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75 वर्षीय बुजुर्ग महिला की मोहम्मद रफीक ने की स्टील के रॉड से हत्या, शव को बोरे में भरकर खिड़की से फेंका: गिरफ्तार

मुंबई के वडाला क्षेत्र में एक बुजुर्ग महिला की बेरहमी से हत्या और उसके शव को घर से बाहर फेंक देने का मामला सामने आया है। दरअसल, महिला की बेरहमी से हत्या के मामले में 27 वर्षीय आरोपित की पहचान मोहम्मद फैज रफीक सैय्यद के रूप में हुई है, जिसे बुधवार (2 नवंबर, 2023) को गिरफ्तार कर लिया गया। वह वडाला पूर्व में बीपीटी गेट नंबर 5 इलाके का निवासी है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, आरोपित मोहम्मद फैज ने 75 वर्षीय महिला के सिर पर स्टील की रॉड से वार कर उसकी हत्या कर दी। वहीं महिला की पहचान सुगराबी हुसैन मुल्ला के रूप में हुई, जिसकी मौके पर ही मौत हो गई। रिपोर्ट्स के मुताबिक, आरोपित ने महिला की हत्या करने के बाद उसके शव को बोरे में भरा और उसके शव को घर की खिड़की से बाहर फेंक दिया। 

इतना ही नहीं आरोपितों ने महिला के शव को जलाकर सबूत मिटाने की भी कोशिश की लेकिन फिर भी बच नहीं सके।

इससे पहले भी महाराष्ट्र में हुई है वीभत्स हत्या

बता दें कि यह पहली बार नहीं है कि महाराष्ट्र के मुंबई जिले से इस तरह का क्रूर अपराध सामने आया है। इससे पहले 18 अक्टूबर को भी मुंबई में एक अंतरधार्मिक जोड़े की ऑनर किलिंग का मामला सामने आया था, जहाँ एक युवा जोड़े का अंतरधार्मिक विवाह हिंसा और निराशा की दुखद कहानी बन कर रह गया। 

गौरतलब है कि गुलनाज़ खान नाम की 20 वर्षीय महिला और उसके 22 वर्षीय पति करण रमेश चंद्र की 14 अक्टूबर,  2023 को महिला के पिता गोरा रईसुद्दीन खान (50), उसके भाई सलमान खान (22) और उनके साथी मोहम्मद कैफ ने बेरहमी से हत्या कर दी।

मुंबई पुलिस ने 17 अक्टूबर, 2023 को इस मामले में तीन आरोपितों और तीन अन्य नाबालिगों को गिरफ्तार कर िया गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह घटना तब सामने आई जब मूल रूप से उत्तर प्रदेश के बांदा की रहने वाली गुलनाज खान के परिवार के सदस्य करण रमेश चंद्र से उनकी शादी का कड़ा विरोध कर रहे थे, जो 2022 में हुई थी।

पेपर लीक मामले में राजस्थान कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष गोविंद डोटासरा के दोनों बेटे राडार पर, ED ने पूछताछ के लिए दिल्ली बुलाया

की प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने गुरुवार (2 नवंबर 2023) को पेपर लीक मामले में कथित संलिप्तता के लिए राजस्थान कॉन्ग्रेस प्रमुख गोविंद सिंह डोटासरा के दो बेटों अभिलाष और अविनाश को तलब किया है। परीक्षा पेपर लीक मामले में ईडी द्वारा राजस्थान पीसीसी प्रमुख गोविंद सिंह डोटासरा और एक अन्य विधायक ओमप्रकाश हुडला के घरों पर छापेमारी के एक हफ्ते बाद यह बात सामने आई है। इनके घरों में छापेमारी 26 अक्टूबर 2023 को की गई थी।

राजस्थान में सीकर की लक्ष्मणगढ़ सीट से कॉन्ग्रेस पार्टी के उम्मीदवार डोटासरा का मुकाबला बीजेपी के उम्मीदवार सुभाष महरिया से है। डोटासरा इस निर्वाचन क्षेत्र के विर्तमान विधायक हैं। इस बीच, राजस्थान के मंत्री और कॉन्ग्रेस के नेता प्रताप सिंह खाचरियावास ने कहा कि पूरी पार्टी डोटासरा के साथ खड़ी है।

26 अक्टूबर 2023 को हुई छापेमारी के बाद डोटासरा ने दावा किया था कि ईडी के अधिकारियों ने उनसे कोई पूछताछ नहीं की और न ही उनका बयान लिया। डोटासरा ने आगे कहा कि उन्होंने एक रुपया भी नहीं लिया या कोई अवैध दस्तावेज़ नहीं पाया। उन्होंने उनके और उनके बेटों के फोन, साथ ही एक पेन ड्राइव पर मौजूद ईमेल भी ले लिए।

उन्होंने दावा किया कि पेपर लीक मामले के सिलसिले में ईडी उनके घर की तलाशी लेने आई थी, लेकिन तलाशी वारंट मेरे बेटे अविनाश डोटासरा के नाम पर था, जो एक लेखा अधिकारी है। उनका दावा है कि डोटासरा के जयपुर और सीकर स्थित घरों के साथ-साथ उनके राजनीतिक कार्यालय के और उनके दोनों बेटों के अपार्टमेंट की भी तलाशी ली गई।

कॉन्ग्रेस प्रमुख ने कहा कि लोग उन्हें और उनके परिवार को कलाम अकादमी से जोड़ते रहते हैं, लेकिन इस संस्थान से ना ही उनका और ना ही उनके बेटों और रिश्तेदारों का कोई संबंध है। कलाम कोचिंग संस्थान की भूमिका पेपर लीक मामले में संदेह के घेरे में है। उन्होंने यह भी कहा कि ईडी इसके लिए कोई दस्तावेज या सबूत ढूंढने में असमर्थ रहा।

दरअसल, अगस्त में ईडी ने कलाम एकेडमी की सीकर शाखा पर छापा मारा था। डोटासरा परिवार का गृहनगर सीकर है और उनका विधानसभा क्षेत्र लक्ष्मणगढ़ भी सीकर जिले में ही है। ईडी ने इस मामले में शामिल आरपीएससी के पूर्व सदस्य बाबूलाल कटारा और अनिल कुमार मीणा नामक एक अन्य व्यक्ति को गिरफ्तार किया था। ईडी ने जून में पूरे राजस्थान में विभिन्न स्थानों पर शुरुआती छापेमारी की थी।

