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क्या हैं ‘टिकटॉक इस्लामिज्म’ ग्रुप्स, जिन्हें कट्टरपंथी बता जर्मन सरकार ने किया बैन: लोकतंत्र के खिलाफ युवाओं का कर रहे थे ब्रेनवॉश

जर्मनी की सरकार ने देश में चरमपंथ को बढ़ावा देने और संविधान के खिलाफ काम करने के आरोप में दो इस्लामवादी समूहों पर बड़ा कदम उठाया है। इनमें से एक ‘इस्लामिक सेंटर हैम्बर्ग (IZH) है, जिसे ईरान और हिजबुल्लाह का समर्थन करने के आरोप में बैन किया गया। दूसरा समूह ‘मुस्लिम इंटरएक्टिव‘ है, जिस पर भी बैन लगा दिया गया है।

यह कदम इसलिए अहम है क्योंकि मुस्लिम इंटरएक्टिव जैसे समूह सोशल मीडिया, खासकर टिकटॉक का इस्तेमाल करके जर्मनी में खिलाफत (इस्लामी शासन) की माँग कर रहे थे और युवाओं में कट्टरपंथी विचार फैलाने की कोशिश कर रहे थे। जर्मन अधिकारियों ने इसे ‘आधुनिक टिकटॉक इस्लामिज्म‘ कहा है, यानी सोशल मीडिया के जरिए युवाओं को प्रभावित करने की रणनीति।

यह कार्रवाई जर्मनी के लोकतंत्र की सुरक्षा के लिए जरूरी थी, क्योंकि ये समूह लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करने की कोशिश कर रहे थे। सरकार ने इस पर सख्त कदम उठाकर यह साफ कर दिया है कि वह ऐसे चरमपंथी विचारों से निपटने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी।

क्या कार्रवाई हुई है?

जर्मन सरकार ने इस्लामिक सेंटर हैम्बर्ग (IZH) और उसके जुड़े समूहों पर बैन लगा दिया है। इसके बाद, जर्मनी में चार शिया मस्जिदों को बंद कर दिया गया और संगठन की संपत्तियाँ जब्त कर ली गईं। गृह मंत्री नैन्सी फेजर ने कहा कि यह समूह लोकतंत्र, मानवाधिकार और महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ था और इसका मकसद जर्मनी में इस्लामी शासन स्थापित करना था। इसके साथ ही, इसे Hezbollah जैसे आतंकवादी समूहों का समर्थन करने का भी आरोप लगा था।

इसके अलावा, पिछले साल नवंबर में पुलिस ने 55 जगहों पर छापे मारे थे, जिससे पता चला कि यह समूह गुपचुप तरीके से अपने राजनीतिक उद्देश्य पूरे कर रहा था। इस कार्रवाई का मकसद यह दिखाना था कि जर्मनी किसी भी प्रकार की कट्टरपंथी गतिविधि को नहीं सहन करेगा। सरकार ने यह भी साफ किया कि यह कदम शिया मुसलमानों के मजहबी अधिकारों के खिलाफ नहीं है, बल्कि इस्लामी कट्टरपंथियों के खिलाफ है।

क्या कर रहा था ‘ग्रुप’?

‘ग्रुप’ एक ऐसा समूह था जो जर्मनी में युवाओं को कट्टरपंथी विचारधारा से प्रभावित करने की कोशिश कर रहा था। इसके लिए इस समूह ने टिकटॉक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल किया। टिकटॉक की तरह के ऐप्स, जो तेज और मजेदार वीडियो दिखाते हैं, ऐसे प्लेटफॉर्म कट्टरपंथी विचार फैलाने के लिए आदर्श जगह बन गए हैं। ग्रुप का मकसद था कि वह युवाओं को इस्लामिक क्रांति के विचारों से जोड़ सके और उन्हें लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ विचारों में प्रभावित कर सके।

इसके अलावा, ‘ग्रुप’ का एक और बड़ा उद्देश्य था, वैश्विक खिलाफत की स्थापना करना। इसका मतलब था कि वे चाहते थे कि पूरी दुनिया में एक इस्लामिक शासन बने, जो लोकतांत्रिक देशों के खिलाफ हो। इस उद्देश्य को फैलाने के लिए, ग्रुप के सदस्य सोशल मीडिया के जरिए युवा लोगों को अपने विचारों के प्रति आकर्षित कर रहे थे और जर्मनी में इस्लामी शासन स्थापित करने की कोशिश कर रहे थे।

कौन चलाता है ग्रुप और क्या लक्ष्य है?

‘ग्रुप’ एक युवा संगठन चला रहा था, जो 2020 में बना था और अब इसे ‘हिजबुत तहरीर (HuT)’ से जोड़ा जा रहा है। हिजबुत तहरीर को 2003 में जर्मनी में बैन किया गया था। इस संगठन का मुख्य लक्ष्य ‘दुनिया भर में एक इस्लामिक शासन यानी खिलाफत की स्थापना करना और पश्चिमी लोकतांत्रिक व्यवस्था का विरोध करना था। ये लोग चाहते थे कि जर्मनी में इस्लामी कानून लागू हो और वे जर्मनी के संविधान का विरोध करते थे।

इस संगठन के विचार खासकर युवाओं को आकर्षित करते थे, क्योंकि वे अपने संदेश को सोशल मीडिया जैसे टिकटॉक के माध्यम से बहुत आसानी से फैलाते थे। उनका उद्देश्य था कि वे युवाओं को इन प्लेटफॉर्म्स पर अपने विचारों से प्रभावित करें और उन्हें कट्टरपंथी सोच अपनाने के लिए तैयार करें।

अन्य दो ग्रुप क्या कर रहे थे?

जर्मनी में ग्रुप के अलावा, दो और कट्टरपंथी समूह ‘जेनरेशन इस्लाम और रियलिटी इस्लाम‘ थे। ये दोनों समूह भी वही काम कर रहे थे जो ग्रुप करता था, यानी कट्टरपंथी विचारों को फैलाना। इन दोनों समूहों पर भी ग्रुप की तरह बैन लग सकता था, क्योंकि ये भी युवाओं को इस्लामिक कट्टरपंथ की तरफ खींचने की कोशिश कर रहे थे। जर्मनी की खुफिया एजेंसियों ने इन समूहों की गतिविधियों पर कड़ी नजर रखी और इनकी संपत्तियों की भी तलाशी ली।

हालाँकि, अभी तक इन समूहों पर कोई बैन नहीं लगाया गया है, लेकिन वे भी ग्रुप और मुस्लिम इंटरएक्टिव जैसे समूहों की तरह मुश्किल में पड़ सकते हैं। इनका भी उद्देश्य इस्लामिक शरिया कानून के तहत शासन स्थापित करना और लोकतांत्रिक व्यवस्था का विरोध करना था, इसलिए जर्मनी सरकार इन पर नजर बनाए रखे हुए है।

क्या जर्मनी में पहले भी बैन हुए हैं ऐसे ग्रुप?

हाँ, जर्मनी में पहले भी कई कट्टरपंथी समूहों पर बैन लगाया जा चुका है। इनमें से सबसे पहले 2003 में हिजबुत तहरीर (HuT) पर बैन लगाया गया था। यह समूह भी जर्मनी में कट्टरपंथी विचारों को फैलाने और शरिया कानून के तहत शासन स्थापित करने की कोशिश कर रहा था, इसलिए उसे देश में पूरी तरह से बैन कर दिया गया था।

इसके बाद, 2020 में हेजबोल्ला (Hezbollah) को भी आतंकवादी संगठन घोषित करते हुए जर्मनी में उस पर बैन लगा दिया था। यह समूह ईरान से जुड़ा हुआ था और जर्मनी के अंदर अपनी आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ावा दे रहा था।

इनके अलावा, हाल ही में 2023 में हमास (Hamas) के समर्थन में काम कर रहे समीदोन–पलस्तीनियन सॉलिडेरिटी नेटवर्क पर भी जर्मनी ने बैन लगा दिया। यह समूह इजरायल के खिलाफ हिंसा को बढ़ावा दे रहा था और उसकी आतंकवादी गतिविधियों को समर्थन दे रहा था।

जर्मनी ने इन सभी समूहों के खिलाफ कार्रवाई की क्योंकि ये समूह जर्मन समाज के लिए खतरा पैदा कर रहे थे और लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करने की कोशिश कर रहे थे। जर्मनी के लिए यह एक निरंतर प्रक्रिया बन चुकी है, जिसमें वह किसी भी प्रकार की इस्लामी कट्टरपंथी गतिविधियों से निपटने के लिए लगातार सक्रिय रहता है।

जर्मनी की सरकार का लक्ष्य है कि वह समाज में शांति बनाए रखे और किसी भी प्रकार के आतंकवाद या कट्टरपंथ को बढ़ावा न दे। इसलिए, जब भी कोई समूह लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ काम करता है, तो उस पर कड़ी कार्रवाई की जाती है।

क्या जर्मनी इस्लामी कट्टरपंथियों से जूझ रहा है?

हाँ, जर्मनी में इस्लामी कट्टरपंथ की समस्या लगातार बढ़ती जा रही है। अब चरमपंथी संगठन पुराने तरीकों की बजाय नए डिजिटल रास्तों का इस्तेमाल कर रहे हैं। ‘टिकटॉक इस्लामिज्म‘ इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। ये समूह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे टिकटॉक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब का इस्तेमाल करके युवाओं को कट्टरपंथ की ओर खींच रहे हैं।

तेज, आकर्षक और भावनात्मक वीडियो बनाकर ये लोग युवाओं को यह महसूस कराते हैं कि पश्चिमी लोकतंत्र उनके धर्म के खिलाफ है और उन्हें इस्लामी शासन की ओर लौटना चाहिए। यह तरीका खासकर किशोरों और छात्रों पर असर डाल रहा है, जो सोशल मीडिया पर बहुत समय बिताते हैं।

जर्मनी की खुफिया एजेंसियाँ इन गतिविधियों पर लगातार नजर रख रही हैं। कई रिपोर्टों में यह पाया गया है कि ऐसे समूहों के जरिए नाबालिगों को प्रभावित किया जा रहा है और उन्हें समाज से अलग सोच अपनाने के लिए उकसाया जा रहा है। इस वजह से सरकार ने कई बार सख्त कदम उठाए हैं, जैसे मुस्लिम इंटरएक्टिव, जेनरेशन इस्लाम और रियलिटी इस्लाम जैसे संगठनों पर छापे और जाँचें। सरकार का कहना है कि ऐसे समूह मजहब के नाम पर नफरत फैला रहे हैं और लोकतंत्र को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं।

पिछले कुछ वर्षों में जर्मनी में इस्लामवादी-प्रेरित हमलों और साजिशों के कई मामले सामने आए हैं। खासकर गाजा युद्ध और मध्य पूर्व में तनाव बढ़ने के बाद, इन घटनाओं में तेजी आई है। कई बार स्कूलों और मस्जिदों में ऐसे युवाओं के समूह मिले हैं जो सोशल मीडिया पर देखे गए वीडियो से प्रभावित होकर कट्टर विचारधारा अपनाने लगे थे। यही वजह है कि जर्मन सरकार अब इन डिजिटल नेटवर्क्स को लेकर और ज़्यादा सतर्क हो गई है।

जर्मनी की सरकार का मानना है कि मजहब का इस्तेमाल राजनीति या चरमपंथ के लिए नहीं होना चाहिए। इसलिए जब कोई संगठन मजहबी स्वतंत्रता के नाम पर हिंसा, नफरत या ‘खिलाफत’ की माँग करने लगता है तो उस पर तुरंत कार्रवाई की जाती है। हाल ही में सरकार ने कई समूहों की संपत्तियाँ जब्त कीं, उनके सोशल मीडिया चैनल बंद किए और सदस्यों पर कानूनी कार्रवाई शुरू की।

सरकार का लक्ष्य सिर्फ चरमपंथ को रोकना नहीं है, बल्कि युवाओं को सुरक्षित और सही जानकारी देना भी है। इसके लिए स्कूलों और सामुदायिक संगठनों के साथ मिलकर जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। अधिकारियों का कहना है कि ‘टिकटॉक इस्लामिज्म‘ जैसे रुझान केवल एक सुरक्षा चुनौती नहीं हैं, बल्कि ये समाज में विभाजन भी पैदा करते हैं।

