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‘भारत में होता तो कहते टेस्ट क्रिकेट को ख़त्म कर रहे’: दूसरे ही दिन ख़त्म हो गया ऑस्ट्रेलिया-दक्षिण अफ्रीका का मैच, गाबा के पिच को लेकर छिड़ी बहस

टेस्ट क्रिकेट की घटती लोकप्रियता को लेकर लंबे समय से बहस छिड़ी हुई है। इस बीच ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका (AUSvsSA) के बीच ब्रिस्बेन के गाबा (Gabba Test) में हुए टेस्ट मैच के दूसरे दिन खत्म होने के बाद दिग्गज क्रिकेटर से लेकर फैंस तक निराश नजर आ रहे हैं।

दरअसल, मेजबान ऑस्ट्रेलिया और साउथ अफ्रीका के बीच 3 टेस्ट मैचों की सीरीज का पहला मैच शनिवार (17 दिसंबर 2022) को शुरू हुआ था। इस मैच में ऑस्ट्रेलिया ने अफ्रीका को 6 विकेट से हरा दिया है। कायदे से यह मैच बुधवार (21 दिसंबर 2022) तक चलना चाहिए था। हालाँकि, यदि गेंदबाज बेहतरीन प्रदर्शन करते तो मैच चौथे दिन भी खत्म हो सकता था। लेकिन, मैच में दूसरे दिन का खेल भी पूरी तरह से नहीं हुआ और परिणाम सामने आ गया।

मैच शुरू होने से पहले सामने आई पिच रिपोर्ट्स और फोटोज को देखने के बाद सोशल मीडिया में इस बात की चर्चा हो रही थी कि गाबा टेस्ट में गेंदबाजों का बोलबाला रहेगा और हुआ भी यही। मैच में पहले बल्लेबाजी करते हुए साउथ अफ्रीकी टीम महज 152 रनों पर ही सिमट गई थी। जवाब में ऑस्ट्रेलियाई टीम ने अपनी पहली पारी में 218 रन बनाए थे। पहली पारी के आधार पर कंगारू टीम को 66 रनों की बढ़त हासिल हुई थी।

हालाँकि, इसके बाद बल्लेबाजी करने उतरी अफ्रीका अपनी दूसरी पारी में महज 99 रनों पर ही ऑल आउट हो गई। इसके बाद ऑस्ट्रेलिया को 34 रनों का लक्ष्य मिला था। ऑस्ट्रेलिया ने इस लक्ष्य को हासिल करने में अपने 4 विकेट गंवा दिए। इसमें भी दिलचस्प बात यह रही कि इन 34 रनों में 19 रन एक्सट्रा थे।

इस प्रकार 5 दिन चलने वाला टेस्ट मैच 2 दिन से पहले ही समाप्त हो गया। इस मैच में, 142 ओवरों का खेल हुआ और इसमें दोनों पारियों को मिलाकर कुल 34 विकेट गिरे। इसमें से, 30 विकेट तेज गेंदबाजों के खाते में गए। गाबा टेस्ट में खराब विकेट (पिच) के लिए पूर्व भारतीय ओपनर वीरेंद्र सहवाग समेत कई दिग्गज क्रिकेटरों और फैंस ने अपनी प्रतिक्रिया दी है।

वीरेंद्र सहवाग ने ऑस्ट्रेलिया को लताड़ लगाते हुए कहा है कि यदि भारत में ऐसा हुआ होता तो कहा जाता टेस्ट क्रिकेट खत्म हो गया है। सहवाग ने ट्वीट किया, “142 ओवर और 2 दिन भी नहीं चला। ये लोग किस तरह की पिच होने चाहिए, इस पर ज्ञान देने में आगे रहते हैं। अगर यह भारत में हुआ होता, तो इसे टेस्ट क्रिकेट का अंत, टेस्ट क्रिकेट को बर्बाद हो गया और न जाने क्या-क्या कहा जाता। भयंकर हिपोक्रेसी है।”

यही नहीं, सहवाग ने इंस्टाग्राम में ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीका के बीच हुए इस मैच का स्कोरकार्ड पोस्ट करते हुए लिखा, “त्वाडा कुत्ता टॉमी, साडा कुत्ता कुत्ता। हिप्पोक्रेसी की भी सीमा होती है।”

पूर्व भारतीय क्रिकेटर वसीम जाफर ने मीम शेयर करते हुए ट्वीट किया, “यदि उपमहाद्वीप में कोई टेस्ट 2 दिनों में समाप्त हो जाता, तो प्रतिक्रिया बिल्कुल अलग होती।” दरअसल, हाल ही में पाकिस्तान और इंग्लैंड के बीच खेले गए टेस्ट मैच के बाद रावलपिंडी की पिच को ICC ने डीमेरिट प्वाइंट दिया गया था।

दिनेश कार्तिक ने ट्वीट कर कहा, “दो दिनों से भी कम समय में 34 विकेट, ऐसा लगता है जैसे टेस्ट क्रिकेट स्टेरॉयड पर हो।”

पत्रकार तरुण सिंह वर्मा ने ट्वीट कर कहा, “गाबा में ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका के बीच टेस्ट मैच दो दिन में 145 ओवर के अंदर ही खत्म हो गया। हरी पिच पर दोनों टीमों के तेज गेंदबाजों के प्रदर्शन की हर कोई तारीफ करेगा। लेकिन, अगले साल जब ऑस्ट्रेलिया भारत आएगा, तो वे यहां के स्पिन ट्रैक को कोसना शुरू कर देंगे।”

पार्थ नारोदिया नामक ट्विटर यूजर ने कहा, “दो दिन में टेस्ट मैच खत्म हुआ। चूँकि ये ऑस्ट्रेलिया का ऐतिहासिक गाबा मैदान है इसलिए पिच खराब नहीं, बॉलर फ्रेंडली थी और ऐसी पिच बैट और बॉल के बीच संतुलन बनाए रखती है। गोरे लोगों का दोगलापन।”

सचिन देसाई नामके ट्विटर यूजर ने मीम शेयर करते हुए ट्वीट किया, “ये भेदभाव क्यों?”

