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‘मेरे ट्वीट को गलत समझा गया’: PM मोदी पर आपत्तिजनक टिप्पणी कर TMC नेता कीर्ति आजाद ने दी सफाई, ट्वीट डिलीट कर बोले- मुझे माफ कर दो

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने को लेकर सोशल मीडिया पर बुरी तरह ट्रोल हुए तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) नेता कीर्ति झा आजाद (Kirti Jha Azad) ने माफी माँग ली है। कीर्ति ने मेघालय की राजधानी शिलॉन्ग यात्रा के दौरान पीएम मोदी द्वारा पहने गए वहाँ के पारंपरिक पहनावे पर अपमानजनक टिप्पणी की थी।

सार्वजनिक रूप से माफी माँगते हुए कीर्ति ने ट्वीट कर कहा, “मेरे हालिया ट्वीट का गलत मतलब निकाला गया। इससे लोगों की भावनाएँ आहत हुईं, उनसे मैं सॉरी कहता हूँ। अनजाने में मेरी टिप्पणी से हुई पीड़ा के लिए मुझे खेद है। मैं अपने संवैधानिक मूल्यों को हमेशा बनाए रखने के लिए काम करने की अपनी प्रतिज्ञा को दोहराता हूँ।”

दरअसल, 18 दिसंबर 2022 को शिलॉन्ग दौरे में पीएम मोदी ने वहाँ की पारंपरिक खासी पोशाक ‘जिमफॉन्ग’ पहनी थी। इस पोशाक में पीएम मोदी की तस्वीर के साथ एक महिला मॉडल की तस्वीर को ट्विटर पर शेयर करते हुए कीर्ति आजाद ने लिखा था- “न नर है न ही है ये नारी, केवल है ये फैशन का पुजारी।”

कीर्ति आजाद का ट्वीट

कीर्ति आजाद के इस ट्वीट के बाद सोशल मीडिया पर बवाल हो गया। पूर्वोत्तर के मुख्यमंत्रियों ने कीर्ति आजाद को लताड़ लगाते हुए इसे जनजातीय संस्कृति का अपमान बताया। उधर, तृणमूल कॉन्ग्रेस ने भी कीर्ति के बयान से पल्ला झाड़ लिया। अपनी किरकिरी होती देख कीर्ति ने इस पोस्ट को डिलीट कर दिया।

भाजपा अनुसूचित जनजाति मोर्चा ने ट्वीट कर कहा, “आप इस जनजाति समुदाय की पोशाक का अपमान कर रहे हैं। आप और आपकी पार्टी का आदिवासियों के प्रति नफरत का इतिहास है।” मोर्चे के ट्विटर हैंडल से कीर्ति के खिलाफ एससी/एसटी कानून के तहत केस दर्ज करने की भी माँग की गई।

पूर्वोत्तर के मुख्यमंत्रियों और जनजातियों नेताओं की आपत्ति का जवाब देते हुए कीर्ति आजाद ने लिखा, “मैंने पोशाक का अपमान नहीं किया है। ये मुझे पसंद है। मैं बस यह कहना चाह रहा था कि हमारे प्रधानमंत्री को फैशन स्टेटमेंट बनना पसंद है। वे इसका कोई भी मौका नहीं छोड़ते हैं।” उन्होंने खुद को तृणमूल कॉन्ग्रेस का सैनिक बताया।

बता दें कि कीर्ति झा आजाद पूर्व क्रिकेटर हैं और राजनीति में आने के बाद पार्टियाँ बदलने का उनका इतिहास है। कीर्ति साल 2014 में बिहार के दरभंगा से तीसरी बार BJP से सांसद चुने गए थे। कीर्ति दरअसल मुख्यमंत्री बनने का ख्वाब दे रहे थे और चाहते थे कि भाजपा इसके लिए उन्हें आगे करे, लेकिन भाजपा ने जब ऐसा नहीं किया तो वे पार्टी के खिलाफ बयानबाजी करने लगे। 23 जुलाई 2015 को पार्टी ने उन्हें निलंबित कर दिया।

भाजपा से निलंबित होने के बाद कीर्ति आजाद ने फरवरी 2019 में भाजपा को छोड़ दिया और कॉन्ग्रेस में शामिल हो गए। वहाँ भी उन्हें अपनी महत्वकांक्षा पूरी होती हुई नहीं दिखी तो उन्होंने कॉन्ग्रेस भी छोड़ दिया। कॉन्ग्रेस छोड़ने के बाद कीर्ति आजाद ने 2021 में TMC की सदस्यता ले ली। पीएम मोदी की पोशाक पर बयानबाजी को लेकर TMC अब उनसे नाराज है।

केरल के ‘पत्रकार’ सिद्दीकी कप्पन को ED केस में मिली जमानत, 26 महीने बाद होगी रिहाई: UAPA केस में पहले मिल चुकी है बेल

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शुक्रवार (24 दिसंबर 2022) को केरल के पत्रकार सिद्दीकी कप्पन को PMLA केस में जमानत दे दी। कोर्ट द्वारा दी गई इस राहत के बाद सिद्दीकी कप्पन जेल से 26 महीने बाद छूटेगा। उसे यूपी पुलिस ने हाथरस घटना के समय जनता को भड़काने समेत अन्य आरोपों में अक्टूबर 2020 में गिरफ्तार किया था।

जानकारी के मुताबिक, कप्पन की जमानत का आदेश हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के जस्टिस दिनेश कुमार सिंह ने पास किया है। इससे पहले 1 नवंबर को लोकल कोर्ट ने इसी याचिका को खारिज किया था और मनी लॉन्ड्रिंग केस में कप्पन जेल में बंद रहा था। उन्होंने इसके बाद हाईकोर्ट का रुख किया जिस पर फैसला शुक्रवार को दिया गया।

इससे पहले 9 सितंबर 2022 को सिद्दीकी कप्पन को सुप्रीम कोर्ट ने यूएपीए के तहत हुई गिरफ्तारी में जमानत दी थी। कोर्ट ने जमानत देते हुए कप्पन का पासपोर्ट जब्त कर लिया था। साथ ही उसे अगले 6 सप्ताह तक दिल्ली में ही रहने और हर सप्ताह जंगपुरा थाने में हाजिर होने का आदेश दिया था। कोर्ट ने कहा था कि इस अवधि के बाद वह केरल जा सकेगा लेकिन वहाँ भी उसे हाजिरी लगानी होगी।

