बिहार विधानसभा चुनाव में ग्राउंड रिपोर्टिंग के लिए ऑपइंडिया की टीम सीमांचल के कटिहार पहुँची, जो बांग्लादेश सीमा से सटा है। यहाँ घुसपैठ बड़ा मुद्दा है, लेकिन स्थानीय मुस्लिम आबादी इसे अफवाह या राजनीतिक एजेंडा बताकर नकार रही है।
कटिहार में मुस्लिम आबादी 44% है, जो 1951 से 16% बढ़ चुकी। बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठिए आ रहे हैं, हिंदू अल्पमत होकर पलायन कर रहे।
एक स्थानीय मुस्लिम निवासी ने कहा, “यह BJP का वोट बैंक गेम है, हम देसी हैं, कोई घुसपैठ नहीं।” लेकिन हिंदू ग्रामीणों का कहना है, “लैंड ट्रांसफर अनौपचारिक तरीके से हो रहा, सुरजापुरी मुस्लिम ब्रदरहुड का नाम लेकर शेरशाहाबादी घुसपैठिए बस रहे।”
NRC-CAA का विरोध इसलिए क्योंकि वे डरते हैं कि असली घुसपैठिए पकड़े जाएँगे। कटिहार जैसे इलाकों में डेमोग्राफी चेंज नेशनल सिक्योरिटी थ्रेट है। असलियत ये है कि यहाँ भारी घुसपैठ हो रही है, लेकिन इसे स्वीकारना मुश्किल है।
बिहार विधानसभा चुनाव में ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट टीम माँ सीता की जन्मभूमि सीतामढ़ी पहुँची, जहाँ पीएम नरेंद्र मोदी ने भव्य रैली की। पीएम मोदी की रैली में भारी भीड़ उमड़ी। इस दौरान ज्यादातर लोग NDA केविकास और नीतीश कुमार की साफ छवि की तारीफ कर रहे थे। एक ध्रुव राठी फैन ने तेजस्वी यादव के जॉब प्रॉमिस पर भरोसा जताया, लेकिन जंगलराज के काले इतिहास को भूलने की बात पर लोग भड़क गए।
रैली में एक स्थानीय युवक ने कहा, “तेजस्वी के वादे सुन-सुनकर थक गए, लालू राज में बेरोजगारी चरम पर थी। NDA ने सड़कें, बिजली दी है।” अल्पमत में कुछ लोग तेजस्वी को मौका देने की बात कह रहे थे, लेकिन बहुमत ने इसे खारिज किया।
अनुराग मिश्रा की रिपोर्ट बताती है कि महागठबंधन की राह कठिन क्यों है- विकास की कमी और पुराने घोटालों का बोझ। सीतामढ़ी जैसे इलाकों में NDA का जलवा साफ दिखा।
बिहार के अररिया में राहुल गाँधी की रैली में भीड़ उल्टे पाँव लौटते दिखाई दी। राहुल गाँधी के मंच पर आने से पहले जो भीड़ थी, वो मंच पर आते ही कम होती चली गई। ये भीड़ मुस्लिमों की है। उनका कहना है कि राहुल गाँधी से ज्यादा जरूरी नमाज है।
हाल ऐसा रहा कि उधर राहुल गाँधी मंच से भाषण दे रहे थे और इधर रैली में आए लोगों ने भाषण सुनने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखी। रैली से वापस जाने वाले हर व्यक्ति के पास अपना कोई बहाना था। कोई पानी पीने के बहाने, कोई दवाई लाने के बहाने, तो कोई खाना खाने की बात कहकर रैली से खिसक लिया।
लोगों का कहना है कि राहुल गाँधी को देखना तो अच्छा लगता है लेकिन अररिया में उनके विधायक ने अब तक उनके लिए कुछ काम नहीं किया है।
देखिए लोगों ने क्या कुछ कहा, ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट में
कश्मीर की घाटी जितनी खूबसूरत दिखती है, उतनी ही गहरी उनमे दबी पंडितों की एक कहानी है- नरसंहार की, पलायन की, पहचान खोने की और बिछड़ने की। निर्देशक आदित्य सुहास जंभाले और निर्माता आदित्य धार की Netflix पर आई फिल्म बारामूला (Baramulla) उसी कहानी को भीतर समेटे हुए चलती है। यह सिर्फ एक हॉरर फिल्म नहीं है बल्कि एक ऐसा भावनात्मक अनुभव है जो कश्मीरी पंडितों के सालों पुराने दर्द को नए अंदाज में सामने लाती है।
फिल्म की मुख्य कहानी DSP रिदवान सय्यद (अभिनेता मानव कौल) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो घाटी में बच्चों के रहस्यमय ढंग से गायब होने की जाँच कर रहे हैं। DSP की बीवी गुलनार (अभिनेत्री भाषा सुंबली) और उनका छोटा बेटा उस डरावने माहौल में धीरे-धीरे ऐसी चीजे महसूस करने लगते हैं, जो किसी सामान्य इंसान की समझ से परे है। फिल्म की शुरुआत से ही एक बेचैनी महसूस होती है, जैसे घाटी की ठंडी हवा में कोई आत्मा भटक रही हो, कोई जो लौटना चाहती हो, कोई जो अब भी अपनी जमीन तलाश रही है।
इसी डर और रहस्य के बीच फिल्म धीरे-धीरे हमें उस पुराने कश्मीरी पंडित परिवार की यादों में ले जाती है, जिसका घर अब किसी और का हो चुका है। कैमरा जब उस घर के कोनों में घूमता है तो बंद कमरे में शिवलिंग, घर की दीवारों पर लटकी तस्वीरें, पुराने लकड़ी के दरवाजे, बर्फ में ढकी खिड़कियों से लगता है जैसे हर चीज किसी खोए हुए जीवन का सबूत दे रही हो। यही वह जगह है, जहाँ फिल्म का हॉरर और पंडितों का दर्द एक-दूसरे में घुल जाते हैं।
बारामूला फिल्म में दिखाया गया डर सिर्फ आत्माओं का नहीं है बल्कि उस अदृश्य भय का है जो हर विस्थापित कश्मीरी पंडित के मन में आज भी है- ‘क्या हम कभी वापस जा पाएँगे?’ फिल्म सिर्फ यह नहीं दिखाती कि कैसे कश्मीरी पंडितों को घाटी से निकाला गया बल्कि यह दिखाती है कि उनके जाने के बाद घाटी कैसे बदल गई। जो घर कभी उनके थे, अब वो अजनबियों के हैं। उन घर में आज भी पूजा की घंटियाँ गूँजती हैं, जहाँ हिंदू भगवान का वास आज भी है लेकिन यह सब सन्नाटे की तरह है।
मानव कौल का किरदार रिदवान, जो खुद कश्मीर घाटी से ही है। वह धीरे-धीरे उस रहस्य की परतें खोलते हुए महसूस करता है कि जो बच्चे गायब होने की घटनाएँ हो रहीं है, वो सिर्फ सुपरनैचुरल नहीं बल्कि इतिहास के जख्म हैं। फिल्म यह ऐहसास दिलाती है कि कुछ दर्द इतने गहरे होते हैं कि वो मिट्टी में समा जाते हैं और जब कोई उस मिट्टी को कुरेदता है तो वही पुराने साये लौट आते हैं।
भाषा सुंबली, जो खुद ‘द कश्मीर फाइल्स’ में कश्मीरी पंडितों की पीड़ा का चेहरा बन चुकी हैं, यहाँ गुलनार के किरदार में एक और बार उस दर्द को जीवित करती हैं। जब वह अपने घर के कोनों में कुछ अनजानी आवाजे सुनती है या पुराने सपनों में किसी का नाम पुकारती है तो जैसे उसकी आत्मा किसी और के अतीत से टकरा रही है। शायद यह वही अतीत है, जो कभी किसी कश्मीरी पंडित परिवार का था।
फिल्म का हॉरर साइड जितना डर पैदा करता है, उतना ही वह सवाल भी खड़े करता है- क्या ये आत्माएँ सच में मरी हुई हैं या वे लोग जो जिंदा रहते हुए भी अपनी पहचान खो बैठे? क्या इन बच्चों के गायब होने की कहानी सिर्फ रहस्य है या वो उस खोई हुई पीढ़ी का दर्द है, जो अपने घरों से उखाड़ी गई और इतिहास की परछाइयों में खो गई?
आदित्य सुहास जंभाले ने इस फिल्म में कश्मीर को सिर्फ एक पृष्ठभूमि नहीं बल्कि एक जिंदा किरदार बना दिया है। यहाँ बर्फ, हवा, सन्नाटा सब बोलते हैं। कैमरा जब पहाड़ों से गुजरता है तो लगता है जैसे वो खुद दर्द बयां कर रहे हों। यह दर्द सिर्फ फिल्म के पात्रों का नहीं है बल्कि हर उस कश्मीरी पंडित का है, जिसने अपने बचपन की गलियाँ खो दी। यहाँ उस दर्द को दर्शक भी महसूस कर पा रहा है।
फिल्म के एक सीन में जब DSP रिदवान पुराने घर की फर्श के नीचे से कुछ चीजे निकालता है। इनमें बच्चों के खिलौने, टूटी तस्वीरें, पुराने दस्तावेज कोई भूतिया रहस्य से ज्यादा एक मानवीय त्रासदी बन जाता है। दर्शक समझ जाता है कि यह कहानी भूतों की नहीं बल्कि उन जिंदा लोगों की है, जिन्हें अपने ही घरों से भूत बना दिया गया। जो फिल्म का आधा हिस्सा खत्म होने के बाद सामने आता है।
बारामूला इस बात को बहुत खूबसूरती से कहती है कि कश्मीरी पंडितों का दर्द सिर्फ इतिहास नहीं है, वह अब भी जिंदा है, अब भी सिसक रहा है और अब भी घाटी की ठंडी हवा में बहता है। यह फिल्म याद दिलाती है कि विस्थापन सिर्फ जमीन खोना नहीं होता बल्कि अपने देवताओं, अपनी भाषा, अपने त्योहारों और अपनी यादों से कट जाना होता है।
अंत के 20 मिनट फिल्म को हॉरर से सन्नाटे में बदल देते हैं। सालों पहले घाटी में हुए नरसंहार की कहानी फिल्म के किरदारों को जीवंत दिखाई देती है। एक परिवार, जिसके साथ धोखा हुआ है। वही धोखा जो फिल्म के अंत में क्लाइमेक्स बन जाता है। फिल्म प्रेमी भी सोचने पर मजबूर हो जाते हैं कि असली हॉरर किसी भूत या चुड़ैल का नहीं बल्कि उस खोए हुए अतीत का है, जिसे हमने देखने से इनकार कर दिया।
बारामूला फिल्म अपने भीतर कश्मीरी पंडितों की चीख समेटे हुए है। एक ऐसी चीख जो दिखती नहीं, सुनाई नहीं देती पर उसे महसूस किया जा सकता है। यह फिल्म डर नहीं दिखाती बल्कि बताती है कि जब कश्मीरी पंडितों ने अपनी जमीन, अपनी पहचान और अपना घर खो दिया तो उनकी आत्मा आज भी भटक रही है।
ऑपइंडिया ने भी कश्मीरी पंडितों के पलायन और नरसंहार को लेकर हमेशा आवाज बुलंद की है, इससे जुड़े आर्टिकल पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।
कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु के इंटरनैशनल कैम्पेगौड़ा एयरपोर्ट पर कुछ लोगों के खुले में नमाज पढ़ने का एक वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल है। कर्नाटक बीजेपी के प्रवक्ता विजय प्रसाद ने अपने X हैंडल पर नमाज पढ़ते लोगों के फोटो और वीडियो शेयर किए हैं। विजय प्रसाद ने लिखा है कि यह बेंगलुरु अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के टी2 टर्मिनल के अंदर इसकी अनुमति कैसे दी गई है।
How is this even allowed inside the T2 Terminal of Bengaluru International Airport? Hon’ble Chief Minister @siddaramaiah and Minister @PriyankKharge do you approve of this?
