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मस्जिद में धर्मांतरण, बीफ खिलाने की कोशिश, इतना पीटा कि गर्भ में मर गया बच्चा: जिसे ‘दीपक’ समझ फेसबुक पर हुआ प्यार वो निकला खालिद

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद से लव जिहाद और धर्मांतरण की कोशिश का मामला सामने आया। पीड़ित लड़की का आरोप है कि खालिद चौधरी ने दीपक बनकर फेसबुक के सहारे उससे दोस्ती की। इसके बाद उसे प्रेम जाल में फँसा लिया और उसके साथ शारिरिक संबंध बनाए। लेकिन जब खालिद की सच्चाई सामने आई तो वह लड़की को फोटो वायरल करने की धमकी देने लगा। यही नहीं मस्जिद ले जाकर गौमांस खिला धर्मांतरण की भी कोशिश की।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मामला गाजियाबाद के विजय नगर थाना क्षेत्र थाना क्षेत्र का है। पीड़िता का आरोप है कि साल 2020 में दीपक नामक फेसबुक आईडी से फ्रेंड रिक्वेस्ट आई थी। रिक्वेस्ट एक्सेप्ट करने के बाद युवक उसे मैसेज करता था। इसके बाद दोनों की बातचीत शुरू हुई। करीब 6 महीने बाद दोनों के बीच मुलाकात हुई। कई बार मुलाकातों के बाद आरोपित ने उसे प्यार में फँसा लिया और उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए।

इसी दौरान लड़की को आरोपित की सच्चाई का पता चल गया। जिसे वह दीपक समझ रही थी वह खालिद चौधरी निकला।

युवक की पहचान सामने आने के बाद पीड़ित लड़की ने उससे संबंध खत्म करने की कोशिश की। लेकिन खालिद उसे बदनाम करने की धमकी देने लगा। पीड़िता का कहना है कि खालिद ने उससे कहा था कि वह एक बड़ा पत्रकार है। उसके पास फ़ोटो, वीडियो हैं। यदि उसने अलग होने की कोशिश की तो वह उसकी फोटोज वायरल कर उसे बदनाम कर देगा।

इसके बाद अपने जन्मदिन पर खालिद पीड़ित लड़की को निजामुद्दीन मस्जिद ले गया। जहाँ वह लड़की का धर्मांतरण कराना चाहता था। लेकिन लड़की ने उसका विरोध किया तो खालिद ने उसे जबरदस्ती बीफ खिलाने की कोशिश की। पीड़िता का आरोप है कि खालिद चौधरी ने कई बार उसका बलात्कार किया। इससे वह गर्भवती हो गई थी। लेकिन जब उसने धर्मांतरण करने से इनकार कर दिया तो खालिद ने उसके साथ जमकर मारपीट की। इससे उसके पेट में पल रहे बच्चे की मौत हो गई।

पीड़ित लड़की का दावा है कि जब उसने धर्म-परिवर्तन करने से इनकार कर दिया तो खालिद चौधरी ने उससे कहा कि वह अपने आकाओं के इशारे पर इसी तरह हिंदू लड़कियों को फँसाता है। पीड़िता की शिकायत पर पुलिस ने संबंधित धाराओं में मामला दर्ज करते हुए आरोपित खालिद चौधरी की तलाश शुरू कर दी है।

‘मुस्लिम नहीं हैं अहमदिया’: आंध्र प्रदेश वक्फ बोर्ड के ‘फतवा’ पर मोदी सरकार सख्त, पूछा- किस अधिकार से घोषित किया ‘काफिर’

आंध्र प्रदेश वक्फ बोर्ड के एक फतवे पर केंद्र की मोदी सरकार ने सख्त नाराजगी जताई है। इस फतवे के जरिए अहमदिया समाज को ‘गैर मुस्लिम’ और ‘काफिर’ घोषित किया गया है। केंद्र ने इसे घृणा फैलाने वाली हरकत बताते हुए राज्य सरकार से पूछा है कि किस ‘आधार’ और ‘अधिकार’ से यह फतवा जारी किया गया है। अहमदिया मुस्लिमों ने इसके खिलाफ केंद्रीय अल्पसंख्यक मंत्रालय से शिकायत की थी।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, केंद्रीय अल्पसंख्यक मंत्रालय ने आंध्र प्रदेश सरकार को लिखे पत्र में कहा है, “अहमदिया मुस्लिम समुदाय की ओर से 20 जुलाई 2023 को एक शिकायत प्राप्त हुई है। इसमें कहा गया है कि कुछ वक्फ बोर्ड अहमदिया समुदाय का विरोध कर रहे हैं और उन्हें इस्लाम से बाहर करने के लिए अवैध प्रस्ताव पारित कर रहे हैं। यह अहमदिया समुदाय के खिलाफ घृणा फैलाने वाली हरकत है। वक्फ बोर्ड के पास अहमदिया सहित किसी भी समुदाय की धार्मिक पहचान निर्धारित करने का अधिकार नहीं है।”

अल्पसंख्यक मंत्रालय ने यह भी कहा है कि वक्फ अधिनियम 1995 के तहत वक्फ बोर्ड को भारत में वक्फ संपत्तियों की देखरेख और उनका मैनेजमेंट का अधिकार है। राज्य वक्फ बोर्ड को इस तरह का आदेश पारित करने का कोई अधिकार नहीं है। मंत्रालय ने आगे कहा है, “वक्फ अधिनियम 1955 के के तहत वक्फ बोर्ड राज्य सरकार के एक निकाय के रूप में काम कर सकता है। इसका मतलब यह है कि वक्फ बोर्ड राज्य सरकार द्वारा जारी आदेशों पर काम कर सकता है। उसे किसी भी गैर-सरकारी संगठनों द्वारा जारी फतवों पर संज्ञान लेने का कोई अधिकार नहीं है।”

मंत्रालय की ओर से यह भी कहा गया है कि वक्फ बोर्ड ने अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया है। उसे इस तरह के आदेश जारी करने का कोई अधिकार नहीं है। खासकर तब, जब इस तरह के आदेश से किसी समुदाय विशेष के खिलाफ घृणा और असहिष्णुता पैदा हो सकती है।