इसलिए कहा जा सकता है कि जर्मनी इस समय एक दोहरी लड़ाई लड़ रहा है। एक ओर वह अपने देश को आतंकवाद और कट्टरपंथ से बचा रहा है और दूसरी ओर सोशल मीडिया के जरिए फैल रहे डिजिटल चरमपंथ को भी रोकने की कोशिश कर रहा है। सरकार के लिए यह आसान नहीं है, लेकिन जर्मनी का यह सख्त रुख यह दिखाता है कि वह अपने लोकतंत्र और समाज की सुरक्षा को लेकर कोई समझौता नहीं करेगा।

लाल आतंक पर वोट का प्रहार: बिहार में नक्सल प्रभावित भीमबाँध-कछुआ-बासकुंड में दशकों बाद हुई वोटिंग, नक्सलवाद को खत्म कर मोदी सरकार ने लौटाया ‘वोट का अधिकार’

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में कई ऐतिहासिक नजारे देखने को मिले। जहाँ एक ओर मतदान के पहले चरण में पहली बार  64.66% मतदान हुआ। यह पिछले चुनावों की तुलना में काफी अधिक है और ये अब तक का रिकॉर्ड है।

बिहार में मतदाताओं की संख्या 7.42 करोड़ है। इनमें पुरुष मतदाता 3.92 करोड़ और महिला मतदाता 3.50 करोड़ हैं। पहले चरण में कुल वोटर्स की संख्या 3.75 करोड़ से अधिक थी। अब दूसरे चरण में अधिकतम वोटर्स के मतदान बूथ तक पहुँचने की बारी है।

बिहार चुनाव के पहले चरण में कई ऐसे बूथ रहे जो कभी नक्सल प्रभावित हुआ करते थे, वहाँ दशकों बाद मतदाताओं ने अपने मत का प्रयोग कर वोट दिया।

बिहार के मुंगेर जिले में भीमबाँध समेत 7 मतदान केंद्रों में 20 साल बाद लोगों ने वोट डाला। इन जगहों पर 5 जनवरी 2005 को नक्सली हमले हुए थे। भीमबांध इलाके के पास बारूदी सुरंग विस्फोट कर मुंगेर के SP समेत 7 पुलिसकर्मियों को मार दिया गया था। इसके बाद उन इलाकों से मतदान केंद्रों को हटा दिया गया था।

भीमबाँध तारापुर विधानसभा के तहत आता है। इसके बूथ संख्या 310 पर 170 महिलाएँ और 204 पुरुषों समेत 374 मतदाता हैं। 20 वर्ष के बाद मतदान केंद्रों के लगने पर वहाँ केंद्रीय अर्धसैनिक बल को तैनात कर लगातार पेट्रोलिंग की जा रही है।

ऐसा नहीं है कि भीमबाँध पर मतदान नहीं हो रहे थे बल्कि नक्सली हमले के बाद वहाँ के बूथ को लगभग 20 किलोमीटर दूर लगा दिया गया था। इसके कारण गाँव के लोगों को मतदान केंद्रों तक पहुँचना मुश्किल हो गया था। कम लोग ही बूथ तक पहुँच पाते थे।

इसी तरह बिहार के कछुआ और बासकुंड गाँव के लोगों ने 16 साल बाद मतदान किया। नक्सल प्रभावित क्षेत्र होने के कारण पहले मतदान संभव नहीं था। लखीसराय जिले के सूर्यगढ़ा विधानसभा क्षेत्र के चार गावों में मतदान बूथ बनाए गए।

लखीसराय जिले के 56 मतदान केंद्र नक्सल प्रभावित है। चानन प्रखंड के दो मतदान केंद्र संख्या 407 सामुदायिक भवन कछुआ में 363 मतदाता है। मतदान केंद्र संख्या 417 बासकुंड-कछुआ में 495 मतदाता हैं। नक्सल प्रभावित इन दोनों इलाकों में पहली बार EVM के जरिए मतदान हुए।

इन दोनों मतदान केंद्रों में वोट डालने के लिए मतदाताओं को 6 से 10 किलोमीटर दूर जाना पड़ता था। साथ ही इसके लिए लोगों को जंगल और पहाड़ पार कर पैदल जाना पड़ता था।

पिछले लोकसभा चुनाव में 5 माओवाद प्रभावित मतदान केंद्र को बदलकर मैदानी भाग में लाया गया था। नक्सल से मुक्त होने के बाद चुनाव आयोग ने उन 5 मतदान केंद्रों को उनके मूल स्थान पर बहाल किया है।

बिहार चुनाव-2025 के पहले चरण में ही लोकतांत्रिक इतिहास का नया अध्याय लिखा गया, जहाँ दशकों बाद लोग अपने ही गाँव में मतदान कर पाए। दोनों क्षेत्रों में मतदान होना यह दर्शाता है कि नक्सल प्रभाव का खात्मा हो चुका है और लोकतंत्र की बहाली हो रही है।

प्रशासन ने इन क्षेत्रों को नक्सल मुक्त घोषित कर दिया है। जिले के कुल 56 मतदान केंद्र नक्सल ग्रामीणों के लिए यह केवल वोट डालने का अवसर नहीं, बल्कि डर से मुक्ति और लोकतांत्रिक अधिकार की जीत है।

दूसरे चरण में भी बिहार चुनाव बनेगा ऐतिहासिक

प्रथम चरण ही नहीं दूसरे चरण में भी बिहार के कई उन क्षेत्रों में भी मतदान होगा जहाँ पिछले 75 साल में नहीं हुआ। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के दूसरे चरण यानी 11 नवंबर 2025 में जमुई जिले के 4 गाँवों में पहली बार मतदान होगा।

ये गाँव आजादी के बाद से अब तक (लगभग 77 साल) कभी भी अपने ही गाँव में मतदान नहीं कर पाए। इस बार यहाँ मतदान केंद्र बनाए गए हैं और ग्रामीणों को पहली बार लोकतंत्र का उत्सव अपने गाँव में मनाने का अवसर मिलेगा।

बिहार के दूसरे चरण के मतदान में 18 जिलों की 122 विधानसभा सीटों पर मतदान होगा। इन्हीं के तहत जमुई के 4 गाँव भी शामिल हैं। बिहार के लोकतांत्रिक इतिहास में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है।

बिहार में चुनाव के दौरान इतिहास तो बन रहा है लेकिन इसका पूरा श्रेय मोदी सरकार की नक्सल खत्म करने वाले प्रयासों की ओर जाता है। नक्सल खत्म करने के लिए मोदी सरकार ने लगातार कई वर्षों तक काम किया।

इसके बाद जाकर भारत के कई जिले नक्सल के प्रभाव से मुक्त हुए हैं। इसके बाद ही बिहार के पहले चरण में भीमबाँस समेत अन्य जगहों पर कई जगहों बाद मतदान सफल तौर पर शांतिपूर्वक संपन्न हो पाए।

मोदी सरकार में संविधान-डेमोक्रेसी पर खतरा बताने वालों को जवाब देना चाहिए कि ये सारे प्रयास लोकतंत्र बचाने की भावना से नहीं किए गए तो किस मंशा से किए गए होंगे।

फिर विवादों में IIT गाँधीनगर: आतंकी याकूब मेमन के समर्थन में दया याचिका लिखने वाले एम के रैना को बनाया फैकल्टी, प्रोफेसर ने ‘वंदे मातरम’ का किया विरोध

हमेशा किसी न किसी विवाद में फँसा रहने वाला गुजरात का भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान गाँधीनगर (IIT गाँधीनगर) एक बार फिर सुर्खियों में है। इस बार मामला संस्थान में हुई नियुक्ति को लेकर है। सोशल मीडिया पर दावा किया जा रहा है कि IIT गाँधीनगर ने गुप्त रूप से कुछ फैकल्टी की नियुक्ति की है, जिनमें अभिनेता एम के रैना का नाम भी शामिल है।

एम के रैना वही व्यक्ति हैं जिन्होंने आतंकी याकूब मेमन के लिए दया याचिका पर हस्ताक्षर किए थे। अब उनकी नियुक्ति सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोग IIT गाँधीनगर पर फिर से सवाल उठ रहे हैं। इसके अलावा, संस्थान के ही एक प्रोफेसर द्वारा ‘वंदे मातरम’ पर आपत्ति जताने की बात भी सामने आई है, जिससे विवाद और बढ़ गया है।

दरअसल, IIT गाँधीनगर का मानविकी विभाग पिछले कई सालों से विवादों में घिरा रहा है। आरोप लगते रहे हैं कि यह विभाग इस्लामी एजेंडा चलाने, देशविरोधी तत्वों और आतंक समर्थकों की नियुक्ति करने और वामपंथी विचारधारा को बढ़ावा देने में लगा हुआ है। इन तमाम कारणों से IIT गाँधीनगर बार-बार विवादों के केंद्र में रहा है।

याकूब मेमन की दया याचिका पर हस्ताक्षर

साल 1993 में मुंबई में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों ने पूरे देश को हिला दिया था। इन धमाकों में सैकड़ों लोगों की जान गई और देशभर में दहशत फैल गई थी। इस मामले में आतंकवादी याकूब मेमन को गिरफ्तार कर अदालत ने दोषी ठहराया और फाँसी की सजा सुनाई थी।

लेकिन जुलाई 2015 में, याकूब मेमन को बचाने के लिए राष्ट्रपति के नाम एक दया याचिका दायर की गई थी। इस याचिका पर अभिनेता एम के रैना सहित करीब 300 लोगों ने हस्ताक्षर किए थे। उन्होंने तर्क दिया था कि आतंकवादी को फांसी देना ‘अनुचित और कठोर’ है।

अब सोशल मीडिया पर एम के रैना के हस्ताक्षर वाली उस याचिका की तस्वीरें फिर से वायरल हो रही हैं। लोग सवाल उठा रहे हैं कि जो व्यक्ति पहले आतंकवादी के लिए दया की माँग कर चुका है, वही अब IIT गाँधीनगर में नियुक्त किया जा रहा है, क्या यह देश के शैक्षणिक संस्थानों में वामपंथी एजेंडे की घुसपैठ नहीं है?

मोदी सरकार के खिलाफ दुष्प्रचार

एम के रैना का विवाद सिर्फ उनकी पुरानी गतिविधियों तक सीमित नहीं है बल्कि उनके राजनीतिक बयानों ने भी लोगों का ध्यान खींचा है। साल 2016 में दिए गए एक इंटरव्यू में रैना ने मोदी सरकार पर तीखा हमला किया था। उन्होंने कहा था, “यह सरकार हमारा ब्रेन-डेड करना चाहती है।” इसके साथ ही उन्होंने परोक्ष रूप से सरकार को तानाशाह कहने की कोशिश की और आरोप लगाया कि विपक्ष की आवाज दबाई जा रही है तथा संस्थाओं को कमजोर किया जा रहा है।

अब सोशल मीडिया पर लोग सवाल उठा रहे हैं कि ऐसे राजनीतिक झुकाव रखने वाले व्यक्ति को IIT गाँधीनगर में नियुक्त करना क्या उचित है? कई यूजर्स ने इस विवाद को संस्थान की पिछली नियुक्तियों से जोड़ते हुए भी देखा है, जैसे कि फिल्ममेकर डॉन चाको पालथरा की नियुक्ति और आरोप लगाया है कि संस्थान में लगातार वामपंथी सोच वाले लोगों को जगह दी जा रही है।

इस विवाद के बाद IIT गाँधी नगर के भर्ती नियमों पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। लोग पूछ रहे हैं कि एक कलाकार पृष्ठभूमि वाला व्यक्ति तकनीकी संस्थान में फैकल्टी पद पर कैसे नियुक्त हुआ? अगर रैना को ‘आर्टिस्ट-इन-रेजिडेंस’ बनाया गया है, तो यह जानकारी वेबसाइट पर सार्वजनिक क्यों नहीं की गई? और आखिर इन पदों के लिए पात्रता और चयन के मानदंड क्या हैं? इन सवालों के जवाब न मिलने से IIT गाँधीनगर की पारदर्शिता और नीयत दोनों पर सवाल खड़े हो गए हैं।

