सऊदी अरब के शहर मक्का में शुक्रवार (23 दिसंबर 2022) को भयंकर तूफान और बारिश के कारण बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो गई। इस बाढ़ में मक्का शहर में कई गाड़ियाँ भी बह गईं। वहीं, काबा का उमरा करने गए मुस्लिम इस दौरा भीगते रहे। बता दें कि उमरा के दौरान बारिश को मुस्लिम शुभ मानते हैं।
रिपोर्टों के अनुसार, शहर की नगरपालिका पिछले कुछ दिनों से खराब मौसम को लेकर आपातकालीन टीमों को हाई अलर्ट पर रखा था। इन टीमों को किसी भी अप्रिय घटना से निपटने के लिए तैयार रहने को कहा गया था।
أثار الأمطار والسيول التي ضربت حي العتيبية بمكة صباح اليوم الجمعة 1444/5/29هـ
सामने आए कई वीडियो में दिख रहा है कि भयंकर तूफान और बारिश के बीच मुस्लिम काबा में उमरा कर रहे हैं। इस दौरान उमरा कर रहे मुस्लिम खुश नजर आए। वहीं, भारी बारिश के कारण उत्पन्न हुई बाढ़ के कारण कई गाड़ियाँ बहकर एक जगह से दूसरी जगह चली गईं। कुछ कारों के बालू में दबे होने का भी वीडियो सामने आया है।
इससे पहले सऊदी अरब की राष्ट्रीय मौसम विज्ञान केंद्र (NCM) ने मक्का के लिए मौसम की चेतावनी जारी की थी। मक्का के निवासियों को जारी की गई चेतावनी में कहा गया था कि जब तक आवश्यक न हो, वे अपने घरों से बाहर न निकलें।
शहर में बर्बाद और फँसी हुई गाड़ियों को निकालने के लिए सरकारी अधिकारियों को बुलाया गया। शहर के अधिकारियों का कहना है कि इस तूफान और बाढ़ में अभी तक किसी के मरने की सूचना नहीं है। वहीं, इसमें हुए नुकसान के आँकलन का काम जारी है।
शहर के आपदा प्रबंधन केंद्र ने कहा, “लोगों को सावधानी बरतनी चाहिए और अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उन जगहों पर नहीं जाना चाहिए, जहाँ बारिश का पानी जमा होता है।” इस बीच NCM ने जेद्दा में बारिश के अलर्ट स्तर को बढ़ा दिया। जेद्दा के अलग-अलग हिस्सों में बारिश हुई और तटीय शहर के ऊपर आसमान में घने बादल छाए हुए हैं।
मध्य प्रदेश के भोपाल में पुलिस ने एक नाबालिग मुस्लिम लड़की के अपहरण के आरोप में कुश्ती के एक कोच के खिलाफ केस दर्ज किया गया है। आरोपित का नाम नवीन नारा है। बताया जा रहा है कि नवीन ने शादीशुदा होने के बाद भी 16 साल की मुस्लिम लड़की से निकाह करने के लिए इस्लाम कबूल किया। नवीन की नामजदगी शुक्रवार (23 दिसंबर 2022) को हुई है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मामला शयमला थानाक्षेत्र का है। यहाँ एक 16 वर्षीया मुस्लिम लड़की के अब्बा ने थाने में शिकायत दी थी। शिकायत में बताया गया था कि उनकी बेटी और नवीन नाम का कुश्ती कोच जुलाई 2022 में हरियाणा के रोहतक में एक कुश्ती कार्य्यक्रम के दौरान मिले थे। कुछ दिनों बाद नवीन नाबालिग लड़की को कुश्ती की ट्रेनिंग के लिए रोहतक ले जाने की कोशिश करने लगा। इसी कोशिश के चलते अगस्त 2022 में नवीन भोपाल भी आया। हालाँकि लड़की के परिजनों को नवीन का व्यवहार पसंद नहीं आया इसलिए उन्होंने मिलने में ज्यादा रूचि नहीं ली।
शिकायत के मुताबिक बाद में नवीन ने लड़की का अपहरण कर लिया और अपने साथ ले कर रोहतक गया। लड़की अपने घर नहीं पहुँची तो उसकी तलाश शुरू हुई। पुलिस को उसका स्कूटर पार्किंग में मिला था। पुलिस ने CCTV खँगाले तो लड़की एक कार में बैठती दिखाई दी। कार के नंबर से वो रॉकी सिंह के नाम पर मिली। रॉकी नवीन के परिवार का सदस्य है। पुलिस ने झज्जर में चरखी दादरी स्थित नवीन के घर का पता लगाया। इस दौरान पुलिस को अपनी जाँच में यह भी पता चला कि पहले से विवाहित नवीन ने लड़की से शादी करने के लिए इस्लाम कबूल कर लिया था। दोनों का निकाह मोहाली के नयागाँव स्थित के मस्जिद में इस्लामी तौर-तरीकों से सम्पन्न हुआ था।
रिपोर्ट्स के मुताबिक पुलिस ने लड़की को हिरासत में ले कर कोर्ट में पेश किया। यहाँ पर लड़की ने 28 अक्टूबर 2022 के फैसले का हवाला देते हुए नवीन के साथ अपने निकाह को वैध बताया। इस फैसले में यह कहा गया था कि यौवन आने के बाद मुस्लिम लड़की का निकाह वैध माना जाएगा। 9 दिसंबर 2022 को अदालत ने तमाम दलीलों को सुनते हुए लड़की को पुलिस कस्टडी में सौंप दिया। फिलहाल पुलिस फरार चल रहे नवीन की तलाश कर रही है।
शयमला हिल्स थाने के SHO उमेश यादव के मुताबिक लड़की अंत तक अपने अपहरण के आरोपों को गलत बताती रही। उसने नवीन के साथ अपनी मर्जी से निकाह करने की भी दलील दी। पुलिस के अनुसार लड़की किसी भी रूप में अपने माता-पिता के साथ जाने को तैयार नहीं थी। बाद में पुलिस के समझाने के बाद लड़की अपने अम्मी-अब्बू के साथ घर चली गई। फ़िलहाल पुलिस कानूनी तौर पर यह जाँच-पड़ताल में लगी है कि क्या आरोपित नवीन पर पॉक्सो एक्ट के तहत मामला बनता है या नहीं।
मालदीव में चीन की समर्थक मानी जाने वाली पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन की ‘प्रोग्रेसिव पार्टी ऑफ मालदीव (PPM’) के एक नेता ने राजधानी माले में भारतीय उच्चायोग पर हमले के लिए लोगों को उकसाया है। हालाँकि, मालदीव डेमोक्रेटिक पार्टी ने इसके विरोध में आवाज़ उठाई है।
‘प्रोग्रेसिव पार्टी ऑफ मालदीव’ के नेता अब्बास आदिल रिज़ा ने एक ट्वीट के जरिए लोगों को भारतीय उच्चायोग पर आगजनी के लिए उकसा कर नया विवाद खड़ा कर दिया है। इस्लामिक पार्टी PPM के नेता ने ट्विटर पर लिखा, “8 फरवरी को अडू में आगजनी और हिंसा भारत के इशारे पर की गई थी। हमने अभी तक इसका जवाब नहीं दिया है। मेरा प्रस्ताव है कि हम भारतीय उच्चायोग से शुरुआत करें। #IndiaOut”
अब्बास आदिल रिज़ा के ट्वीट का स्क्रीन शॉट
अब्बास के भारतीय उच्चायोग के खिलाफ हिंसा फैलाने वाले इस विवादास्पद ट्वीट को ख़बर लिखे जाने तक 62 रीट्वीट और 33 लाइक मिल चुके थे। पीपीएम के नेता जिस घटना के बारे में झूठ फैला कर लोगों को भड़का रहे हैं, वह घटना 8 फरवरी, 2012 की है। आरोप है कि इसी दिन राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद को ‘बंदूक की नोक’ पर जबरन पद से हटा दिया गया था। इसके विरोध में नशीद के ‘मालदीव डेमोक्रेटिक पार्टी (MDP)’ के समर्थकों ने माले में रिपब्लिक स्क्वायर पर प्रदर्शन किया था।
इस विरोध प्रदर्शन के दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़प हुई थी। प्रदर्शन कर रहे लोगों पर लाठीचार्ज किया गया था, साथ ही आँसू गैस के गोले भी दागे गए थे। राष्ट्रपति नशीद के समर्थकों को गिरफ्तार भी कर लिया गया था। अब्बास आदिल रिज़ा ने अब दावा किया है कि नशीद के समर्थकों ने भारतीय अधिकारियों के इशारे पर हिंसा की थी। घटना के 10 साल बाद अब्बास ने ‘बदला’ लेने का प्रण लिया है और अपने समर्थकों को माले में भारतीय उच्चायोग पर हमला करने के लिए उकसाया है। भारत के साथ मालदीव के द्विपक्षीय संबंधों को नुकसान न पहुँचे इसे ध्यान में रखते हुए, सत्तारूढ़ एमडीपी ने इस बयान की निंदा की है।
एमडीपी सेक्रेटेरियट की तरफ से किए गए ट्वीट में लिखा गया है, “एमडीपी भारतीय उच्चायोग पर आगजनी के आह्वान की कड़े शब्दों में निंदा करती है और अधिकारियों से मामले की जाँच करने की अपील करती है। एमडीपी मित्र राष्ट्रों के प्रति हिंसा और नफरत फैलाने के विपक्ष के निरंतर प्रयास की भी निंदा करती है।
The MDP condemns in the strongest terms the call for an arson attack on the Indian High Commission, and calls on the authorities to investigate the matter. The MDP also condemns the opposition’s continuous effort to incite violence & hatred towards friendly nations.
