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कॉलेजियम की बैठक में क्या चर्चा हुई? सुप्रीम कोर्ट ने RTI के तहत जानकारी देने से किया इनकार, कहा – इसे सार्वजनिक नहीं कर सकते: केंद्र को भी चेताया

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) का स्वघोषित कॉलेजियम सिस्टम (Collegium) पर केंद्र की मोदी सरकार (Modi Government) के साथ तकरार बढ़ रही है तो दूसरी तरफ वह इस सिस्टम को पारदर्शी बनने भी नहीं देना चाहता है। सुप्रीम कोर्ट ने कॉलेजियम सिस्टम के कामकाज और तौर-तरीकों की जानकारी देने से स्पष्ट मना कर दिया और कहा कि इसे सार्वजनिक नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस एमआर शाह और सीटी रविकुमार की पीठ ने कहा कि सूचना के अधिकार (RTI) कानून के तहत केवल अंतिम फैसले ही सार्वजनिक किए जा सकते हैं, न कि कॉलेजियम की बैठकों की चर्चा और जजों की नियुक्ति से संबंधित प्रक्रिया। इस मामले को लेकर दायर याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (9 दिसंबर 2022) को खारिज कर दिया।

पीठ ने कहा, “अंतिम प्रस्ताव तैयार होने और कॉलेजियम के सदस्यों द्वारा हस्ताक्षर किए जाने के बाद ही, नियत प्रक्रिया और चर्चा/विचार-विमर्श और परामर्श की प्रक्रिया को पूरा करने के बाद होता है, उसे दिनांक 3 अक्टूबर, 2017 के प्रस्ताव के अनुसार सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर प्रकाशित करने की जरूरत होती है।”

दरअसल, अंजलि नाम की एक ऐक्टिविस्ट ने याचिका दायर कर 2018 की कॉलेजियम की बैठक के विवरण का खुलासा करने का निर्देश देने की माँग की थी। इस बैठक हाईकोर्ट के दो मुख्य न्यायाधीशों को शीर्ष अदालत में पदोन्नत करने का निर्णय लिया गया था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि कॉलेजियम के सिर्फ निर्णय बताए जा सकते हैं, उसमें की गई चर्चा नहीं।

याचिकाकर्ता के वकील प्रशांत भूषण ने कोर्ट में तर्क दिया कि जनता में विश्वास पैदा करने के लिए हाईकोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्ति पारदर्शी तरीके से की जानी चाहिए। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कॉलेजियम प्रणाली के भीतर चर्चा को RTI के माध्यम से सार्वजनिक डोमेन में नहीं रखा जा सकता है, क्योंकि वे अंतिम निर्णय के चरित्र को नहीं मानते।

न्यायमूर्ति शाह ने कहा, “कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया था, जिसकी परिणति कॉलेजियम के सभी सदस्यों द्वारा तैयार और हस्ताक्षरित एक अंतिम प्रस्ताव के रूप में हुई थी और उसे सार्वजनिक डोमेन में प्रकट करने की जरूरत नहीं थी और वह भी आरटीआई अधिनियम के तहत सार्वजनिक डोमेन में बिल्कुल नहीं।”

बता दें कि कॉलेजियम सिस्टम को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को भी धमकी दे दी। कोर्ट ने कहा कि कॉलेजियम सिस्टम पर बयान देने से केंद्र अपने मंत्रियों को रोकें। बता दें कि कानून किरेन रिजिजू कॉलेजियम सिस्टम पर लगातार सवाल उठाते रहे हैं और उसे एलियन प्रणाली बताते रहे है।

वहीं, उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने भी कॉलेजियम को लेकर कहा था कि दुनिया में सिर्फ भारत ही ऐसा देश है, जहाँ जज ही जज को चुनते और नियुक्त करते हैं। इसमें पारदर्शिता की भी घोर कमी है। सुप्रीम कोर्ट सरकार के इन बयानों से भड़क गया।

कोर्ट ने कहा था कि जब तक कॉलेजियम सिस्टम है, उसे सरकार को मानना पड़ेगा। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा था कि अगर उसे कॉलेजियम के खिलाफ कोई कानून पास करना है तो करे, लेकिन उसकी न्यायिक समीक्षा का अधिकार उसके पास है। उल्लेखनीय है कि मोदी सरकार ने कॉलेजियम प्रणाली की जगह एक नया कानून बनाया था, जिसे न्यायिक समीक्षा का आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था।

बता दें कि कॉलेजियम प्रणाली को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। जजों की नियुक्ति में भाई-भतीजावाद एवं जातिवाद को न्यायपालिका में ‘अंकल कल्चर’ कहा जाता है। कुछ तबका इसे खत्म करने की माँग करता है। वहीं, कुछ तबका इसे सही बताता है, लेकिन साथ में इसे पारदर्शी बनाने की वकालत करता है।

‘फवाद खान के फैन हो तो पाकिस्तान जाकर देखो फिल्म’: भारत में रिलीज होने जा रही है ‘मौला जट्ट’, MNS ने चेताया – देश में कहीं नहीं चलने देंगे

फवाद खान की पाकिस्तानी फिल्म ‘द लीजेंड ऑफ मौला जट्ट’ भारत में रिलीज होने वाली है, लेकिन इससे पहले ही राज ठाकरे की MNS ने इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। फिल्म दुनिया भर में अभी तक ₹90 करोड़ रुपए से भी अधिक का कारोबार कर चुकी है। ‘महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना’ नेता अमेय खोपकर ने इस संबंध में चेतावनी जारी की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी एक पाकिस्तानी फिल्म को भारत में रिलीज नहीं होने देगी।

उन्होएँ शुक्रवार (9 दिसंबर, 2022) को कहा कि पार्टी के अध्यक्ष राज ठाकरे के आदेश के अनुसार काम करते हुए मनसे कार्यकर्ता भारत में कहीं भी इस फिल्म को रिलीज नहीं होने देंगे। उन्होंने इस बात से नाराज़गी जताई कि एक भारतीय कंपनी ही इस फिल्म को भारत में रिलीज कर रही है। उन्होंने भारत में फवाद खान के फैंस को देशद्रोही करार देते हुए कहा कि अगर वो पाकिस्तानी अभिनेता के उतने ही बड़े फैन हैं तो पाकिस्तान जाकर देखें।

‘The Legend Of Maula Jatt’ के बारे में बता दें कि ये 1979 की पाकिस्तानी कल्ट-क्लासिक फिल्म से प्रेरित हैं। फिल्म में फवाद खान के अलावा माहिरा खान भी मुख्य भूमिका में हैं। पाकिस्तानी रुपयों में फिल्म 250 करोड़ (11 मिलियन डॉलर) का कारोबार दुनिया भर में कर चुकी है। फिल्म में हम अली अब्बासी ने कबीले के एक क्रूर सरदार का रोल निभाया है। बिलाल लाशरी इस फिल्म के निर्देशक हैं, जिनकी पिछली फिल्म ‘वार (2013)’ ने भी तगड़ा कारोबार किया था।