एक अन्य यूजर स्वप्निल वर्मा ने गाबा में भारत द्वारा ऑस्ट्रेलिया को हराने की बात को याद करते हुए ट्वीट कर कहा, “गाबा में ऑस्ट्रेलिया को हराना हर किसी के बस की बात नहीं। दक्षिण अफ्रीका की हालत देख लीजिए।”

सलीम ने सोनू सिंह बनकर शादीशुदा हिन्दू महिला का किया रेप, कैद करके धर्मान्तरण और निकाह का दबाव बनाया: FIR के बाद गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले से एक लव जिहाद का मामला सामने आया है। यहाँ एक शादीशुदा हिन्दू महिला ने मुस्लिम युवक पर नाम बदल कर अपहरण और रेप करने का आरोप लगाया है। आरोपित का नाम सलीम है जिस पर सोनू सिंह नाम से पीड़िता को अपने जाल में फँसाने के लिए FIR दर्ज हुई है। पुलिस ने सलीम को गिरफ्तार कर लिया है। घटना बुधवार (14 दिसंबर 2022) की बताई जा रही है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मामला ललौली थानाक्षेत्र का है। पीड़िता की शादी 3 साल पहले हुई थी। उसका 2 साल का एक बेटा भी है। ससुराल में कुछ विवाद होने के चलते वो अपने मायके में रहती है। लड़की और सलीम का परिचय फोन कॉल के जरिए हुआ था। 2 माह पहले पीड़िता के नंबर पर सलीम की कॉल आई थी। सलीम ने खुद को क्षत्रिय परिवार से बताते हुए सोनू नाम से परिचय दिया था। कुछ दिनों तक सोनू बने सलीम और महिला की बात होती रही।

पुलिस को दी गई शिकायत में आगे बताया गया है कि 14 दिसंबर को सोनू ने लड़की को मिलने के लिए एक जगह बुलाया। सोनू नाम से धोखे में आई लड़की सलीम से मिलने भी पहुँच गई। थोड़ी देर के बाद सलीम उन्हें अपने साथ एक घर में ले गया। यहाँ पीड़िता को सोनू के सलीम होने की जानकारी हुई। उसने घर से निकलना चाहा तो सलीम ने पीड़िता को बंधक बना लिया और जबरन रेप किया।

आरोप है कि सलीम ने उसी घर में महिला को 3 दिनों तक बंधक बनाए रखा और लगातार रेप किया। इस दौरान महिला पर जबरन निकाह और धर्मान्तरण का भी दबाव बनाया गया। महिला के घर वालों को चिंता हुई तो उन्होंने अपने स्तर से तलाश की। थक-हार पर लड़की के परिजनों ने गुमशुदगी की FIR दर्ज करवाई। पुलिस ने सक्रियता दिखाते हुए महिला की तलाश शुरू कर दी। कई जगहों की छापेमारी के बाद आखिरकार पुलिस ने पीड़िता को खोज ही निकाला।

पुलिस ने जरूरी कार्रवाई करते हुए लड़की को उसके घर वालों को सौंप दिया। आरोपित सलीम को गिरफ्तार कर लिया गया है। पुलिस के मुताबिक सलीम से पूछताछ की जा रही है। घटना की जानकारी होने के बाद हिन्दू संगठनों ने भी थाने पहुँच कर सलीम के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग की है।

कोई तोड़फोड़ नहीं हुई, सिर्फ खंभे हटाए हैं: गुजरात के पालीताना में मंदिर विवाद को लेकर महंत ने दी सफाई, वायरल हुई थी ‘हमले’ की खबर

गुजरात के भावनगर जिले अंतर्गत पालीताना में शत्रुंजय पहाड़ी पर लगे बोर्ड और लोहे के खंभे को क्षतिग्रस्त किया गया था। पूरी घटना खंबे में लगे सीसीटीवी कैमरे में कैद हुई थी। इसके बाद से दो समुदायों, सेठ आनंदजी कल्याणजी ट्रस्ट और नीलकंठ महादेव सेवा समिति के बीच तनावपूर्ण माहौल बना हुआ है।

इस मामले में गृह विभाग की ओर से हाई लेवल मीटिंग की गई। वहीं, दूसरी ओर समस्त जैन श्वेतांबर मूर्तिपूजक तप गच्चा महासंघ ने पालीताना में रैली निकालकर डिप्टी कलेक्टर को ज्ञापन भी सौंपा है।

क्या है पालीताना मंदिर विवाद?

रिपोर्ट्स के अनुसार, यह पूरा विवाद मंदिर के पास लगे सीसीटीवी कैमरे के खंभे को हटाने के बाद शुरू हुआ था। लंबे समय से यहाँ पवित्र पहाड़ी पर शिव मंदिर के लिए आंदोलन हो रहा था। देश भर के महंतों ने इस आंदोलन में भाग लेकर सरकार से हस्तक्षेप की माँग की थी। हालाँकि, इस बीच दावा किया गया कि कुछ बदमाशों ने सूरजकुंड में लगे सीसीटीवी कैमरों के खंभे को क्षतिग्रस्त कर दिया, जिसके बाद जैन समुदाय के लोग रोष में आ गए। दूसरी ओर शिव मंदिर ट्रस्ट ने अवैध अतिक्रमण का आरोप लगाते हुए कहा है कि सेठ आनंदजी कल्याणजी ट्रस्ट ने उनके परिसर में बिजली के पोल ​​लगवा दिए हैं।

अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो पर शिव मंदिर के महंत ने सफाई दी है कि कोई तोड़-फोड़ नहीं हुई, सिर्फ सीसीटीवी कैमरे लगे लोहे के खंभे हटाए गए।

