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गोवा में जिस एयरपोर्ट की रखी आधारशिला, अब उसका उद्घाटन: PM मोदी ने मनोहर पर्रिकर को किया याद, AIIMS के 3 आयुष भी देश को समर्पित

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार (11 दिसंबर 2022) को गोवा में मोपा एयरपोर्ट का उद्घाटन किया। इस एयरपोर्ट को पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल पर करीब 2,870 करोड़ रुपए से विकसित किया गया है। इसके अलावा, पीएम मोदी ने गोवा की राजधानी पणजी में आयोजित हुए आयुर्वेद कॉन्ग्रेस के समापन समारोह में AIIMS के आयुष हॉस्पिटल समेत 3 आयुष संस्थानों का भी उद्घाटन किया।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, साल 2016 में पीएम मोदी ने मोपा एयरपोर्ट की आधारशिला रखी थी। यह गोवा का दूसरा एयरपोर्ट है। यहाँ का पहला एयरपोर्ट डाबोलिम में स्थित है। इस एयरपोर्ट के माध्यम से हर साल करीब 44 लाख यात्रियों को सेवा प्रदान करने की उम्मीद है। वहीं, बाद में इस एयरपोर्ट का विस्तार कर 1 करोड़ यात्रियों तक विस्तारित किया जाना है। 2,870 करोड़ रुपए की लागत से बनकर तैयार हुआ यह एयपोर्ट कार्गो सेवाओं को भी पूरा करेगा।

गोवा के लोगों को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा:

“मुझे खुशी है कि इस हवाई अड्डे के टर्मिनल का नाम मेरे प्रिय मित्र मनोहर जी के नाम पर रखा गया है। मनोहर जी अब इस हवाई अड्डे के माध्यम से यहाँ आने वाले हर किसी की याद में रहेंगे।”

गोवा में बने डाबोलिम एयरपोर्ट से 15 घरेलू और 6 अंतरराष्ट्रीय जगहों के लिए कनेक्टिविटी है। वहीं, मोपा एयरपोर्ट के जरिए 35 घरेलू और 18 अंतरराष्ट्रीय जगहों के लिए कनेक्टिविटी का विस्तार हो जाएगा। यह एयरपोर्ट आगामी 5 जनवरी से शुरू होगा। एयरपोर्ट शुरू होने के बाद गोवा के टूरिज्म में तेजी से इजाफा होने की उम्मीद जताई जा रही है।

गौरतलब है कि साल 2014 में नरेंद्र मोदी की नेतृत्व वाली सरकार सत्ता में आने के बाद से नए एयरपोर्ट के निर्माण ने तेजी पकड़ी है। उससे पहले तक देश में कुल 74 एयरपोर्ट थे। बीते 8 सालों में यह संख्या 74 से बढ़कर 140 या इससे अधिक हो गई है। यानी मोदी सरकार में एयरपोर्ट की संख्या दोगुनी हो गई है।

केंद्र सरकार का टारगेट है कि अगले 5 साल (साल 2027 तक) में देश में एयरपोर्ट की संख्या 220 से ज्यादा कर दी जाए ताकि न सिर्फ देश बल्कि विदेशों के साथ भी कनेक्टिविटी तेज हो सके। इससे न केवल परिवहन की सुविधाओं में विस्तार होगा बल्कि टूरिज्म और व्यापार में भी तेजी से इजाफा होगा।

देश को दी 3 आयुष संस्थानों की सौगात

पीएम मोदी ने गोवा की राजधानी पणजी में 9वें आयुर्वेद कॉन्ग्रेस के समापन समारोह में AIIMS का उद्घाटन किया। इसके अलावा, उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में बने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ यूनानी मेडिसिन और दिल्ली के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ होम्योपैथी का भी वर्चुअल उद्घाटन किया।

इस दौरान, पीएम मोदी ने कहा, “आयुर्वेद एक ऐसा विज्ञान है जिसका दर्शन, जिसका उद्देश्य है ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः’ यानी सबका सुख, सबका स्वास्थ्य। पहले जिस योग और आयुर्वेद को उपेक्षित समझा जाता था, वही आज पूरी मानवता के लिए एक नई उम्मीद बन गई है। हमारे पास आयुर्वेद का परिणाम भी था, प्रभाव भी था, लेकिन प्रमाण के मामले में हम पीछे छूट रहे थे। इसलिए, आज हमें ‘डेटा बेस्ड एविडेंसेस’ का डॉक्युमेंटेशन करना होगा।”

उन्होंने यह भी कहा है, “अपने ज्ञान, विज्ञान और सांस्कृतिक अनुभव से विश्व के कल्याण का संकल्प अमृत काल का बड़ा लक्ष्य है, आयुर्वेद इसके लिए एक प्रभावी माध्यम है। भारत इस वर्ष G20 समुह की अध्यक्षता और मेजबानी कर रहा है। हमने G20 समिट की थीम वन अर्थ, वन फैमिली, वन फ्यूचर रखा है।”

प्रधानमंत्री ने यह भी कहा है कि कुछ लोग समझते हैं कि आयुर्वेद, सिर्फ इलाज के लिए है लेकिन इसकी खूबी ये भी है कि आयुर्वेद हमें जीवन जीने का तरीका सिखाता है। आयुर्वेद हमें सिखाता है कि हार्डवेयर-सॉफ्टवेयर की तरह ही शरीर और मन भी एक साथ स्वस्थ रहने चाहिए, उनमें समन्वय रहना चाहिए।

मस्जिद से इमाम को उठाया, सिर में 3 गोली मारी, लाश झाड़ियों से बरामद: ईरान में चल रहे हिजाब विरोधी प्रदर्शन के बीच मौलवियों पर हमले बढ़े

शिया मुस्लिम बहुल ईरान में एक सुन्नी मौलवी के हत्या की खबर है। बताया जा रहा है कि कत्ल किए जाने से पहले मौलवी का अपहरण किया गया था। मृतक मौलवी का नाम अब्दुल वहीद है जिनकी लाश एक सड़क के किनारे झाडियों में मिली है। मौलवी अब्दुल वहीद को सिर में गोली मारी गई है। मौलवी का अपहरण गुरुवार (8 दिसंबर 2022) को एक बिना नंबर प्लेट वाली कार से किया गया था।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक घटना दक्षिण-पूर्वी सिस्तान की है। यहाँ सुन्नी मौलवी अब्दुल वहीद को कुछ समय पहले क्रांति विरोधी समूह ने मौत की धमकी दी थी। गुरुवार को अचानक ही एक कार एक मस्जिद में पहुँची। इस मस्जिद का नाम इमाम हुसैन मस्जिद था जहाँ मौलवी नमाज़ पढ़ाने वाले इमाम की हैसियत से आया-जाया करते थे। यहाँ से अपहरण हुए मौलवी की लाश बाद में रिगी खाश काउंटी में बरामद हुई। मौलवी के सिर में 3 गोलियाँ मारी गईं।

इमाम के अलावा मौलवी अब्दुल वाहिद मस्जिद के पास ही मौजूद एक मदरसे के टीचर भी थे। प्रांतीय सुरक्षा परिषद के मुताबिक मौलवी की लाश शुक्रवार (9 दिसंबर 2022) को बरामद हुई थी जिनकी हत्या की जाँच करवाई जा रही है। बताया जा रहा है कि सुन्नी मौलवी की हत्या के बाद सिस्तान क्षेत्र में तनाव फ़ैल गया है। जिस जगह मौलवी की लाश मिली है वो काफी सुनसान जगह है। घटना की जानकारी होने पर लोगों की भीड़ जमा हो गई थी।

गौरतलब है कि 16 सितम्बर 2022 को ईरानी महिला महसा अमीनी की पुलिस टार्चर के बाद मौत के बाद ईरान अशांति के दौर से गुजर रहा है। वहाँ लगातार मौलवियों पर हमले किए जा रहे हैं। कहीं उनका अपहरण हो रहा है तो कहीं उनके सिर पर बँधे साफे को हाथ मारकर गिराया जा रहा है। पुलिस और प्रदर्शनकारियों की झड़प में कई लोगों की मौत हो चुकी हैं। हिंसा ईरान के लगभग सभी बड़े शहरो में फ़ैल गई यही और हजारों लोग सड़को पर रूढ़िवाद का विरोध कर रहे हैं।

माहवारी होते निकाह, बेटियों को संपत्ति में अधिकार, कट्टरपंथी मानसिकता, न्याय में देरी… जानिए क्यों जरूरी है पूरे भारत में समान नागरिक संहिता

देश में समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) को लेकर बहस छिड़ी हुई है। भाजपा शासित कई राज्यों में इसे पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर शुरू किया गया है। यह देश के लिए अनिवार्य है। समान नागरिक संहिता के अभाव में हर धर्म के लिए अलग-अलग पर्सनल लॉ के तहत न्यायिक प्रक्रिया पूरी करनी पड़ती है। इसके कारण कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। हम बात कर रहे हैं पर्सनल लॉ से होने वाली 15 प्रमुख परेशानियाँ:

