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अद्वैत वन, संग्रहालय, गुरुकुल, कलाग्राम, नर्मदा विहार… ओंकारेश्वर में जगद्गुरु शंकराचार्य की 108 फ़ीट ऊँची प्रतिमा तैयार, जहाँ बीता बचपन वो अब कहलाएगा ‘एकात्म धाम’

मध्य प्रदेश के ओंकारेश्वर में सनातन धर्म के ध्वजवाहक शंकराचार्य की विशाल प्रतिमा बन कर लगभग तैयार हो गई है। बता दें कि ओंकारेश्वर भगवान शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से भी एक है। खंडवा जिले में स्थित इस क्षेत्र में मंधाता पर्वत पर शंकराचार्य की ये प्रतिमा तैयार की जा रही है। अष्टधातु से बनी इस प्रतिमा के निर्माण में देश के कई प्रतिभाशाली एवं अनुभवी इंजीनियरों और कलाकारों ने योगदान दिया। सोमवार (18 सितंबर, 2023) को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इसका लोकार्पण करेंगे।

वहीं 16 सितंबर से ही लोकार्पण कार्यक्रम के लिए धार्मिक आयोजनों का क्रम शुरू हो जाएगा। प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा के अलावा हवन और यज्ञ समेत अन्य धार्मिक कार्य भी किए जाएँगे। बड़ी संख्या में साधु-संत भी पहुँच रहे हैं। केरल में जन्मे शंकराचार्य ने बाल्यावस्था में ही गृह-त्याग कर के ओंकारेश्वर में शरण ली थी। मान्यता है कि वो 4 वर्षों तक यहाँ रहे थे। उनकी इसी स्मृति को सँजोए रखने के लिए मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार ने उनकी 108 फ़ीट ऊँची प्रतिमा यहाँ बनवाई है।

खास बात ये है कि इस प्रतिमा में उनके बाल स्वरूप को ही दिखाया गया है। मध्य प्रदेश के उज्जैन में पहले ही महाकाल कॉरिडोर बन चुका है और श्रद्धालुओं के लिए कई कार्य किए गए हैं। वहीं ओंकारेश्वर में शंकराचार्य की प्रतिमा को ‘Statue Of Oneness’ नाम दिया गया है। इस पूरे क्षेत्र को ‘एकात्म धाम’ के रूप में विकसित किया जा रहा है। यहाँ पर ‘अद्वैत लोक’ नाम का एक संग्रहालय भी बन रहा है। साथ ही ‘आचार्य शंकर अद्वैत वेदांत संस्थान’ की भी स्थापना की जा रही है।

ओंकारेश्वर में ही शंकराचार्य को गुरु गोविंद भगवत्पाद नाम के गुरु मिले थे। 12 वर्ष की आयु में ही उन्होंने यहाँ से देश भर में हिन्दू धर्म के पुनरुद्धार के लिए प्रस्थान किया था। LNT कंपनी इस मूर्ति का निर्माण कार्य कर रही है। महाराष्ट्र के शोलापुर के प्रसिद्ध मूर्तिकार भगवान राम पुर ने इस मूर्ति को गढ़ा है, वहीं 2018 में चित्रकार वासुदेव कामत ने इसका चित्र तैयार किया था। भाजपा ने तब 2017-18 में ‘एकात्म यात्रा’ भी निकाली थी। 27,000 ग्राम पंचायतों से इसके तहत धातु संग्रहण के लिए अभियान चलाया गया था।

‘एकात्म धाम’ में शंकराचार्य से जुड़ी चित्रकथाएँ, लेजर लाइट वॉटर साउंड शो, उनके जीवन पर फिल्म, ‘सृष्टि’ नाम का अद्वैत व्याख्या केंद्र, नर्मदा विहार, अन्नक्षेत्र और शंकर कलाग्राम विकसित किया गया है। एक पारंपरिक गुरुकुल भी यहाँ स्थापित किया जाएगा। इसके साथ ही 36 हेक्टेयर में ‘अद्वैत वन’ भी विकसित किया जा रहा है। 2000 करोड़ रुपए की लागत से इसे बनाया जा रहा है। प्रतिमा के अलावा परियोजना का बाकी कार्य दिसंबर 2024 तक पूरा हो जाएगा।

कर्नाटक सरकार की स्कीम, सुधीर चौधरी ने पूछा ‘सिर्फ अल्पसंख्यकों के लिए क्यों’ तो दर्ज हुई FIR: मंत्री प्रियांक खड़गे ने दी धमकी, ज़ुबैर ने किया गुमराह

कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार एक नए विवाद में फँस गई है। इसकी शुरुआत 8 सितंबर 2023 को हुई, जब भाजपा नेता तेजस्वी सूर्या और केंद्रीय मंत्री राजीव चंद्रशेखर ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर एक अखबार में छपे विज्ञापन की कटिंग शेयर की। इस विज्ञापन में कर्नाटक सरकार द्वारा अल्पसंख्यकों के लिए चलाई जा रही योजना के बारे में जानकारी दी गई थी।

इस विज्ञापन को देखकर ये लगता है कि इसे सरकार ने नहीं, बल्कि एआर-रहीम ट्रस्ट नाम के किसी निजी संगठन की ओर से दिया गया था। इसे कर्नाटक अल्पसंख्यक विकास निगम लिमिटेड की ओर से जारी किया गया है। इस विज्ञापन को लेकर ही कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार सवालों के घेरे में आ गई है।

एआर-रहीम ट्रस्ट द्वारा दिया गया विज्ञापन

केंद्रीय मंत्री राजीव चंद्रशेखर द्वारा साझा किए गए विज्ञापन में बताया गया है कि कर्नाटक सरकार धार्मिक अल्पसंख्यकों को टैक्सी, ऑटो और मालवाहक वाहन खरीदने के लिए 50 प्रतिशत की सब्सिडी दे रही है। बता दें कि स्वावलंबी सारथी योजना पिछले महीने कर्नाटक सरकार के आवास एवं अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री जमीर अहमद खान ने शुरू की थी।

केंद्रीय मंत्री राजीव चंद्रशेखर ने कहा कि यह योजना विशेष रूप से गैर-हिंदुओं के लिए है। यहाँ तक ​​कि आर्थिक रूप से गरीब हिंदू समुदायों को भी इससे बाहर रखा गया है। मंत्री ने इसे खुलेआम भेदभाव और संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन बताया है।

चंद्रशेखर ने कहा कि इसी पार्टी के नेता विदेश जाकर देश के संविधान के खतरे में होने की बात करते हैं। उन्होंने इसे ‘राज्य प्रायोजित धर्मांतरण प्रलोभन’ कहा। उन्होंने इस योजना को ‘कर्नाटक में राहुल गाँधी की कॉन्ग्रेस द्वारा कुछ समुदायों को रिश्वत देने की बेशर्म नीति और तुष्टिकरण की राजनीति का उदाहरण बताया।

चन्द्रशेखर ने कहा, “सभी कन्नडिगाओं के लिए निर्धारित सार्वजनिक संसाधनों का उपयोग करके एक समुदाय को बेशर्मी से रिश्वत देकर भेदभाव और संविधान की धारा 14 का उल्लंघन किया जा रहा है। धर्मांतरण के लिए राज्य-प्रायोजित प्रलोभन है ये। यह यूपीए/I.N.D.I गठबंधन के वंशवादियों की तुष्टिकरण और भ्रष्ट राजनीति है।”

8 सितंबर को ही AltNews के सह-संस्थापक मोहम्मद जुबैर ने राजीव चंद्रशेखर और तेजस्वी सूर्या की पोस्ट का ‘फैक्ट चेक’ करने की कोशिश की। यहाँ ध्यान रखना जरूरी है कि AltNews और मोहम्मद जुबैर ऑफिशियली खबरों के ‘फैक्ट चेक’ के लिए कर्नाटक सरकार के साथ साझेदारी कर रही है। यह जानकारी कर्नाटक सरकार में मंत्री प्रियांक खड़गे दे चुके हैं।

मोहम्मद जुबैर ने राजीव चन्द्रशेखर और तेजस्वी सूर्या के पोस्ट का फैक्ट चेक करने के चक्कर में कुछ दावे भी किए, जिसमें-

