उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद में धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए पर्यटन एवं संस्कृति विभाग ने पाँच प्रमुख मंदिरों के सौंदर्यीकरण और विकास पर सहमति दे दी है। हाल ही में भेजे गए बजट प्रस्तावों को मुख्यमंत्री पर्यटन योजना के तहत मंजूरी मिल चुकी है। कुल 7.50 करोड़ रुपए इन मंदिरों के कायाकल्प पर खर्च किए जाएँगे।
पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री ठाकुर जयवीर सिंह के अनुसार, हनुमान मंदिर, नगला हरी सिंह की मरम्मत व विकास पर 1.97 करोड़ रुपए, सिद्ध काली माता मंदिर, गाँव कनवार रैमजा पर 1.93 करोड़ रुपए, पसीने वाले हनुमान मंदिर पर 1 करोड़ रुपए, स्वामी गुदरिया वाले महाराज आश्रम, रजौरा पर 1.47 करोड़ रुपए और गोगा जी काली मंदिर, पिपरौली जलेसर रोड पर 1.12 करोड़ रुपए खर्च किए जाएँगे।
इन पाँचों मंदिरों में से एक पसीने वाले हनुमान जी के मंदिर की अपनी एक अलग विशेषता और मान्यता है। आईए जानते हैं कि आखिर इसको पसीने वाले हनुमान जी का मंदिर क्यों कहते हैं?
पसीने वाले हनुमानजी: चंद्रवार के चमत्कार की सजीव कहानी
यमुना नदी की शांत तलहटी में बसा चंद्रवार गाँव आज भी एक रहस्य समेटे हुए है। यहाँ स्थित पसीने वाले हनुमानजी का प्राचीन मंदिर लोगों की आस्था को ऐसा आकार देता है, जिसे देखकर विज्ञान भी उलझन में पड़ जाता है।
कहा जाता है कि जैसे ही यहाँ हनुमानजी की प्रतिमा पर सिंदूर लगाया जाता है, वह गीली हो जाती है। भक्तों का मानना है कि यह सिर्फ चमत्कार नहीं बल्कि यह प्रमाण है कि यहाँ श्री हनुमानजी जीवंत स्वरूप में विराजते हैं और अपने भक्तों की हर मनोकामना ना सिर्फ सुनते हैं, बल्कि उसे पूरी भी करते हैं।
हर मंगलवार और शनिवार को इस मंदिर में भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ती है, मानो किसी ऊर्जा का प्रवाह उन्हें यहाँ खींच लाता हो।
जहाँ इतिहास और आस्था मिलकर रचते हैं चमत्कार
स्थानीय परंपराओं के अनुसार, यह मंदिर करीब दो हजार वर्ष पुराना है। उस समय चंद्रवार राजा चन्द्रसेन की राजधानी हुआ करता था और इसी काल में इस दिव्य मंदिर का निर्माण कराया गया। समय बदलता गया लेकिन यहाँ की मान्यता और रहस्य वही रहे।
मंदिर के महंत बताते हैं कि पहले प्रतिमा पर इतना पसीना आता था कि भक्त उसे बोतलों में भरकर प्रसाद की तरह घर तक ले जाते थे। महंत इसे इस भूमि की अलौकिक शक्ति का परिणाम बताते हैं।
भक्त कहते हैं कि यहाँ हर प्रार्थना पूरी होती है, क्योंकि उनके सामने हनुमानजी सिर्फ मूर्ति नहीं बल्कि जीवंत रूप में विद्यमान हैं। इसी विश्वास ने इस मंदिर को भक्तों के हृदय का सबसे पवित्र स्थान बना दिया है।
भक्तों की मेहनत से बदली मंदिर की तस्वीर
आज जो मंदिर दिखाई देता है, वह हमेशा ऐसा नहीं था। करीब 30-40 साल पहले यहाँ सिर्फ एक छोटी-सी मढ़िया थी। भक्तों ने अपने श्रम, धन और समर्पण से धीरे-धीरे इसे भव्य रूप दिया। फिर यहाँ राम, सीता और लक्ष्मण का मंदिर बना और पास में ही भगवान भोलेनाथ के लिए महाकाल स्वरूप वाला मंदिर भी स्थापित किया गया।
भगवान राम, लक्ष्मण और माँ सीता की मूर्ति भी है स्थापित
भक्तों का कहना है कि जबसे सामने श्रीराम मंदिर बना, प्रतिमा पर आने वाले पसीने की मात्रा थोड़ी कम हुई है लेकिन हनुमानजी आज भी अपना चमत्कार दिखाते हैं। यहाँ समय-समय पर भंडारा और धार्मिक आयोजन होते रहते हैं, जो इसे हमेशा जीवंत बनाए रखते हैं।
चंद्रवार: युद्धभूमि से पवित्र धाम तक का सफर
बात करें चंद्रवार गाँव की तो यह सिर्फ धार्मिक महत्व वाला क्षेत्र नहीं बल्कि यह इतिहास का एक जीवंत रूप है। कहा जाता है कि 1193 में यहीं राजा जयचंद्र और मोहम्मद गोरी के बीच युद्ध हुआ था। गाँव के आसपास फैले खंडहर आज भी उस युग की दास्तान सुनाते हैं।
पुरातत्व से जुड़े प्रमाण भी यहाँ समय-समय पर मिलते हैं, जो इस भूमि की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक समृद्धि को उजागर करते हैं। पुराना नाम भी फिरोजाबाद नहीं बल्कि चंद्रवार ही हुआ करता था। यही कारण है कि आज भी इस शहर का नाम पुनः चंद्रवार करने की माँग उठती रहती है और प्रस्ताव शासन स्तर पर लंबित है।
यमुना किनारे फैली प्राकृतिक सुंदरता और शांत वातावरण इसे दिव्यता और इतिहास का अद्भुत संगम बना देते हैं। यहाँ आकर हर कोई एक ही बात महसूस करता है कि मूर्ति पत्थर की हो सकती है लेकिन विश्वास हमेशा जीवित होता है।
स्पेन के कैडिज व सेउटा डायोसीज के बिशप राफेल जोर्नोसा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। 76 वर्षीय जोर्नोसा पर 1990 के दशक में एक किशोर लड़के के यौन शोषण का आरोप है और इसी मामले की जाँच चर्च ट्रिब्यूनल द्वारा की जा रही है। वे स्पेन के पहले ऐसे कैथोलिक बिशप हैं जिनके खिलाफ वैटिकन के स्तर पर सार्वजनिक रूप से जाँच की जा रही है।
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, वैटिकन ने अपने संक्षिप्त बयान में केवल इस्तीफा स्वीकार करने की घोषणा की है और इसमें आरोपों का कोई जिक्र नहीं है। वहीं, कैडिज व सेउटा डायोसीज ने इस महीने बताया कि आरोपों की जाँच मैड्रिड स्थित स्पेन में वैटिकन के दूतावास पर बुलाए गए चर्च ट्रिब्यूनल के माध्यम से चल रही है। यह घटना केवल एक इस्तीफे की खबर भर नहीं है बल्कि इसने एक बार फिर कैथोलिक चर्च में लंबे समय से चले आ रहे यौन शोषण के मुद्दे को उठा दिया है।
क्या है जोर्नोसा के खिलाफ आरोप?
स्पैनिश अखबार ‘EL PAIS’ की रिपोर्ट के मुताबिक, जोर्नोसा पर 1990 के दशक में एक नाबालिग का बार-बार यौन शोषण करने का आरोप है। जिस समय यह घटना हुई उस वक्त जोर्नोसा गेटाफे में पादरी थे और डायोसेसन सेमिनरी (धार्मिक विद्यालय) का संचालन करते थे।
पीड़ित ने ‘डिकैस्टरी फॉर द डॉक्ट्रिन ऑफ फेथ’ को डाक से एक शिकायत भेजी जिसमें अपने साथ हुए शोषण का विवरण दिया था। पीड़ित ने बिशप पर आरोप लगाया है कि उन्होंने उसका 14 साल की उम्र से लेकर 21 वर्ष की उम्र तक शोषण किया था। पीड़ित ने लिखा, “मैं यह पत्र सिर्फ इस उद्देश्य से लिख रहा हूँ कि जो मेरे साथ हुआ, वह किसी और बच्चे के साथ न हो।” पीड़ित के साथ शोषण की शुरुआत 1994 में हुई थी।
पीड़ित ने अपने पत्र में लिखा है, “14 से 18 साल की उम्र तक मैं लगभग हर हफ्ते ‘सैरो दे लॉस आंजेलेस’ के मेजर सेमिनरी जाता था। इसी दौरान वह मेरा शोषण करता था। रात में वह मेरे कमरे में आता था और मैं यह सब सहता था। वह मेरे बिस्तर में घुस जाता, मुझे सहलाता और चूमता था। सुबह भी वह इसी तरह मुझे जगाता था। मैं डर के मारे शून्य हो जाता था।” पीड़ित के साथ ‘निजी अंगों को छूना, सहलाना और होंठों पर किस करना’ जैसी घटनाएँ रिट्रीट्स और कैंपों के दौरान भी हुई।
राफेल जोर्नोसा
पीड़ित के अनुसार शोषण तब तक जारी रहा जब तक वह 2000 के शुरुआती वर्षों में 21 साल का नहीं हो गया। पीड़ित ने वयस्क होने पर सेमिनरी में प्रवेश लिया। पत्र में पीड़ित ने लिखा, “उसी समय मैंने उसे बताया कि मैं समलैंगिक हूँ। जोर्नोसा ने मुझे सेमिनरी में प्रवेश दिया और मुझे ‘कन्वर्जन थेरेपी’ ले गया ताकि मेरी समलैंगिकता ठीक की जा सके।”
पीड़ित ने बताया कि दो साल तक सेमिनरी में रहने के दौरान जोर्नोसा लगभग हर रात और सुबह उसके बिस्तर में आता था, उसे चूमता और उसके निजी अंगों को छूता था। उसने लिखा, “कई बार मैंने जोर्नोसा से कहा कि हम जो कर रहे हैं, वह सही नहीं है। वह हमेशा इसे सच्ची दोस्ती बताता था।”
पीड़ित का कहना है कि वह जोर्नोसा की हर बात पर आँखें बंद करके भरोसा करता था। पीड़ित अपने कन्फेशन के दौरान समलैंगिक संबंधों को स्वीकार करता और अपने बिस्तर पर चला जाता जिसके कुछ ही मिनटों बाद जोर्नोसा उसके बिस्तर पर होते थे। जब वह सेमिनरी छोड़कर बाहर आया तो पीड़ित को इस बात का अहसास तक नहीं था कि वह शोषण का शिकार हुआ है।
कई साल बाद थेरेपी लेते समय उसे समझ आया कि जोर्नोसा ने उसके साथ यौन शोषण किया था। इसके बाद 32 वर्ष का होने पर पीड़ित ने जोर्नोसा को एक ईमेल लिखा और अपने यौन शोषण का जिक्र किया। पीड़ित ने कहा, “उसने कभी जवाब नहीं दिया और उसी दिन के बाद उसने मुझसे कभी संपर्क नहीं किया।”
इस साल वह जोर्नोसा से मिला और आमने-सामने जाकर उससे शोषण किए जाने की बात कही। पीड़ित ने लिखा, “उसने मुझे आसानी से बस इतना कह दिया कि उसका कोई ऐसा इरादा नहीं था।” इसके बाद पीड़ित ने आगे शिकायत की थी। यह पहली बार है जब स्पेन में किसी बिशप की इस तरह जाँच की जा रही हो। हालाँकि, यह यह शोषण का इकलौता मामला नहीं है बल्कि ऐसे मामलों की संख्या हजारों में है।
यौन शोषण के मामलों पर ‘EL PAIS’ का डेटाबेस
स्पेन में दशकों तक चर्च में होने वाले यौन शोषण के मामलों को नकारा जाता रहा या उन पर चुप्पी साध ली गई। यौन शोषण को लेकर कोई बात तक नहीं की जाती थी और कई अन्य देशों के मामलों का जब जिक्र होता तो स्पैनिश एपिस्कोपल कॉन्फ्रेंस (CEE) कह देती कि स्पेन एक अपवाद है यानी यहाँ ऐसे केस नहीं हैं। कई केसों को लेकर चर्चा होती रही लेकिन उस पर सार्वजनिक चुप्पी ही रही।
दशकों तक इस स्थिति के बाद अक्टूबर 2018 में ‘EL PAÍS’ ने इस मुद्दे की जाँच शुरू करने का फैसला किया। ‘EL PAÍS’ ने जो इस केसों की शुरुआती रिपोर्ट बनाई उसमें सिर्फ 34 केस दर्ज थे जो अदालतों और मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर लिए गए थे। चर्च प्रशासन की इस अस्पष्ट व्यवस्था के कारण, अखबार ने एक ईमेल जारी किया ([email protected]), जहाँ कई वर्षों के दौरान सैकड़ों पीड़ितों और गवाहों ने अपनी कहानियाँ भेजीं।
अप्रैल 2021 में अखबार ने स्पेनिश कैथोलिक चर्च में पैडोफीलिया पर पहला और अब तक का एकमात्र डेटाबेस प्रकाशित किया, जिसे हर नए मामले के सामने आने पर लगातार अपडेट किया जाता है। अखबार के डेटा के मुताबिक, अब तक चर्च द्वारा शोषण का शिकार 2,936 पीड़ित उनके सामने आए हैं जिन्होंने कुल 1,564 आरोपितों पर शोषण के आरोप लगाए हैं।
EL PAIS का डेटाबेस (साभार:elpais.com)
अखबार ने ऐसे केसों की एक लंबी लिस्ट जारी की है। जिसमें हजारों घटनाओं का जिक्र है और उनके बाद हुई कार्रवाई का भी वर्णन है। इस डेटाबेस में उन पादरियों, बिशप और धार्मिक पदाधिकारियों का जिक्र किया गया है जिन्होंने इस घटनाओं को अंजाम दिया था। अखबार को जिस सबसे पुराने मामले की जानकारी मिली है वो 1927 का है। आँकड़ों के मुताबिक, 1960 के दशक में सबसे ज्यादा मामले दर्ज किए गए, जो कुल मामलों का एक-चौथाई है।
स्पेन में 1940 से अब तक चर्च के लोगों द्वारा 4 लाख+ बच्चों के शोषण का अनुमान
2023 में एक स्वतंत्र आयोग की रिपोर्ट में खुलासा हुआ था कि स्पेन में 1940 से अब तक रोमन कैथोलिक चर्च के धर्मगुरुओं द्वारा लगभग 2,00,000 बच्चों का यौन शोषण किए जाने का अनुमान है। रिपोर्ट में कोई सटीक संख्या नहीं दी गई थी लेकिन 8,000 से अधिक वयस्कों पर किए गए एक सर्वे में 0.6% लोगों ने बताया कि बचपन में उनका यौन शोषण चर्च के पादरियों ने किया था। स्पेन की लगभग 3.9 करोड़ वयस्क आबादी पर यह प्रतिशत लागू करने पर अनुमानित संख्या करीब 2 लाख बनती है।
करीब 700 पेज की यह रिपोर्ट बनाने वाले लोकपाल (ओम्बुड्समैन) एंज़ेल गाबिलोंदो ने बताया कि जब इसमें चर्च से जुड़े गैर-पादरी (ले-मेंबर्स) द्वारा किए गए शोषण को भी जोड़ते हैं तो यह प्रतिशत 1.13% हो जाता है। इसका मतलब है कि 4 लाख से अधिक स्पेनिश नागरिक बचपन में चर्च से जुड़े व्यक्तियों द्वारा यौन शोषण का शिकार हुए हो सकते हैं।
इन मामलों की जाँच के लिए बने आयोग ने 487 पीड़ितों का इंटरव्यू भी किया था। गाबिलोंदो ने दावा किया था, “शोषण के शिकार कई लोग ऐसे हैं जिन्होंने आत्महत्या कर ली है… कई ऐसे लोग हैं जो अपनी जिंदगी को फिर से पटरी पर नहीं ला पाए हैं।” पीड़ित इसके कारण होने वाली ‘भावनात्मक समस्याओं’ से जूझ रहे हैं। स्पेन की संसद ने मार्च 2022 में भारी बहुमत से एक स्वतंत्र आयोग के गठन को मंजूरी दी थी। हालाँकि, स्पेनिश कैथोलिक चर्च ने इस स्वतंत्र जाँच में आधिकारिक रूप से हिस्सा नहीं लिया था।
द गार्जियन की रिपोर्ट
इस वर्ष अब तक यौन शोषण की 101 शिकायतें मिली: चर्च का दावा
स्पेन की कैथोलिक चर्च ने बीते शुक्रवार (21 नवंबर 2025) को बताया कि इस वर्ष अब तक उसे यौन शोषण की 101 शिकायतें प्राप्त हुई हैं। ये सभी शिकायतें उस नई मुआवजा प्रणाली के तहत दर्ज की गई हैं। यह फैसला चर्च पर लगातार बढ़ रहे आरोपों और नाबालिगों के शोषण मामलों में पारदर्शिता की कमी को लेकर उठी आलोचनाओं के बाद लिया गया था।
स्पेनिश एपिस्कोपल कॉन्फ्रेंस के महासचिव फ्रांसिस्को गार्सिया मागान के अनुसार, इनमें से 58 मामले ‘सुलझाए’ जा चुके हैं जबकि 11 मामले समाधान के करीब हैं। बाकी शिकायतों पर समीक्षा अभी जारी है। हालाँकि, मागान ने यह स्पष्ट नहीं किया कि जिन मामलों को निपटाया गया है उनमें पीड़ितों को मुआवजा मिला या नहीं। माना जा रहा है कि यह संख्या असल संख्या जैसे EL PAIS के आँकड़ों से काफी कम है।
चर्च में शोषण पर पादरियों का पहरा?