गृह मंत्री हर्ष सांघवी ने सख्त कार्रवाई का किया वादा

राज्य के गृह मंत्री हर्ष सांघवी ने सोशल मीडिया पर जानकारी दी है कि सरकार ने घटना का संज्ञान लिया है और जाँच शुरू कर दी गई है। संघवी ने कहा है कि उन्होंने मामले को लेकर आला अधिकारियों के साथ बैठक की है। मामले की सख्ती से जाँच करने के आदेश दिए हैं।

इस मामले में श्रीमहासंघ अहमदाबाद के अध्यक्ष महेंद्र शाह का कहना है कि मंदिर के आसपास खनन बंद होना चाहिए। पहले भी इस तरह का कृत्य करके जैन और हिंदुओं की आस्था को ठेस पहुँचाई गई थी। सिर्फ 2-5 लोगों को गिरफ्तार करने से काम नहीं चलेगा, ये साजिश बंद होनी चाहिए। समाज के नेता 10 सूत्री माँगों को लेकर मुख्यमंत्री से मिलेंगे।

‘बम बनाते हुए कोई मरता है तो सरकार मुआवजा देती है क्या?’: ज़हरीली शराब से 70+ मौतों पर बोले जदयू नेता, मानवाधिकार आयोग बिहार भेजेगा टीम

बिहार में शराबबंदी के बावजूद अवैध शराब बनाने का काम जारी है और उसे पीकर मरने वालों का आँकड़ा भी लगातार बढ़ रहा है। इन सबके बीच जहरीली शराब पीकर मरे लोगों को मुआवजे की माँग पर राजनीति तेज हो गई है। जदयू के नेता उपेंद्र कुशवाहा ने मृतकों की तुलना बम बनाने वालों से की है। वहीं राष्ट्रीय मानवाधिकार मौत के मामलों की जाँच करेगी।

बिहार में जहरीली शराब पीकर लगातार हो रही मौतों का राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने संज्ञान लिया है। आयोग ने जहरीली शराब से हुई मौतों की जाँच के लिए एक टीम बिहार भेजने का निर्णय लिया है। आयोग ने कहा कि इसके सदस्य की अध्यक्षता वाली एक जाँच टीम बनाई जाएगी।

उधर, JDU नेता उपेंद्र कुशवाहा ने जहरीली शराब पीकर मरने वाले लोगों की तुलना बम बनाने वालों से करते हुए कहा कि बम बनाते वक्त विस्फोट में किसी की मौत हो तो सरकार मुआवज़ा देती है? उन्होंने मृतकों को मुआवजे देने की विपक्ष की माँग को सिरे से खारिज कर दिया।

बता दें कि बिहार में जहरीली शराब पीने से मृतकों की संख्या बढ़ रही है। इसुआपुर से शुरू शुरू हुआ मौत का सिलसिला मशरख, मढ़ौरा, तरैया, अमनौर, बनियापुर तक जा पहुँचा। अब तक 72 लोगों की मौत की बात सामने आई है। वहीं, कई लोगों का इलाज विभिन्न अस्पतालों में चल रहा है।

इलाज करने वाले डॉक्टरों का कहना है कि जहरीली शराब पीने के कारण मृतकों के शरीर में फॉलिक एसिड बढ़ गई है, जिसके कारण शरीर कम अंग काम करना बंद कर दे रहे हैं। मौत से पहले सभी मृतकों के ब्लड प्रेशर में लगातार बदलाव भी देखने को मिल रहा है। मरीजों में बेचैनी, उल्टी, पेट दर्द, साँस लेने में परेशानी, आँखों से धुँधला दिखाई देने जैसे कई तरह की समस्याएँ देखने को मिल रही हैं।

उधर लोजपा (रामविलास) के अध्यक्ष चिराग पासवान (Chirag Paswan) ने कहा कि जहरीली शराब पीने से लगभग 200 मौतें हुई हैं। सरकार बिना पोस्टमार्टम के मृतकों का अंतिम संस्कार करा रही है और मृतकों की संख्या छिपाने का प्रयास कर रही है। उन्होंने कहा कि वे राज्यपाल से मिलकर राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने की माँग करेंगे।

मृतकों को लेकर राज्य की नीतीश सरकार की छिछालेदर होने के बाद सारण के SP ने इसुआपुर थाना के अध्यक्ष संजय कुमार राम, चौकीदार और दफदार को निलंबित कर अपने काम की इतिश्री कर ली है। पुलिस ऑपरेशन क्लीन के तहत छापेमारी कर शराब के कारोबार से जुड़े लोगों की गिरफ्तारी कर रही है। हालाँकि, इसमें बड़ी मछलियाँ पहले भी बचती रही हैं और आशंका है कि इस बार भी बच जाएँगी।

जब विधानसभा में विपक्ष ने जहरीली शराब पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार को घेरना शुरू किया तो वे बिफर उठे थे। कुर्सी और सदन की मर्यादा को तार-तार करते हुए वे विपक्ष पर चिल्लाने लगे थे। उन्होंने कहा था कि जो नकली शराब पीएगा, वो मरेगा ही।

नीतीश कुमार ने राज्य में शराब की तस्करी और अवैध निर्माण को रोकने में लाचार रहने के बावजूद मृतकों के परिजनों को मुआवजा देने से साफ इनकार कर दिया। दरअसल, मुआवजे की माँग को नकार कर नीतीश कुमार जहरीली शराब मामले में सरकार की लापरवाही को नजरअंदाज करना चाहते हैं।

स्कूल के नाम में ‘महेश’, बच्चों को घुमाया चर्च, करवाया प्रेयर: अभिभावकों के विरोध के बाद माँगी माफ़ी, VHP ने कहा – 700 छात्र-छात्राओं को ले गए थे