Did these individuals obtain prior permission to offer Namaz in a high-security airport zone? Why is it… pic.twitter.com/iwWK2rYWZa
विजय प्रसाद ने इस घटना को लेकर सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठाए हैं। सोशल मीडिया पर इसी तरह के तमाम सवाल उठाए जा रहे हैं। इस बीच एक और सवाल जो उठ रहा है वो ये कि मजहब विशेष के लोगों द्वारा सार्वजनिक जगहों पर नमाज पढ़ना जैसी गतिविधि करना का क्या ताकत दिखाने की कोशिश है?
ये सवाल इसलिए भी उठ रहा है क्योंकि लगभग सभी बड़े एयरपोर्ट्स की तरह ही कैम्पेगौड़ा एयरपोर्ट पर पूजा या इबादत करने के लिए बाकायदा कक्ष बनाए गए हैं। बेंगलुरु एयरपोर्ट की वेबसाइट के मुताबिक, एयरपोर्ट के दोनों टर्मिनल (T-1, T-2) के पास Multi-Faith Prayer Rooms यानि सर्व धर्म प्रार्थना कक्ष बने हुए हैं। जहाँ जाकर किसी भी धर्म या पंथ के लोग अपनी प्रार्थना कर सकते हैं।
बेंगलुरु एयरपोर्ट का सर्व धर्म प्रार्थना कक्ष (फोटो- Instagram/BLR Airport)
यह सब जानने-समझने के बाद अब सवाल वही है कि जब सुविधा उपलब्ध है, तब भी सार्वजनिक जगह पर नमाज पढ़ना क्या केवल अकीदे का ही प्रदर्शन है या फिर किसी तरह का शक्ति प्रदर्शन? क्योंकि यह कोई इकलौती घटना नहीं है। मुंबई एयरपोर्ट से लेकर लखनऊ के स्कूल, मॉल, रेलवे स्टेशन से लेकर कलेक्ट्रेट परिसर तक, इन सभी जगहों पर नमाज पढ़े जाने से जुड़ी खबरें इससे पहले भी सामने आई हैं और केवल मुट्ठी भर घटनाएँ हैं जिनका जिक्र हम कर रहे हैं।
कई मंदिरों तक में नमाज पढ़ने की घटनाएँ सामने आ चुकी हैं। बीते दिनों उत्तर प्रदेश के बदायूँ में एक मुस्लिम ने मंदिर में नमाज पढ़ी थी, मथुरा से भी ऐसा मामला सामने आया है। ऐसी घटनाओं और ऐसी वीडियोज की इंटरनेट पर भरमार है।
ईद की नमाज के दौरान सड़कें बंद किए जाने की कितनी ही घटनाएँ आपने सुनी और देखी होंगी। ईद पर तो कई बार प्रशासन खुद तय करता है कि कहाँ नमाज पढ़ी जाए और कहाँ नहीं, फिर भी सड़कों को बंद करने की घटनाएँ दिखती हैं। यह बात जुमे की नमाज के लिए भी कही जा सकती है। उस दिन भी नमाज के लिए सड़कों को जाम कर देने की लोगों की आदत बन गई है। इसकी वजह यह नहीं है कि आस-पास जगह खाली नहीं है, या कोई व्यवस्था नहीं है बल्कि वजह यह है कि लोगों को यह दिखना है कि वो कितने ताकतवर हैं।
नमाज पढ़ना इस्लाम का जरूरी हिस्सा है और उस मजहब के मानने वाले इसे पढ़ें यह किसी विवाद की बात नहीं है। विवाद इस बात पर है कि प्रशासन या कोई अथॉरिटी ‘मस्जिद, ईदगाह या प्रार्थना कक्ष’ जैसे वैकल्पिक स्थान मुहैया करवाती है तो फिर नमाज पढ़ने के लिए सार्वजनिक स्थल को चुना क्यों जाता है? क्या यह अपनी उपस्थिति का संदेश देने और खुद की मौजूदगी का एहसास कराने की कोशिश नहीं लगती है? क्या ऐसा नहीं लगता है कि एक मजहब विशेष के लोग यह साबित करना चाहते हैं कि आप उनकी मौजूदगी को समझें, महसूस करें और शायद डरें भी?
जब कोई समुदाय बार-बार सार्वजनिक स्थानों पर एकजुट होकर अपने अकीदे का प्रदर्शन करता है, तो यह स्वाभाविक रूप से एक संदेश की तरह होता है। यह संदेश होता है कि हम एकजुट हैं और अब तुमसे दबने वाले नहीं हैं। यह उनकी अपनी कथित असुरक्षा को ताकत के दम पर जीतने की कोशिश होती है। यही वजहें कई बार फिर विवाद को भी जन्म दे देती हैं।
नवंबर 2021 की बात है, खुले में नमाज को लेकर राजधानी दिल्ली से सटे गुरुग्राम में हिंदू और मुस्लिमों के बीच विवाद की नौबत आ गई। यहाँ लोग बार-बार यह माँग कर रहे थे कि खुले में नमाज ना पढ़ी जाए। खूब प्रदर्शन हुए और आखिरी में थक हारकर लोगों से सार्वजनिक जगहों पर गोवर्धन पूजा कर दी। इससे AIMIM के चीफ असदुद्दीन ओवैसी इससे तिलमिला गए। वो इसे मुस्लिमों के प्रति नफरत बताने लगे लेकिन फिर सवाल वही उठता है कि क्या सड़क, चौक, चौराहों पर नमाज पढ़कर शक्ति प्रदर्शन करना भी किसी खास धर्म के प्रति नफरत का ही नतीजा है।
समुदाय जब अपनी ऐसी हरकतों के चलते अपने विरोध की जमीन भी तैयार करने लगे हैं। लोगों को आने-जाने में समस्याएँ आती हैं तो स्वाभाविक तौर पर उनका गुस्सा निकलता है और यह विरोध की वजह बन जाता है। हर धर्म, पंथ, मजहब को अपने रीति-रिवाजों का पालन करने की पूरी आजादी होनी चाहिए लेकिन यह जिम्मेदारी के साथ होनी चाहिए।
अगर एयरपोर्ट, स्टेशन या किसी सार्वजनिक स्थान पर पहले से प्रार्थना कक्ष या निर्धारित जगह है तो उसका उपयोग करना ही कानून सम्मत होना चाहिए। लोगों को यह छूट नहीं मिलनी चाहिए कि वो अपने अकीदे के नाम पर दूसरों के लिए समस्याएँ पैदा कर सकें।
असम में ‘बहुविवाह निषेध कानून’ लागू करने की दिशा में कदम बढ़ा दिया है। इसके लागू होने के साथ ही असमवासी एक से ज्यादा शादी तब तक नहीं कर सकता, जब तक की उसका पार्टनर जिंदा है या उसने उसे तलाक नहीं दे दिया है। अगर व्यक्ति एक से ज्यादा विवाह करने का दोषी पाया गया, तो उसे 7 साल जेल की सजा हो सकती है।
बहुविवाह यानी एक से ज्यादा विवाह। पुरुष हो या स्त्री दोनों के एक ही वक्त में एक से ज्यादा विवाह प्रतिबंधित होगा। बहुविवाह पर रोक लगाने के लिए ये कानून बनाया जा रहा है। एक समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा में ये एक बड़ा कदम माना जा रहा है। सरकार के मुताबिक, कानून का उद्देश्य महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करना और धार्मिक आधार पर समाज में समानता लाना है।
सीएम हिमंता सरमा के मुताबिक, नए कानून के लागू होने के बाद, बहुविवाह के मामलों में गैर-जमानती अपराध के रूप में मुकदमा दर्ज किया जाएगा। मुख्यमंत्री ने यह भी बताया कि सरकार बहुविवाह से पीड़ित महिलाओं के लिए मुआवजे का एक विशेष कोष स्थापित करेगी, जिससे उन्हें आर्थिक सहायता दी जा सके।
असम के सीएम सरमा ने कहा, “हम चाहते हैं कि कोई भी महिला इस स्थिति में आर्थिक तंगी का सामना न करे, इसलिए सरकार उनकी मदद के लिए आगे आएगी।” हालाँकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि यह कानून छठी अनुसूची के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों और जनजातीय समुदायों पर लागू नहीं होगा।
महिला कोष बनाएगी असम सरकार
पुरुष के जेल जाने के बाद महिला का क्या होगा? या, अगर वह पुरुष की जानकारी के बिना उसकी दूसरी पत्नी है, तो महिला ही पीड़ित है। कभी-कभी, पुरुष द्वारा दूसरी महिला से शादी करने के बाद पहली पत्नी को घर से निकाल दिया जाता है। इसलिए, यह सुनिश्चित करने के लिए कि कोई महिला पीड़ित न बने, असम सरकार एक सहायता राशि महिलाओं को देगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि मुआवजे की राशि और पात्रता के मानदंड नियम बनने पर तय किए जाएँगे।
ऐसा कानून लाने वाला असम देश का पहला राज्य होगा। राज्य के बराक घाटी, मध्य असम के जमुनामुख और होजई में बांग्ला भाषी मुस्लिम की तादाद ज्यादा है। इन क्षेत्रों में बहुविवाह के केस ज्यादा आते हैं।
जनजातीय समुदाय पर लागू नहीं होगा कानून
असम कैबिनेट ने जिस ‘असम बहुविवाह निषेध विधेयक, 2025’को मंजूरी दी है, उसे 25 नवंबर को राज्य विधानसभा में पेश किए जाने की उम्मीद है। विधेयक के कानून बनने के बाद भी जनजातीय समुदाय पर ये लागू नहीं होगा। उन्हें इस कानून से छूट दी गई है। इनमें बहुविवाह हो सकता है। राज्य के बीटीएडी, दिमा हसाओ और कार्बी आंगलोंग जैसे जनजातीय समुदाय की बहुतायत है।
विधेयक के तहत छूट के बारे में सीएम सरमा ने कहा, “आदिवासी लोगों को इससे बाहर रखा जाएगा क्योंकि उनके कुछ रीति-रिवाज हैं। और छठी अनुसूची के ज़िलों में, जो बीटीसी (बोडोलैंड प्रादेशिक परिषद), दीमा हसाओ और कार्बी आंगलोंग में आते हैं, ये विधेयक तुरंत लागू नहीं होंगे… इसलिए छठी अनुसूची के क्षेत्रों में, अगर कोई अल्पसंख्यक मुसलमान 2005 से पहले वहाँ रहा है, तो उसे भी छूट दी जाएगी।”
कैसे तैयार हुआ ‘असम बहुविवाह विधेयक’ का मसौदा
राज्य में बहुविवाह की प्रथा को खत्म करने संबंधी कानून का मसौदा तैयार करने के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया गया था। इसमें राज्य के महाधिवक्ता देवजीत सैकिया, पुलिस महानिदेशक ज्ञानेन्द्र प्रताप सिंह और लिगल एडवाइजर कुंतल शर्मा शामिल थे।
जस्टिस फूकन समिति ने समान नागरिक संहिता, राज्य के नीति निदेशक तत्व और अनुच्छेद 25 में दिए गए मूल अधिकार के साथ-साथ मुस्लिम पर्सनल लॉ अधिनियम 1937 के प्रावधानों की भी जाँच की। इस दौरान समिति ने 45 दिनों में विधेयक के लिए मसौदा तैयार कर लेने की बात कही।
असम को बहुविवाह कानून बनाने का अधिकार
असम सरकार ने पहले इस बात का पता लगाया कि राज्य विधायिका को ऐसा कानून बनाने का अधिकार है या नहीं। राज्य विधायी शक्तियों की जाँच के लिए गुवाहाटी हाईकोर्ट के रिटायर पूर्व जस्टिस रूमी फूकन की अध्यक्षता में समिति बनाई गई। इस समिति ने अपनी रिपोर्ट में साफ किया कि असम सरकार को बहुविवाह पर कानून बनाने का अधिकार है।
राज्य सरकार ने बहुविवाह पर विधानसभा में ‘असम बहुविवाह निषेध विधेयक 2025’ लाने से पहले जनता से राय भी माँगी। इस पर जनता ने अपनी प्रतिक्रिया दी और सरकार के कानून बनाने का समर्थन किया।
बहुविवाह का प्रचलन