प्रवर्तन निदेशालय पिछले वर्ष दिसंबर में ग्रेड II शिक्षक प्रतियोगी परीक्षा प्रश्नपत्रों के लीक होने से संबंधित मनी लॉन्ड्रिंग के विभिन्न पहलुओं की जाँच कर रहा है। पेपर लीक मामले में कुल 55 लोगों को गिरफ्तार किया गया था, जिनमें 37 अभ्यर्थी भी शामिल थे। ईडी की जाँच के अनुसार, कम-से-कम 180 उम्मीदवारों को 8-10 लाख रुपए लेकर परीक्षा के प्रश्न पत्र बाँटे गए थे। इसमें भूपेन्द्र सरन को गिरफ्तार किया गया था।

सामने आए एक चौंकाने वाले मामले में राजस्थान भ्रष्टाचार निरोधक इकाई (एसीबी) ने नवल किशोर मीणा नाम के एक ईडी अधिकारी को उसके सहयोगी बाबूलाल मीणा के साथ 15 लाख रुपए की रिश्वत माँगने के आरोप में गिरफ्तार किया है। इसमें आरोपितों ने 17 लाख रुपए की रिश्वत की माँग की थी।

नवल किशोर मीणा और बाबूलाल मीणा पर मणिपुर चिटफंड मामले में रिश्वत लेने का आरोप है। राजस्थान एसीबी द्वारा जारी एक आधिकारिक बयान के अनुसार, ईडी अधिकारियों ने मामले को खारिज करने, संदिग्धों को गिरफ्तार नहीं करने और संपत्ति जब्त करने के बदले में रिश्वत ली।

यह गिरफ्तारी राजस्थान एसीबी द्वारा जाँच के सिलसिले में राजस्थान में कई स्थानों पर छापेमारी के बाद हुई। नवल किशोर मीना को कमाई के ज्ञात स्रोत के मुकाबले आय में असमानता के मामले में पकड़े जाने के बाद राजस्थान एसीबी ने गिरफ्तार कर लिया था।

‘बहन’ को विदा करवाकर ससुराल ले गया ‘भाईजान’ अंगूर आलम, खुद ही मनाने लगा सुहागरात; घरवालों की नजर पड़ी तो हो गया बवाल 

बिहार के पश्चिमी चंपारण में एक आशिक अपनी प्रेमिका की निकाह होने के बाद भाईजान बनकर उसके साथ ससुराल पहुँचा और फिर रात को खुद ही सुहागरात मनाने लगा जिससे ससुराल वालों का पारा हाई हो गया। घटना बेतिया के नौतन थाना क्षेत्र के कुंजलहीं गाँव की है।

क्या है पूरा मामला

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, नौतन थाना क्षेत्र के कुंजलहीं गाँव के शेखावत हवारी के बेटे मुश्ताक हवारी की 30 अक्टूबर, 2023 को अमवा मंझार निवासी शख्स की बेटी के साथ शादी जरीना खातून (बदला हुआ नाम) से तय हुई थी। बारात समय पर कुंजलहीं गाँव पहुँची। जिसके बाद निकाह की रस्म निभाई गई। 

लेकिन मामले में नया मोड़ तब आया जब इस निकाह में आया हुआ दुल्हन का आशिक अंगूर आलम विदाई के समय भाईजान बनकर अपनी प्रेमिका के साथ उसके ससुराल पहुँच गया। प्रेमिका के ससुराल पहुँचे  आशिक अंगूर आलम ने रात में अपनी प्रेमिका के कमरे में सोने की जिद की।

ससुराल वाले भी दुल्हन का भाई समझकर बात मान गए। लेकिन किसी ने दोनों को उस कमरे में आपत्तिजनक हालत में सुहागरात मनाते देख लिया। फिर क्या था, लोगों ने अंगूर आलम की जमकर पिटाई कर दी। इस मामले पर जमकर बवाल हुआ। ग्रामीणों ने आशिक अंगूर आलम की पिटाई करने के बाद उस युवक का सिर भी मुंडवा दिया।

प्रेमिका की जिद के चलते पंचायत ने लिया यह फैसला

आपत्तिजनक हालात में आशिक के साथ पकड़े जाने के बाद भी नाराजगी जताते हुए लड़की ने अपने परिजनों को फोन करके आशिक के साथ रहने की जिद करने लगी। दोनों पहले से ही मुहब्बत करते थे लेकिन परिजनों ने जरीना का निकाह कहीं और कर दिया। मामला बढ़ता देख खंड्डा पंचायत के वरिष्ठ सदस्यों की पंचायत बुलाई गई। जहाँ पंचों की उपस्थिति में दूल्हा-दुल्हन और उनके परिजनों से बात करके मामले लड़की को भाई बनकर आए उसके आशिक अंगूर आलम के साथ भेज दिया गया। 

दुल्हन के इस निकाह से साफ इनकार करने पर पंचों ने दोनों पक्षों के बीच कागजाती प्रक्रिया को पूरा कर दुल्हन को उसके माता-पिता और आशिक अंगूर आलम के साथ लौटा दिया।

‘7 नवंबर को मतदान कराने के लिए केंद्रों पर ना आएँ अधिकारी’: नक्सलियों ने दी धमकी, PM मोदी की रैली से कुछ घंटे पहले 3 ग्रामीणों की हत्या

छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुनावी सभा से ठीक पहले नक्सलियों ने गुरुवार (2 नवंबर 2023) को तीन ग्रामीणों को मौत के घाट उतार दिया। नक्सलियों ने मृतकों पर पुलिस का मुखबिर होने का आरोप लगाया था। इस मामले में नक्सलियों की जन अदालत लगाई और मौत की सजा का फैसला देते हुए तीनों का गला रेत डाला गया।

गौरतलब है कि पीएम मोदी ने गुरुवार को चुनावी राज्य छत्तीसगढ़ में एक रैली को संबोधित किया। चुनावी कार्यक्रम के ऐलान के बाद कॉन्ग्रेस शासित इस राज्य में पीएम मोदी की संभवत: यह पहली सार्वजनिक रैली है। पीएम की रैली दोपहर तीन बजे से कांकेर शहर में हुई।