भारत में पाकिस्तानी फिल्म की रिलीज के खिलाफ भड़की मनसे

बता दें कि फवाद खान बॉलीवुड में भी काम कर चुके हैं। 2014 में उन्होंने ‘खूबसूरत’ में सोनम कपूर के साथ काम किया था। वहीं, मल्टी-स्टारर ‘कपूर एंड संस (2016)’ में भी उन्होंने ऋषि कपूर और सिद्धार्थ मल्होत्रा जैसे अभिनेताओं के साथ काम किया था। अमेय खोपकर ने कहा है कि उनकी बातों को ‘बयान’ नहीं, ‘धमकी’ के रूप में लिया जाए। उन्होंने कहा कि जो भी पाकिस्तानियों के एजेंट यहाँ हैं, वो इस बात को अच्छी तरह समझ लें।

‘फोटो लेकर बनाई अश्लील वीडियो, ब्लैकमेल किया’: HC ने फेसबुक पर ठोका ₹50 हजार का जुर्माना, 1 साल पुरानी PIL का नहीं दिया था जवाब

उत्तराखंड हाई कोर्ट ने फेसबुक पर एक जनहित याचिका का जवाब नहीं देने पर 50 हजार रुपए का जुर्माना लगाया है। साल 2021 में कोर्ट ने फेसबुक से फर्जी आईडी और ब्लैकमेलिंग कर लोगों से पैसे माँगने के मामले में जवाब दाखिल करने को कहा था। हालाँकि, फेसबुक ने बीते एक साल में जबाव नहीं दिया। इससे उस पर जुर्माना लगाया गया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, उत्तराखंड हाई कोर्ट ने मुख्य न्यायाधीश जस्टिस विपिन सांघी व जस्टिस आरसी खुल्बे ने मामले की सुनवाई करते हुए मेटा के स्वामित्व वाली फेसबुक को 16 फरवरी तक जवाब देना का समय दिया है। साथ ही, समय पर जवाब देने पर 50 हजार रुपए का जुर्माना लगाया है।

कोर्ट ने आदेश जारी करते हुए कहा है, “यह जुर्माना जमा करने के लिए तीन सप्ताह का समय दिया जा रहा है। इसके लिए और अधिक समय नहीं दिया जाएगा।”

हालाँकि, फेसबुक के वकील ने अपील करते हुए अतिरिक्त समय की माँग की थी। इसके बाद, वकील के अनुरोध को स्वीकार करते हुए, कोर्ट ने जवाबी हलफनामा दायर करने के लिए चार सप्ताह की अनुमति दी। कोर्ट ने कहा है कि जवाबी हलफनामे में आईटी नियम, 2021 के अनुसार उठाए गए कदमों का भी जिक्र होना चाहिए।

दरअसल, साल 2021 में हरिद्वार के रहने वाले आलोक कुमार ने हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर कहा था कि फेसबुक में फर्जी आईडी बनाकर लोगों को फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजी जा रही है। इसके बाद, फेसबुक फ्रेंड की फोटोज को एडिट कर उनकी अश्लील वीडियो बनाई जाती है और ब्लैकमेलिंग की जाती है।

याचिकाकर्ता ने कहा था कि सोशल मीडिया के गलत इस्तेमाल से लोग आत्महत्या करने को मजबूर हैं। इसलिए, फेसबुक को यह निर्देश दिए जाएँ कि इस तरह की अश्लील वीडियो डालने वाले लोगों की आईडी ब्लॉक की जाए। साथ ही, फेसबुक को यह भी निर्देश दिए जाएँ कि एक ऐसा नंबर जारी करे जिसमें पीड़ित अपनी शिकायत दर्ज करवा सकें।

कोर्ट में दाखिल याचिका में, याचिकाकर्ता ने फेसबुक के अलावा केंद्र सरकार, राज्य सरकार, पुलिस अधिकारियों को भी ऑनलाइन दुर्व्यवहार से निपटने के लिए दिशानिर्देश तैयार करने के निर्देश देने की माँग की थी।

याचिकाकर्ता के वकील अभिजय नेगी ने कहा कि पहले भी फेसबुक को नोटिस कोर्ट ने दिया था लेकिन जवाब अब तक नहीं दाखिल किया, जिसके बाद अब कोर्ट ने जुर्माना लगाया है।साथ ही ठगी के मामले भी फेसबुक पर आ रहे हैं जो बेहद गंभीर हैं।

याचिकाकर्ता की अर्जी पर सुनवाई करते हुए, कोर्ट ने इस मामले को विचारणीय माना था। उत्तराखंड हाई कोर्ट ने यह भी कहा था कि लोगों की फर्जी आईडी बनाकर ब्लैकमेलिंग करने और जबरन वसूली करने को लेकर फेसबुक कैसे एक्शन ले रही है, इस बारे में कोर्ट को जानकारी दी जाए।

‘वे अल्लाह को नहीं मानते, बुत पूजते हैं…हमें नफरत है उनसे’: पाकिस्तानी बच्चों ने उगला भारतीयों के लिए जहर, Video वायरल

भारत और पाकिस्तान के बीच आपसी संबंध कितने ही खराब क्यों न हों, एक भारतीय हमेशा शांति और चैन की ही बात करता है। हालाँकि, पाकिस्तान का हाल ऐसा नहीं है। वहाँ रहने वाले लोगों के दिमाग में भारत और हिंदुओं के खिलाफ जहर भरा हुआ है। आजकल सोशल मीडिया में एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें पाकिस्तानी ‘बच्चे’ भारत से नफरत और हिंदू धर्म का अपमान करते नजर आ रहे हैं।

वायरल वीडियो में, पाकिस्तानी यूट्यूबर सना अमजद वहाँ के बच्चों से भारत को लेकर सवाल पूछ रही हैं। इन सवालों के जवाब में पाकिस्तानी बच्चों के जवाब यह दर्शाते हैं कि भारत और हिंदुओं को लेकर उनके दिमाग में कितना कुछ भरा जा चुका है। सबसे बड़ी बात यह है कि ये बच्चे हर चीज के लिए इस्लाम की दुहाई दे रहे हैं।

यहाँ क्लिक कर आप वीडियो देख सकते हैं। इस वीडियो में 3.38 सेकेंड के स्लॉट के बाद पाकिस्तानी बच्चे हिंदू धर्म को अपमानित करते और भारत से अपनी नफरत जाहिर करते देखे जा सकते हैं।

वीडियो में देखा जा सकता है कि यूट्यूबर बच्चे से पूछ रही है कि इंडिया का नाम सुनते ही उसके दिमाग में सबसे पहले क्या आता है। इस पर वह कहता है “दुश्मनी, उनसे लड़ाई करें और गुस्सा आता है।” भारत से संबंधों के सुधार को लेकर बच्चे से सवाल पूछे कर जाने पर वह ‘नहीं’ का जवाब देता है और भारत से नफरत पर ‘हाँ’ कहता हुआ दिखाई देता है। एक अन्य बच्ची से सवाल पूछे जाने पर उसका जवाब भी यही है कि भारत का नाम सुनकर उसे गुस्सा आता है।

