तालिबान राज में अफगानिस्तान में आम लोगों के लिए हालात लगातार मुश्किल होते जा रहे हैं। पाकिस्तान के साथ जारी सीमा विवाद के बीच तालिबान सरकार द्वारा पाकिस्तानी दवाओं के आयात पर पूरी तरह रोक लगाए जाने से देश में बुनियादी दवाओं की भारी किल्लत पैदा हो गई है। लोग बहुत जरूरी दवाओं के लिए भी मारे-मारे घूम रहे हैं।
पाकिस्तान से धोखा खाए अफगानिस्तान को अब भारत का सहारा है। अफगान लोगों के लिए हमेशा कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहने वाले भारत पर भरोसा जताते हुए तालिबान के स्वास्थ्य मंत्री नूर जलाल जलाली मंगलवार (16 दिसंबर 2025) को नई दिल्ली पहुँचे हैं।
पाक से दवाओं के आयात पर अफगानिस्तान का बैन
कुछ ही दिन पहले की बात है जब काबुल में तालिबान-शासित सरकार के उप-प्रमुख और आर्थिक मामलों के प्रभारी अब्दुल गनी बरादर ने हाल ही में घोषणा की कि पाकिस्तान से आने वाली सभी दवाओं के आयात पर प्रतिबंध लगाया जा रहा है। बरादर ने पाकिस्तानी दवाओं की गुणवत्ता को ‘खराब’ बताते हुए अफगान में आयात करने वालों को निर्देश दिया कि वे 3 महीने के भीतर पाकिस्तानी कंपनियों के साथ अपने सभी बकाया भुगतान निपटाएँ और वैकल्पिक देशों से दवाओं की आपूर्ति की व्यवस्था करें।
हालाँकि जमीनी हकीकत यह है कि नए आपूर्तिकर्ताओं की तलाश अफगानिस्तान के लिए बेहद कठिन साबित हो रही है। तालिबान सरकार में प्रशासनिक मामलों के महानिदेशक नूरुल्लाह नूरी के अनुसार, अफगानिस्तान में इस्तेमाल होने वाली 70% से अधिक दवाएँ अब तक पाकिस्तान से ही आयात की जाती रही हैं। ऐसे में अचानक लगाए गए प्रतिबंध का सीधा असर आम नागरिकों पर पड़ रहा है जिन्हें अब साधारण दवाएँ भी आसानी से उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं।
अफगानिस्तान के चरमराए ‘हेल्थ सिस्टम’ पर दोहरा बोझ
पिछले कई दशकों से अफगानिस्तान अपनी जरूरत की दवाओं का केवल एक बेहद छोटा हिस्सा ही खुद तैयार कर पाता रहा है। देश में दवा निर्माण से जुड़ा बुनियादी ढाँचा कमजोर है, फार्मास्यूटिकल लैब्स की भारी कमी है, क्वालिटी कंट्रोल की प्रभावी व्यवस्था नहीं है और आपूर्ति श्रृंखला भी बार-बार बाधित होती रही है। ऐसी कई कमजोरियों के कारण अफगानिस्तान लंबे समय से दवाओं के आयात पर निर्भर बना हुआ है।
वर्तमान संकट से पहले भी अफगानिस्तान में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति बेहद खराब मानी जाती थी। अगस्त 2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद हालात और ज्यादा बिगड़ गए। इसके बाद देश ने एक गंभीर मानवीय संकट का सामना किया, जिसे लगातार पड़ रहे सूखे, विनाशकारी बाढ़ और अर्थव्यवस्था के लगभग ठप हो जाने ने और गहरा कर दिया।
ईरान और पाकिस्तान से बीते कुछ महीनों में बड़ी संख्या में निर्वासित किए गए अफगानों के दबाव ने अफगानिस्तान की पहले से ही कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था को टूटने की कगार पर ला खड़ा किया है। लौटाए गए इन लोगों में सैकड़ों हजार ऐसे हैं जिन्हें तत्काल चिकित्सीय सहायता की जरूरत है लेकिन सीमित संसाधनों के चलते स्वास्थ्य तंत्र उनकी जरूरतें पूरी करने में असमर्थ दिख रहा है।
आँकड़ों के अनुसार, जनवरी से 13 अगस्त के बीच ईरान से लगभग 18.6 लाख अफगानों को वापस भेजा गया जबकि पाकिस्तान से 3.14 लाख से अधिक लोगों की वापसी हुई। इस तरह सिर्फ आठ महीनों के भीतर ही 20 लाख से ज्यादा अफगान नागरिक अपने देश लौटने को मजबूर हुए हैं। इनमें से अधिकतर लोगों को स्वास्थ्य सेवाओं की जरूरत है।
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, देश की कुल 4.6 करोड़ आबादी में से करीब 2.29 करोड़ लोग यानी लगभग आधी आबादी को मानवीय सहायता की जरूरत है। 1.68 करोड़ लोगों को सहायता के लिए चिन्हित किया गया है, जिसके लिए करीब 2.42 अरब अमेरिकी डॉलर की आवश्यकता बताई गई है।

इस बीच अफगानिस्तान में मानवीय सहायता अभियानों को धन की भारी कमी का सामना करना पड़ रहा है, जिससे हालात और ज्यादा चिंताजनक हो गए हैं। देश की स्वास्थ्य व्यवस्था पहले से ही बेहद कमजोर है और खासकर ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच असमान बनी हुई है। सीमित संसाधनों, इन्फ्रा की कमी और प्रशिक्षित कर्मियों के अभाव ने पूरे स्वास्थ्य तंत्र को टूटने कगार पर ला खड़ा किया है।
