राख रोकते हैं। ऑनलाइन मॉनिटरिंग सिस्टम से केंद्रीय बोर्ड सीधे निगरानी करता है। अगर ईमानदारी से नियम मानें तो न खेती खराब होगी, न पानी दूषित होगा।
समस्या यह है कि कॉन्ग्रेस ने इन समाधानों पर बात करने की बजाय विरोध को भड़काया। अगर स्थानीय लोग निगरानी समिति बनाते और कंपनी से स्थानीय नौकरियाँ माँगते, तो यह परियोजना सफल हो सकती थी। लेकिन राजनीति ने सब बिगाड़ दिया।
सत्ता में मंजूरी, विपक्ष में विरोध: कॉन्ग्रेस की दोहरी नीति उजागर
अशोक गहलोत की कॉन्ग्रेस सरकार ने 2023 में इस परियोजना को पूरी मंजूरी दी। तब कॉन्ग्रेस इसे विकास का प्रतीक बताती थी। लेकिन चुनाव हारते ही रुख बदल गया। कॉन्ग्रेस नेता अब कहते हैं कि भाजपा किसानों की दुश्मन है। लेकिन एफआईआर में कॉन्ग्रेसियों के ही नाम हैं। यह साफ दिखाता है कि कॉन्ग्रेस ने बाहरी तत्वों के साथ मिलकर आंदोलन को हिंसक बनाया। उनका मकसद सिर्फ भाजपा सरकार को बदनाम करना था, विकास नहीं।
इस राजनीति की वजह से कंपनी ने फैक्ट्री कहीं और लगाने का फैसला किया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, परियोजना अब राजस्थान से बाहर जा रही है।
एक फैक्ट्री गई, दस नहीं आएँगी… ये राजस्थान का ही बड़ा नुकसान
यह सिर्फ एक फैक्ट्री का मामला नहीं है। उद्योग जगत में कहावत है कि एक फैक्ट्री आने से दस और आती हैं। हनुमानगढ़ इंडस्ट्रियल हब बन सकता था। यहाँ कृषि अवशेष भरपूर हैं, एथेनॉल प्लांट के लिए परफेक्ट जगह। इससे हजारों नौकरियाँ, किसानों को अतिरिक्त आय और राज्य को राजस्व मिलता। लेकिन कॉन्ग्रेस की विध्वंसक नीतियों ने सब चौपट कर दिया।
टिब्बी के प्रधान का दावा है कि इसी जगह पर कोको-कोला या पेप्सी जैसी बड़ी कंपनी भी फैक्ट्री लगाने वाली थी। इसके लिए हनुमानगढ़ के डीएम से संपर्क हुआ था। एथेनॉल फैक्ट्री के प्रोजेक्ट की फाइल पर भी इन्हीं प्रधान का नाम और नंबर दर्ज है। लेकिन एथेनॉल फैक्ट्री के बवाल की वजह से प्रशासन ने हाथ खड़े कर दिए। ऐसे में जो कंपनियाँ हनुमानगढ़ आने वाली थी, अब वो कंपनियाँ भी नहीं आएंगी। इस एक प्रोजेक्ट के बाहर जाने से कई अन्य निवेश रुक जाएँगे। इससे पूरे राजस्थान की अर्थव्यवस्था को झटका लगेगा। राज्य में बेरोजगारी बढ़ेगी तो युवा भी पलायन को मजबूर होंगे
राजनीति छोड़कर विकास पर दें ध्यान
हनुमानगढ़ एथेनॉल फैक्ट्री विवाद कॉन्ग्रेस की राजनीतिक महत्वाकांक्षा का शिकार बना है। अशोक गहलोत और उनकी पार्टी ने सत्ता में रहते मंजूरी दी, बाहर रहते विरोध भड़काया। नतीजा यह निकला कि ₹450 करोड़ का निवेश चला गया। राजस्थान को इंडस्ट्रियल ग्रोथ का मौका खोना पड़ा।
जरूरत है कि राजनीतिक पार्टियाँ किसानों की वाजिब समस्याओं का समाधान निकालें, न कि उन्हें भड़काएँ। निगरानी समिति बनाकर, नियमों का सख्त पालन सुनिश्चित करके ऐसे प्रोजेक्ट्स को सफल बनाया जा सकता है। लेकिन कॉन्ग्रेस जैसी विध्वंसक सोच जबतक ताकतवर बनी रहेगी, तबतक राजस्थान का इंडस्ट्रियल ग्रोथ पीछे जाता रहेगा।
यह घटना सबक है कि राजनीति विकास के रास्ते में रोड़ा न बने। उम्मीद है कि राज्य सरकार इस नुकसान से सीख लेगी और भविष्य में ऐसे निवेशों को सुरक्षित रखेगी।