1961 में जनगणना के वक्त 1 लाख सैंपल लेकर बहुविवाह पर सर्वे किया गया था। उस वक्त ये बात सामने आई थी कि मुस्लिम में बहुविवाह का प्रतिशत 5.6 था, जो देश में सबसे अधिक था।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) के 2019-2020 के आँकड़ों से पता चलता है कि हिंदुओं की 1.3 फीसदी, मुसलमानों की 1.9 फीसदी, ईसाइयों में 2.1फीसदी और दूसरे धार्मिक समूहों की 1.6 फीसदी लोग बहुविवाह करते हैं। जनजातीय क्षेत्रों में ये ज्यादा होता है, इसलिए पूर्वोत्तर में बहुविवाह का प्रचलन ज्यादा है।
भारत में बहुविवाह पर कानूनी स्थिति
भारत में हिन्दू, सिख, ईसाई, पारसी, जैन आदि के लिए बहुविवाह प्रतिबंधित है। हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 के मुताबिक, एक वक्त पर एक पुरुष या स्त्री सिर्फ एक शादी के बंधन में रह सकता है। इस कानून के द्वारा हिंदू बहुविवाह को समाप्त कर दिया गया और इसे अपराध माना गया।
इस अधिनियम की धारा 17 और भारतीय दंड संहिता,1860 की धारा 494 और 495 के तहत बहुविवाह करने पर सजा का प्रावधान है। हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 न सिर्फ हिन्दुओं बल्कि सिखों, जैनों, बौद्धों पर भी लागू होता है। क्योंकि इनका अपना कोई अधिनियम नहीं है।
पारसी विवाह और तलाक अधिनियम 1936 के तहत पारसियों के बहुविवाह पर रोक लगा दी गई। पहले उनकी दो शादियों को समाज में मान्यता थी। लेकिन कानून लागू कर तय कर दिया गया कि कोई भी पारसी स्त्री या पुरुष एक समय पर एक शादी के बंधन में ही रह सकता है।
लेकिन मुस्लिम पुरुषों को धार्मिक कानून के तहत एक साथ 4 बीवियों को रखने का अधिकार है। मुस्लिम पर्सनल लॉ के शरिया एप्लीकेशन अधिनियम 1937 के तहत, मुस्लिम पुरुष एक ही वक्त पर चार बीवियाँ रख सकते हैं। हालाँकि उन्हें सबके साथ समान व्यवहार करने की शर्त रखी गई है। लेकिन ये कानून मुस्लिम महिलाओं पर लागू नहीं होता है। यहाँ तक कि स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 में भी बहुविवाह पर प्रतिबंध लगाया गया है। अलग-अलग धर्म के पुरुष-स्त्री की शादी इस एक्ट के अंतर्गत आते हैं।
बहुविवाह का मामला मुस्लिम पुरुषों तक ही सीमित है, जो एक से ज्यादा बीवी कानूनी तौर पर रख सकते हैं। इसलिए असम में बनने वाला कानून मुस्लिम पुरुषों को भी एक से ज्यादा निकाह करने पर प्रतिबंध लगाएगा। भारत की न्याय संहिता 2023 के तहत, बहुविवाह को एक अपराध माना ही जाता है। एक समान नागरिक संहिता की दिशा में यह एक बड़ा पहल होगा।
कुछ तारीखें इतिहास के मानचित्र पर अमर हो जाती हैं। ऐसी ही एक तारीख है 9 नवंबर। इसी दिन जूनागढ़ राज्य का भारत संघ में विलय हुआ था। हालाँकि, 562 रियासतों का विलय हुआ था लेकिन सभी रियासतों के विलय की तारीखें इतिहास नहीं बन सकीं। कुछ रियासतें इससे बाहर रहीं, जिनमें से एक जूनागढ़ भी थी। 9 नवंबर, 1947 के ऐतिहासिक दिन, जूनागढ़ की तलहटी से गढ़वा गिरनार की साक्षी में यह ऐतिहासिक घोषणा की गई कि जूनागढ़ राज्य अब भारत संघ का अंग है।
भारत में विलय के बाद जूनागढ़ को सौराष्ट्र राज्य में स्थान दिया गया। परंतु इसके विलय की प्रक्रिया समस्याओं और चुनौतियों से भरी रही। इसका पूरा इतिहास हिंदुओं के खून से सना हुआ था। जूनागढ़ के तत्कालीन नवाब और उनके दीवान पाकिस्तान समर्थक थे और जूनागढ़ की बहुसंख्यक हिंदू आबादी भारत में विलय के पक्ष में थी। बहुसंख्यक हिंदू आबादी की अनदेखी करते हुए जूनागढ़ की इस्लामी सेना ने हिंदुओं पर घोर अत्याचार किए और फिर आरजी सरकार व काठियावाड़ के अन्य राज्यों की सेनाओं ने मोर्चा संभाला, बाद में भारतीय संघ की संयुक्त सेना ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज 9 नवंबर को आइए उस इतिहास पर एक नजर डालते हैं।
जूनागढ़- गढ़वा गढ़, गिरनार की छाया में बसी एक महत्वपूर्ण रियासत
जूनागढ़, यह नाम ही इसकी भव्यता को दर्शाता है। ‘जूनो गढ़’ का अर्थ है प्राचीन किला। गिरनार पर्वत की तलहटी में स्थित यह रियासत 8,643 वर्ग किलोमीटर में फैली हुई थी। इसकी 82% जनसंख्या हिंदू थी लेकिन शासक वर्ग मुस्लिम बाबी वंश का था। इस राजवंश की शुरुआत मुहम्मद शेर खान बाबी ने 1654 में की थी। उनसे पहले, मुगलों और चूड़ासमा राजवंश के राजपूतों ने शासन किया था। यह राज्य जमीन से पाकिस्तान के पास नहीं था लेकिन समुद्र के रास्ते यह कराची के वेरावल बंदरगाह से लगभग 300 मील दूर था।
जूनागढ़ के इतिहास पर एक संक्षिप्त नजर डालें तो यह चूड़ासमा राजपूतों के शासन के अधीन था, जब तक कि गुजरात के सुल्तान मुहम्मद बेगड़ा ने 1472-73 में जूनागढ़ पर विजय प्राप्त नहीं कर ली। मुगल साम्राज्य के पतन के बाद, अहमदाबाद के सूबा शेर खान बॉबी ने 1735 में जूनागढ़ में अपना राज्य स्थापित किया। उनके वंशज जूनागढ़ के अंतिम नवाब महाबत खान रसूल खान थे।
नवाब महाबत खान रसूल खान
जूनागढ़ के अंतिम नवाब मुहम्मद महताब खान एक विचित्र शासक थे। उन्हें शिकार का शौक था लेकिन वे राज्य में अपनी उपलब्धियों से अधिक अपने कुत्तों के लिए प्रसिद्ध हुए। उनके पास विभिन्न नस्लों के 300 से अधिक कुत्ते थे। जूनागढ़ की सीमाओं पर विजय प्राप्त करने के बाद, वे पूरे काठियावाड़ में सिर्फ अपने कुत्तों के लिए प्रसिद्ध हो गए। उन्होंने कुत्तों के लिए एक कब्रिस्तान भी बनवाया था और कहा जाता है कि उन्होंने एक बार दो कुत्तों का विवाह भी करवाया था।
जूनागढ़ के नवाब
विवाह के बाद, उन्होंने पूरे जूनागढ़ राज्य में अवकाश घोषित करने का फरमान जारी किया और उस समय के 25-30 लाख रुपये भी खर्च कर दिए। यह नवाब ऐसे ही अजीबोगरीब फैसलों के लिए जाना जाते थे। हालाँकि, नवाब की असली शक्ति या अधिकार उनके दीवान के पास था। दीवान की कही हुई बात पत्थर की लकीर मानी जाती थी। दरअसल, नवाब सिर्फ कुत्ते ही रखते थे और जूनागढ़ की सत्ता दीवान के पास ही थी।
मुस्लिम लीग के शाहनवाज भुट्टो बने दीवान
1947 की गर्मियाँ अंधकारमय थीं और उस समय भारत-पाकिस्तान विभाजन की चर्चा जोरों पर थी। गर्मियों के कारण, जूनागढ़ के नवाब यूरोप की यात्रा पर थे और जूनागढ़ को दीवान शाहनवाज भुट्टो (जुल्फिकार अली भुट्टो के पिता) के भरोसे छोड़ गए थे। आजादी की आहट सुनाई दे रही थी। कुछ अपवादों को छोड़कर, अधिकांश रियासतें भारत में शामिल हो रही थीं। ऐसे समय में, यह कहा जाने लगा कि नवाब जूनागढ़ का पाकिस्तान में विलय करना चाहते हैं लेकिन जूनागढ़ रियासत ने आधिकारिक तौर पर स्पष्ट किया कि ये सभी बातें निराधार हैं।
शाहनवाज भुट्टो से पहले जूनागढ़ के दीवान अब्दुल कादिर थे। 25 जुलाई 1947 को माउंटबेटन ने राजाओं की एक बैठक बुलाई, जिसमें जूनागढ़ के दीवान अब्दुल कादिर के भाई नबी बख्श, नवाब के संवैधानिक सलाहकार के रूप में उपस्थित थे। माउंटबेटन के साथ कुछ विचार-विमर्श के बाद, उन्होंने माउंटबेटन, सरदार पटेल और नवानगर के जाम साहब (वर्तमान जामनगर को तब नवानगर के नाम से जाना जाता था। नवानगर के शासक को जाम साहब कहा जाता था) को आश्वासन दिया कि वे स्वयं नवाब को भारत में विलय की सलाह देंगे।
शाहनवाज भुट्टो
नवाब के सलाहकार नबी बख्श ने नवाब को साफ-साफ समझाया था कि अगर भारत के साथ विलय नहीं किया गया, तो भारतीय संघ हलचल मचा देगा और नवाब को रोने पर मजबूर कर देगा। इस सलाह के कारण शाहनवाज भुट्टो ने नबी बख्श की संपत्ति जब्त कर ली। उस समय दीवान अब्दुल कादिर ने भी कहा था कि अगर जान बचानी है तो जूनागढ़ का भारत से जुड़ना ही एकमात्र रास्ता है। इसके बाद वो इलाज के लिए अमेरिका चले गए और शाहनवाज जूनागढ़ के दीवान बन गए।
शाहनवाज भुट्टो का रुख बिल्कुल साफ था। वो पाकिस्तान को अपना ‘वतन’ मानते थे। इसकी वजह यह थी कि वे कराची मुस्लिम लीग के नेता थे और पाकिस्तान की माँग भी मुस्लिम लीग ने ही की थी। जब जूनागढ़ को मुस्लिम लीग से जुड़ा दीवान मिला, तो नवाब भी धीरे-धीरे मुस्लिम लीग के असर में आने लगे। यहीं से पाकिस्तान में विलय के बीज बोए गए।
15 अगस्त 1947 – जूनागढ़ के नवाब ने पाकिस्तान में विलय की घोषणा की
लगभग तय हो चुका था कि जूनागढ़ भारत संघ में शामिल होने जा रहा है। इसी सिलसिले में नवाब को विलय समझौते पर दस्तखत करने के लिए भेजा गया था लेकिन 12 अगस्त 1947 तक कोई जवाब नहीं मिला। इसके बाद नवाब और उनके दीवान को टेलीग्राम भेजकर फिर से याद दिलाया गया कि जल्द जवाब भेजें। विलय समझौते पर हस्ताक्षर करने और उसे भेजने की आखिरी तारीख 14 अगस्त 1947 थी। दीवान की ओर से जवाब आया कि मामला अब भी विचाराधीन है। जूनागढ़ की अधिकांश हिंदू आबादी चाहती थी कि उनका राज्य भारत में शामिल हो। इसी बात को लेकर जूनागढ़ के हिंदुओं ने दीवान को एक आवेदन भी दिया।
लेकिन शाहनवाज भुट्टो ने जनता की माँग को पूरी तरह खारिज कर दिया और 15 अगस्त को सीधे ऐलान कर दिया कि ‘जनहित’ में जूनागढ़ राज्य ने पाकिस्तान में शामिल होने का फैसला किया है। काठियावाड़ के बाकी राजाओं ने जूनागढ़ के इस फैसले की कड़ी आलोचना की। जूनागढ़ राज्य की परिषद के एकमात्र हिंदू सदस्य राय बहादुर धरमदास हीरानंदानी ने पाकिस्तान में जाने का विरोध किया था लेकिन नवाब और दीवान के दबाव में उन्हें इस्तीफा देना पड़ा और जूनागढ़ छोड़ना पड़ा। नवाब के अनुभवी राजकुमार, कैप्टन डॉ. प्रेमराय मजमूदार को दिल्ली भेजा गया था। जब वे लौटे और भारत से जुड़ने की सलाह दी, तो उन्हें भी जूनागढ़ से निकाल दिया गया।