अक्टूबर 2020 में हुई गिरफ्तारी

बता दें हाथरस घटना के दौरान वहाँ जाते समय सिद्दीकी को गिरफ्तार किया गया था। इसके अलावा PFI से जुड़े अन्य 8 लोगों को भी SIT ने गिरफ्तार किया था। उस समय उसके साथ PFI का भी एक सदस्य था। गिरफ्तारी के बाद यूपी पुलिस की SIT ने सिद्दीकी कप्पन के खिलाफ 5000 पेज की चार्जशीट दाखिल की थी।

हलफनामे में कप्पन के उन 36 आर्टिकल्स को हाईलाइट किया है जो उसके लैपटॉप से बरामद हुए थे। इन लेखों में निजामुद्दीन मरकज, एंटी सीएए प्रोटेस्ट, दिल्ली दंगे, राम मंदिर, शरजील इमाम जैसे मुद्दों पर बात है।

हलफनामे में कहा गया था कि कप्पन जिम्मेदार पत्रकार की तरह नहीं लिखता था। उसका काम सिर्फ मुस्लिमों को भड़काने का था। उसकी संवेदनाएँ माओवादी और कम्युनिस्टों के साथ थीं। एएमयू में हुए सीएए प्रोटेस्ट पर लिखे लेख में उसने ऐसे दिखाया था जैसे पीटे गए मुस्लिम पीड़ित हों और पुलिस ने उन्हें पाकिस्तान जाने को कहा हो।

80 करोड़ लोगों को 1 साल तक मिलेगा मुफ्त अनाज, 1 रुपया भी नहीं देना होगा: मोदी सरकार का फैसला, खर्च होंगे ₹2 लाख करोड़

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार (Narendra Modi Government) ने देश की जनता के हित को ध्यान में रखते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला लिया है। सरकार ने देश के 80 करोड़ लोगों को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) के तहत अगले साल दिसंबर तक मुफ्त अनाज उपलब्ध कराने की घोषणा की है। इसके लिए केंद्र सरकार हर साल करीब 2 लाख करोड़ रुपए खर्च करेगी।

केंद्रीय खाद्य मंत्री पीयूष गोयल (Union Food Minister Piyush Goyal) ने इसकी घोषणा करते हुए कहा कि इस योजना के तहत जिन लोगों को अनाज दिया जाएगा, उन्हें एक रुपए भी भुगतान करने की जरूरत नहीं है। मुफ्त खाद्यान्न उपलब्ध कराने का पूरा भार केंद्र वहन करेगा। इसके लिए सालाना 2 लाख करोड़ रुपए की लागत आएगी।

बता दें कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून (NFSA) के तहत सरकार हर व्यक्ति को प्रतिमाह 5 किलोग्राम खाद्यान्न उपलब्ध कराती है। यह खाद्यान्न 2-3 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से सरकार द्वारा उपलब्ध कराया जाता है। अब सरकार इसे बिल्कुल मुफ्त उपलब्ध कराएगी। अंत्योदय अन्न योजना (AAY) के तहत ऐसे परिवारों को हर महीने 35 किलोग्राम अनाज मिलता है।

उधर, सरकार ने प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PMGKAY) के तहत दी जाने वाली मुफ्त राशन योजना का अब विस्तार नहीं करेगी। यह योजना 31 दिसंबर को समाप्त हो रही है। यह योजना NFSA के तहत दिए जाने वाले खाद्यान्न के अतिरिक्त है। इस योजना को कोरोना लॉकडाउन के दौरान शुरुआत की गई थी। इस योजना के तहत जरूरतमंदों को हर महीने 5 किलोग्राम मुफ्त अनाज (गेहूँ या चावल) दिया जाता था।

बैटल ऑफ भोपाल: जब निजाम-मुगल-नवाब-जय सिंह पर अकेले भारी पड़े मराठा, 70 हजार की फौज को धूल चटाई; 5 लाख रुपए दे निजाम और मुहम्मद खान ने जान बचाई

हैदराबाद से भोपाल की दूरी करीब 850 किलोमीटर है। आज करीब 16-17 घंटे में यह दूरी नापी जा सकती है। लेकिन 285 साल पहले हैदराबाद के निजाम के सामने मराठा ऐसी दीवार बनकर खड़े हुए कि इतिहास में शौर्य का एक नया अध्याय जुड़ गया। इसे बैटल ऑफ भोपाल (Battle of Bhopal) यानी भोपाल का युद्ध के नाम से जानते हैं।

24 दिसंबर 1737 को हुए इस युद्ध में निजाम के साथ मुगल, नवाबों और जयपुर के जय सिंह द्वितीय की ताकत भी जुड़ी थी। लेकिन मराठा वीर अकेले ही सब पर भारी पड़े थे। कहते हैं कि यदि इस युद्ध में मराठा पराजित हो जाते तो न केवल भोपाल हैदराबाद का हिस्सा बनता, बल्कि मुगलों का भी कभी अंत नहीं होता।

भोपाल पर निजाम का कब्जा

समृद्ध इतिहास वाला भोपाल आज मध्य प्रदेश की राजधानी है। इसकी पृष्ठभूमि राजा भोज से जुड़ी हुई है, जिन्होंने यहाँ दुनिया का सबसे बड़ा तालाब बनावाया था। सालों बाद यहाँ निजाम शाह का शासन आया। निजाम की पत्नी कमलापति थीं, जिनके नाम के चलते लोग धीरे-धीरे इसे रानी कमलापति का भोपाल कहने लगे थे। बाद में रानी कमलापति का भोपाल, दोस्त मोहम्मद खान का हो गया। उसने रानी के बेटे को मारकर खुद को यहाँ नवाब घोषित कर दिया। दोस्त खान ने यहाँ 1723 से 1728 तक राज किया। फिर हैदराबाद के निजाम ने भोपाल पर हमला कर उसे (दोस्त मोहम्मद खान) अपने अधीन कर लिया। उसकी मौत के बाद निजाम का बेटा यहाँ का नवाब बनाया गया

मराठा और निजाम की संयुक्त सेना के बीच युद्ध

हैदराबाद का निजाम हमेशा भोपाल पर काबिज रहना चाहता था। दूसरी ओर मार्च 1737 में मराठाओं से हार कर मुगल बिलबिलाए हुए थे। वे कैसे भी मराठाओं की बढ़ती ताकत को रोकना चाहते थे। यही वजह थी कि उन्होंने हैदराबाद के निजाम के कंधे पर बंदूक रखकर मराठाओं को खत्म करने की साजिश रची। इस साजिश में हैदराबाद के निजाम के साथ केवल मुगल ही नहीं, बल्कि जय सिंह द्वितीयव अवध और बंगाल के नवाब भी थे। सभी एकजुट हुए और मराठाओं पर हमला बोलने की साजिश रची। मगर वे भूल गए थे कि दिल्ली में घेरकर मुगलों को मारने वाले पेशवा बाजीराव अब भी मराठाओं का नेतृत्व कर रहे थे।