एक अन्य लड़के से भारत को लेकर यूट्यूबर द्वारा पूछे गए सवाल के जवाब में लड़का कहता है, भारतीयों में जहानत (समझदारी) की कमी है। इसके बाद यूट्यूबर उससे कहती है कि भारतीय तो बहुत आगे निकल गए हैं फिर उनमें समझदारी की कमी कैसे हुई। इस पर, लड़का जवाब देते हुए कहता है, “लिखा है कि इनको सब कुछ यहीं पर मिल जाना है और हमें ऊपर जाकर मिलना है।” उसके इस जवाब का सीधा मतलब यह था कि हिंदू अपने कर्म में विश्वास रखते हैं और उन्हें यहीं सब कुछ मिल जाना है। इसके ठीक विपरीत इस्लामवादियों के लिए 72 हूरों से लेकर जन्नत तक का हिसाब लिखा हुआ है।

इसके बाद, सना अमजद ने एक अन्य लड़के से वही पूछा, इस पर उसने कहा, “हमारे दिल में उनके लिए नफरत पैदा होती है।” लड़के ने इसका कारण बताते हुए आगे कहा, “हम तो अपने रब को रब मानते हैं और वो बुतों (मूर्तियों) को अपना रब मानते हैं।” पाकिस्तानी यूट्यूबर सना अमजद ने अपने अगले सवाल में उस लड़के से पूछा किसने बताया कि मजहब की वजह से नफरत कर सकते हैं। इस पर लड़का कहता है “इस्लाम ने बताया।”

सना अमजद आगे एक 10-12 साल की लड़की से भारत को लेकर पूछते हुए दिख रहीं हैं। सवाल के जवाब में लड़की कहती है, “पड़ोसी देश होने के कारण वह हमारा दुश्मन है। इस दुश्मनी की बड़ी वजह यह है कि वह (भारत) कश्मीर पर जुल्म करता है।” यूट्यूबर आगे पूछती हैं कि आपको ये सब किसने बताया? इस पर वह लड़की कहती है, “मैंने से सब किताबों में पढ़ा और सुना है। मैं कश्मीर होकर आई हूँ।” हालाँकि, यूट्यूबर के यह पूछे जाने पर कि क्या आपने वहाँ जुर्म होते देखा है। लड़की कहती है “नहीं, मैंने सिर्फ सुना है।”

वीडियो को थोड़ा आगे बढ़ाने पर, पाकिस्तानी यूट्यूबर दो लड़कों से बात करती नजर आती हैं। इन लड़कों से भी भारत को लेकर सवाल पूछने पर एक लड़का कहता है, “भारतीय दुश्मन हैं।” वहीं, दूसरा लड़का कहता है, “वे लड़ते हैं और बुरे हैं।” भारत को लेकर नफरत का कारण पूछने पर लड़का कहता है, “वे मुस्लिम नहीं हैं, वे अल्लाह को नहीं मानते और पत्थर को पूजते हैं।” पाकिस्तानी यूट्यूबर सना अमजद आगे पूछती हैं कि क्या मजहब को लेकर किसी से नफरत करना सही है? इस पर फिर लड़का कहता है, “हाँ।”

बता दें कि भारत देश और हिंदू धर्म से पाकिस्तान के कट्टरपंथियों की नफरत कई दफा वीडियोज में सामने आ चुकी है। कभी बच्चे लकड़ी की तलवार से काफिरों की मारने की बात करते हैं तो कई बार माता-पिता ही अपने बच्चों से ये कहलवाते दिखते हैं कि वो काफिरों को मारेगा।

गुजरात में BJP की प्रचंड लहर के बीच AAP को मिला 13 प्रतिशत वोट: कौन हैं वो लोग जिन्होंने अरविंद केजरीवाल को तरजीह दी? पढ़ें विश्लेषण

गुजरात विधानसभा चुनाव के नतीजे (Gujarat Assembly Election Result) 8 दिसंबर 2022 को घोषित हो गए। भारतीय जनता पार्टी (BJP) की जीत की भविष्यवाणी की जा रही थी और माहौल को देखते हुए यह लगभग तय था कि इस चुनाव में भी जीत रही है। हालाँकि, यह अनुमान नहीं था कि बीजेपी को इतना प्रचंड बहुमत और ऐसी ऐतिहासिक जीत मिलेगी, क्योंकि पार्टी ने 182 में से 156 सीटों पर जीत हासिल की है। दूसरी ओर कॉन्ग्रेस 77 से 17 सीटों पर फिसल गई है। आम आदमी पार्टी (AAP) के पास खोने के लिए कुछ नहीं था, लेकिन वह उस तरह का प्रदर्शन नहीं कर सकी, जैसा उसने प्रचार किया था। इस चुनाव में AAP को सिर्फ 5 सीटें मिली हैं।

हालाँकि, AAP के नेताओं ने अपने समर्थकों के लिए खुशी की वजह ढूंढ ली है और वजह है AAP का राष्ट्रीय पार्टी बन जाना। नियमों के मुताबिक, किसी पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी घोषित करने का एक मापदंड यह है कि उसे कम-से-कम चार राज्यों के विधानसभा चुनावों में 6 फीसदी से ज्यादा वोट हासिल करना होगा। जैसा कि AAP को 2020 में दिल्ली (54%), पंजाब (42%) और इस साल की शुरुआत में गोवा (6.8%) और अब गुजरात (12.9%) में 6% से अधिक वोट मिले हैं। इस तरह AAP ने राष्ट्रीय पार्टी के इस मानदंड को पूरा कर लिया है।

गुजरात में इस बार AAP को 5 सीटों पर जीत मिली है, जिनमें से 4 सौराष्ट्र और 1 मध्य गुजरात की सीटें हैं। बाकी सभी सीटों पर पार्टी ने चुनाव लड़ा और वे हार गए। 128 सीटों पर AAP के उम्मीदवार इतनी बुरी तरह हारे कि उनकी जमानत तक जब्त हो गई। पार्टी के बड़े चेहरे- इशुदान गढ़वी, गोपाल इटालिया, अल्पेश कथीरिया, धार्मिक मालवीय- भी नहीं जीत सके। हालाँकि, आम आदमी पार्टी को 12.92 फीसदी यानी करीब 13 फीसदी वोट मिले है। ऐसे में एक सवाल यह भी है कि ये वोटर कौन हैं?

AAP को किसका वोट मिला?