राजस्थान के जोधपुर में एक स्कूल के छात्रों को टूर के तौर पर चर्च ले जाने का मामला सामने आया है। आरोप है कि इस दौरान बच्चों से ईसाई प्रेयर भी करवाया गया। खबर फैलते ही बच्चों के माता-पिता और ‘विश्व हिन्दू परिषद (VHP)’ ने घटना पर नाराजगी जताई है। हालात तनावपूर्ण होने की सूचना पर पुलिस भी पहुँच गई। लोगों के विरोध को देखते हुए शुक्रवार (16 दिसंबर, 2022) को स्कूल के मैनेजमेंट ने माफ़ी माँगी है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, विवादों में घिरे शिक्षण संस्थान का नाम ‘महेश पब्लिक स्कूल’ है। यह जोधपुर के पहला पुलिया नाम की जगह पर स्थित है। इस स्कूल का प्रबंधन बच्चों को जोधपुर के ही सरदारपुरा इलाके में पड़ने वाले चर्च में ले गया था। आरोप है कि इस जगह पर बच्चों से चर्च में होने वाली प्रार्थना भी सामूहिक तौर पर करवाई गई थी। जब इसकी जानकारी कुछ बच्चों के माता-पिता को हुई तब वो स्कूल पहुँच कर विरोध दर्ज करवाने लगे।

बताया जा रहा है कि स्कूल मैनेजमेंट बच्चों के अभिभावकों को शांत करवा ही रहा था कि किसी ने पूरे मामले की सूचना ‘विश्व हिन्दू परिषद’ के कार्यकर्ताओं को दे दी। हिन्दू संगठन के लोग भी विरोध में शामिल हो गए। विरोध करने वालों का कहना था कि बच्चों के अभिभावकों को बिना बताए ऐसा करना उनकी धार्मिक भावनाओं का अपमान है। विरोध में शामिल सभी लोग स्कूल प्रबंधन के खिलाफ कार्रवाई की माँग कर रहे थे। घटना की सूचना पर पहुँची पुलिस भी नाराज लोगों को समझाने का प्रयास करने लगी।

जिन बच्चों को चर्च ले जाया गया वो क्लास 1 से क्लास 5 के बीच के छात्र हैं। वायरल वीडियो में बच्चों के अभिभावको को कहते सुना गया, “आज ही एक्जाम शुरू हुआ और आज ही चर्च घुमाया जा रहा है। क्या सिर्फ चर्च ही था ले जाने के लिए, मंदिर नहीं?”

VHP नेता महेंद्र सिंह ने आरोप लगाया है कि जिन बच्चो को चर्च में घुमा फिर कर प्रार्थना करवाई गई थी, उनकी संख्या 600 से 700 के आस-पास थी। इस बीच हालात अपने खिलाफ देखते हुए स्कूल प्रबंधन ने अपनी तरफ से बिना शर्त माफ़ी माँग ली। महेश पब्लिक स्कूल ने अपने प्रार्थना पत्र में भविष्य में बिना गार्जियन की अनुमति के बिना ऐसा कभी न करने का संकल्प लिया है। माफ़ी पात्र स्कूल के प्रिंसिपल की तरफ से लिखा गया है।

इस साल भारत के 58% लोगों ने चीन में बने उत्पादों का किया बहिष्कार, सीमा पर तनाव को बताया कारण: सर्वे में खुलासा – ‘मेड इन चाइना’ की जगह स्वदेशी की धूम

अरुणाचल प्रदेश के तवांग सेक्टर में भारत और चीनी सेना के बीच हुई झड़प के बाद दोनों देशों के राजनीतिक संबंध एक बार फिर तनावपूर्ण हो गए हैं। एलएसी पर हुई इस झड़प के बाद, सोशल कम्युनिटी एंगेजमेंट प्लेटफॉर्म ‘लोकल सर्कल्स’ ने एक सर्वे किया है। इस सर्वे में, प्रत्येक 10 में से 6 लोगों ने कहा है कि उन्होंने चीनी उत्पादों (मेड इन चाइना प्रोडक्ट) का बायकॉट कर दिया है।

लोकल सर्कल्स द्वारा किए गए इस सर्वे में देश के 319 जिलों के अलग-अलग शहरों से 40,000 से अधिक लोगों की राय ली गई है।

58% भारतीयों ने कम की चीनी सामानों की खरीदारी

इस सर्वे में लोगों से पूछा गया है कि क्या कारण था कि उन्होंने बीते एक साल में चीनी प्रोडक्टस की खरीदारी कम कर दी? इसके जवाब में 58% ने कहा कि उन्होंने चीन से तनाव के चलते चीनी प्रोडक्ट को बायकॉट किया है। सर्वे में 28% लोगों ने कहा है कि कीमत, क्वालिटी और बेहतर कस्टमर सर्विस के कारण उन्होंने मेड इन इंडिया प्रोडक्ट खरीदा है। वहीं, 11% लोगों ने सिर्फ बेहतर क्वालिटी और रेट को देखते हुए भारतीय प्रोडक्ट को चुना। हालाँकि, 8% लोगों ने अल्टरनेटिव विदेशी प्रोडक्ट को प्राथमिकता देने की बात कही है।

इसके अलावा, 8% लोगों की ने यह भी कहा है कि उनकी पसंद के प्रोडक्ट्स अन्य कंपनियों ब्रांड या ऑनलाइन में नहीं मिले। ऐसी स्थिति में उन्हें मेड इन चाइना प्रोडक्ट खरीदना पड़ा। वहीं, 35% लोगों का कहना है कि पिछले 12 महीनों में उन्होंने मेड इन चाइना प्रोडक्ट की टॉप कैटेगरी के रूप में गैजेट्स और इलेक्ट्रॉनिक आइटम्स खरीदे हैं। साथ ही, 14% लोगों ने मेड इन चाइना प्रोडक्ट के रूप में त्यौहार के दौरान उपयोग में आने वाले सामान जैसे लाइटिंग, लैंप आदि की खरीदारी की है।