भोपाल का युद्ध, 1737

24 दिसंबर 1737, वही दिन है जब 70 हजार की फौज को पेशवा बाजीराव की सेना ने इस तरह धूल चटाई कि निजाम को भोपाल छोड़ना पड़ा, जबकि मुगलों का नामोनिशान मिटने की कगार पर आ गया।

इतिहास बताता है कि 1737 के दिसंबर में हैदराबाद के निजाम और अन्य नवाबों के साथ साठ-गाँठ कर मराठाओं को हराने के लिए मुगलों ने हमला बोला। हैदराबाद के निजाम का उद्देश्य साफ था वे भोपाल पर कब्जा चाहते थे और मुगल किसी भी तरह मराठाओं को हराकर अपना अस्तित्व बचाना चाहते थे। वह दिल्ली की हार से तिलमिलाए थे। उनको पता चल रहा था कि औरंगजेब की मौत उन्हें लगातार कमजोर कर रही है। वहीं पेशवा बाजीराव के नेतृत्व में मराठा सेना हर दिन मजबूत हो रही थी।

यही वजह थी कि 1737 में मुगल शासक मोहम्मद शाह ने खुद हैदराबाद निजाम से मदद माँगी। इसके बाद निजाम ने भोपाल को अपने कब्जे में रखने के लिए करीबन 70000 फौजी मराठाओं से लड़ने के लिए लगाए। लेकिन पेशवा बाजीराव की सूझबूझ का उनके पास कोई जवाब नहीं था। निजाम ने जहाँ भोपाल की लालच में किले में डेरा जमाकर अपनी रक्षात्मक रणनीति तैयार करनी शुरू की। वहीं पेशवा ने समझदारी के साथ आक्रमण का निर्णय लिया। 

उन्होंने निजाम को किले सहित चारों ओर से घेरा और फिर उनके खाने-पीने के सामानों पर रोक लगा दी। पेशवा जानते थे कि सेना कितनी ही बड़ी क्यों न हो, लेकिन अगर उन्होंने पानी जैसी मूलभूत जरूरत पर गाज गिरा दी तो आधी जीत उनकी वहीं हो जाएगी और निजाम को अपनी सेना सहित घुटने टेकने ही पड़ेंगे। पेशवा ने अपनी इसी रणनीति पर काम किया। युद्ध से पहले उन्होंने अपने भाई चिमाजी को 10 हजार सैनिकों के साथ अलग भेज दिया। जब निजाम की सेना के साथ मराठाओं की सेना के आमने-सामने आने का समय आया तब तक निजाम की सेना प्यास से तड़प चुकी थी, क्योंकि चिमाजी की मदद से पेशवा ने पानी के हर स्रोत में जहर मिलवा दिया था। न सैनिक उस पानी को पी सकते थे और न ही लड़ सकते थे। अंतत: निजाम की वो भारी-भरकम 70 हजार की सेना पस्त पड़ गई। 

निजाम की फ़ौज के कमजोर पड़ते ही बाजीराव ने मराठा सेना के साथ हमला बोला और ऐसी मारकाट मचाई कि हैदराबाद के निजाम ने कसम खा ली कि वह दोबारा मराठा से युद्ध नहीं करेंगे। हालात देख निजाम ने न केवल भोपाल पर कब्जे का सपना छोड़ा, बल्कि उलटा 50 लाख रुपए मराठाओं को देकर अपनी और मुगलों के सरदार मुहम्मद खान बहादुर की जान बचाई। वहीं 7 जनवरी 1738 को यानी इस युद्ध के चंद दिनों बाद ही भोपाल के दोराहा में पेशवा बाजीराव और जय सिंह द्वितीय के बीच शांति संंधि हुई। इसके बाद मराठा ने मालवा प्रांत पर आधिपत्य जमाया और भोपाल में स्वराज्य की स्थापना हुई।

अब प्रणय रॉय और राधिका भी अडानी को बेचेंगे NDTV की अपनी हिस्सेदारी: AMG मीडिया नेटवर्क का हिस्सा बढ़कर 65% हो जाएगा

नई दिल्ली टेलीविजन लिमिटेड यानी NDTV के संस्थापक प्रणय रॉय (Prannoy Roy) और राधिका रॉय (Radhika Roy) ने शुक्रवार (23 दिसंबर 2022) को एक बयान जारी कहा कि उन्होंनेे अपने अधिकांश शेयर गौतम अडानी को बेचने का फैसला किया है। इस डील के पूरी होने के बाद NDTV में अडानी की हिस्सेदारी बढ़कर लगभग 65% हो जाएगी।

अपनी हिस्सेदारी को बेचने को लेकर उन्होंने संयुक्त बयान में कहा, “हालिया ओपन ऑफर के बाद AMG मीडिया नेटवर्क अब NDTV की सबसे बड़ी एकल शेयरहोल्डर है। नतीजतन, आपसी समझौते से हमने NDTV में अपने अधिकतर शेयरों को AMG मीडिया नेटवर्क को बेचने का फैसला किया है।”

उन्होंने यह भी कहा, “ओपन ऑफर लॉन्च होने के बाद से गौतम अडानी के साथ हमारी चर्चा रचनात्मक रही है। हमारी तरफ से दिए गए सभी सुझावों को उन्होंने सकारात्मक रूप से और खुलेपन के साथ स्वीकार किया है। हम NDTV और इसकी पूरी असाधारण टीम को विकास के अगले चरण में देखने के लिए उत्सुक हैं, जिस पर भारत गर्व कर सकता है।”

NDTV में प्रणय रॉय और राधिका रॉय की कुल हिस्सेदारी 32.26 प्रतिशत है। दोनों ने 5 प्रतिशत शेयर बचाते हुए शेष 27.26 शेयर बेचने का फैसला किया है। वहीं, गौतम अडानी की स्वामित्व वाली AMG मीडिया नेटवर्क के पास इसका 37.44 प्रतिशत हिस्सा है। यह डील पूरी होने के बाद अडानी ग्रुप NDTV में सबसे बड़ा शेयर होल्डर बन जाएगा और यह हिस्सेदारी बढ़कर 64.70% हो जाएगी।