एमडीपी के अलावा 2018 से वजूद में आई एक अन्य राजनीतिक पार्टी ‘मालदीव्स थर्ड वे डेमोक्रेट्स (MTD)’ और वर्ष 2019 में स्थापित राजनीतिक दल ‘मालदीव रिफॉर्म मूवमेंट (MRM)’ ने भी अब्बास के बयान की निंदा करते हुए इस पर कार्रवाई की माँग की है।
आपको बता दें कि चीन के इशारे पर मालदीव में भारत के प्रति लोगों को भड़काने वाले इस अभियान का नेतृत्व पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन चला रहे हैं। यामीन की पार्टी चीन की समर्थक रही है। अब्दुल्ला यामीन 2013 से 2018 तक मालदीव के राष्ट्रपति रहे थे। अपने कार्यकाल के आखिरी दौर में उन्होंने कैंपेन की शुरुआत कर दी थी।
जम्मू-कश्मीर पुलिस की राज्य जाँच एजेंसी (SIA) ने श्रीनगर के DM के आदेश पर शनिवार (24 दिसंबर 2022) को यहाँ के बरजुल्ला इलाके में स्थित अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी के नाम पर दर्ज एक घर को जब्त किया है।
SIA के अधिकारियों ने कहा है कि गिलानी की यह संपत्ति साल 1990 में प्रतिबंधित संगठन जमात-ए-इस्लामी द्वारा खरीदी गई थी। हालाँकि, इसे गिलानी के नाम पर दर्ज कराया गया था। साल 2000 की शुरुआत तक गिलानी यहाँ रहता था। लेकिन, इसके बाद वह यहाँ से हैदरपोरा इलाके में रहने चला गया था।
जम्मू-कश्मीर: दिवंगत अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी के श्रीनगर के बरजुल्ला स्थित घर को श्रीनगर के DM के आदेश पर राज्य जांच एजेंसी (SIA) ने सील कर दिया है। pic.twitter.com/MypomR0JN7
अधिकारियों ने यह भी कहा है कि सैयद अली शाह गिलानी के घर छोड़ने के बाद इसका इस्तेमाल जमात-ए-इस्लामी के मुखिया के घर के रूप में किया जा रहा था। जम्मू-कश्मीर पुलिस की राज्य जाँच एजेंसी ने बरजुल्ला इलाके में एक अन्य घर भी जब्त किया है।
संपत्तियों की जब्ती को लेकर अधिकारियों का यह भी कहना है कि SIA की कार्रवाई प्रतिबंधित संगठन जमात-ए-इस्लामी से संबंधित कई संपत्तियों की जब्ती का हिस्सा है। SIA ने जम्मू-कश्मीर में जमात-ए-इस्लामी की कुल 188 संपत्तियों की पहचान की है। इन सभी संपत्तियों को या तो नोटिफाई किया जा चुका है या फिर ऐसी संपत्तियों पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जा रही है।
कहा जा रहा है कि जमात-ए-इस्लामी-इस्लामी के खिलाफ हुई यह कार्रवाई जम्मू-कश्मीर में बढ़ रही टेरर फंडिंग के खतरे को काफी हद तक खत्म कर देगी। साथ ही यह कानून व्यवस्था और समाज में फैले डर को समाप्त करने की दिशा में बड़ा कदम है।
बता दें, इससे पहले गत शनिवार (17 दिसंबर 2022) को भी जमात-ए-इस्लामी से जुड़ी 100 करोड़ रुपए की संपत्ति जब्त की थी। SIA ने एक बयान जारी करते हुए कहा था कि केंद्र शासित प्रदेश के बारामूला, बांदीपोरा, गांदरबल और कुपवाड़ा में एसआईए की सिफारिश पर बारामूला, बांदीपोरा, गांदरबल और कुपवाड़ा के जिला मजिस्ट्रेट द्वारा अधिसूचित किए जाने के बाद लगभग 100 करोड़ रुपए की संपत्तियों के उपयोग और प्रवेश पर रोक लगाई गई है। ये सम्पतियाँ अलग-अलग जगहों (एक दर्जन से अधिक स्थानों) पर थीं।
SIA के अलावा राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) ने भी आतंकी गतिविधियों से जुड़े दो मामलों में जम्मू-कश्मीर के कठुआ में कुछ जगहों पर छापेमारी की है। रिपोर्ट के अनुसार, NIA ने जम्मू-कश्मीर में कुछ संदिग्ध ठिकानों पर छापेमारी की है। इनमें से कुछ जगहों पर हुई छापेमारी में कई पुख्ता सबूत NIA के हाथ लगे हैं।
J&K | NIA raids underway in Kathua against some suspects, in connection with separate cases having links to terror activities. pic.twitter.com/fRJsREuziz
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने श्री स्वामीनारायण गुरुकुल राजकोट संस्थान के 75वें अमृत महोत्सव को संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने कहा कि श्री स्वामीनारायण गुरुकुल राजकोट की यात्रा के 75 वर्ष ऐसे कालखंड में पूरे हो रहे हैं, जब देश अपनी आज़ादी के 75 वर्ष मना रहा है। प्रधानमंत्री ने कहा कि पिछले 75 वर्षों में गुरुकुल ने छात्रों के मन-मस्तिष्क को अच्छे विचारों और मूल्यों से सींचा है, ताकि उनका समग्र विकास हो सके।
प्रधानमंत्री ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि जिस कालखंड में दुनिया के दूसरे देशों की पहचान वहाँ के राज्यों और राजकुलों से होती थी, तब भारत को, भारतभूमि के गुरुकुलों से जाना जाता था। गुरुकुल यानी, गुरु का कुल, ज्ञान का कुल! पीएम मोदी ने कहा कि शून्य से अनंत तक, हमने हर क्षेत्र में शोध किए, नए निष्कर्ष निकाले। प्रधानमंत्री ने इस पर ख़ुशी जताई कि स्वामीनारायण गुरुकुल इस पुरातन परंपरा को, आधुनिक भारत को आगे बढ़ाने के लिए ‘कन्या गुरुकुल’ की शुरुआत कर रहा है।
पीएम मोदी ने कहा, “आजादी के इस अमृतकाल में देश, एजुकेशन इनफ्रास्ट्रक्चर हो या एजुकेशन पॉलिसी, हर स्तर पर काम कर रहा है। पूज्य धर्मजीवन दास जी स्वामी जी का गुरुकुल के लिए जो विजन था उसमें अध्यात्म और आधुनिकता से लेकर संस्कृति और संस्कार तक समाहित था। इस गुरुकुल ने छात्रों के मन-मस्तिष्क को अच्छे विचारों और मूल्यों से सींचा है, ताकि उनका समग्र विकास हो सके। खोज और शोध भारत की जीवन पद्धति का हिस्सा थे। नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय हमारी गुरुकुल परंपरा के वैश्विक वैभव के पर्याय हुआ करते थे।”