चर्च में यौन शोषण से जुड़े मामलों में कार्रवाई का होना स्पेन में समस्याओं को और बढ़ा रहा है। अलग-अलग रिपोर्ट्स में इन समस्याओं और शोषण के तंत्र के पीछे की कई वजहें होने का जिक्र किया गया है। पादरी या बिशप जैसे अधिकारियों और बच्चों के बीच पावर डायनेमिक्स शोषण की परिस्थितियाँ बना देती है। बच्चे ताकतवर पादरी या बिशप के खिलाफ आवाज उठाने से कतराते हैं जिससे उनका हौसला बढ़ता है।
इसके अलावा चर्च की इनकार (denial) की नीति और आरोपितों को छिपाने की वजह से भी इस समस्या का समस्या बढ़ी हुई है। ओम्बड्समैन की रिपोर्ट में दावा किया गया था कि कई मामलों में आरोपितों को दूसरे शैक्षणिक केंद्रों में भेजा गया था, या दूसरे देशों में ट्रांसफर कर गया ताकि उन्हें बचाया जा सके। इसके अलावा, रिपोर्ट बताती है कि canonical (चर्च का धार्मिक कानून) प्रक्रियाओं में पीड़ितों को पर्याप्त अधिकार नहीं दिए गए हैं। अक्सर पीड़ितों को अपनी आवाज रखने का वो स्थान नहीं मिलता है जो उन्हें मिलना चाहिए था।
ऐसे मामलों की जाँच के लिए जब लोकपाल की अध्यक्षता में आयोग का गठन किया गया तो उसे भी चर्च के द्वारा मदद नहीं की गई। रिपोर्ट बताती है कि जाँच के दौरान चर्च की प्रतिक्रिया बहुत सीमित और न्यूनतम रही है। चर्च के पुराने आर्काइव तक अधिकतर शोधकर्ताओं की पहुँच नहीं है जिससे इस बारे में और अधिक जानकारी जुटाने में मदद नहीं मिलती है। जैसे ही पीड़ितों को कहीं भी अपनी बात कहने का मौका नजर आया, हजारों की संख्या में लोग बाहर आकर अपना पक्ष रख रहे हैं।
किनका शोषण हुआ, कौन-कौन दोषी हैं और कितनी संख्या में पीड़ितों को न्याय और मुआवजा मिला इसका भी कोई सही-सही डेटाबेस मिलना मुश्किल है। जो है भी तो उसके सही होने पर खुद ही कई सवाल हैं। अब समय है कि चर्च को अपने बनाए नियमों की समीक्षा करनी चाहिए। पीड़ितों को न्याय मिले, मुआवजा मिले और दोषियों को सजा मिले यह तय किया जाना बेहद जरूरी है।
स्पेन के कैथोलिक चर्च में बच्चों के साथ होने वाला यौन शोषण कोई पुरानी बात नहीं है बल्कि आज भी जारी है और काफी गंभीर है। बिशप का इस्तीफा और वैटिकन की जाँच एक बड़ा कदम जरूर है लेकिन इससे पूरी समस्या हल नहीं हो जाती। पुरानी रिपोर्ट्स, पीड़ितों की संख्या और नए मामले बताते हैं कि यह मुद्दा बहुत बड़ा है और सिर्फ मुआवजा देकर इसे खत्म नहीं किया जा सकता।
चर्च को सच में अपनी गलतियों को समझकर खुलकर काम करना होगा और अंदर से बड़े सुधार करने होंगे। वरना जिम्मेदारी लेने की बातें तो होती रहेंगी लेकिन असली दर्द झेलने वाले लोगों की आवाज ठीक से नहीं सुनी जाएगी।
आगामी शीतकालीन सत्र में चंडीगढ़ को लेकर केन्द्र सरकार के संशोधन विधेयक की अफवाह और विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया के बीच केन्द्र सरकार ने साफ कर दिया है कि चंडीगढ़ की शासन प्रणाली जैसी चल रही है वैसी ही चलेगी। सरकार इसमें किसी तरह का बदलाव नहीं करने जा रही है। पंजाब और हरियाणा के साथ जैसा संबंध चंडीगढ़ का है, वैसा ही बना रहेगा।
संघ राज्य क्षेत्र चंडीगढ़ के लिए सिर्फ केंद्र सरकार द्वारा कानून बनाने की प्रक्रिया को सरल बनाने का प्रस्ताव अभी केंद्र सरकार के स्तर पर विचाराधीन है| इस प्रस्ताव पर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है| इस प्रस्ताव में किसी भी तरह से चंडीगढ़ की शासन-प्रशासन की व्यवस्था या चंडीगढ़…
— PIB – Ministry of Home Affairs (@PIBHomeAffairs) November 23, 2025
गृह मंत्रालय ने लोगों को आश्वस्त किया है कि चंडीगढ़ के हितों को ध्यान रखते हुए, सभी पक्षों से व्यापक चर्चा के बाद ही कोई फैसला सरकार लेगी।
दरअसल ये अफवाह उड़ी थी कि सरकार शीतकालीन सत्र में 131 वां संविधान संशोधन बिल पेश करने जा रही है और चंडीगढ़ को अन्य केन्द्र शासित प्रदेशों मसलन लक्षद्वीप, अंडमान- निकोबार द्वीप समूह, दादर नागर हवेली आदि की तरह केन्द्र शासित प्रदेश बनाएगी।
विपक्ष के उठे विरोध के स्वर
चंडीगढ़ को अनुच्छेद 240 में शामिल की अफवाह उड़ते ही विपक्षी दलों खास कर कॉन्ग्रेस, अकाली दल और आम आदमी पार्टी की कड़ी प्रतिक्रिया सामने आई। आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने इसे पंजाब की पहचान से जोड़ा है। उन्होंने कहा है कि सरकार संविधान के फेडरल स्ट्रक्चर की धज्जियाँ उड़ा रही है।
BJP की केंद्र सरकार द्वारा संविधान संशोधन के माध्यम से चंडीगढ़ पर पंजाब के अधिकार को खत्म करने की कोशिश किसी साधारण कदम का हिस्सा नहीं, बल्कि पंजाब की पहचान और संवैधानिक अधिकारों पर सीधा हमला है। फेडरल स्ट्रक्चर की धज्जियाँ उड़ाकर पंजाबियों के हक़ छीनने की यह मानसिकता बेहद खतरनाक… https://t.co/Ed9Q3KNGYi
वहीं पंजाब के सीएम भगवंत मान ने इसे पंजाब की आत्मा पर चोट पहुँचाने वाला फैसला करार दिया। उनका कहना है कि चंडीगढ़ पर पंजाब का अधिकार कम करने की कोशिश की जा रही है।
To plan and formulate a strong and decisive response against the anti-Punjab Constitution (131st Amendment) Bill, which aims to demolish Punjab’s rightful claim over Chandigarh, I have called an EMERGENCY MEETING of the Core Committee of the party at 2 PM on Monday at the Party… pic.twitter.com/f3cmFsIq9c
वहीं शिरोमणि अकाली दल ने संघीय ढाँचे पर कुठाराघात करार देते हुए कहा है कि चंडीगढ़ पर पंजाब का हक है और इस पर कोई समझौता नहीं हो सकता।
हालाँकि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने रविवार (23 नवंबर 2025) को साफ किया कि चंडीगढ़ के लिए सिर्फ केंद्र सरकार की तरफ से कानून बनाने की प्रक्रिया को सरल बनाने का प्रस्ताव अभी विचाराधीन है और इस पर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है। मंत्रालय ने यह भी साफ कर दिया कि आने वाले संसद के शीतकालीन सत्र में इस संबंध में कोई बिल लाने की सरकार की मंशा नहीं है।
बीजेपी ने इसे जबरदस्ती विवाद खड़ा करने और अनावश्यक राजनीतिक करने का आरोप विपक्ष पर लगाया। बीजेपी पंजाब के अध्यक्ष सुनील जाखड़ ने कहा कि बीजेपी की प्राथमिकता पंजाब और चंडीगढ़ के हित में रही है। उन्होंने भरोसा दिया कि किसी भी तरह के भ्रम की स्थिति में केन्द्र सरकार से बातचीत कर जानकारी स्पष्ट की जाएगी।
आर्टिकल 240 क्या है
राष्ट्रपति को केन्द्र शासित प्रदेशों जैसे लक्षद्वीप, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, दादर नागर हवेली में सीधा हस्तक्षेप कर जरूरी नियम और कानून बना सकते हैं और बदलाव भी कर सकते हैं।
दरअसल अनुच्छेद 240 के मुताबिक, राष्ट्रपति जो भी नया नियम बनाएँगे, वह पुराने को खत्म कर सकता है या पुराने कानून में बदलाव कर सकता है। राष्ट्रपति द्वारा बनाए गए नियम संसद में पारित कानून के बराबर ताकतवर होगा।
दरअसल पुद्दुचेरी जैसे केन्द्र शासित प्रदेशों में विधानसभा हैं। ये अनुच्छेद 239ए के तहत आते हैं। यहाँ विधानसभा की पहली बैठक के दिन से ही राष्ट्रपति का सीधा कानून बनाने का अधिकार निरस्त हो जाता है। विधानसभा निलंबित या भंग होने की स्थिति में ही राष्ट्रपति सीधा इन क्षेत्रों के लिए नियम बना सकते हैं।
पहले अफवाह उड़ी कि चंडीगढ़ को अनुच्छेद 240 के अंतर्गत ले आया जाएगा। अगर ऐसा होता तो यहाँ अलग प्रशासक यानी एलजी की नियुक्ति की जाती। अभी तक पंजाब के राज्यपाल के अधिकार क्षेत्र में चंडीगढ़ आता है। संविधान संशोधन के जरिए चंडीगढ़ को अनुच्छेद 240 के अंतर्गत लाने पर ये खत्म हो जाता। सीधे राष्ट्रपति को कानून बनाने का अधिकार मिल जाता।
चंडीगढ़ पूरी तरह केन्द्र शासित प्रदेश बन जाता, जैसा अंडमान निकोबार, दादर नागर हवेली और लक्षद्वीप है। इन क्षेत्रों में विधानसभा नहीं है और ये केन्द्र शासित प्रदेश हैं।
आरोप लगाया गया कि लोकसभा और राज्यसभा की बुलेटिन के मुताबिक, विधेयक 1 दिसंबर 2025 को संसद के पटल पर रखा जाएगा। इसके बाद चंडीगढ़ उन केन्द्र शासित प्रदेशों में लाया जाएगा, जो पहले से अनुच्छेद 240 के अंतर्गत आते हैं।
चंडीगढ़ को लेकर क्या है विवाद
चंडीगढ़ फिलहाल पंजाब और हरियाणा दोनों की राजधानी है। इस पर हक जताने की वजह से दोनों राज्य एक-दूसरे से भिड़ते रहते हैं। पंजाब के राज्यपाल ही अभी चंडीगढ़ के प्रशासक के तौर पर काम करते हैं। यानी राजधानी भले ही हरियाणा-पंजाब दोनों की हो, लेकिन प्रशासनिक शक्ति पंजाब के पास है।