प्रणय रॉय और राधिका रॉय के बयान सामने आने के बाद NDTV के शेयर में उछाल देखने को मिली। शुक्रवार (23 दिसंबर 2022) को NTDV के शेयर 2.50 प्रतिशत की उछाल के साथ 339.95 रुपए पर बंद हुए। अडानी ग्रुप द्वारा NDTV को खरीदने की प्रक्रिया शुरू करने के बाद से कंपनी के शेयर में 16 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है।

डरने का नहीं, हिंदुओं को सुरक्षित बसाने का समय है: कश्मीर में आतंकियों की कमर तोड़ने के लिए उठाने होंगे और कड़े कदम, अब्दुल्ला-मुफ्ती से दूर रहना होगा

दुर्दांत आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैय्यबा के कुख्यात मुखौटे ‘द रेसिस्टेंस फ्रंट’ (TRF) ने कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री पुनर्वास पैकेज के तहत घाटी में कार्यरत 56 कश्मीरी अल्पसंख्यकों (गैर-मुस्लिमों) की सूची जारी करते हुए उन्हें धमकी दी थी। उसने पिछले सप्ताह फिर से ऐसे ही 10 और लोगों की सूची जारी की है। इससे पहले भी यह आतंकी संगठन ‘राइजिंग कश्मीर’ नामक अखबार में काम करने वाले आठ पत्रकारों की सूची जारी करके उन्हें धमका चुका है। TRF यह कारगुजारियाँ ‘कश्मीर फाइट्स’ नामक अपने ऑनलाइन मुखपत्र के माध्यम से करता है। TRF के द्वारा जारी सूची में कश्मीरी अल्पसंख्यकों के नाम के साथ-साथ उनके नए और पुराने कार्यस्थलों का पूरा विवरण है। यह तथ्य सर्वाधिक चौंकाने वाला और चिंताजनक है।

यह सूची जारी होने के बाद से कश्मीरी विस्थापितों के जम्मू-कश्मीर पीपुल्स फोरम, कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति और पनुन कश्मीर जैसे तमाम संगठन इन कर्मियों की सुरक्षा की माँग कर रहे हैं। कुछेक महीने पहले हुई टारगेट किलिंग की घटनाओं के बाद से प्रधानमंत्री राहत पैकेज के तहत नौकरी पाए कश्मीरी विस्थापित काफी संख्या में कश्मीर से वापस जम्मू लौट आए हैं और खुद की जम्मू में नियुक्ति की माँग कर रहे हैं। उन्हें पिछले लगभग आठ माह से वेतन भी नहीं मिला है।

दरअसल, यह सूची जम्मू-कश्मीर में हालात को सामान्य बनाने की केंद्र सरकार की कोशिशों को नाकाम करने की साजिश है। अब TRF जैसे आतंकी संगठन की खुलेआम धमकी का गंभीर संज्ञान लेने की आवश्यकता है। इन धमकियों के लिए जिम्मेदार चार TRF आतंकियों को चिह्नित करते हुए उनकी खोज-खबर और आवभगत करने के लिए राष्ट्रीय जाँच एजेंसी ने घाटी में पोस्टर लगवाए हैं। निश्चय ही, यह TRF और उसके आकाओं की कमर तोड़ने का सही समय है।

आतंकियों की इस गीदड़ भभकी से डरकर मैदान छोड़ने की आवश्यकता नहीं है। परंतु, कश्मीरी विस्थापितों की सुरक्षा और उनकी अन्यान्य माँगों पर तत्काल ध्यान दिया जाना चाहिए। क्योंकि सुरक्षित वातावरण में ही उनकी घर वापसी हो सकती है और तभी वे निश्चिंत होकर अपना काम कर सकते हैं। इसलिए उन्हें सुरक्षा और विश्वास दिलाना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। अगर कश्मीरी विस्थापित और प्रवासी घाटी से भाग खड़े होते हैं, तो आतंकियों और उनके आकाओं के मंसूबे पूरे हो जाएँगे।

कश्मीर के हालात को सामान्य बनाने के लिए केंद्र सरकार, उपराज्यपाल प्रशासन और तमाम सुरक्षा एजेंसियाँ जुटे हुए हैं। लेकिन जिस प्रकार से यह सूची जारी हुई है और उसमें जिस प्रकार की गोपनीय सूचनाएँ हैं, वे कान खड़े करने वाली हैं। इससे एकबार फिर यह स्पष्ट हो गया है कि आतंकियों के हमदर्द और हिमायतियों की शासन-प्रशासन में गहरी पैठ है। उनको चिह्नित करने और दण्डित किए जाने का जो काम किया गया है, वह नाकाफी है। इस काम को और भी तेजी और बारीकी से किया जाना चाहिए।

अनुच्छेद 370 और 35 ए की समाप्ति हुए 3 वर्ष से अधिक समय बीत गया है। इस दौरान केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर में जमीनी बदलाव के लिए और हालात को सामान्य बनाने के लिए अनेक काम किए हैं। उनका सुखद और सकारात्मक परिणाम भी दिखाई-सुनाई पड़ रहा है। फिर भी स्थिति को सामान्य बनाने के लिए और इस सिरदर्द की समाप्ति के लिए कुछ सर्जिकल कार्रवाई करने की आवश्यकता को नज़रन्दाज नहीं किया जा सकता है। सिर्फ कश्मीरी विस्थापितों को घाटी में नौकरी देना या उनकी घर वापसी कराना काफी नहीं है। वे वास्तविक अल्पसंख्यक हैं। इसीलिए दांतों के बीच जीभ की तरह दबे-कुचले और असुरक्षित हैं।

उत्तर प्रदेश आवास विकास परिषद् और हरियाणा अर्बन डवलपमेंट अथॉरिटी की तर्ज पर जम्मू-कश्मीर डवलपमेंट अथॉरिटी का गठन करके कश्मीर के प्रत्येक जिले में सर्वसुविधासम्पन्न बड़े-बड़े रिहायशी और व्यावसायिक परिसर बनाए जाने चाहिए। इन परिसरों में न सिर्फ कश्मीरी विस्थापितों को भूखंड आवंटित किए जाएँ, बल्कि सेना और अर्ध-सैनिक बलों के पूर्व-कर्मियों को भी रियायती दर पर भूखंड आवंटित किए जाने चाहिए। इन परिसरों में किसी भी भारतीय को रियायती दर पर भूखंड खरीदने का अधिकार दिया जाना चाहिए।