  • मुस्लिम पर्सनल लॉ में बहु-विवाह करने की छूट है, लेकिन अन्य धर्मों में ‘एक पति-एक पत्नी’ का नियम बहुत कड़ाई से लागू है। बांझपन या नपुंसकता जैसे उचित और व्यावहारिक कारण होने पर भी हिंदू, ईसाई, पारसी के लिए दूसरा विवाह करना एक गंभीर अपराध है और भारतीय दंड संहिता की धारा 494 में बहुविवाह के लिए 7 वर्ष की सजा का प्रावधान है। इसीलिए कई लोग दूसरा विवाह करने के लिए मुस्लिम धर्म अपना लेते हैं। भारत जैसे सेक्युलर देश में मौज-मस्ती के लिए भी चार निकाह जायज है, जबकि इस्लामी देश पाकिस्तान में पहली बीवी की इजाजत के बिना शौहर दूसरा निकाह नहीं कर सकता हैं। मानव इतिहास में ‘एक पति-एक पत्नी’ का नियम सर्वप्रथम भगवान श्रीराम ने लागू किया था और यह किसी भी प्रकार से धार्मिक या मजहबी विषय नहीं, बल्कि ‘सिविल राइट, ह्यूमन राइट, जेंडर जस्टिस, जेंडर इक्वालिटी और राइट टू डिग्निटी’ का मामला है। इसलिए यह जेंडर न्यूट्रल और रिलीजन न्यूट्रल होना चाहिए।
  • कहने को तो भारत में संविधान अर्थात समान विधान है, लेकिन विवाह की न्यूनतम उम्र भी सबके लिए समान नहीं है। मुस्लिम लड़कियों की वयस्कता की उम्र निर्धारित नहीं है और माहवारी शुरू होने पर लड़की को निकाह योग्य मान लिया जाता है। इसलिए 9 वर्ष की उम्र में लड़कियों का निकाह कर दिया जाता है, जबकि अन्य धर्मों मे लड़कियों की विवाह की न्यूनतम उम्र 18 वर्ष और लड़कों की विवाह की न्यूनतम उम्र 21 वर्ष है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) कई बार कह चुका कि 20 वर्ष से पहले लड़की शारीरिक और मानसिक रूप से परिपक्व नहीं होती है और 20 वर्ष से पहले गर्भधारण करना जच्चा-बच्चा दोनों के लिए अत्यधिक हानिकारक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, लड़का हो या लड़की 21 वर्ष से पहले दोनों ही मानसिक रूप से परिपक्व नहीं होते हैं। 21 वर्ष से पहले तो बच्चे ग्रेजुएशन भी नहीं कर पाते हैं और आर्थिक रूप से माता-पिता पर निर्भर होते हैं। इसलिए विवाह की न्यूनतम उम्र सबके लिए एक समान ’21 वर्ष’ करना नितांत आवश्यक है। ‘विवाह की न्यूनतम उम्र’ किसी भी तरह से धार्मिक या मजहबी विषय नहीं है बल्कि ‘सिविल राइट, ह्यूमन राइट, जेंडर जस्टिस, जेंडर इक्वालिटी और राइट टू हेल्थ’ का मामला है इसलिए यह जेंडर न्यूट्रल, रिलीजन न्यूट्रल और 21 वर्ष होना चाहिए।
  • तीन तलाक अवैध घोषित होने के बावजूद अन्य प्रकार के मौखिक तलाक (तलाक-ए-हसन एवं तलाक-ए-अहसन) आज भी मान्य है। इसमें भी तलाक का आधार बताने की बाध्यता नहीं है। केवल 3 महीने तक प्रतीक्षा करना है। वहीं अन्य धर्मों में केवल न्यायालय के माध्यम से ही विवाह-विच्छेद हो सकता है। हिंदू, ईसाई, पारसी दंपति आपसी सहमति से भी मौखिक विवाह-विच्छेद की सुविधा से वंचित हैं। मुस्लिमों में प्रचलित मौखिक तलाक का न्यायपालिका के प्रति जवाबदेही नहीं होने के कारण मुस्लिम बेटियों और उनके माता-पिता, भाई-बहन और बच्चों को हमेशा भय के वातावरण में रहना पड़ता है। तुर्की जैसे मुस्लिम बाहुल्य देश में भी अब किसी तरह का मौखिक तलाक मान्य नहीं है। इसलिए तलाक लेने का तरीका जेंडर न्यूट्रल,रिलीजन न्यूट्रल और सबके लिए यूनिफॉर्म होना चाहिए।
  • मुस्लिम कानून में मौखिक वसीयत एवं दान मान्य है, लेकिन अन्य धर्मों में केवल पंजीकृत वसीयत एवं दान ही मान्य है। मुस्लिम कानून में एक-तिहाई से अधिक संपत्ति का वसीयत नहीं किया जा सकता है, जबकि अन्य धर्मों में शत-प्रतिशत संपत्ति का वसीयत किया जा सकता है। वसीयत और दान किसी भी तरह से धार्मिक या मजहबी विषय नहीं, बल्कि ‘सिविल राइट, ह्यूमन राइट, जेंडर जस्टिस, जेंडर इक्वालिटी और राइट टू लिबर्टी’ का मामला है। इसलिए यह जेंडर न्यूट्रल, रिलीजन न्यूट्रल और सबके लिए यूनिफॉर्म होना चाहिए।
  • मुस्लिम कानून में ‘उत्तराधिकार’ की व्यवस्था अत्यधिक जटिल है। पैतृक संपत्ति में पुत्र एवं पुत्रियों के अधिकार में अत्यधिक भेदभाव है। अन्य धर्मों में भी विवाहोपरान्त अर्जित संपत्ति में पत्नी के अधिकार अपरिभाषित हैं। उत्तराधिकार के कानून बहुत जटिल हैं। विवाह के बाद पुत्रियों के पैतृक संपत्ति में अधिकार सुरक्षित रखने की व्यवस्था नहीं है। ‘उत्तराधिकार’ किसी भी तरह से धार्मिक या मजहबी विषय नहीं है, बल्कि ‘सिविल राइट, ह्यूमन राइट, जेंडर जस्टिस, जेंडर इक्वालिटी और राइट टू लाइफ’ का मामला है। इसलिए यह भी जेंडर न्यूट्रल, रिलीजन न्यूट्रल और सबके लिए यूनिफॉर्म होना चाहिए।
  • विवाह विच्छेद (तलाक) का आधार भी सबके लिए एक समान नहीं है। व्यभिचार के आधार पर मुस्लिम शौहर अपनी बीबी को तलाक दे सकता है, लेकिन बीवी अपने शौहर को तलाक नहीं दे सकती है। हिंदू, पारसी और ईसाई धर्म में तो व्यभिचार तलाक का ग्राउंड ही नहीं है। कोढ़ जैसी बीमारी के आधार पर हिंदू और ईसाई धर्म में तलाक हो सकता है, लेकिन पारसी और मुस्लिम धर्म में नहीं। कम उम्र में विवाह के आधार पर हिंदू धर्म में विवाह विच्छेद हो सकता है, लेकिन पारसी, ईसाई और मुस्लिम में यह संभव नहीं है। ‘विवाह विच्छेद’ किसी भी तरह से धार्मिक या मजहबी विषय नहीं है, बल्कि ‘सिविल राइट, ह्यूमन राइट, जेंडर जस्टिस, जेंडर इक्वालिटी और राइट टू लाइफ’ का मामला है। इसलिए यह भी पूर्णतः जेंडर न्यूट्रल, रिलीजन न्यूट्रल और सबके लिए यूनिफॉर्म होना चाहिए।
  • गोद लेने और भरण-पोषण करने का नियम भी हिंदू, मुस्लिम, पारसी और ईसाई के लिए अलग-अलग हैं। मुस्लिम महिला गोद नहीं ले सकती है और अन्य धर्मों में भी पुरुष प्रधानता के साथ गोद लेने की व्यवस्था लागू है। ‘गोद लेने का अधिकार’ किसी भी तरह से धार्मिक या मजहबी विषय नहीं है, बल्कि ‘सिविल राइट, ह्यूमन राइट, जेंडर जस्टिस, जेंडर इक्वालिटी और राइट टू लाइफ’ का मामला है। इसलिए यह भी पूर्णतः जेंडर न्यूट्रल, रिलीजन न्यूट्रल और सबके लिए यूनिफॉर्म होना चाहिए।
  • विवाह-विच्छेद के बाद हिंदू बेटियों को तो गुजारा-भत्ता मिलता है, लेकिन तलाक के बाद मुस्लिम बेटियों को गुजारा भत्ता नहीं मिलता है। गुजारा-भत्ता किसी भी तरह से धार्मिक या मजहबी विषय नहीं है, बल्कि ‘सिविल राइट, ह्यूमन राइट, जेंडर जस्टिस, जेंडर इक्वालिटी और राइट टू लाइफ’ का मामला है। इसलिए यह भी पूर्णतः जेंडर न्यूट्रल, रिलीजन न्यूट्रल और सबके लिए यूनिफॉर्म होना चाहिए। ‘भारतीय दंड संहिता’ की तर्ज पर सभी नागरिकों के लिए एक समग्र, समावेशी और एकीकृत ‘भारतीय नागरिक संहिता’ लागू होने से विवाह विच्छेद के बाद सभी बहन बेटियों को गुजारा भत्ता मिलेगा, चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान, पारसी हो या ईसाई। इससे धर्म, जाति, क्षेत्र और लिंग आधारित विसंगतियाँ समाप्त होंगी।
  • पैतृक संपत्ति में पुत्र-पुत्री तथा बेटा-बहू को समान अधिकार प्राप्त नहीं हैं। इसमें धर्म, क्षेत्र और लिंग आधारित बहुत सी विसंगतियाँ व्याप्त हैं। विरासत, वसीयत और संपत्ति का अधिकार किसी भी तरह से धार्मिक या मजहबी विषय नहीं, बल्कि ‘सिविल राइट, ह्यूमन राइट, जेंडर जस्टिस, जेंडर इक्वालिटी और राइट टू लाइफ’ का मामला है। इसलिए यह भी पूर्णतः जेंडर न्यूट्रल, रिलीजन न्यूट्रल और सबके लिए यूनिफॉर्म होना चाहिए। ‘भारतीय दंड संहिता’ की तर्ज पर सभी नागरिकों के लिए एक समग्र, समावेशी और एकीकृत ‘भारतीय नागरिक संहिता’ लागू होने से धर्म, क्षेत्र और लिंग आधारित विसंगतियाँ समाप्त होंगी। विरासत, वसीयत तथा संपत्ति का अधिकार सबके लिए एक समान होगा। चाहे वह हिंदू हो या मुस्लिम, पारसी हो या ईसाई।
  • अलग-अलग पर्सनल लॉ लागू होने के कारण विवाह-विच्छेद की स्थिति में विवाहोपरांत अर्जित संपत्ति में पति-पत्नी को समान अधिकार नहीं है, जबकि यह किसी भी तरह से धार्मिक या मजहबी विषय नहीं, बल्कि ‘सिविल राइट, ह्यूमन राइट, जेंडर जस्टिस, जेंडर इक्वालिटी और राइट टू लाइफ’ का मामला है। इसलिए यह भी पूर्णतः जेंडर न्यूट्रल, रिलीजन न्यूट्रल और सबके लिए यूनिफॉर्म होना चाहिए। ‘भारतीय दंड संहिता’ की तर्ज पर सभी नागरिकों के लिए एक समग्र, समावेशी और एकीकृत ‘भारतीय नागरिक संहिता’ लागू होने से धर्म, क्षेत्र, लिंग आधारित विसंगतियाँ समाप्त होंगी और विवाहोपरांत अर्जित संपत्ति का अधिकार सबके लिए एक समान होगा, चाहे वह हिंदू हो या मुस्लिम, पारसी हो या ईसाई।
  • अलग-अलग धर्मों के लिए अलग-अलग पर्सनल लॉ लागू होने के कारण मुकदमों की सुनवाई में अत्यधिक समय लगता है। भारतीय दंड संहिता की तरह सभी नागरिकों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक समग्र समावेशी एवं एकीकृत भारतीय नागरिक संहिता लागू होने से न्यायालय का बहुमूल्य समय बचेगा और नागरिकों को त्वरित न्याय मिलेगा।
  • अलग-अलग संप्रदाय के लिए लागू अलग-अलग ब्रिटिश कानूनों से नागरिकों के मन में गुलामी की हीनभावना व्याप्त है। भारतीय दंड संहिता की तर्ज पर देश के सभी नागरिकों के लिए एक समग्र समावेशी और एकीकृत ‘भारतीय नागरिक संहिता’ लागू होने से समाज को सैकड़ों जटिल, बेकार और पुराने कानूनों से मुक्ति ही नहीं, बल्कि गुलामी की हीनभावना से भी मुक्ति मिलेगी।
  • अलग-अलग पर्सनल लॉ लागू होने के कारण अलगाववादी और कट्टरपंथी मानसिकता बढ़ रही है और हम एक अखण्ड राष्ट्र के निर्माण की दिशा में त्वरित गति से आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। भारतीय दंड संहिता की तरह सभी नागरिकों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक समग्र, समावेशी एवं एकीकृत भारतीय नागरिक संहिता लागू होने से ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ का सपना साकार होगा।
  • हिंदू मैरिज एक्ट में तो महिला-पुरुष को लगभग एक समान अधिकार प्राप्त हैं, लेकिन मुस्लिम और पारसी पर्सनल लॉ में बेटियों के अधिकारों में अत्यधिक भेदभाव है। भारतीय दंड संहिता की तरह सभी नागरिकों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक समग्र, समावेशी एवं एकीकृत भारतीय नागरिक संहिता का सबसे ज्यादा फायदा मुस्लिम और पारसी बेटियों को मिलेगा, क्योंकि उन्हें पुरुषों के बराबर नहीं माना जाता है।
  • अलग-अलग पर्सनल लॉ के कारण रूढ़िवाद, कट्टरवाद, सम्प्रदायवाद, क्षेत्रवाद, भाषावाद बढ़ रहा है। देश के सभी नागरिकों के लिए एक समग्र, समावेशी और एकीकृत ‘भारतीय नागरिक संहिता’ लागू होने से रूढ़िवाद, कट्टरवाद, सम्प्रदायवाद, क्षेत्रवाद और भाषावाद ही समाप्त नहीं होगा, बल्कि वैज्ञानिक और तार्किक सोच भी विकसित होगी।