अगर 131संशोधन विधेयक पारित होता, तो चंडीगढ़ में बड़ा बदलाव आ जाता। केन्द्र को चंडीगढ़ का एलजी नियुक्त करना पड़ता और केन्द्र के पास चंडीगढ़ की कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी होती।
पंजाब का कहना है कि चंडीगढ़ में पंजाबी भाषा बोलने वाले ज्यादा है। इसे पंजाब के क्षेत्र को खाली कर बसाया गया और विकसित किया गया था। इसलिए आज भी यह पंजाब का ही पार्ट है। वहीं, हरियाणा का कहना है कि इस क्षेत्र में गैर पंजाबियों की संख्या काफी है। जब हरियाणा बना तो उसे हरियाणा में शामिल होना चाहिए।
चंडीगढ़ का इतिहास
भारत विभाजन के वक्त 1947 में लाहौर पर पाकिस्तान का अधिकार हो गया। इस वक्त पंजाब के पास अपनी राजधानी नहीं थी। इसको देखते हुए 1950 के दशक में नई आधुनिक राजधानी बनाने का निर्णय लिया गया। इनमें से ही एक है चंडीगढ़, जिसे प्लान सिटी भी कहते हैं।
1966 में Punjab Reorganisation act लाया गया। इसके तहत पंजाब का विभाजन हुआ। पंजाबी भाषा भाषी क्षेत्र को पंजाब में रखा गया जबकि हिन्दी या हरियाणवी भाषा भाषी क्षेत्र को हरियाणा में रखा गया। उस वक्त हरियाणा की राजधानी भी चंडीगढ़ को बना दिया गया।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) का एक नया फीचर सामने आया है। अब तक एक्स पर केवल आप ये देख सकते थे कि ये अकाउंट कब क्रिएट किया गया है या कब वैरिफाइड हुआ है, लेकिन अब आप ये भी देख सकते हैं कि ये अकाउंट कहाँ से संचालित किया जा रहा है।
X पर अब जहाँ से कोई अकाउंट चल रहा है उस देश या क्षेत्र का नाम कोई भी व्यक्ति देख सकता है। उदाहरण के तौर पर आप ‘ऑपइंडिया’ का यह अकाउंट देख सकते हैं।
X का कहना है कि यह उनके पोर्टल पर दिखाई देने वाले कॉन्टेंट की प्रमाणिकता को सत्यापित करने की दिशा में उठाया गया कदम है। लंबे वक्त से ये शिकायत की जा रही थी कि सोशल मीडिया पर कहीं और बैठे लोग किसी और देश का व्यक्ति बनकर वहाँ शांति के लिए खतरा पैदा कर रहे थे और भारत में भी ऐसी कोशिशें किए जाने की शिकायतें मिली थीं।
अब इस फीचर के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर एक नई बहस शुरू हो गई है। सोशल मीडिया पर कुछ यूजर्स ने कई अकाउंट के स्क्रीनशॉट्स शेयर किए हैं, जिसमें यह दावा किया गया है कि अब तक जिन अकाउंट्स से लगातार केवल देश विरोधी या सरकार विरोधी भड़काऊ पोस्ट शेयर की जाती थी, असल में वह सभी भारत से नहीं बल्कि अन्य देशों से संचालित हो रहे हैं।
मोटे तौर पर इस फीचर के सामने आने के बाद यह सामने आया है कि कुछ लोग जो X पर खुद को भारतीय दिखाकर लोगों को देश या सरकार के खिलाफ भड़का रहे थे वो भारत के हैं ही नहीं। हालाँकि, देश के खिलाफ गतिविधियाँ करने के लिए इसी देश के नागरिक का एक मुखौटा उन्होंने पहना हुआ था। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल देश की सुरक्षा पर उठता है।
लोगों के स्क्रीनशॉट्स देखने के बाद जब हमने खुद भी जाकर अकाउंट्स को चेक किया तो इस बात की पुष्टि हुई है कि वाकई इनमें से कोई अमेरिका, कोई साउथ एशिया, तो कोई हॉन्ग-कॉन्ग से भारत पर न सिर्फ नजर रखे हुए है बल्कि भारतवासियों को भड़काने का भी काम भी कर रहे हैं।
Alt News क्या अमेरिका से हो रहा संचालित?
सोशल मीडिया पर अपने कई उकसाने वाले पोस्ट के लिए कुख्यात Alt News के कुछ स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर वायरल हुए हैं। इन स्क्रीनशॉट में दावा किया जा रहा है कि असल में Alt News का अकाउंट भारत से संचालित ना होकर अमेरिका से संचालित हो रहा है। हालाँकि, Alt News द्वारा VPN का इस्तेमाल किए जाने का संदेह है लेकिन वायरल दावों में इसे US से चलने वाला अकाउंट ही बताया गया है।
यह कंपनी फैक्ट चेक संस्था होने का दावा करती है लेकिन यह भी देखा जा चुका है कि Alt News के संस्थापक, मोहम्मद जुबैर और प्रतीक सिन्हा, बेहद पक्षपाती हैं। जुबैर को कई बार सोशल मीडिया पर फर्जी खबरें पोस्ट करते और फिर चुपचाप उन्हें डिलीट करते हुए पकड़ा गया है।
वहीं, Annusi Tiwari नाम से चल रहा एक अकाउंट, जिससे ना सिर्फ भारत विरोधी पोस्ट शेयर होती है, बल्कि हिंदुओं को आपस में ही लड़ाने की चालें चली जाती थी, उस अकाउंट के असल में भारत से नहीं बांग्लादेश संचालित होने का दावा किया जा रहा है।
This account is based in Bangladesh and his name is Mohammad Asif, they are pretending to be hindu so that they can create chaos among us!
एक और अकाउंट जिसने हमेशा ही ध्यान खींचा, वह था ‘इंडियन मुस्लिम आर्काइव’, जिसका हैंडल ‘Rustum_0’ है। इस अकाउंट का लोकेशन ‘दक्षिण एशिया’ है और यह भ्रामक इतिहास सामग्री पोस्ट करने के लिए जाना जाता है।
इसी तरह @DrNimoYadav का अकाउंट साउथ एशिया से संचालित किए जाने का दावा किया गया है। हालाँकि, स्क्रीनशॉट देखने के बाद जब हमने चेक किया तो लोकेशन अपडेट हो चुकी थी और फिलहाल उसका लोकेशन इंडिया ही दिखने लगा है। जबकि फिचर आने के बाद अकाउंट बेस्ड इन साउथ एशिया दिख रहा था।
इसके अलावा ExposeIT नाम से चलाया जा रहा अकाउंट, जिससे भारत के खिलाफ लोगों को भड़काने के लिए फेक फोटो वीडियो भी शेयर होती रहीं हैं, उसके भी यूनाइटेड स्टेट्स से संचालित होने का दावा किया जा रहा है।
यह नया फीचर उन अकाउंट्स पर भी ध्यान आकर्षित कर रहा है, जो लंबे समय से सोशल मीडिया पर उकसावे से भरी पोस्ट शेयर कर रहे थे। ऐसे ही एक हैंडल का नाम Tractor2twitr_P है। यह अकाउंट अक्सर पंजाब, सिख पहचान, किसान आंदोलन और कथित भेदभाव जैसे मुद्दों पर टिप्पणी करता है। नए फीचर में यह दिखाई देता है कि यह अकाउंट ‘ऑस्ट्रेलएशिया’ से चल रहा है जबकि इसकी प्रोफाइल में दावा किया गया है कि इसका मालिक लुधियाना से है।
यह अकाउंट लगातार भारत-विरोधी कंटेंट पोस्ट कर रहा है और पंजाब में उकसावे वाले अभियान चलाने में सक्रिय रहा है। किसान आंदोलन के दौरान भी ऐसे कई अकाउंट सामने आए थे, जो ऑनलाइन सबसे ज्यादा शोर मचा रहे थे। इसी तरह का एक और हैंडल tractor2twitr पहले भारत में बैन किया जा चुका है।
कारण यह है कि वह भारत-विरोधी सामग्री फैला रहा था। माना जा रहा है कि Tractor2twitr_P या तो उसी समूह द्वारा चलाया जा रहा है या वही विचारधारा और एजेंडा फैला रहा है। हाल ही में यह अकाउंट पंजाब यूनिवर्सिटी के विरोध-प्रदर्शन को लेकर लगातार नैरेटिव सेट करने वाली पोस्ट्स कर रहा है और माहौल बनाने की कोशिश कर रहा है।
सरकार की बातों को मिला समर्थन
किसान आंदोलन के दौरान सरकार ने कहा था कि कई बड़े सोशल मीडिया अकाउंट भारत के बाहर से संचालित हो रहे हैं। उस समय इन बातों को कई लोगों ने नजरअंदाज कर दिया था। लेकिन अब X का यह नया फीचर दिखा रहा है कि आंदोलन से जुड़े कुछ प्रमुख अकाउंट वास्तव में भारत में नहीं थे।
पहली बार किसी प्लेटफॉर्म ने खुद यह बताया है कि वे अकाउंट, जिन्होंने आंदोलन की ऑनलाइन दिशा तय की, असल में कहाँ से चलाए जा रहे थे। इस तरह यह फीचर अनजाने में सरकार की बातें सही साबित कर रहा है।
हजारों किलोमीटर दूर से नैरेटिव गढ़ने का खेल
अब बातचीत केवल सोशल मीडिया पर आवाज उठाने तक सीमित नहीं है बल्कि यह सवाल भी हो रहा है कि कौन बोल रहा है और कहाँ से। जब कोई अकाउंट खुद को भारत की सामाजिक या राजनीतिक बातों से जुड़ा दिखाए लेकिन असल में विदेश से चल रहा हो, तो उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
जाति विवादों, सांप्रदायिक तनावों, पंजाब के मुद्दों और राजनीतिक नाराजगी पर कई ऑनलाइन चर्चाएँ उन लोगों ने चलाईं, जो भारत से बहुत दूर बैठे हैं। X पर आए नए ‘लोकेशन लेबल’ अब लोगों को यह समझने का तरीका देते हैं कि कौन सच में जमीन की हकीकत बता रहा है और कौन विदेश में बैठकर खुद को स्थानीय बताने की कोशिश कर रहा है।
लोकेशन छिपाने की वजह पर सवाल
हर विदेशी हैंडल को संदिग्ध मानना गलत है। बहुत से भारतीय विदेशों में रहते हैं और स्वाभाविक रूप से भारत से जुड़े मुद्दों पर बोलते हैं। लेकिन चिंता तब होती है जब ऐसे अकाउंट, जो तनाव पैदा करने वाले मुद्दों को बढ़ाकर पेश करते हैं, अपनी सही लोकेशन छुपाते हैं। अगर पारदर्शिता से कोई दिक्कत नहीं होती, तो वे अपनी असली लोकेशन क्यों छुपाते?
यह सवाल सहयोग, फंडिंग और जानबूझकर हस्तक्षेप जैसी आशंकाएँ पैदा करता है। और बड़ा सवाल यह है, किसे फायदा होता है जब संकट के समय भारत से बाहर बैठे लोग गलत सूचना और उकसाने वाले विचार फैलाते हैं?
पारदर्शिता से घबराहट क्यों?