इसी प्रकार कश्मीर में बड़े-छोटे उद्योग स्थापित करने वालों और अपना रोजगार शुरू करने वाले दुकानदारों, रेहड़ी-ठेले वालों आदि को रियायती ब्याज पर ऋण और सब्सिडी दी जानी चाहिए। उन्हें काम-धंधे/व्यवसाय के मुफ्त बीमे के अलावा जीवन बीमा की सुविधा भी दी जानी चाहिए। आसानी से लाइसेंस मुहैया कराते हुए सस्ते दाम पर शस्त्र उपलब्ध कराए जाने चाहिए। इससे इन परिसरों में बसने वाले लोग अपनी सुरक्षा के लिए सिर्फ सुरक्षा बलों पर ही निर्भर नहीं रहेंगे।

पिछली सदी के आखिरी दशक में आतंक अपने चरम पर था। उस वक्त लालकृष्ण आडवाणी जी के प्रयासों से प्रत्येक गाँव के स्थानीय नागरिक समाज को जोड़कर विलेज डिफेंस कमेटियों (वी डी सी) का गठन किया गया थाष कश्मीर संभाग में इन कमेटियों का पुनर्गठन करने की आवश्यकता है। इन्हें साधनों, संसाधनों और सुविधाओं से भी लैस किया जाना चाहिए। ये कमेटियाँ आतंकियों को मुँहतोड़ जवाब देने में सक्षम होंगी और विश्वास बहाली का आधार बनेंगी।

सीमापार से घुसपैठ को भारतीय सुरक्षा बलों की मुस्तैदी ने काफी कम कर दिया है। सरकार ने हवाला फंडिंग की भी कमर तोड़ दी है। लेकिन पिछले कुछ दिनों से एक नयी समस्या उभर रही है। यह समस्या मादक पदार्थों की तस्करी है। पंजाब के रास्ते जम्मू-कश्मीर में नशे का कारोबार दिन दूना रात चौगुना फल-फूल रहा है। नशे के इस कारोबार के तार आतंकियों से जुड़े हुए हैं। यह आतंकी फंडिंग और जम्मू-कश्मीर की युवा पीढ़ी को बर्बाद करने का नया तरीका है। समय रहते इसकी नकेल कसना जरूरी है। अन्यथा यह असाध्य रोग बन जाएगा।

अब्दुल्ला-मुफ़्ती खानदान से इतर राजनीतिक नेतृत्व खड़ा करने की भी कोशिश होनी चाहिए। ये दोनों परिवार लोगों को बरगलाने और भड़काने में माहिर हैं। झूठ और लूट की राजनीति ही उनका वास्तविक एजेंडा है। पिछले 70 साल से जम्मू-कश्मीर इसी भय, भ्रम और भ्रष्टाचार की राजनीति का शिकार रहा है। जम्मू-कश्मीर के पुराने और पके हुए नेता घाघ हैं और उनमें से कई शीर्षस्थ नेताओं का गठजोड़ आतंकियों और अलगाववादियों के साथ गठजोड़ जगजाहिर है।

आतंकियों और अलगाववादियों की सबसे बड़ी हमदर्द महबूबा मुफ़्ती हैं। अब इस परम्परागत नेतृत्व के बरक्स विकास और बदलाव की बात करने वाले नए नेतृत्व को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इस प्रकार का वैकल्पिक और विकासोन्मुख नेतृत्व ग्राम पंचायतों, खंड/जिला विकास परिषदों और नगर निकायों में से चिह्नित करके प्रोत्साहित किया जा सकता है। सकारात्मक सोच ही विकास और बदलाव की संवाहक हो सकती है। जम्मू-कश्मीर में इसकी विशेष आवश्यकता है। ‘बैक टू विलेज’ और ‘माय टाउन, माय प्राइड’ कार्यक्रमों के दौरान नागरिकों और जनप्रतिनिधियों की अत्यंत निराशाजनक भागीदारी और नकारात्मक प्रतिक्रिया चिंताजनक है। यह प्रतिक्रिया दर्शाती है कि उपराज्यपाल शासन को और अधिक पारदर्शी, जवाबदेह, संवेदनशील, त्वरित और परिणामोन्मुख होने की आवश्यकता है।

नौकरशाही पर अति-निर्भरता स्थानीय समाज में अलगाव और अन्यमनस्कता पैदा करती है। जम्मू-कश्मीर पब्लिक यूनिवर्सिटी बिल-2022 इसका एक उदाहरण है। इस प्रकार का कोई कानून बनाने से पहले छात्रों-प्राध्यापकों और नागरिक समाज आदि सभी स्टेकहोल्डर्स के साथ व्यापक विचार-विमर्श करके उन्हें विश्वास में लिया जाना चाहिए था। व्यवस्था में जड़ जमाए बैठे घाघ कानून पारित होने के बावजूद अन्य प्रान्तवासियों को अभी भी जम्मू-कश्मीर में रिहाइशी भूखंड/घर नहीं खरीदने दे रहे हैं। तन्त्र में ऐसे अनेक राष्ट्रद्रोही तत्त्व हैं, जो सरकार को ‘फेल’ करना चाहते हैं।

भारत की स्वतंत्रता और एकता-अखंडता के लिए अपने प्राण गँवाने वाले जम्मू-कश्मीर के हजारों वीरों और वीरांगनाओं के नाम पर विद्यालयों, महाविद्यालयों, चौकों, मार्गों, पुलों, बस अड्डों, रेलवे–स्टेशनों आदि के नाम रखने की पहल सराहनीय है। यही लोग जम्मू-कश्मीर की युवा पीढ़ी के आइकॉन होने चाहिए। पिछली सरकारों ने बिट्टा कराटे और वुरहान वानी जैसे आतंकियों को हीरो बनाने/बताने की कारस्तानी की है। अब इतिहास को ठीक करने और ठीक से पढ़ने-पढ़ाने का भी अवसर है, ताकि स्थानीय समाज की भ्रांतियाँ दूर की जा सकें और उन्हें राष्ट्रीय धारा से जोड़ा जा सके। धीरे-धीरे ही सही पर स्थानीय लोग इस सत्य को स्वीकारने लगे हैं कि राष्ट्रीय धारा से जुड़कर ही घाटी में अमन-चैन और खुशहाली आ सकती है।