एक अन्य प्रोफेसर को ‘वंदे मातरम’ से आपत्ति थी

IIT गाँधी नगर में एक और विवाद ने तूल पकड़ लिया है। सोशल मीडिया पर दावा किया जा रहा है कि संस्थान के प्रोफेसर अरूप चक्रवर्ती ने ‘वंदे मातरम’ का विरोध किया है। एक वायरल पोस्ट में प्रोफेसर के ईमेल का स्क्रीनशॉट साझा किया गया है, जिसमें उन्होंने कथित रूप से कहा है कि ‘वंदे मातरम’ गीत की पंक्ति ‘त्वं हि दुर्गा दशप्रहरंधारिणीम्’ में भारत माता के उल्लेख पर उन्हें आपत्ति है।

आरोप है कि उन्होंने यह भी कहा कि यह गीत धार्मिक भावना से जुड़ा है, इसलिए आम लोगों को इसे नहीं गाना चाहिए। इस मेल में कथित तौर पर अन्य विवादित बातें भी लिखी गई हैं, जिससे सोशल मीडिया पर लोगों का गुस्सा भड़क गया है।

अब नेटिजन्स का कहना है कि IIT गाँधी नगर में यह कोई पहली बार नहीं हुआ है, संस्थान पहले भी विवादित नियुक्तियों और वामपंथी एजेंडे को लेकर चर्चा में रहा है। कई यूजर्स ने सरकार से IIT गाँधी नगर के खिलाफ सख्त कार्रवाई और जाँच की माँग की है, ताकि यह पता चल सके कि देश के प्रतिष्ठित संस्थान में आखिर यह कैसी विचारधारा पनप रही है।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से गुजराती में लिखी गई है जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे)


जिस माली में हो रहे भारतीय लोग किडनैप, क्या वहाँ होने वाला है अल-कायदा का कब्जा: जानिए इस्लामी आतंकियों ने अफ्रीकी देश में कैसे जमाईं जड़ें

गृह युद्ध की मार झेल रहे अफ्रीकी देश माली से फिर एक बुरी खबर आई है। पश्चिमी माली के कोबरी इलाके में गुरुवार (6 नवंबर 2025) को अज्ञात बंदूकधारियों ने 5 भारतीय कामगारों का अपहरण कर लिया। शक है यह हरकत अल-कायदा और ISIS से जुड़े आतंकवादी समूहों ने की है। माली में अल-कायदा से जुड़ा आतंकी संगठन जमात नुसरत अल-इस्लाम वल-मुसलमीन (JNIM) सक्रिय है।

यह कोई पहला मौका नहीं है जब वहाँ भारतीयों का अपहरण हुआ हो, वहाँ आए दिन ऐसी घटनाएँ आम हो गई हैं। बीते जुलाई में माली में 3 भारतीयों का अपहरण हुआ था। तब इसकी जिम्मेदारी जमात नुसरत अल-इस्लाम वल-मुसलमीन (JNIM) ने ही ली थी।

इस आतंकी संगठन की माली में मौजूदगी का असर समझने के लिए ‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ की 30 अक्टूबर 2025 की एक रिपोर्ट पढ़िए। यह रिपोर्ट कहती है, “अल-कायदा के आतंकवादी माली की राजधानी बमाको पर कब्जा करने के और करीब पहुँच रहे हैं। अगर माली पर कब्जा हो जाता है, तो यह अमेरिका द्वारा घोषित आतंकवादी समूह द्वारा शासित दुनिया का पहला देश बन जाएगा।” इस्लामी कट्टरपंथ ने कैसे माली में अपनी जड़े जमाईं वो जानने से पहले समझते हैं कि आखिर JNIM है क्या?

क्या है जमात नुसरत अल-इस्लाम वल-मुसलमीन?

अमेरिकी न्याय विभाग से जुड़ी एक आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक, माली, नाइजर और बुर्कीना फासो में आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने वाले जमात नुसरत अल-इस्लाम वल-मुसलमीन (JNIM) ने खुद को माली में अल-कायदा की आधिकारिक शाखा बताया है। वेबसाइट पर बताया गया है कि 2017 में अल-कायदा इन द इस्लामिक मगरिब की सहारा शाखा (AQIM), अंसार अल-डाइन और मकीना लिबरेशन फ्रंट (FLM) ने साथ मिलकर JNIM का गठन किया गया था। अमेरिका-ऑस्ट्रेलिया जैसे कई देशों ने इसे आतंकी घोषित किया हुआ है।

आस्ट्रेलिया की राष्ट्रीय सुरक्षा की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक, JNIM सलाफी-जिहादी संगठन है जो पश्चिम अफ्रीका में एक सलाफी-इस्लामी राज्य बनाने की कोशिश में लगा है। JNIM का लक्ष्य यहाँ पश्चिमी प्रभाव को कम करना था और यह United Nations Multidimensional Integrated Stabilization Mission in Mali (MINUSMA) के साथ भिड़ गया। पिछले एक दशक में JNIM के हमलों में MINUSMA से जुड़े 300+ सैनिक मारे गए हैं।

पश्चिम अफ्रीका में JNIM की गतिविधियों ने इसे वहाँ सक्रिय इस्लामिक स्टेट (IS) के गुटों के साथ टकराव की स्थिति में ला दिया है। 2017 से 2019 के बीच दोनों के बीच संबंध सामान्य रूप से सहयोगात्मक थे। इसे ‘साहेल अपवाद’ कहा जाता था क्योंकि दुनिया के बाकी हिस्सों में अल-कायदा और इस्लामिक स्टेट के गुट आपस में लड़ रहे थे लेकिन साहेल क्षेत्र (अफ्रीका का एक इलाका) में दोनों मिलकर काम कर रहे थे। हालाँकि, 2019 के बाद से इन दोनों संगठनों के रिश्ते बिगड़ गए। अब दोनों गुट लगातार एक-दूसरे से इलाके पर कब्जे के लिए लड़ रहे हैं। 2019 के मध्य से शुरू हुई इस लड़ाई में हजारों आतंकी मारे जा चुके हैं।

कौन चलाता है JNIM?

इयाद अग गली ने 2017 में JNIM बनने के बाद इसके मुख्य अमीर यानी मुखिया के रूप में काम करना शुरू किया था और वही इसका कर्ता धर्ता है। इयाद अग गली माली के किडाल क्षेत्र के रहने वाले तुआरेग समुदाय से है। 1990 के दशक में हुए तुआरेग विद्रोह में उसने भाग लिया था और 2006 में उसने एक छोटा सा विद्रोह भी चलाया लेकिन वह ज्यादा समय तक नहीं चला। 2007 में वे माली सरकार की सलाहकार संस्था हाई काउंसिल ऑफ टेरिटोरियल कलेक्टिविटीज का सदस्य बन गया।

2010 तक अग गली माली सरकार के लिए बंधक वार्ताकार (hostage negotiator) के तौर पर काम करता रहा। इस दौरान उसने AQIM (अल-कायदा इन द इस्लामिक मघरेब) के कई नेताओं से नजदीकी संबंध बना लिए। बाद में AQIM के कुछ लोगों ने उसे अंसार अल-दीन नाम का संगठन बनाने के लिए कहा ताकि AQIM उत्तरी माली में अपनी गतिविधियाँ बढ़ा सके। 25 फरवरी 2013 को UN ने अग गाली को प्रतिबंधित सूची में डाला। अमेरिका ने भी उसे वैश्विक आतंकी घोषित कर दिया था। कभी रॉक म्यूजिक का शौकीन रहे गली अब कट्टर इस्लामी नेता बन चुका है और उसने अपने कब्जे वाले इलाकों में संगीत पर प्रतिबंध लगा दिया है।

इयाद अग गली (फोटो: AFP)

इयाद अग गली ने अमादू कूफा के साथ मिलकर JNIM बनाया था। अमादू कूफा अब JNIM का डिप्टी है। माली के निआफुंके इलाके में जन्मे अमादू कूफा ने 2015 में FLM बनाया था और बाद में JNIM में शामिल हो गया। JNIM बनने के बाद से कूफा के FLM गुट ने सबसे अधिक हिंसक घटनाएँ की हैं और इनके हाथों सबसे ज्यादा लोगों की मौतें हुई हैं। इसका गुट दूसरे गुटों की तुलना में अधिक आम नागरिकों को निशाना बनाता है। 4 फरवरी 2020 को UN ने कूफा का नाम आईएसआईएल (दाएश) और अल-कायदा से जुड़े प्रतिबंधित लोगों की सूची में शामिल किया था।

अमादू कूफा (JNIM का डिप्टी)

आस्ट्रेलिया की राष्ट्रीय सुरक्षा की वेबसाइट के मुताबिक, JNIM के करीब 2000 लड़ाके माली के मध्य और उत्तरी इलाकों में सक्रिय हैं। यह संगठन स्थानीय लोगों से जुड़ने की कोशिश करता है और उन समुदायों की नाराजगी का फायदा उठाता है जो खुद को हाशिए पर या उपेक्षित महसूस करते हैं। यह संगठन खुद को पश्चिम अफ्रीकी सरकारों के विकल्प के तौर पर पेश करता है।

JNIM अपनी फंडिंग के लिए फिरौती के लिए अपहरण, जबरन वसूली और टैक्स (जैसे जकात) वसूलने जैसे तरीकों का इस्तेमाल करता है। बताया जाता है कि JNIM उन तस्करों और अपराधियों से भी टैक्स वसूलता है जो इसके कब्जे वाले इलाकों से गुजरते हैं। इसके अलावा, JNIM ने हथियार भी उन सैन्य ठिकानों और स्थानीय सशस्त्र समूहों से हासिल किए हैं, जिन पर उसने हमला किया था।

JNIM द्वारा किए गए आतंकी हमले (फोटो: Australian National Security)

माली में हिंसा की शुरुआत

कभी अपेक्षाकृत शांत देश माने जाने वाला माली 2011 के आखिर से लगातार बढ़ती हिंसा और आतंकी हमलों की चपेट में है। हालात इतने बिगड़े कि देश दो अलग-अलग लेकिन आपस में जुड़े संघर्षों में उलझ गया, इसमें एक तरफ थे तुआरेग अलगाववादी तो वहीं दूसरी तरफ थे अल-कायदा से जुड़े इस्लामिक आतंकी संगठन। नवंबर 2011 में लीबिया के तानाशाह मुअम्मर गद्दाफी के लिए लड़ चुके तुआरेग योद्धा हथियारों के साथ माली लौटे और ‘मूवमेंट फॉर द लिबरेशन ऑफ अजावाद’ (MNLA) नाम का संगठन बनाया। उनका मकसद था ‘अजावाद’ नाम का अलग तुआरेग देश बनाना। यह माली में नए और हिंसक दौर की शुरुआत थी।

2012 में राष्ट्रपति अमादू तौमानी तुरे को सेना ने तख्तापलट में हटा दिया, जिससे देश में सत्ता का खालीपन पैदा हुआ। इसी मौके का फायदा उठाकर तुआरेग विद्रोहियों ने सरकार के खिलाफ हथियार उठा लिए। इसी समय अल-कायदा से जुड़े दूसरे संगठन MUJAO और अंसार दिने भी अपनी खुद की इस्लामी शासन व्यवस्था लागू करने की माँग को लेकर हिंसा फैला रहे थे। शुरुआत में तुआरेग और इस्लामिक गुटों ने मिलकर सरकार के खिलाफ लड़ाई लड़ी लेकिन बाद में दोनों के रास्ते अलग हो गए।

वजह साफ नहीं थी लेकिन माना जाता है कि MNLA का सेक्युलर रुख और इस्लामी गुटों द्वारा आम लोगों पर बढ़ती हिंसा इसका कारण बना। जब दोनों के बीच झड़पें बढ़ीं, तो उत्तरी माली के बड़े हिस्सों पर इस्लामिक गुटों का नियंत्रण हो गया। माली की सेना के पास विद्रोहियों से मुकाबले के लिए पर्याप्त हथियार नहीं थे। हालात संभालने के लिए माली सरकार ने फ्रांस से मदद माँगी। 2013 में फ्रांस ने सैन्य कार्रवाई कर गाओ, किदाल और टिंबकटू जैसे इलाकों से आतंकियों को खदेड़ दिया लेकिन उन्हें पूरी तरह खत्म नहीं कर सका।

स्थिति सामान्य करने के लिए चुनाव कराए गए और 2015 की शुरुआत में शांति समझौता भी हुआ लेकिन आतंकी हमले रुक नहीं पाए। आज भी माली की सरकार कमजोर है और अब तो कई विशेषज्ञय दावा कर रहे हैं कि अल-कायदा से जुड़ा JNIM इस पर कब्जा करने के लिए तैयार बैठा है।

क्या JNIM का होगा माली पर कब्जा?

