Home Blog Page 2465

NDTV में अडानी ने खरीदी 29.18% हिस्सेदारी, कहा – अब ये लोगों तक पहुँचाएगा हमारा विजन

एएमजी मीडिया नेटवर्क लिमिटेड (AMNL) ने NDTV में अप्रत्यक्ष रूप से 29.18% शेयर्स खरीदे हैं। ये सौदा ‘विश्वप्रधान कमर्शियल प्राइवेट लिमिटेड (VCPL)’ और ‘RRPR होल्डिंग प्राइवेट लिमिटेड’ के जरिए हुआ है। जहाँ VCPL पूरी तरह से AMNL की 100% सब्सिडियरी कंपनी है, वहीं RRPR एनडीटीवी की प्रमोटर कंपनी में। इस कंपनी में AMGNL ने 99.5% इक्विटी ख़रीदने का निर्णय लिया है। NDTV के पास 3 राष्ट्रीय चैनल हैं।

अडानी समूह ने एक प्रेस रिलीज के जरिए इसकी जानकारी दी है। इस अधिग्रहण के बाद RRPR का नियंत्रण पूरी तरह VCPL के पास आ जाएगा। इस कंपनी के पास NDTV में 29.18% शेयर्स हैं। इसके अलावा AMNL और AEL एक ओपन ऑफर भी लॉन्च करेंगे, जिसके तहत NDTV में 26% स्टेक्स उनके पास होंगे। कंपनी ने बताया है कि अधिग्रहण को लेकर नियामक संस्था SEBI द्वारा बनाए गए कानून के तहत ऐसा हो रहा है।

अडानी समूह ने अपनी प्रेस रिलीज में NDTV को एक प्रमुख मीडिया हाउस बताते हुए कहा है कि इसके पास 3 दशकों से विश्वसनीय ख़बरें देने का अनुभव है। इसके पास NDTV 24×7, NDTV India और NDTV प्रॉफिट नाम के 3 न्यूज़ चैनल हैं। अडानी समूह ने कहा कि NDTV की ऑनलाइन उपस्थिति भी दमदार है, जहाँ वो विभिन्न प्लेटफॉर्म्स पर 3.5 करोड़ फॉलोवर्स के साथ सबसे ज्यादा फॉलो किए जाने वाले चैनलों में से एक है।

NDTV में स्टेक खरीदने के बाद अडानी की प्रेस रिलीज

AMNL सभी प्लेटफॉर्म्स ‘न्यू एज मीडिया’ की स्थापना का लक्ष्य लेकर चल रहा है और इसके CEO संजय पुगलिया का कहना है कि इस दिशा में ये एक महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने कहा कि कंपनी भारतीय नागरिकों को और जो भारत में रुचि रखते हैं उन्हें सशक्त करना चाहती है। उन्होंने कहा कि हमारे विजन को लोगों तक पहुँचाने के लिए NDTV एक अच्छा माध्यम है। कंपनी ने NDTV की न्यूज़ डिलीवरी और लीडरशिप को मजबूत करने की बात भी कही है

मजहब के हिसाब से नहीं ढलता बदन, फिर पीरियड आते ही निकाह कबूल कैसे: दूध पीती बच्ची से ‘कामुक हरकत (लिंग प्रवेश नहीं) जायज’ वाली सोच से कब लड़ेंगे मुस्लिम

भारत में लड़कियों के विवाह की न्यूनतम आयु 18 वर्ष कानून से तय है। लेकिन बात जब मुस्लिम लड़कयों की होती है तो अदालतों के हाथ इस्लामी कानून के कारण बंध जाते हैं। हाल में दिल्ली हाईकोर्ट ने एक आदेश में 15 साल की लड़की निकाह को जायज ठहराया। लड़की के घरवाले इसके खिलाफ थे। फिर भी बच्ची के निकाह को मानते हुए उसे उसके शौहर के साथ रहने की अनुमति दी गई। कोर्ट ने उन्हें आश्वस्त भी किया कि अगर वह दोनों साथ रहना चाहते हैं तो कोई उन्हें अलग नहीं कर सकता।

कैसे माना गया निकाह जायज? क्या कहता है इस्लामी कानून

निकाह आदि के मामले में इस्लाम का कानून, भारतीय कानून से अलग चलता है। इस्लाम पर्सनल लॉ कहता है कि अगर लड़की सयानी हो गई है तो उसका निकाह करने में कोई दिक्कत नहीं है। हालाँकि सयानी होने की उम्र कितनी होती है ये इस कानून में स्पष्ट नहीं है। मेडिकली मानते हैं कि लड़की 15 साल की उम्र तक प्यूबर्टी को छूती है। लेकिन व्यवहारिक तौर पर देखें तो ये कई लडकियों को मासिक धर्म कम उम्र में भी शुरू हो जाते हैं। ऐसे में इस्लाम की परिभाषा के अनुसार, वो 15 की हो या कम की, सयानापन आते ही उनका निकाह जायज हो जाता है।