जूनागढ़ के हिंदुओं पर अमानवीय अत्याचार- ऑर्डर ऑफ द डे
अगस्त जैसे-जैसे बीतता गया, मुस्लिम लीग ने तांडव मचा दिया। मुस्लिम लीग ने देश के कई हिस्सों में हिंदुओं के साथ बर्बर अत्याचार शुरू कर दिए थे। सिंध और पंजाब में हिंदू महिलाओं के साथ यौन हिंसा जैसी घिनौनी घटनाएँ हो रही थीं और उनकी लाशें फेंक दी जा रही थीं। ये खबरें जूनागढ़ की हिंदू बहुसंख्या आबादी तक पहुँचीं और वे दहशत में आ गए। क्योंकि जूनागढ़ का दीवान भी मुस्लिम लीग का नेता था, इसलिए लोग और भी ज्यादा डरने लगे और एक-एक कर हिंदू जूनागढ़ छोड़ने लगे।
लेकिन जूनागढ़ की इस इस्लामी शासकीय व्यवस्था को यह सब बर्दाश्त नहीं हुआ, उन्होंने जा रहे हिंदुओं पर भी अत्याचार शुरू कर दिए। राज्य पुलिस और जमीयत-उल-मुसलमीन के कार्यकर्ता रेलवे स्टेशन पर तैनात कर दिए गए। उसी दौरान जूनागढ़ में ‘एक्शन काउंसिल’ नाम की एक गुप्त समिति भी बन गई, पूरा माहौल ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ जैसा था। इस ‘एक्शन काउंसिल’ में हर रोज एक ‘ऑर्डर ऑफ द डे’ जारी किया जाता था, जिसमें बताया जाता था कि हिंदुओं को कैसे मारना और प्रताड़ित करना है।
मंगरोल और बाबरियावाड़ ने भारत में विलय की घोषणा की
अब जूनागढ़ का मामला धीरे-धीरे बड़ा विवाद बनता जा रहा था। नवाब ने पाकिस्तान के साथ विलय समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए थे और पाकिस्तान ने भी उस समझौते को स्वीकार कर लिया था। एक तरफ जूनागढ़ की बहुसंख्यक हिंदू आबादी भय और परेशानी में थी, तो दूसरी तरफ भारत की सरकार भी असमंजस में थी। इस पूरे विवाद को सरदार पटेल देख रहे थे। उन्होंने नवाब को समझाने के लिए सचिव वी.पी. मेनन को भेजा लेकिन शाहनवाज भुट्टो ने उन्हें नवाब से मिलने नहीं दिया।
जूनागढ़ से लौटने के बाद मेनन माणावदर गए। माणावदर में हिंदुओं का भारी बहुमत थी। इसके अलावा बाबरियावाड़ और मंगरोल में भी बड़ी संख्या में हिंदू रहते थे। मेनन ने माणावदर के खान को मुलाकात के लिए बुलाया और उन्हें पाकिस्तान में विलय से होने वाले खतरों के बारे में बताया लेकिन माणावदर के खान मानने को तैयार नहीं थे। इसी दौरान मेनन ने राजकोट में मंगरोल के शेख से मुलाकात की और उनसे भारत में शामिल होने पर चर्चा की। जूनागढ़ के नवाब मंगरोल के शेख को अपना जागीरदार मानते थे लेकिन जब मंगरोल को जूनागढ़ से स्वतंत्र राज्य के रूप में मान्यता मिल गई, तो वहाँ के शेख ने भारत के साथ विलय का समझौता कर लिया।
इसी बीच काठियावाड़ के अन्य रियासतों में भी जोश और असंतोष की लहर फैल रही थी। बाबरियावाड़ नाम का इलाका जिसमें कुल 51 गाँव शामिल थे, मूल रूप से गरासिया राजपूतों का था। ब्रिटिश काल में राजनीतिक विभाग ने इसे जूनागढ़ की अधीनता में रख दिया था लेकिन वहाँ के लोग खुद को स्वतंत्र मानते थे। अंग्रेजी शासन समाप्त होने के बाद इन 51 गाँवों वाले बाबरियावाड़ समूह ने भी भारत संघ में शामिल होने का समझौता कर लिया। इस तरह जूनागढ़ के अधीन दो छोटे रियासतें, मंगरोल और बाबरियावाड़ जूनागढ़ से अलग हो गईं।
जूनागढ़ ने इन क्षेत्रों को अपना हिस्सा मानते हुए वहाँ सैनिक टुकड़ियाँ भेज दीं। भारत संघ की सरकार ने जूनागढ़ को संदेश भेजा कि वह मंगरोल और बाबरियावाड़ से अपनी सेना हटा ले लेकिन शाहनवाज भुट्टो ने इस आदेश को मानने से इंकार कर दिया। सरदार पटेल का मत साफ था बाबरियावाड़ में सेना भेजी जानी चाहिए, क्योंकि जूनागढ़ की यह कार्रवाई सीधा हमला थी और इसका जवाब ताकत से ही दिया जा सकता था। सरदार पटेल ने इस बारे में नेहरू को भी जानकारी दी लेकिन नेहरू उस समय पाकिस्तान के साथ बातचीत के जरिए इस मसले को सुलझाने के पक्ष में थे। उन्होंने जूनागढ़ में सेना भेजने से भी मना कर दिया।
इसी बीच जूनागढ़ की स्थिति बिगड़ती जा रही थी। एक लाख से अधिक हिंदू राज्य छोड़कर पलायन कर चुके थे और पूरे काठियावाड़ की शांति व सुरक्षा खतरे में थी। नेहरू अभी भी सेना भेजने पर विचार कर रहे थे जबकि यहाँ हिंदू, इस्लामी सेना के अत्याचारों का शिकार हो रहे थे। भारतीय संघ की सेना ने कोई कार्रवाई नहीं की और अंततः वहाँ ‘अस्थाई सरकार’ की स्थापना की गई।
मुंबई में ‘अस्थाई सरकार’ की स्थापना और उसका जूनागढ़ पर हमला
इसी बीच कैबिनेट के फैसले के अनुसार काठियावाड़ डिफेंस फोर्स तथा नवानगर, भावनगर और पोरबंदर की सेनाएँ पूरे काठियावाड़ क्षेत्र में तैनात कर दी गईं। 25 अगस्त 1947 को राजकोट में जूनागढ़ के मुद्दे पर काठियावाड़ स्टेट काउंसिल की बैठक बुलाई गई, जिसमें एक ‘रक्षा समिति’ (Defence Committee) गठित की गई। इसके बाद 25 सितंबर 1947 को मुंबई के माधवबाग में हुई एक महत्वपूर्ण बैठक में जूनागढ़ राज्य के लोगों ने नवाब की सरकार को उखाड़ फेंकने का निर्णय लिया। इसी बैठक की अगुवाई श्यामलदास गाँधी ने की और उनके नेतृत्व में ‘जूनागढ़ की अस्थाई सरकार’ (Provisional Government of Junagadh) की स्थापना की गई।
जूनागढ़ के पास अपनी एक प्रशिक्षित सेना थी और उसमें पाकिस्तान का भी हाथ था। जैसे ही शाहनवाज भुट्टो को अस्थाई सरकार की खबर मिली, उन्होंने तुरंत पाकिस्तान से सेना भेजने की माँग की लेकिन पाकिस्तान की ओर से कोई जवाब नहीं आया। दरअसल, मोहम्मद अली जिन्ना जानते थे कि पाकिस्तान की सेना कमजोर है और उसका बजट भी बहुत सीमित है। इसके अलावा, पाकिस्तान उस समय कश्मीर में अशांति फैलाने की साजिश भी रच रहा था जिसके लिए उसे अपनी सेना की जरूरत थी।
आरजी सरकार भी अब पूरी तरह सक्रिय हो चुकी थी। आरजी सेना के कमांडर रतुभाई अदाणी ने युवाओं को सैन्य प्रशिक्षण दिया और जूनागढ़ राज्य की सीमाओं पर हमला कर दिया। 30 सितंबर 1947 को आरजी सेना ने जूनागढ़ राज्य की संपत्ति ‘जूनागढ़ हाउस’, जो राजकोट में स्थित एक भव्य हवेली थी, पर कब्जा कर लिया। उसी दिन, यानी दशहरे के दिन, आरजी सेना ने भेसन महल के अंतर्गत आने वाले आमरापर आदि गाँवों पर भी कब्जा जमा लिया।
भारत सेना की एंट्री, मंगरोल और बाबरियावाड़ के प्रशासन पर नियंत्रण
बाद में सरदार पटेल के आदेश पर भारतीय संघ की सेना ने भी ‘जूनागढ़ मिशन’ की ओर कदम बढ़ाया। 22 अक्टूबर को पुलिस बल भेजा गया और माणावदर राज्य का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया गया। 1 नवंबर को भारतीय संघ ने बाबरियावाड़ और मंगरोल के प्रशासन का भी अधिग्रहण कर लिया। इस दौरान काठियावाड़ की अन्य रियासतों ने भी जूनागढ़ का बहिष्कार शुरू कर दिया। पाकिस्तान से सहायता मिलने के बावजूद जूनागढ़ में आर्थिक संकट गहराने लगा। अनाज की कमी हो गई और राज्य की आय भी पूरी तरह रुक गई।
आरजी सेना, भारत की सेना और भावनगर, नवानगर, पोरबंदर जैसी देशी रियासतों की संयुक्त सेनाओं ने जूनागढ़ की घेराबंदी कर दी और एक के बाद एक रियासतों पर कब्ज़ा करना शुरू कर दिया। जूनागढ़ का नवाब भी यह स्थिति देखकर घबरा गया और पीछे हटने के लिए आगे बढ़ा लेकिन शाहनवाज भुट्टो ऐसा नहीं होने देने वाला था।
नवाब कुत्तों के साथ पाकिस्तान भागा
24 अक्टूबर 1947 को जूनागढ़ का नवाब अपने परिवार, कुछ कुत्तों, कुछ बेगमों (ज्यादातर बेगमें पहले ही भाग चुकी थीं) और बहुत-सा सामान लेकर पाकिस्तान भाग गया। जाते समय वह राज्य का सारा धन और जरूरी दस्तावेज भी अपने साथ ले गया। नवाब के भाग जाने के बाद आरजी सरकार का हौसला और बढ़ गया और उसने राज्य के अलग-अलग इलाकों पर कब्जा करना शुरू कर दिया। 2 नवंबर को नवागढ़ पर भी आरजी सरकार का कब्ज़ा हो गया। नवागढ़ एक किलेबंद इलाका था लेकिन आरजी सेना ने वहाँ अपना झंडा फहराया। इस घटना से शाहनवाज भुट्टो गुस्से में आ गया।
भुट्टो ने आरजी सरकार की ताकत का अंदाजा लगाने के लिए अपने निजी लोगों को भेजा और जो रिपोर्ट उसे मिली, उसने खुद भुट्टो को भी डरा दिया। नवागढ़ के बाद आरजी सेना ने कुतियाना पर हमला किया। कुतियाना पंथक के मेर जवान, पोरबंदर और जामनगर के गरासिया दरबार भी आरजी सेना से जा मिले। आरजी सैनिकों ने किले की दीवारें फाँदकर कुतियाना पर कब्ज़ा कर लिया। इस दौरान गुमन सिंह नामक एक वीर सैनिक ने शहादत प्राप्त की।
जूनागढ़ का भारत में विलय
शाहनवाज भुट्टो भारतीय सेना, आरजी सरकार और काठियावाड़ की देशी रियासतों के दबाव को समझ चुका था। नवाब तो पाकिस्तान भाग गया था लेकिन भुट्टो के हाथ में सत्ता आने के बाद पूरे राज्य में डर और अराजकता का माहौल बन गया। भुट्टो ने पाकिस्तान में जिन्ना को एक पत्र भेजा, जिसमें उसने पाकिस्तान में विलय से पैदा हुई भयावह स्थिति का जिक्र किया। इस दौरान नवाब ने टेलीग्राम के जरिए भुट्टो को संदेश भेजा कि अपनी जान बचाने का एकमात्र रास्ता भारत संघ में शामिल होना ही है। इस बार भुट्टो भी नवाब से सहमत हो गया और जूनागढ़ राज्य को भारत संघ में मिलाने के लिए आगे आया।