1-जुबैर ने दावा किया कि दोनों नेता इस योजना का सांप्रदायिकरण कर रहे हैं और यह योजना एससी/एसटी के लिए भी उपलब्ध है।
2- इस योजना में SC/ST को 75% या अधिकतम 4 लाख तक की सब्सिडी राशि मिल सकती है।
3- अल्पसंख्यक 50% या अधिकतम 3 लाख तक की सब्सिडी राशि के लिए पात्र हैं।
3- भाजपा के तहत भी ऐसी ही योजना थी, इसलिए चंद्रशेखर और सूर्या गलत सूचना फैला रहे थे।

चूँकि जुबैर को अपने हिसाब से तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करने और अपना एजेंडा चलाने की पुरानी आदत है, उसने इस मामले में भी ऐसा ही किया। उसने अपनी बात साबित करने के लिए 2 स्क्रीनशॉट्स शेयर किए। जुबैर ने ‘डिस्ट्रिक्टइंफो‘ वेबसाइट के स्क्रीनशॉट्स को आधिकारिक जानकारी के तौर पर शेयर किया, जबकि वो वेबसाइट निजी है, जिसका सरकार से कोई लेना देना ही नहीं है।

डिस्ट्रिक्ट इंफो वेबसाइट का अबाउट अस सेक्शन, जो ये बताता है कि वेबसाइट थर्ड पार्टी से मिली जानकारियाँ साझा करती है।

जुबैर ने जिस आर्टिकल का इस्तेमाल अपने फैक्ट चेक में किया, वो 19 अगस्त 2023 को पब्लिश हुआ था, कर्नाटक सरकार के सत्ता में आने के ठीक बाद। ये अलग बात है कि उस दिन उस वेबसाइट के एक्स (पूर्व में ट्विटर) हैंडल से एयर फ्रायर और इंडक्शन पर इस्तेमाल होने वाले बर्तनों के विज्ञापन वाले अमेजन के लिंक पोस्ट कर रहा था। उस वेबसाइट के सोशल मीडिया पर महिलाओं के कपड़े और जूतों से जुड़े लिंक भी पोस्ट किए जाते हैं।

डिस्ट्रिक्ट्स इंफो के सोशल मीडिया हैंडल पर अमेजन के सामानों की मार्केटिंग

वैसे, ये वेबसाइट देखने में बिल्कुल साफ है कि वो कोई भरोसेमंद वेबसाइट नहीं है, जिसका इस्तेमाल फैक्ट चेक में किया जाए। हालाँकि जो जानकारी वेबसाइट पर है, वो पूरी तरह से गलत भी नहीं है।

कॉन्ग्रेस सरकार के बजट के अनुसार, वास्तव में इस योजना की घोषणा सरकार ने की थी। हालाँकि महत्वपूर्ण बात ये है कि उक्त वेबसाइट और मोहम्मद जुबैर ने शायद जानबूझकर पूरी बात नहीं रखी और पाठकों को ये पता करने के लिए कि क्या सही है, उन्हीं पर छोड़ दिया।

जुबैर ने इन बातों को पाठकों के विवेक पर छोड़ा

जब कोई व्यक्ति ‘स्वावलंबी सारथी योजना’ के बारे में सर्च करता है, तो वह केएमडी – कर्नाटक अल्पसंख्यक विभाग की आधिकारिक वेबसाइट पर पहुँचता है। इस सरकारी वेबसाइट पर भी इस योजना के बारे में जानकारी दी गई है कि ये सिर्फ अल्पसंख्यकों के लिए है।

कर्नाटक सरकार की आधिकारिक वेबसाइट पर योजना के बारे में जानकारी
योजना का लाभ पाने की शर्तों की जानकारी

वेबसाइट स्पष्ट रूप से कहती है कि इस योजना के लिए आवेदन करने के लिए आवेदक को धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय से संबंधित होना चाहिए। यह योजना अल्पसंख्यक विभाग से जुड़ी है, और चल रही है, जैसा कि “ऑनलाइन आवेदन करें” बटन से साफ पता चला है।

अब, कोई यह तर्क दे सकता है कि चूँकि यह अल्पसंख्यक विभाग की वेबसाइट है, इसलिए यह केवल अल्पसंख्यकों से जुड़ी जानकारी ही देगी। ऐसे में हमने समाज कल्याण विभाग की वेबसाइट को भी देखा और ये जानने की कोशिश की कि क्या ये योजना एससी/एसटी वर्ग के लोगों के लिए भी चल रही है, जैसा कि कर्नाटक सरकार ने अपने बजट में घोषणा की थी?

उस वेबसाइट पर ‘स्वावलंबी सारथी योजना’ नाम की कोई योजना नहीं दिखी और न ही उसके लिए आवेदन करने की कोई जगह मिली। जब ऑपइंडिया ने समाज कल्याण विभाग से बात की तो हमें साफ तौर पर बताया गया है कि इस योजना का लाभ सिर्फ अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को ही मिलेगा। एससी/एसटी समुदाय के लोगों को नहीं।

हालाँकि, यह सच है कि कर्नाटक सरकार ने अपने बजट में अल्पसंख्यकों और एससी/एसटी समुदाय के लिए इस योजना की घोषणा की थी, लेकिन अभी तक की जानकारी से ऐसा लगता है कि यह योजना अभी तक सिर्फ अल्पसंख्यकों के लिए शुरू की गई है, एससी/एसटी समुदाय के लिए नहीं। यह स्पष्ट है कि अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति समुदाय इस योजना का लाभ तभी प्राप्त कर सकता है, जब इस बारे में सरकार अधिसूचना जारी करे। फिलहाल तो ऐसा कुछ दिख नहीं रहा है।

इस योजना को लेकर आजतक के पत्रकार सुधीर चौधरी ने 12 सितंबर को एक शो किया था। इस शो में उन्होंने अंबेडकर विकास निगम के प्रमुख पी नागेश के हवाले से बताया था कि यह योजना अभी एससी/एसटी समुदाय के लिए लागू नहीं है। हालाँकि इसे इन समुदायों के लिए शुरू करने पर चर्चा चल रही है। उन्होंने पुष्टि की थी कि ये योजना अभी तक एससी/एसटी वर्ग के लोगों के लिए अधिसूचित नहीं की गई है।

जब मोहम्मद जुबैर अमेजन के विज्ञापनों को शेयर करने वाली एक ‘ऐरी-गैरी’ वेबसाइट पर भरोसा कर रहे था, तब भी इस बात की पूरी जानकारी मौजूद थी कि कर्नाटक सरकार ने इस योजना की घोषणा तो अल्पसंख्यकों के साथ ही एससी/एसटी वर्ग के लिए भी की थी। इसे लागू भी कर दिया गया, लेकिन सिर्फ अल्पसंख्यक समुदाय के लिए। एससी/एसटी के लिए इसे अभी तक लागू नहीं किया गया है।

इस बीच एक अन्य ट्वीट में मोहम्मद जुबैर ने एक और भ्रामक दावा किया। जुबैर ने ट्वीट किया, ”बीजेपी सरकार में भी ऐसी ही एक योजना थी। यहाँ अल्पसंख्यक विभाग @DOMGOK के कुछ पुराने ट्वीट हैं, ‘प्रत्येक लाभार्थी को वाहन की कीमत 33% सब्सिडी मिलेगी, जिसमें ऑटो रिक्शा/टैक्सी/माल गाड़ी खरीदने के लिए अधिकतम 2.5 लाख रुपये दिए जाएँगे’।”

जुबैर का ट्वीट

ज़ुबैर ने फिर से चालाकी से सेलेक्टिव जानकारी साझा की, ताकि इस मामले की पूरी तस्वीर स्पष्ट न हो।

हालाँकि, यह भी सच है कि ऐसी ही एक योजना भाजपा सरकार में भी चल रही थी। ये जानकारी कर्नाटक के अल्पसंख्यक विभाग द्वारा 2021-2022 में दी गई थी, जिसमें बताया गया है कि 31 मार्च 2022 तक वाहनों की खरीद के लिए कितनी सब्सिडी दी गई थी। इस रिपोर्ट के अनुसार, अल्पसंख्यक विभाग द्वारा 1,333 वाहनों पर सब्सिडी दी गई थी ।

सरकारी वेबसाइट पर मौजूद जानकारी

हालाँकि, जुबैर द्वारा डाले गए स्क्रीनशॉट भ्रम पैदा करने वाले थे, क्योंकि भाजपा सरकार ने 2022 में इस योजना को होल्ड (रोक) पर रख दिया था।