अलग-अलग मीडिया रिपोर्ट्स में JNIM के माली पर कब्जा करने से जुड़े दावे किए जा रहे हैं। द टेलीग्राफ से लेकर वॉशिंगटन पोस्ट जैसे अखबारों ने भी इस विषय पर विस्तार से लिखा है। द टेलीग्राफ की एक रिपोर्ट बताती है कि JNIM अब राजधानी बमाको तक अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है। आतंकियों ने ईंधन की सप्लाई रोक दी है और शहरों की नाकेबंदी कर दी है। इससे डर बढ़ गया है कि कहीं माली अल-कायदा के सीधे शासन वाला पहला देश न बन जाए।

बीते कुछ हफ्तों से JNIM ने राजधानी बमाको की ओर जाने वाले ईंधन काफिलों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है। माली की सेना, जो 2021 के तख्तापलट के बाद से सत्ता में है, अब तक इस संकट को काबू में नहीं कर पाई है। स्कूल बंद कर दिए गए हैं, पेट्रोल पंप सूख चुके हैं और राजधानी की सड़कों पर लंबी लाइनें लग रही हैं।

माली की सेना-नेतृत्व वाली सरकार पहले से ही अंतरराष्ट्रीय दबाव और आंतरिक अस्थिरता से जूझ रही है। संयुक्त राष्ट्र, फ्रांस और अमेरिका के सैनिक पहले ही देश छोड़ चुके हैं। अब रूस और तुर्की ही माली की मुख्य सुरक्षा ताकत हैं। लेकिन हालात यह संकेत दे रहे हैं कि देश धीरे-धीरे एक और बड़े संकट की ओर बढ़ रहा है। जहाँ आतंकवादी न सिर्फ हथियारों से बल्कि ईंधन और अर्थव्यवस्था पर पकड़ बनाकर पूरे माली को अपने कब्जे में लेने की कोशिश कर रहे हैं।


Ground Report: सीमांचल में PM मोदी की रैली के लिए सड़कों पर उतरी भीड़, GenZ से लेकर 90 साल के बुजुर्ग तक उमड़े

बिहार चुनाव के दूसरे चरण में ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट टीम सीमांचल पहुँची। कटिहार में पीएम मोदी की रैली में इतनी भारी भीड़ उमड़ी कि पंडाल फुल होने के बाद लोग सड़कों पर खड़े होकर भाषण सुनते रहे। जेन-जेड युवा से लेकर 90 साल के बुजुर्ग तक सब मौजूद रहे।

पीएम मोदी की रैली में शामिल होने के बाद एक बुजुर्ग बोले, “मोदी जी 100 साल जियो, हम आपके साथ हैं।” रिपोर्टर अनुराग मिश्रा ने कैमरे पर कैद किया कि बाहर के लोग स्पीकर से जुड़े, तालियाँ बजाते रहे।

रैली में नीतीश कुमार और मोदी के साथ चिराग पासवान के समर्थक जोर-शोर से नजर आए। कई युवाओं ने चिराग को अगला सीएम बताते हुए नारे लगाए। एक समर्थक ने कहा, “चिराग भैया युवा हैं, बिहार को नई दिशा देंगे। एनडीए में चिराग का रोल बड़ा होगा।”

मुस्लिम बहुल इलाके में भी पीएम मोदी की तारीफ दिखी। यहाँ एमवाई समीकरण टूटता दिखा। दूसरे चरण की सीटों पर माहौल गरम है। कटिहार, पूर्णिया, अररिया, किशनगंज में एनडीए लहर साफ दिखती है।

क्या हैं दूसरे चरण की सीटों के हाल, देखिए ग्राउंड रिपोर्ट में

‘वंदे मातरम्’ ने जगाई क्रांति की ज्वाला, लेकिन राष्ट्रगान बनने के आड़े आ गए जवाहरलाल नेहरू: जानें- बंकिम चंद्र चटर्जी की मूल रचना को कॉन्ग्रेस ने क्यों किया छोटा

भारत के राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ की रचना के 150 वर्ष पूरे हो चुके हैं। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय (बंकिमचंद्र चटर्जी) की यह अमर रचना उस युग की पुकार थी, जब हर भारतीय के हृदय में स्वतंत्रता का सपना पल रहा था। इस गीत ने क्रांति की ज्वाला भड़काई, राष्ट्रभक्ति को स्वर दिया और माँ भारती के चरणों में असीम श्रद्धा अर्पित की। अंग्रेजी हुकूमत के दौर में यह स्वर साहस का प्रतीक बना और आज भी ‘वंदे मातरम्’ हर भारतीय के हृदय में मातृभूमि के प्रति प्रेम का अमर गीत बन गूँजता है।

वंदे मातरम्: राष्ट्रभक्ति का अमर स्वर

‘वंदे मातरम्’ केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारत की आत्मा की धड़कन है। वंदे मातरम् की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी। यह पहली बार 7 नवंबर 1875 को उनकी साहित्यिक पत्रिका ‘बंगदर्शन’ में प्रकाशित हुआ था। बाद में इसे उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ (1882) में शामिल किया गया। इस उपन्यास ने न केवल भारतीय साहित्य में नया युग प्रारंभ किया बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन की चेतना को भी जन्म दिया।

अंग्रेजों के लिए भय का प्रतीक

1905 में जब स्वदेशी आंदोलन की शुरुआत हुई, तब ‘वंदे मातरम्’ उसका युद्धघोष बन गया। कोलकाता में ‘बंदे मातरम् संप्रदाय’ की स्थापना हुई, जिसके सदस्य मातृभूमि को देवी स्वरूप मानकर हर रविवार प्रभात फेरी में यह गीत गाते थे। इस आंदोलन में रवींद्रनाथ टैगोर, बिपिन चंद्र पाल, और अरविंदो घोष जैसे महान नेता शामिल हुए।

(फोटो साभार: फ्रीपिक)

1906 में ‘वंदे मातरम्’ नामक अखबार की शुरुआत हुई जिसने देश में आत्मनिर्भरता, एकता और स्वतंत्रता का संदेश फैलाया। ब्रिटिश शासन इस गीत से इतना भयभीत था कि उसने इसे स्कूलों में गाने पर प्रतिबंध लगा दिया। छात्रों को सजा दी गई, लेकिन गीत की गूंज को कोई दबा न सका।

विदेश में पहली बार फहराया गया ‘वंदे मातरम्’ वाला तिरंगा

1907 में मैडम भीकाजी कामा ने जर्मनी के स्टटगार्ट में भारत का पहला तिरंगा फहराया, जिस पर ‘वंदे मातरम्’ अंकित था। यह उस युग का वह क्षण था जब यह गीत भारत की सीमाओं से बाहर भी स्वतंत्रता का प्रतीक बन गया।

भारत की स्वतंत्रता के बाद, 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा में पहले राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की कि ‘वंदे मातरम्’ को ‘जन गण मन’ के समान ही सम्मान और दर्जा प्राप्त होगा। यह राष्ट्र के लिए उस गीत के योगदान की आधिकारिक मान्यता थी।

कभी ‘इस्लाम विरोधी’ तो कभी ‘सेकुलरिज्म’ के नाम पर अस्वीकार करते आ रहे मुस्लिम

जब यह गीत स्वतंत्रता की पहचान बन रहा था, 1908 में मुस्लिम लीग ने इसके विरोध की शुरुआत की। अमृतसर अधिवेशन में सैयद अली इमाम ने कहा कि यह गीत इस्लाम विरोधी है, क्योंकि इसमें मातृभूमि की तुलना देवी-देवताओं से की गई है। बाद में खिलाफत आंदोलन के दौरान यह भावना और गहरी होती गई।

इस विरोध के बीच, 1937 में कॉन्ग्रेस ने जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक समिति बनाई, जिसमें मौलाना अबुल कलाम आजाद भी शामिल थे। आजाद ने गीत का अध्ययन किया और निष्कर्ष दिया कि इसके शुरुआती दो पद केवल मातृभूमि की वंदना करते हैं और इनमें किसी मजहबी भावना का विरोध नहीं है। नतीजतन, कॉन्ग्रेस कार्यसमिति ने निर्णय लिया कि राष्ट्रगीत के रूप में केवल दो ही पद स्वीकार किए जाएँ।

नेहरू की अध्यक्षता में कॉन्ग्रेस ने संक्षिप्त संस्करण अपनाने का फैसला किया था, जिसमें से जानबूझकर माँ दुर्गा की स्तुति करने वाले छंद हटा दिए गए थे। ऐसा करते हुए कॉन्ग्रेस ने अपने सांप्रदायिक एजेंडे के लिए फैजपुर अधिवेशन में वंदे मातरम् के छोटे स्वरूप को अपनाया।

कॉन्ग्रेस कार्यसमिति से जुड़े मिनट्स में फैसले का जिक्र

जवाहर लाल नेहरू ने अली सरदार जफरी को पत्र लिखा था। उसमें उन्होंने लिखा था, “मैं समझता हूँ कि पूरा गाना किसी को ठेस पहुँचाने वाला नहीं है। लेकिन मैं ये भी सोचता हूँ कि ये गाना राष्ट्रगान के ‘लायक’ नहीं है। इसके कुछ शब्द लोगों को समझ में नहीं आएँगे। क्योंकि इसमें व्यक्त भावनाएँ आज के राष्ट्रवाद के अनुकूल नहीं है। हमें आसान शब्दों वाले दूसरे राष्ट्रगान की तलाश करनी चाहिए।”

अली सरदार जफरी को लिखे पत्र में नेहरू का वंदे मातरम् के प्रति स्टैंड

यही नहीं, नेताजी सुभाष चंद्र बोस को लिखे नेहरू की 1937 की चिट्ठी में भी इस मुद्दे को लेकर सफाई दी गई है। चिट्ठी में नेहरू ने कथित तौर पर कहा था कि वंदे मातरम के बैकग्राउंड से मुस्लिमों को नाराज कर सकती है। एक सितंबर 1937 को लिखी इस चिट्ठी में नेहरू ने कटुता से लिखा कि ‘वंदे मातरम’ के शब्दों को किसी देवी से जोड़कर देखना बेतुका है। उन्होंने व्यंग्यपूर्ण ढंग से यह भी कहा कि ‘वंदे मातरम’ राष्ट्रीय गान के रूप में उपयुक्त नहीं है। 20 अक्टूबर 1937 को भी नेहरू ने नेताजी बोस को पत्र लिखकर दावा किया कि ‘वंदे मातरम’ की पृष्ठभूमि मुस्लिमों को नाराज कर सकती है।

नेहरु के पत्र में वंदे मातरम् को लेकर उनके विचार

फिर भी, मोहम्मद अली जिन्ना ने 1938 में The New Times of Lahore में वंदे मातरम् का विरोध करते हुए लिखा कि मुस्लिम किसी भी रूप में इस गीत को स्वीकार नहीं कर सकते। धीरे-धीरे यह विरोध धार्मिक से राजनीतिक रंग में बदल गया और देश विभाजन तक पहुँच गया।

आज भी समय के साथ नाम और बहाने बदल गए हैं, लेकिन मानसिकता वही है। कभी इसे इस्लाम विरोधी कहा जाता है, तो कभी सेकुलरिज्म के नाम पर अस्वीकार किया जाता है। बिहार विधानसभा में ओवैसी की पार्टी के विधायकों ने वंदे मातरम् गाने से इनकार किया, तो समाजवादी पार्टी के सांसद शफीकुर्रहमान बर्क ने संसद में इसे ‘इस्लाम के खिलाफ’ बताया।

बर्क का यह रवैया नया नहीं था, 1997, 2013 और 2019 में भी उन्होंने यही तर्क दोहराया। इसी तरह राजद नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी ने कहा, “जो एकेश्वर में विश्वास रखता है, वह वंदे मातरम् नहीं गा सकता।”

यह सोच केवल राजनीति तक सीमित नहीं रही। 2019 में देवबंद के मदरसे जामिया हुसैनिया के मुफ्ती तारिक कासमी ने आदेश जारी कर वंदे मातरम् और भारत माता की जय बोलने पर पाबंदी लगा दी, यह कहते हुए कि ‘इस्लाम में केवल अल्लाह की इबादत होती है।”