भुट्टो ने जूनागढ़ राज्य परिषद के वरिष्ठ सदस्य कैप्टन हार्वे जोन्स के माध्यम से श्यामलदास गाँधी से बातचीत शुरू की और उनसे राज्य में कानून-व्यवस्था बनाए रखने का अनुरोध किया। शाहनवाज ने 9 नवंबर 1947 के राजपत्र में नवाब का संदेश प्रकाशित करते हुए एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की और खुद केशोद हवाई अड्डे से पाकिस्तान भाग गया। अब जूनागढ़ में शासन करने वाला कोई नहीं बचा था, केवल आरजी सरकार ही प्रशासन सँभाल रही थी।
उसी दिन शाम 5 बजे ब्रिगेडियर गुरदयाल सिंह के नेतृत्व में भारतीय संयुक्त सेना मजीवाड़ी गेट के पास पहुँची और ऊपरीकोट के ऐतिहासिक किले पर तिरंगा फहराया। उसी दिन क्षेत्रीय आयुक्त नीलम बुच ने जूनागढ़ के राजपत्र में एक घोषणा प्रकाशित की कि 9 नवंबर की शाम 7 बजे से भारतीय संघ जूनागढ़ का प्रशासन अपने हाथ में लेगा। भारत सरकार के नियंत्रण में आने के बाद आरजी सरकार भी भंग कर दी गई।
13 नवंबर को सरदार पटेल स्वयं जूनागढ़ आए और इसके बाद 28 फरवरी 1948 को जनमत संग्रह हुआ (कई जगह इसे 20 फरवरी भी बताया गया है)। इसमें 1,90,870 लोगों ने भारत संघ में शामिल होने के पक्ष में मतदान किया जबकि केवल 91 लोगों ने पाकिस्तान के पक्ष में वोट दिया। इस भारी बहुमत के साथ जूनागढ़ आधिकारिक रूप से भारत में विलय हो गया।
जूनागढ़ में सरदार पटेल
20 जनवरी 1949 को जूनागढ़ को सौराष्ट्र राज्य में मिला दिया गया और बाद में सौराष्ट्र राज्य भी गुजरात राज्य में शामिल हो गया। आज जूनागढ़ गुजरात और भारत का अभिन्न हिस्सा है। हालाँकि, पाकिस्तान आज भी जूनागढ़ पर दावा करता है और अपने नक्शे में उसे दिखाता है लेकिन जमीनी सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है।
जूनागढ़ का विलय लोकतंत्र, जन-इच्छा और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है। सरदार पटेल की दूरदृष्टि, आरजी हुकूमत का साहस, काठियावाड़ की रियासतों का संघर्ष और जनता का विश्वास, इन सबने मिलकर एक रियासत को भारत के मानचित्र पर उसका सही स्थान दिलाया।
सुप्रीम कोर्ट ने 07 नवंबर 2025 को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि वे स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, खेल परिसर, बस अड्डे, रेलवे स्टेशन और सरकारी इमारतों से सभी आवारा कुत्तों को हटाएँ। कोर्ट ने कहा कि इन कुत्तों को ABC नियम 2023 के तहत नसबंदी और टीकाकरण के बाद निर्धारित शेल्टर होम में रखा जाए। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि इन कुत्तों को ‘जहाँ से पकड़ा गया है, उन्हें वहीं वापस नहीं छोड़ा जाएगा।’
यह आदेश सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने दिया, जिसमें जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया शामिल हैं। आदेश में सबसे पहले जिस मुद्दे पर चर्चा हुई वह था अनुपालन हलफनामें, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से दाखिल करने को कहा था लेकिन वे 27 अक्टूबर 2025 तक जमा नहीं कर पाए।
इस पर कोर्ट ने नाराजगी जताई और आदेश दिया कि सभी राज्यों के मुख्य सचिव 03 नवंबर 2025 को अगली सुनवाई में कोर्ट में उपस्थिथ रहने के आदेश दिए। इस आदेश के बाद न सिर्फ हलफनामे दाखिल किए गए बल्कि सभी अधिकारी भी कोर्ट में मौजूद हुए।
एमिकस क्यूरी (Amicus Curiae) गौरव अग्रवाल ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के हलफनामों का सारांश तैयार किया, जिसमें कई राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की रिपोर्ट में गंभीर कमियाँ और गलतियाँ पाई गईं। कोर्ट ने नोटिस किया कि उनके आदेशों का या तो पालन नहीं किया गया या अधूरा किया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि वे गौरव अग्रवाल की रिपोर्ट को ध्यान से पढ़ें और उसमें बताई गई कमियों को दूर करने के लिए जरूरी कदम उठाएँ।
कोर्ट ने यह भी कहा कि सभी राज्य अगली तारीख से पहले विस्तृत हलफनामा दाखिल करें, जिसमें यह बताया जाए कि उन्होंने कोर्ट के आदेशों का पालन करने के लिए क्या-क्या सुधारात्मक कदम उठाए हैं। कोर्ट ने यह भी चेतावनी दी कि अग किसी ने इस मामले में लापरवाही बरती तो उसे गंभीरता से लिया जाएगा।
हाईवे से जानवरों का हटाने का कोर्ट का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दूसरा मुद्दा उन निर्देशों से जुड़ा बताया जो राजस्थान हाई कोर्ट की जोधपुर बेंच ने राज्य सरकार को दिए थे। इन निर्देशों में कहा गया था कि राज्य की सभी सड़कों और हाईवे से पशुओं और मवेशियों को हटाया जाए ताकि उनके कारण होने वाले सड़क हादसों को रोका जा सके। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस तरह के हादसे अब देशभर में बहुत आम हो गए हैं और इनसे कई लोगों की जान जा चुकी है, गंभीर चोटें आई हैं और संपत्ति को भी नुकसान पहुँचा है। कोर्ट ने कहा कि यह स्थिति इस बात का संकेत है कि जन सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालने वाले प्रशासनिक अधिकारी अपना काम सही तरीके से नहीं कर रहे हैं।
कोर्ट ने कहा कि नेशनल हाईवे , नेशनल एक्सप्रेसवे और स्टेट हाईवे पर पशुओं और आवारा जानवरों की अनियंत्रित मौजूदगी बहुत गंभीर खतरा है। खासकर रात के समय या तेज गति वाले क्षेत्रों यह समस्या ज्यादा भयावह हो जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लेख करते हुए कहा कि यह अनुच्छेद जीवन और सुरक्षा का अधिकार सुनिश्चित करता है। इसलिए यह जरूरी है कि नगर निकाय, सड़क एवं परिवहन विभाग, लोक निर्माण विभाग और हाईवे अथॉरिटी जैसी संबंधित एजेंसियाँ तुरंत मिलकर कार्रवाई करें।
इसी के तहत सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाई कोर्ट के निर्देशों की पुष्टि की और उन्हें पूरे देश में लागू करने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि अब ये निर्देश सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के नगर निगमों, सड़क और परिवहन विभागों, लोक निर्माण विभागों और नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) पर भी लागू होंगे।
फोटो साभार: सुप्रीम कोर्ट
कोर्ट ने विशेष तौर पर कहा कि जानवरों को हाईवे से हटाने के लिए मवेशियों को गौशाला में, कुत्ते या अन्य जानवर को शेल्टर में ट्रांसफर किया जाए। इसके साथ ही जानवरों को जरूरत की अनुसार खाना, पानी और इलाज प्रदान किया जाए, जैसा कि PCA एक्ट 1960 और ABC नियम 2023 के प्रावधानों में शामिल है।
सड़क पर घूमने वाले पशुओं और मवेशियों से होने वाली परेशानियों को रोकने के लिए अब 24 घंटे और 7 दिन काम करने वाली खास टीमें बनाई जाएँगी। ये टीमें लगातार निगरानी रखेंगी और जैसे ही किसी सड़क पर आवारा जानवरों की सूचना मिलेगी या किसी दुर्घटना की खबर आएगी, तुरंत कार्रवाई करेंगी। सभी नेशनल हाईवे, नेशनल एक्सप्रेसवे और स्टेट हाईवे पर पुलिस, NHAI और जिला प्रशासन के कंट्रोल रूम से जुड़े हेल्पलाइन नंबर नियमित दूरी पर लगाए जाएँगे ताकि यात्री सड़क पर आवारा जानवर दिखने या जानवरों की वजह से हुई दुर्घटनाओं की तुरंत शिकायत कर सकें।
कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों, NHAI के चेयरपर्सन और सड़क परिवहन व हाईवे मंत्रालय को निर्देश दिया है कि वे इस आदेश की तारीख से 8 हफ्तों के भीतर एक रिपोर्ट दाखिल करें। इस रिपोर्ट में यह रिपोर्ट सड़कों से आवारा जानवरों को हटाने और उन्हें आश्रय देने की क्या व्यवस्था की गई है, गश्ती दल कैसे और कब काम कर रहे हैं और हेल्पलाइन नंबरों व संकेत बोर्डों की क्या स्थिति है।
स्कूल-कॉलेज जैसे संस्थान परिसरों से आवारा कुत्तों को हटाएँ
सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का तीसरा और सबसे अहम हिस्सा कुत्तों को शिक्षण संस्थानों, अस्पतालों, खेल परिसरों, बस अड्डों, डिपो और रेलवे स्टेशनों से हटाने से जुड़ा था। कोर्ट ने कहा कि इन जगहों पर कुत्तों के काटने की घटनाओं में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। कोर्ट ने कहा, “स्कूलों, अस्पतालों और खेल स्थलों जैसे संस्थानों में ऐसी घटनाओं का बार-बार होना प्रशासन की लापरवाही और इन जगहों को खतरों से सुरक्षित रखने में पूरी व्यवस्था की नाकामी को दर्शाता है। इस स्थिति में न्यायिक दखल जरूरी है ताकि नागरिकों खासकर बच्चों, मरीजों और खिलाड़ियों के जीवन और सुरक्षा के मौलिक अधिकार की रक्षा की जा सके। जैसा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में दिया गया है।”
कोर्ट ने यह भी बताया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (NCDC) जैसी संस्थाओं द्वारा किए गए वैज्ञानिक अध्ययनों में पाया गया है कि भारत में हर साल जानवरों से जुड़ी मौतों का बड़ा हिस्सा रेबीज की वजह से होता है और इनमें से 90 प्रतिशत से अधिक मामले पालतू या आवारा कुत्तों के काटने से होते हैं।
कोर्ट ने कहा, “इस समस्या का सबसे अधिक असर बच्चों, बुज़ुर्गों और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों पर पड़ता है, जो पहले से ही असुरक्षित होते हैं और जिनके पास समय पर इलाज या टीके की सुविधा नहीं होती है।” इन समस्याओं के बारे में ऑपइंडिया ने भी आवारा कुत्तों पर लिखे आर्टिकल में लगातार जागरूक करने की कोशिश की है।