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस मौके पर कहा कि जब विश्व में ‘लैंगिक समानता’ जैसे शब्दों का जन्म भी नहीं हुआ था उस समय हमारे यहाँ गार्गी और मैत्रेयी जैसी विदुषियाँ शास्त्रार्थ कर रही थीं। उन्होंने याद दिलाया कि कैसे वाल्मीकि के आश्रम में आत्रेयी भी पढ़ रही थीं। उन्होंने कहा कि शून्य से अनंत तक, हमने हर क्षेत्र में शोध किए, नए निष्कर्ष निकाले और आज आजादी के इस अमृतकाल में देश, एजुकेशन इनफ्रास्ट्रक्चर हो या एजुकेशन पॉलिसी – हर स्तर पर काम कर रहा है।
भारत में ज्ञान ही जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य रहा है।
जिस कालखंड में दुनिया के दूसरे देशों की पहचान वहां के राज्यों और राजकुलों से होती थी, तब भारतभूमि को यहां के गुरुकुलों से जाना जाता था। खोज और शोध भारत की जीवन पद्धति का हिस्सा रहे हैं।
पीएम मोदी ने कहा कि आज नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के माध्यम से देश पहली बार उस शिक्षा व्यवस्था तैयार कर रहा है जो Forward Looking है Futuristic है। उन्होंने कहा कि भारत में ज्ञान ही जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य रहा है। बकौल पीएम मोदी, भारत ने अंधकार से भरे युगों में मानवता को प्रकाश की वो किरणें दी, जिन से आधुनिक विश्व और विज्ञान की यात्रा शुरू हुई। पीएम मोदी ने इस दौरान अपनी सरकार की विकास कार्यों को भी गिनाया।
उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले में एक दलित परिवार ने एक मुस्लिम पीर पर पिटाई और धर्मान्तरण के दबाव का आरोप लगाया है। पीड़ित परिवार ने कोर्ट में शिकायत देकर आरोपित पीर पर कार्रवाई की माँग की है। मामले में छांगुर नाम के पीर के अलावा धर्म परिवर्तन कर के नीतू से नसरीन बनी एक महिला और नवीन से जमालुद्दीन बने एक अन्य व्यक्ति को भी आरोपित किया गया है। विश्व हिंदू परिषद के प्रवक्ता ने भी पुलिस से इस मामले में हस्तक्षेप करने की आवाज उठाई है। वहीं पुलिस को न्यायालय के निर्देश की प्रतीक्षा है। 4 दिसंबर 2022 की घटना बताते हुए पीड़ित परिवार ने 12 दिसम्बर को अदालत में प्रार्थना पत्र दिया है।
यह मामला थाना कोतवाली उतरौला क्षेत्र का है। यहाँ पीड़ित व्यक्ति ने अदालत में शिकायत देते हुए बताया है कि वह उतरौला क्षेत्र के मधुपुर इलाके में बन रहे एक अस्पताल में 12000 प्रतिमाह के रेट पर मजदूरी करता था। यह अस्पताल छांगुर पीर के साथ रहने वाली नसरीन और उनके शौहर नवीन बनवा रहे हैं। बताया गया है कि 4 दिसंबर 2022 को जब पीड़ित ने अपनी मजदूरी माँगी तब पीर टाल मटोल करने लगा। इस बीच पीर छांगुर पर पीड़ित व्यक्ति की पत्नी को मजदूरी के बदले इस्लाम कबूलने का ऑफर दिया गया।
शिकायत में आगे बताया गया है कि पीड़ितों ने पीर छांगुर की बातों को मानने से इंकार कर दिया। उन्होंने अपना हिसाब करने को कहा तब नसरीन, जमालुद्दीन और छांगुर पीर ने पीड़ितों को गुस्से में गंदी-गंदी गालियाँ दीं। तीनों आरोपितों ने पीड़ित पति-पत्नी को जान से मार डालने की भी धमकी दी। आरोप है कि इस दौरान छांगुर, जमालुद्दीन और नसरीन ने पति-पत्नी को बेरहमी से पीटा और उनके पास रखे 2 हजार रुपए भी छीन लिए। ऑपइंडिया के पास शिकायत कॉपी मौजूद है।
पीड़ित दलित परिवार ने स्थानीय पुलिस पर भी अपनी शिकायत पर कार्रवाई न करने का आरोप लगाया है। उन्होंने 12 दिसंबर 2022 को अदालत की शरण ली। विश्व हिंदू परिषद के राष्ट्रीय प्रवक्ता विनोद बंसल ने ट्वीट करते हुए उत्तर प्रदेश पुलिस से मामले का संज्ञान लेने और कठोर कार्रवाई की माँग की है। इस माँग के जवाब में 22 दिसंबर 2022 को बलरामपुर पुलिस ने कोर्ट के आदेश की प्रतीक्षा होने की जानकारी दी है।
उक्त संबंध में प्राप्त जांच आख्यानुसार प्रकरण माननीय न्यायालय में विचाराधीन है माननीय न्यायालय के आदेशानुसार विधिक कार्यवाही की जाएगीl
ऑपइंडिया द्वारा जुटाई गई जानकारी के मुताबिक इस केस में आरोपित नीतू से नसरीन बनी महिला ने साल 2015 में इस्लाम कबूल किया है। नीतू के साथ उनके पति नवीन भी इस्लाम कबूल कर के जमालुद्दीन बन गए थे। इनकी एक नाबालिग बेटी भी इन्ही के साथ मुस्लिम बनी है। नीतू और नवीन अपनी बेटी के साथ मुंबई में रहते थे। ये सभी पीर छांगुर के साथ बलरामपुर के उतरौला में बस गए हैं।
बिहार के पूर्वी चंपारण में शुक्रवार (23 दिसंबर 2022) की शाम को ईंट भट्ठे की चिमनी गिरने से अब तक 9 लोगों के मरने की खबर सामने आई है। इस घटना पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) ने दुख जताया है। उन्होंने राष्ट्रीय आपदा राहत कोष से मृतकों के परिजनों को 2 लाख रुपए देने की घोषणा की है।
मोतिहारी के रामगढ़वा इलाके में एक ईंट भट्ठे की चिमनी गिर गई। जिस वक्त यह दुर्घटना हुई, उस वक्त लोग वहाँ 50 से अधिक लोग थे। चिमनी गिरने से दर्जनों लोग उसमें दब गए। घटना की जानकारी मिलते ही जिला प्रशासन मौके पर पहुँचा और देर रात तक 8 शवों को मलबे से निकाला। रात में कोहरे और अंधेरा होने कारण बचाव कार्य रूक गया था। अगले दिन एक और व्यक्ति ने दम तोड़ दिया।
कहा जा रहा है कि इस हादसे में 2 दर्जन से अधिक लोगों के दबे होने की आशंका है। वहीं, गंभीर रूप से घायल 16 लोगों को इलाज के लिए रक्सौल के अस्पताल में भर्ती कराया गया है। लोगों का कहना है कि विस्फोट की आवाज बहुत दूर तक सुनाई दी। आवाज सुनते ही इलाके में भगदड़ मच गई।