वंदे मातरम्: एक स्वर जो आज भी भारत की माटी से गूँजता है और हर बार कहता है ‘माँ, तुझे प्रणाम’

वंदे मातरम् किसी धर्म, मजहब या राजनीति का विषय नहीं, यह भारत की आत्मा की आवाज है। यह वह गीत है जिसने गुलामी की बेड़ियों में जकड़े लोगों को आजादी का सपना दिया। इसे गाना किसी पूजा का नहीं, बल्कि देश की मिट्टी के प्रति सम्मान का प्रतीक है।

150 वर्षों के बाद भी ‘वंदे मातरम्’ उतना ही प्रासंगिक है जितना स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में था। यह हर भारतीय के हृदय में गर्व, प्रेम और देशभक्ति की भावना जगाता है। यह गीत हमें याद दिलाता है कि हमारी मातृभूमि के प्रति समर्पण ही सच्चा राष्ट्रधर्म है।

‘हर इंडियन को US से भगाओ’: US में भारतीयों-हिंदुओं के खिलाफ आग उगलने वाले मैट फोर्नी से मीडिया हाउस ने जोड़े हाथ, जहरीले पोस्ट देख नौकरी से निकाला

अमेरिका में हिंदू और भारतीयों के प्रति जहर उगलने वाले मैट फोर्नी ने बुधवार (5 नवंबर 2025) को सोशल मीडिया पर दावा किया था कि वह टेक्सास स्थित मीडिया आउटलेट ‘द ब्लेज़’ में बतौर रिपोर्टर शामिल हो रहा है। लेकिन (7 नवंबर 2025) को उसी फोर्नी ने खुद बताया कि उसे ‘द ब्लेज़’ ने निकाल दिया है।

यह वही व्यक्ति है जिसने बार-बार भारतीयों और हिंदू संस्कृति के खिलाफ नफरत भरी टिप्पणियाँ की हैं, कभी दिवाली का मजाक उड़ाया, तो कभी हर भारतीय को देश से ‘निर्वासित’ करने की माँग की। ऐसे में ‘द ब्लेज़’ द्वारा उसे मौका देना और फिर तुरंत हटाना, इस बात का प्रमाण है कि उसकी जहरीली विचारधारा न सिर्फ समाज के लिए, बल्कि मीडिया संस्थानों की साख के लिए भी खतरा बन चुकी है।

कौन है मैट फोर्नी और उसे भारतीयों से क्या है दिक्कत

मैट फोर्नी खुद को लेखक और पत्रकार कहता है, लेकिन उसकी लिखावट और बयानबाजी किसी पत्रकारिता से नहीं, बल्कि नफरत से भरी विचारधारा से निकलती है। उसका अतीत विवादों से भरा है, महिलाओं को लेकर अपमानजनक लेख लिखना, अश्लील किताबें प्रकाशित करना और अब भारतीयों के खिलाफ नस्लभेदी बातें फैलाना, ये उसका ‘कॅरियर प्रोफाइल’ है।

पिछले कुछ महीनों में उसने सोशल मीडिया पर लगातार भारत, हिंदुओं और भारतीय प्रवासियों को निशाना बनाया। उसने न सिर्फ भारत की आलोचना की, बल्कि भारतीयों के प्रति गहरी नफरत जाहिर करते हुए ट्वीट किया “DEI means Deport every Indian” यानी विविधता (Diversity), समानता (Equity) और समावेश (Inclusion) जैसे सकारात्मक शब्दों को भी उसने नफरत के हथियार में बदल दिया।

ऐसा लगता है कि भारत के विकास, तकनीकी बढ़त और वैश्विक स्तर पर बढ़ते प्रभाव से मैट फोर्नी जैसे लोगों की नींद उड़ गई है। पश्चिम में बैठे कुछ कट्टरपंथी अब यह बर्दाश्त नहीं कर पा रहे कि भारतवासी सिर्फ आउटसोर्सिंग मजदूर नहीं, बल्कि विश्व राजनीति और तकनीक के नेतृत्वकर्ता बन रहे हैं।

द ब्लेज ने नफरत को पत्रकारिता में बदल दिया

असली सवाल ये है की अगर कोई व्यक्ति खुलेआम भारतीयों के निर्वासन की बात करता है, तो कोई मीडिया संगठन उसे ‘भारतीय मामलों का रिपोर्टर’ क्यों बनाता है? यही हुआ द ब्लेज के साथ, जो खुद को एक रूढ़िवादी मीडिया संगठन बताता है।

फोर्नी ने हाल ही में दावा किया कि उसे द ब्लेज में भारत से संबंधित रिपोर्टिंग का काम मिला है। लेकिन विडंबना यह रही कि जैसे ही उसने झूठ फैलाना शुरू किया भारत ने पाकिस्तान पर हमला किया जैसे फेक ट्वीट किए, उसे तुरंत ही Community Notes ने झूठा करार दे दिया। यानी जिसे भारतीय मुद्दों की समझ सिखानी थी, वह खुद बुनियादी तथ्यों से अनजान निकला।

इस घटना ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि पश्चिमी मीडिया अपने पत्रकारों की भर्ती में किस नैतिक स्तर तक गिर चुका है। जो व्यक्ति भारत के लोगों से नफरत करता है, वह भारतीय समाज पर रिपोर्टिंग कैसे कर सकता है? क्या पश्चिमी मीडिया अब ‘हिंदूफोबिया’ को भी ‘स्वतंत्र अभिव्यक्ति’ के नाम पर बेचने लगा है?

हिंदू विरोध की नई परंपरा: मजाक, झूठ और नस्लवाद

मैट फोर्नी के कई पुराने ट्वीट देखें तो पता चलता है कि उसका एजेंडा सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और धार्मिक नफरत से भरा है। उसने हिंदुओं के त्योहारों, खासकर दीवाली का मजाक उड़ाया, यहाँ तक कहा कि भारतीयों के कारण अमेरिका की IT कंपनियों का स्तर गिर गया है।

उसने कई बार यह भी इशारा किया कि भारतीय अमेरिकी नागरिक अमेरिकी नौकरियाँ छीन रहे हैं, जो वही पुरानी नस्लवादी सोच है जो कभी अश्वेतों और अब एशियाई लोगों पर थोप दी जाती है। यानी फोर्नी के लिए भारतीय सिर्फ एक समस्या हैं, चाहे वे डॉक्टर हों, इंजीनियर हों या शिक्षक।

पश्चिमी मीडिया का दोहरा चेहरा

पश्चिमी मीडिया अक्सर भारत को असहिष्णु देश बताने में सबसे आगे रहता है। लेकिन यही मीडिया तब खामोश हो जाता है जब उनके अपने पत्रकार हिंदुओं और भारतीयों के खिलाफ खुलेआम नफरत फैलाते हैं।

भारत में अगर कोई छोटा बयान भी किसी समुदाय के खिलाफ चला जाए, तो उसे तुरंत ‘hate speech’ बता दिया जाता है। मगर जब अमेरिका में कोई पत्रकार पूरे समुदाय के निर्वासन की बात करता है, तो वही बात ‘freedom of expression’ कहलाती है। यही है पश्चिमी उदारवाद का असली चेहरा दोहरे मानदंडों से भरा हुआ।

‘स्वतंत्र भाषण’ के नाम पर नफरत की आजादी

फोर्नी जैसे लोग ‘free speech’ का झंडा उठाते हैं, लेकिन इस झंडे के नीचे वे सिर्फ एक धर्म और एक समुदाय हिंदुओं पर वार करते हैं। वे जानते हैं कि हिंदू समाज शांतिप्रिय है, जवाब में हिंसा नहीं करेगा, इसलिए ये लोग हिंदू धर्म को निशाना बनाकर अपनी साहसिक पत्रकारिता का तमगा कमाते हैं।

लेकिन अगर यही बातें किसी और धर्म के खिलाफ कही जातीं, तो शायद फोर्नी अब तक अमेरिकी न्याय विभाग की जाँच का सामना कर रहा होता। यह दिखाता है कि अमेरिका और यूरोप में हिंदूफोबिया न केवल सामान्य है, बल्कि कई जगहों पर ‘acceptable hate’ बन चुका है।

भारतीयों के विकास से बौखलाहट

पिछले दशक में भारत का जो वैश्विक प्रभाव बढ़ा है, तकनीकी आर्थिक और रणनीतिक स्तर पर उसने कई पश्चिमी बुद्धिजीवियों की नींद उड़ा दी है। अमेरिका में भारतीय मूल के सीईओ, प्रोफेसर, वैज्ञानिक और राजनयिक अब शक्ति के केंद्रों में हैं।

फोर्नी जैसे लोग इस उभार को खतरा मानते हैं, क्योंकि यह उनकी पुरानी धारणाओं को तोड़ता है कि एशियाई सिर्फ आदेश पालन करने वाले लोग हैं। इसलिए वे भारत के खिलाफ डर फैलाने की कोशिश करते हैं कभी आईटी आउटसोर्सिंग का डर, कभी इमिग्रेशन का डर, कभी हिंदू राष्ट्रवाद का डर। असल में यह डर भारत की ताकत का प्रमाण है, क्योंकि जो देश कमजोर होता है, उसके खिलाफ कोई प्रचार नहीं करता।

सोशल मीडिया से सड़कों तक नफरत का असर

फोर्नी जैसे लोगों की नफरत सिर्फ ट्वीट तक सीमित नहीं रहती। अमेरिका और कनाडा में कई बार भारतीय मंदिरों पर हमले हुए, हिंदू विद्यार्थियों को कैंपस में अपमानित किया गया और ब्राह्मण कहकर निशाना बनाया गया।

यह माहौल सोशल मीडिया से बनता है, जब एक पत्रकार भारत के खिलाफ खुलेआम गालियाँ देता है, तो आम लोग उसी नफरत को सही ठहराने लगते हैं। इसलिए यह केवल ऑनलाइन ट्रोलिंग नहीं, बल्कि हिंसा की वैचारिक तैयारी है।

क्या यही है भारत पर रिपोर्टिंग?

फोर्नी जैसे व्यक्ति को भारत पर रिपोर्टिंग का जिम्मा देना वैसा ही है जैसे किसी नस्लभेदी को अफ्रीकी देशों पर रिपोर्टिंग का काम सौंपना। यह पश्चिमी मीडिया के नैतिक पतन का प्रतीक है।

जो व्यक्ति कहता है कि हर भारतीय को देश से बाहर निकालो, वह भारत के समाज, संस्कृति और राजनीति को निष्पक्ष नजर से कैसे देख सकता है? उसकी कलम पहले से ही जहर में डूबी है।

बिहार में रिकॉर्ड तोड़ मतदान देख AltNews का मोहम्मद जुबैर तिलमिलाया, DD न्यूज और PM मोदी पर फर्जी जानकारी फैलाकर करवाई अपनी फजीहत: जानिए पूरा मामला

बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण का मतदान गुरुवार (6 नवंबर 2025) को संपन्न हुआ, जिसमें रिकॉर्ड 64.66% मतदान दर्ज किया गया। यह अब तक के राज्य के चुनावी इतिहास में सबसे ज्यादा वोटिंग प्रतिशत है। चुनाव आयोग (ECI) ने इसे मतदाताओं के लोकतंत्र पर भरोसे और इस बार लागू की गई नई वोटर-फ्रेंडली पहलियों की सफलता का प्रतीक बताया।

इस बीच, चुनावों के दौरान कुछ लोगों ने फर्जी खबरें फैलाने की कोशिश भी की। AltNews के मोहम्मद जुबैर ने DD News और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ एक्स पर भ्रामक जानकारी पोस्ट की, जिसका उद्देश्य चुनावी प्रक्रिया पर संदेह पैदा करना था।

बिहार चुनाव के पहले चरण के मतदान के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने क्या ट्वीट किया?