कोर्ट ने आगे कहा कि भले ही साल 2023 के ABC नियमों के तहत कुत्तों की आबादी पर नियंत्रण के लिए ‘पकड़ो-नसबंदी करो-टीका लगाओ छोड़ दो’ यानी CSVR मॉडल लागू किया गया है, लेकिन इसका सही तरह से अमल नहीं हो पा रहा है। नतीजा यह है कि आवारा कुत्तों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है और इससे ‘देश के कई हिस्सों में लोगों की सुरक्षा पर खतरा बना हुआ है।’
फोटो साभार: सुप्रीम कोर्ट
कोर्ट ने कई ऐसी घटनाओं का जिक्र किया जो मेनस्ट्रीम मीडिया में सामने आई थीं। इनमें वेल्स (Wales) देश के एक कारोबारी का मामला शामिल है, जिन्हें सुबह दौड़ते समय एक आवारा कुत्ते ने काट लिया था। केरल के वायनाड जिले के पनामारम इलाके में एक तीसरी कक्षा के छात्र को क्लासरूम के अंदर ही कुत्ते ने काट लिया। वहीं हरियाणा के हिसार जिले के सिसवाल गाँव के एक सरकारी प्राथमिक स्कूल में घुसे एक आवारा कुत्ते ने 6 बच्चों को काट लिया।
दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में 2025 की वर्ल्ड पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप के दौरान दो विदेशी कोचों को भी आवारा कुत्तों ने काट लिया। केरल के कन्नूर रेलवे स्टेशन पर 18 लोगों को, महाराष्ट्र के डोंबिवली रेलवे स्टेशन पर RPF अधिकारी समेत 9 लोगों को और केरल के अलप्पुझा रेलवे स्टेशन पर छह महीनों में 30 लोगों को आवारा कुत्तों ने काट लिया। उत्तर प्रदेश के संभल रेलवे स्टेशन पर 8 लोगों को एक रेबीज से ग्रस्त कुत्ते ने काटा। इसके अलावा केरल के कन्नूर बस स्टैंड पर 50 लोगों और कोट्टायम के KSRTC बस स्टैंड पर भी कई लोगों को आवारा कुत्तों ने काटा।
कोर्ट ने कहा कि आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या के पीछे कई वजहें हैं, इनमें नसबंदी कार्यक्रमों का ठीक से लागू न होना, खाने के कचरे का गलत तरीके से निपटान, संस्थानों के चारों ओर सुरक्षा घेराबंदी की कमी, विभागों के बीच तालमेल का न होना और लोगों में यह जागरूकता न होना कि कुत्ते के काटने से कैसे बचें और काटने के बाद क्या इलाज करें। इन सब कारणों से ही आवारा कुत्तों की समस्या लगातार बढ़ती जा रही है।
कोर्ट ने कहा कि ABC नियमों, नगर निगम के उपनियमों, दिशा-निर्देशों और मानक संचालन प्रक्रियाओं (SOPs) के बावजूद जमीनी स्तर पर इनके नतीजे संतोषजनक नहीं रहे हैं। कोर्ट ने यह भी बताया कि हर साल कुत्तों के काटने के मामलों का आँकड़ा बढ़ता जा रहा है। कोर्ट ने कहा, “यह समस्या लगातार बनी हुई है, इसलिए जरूरत है कि नगर निगमों, सार्वजनिक स्वास्थ्य विभागों और संस्थानों के प्रशासन के बीच मिलकर एक समग्र और समन्वित योजना बनाई जाए ताकि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार की रक्षा प्रशासन की लापरवाही या अक्षमता के कारण प्रभावित न हो।”
फोटो साभार: सुप्रीम कोर्ट
कोर्ट ने राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को दो हफ्तों का समय दिया है ताकि वे सभी सरकारी और निजी शैक्षणिक संस्थानों, अस्पतालों, खेल परिसरों, बस अड्डों, डिपो और रेलवे स्टेशनों की पहचान कर सकें। इन संस्थानों के प्रशासनिक प्रमुखों को जिला मजिस्ट्रेट की निगरानी में स्थानीय या नगर निकाय अधिकारियों के साथ मिलकर इन जगहों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं। इसके लिए बाड़, दीवारें, गेट और अन्य संरचनात्मक या प्रशासनिक उपाय अपनाए जाएँ ताकि आवारा कुत्ते अंदर न आ सकें। यह पूरी प्रक्रिया जल्द से जल्द और संभव हो तो 8 हफ्तों के भीतर पूरी की जानी चाहिए।
इसके अलावा सभी शैक्षणिक संस्थानों, अस्पतालों, खेल परिसरों, बस अड्डों, डिपो और रेलवे स्टेशनों के प्रबंधन को एक नोडल अधिकारी नियुक्त करने के निर्देश दिए गए हैं, जो परिसर की साफ-सफाई और रखरखाव का जिम्मेदार होगा और यह सुनिश्चित करेगा कि आवारा कुत्ते परिसर में प्रवेश न करें या वहाँ न रहें। इस अधिकारी का नाम और विवरण एंट्री गेट पर स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया जाना चाहिए।
हर तीन महीने में स्थानीय नगर निकाय और पंचायतों को ऐसे सभी परिसरों का निरीक्षण करना होगा ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वहाँ कोई आवारा कुत्ता नहीं है। कोर्ट ने कहा, “अगर इस संबंध में कोई लापरवाही पाई गई तो इसे गंभीरता से लिया जाएगा और जिम्मेदारी संबंधित नगर निकाय अधिकारियों या प्रशासनिक अधिकारियों पर तय की जाएगी।” कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि नगर निकाय की जिम्मेदारी है कि ऐसे सभी परिसरों में पाए जाने वाले आवारा कुत्तों को हटाकर उन्हें नसबंदी और टीकाकरण के बाद ABC नियम 2023 के अनुसार निर्धारित आश्रय स्थल पर भेजा जाए।
कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि पकड़े गए कुत्तों को उसी जगह वापस नहीं छोड़ा जाएगा, जहाँ से उन्हें पकड़ा गया था। कोर्ट ने कहा, “ऐसे आवारा कुत्तों को दोबारा उसी स्थान पर छोड़ना हमारी इस कार्रवाई के उद्देश्य को निष्फल कर देगा, जिसका मकसद इन संस्थागत परिसरों को आवारा कुत्तों की उपस्थिति से पूरी तरह मुक्त कराना है।”
फोटो साभार: सुप्रीम कोर्ट
इसके अलावा स्टेडियमों और खेल परिसरों के प्रबंधन को यह सुनिश्चित करने के लिए सुरक्षा कर्मी या ग्राउंड स्टाफ तैनात करने के निर्देश दिए गए हैं कि परिसर में कोई भी आवारा कुत्ता न हो। भारतीय पशु कल्याण बोर्ड को चार हफ्तों के भीतर एक विस्तृत मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) जारी करने के आदेश दिए गए हैं, जिसमें कुत्तों के काटने की घटनाओं की रोकथाम और संस्थागत परिसरों में आवारा कुत्तों के प्रबंधन के तरीके बताए जाएँ।
उल्लेखनीय है कि जब कोर्ट ने 07 नवंबर 2025 को यह आदेश सुनाया तब सुनवाई के दौरान कुछ NGO और खुद को ‘कुत्ता प्रेमी’ बताने वाले लोगों के वकीलों ने यह दलील दी कि अगर संस्थानों से कुत्तों को हटाया गया तो वहाँ खाली जगह बन जाएगी, जिससे नए कुत्ते वहाँ आने लगेंगे। लेकिन कोर्ट ने इस दलील पर ध्यान देने से साफ इनकार कर दिया।
J Mehta: Third directions relates to institutional areas…having regard to rising incidents of dog bites, this Court deems necessary to direct:
State govts/UTs within 2 weeks identify all govt institutions, including district hospitals, public sport complexes, railway…
इस आदेश के साथ कोर्ट ने मानव जीवन और सुरक्षा को प्राथमिकता देने की दिशा में एक बड़ा और निर्णायक कदम उठाया है। यह एक महत्वपूर्ण शुरुआत है लेकिन कोर्ट को अब इस बढ़ती हुई समस्या पर भी ध्यान देना होगा कि बंद सोसाइटियों, पार्कों और रिहायशी इलाकों में भी आवारा कुत्तों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, जहाँ बच्चे, बुज़ुर्ग और कमजोर लोग लगभग रोज हमलों का सामना कर रहे हैं।
इस आदेश को लेकर पशु कल्याण समूहों और खुद को ‘कुत्ता प्रेमी’ कहने वाले लोगों में चिंता देखी जा रही है। कुछ लोग 7 नवंबर 2025 के इस आदेश के खिलाफ अपील करने की तैयारी में हैं। उनका कहना है कि यह आदेश कुत्तों और दूसरे जानवरों जैसे मवेशियों के प्रति कठोर है क्योंकि अदालत ने उन्हें भी सड़कों और हाईवे से हटाने के निर्देश दिए हैं। आखिर में अब यह कोर्ट पर निर्भर करेगा कि वह जानवरों के प्रति करुणा और इंसानों के जीवन की सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे बनाती है।
ऑपइंडिया आवारा कुत्तों की समस्या पर एक विशेष शृंखला चला रहा है, जिसे आप इस लिंक पर क्लिक कर देख सकते हैं।
(यह खबर मूलरूप से अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)
बिहार चुनाव में पीएम मोदी के उठाए मु्द्दों ने चुनाव की दशा और दिशा को बदलने का काम किया। 24 अक्टूबर को जननायक कर्पूरी ठाकुर के गाँव में उनके परिवार से मिलकर चुनावी रैलियों की शुरुआत की। इस दौरान महिलाओं को खास तौर पर उन्होंने अपील की, सामाजिक कल्याण के लिए चलाई जा रही फ्रीबीज योजनाओं को दोहराया।
विकास की रफ्तार को हवा दे रही सड़कों की खासतौर पर चर्चा की गई, जो विगत वर्षों में काफी अच्छी हो गई है। यानी लालू- राबड़ी राज की नाकामियाँ, यूपीए सरकार के घोटाले और डबल इंजन सरकार की उपलब्धियों को गिना कर पीएम मोदी ने जनता का दिल जीतने की कोशिश की।
पीएम श्री @narendramodi ने आज बिहार के समस्तीपुर स्थित कर्पूरी ग्राम में जननायक 'भारत रत्न' स्वर्गीय कर्पूरी ठाकुर जी को श्रद्धांजलि अर्पित की। pic.twitter.com/bthGwhrktJ
पीएम मोदी ने बिहार में 14 रैलियाँ की और 7 बार दौरा किया। इस दौरान बेगूसराय, मुजफ्फरपुर, सहरसा, छपरा, कटिहार, आरा, नवादा, भागलपुर, अररिया, औरंगाबाद, भभुआ के बाद सीतामढ़ी और बेतिया गए। जबकि 2020 से पीएम मोदी 4 बार दौरा किया था और 12 सभाएँ की थी। पीएम मोदी ने लगभग हर दिन दो सभाओं को इस बार संबोधित किया।
महिलाएँ के हाथों में सत्ता की चाबी
पहले फेज के चुनाव में करीब 65 फीसदी वोटिंग हुई, लेकिन महिलाओं ने पुरुषों के मुकाबले 8 फीसदी ज्यादा वोटिंग किया। माना जा रहा है कि महिलाओं का वोटिंग में बढ़चढ़कर हिस्सा लेना, महिला कल्याण के लिए उठाए गए कदमों की वजह से है। खास कर हाल ही में महिलाओं के खातों में आए 10000 रुपए ने उन्हें ताकत दी है। बिजनेस के क्षेत्र में आगे बढ़ने पर 2 लाख तक का लोन देने का वादा भी महिलाओं को लुभा रहा है।