इस चुनाव में तीन तरह के वोटर थे। पहला, वे मतदाता जो भाजपा को वोट देते हैं और उम्मीदवार की परवाह किए बिना उसका समर्थन करते हैं। यह वर्ग भाजपा को ही वोट दिया। गुजरात में ऐसे मतदाताओं का एक बहुत बड़ा वर्ग है। दूसरा वर्ग है, जो कॉन्ग्रेस समर्थक मतदाता है। यह हर हालत में कॉन्ग्रेस को वोट देता है। हालाँकि ऐसे लोगों की संख्या धीरे-धीरे कम होती जा रही है। इन दोनों वर्गों से अलग मतदाताओं की एक तीसरी श्रेणी है, जो कई पहलुओं पर विचार कर मतदान करते हैं। इतना वोट शेयर हासिल करने में AAP को ऐसे वोटरों से काफी मदद मिली।

मुफ्त की रेवड़ी का असर गरीब लोगों पर पड़ा

आम आदमी पार्टी ने सोशल मीडिया पर हाइप क्रिएट किया, जिससे खासकर युवाओं पर कुछ असर पड़ा। इसके अलावा आम आदमी पार्टी ने भी तथाकथित युवा क्रांतिकारियों का हाथ थामा और इससे युवाओं का कुछ समर्थन भी मिला। इसलिए पहली बार के वोटरों और युवाओं के कुछ वोट आम आदमी पार्टी को मिल गए।

इसके अलावा आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल ने गुजरात का दौरा किया और मुफ्त योजनाओं का लाभ देने का खूब प्रचार किया। बिजली, पानी और सब कुछ मुफ्त करने की घोषणाओं के चलते गरीब और दूर-दराज के गाँवों में रहने वाले लोगों ने भरोसा कर लिया और उनमें से अधिकांश ने आम आदमी पार्टी को वोट किया।

वर्किंग क्लास के कुछ लोगों ने भी वोट किया

गुजरात में कर्मचारियों और वर्किंग क्लास का एक बड़ा तबका है, जो अपने ही कारणों से सरकार विरोधी है। इस वर्ग में सरकार विरोधी माहौल न केवल इस चुनाव में था, बल्कि उस समय भी था जब नरेंद्र मोदी राज्य के मुख्यमंत्री थे। हालाँकि, आबादी के अनुपात में वोटों की संख्या बेहद कम होने से सरकार को इसका कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन आम आदमी पार्टी को फर्क जरूर पड़ा। चुनाव से पहले चल रहे आंदोलनों की अगुआई AAP ने जिस तरह से की थी, उसे देखते हुए इस वर्ग के वोट मिलने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है।

AAP को मुस्लिम वर्ग का वोट मिला या नहीं?

आम आदमी पार्टी को मुस्लिम वोटरों का भी अच्छा सहयोग मिला है। मतदान से कुछ दिन पहले अहमदाबाद में ‘मुस्लिम फाइटर्स क्लब’ ने एक बैठक आयोजित की और आम आदमी पार्टी के समर्थन में वोट देने की अपील की थी, जो काफी सुर्खियों में भी रही। हालाँकि गुजरात के मुस्लिम मतदाता कॉन्ग्रेस समर्थक रहे हैं, लेकिन पार्टी की निष्क्रियता ने उन्हें AAP में स्थानांतरित कर दिया होगा। कई मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों में AIMIM की तुलना में AAP को अधिक वोट मिले। इससे पता चलता है कि पार्टी को अच्छी संख्या में मुस्लिम वोट मिले।

जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है, तीसरी श्रेणी के अधिकतर मतदाताओं ने भी भाजपा के काम को देखा और उसे वोट दिया। इसे परिणामों में देखा जा सकता है। बाकी सरकार से असंतुष्ट मतदाताओं के वोट तब आम आदमी पार्टी और कॉन्ग्रेस के बीच बँट गए। इसलिए कॉन्ग्रेस की निष्क्रियता का कुछ फायदा AAP को भी मिला और वह 13 फीसदी वोट शेयर पर पहुँच गई।

अब सवाल है कि आम आदमी पार्टी बड़ा अंतर क्यों नहीं ला पाई। इसकी वजह यह रही कि उसके वोट बँट गए। पार्टी को अधिक सीटें नहीं मिल सकीं, क्योंकि उसके पास पहले ही कम मतदाता थे और वे राज्य के अलग-अलग सीटों में बँटे हुए थे। कच्छ में बैठा व्यक्ति सोशल मीडिया पर किसी पोस्ट पर टिप्पणी कर सकता है और वलसाड में बैठा व्यक्ति भी उसी पोस्ट पर टिप्पणी कर सकता है, लेकिन एक भी सीट जीतने के लिए किसी पार्टी को एक जगह एक साथ केंद्रित वोटों की जरूरत होती है, जो AAP के पास नहीं था।

क्या AAP 2027 के विधानसभा चुनावों में बेहतर करेगी?

पहली बार 182 सीटों पर चुनाव लड़ने और 13 फीसदी वोट शेयर हासिल करने के बाद आम आदमी पार्टी के नेताओं और समर्थकों का दावा है कि पार्टी साल 2027 के विधानसभा चुनावों में अच्छा प्रदर्शन करेगी। हालाँकि, ऐसे दावे अत्यधिक आशावादी हैं, क्योंकि राजनीति में पाँच साल बहुत बड़ा कालखंड होता है।अगर भाजपा सरकार घोषणा पत्र के वादों पर टिकी रही और किसी विवाद में पड़े बिना सरकार चलती रही तो पाँच साल बाद वोट देने जाने वाला मतदाता दूसरा विकल्प क्यों चुने? तब तक बीजेपी को भी चुनाव में फायदा होने की स्थिति और भी मजबूत हो जाएगी।

दूसरी ओर आम आदमी पार्टी को अभी संगठन पर काफी मेहनत करनी है। इस चुनाव में निराशाजनक प्रदर्शन के बाद कार्यकर्ताओं का उत्साह कम हो सकता है और वे मेहनत से परहेज कर सतके हैं। संभावनाएँ बहुत हैं और पर्याप्त समय भी है, लेकिन इन नतीजों से एक बात बिल्कुल साफ हो गई है कि आम आदमी पार्टी और कॉन्ग्रेस में से विपक्ष कौन होगा, इस पर चर्चा हो सकती है। वर्तमान स्थिति में गुजरात से भाजपा को हटाना इन दोनों पार्टियों के लिए संभव नहीं दिखता।

‘यूट्यूब पर अश्लील AD देख भटका ध्यान, मुझे ₹75 लाख मुआवजा दिलाओ’: परीक्षा में फेल होने के बाद SC पहुँचा युवक, कोर्ट ने ठोका ₹25 हजार का जुर्माना

सुप्रीम कोर्ट में एक युवक ने याचिका दायर कर कहा था कि यूट्यूब (Youtube) में अश्लील विज्ञापन देखने के कारण उसका ध्यान भंग हुआ और इससे वह परीक्षा में फेल हो गया। याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में यूट्यूब से 75 लाख रुपए के मुआवजे की भी माँग की थी। हालाँकि, कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए उस पर 25 हजार रुपए का जुर्माना लगाया। याचिकाकर्ता की पहचान, आनंद किशोर चौधरी निवासी मध्य प्रदेश के रूप में हुई है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सजंय किशन कौल और जस्टिस अभय एस. ओक की बेंच ने शुक्रवार (9 दिसंबर 2022) को हुई सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता को फटकार लगाते हुए कहा, “यह अनुच्छेद 32 के तहत दायर की गई अब तक की सबसे ‘खराब’ याचिकाओं में से एक है।”