भारतीय कुटीर और लघु उद्योग के लिए से इस सर्वे में बड़ी खुशखबरी है। सर्वे के अनुसार, सिर्फ 5% लोगों ने ही चीनी खिलौने, स्टेशनरी सामान और गिफ्ट्स की खरीदी की है। साल 2021 की रिपोर्ट्स देखने से पता चलता है कि बीते साल चीनी फैशन प्रोडक्ट खरीदने की अच्छी खासी डिमांड थी। हालाँकि, 2022 में इसमें बड़ी गिरावट आई है। 2021 में जहाँ 11% लोग फैशन प्रोडक्ट में मेड इन चाइना सामानों की खरीदी कर रहे थे। वहीं, इस सर्वे के अनुसार, 2022 में सिर्फ 3% लोग ही फैशन में मेड इन चाइना सामानों का उपयोग कर रहे हैं।

चीनी वाहनों को भी ना कह चुके हैं भारतीय

वाहन को लेकर पूछे गए सवाल में किसी भी व्यक्ति ने यह नहीं कहा है कि उसने बीते एक साल में मेड इन चाइना वाहनों को खरीदी की है। इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स के मामले में चीन अब भी बेताज बादशाह बना हुआ है। सर्वे के अनुसार, भारत में चीनी गैजेट्स की खतप 29% से बढ़कर 35% पर पहुँच गई है।

लोकल सर्कल्स के इस सर्वे में भाग लेने वाले 59% भारतीयों ने कहा है कि उनके फोन में कोई भी चीनी ऐप नहीं है। वहीं, 29% लोगों ने स्वीकार किया है कि उनके फोन में 1 या इससे अधिक चीनी ऐप है।

कुल मिलाकर देखें तो, सीमा पर चीन की हरकत का असर बाजार पर पड़ता दिख रहा है। इसके अलावा, लोगों को मेड इन इंडिया प्रोडक्ट भी बेहतरीन क्वालिटी में मिल रहे हैं। ऐसे में, चीनी सामानों की माँग घटना स्वाभाविक था। लोकल सर्कल्स द्वारा किया गया यह सर्वे कई मायनों में भारतीय बाजार की चीन के प्रति निर्भरता में हो रही कमी को भी साफ तौर पर दर्शा रहा है। यदि इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स को छोड़ दिया जाए तो शेष किसी अन्य क्षेत्र में मेड इन चाइना सामानों की माँग में बढ़ोतरी दिखाई नहीं देती है।

फर्जी वीजा और खाड़ी देशों में नौकरी के नाम पर अरशद ने 83 लोगों को लूटा: गैंग के 4 सदस्य गिरफ्तार; छानबीन में 360 पासपोर्ट बरामद

दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने विदेश भेजने नाम पर 83 लोगों से ठगी करने वाले रैकेट का भंडाफोड़ किया है। यह रैकेट लोगों को फर्जी वीसा के जरिए लोगों से ठगी करता था। दिल्ली पुलिस ने रैकेट से जुड़े चार लोगों को गिरफ्तार किया है। इस रैकेट का सरगना अरशद है।

इरशाद हिंदी के साथ-साथ अरबी भाषा का भी जानकार है। वह लोगों को खाड़ी देशों में नौकरी लगवाने की गारंटी देकर उनसे ठगी करता था। इसके लिए वह जाली वीसा लगाता और अधिक से अधिक रुपए माँगता था। इस गैंग ने अब तक 83 लोगों के साथ धोखाधड़ी की है।

पकड़े गए आरोपियों के नाम अरशद, राम अनमोल, श्रुति और गुलबहार उर्फ शमीम है। पुलिस ने आरोपितों के पास से 360 पासपोर्ट, 59 जाली वीसा, जाली स्टांप, लैपटॉप, मोबाइल फोन, ढाई लाख रुपए नकद और एक पिस्टल बरामद किया है। पुलिस ने बताया, “आरोपित एक व्यक्ति से 80,000 से लेकर 1,00,000 रुपए तक वसूलते थे।

पुलिस के अनुसार, धर्मेंद्र कुमार नाम के एक व्यक्ति ने इस संबंध में शिकायत की थी। उस शिकायत के आधार पर मामला दर्ज किया गया था। धर्मेंद्र ने अपनी शिकायत में कहा था कि उसने सोशल मीडिया पर वीसा संबंधों जरूरतों के लिए एक विज्ञापन देखा। उस विज्ञापन के जरिए उसने फिजा प्लेसमेंट नाम की एक प्लेसमेंट एजेंसी से संपर्क किया था।

आरोपितों ने धर्मेंद्र से कहा था कि वे उसे खाड़ी देशों और मध्य एशिया में नौकरी और वीसा दिलाने में उसकी मदद करेंगे। इसके बाद धर्मेंद्र ने आरोपितों को 90,000 रुपए दिए। इसके बाद आरोपितों ने जाली वीसा की कॉपी और दुबई का हवाई टिकट दे दिया, जो रद्द कर दिया गया।

धर्मेंद्र कुमार जब प्लेसमेंट एजेंसी के पास गया तो पता चला कि आरोपित अपना ऑफिस बंद करके भाग गए हैं। इसके बाद धर्मेंद्र ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद पुलिस ने जाँच की पता चला कि यह गैंग लोगों को ठगने का काम करता है। मौका देखकर पुलिस ने जनकपुरी में छापेमारी की और आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया।

अरशद जनकपुरी के साथ-साथ कनॉट प्लेस में भी ऑफिस खोल रखा था। दोनों जगहों पर लोगों को ठगने का काम किया जाता था। वह एक कॉल सेंटर भी चलाता था, जहाँ लड़कियाँ लोगों को कॉल करके विदेश भेजने के नाम पर फाँसती थीं। ये लोग थोड़े-थोड़े अंतराल के बाद अपना ठिकाना बदल लेते थे और सोशल मीडिया के माध्यम से फिर लोगों को फाँसते थे।