जुबैर ने जो स्क्रीनशॉट शेयर किए, उनमें से एक कर्नाटक के अल्पसंख्यक मामलों के विभाग का जवाब था। ये जवाब 17 अक्टूबर 2022 को दिया गया था। इसमें विभाग ने लिखा था, “प्रत्येक लाभार्थी को वाहन मूल्य पर 33% सब्सिडी मिलेगी, अधिकतम रु 2.5 लाख रुपए। अगर ऑटो रिक्शा/टैक्सी/माल गाड़ी बैंक लोन पर खरीदा जा रहा है तो उसके लिए बैंक का पत्र भी जमा करना होगा। (1/1)”

कोई भी व्यक्ति ध्यान देगा कि अगर किसी ट्वीट में 1/1 लिखा है, तो इसका मतलब है कि जवाब अभी अधूरा है और वो दूसरे ट्वीट में आ रहा है। कम से कम असली फैक्ट चेकर तो इस बात पर ध्यान देगा ही। चूँकि अगले ट्वीट में पूरा मामला साफ हो जाता, इसलिए जुबैर ने सिर्फ अपने काम का अधूरा ट्वीट ही लगाया।

ट्वीट का दूसरा हिस्सा

मोहम्मद जुबैर ने जिस दूसरे ट्वीट को ‘जानबूझकर’ छोड़ा, उसमें साफ लिखा है कि ये योजना अब बंद हो चुकी है। ये सभी ट्वीट्स अब भी विभाग के सोशल मीडिया हैंडल पर मौजूद हैं।

जुबैर ने दिसंबर 2022 का एक और स्क्रीनशॉट शेयर किया था। ये भी दो हिस्सों में है, लेकिन उसने जानबूझकर पहला हिस्सा ही शेयर किया है।

इस ट्वीट का भी पहला ही हिस्सा जुबैर ने शेयर किया है।

इस ट्वीट में भी साफ लिखा है कि ये योजना लागू की जाएगी। इसका जवाब दिसंबर माह में दिया गया है। इस बात से ये साफ है कि ट्वीट के समय ये योजना बंद थी, चल नहीं रही थी।

अब ये सब कुछ पूरी तरह से साफ है कि किस तरह से जुबैर ने KMDC के जवाबी ट्वीट का महज एक हिस्सा ही शेयर किया, दूसरे को छोड़ दिया (जिसमें साफ साफ लिखा है कि ये योजना उस समय बंद थी)। लोग गुमराह ही रहें, इसलिए उसने एक और स्क्रीनशॉट शेयर कर दिया।

इन सब तथ्यों के आधार पर ये बात साफ है कि जब मई 2023 में कर्नाटक में कॉन्ग्रेस की सरकार आई, तब ये योजना बंद थी। ऐसे में ये कॉन्ग्रेस सरकार की ही योजना है, जिसके बारे में सरकार ने पूरी योजना बनाई और बजट में इसकी घोषणा की। बजट में घोषणा के समय ये कहा गया था कि इस योजना का लाभ एससी/एसटी समुदाय को भी मिलेगा, लेकिन अब तक ये सिर्फ अल्पसंख्यकों के लिए ही चलाई जा रही है।

ऐसे में ये भी संभव है कि कर्नाटक सरकार की अन्य योजनाएँ जो एससी/एसटी/ओबीसी के लिए भी चल रही हैं, उनका भी हश्र ‘स्वावलंबी सारथी योजना’ की तरह ही हुआ हो।

उदाहरण के लिए, कर्नाटक सरकार की एक और योजना है, जिसे ऐरावत योजना कहा जाता है। इस योजना के तहत एससी/एसटी समुदाय के ग्रामीण युवाओं को सब्सिडी वाली गाड़ियाँ पाने की सुविधा देने के लिए ओला और उबेर के साथ पार्टनरशिप की गई है। हालाँकि, ये योजना स्वावलंबी सारथी योजना के बराबर नहीं है, जो सिर्फ अल्पसंख्यकों के लिए थी, बल्कि ये योजना एससी/एसडी समुदाय के ग्रामीण युवाओं के लिए है।

आजतक के सुधीर चौधरी के खिलाफ FIR और जुबैर का फेक न्यूज

जब जुबैर ने भ्रामक जानकारी फैलाना शुरू कर दिया तो प्रियांक खड़गे, जो जुबैर को ‘चीफ’ कहना पसंद करते हैं, ने सुधीर चौधरी को कानूनी परिणाम भुगतने की धमकी दी। इसके बाद उनके के खिलाफ रिपोर्टिंग करने के लिए एफआईआर दर्ज करा दी गई।

बता दें कि सुधीर चौधरी ने एक शो किया था, जिसमें उन्होंने इस योजना के बारे में बताया था कि कैसे इसे हिंदुओं के लिए नहीं बल्कि अल्पसंख्यकों के लिए लागू किया जा रहा है। वीडियो सामने आते ही हिंदू विरोधी बयान देने वाले प्रियांक खड़गे ने ट्वीट किया कि सुधीर गलत सूचना फैला रहे हैं और वह एंकर के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करेंगे।

रात 11:36 बजे मोहम्मद जुबैर ने सबसे पहले ट्वीट किया था कि सुधीर चौधरी के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है।

इन सबके बीच, सुधीर चौधरी ने एक और शो किया, जिसमें उन्होंने ये बातें साफ कीं।

1-बजट में कॉन्ग्रेस सरकार ने घोषणा की थी कि यह योजना अल्पसंख्यकों और एससी/एसटी समुदायों के लिए उपलब्ध होगी

2-अखबार और कॉन्ग्रेस सरकार की अपनी वेबसाइट के विज्ञापन से साबित होता है कि इस योजना के लिए पात्रता की आवश्यकता यह है कि व्यक्ति अल्पसंख्यक समुदाय से संबंधित होना चाहिए।

3-एससी/एसटी समुदाय के लिए योजना की पात्रता अभी तक अधिसूचित नहीं की गई है।

4-इस बात की पुष्टि अंबेडकर विकास निगम के प्रबंध निदेशक ने आजतक से की है।

5-साफ है कि यह योजना सिर्फ अल्पसंख्यक समुदाय के लिए लागू है।

यहाँ ये ध्यान देने लायक बात है कि असल चीजों को अभी तक मोहम्मद जुबैर ने ट्वीट नहीं किया है, जबकि सुधीर चौधरी जब शो कर रहे थे, तब यही जुबैर लगातार ट्वीट पर ट्वीट कर रहा था।

स्व-घोषित फैक्ट चेकर जुबैर ने इन मामले में अपनी पूरी क्षमता के साथ काम नहीं किया। सच्चाई ये है कि उसका हकीकत से कोई लेना-देना नहीं है। इस पूरे मामले में आगे चलकर यह संभव है कि कर्नाटक सरकार अपनी घोषणा पर अमल करते हुए एससी/एसटी वर्ग के लिए भी योजना को अधिसूचित कर दे, लेकिन अभी तथ्य यही है कि ये योजना सिर्फ अल्पसंख्यक समुदाय के लिए लागू है।

साफ है कि इस मामले में सुधीर चौधरी हों या अन्य मीडिया हाउस, उन्होंने कोई फेक न्यूज नहीं फैलाया है। फिर भी कर्नाटक सरकार ने सच्चाई को स्वीकार करने की जगह उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने जैसी कार्रवाई की है।

चूँकि कर्नाटक सरकार की ये योजना अगर एससी/एसटी वर्ग के लिए लागू होती तो वो इसका नोटिफिकेशन सार्वजनिक करते, न कि जुबैर के फर्जी फैक्ट चेक की आड़ में सुधीर चौधरी पर एफआईआर दर्ज करते।

ऐसे में साफ है कि सुधीर चौधरी पर एफआईआर सिर्फ इसलिए की गई है कि अगर कोई सच्चाई बताने का प्रयास करेगा और इससे कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार की असलियत बाहर आएगी, तो वो बच नहीं पाएगा। उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज की जाएगी। उसे प्रताड़ित किया जाएगा।

मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में नुपूर जे शर्मा द्वारा लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक कर सकते हैं।

‘लोन भुगतान के 30 दिन के भीतर लौटाएँ संपत्ति के कागजात’: बैंकों को RBI का सख्त निर्देश, देरी होने पर प्रतिदिन ₹5000 देना पड़ेगा मुआवजा