इस फीचर का मकसद सिर्फ इतना था कि यूजर्स सही जानकारी के आधार पर फैसले ले सकें। मगर भारत में इसका असर काफी बड़ा दिख रहा है। अब सामने आ रहा है कि भारत से जुड़े कई एक्टिविस्ट और राजनीतिक कमेंट्री करने वाले अकाउंट असल में विदेशों से ऑपरेटेड हैं।
जो अकाउंट पहले अपनी पहचान छुपाकर असर डालते थे, उन्हें अब असहजता हो रही है। क्योंकि अब भारत के लोग यह पहचान सकते हैं कि बोलने वाला असल में कहाँ से बोल रहा है। यह पारदर्शिता उन लोगों के लिए मुश्किलें खड़ी कर रही है, जो खुद अंधेरे में छिपकर भारत के खिलाफ नैरेटिव गढ़ते थे। इसमें में खासतौर पर वे, जो भारत के बाहर बैठकर ऐसा कर रहे थे।
मुजफ्फरपुर की रहने वाली करिश्मा अजीज नाम की युवती आजकल पुलिस के लिए पहेली बनी हुई है, जिसने बिहार और उत्तराखंड दो अलग-अलग राज्यों को निशाना बनाया है। करिश्मा अजीज पर इन दोनों राज्यों में आईटी एक्ट और कई गंभीर आरोपों के तहत FIR दर्ज है। इसके बावजूद, करिश्मा अजीज का डिजिटल ऑपरेशन लगातार जारी है, जहाँ उसके सोशल मीडिया अकाउंट से लगातार भ्रामक और विवादित कंटेंट पोस्ट किए जा रहे हैं।
हैरत की बात यह है कि उसका एक्स अकाउंट केवल आठ महीने पुराना है, जिसे मई 2025 में एक्स प्लेटफॉर्म द्वारा वेरीफाई भी कर दिया गया था। वर्तमान में, उसके इस अकाउंट के 19.3 हजार से अधिक फॉलोवर्स हैं और उसके प्रत्येक वीडियो पर 50 हजार से ज्यादा व्यूज मिलते हैं। उसका ऑपरेशन एक अकाउंट तक सीमित नहीं है, बल्कि वह करिश्मा अजीज के नाम से जुड़े 7 से 8 अतिरिक्त बैकअप अकाउंट्स का पूरा नेटवर्क चला रही है।
साजिश का इतिहास: बिहार से पहले उत्तराखंड को बनाया निशाना
जाँच में सामने आया है कि करिश्मा अजीज की यह भड़काऊ गतिविधि केवल बिहार तक सीमित नहीं थी। उसने सबसे पहले उत्तराखंड को टारगेट किया था। उत्तराखंड के उत्तरकाशी में धराली आपदा के बाद जब शोक का माहौल था, तब करिश्मा अजीज सहित कुछ अकाउंट्स ने जवानों की मौत और आम नागरिकों की त्रासदी पर अभद्र और सांप्रदायिक तनाव भड़काने वाली टिप्पणियाँ की थीं।
देहरादून के हिंदू संगठनों की शिकायत पर करिश्मा अजीज सहित तीन लोगों के खिलाफ उत्तराखंड में पहली FIR दर्ज की गई थी। इसके बाद, बिहार विधानसभा चुनाव (2025) समाप्त होने पर उसने बिहार को निशाना बनाया। मुजफ्फरपुर साइबर थाने को इनपुट मिला कि करिश्मा अजीज ने 16 नवंबर की शाम को अपने एक्स हैंडल पर 32 सेकेंड का एक वीडियो शेयर किया, जिसमें दावा किया गया कि बिहार चुनाव की मतगणना के बाद युवा सड़क पर हिंसक प्रदर्शन कर रहे हैं।
साइबर थाने के एएसआई दयाल नारायण सिंह ने तुरंत इसकी जाँच की, तो पता चला कि यह वीडियो नेपाल में हुए GenZ जैसे हिंसक प्रदर्शनों का फुटेज था, जिसे बिहार का बताकर जानबूझकर नफरत और हिंसा फैलाने की कोशिश की गई थी। इसके बाद मुजफ्फरपुर में उसके खिलाफ दूसरी FIR दर्ज की गई। मुजफ्फरपुर की FIR कॉपी ऑपइंडिया के पास है।
कानून की गिरफ्त से दूर, मेटा से माँगी गई जानकारी
मुजफ्फरपुर की रहने वाली करिश्मा एजाज का X आईडी @KarishmaAziz_ है। इस पर वह लगातार भ्रामक वीडियो और विवादित कंटेंट पोस्ट कर रही है, लेकिन वह अभी भी कानून की पहुँच से बाहर है। पुलिस जाँच में यह पता चला है कि वह अपनी लोकेशन छिपाने के लिए वीपीएन और प्रॉक्सी सर्वर का इस्तेमाल कर रही है।
इसके अलावा, वह अलग-अलग अकाउंट्स में अलग-अलग मोबाइल नंबर और ईमेल आईडी का उपयोग कर रही है, जिससे लोकेशन बार-बार बदल रही है और उसे ट्रेस करने में मुश्किलें आ रही हैं। साइबर DSP हिमांशु कुमार ने पुष्टि की है कि युवती के ID से जुड़ी पूरी जानकारी पाने के लिए मेटा और एक्स को मेल भेजा गया है।
पुलिस फिलहाल एक्स से पूरा डाटा मिलने का इंतजार कर रही है, जिसके बाद ही उसके खिलाफ आगे की बड़ी कार्रवाई की जाएगी। पुलिस का कहना है कि करिश्मा अजीज का यह कृत्य स्पष्ट रूप से बिहार में भी नेपाल जैसा हिंसक विरोध प्रदर्शन का माहौल तैयार करने या उसे उकसाने का प्रयास है, जो जन-शांति भंग करने और समाज में वैमनस्य उत्पन्न करने वाला गंभीर अपराध है।
पाकिस्तान ने हाल ही में यूरोपियन यूनियन (EU) की मीटिंग में सिंधु जल समझौते (Indus Waters Treaty – IWT) को लेकर अपना दुखड़ा सुनाया है। पाकिस्तान का दावा है कि उनके पास सिर्फ 30 दिनों का पानी बचा है। पाकिस्तान इसका जिम्मेदार भारत को कह रहा है।
पाकिस्तान का कहना है कि सिंधु जल संधि की गोलबंदी और भारत के पानी रोकने के कारण पाक में जल संकट की स्थितियाँ बनी हैं। इस मुद्दे को लेकर 2025 की IEP (इकोलॉजिकल थ्रेट रिपोर्ट) में भी चेतावनी दी गई है।
इसमें लिखा गया है कि पाकिस्तान की कृषि प्रणाली लगभग 80% सिंधु नदी बेसिन पर निर्भर है और वर्तमान में ये गंभीर जल संकट के खतरे में है। इस पूरे मुद्दे को भारत-पाकिस्तान के इतिहास, सिंधु जल संधि के प्रावधानों और हालिया विवादों के साथ समझे जाने की जरूरत है।
Deputy Prime Minister/Foreign Minister Senator Mohammad Ishaq Dar @MIshaqDar50 delivered remarks at the 4th Indo-Pacific Forum roundtable on “Geopolitical and Security Challenges in the Indo-Pacific.” pic.twitter.com/ftn2aLybIT
— Ministry of Foreign Affairs – Pakistan (@ForeignOfficePk) November 21, 2025
IEP की 2025 की रिपोर्ट में क्या हैं प्रमुख दावे
ऑस्ट्रेलिया के थिंक-टैंक इंस्टीट्यूट फॉर इकनॉमिक्स एंड पीस (IEP) द्वारा जारी ‘इकोलॉजिकल थ्रेट रिपोर्ट 2025’ में कहा गया कि सिंधु नदी बेसिन पर निर्भर पाकिस्तान के कृषि क्षेत्र गंभीर जल संकट के खतरे का सामना कर रहा है। इसके अनुसार, भारत के बाँध प्रबंधन में मामूली बदलाव भी पाकिस्तान के लिए गंभीर नुकसान पहुँचाने वाला साबित हो सकता है।
रिपोर्ट में जल संकट को व्यापक पर्यावरणीय और सामाजिक खतरा बताया गया है जो पाकिस्तान की खाद्य सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता को प्रभावित कर सकता है। पानी की कमी के कारण सिंधु बेसिन में खाद्य उत्पादन, रोजगार, और आर्थिक गतिविधियां गहरे संकट में आ सकती हैं। रिपोर्ट ने भारत और पाकिस्तान दोनों को बेहतर संवाद और जल प्रबंधन पर ध्यान देने की सलाह दी है।
भारत के जल प्रबंधन की रणनीति और जियोपॉलिटिकल विवाद
भारत ने अपनी जल संरचनाओं में इजाफा किया है। इसमें ब्यास नदी को गंगा से और सिंधु को यमुना से जोड़ने वाली नई नहर परियोजनाएँ, जल संचयन सुविधाओं का विकास और सिंधु बेसिन के जल अधिकारों पर रणनीतिक नियंत्रण शामिल है।
भारत का तर्क है कि जनसंख्या वृद्धि और बढ़ती कृषि माँग के मद्देनजर जल की अपनी जरूरतों को पूरा करना जरूरी है। भारत ने सिंधु जल संधि के प्रावधानों की दोबारा समीक्षा करने की माँग की है।
इस समीक्षा में जल संसाधनों के न्यायसंगत और संतुलित उपयोग (Equitable and Reasonable Utilization – ERU) और किसी भी प्रकार के नुकसान से बचने (No-Harm Rule) के अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत शामिल हो सकते हैं। भारत ने जल सुरक्षा के पहलुओं को भी प्रमुखता दी है और यह भी कहा है कि उसकी परियोजनाएँ संधि के तकनीकी मानकों के अनुरूप हैं।
पाकिस्तान के लिए सिंधु जल संकट के सामाजिक-आर्थिक प्रभाव
पाकिस्तान के सिंध और पंजाब प्रांत को देश का ‘अन्न भंडार’ कहा जाता है। ये दोनों सिंधु नदी जल पर काफी निर्भर हैं। जल संकट के कारण खेत सूखाग्रस्त हो रहे हैं, फसलों का उत्पादन गिर रहा है, और खाद्य सुरक्षा संकट गहरा रहा है।
कपास, गेहूं, चावल जैसी प्रमुख फसलों की उपज में भारी कमी आ रही है, जो पाकिस्तान की कृषि अर्थव्यवस्था को ध्वस्त कर सकती है। इसके साथ ही, जल संकट से ग्रामीण रोजगार में कमी, खाद्य कीमतों में वृद्धि और सामाजिक उथल-पुथल की आशंका भी बढ़ रही है।
जल संकट को कभी-कभी ‘जल आतंकवाद’ के रूप में भी देखा जाता है, जिसमें जल संसाधन के नियंत्रण को राजनीतिक हथियार के रूप में प्रयोग किया जा रहा है।
क्या था भारत-पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि का इतिहास
सिंधु जल संधि 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच विश्व बैंक की मध्यस्थता से बनी एक संधि है। यह संधि भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु नदी से निकलने वाले जल का बँटवारा सुनिश्चित करती है।
सिंधु नदी में तीन पश्चिमी नदियाँ सिंधु, झेलम और चिनाब पाकिस्तान को आवंटित की गईं जबकि तीन पूर्वी नदियाँ रावी, बीस और सतलज भारत के पाले में आई। संधि के अनुसार, भारत के पास पश्चिमी नदियों के जल पर नियंत्रण करने का अधिकार नहीं था, लेकिन भारत अपने बांध और जल प्रबंधन परियोजनाओं के लिए पूर्वी नदियों के जल का उपयोग कर सकता था।
इस समझौते में यह भी प्रावधान था कि भारत पाकिस्तान के जल आपूर्ति को बिना प्रभावित किए पश्चिमी नदियों के जल का उपयोग सीमित मात्रा में कर सकता है। विश्व बैंक ने संधि की निगरानी और विवाद समाधान में सहायता की जिम्मेदारी भी ली थी।
सिंधु जल संधि इसलिए ऐतिहासिक रूप से भारत-पाकिस्तान के बीच सीमांत जल विवादों के समाधान में महत्वपूर्ण समझी जाती रही है। हालाँकि 2023 से 2025 के दौरान भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनाव और खासकर 26 अप्रैल 2025 पहलगाम आतंकी हमले के बाद, भारत ने सिंधु जल संधि को स्थगित करने का फैसला किया।
इससे पाकिस्तान में जल संकट बढ़ गया। पाकिस्तान की इंडस रिवर सिस्टम अथॉरिटी (IRSA) की रिपोर्ट्स बताती हैं कि सिंधु नदी बेसिन से मिले पानी की मात्रा में हर वर्ष औसतन 13.3% की कमी आ रही है। इसके कारण पाकिस्तान के कृषि क्षेत्र में काफी परेशानी हो रही है।
सिंधु नदी की दो प्रमुख जलाशयों तरबेला और मंगला का जलस्तर डेड स्टोरेज लेवल पर पहुँच चुका है। इसका मतलब है कि पानी की आपूर्ति लगभग खत्म होने वाली है। इस कमी के कारण कपास की खेती समेत कई अहम फसलों की उपज में गिरावट देखने को मिली है।
पाकिस्तान ने सिंधु जल संधि को दोबारा स्थापित करने और पानी बँटवारे में अपने ‘न्याय’ के लिए विश्व बैंक से फिर से मध्यस्थता की माँग की, मगर विश्व बैंक ने हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
इसके बाद पाकिस्तान ने यूरोपीय संघ सहित अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के खिलाफ अपना रोना रोया। उसने दावा किया कि जल संकट की वजह से पाकिस्तान की किसानी और जीविका पर भारी असर पड़ा है। साथ ही, पाकिस्तान की ओर से इस संकट को ‘जल संकट आपातकाल’ कहा जा रहा है।
संधि का वर्तमान स्वरूप और विवाद के क्या हैं समाधान
सिंधु जल संधि विश्व में जल विवादों के लिए एक ऐसा उदाहरण रही है जिसे दोनों देशों ने विवाद के समाधान के लिए अपनाया था। हालाँकि, वर्तमान स्थिति में यह संधि संकट में है।