पलायन से जूझते बिहार में आधी रात को रोती-कलपती स्त्रियों की आवाज़ बना जो ‘महानायक’… राम से शुरू हुई एक गरीब की यात्रा, जो बन गई इतिहास

16वीं-17वीं शताब्दी के महान अंग्रेजी नाटककार विलियम शेक्सपियर के बारे में तो पूरी दुनिया जानती है। उन्होंने कई नए शब्द गढ़े तो कई उनके कई नाटकों के साथ-साथ उनके पात्र भी अमर हो गए। इसके बाद दुनिया भर के महान साहित्यकारों की तुलना उनसे ही होने लगी। लेकिन, अति तो तब हो गई जब लोग 16वीं शताब्दी में सक्रिय रहे गोस्वामी तुलसीदास को ‘हिंदी का शेक्सपियर’ और ईसा से चौथी-पांचवीं शताब्दी में हुए कालिदास को ‘संस्कृत का शेक्सपियर’ बताने लगे।

ठीक इसी तरह, भिखारी ठाकुर को ‘भोजपुरी का शेक्सपियर’ कहा जाने लगा। हमेशा से ये चलन रहा है कि आमजनों के बीच लोकप्रिय व्यक्ति को नीचा दिखा कर एक खास संभ्रांत वर्ग की पसंद को महान बताया जाता है। तुलसीदास, कबीर और भिखारी ठाकुर जैसे महापुरुष आम लोगों के बीच लोकप्रिय हुए। इन्हें संभ्रांत वर्ग ने अपनाने में कोई खास रुचि नहीं दिखाई। आज भोजपुरी प्रदेश में ही आपको कई लोग ऐसे मिल जाएँगे, जो भिखारी ठाकुर को नहीं जानते हों।

लेकिन, आज के समय में जब अश्लील भोजपुरी गानों और फिल्मों ने भसड़ मचा रखी है, भिखारी ठाकुर का जीवन और उनकी शैली को याद करना और आवश्यक हो जाता है। एक निर्धन नाई परिवार में जन्मे व्यक्ति ने कैसे रामलीला से प्रेरित होकर अपने नाटकों से 5 दशक तक जनता का मनोरंजन करने के साथ-साथ कई समाजिक संदेश भी दिया, ये किसी साधारण व्यक्ति के बाद की बात नहीं थी। उनके नाटक को देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते थे और टिकट भी खरीदते थे।

वो एक लोक-कवि थे, कलाकार थे, लेखक थे, नाट्य निर्देशक थे, दर्शक थे, अभिनेता थे, और सूत्रधार भी थे। भोजपुरी भाषा तब अनगढ़ हुआ करती थी, जिसे उन्होंने सशक्त बनाया। उत्तर भारत के साथ-साथ मॉरीशस, फिजी और सूरीनाम तक उनकी कला पहुँची। विरह के मार्मिक क्षणों के चित्रण में वो दक्ष थे, खासकर उन महिलाओं की पीड़ा को उजागर करना जिनका पति बाहर कमाने गया हो। उनका नाटक ‘बिदेशिया’ इसी समस्या पर केंद्रित है। उनकी इन पंक्तियों को देखिए:

राज-समाज के बढ़स बड़ाई।
झगड़ा-झंझट छुटस लड़ाई।।
शांति-सत्य-प्रेम चलित आवस।
सुख के बरखा राम बरिखावस।।

इसमें वो राज्य और समाज की महत्ता बढ़ने की बात करते हुए लोगों से लड़ाई-झगड़ा छोड़ने को कह रहे हैं। युद्ध को छोड़ कर शांति, सत्य और प्रेम का माहौल बनते देखना चाह रहे हैं। साथ ही भगवान राम से प्रार्थना कर रहे हैं कि वो लोगों पर सुख की वर्षा करें। राम आम जनमानस के ईश्वर हैं, रहे हैं, ऐसे में उनके बिना किसी साहित्य की परिकल्पना ही बेमानी है। शायद इसीलिए, Elite वर्ग आज भी श्रीराम के प्रति अपनी घृणा का प्रदर्शन करने में नहीं सकुचाता है।

भिखारी ठाकुर के प्रारंभिक जीवन की बात करें तो उनका जन्म 18 दिसंबर, 1887 को सारण के कुतुबपुर गाँव में हुआ था। ये गाँव बाद में छपरा जिले में चला गया। गंगा की धार में परिवर्तन के कारण इसकी भौगोलिक स्थिति भी बदली। बचपन में ही भिखारी ठाकुर को चरवाही में लगा दिया गया था। एक गरीब इलाके में, गरीब परिवार में जन्मे लड़के का भाग्य भला कुछ और कैसे हो सकता था! लेकिन, ये भिखारी ठाकुर थे।

परिवार नाई का था, तो बाल-दाढ़ी बनाने की तकनीक भी सीखनी पड़ी और ये काम भी करना पड़ा। अपने एक दोस्त से अक्षर-ज्ञान प्राप्त किया और कुछ-कुछ पढ़ने में सक्षम हो गए। बिहार के बड़े-बुजुर्ग से आप पूछेंगे तो वो आपको सन् 1934 के भयंकर भूकंप और अकाल के बारे में बताएँगे। यही वो समय था, जब बिहार के लोगों ने धन कमाने के लिए खेप में बाहर जाना शुरू किया। कोई कोलकाता गया, कोई दिल्ली तो कोई दिल्ली-पंजाब।

भिखारी ठाकुर को भी अपने फूफा के पास पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में भेज दिया गया। उन्होंने इसी दर्जन जगन्नाथपुर की भी यात्रा की। अशोक कुमार सिन्हा अपनी पुस्तक ‘बिहार के 25 महानायक‘ में बताते हैं कि बंगाल में ही रामलीला का मंचन देखते-देखते भिखारी ठाकुर को अपनी कला का एहसास हुआ। गाँव लौट कर उन्होंने रामचरितमानस की चौपाई से अपनी कला की यात्रा शुरू की। जानकारों से चौपाइयों-दोहों के अर्थ पूछे, अपना ज्ञान बढ़ाया और नाट्य मंडली भी बनाई।