जस्टिस कौल ने याचिकाकर्ता से यह भी पूछा, “आपको किस बात का मुआवजा चाहिए। आप इंटरनेट देखते हैं इसलिए या फिर इंटरनेट देखने की वजह से एग्जाम नहीं पास कर पाए, इसलिए मुआवजा चाहिए? क्योंकि विज्ञापन में सेक्सुअल कंटेंट था, इसलिए आप अदालत से मुआवजा लेने पहुँच गए। ये तो आपकी मर्जी है कि आप विज्ञापन देखें।”

सुनवाई के दौरान जस्टिस कौल ने कहा, “विज्ञापन में यौन सामग्री था, इससे आपकी अटेंशन डायवर्ट हो गई इसलिए आप कोर्ट में बोल रहे हैं मुआवजा दे दो।” कोर्ट ने कहा, “आपको विज्ञापन नहीं देखना है तो ना देखें इस तरह की याचिका को दायर करना अदालत के कीमती वक्त को बर्बाद करने जैसा है। अब आपको अपने आचरण के कारण जुर्माना भरना होगा।”

याचिकायकर्ता को फटकारते हुए कोर्ट ने उस पर 1 लाख का जुर्माना लगाया। हालाँकि 1 लाख रुपए के जुर्माने की बात सुनने के बाद याचिकाकर्ता ने प्रार्थना करते हुए कहा, “न्यायधीश महोदय मेरे माता-पिता मजदूरी करते हैं, मुझे माफ कर दीजिए।” इस पर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस कौल ने कहा, “आप को लगता है कि प्रचार के लिए जब चाहें इधर आ सकते हैं। जुर्माना कम कर दूँगा, लेकिन माफ नहीं करूँगा।” इसके बाद उन्होंने, जुर्माने की राशि घटाकर 25000 रुपए करने का आदेश जारी कर दिया।

याचिकाकर्ता ने बेंच से कहा, “मेरे पास रोजगार नहीं है, मैं जुर्माना नहीं दे पाऊँगा।” तब, जस्टिस कौल ने कहा, “रोजगार नहीं हैं तो हम रिकवरी करेंगे, और क्या।”

दरअसल, याचिकाकर्ता आनंद किशोर चौधरी ने सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 19 (2) के तहत याचिका दाखिल कर कहा था कि यूटयूब पर अश्लील विज्ञापन के चलते उसका ध्यान भंग हुआ और वह मध्य प्रदेश पुलिस में भर्ती की परीक्षा पास नहीं कर पाया। इसके एवज में उसे यूट्यूब द्वारा 75 लाख का मुआवजा दिया जाना चाहिए। इतना ही नहीं, सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में युवक ने सोशल मीडिया पर ऐसे विज्ञापनों (अश्लीलता) पर रोक लगाने की भी माँग की थी।

‘कांतारा फिल्म देखकर हिंदू संस्कृति का समर्थन कर रहे हो’: कर्नाटक में मूवी देखने गए मुस्लिम स्टूडेंट कपल से मारपीट, बिना फिल्म देखे भगाया, मामला दर्ज

कर्नाटक (Karnataka) में सुपरहिट मूवी कांतारा (Kantara) देखने गए एक मुस्लिम युवक को उसके ही समुदाय के कुछ लोगों ने रोक लिया। जब युवक ने विरोध किया तो उसके साथ मारपीट की गई। इसका एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। इस मामले में पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई है।

मामला कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ जिले के सुलिया शहर का है। पुत्तुर स्थित संतोष सिनेमा हॉल में बुधवार (7 दिसंबर 2022) को मोहम्मद इम्तियाज ऋषभ शेट्टी की सुपरहिट मूवी कांतारा देखने के लिए गया था। उसके साथ एक लड़की भी थी। इसी दौरान उसे मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों ने उसे रोक दिया और फिर उसके साथ मारपीट की।

सामने आए वीडियो में ग्रुप के लोग इम्तियाज के साथ बहस करते दिख रहे हैं। वहीं, कुछ लोग उसके साथ गई लड़की के साथ बहस कर रहे थे। मामला जब बढ़ गया तो संतोष सिनेमा हॉल के मालिक ने इसकी शिकायत पुलिस में की। वहीं, एक अन्य रिपोर्ट में कहा गया है कि वीडियो वायरल होने के बाद पुलिस ने संज्ञान लिया और कपल को शिकायत दर्ज कराने के लिए मनाया।

प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि लड़का और लड़की विद्यार्थी थे और केरल के कॉलेज केवीजी संस्थान में पढ़ाई कर रहे हैं। दोनों संतोष थिएटर में फिल्म देखने के लिए आए थे। लड़की को हिजाब में देखकर पास के ही एक दुकानदार ने मुस्लिम युवक को रोका। इसके बाद कई लोग आ गए और दोनों को फिल्म देखने के लिए पूछताछ की।

पुलिस में दी गई शिकायत के अनुसार, हमलावरों ने कहा कि वे फिल्म देखकर हिंदू संस्कृति का समर्थन कर रहे हैं। इस घटना और विवाद के बाद दोनों कपल बिना फिल्म देखे ही थिएटर से वापस लौट आए। पीड़ित युवक बंटवाल तालुक के बी मुडा गाँव का रहने वाला है।

सुलिया पुलिस स्टेशन के सब-इंस्पेक्टर के अनुसार, “हमें सोशल मीडिया के माध्यम से घटना की जानकारी मिली है। दंपति ने शिकायत दर्ज नहीं की, लेकिन हमने उन्हें ट्रैक किया और शिकायत दर्ज करने के लिए कहा। उनकी शिकायत के आधार पर हमने एक प्राथमिकी दर्ज की है और हम संदिग्ध की तलाश कर रहे हैं।”

पुलिस ने आरोपितों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 341, 323 (हमला), 504 (जानबूझकर अपमान) और 506 (आपराधिक धमकी) के तहत मामला दर्ज किया है।

‘मेरे 4 बच्चे नहीं होते अगर कॉन्ग्रेस बिल ले आती…’ : जनसंख्या नियंत्रण पर बोले रवि किशन, कहा- अब सॉरी फील करता हूँ

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के गोरखपुर से सांसद रवि किशन ने जनसंख्या नियंत्रण कानून के संबंध में बड़ा ही रोचक बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि अगर कॉन्ग्रेस पहले जनसंख्या नियंत्रण बिल लेकर आई होती तो वह चार बच्चे नहीं करते। उन्होंने कहा की कॉन्ग्रेस ने देश पर लंबे समय तक शासन किया। इस दौरान पार्टी को इसे लेकर जागरूकता फैलानी चाहिए थी।