इस जिले में चुनाव के पहले चरण में मतदान होना है। इससे पहले ही नक्सलियों ने धुर नक्सल प्रभावित मोरखंडी गाँव में तीन ग्रामीणों की हत्या कर दी। नक्सलियों ने चुनाव अधिकारियों को सात नवंबर को मतदान कराने के लिए मतदान केंद्रों पर नहीं जाने की भी चेतावनी दी है। बता दें कि छत्‍तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव दो चरणों- 7 और 17 नवंबर को मतदान होना है। नतीजे 3 दिसंबर को आएँगे।

शुरुआती जानकारी देते हुए पुलिस ने कहा कि महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले से सटे छोटे बेठिया पुलिस स्टेशन (कांकेर) के मोरखंडी गाँव में नक्सलियों ने इस वारदात को अंजाम दिया। इस गाँव के रहने वाले 35 साल के कुल्ले कटलामी, 22 साल के मनोज कोवाची और 27 साल के डुग्गे कोवाची की नक्सलियों ने बुधवार 1 नवंबर और गुरुवार 2 नवंबर की दरमियानी रात को हत्या कर दी।

अधिकारियों के मुताबिक, महाराष्ट्र की सीमा से सटे इस गाँव के तीनों ग्रामीणों पर नक्सलियों को महाराष्ट्र पुलिस के लिए मुखबिरी करने का शक था। इसी वजह से तीनों ग्रामीणों की हत्या कर दी। घटनास्थल पर फेंके गए पर्चे में माओवादियों ने दावा किया कि तीनों महाराष्ट्र पुलिस की विशिष्ट नक्सल विरोधी इकाई सी-60 के लिए मुखबिर के तौर पर काम कर रहे थे।

एक अधिकारी ने पहले बताया था कि राज्य के बीजापुर जिले में एक 40 साल के व्यक्ति मुचाकी लिंग की नक्सलियों ने पुलिस मुखबिर होने का आरोप लगाकर हत्या कर दी। उन्होंने बताया कि बुधवार और गुरुवार की दरमियानी रात को नक्सलियों ने मुचाकी की रस्सी से गला घोंटकर हत्या कर दी। इसके बाद उसकी लाश को जिले के गलगाम और नदपल्ली गाँवों के बीच सड़क किनारे फेंक दिया।

मीडिया रिपोर्टों में एक अधिकारी के हवाले से बताया गया है कि नक्सलियों ने चुनाव अधिकारियों को सात नवंबर 2023 को मतदान करवाने के लिए मतदान केंद्रों पर न जाने की चेतावनी भी जारी की है। इस पर बस्तर रेंज के पुलिस महानिरीक्षक सुंदरराज पी ने कहा कि चुनाव शांतिपूर्ण तरीके से हों, इसके लिए सभी जरूरी कदम उठाए जाएँगे।

उन्होंने कहा कि बीते चार दशकों में नक्सली 1,700 से अधिक निर्दोष लोगों को मौत के घाट उतारने के साथ ही करोड़ों रुपए की सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुँचा चुके हैं। बस्तर के मूल निवासी नक्सलियों के इस विनाशकारी रवैये से निराश और नाराज हैं। ये लोग अब सकारात्मक माहौल की आस में हैं।

गौरतलब है कि इसी साल 26 अप्रैल को छत्तीसगढ़ में नक्सलियों ने सुरक्षा बलों पर पिछले कुछ वर्षों का सबसे सबसे बड़ा हमला किया था। ये हमला नक्सलियों ने दंतेवाड़ा के अरनपुर में जिला रिजर्व गार्ड (डीआरजी) के जवानों पर घात लगाकर किया था। इसमें 10 जवानों सहित एक ड्राईवर की जान चली गई थी।

जो पत्रकार है 1984 सिख दंगों का चश्मदीद, उसे ही मारने की खालिस्तानी भेज रहे धमकी: पंजाब के पूर्व MLA को आया मेल, बोले- इससे कमलनाथ को होगा फायदा

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील व पंजाब के पूर्व विधायक हरविंदर सिंह फुलका (एचएस फुलका) को कथिततौर पर 1 नवंबर को खालिस्तानी आतंकी संगठन ‘सिख फॉर जस्टिस’ द्वारा धमकी दी गई। फुलका ने बताया कि उन्हें यह धमकी ईमेल पर मिली। इसमें उन्हें और पत्रकार संजय सूरी को जान से मारने की बात है।

फुलका ने कहा, “मुझे एक ईमेल आया जिसमें सिख फॉर जस्टिस ने मुझे मारने की बात की है, मुझे इसकी परवाह नहीं है। लेकिन हैरानी की बात है कि धमकी में संजय सूरी को भी मारने की बात कही गई है, जो एक पत्रकार हैं और कमलनाथ के खिलाफ मुख्य चश्मदीद।”

मालूम हो कि मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ पर 1984 सिख नरसंहार में अहम भूमिका निभाने का आरोप है और इस केस के मुख्य चश्मदीद सूरी हैं। सूरी ने रकाबगंज गुरुद्वारा को जलाने और दो सिखों की हत्या के मामले में उनके खिलाफ सबूत पेश किए थे। अब वही कमलनाथ 2023 के मध्यप्रदेश विधानसभा चुनावों में कॉन्ग्रेस की ओर से मुख्यमंत्री पद के चेहरे हैं।

फुलका ने कहा कि उन्हें नहीं पता था कि ‘कमलनाथ इतना ताकतवर है’ कि खालिस्तानी आतंकी संगठन केस के मुख्य चश्मदीद को मारने की धमकी देगा। उन्होंने ये भी कहा कि उनको नहीं समझ आ रहा है कि सूरी को मारने से तो कमलनाथ को फायदा देगा, और उससे सिखों को इंसाफ नहीं मिलेगा।

फुलका पत्रकार सूरी के लिए कहते हैं, “सिख तो उनके बहुत आभारी हैं। आखिर सिख ही उन्हें कैसे धमकी दे सकते हैं। ये सब तो बिलकुल कमलनाथ को फायदा पहुँचाएगा।” उन्होंने इस मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जाँच कराने को कहा है ताकि पता लग सके कि इस पत्र की प्रमाणिकता क्या है। इसके अलावा उन्होंने पीएम मोदी से ये भी अपील की कि वह यूके सरकार से संजय सूरी की सुरक्षा का ख्याल रखने को कहें क्योंकि वो इस समय वहीं पर सीएनएन के लिए काम कर रहे हैं।