महिलाओं को मुफ्त राशन, स्कूलों में लड़कियों को मिल रही साइकिल समेत तमाम जेनरेशनल योजनाओं से हो रहे लाभों की ओर झुकाव देखा गया। इसलिए माना जा रहा है कि महिलाओं का रुझान एनडीए की ओर रहा है और इनलोगों ने बढ़चढ़ कर वोट किया।
अब सवाल ये उठता है कि क्या महिलाओं का वोट ही सरकार बनाने में निर्णायक साबित होगा? दरअसल 2005 में सत्ता में आए नीतीश कुमार ने महिलाओं को तरजीह दी और उनके लिए कई योजनाएँ शुरू की। यही वजह है कि महिलाएँ उन्हें ज्यादा संख्या में वोट देती आ रही हैं।
दूसरी बात ये भी है कि बिहार की महिलाएँ दूसरे राज्यों से ज्यादा राजनीतिक रूप से जागरूक मानी जाती है। 10 हजार रुपए खाते में आने के बाद तो उनमें ज्यादा उत्साह देखा गया।
बिहार चुनाव के बाद एनडीए सरकार अगर फिर से सत्तासीन होती है, तो इतना तो तय है कि इसका श्रेय महिलाओं को जाएगा। इससे महिलाओं को वोट बैंक के रूप में देखने का ट्रेंड देशभर में स्थापित हो सकता है।
छठ मैया के अपमान का मुद्दा
बिहार के सबसे बड़े पर्व ‘छठ के अपमान’ का मुद्दा भी पीएम मोदी ने उठाया। दरअसल ये पर्व ज्यादातर महिलाएँ करती हैं और इससे पूरे बिहार की आस्था जुड़ी हुई है। इसलिए पीएम मोदी ने लोगों को याद दिलाया कि कैसे महागठबंधन ने छठ का अपमान किया है और अपने प्रचार में धमकी भरे लहजे का इस्तेमाल करके वो साफ बता रहे हैं कि वो बिहार को क्या देने वाले हैं।
लालू-राबड़ी का ‘जंगलराज’ बना मुद्दा
2005 से पहले जिन लोगों ने लालू यादव और राबड़ी देवी के 15 साल का जंगलराज देखा है, वे लोग आज भी उस वक्त की अराजकता और खस्ता कानून व्यवस्था की चर्चा करते हैं। उन्होंने ये भी देखा है कि नीतीश सरकार के शासन काल में कैसे बिहार में कानून व्यवस्था बहाल करने की कोशिश की गई।
संगठित माफिया और राजनीति गठजोड़ पर वार करते हुए पीएम मोदी ने भी अपनी रैली में लोगों को लालू-राबड़ी के ‘जंगलराज‘ की याद दिलाया। माफिया शहाबुद्दीन के बेटे ओसामा को सीवान से टिकट दिए जाने के बाद एनडीए ने जमकर पुराने दिनों की याद ताजा की। यहाँ तक कि नई पीढ़ी को भी पुरानी पीढ़ी से पूछने के लिए उस वक्त क्या-क्या होता था? कुल मिलाकर ‘जंगलराज’ की याद बिहारवासियों को दिलाने में एनडीए सफल रहा।
पहले चरण की वोटिंग के बाद पीएम मोदी ने सीतामढ़ी की सभा में 8 नवंबर 2025 को रैली की। उन्होंने जनता का मतदान में बढ़चढ़कर हिस्सा लेने के लिए आभार जताया। इस दौरान उन्होंने कहा कि “जंगलराज वालों को 65 वोल्ट का झटका लगा है।”
पीएम मोदी ने जंगलराज शब्द को परिभाषित करते हुए कहा, “जंगलराज का मतलब है कट्टा, क्रूरता, कटुता, कु:संस्कार और करप्शन।” उन्होंने साफ कहा कि बिहार को ऐसे कुशासन से मुक्ति चाहिए।
सुशासन का सबसे अधिक फायदा हमारी माताओं-बहनों और बेटियों को होता है। बिहार में आज इसके एक नहीं, अनेक उदाहरण हैं… pic.twitter.com/sAMsPXcdYG
पीएम मोदी और सीएम नीतीश दोनों पर परिवारवाद और भ्रष्टाचार के मामले में बेदाग रहे हैं। ऐसे में दोनों नेताओं ने इस मुद्दे पर विपक्ष को जमकर घेरा। कॉन्ग्रेस के स्टार प्रचारक राहुल गाँधी और आरजेडी के स्टार प्रचार और सीएम पद का चेहरा तेजस्वी यादव पर पीएम मोदी ने अपनी ज्यादातर रैलियों में परिवारवाद और भ्रष्टाचार के आरोप लगाए।
उन्होंने कहा, “ये सिर्फ दो परिवारों के ही इर्द-गिर्द सिमटी हुई पार्टियाँ हैं। एक बिहार का सबसे भ्रष्ट परिवार और दूसरा देश का सबसे भ्रष्ट परिवार।” उन्होंने कहा कि “चारा खाने वाले सोचते हैं कि बिहार को चरा जाएँगे, जमीन लेकर नौकरी देने वाले गरीबों को फिर बेवकूफ बनाएँगे। लेकिन अब बिहार की जनता सबको समझ गई है”
बिहार में छोटे किसानों की संख्या ज्यादा है। इसलिए पीएम मोदी ने उनके हितों की बात की पीएम ने कहा, बिहार के किसानों को अब तक करीब 30,000 करोड़ रुपये मिल चुके हैं….ये सारा पैसा बिना तट कमीशन के किसानों के खाते में जमा हुआ है।
अगर यही जंगलराज वाले होते तो और उनके साथी कॉन्ग्रेस वाले होते तो आपके हक का ये सारा पैसा लूटकर वो अपनी तिजोरी भर लेते। ये मैं नहीं कह रहा हूं बल्कि कॉन्ग्रेस के एक पीएम ने कहा था कि दिल्ली से 1 रुपया निकलता है तो गांव तक पहुँचते-पहुँचते ये 15 पैसा हो जाता है।”
इस दौरान पीएम मोदी मुफ्त अनाज, पक्के मकान, शौचालय से लेकर अपनी सरकार की सभी योजनाओं से गरीबों को होने वाले फायदे को गिनाना नहीं भूलते थे।
राष्ट्रवाद और घुसपैठिए का मुद्दा
‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान राहुल गाँधी द्वारा पूछे गए सेना के शॉर्य पर सवाल को पीएम मोदी जनता के बीच ले गए। उन्होंने कहा, “आतंकवादियों को ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान पाकिस्तान में घुसकर तबाह किया गया। सेना की ये कॉन्ग्रेस-RJD को पसंद नहीं आई, धमाके पाकिस्तान में हो रहे थे और नींद कॉन्ग्रेस के शाही परिवार की उड़ी हुई थी।”
उन्होंने कहा कि आज तक पाकिस्तान और कॉन्ग्रेस के नामदार दोनों ही ऑपरेशन सिंदूर के सदमे से बाहर नहीं निकल पाए। उन्होंने विपक्षी गठबंधन पर घुसपैठियों के प्रति नरम रुख रखने का आरोप लगाया और ‘घुसपैठिया मुक्त भारत’ बनाने का वादा किया
चुनाव बाद एक-दूसरे का माथा नोचेंगे महागठबंधन के घटक- पीएम मोदी
महागठबंधन में सीट शेयरिंग पर पूरी तरह बात नहीं बनने, राहुल गाँधी की बिहार यात्रा में तेजस्वी को सीएम चेहरा नहीं घोषित करने और बाद में दबाव के बीच सीएम पद का चेहरा तेजस्वी यादव को बनाए जाने पर पीएम मोदी ने जमकर चुटकी ली।
प्रधानमंत्री ने कहा, “कॉन्ग्रेस ने जंगलराज के युवराज को पैदल तो किया ही, सीएम पद के नाम पर कॉन्ग्रेस ने हामी तक नहीं भरी। इसके बाद आरजेडी ने भी कॉन्ग्रेस को सबक सिखाने की ठानी और बिहार कॉन्ग्रेस अध्यक्ष के खिलाफ ही अपना उम्मीदवार उतार दिया। ये दोनों दल एक-दूसरे के बाल नोचने में लगे हैं और तो खबर ये है कि हर बूथ पर कॉन्ग्रेस के लोगों ने आरजेडी को हराने की ठान ली है।”
ऐन चुनाव के वक्त बिहार छोड़ भाग गए थे राहुल गाँधी
राहलु गाँधी ने बिहार में चुनाव प्रचार तो पूरे जोश से शुरू की थी। राज्य में न्याय यात्रा भी निकाली और जनता से जुड़ने की कोशिश की। लेकिन जल्दी ही शांत हो गए। यहाँ तक कि जब चुनाव प्रचार पूरे शबाब पर था, तब राहुल गाँधी 57 दिनों तक बिहार से ‘गायब’ रहे। इस दौरान विदेश यात्रा से लेकर यूपी हरियाणा में समर्थकों के बीच जाने और दिल्ली में इमरती छानने तक की तस्वीरें आईं।
उन्होंने एसआईआर का विरोध किया और वोट चोरी के आरोप लगाए, लेकिन जनता को ये बताने में नाकाम रहे कि एसआईआर से जनता के ‘वोट कट’ गए। बिहार चुनाव के दौर में उन्होंने हरियाणा विधानसभा चुनाव के वक्त ‘वोट चोरी’ हुई थी, इसे साबित करने के लिए फर्जी फोटो का इस्तेमाल किया। यहाँ तक कि ब्राजीलियन मॉडल का वह फोटो वायरल हो गया, जिसे राहुल गाँधी ने हरियाणा का मतदाता बताया था। ये सारे फर्जीवाड़े वाले आरोप जनता को आकर्षित करने में नाकाम रहे।
नीतीश सरकार के प्रति गुस्सा नहीं दिखा
नीतीश कुमार के 20 साल के शासनकाल के बावजूद लोगों में उनके प्रति गुस्सा देखा नहीं गया, जो आम तौर पर लंबे वक्त तक सत्ता में रहने के बाद नेताओं के प्रति जनता का होता है। हालाँकि रोजगार के मुद्दे पर लोगों में नाराजगी दिखी। इसको भाँपते हुए एनडीए ने अपने संकल्प पत्र में बिहार में 1 करोड़ रोजगार देने का वादा किया था।
इसे पीएम मोदी ने भी अपनी रैली में दोहराया। यहाँ तक कि पलायन का मुद्दा भी बिहारवासियों के लिए अहम रहा है। इसको देखते हुए पीएम मोदी ने शिक्षा, कौशल विकास से लेकर ‘बिहार में ही काम करेगा, बिहार का ही नाम करेगा’ जैसे नारे देकर जनतो विश्वास दिलाया कि सरकार इन मुद्दों पर गंभीर है।
पाकिस्तानी फौज के हाथों में देश की कमान सौंपने के लिए शहबाज शरीफ सरकार सीनेट में लड़ाई लड़ रही है। दरअसल, सरकार संविधान में 27वाँ विधेयक को संशोधित करने की तैयारी में है। शनिवार (09 नवंबर 2025) को ही पाकिस्तान के सीनेट में 27वाँ संवैधानिक संशोधन विधेयक, 2025 पेश किया गया। इसके तहत पाकिस्तानी फौज में चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेस (CDF) पद बनाया जाएगा, जिसकी जिम्मेदारी फील्ड मार्शल असीम मुनीर को मिलेगी।
संशोधित बिल में पाकिस्तान की फौज, नेवी और एयरफोर्स को सीधे असीम मुनीर के ही आदेश पर चलने का अधिकार देता है। पूरे पाकिस्तान के सैन्य बलों में CDF को सर्वोच्च माना जाएगा। इससे असीम मुनीर की शक्तियाँ भी बढ़ जाएँगी। फिर यही असीम मुनीर पाकिस्तान में खुलेआम आतंकवाद को पनाह देगा, जो फील्ड मार्शल की तारीफ करते नहीं थकते हैं। ये पद भारत की नकल कर लाया गया है, जैसा यहाँ थलसेना का प्रमुख CDS होता है।
संशोधन विधेयक को लेकर जहाँ पाकिस्तानी सरकार का कहना है कि संशोधन से देश के प्रशासन और न्यायपालिका में संरचनात्मक सुधार लाएगा, वहीं विपक्ष और कानूनी विशेषज्ञों का आरोप है कि इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता, प्रांतीय स्वायत्तता और नागरिक शासन की शक्ति कमजोर होगी।
क्या है 27वाँ संवैधानिक संशोधन?