आर्टिकल 14 के अनुसार देश के सभी नागरिक एक समान हैं। आर्टिकल 15 जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र और जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध करता है। आर्टिकल 16 सबको समान अवसर उपलब्ध कराता है। आर्टिकल 19 देश मे कहीं पर भी जाकर पढ़ने, रहने, बसने, रोजगार करने का अधिकार देता है। आर्टिकल 21 सबको सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार देता है। आर्टिकल 25 धर्म पालन का अधिकार देता है, लेकिन अधर्म पालन का नहीं। रीतियों को पालन करने का अधिकार देता है, लेकिन कुरीतियों को नहीं। प्रथा को पालन करने का अधिकार देता है, लेकिन कुप्रथा को नहीं।

देश के सभी नागरिकों के लिए एक समग्र, समावेशी और एकीकृत ‘भारतीय नागरिक संहिता’ लागू होने से आर्टिकल 25 के अंतर्गत प्राप्त मूलभूत धार्मिक अधिकार जैसे पूजा, नमाज या प्रार्थना करने, व्रत या रोजा रखने तथा मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा का प्रबंधन करने या धार्मिक स्कूल खोलने, धार्मिक शिक्षा का प्रचार प्रसार करने या विवाह-निकाह की कोई भी पद्धति अपनाने या मृत्यु पश्चात अंतिम संस्कार के लिए कोई भी तरीका अपनाने में किसी भी तरह का हस्तक्षेप नहीं होगा।

विवाह की न्यूनतम उम्र, विवाह विच्छेद (तलाक) का आधार, गुजारा भत्ता, गोद लेने का नियम, विरासत और वसीयत का नियम तथा संपत्ति का अधिकार सहित उपरोक्त सभी विषय “सिविल राइट, ह्यूमन राइट, जेंडर जस्टिस, जेंडर इक्वालिटी और राइट टू लाइफ” से सम्बन्धित हैं। इनका न तो मजहब से किसी तरह का संबंध है और न तो इन्हें धार्मिक या मजहबी व्यवहार कहा जा सकता है, लेकिन आजादी के 75 साल बाद भी धर्म या मजहब के नाम पर महिला-पुरुष में भेदभाव जारी है।

हमारे संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद 44 के माध्यम से ‘समान नागरिक संहिता’ की कल्पना किया था, ताकि सबको समान अधिकार और समान अवसर मिले और देश की एकता, अखंडता मजबूत हो। लेकिन, वोट बैंक राजनीति के कारण आज तक ‘समान नागरिक संहिता या भारतीय नागरिक संहिता’ का एक ड्राफ्ट भी नहीं बनाया गया। जिस दिन ‘भारतीय नागरिक संहिता’ का ड्राफ्ट बनाकर सार्वजनिक कर दिया जाएगा और आम जनता विशेषकर बहन-बेटियों को इसके लाभ के बारे में पता चल जाएगा, उस दिन कोई भी इसका विरोध नहीं करेगा। सच तो यह है कि जो लोग समान नागरिक संहिता के बारे में कुछ नहीं जानते हैं, वे ही इसका विरोध कर रहे हैं।

आर्टिकल 37 में स्पष्ट रूप से लिखा है कि नीति निर्देशक सिद्धांतों को लागू करना सरकार की फंडामेंटल ड्यूटी है। जिस प्रकार संविधान का पालन करना सभी नागरिकों की फंडामेंटल ड्यूटी है, उसी प्रकार संविधान को शत-प्रतिशत लागू करना सरकार की फंडामेंटल ड्यूटी है। किसी भी सेक्युलर देश में धार्मिक आधार पर अलग-अलग कानून नहीं है, लेकिन हमारे यहाँ आज भी हिंदू मैरिज एक्ट, पारसी मैरिज एक्ट और ईसाई मैरिज एक्ट लागू है। जब तक भारतीय नागरिक संहिता लागू नहीं होगी, तब तक भारत को सेक्युलर कहना सेक्युलर शब्द को गाली देना है। यदि गोवा के सभी नागरिकों के लिए एक ‘समान नागरिक संहिता’ लागू हो सकती है तो देश के सभी नागरिकों के लिए एक ‘भारतीय नागरिक संहिता’ क्यों नहीं लागू हो सकती है?

जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र और लिंग आधारित अलग-अलग कानून 1947 के विभाजन की बुझ चुकी आग में सुलगते हुए धुएँ की तरह हैं, जो विस्फोटक होकर देश की एकता को कभी भी खण्डित कर सकते हैं। इसलिए इन्हें समाप्त कर एक ‘भारतीय नागरिक संहिता’ लागू करना न केवल धर्मनिरपेक्षता को बनाए रखने के लिए, बल्कि देश की एकता-अखंडता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए भी अति आवश्यक है।

दुर्भाग्य से ‘भारतीय नागरिक संहिता’ को हमेशा तुष्टीकरण के चश्मे से देखा जाता रहा है। जब तक भारतीय नागरिक संहिता का ड्राफ्ट प्रकाशित नहीं होगा, तब तक केवल हवा में ही चर्चा होगी और समान नागरिक संहिता के बारे में सब लोग अपने-अपने तरीके से व्याख्या करेंगे और भ्रम फैलाएँगे। इसलिए विकसित देशों में लागू ‘समान नागरिक संहिता’ और गोवा में लागू ‘गोवा नागरिक संहिता’ का अध्ययन करने और ‘भारतीय नागरिक संहिता’ का ड्राफ्ट बनाने के लिए तत्काल एक ज्यूडिशियल कमीशन या एक्सपर्ट कमेटी बनाना नितांत आवश्यक है।