भारत में विवाह की सही उम्र के लिए कानून

मुस्लिम सुमदाय के लोग मानें या न मानें लेकिन अन्य समुदाय के लोग शादी की उम्र पर बात करते हुए तय कानून को मानते हैं। इसका कारण यही है कि शादी की जो उम्र 18 साल बनाई गई है वो बहुत सोच-विचारने के बाद तय हुई है। आगे भी इसके बढ़ने की संभावना है।

सबसे पहले 1860 के इंडियन पीनल कोड में शादी की उम्र का कोई जिक्र नहीं था, लेकिन 10 साल से कम उम्र की लड़की के साथ शारीरिक संबंध को गैरकानूनी बताया गया था। फिर धर्म के आधार पर शादी की उम्र को लेकर कानून आए जैसे इंडियन क्रिश्चियन मैरिज एक्ट, हिंदू मैरिज एक्ट। 

इस बीच 1929 में पहली बार शादी की उम्र को लेकर कानून बना। बाल विवाह निरोधक कानून 1929 के अनुसार शादी के लिए लड़के की न्यूनतम आयु 18 साल और लड़की की न्यूनतम आयु 16 साल तय की गई। फिर 1978 में बाल विवाह कानून में संशोधन किया गया। इसमें लड़के की शादी की न्यूनतम उम्र 21 साल और लड़की की 18 साल कर दी गई।

इसके बाद 1929 के बाल विवाह निषेध अधिनियम को निरस्त कर केंद्र सरकार बाल विवाह निषेध कानून 2006 लेकर आई। नवंबर 2007 से यह कानून लागू किया गया। आज यह कानून सभी धर्मों पर लागू होता है। लेकिन, मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट 1937 की वजह से यह पूरी तरह कारगर साबित नहीं हो पा रहा।

क्या-क्या होगा जायज?

अब हालात जब ये हैं कि हमारी अदालतें भी इस कानून के आगे इतना बंध गई है तो सवाल उठना जाहिर है कि आखिर कब तक मजहबी कानून के आधार पर समाज में फैसले होंगे। एक ओर इस्लाम लड़की के सयानी होने की उम्र को उसके निकाह की सही उम्र मानता है। तो दूसरी ओर ये भी कहता है कि दूध पीती बच्ची के कामुक टच भी जायज है, बस लिंग प्रवेश नहीं होना चाहिए।

मौजूद जानकारी के अनुसार, ये बात ईरान के संस्थापक अयातुल्लाह खुमैनी ने अपनी किताब में कह रखी है, “लड़की के 9 साल के होने से पहले सेक्स नहीं करना चाहिए। भले ही वह स्थाई या अस्थाई निकाह ही क्यों न हो। इसके अलावा अन्य तमाम हरकतें की जा सकती हैं जिसमें कामुक टच, गले लगाना और पैरों के बीच में प्राइवेट पार्ट रगड़ना शामिल है। यहाँ तक कि ये सब किसी दूध पीती बच्ची के साथ भी जायज है।”

संबंधित जानकारी

मजहब देखकर नहीं पड़ता शरीर पर असर

लड़कियों के लिए शादी की सही उम्र 16 हो, 18 हो या 21 हो- इस पर बहस लंबे समय से हो रही है। जाहिर है कि इसके पीछे कारण सिर्फ सामाजिक नहीं हैं। मेडिकली भी माना जाता है कि इस तरह कम उम्र में लड़कियों की शादियाँ उनकी शारीरिक, मानसिक विकास के लिए सही नहीं होता।

पढ़ने की उम्र में लड़कियाँ घर के काम-काज में उलझ जाती हैं। उनका मानसिक विकास चार दिवारी में होना शुरू होता है और वहीं सीमित रह जाता है। इसी तरह हेल्थ की बात करें तो कई अध्य्यन हैं जो कहते हैं कि कम उम्र में शादी के बाद प्रसव के समय माँ और बच्चा दोनों की जान को खतरा बराबर रहता है।