रवि किशन ने कहा, “मैं इस कार्यक्रम से निकलकर सीधा पार्लियामेंट में बिल पेश करने जा रहा हूँ।” आजतक के एक कार्यक्रम में रवि किशन से जब यह पूछा जाता है कि उनके चार बच्चे हैं और वह इसे कैसे डिफेंड करेंगे, वीडियो के 20:00 मिनट में उन्हें कहते सुना जा सकता है, ”मेरे चार बच्चे हैं और मैंने उनकी परवरिश की है। उनके परवरिश के टाइम मैंने काफी स्ट्रगल किया। मेरी पत्नी लंबी और छरहरी थी। हर बच्चे के डिलीवरी के बाद वाइफ के शरीर को बिगड़ते हुए देखा। अब जब मैं उनको देखता हूँ तो सॉरी फील करता हूँ।”

इसके बाद एंकर चित्रा त्रिपाठी पूछती हैं कि चाहे जो कुछ भी हो, अब लोग तो यही बोलेंगे कि अपना तो कर लिए और दूसरे को रोक रहे हैं, इसपर रवि किशन कहते हैं, “मेरे 4 बच्चे हैं, ये कोई गलती नहीं है, अगर कॉन्ग्रेस ये बिल लेकर आती, अगर कानून बना होता, तो हम 4 बच्चे नहीं करते। इसके लिए कॉन्ग्रेस दोषी है। उनकी सरकार थी, हम जागरूक नहीं थे। उन्हें इस मामले में गंभीर होना चाहिए था।”

रवि किशन ने आगे कहा, “चीन और अन्य देशों ने जनसंख्या पर नियंत्रण किया। चीजों को सही किया। अगर हम अपने देश के संदर्भ में बात करें तो इस देश को चलाना बड़ी बात है। अगर कॉन्ग्रेस ने आने वाली पीढ़ियों को लेकर सोचा होता, तो हमें जो स्ट्रगल नहीं करना पड़ रहा है वह नहीं करना पड़ता।” उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ़ करते हुए कहा कि देश की आबादी 135 करोड़ है और प्रधानमंत्री जी 80 करोड़ की आबादी को कोविड के बाद मुफ्त में अनाज दे रहे हैं। इसके आलावा भी कई सारी योजनाओं से लोगों को लाभ पहुँचाया जा रहा है।

उन्होंने कहा, “अब चीजें सही हो रही हैं। देश में फाइटर हेलिकॉप्टर बन रहा है। सर्जिकल स्ट्राइक किया जा रहा है। हम आईएनएस विक्रांत बना रहे हैं। जीडीपी में हमने ब्रिटेन को पीछे छोड़ दिया है। कोरिडोर भी बन रहा है तो एम्स भी बन रहा है। प्रभु राम का मंदिर भी बन रहा है तो सड़कें भी बन रही हैं।” इसी बीच जब वहाँ बैठे दिल्ली के सांसद मनोज तिवारी ने जब रवि किशन के चार बच्चे होने को गलती बताया तो रवि किशन ने फिर कहा यह गलती नहीं है। इसको गलती नहीं कह सकते हैं। कॉन्ग्रेस अगर बिल लाती तो ऐसा होता ही नहीं।

कोर्ट में ‘तारीख-पे-तारीख’ का कारण वकीलों की हड़ताल: सुप्रीम/हाई कोर्ट भी नहीं ले पाते कड़े फैसले… सलमान खुर्शीद ने ‘खुल के’ में बताई वजह

‘दामिनी’ फिल्म का प्रसिद्ध डायलॉग ‘तारीख-पे-तारीख’ आज के दौर में अदालत की सच्चाई है। भारत की अदालतों में वकीलों ने हड़ताल-पे-हड़ताल करके न्याय प्रणाली को बाधित करने का काम किया है। यह देश में पाँच करोड़ लंबित मामलों में ‘तारीख-पे-तारीख’ के प्रमुख कारणों में से एक है।

वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद ने मॉडरेटर मनोज रघुवंशी के साथ वकीलों की हड़ताल के जटिल मुद्दे का समाधान खोजने के लिए रविवार (4 दिसंबर 2022) को ‘खुल के’ मंच पर ऑनलाइन राउंडटेबल चर्चा की।

सुप्रीम कोर्ट ने हालाँकि बार-बार कहा है कि वकील हड़ताल पर नहीं जा सकते हैं, लेकिन ये निर्देश ‘हड़तालों’ को रोकने में सफल नहीं हो रहे। यह न्याय में देरी के शिकार करोड़ों निर्दोष भारतीयों के लिए एक अभिशाप की तरह है। इस राउंडटेबल चर्चा से ठीक दस दिन पहले गुजरात, तेलंगाना और उत्तराखंड में वकीलों ने काम करना बंद कर दिया था।

सलमान खुर्शीद को यह बताया गया कि उत्तराखंड के तीन जिलों में मौजूद अदालतों में वकील बीते 35 साल से हर शनिवार हड़ताल कर रहे हैं। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने इन हड़तालों को अवैध करार दिया था।

यह मामला जब सुप्रीम कोर्ट के सामने आया था तो कोर्ट ने काफी सख्त टिप्पणी की थी। कई बार नेपाल में भूकंप, पाकिस्तान के एक स्कूल में बम विस्फोट, श्रीलंका के संविधान में संशोधन जैसे ‘मामूली’ वजहों से हड़ताल किए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इसे ‘मजाक’ करार दिया था और उच्च न्यायालय के फैसले की पुष्टि की थी।

वकीलों की हड़ताल पर ‘खुल के’ चर्चा

सलमान खुर्शीद ने खेद व्यक्त करते हुए बताया कि कभी-कभी हड़तालें हिंसक हो जाती हैं, जिसमें काम करने वाले बार के सदस्य के साथ ‘क्रूरता’ की जाती है। राउंडटेबल चर्चा में अधिवक्ता ने खुलासा किया कि कोर्ट द्वारा कई बार यह सिफारिश की गई है कि बार एसोसिएशन में एक शिकायत समिति होनी चाहिए, जो हड़ताल करने के लिए बार एसोसिएशन के हर प्रस्ताव की जाँच करे और उसे मंजूरी दे।

आश्चर्य जताते हुए अधिवक्ता ने सवालिया लहजे में बात आगे बढ़ाई कि क्या ये हड़ताल इसलिए किए जाते हैं क्योंकि ‘कुछ सहयोगी’ काम नहीं करना चाहते हैं और सिर्फ ‘बहाने ढूंढते हैं’। सलमान खुर्शीद ने खुलासा किया कि यह सुनिश्चित करने के लिए कोई सिस्टम नहीं बनाया गया है कि ये हड़ताल न हो।