लेखक: अश्विनी उपाध्याय, सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता

लंच ब्रेक में लगा जय श्रीराम का नारा… सेंट जोसेफ स्कूल ने 18 छात्रों को सस्पेंड किया, प्रिंसिपल बोलीं- सिर्फ 1 को किया है, NCPCR ने जवाब माँगा

मध्यप्रदेश के सागर जिले में एक मिशनरी स्कूल में जय श्रीराम बोलने पर डेढ़ दर्जन छात्रों के सस्पेंड किए जाने का मामला सामने आया है। बताया जा रहा है कि इस बावत स्कूल प्रशासन ने क्लास में मौजूद 30 बच्चों से लिखित माफीनामा भी लिया है। राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग ने इस घटना का संज्ञान लेते हुए सागर जिले के DM को नोटिस जारी किया है। वहीं स्कूल प्रबंधन ने सफाई देते हुए बताया कि कार्रवाई जय श्री राम बोलने पर नहीं बल्कि जूनियर छात्रों को परेशान करने पर की गई है।

पत्रिका की खबर के मुताबिक मामला सेंट जोसेफ कान्वेंट स्कूल का है। यहाँ क्लास 10 में पढ़ने वाले बच्चों पर लंच ब्रेक के दौरान जय श्रीराम के नारे लगाने का आरोप लगा। मामले की शिकायत स्कूल की प्रिंसिपल से की गई। आरोप है कि इसके बाद स्कूल प्रशासन ने पूरे क्लास के सभी 30 बच्चों से माफ़ीनाम लिखवा डाला। इतना ही नहीं, आरोप तो यह भी है कि कुल 18 छात्रों को कॉलेज से निलंबित कर दिया गया।

सागर जिले के जिला शिक्षा अधिकारी अखिलेश पाठक ने इस घटना पर बयान दिया है। उन्होंने कहा कि छात्रों का निलंबन बेहद गलत है। अखिलेश पाठक ने स्कूल को फ्रीडम ऑफ़ स्पीच का भी सम्मान करने की नसीहत दी। इन तमाम आरोपों के बीच स्कूल की प्रिंसिपल सिस्टर मोली ने कार्रवाई की जद में आए छात्रों पर जूनियर छात्रों को परेशान करने का आरोप लगाया है। सिस्टर मोली थॉमस के मुताबिक सिर्फ एक विद्यार्थी को निलंबित किया गया है।

NCPCR ने जारी किया नोटिस

छात्रों का अभिभावकों ने स्कूल प्रबंधन के एक्शन पर असंतोष जताते हुए कहा कि सस्पेंड करने के बजाए उन्हें चेतवानी दी जा सकती है। इस घटना का संज्ञान राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग के चेयरपर्सन प्रियांक कानूनगो ने लिया है। शनिवार (10 दिसंबर 2022) को उन्होंने ट्वीट कर के अख़बार की कटिंग शेयर की और जिलाधिकारी सागर को नोटिस जारी होने की जानकारी दी।

NCPCR की इस नोटिस में प्रकाशित हुई खबर का हवाला दिया गया है। नोटिस में पूरे मामले की जाँच करवा कर 7 दिनों के अंदर आख्या सौंपने के लिए कहा गया है। इस नोटिस में DM से इस बात का भी ध्यान रखने को कहा गया है कि बच्चों की पढ़ाई किसी भी रूप में बाधित न होने पाए।

ऑपइंडिया ने आरोपों की पुष्टि के लिए सेंट जोसेफ कान्वेंट स्कूल को फोन किया लेकिन उनका फोन उठा नहीं। स्कूल प्रबंधन का बयान आने के बाद उसे खबर में अपडेट किया जाएगा।

एलन मस्क ने ब्लू टिक का रेट किया महंगा, नीलाम करेंगे ऑफिस के 265 सामान: ट्विटर फाइल्स 4.0 से जानें कैसे रची गई ‘ट्रंप’ के खिलाफ साजिश

एलन मस्क के ट्विटर खरीदने के बाद से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म में लगातार बदलाव देखने को मिले। इसमें सबसे बड़ा बदलाव ट्विटर ब्लू को लेकर था जो कि अब फिर से शुरू होने जा रहा है। इस बीच खबर है कि एलन मस्क ट्विटर ऑफिस के गैर-जरूरी सामानों की नीलामी करने जा रहे हैं। यह नीलामी अगले महीने होनी है। इसके अलावा, अमेरिका की राजनीति में भूचाल मचाने वाली ट्विटर फाइल्स की नई कड़ी ‘ट्विटर फाइल्स 4.0’ रविवार (11 दिसंबर 2022) को लॉन्च हुई। इस ‘फाइल्स’ में बताया गया है कि ट्विटर से डोनाल्ड ट्रंप को बैन करने के लिए नियमों की धज्जियाँ उड़ाई गईं थीं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, एलन मस्क ने ट्विटर की प्रीमियम सर्विस ‘ट्विटर ब्लू’ को एक बार फिर से लॉन्च करने का ऐलान किया है। सब्सक्रिप्शन पर आधारित यह सर्विस सोमवार (12 दिसंबर 2022) से शुरू होने जा रही है।

‘ट्विटर ब्लू’ के लिए सब्सक्रिप्शन लेने वाले यूजर्स को उनके ट्विटर हैंडल पर ‘ब्लू-टिक’ यानी नीला चेकमार्क प्राप्त करने के लिए हर महीने भुगतान करना होगा। ट्विटर ब्लू के लिए जारी नए प्लान के अनुसार, ट्विटर ने वेबयूजर्स को हर महीने 9 डॉलर यानी करीब 660 रुपए और iPhone यूजर्स से 11 डॉलर यानी करीब 907 रुपए का भुगतान करना होगा।

हालाँकि, ट्विटर की ओर से यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि APPLE यूजर्स को अन्य यूजर्स के मुकाबले अधिक चार्ज क्यों देना होगा। लेकिन, ऐसा माना जा रहा है कि, ट्विटर ‘ऐप स्टोर’ के साथ जुड़ी कॉस्ट को बैलेंस करने के लिए ऐसा कर रहा है।

बता दें कि इससे पहले नवंबर की शुरुआत में ट्विटर ब्लू की शुरुआत की थी। इस सर्विस में ट्विटर यूजर 8 डॉलर का पेमेंट करके अपने अकाउंट को वेरिफाई करा सकते थे। हालाँकि, कई फेक अकाउंट्स के वेरिफाई होने के बाद यह सर्विस हटा दी गई थी। इसके बाद अब, एलन मस्क ने अकाउंट वेरिफिकेशन के लिए यह ऐलान किया है।

ट्विटर ऑफिस के सामानों की होगी नीलामी

ट्विटर खरीदने के बस एलन मस्क ने खुलासा करते हुए कहा था कि सैन फ्रांसिस्को ऑफिस में काम करने वाले कमचारियों के भोजन के लिए ट्विटर को हर साल करीब 13 मिलियन डॉलर खर्च करना पड़ रहा है। इसके बाद एलन मस्क ने फ्री लंच सर्विस को बंद करने का ऐलान कर दिया था।

इस ऐलान के बाद, ट्विटर को कैंटीन से जुड़े सामानों की जरूरत बंद हो गई है। इसलिए, अब ट्विटर कंपनी किचिन व ऑफिस से जुड़े करीब 265 सामानों की नीलामी करने जा रही है। यह नीलामी 17-18 जनवरी को हेरिटेज ग्लोबल पार्टनर्स की वेबसाइट पर ऑनलाइन होगी।

इस नीलामी में, किचन से जुड़े सामान, इलेक्ट्रॉनिक्स आइटम, फर्नीचर, मेमोरेबल वस्तुओं समेत अन्य सामानों को बेचा जाएगा। इन सामानों में से कुछ की बोली केवल महज 25 डॉलर से शुरू होगी, जिसमें ट्विटर बर्ड स्टैच्यू और स्कल्पचर प्लांटर भी शामिल हैं।

ट्विटर फाइल्स 4.0 में हुए कई और बड़े खुलासे…

अमेरिका की राजनीति में भूचाल लाने वाली ट्विटर फाइल्स की नई सीरीज ‘ट्विटर फाइल्स 4.0’ रविवार (11 दिसंबर 2022) को जारी की गई। इससे पहले इस ‘फाइल्स’ की तीन सीरीज ट्विटर फाइल्स, ट्विटर फाइल्स 2.0 और ट्विटर फाइल्स 3.0 लॉन्च की जा चुकी है।

लेखक माइकल शेलेंबर्गर द्वारा कवर की गई ट्विटर फाइल्स 4.0 में बताया गया है कि अमेरिका कैपिटल (यूएस कैपिटल) में हुए दंगों के बाद ट्विटर ट्रस्ट एंड सेफ्टी के पूर्व-ग्लोबल हेड योएल रोथ ने पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को सेंसर करने का फैसला किया था। साथ ही, यह भी बताया गया है कि रोथ ने ट्विटर के अन्य जूनियर कर्मचारियों के सुझावों की पूरी तरह से अनदेखा करते हुए ट्विटर के नियमों में बदलाव कर दिए थे।

माइकल शेलेंबर्गर ने ट्वीट के थ्रेड में बताया है कि पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की पत्नी मिशेल ओबामा सहित डेमोक्रेटिक पार्टी के अन्य नेताओं और समर्थकों ने ट्विटर से डोनाल्ड ट्रम्प को ‘डी-प्लेटफॉर्म’ (हटाने) करने के लिए ट्विटर के सीईओ जैक डार्सी पर दबाव बनाया था।

हालाँकि, उस दौरान डार्सी छुट्टी पर थे और उन्होंने अधिकारियों से ट्विटर के नियमों में बदलाव न करने के लिए कहा था। लेकिन, योएल रोथ ने नियमों में फेरबदल करते हुए डोनाल्ड ट्रंप के खिलाफ कार्रवाई की थी।