क्या है मामला

इस पूरे मामले की शुरुआत साल 2012 में हुई। आंध्र प्रदेश वक्फ बोर्ड ने अहमदिया को गैर-मुस्लिम घोषित करने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया था। वक्फ बोर्ड के इस फैसले को आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट में चुनौती दी गई। हाई कोर्ट ने वक्फ बोर्ड के फैसले पर अंतरिम रोक लगा दी। बावजूद आंध्र प्रदेश वक्फ बोर्ड ने इसी साल फरवरी में एक और प्रस्ताव पारित किया। इस प्रस्ताव में कहा गया कि 26 मई, 2009 को जमीयत उलेमा द्वारा जारी किए फतवे को देखते हुए ‘कादियानी समुदाय’ को ‘काफिर’ घोषित किया जाता है। ये मुस्लिम नहीं हैं। बता दें कि अहमदिया मुस्लिमों को कादियानी भी कहा जाता है।

कौन हैं अहमदिया मुस्लिम

पंजाब के लुधियाना जिले के कादियान गाँव में मिर्जा गुलाम अहमद ने साल 1889 में अहमदिया समुदाय की शुरुआत की। मिर्जा गुलाम अहमद खुद को पैगंबर मोहम्‍मद का अनुयायी और अल्‍लाह की ओर से चुना गया मसीहा बताते थे। मिर्जा गुलाम अहमद ने इस्लाम के अंदर पुनरुत्थान की शुरूआत की थी। इसे अहमदी आंदोलन और इससे जुड़े मुस्लिमों को अहमदिया बोला गया। अहमदिया मुस्लिम गुलाम अहमद को पैगंबर मोहम्मद के बाद का एक और पैगंबर या आखिरी पैगंबर मानते हैं। इसी कारण अन्य मुस्लिम उनका विरोध करते हैं। चूँकि गुलाम अहमद कादियान गाँव से थे। इसलिए अहमदिया मुस्लिमों को कादियानी भी कहा जाता है।

‘वह भाग सकता ​था, उसे किडनैप कर सकते थे, उसकी हत्या हो सकती थी’: तिहाड़ जेल से सुप्रीम कोर्ट कैसे आ गया आतंकी सरगना यासीन मलिक

21 जुलाई 2023 को सुप्रीम कोर्ट में मौजूद हर शख्स उस वक्त हैरान रह गया, जब उन्हें आतंकी सरगना यासीन मलिक दिखा। जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) का सरगना इस समय टेरर फंडिंग मामले में दिल्ली के तिहाड़ जेल में बंद है। कड़ी सुरक्षा में वह जेल से सुप्रीम कोर्ट आया था। लेकिन उसकी व्यक्तिगत पेशी को लेकर शीर्ष अदालत की तरफ से कोई निर्देश नहीं दिया गया था। ऐसे में उसकी पेशी पर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताई है। सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने केंद्रीय गृह सचिव अजय भल्ला को पत्र लिखकर इसे गंभीर सुरक्षा चिंता का मामला बताया है। सूत्रों के अनुसार तिहाड़ जेल प्रशासन ने भी जाँच के आदेश दिए हैं।

सुप्रीम कोर्ट में रुबैया सईद के अपहरण मामले में जम्मू की निचली अदालत द्वारा 20 सितंबर 2022 को पारित आदेश के खिलाफ सीबीआई की याचिका पर सुनवाई थी। जस्टिस सूर्यकांत और दीपांकर दत्ता की बेंच को मामले की सुनवाई करनी थी। इस दौरान अदालत में यासीन मलिक भी मौजूद था। इस पर अदालत ने नाराजगी जताते हुए कहा कि जब यासीन मलिक को कोर्ट में पेश करने का कोई आदेश नहीं दिया गया है तो उसे यहाँ क्यों लाया गया है? यदि यासीन मलिक को अपनी बात रखनी होगी तो वह वर्चुअली ऐसा कर सकता है।

जस्टिस दत्ता ने अब इस सुनवाई से खुद को अलग कर लिया है। नई बेंच चार हफ्ते बाद इस मामले की अब सुनवाई करेगी। सुनवाई के दौरान मलिक की पेशी से पैदा हुए सुरक्षा चिंता को लेकर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ को भरोसा दिलाया कि भविष्य में उसे इस तरह बाहर न लाया जाए, यह सुनिश्चित करने के लिए जरूरी कदम उठाए जाएँगे। एसजी ने इसको लेकर केंद्रीय गृह सचिव को लिखे पत्र में कहा है कि यह सुरक्षा में कमी का गंभीर मामला है। वह भाग सकता था। उसका अपहरण या उसकी हत्या हो सकती थी।

एनबीटी ने अपनी रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से बताया है कि तिहाड़ जेल ने इस घटना की जाँच के आदेश दिए हैं। जेल के डीआईजी खुद इसकी जाँच करेंगे। यह पता लगाया जाएगा कि यासीन मलिक को जानबूझकर बाहर ले जाया गया था या ऐसा भूलवश हुआ था।

यासीन मलिक से जुड़ी यह घटना ऐसे समय में हुई है जब उसकी 11 साल की बेटी का एक जहरीला वीडियो वायरल है। उसकी बेटी रजिया सुल्तान का यह वीडियो मुजफ्फराबाद में रिजनल लेजिस्लेटिव असेंबली में संबोधन का है। इसका इस्तेमाल पाकिस्तान अपने प्रोपेगेंडा के लिए कर रहा है। इसमें यासीन मलिक की बेटी कह रही है कि उसके अब्बा कश्मीर के हित की लड़ाई के दीप-स्तंभ हैं। अगर उसके अब्बा को कुछ भी नुकसान पहुँचता है तो वो इसका दोष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देगी। उसके अब्बा को फर्जी मामले में फँसाया गया है और उसे उम्मीद है कि जल्द ही वो जेल से निकलेंगे।

यासीन मलिक 1988 में पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में चला गया था और वहाँ से भारत के खिलाफ सशस्त्र आतंक चला रहा था। इसके बाद वो वापस आ गया और अलगाववादी बन कर रहने लगा। उसके ऊपर वायुसेना जवानों की हत्या समेत 60 मामले दर्ज हैं। 2009 में पाकिस्तान जाकर उसने मुशैल हुसैन से निकाह कर ली थी।

यासीन मलिक वो आतंकी है, जो कश्मीर में कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार में सीधे तौर पर शामिल था। इसके बावजूद मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री रहते उससे मुलाकात की थी और उससे हाथ मिलाया था। उस पर ‘अलगाववादी नेता’ के मुखौटे में कश्मीर में आतंकवाद का समर्थन करने का भी आरोप है। साथ ही उसे भारत में टेरर फंडिंग समेत दूसरे अपराधों के मामले में हिरासत में भी लिया गया था। यासीन मलिक पर राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबैया सईद के अपहरण का भी आरोप है।