लेकिन, उन्होंने अपने नाटकों की विषय-वस्तु न तो पौराणिक कहानियों को चुना, न राजा-रानी के भोग-विलास को और न लोक-कथाओं के ही नायक-नायिकाओं की। उस समय की सामाजिक बुराइयों, नशे की समस्या, ऊँच-नीच की भावना और झूठी मान्यताओं को उन्होंने अपनी कला के माध्यम से उकेरना शुरू किया। कलकत्ता, गोरखपुर और धनबाद में उनका ‘बिदेसिया’ नाटक खासा लोकप्रिय हुआ। मजदूरों और उनके परिवारों के बीच उनकी लोकप्रियता का कारण यही बना।

बिहार की तब जो सामाजिक स्थिति थी, आज भी उसकी झलक दिखती है। उसमें बहुत ज्यादा बदलाव नहीं आया है। कमाने के लिए बाहर गया मजदूर और गाँव में उसकी अकेली पत्नी के विरह की गाथा है ‘बिदेसिया’। पति की गैर-मौजूदगी में एक महिला को क्या सब बर्दाश्त करना पड़ता है, इसे उन्होंने उकेरा। उन्होंने अपने नाटकों में अश्लीलता को जगह न देते हुए एक मर्यादा बाँधी और उसके भीतर कार्य किया। उनके कलाकार समय और परिस्थिति को भाँपते हुए डायलॉग बदल सकते थे और उन्हें इसकी आज़ादी थी।

एक बार कुल्हड़िया के राजा ने अपने एक नौकर की कोड़े से पिटाई करवाई तो उन्होंने राजा के सामने ही अपने एक नाटक में डायलॉग डाल दिया, “ज्यादा गड़बड़ी करोगे तो कुल्हड़िया के राजा के यहाँ नौकर रखवा देंगे। कोड़ा लगेगा तो होश ठिकाने आ जाएगा।” एक बार उनके ‘गंगा अस्नान’ नाटक के एक पात्र ‘मलेच्छु’ ने बाबू जगजीवन राम की तरफ इशारा कर के कह दिया था कि मैं वहाँ बैठा हूँ। असल में वो श्याम वर्ण का था और अँधेरे में लड़कियाँ उसे खोज रही थीं। राजा को गुस्सा आया कि अतिथि का अपमान हुआ है, क्योंकि तब केंद्रीय मंत्री रहे जगजीवन राम भी श्याम वर्ण के थे।

हालाँकि, कला के इस मर्म को वो समझ गए और तुरंत माइक सँभाल कर लोक-कवि और उनके पात्रों की प्रशंसा की। उनके नाटकों के शीर्षक देखिए – ‘बेटी बेचवा’, ‘पुत्र-वध’, ‘विधवा-विलाप’, ‘गबर घिचोर’ (पंचायत द्वारा एक बच्चे के अधिकार को लेकर फैसला), ‘भाई-विरोध’ (झगड़े के कारण परिवार के टूटने पर), ‘कलियुग-प्रेम’ (जुआ और नशखोरी के दुष्प्रभाव पर) और ‘गंगा अस्नान’ (झूठी मान्यताओं पर आधारित)। उनके नाटकों के दौरान भीड़ को सँभालने के लिए पुलिस तक लगाना पड़ता था।

कवि डॉ केदारनाथ सिंह ने उनके नाम के शीर्षक से उन पर एक पूरी की पूरी कविता लिखी है। उनके नाटक में जो पुरुष आते थे, उन पर महिलाओं की पीड़ा के प्रदर्शन का प्रभाव ज़रूर पड़ता रहा होगा और इस तरह भिखारी ठाकुर एक अच्छे समाज के निर्माण के लिए अपनी कला का इस्तेमाल कर रहे थे।इलीट क्लास के लोगों ने भिखारी ठाकुर को ‘नचनिया’ से अधिक कुछ नहीं समझा। ‘बेटी-बियोग’ में उन्होंने दिखाया कि कैसे लड़कियों को शादी के नाम पर पशु की तरह किसी भी खूँटी से बाँध देने की परंपरा थी और इसमें उसकी राय तक न ली जाती थी।

भारत की आज़ादी और उसके बाद के समय में उन्होंने समाज में स्त्रियों की आज़ादी की लड़ाई लड़ी, लेकिन आज के फेमिनिस्टों की तरह पुरुषों को गाली देकर नहीं। अपनी पुस्तक ‘रंगमंच का जनतंत्र‘ में हृषिकेश सुलभ लिखते हैं कि शास्त्रीयता और शुद्धता की परवाह न करते हुए भिखारी ठाकुर अँधेरे में रोती-कलपती और विलाप करती महिलाओं की आवाज़ थे। उनका नाटक इतना स्वछन्द होता था कि मंच पर ही एक चक्कर लगा कर गाँव से कोलकाता पहुँच जाना, कंधे पर बंदूक को हल बना कर किसान बन कर हल जोतने लगना, गमछा तान कर दुल्हन बन जाना – ये सब उनके नाटक की स्वछंदता थी।

उनके इन दृश्यों में जान डालते थे उनके शब्द और गीत-संगीत, जो स्थानीय ही होते थे और उनका रिश्ता यथार्थ से होता था। उनके जीवन के अंतिम दिनों में ‘बिदेसिया’ को उन्होंने फ़िल्मी रूप भी दिलवा दिया। ग्रामीण संस्कृति को नजदीक से देखने वाला कोई व्यक्ति ही इस तरह उनकी पीड़ा को दिखाने की क्षमता रख सकता है। पलायन की समस्या के बीच स्त्रियों की व्यथा को सामने रखने वाले साहित्य के वो महानायक थे भिखारी ठाकुर, जिनसे आज अश्लील प्रदर्शन कर के उसे कला का नाम देने वालों को सीखना चाहिए।