ट्विटर फाइल्स के तीन भाग

ट्विटर फाइल्स 4.0 से पहले इसके तीन भाग जारी किए जा चुके हैं। पहले भाग ट्विटर फाइल्स में बताया गया है कि ‘द न्यूयॉर्क पोस्ट’ द्वारा अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के बेटे हंटर बाइडेन को लेकर कवर की गई ‘लैपटॉप स्टोरी’ को ‘बाइडन टीम’ के दवाब में आकर ट्विटर द्वारा हटाया गया था।

वहीं, ट्विटर फाइल्स 2.0 में बताया गया है कि ट्विटर के अधिकारी मेन स्ट्रीम व दक्षिणपंथी विचारधारा के लोगों के ट्विटर अकाउंट और ट्विट्स को सेंसर कर रहे थे। यह सब नियमों को ताक में रख कर किया जा रहा था। इसी प्रकार, ट्विटर फाइल्स 3.0 में खुलासा किया गया कि अमेरिकी जाँच एजेंसी FBI व डेमोक्रेटिक पार्टी (जो बाइडेन की पार्टी) के बड़े नेताओं के कहने पर ट्विटर के अधिकारियों ने नियमों का उल्लंघन करते हुए डोनाल्ड ट्रंप का ट्विटर हैंडल सस्पेंड किया था।

‘200 करोड़ मुस्लिमों की जीत’: FIFA में मोरक्को की जीत पर ‘उम्माह’ के साथ भारत के एक मुख्यमंत्री, मेसी को ‘बकरी’ बना किया था रोस्ट

कतर में हुए फीफा वर्ल्ड कप (Qatar Fifa World Cup) में पुर्तगाल के साथ हुए मैच में मोरक्को (1-0) के जीतते ही सोशल मीडिया पर मुस्लिम समुदाय का अलग ही रुख देखने को मिला। अब तक जहाँ लोग अपनी पसंदीदा टीम या उसके खिलाड़ियों के प्रदर्शन की चर्चा मैच खत्म होने के बाद करते थे। वहीं इस बार मोरक्को के जीतने पर बातें उम्माह की होती नजर आईं। इतना ही नहीं, जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम उमर अब्दुल्ला भी इस भीड़ का हिस्सा थे जिन्होंने पूरे फीफा के वक्त दो बार ट्वीट किया, वो भी सिर्फ इस्लामी देश की जीत से संबंधित।

देख सकते हैं कि एक ट्वीट में उमर अब्दुल्ला ‘मोरक्को वो हो (खुशी दर्शाने वाले शब्द)’ कहकर अपनी खुशी जाहिर करते हैं और दूसरे ट्वीट में वो फुटबॉल जगत के लीजेंड माने जाने वाले मेसी की खिल्ली उड़ाते हुए एक ट्वीट रीट्वीट करते हैं। इसमें दिखाया जाता है कि कैसे बाहरी देश मेसी को महान समझते हैं और इस्लामी देश के सामने वह कुछ भी रह जाते। इस संदेश को देने के लिए एक जिंदा बकरी और एक रोस्ट होते मटन की तस्वीर को शेयर किया गया है। उनके इन दोनों ट्वीट से साफ पता चलता है कि उनके लिए फीफा में क्या जरूरी था। अगर वो खेल और खिलाड़ी को इज्जत देना जानते तो मेसी जैसे खिलाड़ी का मजाक नहीं उड़ाते।

मालूम हो कि केवल उमर अब्दुल्ला अकेले नहीं है जिन्हें मोरक्को की जीत से इतनी खुशी हुई हो। ऐसे तमाम मुस्लिम है जो एक मुस्लिम देश के फीफा में मैच जीतने पर फूल रहे हैं। 2014 में वर्ल्ड कप के विजेता रहे इस्तानबुल के फुटबॉलर मेसुत ओजिल मोरक्को की जीत को सबसे दुनिया के हर मुस्लिम की जीत से जोड़ते हैं और कहते हैं,”गर्व हो रहा है। क्या टीम है! मुस्लिम जगत के लिए क्या उपलब्धि है। अच्छा लग रहा है यह देखकर कि आधुनिक फुटबॉल के समय में भी कहानियाँ सच होती हैं। इससे कई लोगों को ताकत और उम्मीद मिलेगी।”

भारत के बारे में फर्जी न्यूज फैलाने वाले खालेद बेदौन ने कहा, “मोरक्को एक मुस्लिम देश है। वहाँ 98 फीसद लोग इस्लाम को मानते हैं। खिलाड़ियों ने भी गोल और जीत के बाद इबादत की है। ये जीत विश्व भर के 2 बिलियन मुस्लिमों की है।”

कुछ यूजर ये भी लिखते हैं कि उन्हें रोनाल्डो पसंद है और वह विश्वास नहीं कर पा रहे कि उन्होंने अपने जीवन में एक भी वर्ल्ड कप नहीं जीता। मगर साथ ही उन्हें मोरक्को की जीत की खुशी है। उन्हें उम्माह का समर्थन मिला है। देख सकते हैं कि कैसे मोरक्को की जीत से ज्यादा उम्माह की बातें ट्वीट में हो रखी हैं और शायद यही वजह है कि उमर अब्दुल्ला भी मोरक्को की जीत पर इतना खुश हुए।

विवादों में रहा कतर का फीफा

बता दें कि इस बार कतर में हुआ फीफा वर्ल्ड कप कई विवादों का हिस्सा रहा। पहले तो खबर आई कि वहाँ पर इस्लामी मजहब का प्रचार-प्रसार गैर-मुस्लिम टूरिस्टों में किया जा रहा है। फिर पता चला कि वहाँ रेनबो रंग वाले कलाई बंध बाँधने से यूरोपियन खिलाड़ियों को मना कर दिया गया है और पत्रकारों को भी इस बैंड को पहनकर मैच नहीं देखने दे दिया जा रहा।

इसी तरह मैच को एक बीयर कंपनी द्वारा स्पान्सर किया गया लेकिन कतर ने स्टेडियम में बीयर की बिक्री पर रोक लगा दी। सब कुछ इस्लामी मुल्क ने इस्लाम को देखने हुए किया और जब इस खेल में मोरक्को की जीत हुई तो यह भी खबर आई कि फ्रांच में दंगे हुए हैं, पुलिस पर पत्थरबाजी हुई है, सड़कों पर ईंट-पत्थर फेंके गए हैं।

राजीव गाँधी की हत्या में जिसकी बैटरी से उड़ाया गया था बम, उस हत्यारे को The Hindu के डायरेक्टर वाले मीडिया स्कूल ने दिया मंच, बताया ‘निर्दोष’

पत्रकारिता के प्रमुख संस्थानों में से एक एशियन कॉलेज ऑफ जर्नलिज्म (ACJ) ने भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की हत्या के दोषी एजी पेरारीवलन को गेस्ट लेक्चर के लिए बुलाया है। तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई स्थित ACJ पत्रकार शशि कुमार की अध्यक्षता वाले मीडिया डेवलपमेंट फाउंडेशन के तत्वावधान में आता है। ‘द हिंदू’ के एन राम मीडिया डेवलपमेंट फाउंडेशन के संस्थापक ट्रस्टी भी हैं।

गेस्ट लेक्चर प्रोजेक्ट 39A द्वारा आयोजित किया जाता है, जो नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी दिल्ली (NLW, Delhi) की एक पहल है। ACJ में प्रोजेक्ट 39A पर एक अध्याय भी है और इसी पर लेक्चर देने के लिए ACJ ने सजायाफ्ता अपराधी बुलाया है। यह लेक्चर कॉलेज के एमएस सुब्बुलक्ष्मी ऑडिटोरियम में 17 दिसंबर 2022 को होना है।

प्रोजेक्ट 39A और ACJ ने इस सजायाफ्ता व्यक्ति को एक निर्दोष के रूप में चित्रित करने की पूरी कोशिश की है, जिसे सरकार ने अपना शिकार है। कई व्यक्तियों ने राजीव गाँधी के हत्यारे को मंच देने के खतरों को पहचाना और गेस्ट लेक्चरर के रूप में बुलाने पर ट्विटर पर निंदा की।

राजनीतिक विश्लेषक सुमंत रमन ने एसीजे द्वारा एजी पेरारीवलन की मेजबानी करने के फैसले पर हैरानी जताई।

अन्य लोगों ने कहा कि उन्होंने अपनी सजा पूरी कर ली है और उन्हें रिहा कर दिया गया है, लेकिन उन्हें निर्दोष के रूप में चित्रित करना समाज के लिए अच्छा नहीं है।

पेरारीवलन के व्याख्यान का शीर्षक ‘न्याय से इनकार और एक अधूरी खोज’ है। यह अपने आप में अपराधी को भारतीय राज्य के एक निर्दोष पीड़ित के रूप में चित्रित करने के संस्थान के इरादे की और इंगित करता है। इतना ही नहीं, एनएलयू दिल्ली द्वारा एसीजे के सहयोग से की गई पहल एक कदम आगे बढ़कर है। इसमें दावा है कि भारतीय न्यायपालिका और व्यवस्था सामान्य रूप से पेरारीवलन को मानवीय गरिमा को गिराने में दोषी है। उनका दावा है कि ‘राजीव गाँधी की हत्या में पेरारीवलन की भूमिका पर गंभीर संदेह होने के बाद’ उनकी रिहाई का आदेश दिया गया था।

एजी पेरारिवलन कौन है

50 वर्षीय एजी पेरारीवलन उर्फ अरिवु तमिल कवि कुयिलदासन के पुत्र हैं। जब वह किशोर था, तब वह लिट्टे का समर्थक था। 21 मई 1991 की शाम को जब पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की तमिलनाडु के श्रीपेरंबुदूर की एक रैली में हत्या कर दी गई थी तब वह 19 साल का था।