बता दें कि संजय सूरी ने इस मामले में अभी कोई बयान जारी नहीं किया है। वहीं फुलका ने भी जिस ईमेल के बारे में बात की है पर उसका कोई स्क्रीनशॉट नहीं लगाया है। ऑपइंडिया इस बात की पुष्टि नहीं करता कि सिख फॉर जस्टिस द्वारा भेजे गए पत्र में क्या बातें लिखी गई हैं। ये खबर एच एस फुलका के पोस्ट पर आधारित हैं।

‘कहो अशोक गहलोत जिंदाबाद, राहुल-सोनिया गाँधी मुर्दाबाद’ : राजस्थान में कॉन्ग्रेस नेता ने मंच से लगवाए नारे, Video वायरल

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के सलाहकार और राजस्थान की दूदू विधानसभा से प्रत्याशी बाबूलाल नागर ने मंच से राहुल गाँधी सोनिया गाँधी मुर्दाबाद के नारे लगवाए हैं। यह पूरा वाकया मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की मौजूदगी में हुआ।

जानकारी के अनुसार, राजस्थान के अजमेर जिले की दूदू विधानसभा से कॉन्ग्रेस प्रत्याशी बाबूलाल नागर के नामांकन से पहले आयोजित रैली के दौरान कॉन्ग्रेस समर्थक नारेबाजी करने लगे। यह नारेबाजी राजस्थान कॉन्ग्रेस प्रभारी सुखजिंदर सिंह रंधावा के भाषण के दौरा हुई।

बाबूलाल नागर ने समर्थकों को चुप करवाते हुए कहा,”आप सब लोग सुनें, बोलना है कॉन्ग्रेस पार्टी और अशोक गहलोत जिंदाबाद, राहुल सोनिया गाँधी मुर्दाबाद।” इस दौरान मंच पर उनके पीछे ही मुख्यमंत्री अशोक गहलोत मौजूद थे।

बाबूलाल नागर 4 बार के विधायक हैं और अशोक गहलोत के करीबी हैं। वह राजस्थान सरकार में मंत्री भी रहे हैं और वर्तमान में अशोक गहलोत के सलाहकार हैं। उन्हें कॉन्ग्रेस ने इस बार भी दूदू से प्रत्याशी बनाया है।

बाबूलाल नागर का यह बयान अब सोशल मीडिया पर वायरल है। राजस्थान कॉन्ग्रेस के बड़े नेताओं के सामने बाबूलाल नागर का यह बयान अब कॉन्ग्रेस की दरारों को सामने ला रहा है। दरअसल, अशोक गहलोत और कॉन्ग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के बीच सब कुछ ठीक नहीं है।

यह झगड़ा बीते वर्ष से चला आ रहा है जब कॉन्ग्रेस में नए अध्यक्ष को चुना जाना था। इस दौरान कयास लगाए गए थे कि अशोक गहलोत को कॉन्ग्रेस का अध्यक्ष बनाया जाएगा और सचिन पायलट मुख्यमंत्री बनेंगे।

हालाँकि, अशोक गहलोत के समर्थक विधायकों ने दिल्ली पहुंचे प्रभारी अजय माकन और मल्लिकार्जुन खडगे की बैठक में नहीं पहुंचे थे। कहा गया था कि यह सब अशोक गहलोत के इशारे पर हुआ था। अशोक गहलोत के इस कदम को पार्टी हाईकमान सोनिया गांधी और राहुल गांधी की नाफरमानी के तौर पर देखा गया था।

इसके बाद मल्लिकार्जुन खडगे कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष बन गए। तब से ही राजथान कॉन्ग्रेस में अशोक समर्थक विधायकों और हाईकमान के बीच तकरार चल रही है। बाबूलाल नागर का यह सार्वजनिक बयान इसी कड़ी में आया है।

नैनीताल के अवैध मदरसे पर चला प्रशासन का बुलडोजर: छापे के वक्त भीतर मिले थे 24 बच्चे, न मिलता था खाना-न साफ पानी

उत्तराखंड के नैनीताल में एक मदरसे पर बुलडोजर कार्रवाई की गई है। इस अवैध मदरसे को जाँच के बाद ढहा दिया गया है। इस मदरसे पर 8 अक्टूबर 2023 को छापा पड़ा था। छापे के दौरान मदरसे से 24 बच्चे मिले थे जो कि बीमार थे और बहुत बुरी हालत में थे।

इस घटना के बाद मदरसे के संचालक को इस संबंध में नोटिस भी जारी किया गया था जिसके जवाब से जिला प्रशासन संतुष्ट नहीं हुआ। अब यह अवैध मदरसा कोर्ट से अनापत्ति प्रमाण पत्र लेकर इसके 266 वर्गमीटर हिस्से को बुलडोजर से ढहा दिया गया है।

जोली कोट क्षेत्र में स्थित इस मदरसे को लेकर कुछ चौंकाने वाले खुलासे हुए थे। इस मदरसे में छापेमारी के दौरान प्रशासन को कई अनियमितताएँ भी मिली थी। 2010 से ही ये मदरसा यहाँ संचालित किया जा रहा था, यानी पिछले 13 वर्षों से। जिलाधिकारी वंदना सिंह को इसके बारे में शिकायतें प्राप्त हुई थीं।

इसके बाद हल्द्वानी की सिटी मजिस्ट्रेट ऋचा सिंह और तहसीलदार संजय सिंह को मौके पर भेजा गया था। जब टीम यहाँ चेंकिंग के लिए पहुँची तो 24 बच्चे रहते हुए मिले। चौंकाने वाली बात ये है कि ये सभी बीमार थे।

बच्चे काफी बीमार थे, लेकिन उनके इलाज के लिए कोई व्यवस्था नहीं की गई थी। उनके हाथ-पाँव में चोट के निशान भी मिले थे। बच्चों ने बताया है कि उनके साथ मारपीट की जाती थी, उनमें से कई भाग भी गए। सफाई व्यवस्था के निरीक्षण में भी कई गड़बड़ियाँ मिलीं।

सिटी मजिस्ट्रेट ऋचा सिंह ने बताया कि कमरे भी गंदे थे और बच्चों के पीने के लिए साफ़ पानी तक उपलब्ध नहीं था। उनके रहने के लिए कोई साफ़ जगह नहीं थी। यहाँ तक कि उन्हें खाने के लिए भोजन तक ठीक से नहीं मिलता था। मदरसे में गन्दगी का ढेर लगा हुआ था।

मदरसा सील करने के बाद सभी बच्चों के अभिभावकों को बुलाया गया है और उनके साथ छात्रों को घर भेजा जा रहा है। जाँच की जा रही है कि बच्चों के शरीर पर चोट के निशान के क्या-क्या कारण हैं।