सलमान खुर्शीद ने कहा कि हालाँकि उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय ने कुछ वकीलों को इस संबंध में ‘अवमानना’ के लिए जेल भी भेजा है, लेकिन जब इसमें सैकड़ों या हजारों वकील शामिल होते हैं तो न्यायाधीशों के लिए स्थिति से निपटना मुश्किल हो जाता है। पैनलिस्ट ने जोर देकर कहा कि अदालतें अवमानना के लिए 5000 वकीलों को जेल नहीं भेज सकती हैं।

सलमान खुर्शीद ने स्पष्ट किया कि ‘कानूनी संस्कृति’ के तहत वकील ‘काली पट्टी’ बाँधकर अपना विरोध जता सकते हैं या एक घंटे ‘देर’ से काम शुरू कर सकते हैं, लेकिन प्रयास यह होना चाहिए कि ‘महत्वपूर्ण मामले’ प्रभावित न हों।

राउंडटेबल चर्चा में सलमान खुर्शीद ने भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ के शब्दों को दोहराया, जिसमें उन्होंने कहा था कि इन हड़तालों के वास्तविक शिकार न तो न्यायाधीश हैं, न ही वकील हैं, बल्कि निर्दोष ‘मुवक्किल’ हैं जो अक्सर बेहद गरीब होते हैं। खुर्शीद ने कहा कि निर्दोष लोगों के अलावा ‘न्याय की व्यवस्था भी शिकार’ हो जाती है।

‘खुल के‘ राउंडटेबल चर्चा के दौरान हड़तालों की उलझन को सुलझाने के मामले पर सलमान खुर्शीद को एक सुझाव जानदार लगा। हड़ताल के लिए सैकड़ों या हजारों वकीलों को जिम्मेदार ठहरा पाने में सुप्रीम कोर्ट की दिक्कत का समाधान है – केवल दो व्यक्तियों को जिम्मेदार ठहरा कर। ये दो होंगे – वो बार मेंबर जिसने हड़ताल के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किया और वो ‘रीडर’ या जिला न्यायाधीश का ‘पेशकार’ जिसने इस प्रस्ताव को ‘स्वीकार’ किया। इस सुझाव पर सलमान मान गए, लेकिन तुरंत एक शर्त जोड़ दी कि चीजें हमेशा ब्लैक एंड व्हाइट नहीं होतीं। कभी-कभी चीजें ‘धुंधली’ होती हैं।

सलमान खुर्शीद ने चर्चा का समापन यह सुझाव देकर किया कि ‘तारीख-पे-तारीख’ कार्यक्रम में उठाए गए इन सभी ‘मुद्दों’ की एक समिति द्वारा पूरी तरह से जाँच की जानी चाहिए। इसमें पुराने न्यायाधीश, नए न्यायाधीश, वकील और ‘आप लोग (‘खुल के’ के दर्शक) मिलकर एक समाधान खोजिए ।

‘1 साल में 87 लोगों की भर्ती, 20 का AAP से संबंध’ : DCW में अवैध नियुक्तियों को लेकर स्वाति मालीवाल पर शिकंजा कसा, दिल्ली कोर्ट ने आरोप तय करने का दिया आदेश

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की करीबी और दिल्ली महिला आयोग (DCW) की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल की मुश्किलें बढ़ती दिख रहीं हैं। दिल्ली की एक अदालत ने दिल्ली महिला आयोग में नियुक्तियों में हुई अनियमितता के एक मामले में स्वाति मालीवाल समेत चार अन्य लोगों पर आरोप तय करने के आदेश दिए हैं।

कोर्ट ने क्या कहा

रिपोर्ट्स के अनुसार, गुरुवार (8 दिसंबर 2022) को हुई सुनवाई में दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट के स्पेशल जस्टिस दिगविनय सिंह ने कहा है कि दिल्ली महिला आयोग में नियुक्तियाँ 6 अगस्त 2015 से लेकर 1 अगस्त, 2016 के बीच की गईं थी। स्वाति मालीवाल व अन्य आरोपितों पर पद के दुरुपयोग का शक काफी मजबूत है। साथ ही, प्रथम दृष्टया उनके खिलाफ आरोप तय करने के लिए पर्याप्त सामग्री भी उपलब्ध है।

भ्रष्टाचार और नियुक्तियों में अनियमितता को लेकर कोर्ट ने कहा है कि महिला आयोग द्वारा अलग-अलग डेट्स पर बैठकें की गईं थीं। कोर्ट में पेश किए मीटिंग से जुड़े दस्तावेज, ‘मिनट्स ऑफ मीटिंग्स’ पर चारों आरोपितों के साइन थे। इसलिए, प्रथम दृष्टया यह संदेह होता है कि ये सभी नियुक्तियाँ इन्हीं आरोपितों द्वारा की गई थीं। कोर्ट ने यह भी कहा है कि किसी भी आरोपित ने ‘अवैध नियुक्तियों’ पर न तो आपत्ति दर्ज की और ना ही असहमति दिखाई बल्कि महिला आयोग की बैठकों में नियुक्ति को लेकर सर्वसम्मति से निर्णय लिए गए थे।

यही नहीं कोर्ट ने, स्वाति मालीवाल के अलावा महिला आयोग की तत्कालीन सदस्य प्रोमिला गुप्ता, सारिका चौधरी और फरहीन मलिक पर आईपीसी की धारा 120 (बी) और भ्रष्टाचार निरोधक कानून की धारा 13 (2), 13(1)(डी) के तहत आरोप तय करने के आदेश दिए हैं।

कोर्ट ने यह भी कहा है कि महिला आयोग दिल्ली सरकार से रिक्त पदों पर नियुक्ति करने के लिए कह रहा था। लेकिन, दिल्ली सरकार ने समय पर नियुक्तियाँ नहीं कीं। इसका मतलब यह नहीं है कि महिला आयोग के पास मनमानी ढंग से नियुक्ति करने का अधिकार मिल गया था।

कोर्ट ने आगे कहा है, “प्रस्तुत तथ्य एक मजबूत संदेह पैदा करते हैं कि आरोपितों के कार्यकाल के दौरान विभिन्न पदों पर भर्ती मनमाने ढंग से की गई थी। इसमें, सभी नियमों और विनियमों का उल्लंघन किया गया था जिसमें करीबी और प्रियजनों को नियुक्त करते हुए सरकारी खजाने से वेतन दिया गया था।”

जस्टिस दिग विनय सिंह ने यह भी कहा है, “प्रथम दृष्टया यह स्पष्ट हो रहा है कि महिला आयोग में की गईं अधिकांश नियुक्तियाँ आरोपित व्यक्तियों/ आम आदमी पार्टी के करीबी और प्रिय लोगों को दी गई थीं। इस प्रकार, आरोपित व्यक्तियों द्वारा यह दावा नहीं किया जा सकता है कि उन्होंने अपने पद का गलत इस्तेमाल कर आर्थिक लाभ नहीं लिया, या ऐसा करने (नियुक्ति करने) के पीछे कोई गलत इरादा नहीं था।”