अपडेट: शुरुआती जाँच के बाद तिहाड़ जेल प्रशासन ने चार अधिकारियों को सस्पेंड कर दिया है। जेल महानिदेशक संजय बेनीवाल ने उप महानिरीक्षक (जेल मुख्यालय) राजीव सिंह को विस्तृत जाँच रिपोर्ट सोमवार तक सौंपने के निर्देश दिए हैं।

‘मुझे सच कहने की सजा मिली, सारे रिकॉर्ड बताते हैं राजस्थान महिला अत्याचार में नंबर 1’: CM अशोक गहलोत को राजेंद्र सिंह गुढ़ा ने याद दिलाए ‘एहसान’

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने 21 जुलाई 2023 को अपने कैबिनेट के सदस्य राजेंद्र सिंह गुढ़ा को बर्खास्त कर दिया था। गुढ़ा का कहना है कि उन्हें सच बोलने की सजा मिली है। सारे रिकॉर्ड बताते हैं कि महिला अत्याचार में राजस्थान नंबर वन है। बर्खास्तगी के बाद मीडिया से बातचीत में उन्होंने अपने ‘एहसान’ याद दिलाते हुए यह भी बताया कि कैसे संकट के समय वे अशोक गहलोत के साथ खड़े रहे थे।

उन्होंने कहा, “हमें जो ठीक लगा, हमें जो सच लगता है, वो बोलते हैं। इसके लिए ही हमें जनता ने चुना है। राजेंद्र सिंह गुढ़ा ऐसा ही है। जब भी कहीं भी किसी पर अत्याचार होता है राजेंद्र गुढ़ा सबसे पहले खड़ा रहता है। मैं अंतरात्मा की आवाज पर चलता हूँ। मुझे सच बोलने की सजा मिली है।’ उन्होंने कहा कि सच बोलना कोई गुनाह नहीं है। राजस्थान महिलाओं से रेप में अव्वल है। आरपीएससी में भ्रष्टाचार है। कमियों को दूर करने के लिए सरकार कोई कार्रवाई नहीं कर रही। पत्रकारों से बातचीत में गुढ़ा ने कहा, “हमें बहन-बेटियों ने इसलिए जिताकर भेजा था कि हम उनके मान-सम्मान की रक्षा कर सकें। लेकिन सारे रिकॉर्ड कहते हैं कि राजस्थान महिला अत्याचार में नंबर एक पर है। यह अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार के कार्यकाल में हुआ है।”

अशोक गहलोत को संकट के समय दिए गए समर्थन का जिक्र करते हुए पूर्व मंत्री ने कहा कि जब ये सरकार अल्पमत में थी, तब हमने इसको मजबूती दी। हमने कभी इनके लिए संकट नहीं खड़ी की। लेकिन जब कभी कोई दिक्कत आई अपनी पूरी ताकत के साथ इनके साथ खड़े रहे। उन्होंने भविष्य में गहलोत को समर्थन देने पर सौ बार सोचने की बात कही है।

राजेंद्र गुढ़ा झुंझुनूं जिले की उदयपुरवाटी विधानसभा सीट से विधायक हैं। वे बसपा से कॉन्ग्रेस में आए थे। पहली बार 2008 में बसपा के टिकट पर जीते। उसके बाद अपनी पार्टी विधायकों के साथ उन्होंने गहलोत सरकार को समर्थन दे दिया था। उस समय उन्हें राज्यमंत्री बनाया गया था। 2018 में भी वे बसपा के टिकट पर ही जीते थे। लेकिन इस बार भी गहलोत सरकार को समर्थन दिया। सितंबर 2019 में गुढ़ा समेत बसपा के 6 विधायक कॉन्ग्रेस में शामिल हो गए। इसके बाद गुढ़ा को गहलोत ने फिर से मंत्री बनाया था। ध्यान रहे कि जब सचिन पायलट की बगावत के कारण गहलोत की सरकार मुश्किल में दिख रही थी तब यह समर्थन पार्टी के लिए काफी महत्वपूर्ण था।

लेकिन हाल में उन्होंने कई बार प्रदेश की कॉन्ग्रेस सरकार के कामकाज को लेकर सवाल उठाए हैं। 21 जुलाई को राजस्थान विधानसभा में मणिपुर पर अपनी पार्टी नेताओं के हंगामे के बीच उन्होंने राज्य में महिला अत्याचार का मुद्दा उठाया था। उन्होंने कहा था, “सच्चाई ये है कि महिलाओं की सुरक्षा में हम असफल रहे हैं। राजस्थान में जिस तरह से महिलाओं के ऊपर अत्याचार बढ़े हैं, मणिपुर की बजाए हमें अपने गिरेबान में झाँकना चाहिए।” शुरुआत में कॉन्ग्रेस ने इसे उनका निजी बयान बताकर पल्ला झाड़ने की कोशिश की। लेकिन कुछ ही घंटों के भीतर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने उन्हें अपनी कैबिनेट से बर्खास्त करने का प्रस्ताव राज्यपाल को भेजा। राज्यपाल कलराज मिश्रा ने इसे तत्काल मंजूरी दे दी थी।

झुंड में घेरना, नग्न होने की धमकी देना, सैनिक से लेकर पत्रकारों तक से सवाल: कौन हैं मणिपुर की ‘मीरा पैबिस’, जिनसे निपटने के लिए ट्रेंड महिला बल की हो रही डिमांड

हिंसा प्रभावित मणिपुर में ‘मीरा पैबिस’ से निपटने के लिए प्रशिक्षित महिला बलों की माँग की गई है। ‘मीरा पैबिस’ को जानने से पहले कुछ घटनाओं पर गौर करिए। 21 जुलाई 2023 को न्यूज एजेंसी एएनआई ने एक वीडियो जारी किया था। इस वीडियो में मैतेई महिलाओं का एक समूह एक घर को आग के हवाले करते दिख रहा था। यह घर 4 मई 2023 को हुई उस घटना के आरोपितों में से एक का था, जिसमें महिलाओं का नग्न परेड निकालकर उनका गैंगरेप किया गया।