11 जून 1991 को पेरारीवलन को हत्याकांड में उसकी भूमिका के लिए गिरफ्तार किया गया था। उसे कोर्ट द्वारा इस मामले में दोषी ठहराया गया। कोर्ट में यह साबित हो गया था कि उसने बम बेल्ट में इस्तेमाल की गई 9 वोल्ट की दो बैटरी खरीदी और उन्हें ऑपरेशन के मास्टरमाइंड लिट्टे प्रमुख शिवरासन को दिया था। पेरारीवलन ने उस समय TADA (एक कानून जिसे अब खत्म कर दिया गया है) के तहत अपना अपराध कबूल कर लिया था।

उसने अपने कबूलनामे में कहा था, “इसके अलावा, मैंने दो नौ-वोल्ट बैटरी सेल (गोल्डन पावर) खरीदे और उन्हें शिवरासन को दे दिया। उसने बम विस्फोट करने के लिए केवल इनका इस्तेमाल किया था।” हालाँकि, जिस सीबीआई अधिकारी ने उसका बयान दर्ज किया था, उसने बाद में एक डॉक्यूमेंट्री में दावा किया था कि उसने बयान के साथ छेड़छाड़ की थी और उसमें अपनी व्याख्या जोड़ दी थी। अधिकारी के अनुसार, पेरारीवलन ने कहा था कि उसे इस बात का कोई ज्ञान नहीं था कि बैटरी का इस्तेमाल राजीव गाँधी की हत्या के लिए किया जाएगा।

तमिल डॉक्यूमेंट्री ‘उइरवली- सक्कियाडिक्कुम साथम‘ में सीबीआई अधिकारी त्यागराजन का बयान है, जिसमें उन्होंने कहा था कि उनके अनुसार पेरारीवलन कैसे ‘निर्दोष’ था। हालाँकि, दोषी अपराधी के कबूलनामे को सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा था।

अधिकारी ने कहा था, “मुझे क्या चुभ रहा है कि उस समय अरिवु (पेरारीवलन) ने मुझसे कहा कि उसे नहीं पता कि बैटरी खरीदने के लिए क्यों कहा जा रहा है और वे उनके साथ क्या करेंगे। उसने मुझे बताया कि वह इसके बारे में बिल्कुल नहीं जानता था, लेकिन कबूलनामा लिखते समय मैंने वह हिस्सा छोड़ दिया था।”

सीबीआई अधिकारी के इस बयान को पेरारीवलन को ‘निर्दोष’ बताने के लिए बार-बार इस्तेमाल किया जाने लगा। हालाँकि, जिस बात को लोग नहीं जानते, वह यह है कि इस सीबीआई अधिकारी का एक संदिग्ध अतीत है, जो उनके बयान को संदेह के घेरे में डालता है।

सिस्टर अभया मामले में त्यागराजन ने कथित तौर पर न्याय को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अधिकारी त्यागराज ने अभया की हत्या को आत्महत्या साबित करने करने के लिए अधिकारी पर दबाव डाला था और आरोपितों को बचाने की पूरी कोशिश की थी। बता दें कि 27 मार्च 1992 को केरल के कोट्टयम में सेंट पायस एक्स कॉन्वेंट स्थित एक कुएँ में एक यह नन मृत पाई गई थी।

कहा जाता है कि त्यागराज ने अपने अधीनस्थ वर्गीज पी थॉमस पर यह निष्कर्ष निकालने के लिए दबाव डाला था कि सिस्टर अभया की हत्या नहीं की गई थी, बल्कि उन्होंने आत्महत्या की थी। उनके दबाव में अपराध शाखा ने दर्ज किया था कि अभया ने आत्महत्या की थी, क्योंकि उसे प्रथम वर्ष की प्री-डिग्री परीक्षा में 100 में से केवल 7 अंक मिले थे। हालाँकि, बाद में यह हत्या का खुलासा हो गया और इस मामले में फादर थॉमस कोट्टूर और सिस्टर सेफी को दोषी ठहराया गया।

टाडा अदालत ने 1998 में एजी पेरारीवलन को मौत की सजा सुनाई थी। वहीं एसीजे लोगों को यह विश्वास दिलाना चाहता है कि पेरारीवलन ‘निर्दोष’ है। उसके मामले की एक टाइमलाइन संक्षेप में साबित करती है कि उसकी सजा कई बार रोकी गई थी और उसकी रिहाई भी उसकी बेगुनाही साबित होने के बजाय तकनीकी कारणों से हुई थी।

  1. जनवरी 1998 में टाडा अदालत द्वारा पेरारीवलन और 25 अन्य को मृत्युदंड दिए जाने के बाद मई 1999 में सर्वोच्च न्यायालय ने मृत्युदंड को बरकरार रखा।
  2. अक्टूबर 1999 में सुप्रीम कोर्ट ने दायर अपील को खारिज कर दिया।
  3. अक्टूबर में ही दया याचिका दायर की गई थी जिसे बाद में तमिलनाडु के राज्यपाल ने खारिज कर दिया था।
  4. अप्रैल 2000 में तत्कालीन मुख्यमंत्री एम करुणानिधि की अध्यक्षता वाली तमिलनाडु कैबिनेट ने राज्य के राज्यपाल से नलिनी को दी गई मौत की सजा को कम करने की सिफारिश की। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने भी भारत के राष्ट्रपति से उसकी मौत की सजा कम करने की अपील की। इसे राज्यपाल ने स्वीकार कर लिया। कुछ दिनों बाद ही राज्यपाल ने संतन, मुरुगन और पेरारीवलन की दया याचिका को भारत के राष्ट्रपति के पास भेज दिया। यह दया याचिका अगस्त 2011 में खारिज कर दी गई थी।
  5. 30 अगस्त 2011 को तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने विधानसभा में संथन, मुरुगन और पेरारिवलन की मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदलने की मांग करते हुए एक प्रस्ताव पेश किया। उसी दिन मद्रास हाईकोर्ट ने तीनों की फांसी पर रोक लगा दी और मामला सुप्रीम कोर्ट भेज दिया गया।
  6. 18 फरवरी 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने दोषियों की मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इसलिए आया, क्योंकि राष्ट्रपति ने 2011 में ही उनकी याचिका को खारिज करते हुए क्षमादान याचिका पर फैसला करने में 11 साल का समय लिया था। जस्टिस सदाशिवम ने कहा था, “तथ्य यह है कि दया याचिका के निपटान के लिए राष्ट्रपति/राज्यपाल को कोई समय सीमा निर्धारित नहीं की गई है, सरकार को लोकतंत्र की संस्था में लोगों के विश्वास को बहाल करने के लिए अधिक व्यवस्थित तरीके से काम करने के लिए मजबूर होना चाहिए …”। यहाँ यह ध्यान रखना उचित है कि जब सजा कम की गई थी, तब अभियुक्तों की दोषसिद्धि पर कोई निर्णय नहीं हुआ था। उन्हें अभी भी दोषी ठहराया गया था। हालाँकि, यह दया याचिका पर फैसला करने में देरी की तकनीकी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा को उम्रकैद में बदलने का फैसला किया।
  7. 19 फरवरी 2014 को राजनीति हावी हो गई और मुख्यमंत्री जे जयललिता की अध्यक्षता वाली तमिलनाडु कैबिनेट ने राजीव गाँधी हत्याकांड के सभी सात दोषियों को रिहा करने का फैसला किया।
  8. 20 फरवरी 2014 को कॉन्ग्रेस सरकार ने पेरारीवलन सहित दोषियों की रिहाई के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
  9. दिसंबर 2015 में पेरारीवलन ने फिर से तमिलनाडु के गवर्नर के पास दया याचिका दायर की और रिहाई के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
  10. 2017 में तमिलनाडु सरकार पेरारीवलन को पैरोल देती है।
  11. 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि दोषी द्वारा दायर दया याचिका पर निर्णय लेने का अधिकार राज्यपाल के पास है।
  12. 9 सितंबर 2018 को एडप्पादी के पलानीस्वामी की अध्यक्षता वाली तमिलनाडु कैबिनेट ने सभी सात दोषियों को रिहा करने की सिफारिश की और 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को तमिलनाडु सरकार के दोषियों को रिहा करने के फैसले पर 3 महीने के भीतर निर्णय लेने के लिए कहा।
  13. फरवरी 2021 में केंद्र सरकार यह कहते हुए सुप्रीम कोर्ट में वापस चली गई कि उसका मानना ​​है कि तमिलनाडु सरकार के बजाय भारत के राष्ट्रपति दोषियों की छूट पर निर्णय लेने के लिए सही प्राधिकारी थे।
  14. 2021 तक डीएमके सरकार पेरारिवलन को दी गई पैरोल को बढ़ाती रही।
  15. 15 मार्च 2022 को पेरारीवलन पहली बार जमानत पर जेल से बाहर आया। सुप्रीम कोर्ट द्वारा जमानत दिए जाने के बाद उन्होंने वेल्लोर के पुलिस अधीक्षक से अनुरोध किया कि उनकी पैरोल रद्द कर दी जाए और उन्हें जेल ले जाया जाए ताकि वह जमानत पर वहाँ से बाहर निकल सकें। अदालत ने केवल यह देखा था कि उसे बिना किसी शिकायत के दो बार पैरोल दी गई थी और वह पहले ही एक लंबी सजा काट चुका था और इसलिए वह जमानत का हकदार था। वह अभी भी दोषी ठहराया गया था। न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, “चूँकि वह पहले ही 30 साल से अधिक की सजा काट चुका है, इसलिए हमारा विचार है कि वह अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज के जोरदार विरोध के बावजूद जमानत का हकदार है।”
  16. 18 मई 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने अपनी विशेष शक्तियों का प्रयोग करते हुए पेरारीवलन को रिहा करने का आदेश दिया। , अदालत ने कहा था, “अपीलकर्ता की क़ैद की लंबी अवधि को ध्यान में रखते हुए जेल के साथ-साथ पैरोल के दौरान उसका संतोषजनक आचरण, उसके मेडिकल रिकॉर्ड से पुरानी बीमारियाँ, क़ैद के दौरान हासिल की गई उसकी शैक्षणिक योग्यता और अनुच्छेद 161 के तहत ढाई साल से उसकी याचिका की लंबितता को ध्यान में रखते हुए राज्य मंत्रिमंडल की सिफारिश के बाद, हम इस मामले को राज्यपाल के विचारार्थ वापस भेजना उचित नहीं समझते हैं। संविधान के अनुच्छेद 142 26 के तहत अपनी शक्ति के प्रयोग कर हम निर्देश देते हैं कि अपीलकर्ता को 1991 के अपराध संख्या 329 के संबंध में सजा पूरी करने के लिए माना जाता है। अपीलकर्ता, जो पहले से ही जमानत पर है, को तत्काल रिहा किया जाता है। उनके जमानत बांड रद्द किए जाते हैं।” सुप्रीम कोर्ट ने पहले कहा था कि तमिलनाडु के राज्यपाल पेरारीवलन की रिहाई पर राज्य कैबिनेट के फैसले से बंधे थे और राष्ट्रपति को दया याचिका भेजते हुए उनकी कार्रवाई को अस्वीकार कर दिया था। यह कहते हुए कि यह संविधान के खिलाफ कुछ भी नहीं कर सकता है। शीर्ष अदालत ने केंद्र के इस सुझाव से सहमत होने से इनकार कर दिया था कि अदालत को इस मुद्दे पर राष्ट्रपति के फैसले तक इंतजार करना चाहिए। इसने केंद्र को बताया था कि राज्यपाल केंद्र को अपना जवाब प्रस्तुत करने का निर्देश देते हुए संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत तमिलनाडु मंत्रिपरिषद द्वारा दी गई सहायता और सलाह से बंधे थे। इसलिए यह स्पष्ट है कि पेरारिवलन की रिहाई तमिलनाडु सरकार की राजनीति का उत्पाद थी न कि उसकी मासूमियत की।