दोनों देशों के बीच विश्वास की कमी और राजनीतिक तनाव के कारण संधि के पालन और वाटर शेयरिंग पर असहमति गहरी हो गई है। विश्व बैंक की मध्यस्थता और तटस्थ विशेषज्ञों की नियुक्ति के बावजूद विवाद नहीं सुलझ पाया है।
जल संकट को लेकर भारत और पाकिस्तान के संवाद के बिना समाधान की राहें अभी दूर हैं। जल अधिकारों पर नए नियम, जल उपयोग के तकनीकी सुधार और क्षेत्रीय जल प्रबंधन के नए ढाँचे की जरूरत महसूस की जा रही है। इसके लिए दोनों को संयुक्त प्रयास, संघर्ष कम करना, और परस्पर भरोसा स्थापित करना होगा।
सिंधु जल संधि का संघर्ष और जल संकट क्षेत्रीय सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और जल संरक्षण के लिहाज से बेहद संवेदनशील मामला है। पाकिस्तान EU समेत अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी दिक्कतों को रखकर गम्भीर संकट की स्थिति दिखलाने और उशका पीड़ित बनने की कोशिश कर रहा है।
वहीं, भारत जल संसाधन प्रबंधन और राष्ट्रीय हितों के तहत अपनी रणनीति को मजबूती दे रहा है। इस जटिल विवाद का दीर्घकालिक समाधान द्विपक्षीय या बहुपक्षीय संवाद, जल कानूनों के आधुनिकरण, पर्यावरणीय स्थिरता और क्षेत्रीय सहयोग के माध्यम से ही संभव है। सिंधु जल संधि की वर्तमान स्थिति बताती है कि जल को लेकर राष्ट्रीय और क्षेत्रीय हितों का टकराव भविष्य के लिए एक बड़ी चुनौती है।
दुबई एयर शो में भारतीय वायु सेना (IAF) का तेजस विमान जब क्रैश हुआ, तो हमें बहुत दुख हुआ, क्योंकि हमने अपना एक प्रशिक्षित पायलट खो दिया। यह सिर्फ एक हादसा नहीं है, बल्कि पूरे देश के लिए एक बहुत बड़ी क्षति है। इस हादसे ने यह सवाल फिर उठा दिया है कि ये हवाई करतब (यानी प्रदर्शन उड़ानें) कितने खतरनाक होते हैं। हमें यह याद रखना होगा कि ऐसे एयर शो में हादसे, हालाँकि कम होते हैं, पर दुनिया की सबसे एडवांस सेनाओं में भी हो सकते हैं, इसलिए भावनाओं में बहने के बजाय सच्चाई को समझना जरूरी है।
असल में, इन उड़ानों में विमान को उसकी पूरी ताकत दिखाने के लिए बहुत कम ऊँचाई पर और तेज गति से, जानबूझकर जोखिम भरी कलाबाजियाँ करवाई जाती हैं। ये उड़ानें सामान्य उड़ानों से बहुत अलग होती हैं, क्योंकि जरा सी भी गलती होने पर संभलने का मौका नहीं मिलता। इसीलिए, यह काम असली युद्ध की उड़ान से भी ज्यादा खतरनाक माना जाता है और शुक्रवार (21 नवंबर 2025) की घटना ने यही दुखद सच्चाई दिखाई।
शुरुआती वीडियो फुटेज देखकर विशेषज्ञों ने कहा है कि तेजस विमान मुश्किल कलाबाजी करते समय अचानक नीचे आने लगा था और उन्होंने कुछ संभावित कारण भी बताए हैं। मगर, यह बात याद रखनी चाहिए कि जाँच पूरी होने से पहले कोई भी व्यक्ति पक्के तौर पर हादसे की असली वजह नहीं बता सकता। ऐसे एडवांस फाइटर जेट के हादसे अक्सर किसी एक कारण से नहीं होते, बल्कि मशीन, पायलट, मौसम या काम करने के तरीके में हुई कई छोटी-छोटी गड़बड़ियों की एक पूरी चेन के कारण होते हैं, इसलिए हमें IAF की आधिकारिक जाँच रिपोर्ट का इंतजार करना चाहिए।
लेकिन इस हादसे ने एक बार फिर यह दिखा दिया है कि विमानन एरिया के पेशेवरों की जिदंगी कितनी खतरनाक होती है। उनके काम में कितनी बारीकियाँ और पेचीदगियाँ होती हैं। जरा सी चूक भी कई बार भयानक नतीजे ला सकती है और दुर्भाग्यवश, कभी-कभी उनकी जान भी ले सकती है।
नेगेटिव G करतब और पायलट की शारीरिक सीमाएँ
सबसे ज्यादा जिस बात पर चर्चा हो रही है, वह है ‘नेगेटिव G’ करतब (Negative G manoeuvre) का पायलट के शरीर पर पड़ने वाला असर। आम तौर पर उड़ान के दौरान, गुरुत्वाकर्षण (Gravity) खून को दिमाग से दूर खींचता है। लेकिन ‘नेगेटिव G’ की स्थिति में इसका उल्ट होता है। खून तेजी से दिमाग की तरफ जाता है। इसकी वजह से ‘रेड-आउट’ जैसी स्थिति पैदा हो सकती है, जिसमें देखने की क्षमता बहुत बिगड़ जाती है और ज्यादा गंभीर होने पर कुछ पल के लिए बेहोशी भी आ सकती है।
हवाई कलाबाजी करते समय, खासकर उल्टे होकर उड़ने के दौरान, पायलट को चक्कर आ सकते हैं, उसके रिफ्लेक्स धीमे हो सकते हैं, और सोचने-समझने की क्षमता कुछ पल के लिए कमजोर पड़ सकती है। चाहे पायलट ने कितनी भी बेहतरीन ट्रेनिंग ली हो या ‘एंटी-G सूट’ पहना हो, कोई भी इन जैविक सीमाओं से बच नहीं सकता। तेज सफ्तार और कम ऊँचाई पर, अगर पायलट एक सेकंड के लिए भी बेकाबू हो जाए, तो विमान को संभालना नामुमकिन हो जाता है। यह कारण यह नहीं बताता कि पायलट की कोई गलती थी, बल्कि यह उस कठोर सच्चाई को दिखाता है कि विमान कभी-कभी उस सीमा से भी ज्यादा अच्छा प्रदर्शन कर सकता है, जिसे इंसान का शरीर ठीक से झेल नहीं पाता।
इंजन सीज या कुछ समय के लिए पावर लॉस होना
दुर्घटना का एक और संभावित कारण इंजन की खराबी या कलाबाजी के दौरान कुछ पल के लिए इंजन की ताकत कम होना हो सकता है। उदाहरण के लिए, मार्च 2024 में जैसलमेर के पास हुए तेजस क्रैश में, जाँचकर्ताओं ने पता लगाया था कि इंजन के तेल पंप में गड़बड़ी आ गई थी, जिससे इंजन जाम (Seizure) हो गया था। हालाँकि, इस दुबई क्रैश में भी वही खराबी थी, इसका कोई सबूत नहीं है, लेकिन इससे यह पता चलता है कि जब लड़ाकू विमानों को इतनी जोरदार तरीके से उड़ाया जाता है, तो उनके इंजन तेल (Lubrication) या ईंधन सप्लाई की गड़बड़ियों के प्रति कितने कमजोर हो सकते हैं।
ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ‘नेगेटिव G’ या लगभग शून्य गुरुत्वाकर्षण वाली स्थितियों में, इंजन का तेल और ईंधन वैसे काम नहीं करते, जैसे वे सीधी उड़ान में करते हैं। तेल के दबाव या ईंधन की सप्लाई में जरा-सी भी रुकावट आने पर इंजन कुछ देर के लिए बंद हो सकता है या उसकी ताकत घट सकती है। सामान्य उड़ान में पायलटों के पास ऊँचाई और समय होता है कि वे इंजन को फिर से चालू करने या इमरजेंसी के तरीके अपना सकें। पर, एयर शो में विमानों को लोगों को दिखाने के लिए जानबूझकर जमीन के बहुत करीब उड़ाया जाता है, ऐसे में अगर इंजन की ताकत अचानक कम हो जाए, तो बचने या संभलने का कोई मौका नहीं मिलता।
‘डिजिटल कंट्रोल’ वाला ‘फ्लाई-बाय-वायर’ सिस्टम
तेजस विमान एक ‘डिजिटल कंट्रोल’ वाला विमान है, जिसे ‘फ्लाई-बाय-वायर’ सिस्टम कहा जाता है। इसका मतलब है कि जब पायलट कोई कमांड देता है, तो वह सीधे मशीनरी तक नहीं जाती, बल्कि बीच में लगे कंप्यूटर उस कमांड को समझते हैं और फिर विमान को उड़ाते हैं। इस तकनीक से विमान बहुत तेज और फुर्तीला बन जाता है।
हालाँकि, यह सारा सिस्टम दर्जनों सेंसर से मिलने वाले सटीक डेटा पर निर्भर करता है। इसलिए, अगर अत्यधिक कलाबाजी के दौरान किसी सेंसर में कोई छोटी-सी गड़बड़ी आ जाए, या सॉफ्टवेयर में कोई उलझन पैदा हो जाए, तो विमान अचानक गलत प्रतिक्रिया दे सकता है। बेशक, इन सिस्टम की खूब जाँच की जाती है, लेकिन एयर शो में विमान को क्षमता की आखिरी हद तक उड़ाया जाता है। बहुत कम ऊँचाई पर, अगर कंट्रोल का जवाब थोड़ा सा भी देर से या गलत मिले, तो यह भयानक हो सकता है। यह समस्या केवल तेजस के साथ नहीं है, बल्कि दुनिया के दूसरे आधुनिक लड़ाकू विमानों में भी ऐसा देखा गया है।
पक्षी से टकराना या कोई बाहरी चीज निगलना
हमें हादसे के पीछे मौसम और आस-पास के माहौल से जुड़े कारणों पर भी ध्यान देना होगा। एयर शो अक्सर समुद्र के किनारों या भीड़-भाड़ वाले शहरों के पास होते हैं, जहाँ पक्षी ज्यादा होते हैं। अगर उड़ान के दौरान कोई पक्षी विमान से टकरा जाए (Bird Strike) या इंजन में कोई बाहरी चीज चली जाए, तो इससे इंजन की हवा का बहाव, जलने की प्रक्रिया या टरबाइन का काम अचानक और बुरी तरह से बिगड़ सकता है।
इतिहास में, दुनिया की सबसे एडवांस एयर फोर्सेस के विमानों के साथ भी ऐसी घटनाओं के कारण हादसे हुए हैं। एक ऊँचाई पर उड़ रहे विमान में अगर पक्षी टकराए, तो शायद पायलट बच जाए, लेकिन कम ऊँचाई पर खतरनाक कलाबाजी करते समय अगर ऐसा हो जाए, तो समय और ऊँचाई कम होने के कारण विमान को संभालना नामुमकिन हो सकता है।
मिलिट्री एक्सरसाइज के दौरान एयरशो क्रैश या दुर्घटनाएँ पहले कभी नहीं होतीं, ऐसा क्यों है?
यह समझना बहुत जरूरी है कि एयर शो में विमानों का क्रैश होना सिर्फ भारत या तेजस विमान की अकेली समस्या नहीं है। अमेरिका, रूस, फ्रांस, चीन और कई यूरोपीय देशों ने भी अपने बेहतरीन लड़ाकू विमानों को प्रदर्शन (डेमोंस्ट्रेशन) उड़ानों के दौरान हादसों में खोया है। F-16, Su-27, मिराज 2000 और MiG-29 जैसे विमान, जिनकी भरोसेमंद कार्यक्षमता कई दशकों से सिद्ध हो चुकी है, वे भी एयर शो के दौरान क्रैश हुए हैं।
ये हादसे इसलिए नहीं होते कि विमान असुरक्षित होते हैं, बल्कि इसलिए होते हैं क्योंकि एयर शो में जानबूझकर सुरक्षा की गुंजाइश कम कर दी जाती है, ताकि कलाबाजियाँ ज्यादा शानदार और नजदीक से दिख सकें। जोखिम ऐसे प्रदर्शनों का एक अटूट हिस्सा होता है। हाल के विश्वव्यापी उदाहरण देखें तो पता चलता है कि सबसे आधुनिक सेनाएँ भी हादसों से अछूती नहीं हैं।
उदाहरण के लिए, अक्टूबर 2025 में अमेरिकी नौसेना को दक्षिण चीन सागर के ऊपर दोहरे हादसे का सामना करना पड़ा था, जब USS निमित्ज विमानवाहक पोत से उड़ान भरते समय एक MH-60R सीहॉक हेलिकॉप्टर और एक F/A-18F सुपर हॉर्नेट लड़ाकू जेट आधे घंटे के भीतर ही दुर्घटनाग्रस्त हो गए थे।
अमेरिका में हुई एक और दुखद घटना ने यह दिखाया कि कंट्रोल एयर स्पेस में भी विमानन सुरक्षा कितनी नाजुक हो सकती है। वाशिंगटन डीसी के पास, रीगन नेशनल एयरपोर्ट के नजदीक, अमेरिकन एयरलाइंस के एक छोटे जेट विमान और अमेरिकी सेना के ब्लैक हॉक हेलिकॉप्टर की हवा में टक्कर होने से बड़ा हादसा हो गया।
जिस समय यह हुआ, सिविल एयरक्राफ्ट (जिसमें 60 यात्री और 4 क्रू सदस्य थे) लैंडिंग के लिए आ रहा था, तभी उसकी ट्रेनिंग मिशन पर निकले सैन्य हेलिकॉप्टर से टक्कर हो गई। टक्कर होते ही दोनों विमान बर्फीली पोटोमैक नदी में जा गिरे। अधिकारियों ने पुष्टि की कि विमान में सवार सभी 64 नागरिक और हेलिकॉप्टर में सवार तीनों सैनिक मारे गए।
हालाँकि अमेरिका में दुनिया के सबसे एडवांस एयर ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम हैं, फिर भी हादसे की वजह तुरंत पता नहीं चली, जिसके बाद राष्ट्रीय परिवहन सुरक्षा बोर्ड (NTSB) ने पूरी जाँच शुरू की। एयरपोर्ट को बंद कर दिया गया और फ्लाइट्स को मोड़ना पड़ा। बचाव दल को कई दिनों तक बर्फीले, कम रोशनी वाले पानी में जूझना पड़ा। यह घटना दिखाती है कि भले ही नागरिक और सैन्य विमानन सिस्टम कितने भी आधुनिक क्यों न हों, वे इंसानी, तकनीकी या पर्यावरणीय गलतियों के आगे अब भी कमजोर पड़ सकते हैं।