उत्तराखंड में लगभग 50 मदरसे ऐसे बताए जा रहे हैं, जिन्हें नियम-कानून का पालन किए बिना अवैध तरीके से संचालित किया जा रहा है। हालिया दिनों में ये पहला मौका है, जब पहाड़ी राज्य में मदरसा सील करने के बाद उसे ढहाने की कार्रवाई की गई हो।

उत्तराखंड में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली सरकार इसे लेकर सख्त है। उत्तर प्रदेश में तो पहले ही मदरसों में राष्ट्रगान से लेकर स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में पढ़ाने का निर्णय लिया गया है। वहाँ मदरसों के सिलेबस में गणित और विज्ञान अनिवार्य है।

पोल में कक्का की हवा, जमीन पर भूपेश बघेल हक्का-बक्का: छत्तीसगढ़ में हर दिन मजबूत हो रही BJP, कॉन्ग्रेस का खिसका आधार

छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव 2023 में सभी पार्टियों ने पूरी ताकत झोंक दी हैं। नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ़ में दो चरणों में मतदान होना है, जिसके नतीजे 3 दिसंबर 2023 को आएँगे। अब चुनाव परिणामों को लेकर अटकलें भी लगनी शुरू हो गई हैं। इस बीच, एक सर्वे आई है, जिसमें कॉन्ग्रेस को आगे दिखाया गया है। हालाँकि, ये सर्वे जमीनी हकीकत से दूर नजर आता है, क्योंकि छत्तीसगढ़ में लगभग हर मुद्दे पर कॉन्ग्रेस जो कुछ समय पहले आगे दिखती थी, वो अब पीछे छूट चुकी है, जिसका जिक्र इस लेख में किया जा रहा है।

अभी सबसे पहले बात सर्वे की। टाइम्स नाऊ-इटीजी ने छत्तीसगढ़ के लिए जो सर्वे जारी किया है, उसमें कॉन्ग्रेस को 3 प्रतिशत वोटों से आगे दिखाया गया है। कॉन्ग्रेस के 42.30 प्रतिशत मतों के मुकाबले भाजपा को 39.30 प्रतिशत मत मिलते दिखाया जा रहा है, तो अन्य के खाते में 18.40 प्रतिशत मत जाते दिख रहा है। इस सर्वे के मुताबिक, कॉन्ग्रेस 51 से 59 सीटें जीत सकती है तो भाजपा को 27 से 35 सीटों के मिलने का अनुमान जताया जा रहा है। वहीं, अन्य के खाते में 2-6 सीटें मिलती दिख रही हैं।

औंधे मुँह गिरने वाले हैं सर्वे

छत्तीसगढ़ में चुनाव है। भूपेश बघेल के हाथ में सत्ता है, लेकिन उन्हें अपने ही दो साथियों के साथ लड़ाई लड़नी पड़ रही है। ताम्रध्वज साहू अपने बड़े साहू समाज की ओर से कॉन्ग्रेस में भूपेश बघेल को चुनौती दे रहे हैं, तो दूसरे हैं टीएस सिंहदेव, जिनकी नाराजगी किसी से छिपी नहीं है। सिंहदेव की नाराजगी थामने के लिए कॉन्ग्रेस हाईकमान को मजबूरी में उन्हें उप-मुख्यमंत्री बनाना पड़ा था। बात सिर्फ इतनी ही नहीं है, बल्कि बात है राज्य के सबसे बड़े मुद्दों की। भूपेश बघेल ने 2018 में छत्तीसगढ़ की जनता से शराबबंदी का वादा किया था, लेकिन वादा निभाना तो दूर, उनके बेटे पर ही 2000 करोड़ के शराब घोटाले का आरोप लगा है।

भूपेश बघेल ने राज्य में युवाओं को रोजगार देने की बात कही, लेकिन उनके राज्य में छत्तीसगढ़ पब्लिक सर्विस कमीशन का सबसे बड़ा घोटाला सामने आ चुका है। इस घोटाले में नेताओं और अफसरों के बच्चों-नजदीकियों को थोक के भाव कलेक्टर बनाया गया। छत्तीसगढ़ के युवाओं ने इसके खिलाफ खूब प्रदर्शन भी किए। यही नहीं, भूपेश बघेल की सरकार कॉन्ग्रेस के हाईकमान के लिए पैसे उगाहने की मशीनरी तक कही जाने लगी है। महिलाओं के कल्याण के मुद्दे पर ये सरकार अप्रभावी साबित हुई है, तो सबसे ज्यादा अनुसूचित जनजाति वाले राज्यों में से एक छत्तीसगढ़ में पिछले 5 सालों में एसटी वर्ग की क्या गत हुई है, ये किसी से छिपा नहीं है।

यही नहीं, भूपेश बघेल अपने पूरे कार्यकाल में कॉन्ग्रेस संगठन के लिए चुनावी मोड में खड़े रहे। राज्य में विकास कार्य पैरालाइज्ड हो चुके हैं। सामान्य अपराध से लेकर नक्सली हिंसा के नाम पर आम लोगों को मार देने का कलंक भी भूपेश बघेल सरकार के सिर पर लग चुका है। शिक्षा की हालत खराब है। केंद्र सरकार द्वारा पोषित योजनाओं का पैसा तो ले लिया गया, जनता तक वो पहुँचा नहीं। ऐसे में ये सर्वे किस आधार पर किया गया, सबसे बड़ा सवाल तो यही है। आगे हम विस्तार से बता रहे हैं कि क्यों कॉन्ग्रेस छत्तीसगढ़ के बचाव में मजबूत नहीं दिख रही है।

राजनीतिक नेतृत्व

कॉन्ग्रेस: छत्तीसगढ़ कॉन्ग्रेस में ताकत के कई केंद्र हैं। भूपेश बघेल के साथ ही ताम्रध्वज साहू और टीएस सिंहदेव का अपना एक समर्थक वर्ग है। वहीं, भूपेश बघेल के पास ऐसा कोई समर्थक वर्ग नहीं दिखता है। वहीं, टॉप लीडरशिप में राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी के अलावा कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे भी छत्तीसगढ़ पर नजर रख रहे हैं, लेकिन ये सभी नेता पड़ोस की मध्य प्रदेश और राजस्थान की सीटों पर भी जुटे हुए हैं। वहीं, ताम्रध्वज साहू और टीएस सिंहदेव का समर्थक वर्ग भूपेश बघेल की सुनता तक नहीं है।