अगर ये मान लिया जाए कि दिल्ली महिला आयोग (DCW) एक स्वायत्त संस्था है और पद भी उसी ने बनाया है, या नियुक्ति की प्रक्रिया और शर्तें भी उसी ने बनाई हैं, तब भी प्रथम दृष्टया उन पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13 (1) (डी) के तहत केस बनता है। चूँकि, आरोपितों ने सरकार से पैसा लिया है इसलिए उनके खिलाफ केस चलाया जा रहा है।”

कोर्ट ने ‘अवैध’ नियुक्तियों पर जोर देते हए कहा है, “दिल्ली महिला आयोग में न तो मनमाने ढंग से पद बनाए जा सकते और ना ही अपने करीबियों के लिए नियमों का उल्लंघन किया जा सकता है। अपने लोगों के हितों को तरजीह और भाई-भतीजावाद भी एक तरह का भ्रष्टाचार है।”

भ्रष्टाचार और नियुक्तियों में अनियमितता को लेकर कोर्ट ने कहा है कि महिला आयोग द्वारा अलग-अलग डेट्स पर बैठकें की गईं थीं। कोर्ट में पेश किए मीटिंग से जुड़े दस्तावेज, ‘मिनट्स ऑफ मीटिंग्स’ पर चारों आरोपितों के साइन थे। इसलिए, प्रथम दृष्टया यह संदेह होता है कि ये सभी नियुक्तियाँ इन्हीं आरोपितों द्वारा की गई थीं। कोर्ट ने यह भी कहा है कि किसी भी आरोपित ने ‘अवैध नियुक्तियों’ पर न तो आपत्ति दर्ज की और ना ही असहमति दिखाई बल्कि महिला आयोग की बैठकों में नियुक्ति को लेकर सर्वसम्मति से निर्णय लिए गए थे।

स्वाति मालीवाल व अन्य पर क्या हैं आरोप

इस मामले में दिल्ली महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष और भारतीय जनता पार्टी की विधायक बरखा शुक्ला सिंह की शिकायत के बाद एंटी करप्शन ब्यूरो ने एफआईआर दर्ज की थी। बरखा शुक्ला ने आरोप लगाए थे कि स्वाति मालीवाल ने नियमित प्रक्रिया की अनदेखी कर AAP कार्यकर्ताओं और करीबी लोगों को दिल्ली महिला आयोग में अलग-अलग पदों पर नियुक्तियाँ की थीं। महिला आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों के इस फैसले से वे लोग नौकरी से वंचित हो गए थे जो इसके हकदार थे।

FIR के अनुसार, दिल्ली महिला आयोग में 6 अगस्त, 2015 से 1 अगस्त, 2016 के बीच 90 नियुक्तियाँ की गईं थीं। इनमें से 71 लोगों को अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) के आधार पर नियुक्त किया गया था। वहीं, 16 को ‘डायल 181’ संकट हेल्पलाइन के लिए नियुक्त किया गया। यही नहीं, इस मामले में शेष तीन लोगों की नियुक्तियों का कोई रिकॉर्ड प्राप्त नहीं हुआ।

आरोपों के बाद जाँच में क्या हुआ

बरखा शुक्ला सिंह की शिकायत के बाद दर्ज हुई एफआईआर के आधार पर एंटी करप्शन ब्यूरो ने जाँच शुरू की। इस जाँच में एसीबी ने पाया कि 27 जुलाई 2015 को स्वाति मालीवाल को दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष नियुक्त करने के साथ प्रोमिला गुप्ता, सारिका चौधरी और फरहीन मलिक को सदस्य बनाया गया था।

इस दौरान, 6 अगस्त 2015 से 1 अगस्त 2016 के बीच इनके कार्यकाल में आयोग में 26 स्वीकृत पदों की जगह 87 लोगों की नियुक्ति की गई। यही नहीं, इस जाँच में यह भी पाया गया था कि नियुक्त किए गए 87 व्यक्तियों में से कम से कम 20 लोग सीधे आप से जुड़े हुए थे।

इस जाँच के दौरान, एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) ने यह दावा भी किया था कि ये नियुक्तियाँ चयन प्रक्रिया और नियमों के विरुद्ध थीं। इसमें सामान्य वित्त नियम (GFR) का भी उल्लंघन किया गया था। अप्रैल 2016 में सदस्य सचिव की नियुक्ति उप राज्यपाल की अनुमति के बिना की गई थी। यही नहीं, महिला आयोग को 676 लाख रुपए किश्तों में जारी करने के बजाय एक मुश्त राशि जारी की गई थी।

स्वाति मालीवाल समेत प्रोमिला गुप्ता, सारिका चौधरी और फरहीन मलिक को आरोपित बनाते हुए दाखिल किए गए आरोप पत्र में कहा गया है कि दिल्ली महिला आयोग ने स्टाफ की संख्या बढ़ाने के लिए महिला एवं बाल विकास विभाग से अनुमति नहीं ली थी।

एंटी करप्शन ब्यूरो द्वारा की गई जाँच के दौरान महिला आयोग की ओर से जवाब दिया गया था कि नियुक्तियों के लिए इंटरव्यू लिए गए थे, लेकिन इसको लेकर महिला आयोग किसी प्रकार के दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सका। आरोप पत्र में यह भी कहा गया है कि नियुक्ति के बाद वेतन नियमों में उल्लंघन करते हुए दो लोगों का वेतन कुछ ही समय में दोगुना कर दिया गया था।

स्वाति मालीवाल और अरविंद केजरीवाल के बीच संबंध

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल के बीच संबंधों को लेकर सोशल मीडिया से लेकर मीडिया तक में चर्चा होती रही है। महिला आयोग में स्वाति मालीवाल की नियुक्ति के बाद कई बार उन्हें केजरीवाल की बहन तक कहा गया है। हालाँकि, दोनों ही आपसी संबंधों की किसी बात से इनकार करते रहे हैं।

हालाँकि, दोनों के बीच के संबंध कैसे हैं इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि स्वाति मालीवाल केजरीवाल के एनजीओ ‘परिवर्तन’ से जुड़ी रहीं हैं। इसके अलावा, दिल्ली की सत्ता संभालने के बाद केजरीवाल ने उन्हें अपना सलाहकार भी नियुक्त था। इस दौरान स्वाति की सैलरी को लेकर भी काफी बवाल हुआ था। दरअसल, अरविंद केजरीवाल ने उन्हें 1.5 लाख (डेढ़ लाख रुपए) रुपए की सैलरी दे रहे थे।

यही नहीं, जब दिल्ली महिला आयोग में स्वाति मालीवाल को अध्यक्ष बनाया गया था, तब वह आम आदमी पार्टी के नेता नवीन जयहिंद की पत्नी थीं। हालाँकि, दोनों के बीच अब तलाक हो चुका है। नवीन जयहिंद आम आदमी पार्टी हरियाणा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष हैं और उन्हें केजरीवाल का करीबी माना जाता है।