गुरुवार (6 नवंबर 2025) को मतदान प्रक्रिया पूरी होने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक्स पर बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण को लेकर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने लिखा, “बिहार विधानसभा चुनावों में पहले चरण की वोटिंग में एनडीए ने भारी बढ़त हासिल कर ली है। इसके साथ ही दूसरे चरण में भी हर तरफ उसकी लहर नजर आ रही है।”

प्रधानमंत्री ने आगे लिखा, “जनता-जनार्दन के इसी जोश के बीच कल दोपहर करीब 1:45 बजे औरंगाबाद और लगभग 3:30 बजे भभुआ में अपने परिवारजनों से संवाद का सौभाग्य प्राप्त होगा।” पीएम मोदी का यह पोस्ट चुनावी नेताओं की सामान्य प्रतिक्रिया की तरह था, जिसमें वे अपनी पार्टी की बढ़त का दावा करते हुए जीत का भरोसा जताते हैं।

DD न्यूज ने पीएम मोदी के हवाले से क्या ट्वीट किया?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ट्वीट का हवाला देते हुए DD न्यूज ने ट्वीट किया, “पहले चरण में भी लहर जारी बिहार चुनाव के पहले चरण में कलाकारों ने शानदार बढ़त बनाई है, जनता-जनार्दन के जोश के बीच कल दोपहर 1:45 बजे और 3:30 बजे भभुआ में अपने परिवारजनों से संवाद करेंगे।”

DD न्यूज ने मूलतः प्रधानमंत्री मोदी के पोस्ट के शब्दों को ही ट्वीट किया, जिसमें न केवल उनकी जीत की उम्मीद को दर्शाया गया, बल्कि उससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह कि उन्होंने भभुआ में उनकी व्यस्तता के बारे में भी ट्वीट किया।

AltNews के मोहम्मद ज़ुबैर ने क्या ट्वीट किया

DD News के एक ट्वीट के तुरंत बाद, AltNews का सह-संस्थापक मोहम्मद जुबैर, जो अक्सर हिंदुओं के खिलाफ भड़काऊ बयान और फेक न्यूज फैलाने के आरोपों में रहता है, उसने एक्स पर उसका स्क्रीनशॉट शेयर करते हुए एक भ्रामक पोस्ट कर दी।

जुबैर ने लिखा, “राष्ट्रीय प्रसारक @DDNewsHindi को कैसे पता कि बिहार के पहले चरण में NDA आगे चल रहा है?” उसके इस ट्वीट से यह संकेत दिया गया कि DD News को पहले से मालूम है कि वोट NDA के पक्ष में पड़े हैं यानी चुनाव में पहले से धांधली या ‘वोट चोरी’ हो चुकी है। यह वही झूठा नैरेटिव था जिसे राहुल गाँधी, कॉन्ग्रेस और विपक्षी दल फैला रहे थे।

जुबैर के ट्वीट का मकसद यह दिखाना कि चुनाव पहले से ही NDA के पक्ष में ‘सैट’ कर दिए गए हैं और DD News (जो सरकारी प्रसारक है) को मोदी सरकार या खुद प्रधानमंत्री मोदी की ओर से NDA की जीत का संदेश देने के निर्देश मिले हैं।

फैक्ट चेक: मोहम्मद जुबैर कैसे फैला रहा था फर्जी खबरें?

DD News का ट्वीट दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पोस्ट का हूबहू अनुवाद था। पीएम मोदी ने अपने ट्वीट में केवल राजनीतिक उत्साह व्यक्त करते हुए कहा था कि बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण में NDA को बढ़त मिली है और जनता में जबरदस्त जोश दिख रहा है। यह एक सामान्य राजनीतिक बयान था, न कि किसी तरह का चुनावी नतीजा या भविष्यवाणी।

लेकिन AltNews के मोहम्मद जुबैर ने DD News के इसी ट्वीट का अंग्रेजी अनुवाद डालकर उसे इस तरह पेश किया मानो दूरदर्शन ने खुद NDA की बढ़त की घोषणा कर दी हो। जुबैर का यह तरीका भ्रामक था, क्योंकि अंग्रेजी में अनुवाद के कारण यह तुरंत समझ नहीं आता कि DD News ने सिर्फ प्रधानमंत्री की पोस्ट को शेयर किया है, अपनी कोई स्वतंत्र राय नहीं दी।

जुबैर के पोस्ट से यह झूठा संकेत देने की कोशिश की गई कि प्रधानमंत्री मोदी को पहले से चुनाव परिणामों की जानकारी थी, जबकि यह बिल्कुल गलत है। दरअसल, सभी राजनीतिक दल और नेता मतदान समाप्त होने के बाद अपने-अपने पक्ष में बढ़त का दावा करते हैं, यह चुनावी राजनीति का सामान्य हिस्सा है, न कि किसी नतीजे की पूर्व जानकारी।

उदाहरण के तौर पर पीएम मोदी की तरह ही, राजद के तेजस्वी यादव ने भी एक्स का सहारा लेकर दावा किया कि पहले चरण का मतदान समाप्त होने के बाद राजद आगे चल रही है। महागठबंधन के नेता तेजस्वी यादव ने एक लंबी पोस्ट में दावा किया कि पहले चरण के बाद महागठबंधन को समर्थन दिखाई देने लगा है।

उन्होंने ट्वीट किया, “20 साल में पहली बार महागठबंधन के पक्ष में अभूतपूर्व बदलाव की लहर दिख रही है। हर घर से नहीं, बल्कि हर दिल से एक ही आवाज गूँज रही है: अबकी बार हम नई युवा सरकार लाएँगे, हर घर से सरकार चलाएँगे  और हर बिहारी को चिंतामुक्त और परिवर्तनकारी, यानी मुख्यमंत्री बनाएँगे।”

अगर कोई न्यूज चैनल तेजस्वी यादव का यही बयान शब्दशः साझा करे, तो क्या इसका मतलब यह होगा कि चैनल या यादव ने चुनाव परिणाम पहले से जान लिए? बिल्कुल नहीं।

ऐसे में मोहम्मद जुबैर का यह भ्रामक पोस्ट न केवल गलत सूचना फैलाने वाला है, बल्कि चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़ा करता है। चुनाव के दौरान इस तरह की फेक न्यूज लोकतंत्र की पारदर्शिता और निष्पक्षता के लिए खतरनाक साबित हो सकती है।

मोहम्मद जुबैर कैसे नियमित रूप से फैलाता है फर्जी खबरें और बनता है इस्लामवादियों का मुखपत्र

मोहम्मद जुबैर अक्सर इस्लाम या आतंकवाद की आलोचना करने वालों को चुप कराने के लिए फेक न्यूज और व्यक्तिगत हमलों (ad hominem attacks) का सहारा लेता है। जब कोई व्यक्ति इस्लाम से जुड़ी किसी बात पर तथ्य आधारित आलोचना करता है, तो जुबैर उस व्यक्ति को निशाना बनाता है, उसे ‘इस्लामोफोबिया’ का आरोप लगाकर ट्रोल्स की भीड़ उसके पीछे छोड़ देता है। यह उसका पुराना और आजमाया हुआ तरीका बन चुका है।

जुबैर अक्सर असल तथ्यों की जाँच करने के बजाय बहस करने वाले व्यक्ति की छवि खराब करने पर ध्यान देते हैं। उदाहरण के तौर पर, उसने बीजेपी की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा के खिलाफ सोशल मीडिया पर अपनी भीड़ को उकसाया था।

नूपुर शर्मा ने टीवी डिबेट में पैगंबर मोहम्मद और आयशा के रिश्ते पर जो बातें कही थीं, वे कई प्रसिद्ध इस्लामी विद्वानों द्वारा पहले भी दोहराई जा चुकी हैं। लेकिन जुबैर ने उस पर कोई तथ्य-जाँच नहीं की, बल्कि व्यक्तिगत हमले किए और उन्हें निशाना बनाया।

इसी तरह, हाल ही में उसने धर्मस्थल को लेकर झूठी खबर फैलाने की कोशिश की ताकि हिंदुओं को बदनाम किया जा सके। इसके अलावा, उसने महू में मुस्लिमों द्वारा की गई हिंसा के लिए हिंदुओं को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश की, बांग्लादेश में हिंदुओं के नरसंहार को सफेद झूठों से ढकने की कोशिश की और कांवड़ यात्रियों द्वारा पुलिस पर हमले की झूठी खबर फैलाई।

ऐसे कई मामलों में मोहम्मद जुबैर ने झूठी खबरें फैलाकर समाज में भ्रम और नफरत पैदा करने का काम किया है। उसके इन कारनामों पर विस्तार से OpIndia ने कई बार रिपोर्ट प्रकाशित की है, जिन्हें यहाँ पढ़ा जा सकता है।

जब इलाके में मुस्लिम हैं ही नहीं तो वोटर लिस्ट में कैसे जुड़े उनके नाम?: गुजरात के बापूनगर में स्थानीयों ने उठाए सवाल, ऑपइंडिया से बोले- SIR होना बहुत जरूरी

बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया सफलतापूर्वक पूरी होने के बाद, चुनाव आयोग ने अब दूसरे चरण में देश के 12 राज्यों में यह प्रक्रिया शुरू की है, जिसमें गुजरात भी शामिल है।

यह प्रक्रिया मंगलवार (4 नवंबर 2025) से शुरू हुई है। इसी दौरान अहमदाबाद के बापूनगर विधानसभा क्षेत्र से एक गंभीर शिकायत सामने आई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि हिंदू बहुल इलाकों की मतदाता सूची में मुस्लिम नाम दर्ज किए गए हैं, जबकि वहाँ मुस्लिम आबादी नहीं रहती।

यह मामला बापूनगर के राखियाल इलाके की प्रेरणा सोसाइटी और नरोत्तमदासनी चाली से जुड़ा है। स्थानीय निवासियों ने बताया कि उनके इलाके में कुछ ईसाई परिवार तो रहते हैं, लेकिन मुस्लिम नहीं। फिर भी मतदाता सूची में मुस्लिम नाम दर्ज मिल रहे हैं।

लोगों ने यह भी बताया कि मतदाता सूची में उनके मकान नंबर तक गलत लिखे गए हैं। उन्होंने इस पर सवाल उठाते हुए कहा कि ऐसी त्रुटियों को सुधारने के लिए SIR प्रक्रिया जरूरी है ताकि फर्जी या डुप्लिकेट नाम हटाए जा सकें।

ऑपइंडिया की टीम जब मौके पर पहुँची और स्थानीय लोगों से बात की, तो उन्होंने इस प्रक्रिया का समर्थन किया और कहा कि मतदाता सूची को पारदर्शी और सही बनाए रखना बेहद जरूरी है।

(फोटो: ऑपइंडिया)

जब ऑपइंडिया की टीम अहमदाबाद के बापूनगर स्थित राखियाल इलाके की प्रेरणा सोसाइटी पहुँची, तो वहाँ के लोगों ने बताया कि इस सोसाइटी में सालों से सिर्फ हिंदू और ईसाई लोग ही रहते आए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यहाँ कभी कोई मुस्लिम परिवार नहीं रहा, फिर भी मतदाता सूची में कुछ मुस्लिम नाम दर्ज हो गए हैं।

सोसाइटी में लंबे समय से रह रहे एक व्यक्ति ने बताया कि वोटर लिस्ट में कुछ नाम गलत हैं और इन्हें हटाने के लिए SIR प्रक्रिया जरूरी है। वहीं, कनुभाई क्रिश्चियन नाम के निवासी ने बताया कि वह बचपन से यहीं रह रहे हैं और उन्होंने कहा, “हमारी सोसाइटी में न तो अक्षबानू नाम की कोई महिला रहती हैं, न ही कोई और मुस्लिम परिवार।” उनका मानना है कि मतदाता सूची में सिर्फ उन्हीं लोगों के नाम होने चाहिए जो वास्तव में यहाँ रहते हैं।

एक बुज़ुर्ग महिला ने भी यही बात दोहराई। उन्होंने बताया कि वह लगभग 40 सालों से इस सोसाइटी में रह रही हैं और उनकी चाली में सिर्फ हिंदू परिवार हैं। उन्होंने कहा कि मतदाता सूची में कुछ गलत नाम जोड़ दिए गए हैं जिन्हें हटाया जाना चाहिए।

ऑपइंडिया ने जब इलाके के एक 18-19 साल के युवक से बात की, तो उसने बताया कि वह जन्म से ही इसी सोसाइटी में रह रहा है। उसके अनुसार, इस चाली और सोसाइटी में सिर्फ हिंदू परिवार रहते हैं, कोई मुस्लिम नहीं। उसने कहा कि अगर वोटर लिस्ट में मुस्लिम नाम आए हैं, तो यह गलत है और ऐसे नामों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। युवक ने कहा कि ऐसी गड़बड़ियों को दूर करने के लिए SIR प्रक्रिया बहुत जरूरी है।