पाक अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर और चीन अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर के लाखों विस्थापित अभी तक न्याय की बाट जोह रहे हैं। उनकी समस्याओं और मांगों पर भी सहानुभूतिपूर्वक विचार करने की आवश्यकता है। वे आजतक अपने नागरिक अधिकारों से ही नहीं, बल्कि मानव अधिकारों तक से वंचित हैं। उनकी सुनवाई जरूरी है, ताकि वे भी शेष भारतवासियों की तरह सुख, शांति और सम्मान से जीवनयापन कर सकें। उनकी शासन-प्रशासन और विधान-सभा में समुचित भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए। जब तक एक-एक कश्मीरी विस्थापित की सुरक्षित ‘घर वापसी’ नहीं हो जाती, तबतक विधानसभा चुनाव कराने की जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। जम्मू-कश्मीर के प्रत्येक नागरिक के मन में निडर होकर मतदान करने का विश्वास पैदा करके ही वहाँ वास्तविक लोकतंत्र की बहाली हो सकती है।

उमेश कोल्हे हत्या मामले में फँसे उद्धव ठाकरे, महाराष्ट्र सरकार ने दिए ‘फोन कॉल’ जाँच के आदेश: नूपुर शर्मा का समर्थन करने पर हुई थी कोल्हे की हत्या

महाराष्ट्र (Maharashtra) के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) की मुश्किलें बढ़ती दिख रही हैं। महाराष्ट्र सरकार ने शुक्रवार (23 दिसंबर 2022) को महाराष्ट्र के उद्धव ठाकरे के खिलाफ जाँच के आदेश दिए हैं। ठाकरे पर आरोप है कि उन्होंने अमरावती पुलिस पर उमेश कोल्हे की हत्या को लेकर डकैती के नजरिए से जाँच करने का दवाब डाला था।

महाराष्ट्र सरकार के मंत्री शंभूराज देसाई ने इस मामले को लेकर कहा कि राज्य खुफिया विभाग (SID) जाँच करेगी कि क्या उद्धव ठाकरे ने अमरावती की पुलिस आयुक्त आरती सिंह को कोल्हे की हत्या में डकैती के एंगल से जाँच करने के लिए कहा था। बता दें कि उमेश कोल्हे की हत्या की जाँच फिलहाल राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) कर रही है।

दरअसल, उद्धव ठाकरे के खिलाफ जाँच के आदेश अमरावती के निर्दलीय विधायक रवि राणा (MLA Ravi Rana) की माँग के बाद लिया गया है। रवि राणा ने विधानसभा में इस मुद्दे को उठाते हुए कहा कि उमेश कोल्हे की हत्या 21 जून 2022 को हुई थी और मामले की जाँच पुलिस ने डकैती के एंगल से जाँच की थी। उस समय राज्य के सीएम उद्धव ठाकरे थे।

उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा कि उद्धव ठाकरे ने स्थानीय कॉन्ग्रेस नेता (Congress Leader) के कहने पर पुलिस आयुक्त आरती सिंह को इस मामले की जाँच डकैती के एंगल से करने के लिए कहा था। उन्होंने जाँच की माँग करते हुए कहा कि वह चाहते हैं कि उद्धव ठाकरे के फोन कॉल की जाँच विशेष जाँच दल (SIT) करे।

महाराष्ट्र के गृहमंत्री देवेंद्र फडणवीस (Devendra Fadnavis) की ओर से जवाब देते हुए मंत्री शंभूराज देसाई ने SID जाँच का आश्वासन दिया। उन्होंने कहा है कि उमेश कोल्हे की हत्या के बाद क्या हुआ, क्या मामले को दबाने की कोशिश की गई, इसकी जाँच की जाएगी। इसके बाद रिपोर्ट गृहमंत्री को सौंपी जाएगी।

गौरतलब है कि उमेश कोल्हे महाराष्ट्र के अमरावती में फार्मेसी की दुकान चलाते थे। 21 जून 2022 की रात जब वह घर लौट रहे थे मुस्लिम हमलावरों ने उनकी गला काटकर हत्या कर दी थी। उनकी हत्या बीजेपी की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा की पैगंबर मोहम्मद पर की गई टिप्पणी का समर्थन करने कारण की गई थी।

फिलहाल, मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे (CM Eknath Shinde) की अगुवाई वाली शिवसेना (शिंदे गुट) और भाजपा (BJP) की गठबंधन सरकार की सिफारिश के बाद इस मामले की जाँच राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) कर रही है। इस मामले में NIA ने पिछले सप्ताह चार्जशीट दाखिल की थी। इस मामले में 11 आरोपितों को गिरफ्तार किया गया है।

मीडिया जिसे बता रहा RSS की क्रिसमस पार्टी, संघ को 25 दिसंबर के उस भोज की खबर भी नहीं: कश्मीर से केरल तक आयोजन का हो रहा दावा

देश भर में ईसाई समुदाय क्रिसमस (Christmas) का त्योहार मना रहा है। इस बीच मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) पहली बार देश भर में ईसाइयों के लिए क्रिसमस का आयोजन कर रहा है और 25 दिसंबर 2022 को इसके मौके पर भोज का आयोजित करेगा। हालाँकि, संघ ने इससे साफ इनकार किया है।

मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि संघ की ईकाइ राष्ट्रीय ईसाई मंच (RIM) क्रिसमस सेलिब्रेशन का आयोजन जम्मू-कश्मीर से लेकर केरल तक आयोजित किया जा रहा है। इस क्रिसमस भोज में देश के महत्वपूर्ण चर्चों के प्रमुख भी शामिल होंगे। वहीं, संघ के वरिष्ठ के वरिष्ठ नेता इंद्रेश कुमार के भी इन आयोजनों में शामिल होने की बात कही जा रही है।

ऑपइंडिया से बात करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर कार्यवाह मनमोहन वैद्य (Man Mohan Vaidya) ने इस तरह के किसी भी आयोजन को सिरे से नकार दिया। मीडिया रिपोर्ट को खारिज करते हुए उन्होंने कहा कि इस तरह का कोई भी कार्यक्रम का आयोजन करने की कोई योजना नहीं है। जो आयोजन किए जा रहे हैं, उनका संघ से कोई ताल्लुक नहीं है।

इतना ही नहीं, मीडिया में जिस राष्ट्रीय ईसाई मंच को संघ का संगठन बताया जा रहा है, उससे भी किसी तरह का ताल्लुक होने से उन्होंने इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि अगर कोई व्यक्तिगत कार्यक्रम का आयोजन कर रहा है, उसे संघ से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।