‘रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI)’ ने सभी बैंकों को निर्देश दिया है कि जो भी लोग ऋण का भुगतान कर देते हैं, एक महीने के भीतर उनकी संपत्ति के कागजात उन्हें वापस किए जाएँ। बैंकों के अलावा सभी NBFC (नॉन-बैंकिंग फाइनेंसियल कॉर्पोरेशन) को भी यही निर्देश दिया गया है। लोन का भुगतान कर दिया जाता है या उन्हें सेटल करा दिया जाता है तो इसके 30 दिन के भीतर बैंकों को संपत्ति के ऑरिजिनल कागजात वापस करने होंगे। पहले इस प्रक्रिया में कई महीने लग जाने के कारण लोगों को दिक्कत आती थी।

RBI ने बुधवार (13 सितंबर, 2023) को ये आदेश दिया। इतना ही नहीं, देश के सर्वोच्च बैंक ने ये आदेश भी दिया है कि अगर बैंक ऐसा करने में नाकाम रहते हैं तो फिर उसे कर्जदाता संस्थान को कर्जदारों को प्रतिदिन 5000 रुपए के हिसाब से तब तक हर्जाना देना होगा, जब तक कि कागजात वापस नहीं कर दिए जाते। बैंक, NBFC, हाउसिंग फाइनेंस संस्थान, एसेट रीकंस्ट्रक्शन कंपनी और रीजनल के अलावा सहकारिता बैंकों पर भी यही नियम लागू होगा

अगर बैंक दस्तावेज जारी करने में देर करता है तो उसे इसका उचित कारण बताना पड़ेगा। बता दें कि सामान्यतः बैंक लोन देने के बदले ऋण लेने वालों के संपत्ति के असली कागजात अपने पास रख लेते हैं। RBI पहले ही कह चुका है कि अगर ये कागजात खो जाते हैं तो बैंकों को इसके बदले मुआवजा और हर्जाना भरना पड़ेगा। डाक्यूमेंट्स वापस करने के लिए न सिर्फ ग्राहक का गृह ब्रांच, बल्कि उक्त बैंक के किसी भी ब्रांच से प्रक्रिया पूरी करने की व्यवस्था किए जाने का निर्देश भी दिया गया है।

इसके साथ ही बैंकों को लोन देने के समय ही ये बताना होगा कि ग्राहक को ऋण भुगतान करने के बाद ये डाक्यूमेंट्स वापस कहाँ से मिलेंगे। अगर ऋण लेने वाले व्यक्ति की मौत हो जाती है तो उसके उत्तराधिकारियों को डाक्यूमेंट्स कैसे लौटाए जाएँगे, इसकी पूरी प्रक्रिया भी बैंक तैयार करेगा। 1 दिसंबर, 2023 के बाद जिस भी ऋण का रिपेमेंट होगा, उसमें ये नियम लागू होगा। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि लोन पहले कब लिया गया था।

‘ये नहीं करता अधिकारों का उल्लंघन’: सुप्रीम कोर्ट ने दिवाली पटाखा बैन में हस्तक्षेप करने से किया इनकार, मनोज तिवारी ने दायर की थी याचिका

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार के पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध को बरकरार रखा है। अदालत ने कहा कि पटाखों पर बैन दिल्ली शहर में वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए एक उचित उपाय है। इस बैन को भाजपा सांसद मनोज तिवारी ने चुनौती दी थी। उन्होंने तर्क दिया था कि यह भेदभावपूर्ण है और धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन करता है। अदालत ने कहा कि बैन भेदभावपूर्ण नहीं है क्योंकि यह सभी लोगों पर लागू होता है, उनके धर्म की परवाह किए बिना।

‘त्योहार मनाने से नहीं रोकता पटाखों पर बैन’

मनोज तिवारी की याचिका खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रतिबंध धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन नहीं करता है, क्योंकि यह लोगों को अपने त्योहारों को मनाने से नहीं रोकता है। अदालत का फैसला पटाखों के उद्योग के लिए एक झटका है, लेकिन यह उन लोगों । ये प्रतिबंध 1 अक्टूबर, 2023 से प्रभावी हो जाएगा।

केजरीवाल सरकार ने लगाया था बैन

बता दें कि अरविंद केजरीवाल सरकार ने दो दिन पहले दिल्ली में इस दीपावली पर भी पटाखों पर बैन लगाने की घोषणा की थी। दिल्ली के पर्यावरण मंत्री गोपाल राय ने इसका ऐलान करते हुए कहा था, “मुख्यमंत्री ने निर्णय लिया है कि सर्दियों में सभी पटाखों की बिक्री, और जलाने पर प्रतिबंध रहेगा।” उन्होंने बताया कि दिल्ली पुलिस को पटाखों से सम्बंधित लाइसेंस नहीं देने के निर्देश जारी किए गए।

मनोज तिवारी ने सुप्रीम कोर्ट में किया था चैलेंज

दिल्ली सरकार के इस फैसले के खिलाफ भाजपा सांसद मनोज तिवारी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। उन्होंने इसे धार्मिक स्वतंत्रता का मुद्दा बताते हुए सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप की अपील की थी। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने मनोज तिवारी की याचिका को खारिज करते हुए पटाखों पर बैन को बरकरार रखा।

भारतीय सेना के कर्नल, मेजर और J&K पुलिस के DSP बलिदान, अनंतनाग में आतंकियों के साथ भीषण मुठभेड़: Pak के आतंकी संगठन ने ली जिम्मेदारी

जम्मू कश्मीर के अनंतनाग में भारतीय सेना और आतंकियों के बीच बड़ी मुठभेड़ हुई है। कई घंटों पर चली मुठभेड़ में 2 आतंकियों को मार गिराया गया है। वहीं भारत के 3 जवान भी वीरगति को प्राप्त हो गए। ये मुठभेड़ कोकरनाग इलाके में कई घंटों तक चली। मंगलवार (12 सितंबर, 2023) की शाम को ही वहाँ आतंकियों के मौजूद होने की खबर के बाद भारतीय सेना ने तलाशी अभियान चलाना शुरू किया। गाडोले क्षेत्र में भी जवान पहुँचे, लेकिन रात हो जाने के कारण अभियान को रोक दिया गया था।

वहीं बुधवार की सुबह फिर से आतंकियों की तलाश के लिए अभियान चलाया गया। इसी बीच जवानों ने खोज निकाला कि आतंकी कहाँ छिपे हुए हैं। इस दौरान भारतीय सेना के एक कर्नल जवानों का नेतृत्व कर रहे थे। उन्होंने आतंकियों पर हमला किया, लेकिन गोलीबारी में बुरी तरह घायल हो गए। भीषण गोलीबारी में भारतीय सेना के मेजर रैंक के एक अधिकारी और जम्मू कश्मीर पुलिस के एक DSP भी गंभीर रूप से जख्मी हो गए। इन तीनों को अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती कराया गया था।

वहीं डॉक्टरों ने इन तीनों को मृत घोषित कर दिया। पाकिस्तान के आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैय्यबा से जुड़े ‘रेसिस्टेंस फ्रंट’ को इस घटना के लिए जिम्मेदार बताया जा रहा है। उसने इस हमले की जिम्मेदारी भी ली है। कर्नल मनप्रीत सिंह भारतीय सेना के 19RR के CO (कमांडिंग ऑफिसर) थे। श्रीनगर में भारतीय सेना के 92 बेस अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था। उनके अलावा मेजर आशीष ढोंचक और डीएसपी हुमायूँ भट ने देश के लिए बलिदान दे दिया।

सिर्फ अनंतनाग ही नहीं, बल्कि एक ही दिन पहले राजौरी में भी आतंकियों और भारतीय सेना में मुठभेड़ हुई, जिसमें ‘केंट’ नाम की एक फीमेल डॉगी बलिदान हो गई। कर्नल मनप्रीत सिंह ’19 राष्ट्रीय राइफल्स यूनिट’ के नेतृत्व कर रहे थे। वहीं हुमायूँ भट्ट के शरीर से काफी खून बह गया था, इसी कारण उनकी मृत्यु हो गई। घायलों की मदद के लिए घटनास्थल पर हेलीकॉप्टर भेजा गया है। सेना और पुलिस के कई बड़े अधिकारी ग्राउंड पर मौजूद हैं।