महेशभाई नाम के एक और स्थानीय निवासी ने बताया कि वह पिछले 53 सालों से इस इलाके में रह रहे हैं। उन्होंने कहा, “मैंने कभी नहीं सुना कि इस सोसाइटी या चाली में किसी मुस्लिम व्यक्ति ने घर खरीदा हो या किराए पर लिया हो।” उन्होंने शक जताया कि यह किसी साजिश का हिस्सा हो सकता है और इसकी पूरी जाँच होनी चाहिए कि हिंदू बहुल इलाके की मतदाता सूची में मुस्लिम नाम कैसे शामिल हो गए।

SIR प्रक्रिया को लेकर महेशभाई ने कहा कि मतदाता पंजीकरण का सत्यापन बिल्कुल सही कदम है। उन्होंने कहा, “ऐसी गड़बड़ियों को अभी ही ठीक करना जरूरी है, क्योंकि अगर बाद में मामला बढ़ गया तो इसे संभालना मुश्किल होगा। अभी जो जाँच चल रही है, वह बिल्कुल सही दिशा में है।”

आमतौर पर हर चुनाव से पहले मतदाता सूची में केवल छोटे-मोटे संशोधन किए जाते हैं, लेकिन पूरी तरह से समीक्षा नहीं होती। इसी वजह से कई गलतियाँ और फर्जी नाम सूची में बने रह जाते हैं। ऐसे में SIR (विशेष गहन पुनरीक्षण) जैसी प्रक्रिया बेहद जरूरी है ताकि मतदाता सूची को पूरी तरह सही किया जा सके।

बापूनगर से आई शिकायतें यह दिखाती हैं कि गुजरात समेत पूरे देश में SIR क्यों जरूरी है। पिछली बार यह प्रक्रिया कई दशक पहले हुई थी और अब चुनाव आयोग फिर से पूरी मतदाता सूची का सत्यापन और संशोधन कर रहा है ताकि डुप्लिकेट नाम हट सकें और सही मतदाता सूची में शामिल रहें।

बिहार में यह प्रक्रिया सफल रही थी और अब इसे गुजरात, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश समेत 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में शुरू किया गया है। SIR के तहत बीएलओ (बूथ लेवल अधिकारी) घर-घर जाकर दस्तावेज़ों की जाँच करेंगे और मतदाता सूची को नए सिरे से तैयार करेंगे। इससे फर्जी या गलत नाम हटाए जा सकेंगे।

यह प्रक्रिया करीब एक महीने तक चलेगी। इसके बाद जिनके नाम हटाए जाएँगे, उन्हें अपील करने का मौका दिया जाएगा। अंतिम मतदाता सूची फरवरी में जारी होने की संभावना है।

गुजरात में पहले भी कई बार ऐसे मामले सामने आए हैं, जहाँ बांग्लादेशी घुसपैठियों द्वारा जाली दस्तावेज बनाकर मतदाता सूची में नाम जोड़े गए। SIR प्रक्रिया से ऐसे अवैध मतदाताओं की पहचान कर उनके नाम हटाए जा सकेंगे, जिससे चुनाव प्रक्रिया और अधिक पारदर्शी बनेगी।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से गुजराती में लिंकन सोखाडिया ने लिखी है जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें)

पवित्र पहाड़ी पर मद्रास HC का फैसला हिंदुओं के पक्ष में आया, तो मुस्लिमों को पीड़ित दिखाने वाली कहानी गढ़ने में जुट गया TNM: BJP पर लगाया ‘एक और अयोध्या’ बनाने का आरोप

तमिलनाडु के मदुरै में स्थित प्रसिद्ध ‘थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी’ हिंदू और मुस्लिम के बीच तनाव का कारण रहा है। हालाँकि मद्रास हाईकोर्ट ने हिंदुओं के पक्ष में अपना फैसला सुना कर भगवान मुरुगन की इस पहाड़ी पर विवाद खत्म करने की कोशिश की है।

पहाड़ी के नाम से लेकर सुल्तान सिकंदर बधुशा दरगाह (मंदिर) में पशु बलि की प्रथा और नेल्लितोप्पु क्षेत्र में मुसलमानों के इबादत करने के अधिकार पर अक्टूबर में मद्रास हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया, जिसकी काफी चर्चा की गई।

हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि पवित्र स्थल का नाम ‘थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी‘ ही रहेगा, सिविल न्यायालय के फैसले तक पशु बलि पर प्रतिबंध रहेगा और मुसलमान केवल रमज़ान और बकरीद के दौरान ही नेल्लितोप्पु क्षेत्र में शर्तों के साथ इबादत कर सकेंगे।

यह जगह सनातन धर्म के अनुयायियों के लिए काफी पूजनीय है, क्योंकि यहाँ ऐतिहासिक अरुलमिघु सुब्रमण्यम स्वामी का मंदिर है, जो भगवान मुरुगन के छह निवास स्थानों में एक माना जाता है।

फिर भी, वामपंथी मुखपत्र ‘द न्यूज मिनट’ ने कोर्ट के फैसले के बावजूद इस मुद्दे को फिर से हवा देने की कोशिश की है। इसका मकसद धार्मिक भावनाओं को भड़काना और भारतीय जनता पार्टी को निशाना बनाना है। 5 नवंबर को प्रकाशित ‘दक्षिण की अयोध्या – अनादि काल की एक समयरेखा’ शीर्षक वाले लेख में, मुस्लिमों को ‘पीड़ित’ दिखाने की झूठी कोशिश की गई। इसके लिए तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया।

‘अयोध्या’ का जिक्र किए जाने से साफ पता चलता है कि मीडिया हाउस इस लेख के जरिए क्या हासिल करना चाहता है। इस दौरान इस बात को भी नजरअंदाज कर दिया गया कि राम जन्मभूमि का फैसला सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया था। हालाँकि, यह वामपंथी प्रोपेगेंडा ऐसे फैसलों को तभी स्वीकार करता है जब वे उनके अनुसार हो। वरना वे हर संस्था को समझौतावादी बताते हैं या फैसलों का सम्मान नहीं करते, जैसा कि इस स्थिति में भी हुआ।

मुस्लिम को ‘पीड़ित’ बता बीजेपी पर हमला तेज

आर्टिकल में 4 जुलाई को 52 वर्षीय रसोइये सैयद अबुताहिर के साथ हुए एक साक्षात्कार का हवाला दिया गया है, जो तिरुपरनकुंड्रम स्थित दरगाह पर एक बकरे की बलि देना चाहते थे। उन्होंने दावा किया कि ‘सुन्नी मुसलमानों ने अपनी सूफी तीर्थयात्रा की तारीख क्रिसमस पर बदल दी। ताकि उनके गैर-ब्राह्मण हिंदू पड़ोसी इस उत्सव में शामिल हो सकें।”

हालाँकि, एक पुलिस निरीक्षक ने उन्हें बताया कि यहाँ पशुबलि निषेध है और उन्हें रोक दिया। दरगाह समिति के सदस्यों, स्थानीय जमात और कई मुस्लिम नेताओं ने इसका विरोध किया। लेकिन पुलिस ने तुरंत कार्रवाई की। इस दौरान आरोप लगा कि केवल मुस्लिम पुरुषों पर ही एफआईआर दर्ज कीं, जबकि हिंदुओं, महिलाओं और बच्चों को छोड़ दिया गया।

(फोटो साभार- द हिन्दू)

इस लेख की शुरुआत में मुसलमानों को ऐसे चित्रित किया गया, जैसे वे काफी प्यार से रहते हैं और ‘गैर ब्राह्मण’ हिन्दुओं के लिए अपनी आस्था तक कुर्बान कर देते हैं। लेख में थोड़ा आगे बढ़ते ही हिंदू मुन्नानी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर हमला शुरू हो गया। जाहिर तौर पर वामपंथी प्रोपेगेंडा शुरू था, ताकि राज्य विधानसभा चुनावों के नजदीक आते ही इस मुद्दे को तूल दिया जा सके। लेख में हिन्दुओं पर पहाड़ी पर पूर्ण नियंत्रण के लिए राज्यव्यापी आंदोलन चलाने का भी आरोप लगाया गया।

मीडिया संस्थान ने इस बात पर जोर दिया कि हिंदू वर्ग दरगाह में नमाज पढ़ने और पशु बलि पर रोक लगाना चाहते थे, क्योंकि उनका तर्क था कि यह पूरी चट्टान हिंदू देवता मुरुगन के शरीर का प्रतिनिधित्व करती है।

अबुताहिर ने तो यह भी आरोप लगाया कि इस स्थल पर मुस्लिम प्रथाओं को लेकर वर्षों से कोई समस्या नहीं रही है, और यह भी कहा कि अगर पहले कोई आपत्ति नहीं थी, तो अब भी नहीं होनी चाहिए।

सबसे पहले तो यह तर्क ही त्रुटिपूर्ण है। क्योंकि कोई खास प्रथा वर्षों से चली आ रही है, इसका मतलब यह नहीं है कि उसे जारी रहने दिया जाना चाहिए। क्या इसी तरह तीन तलाक कानून जैसी प्रथाओं को भी वैसे ही छोड़ दिया जाना चाहिए था, जैसा पहले था। इसके लिए कानूनी बदलाव ये बताता है कि प्रथाएँ हमेशा सही नहीं होती।

इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह कोई हालिया विवाद नहीं है, बल्कि एक सदी से भी ज़्यादा समय से चला आ रहा है। हिंदुओं ने हमेशा से पूरी पहाड़ी पर अपना स्वामित्व बनाए रखा है, खासकर 1920 में दरगाह द्वारा मंडप बनाने के प्रयास के बाद से।

‘समन्वित पूजा स्थल’ और ‘सांप्रदायिक सद्भाव’ स्थल होने का दावा

लेख के अनुसार, जब पुलिस ने मुस्लिम कट्टरपंथियों को गिरफ्तार किया, तब न तो स्थानीय भाजपा इकाई और न ही कोई अन्य हिंदुत्व संगठन ‘तस्वीर में’ था। पुलिस को पशु बलि के संबंध में तिरुपरनकुंड्रम के किसी भी हिंदू निवासी से कोई औपचारिक शिकायत नहीं मिली थी।

दिलचस्प बात यह है कि मुस्लिम पक्ष ने इस मुद्दे को लेकर अदालत का रुख किया और दलीलों के दौरान दावा किया कि यह एक ‘समन्वित पूजा स्थल है जहाँ दोनों या सभी धर्मों के तीर्थयात्री आते हैं’। उन्होंने यह भी कहा कि ‘दरगाह में हलाल समारोह आयोजित करने वाला व्यक्ति परमशिवम नाम का एक हिंदू है, जो मुक्कुलाथोर या थेवर समुदाय का सदस्य है।’

परमशिवम के बेटे का हस्ताक्षर युक्त शपथ पत्र भी लेख में दिखाया गया है, जिसमें उसे ‘दरगाह का भक्त’ बताया गया है। लेख में कहा गया है कि परमशिवम का परिवार ‘हलाल’ करता है और एक पुराने अनुष्ठान के तहत मांस का एक हिस्सा अपने पास रखता है।

(फोटो साभार- तमिलनाडु टूरिज्म)

इस्लामी आस्था के प्रतीक दरगाह को समन्वित संस्कृति और सांप्रदायिक सद्भाव स्थल के रूप में बताया गया है। साथ ही कहा गया कि इसके कार्यक्रम में हिंदू भी भाग लेते हैं, जो बेहद निराशाजनक है।

ईद या क्रिसमस पर हिंदुओं की भागीदारी या किसी मंदिर में गैर-हिंदुओं का जाना, इन अवसरों या स्थलों की धार्मिक प्रकृति को नुकसान नहीं पहुँचाता। इससे धार्मिक तत्वों को अलग नहीं किया जा सकता, भले ही इनमें विभिन्न धर्मों के लोग शामिल हों।

इसी तरह, जब हिंदू सैकड़ों वर्षों से पहाड़ी पर अपने वैध दावों के लिए संघर्ष कर रहे हैं और उन्हें लगातार इससे वंचित रखा जा रहा है, तो यह सांप्रदायिक सद्भाव का प्रतिनिधित्व कैसे कर सकता है?