कालक्रम को देखते हुए ACJ और प्रोजेक्ट 39A के लिए यह दावा करना कि पेरारीवलन ‘निर्दोष’ था और राज्य के उत्पीड़न का शिकार था, बेतुका है। यह न केवल एक सजायाफ्ता अपराधी का बचाव करता है जो हत्या की साजिश का हिस्सा था, बल्कि भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की हत्या को भी सही ठहराता है, जिसे आतंकवाद और युद्ध के रूप में देखा जाना चाहिए।

ACJ और द हिंदू के एन राम से इसके लिंक

एशियन कॉलेज ऑफ जर्नलिज्म को इस क्षेत्र में अग्रणी संस्थानों में से एक माना जाता है। इसकी वेबसाइट के अनुसार, कॉलेज मीडिया डेवलपमेंट फाउंडेशन द्वारा चलाया जाता है। वेबसाइट पर इसकी पूरी जानकारी दी हुई है।

वेबसाइट के अनुसार, मीडिया डेवलपमेंट फाउंडेशन एक गैर-लाभकारी सार्वजनिक ट्रस्ट है, जिसकी स्थापना 1999 में एक स्वतंत्र, खोजी, सामाजिक रूप से जिम्मेदार और नैतिक पेशे के रूप में पत्रकारिता को बढ़ावा देने के लिए की गई थी। इसका उद्देश्य शिक्षा, प्रशिक्षण और मीडिया से संबंधित अनुसंधान के माध्यम से क्षेत्र में उत्कृष्टता को बढ़ावा देना है। यह महत्वाकांक्षी आधुनिक पत्रकारों को पेशे में विश्वस्तरीय मानकों को प्राप्त करने की क्षमताओं से लैस करता है। यह समाज में सभी समूहों को शैक्षिक और प्रशिक्षण के अवसर प्रदान करके विविधता को बढ़ावा देने और पत्रकारिता तक पहुँच को व्यापक बनाने के लिए प्रतिबद्ध है, जिनमें पत्रकारिता के पेशे में गंभीर रूप से कम प्रतिनिधित्व वाले लोग भी शामिल हैं।

फाउंडेशन के न्यासियों में पत्रकार, टीवी एंकर, फिल्म निर्माता और एशियाविल इंटरएक्टिव के अध्यक्ष शशि कुमार (अध्यक्ष), द हिंदू पब्लिशिंग ग्रुप के निदेशक एन राम, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली में अर्थशास्त्र के पूर्व प्रोफेसर एवं स्तंभकार सीपी चंद्रशेखर, तूलिका पब्लिशर्स की प्रबंध संपादक राधिका मेनन और कस्तूरी एंड संस लिमिटेड के अध्यक्ष एन मुरली शामिल हैं।

अपने लक्ष्य की खोज में, 2000 में फाउंडेशन ने एशियन कॉलेज ऑफ जर्नलिज्म के मूल बीडी गोयनका फाउंडेशन के साथ समझौता किया, जो बैंगलोर में छह साल से सफलतापूर्वक काम कर रहा था। कॉलेज को चेन्नई ले जाया गया और इसकी पाठ्यक्रम सामग्री का पुनर्गठन और विस्तार किया गया। यहाँ से पहला बैच जून 2001 में निकला।

द हिंदू के एन राम मीडिया डेवलपमेंट फाउंडेशन के संस्थापक ट्रस्टी हैं, जो एसीजे का मालिक है और उसे चलाता है। यह अब एक अपराधी की मेजबानी कर रहा है।

गौरतलब है कि एन राम ने द हिंदू पर फर्जी खबरें प्रकाशित करके फाइटर जेट सौदे को पटरी से उतारने की कोशिश की थी। साल 2019 के आम चुनावों के दौरान उन्होंने राफेल सौदे में सरकार पर गलत काम करने का आरोप लगाने के लिए द हिंदू में दस्तावेजों की क्रॉप्ड और अधूरी तस्वीरें प्रकाशित की थीं। इससे जुड़े एक सौदा में बाद में सुप्रीम कोर्ट ने दोषमुक्त कर दिया था।

एन राम के तहत द हिंदू लंबे समय से चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के प्रोपगेंडा को आगे बढ़ा रहा है। इसको लेकर ऑपइंडिया द्वारा स्टोरी की गई है। वास्तव में द हूट में एक लेख बताता है कि कैसे द हिंदू को एलटीटीई की अपनी आलोचना को संतुलित करना था और आतंकवादी संगठन के प्रति सहानुभूति भी थी, क्योंकि इसके पाठक आधार का एक बड़ा हिस्सा एलटीटीई के प्रति सहानुभूति रखता था। इसलिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि एन राम आज राजीव गाँधी की हत्या में मदद करने के दोषी अपराधी को एक मंच देने का समर्थन कर रहे हैं।

दूसरी ओर मीडिया डेवलपमेंट फाउंडेशन के अध्यक्ष शशि कुमार भी ऐसे व्यक्ति हैं, जो स्पष्ट रूप से वामपंथियों के प्रति झुकाव रखते हैं। उन्होंने हाल ही में देशद्रोह कानूनों के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया था। सिद्दीक कप्पन और अन्य राष्ट्र-विरोधी तत्वों जैसे पीएफआई के सदस्यों की गिरफ्तारी को उन्होंने अपनी याचिका का आधार बनाया था।

वामपंथियों और इस्लामी चरमपंथियों का समर्थन करते हुए शशि कुमार ने हिंदुओं द्वारा ‘घृणास्पद भाषण’ के खिलाफ याचिका भी दायर की थी। अनुभवी पत्रकार शशि कुमार ने सुप्रीम कोर्ट में एक इंटरवेंशन अप्लीकेशन में कहा कि मीडिया में अभद्र भाषा को बहुसंख्यक ताकतों द्वारा स्वतंत्र भाषण या धार्मिक स्वतंत्रता के रूप में स्थापित करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। दिशा रवि और सिद्दीक कप्पन जैसी भारत विरोधी ताकतों के लिए आजादी की मांग करते हुए उन्होंने 153A के पक्ष में तर्क दिया, क्योंकि इससे इस्लामवादियों की संवेदनाओं को ठेस पहुँचता है।

अपने आवेदन में उन्होंने कहा, “यह एक विडंबना है कि भारतीय दंड संहिता की धारा 153ए [समुदायों या समूहों के बीच सांप्रदायिक वैमनस्य और घृणा पैदा करने] के तहत एक अपराध के लिए प्रकाशन और टेलीकास्ट के उदाहरणों को बहुसंख्यक ताकतों द्वारा अनुच्छेद 19 (1) (ए) के तहत संरक्षण करने की माँग की जाती है। इस संबंध में संवैधानिक कथन स्पष्ट है, कोई अस्पष्टता वारंट कानून नहीं है।” यूपीएससी जिहाद पर एक शो प्रसारित करने के बाद सुदर्शन न्यूज के खिलाफ मामले में हस्तक्षेप आवेदन दायर किया गया था।

इन सबके साथ इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि एक दोषी को एसीजे में जगह मिलेगी। जहाँ तक प्रोजेक्ट 39A का संबंध है, तो वे मृत्युदंड के पूरी तरह खिलाफ हैं। यहाँ तक कि मृत्युदंड को वो मानव बलि के रूप में प्रदर्शित करने की कोशिश कर रहे हैं। केवल तीन हफ्ते पहले प्रोजेक्ट 39A को मौत की सजा के “उन्मूलन की लड़ाई में अपनी अटूट प्रतिबद्धता और उपलब्धियों के लिए” पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