Pained by the loss of lives due to a mishap at a brick kiln in Motihari. Condolences to the bereaved families. Prayers with the injured. An ex-gratia of Rs. 2 lakh from PMNRF would given to the next of kin of each deceased. The injured would be given Rs. 50,000: PM @narendramodi
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर कहा, “मोतिहारी में एक ईंट भट्ठे में हुए हादसे में लोगों की मौत से व्यथित हूँ। शोक संतप्त परिवारों के प्रति संवेदना और घायलों के लिए प्रार्थना करता हूँ। PMNRF से 2 लाख रुपए अनुग्रह राशि के रूप में प्रत्येक मृतक के परिजनों को दिए जाएँगे। वहीं, घायलों को 50,000 रुपए दिए जाएँगे।”
Pained by the loss of lives due to a mishap at a brick kiln in Motihari. Condolences to the bereaved families. Prayers with the injured. An ex-gratia of Rs. 2 lakh from PMNRF would given to the next of kin of each deceased. The injured would be given Rs. 50,000: PM @narendramodi
बताया जाता है कि रामगढ़वा प्रखंड के नारीरगिर गाँव के सरेह में तीन साझेदार मिलकर चिमनी चलाते हैं। दोपहर के बाद से चिमनी के नीचे पकाने के लिए कच्चे ईंटों को लगाया जा रहा था। इस दौरान दर्जनों मजदूर काम कर रहे थे। इस दौरान चिमनी ब्लास्ट कर गिर गया। इकस दौरान दो पार्टनर मोहम्मद इरशाद और नुरुल हक वहाँ मौजूद थे। इसमें से इरशाद की भी मौत हो गई है।
ईंट भट्ठे की चिमनी करीब 100 फीट ऊँचा था, जिसमें से आधा टूट कर 50 फीट दूर तक जा गिरा है। लोगों का कहना है कि चिमनी में विस्फोट हुआ और वह भरभरा कर गिर गया। ईंट फैक्ट्री शुक्रवार (23 दिसंबर 2022) से ही शुरू की गयी थी। लोगों का कहना है कि ईंट पकाने की शुरुआत करने से पहले चिमनी की जाँच नहीं की गयी थी। धुएँ के प्रेशर के बाद इसमें धमाका हो गया।
बिहार पुलिस ने भागलपुर जिले से अवैध हथियारों का बड़ा जखीरा बरामद किया है। इस कार्रवाई के दौरान पुलिस ने 2 तस्करों को गिरफ्तार किया है। दोनों से हुई पूछताछ के दौरान एक मस्जिद के बगल वाले घर से बंदूकों को बनाने वाली फैक्ट्री भी मिली है। इस घर के मकान मलिक का नाम डॉक्टर मोहम्मद इकबाल अंसारी और फैक्ट्री चलाने वाले का नाम मोहम्मद फैज़ल है। स्पेशल टास्क फ़ोर्स ने यह कार्रवाई शुक्रवार (23 दिसंबर 2022) को की है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक छापेमारी भागलपुर के नाथनगर थानाक्षेत्र में हुई है। पहले की कार्रवाई में पुलिस ने 1 दर्जन अवैध हथियारों के साथ 2 तस्करों को गिरफ्तार किया था। दोनों तस्कर हथियारों के साथ ट्रेन पकड़ने जा रहे थे। इनमें से एक नवगछिया का संजय कुमार और दूसरा मुंगेर का गुड्डू शर्मा है। दोनों ने पूछताछ में बड़ी मस्जिद के पास चम्पा नगर मोहल्ले में हकीम शाह लेन में एक घर में बनी फैक्ट्री से उन हथियारों को खरीदने की जानकारी दी।
पुलिस ने बताए गए मकान पर छापा मारा तो वहाँ मिनी गन बनाने की फैक्ट्री मिली। मौके पर पुलिस को मकान मालिक का बेटा मीकाईल मिला जिसे हिरासत में ले लिया गया। उससे पूछताछ की जा रही है। इस बीच फैज़ल को पुलिस कार्रवाई की भनक लग गई थी और वो फरार हो गया। उसकी तलाश में छापेमारी चल रही है। बताया जा रहा है कि फैज़ल लगभग 2 साल से इस फैक्ट्री को किराए के मकान में चला रहा था।
भागलपुर में मिनी हथियार फैक्ट्री का खुलासा, पूरी खबर के लिए देखिए ये खास रिपोर्ट। pic.twitter.com/CMjaAjwwFb
पुलिस को बरामद हुए हथियारों की तस्करी का नेटवर्क बंगाल और झारखंड से जुड़े होने का शक है। पुलिस के मुताबिक उन्हें हथियारों की तस्करी की गुप्त सूचना मिली थी। हर पिस्टल 9500 रुपए का रेट तय हुआ था। फैज़ल को 50 हजार रुपए पेशगी के तौर पर मिले थे। बाकी पैसे हथियार बिकने के बाद मिलने की बात हुई थी। पुलिस ने फैज़ल के घर पर भी दबिश दी लेकिन वो वहाँ नहीं मिला। बताया जा रहा है कि फैज़ल ने पहले अपने घर से भी अवैध हथियारों की सप्लाई की है।
कभी देश में महिला सशक्तिकरण की प्रतीक रही ICICI Bank की पूर्व सीईओ पद्मश्री और पद्मभूषण चंदा कोचर (Ex CEO Chanda Kochar) और उनके पति दीपक कोचर को सैकड़ों करोड़ रुपए के घोटाले में गिरफ्तार कर लिया गया है। शुक्रवार (23 दिसंबर 2022) को CBI ने दोनों को पूछताछ के लिए बुलाया था।
अधिकारियों का कहना है कि पूछताछ के दौरान चंदा कोचर और उनके पति दीपक कोचर टाल-मटोल कर रहे थे और सवालों का जवाब नहीं दे रहे थे। इसके बाद अधिकारियों ने दोनों को गिरफ्तार कर लिया। आज शनिवार (24 दिसंबर 2022) को दोनों को CBI की स्पेशल कोर्ट में पेश किया जाएगा।
CBI ने यह कार्रवाई ICICI बैंक और वीडियोकॉन लोन धोखाधड़ी के मामले में की है। चंदा कोचर के समय ICICI बैंक ने वीडियोकॉन को 3250 करोड़ रुपए का लोन दिया था, जो बाद में नॉन परफॉर्मिंग एसेट (NPA) हो गए। NPA को साधारण भाषा में कहें तो ये पैसे डूब गए।
ICICI बैंक ने 2009 से 012 तक वीडियोकॉन ग्रुप को 3250 करोड़ रुपए का लोन दिया था। इसमें से 86 प्रतिशत (करीब 2810 करोड़ रुपए) ऋण वीडियोकॉन ने नहीं चुकाए। इसके बाद साल 2017 में इस लोन को ICICI बैंक ने NPA खाते में डाल दिया। उस समय बैंक की प्रमुख चंदा कोचर थीं।
आरोप है कि चंदा कोचर ने वीडियोकॉन को यह लोन इस शर्त पर दिया था कि वीडियोकॉन चंदा के पति दीपक कोचर की कंपनी में निवेश करेगा। वीडियोकॉन ग्रुप के पूर्व चेयरमैन वेणुगोपाल धूत ने कोचर की कंपनी नूपावर रिन्यूएबल में लोन के पैसे से करोड़ों रुपए का निवेश किया था।