भाजपा: भारतीय जनता पार्टी के पास छत्तीसगढ़ में नेतृत्व की कोई कमीं नहीं है। तीन बार मुख्यमंत्री रहे रमन सिंह को भले ही भाजपा का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाकर केंद्र में बुला लिया गया हो, लेकिन छत्तीसगढ़ में वो अब भी काफी प्रभावी हैं। वहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा के पूर्व अध्यक्ष अमित शाह, भाजपा के मौजूदा अध्यक्ष जेपी नड्डा और भाजपा संघठन के महासचिव बीएल संतोष छत्तीसगढ़ में पूरी तरह से सक्रिय हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई रैलियाँ छत्तीसगढ़ में कर चुके हैं। ऐसे ही एक सरकारी कार्यक्रम के दौरान टीएस सिंहदेव ने जब केंद्र सरकार की तारीफ कर दी, तो सिंहदेव को कॉन्ग्रेस आलाकमान ने माफी माँगने के लिए मजबूर कर दिया।

छत्तीसगढ़ में भाजपा के पास राज्य के कई बड़े चेहरे मौजूद हैं। भाजपा के लिए ओबीसी चेहरे के तौर पर अरुण साओ को प्रदेश अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी सौंपी गई है, तो रमन सिंह पहले की तरह चुनावी कार्यक्रमों का अहम हिस्सा हैं। इसके अलावा अनुसूचित जनजाति के नेताओं में रेणुता सिंह सेरुता मोर्चा संभाल रही हैं, तो ओम माथुर और मनसुख माँडविया जेसे धुरंधर छत्तीसगढ़ पर नजर रखे हुए हैं।

छत्तीसगढ़ का चुनावी इतिहास

छत्तीसगढ़ के चुनावी इतिहास को समझने के लिए सिर्फ थोड़ा ही पीछे जाना होगा। छत्तीसगढ़ में पहली बार कॉन्ग्रेस ने 2018 में जीत दर्ज की। भूपेश बघेल की अगुवाई में कॉन्ग्रेस ने 68 विधानसभा सीटों पर जीत दर्ज की थी, तो भाजपा को 90 में से सिर्फ 15 सीटें मिली थी, 7 सीटें अन्य के हाथों में हैं, तो 2 सीटों पर अन्य दलों\निर्दलीयों ने जीत हासिल की थी। भाजपा को कुल 33 प्रतिशत और कॉन्ग्रेस को 43 प्रतिशत वोट मिले थे। इस तरह से इस बार भाजपा और कॉन्ग्रेस के बीच महज 3 प्रतिशत के मतों का अंतर सर्वे में दिख रहा है, जो सीटों के लिहाज से लगभग दोगुने का अंतर तो कतई नहीं बैठता। ऐसे में ये आंकड़े संदिग्ध दिखते हैं।

वैसे, साल 2013 के विधानसभा चुनाव में आँकड़ा भाजपा के पक्ष में था। भाजपा ने 90 में से 49 सीटें जीतकर लगातार तीसरी बार सरकार बनाई थी। कॉन्ग्रेस को 39 सीटें मिली थी। अन्य के हिस्से में दो सीटें गई थी। मत प्रतिशत की बात करें तो 2013 में भाजपा को 41 प्रतिशत तो कॉन्ग्रेस को 40 प्रतिशत कुल वोट पड़े थे। और अभी साल 2019 के लोकसभा चुनाव की बात करें तो भाजपा ने 51 प्रतिशत मत हासिल करते हुए 9 लोकसभा सीटें जीती थी, जबकि कॉन्ग्रेस को 42 प्रतिशत वोट मिले थे, और महज 2 सीटें उसकी झोली में गई थी। ये चुनाव 2018 के विधानसभा चुनाव के बाद हुए थे, जिसमें भाजपा ने बाजी मारी थी। ऐसे में इस विधानसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस को आगे दिखाने का मतलब है कि या तो आपका सैंपल साइज बहुत छोटा है, या आपके एक्सपर्ट छत्तीसगढ़ की राजनीति से अनभिज्ञ हैं।

छत्तीसगढ़ में कितने मतदाता, सीटें कितनी और आरक्षण कितना?

चुनाव आयोग के आँकड़ों के मुताबिक, छत्तीसगढ़ में कुल 90 विधानसभा सीटें हैं। इसमें से 39 सीटें आरक्षित हैं। आरक्षित सीटों में से 10 अनुसूचित जातियों (एससी वर्ग) के लिए और 29 अनुसूचित जनजाति (एसटी) वर्ग के लिए सुरक्षित हैं। छत्तीसगढ़ में कुल 2 करोड़ 3 लाख 80 हजार 79 मतदाता हैं। जिनमें 1 लाख 60 हजार 955 दिव्यांग मतदाता हैं, तो 790 मतदाता थर्ड जेंडर के हैं। इसके अलावा 80 वर्ष से अधिक उम्र के वरिष्ठ मतदाताओं की संख्या 2 लाख 63 हजार 829 मतदाता हैं। वहीं, 2 लाख 63 हजार 829 मतदाता 18-19 साल के हैं, जो पहली बार मतदान करने वाले हैं।

जाति वर्ग आधारित मतदाताओं का डाटा

छत्तीसगढ़ में सामान्य वर्ग के मतदाता महज 5 प्रतिशत हैं। सबसे बड़े वर्ग के तौर पर ओबीसी और अनुसूचित जनजाति हैं। छत्तीसगढ़ के कुल मतदाताओं में 37 प्रतिशत ओबीसी वर्ग के हैं, जिसमें साहू समाज के सबसे ज्यादा वोटर हैं, तो अनुसूचित जनजाति (एसटी वर्ग) के 34 प्रतिशत मतदाता हैं। राज्य के 15 प्रतिशत मतदाता एससी कम्युनिटी के हैं। खास बात ये है कि छत्तीसगढ़ में भाजपा भले ही लगातार तीन चुनाव जीती हो, लेकिन महज 6 विधानसभा सीटों पर ही उसके मतदाता लगातार तीन चुनाव जीत सके। वहीं, कॉन्ग्रेस के पास ऐसी 9 सीटें हैं, जो पिछले तीन चुनाव से कॉन्ग्रेस के पास हैं। इसमें से दो सीटें एसटी वर्ग के लिए आरक्षित हैं। छत्तीसगढ़ में कुल 12 विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहाँ अनुसूचित जनजाति का वर्चस्व है, तो बाकी की 78 सीटों पर एससी, एसटी और ओबीसी तीनों का प्रभाव है।

चुनाव आयोग ने क्या की है तैयारियाँ?