सीनेट में पेश किया गया 27वाँ संवैधानिक संशोधन विधेयक पाकिस्तान के संविधान में कई अहम बदलाव लाने की कोशिश है। प्रस्ताव में प्रमुख तौर पर संविधान के 5 अनुच्छेदों के संशोधन की बात कही गई है, इनमें अनुच्छेद 160 (3a), 213, 243, 191a और 200 में परिवर्तन शामिल हैं। पाकिस्तान सरकार का कहना है कि इससे देश की वित्तीय व्यवस्था, न्यायिक शक्तियों और प्रमुख अधिकारियों की नियुक्ति में बड़े बदलाव किए जाएँगे।
सरकार ने जो संशोधन ड्राफ्ट प्रस्तावित किया है, उसके अनुसार अनुच्छेद 160 (3a) में संघीय राजस्व में प्रांतो की हिस्सेदारी की सुरक्षा की संवैधानिक गारंटी वापस ली जा सकती है। इससे केंद्र को वित्तीय नियंत्रण (fiscal control) बढ़ेगा और प्रान्तों की स्वायत्तता (provincial autonomy) कम हो सकती है।
आर्टिकल 191a में न्यायिक पुनर्संरचना (judicial restructuring) के बदलाव का प्रस्ताव है। इसमें नया ‘संवैधानिक न्यायालय’ (Constitutional Court) बनाने की बात कही गई है, जिसमें केवल संविधान संबंधित मुद्दों की पैरवी की जाएगी। ये प्रस्ताव न्यायालयों का ढाँचा बदलेगा, खासकर पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट पर बोझ कम करेगा। यानि यह ‘संवैधानिक कोर्ट’ पाकिस्तान का सर्वोच्च न्यायालय कहलाएगा।
पाकिस्तान में चुनाव और न्यायपालिका कार्यों में बदलाव
संशोधन पाकिस्तान में चुनाव और न्यायपालिका पर भी असर डालता है। विधेयक के संशोधन में आर्टिकल 213 के तहत निर्वाचन चुनाव आयुक्त (Chief Election Commissioner) की नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव का सुझाव दिया गया है। इससे चुनावी संस्थाओं की संयोजना (structure) बदल सकती है, जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है।
वहीं अनुच्छेद 200 में उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के स्थानांतरण (transfer) संबंधित जुड़े प्रावधानों में बदलाव प्रस्तावित किए गए हैं। इससे न्यायपालिका पर सरकार का नियंत्रण होगा। लेकिन सरकार का कहना है कि संशोधन से न्यायाधीशों की स्वतंत्रता, उनके स्थानांतरण की प्रक्रिया आदि पर प्रभाव पड़ सकता है, जिससे न्यायपालिका के स्वायत्तता का प्रश्न उठता है।
27वाँ संशोधन में पाकिस्तानी फौज के लिए बड़ा बदलाव
इस संशोधन का सबसे अहम अनुच्छेद 243 है, जिस पर बहस छिड़ी हुई है। इस अनुच्छेद में प्रस्तावित संशोधन में पाकिस्तान की सैन्य सेवाओं में शीर्ष समन्वय कार्यालय ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी (CJCSC) के अध्यक्ष पद को 27 नवंबर 2025 को समाप्त कर देता है। इसी दिन वर्तमान CJCSC जनरल साहिर शमशाद मिर्जा का कार्यकाल समाप्त हो रहा है।
सीनेट में संशोधित बिल पेश करने वाली पाकिस्तान की सरकार में कानून मंत्री आजम नजीर तरार ने बताया कि अब CJCSC पद पर कोई नई नियुक्ति नहीं की जाएगी क्योंकि फील्ड मार्शल असीम मुनीर सभी सुरक्षाबलों के प्रमुख के रूप में कार्यभार संभालेंगे, जो देश के पहले CDF बनेंगे। ये पद तीनों डिफेंस फोर्सेस को कमांड करेगा।
संशोधन के तहत, पाकिस्तान के राष्ट्रपति देश की आर्मी, नेवी और एयर फोर्स के चीफ प्रधानमंत्री की सलाह से ही नियुक्त कर सकेंगे, लेकिन संवैधानिक तौर पर CDF ही तीनों डिफेंस फोर्सेस का प्रमुख माना जाएगा।
न्यूक्लियर मिशन में CDF की भूमिका
सेना का नया कमांडर CDF की भूमिका पाकिस्तान के न्यूक्लियर मिशन में भी अहम होगी। कमांडर ही पाकिस्तान न्यूक्लियर और रणनीतिक श्त्रागार की देखरेख करेगा। Dawn की रिपोर्ट के अनुसार, कमांडर एक आर्मी ऑफिसर ही होना चाहिए, जिसे CDF की कहने पर प्रधानमंत्री ने नियुक्त किया हो।
इसके अलावा यह संशोधित विधेयक पाकिस्तानी फौज में फाइव-स्टार रैंक वाले ऑफिसर को विशेष अधिकार भी प्रस्तावित करता है, इनमें फील्ड मार्शल, मार्शल ऑफ एयर फोर्स और फ्लेट के एडमिरल शामिल हैं।
पाकिस्तानी फौज पर मेहरबान शहबाज शरीफ सरकार
इसके अलावा पाकिस्तान की फौजपरस्त सरकार का यह संशोधित विधेयक पाकिस्तानी फौज में फाइव-स्टार रैंक वाले ऑफिसर को विशेष अधिकार भी प्रस्तावित करता है, इनमें फील्ड मार्शल, मार्शल ऑफ एयर फोर्स और फ्लेट के एडमिरल शामिल हैं।
इन आर्मी ऑफिसर का जीवनभर के लिए वर्दी, रैंक और औदा बना रहेगा। रिटायरमेंट के बाद भी सरकार इन्हें अलग जिम्मेदारी प्रधान करेगी। ये ऑफिसर राष्ट्रपति के समान संवैधानिक छूट का आनंद ले सकते हैं। सबसे अहम संशोधन है कि इन्हें केवल संसद में महाभियोग प्रस्ताव पेश कर ही पद से हटाया जा सकता है।
27वें संवैधानिक संशोधन विधेयक पर पाकिस्तान में राजनीतिक बवाल
पाकिस्तान की शहबाज शऱीफ द्वारा सीनेट में पेश किए गए इस 27वें संवैधानिक संशोधन विधेयक पर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। पाकिस्तान में विपक्षी पार्टियाँ बिलावल भुट्टो जरदारी की PPP, इमरान खान की PT और जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम इसे ‘लोकतंत्र की कब्र’ बता रही हैं। उनका आरोप है कि यह संशोधन सेना और केंद्र सरकार की असीमित शक्तियाँ देने के लिए लाया गया है।
वहीं कई बार एसोसिएशनों ने इसे न्यायपालिका के खिलाफ साजिश करार दिया है। पाकिस्तान के कानूनी विश्लेषक अली दयाल ने कहा, “इस संशोधन के बाद पाकिस्तान दो हिस्सों में बंठ जाएँगा। एक संवैधानिक अदालत के हाथ में संविधान होगा और दूसरे के पास राजनीतिक सत्ता।”
पाकिस्तानी सीनेट में 27वाँ संशोधन विधेयक मंजूर होने में मुश्किल
पाकिस्तान की शहबाज शरीफ सरकार कैबिनेट की मंजूरी से संसद में 27वाँ संवैधानिक संशोधन विधेयक ले तो आई लेकिन विधेयक को कानून बनाने में मुश्किल झेल रही है। दरअसल, शहबाज शरीफ सरकार को पाकिस्तानी संसद की निचली सदन में बहुमत है लेकिन ऊपरी सदन में सीनेट में विधेयक को मंजूरी के लिए विपक्ष की सहायता की जरूरत है।
इस बीच शहबाज शरीफ सरकार PPP को मनाने में लगी हुई है। PPP के अध्यक्ष बिलावल भुट्टो जरदारी ने खुलासा किया कि खुद प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ समेत PML-N के नेता ने संवैधानिक रिफॉर्म को सपोर्ट करने के लिए PPP से गुजारिश की है।
हालाँकि, सीनेट में पेश किए जाने के बाद विधेयक को पाकिस्तान की राष्ट्रीय असेंबली और सीनेट की कानून और न्याय संबंधी स्थायी समितियों के संयुक्त समीक्षा और विचार के लिए भेजा गया। संयुक्त समिति की बैठक के दौरान, जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-फजल के दो सदस्यों और सीनेटर ने इस बैठक का बहिष्कार किया। उन्होंने कहा कि ड्राफ्ट लिस्ट में ऐसे प्रावधान शामिल हैं जो 26वें संशोधन विधेयक में पहले ही नामंजूर किया गया था।