इस घटना का वीडियो वायरल होने के बाद से मुख्यमंत्री बीरेन सिंह के इस्तीफे, उन्हें बर्खास्त करने और राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने की माँग हो रही है। हाई कोर्ट के एक फैसले के कारण राज्य में मई में हिंसा भड़की थी। आपको ध्यान होगा कि 30 जून 2023 को यह खबर आई थी कि मुख्यमंत्री बीरेन सिंह अपने पद से इस्तीफा देने वाले हैं। फिर खबर आई कि महिला समर्थकों के एक समूह ने गवर्नर हाउस जाने से पहले ही उन्हें घेर लिया और उनका त्यागपत्र फाड़ दिया

इससे पहले 24 जून को सेना ने बताया था कि मणिपुर की राजधानी इंफाल में उसे 12 उपद्रवियों को छोड़ना पड़ा। इन उपद्रवियों की रिहाई के लिए महिलाओं की अगुवाई में सैकड़ों की भीड़ सड़क पर आ गई थी। उपद्रवियों को लेकर जा रहे सैन्य बल को घेर लिया गया। सुरक्षा बलों ने महिलाओं से हटने की लगातार अपील की, लेकिन वह बेअसर रही। आखिरकार सेना ने महिलाओं पर बल प्रयोग नहीं करने का फैसला करते हुए उपद्रवियों को छोड़ दिया।

इस घटना के चंद दिन बाद सेना के स्पेयर कॉर्प्स ने बताया था कि मणिपुर में दंगाई महिलाओं को ढाल बना रहे हैं। महिलाओं का समूह सुरक्षा बलों के अभियान में बाधा डाल रही हैं। महिलाओं की भीड़ जमा कर कर ऐसी-ऐसी हरकतें की जा रही हैं, जिससे भारतीय सेना को उत्तर-पूर्वी राज्य में शांति बहाली में खासी परेशानी आ रही है। एक वीडियो शेयर कर इसके बारे में बताया गया था। बताया था कि जिन गाड़ियों में हथियारबंद दंगाई चलते हैं, उनके साथ बड़ी संख्या में महिलाएँ भी होती हैं ताकि सुरक्षा बलों को रोका जा सके।

इन सभी घटनाओं में कॉमन बात महिला समूहों की संलिप्तता है। अब आप इन महिला समूहों को राजनीतिक समर्थक कहें या उपद्रवी या फिर कुछ और, लेकिन मणिपुर में ऐसा हर समूह खुद को ‘मीरा पैबिस’ कहता है। समाज की वरिष्ठ महिलाओं के हाथ में ऐसे समूहों की कमान होती है। जब भी इन्हें अपने समुदाय या खुद के साथ अन्याय होता दिखता है, ये ऐसे ही खड़ी हो जाती हैं। इनका मणिपुर के समाज में दबदबा इस बात से भी समझा जा सकता है कि जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मणिपुर का दौरा किया था तो विभिन्न नागरिक/समाजिक समूहों के साथ उनकी बैठक का हिस्सा ‘मीरा पैबिस’ भी थे।

रिपोर्टों के अनुसार अब सुरक्षा बलों ने इन ‘मीरा पैबिस’ से निपटने के लिए प्रशिक्षित महिला कर्मियों की माँग की है। बताया गया है कि इन समूह ने न केवल अर्धसैनिक बलों की आवाजाही को ‘रोका’ है, बल्कि गंभीर अपराधों को अंजाम देने में ‘मदद’ भी की है। इस स्थिति का हवाला देते हुए राज्य में कानून-व्यवस्था बहाल करने के काम में जुटे अधिकारियों ने महिला अर्धसैनिक बलों की ज्यादा बटालियन की आवश्यकता बताई है। खासकर रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) की महिला बटालियन जिसे दंगों से निपटने में बेहद सक्षम माना जाता है।

असम राइफल्स में महिला जवानों की संख्या काफी कम है और अधिकारियों का मानना है कि वे कानून-व्यवस्था से जुड़ी समस्याओं से निपटने के लिए प्रशिक्षित नहीं हैं। सेना के एक अधिकारी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया है कि खुद को ‘मीरा पैबिस’ बताने वाली महिलाओं का समूह अक्सर दबाव डालने के लिए नंगा हो जाने की धमकी देती हैं। सैन्य आवाजाही रोकने के लिए रास्तों में डंडा लेकर खड़ी हो जाती हैं। झुंड बनाकर सुरक्षा बलों को रोकने वाली ‘मीरा पैबिस’ पत्रकारों को भी नहीं छोड़तीं। बताया जाता है कि मणिपुर में रिपोर्टिंग करने गए पत्रकार हों या सुरक्षा बल के जवान, ‘मीरा पैबिस’ की सदस्य उन्हें घेरकर उनसे बहस करती हैं। उन्हें अपने पहचान-पत्र दिखाने को कहती हैं।

‘पाकिस्तान नहीं जाऊँगी, जेल में गुजार दूँगी जिंदगी’: सीमा हैदर ने राष्ट्रपति को भेजी अर्जी, सचिन के साथ शादी के फोटो भी वायरल

सीमा हैदर ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अर्जी भेजी है। भारत की नागरिकता देने की गुहार लगाई है। साथ ही मीडिया से बातचीत में कहा है कि वह जेल में जिंदगी गुजार देगी, लेकिन पाकिस्तान नहीं जाएगी। उसने सचिन को अपनी जिंदगी बताते हुए कहा है कि उसका एक ही गुनाह है कि वह नेपाल के रास्ते भारत में घुसी। इस बीच सचिन के साथ उसकी शादी की कुछ तस्वीरें भी वायरल हो रही है।

रिपोर्ट के अनुसार सीमा ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को 38 पेज की दया याचिका भेजी है। इसमें अपने बच्चों के साथ भारत में रहने की अनुमति देने की गुहार लगाई है। याचिका में सचिन को अपना पति बताते हुए शादी की कुछ तस्वीरें भी भेजी गई है। याचिका में उसने 13 मार्च 2023 को नेपाल के काठमांडू स्थित पशुपति नाथ मंदिर में सचिन के साथ शादी करने की बात कही। उल्लेखनीय है कि दोनों के नेपाल के एक होटल में साथ रहने की बात पहले ही सामने आ चुकी है।