बता दें कि देश की मुख्यधारा की मीडिया लगातार इस बात कह रही है कि संघ अपने दृष्टिकोण में बदलाव और समाज के हर संप्रदाय में अपनी स्वीकृति को बढ़ाने के लिए यह कदम उठाया है। मीडिया रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ईसाई समुदाय को भाजपा से जोड़ने के लिए संघ द्वारा यह पहल की गई है।

दैनिक भास्कर की न्यूज का स्क्रीनशॉट

कुछ मीडिया रिपोर्ट में कहा गया है, “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार ने चर्च प्रमुखों को बता दिया है कि वे वोट बैंक की राजनीति का हिस्सा न बनें।” इसके अलावा, यह भी दावा किया गया है कि राष्ट्रीय ईसाई मंच की ओर से उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के चर्च प्रमुखों को आमंत्रित किया जा रहा है, जहाँ पिछले कुछ समय से पादरियों, चर्चों और ईसाइयों के कुछ संस्थानों पर हमले की घटनाएँ सामने आई हैं। इस कार्यक्रम में RSS के वरिष्ठ नेता इंद्रेश कुमार के भी कार्यक्रम में शामिल होने की संभावना है।

ऑपइंडिया से बातचीत में संघ के मीडिया विभाग अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने कहा कि इन मीडिया रिपोर्ट में किसी भी तरह की सच्चाई नहीं है। उन्होंने यह भी बताया कि इस तरह के दावे पर उन्हें देश के एक प्रमुख दैनिक अखबार से बात की और इस रिपोर्ट को पूरी तरह खंडन किया।

बता दें कि अल्पसंख्यक मामलों के केंद्रीय राज्यमंत्री जॉन बारला मेघालय हाउस में क्रिसमस भोज की मेजबानी करने की बात कही जा रही है। यह पहली बार है, जब भाजपा सरकार में इस तरह का आयोजन किया जा रहा है।

जनसत्ता की खबर का स्क्रीनशॉट

सुनील आंबेकर ने कहा कि राष्ट्रीय ईसाई मंच को इस आयोजन का आयोजक बताया जा रहा है, उसका संघ से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कोई संबंध नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर कोई संगठन, सरकार या मंत्री-सांसद इस तरह का आयोजन कर रहे है तो उनसे संघ का कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय ईसाई मंच भी संघ का संगठन नहीं है।

यहाँ उल्लेखनीय है कि संघ और ईसाई संगठनों के बीच दूरी की प्रमुख वजह प्रलोभन के जरिए किया जाने वाला धर्मांतरण है। संघ धर्मांतरण को देश विरोधी गतिविधि मानता है, वहीं कुछ ईसाई मिशनरियाँ लोगों को लालच देकर धर्मांतरण के काम में लगी हैं। इसको लेकर आम लोगों और चर्च के बीच नोक-झोंक की स्थिति भी देखने को मिलती है।

संघ के दूसरे सरसंघचालक और गुरुजी के नाम से प्रसिद्ध माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर (Madhav Sadashivrao Golwalkar) ने ईसाई मिशनरियों को देश के लिए खतरनाक माना था। सन 1940 से लेकर निधन होने तक लगभग 33 वर्षों तक संघ के सरसंघचालक रहे गोलवलकर ने अपनी किताब में भी इसका जिक्र किया है।

गोलवलकर ने सन 1966 में ‘बंच ऑफ थॉट’ नाम लिखी अपनी किताब में भी इसका उल्लेख किया है। चार भागों में बँटी इस पुस्तक में ‘राष्ट्र और उसकी समस्याओं’ नाम से एक विषय है। इसमें ‘आंतरिक खतरा’ नाम से गोलवलकर ने मुस्लिम और ईसाई संगठनों को देश के लिए आंतरिक खतरा बताया है। बता दें कि ये दोनों संगठन अपनी मजहबी क्रिया-कलापों के लिए बाहरी देशों में स्थित संगठनों से सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं।

खैर जो भी हो, संघ ने स्पष्ट कर दिया है कि उसने अपनी विचारधारा को नहीं छोड़ा है। हालाँकि, संघ की भोज वाली खबर को लेकर राजनीति भी होने लगी। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इसको लेकर संघ को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की है।

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा, “मोहन भागवत कभी मस्जिद और कभी मजार जा रहे हैं, कभी क्रिसमस का आयोजन कर रहे हैं। इनकी कथनी और करनी में बहुत अंतर है। इनको सिद्धांत से कोई लेना-देना नहीं है, बस सत्ता में बने रहना है। इनको लोगों में वैमनस्यता फैलाना है, एक से दूसरे भाई को लड़ाकर अपना उल्लू सीधा करना है और वोट लेना है। यही इनका उद्देश्य है।”

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने उन मीडिया रिपोर्ट के आधार पर ये बातें कही हैं, जिनमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा क्रिसमस पर भोज का आयोजन करने की बात कही गई है। हालाँकि, इस तरह की असमंजस और अटकलों को संघ ने नकार दिया है और कहा कि इन आयोजनों में उसकी कोई भूमिका या संबंध नहीं है। ऐसे में सीएम बघेल का यह बयान भी अब निरापद हो गया है।

जिस NGO से जुड़े, उसके MD को बना दिया ईसाई: सीतापुर के धर्मांतरण केस में लाखों की विदेशी फंडिंग का खुलासा, चंदे के लिए डेविड करता था अलग-अलग देशों की यात्रा

उत्तर प्रदेश के सीतापुर से सामने आए ईसाई धर्मांतरण मामले में कई खुलासे हुए हैं। पता चला है कि धर्मांतरण के लिए एनजीओ चलाने वाले डेविड के बैंक खातों में लाखों की फंडिंग होती थी। चंदे के रूप में मिलने वाले इन रुपयों का कोई रिकॉर्ड नहीं दिया गया। आरोप है कि डेविड ने FCRA (विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम) का उल्लंघन किया था। डेविड कई देशों की यात्रा कर चुका है।

सीतापुर से जबरन धर्मांतरण कराए जाने का मामला सामने आने के बाद पुलिस ने आरोपित डेविड के तीन बैंक खातों को सीज कर दिया है। जाँच के दौरान पता चला है कि धर्मांतरण के लिए डेविड को बड़े पैमाने पर विदेशी फंडिंग की जाती थी। अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक(ASP) एनपी सिंह के मुताबिक डेविड ने FCRA का उल्लंघन किया था। डेविड व उसके एनजीओ को 2014-15 के दौरान अमेरिका, दक्षिण कोरिया, ब्राजील, केन्या और अर्जेंटीना से भारी फंडिंग हुई थी। जिसका कोई भी रिकॉर्ड नहीं दिया गया।