अफगानिस्तान में संक्रामक बीमारियों का बार-बार फैलना, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य से जुड़ी गंभीर समस्याएँ, कुपोषण और नॉन-कम्युनिकेबल डिजीज मृत्यु और बीमारियों की दर में इजाफा कर रहे हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, आने वाले समय में कई बीमारियों के फैलने का गंभीर खतरा बना हुआ है। इनमें एक्यूट वॉटर डायरिया, खसरा, पोलियो, क्रीमियन-कांगो हैमरेजिक फीवर (CCHF), डेंगू, कोविड-19, काली खांसी (पर्टुसिस) और मलेरिया जैसी बीमारियाँ शामिल हैं।
विशेषज्ञों और मानवीय संगठनों का कहना है कि यदि स्वास्थ्य और मानवीय सहायता के लिए तुरंत और पर्याप्त फंडिंग नहीं की गई तो अफगानिस्तान में बीमारियों, मौतों और मानसिक स्वास्थ्य संकट की स्थिति और भयावह हो सकती है। कमजोर स्वास्थ्य ढांचा और लगातार बढ़ती जरूरतें देश को एक लंबे और गहरे मानवीय संकट की ओर धकेल रही हैं।
अफगानिस्तान को ‘स्वस्थ’ रहने के लिए भारत से मदद की जरूरत
अफगान विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी, उद्योग-वाणिज्य मंत्री अल्हाज नूरुद्दीन अजीजी के बाद स्वास्थ्य मंत्री मौलवी नूर जलाल जलाली भारत आए हैं। यह दौरा स्वास्थ्य संकट से जूझते अफगानिस्तान को मदद के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। भारत लगातार अफगानिस्तान के स्वास्थ्य संबंधी बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की कोशिश में लगा है। इसी महीने की शुरुआत में भारत ने इन्फ्लुएंजा और मेनिन्जाइटिस के टीकों की 63,734 खुराकें अफगानिस्तान भेजी थीं।
इसके अलावा, बीते 28 नवंबर को भारत ने अफगानिस्तान की स्वास्थ्य जरूरतों को पूरा करने के लिए 73 टन जीवन रक्षक दवाएँ, टीके और आवश्यक सामग्री भेजी थी। विदेश मंत्रालय ने ‘X’ पर लिखा था, “अफगानिस्तान के स्वास्थ्य सेवा प्रयासों को बढ़ावा देते हुए भारत ने तत्काल चिकित्सा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए 73 टन जीवन रक्षक दवाएँ, टीके और आवश्यक पूरक सामग्री काबुल भेजी हैं। अफगान जनता के प्रति भारत का अटूट समर्थन जारी है।”
Augmenting Afghanistan’s healthcare efforts.
— Randhir Jaiswal (@MEAIndia) November 28, 2025
?? has delivered 73 tonnes of life-saving medicines, vaccines and essential supplements to Kabul to cater to urgent medical needs.
India’s unwavering support to the Afghan people continues. pic.twitter.com/G4IU1a2O3v
पिछले अक्टूबर में जब अमीर खान मुत्ताकी भारत आए थे तब भी भारत ने अफगानिस्तान को स्वास्थ्य सेवाओं की मदद देने का एलान किया था। भारत ने काबुल में थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चों और मरीजों के लिए एक विशेष केंद्र बनाने की घोषणा की थी। इसके साथ ही एक आधुनिक जाँच केंद्र (डायग्नोस्टिक सेंटर) बनाने, काबुल के इंदिरा गाँधी इंस्टीट्यूट ऑफ चाइल्ड हेल्थ में पुराने हीटिंग सिस्टम को बदले जाने की घोषणा की गई थी।
इसके अलावा भारत काबुल के बगरामी इलाके में 30 बेड का एक नया अस्पताल, कैंसर के इलाज के लिए एक ऑन्कोलॉजी सेंटर और गंभीर दुर्घटनाओं के इलाज के लिए एक ट्रॉमा सेंटर भी बनवा रहा है। साथ ही, देश के अलग-अलग इलाकों में माताओं और नवजात शिशुओं की देखभाल के लिए पक्तिका, खोस्त और पक्तिया प्रांतों में 5 मैटरनिटी हेल्थ क्लीनिक बनाए जाने की घोषणा भी की है। इस दौरे के समय भारत ने अफगानिस्तान को 20 एंबुलेंस भी भेंट की हैं ताकि मरीजों को समय पर अस्पताल पहुँचाया जा सके।
ऐसे समय में जब कई देश अफगानिस्तान को केवल राजनीतिक चश्मे से देख रहे हैं, भारत ने यह स्पष्ट कर दिया कि उसकी विदेश नीति का केंद्र सत्ता नहीं, बल्कि अफगान लोगों की पीड़ा है और इस मुश्किल घड़ी में भारत अफगानिस्तान के साथ खड़ा है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना को व्यवहार में उतारकर सीमाओं, मतभेदों और वैश्विक राजनीति से ऊपर उठकर भारत अपने सदियों पुराने दोस्त के साथ मजबूती से खड़ा है।