शादी की जो तस्वीरें वायरल हो रही हैं उनमें सीमा को हिंदू परिधानों में देखा जा सकता है। एक तस्वीर में वह सचिन के गले में जयमाला डाल रही है। उसके हाथों में चूड़ियाँ, गले में मंगलसूत्र और माँग में सिंदूर है। कुछ तस्वीरों में दोनों बच्चों के साथ भी दिख रहे हैं। अपने चार बच्चों के साथ पाकिस्तान से नोएडा के रबूपुरा आई सीमा के जासूस होने का भी संदेह जताया जा रहा। यूपी एटीएस ने उससे पूछताछ भी की है।

पूछताछ के बाद सीमा ने पीएम मोदी और यूपी सीएम योगी आदित्यनाथ से भी पाकिस्तान न भेजने की गुहार लगाई है। इंडिया टुडे को दिए इंटरव्यू में सीमा हैदर ने कहा है, “मैं कोई जासूस नहीं हूँ। पूरी सच्चाई जल्द ही सामने आ जाएगी। मैं मोदी जी और योग जी से अनुरोध करती हूँ कि मुझे वापस न भेजें। मेरे पास भारत आने का कोई दूसरा तरीका नहीं था। इसलिए मैं अवैध तरीके से बॉर्डर पार कर यहाँ आई। मैंने खुद से जुड़ी कोई भी जानकारी नहीं छिपाई है।”

यूपी एटीएस की पूछताछ को लेकर उसने कहा है, “मुझ पर शुरू से ही शक किया जा रहा है। मैंने अपने गाँव से लेकर कराची और फिर यहाँ आने तक की पूरी जानकारी सच-सच बता दी। मेरी मजबूरी थी। मुझे भारत आना था। लेकिन यहाँ का वीजा मुझे नहीं मिल रहा था। सचिन के बिना मेरा रह पाना नामुमकिन था।” पहचान पत्र में उम्र कम लिखे होने को लेकर सीमा ने कहा है, “पाकिस्तान में उम्र को लेकर कोई सवाल नहीं होता। वहाँ सब की उम्र इसी तरह लिखी जाती है। मेरे बच्चों की उम्र भी 1-1 साल कम लिखी हुई है।”

नेपाल के होटल विनायक में अपना नाम प्रीति लिखवाने को लेकर सीमा ने कहा है, “होटल वाले सरासर झूठ कह रहे हैं। उन्होंने हमसे नाम नहीं पूछा था। वे ख़ुद को बचाने के लिए यह सब कह रहे हैं। मैं नेपाल के पशुपति नाथ मंदिर के अलावा कहीं और नहीं गई। मैं पिछले एक साल से हिंदू हूँ। मैं पाकिस्तान में हिंदू बनकर नहीं रह सकती थी। अगर पाकिस्तान में किसी को पता चल जाता कि मैं भारत जा रही हूँ तो वे मुझे मार देते। मैं दो बार करवा चौथ मना चुकी हूँ। मैंने नेपाल में भी खुद को हिंदू बताया था। मेरी दो साल पुरानी वीडियो निकलवाकर देख लीजिए। उसमें मेरी माँग में सचिन के नाम का सिंदूर होगा। मैं सचिन को अपना पति मानती थी।”

सीमा हैदर ने यह भी कहा है कि यह झूठ कहा जा रहा है कि उसने 8 मई को वीजा और पासपोर्ट बनवाया था। उसके पास पहले से ही पासपोर्ट था। उसके पास से 6 पासपोर्ट मिलने को लेकर सीमा ने कहा है कि इसमें से 4 पासपोर्ट बच्चों के हैं और दो उसके हैं। उसके एक पासपोर्ट में सरनेम नहीं था। इसके चलते उसे नेपाल से वीजा नहीं मिला था। इसलिए दोबारा पासपोर्ट बनावाया था।

राजस्थान में ‘महिला सुरक्षा’ की बात करने पर मंत्री राजेंद्र सिंह गुढ़ा को CM अशोक गहलोत ने किया बर्खास्त, कहा था- मणिपुर की बजाए हमें अपने गिरेबान में झाँकना चाहिए

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने मंत्री राजेंद्र सिंह गुढ़ा को पद से बर्खास्त कर दिया है। उन्होंने महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध पर अपनी ही सरकार को आईना दिखाया था। विधानसभा का ये वीडियो सोशल मीडिया पर तुरंत वायरल हो गया। साथ ही मणिपुर के वायरल वीडियो पर राजनीति कर रही कॉन्ग्रेस को झटका लगा था। अब खबर आ रही है कि राजेंद्र सिंह गुढ़ा को पद से हटा दिया गया है, अब वो राजस्थान सरकार में मंत्री नहीं रहे।

राजस्थान: मंत्री राजेंद्र सिंह गुढ़ा बर्खास्त किए गए

राज्यपाल कलराज मिश्रा ने मुख्यमंत्री की सिफारिश को मंजूर करते हुए राजेंद्र सिंह गुढ़ा की बर्खास्तगी पर मंजूरी की मुहर लगा दी है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने राजभवन से सिफारिश की थी कि मंत्री को त्वरित रूप से उनके पद से बर्खास्त किया जाए। याद दिला दें कि राजेंद्र सिंह गुढ़ा उन 6 बसपा विधायकों में शामिल थे, जिन्होंने सितंबर 2019 में कॉन्ग्रेस का दामन थाम लिया था। वो झुंझनू के उदयपुरवाटी से दूसरी बार विधायक बने हैं।

पिछले 1 साल में कई मौकों पर राजेंद्र सिंह गुढ़ा का बयान पार्टी लाइन से अलग गया था। बताया जा रहा है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कॉन्ग्रेस आलाकमान की मंजूरी मिलने के बाद ये कदम उठाया है। इसीलिए, उनके बयान के कुछ देर बाद ही उनकी बर्खास्तगी की फ़ाइल को राजभवन भेज दिया गया। शुक्रवार (21 जुलाई, 2023) को उनका बयान आया और उसी दिन रात तक बर्खास्तगी का आदेश भी।

विधानसभा में राजेंद्र सिंह गुढ़ा ने क्या कहा था?