‘मुस्कुराइए… अब आप भारत के नागरिक हैं’: इस्लामी मुल्कों से भागकर आए 108 हिंदुओं को अहमदाबाद में मिली नागरिकता, बोले- यही हमारे लिए स्वर्ग

गुजरात के अहमदाबाद में विभिन्न इस्लामी मुल्कों से प्रताड़ित होकर आए 108 हिन्दू शरणार्थियों को भारत की नागरिकता दी गई है। इस मौके पर गुजरात के गृह राज्यमंत्री हर्ष संघवी ने इन सभी हिन्दुओं को प्रमाण पत्र वितरित किए। बुधवार (12 सितंबर 2023) को आयोजित इस समारोह में नागरिकता पाए हिन्दुओं ने ख़ुशी जाहिर की। संघवी ने भी सभी का भारत में स्वागत करते हुए उनसे देश के विकास में भागीदारी सुनिश्चित करने का आग्रह किया।

यह आयोजन अहमदाबाद के होटल सिल्वर क्लाउड में आयोजित किया गया। नागरिकता पाने वाले लोगों में पाकिस्तान के साथ अफगानिस्तान और बांग्लादेश से आए हिन्दू भी शामिल हैं। इस कार्यक्रम की तस्वीरें अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल पर शेयर करते हुए हर्ष संघवी ने लिखा कि भारत की नागरिकता चुनने वाले सभी परिवारों ने देश के प्रति समर्पण दिखाया।

हर्ष संघवी ने यह भी कहा कि नागरिकता मिलने के बाद सभी परिवार बेहद खुश हैं, क्योंकि अब वे भारत के स्थाई नागरिक बन चुके हैं। जिन नागरिकों को प्रमाण पत्र दिए गए हैं, उनमें महिलाएँ और बच्चे भी शामिल हैं। इनमें बुजुर्गों एवं बच्चों सहित सभी उम्र वर्ग के लोग शामिल हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, हर्ष संघवी ने कहा कि नागरिकता पाने वाले हिन्दुओं के घर दीपावली जैसा माहौल है। उन्होंने सभी 108 लोगों से भारत के विकास में सक्रिय भागीदारी निभाने का भी आह्वान किया। पहले की बातें याद दिलाते हुए संघवी ने बताया कि कभी नागरिकता पाने के लिए लोगों को दिल्ली के चक्कर लगाने पड़ते थे।

नरेंद्र मोदी की सरकार की तारीफ करते हुए हर्ष संघवी ने कहा कि इन नीतियों को मोदी सरकार ने सरल कर दिया। एक स्वर में सभी को सम्बोधित करते हुए संघवी ने कहा, “मुस्‍कुराइए आप अब भारत के नागरिक हैं।” इस कार्यक्रम को गुजरात के गृह राज्यमंत्री संघवी ने शरणार्थियों के तीसरे जन्म के तौर पर बताया।

आंकड़ों की चर्चा करते हुए कार्यक्रम में मौजूद भाजपा नेता पायल कुकराणी ने बताया कि पिछले 5 वर्षों के अंदर अकेले गुजरात में 1149 लोगों को भारत की नागरिकता मिल चुकी है। डॉक्टर गणेश कुमार नाम के एक पाकिस्तान शरणार्थी ने बताया कि वहाँ रहने वाले हिन्दुओं को नाबालिग बच्चियों के अपहरण, फिरौती और धार्मिक भेदभाव झेलने पड़ते हैं।

डॉक्टर गणेश ने भारत में बसना ही अंतिम विकल्प बताया। नागरिकता पाने वाली कौशल्या ने भारत को अपने लिए स्वर्ग जैसा बताया। डॉक्टर अशोक शेखानी के अनुसार, वो पाकिस्तान में हर दिन प्रताड़ना का शिकार होते थे। 73 साल की खेमी देवी ने भी भारत को अपने लिए स्वर्ग बताया।

कश्मीर में 33 साल बाद आर्य समाज ने फिर से खोला अपना स्कूल: आतंकियों के कारण करना पड़ा था बंद, 370 निरस्त होने के बाद बदल रहे हालात

आर्य समाज ने आखिरकार 35 साल के बाद जम्मू-कश्मीर की राजधानी श्रीनगर के डाउनटाउन में अपने सबसे पुराने शैक्षणिक संस्थानों में से एक को फिर से खोल दिया है। यहाँ पुराने शहर के महाराजगंज क्षेत्र में स्थित DAV पब्लिक स्कूल में साढ़े तीन दशकों के बाद फिर से छात्र-छात्राओं की आमद शुरू हो गई है।

धीरे-धीरे इस राज्य में 90 के दशक के आतंकवाद के भयावह दौर का खौफ कम होता जा रहा है। लोग अमन-चैन की तरफ लौटने लगे हैं। साल 2019 में अनुच्छेद 370 के निरस्त होने से यहाँ के हालात में बदलाव आ रहा है। इसका असर अब दिखने भी लगा है। सबूत इस स्कूल के दोबारा से खुलने के तौर पर सामने है।

दरअसल, आर्य समाज ट्रस्ट का ये स्कूल 1990 के दशक की शुरुआत में अलगाववादी आतंकवाद पनपने की वजह से 33 साल से तक बंद पड़ा रहा था। ‘ग्रेटर कश्मीर‘ को स्कूल की प्रिंसिपल और प्रबंधक समीना जावेद ने बताया कि संस्था को उसी जगह पर, उसी इमारत के अंदर, उसी प्रबंधन के तहत फिर से खोल दिया गया है।

अप्रैल से शुरू हुआ पहला सत्र

मूल रूप से लखनऊ के रहने वाले प्रिंसिपल जावेद ने बताया, “भारत भर में आर्य समाज से संबद्ध सभी स्कूलों को दयानंद आर्य विद्यालय या DAV के नाम से जाना जाता है।” उन्होंने ये भी जानकारी दी कि स्कूल ने इस साल अप्रैल में अपना पहला सत्र शुरू किया। इसके तहत कक्षा 7 तक 35 छात्रों का प्रारंभिक नामांकन था।

उन्होंने बताया, “हमें कक्षा 7 से ऊपर के छात्र मिले थे, लेकिन उन्हें JNV रैनावारी भेज दिया गया।” स्कूल जम्मू-कश्मीर बोर्ड ऑफ स्कूल एजुकेशन से संबद्ध है और जोनल एजुकेशन ऑफिसर (ZEO) रैनावारी के अधिकार क्षेत्र में आता है।

प्रिंसिपल और प्रबंधक जावेद ने इस बात पर जोर दिया कि स्कूल के छात्रों को उचित मार्गदर्शन और दिशा की जरूरत है। इसके लिए शिक्षक और प्रबंधन दोनों सामूहिक तौर से अपने शैक्षिक अनुभव को बढ़ाने के लिए काम कर रहे हैं।

आसान नहीं था स्कूल को फिर से खोलना

इस स्कूल को उस जगह और इमारत में दोबारा से स्थापित करना आसान नहीं था। इसे लेकर प्रिंसिपल ने कहा, “इसके लिए काफी कोशिशें करने की जरूरत थी, क्योंकि हमें इमारत को नया करना था, इसे सही रूप देना था और कक्षाएँ शुरू करनी थीं।”

उन्होंने आगे कहा, “स्कूल को फिर से खोलने में शुरुआती चुनौतियाँ थीं, लेकिन अब हम हर गुजरते दिन के साथ सकारात्मक बदलाव देख रहे हैं। माता-पिता और समुदाय सामान्य तौर पर सहयोगात्मक रहे हैं।”

लक्ष्य है छात्रों को धर्मनिरपेक्ष माहौल देना

स्कूल की प्रिंसिपल ने इस बात पर जोर दिया कि स्कूल प्रबंधन का पहला लक्ष्य छात्रों को धर्मनिरपेक्ष माहौल और उनके पूरे व्यक्तित्व विकास में योगदान देना है। सत्र की शुरुआत के बाद से ही छात्रों ने पर्यावरण दिवस, योग दिवस, शिक्षक दिवस और अन्य पाठ्येतर गतिविधियों जैसे विभिन्न कार्यक्रमों में सक्रिय तौर से शिरकत करवाई जा रही है।