कई बार कमजोर शरीर के कारण गर्भपात के खतरे बढ़ जाते हैं और कई बार वे एनिमिया, हाई ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों की शिकार हो जाती हैं। नेशनल लाइब्रेरी ऑफ साइंस पर प्रकाशित एक लेख बताता है कि कम उम्र में लड़कियों की शादी उनके लिए तमाम बीमारियाँ लेकर आती हैं। कई बार उन्हें यौन संबंधी समस्या हो जाती हैं, तो कभी बार सर्वाइकल कैंसर से उन्हें जूझना पड़ता है।

ncbi पर प्रकाशित लेख से लिया स्क्रीऩशॉट

इंसानी शरीर को मद्देनजर रखते हुए किए गए विज्ञान के शोध मजहब देखकर नहीं किए जाते। न ही ऐसे शोधों में मजहब का कोई रोल होता है। अगर विज्ञान इस बात को कह रहा है कि बाल विवाह के बाद की समस्याएँ लड़की के शरीर के लिए खतरनाक हैं, तो ऐसा नहीं है कि उसने सिर्फ हिंदू, ईसाई लड़कियों को देख अपने निष्कर्ष दिए। इसमें मुस्लिम लड़कियाँ भी आती हैं जिनके निकाह की उम्र उनके माहवारी के बाद से शुरू हो जाती है।

’29 सितंबर को मनीष सिसोदिया हाजिर हो’: दारू घोटाले में घिरे दिल्ली के डिप्टी सीएम को असम की अदालत ने बुलाया, CM सरमा की पत्नी को बताया था करप्ट

दिल्ली में शराब (दारू) घोटाले को लेकर सीबीआई की जाँच में घिरे उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को असम के कामरूप की सीजेएम कोर्ट ने समन भेजकर 29 सितंबर, 2022 को हाजिर होने को कहा है। मानहानि का यह पूरा मामला असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा से जुड़ा है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, असम के CM हिमंत बिस्व सरमा ने दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के खिलाफ 30 जून को कामरूप (ग्रामीण) सीजेएम कोर्ट में आपराधिक मानहानि का केस दायर किया था। इसी संबंध में सीजेएम कोर्ट ने समन भेजकर मनीष सिसोदिया को तलब किया है।

बता दें कि आप नेता मनीष सिसोदिया ने दिल्ली में 4 जून, 2022 को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आरोप लगाया था कि असम सरकार ने सीएम सरमा की पत्नी रिंकी भुइयां सरमा की कंपनी जेसीबी इंडस्ट्रीज व उनके बेटे के व्यावसायिक भागीदार को पीपीई किट की आपूर्ति का ठेका दिया था। उन्होंने दावा किया था कि कोरोना महामारी काल में 2020 में यह आपूर्ति पीपीई किट की बाजार दर से ज्यादा दाम पर की गई थी।

वहीं CM सरमा ने इन आरोपों को निराधार बताते हुए मनीष सिसोदिया के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवाया था। इसके साथ ही सरमा ने अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों के खिलाफ मनीष सिसोदिया से स्पष्टीकरण माँगा था लेकिन उन्हें कोई जवाब नहीं मिलने पर उन्होंने सिसोदिया के खिलाफ आपराधिक मानहानि का मामला दर्ज कराया।

गौरतलब है कि असम के मुख्यमंत्री से पहले उनकी पत्नी रिंकी भूइयां सरमा ने भी मनीष सिसोदिया के खिलाफ मानहानि का केस दर्ज कराया था। उन्होंने गुवाहाटी कामरूप सिविल जज की अदालत में मानहानि का सिविल केस दर्ज कराते हुए 100 करोड़ रुपए हर्जाने की माँग की है। रिंकी भूइंया और हिमंत बिस्वा सरमा ने सिसोदिया के आरोपों को खारिज करते हुए इन्हें झूठा बताया था। उन्होंने बताया था कि जेसीबी इंडस्ट्रीज ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन को ये पीपीई किट दान में दिए थे।

‘खाने में कुछ गड़बड़ लग रही है, शरीर पर असर पड़ रहा’: मौत से पहले सोनाली फोगाट ने माँ को किया था कॉल, बहन ने जताई साजिश की आशंका

भाजपा नेता और टिकटॉक स्टार सोनाली फोगाट (Sonali Phogat) की गोवा में संदिग्ध मौत को उनकी बहन ने साजिश करार दिया है। बहन रूपेश के मुताबिक, सोनाली फोगाट ने सोमवार (22 अगस्त 2022) सुबह माँ से बात की थी। उन्होंने माँ से कहा था, “मुझे कुछ गड़बड़ लग रही है। ऐसा लग रहा है कि मेरे खिलाफ कोई साजिश हो रही है।” रूपेश ने बताया, “सोनाली ने माँ को खाने में गड़बड़ी होने की बात भी बताई थी। उसने कहा था कि खाने का असर उसके शरीर पर पड़ रहा है। इसलिए परिवार को शक है कि उसकी हत्या की गई है। इस मामले में CBI जाँच होनी चाहिए।”