वीडियोकॉन को लोन की मंजूरी देने वाली कमिटी में चंदा कोचर खुद शामिल थीं। बाद में यह मामला सामने आया तो बवाल हो गया। CBI ने 24 जनवरी 2019 को FIR दर्ज की और उसमें चंदा, उनके पति दीपक और वीडियोकॉन के वेणुगोपाल धूत को आरोपित बनाया।
दरअसल, यह मामला तब सामने आया, जब ICICI Bank और वीडियोकॉन के शेयर होल्डर अरविंद गुप्ता ने फ्रॉड का आरोप लगाया था। अरविंद गुप्ता ने साल 2018 में प्रधानमंत्री, भारतीय रिजर्व बैंक और सेबी (SEBI) को पत्र लिखकर वीडियोकॉन के एमडी धूत और ICICI Bank की सीईओ चंदा कोचर पर एक-दूसरे को लाभ पहुँचाने का आरोप लगाया था।
कोचर के बुरे दिन की शुरुआत
इस कार्रवाई के बाद बैंक ने अप्रैल 2009 से मार्च 2018 के बीच चंदा कोचर को दिए गए सभी बोनस को वापस ले लिया। फरवरी 2019 में बैंक ने चंदा कोचर को टर्मिनेशन लेटर देकर उन्हें पद से हटा दिया। फिलहाल मामले की जाँच CBI, ED, SFIO और आयकर विभाग जाँच कर रही है।
जनवरी 2020 में ED ने कोचर परिवार की 78 करोड़ रुपए से ज्यादा की संपत्ति की थी। उस दौरान ED ने पूछताछ के बाद दीपक कोचर को गिरफ्तार कर लिया था। इसके बाद पिछले साल फरवरी में स्पेशल PMLA कोर्ट ने आईसीआईसीआई बैंक-वीडियोकॉन मनी लॉन्ड्रिंग मामले में 5 लाख रुपए के मुचलके पर जमानत दे दी थी। कोर्ट ने देश से बाहर जाने पर रोक लगा दिया था।
महिला सशक्तिकरण की प्रतीक चंदा कोचर
एक समय था जब चंदा कोचर को भारत में महिला सशक्तिकरण का प्रतीक माना जाता था। उन्हें ICICI बैंक को ऊँचाइयों पर पहुँचाने वाली महिला के रूप में भी याद किया जाता है। विश्व की प्रतिष्ठित पत्रिका फोर्ब्स ने उन्हें दुनिया की 100 सबसे शक्तिशाली महिलाओं की सूची में शामिल किया था।
चंदा कोचर भारत में किसी बैंक की CEO बनने वाली पहली महिला थीं। बैंकिंग सेक्टर में उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने चंदा कोचर को देश के दूसरे और तीसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्मश्री और पद्म भूषण से भी सम्मानित किया है।
कभी कमाती थी एक दिन में 2.18 लाख रुपए
जब मामले का खुलासा हुआ था, तब चंदा कोचर का एक दिन का वेतन करीब 2.20 लाख रुपए था। धोखाधड़ी, रिश्वत, मनी लॉन्ड्रिंग और NPA से जुड़े इस मामले ने चंदा कोचर के स्वर्णिम करियर को बर्बाद कर दिया।
चंदा कोचर ने साल 1984 में इंडस्ट्रियल क्रेडिट एवं इन्वेस्टमेंट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया को मैनेजमेंट ट्रेनी के रूप में ज्वॉइन किया था। उस समय यह बैंक नहीं था। साल 1994 में ICICI बैंक बना। चंदा कोचर कोर टीम का हिस्सा बनीं और वह मैनेजमेंट ट्रेनी से सीधे सहायक जनरल मैनेजर बन गईं।
चंदा कोचर मैनेजमेंट ट्रेनी से डिप्टी जनरल मैनेजर बनीं, फिर डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर बनीं। साल 2009 में वह बैंक की प्रबंध निदेशक (Managing Director) और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) बनीं। अपने पति की कंपनी को फायदा पहुँचाने के लिए चंदा कोचर ने वीडियोकॉन के साथ मिलकर इस बैंक फ्रॉड को अंजाम दे दिया।
भारत का इतिहास किसने लिखा? कैसे लिखा? क्या लिखा-छापा? जिन-जिन को यह जिम्मेदारी दी गई थी, क्या उन लोगों ने अपने-अपने हिस्से की ईमानदारी लेखन के वक्त बचाए रखी? ईमानदार उत्तर है – नहीं। नहीं इसलिए क्योंकि समय-समय पर इन दरबारी इतिहासकारों के लिखे से उलट इतिहास लेखन किया जाता रहा है, भारत के सच को भारतीयों के साथ साझा किया जाता रहा है। ‘असत्यमेव जयते’ – इस कड़ी में जुड़ी एक नई पुस्तक है। इसे लिखा है अभिजित जोग ने।
कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया में ‘असत्यमेव जयते’ पुस्तक का विमोचन 17 दिसंबर 2022 को किया गया। हिंदी, गुजराती और इंग्लिश में प्रकाशित इस पुस्तक के लॉन्च के अवसर पर ऑपइंडिया ने लेखक अभिजित जोग से लंबी बातचीत की। इसमें मुख्य बातें किताब पर तो की ही गईं, साथ में अब तक के इतिहास लेखन, सरकार से अपेक्षाएँ, वामपंथी गैंग आदि पर भी चर्चा शामिल रही। अभिजित जोग के अलावा लेखिका शेफाली वैद्य से भी इस पुस्तक को लेकर संक्षिप्त बातचीत हुई। पहले अभिजित जोग से हुई बातचीत को पढ़िए।
सवाल: सत्यमेव जयते का कॉन्सेप्ट सर्वव्यापी है। इतना कि लोग इसे ही सत्य मान कर चलते हैं। कानून, पुलिस, प्रशासनिक प्रक्रिया से लेकर दोस्त-परिवार की बातचीत में भी लोग “मैं सत्य के साथ खड़ा हूँ, अंततः मेरी जीत होगी” टाइप बातें करते हैं। ऐसे में वो क्या वजह रही कि आपको ‘असत्यमेव जयते’ टाइटल से पुस्तक लिखनी पड़ गई?
जवाब: सत्यमेव जयते हमारी संस्कृति का आधार है। पूरा हिंदू कल्चर ही सत्यमेव जयते की विचारधारा से प्रभावित है, उसी के आधार पर चलता है। दुर्भाग्यवश हमारा जो इतिहास है, उससे संबंधित जो भ्रांतियाँ फैलाई गई हैं, उसका एक शब्द में अगर वर्णन करना है तो ‘असत्यमेव जयते’ ही बोलना पड़ता है। इसका कारण है कि इतिहास लेखन में इतना झूठ बोला गया है कि अगर उसको बयान करना है तो ‘असत्यमेव जयते’ ही बोल सकते हैं। मतलब हमको अभी ‘असत्यमेव जयते’ से ‘सत्यमेव जयते’ की ओर जाना है। इस किताब को लिख कर उसी दिशा की ओर एक कदम उठाया है मैंने।
सवाल: आपकी पुस्तक में “आर्यन थ्योरी” पर भी बात की गई है। “हम भारतीय (खासकर गेहुएँ रंग वाले) आर्यन हैं, कहीं और से आकर यहाँ के मूल निवासियों की सत्ता हथिया ली।” – इस पर बहुत लिखा गया, बहुत पढ़ाया गया। क्या यह “फूट डालो और शासन करो” की नीति का ही एक्सटेंडेड वर्जन था? अगर हाँ तो आजादी के बाद भी क्यों इस थ्योरी को पाला-पोसा गया?