प्रिंसिपल ने कहा, “हमारा ध्यान पाठ्यक्रम से परे भी है और हमारा लक्ष्य इन छात्रों को अन्य क्षेत्रों के लिए भी तैयार करना है। मैं निजी तौर से एक दिन में छह कक्षाएँ लेती हूँ।” उन्होंने आगे बताया कि स्कूल ने सात शिक्षकों की भर्ती की है। ये सभी स्थानीय लोग हैं जो इस स्कूल को चलाने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं। प्रिंसिपल जावेद ने कहा, “मेरा मानना है कि शिक्षक किसी भी स्कूल की रीढ़ होते हैं और हमारे शिक्षक स्कूल के सुचारू संचालन के लिए हर संभव कोशिश कर रहे हैं।”

स्थानीय संस्था का था स्कूल पर कब्जा

एक अधिकारी ने खुलासा किया कि 90 के दशक की शुरुआत में पुराने शहर में स्कूल बंद होने के बाद एक अन्य स्कूल चलाने के लिए इमारत पर एक स्थानीय संस्था ने कब्जा कर लिया था। उन्होंने अपने स्थानीय स्कूल को डीएवी भवन में स्थानांतरित कर दिया क्योंकि डीएवी स्कूल बंद होने के बाद इसका इस्तेमाल कम हो गया था।

अधिकारी ने बताया, “हालाँकि, 2022 से स्कूल प्रबंधन ने इसे फिर से खोलने की कोशिशें शुरू कीं और इसका नतीजा रहा कि पहला सत्र इस साल अप्रैल में शुरू हो पाया।” दरअसल 1992 में स्कूल की इमारत पर एक स्थानीय शख्स ने कब्जा के बाद यहाँ प्राइवेट स्कूल नक्शबंदी पब्लिक खोला था।

हालाँकि, बाद में लंबी कानूनी लड़ाई के बाद आर्य समाज ट्रस्ट की जम्मू-कश्मीर इकाई के अध्यक्ष अरुण चौधरी ने एक स्थानीय कारोबारी की मदद से स्कूल को दोबारा हासिल कर लिया। नक्शबंदी पब्लिक में पढ़ने वाले छात्रों और उनके पेरेंट्स के विरोध के बावजूद आखिरकार अधिकारियों ने 2022 में ट्रस्ट को संपत्ति का कब्जा वापस सौंप दिया।

वंचित परिवारों के बच्चों के मिलती है शिक्षा

एक रिपोर्ट के मुताबिक, आर्य समाज ट्रस्‍ट का ये स्कूल अभी एक जर्जर इमारत में चल रहा है। यहाँ सराफ कदल इलाके में वंचित परिवारों के छात्र शिक्षा पा रहे हैं। इस पढ़ाई के बदले स्कूल कोई फीस नहीं लेता है। हालाँकि, कुछ पेरेंट्स अपनी मर्जी से 500 रुपए हर महीने का योगदान स्‍कूल को देते हैं। ये पैसा अभी इस मिडिल स्कूल को चलाने में मदद करता है, जिसमें आठवीं क्‍लास तक की कक्षाएँ लगाई जा रही है।

बच्चे भी हैं खुश

कश्मीर घाटी में डीएवी प्रबंधन अगले शैक्षणिक कैलेंडर से अपने सभी बंद पड़े स्कूलों को खोलने का प्लान बना रहा है। इससे छात्रों में खुशी की लहर है। पहले के नक्शबंद पब्लिक स्कूल की 10वीं कक्षा की छात्रा जायका ने कहा, “जब से डीएवी के तहत स्कूल फिर से खुला है, हमारी पढ़ाई का स्तर बढ़ गया है।” जायका की तरह अन्य छात्रों और शिक्षकों में उम्मीद जगी है कि स्कूल फिर से खुलने से श्रीनगर के पुराने शहर क्षेत्र में बेहतर शिक्षा मिलेगी और छात्रों को फायदा पहुँचेगा।

नाच रहा चीन अपनी 500 बड़ी कंपनियों के ग्रोथ पर, इंडिया के वामपंथी अभी भी मजदूरों-किसानों का हक मार खुद करते हैं अय्याशी

चीन की टॉप 500 कंपनियों ने साल 2022-23 में 5.46 ट्रिलियन डॉलर का बिजनेस किया। मतलब 452824008000000 रुपए, थोड़े और आसान शब्दों में कहें तो 4,52,824 अरब रुपया का बिजनेस। यह रिपोर्ट ऑल-चाइना फेडरेशन ऑफ इंडस्ट्री एंड कॉमर्स ने जारी की है। चाइनीज प्राइवेट कंपनियों के लिए काम करने वाली इस संस्था के अनुसार वहाँ की टॉप 500 कंपनियों की जो औसत वार्षिक विकास दर है, वो है – 3.94 प्रतिशत।

इस लिस्ट में आम भारतीयों के लिए जानी-पहचानी कंपनियों की बात करें तो ई-कॉमर्स कंपनी JD, अलीबाबा, टेक्नॉलजी कंपनी टेन्सेंट, बायडु आदि ने सबसे ज्यादा बिजनेस किया है। पिछले साल JD ने अकेले 1.05 ट्रिलियन युआन (12128 अरब रुपए) के बिजनेस को पार कर लिया। अलीबाबा भी कुछ ज्यादा पीछे नहीं रहा। 864.53 बिलियन युआन (9981 अरब रुपए) के साथ यह दूसरे नंबर पर रहा।

बिजनेस के इतने बड़े आँकड़े को देख कर चौंकिए मत। चौंकने वाली खबर इससे भी बड़ी है। अनुसंधान एवं विकास मतलब रिसर्च और डेवलपमेंट (R&D) करने के लिए टॉप 500 चायनीज कंपनियों में से 326 ने 3 प्रतिशत से ज्यादा कर्मचारी रखे हैं। जबकि 414 कंपनियाँ तो ऐसी हैं, जिन्होंने अपने उत्पाद से संबंधित मूल तकनीक को खुद ही विकसित किया है।

वामपंथ मतलब लाल सलाम/मजदूर/किसान/हड़ताल/पूंजी का विरोध/उद्योग-धंधों के खिलाफ प्रदर्शन आदि से अगर अपनी समझ बना बैठे हैं तो चौंकाने वाले आँकड़े अभी और हैं। वो आँकड़ा है पंचवर्षीय योजना का। भारत की तरह वहाँ भी पंचवर्षीय योजना बनाई जाती है, उस पर काम किया जाता है। 2021-25 की चीन वाली पंचवर्षीय योजना के तहत वहाँ की सरकार ने रिसर्च और डेवलपमेंट खर्च को 7 प्रतिशत वार्षिक तक ले जाने का लक्ष्य रखा है।

रिसर्च और डेवलपमेंट पर 7 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि खर्च कितना होता है, यह कम है या ज्यादा… इसको वैश्विक स्तर पर समझते हैं। मकिन्ज़ी एंड कंपनी (McKinsey & Company) एक कंसल्टिंग फर्म है। इसके अनुसार रिसर्च और डेवलपमेंट खर्च में 7 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि के लक्ष्य को अगर चीन पा लेता है तो वह आरएंडडी पर दुनिया का सबसे अधिक खर्च करने वाला देश बनने की ओर अग्रसर हो जाएगा।

चायनीज प्राइवेट कंपनियाँ और चीनी सरकार

  • चीन में जो वामपंथी सरकार है, वो वहाँ के मजदूरों-किसानों की सरकार है।
  • बिजनेसमैन के सारे पैसों को कब्जे में लेकर वो आम नागरिकों में बाँट देती है।

ऊपर जो 2 लाइनें लिखी हैं, कुछ ऐसी सोच है अगर आपकी तो आप वामपंथी प्रोपेगेंडा में फँसे हुए हैं। सच्चाई इससे कोसों दूर है। क्यों? क्योंकि चीन की जो पंचवर्षीय योजना बनाई जाती है, वो वहाँ की सरकार बनाती है न की प्राइवेट कंपनी। इस योजना के तहत चीनी सरकार प्राइवेट कंपनियों को भरपूर सपोर्ट करती है। गूगल/ट्विटर/ऐमेजॉन जैसी वैश्विक कंपनियों को चीन में घुसने नहीं देना, उनके टक्कर की पैरेलल कंपनी खड़ी करना… यह चीनी सरकार के सपोर्ट से ही संभव है।

चीन की सरकार अपनी प्राइवेट कंपनियों को कैसे करती है सपोर्ट? ऑल-चाइना फेडरेशन ऑफ इंडस्ट्री एंड कॉमर्स के महासचिव झाओ जियांग के शब्दों से समझते हैं। इस रिपोर्ट के आने के बाद जियांग ने कहा:

“आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच चीन की टॉप 500 प्राइवेट कंपनियों की गुणवत्ता बढ़ी है, इनसे जुड़ी तकनीकी नई और उन्नत हुई है। प्राइवेट कंपनियों के बिजनेस को बढ़ाने के लिए लक्ष्य बनाकर सरकार ने जो योजनाएँ चलाईं, उसका धन्यवाद।”

साल 2022 में चायनीज प्राइवेट कंपनियों को आगे बढ़ाने के लिए चीन की सरकार ने कई प्रयास किए। इनमें से दो प्रमुख प्रयास हैं – (i) प्राइवेट कंपनियों के बिजनेस और उससे जुड़ी अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर टॉप-लेवल दिशा-निर्देश जारी किया गया। (ii) एक विशेष ब्यूरो की स्थापना की गई, जिसका काम सिर्फ यही था कि हर एक प्राइवेट कंपनी को कैसे लक्ष्य बनाकर सहयोग दिया जाए, उनके बिजनेस को आगे बढ़ाया जाए।

इन सबका फायदा क्या हुआ? किसे हुआ? पिछले साल के इन आँकड़ों से समझिए। चीन की जितनी भी बाजार संस्थाएँ हैं, उनमें से 97 प्रतिशत से ज्यादा प्राइवेट ही हैं। मतलब सरकारी संस्थाएँ 3 प्रतिशत से भी कम हैं। और इनसे चीन की सरकार को कितना फायदा होता है? चायनीज उद्योग और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अनुसार उनके देश को मिलने वाला टैक्स से राजस्व इन्हीं प्राइवेट कंपनियों से लगभग 50 प्रतिशत आता है, सकल घरेलू उत्पाद में इनका हिस्सा 60 प्रतिशत है, जबकि तकनीकी नवाचार में इन कंपनियों ने 70 प्रतिशत योगदान दिया है।

वामपंथी चीन की पूंजीवादी नीति, कब से?

9 सितंबर 1976 को माओ जेदोंग (माओ से-तुंग) की मौत होती है। इसके बाद चीन में जो सत्ता आई, उसने माओवादी विचारधारा से तौबा कर लिया। क्यों? क्योंकि इसके एक से अधिक कारण तात्कालिक चायनीज नेताओं ने देखा-समझा।

(i) माओ की नीतियों के कारण साल 1950 से 1973 तक साल-दर-साल चीन की जीडीपी 3 प्रतिशत से भी कम बढ़ी। जबकि आर्थिक विकास दर में इसी दौरान चीन के निकटवर्ती देश जापान, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर, ताइवान काफी आगे निकल गए थे।
(ii) 1970 के दशक के अंत तक चीन में खाद्य आपूर्ति और कृषि-उत्पादन इतना कम हो गया था कि सरकारी दस्तावेजों में 1959-61 के भयंकर अकाल की बातें लिखी जाने लगी थीं, सरकारी अधिकारी इसके लिए आवश्यक कदम उठाने की माँग करने लगे थे।
(iii) माओ की नीतियों के कारण चीन में 1959-61 के दौरान जो अकाल आया, उसमें 1.5 करोड़ से लेकर 5.5 करोड़ लोग भूख के कारण मर गए थे।

इन बड़े कारणों के अलावे और भी तात्कालिक कारण थे, जो माओवादी विचारधारा को चीनी सत्ता से दूर ले गए। माओ की मौत की बाद डेंग जियोपिंग या देंग शियाओ पिंग (Deng Xiaoping) ने जब सत्ता संभाली तो उन्होंने चीन के राष्ट्रीय आर्थिक विकास को अपनी राजनीति में सर्वोच्च प्राथमिकता दी। इसके लिए उन्होंने किसी एक राह पर चलने के बजाय अलग-अलग रास्ते चुने। एक तरफ रूस के स्टाइल को कॉपी करते हुए बड़े-बड़े उद्योग-धंधे-कारखानों को प्रोत्साहन दिया तो दूसरी ओर पहली बार चीन में विशेष आर्थिक क्षेत्र (Special Economic Zone) खोला गया। विदेशियों (बिजनेस) के लिए जो चीन पहले बिल्कुल बंद था, 1976 के बाद उसी चीन ने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को आकर्षित करना शुरू कर दिया।

खेती-किसानी से लेकर उद्योग-धंधों में प्रयोग, दूसरे देशों के सफल बिजनेस मॉडल को देखने के लिए हजारों चीनी अधिकारियों को भेजने से लेकर विदेशी बिजनेसमैन को चीन में पैसा लगाने के लिए पहली बार जॉइंट वेंचर संबंधी कानून के बनाने तक… डेंग जियोपिंग ने कई काम किए। विरोध भी बहुत झेला। लेकिन यह सारे काम किताबी/थ्योरी-बेस्ड न होकर प्रयोग के आधार पर था, इसलिए रिजल्ट जल्द दिखने लगे। साल 1979 से 1984 आते-आते तक चीन की पॉलिसी आर्थिक विकास की पॉलिसी बन चुकी थी।

1984 के बाद से चीन में डेंग जियोपिंग की सत्ता ने आर्थिक व्यवस्था के सुधार पर निर्णय लेना शुरू कर दिया था। इसमें सबसे बड़ा निर्णय था – प्राइवेट कंपनियों पर सरकारी हस्तक्षेप और नियंत्रण कम से कम करना। 1997 में डेंग जियोपिंग की मौत के बाद भी जियांग जेमिन और झू रोन्गजी की सत्ता ने उनकी नीतियों को ही आगे बढ़ाया। 1997-98 में वहाँ बड़े पैमाने पर निजीकरण हुआ। कुछेक बड़े और महत्वपूर्ण राज्य-समर्थित उद्योगों को छोड़कर सभी की संपत्तियों को निजी निवेशकों को बेच दिया गया। यह इतने बड़े स्केल पर किया गया कि 2001 से 2004 आते-आते वहाँ राज्य-समर्थित या स्वामित्व वाले उद्योगों की संख्या में 48 प्रतिशत की कमी आ गई।

2005 में पूरे चीन की GDP का 50 प्रतिशत प्राइवेट कंपनियों से आया। ऐसा पहली बार हुआ था। 2005 में ही क्रय शक्ति समता (purchasing power parity) के आधार पर चीन एशिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका था। इसके पहले जापान एशिया का सुपर पावर था। इसी रास्ते पर चलते हुए 5 साल के बाद 2010 में जापान को पीछे छोड़ चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका था।

प्राइवेट कंपनी के लिए आर्मी कैंट की भी सुविधा

चीता मोबाइल नाम की एक बड़ी कंपनी है चीन में। क्लिन मास्टर नाम का ऐप जिन लोगों ने यूज किया है, वो इस कंपनी के बारे में जानते होंगे। इसने भारत में न्यूज ऐग्रिगेटर बिजनेस में हाथ आजमाया था। इंस्टा न्यूज, न्यूज रिपब्लिक इसी चीता मोबाइल के ऐप थे। मैंने भी लगभग 3 साल यहाँ काम किया है। काम-ट्रेनिंग के सिलसिले में चीन भी जाना हुआ। इस कंपनी का हेड क्वॉर्टर बीजिंग के शाओयांग जिले में है, हमारी ट्रेनिंग यहीं हुई थी।

पहले दिन हेड क्वॉर्टर के कैंपस में खो गया। सड़क से ऑफिस के मेन गेट तक जाने में हाँफ गया। कुछ खाने-पीने के लिए पूछता हुआ मेस गया तो 20 मिनट से ज्यादा लग गए। मेस से आते वक्त ऑफिस का रास्ता ही भूल गया। आखिर एक प्राइवेट कंपनी का कैंपस इतना बड़ा-लंबा-चौड़ा कैसे? हमारे साथ हिंदी बोलने वाला एक चायनीज लड़का काम करता था। अभी भी दोस्ती है। उसने बताया कि जिस जगह पर चीता मोबाइल का ऑफिस है, वो आर्मी की जगह है। लीज पर दी गई है।

इसलिए फिर से ऊपर का 2-3 लाइन लिख रहा हूँ:

  • चीन में जो वामपंथी सरकार है, वो वहाँ के मजदूरों-किसानों की सरकार है।
  • बिजनेसमैन के सारे पैसों को कब्जे में लेकर वो आम नागरिकों में बाँट देती है।