सिर्फ हमारे देश में ही नहीं, बल्कि दुनिया की सबसे ताकतवर सेनाओं में भी हादसे होते रहते हैं। जैसे, अमेरिकी नौसेना में हाल के सालों में कई बड़े हादसे हुए हैं। इससे पता चलता है कि जब काम का बोझ ज्यादा होता है, तो खतरा भी बढ़ जाता है। उदाहरण के लिए, अप्रैल 2025 में, लाल सागर में अमेरिकी जहाज (Aircraft Carrier) यूएसएस हैरी एस ट्रूमैन से लगभग $6 करोड़ की कीमत वाला एक F/A-18 सुपर हॉर्नेट लड़ाकू विमान, उसे खींचने वाले ट्रैक्टर के साथ, फिसलकर समुद्र में गिर गया था।
यह तब हुआ जब जहाज दुश्मनों से बचने की कोशिश कर रहा था और लगातार मिसाइलों के खतरे का सामना कर रहा था। सिर्फ अमेरिका ही क्यों, चीन में भी एयर शो के दौरान जानलेवा दुर्घटनाएँ हुई हैं। जैसे 2016 में, एक मशहूर पायलट मिशेल लूश की मौत हो गई थी, जब वह विमान को बहुत ऊँचाई से सीधी नीचे लाने के बाद वापस ऊपर नहीं खींच पाए थे। ये सभी घटनाएँ एक कड़वी सच्चाई बताती हैं। चाहे हम शांति के समय कोई शानदार प्रदर्शन कर रहे हों या लड़ाई के करीब वाले ऑपरेशन, ये तेज रफ्तार वाले विमान हमेशा इंसान और मशीन की आखिरी हद पर काम करते हैं। इसलिए, कोई भी देश, चाहे वह कितना भी आगे क्यों न हो, ऐसे दुखद हादसों से बच नहीं सकता।
तेजस का ऑपरेशनल ट्रैक रिकॉर्ड
तेजस विमान साल 2016 से भारतीय वायु सेना (IAF) में है और इसने अब तक हज़ारों घंटों तक सुरक्षित उड़ान भरी है, जिसमें सामान्य गश्त, अभ्यास और ट्रेनिंग मिशन सब शामिल हैं। इससे पहले जो क्रैश 2024 में जैसलमेर के पास हुआ था, उसकी वजह साफ-साफ पता चल गई थी। वह इंजन के तेल पंप की खराबी थी। उस हादसे के बाद जो सुधार किए गए, उसने दिखाया कि भारत की सैन्य विमानन सुरक्षा प्रणाली सक्रिय है और पारदर्शी तरीके से काम करती है। यह बात भी ध्यान देने लायक है कि दुबई में क्रैश उस दिन हुआ, जब सरकार ने तेल लीक होने की अफवाहों को गलत बताया था। जाँच पूरी होने से पहले ही बिना किसी संबंध वाले दावों को हादसे से जोड़ना, लोगों की समझ को गुमराह करता है और जाँच प्रक्रिया की विश्वसनीयता को कम करता है।
एक त्रासदी, कोई फैसला नहीं
यह सच है कि मार्च 2024 से अब तक भारतीय वायु सेना (IAF) ने नौ विमान खोए हैं, और यह तेजस का दूसरा हादसा है, लेकिन सिर्फ इन आँकड़ों को देखकर डरना नहीं चाहिए। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारी एयरफोर्स दुनिया के सबसे मुश्किल हवाई क्षेत्रों में काम करती है। ऐसे में, हादसे होना, भले ही दिल तोड़ने वाला हो, लेकिन तेज रफ्तार वाले सैन्य विमानन की एक दुखद सच्चाई है।
इस हादसे की जाँच के लिए कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी बिठा दी गई है और केवल उनके नतीजे ही हमें सही जवाब देंगे। जब तक जाँच पूरी नहीं होती, तब तक हमें अटकलों पर भरोसा करने के बजाय संयम रखना चाहिए और पूरी तस्वीर देखनी चाहिए। यह इंसान का स्वभाव है कि वह किसी भी असफलता का एक ही कारण जानना चाहता है, खासकर जब यह दुबई एयर शो के उस भयानक शुक्रवार (21 नवंबर 2025) की तरह इतना दुखद हो। लेकिन, अक्सर दुखद हादसों की वजह कोई एक गलती नहीं होती, बल्कि वे कई अनजाने कारणों के एक साथ मिल जाने का नतीजा होते हैं, और इनमें से कुछ कारणों का पता तो सबसे अनुभवी जाँचकर्ता भी शायद न लगा पाएँ।
अफगानिस्तान और भारत के बीच द्विपक्षीय व्यापार संबंध आज न सिर्फ ऐतिहासिक विरासत का विस्तार हैं बल्कि मौजूदा भू-राजनीतिक समीकरणों, क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और पाकिस्तान को बायपास करने की रणनीति के केंद्र में भी हैं।
दोनों देश साझेदारी के नए चरण में प्रवेश कर रहे हैं। एयर कार्गो कॉरिडोर, व्यापार अटैशे की नियुक्ति और निवेश सहयोग से यह साझेदारी न केवल आर्थिक पर साथ ही भू-राजनीतिक दृष्टि से भी अहम हो गई है।
भारत और अफगानिस्तान के बीच प्राचीन सिल्क रूट दोनों देशों की ऐतिहासिक विरासत रहा है। यहीं से सूखे मेवे, मसाले, कालीन और घोड़े आदि का आयात निर्यात होता रहा। आज दोनों देशों के रिश्ते सुरक्षा, विकास और कनेक्टिविटी की आधुनिक भाषा में बदल गए हैं, इसका आधार वही पुरानी ऐतिहासिक निकटता और आपसी भरोसा है।
तालिबानी सत्ता की वापसी के बाद राजनीतिक मान्यता को लेकर थोड़ी परेशानी रही, लेकिन भारत ने मानवीय सहायता, बुनियादी इंफ्रास्ट्रक्चर ढाँचागत प्रोजेक्ट और व्यापारिक संपर्क को जारी रखकर संबंध टूटने नहीं दिए। इसी कड़ी में नई दिल्ली और काबुल अब इस रिश्ते को मदद से आगे ले जाकर ‘साझेदार व्यापार’ में बदलने की कोशिश कर रहे हैं।
अफगानिस्तान के उद्योग और वाणिज्य मंत्री नूरुद्दीन अजीजी 5 दिवसीय यात्रा के तहत भारत के दौरे पर हैं। इस दौरे का मकसद दोनों देशों के व्यापारिक संबंधों के बेहतर करना है। इस दौरे में एयर कार्गो कॉरिडोर की घोषणा हुई। काबुल- दिल्ली और काबुल- अमृतसर मार्ग पर मालवाहक उड़ानें शुरू होंगी।
India-Afghanistan to strengthen bilateral trade ties Key initiatives: -Establish trade attaché offices in Delhi, Kabul -Reactivate dormant joint trade working group -Set up new joint chamber of commerce -Launch dedicated air cargo corridors soon Kabul Delhi Kabul Amritsar pic.twitter.com/TUXXyLGSZB
इसके अलावा दोनों देशों ने व्यापार अटैशे नियुक्त करने का निर्णय लिया है। इसका उद्देश्य यह है कि व्यापारिक गतिविधियों की निगरानी, निवेशकों को मार्गदर्शन और नीतिगत समन्वय सीधे तौर पर किया जा सके। इससे व्यापारिक विवादों का समाधान भी तेज़ी से होगा और कारोबारी माहौल को स्थिरता मिलेगी।
अजीजी से पहले अफगानिस्तान के विदेश मंत्री आमिर खान मुत्तकी अक्टूबर में भारत की सप्ताह भर की यात्रा के लिए आए थे। तब भारत और अफगानिस्तान ने खनिज, ऊर्जा और अवसंरचना क्षेत्रों में निवेश के अवसर तलाशने के लिए एक द्विपक्षीय व्यापार कमेटी बनाने की बात कही थी। भारत ने भी कूटनीतिक संबंधों को बेहतर बनाने के लिहाज से काबुल में अपने तकनीकी मिशन को दूतावास का दर्जा दिया है।
गौरतलब है कि ये यात्रा उस समय हो रही है जब पाकिस्तान के साथ अफगानिस्तान के रिश्तों में तनाव चल रहा है। पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के लिए जमीनी रास्ते बंद कर दिए हैं। इससे अफगानिस्तान का व्यापार प्रभावित हो रहा है।
इसी के चलते अफगानिस्तान ने भारत की ओर अपने कदम तेजी से बढ़ाए हैं। अब एयर कार्गों सेवा जल्द ही शुरू किए जाने की घोषणा से पाकिस्तान पर दोतरफा दबाव बढ़ेगा। भारत- अफगानिस्तान डील में दोनों देशों ने नया संयुक्त वाणिज्य मंडल (Joint Chamber of Commerce) बनाने की घोषणा की है।
ये प्लेटफॉर्म व्यापारिक संगठनों, उद्योगपतियों और निवेशकों को एक साझा मंच देगा, जहाँ वे नए अवसरों और चुनौतियों पर चर्चा कर सकेंगे। इससे निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ेगी और व्यापारिक रिश्ते सरकारी स्तर से एक कदम आगे बढ़ेंगे।
क्या है भारत-आफगानिस्तान की मौजूदा व्यापारिक इंफ्रास्ट्रक्चर
2024-25 के वित्तीय वर्ष में भारत-अफगानिस्तान का द्विपक्षीय व्यापार ₹8372 करोड़ (1 अरब डॉलर ) के पार पहुँच चुका है। क्षेत्रीय अस्थिरता के बावजूद ये इजाफा काबिल-ए-तारीफ है।
आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, कुल व्यापार लगभग 1.0087 अरब डॉलर (₹8372 करोड़) रहा, जिसमें से करीब 689.8 मिलियन डॉलर (₹5722 करोड़) अफगानिस्तान के निर्यात और करीब 319 मिलियन डॉलर (₹2647 करोड़) भारत के निर्यात रहे, यानी व्यापार संतुलन पहली बार काबुल के पक्ष में थोड़ा झुक गया।
अफगानिस्तान से भारत को मुख्य रूप से सूखे मेवे, बीज, केसर, जड़ी-बूटियाँ, किशमिश और अनार जैसे कृषि उत्पाद आते हैं, जो भारतीय बाजार में प्रीमियम श्रेणी के माने जाते हैं।
इसके बदले में भारत अफगानिस्तान को दवाइयाँ, मशीनरी, रेडीमेड कपड़े, खाद्य पदार्थ, निर्माण सामग्री और रोजमर्रा की उपभोक्ता वस्तुएँ निर्यात करता है। ये सामान अफगान के शहरी और कस्बाई बाजारों के लिए अहम आपूर्ति शृंखला बन चुके हैं।
पाकिस्तान की समस्या और उसका बायपास
भारत- अफगानिस्तान व्यापार की सबसे बड़ी भू-राजनीतिक (जियो-पॉलिटिकल) रुकावट पाकिस्तान है। पाकिस्तान अक्सर भारत और अफगानिस्तान के बीच जमीनी ट्रांजिट को रोकने की कोशिश करता है।
वर्तमान में अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा पर तनाव बढ़ा है। सीमा पार हमले और बार बार क्रॉसिंग बंद होने से अफगानिस्तान के ताजे फल और सब्जियों के निर्यात को खासतौर पर भारी नुकसान हुआ। इसके कारण अफगानिस्तान को वैकल्पिक मार्ग खोजने पड़े।
हाल में पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के लिए अपनी जमीनी सीमा बंद कर दी। इसके कारण अफगानिस्तान को व्यापार में काफी नुकसान झेलना पड़ा। इसके बाद तालिबान सरकार ने अपने व्यापारियों को दूसरे देशों के साथ व्यापार बढ़ाने तथा वैकल्पिक रूट अपनाने की सलाह जारी की।
इसी के चलते भारत के साथ हवाई कार्गो सेवा और चाबहार मार्ग के विस्तार को अफगानिस्तान की ‘पाकिस्तान बायपास’ रणनीति के रूप में देखा जा रहा है, जिससे इस्लामाबाद की सामरिक और आर्थिक चिंता स्वाभाविक रूप से बढ़ी है।
2017 में हुई भारत-अफगान एयर कॉरिडोर की शुरुआत
भारत- अफगानिस्तान के बीच एयर फ्रेट कॉरिडोर की शुरुआत 2017 में हुई, जब काबुल से दिल्ली के लिए पहला कार्गो फ्लाइट 60 टन कार्गो भारत पहुँचा। इसमें मुख्य रूप से ‘हींग’ और अन्य औषधीय पौधों को लाया गया।
असल में यह फैसला 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन राष्ट्रपति अशरफ गनी की मुलाकात में लिया गया था, ताकि पाकिस्तान की जमीनी रुकावटों को खत्म करके अफगानिस्तान को सीधे भारतीय बाजार से जोड़ा जा सके।
इसके तुरंत बाद कंधार- दिल्ली कार्गो फ्लाइट शुरू हुई, जिससे अनार और ताजे फल आदि भारतीय थोक मंडियों तक आसानी और तेजी से पहुँचे। इससे अफगान किसानों को भी बेहतर दाम मिलने के रास्ते भी खुले।
इस एयर कॉरिडोर ने शुरुआती वर्षों में व्यापार को गति दी, लेकिन सुरक्षा, वित्तीय प्रतिबंधों और तालिबान की वापसी के बाद इसे रोक दिया गया। अब इसे फिर से सक्रिय किया जा रहा है।
दोनों देशों के बीच नई हवाई कार्गो सेवा की डील
अफगानिस्तान के तालिबान व्यापार मंत्री अल हज नूरुद्दीन अजीजी की हालिया यात्रा के दौरान काबुल- दिल्ली और काबुल- अमृतसर मार्गों पर एयर फ्रेट कॉरिडोर ‘सक्रिय’ कर दिया गया हैं। इन रास्तों पर कार्गो उड़ानें बहुत जल्द शुरू होने वाली हैं।
विदेश मंत्रालय के अधिकारी आनंद प्रकाश के अनुसार, इन मार्गों पर शीघ्र ही नियमित कार्गो फ्लाइट ऑपरेशन शुरू होंगे, जिससे दोनों देशों के बीच कनेक्टिविटी और व्यापारिक संबंधों को सीधा बढ़ावा मिलेगा।