दरगाह के कार्यक्रमों में शामिल कुछ हिंदुओं की हरकतें, व्यापक हिंदू समुदाय की भावनाओं का प्रतिनिधित्व नहीं करती। हिन्दुओं की आस्था को दूसरों की आस्था के समान ही महत्वपूर्ण क्यों नहीं माना जाना चाहिए?

फर्जी बयान को बनाए रखने के लिए आधिकारिक बयानों पर संदेह

तिरुपरनकुंद्रम राजस्व निरीक्षक के अनुसार, “दरगाह तक जाने वाले आम रास्ते को मुसलमानों ने जाम कर दिया था। उन्होंने बताया कि मुस्लिमों ने ‘पुलिस को अपना कर्तव्य निभाने से रोका’ और शिकायत में ‘पुलिस अराजकता मुर्दाबाद’ समेत कई विवादित नारे लगाए गए।” लेख में सवाल किया गया कि एक समुदाय के तीर्थयात्रियों को दूसरे समुदाय के तीर्थयात्रियों को दरगाह तक जाने देने में क्या आपत्ति हो सकती है?

(फोटो साभार- आउटलुक ट्रेवलर)

इसका जवाब शायद वैसा ही हो सकता है जैसे हर त्योहार पर हिंदू जुलूसों पर हमले होते हैं और उन्हें अक्सर ‘मुस्लिम इलाकों’ से गुजरने की इजाजत नहीं दी जाती। हालाँकि, वामपंथी लॉबी इस चर्चा के लिए तैयार नहीं है और न ही कभी होगी। उन्हें सबसे ज़्यादा परेशान करने वाली बात उनके पसंदीदा जनसांख्यिकी की सच्चाई को उजागर करने वाली असुविधाजनक सच्चाइयाँ हैं। इसलिए वे समुदाय के हर नापाक पहलू को नज़रअंदाज करते रहते हैं।

लेख में बताया गया है कि राजस्व निरीक्षक के आरोपों को मदुरै के पुलिस आयुक्त जे लोगनाथन ने मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ में अपनी याचिका में दोहराया और इस बात पर अफसोस जताया कि वे यह बताने को तैयार नहीं थे कि कैसे ‘राजपलायम के हिंदू अपने मुस्लिम पड़ोसियों के साथ एक परिवार की तरह बकरे की बलि देने और सूफ़ी रीति-रिवाजों में हिस्सा लेने के लिए यात्रा करते थे’, ताकि ‘सांप्रदायिक सद्भाव’ का प्रचार जोर शोर से किया जा सके।

कथित तौर पर अबुताहिर ने लगभग पंद्रह मिनट तक बात की और फिर अचानक संपर्क तोड़कर गायब हो गए। उन्होंने जमात के उन सदस्यों से भी संपर्क तोड़ दिया जिन्होंने मीडिया हाउस को उनसे संपर्क करवाया था और बातचीत जारी रखने के लिए तभी राज़ी हुए जब मदुरै के वकील एस वंचिनाथन ने उनका मामला लेने का वादा किया और उनके गायब होने के लिए स्थानीय पुलिस को जिम्मेदार ठहराया।

इसके बाद लेख में एक ‘आदर्श समाज’ को दिखाने की कोशिश की गई है। इसमें कहा गया कि एक अकेला मुस्लिम परिवार हिंदुओं के बीच रहता है। दोनों समुदायों के लोग तब तक मिलजुलकर रहते हैं, जब तक कि भाजपा या हिंदुत्व कार्यकर्ता उनके बीच तनाव पैदा नहीं कर देते।

हिंदू भावनाओं को नजरअंदाज किया गया

यह लेख बड़ी चालाकी से दोष दोनों पर डाल देता है। इस दौरान इस बात को नज़रअंदाज़ किया गया है कि यह मामला लंबे समय से हिंदू धार्मिक भावनाओं से जुड़ा हुआ है और राजनीति से इसका कोई लेना-देना नहीं है। यह लेख मूलतः हिंदुओं से ‘सांप्रदायिक सद्भाव’ के नाम पर अपने अधिकारों को छोड़ने या आरोप झेलने के लिए तैयार रहने को कहता है।

लेख के अनुसार, पुलिस ने जिला कलेक्टर से आदेश मिलने का दावा किया और उन्हें पहाड़ी पर चढ़ने से रोक दिया, लेकिन जमात ने जब जाँच की तो पाया कि ऐसा कोई आदेश नहीं दिया गया था। अधिकारियों ने तब दावा किया कि ये निर्देश जिला के राजस्व विकास अधिकारी (आरडीओ) ने जारी किए गए थे। हालाँकि, मुसलमानों ने दावा किया कि पुलिस को ऐसा कोई निर्देश जारी नहीं किया गया था।

अगर यह सच है, तो क्या यह वर्तमान सरकार के अधीन अधिकारियों की प्रशासनिक विफलता नहीं है? हालाँकि, लेख में जिम्मेदार अधिकारियों से सवाल पूछने के बजाय, हिंदू समूहों और भाजपा से सवाल पूछे गए हैं। ऐसा तब है जब राज्य विधानसभा में भाजपा के सिर्फ 4 सदस्य हैं।

लेख में यह भी जोड़ा गया कि जैनियों ने पुरातात्विक साक्ष्य प्रस्तुत किए हैं जिनसे पता चलता है कि उन्होंने अन्य दो धर्मों से बहुत पहले तीर्थस्थल स्थापित किए थे, बिना यह बताए कि कैसे इस्लामवादियों ने उनकी गुफाओं को भी नहीं छोड़ा और उन्हें हरे रंग से रंग दिया।

लेख में कहा गया, “इस संघर्ष से जुड़े बदलते कानूनी और राजनीतिक समीकरणों ने विस्तार से बताया कि कैसे पुलिस और नौकरशाही की कार्रवाइयों ने एक खालीपन पैदा किया , जिसे भाजपा ने अपने हिंदुत्व के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए तेजी से भर दिया।”

निष्पक्षता का भ्रम पैदा करने के लिए लेख में दावा किया गया कि “धर्मनिरपेक्ष समूह पुलिस और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) के नेतृत्व वाली राज्य मशीनरी से बेहद निराश हैं, जिसे वे द्रविड़ मॉडल की सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्धता को सक्रिय रूप से कमज़ोर करने वाला मानते हैं।”

पूरा लेख हिंदुत्व और भाजपा की निंदा करने के लिए समर्पित है, जबकि जिस सरकार को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए, उसकी आलोचना केवल राज्य में उनकी बढ़ती उपस्थिति के बावजूद “सामाजिक न्याय” प्रदान करने में विफल रहने के लिए की जा रही है।

गौरतलब है कि यह वही पार्टी है जिसके मंत्री, विधायक और यहाँ तक कि सांसद भी सनातन धर्म को खत्म करना चाहते हैं। इसके प्रति अपनी घृणा सार्वजनिक तौर पर जाहिर कर चुके हैं। यह बेहद हास्यास्पद है कि लेख में यह सुझाव दिया गया है कि ऐसे प्रशासन ने उन शरारती ‘हिंदुत्ववादी ताकतों’ के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की, जिनका वास्तव में राज्य में कोई दबदबा नहीं है।

इसके बाद मीडिया संस्थान ने इसी बयानबाजी को दोहराया और कहा कि ‘हिंदुत्व समूह इसे दक्षिण भारत का अयोध्या कह रहे हैं।’ इसने आगे इस बात की निंदा की कि कैसे ‘हिंदू मुन्नानी, हिंदू मक्कल कच्ची, आरएसएस और भाजपा लगभग पाँच लाख लोगों के साथ 22 जून को मदुरै में मुरुगन ‘मानडु’ (सम्मेलन) के लिए एकत्रित हुए।’ यह राज्य के इतिहास में सबसे बड़ा हिंदुत्व सम्मेलन था।

इस दौरान पूरी पहाड़ी पर कब्जा करने का संकल्प लिया गया। भगवान मुरुगन के इस निवास स्थान में मौजूद दरगाह में पशु बलि पर रोक लगाने की माँग की गई। हिंदू मक्कल कच्ची ने अदालत में सिकंदर मलाई नाम के इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए याचिका दायर की और इस बात पर ज़ोर दिया कि मुरुगन के कई नामों में से एक के सम्मान में पहाड़ी को स्कंदर मलाई कहा जाए।

मुसलमानों ने उस स्थान पर अपनी बलि प्रथा जारी रखी और मुस्लिम नेताओं ने भी उस स्थान का दौरा किया। हालाँकि, मीडिया संगठन ने सिर्फ हिंदुओं के वहाँ जमा होकर लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने पर आपत्ति जताई। अगर हिंदू धर्मनिरपेक्षता के निर्धारित मार्ग से ज़रा भी विचलित होते हैं, अपनी धार्मिक पहचान का दावा करते हैं या कोई सच्ची माँग करते हैं, तो अदालत के फैसले की परवाह किए बिना उन्हें ‘हिंदुत्ववादी’ करार दिया जाएगा।

कानूनी विवादों का इतिहास एक सदी पुराना है

लेख में आरोप लगाया गया है कि “कुंड्रम, कुंदरू या मलाई हर एक नाम और दावे के पीछे एक कहानी है, जो उस समय से जुड़ी है जिसका ऐतिहासिक साक्ष्य काफी कम है।” हालाँकि, जैसा कि पहले बताया गया है, दरगाह ने 1920 में एक मंडप बनाने की कोशिश की, लेकिन तिरुपरनकुंड्रम स्थित अरुलमिगु सुब्रमण्यम स्वामी मंदिर ने पूरे क्षेत्र पर स्वामित्व की घोषणा की।

निचली अदालत ने 1923 में कहा कि मंदिर के पास लगभग पूरी पहाड़ी है, सिवाय नेल्लीथोप्पु की लगभग 33 सेंट ज़मीन के, जहाँ दरगाह का ध्वजस्तंभ और मस्जिद स्थित हैं। उस समय की सर्वोच्च अदालत, प्रिवी काउंसिल ने, दरगाह की अपील के बाद, 1931 में ‘अनादि काल से’ पहाड़ी पर मंदिर के अधिकारों को बरकरार रखा।

इस रुख का समर्थन अन्य मामलों द्वारा भी किया गया। अदालत ने 1958 में दरगाह की प्रतिबंधित सीमाओं के बाहर खुदाई पर रोक लगा दी। साल 2011 में कोर्ट ने मंदिर की सहमति के बिना किसी भी नए निर्माण कार्य पर रोक लगा दी।

अदालतें एक सदी से भी ज़्यादा समय से पहाड़ी पर मंदिर के नियंत्रण को बरकरार रखती आई हैं, और दरगाह के अधिकारों को केवल उसके 33 सेंट के दायरे तक ही सीमित कर दिया है।

मुस्लिम अतिक्रमण का विरोध करते रहे हैं हिन्दू

हकीकत उस चित्रण के बिल्कुल उलट है जो द न्यूज़ मिनट ने अपने लेख में गढ़ने की कोशिश की थी। मुसलमानों द्वारा किए गए अवैध अतिक्रमणों का विरोध करने के लिए हिंदुओं को बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन करने पड़े और कानूनी लड़ाई भी लड़नी पड़ी।

डीएमके सरकार की मंज़ूरी से पशु बलि की अनुमति दी गई थी। जब प्रतिबंधित पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) की राजनीतिक शाखा, डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) ने सांप्रदायिक तनाव भड़काने की कोशिश की, तो हिंदू श्रद्धालुओं के उग्र प्रदर्शन के बाद अधिकारियों को अंततः कार्रवाई करने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसके अलावा, डीएमके पहाड़ी का नाम बदलकर सिकंदर मलाई करने की कोशिश करता रहा।

निजी स्वार्थों वाले लोग दरगाह को सांप्रदायिक सद्भाव और धर्मनिरपेक्षता का प्रतीक मान सकते हैं, लेकिन सच्चाई यही है कि इसका इस्तेमाल हिंदुओं के धार्मिक अधिकारों को कुचलने, उनके पवित्र स्थल पर अतिक्रमण करने और उनकी धार्मिक भावनाओं का शोषण करने के लिए किया गया है। उच्च न्यायालय का फैसला और इस क्षेत्र की कानूनी पृष्ठभूमि भी इसी सच्चाई को रेखांकित करती है, जिसे उदार-वामपंथी मीडिया छिपानी की कोशिश करता है।

(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)