चुनाव आयोग ने इस बार थर्ड जेंडर, सेक्स वर्कर्स और दिव्यांगों को मतदान में शामिल करने के लिए कई अभियान चलाए हैं। चुनाव आयोग सभी वर्ग के मतदाताओं को मतदान में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है। इसके लिए इस बार छत्तीसगढ़ में मतदान केंद्रों की संख्या भी बढ़ाई गई है। साल 2018 के विधानसभा चुनाव में कुल 23,677 मतदान केंद्र बनाए गए थे। इस बार इनकी संख्या बढ़ाकर 24 हजार 109 कर दी गई है। चुनाव आयोग ने दिव्यांगों के लिए व्हीलचेयर की सुविधा भी दी है, तो दृष्टिबाधित लोगों के लिए एक साथी को ले जाने की भी अनुमति दे दी है। चुनाव आयोग ने बस्तर के नक्सल प्रभावित इलाकों में पहली बार 100 से अधिक मतदान केंद्र बनाए हैं, जिसकी सुरक्षा के लिए भारी संख्या में केंद्रीय बलों की तैनाती की गई है।

छत्तीसगढ़ में मतदान और नतीजे कब?

छत्तीसगढ़ में मतदान दो चरणों में होने हैं। पहले चरण में 7 नवंबर और 17 नवंबर को मतदान होने हैं। पहले चरण में नक्सल हिंसा प्रभावित बस्तर और राजनांदगाँव डिवीजन के 7 जिलों की 20 विधानसभा सीटों पर 7 नवंबर को मतदान होंगे, तो दूसरे चरण में बाकी की 70 सीटों पर मतदान होंगे। छत्तीसगढ़ में बाकी राज्यों की तरह 3 दिसंबर को मतगणना होगी।

दिल थाम कर बैठिए, 3 दिसंबर को हो जाएगा सबकुछ साफ

छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में सत्ता-विरोधी लहर एक बड़ा फैक्टर है। ऐसे में भाजपा कॉन्ग्रेस सरकार के खिलाफ एंटी-इनकंबेंसी भावना का फायदा उठाने की उम्मीद कर रही है। कॉन्ग्रेस पिछले पाँच साल से छत्तीसगढ़ में सत्ता में है, लेकिन जनता में कॉन्ग्रेस के प्रति काफी असंतोष दिखता है। जबकि भाजपा राज्य में अपनी मजबूत संगठनात्मक उपस्थिति से भी लाभान्वित होने की उम्मीद कर रही है।

भाजपा के पास एक अच्छी तरह से चलने वाला चुनावी मशीनरी है और यह उम्मीद की जा रही है कि वह मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने में सफल होगी। वैसे, इस बार छत्तीसगढ़ में हमार राज पार्टी नाम से एसटी वर्ग का प्रतिनिधित्व करने का दम भरने वाली पार्टी भी मैदान में है, जो एसटी वर्ग के लिए आरक्षित 29 विधानसभा सीटों पर कॉन्ग्रेस के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती है।

बहरहाल, चुनाव के नतीजे तो 3 दिसंबर को आएँगे, लेकिन तब तक सभी दलों और सभी उम्मीदवारों की धड़कनें बढ़ी ही रहेंगी। इस बार भूपेश बघेल के सामने सिर्फ भाजपा की ही नहीं, बल्कि अजीत जोगी कॉन्ग्रेस भी चुनौती पेश कर रही है। उनके अपने परिवारी जन भी उन्हें चुनौती दे रहे हैं। ऐसे में सर्वे के आंकड़ें कहाँ तक सटीक बैठेंगे, ये देखने वाली बात होगी।

तनवीर कर रहा था हिन्दू छात्रा से छेड़छाड़, गुंडे लाकर घर में घुसा: रोकने पर की गार्डों से मारपीट, UP पुलिस ने पकड़ा

नोएडा के सेक्टर 142 की एक सोसायटी में तनवीर अहमद ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर साथ में पढ़ने वाली एक हिन्दू छात्रा के परिवार वालों पर हमला कर दिया और जान से मारने की धमकियाँ दीं। इससे पहले तनवीर ने छात्रा के साथ छेड़खानी भी की थी। पीड़िता नोएडा के एक निजी विश्वविद्यालय में BALLB की छात्रा है।

जानकारी के अनुसार, छात्रा के साथ ही पढ़ने वाले तनवीर अहमद ने 30 अक्टूबर को नोएडा की पारस टियरा सोसायटी में स्थित उसके अपार्टमेन्ट में घुस कर छेड़खानी की और प्रताड़ित किया। इसकी अगली सुबह तनवीर वापस आकर फिर छात्रा को परेशान करने लगा।

इस दौरान वह अपने साथ 8-10 गुंडे लेकर आया, जो कि छात्रा समेत पूरे परिवार को जान से मारने की धमकी देने लगे। पीड़िता के हल्ला मचाने पर सोसायटी के गार्ड ने आकर उन्हें बचाया। पीड़िता ने बताया कि यदि गार्ड वहाँ आकर उनके परिवार को ना बचाते तो कोई बड़ी घटना भी हो सकती थी।

सोसायटी के गार्डों का गुंडों को रोकते हुए वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। इसमें दिखता है कि तनवीर अपने गुंडों के साथ गार्डों से मारपीट कर रहा है और उन्हें धमका रहा है। थोड़ी देर गार्डों से उलझने के बाद तनवीर अपने साथियों के साथ घटनास्थल से फरार हो गया।

घटना की जानकारी पुलिस को मिलने के पश्चात उसने बलवा, महिला से छेड़छाड़ करने और डराने धमकाने जैसी धाराओं में तनवीर के खिलाफ मामला दर्ज करके उसको गिरफ्तार कर लिया है। तनवीर के अन्य साथी अब भी फरार हैं।

इस मामले में नोएडा सेंट्रल के ADCP हिरदेश कठेरिया ने कहा, “सेक्टर 142 थाने को पारस टियरा सोसायटी में 29 और 30 अक्टूबर को हुई घटना के विषय में जानकारी दी गई। इस पर तुंरत कार्रवाई करते हुए आरोपित को गिरफ्तार किया गया। दोनों एक साथ ही पढ़ते हैं। 29 को तनवीर ने पीड़िता के घर पर अभद्रता की। इस मामले में अभियोग दर्ज कर उसे न्यायालय में पेश किया गया है और उसके अन्य साथियों की तलाश की जा रही है।”