एसीजे, इसके संस्थापक ट्रस्टी, इसके अध्यक्ष और यहाँ तक कि प्रोजेक्ट 39A के मजबूत वामपंथी पूर्वाग्रह के साथ के गठजोड़ में आश्चर्य की बात नहीं है कि वे एक सजायाफ्ता अपराधी को सरकार द्वारा शिकार किए गए निर्दोष के रूप में चित्रित करना चाहेंगे।

शादीशुदा महिला ने अपनी मर्जी से किसी और पुरुष से बनाए संबंध, बाद में वो शादी से मुकर गया: झारखंड हाईकोर्ट ने बताया ये बलात्कार है या नहीं

झारखंड उच्च न्यायालय ने कहा है कि शादी का वादा कर के किसी शादीशुदा महिला के साथ उसकी मर्जी से संबंध बनाना बलात्कार की श्रेणी में नहीं आता है। अर्थात, कोई शादीशुदा महिला ये कह कर किसी पुरुष पर बलात्कार का इल्जाम नहीं लगा सकती कि आरोपित ने शादी का वादा कर के उसे फुसला लिया। झारखंड हाईकोर्ट ने कहा कि केस दर्ज कराने वाली विवाहित ने ये जानते हुए दूसरे पुरुष से संबंध बनाया कि तलाक के बिना उसकी शादी नहीं हो सकती, इसीलिए रेप केस के तहत मामला दर्ज नहीं किया जा सकता।

जस्टिस संजय कुमार द्विदेदी ने ये फैसला सुनाया। बताया जा रहा है कि याचिकाकर्ता ने पीड़िता से वादा किया था कि वो उसके पति से तलाक के बाद उससे शादी कर लेगा। साथ ही एक मंदिर में उसने पीड़िता की माँग में सिंदूर भी भर दिया था। इसके बाद कई मौकों पर दोनों ने शारीरिक संबंध बनाए। हालाँकि, अंत में उसने शादी से इनकार कर दिया। इसके बाद उसके खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज किए गए। इसके खिलाफ वो याचिका लेकर हाईकोर्ट पहुँचा

मंगलवार (6 दिसंबर, 2022) को एकल पीठ ने ये निर्णय सुनाया। हाईकोर्ट के सामने सवाल ये था कि अपनी मर्जी से शादीशुदा महिला ने किसी अन्य पुरुष शारीरिक संबंध बनाए और वो व्यक्ति उससे शादी का वादा कर के मुकर गया, ऐसे में इसे IPC की धारा-376 के तहत अपराध माना जाए या नहीं। अदालत ने ये भी कहा कि अगर शुरू से आरोपित की मंशा धोखाधड़ी की रही हो, तब ये मामला धारा-420 के तहत माना जा सकता है।

मामला कुछ यूँ है कि नवंबर 2019 में देवघर जिले के सारवाँ मेले में आरोपित व्यक्ति की पोस्टिंग की गई थी। पीड़िता के पिता दुकान चलाते हैं, जहाँ इन दोनों की मुलाकात हुई। जब इन दोनों के बीच संबंध बने, उससे पहले ही महिला ने तलाक की याचिका कोर्ट में दायर कर दी थी। आरोपित पक्ष का कहना है कि दोनों बालिग़ हैं और उन्होंने मर्जी से संबंध बनाए, ऐसे में रेप का मामला बनता ही नहीं। आरोपित की माँ ने भी महिला के विरुद्ध केस दर्ज कराया था।

जिस विधायक ने कहा था ‘सपने में भी नहीं छोड़ूँगा AAP का साथ’ , वो भी होगा BJP में शामिल: गुजरात में केजरीवाल के पास बचेंगे सिर्फ 4 MLA

गुजरात विधानसभा चुनाव में सरकार बनाने का दावा करने के बाद आम आदमी पार्टी महज 5 सीट में सिमट गई थी। गुजरात चुनाव में करारी हार झेलने के बाद अब AAP को बड़ा झटका लगा है। दरअसल, गुजरात के जूनागढ़ जिले की विसावदर सीट से विधायक चुने गए भूपत भयाणी भाजपा में शामिल होने जा रहे हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, गुजरात विधानसभा चुनाव में भाजपा की बड़ी जीत और भाजपा की नीतियों से प्रभावित होकर विधायक भूपत भयाणी आम आदमी पार्टी का दामन छोड़ने जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि भयाणी दो साल पहले तक भाजपा में ही थे। इसलिए, उनका भाजपा में शामिल होना ‘घर वापसी’ की तरह देखा जा रहा है।

गौरतलब है कि विसावदर सीट से जीत हासिल करने के बाद भूपत भायाणी ने आम आदमी पार्टी नहीं छोड़ने की बात कही थी। उन्होंने कहा था, “मैं उस पार्टी के साथ व्यापार करने का सपना भी नहीं देखूँगा, जिसने मुझे विधायक बनाया है। क्योंकि मैं किसान का बेटा हूँ। हालाँकि, अब वह अपने ही बयान से पलटते नजर आ रहे हैं। कहा जा रहा है कि भयाणी सोमवार (12 दिसंबर 2022) को गाँधी नगर में सीएम भूपेंद्र पटेल की मौजूदगी में भाजपा में शमिल होंंगे।

चुनाव आयोग की वेबसाइट के अनुसार, आम आदमी पार्टी की टिकट पर चुनाव लड़े भूपत भयाणी ने विसावदर सीट पर 65675 वोट हासिल करते हुए जीत दर्ज की थी। भयाणी ने शुरुआती रुझानों में ही बढ़त हासिल कर ली थी। उनके अलावा इस सीट पर निवर्तमान भाजपा विधायक हर्षद कुमार और कॉन्ग्रेस से करशनभाई वड़ोदैया मैदान में थे। एक ओर जहाँ, हर्षद कुमार को 58771 वोट मिले थे। वहीं, कॉन्ग्रेस प्रत्याशी प्रत्याशी तीसरे नंबर पर रहे थे।

गुजरात विधानसभा की कुल 182 सीटों में से भाजपा के पास फिलहाल 156 सीटें हैं। आम आदमी पार्टी के विधायक के भाजपा में शामिल होने से यह संख्या बढ़कर 157 हो जाएगी। बताया जा रहा है कि अन्य चार आप विधायक भी भाजपा के संपर्क में हैं। इसके अलावा, चुने गए सभी निर्दलीय उम्मीदवार भी कभी न कभी भाजपा का हिस्सा रहे हैं। ऐसे में कयास लगाए जा रहे हैं कि अभी कुछ और विधायक भाजपा में शामिल हो सकते हैं।

गेंद माँगने पर दलित बच्चे को दी गंदी-गंदी गालियाँ, परिजनों से मारपीट भी: UP के फतेहपुर में जुबैर अंसारी समेत 3 पर FIR, Video भी वायरल

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले में क्रिकेट खेल रहे बच्चों से मारपीट की घटना सामने आ रही है। यहाँ जुबेर नाम के एक पेट्रोल पंप मालिक पर आरोप है कि उसने अपने कर्मचारियों कमरुल हसन और नौशाद के साथ मिलकर, क्रिकेट खेल रहे बच्चे और उसके परिजनों को पीटा है। हमले में 3 लोगों के घायल होने की सूचना है जिसमें एक दलित समुदाय से भी बताया जा रहा है। पुलिस ने शनिवार (10 अप्रैल 2022) को तीनों आरोपितों पर FIR दर्ज कर के जाँच शुरू कर दी है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक घटना जहानाबाद थानाक्षेत्र की है। बताया जा रहा है कि यहाँ के गाँव रामबाग में शुक्रवार (9 दिसंबर 2022) को 2 टीमों के बीच क्रिकेट मैच चल रहा था। इस दौरान बैटिंग करती टीम के एक शॉट पर क्रिकेट बॉल मैदान के पास बने जुबेर के पेट्रोल पंप पर चली गई। दलित समुदाय की महिला अनीता देवी ने अपनी शिकायत में बताया है कि उसका बेटा उस गेंद को लेने पेट्रोल पम्प पर गया था।

पीड़िता का कहना है कि जब वो गेंद लेने गया तब वहाँ मौजूद पेट्रोल पम्प के कर्मचारियों ने गेंद अपने मालिक को दे दी। जब पीड़ित जुबेर से गेंद माँगने गया तब उसे जातिसूचक शब्द बोल कर गालियाँ दी जाने लगीं। पीड़ित की माँ का कहना है कि गालियाँ देने के बड़ा जुबेर अंसारी ने अपने कर्मचारियों कमरुल हसन और नौशाद के साथ उसके बेटे की पिटाई की। इसी दौरान उसी महिला के परिवार के 2 अन्य बच्चे भी वहाँ पहुँच गए और पीड़िता को बचाने की कोशिश करने लगे।

अपने शिकायत में पीड़िता ने बताया है कि पहले जुबेर ने उनके बेटे से उसके गाँव का नाम पूछा बाद में उन्हें गालियाँ देते हुए साले शब्द के साथ उनकी जाति को जोड़ा गया। इस दौरान पीड़िता के तीनों परिजनों की पिटाई की गई। ऑपइंडिया के पास FIR कॉपी मौजूद है।

वायरल हो रहे वीडियो में एक महिला को जमीन में गिरा देखा जा सकता है और आस-पास लोगों की भीड़ दिखाई दे रही है। आरोप है कि जुबेर, कमरुल और नौशाद ने मिल कर महिला के परिवार के तीनों सदस्यों को मारा और उनकी जाति को टारगेट कर के गालियाँ दीं। इस मारपीट का वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। पुलिस ने नौशाद, कमरुल और जुबेर अंसारी पर IPC की धारा 323, 504 और SC/ST एक्ट के तहत कार्रवाई की गई है।