Thursday, July 25, 2024
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कॉलेजियम की बैठक में क्या चर्चा हुई? सुप्रीम कोर्ट ने RTI के तहत जानकारी देने से किया इनकार, कहा – इसे सार्वजनिक नहीं कर सकते: केंद्र को भी चेताया

बता दें कि कॉलेजियम प्रणाली को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। जजों की नियुक्ति में भाई-भतीजावाद एवं जातिवाद को न्यायपालिका में 'अंकल कल्चर' कहा जाता है। कुछ तबका इसे खत्म करने की माँग करता है। वहीं, कुछ तबका इसे सही बताता है, लेकिन साथ में इसे पारदर्शी बनाने की वकालत करता है।

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) का स्वघोषित कॉलेजियम सिस्टम (Collegium) पर केंद्र की मोदी सरकार (Modi Government) के साथ तकरार बढ़ रही है तो दूसरी तरफ वह इस सिस्टम को पारदर्शी बनने भी नहीं देना चाहता है। सुप्रीम कोर्ट ने कॉलेजियम सिस्टम के कामकाज और तौर-तरीकों की जानकारी देने से स्पष्ट मना कर दिया और कहा कि इसे सार्वजनिक नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस एमआर शाह और सीटी रविकुमार की पीठ ने कहा कि सूचना के अधिकार (RTI) कानून के तहत केवल अंतिम फैसले ही सार्वजनिक किए जा सकते हैं, न कि कॉलेजियम की बैठकों की चर्चा और जजों की नियुक्ति से संबंधित प्रक्रिया। इस मामले को लेकर दायर याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (9 दिसंबर 2022) को खारिज कर दिया।

पीठ ने कहा, “अंतिम प्रस्ताव तैयार होने और कॉलेजियम के सदस्यों द्वारा हस्ताक्षर किए जाने के बाद ही, नियत प्रक्रिया और चर्चा/विचार-विमर्श और परामर्श की प्रक्रिया को पूरा करने के बाद होता है, उसे दिनांक 3 अक्टूबर, 2017 के प्रस्ताव के अनुसार सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर प्रकाशित करने की जरूरत होती है।”

दरअसल, अंजलि नाम की एक ऐक्टिविस्ट ने याचिका दायर कर 2018 की कॉलेजियम की बैठक के विवरण का खुलासा करने का निर्देश देने की माँग की थी। इस बैठक हाईकोर्ट के दो मुख्य न्यायाधीशों को शीर्ष अदालत में पदोन्नत करने का निर्णय लिया गया था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि कॉलेजियम के सिर्फ निर्णय बताए जा सकते हैं, उसमें की गई चर्चा नहीं।

याचिकाकर्ता के वकील प्रशांत भूषण ने कोर्ट में तर्क दिया कि जनता में विश्वास पैदा करने के लिए हाईकोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्ति पारदर्शी तरीके से की जानी चाहिए। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कॉलेजियम प्रणाली के भीतर चर्चा को RTI के माध्यम से सार्वजनिक डोमेन में नहीं रखा जा सकता है, क्योंकि वे अंतिम निर्णय के चरित्र को नहीं मानते।

न्यायमूर्ति शाह ने कहा, “कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया था, जिसकी परिणति कॉलेजियम के सभी सदस्यों द्वारा तैयार और हस्ताक्षरित एक अंतिम प्रस्ताव के रूप में हुई थी और उसे सार्वजनिक डोमेन में प्रकट करने की जरूरत नहीं थी और वह भी आरटीआई अधिनियम के तहत सार्वजनिक डोमेन में बिल्कुल नहीं।”

बता दें कि कॉलेजियम सिस्टम को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को भी धमकी दे दी। कोर्ट ने कहा कि कॉलेजियम सिस्टम पर बयान देने से केंद्र अपने मंत्रियों को रोकें। बता दें कि कानून किरेन रिजिजू कॉलेजियम सिस्टम पर लगातार सवाल उठाते रहे हैं और उसे एलियन प्रणाली बताते रहे है।

वहीं, उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने भी कॉलेजियम को लेकर कहा था कि दुनिया में सिर्फ भारत ही ऐसा देश है, जहाँ जज ही जज को चुनते और नियुक्त करते हैं। इसमें पारदर्शिता की भी घोर कमी है। सुप्रीम कोर्ट सरकार के इन बयानों से भड़क गया।

कोर्ट ने कहा था कि जब तक कॉलेजियम सिस्टम है, उसे सरकार को मानना पड़ेगा। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा था कि अगर उसे कॉलेजियम के खिलाफ कोई कानून पास करना है तो करे, लेकिन उसकी न्यायिक समीक्षा का अधिकार उसके पास है। उल्लेखनीय है कि मोदी सरकार ने कॉलेजियम प्रणाली की जगह एक नया कानून बनाया था, जिसे न्यायिक समीक्षा का आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था।

बता दें कि कॉलेजियम प्रणाली को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। जजों की नियुक्ति में भाई-भतीजावाद एवं जातिवाद को न्यायपालिका में ‘अंकल कल्चर’ कहा जाता है। कुछ तबका इसे खत्म करने की माँग करता है। वहीं, कुछ तबका इसे सही बताता है, लेकिन साथ में इसे पारदर्शी बनाने की वकालत करता है।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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