PAK सेना ने उतारा मौत के घाट, आज तक नहीं मिला पार्थिव शरीर: जानें कौन थे धीरेन्द्रनाथ दत्ता, बंगाली भाषा के लिए किया था जिन्होंने उर्दू का विरोध

बांग्लादेश मुक्ति संघर्ष के बड़े नाम और बांग्ला भाषा के लिए जीवन भर पाकिस्तानी सरकार से लोहा लेने वाले क्रांतिकारी धीरेन्द्रनाथ दत्ता की आज 2 नवम्बर को जयंती है। उन्हें पाकिस्तान की सेना ने उनके बेटे के साथ घर से उठा कर मार दिया था। लेकिन उनका पार्थिव देह आज तक नहीं मिल सकी है।

धीरेन्द्रनाथ दत्ता का जन्म वर्ष 1886 में 2 नवम्बर को बांग्लादेश (तब संयुक्त बंगाल) के कमिला जिले के रामरेल गाँव हुआ था। धीरेन्द्रनाथ दत्ता की शुरूआती पढ़ाई स्स्थानीय स्तर पर और फिर कोलकाता के रिपन कॉलेज में हुई थी। धीरेन्द्रनाथ दत्ता ने अपनी पढ़ाई के बाद वकालत का पेशा चुना।

वह वकील के तौर पर आमजनमानस में काफी लोकप्रिय थे। धीरेन्द्रनाथ दत्ता शुरुआत से ही क्रांतिकारी विचारों वाले थे। उन्होंने 1905 में कर्जन द्वारा प्रस्तावित बंगाल विभाजन, 1920 में असहयोग आन्दोलन और फिर 1942 में महात्मा गाँधी द्वारा चालू किए गए ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ में भी हिस्सा लिया था।

धीरेन्द्रनाथ अपने इलाके में लोकप्रिय थे इसीलिए उनको वर्ष 1937 में बंगाल प्रांतीय विधानसभा में विधायक चुना गया था। धीरेन्द्रनाथ दत्ता बंगाली राष्ट्रवाद और बंगाली भाषा के बड़े समर्थक थे। उन्होंने इस कारण से भारत-पाक विभाजन के बाद बांग्लादेश (तब पूर्वी पाकिस्तान) में रहना चुना।

उनके पास देश की आजादी के बाद एक समय भारतीय बंगाल की विधानसभा या फिर संविधान सभा में जाने का विकल्प भी था लेकिन अपनी मातृभूमि से प्रेम के चलते वह वहीं रहे और पाकिस्तान की संविधान सभा में शामिल होने का निर्णय लिया।

पाकिस्तान की संविधान सभा में धीरेन्द्रनाथ दत्ता अकेले और पहले ऐसे नेता थे जो कि बंगाली भाषा को पूर्वी पाकिस्तान की आधिकारिक भाषा बनाने की लड़ाई लड़ रहे थे। वह पूर्वी पाकिस्तान के पहले ऐसे नेता थे जिन्होंने पाकिस्तान में उर्दू के विरुद्ध आवाज उठाई थी जो कि आगे चल कर बांग्लादेश की आजादी का सबसे बड़ा कारण बनी।

धीरेन्द्रनाथ दत्ता का कहना था कि भले ही पाकिस्तान के भीतर बांग्ला एक क्षेत्रीय भाषा है लेकिन पूर्वी पाकिस्तान में यह आमजन में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है। उनका कहना था कि 6.9 करोड़ पाकिस्तानियों में से 4 करोड़ लोग बांग्ला भाषा बोलते हैं ऐसे में इसे ही आधिकरिक भाषा बनाया जाना चाहिए।

हालाँकि, उनकी इस माँग को पाकिस्तान की संविधान सभा में ठुकरा दिया गया। पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति मुहम्मद अली जिन्ना ने करोड़ों पूर्वी पाकिस्तानियों का अपमान करते हुए ढाका में एक रैली में स्पष्ट कर दिया था कि उर्दू के अलावा और कोई भी भाषा पाकिस्तान में नहीं चलेगी।

धीरेन्द्रनाथ दत्ता बंगाल की प्रांतीय सरकार में रहकर बांग्ला भाषा के लिए काम करते रहे और बंगालियों के लिए अधिकारों की माँग करते रहे। वह पूर्वी बंगाल के मुख्यमंत्री अताउर रहमान की सरकार में स्वास्थ्य और समाज कल्याण मंत्री भी रहे।

धीरेन्द्रनाथ दत्ता को वर्ष 1960 में पाकिस्तानी सरकार ने 1960 में विधानसभा से बर्खास्त कर दिया था। उन्हें 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान उनको घर में नजरबन्द कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने राजनीति से संन्यास भी ले लिया था।

राजनीति से संन्यास लेने के बाद भी धीरेन्द्रनाथ बंगाली अधिकारों के लिए सक्रिय रहे और लगातार नए बंगाली नेताओं को बढ़ाने में सहायता करते रहे। हालाँकि, उनका यह रवैया पाकिस्तान के जनरल याहया खान की तानाशाह सरकार को पसंद नहीं आया।

29 मार्च 1971 को धीरेन्द्रनाथ दत्ता और उनके पुत्र दिलीप कुमार दत्ता को पाकिस्तान की सेना के द्वारा उनके घर से अगवा करके मैनामाटी कैंटोनमेंट में ले जाकर मार दिया गया। आजतक उनका शव भी बरामद नहीं हो सका है।

धीरेन्द्रनाथ दत्ता की आज 137वीं जयंती है। बंगाली राष्ट्रवाद और बांग्ला भाषा के अधिकारों के लिए लड़ने वाले धीरेन्द्रनाथ बांग्लादेश के निर्माण से पहले ही मार दिए गए। इस प्रकार उनका बांगला को आधिकारिक भाषा बनते देखने का सपना उनके जीवनकाल में पूरा नहीं हो सका।

बंगाल की जनता उनका आज भी सम्मान करती है और बांग्ला भाषा के लिए आवाज उठाने वाले पहले क्रांतिकारी के तौर पर जानती है। उनके बांग्लादेश के निर्माण में योगदान को लेकर फरवरी 2023 में डाक्यूमेंट्री भी रिलीज की गई थी।