ऊपर जो 2 लाइनें लिखी हैं, कुछ ऐसी सोच है अगर आपकी तो आप वामपंथी प्रोपेगेंडा में फँसे हुए हैं।

उज्ज्वला स्कीम को मोदी सरकार ने दिया विस्तार: 75 लाख महिलाओं को फ्री में मिलेगा LPG गैस कनेक्शन, पेट्रोलियम कंपनियों को ₹1650 करोड़

प्रधानमंत्री नरेंद्र सरकार की सरकार ने बढ़ती महंगाई के बीच देश के लोगों को राहत देने की कोशिश की है। केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने बताया कि मोदी सरकार अगले तीन सालों में 75 लाख लोगों को एलपीजी के मुफ्त कनेक्शन दिए जाएँगे। यह LPG उज्ज्वला योजना के तहत महिलाओं को दिए जाएँगे।

नए मुफ्त कनेक्शन के लिए केंद्र ने बुधवार (13 सितंबर 2023) को कैबिनेट की बैठक में सरकारी पेट्रोलियम कंपनियों को 1,650 करोड़ रुपए जारी करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। यह बैठक पीएम मोदी की अध्यक्षता में बुलाई गई थी। नए मुफ्त कनेक्शन के बाद देश में उज्ज्वला लाभार्थियों की संख्या 9.60 करोड़ से बढ़कर 10.35 करोड़ हो जाएगी।

अनुराग ठाकुर ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी की अध्यक्षता में रक्षाबंधन और ओणम के मौके पर एलपीजी गैस की कीमतों में भारी कटौती की गई थी। इसके कारण LPG सिलिंडर का मूल्य 200 घटकर 1100 रुपए से 900 रुपए हो गया। इससे उज्ज्वला योजना के साथ-साथ आम लोगों को भी फायदा होगा।

उन्होंने कहा कि उज्ज्वला योजना की सफलता की कई अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने सराहना की है। उन्होंने कहा कि इस योजना से महिलाओं के जीवन में काफी बदलाव आए हैं और उनके स्वास्थ्य में सुधार हुआ है। इससे पहले अधिकांश महिलाएँ लकड़ी और कोयले पर निर्भर थीं। इससे पर्यावरण भी प्रदूषित होता था।

अनुराग ठाकुर ने कहा कि गैस की कीमतों में कटौती के बाद सबसे ज्यादा फायदा उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों को मिल रहा है। उन्होंने कहा कि लाभार्थियों को पहले से ही 200 रुपए की सब्सिडी मिल रही थी और अब 400 रुपए की सब्सिडी मिलेगी।

बताते चलें कि प्रधानमंत्री उज्ज्वला य़ोजना की शुरुआत मई 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की थी। इस योजना के तहत गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले परिवारों की महिलाओं को मुफ्त में गैस कनेक्शन दिए जाते हैं। यह कनेक्शन अनिवार्य रूप से महिला के ही नाम से जारी किए जाते हैं।

ई-कोर्ट पर सरकार की पहल

उज्ज्वला के साथ-साथ केंद्र सरकार ने ई-कोर्ट को लेकर महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। अनुराग ठाकुर ने कहा कि कैबिनेट ने ई-कोर्ट परियोजना के तीसरे चरण को मंजूरी दे दी गई है और इसके लिए सरकार ने 7210 करोड़ रुपए की व्यवस्था की है। इसके पीछे ऑनलाइन अदालतों को बढ़ावा देना और न्यायिक प्रणाली को और अधिक पारदर्शी बनाना है।

केंद्रीय मंत्री ने कहा, “कैबिनेट का एक महत्वपूर्ण निर्णय यह है कि 7,210 करोड़ रुपए की ई-कोर्ट मिशन मोड परियोजना चरण 3 को मंजूरी दी गई है। इसका लक्ष्य ऑनलाइन और पेपरलेस अदालतों की स्थापना करना है। कागज रहित अदालतों के लिए ई-फाइलिंग और ई-भुगतान प्रणाली को सार्वभौमिक बनाया जाएगा। डेटा संग्रहीत करने के लिए क्लाउड स्टोरेज बनाया जाएगा। सभी अदालत परिसरों में 4,400 ई-सेवा केंद्र स्थापित किए जाएँगे।”

जिससे पैसे कमाया, जिसकी मदद से ली जमीन, इंजमाम ने उसकी ही 13 साल की बेटी का किया रेप: मोबाइल में मिली नंगी तस्वीरों से खुला केस, 61 साल की सजा

13 साल की बच्ची से रेप में केरल के कासरगोड की एक फास्ट ट्रैक अदालत ने 28 साल के इंजमाम उल हक उर्फ राजीव को कुल 61 साल जेल की सजा सुनाई है। उसने जिस बच्ची को हवस का शिकार बनाया था, उसके पिता ने उसे घर बनाने का ठेका दिया था। इतना ही नहीं बाद में जमीन खरीदने में भी उसकी मदद की थी।

इंजमाम उल हक मूल रूप से पश्चिम बंगाल का रहने वाला है। 2017 की इस रेप का खुलासा 2019 में हुआ था। दरअसल यौन शोषण की एक अन्य मामले में गिरफ्तार मलयाली के मोबाइल की पुलिस पड़ताल कर रही थी। इसी दौरान पीड़ित बच्ची की नंगी तस्वीरें मिली। इसके बाद बच्ची से जब चाइल्डलाइन के काउंसलर्स ने संपर्क किया तो इंजमाम उल हक की हैवानियत का खुलासा हुआ।

खुलासे के वक्त बच्ची 10वीं की छात्रा थी। इंजमाम ने जब उसे अपनी हवस का शिकार बनाया था, तब वह आठवीं में पढ़ती थी। इंजमाम ने इस घटना का जिक्र करने पर उसे जान से मारने की धमकी भी दी थी। बच्ची के बयान के आधार पर उसके खिलाफ पॉस्को एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया था। 12 सितंबर 2023 को फास्ट ट्रैक कोर्ट ने उसे सजा सुनाई।

अलग-अलग मामलों में सुनाई गई सजा के एक साथ चलने के कारण इंजमाम को 25 साल जेल में बिताने में होंगे। उस पर 2 लाख 10 हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया गया है। जुर्माने की रकम न अदा करने पर उसे 11 महीने अतिरिक्त जेल में बिताने होंगे।

ऑनमनोरमा की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2019 में केरल की पय्यन्नूर पुलिस ने एक मलयाली को एक अन्य नाबालिग लड़की के यौन शोषण केस में गिरफ्तार किया था। लेकिन उसका फोन चेक करते समय उसमें दूसरी नाबालिग लड़की की नग्न तस्वीरें मिली। जाँच में वह लड़की कासरगोड के चित्तारिक्कल थाना क्षेत्र में रहने वाली कक्षा 10 की छात्रा निकली। इसके बाद जब चाइल्ड हेल्पलाइन के काउंसलर्स ने उस लड़की से संपर्क किया तो 2017 का रेप केस सामने आया।

पीड़िता ने काउंसलर्स को बताया कि उसके पिता ने घर बनाने का ठेका इंजमाम उल हक को दिया था। घर बनने के दौरान लड़की अपने परिवार के साथ एक अन्य जगह पर रहती थी, जबकि मजदूर और इंजमाम निर्माणाधीन इमारत में रहते थे। थोड़े समय बाद लड़की का परिवार भी निर्माणाधीन इमारत में शिफ्ट हो गया। यहाँ इंजमाम ने पीड़िता को कई बार अपनी हवस का शिकार बनाया और उसे जान से मारने की धमकी दी।

नाबालिग के बयान पर पुलिस ने इंजमाम उल हक पर पॉक्सो एक्ट के तहत केस दर्ज कर गिरफ्तार कर लिया। चित्तारिक्कल थाने के SHO इंस्पेक्टर रंजीत रवींद्रन ने केस की जाँच कर कोर्ट में चार्जशीट पेश की। पुलिस ने मामले को फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट में चलाने की माँग की जिसे स्वीकार कर लिया गया। कोर्ट ने IPC की धारा 376 (3) के तहत इंजमाम को 25 साल, पॉक्सो एक्ट के तहत 25 साल , IPC 354 के तहत 9 साल और IPC 506 के तहत 2 साल की सजा सुनाई है।