मणिपुर में 3 महिलाओं को भीड़ द्वारा नग्न कर के जुलूस निकाला गया और उनका गैंगरेप किया गया। घटना के ढाई महीने बाद वीडियो वायरल हुआ। संसद के मॉनसून सत्र का पहले दिन इसकी ही भेंट चढ़ गया। कॉन्ग्रेस पार्टी राजस्थान के विधानसभा में भी इस पर चर्चा करना चाहती थी, लेकिन उनके अपने ही मंत्री ने कुछ ऐसा कहा, जिससे राजस्थान सरकार की कलई खुल गई। राजस्थान विधानसभा में कॉन्ग्रेस विधायक मणिपुर काण्ड पर भाजपा विरोधी तख्तियाँ लहरा रहे थे।

राजेंद्र सिंह गुढ़ा ने विधानसभा में कहा था, “सच्चाई ये है कि महिलाओं की सुरक्षा में हम असफल रहे। राजस्थान में जिस तरह से महिलाओं के ऊपर अत्याचार बढ़े हैं, मणिपुर की बजाए हमें अपने गिरेबान में झाँकना चाहिए।” उनके इस बयान पर भाजपा विधायकों ने मेज थपथपाई। इसके बाद नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ ने संविधान के अनुच्छेद-162(2) हवाला देते हुए कहा कि ये सरकार सामूहिक जिम्मेदारी से चलती है। फिर उन्होंने समझाया कि संविधान कहता है कि अगर एक मंत्री बोल रहा है तो समझिए पूरी सरकार बोल रही है।

‘बिहार पुलिस की लाठी से नहीं, हार्ट अटैक से मरे विजय सिंह’: BJP बोली- हाई कोर्ट सिटिंग जज करें जाँच, बेटे ने कहा था ‘बीमारी’ बताने का डाल रहे ‘दबाव’

बिहार की राजधानी पटना में पुलिस ने 13 जुलाई, 2023 को प्रदर्शन कर रहे भाजपा कार्यकर्ताओं पर जम कर लाठीचार्ज किया था। भाजपा ने आरोप लगाया था कि पुलिस की लाठी से पार्टी के जहानाबाद के जिला महामंत्री विजय सिंह की मौत हो गई। प्रत्यक्षदर्शियों ने भी विजय सिंह की मौत पुलिस की लाठी से होने की बात कही। हालाँकि, पुलिस-प्रशासन ने इससे इनकार कर दिया। अब पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में दावा किया गया है कि विजय सिंह की मौत हार्ट अटैक से हुई है।

जिला प्रशासन ने अब एक बयान जारी कर के कहा है कि विजय सिंह की मौत का पता लगाने के लिए एक मेडिकल बोर्ड का गठन किया गया था। इस बोर्ड का कहना है कि मौत की वजह दिल की बीमारी और इससे संबंधित जटिलताएँ हैं। बयान में दावा किया गया है कि दोपहर 1:22 से 1:27 के बीच विजय सिंह छज्जूबाग में बेहोश हुए थे, जबकि लाठीचार्ज डाकबंगले क्रॉसिंग इलाके में हुई। भाजपा ने जिला प्रशासन के दावे को नकारते हुए उच्च-स्तरीय जाँच की माँग की है।

बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष विजय कुमार सिन्हा ने कहा कि पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के साथ छेड़छाड़ की गई है। PMCH द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट की उच्च-स्तरीय जाँच की माँग करते हुए उन्होंने कहा कि राज्य के स्वास्थ्य विभाग के शीर्ष अधिकारियों के निर्देश पर इसे तैयार किया गया है। उन्होंने याद दिलाया कि वैशाली और लखीसराय में हुई मौतों की वजह भी दिल की बीमारी बता दी गई थी। वहीं राजद प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने इन आरोपों को बेबुनियाद कहा है।

मेडिकल रिपोर्ट में ये भी लिखा है कि विजय सिंह को हृदय रोग तो था ही, साथ ही उनके हृदय की 2 नसों में ब्लॉकेज भी था। हिस्टोपैथोलॉजिकल रिपोर्ट में भी ये निष्कर्ष आने की बात कही गई है। पटना के DM चंद्रशेखर सिंह का कहना है कि मेडिकल जाँच रिपोर्ट में ये भी आया है कि विजय सिंह के शरीर पर जख्म के कोई निशान नहीं थे। उधर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सम्राट चौधरी ने भी इस रिपोर्ट पर सवाल खड़े करते हुए माँग की है कि पोस्टमॉर्टम की प्रक्रिया का वीडियो उपलब्ध कराया जाए।

साथ ही उन्होंने ऐलान किया कि 24 जुलाई से लेकर 9 अगस्त तक बिहार में भाजपा कार्यकर्ता जिला एवं मंडल स्तर पर प्रदर्शनी लगाएँगे, जिनमें 13 जुलाई वाली पुलिस इस लाठीचार्ज का से जुड़ी तस्वीरें लगाई जाएँगी। उन्होंने कहा कि विजय सिंह की मौत के मामले की जाँच एक सिटिंग जज की अध्यक्षता में गठित कमिटी द्वारा की जानी चाहिए। वहीं राजद प्रवक्ता एजाज अहमद ने किसी भी प्रकार की जाँच की ज़रूरत को नकारते हुए कहा कि भाजपा के पास मुद्दा नहीं है, इसीलिए इस पर राजनीति कर रही है।

याद दिला दें कि मृतक के बेटे ने कहा था कि उनके पिता कोई दवा वगैरह खाते ही नहीं थे और न ही किसी डॉक्टर के पास उनके नाम का प्रिस्क्रिप्शन मिलेगा। उन्होंने कहा था कि गाँव वाले भी कभी ऐसा नहीं कहेंगे कि वो बीमार थे, वो पैदल गाँव से जहानाबाद चले जाते थे। बेटे ने पूछा था कि अगर वो बीमार होते तो ट्रेन से पटना क्यों जाते? उन्होंने पुलिस पर भी परिवार को ‘टॉर्चर’ करने का आरोप लगाते हुए कहा था कि उनके पिता की मौत को बीमारी से हुई मौत बताने के लिए दबाव डाला जा रहा है। साथ ही इस मामले में प्रत्यक्षदर्शी गवाह रहे भरत चंद्रवंशी ने भी कहा था कि लाठी चलने के कारण विजय सिंह की मौत हुई है।

‘मणिपुर की बजाए हमें अपने गिरेबान में झाँकना चाहिए’: राजस्थान के मंत्री ने विधानसभा में अपनी ही सरकार को घेरा, माना – राज्य में बढ़ा महिला अपराध