जवाब: मैं तो बोलूँगा कि यह ‘फूट डालो और राज करो’ नीति का आधार था। इसका कारण यह है कि जिसे आर्य कहा गया, उनका कोई वंश नहीं है, यह कोई विशेष समुदाय नहीं है। लोगों के वर्ण, चेहरे, रंग आदि से इसका कोई लेना-देना नहीं। इसका नामकरण लोगों की क्वालिटी के आधार पर रखा गया। जिन लोगों में कुछ किस्म की क्वालिटी थी, उन्हें आर्यन कहा गया। इसको ऐसे समझ सकते हैं कि सभ्य, सुसंस्कृत, बुद्धिमान, औरों की मदद करने वाला, शक्तिशाली गुणों से भरपूर लोगों को आर्य कहा गया। इस तरह के अच्छे गुणों वाले लोग आर्य कहलाए।
कई लोगों को लगता था कि उनमें बहुत सारे अच्छे गुण हैं, तो वो खुद को आर्य कहलाते थे। इसमें ऐसा बिल्कुल नहीं है कि कोई एक वंश है, जो आर्य वंश है। इसका गोरे-काले, खड़ी या चपटी नाक आदि से कोई संबंध नहीं है। अब सवाल उठता है कि फिर आर्यन थ्योरी आई कैसे? इसका जवाब अंग्रेजों के भारत आगमन से शुरू होता है।
अंग्रेजों ने भारत आगमन के साथ पाया कि यहाँ की भाषा संस्कृत है, जो दुनिया की कई अन्य भाषाओं से मिलती-जुलती है… श्रीलंका से लेकर आइसलैंड तक, पूरे विशाल प्रदेश में जितनी भाषाएँ बोली जाती हैं, उनमें से अधिकांश भाषाएँ संस्कृत से साम्य रखती हैं। इनमें यूरोप की बहुत भाषाएँ आती हैं – इंग्लिश, फ्रेंच, ग्रीक, लैटिन… ये सब भाषाएँ संस्कृत से काफी समानता रखती हैं। इस बात को अंग्रेजों ने बखूबी समझ लिया। यह भी समझ लिया कि इन सभी भाषाओं में सबसे पुरानी भाषा संस्कृत है। फिर उन्होंने यह भी मान लिया कि इन भाषाओं का उद्भव संस्कृत से हुआ है। उन्होंने यहाँ तक मान लिया कि यूरोप की संस्कृति भारतीय संस्कृति से विकसित हुई है।
जाने-माने विद्वान वॉल्टेयर (Voltaire) ने तो यहाँ तक कह दिया था कि यूरोप की सभ्यता ने गंगा के किनारों पर ही जन्म लिया है। अंग्रेजों की इस मान्यता को बाद में अंग्रेजों ने ही बदल डाला। इसके पीछे कोई शोध या सामाजिक/वैज्ञानिक अध्ययन नहीं था। बल्कि औपनिवेशिक जरूरत थी। पहले अंग्रेजों की महत्वाकांक्षा भारत में सिर्फ व्यापार तक सीमित थी। बाद में उन्हें अहसास हो गया कि वो यहाँ राज कर भी सकते हैं और लंबे समय तक उनका राज चल भी सकता है।
ऐसे में ‘संस्कृत से यूरोपियन भाषाओं का उद्भव’ या ‘भारतीय संस्कृति से विकसित हुई यूरोप की संस्कृति’ जैसा नैरेटिव बदलने की जरूरत आन पड़ी। इसके पीछे सिंपल सा तर्क था – जिसे वो गुलाम बनाने वाले थे, उसी की संस्कृति को श्रेष्ठ मान कर नीचा कैसे दिखाया जा सकता है? इसी के बाद संस्कृत को बाहर से आई भाषा का खेल रचा गया, यहाँ की संस्कृति को द्रविड़ियन संस्कृति का नाम दिया गया।
‘असत्यमेव जयते’ पुस्तक के विमोचन के दौरान
काल्पनिक और मनगढ़ंत कहानियों को रचा गया। जिस संस्कृत को कुछ साल पहले तक अंग्रेजी विद्वानों ने सबसे पुरानी और यूरोपियन भाषाओं की जननी कहा, उसे ही अब पश्चिम से आई भाषा बताने लगे। पश्चिम से आए लोगों को आर्य का नाम दिया गया। आर्यों ने यहाँ के मूल निवासियों मतलब द्रविड़ों को मार कर दक्षिण भारत की ओर धकेल दिया – यह भी रचा गया। इसके बाद पश्चिम के इन लोगों (गोरे, सुनहरे बालों वाले, नीली आँखों वाले) ने ही संस्कृत और वैदिक संस्कृत की रचना की, उसका विकास किया।
यह कहानी इसलिए रची गई क्योंकि अंग्रेज खुद भी पश्चिम से आए थे, तो उन्हें यह तर्क देने में आसानी हुई कि जो लोग सैकड़ों सालों पहले पश्चिम से आकर आपको सभ्यता/संस्कृति सिखाए, वैसा ही ये (अंग्रेज) लोग भी सिखाएँगे, जैसे – मॉर्डन सभ्यता, रेलवे, पोस्ट ऑफिस से लेकर नवीनतम तकनीक तक। मतलब आम भारतीयों के दिमाग में यह भर दिया कि पश्चिम से आए लोग ही सिखाते हैं, यही भारत की परंपरा रही है, इसलिए ये खुद भी सिखाने आए हैं। पूरे देश को गुलाम बनाए रखने और अपने राज को नैतिक आधार देने के लिए इन कहानियों को गढ़ा गया, इसे इतनी बार रटा-रटाया गया कि अंततः यह थ्योरी ही बन गई।
स्वतंत्रता के बाद भी अंग्रेजों द्वारा दी गई यह थ्योरी क्यों चलती रही, यह मिलियन डॉलर क्वेश्चन है। इसका कारण यह है कि राज करने के लिए भारत के लोगों को विभाजित रखना है। पहले यह अंग्रेजों का बनाया नैरेटिव था कि भारत के लोगों में इतनी फूट है, इतनी विभाजित है जनता कि उन पर राज करने के लिए किसी थर्ड पार्टी की जरूरत है, ऐसी थर्ड पार्टी जो सबको समान न्याय दे सके। स्वतंत्र भारत में अंग्रेजों वाली थर्ड पार्टी की जगह नेहरू-गाँधी परिवार ने ले ली। इन लोगों ने भी खुद को ऐसे दर्शाया कि भारतीय जनता विभाजित है और उनको एकसमान न्याय देने के लिए नेहरू-गाँधी परिवार बैठा हुआ है।
भारत के सामाजिक/भाषाई विभाजन वाले इस नैरेटिव को चलाने के लिए उन्होंने बनी-बनाई आर्यन इन्वेजन थ्योरी को चालू रखा कि दक्षिण के लोग अलग हैं, उत्तर के लोग अलग हैं… संस्कृत, तमिल और हिंदी अलग है। उच्च जाति के लोग आर्यन हैं, जो भारत के बाहर से यहाँ आए, जबकि निम्न जातियों के लोग (बहुजन समाज) यहाँ के मूल निवासी हैं। यह विभाजन (मनगढ़ंत) निश्चित तौर पर उनके पक्ष में था।
इसके साथ एक चीज और की गई। स्वतंत्र भारत में इतिहास लेखन का काम वामपंथियों को सौंप दिया गया। और वामपंथियों की तो यह घोषित पॉलिसी ही है कि भारत एक अप्राकृतिक गणतंत्र है और इसके 16 टुकड़े किए जाने चाहिए। मतलब भारत को टुकड़े-टुकड़े में तोड़ना यह वामपंथियों का घोषित मकसद है। उनके इस मकसद के लिए भी आर्यन इन्वेजन थ्योरी की बहुत जरूरत थी। इसलिए राज करने वाले कॉन्ग्रेस और इतिहास लिखने वाले वामपंथियों ने साथ मिलकर इसे अपने-अपने फायदे के लिए आगे बढ़ाया। आप इसको आसान शब्दों में ऐसे समझ सकते हैं कि गोरे अंग्रेज चले गए, काले अंग्रेज रह गए।
सवाल: “हम तो साँप-छुछुंदर वाले लोग थे, बर्बर थे। कुछ समय बाद सूफी आए, उन्होंने सौहार्द्र का पाठ पढ़ाया… इसके कुछ समय बाद पादरी आए और उन्होंने हमें सभ्यता सिखाई” – इस हास्यास्पद लेकिन खतरनाक झूठ को कैसे काटा आपने? कोई एक उदाहरण देकर बताएँ।
जवाब: हम बर्बर थे, यह कहना बहुत ही गलत है। ऐसा इसलिए क्योंकि भारत की सभ्यता पूरे विश्व की सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक है और यह अभी तक जीवित है। इसके विपरीत पुरानी अन्य सभ्यताएँ कब की खत्म हो चुकी हैं, जैसे – मिश्र की सभ्यता, मेसोपोटामिया की सभ्यता, मायन सभ्यता आदि। जिसे हम हिंदू सभ्यता या भारत की सभ्यता कहते हैं, ये आज भी चल रही है। यही कारण है कि यह कई लोगों की नजर में चुभता भी है कि क्यों और कैसे यह संस्कृति अभी भी चल रही है।
भारत की सभ्यता विश्व की पहली ज्ञान-आधारित सभ्यता थी। इसलिए बर्बर वाली बात तो किसी भी एंगल से कही ही नहीं जा सकती है। अब बात सूफियों और उनके सौहार्द्र सिखाने पर। सबसे पहले तो इसे क्लियर कर लीजिए कि सूफियों को किसी भी तरह से कोई भी संत नहीं कह सकता है। जितने भी सूफी भारत आए, वो बहुत ही हिंसक और धर्मांध तरह के लोग थे। इनमें कहीं से भी संत प्रवृति का अंशमात्र भी नहीं था। जितने भी बड़े नाम वाले सूफी हैं, जैसे निजामुद्दीन औलिया या मोइनुद्दीन चिस्ती… ये सब मुस्लिम आक्रांताओं के साथ बाहर से भारत आए थे।