इस समय अफगानिस्तान-पाकिस्तान तनाव के कारण जमीनी ट्रांजिट लगभग ठप है। इससे अफगान निर्यातकों, विशेषकर फल उत्पादकों, को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। अब एयर कार्गो कॉरिडोर से ही अफगानिस्तान को उम्मीद है कि ताजा और अधिक मूल्य वाले अफगानी सामान बिना रुकावट भारतीय शहरों तक पहुँचेंगे। कार्गो के जरिए भारत से दवाइयाँ, मशीनरी और कपड़े काबुल और अन्य शहरों में पहुँच सकेंगे।
चाबहार पोर्ट और समुद्री कनेक्टिविटी
हवाई मार्ग के साथ-साथ भारत और अफगानिस्तान ईरान के चाबहार बंदरगाह के जरिए समुद्री-स्थलीय कनेक्टिविटी को भी रणनीतिक रूप से मजबूत करने की योजना पर काम कर रहे हैं।
चाबहार पोर्ट में भारत की भारी निवेश और त्रिपक्षीय ट्रांजिट समझौता अफगानिस्तान को अरब सागर तक वैकल्पिक समुद्री रास्ता देता है, जो पाकिस्तान के कराची और ग्वादर बंदरगाहों पर निर्भरता को कम करता है।
अफगान व्यापार मंत्री ने भारत से चाबहार के जरिए रेगुलर शिपिंग सेवाएं शुरू करने, ईरान के निमरोज प्रांत में ड्राई पोर्ट विकसित करने और भारतीय बंदरगाह न्हावा-शेवा पर अफगान कार्गो की क्लीयरेंस आसान बनाने की माँग भी की है।
हालाँकि अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण चाबहार की क्षमता अभी पूरी तरह इस्तेमाल नहीं हो पा रही, लेकिन इसे आने वाले समय में ‘गेम चेंजर कॉरिडोर’ माना जा रहा है जो दक्षिण एशिया और मध्य एशिया कनेक्टिविटी की धुरी बन सकता है।
भारत-अफगानिस्तान का व्यापारिक ढाँचा, रियायतें और निवेश अवसर
भारत ने अफगान उत्पादों के लिए अपने बाजार में लगभग शून्य या बहुत कम टैरिफ का प्रावधान रखा है। इसके कारण छोटे अफगान किसानों और उत्पादकों को बेहतर खरीदार और दाम मिल पा रहे हैं। कई विश्लेषकों का ये भी कहना है कि भारतीय बाजार तक आसान पहुँच के चलते अफगान किसानों को अफीम जैसी अवैध खेती के बजाय सूखे मेवे, केसर, जड़ी- बूटियों वाली वैकल्पिक खेली करने का मौका मिल रहा है।
दूसरी ओर, अफगानिस्तान तालिबान शासन के तहत भी भारतीय निवेश को आकर्षित करने के लिए 5 साल तक कृषि-प्रोसेसिंग, खनन और हल्की मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्रों में टैक्स हॉलिडे, कच्चे माल और मशीनरी पर 1% आयात शुल्क जैसे प्रोत्साहन दे रहा है।
इस व्यापारिक संरचना को मूर्त रूप देने के लिए दोनों देशों ने वाणिज्यिक/ट्रेड अटैशे नियुक्त करने, संयुक्त कार्य समूहों को पुनः सक्रिय करने और बैंकिंग- भुगतान सिस्टम को दोबारा स्थापित करने पर आपसी सहमति जताई है।
अफगान बैंकों में भुगतान, बैंकिंग और SWIFT की चुनौती
तालिबान के सत्ता में आने और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बाद अफगान बैंकों की SWIFT प्रणाली से कटौती के कारण भारत–अफगानिस्तान व्यापार में भुगतान और बैंकिंग सबसे बड़ी तकनीकी बाधा बनकर उभरे।
इससे न केवल बड़े कॉर्पोरेट सौदे, बल्कि छोटे और मध्यम व्यापारियों के लिए भी लेन–देन जोखिमपूर्ण और महँगा हो गया। इसके चलते कई भारतीय आयातकों को अपने ऑर्डर घटाने पड़े।
नई साझेदारी में दोनों देश इस स्थिति को हल करने के लिहाज से वैकल्पिक भुगतान सिस्टम, थर्ड-कंट्री बैंकिंग चैनल या लिमिटेड विशेष प्रावधान जैसे विकल्पों पर चर्चा कर रहे हैं ताकि वैध व्यापार को प्रतिबंधों से कम से कम नुकसान हो।
हवाई कार्गो और चाबहार मार्ग पर जोर इसलिए भी है कि इन संरचनाओं के साथ समानांतर रूप से सुरक्षित और पारदर्शी भुगतान ढाँचा स्थापित किया जा सके।
मानवीय, सामाजिक और सामरिक आयाम
भारत- अफगानिस्तान व्यापार आर्थिक साझेदारी के साथ मानवीय और सामाजिक आयाम से भी गहराई से जुड़ा है। बड़ी संख्या में अफगान नागरिक इलाज, शिक्षा और रोजगार के लिए भारत आते हैं। दवाइयों, मेडिकल उपकरणों का भारतीय निर्यात सीधे तौर पर अफगानिस्तान की स्वास्थ्य व्यवस्था को सहारा देता है।
इसके अलावा, व्यापारिक कनेक्टिविटी को क्षेत्रीय स्थिरता की रणनीति के तौर पर भी देखा जा रहा है, जहाँ अफगानिस्तान को वैकल्पिक वैध आर्थिक अवसर देकर कट्टरपंथ और अवैध अर्थव्यवस्था को कम करने की सोच दिखाई देती है। भारत के लिए यह आर्थिक के साथ सामरिक निवेश भी है। ये मध्य एशिया तक भारत की पहुँच, ऊर्जा मार्गों और ‘कनेक्ट सेंट्रल एशिया’ नीति को मजबूत करता है।
पाकिस्तान पर क्या पड़ेगा इसका असर
नई हवाई कार्गो सेवा और चाबहार मार्ग के सक्रिय होने से पाकिस्तान की पारंपरिक ‘ट्रांजिट लीवरेज’ कमजोर पड़ती है, क्योंकि अब वह अफगानिस्तान-भारत व्यापार को रोककर दोनों पर दबाव नहीं बना पाएगा।
भारतीय और अफगान अधिकारियों के बयानों से ये साफ संदेश दिखता है कि ‘रोडब्लॉक’ को बायपास करके दोनों देसों के बीच की साझेदारी को आगे बढ़ाया जाएगा। इससे पाकिस्तान की नाराजगी और चिंता बढ़ना स्वाभाविक है।
आर्थिक रूप से भी जब अफगानिस्तान अपनी निर्यात रणनीति भारत, ईरान और मध्य एशिया की ओर मोड़ता है तो पाकिस्तान की ट्रांजिट फीस, लॉजिस्टिक बिजनेस और सीमावर्ती व्यापार को नुकसान होता है। ये पहले सालाना अरबों डॉलर का वॉल्यूम रखता था। इस बदलाव से दक्षिण एशिया में शक्ति-संतुलन और कनेक्टिविटी मैप पर दीर्घकालिक असर पड़ सकता है, जिसमें भारत-अफगानिस्तान की नजदीकी एक निर्णायक स्थिति के तौर पर बनकर उभर रही है।
दोनों देशों के लिए आगे की संभावनाएँ और चुनौतियाँ
आने वाले वर्षों में अगर एयर कॉरिडोर वाणिज्यिक तौर पर व्यावहारिक साबित होते हैं तो द्विपक्षीय व्यापार को 1.5- 2 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य पूरा होने की संभावना सच हो सकती है।
हालाँकि राजनीतिक मान्यता, तालिबान शासन की नीतियाँ, वैश्विक प्रतिबंध, आतंकवाद का खतरा और बैंकिंग में आने वाली बाधाएँ अभी भी चुनौतियाँ हैं, जो इस रिश्ते की रफ्तार को सीमित कर सकती हैं।
इसके बावजूद, मौजूदा स्थिति में अफगानिस्तान-भारत द्विपक्षीय व्यापार संबंध दोनों देशों के लिए एक ‘रेयर पॉजिटिव’ के रूप में उभर रहे हैं, जो मानवीय जरूरत, आर्थिक हित और जियोपॉलिटिकल रणनीति को एक साथ साधने की कोशिश है।
अयोध्या में भगवान राम के जन्मस्थान पर उनके भव्य मंदिर का पुनर्निमाण करने के लिए हिंदुओं ने 500 वर्षों से अधिक का लंबा संघर्ष किया। इस संघर्ष के दौरान यह धरती राम भक्तों के लहू से लाल भी हुए लेकिन अपने आराध्य को मंदिर में देखने के सपने के सामने भक्तों को हर बलिदान छोटा लग रहा था। 500 सौ वर्षों तक हिंदुओं ने अन्याय, दमन और अपमान को सहते हुए भी प्रभु राम के प्रति अपनी श्रद्धा को टूटने नहीं दिया और कानूनी लड़ाई लड़ अपने आराध्य का भव्य मंदिर बनवा दिया।
इस संघर्ष की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि अयोध्या में मौजूद भगवान राम के मंदिर को तोड़कर वहाँ मुगलिया आक्रांताओं ने ‘बाबरी’ खड़ी कर दी थी। यह ना सिर्फ हिंदू आस्था पर चोट थी बल्कि इसे मजहबी वर्चस्व का प्रतीक बनाकर सदियों तक हिंदुओं के घावों को हरा रखा गया। आखिरकार, मुस्लिम आक्रांताओं की हिंदू विरोधी मानसिकता की इस पहचान को 6 दिसंबर 1992 को राम भक्तों ने ‘समतल’ कर दिया।
प्रभु राम का भव्य मंदिर बनकर तैयार है और आगामी 25 नवंबर को वहाँ धर्म ध्वजा स्थापित करने की तैयारी है। दूसरी और अयोध्या से 850 किलोमीटर दूर एक बाबरी बनाने की तैयारी चल रही है। इसके लिए दिन चुना गया है- 6 दिसंबर।
ममता बनर्जी की पार्टी TMC के विधायक हुमायूँ कबीर ने मुस्लिम बहुल मुर्शिदाबाद में 6 दिसंबर को ‘बाबरी नाम की मस्जिद’ की नींव रखे जाने का ऐलान किया है। हुमायूँ कबीर का कहना है कि इसे बनने में तीन साल लगेंगे। अगर किसी को इसका शक भी हो कि इस नई मस्जिद का उस पुरानी बाबरी से कोई लेना-देना नहीं है तो कबीर ने यह भी साफ कर दिया है कि यह उसी का ‘सेंटीमेंट’ यानी भाव है।
हुमायूँ कबीर का कहना है कि बाबर ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद बनाई और यह ऐतिहासिक मुस्लिम सेंटीमेंट है। उनका कहना है, “बंगाल में 35-37% मुस्लिम आबादी और मुर्शिदाबाद में 72% है और इसलिए उनका ‘सेंटीमेंट’ है कि उनकी जो 6 दिसंबर को अयोध्या में मस्जिद तोड़ी गई वो मुस्लिमों के मन में अभी भी है।”
बंगाल में आने वाले 6 महीनों के भीतर विधानसभा चुनावों का एलान किए जाने की संभावना है और इसी को देखकर हुमायूँ के इस बयान को मुस्लिम वोटों के तुष्टीकरण की साजिश के तौर पर देखा जा रहा है। चुनावों से ठीक पहले TMC किसी भी तरह मुस्लिम आबादी को अपने पक्ष में लाने की पुरी कोशिश करती नजर आने लगी है। चाहे इसके लिए हिंदुओं की आस्था पर प्रहार ही क्यों ना करना पड़े।
TMC के साथ कॉन्ग्रेस भी वोटों की इस दौड़ में शामिल हो गई है। यह जानते हुए भी कि यह TMC की तुष्टिकरण की नीति है, कॉन्ग्रेस खुलकर उसके साथ है। कॉन्ग्रेस नेता सुरेंद्र राजपूत ने कहा कि इसमें कुछ विवादित नहीं है, इसको विवाद का मुद्दा क्यों बनाया जा रहा है।
सुरेंद्र राजपूत कोई नौसिखिया तो हैं नहीं, टीवी पर कॉन्ग्रेस का लंबा समय से पक्ष रख रहे हैं और राजनीतिक चालबाजियों को अच्छी तरह से जानते समझते हैं। 6 दिसंबर की तारीख पर बाबरी बनाने के एलान के मायने क्या हैं इसमें अगर सुरेंद्र राजपूत को कुछ विवादित नहीं दिख रहा है तो साफ है कि उन्होंने अपने आँखों पर राजनीतिक पट्टी बाँध ली है।
भारतीय राजनीति में तुष्टिकरण कोई नई बीमारी नहीं है लेकिन TMC ने इसे जिस स्तर तक गिराकर ले जाने की कोशिश की है, वह देश की सामाजिक एकता के लिए सीधा-सीधा खतरा भी बन सकता है। मुस्लिम वोटों की ठेकेदार बन चुकी यह पार्टी उस रास्ते पर उतर आई है, जहाँ वोटों के लालच में हिंदुओं की भावनाओं और आस्था को बार-बार कुचला जा रहा है।
इस मामले में TMC की रणनीति साफ है कि बहुसंख्यक हिंदुओं को उकसाओ, उनकी आस्था का मजाक बनाओ और फिर खुद को ‘अल्पसंख्यकों का रक्षक’ बताकर मुस्लिम वोटों को अपने पक्ष में खड़ा करो। इसके लिए देश पर तलवार के दम पर हुकूमत करने, मंदिर तोड़ने और हिंदुओं के अस्तित्व को मिटाने की कोशिश करने वाले मुगलों को रोमैन्टिसाइज करने में भी नेताओं को कोई गुरेज नहीं है।
हिंदुओं की आस्था और भावनाओं को चोट पहुँचाने का सिलसिला लगातार और योजनाबद्ध तरीके से चलाया गया है। चाहे वह राम मंदिर का विरोध हो, जय श्रीराम बोलने पर हिंसा हो, दुर्गा विसर्जन पर प्रतिबंध हो या मुगल महिमामंडन, हर घटना इस बात का सबूत है कि बहुसंख्यक लोगों की भावनाओं को जानबूझकर उकसाने के प्रयोग बार-बार किए जा रहे हैं।
सदियों से हिंदू समाज बाहरी और अंदरूनी दोनों प्रकार के संघर्षों से लड़ता आया है। लेकिन सबसे खतरनाक लड़ाई वह होती है जिसमें दुश्मन सामने से नहीं बल्कि भीतर से हमला करे। TMC की यह राजनीति उसी प्रकार का हमला है। जब किसी समाज की आस्था पर प्रहार किया जाता है, तो वह समाज अपनी पहचान खोने लगता है।