जाँच में खुलासा हुआ है कि धर्मांतरण कराने वालों ने करीब 50 लाख रुपए की संपत्ति बना ली है। पुलिस सूत्रों के अनुसार साल 2018-19 के बीच एक करोड़ रुपए के दान का पता लगा है। इसे लेकर विस्तार से जाँच की जा रही है।

पुलिस ने डेविड को दान देने वाले 12 सोर्सेस के पता लगाने का दावा किया है। जिसमें कैलिफोर्निया, टेक्सास, दक्षिण कोरिया, केन्या, अर्जेंटीना और ब्राजील के लोग शामिल हैं। सीतापुर से हिरासत में लिया गया रिवाल्डो जोसे डिसिल्वा ही ब्राजील से पैसे भेजने वालों में से एक है। जाँच से पता चला है कि दान के रूप में फंड एक ई-गेटवे के माध्यम से डेविड के खाते में ट्रांसफर किया जाता था। रिपोर्ट्स के मुताबिक चेन्नई में कैल्वेरी चर्च के माध्यम से ई-गेटवे सुविधा प्रदान की गई थी।

डेविड उसकी पत्नी और बाकी सहयोगियों पर गाँव के गरीब व भोले भाले लोगों को नौकरी व पैसे की लालच देकर धर्म परिवर्तन करा ईसाई बनाने का आरोप है। इसके लिए डेविड ने कई जगहों पर संपत्तियाँ खरीदी हैं। आरोप है कि सीतापुर में भी ऐसी ही एक संपत्ति पर बड़े स्तर पर लोगों को जमा कर धर्मांतरण का कार्य किया जा रहा था।

डेविड ने पैसे जुटाने के लिए और धर्मांतरण को रफ्तार देने के लिए तीन देशों की यात्रा भी की। उसने साल 2018 में ब्राजील, 2019 में साउथ कोरिया और अर्जेंटीना की यात्रा की। माना जा रहा है कि ब्राजील यात्रा के दौरान डेविड ने जिन लोगों से फंडिंग के लिए संपर्क किया था, वही लोग बीते दिनों सीतापुर चर्च में आए थे। चर्च में आए ब्राजील के नागरिकों को 29 दिसंबर तक भारत छोड़ने का निर्देश जारी किया गया है।

जाँच के दौरान यह भी पता चला है कि डेविड मूल रूप से जौनपुर के लाखापूरब गाँव का रहने वाला है। साल 2008 में डेविड ने एक एनजीओ से जुड़ने के बाद अपना धर्म बदलकर ईसाई बन गया था। उसके बाद 2011 में उसने रोहिणी नाम के लड़की से शादी कर ली औऱ लखनऊ में एक दूसरे एनजीओ से जुड़े। डेविड ने इस एनजीओ के एमडी को अपनी बातों में फँसा कर ईसाई बना दिया था। उसके बाद यह सिलसिला नहीं थमा।

आपको बता दें कि डेविड और उनकी पत्नी रोहिणी पर 19 दिसंबर 2022 को ब्राजील के लोगों के साथ सीतापुर के शहबाजपुर में धार्मिक सभा आयोजित कर लोगों के धर्मांतरण का आरोप लगा था। घटना की शिकायत नैमिष गुप्ता नाम के व्यक्ति ने की थी। उनका आरोप था कि सभा में लोगों को ईसाई बनने का प्रलोभन दिया जा रहा था। शिकायतकर्ता ने खुद को भी धर्मांतरण का लालच दिए जाने का दावा किया था। इस कार्य्रकम का वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। पुलिस ने डेविड अस्थाना और उनकी पत्नी रोहिणी अस्थाना उर्फ़ रिंकी को नामजद करते हुए दोनों के खिलाफ छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम 1968 की धारा 3/5 के तहत FIR दर्ज कर गिरफ्तार कर लिया। वहीं विदेशियों को 29 दिसंबर तक अपने देश लौटने की हिदायत दी।

गजब बिहार, अजब मामला! पुलिस ने पहले मजदूरी में दी दारू, फिर शराबबंदी में कर लिया गिरफ्तार: SP से पीड़ित पत्नी ने लगाई न्याय की फरियाद

शराबबंदी वाले बिहार में पुलिस का नया कारनामा सामने आया है। बिहार के रोहतास में पुलिस ने लल्लू भुइयां नाम के एक व्यक्ति को शराब रखने के आरोप में गिरफ्तार किया। भुइयां की पत्नी ने आरोप लगाया है कि थाने में काम करने के बदले उसके पति को पुलिस ने मजदूरी में शराब दी थी। फिर उसे गिरफ्तार कर लिया।

पीड़ित पत्नी ने रोहतास के एसपी से इसकी शिकायत करते हुए न्याय की गुहार लगाई है। मामला रोहतास के इंद्रपुरी थाने का है। लल्लू भुइयां की पत्नी ने थानेदार पर आरोप लगाते हुए कहा है कि उसके पति को इंद्रपुरी थाने मे काम करने के लिए बुलाया जाता था। बड़ा बाबू चौकीदार के उसके पति को बुलाते थे। महिला का आरोप है कि मजदूरी के बदले उसके पति को शराब दिया जाता था। जब वह पैसे माँगता था तो उसे थाने से भगा दिया जाता था।

महिला का कहना है कि हाल ही में उसके पति को थाने में सफाई के लिए बुलाया गया था। इस बार भी मजदूरी में पैसे की जगह शराब पकड़ाकर भगा दिया। उसका पति शराब लेकर घर आ गया। आसपास के ही 2 लोगों के साथ बैठकर शराब पी। जैसे ही वे दो लोग शराब पीकर निकले पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया। उन्होंने लल्लू भुइयां का नाम लिया। इसके बाद इंद्रपुरी पुलिस ने उसके पति को भी गिरफ्तार कर लिया। यह घटना 20 नवंबर की रात की बताई जाती है।

महिला का आरोप है कि इस दौरान उसके साथ भी खराब व्यवहार किया गया। महिला ने थानेदार समेत अन्य पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की माँग की है। रोहतास के एसपी आशीष भारती ने बताया है कि मामले की जाँच की जा रही है। जाँच के बाद जो भी दोषी पाया जाएगा, उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। वहीं भीम आर्मी के बिहार प्रदेश महासचिव डॉ. शैलेश सागर ने थानेदार सहित दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग की है। ऐसा नहीं होने पर आंदोलन की चेतावनी दी है।