9 साल में लगे ₹13 करोड़, फिर भी पूरा नहीं हुआ बिहार के बेगूसराय का पुल: उद्घाटन से पहले नदी में समाया, अधिकारियों पर भ्रष्टाचार के आरोप

बिहार के बेगूसराय में एक आधा अधूरा बना पुल टूट कर गिर गया है। पिछले 9 वर्षों में 13 करोड़ खर्च होने के बाद भी इसका काम पूरा ही नहीं हो पाया था। निर्माणाधीन होने के चलते इस पुल का उद्घाटन भी नहीं हो पाया था। घटना रविवार (18 दिसंबर 2022) की है। 3 दिनों पहले इस पुल में दरारें आ गईं थीं। आस-पास के लोग पुल टूटने का जिम्मेदार इसे बनाने वालों को बता रहे हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक जो पुल टूटा है वो साहेबपुरकमाल प्रखंड क्षेत्र की बिष्णुपुर अहोक पंचायत में आता है। यह बूढ़ी गंडक पर बना हुआ था। 3 दिनों पहले पुल में आई दरार की सूचना अधिकारियों को दी गई थी। इस सूचना पर अधिकारियों ने निरीक्षण भी किया था। बाद में कोई पुल की तरफ न जा पाए इसके लिए सुरक्षा के दृष्टिकोण से 2 चौकीदार भी नियुक्त किए गए थे।

जानकारी के मुताबिक यह पुल मुख्यमंत्री नबार्ड योजना के तहत बनाया गया था। इसकी कुल लम्बाई 206 मीटर थी। पुल के बीच का हिस्सा टूटा है जो गिर कर नदी में समा गया है। स्थानीय लोग पुल गिरने से काफी उदास बताए जा रहे हैं। टूटे हुए पुल को देखने के लिए लोगों की भीड़ भी जमा हुई थी। ग्रामीणों ने इस घटना के पीछे पुल बनाने वाले अधिकारियों की लापरवाही को जिम्मेदार बताया है। पुल बनाने वालों पर भ्रष्टाचार का भी आरोप लगा है।

बताया जा रहा है कि उद्घाटन न होने के बाद भी लोगों का आवागमन यहाँ से चल रहा था। घटना के समय किसी राहगीर के न होने के चलते बड़ा हादसा टल गया। स्थानीय लोगों ने इस पुल पर ध्यान देने के लिए अधिकारियों से कई बार मिन्नतें भी की थीं।

जमात-ए-इस्लामी की ₹100 करोड़ की संपत्ति जब्त, जम्मू-कश्मीर में टेरर फंडिंग की कमर तोड़ने के लिए बड़ी कार्रवाई: कुल 188 संपत्तियाँ जद में

जम्मू-कश्मीर पुलिस की राज्य जाँच एजेंसी (SIA) की सिफारिश पर सरकार ने जम्मू-कश्मीर के अलग-अलग हिस्सों में प्रतिबंधित संगठन जमात-ए-इस्लामी (JEI) की लगभग 100 करोड़ रुपए की अनेक संपत्तियों को सील किया है।

SIA ने शनिवार (17 दिसंबर, 2022) को जारी एक बयान में कहा है कि केंद्र शासित प्रदेश के बारामूला, बांदीपोरा, गांदरबल और कुपवाड़ा में एसआईए की सिफारिश पर बारामूला, बांदीपोरा, गांदरबल और कुपवाड़ा के जिला मजिस्ट्रेट द्वारा अधिसूचित किए जाने के बाद लगभग 100 करोड़ रुपए की संपत्तियों के उपयोग और प्रवेश पर रोक लगाई गई है। ये संपत्तियाँ अलग-अलग जगहों (एक दर्जन से अधिक स्थानों) पर थीं।

एक अधिकारी ने कहा है कि जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी गतिविधियों के लिए धन की उपलब्धता को रोकने व देश विरोधी तत्वों और आतंकी नेटवर्क के पारिस्थितिकी तंत्र को खत्म करने के उद्देश्य से यह कार्रवाई की गई।

इस कार्रवाई को लेकर अधिकारियों का कहना है कि जमात-ए-इस्लामी से जुड़ी हुई संपत्तियों को सील करने के साथ ही संबंधित राजस्व रिकॉर्ड में इन्हें ‘रेड एंट्री’ दी गई है। इसके अलावा, अधिकारी ने यह भी कहा है कि जब्ती की कार्यवाही के दौरान, यह पाया गया है कि कुपवाड़ा और कंगन (गांदरबल में) कस्बों में करीब दो दर्जन व्यावसायिक प्रतिष्ठान जमात-ए-इस्लामी की संपत्ति पर किराए से चल रहे थे।

इसलिए, जाँच पूरी होने के बाद यह निर्णय लिया गया है कि जिन लोगों को जमात-ए-इस्लामी से कोई संबंध न हो, उन पर किसी तरह की कार्रवाई नहीं की जाएगी। क्योंकि, ऐसे लोग सामान्य किराएदार थे। SIA ने अपने बयान में कहा है, “जमात-ए-इस्लामी के खिलाफ हुई यह कार्रवाई जम्मू-कश्मीर में बढ़ रही टेरर फंडिंग के खतरे को काफी हद तक खत्म कर देगी। साथ ही यह कानून व्यवस्था और समाज में फैले डर को समाप्त करने की दिशा में बड़ा कदम है।”

बयान में यह भी कहा गया है कि जम्मू कश्मीर पुलिस की राज्य जाँच एजेंसी (SIA) ने जम्मू-कश्मीर में जमात-ए-इस्लामी की 188 संपत्तियों की पहचान की थी। इन सभी संपत्तियों को या तो नोटिफाई किया जा चुका है या फिर ऐसी संपत्तियों पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जा रही है।