भारत आने वाले मुस्लिम आक्रांताओं के साथ जो सूफी आए, वो जिहाद को सिर्फ समर्थन नहीं देते थे बल्कि खुद भी जिहाद के सिपाही बन कर आए थे। इन सूफियों का यह भी काम था कि अगर कोई मुस्लिम बादशाह राजकाज के कारण नरम भूमिका अपनाने लगे तो उसे संदेश दे कि यह सही नहीं है। वह राजा को “इस्लाम इसकी इजाजत नहीं देता, काफिरों के साथ सख्ती से ही पेश आना चाहिए” जैसी बातें समय-समय पर याद कराता रहता था। ऐसे सूफियों को किसी भी तरह से संत बोलना या इनके कारण सौहार्द्र आया, इसका खंडन ‘असत्यमेव जयते’ किताब बखूबी किया गया है।
अब आते हैं “पादरियों के साथ सभ्यता आई” टाइप झूठ पर। जब अंग्रेज भारत आए और ईस्ट इंडिया कंपनी के ऑफिसर सर थॉमस रो 1614 में बादशाह जहाँगीर के दरबार में गए, तो भारत में परमिशन माँगी गई थी व्यापार करने की। उन्हें परमिशन मिल भी गई। शुरुआती दिनों में भारतीय संस्कृति को देख कर अंग्रेज अवाक रह गए थे और खुल कर उन लोगों ने कहा भी, लिखा भी कि भारतीय संस्कृति बहुत ही श्रेष्ठ संस्कृति है। ऐसे में जिस विषय पर खुद अंग्रेजों ने ही श्रेष्ठता का मुहर लगाया, उसी को बाद में पादरियों ने आकर सिखाया, यह हास्यास्पद है।
ईस्ट इंडिया कंपनी और पादरियों को लेकर एक दिलचस्प किस्सा है। शुरुआत में ईस्ट इंडिया कंपनी ने मिशनरियों को भारत आकर ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार की अनुमति नहीं दी थी। कंपनी ने यह तर्क दिया था कि अगर मिशनरियों ने आकर ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार किया तो भारत के लोग नाराज हो जाएँगे और उनके व्यापारिक हितों को नुकसान पहुँचेगा। आप ऐसे समझिए कि साल 1813 तक भारत में मिशनरियों को आने की परमिशन नहीं थी। फिर इस परमिशन के लिए ब्रिटेन में हिंदू धर्म के खिलाफ खेल शुरू हुआ।
नैतिकता की दृष्टि से हिंदू धर्म कितना गिरा हुआ है, हिंदू समाज कितनी बुराइयों में जकड़ा हुआ है… यह सब दिखाने और इसी बात को फैलाने के लिए एक कैंपेन चलाया गया। ब्रिटेन में रहने वाले लोगों के दिमाग में हिंदू धर्म के खिलाफ एक तरह से जनमत का निर्माण करना था। ऐसा करके वो ईस्ट इंडिया कंपनी पर दबाव बनाना चाह रहे थे कि रसातल में पहुँच चुके हिंदू धर्म और समाज को बचाने के लिए ईसाई धर्म और मिशनरियों का भारत जाना बहुत जरूरी है। इसके लिए सती जैसी कुरीतियों (यह बिल्कुल गलत थी, इसमें कोई शक नहीं) का बढ़ा-चढ़ा कर डेटा दिखाया गया। पूरे भारत में साल भर में 300-400 की संख्या में होने वाली सती की घटनाओं को ब्रिटेन में 40-50-60 हजार बताया जाने लगा। इस कैंपेन की वजह से मिशनरियों को 1813 में भारत आकर अपने धर्म के प्रचार-प्रसार की अनुमति ब्रिटिश पार्लियामेंट से मिल गई क्योंकि ब्रिटेन में हिंदू धर्म के खिलाफ जनमत निर्माण कर दिया गया था।
ईस्ट इंडिया कंपनी के जो लोग 1813 से पहले मिशनरियों को आने भी नहीं देते थे, भारतीय संस्कृति को श्रेष्ठ बोलते थे… ऐसे लोगों में विलियम जोन्स, वॉरेन हैस्टिंग आदि ने आखिरी समय तक एड़ी-चोटी का जोर लगाया कि मिशनरियों के भारत आगमन पर रोक लगाया जा सके। ‘असत्यमेव जयते’ पुस्तक में इस बात का जिक्र किया गया है कि इनमें से कई अंग्रेज अफसरों ने संस्कृति के आदान-प्रदान (ब्रिटेन की संस्कृति भारत को, भारत की संस्कृति ब्रिटेन को) पर लिखा है कि अगर ऐसा होता है तो इससे फायदा इंग्लैंड को होगा। इससे स्पष्ट है कि मिशनरियों और पादरियों ने आकर भारत को सभ्यता सिखाई, यह कहना सरासर गलत है, ऐसे कथनों का कोई आधार नहीं है।
सवाल: “भारत का इतिहास गुलामी का इतिहास है” – इस झूठ को काटते हुए भी आपने लिखा है। लेकिन इससे जुड़े दो सवाल हैं:
पहला: मान लें कि आपकी पुस्तक 10-20-50 लाख लोगों तक पहुँच भी जाए, लोग सच से वाकिफ भी हो जाएँ तो भी एक बड़ा वर्ग (जो 10वीं कक्षा से नीचे के विद्यार्थी हैं, वो NCERT की किताबों में उसी झूठ को पढ़ रहे हैं) आपके लिखे सच से दूर ही रहेगा। इस समस्या से कैसे निपटा जाए?
दूसरा: वर्तमान सरकार शिक्षा नीति में शायद बदलाव कर रही है। शायद इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि समय-समय पर इसको लेकर कोई मंत्री, कोई सासंद कुछ बोलते दिखते भी हैं। लेकिन धरातल पर मतलब NCERT की किताबों में यह अभी तक नहीं दिखा है। “जो सत्य है, वही लिखा गया है” मान कर बच्चे ऐसे ‘असत्यों’ को पढ़ते हैं, इस पर सरकार को कोई संदेश देना चाहेंगे?
जवाब: पहला प्रश्न बच्चों के NCERT की पुस्तकों को पढ़ने और उसमें लिखे ‘असत्य’ इतिहास से है। इसके लिए हम सबको यह प्रयास करना होगा, दबाव बनाना होगा कि इन पुस्तकों में बदलाव किया जाए। यह अनिवार्य है, NCERT की पुस्तकों में बदलाव करना ही होगा। यह ठीक ऐसा ही है कि मिशनरियों ने ईस्ट इंडिया कंपनी पर दबाव बनाया कि उन्हें भारत में आने देना ही पड़ेगा, कुछ ऐसा ही दबाव यहाँ भी बनाना होगा।
इसके लिए प्रयास के तहत हमें कथाएँ-कहानियाँ लिखनी चाहिए, उपन्यास लेखन करना चाहिए। इन विषयों पर फिल्में बननी चाहिए, जो हमारे असली हीरो हैं… जिन्होंने आक्रांताओं का डट कर मुकाबला किया, करारी मात दी। आखिर इन हीरो के ऊपर हम कथाएँ क्यों नहीं गढ़ते, फिल्में क्यों नहीं बनाते? अगर ऐसा होने लगा, हम समाज में अपने हीरो को लेकर सामने आने लगे तो नई पीढ़ी को उनसे जुड़े किस्से, कहानियाँ, इतिहास सब अच्छा लगने लगेगा, आदर-भाव पैदा होगा। इसके बाद अंततः NCERT की पुस्तकों में बदलाव लाना पड़ेगा। इतने सालों से दबाया गया सत्य कभी न कभी आपको मानना ही पड़ेगा, इतने सालों से पढ़ाया जा रहा झूठ त्यागना ही होगा।
इन बातों को लेकिन प्रमाण के साथ सामने रखना होगा। ऐसा होगा तो यह एक बड़ी मुहिम बन जाएगी। फिर हर तरफ इसका प्रभाव दिखेगा – NCERT में दिखेगा, कॉमन कल्चर में भी दिखेगा। बॉलीवुड की फिल्मों और टीवी सीरियल के सहारे सूफी-सौहार्द्र जो गढ़ा गया, वो भी इन्हीं किताबों, इतिहास लेखन के दम पर बढ़ाया गया है, उसकी भी असलियत सामने आएगी। अपने हीरो की कहानियाँ, अपना इतिहास जब हम लिखेंगे, तो माहौल बनेगा। तभी NCERT को भी बदलना पड़ेगा।
सरकार को लेकर मेरा यह मानना है कि अभी जो नई शिक्षा नीति आने वाली है, उसमें बदलाव जरूर आएगा। सरकार इस पर जरूर विश्वास कर रही होगी, कर रही है, यह मेरा मत है। इसके बावजूद अगर हम अपने सच्चे-सही इतिहास को लेकर पूरे भारत में बड़े स्तर की मुहिम चलाते हैं तो सरकार के ऊपर भी दबाव बनेगा, NCERT के ऊपर भी दबाव बनेगा। कुछ ही दिनों में बदलाव देखने को मिलेगा, मेरा विश्वास है कि सरकार उस दिशा में काम कर रही है।
सवाल: अभी जिनकी सरकार है, आपने उनकी ही विचारधारा के आसपास यह पुस्तक लिखी है… ऐसे में “इतिहास विजेता लिखते हैं” – वाला आरोप आप भी लग सकता है, कैसे करेंगे आप इसका बचाव?