यह देश के लिए इसलिए भी खतरनाक हो सकती है क्योंकि जब हिंदू-विरोधी और कट्टरपंथी राजनीति का सामान्यीकरण किए जाएगा तो इसका परिणाम समाजिक तनाव के रूप में सामने आएगा। मजहबी ध्रुवीकरण कोशिश होगी और यह आगे चलकर कितना खतरनाक रूप दिखाएगी, इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है।
यह दौर नए और विकसित होते भारत के और सशक्त बनने का है और इसके लिए देश को तुष्टिकरण की सड़ी-गली राजनीति से बाहर निकलना होगा। TMC जैसी पार्टियाँ भारत को आगे नहीं ले जा रहीं बल्कि वे उन घावों को फिर से कुरेद रही हैं जिनसे निकलने में हिंदू समाज को सदियों लगे हैं। वोट बैंक की आड़ या कहें कि भूख में जो खेल खेलने की कोशिश की जा रही है वो पूरी भारतीय सभ्यता के खिलाफ है।
कर्नाटक में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उप-मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के बीच कुर्सी को लेकर खींचतान अब और तेज हो गई है। कॉन्ग्रेस सरकार के ढाई साल पूरे होने पर अब शिवकुमार के समर्थक कॉन्ग्रेस हाईकमान को उनकी ओर से किए गए ‘CM पद को ढाई-ढाई साल तक साझा करने’ के वादे की याद दिलाने दिल्ली पहुँच रहे हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, शिवकुमार के करीब 10 समर्थक विधायक गुरुवार (20 नवंबर 2025) और बाकी शुक्रवार (21 नवंबर 2025) को दिल्ली पहुँचे। इनमें मंत्री एन चलुवरायस्वामी, विधायक इकबाल हुसैन, एचसी बालकृष्णा, एसआर श्रीनिवास, रवि गणिगा, गुब्बी वासु, दिनेश गूलीगौड़ा और अन्य शामिल हैं।
इसके अलावा अनेकल शिवन्ना, नेलमंगला श्रीनिवास, कुनिगल रंगनाथ, शिवगंगा बसवराजू समेत कई और विधायक भी दिल्ली जा रहे हैं। ये सभी कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से मुलाकात कर 2023 में तय हुए ढाई-ढाई साल के सत्ता साझा फॉर्मूले को लागू करने की माँग करने पहुँच रहे हैं।
अक्सर शांत नजर आने वाले सिद्धारमैया उनसे शिवकुमार के मुख्यमंत्री बनने से जुड़े सवाल पूछे जाने पर अक्सर चिंतित नजर आते हैं। हाल ही में मीडिया से बातचीत के दौरान, सिद्धारमैया ने कहा कि कथित ‘सत्ता-साझेदारी व्यवस्था’ को लेकर हो रही चर्चा सिर्फ एक अनावश्यक बहस है।
कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने कहा, “यह कहा जा रहा था कि ढाई साल बाद मंत्रिमंडल में फेरबदल किया जा सकता है, उसके बाद ही मुख्यमंत्री बदलने का मुद्दा सामने आया है। पार्टी नेताओं को मंत्रिमंडल फेरबदल पर फैसला लेना होगा। कुल 34 मंत्री पद हैं, जिनमें से दो पद खाली हैं। ये खाली मंत्री पद मंत्रिमंडल फेरबदल के दौरान भरे जाएँगे।”
एक ओर सिद्धारमैया मीडिया से बातचीत, सोशल मीडिया पोस्ट और अपने वफादार विधायकों के माध्यम से सिंहासन पर अपना दावा पेश कर रहे हैं तो दूसरी ओर शिवकुमार अपने ‘वादे’ वाले राज्याभिषेक की माँग को लेकर दिल्ली में अपने वफादार विधायकों के आंदोलन से खुद को दूर रख रहे हैं।
यहाँ गौर करने वाली एक दिलचस्प बात यह है कि सिद्धारमैया की तरफ से मुख्यमंत्री खुद आगे बढ़कर अपने पाँच साल के कार्यकाल का दावा कर रहे हैं, जबकि शिवकुमार की तरफ से, उनके वफादार ‘जरूरी’ काम कर रहे हैं। इस बीच डीके शिवकुमार मीडिया के सवालों पर अपनी पुरानी रट लगाए कह रहे हैं, “पार्टी मुझसे जो भी कहेगी, मैं करूँगा।”
जाहिर है, शिवकुमार मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं लेकिन खराब छवि से बचने के लिए सिद्धारमैया के खिलाफ सार्वजनिक रूप से मोर्चा खोलने से बच रहे हैं। दूसरी ओर, सिद्धारमैया मुख्यमंत्री पद पर अपनी दावेदारी मजबूत करने और जनता को ‘सब ठीक है’ का संदेश देने के लिए अपने पाँच साल के कार्यकाल का दावा कर रहे हैं।
सिद्धारमैया और शिवकुमार के बीच महीनों से चल रहा ‘सिंहासन का खेल’
कर्नाटक की सियासत में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उप-मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के बीच शक्ति संघर्ष अब खुलकर सामने आता दिख रहा है। दोनों नेता भले ही अपनी महत्वाकांक्षाओं को खुलकर स्वीकार या नकार नहीं रहे हों लेकिन यह कहना कि इसे लेकर कोई खींचतान नहीं है, आम लोगों को मूर्ख समझने जैसा होगा।
पिछले चार महीनों में कॉन्ग्रेस के चार नेताओं, तीन विधायक और एक पूर्व सांसद को पार्टी ने नोटिस जारी किए हैं। इन नेताओं ने खुले तौर पर शिवकुमार को अगले मुख्यमंत्री के रूप में समर्थन दिया था। कॉन्ग्रेस अनुशासन समिति ने इन बयानों को पार्टी के लिए शर्मिंदगी और हाईकमान के निर्देशों का उल्लंघन बताया।
शिवकुमार के समर्थक लगातार सिद्धारमैया की जगह उन्हें मुख्यमंत्री बनाने की माँग उठा रहे हैं। कुछ विधायक तो यह भी कह रहे हैं कि इस साल के अंत तक बदलाव हो जाएगा। अक्टूबर में कुनीगल विधायक एचडी रंगनाथ और मांड्या के पूर्व सांसद एलआर शिवरामे गौड़ा को ऐसे ही बयानों पर नोटिस मिला।
इससे पहले चन्नागिरी विधायक शिवगंगा वी बसवराज और रामनगर विधायक इकबाल हुसैन पर भी कार्रवाई की गई थी। शिवकुमार के करीबी माने जाने वाले इकबाल हुसैन ने कहा था कि सिद्धारमैया को पहले ही काफी मौका मिल चुका है, पहले पाँच साल और अब ढाई साल।
उनका कहना था, “शिवकुमार ने पार्टी के लिए बहुत मेहनत की, 140 सीटें दिलाईं। उन्हें मौका मिलना चाहिए ताकि 2028 में कॉन्ग्रेस फिर सत्ता में आए।” मांड्या के विधायक रवि कुमार गौड़ा ने भी कहा कि समय आने पर शिवकुमार जरूर मुख्यमंत्री बनेंगे। उसी तरह, तनवीर सैत ने संकेत दिया कि नेतृत्व स्थिर नहीं रह सकता, नया नेतृत्व आना जरूरी है।
सीपी योगेश्वर ने दावा किया कि जिले के सभी विधायक शिवकुमार को ही मुख्यमंत्री बनते देखना चाहते हैं और अब फैसला हाईकमान को करना है। बसवराज ने अगस्त में यह भी कहा था कि दिसंबर तक ‘चेंज ऑफ गार्ड’ यानी सत्ता परिवर्तन हो जाएगा। रंगनाथ ने शिवकुमार को अपना ‘राजनीतिक गुरु’ और ‘पैन-इंडिया नेता’ तक बताया।
शिवरामे गौड़ा ने यह दावा भी कर दिया कि दो-दो साल के सत्ता साझेदारी समझौते के तहत निर्णय नवंबर तक हो जाएगा। इन बार-बार के बयानों से परेशान होकर कॉन्ग्रेस हाईकमान ने नोटिस जारी किया और कहा, “इस संबंध में आपके मीडिया बयान न केवल पार्टी को शर्मिंदा करते हैं बल्कि पार्टी अनुशासन का भी उल्लंघन करते हैं। हमने आपके अनर्गल बयानों को गंभीरता से लिया है और स्पष्टीकरण माँगा है। आपको यह नोटिस मिलने के एक सप्ताह के भीतर जवाब देना होगा।”
इस साल अप्रैल में आई जाति जनगणना रिपोर्ट ने कॉन्ग्रेस के भीतर तनाव और बढ़ा दिया। लिंगायत, वोक्कालिगा और कुछ मुस्लिम समुदायों में असंतोष बढ़ा, जिसके राजनीतिक असर को लेकर सिद्धारमैया और शिवकुमार खेमों में मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं।
जेडीएस से आए विधायक सिद्धारमैया को सीएम बने रहने देना चाहते हैं। वहीं, शिवकुमार के समर्थक मानते हैं कि कॉन्ग्रेस को राज्य में सत्ता लाने में सबसे बड़ा योगदान उनका है, इसलिए उन्हें अधिकार मिलना ही चाहिए। शिवकुमार के नजरिए से इसे देखें तो अगर उनके मन में CM पद की महत्वाकांक्षा नहीं होती, तो वे अपने समर्थकों को चुप करवा सकते थे लेकिन उनकी चुप्पी और ‘वादे निभाओ’ की आवाजें, उनके मौन समर्थन का संकेत देती हैं।
सिद्धारमैया गुट चाहता है कि शिवकुमार को कर्नाटक कॉन्ग्रेस अध्यक्ष पद से हटाया जाए। 2023 में उप-मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्हें एक साल में पद छोड़ देना चाहिए था लेकिन वे अब तक अध्यक्ष बने हुए हैं ताकि पार्टी पर नियंत्रण बनाए रखें।
हाल ही में उन्होंने कहा, “मैं यह पद हमेशा नहीं रख सकता।” जिसे राजनीतिक संदेश माना जा रहा है कि वे धीरे-धीरे आगे बढ़ना चाहते हैं, सीधे टकराव नहीं। कुल मिलाकर, शिवकुमार के समर्थकों का खुला अभियान, नेतृत्व बदलने की लगातार चर्चाएँ और KPCC अध्यक्ष पद पर बने रहने की उनकी रणनीति यह साफ संकेत हैं कि वह सत्ता के शीर्ष पद की ओर कदम-ब-कदम बढ़ रहे हैं। अब देखना यह है कि कर्नाटक की सियासत में बदलाव होता है या सिद्धारमैया अपना कार्यकाल पूरा कर पाते हैं।
कॉन्ग्रेस ने सिद्धारमैया और शिवकुमार गुटों की कलह के लिए BJP और मीडिया को ठहराया जिम्मेदार
कॉन्ग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला ने कर्नाटक में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उप-मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के बीच चल रही खींचतान को लेकर बीजेपी और मीडिया पर ठीकरा फोड़ा है। उन्होंने कहा कि बीजेपी और मीडिया मिलकर कॉन्ग्रेस सरकार की छवि खराब करने की साजिश कर रहे हैं।
सुरजेवाला ने बताया कि उन्होंने मुख्यमंत्री और उप-मुख्यमंत्री से बातचीत की है और दोनों इस बात से सहमत हैं कि भारी चुनावी हार झेल चुकी और आंतरिक कलह से जूझ रही भाजपा, मीडिया के कुछ हिस्सों के साथ मिलकर कॉन्ग्रेस सरकार को बदनाम करने की मुहिम चला रही है।
उनके अनुसार, इस अभियान का असली उद्देश्य कॉन्ग्रेस सरकार की 5 गारंटी योजनाओं, गृह लक्ष्मी, गृह ज्योति, अन्न भाग्य, शक्ति और युवा निधि की सफलता को कमतर साबित करना है। वह कहते हैं कि ये योजनाएँ ‘समावेशी विकास और न्याय’ का मॉडल बन चुकी हैं।
उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि कुछ कॉन्ग्रेस विधायकों के गैर-जरूरी बयान स्थिति को और बिगाड़ रहे हैं। पार्टी ने ऐसे नेताओं को नेतृत्व को लेकर खुले बयान न देने की कड़ी चेतावनी दी है। हालाँकि, विपक्ष यह कहता रहा है कि कॉन्ग्रेस अपनी ‘गारंटी योजनाओं’ की काल्पनिक सफलता दिखा रही है जबकि अगस्त में जारी CAG रिपोर्ट ने इन योजनाओं से राज्य की अर्थव्यवस्था पर बोझ बढ़ने की बात कही थी।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि सुरजेवाला के अपने बयान में ही यह साफ झलकता है कि कॉन्ग्रेस में अंदरूनी कलह हकीकत है, जिसे छिपाने के लिए बीजेपी और मीडिया पर आरोप लगाए जा रहे हैं।
अगर मान भी लिया जाए कि बीजेपी और मीडिया कॉन्ग्रेस को बदनाम कर रहे हैं, तो सवाल उठता है कॉन्ग्रेस के अपने ही विधायक क्यों सिद्धारमैया और शिवकुमार के पक्ष में बँटे हुए हैं? क्या अपने ही नेता मुख्यमंत्री बनने की माँग करके बीजेपी और मीडिया की साजिश में शामिल हो गए हैं?
यही सब इस मामले की असलियत को उजागर करता है कि कर्नाटक कॉन्ग्रेस में नेतृत्व को लेकर विवाद सच में मौजूद है, जिससे पार्टी खुद ही परेशान है।
(यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में श्रद्धा पांडेय ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)