कॉन्ग्रेस पार्टी मणिपुर की घटना को लेकर भाजपा पर हमलावर है। मणिपुर में 3 महिलाओं को भीड़ द्वारा नग्न कर के जुलूस निकाला गया और उनका गैंगरेप किया गया। घटना के ढाई महीने बाद वीडियो वायरल हुआ। संसद के मॉनसून सत्र का पहले दिन इसकी ही भेंट चढ़ गया। कॉन्ग्रेस पार्टी राजस्थान के विधानसभा में भी इस पर चर्चा करना चाहती थी, लेकिन उनके अपने ही मंत्री ने कुछ ऐसा कहा, जिससे राजस्थान सरकार की कलई खुल गई।

उन्होंने विधानसभा में कहा, “सच्चाई ये है कि महिलाओं की सुरक्षा में हम असफल रहे। राजस्थान में जिस तरह से महिलाओं के ऊपर अत्याचार बढ़े हैं, मणिपुर की बजाए हमें अपने गिरेबान में झाँकना चाहिए।” उनके इस बयान पर भाजपा विधायकों ने मेज थपथपाई। इसके बाद नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ ने संविधान के अनुच्छेद-162(2) हवाला देते हुए कहा कि ये सरकार सामूहिक जिम्मेदारी से चलती है। फिर उन्होंने समझाया कि संविधान कहता है कि अगर एक मंत्री बोल रहा है तो समझिए पूरी सरकार बोल रही है।

राजेंद्र राठौड़ ने कहा कि मंत्री महोदय ने सरकार की कलई खोल दी है। उन्होंने कहा, “मैं मंत्री महोदय को तो बधाई दूँगा की दूँगा, लेकिन ये शर्मनाक बात है मर्दों के प्रदेश वाले मंत्री जी।” बता दें कि मार्च 2022 में राजस्थान के संसदीय कार्यमंत्री शांति धारीवाल ने विधानसभा में बलात्कार की घटनाओं पर चर्चा के दौरान हँसते हुए कहा था कि राजस्थान ‘मर्दों का प्रदेश’ है।कॉन्ग्रेस के कई मंत्री-विधायक भी इस दौरान हँसे थे और किसी ने उन्हें टोका तक नहीं था।

राजेंद्र राठौड़ ने कहा, “मुख्यमंत्री अशोक गहलोत जी, जी, हमारी नहीं तो कम से कम अपने मंत्री के बयान पर तो संज्ञान लो। गृह मंत्री के रूप में लचर कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी तो सँभाल लो।” बता दें कि राजेंद्र सिंह गुढ़ा राजस्थान की कॉन्ग्रेस सरकार में सैनिक कल्याण, होमगार्ड एवं सिविल डिफेन्स मंत्रालय के साथ-साथ पंचायती राज और ग्रामीण विकास मंत्रालय भी सँभाल रहे हैं। मंत्री के बयान से पहले कॉन्ग्रेस के विधायक मणिपुर वाली घटना को लेकर तख्तियाँ लहरा रहे थे।

जैसे आज मणिपुर के Video से विचलित है देश, वैसे ही कभी तस्वीरों से सन्न रह गया था अजमेर: चौगुने पैसे में बिकते थे स्कूल-कॉलेज की लड़कियों के न्यूड फोटो वाले रील

आज सोशल मीडिया का जमाना है। ढाई महीने बाद ही सही, मणिपुर में 3 महिलाओं के साथ हैवानियत का वीडियो सामने आया और मुख्यमंत्री-प्रधानमंत्री से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ने इस पर अपने-अपने स्तर पर टिप्पणी की, कार्रवाई के लिए कहा और आरोपितों की धर-पकड़ हुई। मणिपुर में महिलाओं को नग्न घुमाए जाने और उनके साथ गैंगरेप की घटना में देर से ही सही, न्याय हो तो रहा है। लेकिन, अजमेर में अस्सी-नब्बे के दशक में जो हुआ था, उसकी नाबालिग पीड़िताएँ आज दादी-नानी बन गईं लेकिन न्याय नहीं मिला।

उस समय सोशल मीडिया का जमाना नहीं था, टीवी मीडिया का भी नहीं। रेडियो पर सिर्फ सरकारी और राष्ट्रीय खबरें चलती थीं। उस दौरान अख़बार और पत्रिकाएँ ही खबरों और विश्लेषण का सबसे बड़ा स्रोत हुआ करती थीं। इसी दौरान ‘दैनिक नवज्योति’ में कुछ ऐसी तस्वीरें छपीं जिसने सबको सन्न कर दिया। ये तस्वीरें थीं उन पीड़िताओं की, जिनकी इज्जत लूटने में दरगाह के खादिमों के परिवार वालों, सफेदपोशों और कॉन्ग्रेस नेताओं का गिरोह शामिल था।

इस अख़बार के तत्कालीन संपादक हुआ करते थे दीनबंधु चौधरी, जिनके रिपोर्टर संतोष गुप्ता इस पूरे स्कैंडल की खबर लेकर उनके पास आए थे। खबर छपी भी, लेकिन किसी ने गंभीरता से नहीं लिया। असल में संतोष गुप्ता ने अजमेर के अनाज मंदिर स्थित ‘भरोसा लेबोरेटरी’, जहाँ फिल्म्स के नेगेटिव पर काम होता था, वहाँ से 4 गुना ज्यादा पैसे देकर फोटो रील्स ले जाते हुए एक व्यक्ति को देखा था। उनके साथ एक दोस्त था, जिसने शुरू में तो आनाकानी की लेकिन बाद में उन्हें 4 रील्स दी।

उन्हें देख कर वो दंग रह गए थे। ‘दैनिक भास्कर’ ने पत्रकार दीनबंधु चौधरी का इंटरव्यू लिया है और उनसे उस जमाने में हुए इस स्कैंडल के बारे में जाना। इसी क्रम में उन्होंने बताया कि अख़बार ने तस्वीरें छापने का निर्णय लिया और प्राइवेट पार्ट्स पर काली पट्टी डाल कर उन्हें प्रकाशित कर दिया गया। बार एसोसिएशन के वकील अख़बार की प्रतियाँ लेकर डीएम-एसपी के पास गए और फिर इस प्रकरण में कानूनी कार्रवाई शुरू हुई।

इन सबकी शुरुआत कहाँ से हुई, इसका किस्सा भी उन्होंने सुनाया। असल में श्रीहरि रोड पर स्थित एक कॉलेज की लड़की एडमिट कार्ड के लिए फीस के लिए पैसे न होने के कारण रोती हुई जा रही थी, जिसे वहाँ से गुजरते कुछ रसूखदार युवकों ने देखा और उसकी मदद की। उसके बाद रोज मुलाकात करते-करते उन्होंने लड़की से जान-पहचान बढ़ा ली और एक दिन वैन में बिठा कर हटूंडी स्थित अपने फार्महाउस ले गए, जहाँ उसके साथ बलात्कार किया गया और उसकी अश्लील तस्वीरें भी ले ली गईं।