जवाब: यह किताब मैंने सरकार के विचार को ध्यान में रखते हुए नहीं लिखी है। मेरे यह विचार कई सालों से रहे हैं। वर्तमान सरकार तो अभी 8 साल से है। कई सालों के अभ्यास और अध्ययन के बाद ‘असत्यमेव जयते’ किताब को मैं लिख पाया हूँ। सबसे महत्वपूर्ण इसमें यह है कि जो सच है, उसे लोगों के सामने रखना। इसमें सरकार के विचार या दृष्टिकोण का कोई लेना-देना नहीं है।
भारत दुनिया का एकमात्र ऐसा देश होगा, जिसके इतिहास को पूरी तरह से तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया है। हमारे ऊपर झूठ थोपा गया। इसको हटाने के लिए कभी न कभी तो कदम उठाना ही पड़ेगा। वर्तमान सरकार आज है, कल नहीं भी रहेगी (मैं चाहता हूँ कि हमेशा रहे लेकिन लोकतंत्र में कुछ भी संभव है) लेकिन अपने देश के सही इतिहास को लोगों के सामने रखने का काम चलते रहना चाहिए। हिंदू समाज में जो जागृति आई है, उसे इसी तरह बढ़ते रहना चाहिए। यह भी बहुत स्पष्ट है कि इसमें किसी एक का पक्ष लेकर लिखने-बोलने का सवाल नहीं है, हमें सच के पक्ष में खड़े रहना है और ‘असत्यमेव जयते’ इसी सच के साथ लिखी गई है।
सच को कभी न कभी मानना ही पड़ेगा। झूठी कहानियों को इतिहास बता कर थोपने के दिन बहुत ज्यादा दिनों तक चलने वाला नहीं है। रह गई बात आरोपों (इतिहास विजेता लिखते हैं टाइप बातें) की तो किसी का कोई मुँह तो पकड़ नहीं सकता। हाँ यह जरूर है कि ऐसे आरोप लगाने वाले भी अगर ‘असत्यमेव जयते’ पुस्तक को पढ़ेंगे तो वो जान जाएँगे कि बिना प्रमाण इसमें कुछ नहीं लिखा गया है। मनगढ़ंत कहानियों को इस पुस्तक में जगह नहीं दी गई है। धीरे-धीरे ही सही, लोगों को सच समझ में आने लगेगा कि इसमें सरकार या किसी विरोधी पक्ष को लेकर कुछ भी नहीं लिखा गया है। ‘असत्यमेव जयते’ भारत देश का इतिहास है, हमारा इतिहास है, सच्चा इतिहास है और इस सच को हमको सामने रखना ही चाहिए।
‘असत्यमेव जयते’ पुस्तक को लेकर लेखिका शेफाली वैद्य से भी संक्षिप्त चर्चा की गई। उनसे जो सवाल किया गया, वो लेफ्ट इकोसिस्टम और सच्चे इतिहास को दबाने के उनके नैरेटिव से संबंधित है।
सवाल: हम राष्ट्रवादी लोगों पर तथाकथित ‘दक्षिणपंथी’ का टैग लगा कर खारिज करने की कोशिश की जाती है। ऐसे में जो इतिहास नए सिरे से लिखा जा रहा है, जो इतिहास सच के साथ है, इन लेखकों पर लेफ्ट इकोसिस्टम पूरी जोर-शोर के साथ अटैक करता है। विक्रम संपत ने जब सावरकर पर दो पुस्तकें लिखीं, तब किस तरह का अटैक उन पर हुआ, सब कुछ तथ्यों को सामने रख कर की गई उनकी लेखनी को ही खारिज किया जाने लगा, क्या उसी तरह का अटैक ‘असत्यमेव जयते’ के लेखक के साथ भी हो सकती है? इस संभावना को कहाँ तक देखती हैं आप और अगर अटैक हुआ तो कैसे उससे निपटा जाए, कैसे बचाव किया जाए?
जवाब: जब यह किताब बहुत बिकने लगेगी, बहुत चर्चा में आ जाएगी, तब अटैक होगा। यह ध्यान रखिए कि अगर ऐसा हुआ तो अटैक किताब पर नहीं होगा। वामपंथी गैंग का अटैक किताब या किताब में लिखी सामग्री पर नहीं होगा बल्कि अटैक होगा लेखक पर। लेखक की विश्वसनीयता पर अटैक करके उसे खारिज कर देना वामपंथी गैंग का पुराना हथियार रहा है। एकबार वो लेखक की विश्वसनीयता खत्म कर देते हैं तो उसके बाद जो भी लिखा गया है, फिर चाहे वो तथ्यों के साथ हो या मनगढ़ंत, उसे लिखे हुए की साख अपने आप खत्म हो जाती है।
विक्रम संपत मामले को देख कर इसे आसानी से समझा जा सकता है। वामपंथी गैंग ने विक्रम संपत की किताब या उनकी लिखी सामग्री पर अटैक नहीं किया। अटैक किया गया विक्रम संपत पर, उन पर साहित्यिक चोरी (कॉपी-पेस्ट) का आरोप लगा कर। ऐसा ही अटैक ‘असत्यमेव जयते’ के लेखक के साथ भी होगा, वो लोग जरूर ऐसा करेंगे। जितनी ज्यादा ये किताब चर्चा में आती जाएगी, वामपंथी गैंग का अटैक बढ़ता जाएगा।
रह गई बात क्या करना चाहिए ऐसे अटैक का, तो यह मान कर चलिए कि सत्य अपनी जुबान खुद बोलता है। मैंने स्वयं यह पुस्तक पढ़ी है, मुझे बहुत अच्छी लगी। बहुत सरल तरीके के लेखक ने लिखा है, तथ्यों के साथ लेखन किया गया है। ‘असत्यमेव जयते’ इतिहास की कोई प्राथमिक सोर्स नहीं है, तथ्यों के साथ इतिहास को इस किताब में रखा गया है। यह उन पाठकों के लिए है, जिन्हें इतिहास में दिलचस्पी है, जिनको यह जानना है कि आखिर हमारे साथ इतना बड़ा झूठ क्यों बोला गया है, कैसे बोला गया। यह किताब ऐसे पाठकों को प्रेरित करती है कि वो आगे जाकर पढ़े, तथ्यों का मिलान करे।
यह किताब एक शुरुआत है – सच्चे इतिहास की जिज्ञासा की ओर ले जाने की। इसलिए इस पर अटैक होंगे… और यह अच्छी बात है। अटैक होने का मतलब ही है कि इस पुस्तक पर चर्चा हो रही है, इस किताब ने असर दिखाना शुरू कर दिया है। अगर किताब में धार नहीं होगी तो अटैक क्यों होगा… इसलिए अटैक तो होगा और मैं चाहती हूँ कि अटैक हो क्योंकि जिनको ये किताब चुभनी चाहिए, वहाँ तक यह पहुँच गई है।