फिर तो ब्लैकमेल कर-कर के आए दिन उसका रेप किया जाने लगा। एक दिन दरिंदों ने उस लड़की से अपनी दोस्त को भी लाने को कहा, मना करने पर तस्वीरें शहर भर में फैला देने की धमकी दी। इस डर से वो अपनी दोस्त को लेकर आई। उसके साथ भी वही दरिंदगी दोहराई गई। फिर दूसरी वाली लड़की को अपनी दोस्त को लाने के लिए कहा गया। इस तरह चेन बनता गया और कई लड़कियाँ इस जाल में फँस गईं। दीनबंधु चौधरी ने ये भी बताया कि कैसे उन्हें ये खबर न छपने की धमकी देते हुए हत्या की धमकियाँ आती थीं।

उन्होंने बताया कि आधी रात को उन्हें फोन कॉल्स आते थे, जिनके जवाब में वो बिना डरे कहते थे कि कायरों की तरह छिप कर बात मत करो, सामने आओ। दीनबंधु चौधरी के पिता दुर्गा प्रसाद चौधरी तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत के अच्छे दोस्त थे। खुद मुख्यमंत्री ने उन्हें फोन कॉल कर के ये तस्वीरें न छपने का आग्रह किया और कहा कि इससे उनकी जान को खतरा हो सकता है। लेकिन, दीनबंधु चौधरी ने सफेदपोशों को बेनकाब करने के रास्ते पर आगे बढ़ने का निर्णय लिया।

उन्हें सुरक्षा के लिए 2 गनर भी मुहैया कराए गए, लेकिन उन्होंने ये भी ठुकरा दिया। आज दीनबंधु चौधरी कहते हैं कि अगर उन्होंने सुरक्षा ले ली होती तो ये सन्देश जाता कि वो डर गए हैं। उन्हें रूट बदल कर ऑफिस जाने-आने की सलाह दी गई। इस घटना की शिकार अधिकतर लड़कियाँ नाबालिग थीं, जिनकी उम्र 16-17 साल थी। लड़कियों को धमकाया जाता था कि किसी को इस बारे में कुछ भी बताने पर ये तस्वीरें लीक कर दी जाएँगी।

लेकिन, जिस लैब में रील्स दिए गए थे तस्वीरें निकलवाने के लिए, उन्होंने इसकी कॉपियाँ अपने पास रख लें। लैब कर्मचारियों की नीयत बिगड़ गई और उनके माध्यम से ही ये तस्वीरें शहर भर में सर्कुलेट होने लगीं। 6 लड़कियों ने आत्महत्या का कदम उठा लिया था। अजमेर यूथ कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष फारूक चिश्ती, उपाध्यक्ष नफीस चिश्ती और जॉइंट सेक्रेटरी अनवर चिश्ती का नाम इसमें सामने आया। CID को जाँच की जिम्मेदारी मिली, 18 आरोपित बनाए गए।

पीड़िताओं में कई लड़कियों के बारे में कुछ पता ही नहीं चला कि वो कहाँ गईं, कुछ ने नाम-पहचान बदल लिया और कुछ परिवार के साथ कहीं और शिफ्ट हो गईं। ये लड़कियाँ नहीं चाहती थीं कि उनकी पहचान बाहर आए। अजमेर की लड़कियों के रिश्ते होने बंद हो गए थे। बदनामी के डर से वो पीछे हट गई थीं। 12 लड़कियों को केस दर्ज कराने के लिए एक NGO ने राजी किया, लेकिन लगातार धमकियों के कारण 10 पीछे हट गईं। बची हुई 2 ने 16 आरोपितों की पहचान की, उनमें से भी 11 ही गिरफ्तार हुए।

जिन 18 आरोपितों का नाम FIR में था, वो हैं – हरीश दोला (कलर लैब का मैनेजर), फारुख चिश्ती (तत्कालीन यूथ कॉन्ग्रेस प्रेसिडेंट), नफीस चिश्ती (तत्कालीन यूथ कॉन्ग्रेस वाइस प्रेसिडेंट), अनवर चिश्ती (तत्कालीन यूथ कॉन्ग्रेस जॉइंट सेक्रेटरी), पुरुषोत्तम उर्फ बबली (लैब डेवलपर), इकबाल भाटी, कैलाश सोनी, सलीम चिश्ती, सोहैल गनी, जमीर हुसैन, अल्मास महाराज, इशरत अली, मोइजुल्लाह उर्फ पूतन इलाहाबादी, परवेज अंसारी, नसीम उर्फ टारजन, महेश लोदानी (कलर लैब का मालिक), शम्सू उर्फ माराडोना (ड्राइवर), जऊर चिश्ती (लोकल नेता)।

इनमें से एक सलीम चिश्ती तो इस घटना के सामने आने के 2 दशक बाद 2012 में धराया, बुर्के में। उसे जमानत भी मिल गई। नफीस को पकड़ने में भी पुलिस को 11 साल लग गए थे, वो 2003 में धराया था। सोहैल गनी चिश्ती भी 26 साल तक पुलिस की पहुँच से दूर रहा। उसने दिसंबर 2018 में आत्मसमर्पण किया। उसे भी बेल मिल गई। इकबाल भाटी भी 13 साल बाद 2005 में पकड़ाया और उसे भी जमानत मिल गई। अल्मास महाराज का आज तक कोई अता-पता नहीं है, जबकि उसके खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस भी जारी है।

नसीम उर्फ़ टार्जन जमानत मिलने के बाद कहाँ फरार हुआ, कोई अता-पता नहीं है। मुख्य आरोपित फारूक चिश्ती ने खुद को ‘सिजोफ्रेनिया’ का मरीज बता कर मानसिक रोगी घोषित करवा दिया। राजस्थान हाईकोर्ट ने उसे ये कहते हुए बरी कर दिया कि उसने पर्याप्त सज़ा काट ली है। एक आरोपित पुरुषोत्तम उर्फ़ बबली ने आत्महत्या ही कर ली। उस समय भी सोशल मीडिया होता तो शायद इन आरोपितों की त्वरित गिरफ़्तारी होती और इनका ये खेल इतना लंबा नहीं चलता।