सोनाली की बहन ने बताया, “रविवार (21 अगस्त 2022) को सोनाली से बात हुई थी। तब वह बिल्कुल ठीक थी। अपने फार्म हाउस पर थी, लेकिन माँ से बात करते हुए उसने कहा कि उसे कुछ ठीक नहीं लग रहा है। जैसे किसी ने कुछ कराया हो। सोमवार (22 अगस्त 2022) शाम को भी माँ से सोनाली ने इस बारे में बात की। तब भी उसने कहा कि खाना खाने के बाद उनके शरीर में कुछ हरकत सी हो रही है। ऐसा लग रहा है कि खाने में कुछ गड़बड़ की गई है, शायद कोई साजिश रच रहा है। सुबह मैसेज आया कि दिल का दौरा पड़ने से उसकी मौत हो गई।”

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सोनाली की मौत सोमवार (22 अगस्त, 2022) की रात हुई। उन्हें नॉर्थ गोवा स्थित अंजुना के सेंट एंथोनी हॉस्पिटल लाया गया। उन्होंने बेचैनी की शिकायत की थी। वहाँ उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। पुलिस ने शुरुआती जाँच में हार्ट अटैक को मौत का कारण बताया है। गोवा डीजीपी जसपाल सिंह ने भी इसकी पुष्टि की है कि फोगाट अंजुना में ‘Curlies’ रेस्टोरेंट में थीं। इस दौरान उन्हें बेचैनी की शिकायत हुई। उन्होंने बताया कि सोनाली फोगाट के शरीर पर कोई चोट का निशान नहीं मिला है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद मौत की वजह का पता चल जाएगा।

बता दें कि भाजपा ने 2019 में सोनाली फोगाट को हरियाणा विधानसभा चुनाव में आदमपुर से कॉन्ग्रेस के कुलदीप बिश्नोई के विरुद्ध उतारा था, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। हालाँकि, अब कुलदीप बिश्नोई भी कॉन्ग्रेस से बागी होकर भाजपा में आ चुके हैं। AAP ने इस मौत को संदिग्ध और रहस्यमयी बताते हुए जाँच की माँग की है। मौत से 12 घंटे पहले ही इंस्टाग्राम पर उन्होंने वीडियो डाला था और ट्विटर पर प्रोफाइल तस्वीर बदली थी। सोनाली फोगाट ने कुछ टीवी सीरियलों और वेब सीरीज में भी काम किया था। उनकी उम्र मात्र 42 साल थी। उन्होंने हिसार में ‘हरियाणा कला परिषद’ के साथ भी काम किया था।

‘क्या किसी ने ज़ाकिर नाइक से कहा माफी माँगने के लिए?’: नूपुर शर्मा को मिला राज ठाकरे का समर्थन, हलाल मीट के खिलाफ MNS का अभियान

MNS (महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना) सुप्रीमो राज ठाकरे ने भाजपा की निलंबित नेता नूपुर शर्मा का समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि नूपुर शर्मा ने जो बात कही वही बात ज़ाकिर नाइक ने भी कही थी, लेकिन उससे कोई माफ़ी की माँग क्यों नहीं कर रहा? राज ठाकरे ने कहा कि जब से नूपुर शर्मा का बयान आया है, काफी राजनीति हो रही है और कोई उनका समर्थन नहीं कर रहा। बता दें कि राज ठाकरे कुछ दिनों से स्वास्थ्य लाभ ले रहे थे।

उन्होंने कार्यकर्ताओं के साथ लंबे समय बाद हुई बैठक में ये बातें कही। उन्होंने कहा कि नूपुर शर्मा पर माफ़ी माँगने के लिए काफी दबाव बनाया गया, लेकिन ज़ाकिर नाइक से किसी ने माफ़ी माँगने के लिए नहीं कहा। बीमारी से ठीक होने के बाद पार्टी कैडर के बीच पहुँचे राज ठाकरे ने लंबी लड़ाई का आह्वान किया है। उनके कूल्हे की सर्जरी हुई थी। लेकिन, अब निकाय चुनावों से पहले वो सक्रिय हो गए हैं। उन्होंने हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी के भाई अकबरुद्दीन के उस बयान का जिक्र करते हुए उस पर भी हमला बोला, जिसमें उसने हिन्दुओं को दी थी।

राज ठाकरे ने इस दौरान अपने चचेरे भाई उद्धव ठाकरे पर भी हमला बोला और उन्हें याद दिलाया कि शिवसेना के संस्थापक बालासाहेब ठाकरे ने ही ये नियम बनाया था कि गठबंधन में जिस पार्टी के ज्यादा विधायक होंगे, मुख्यमंत्री भी उसी का बनेगा। उन्होंने याद दिलाया कि 2019 महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान ही नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने कह दिया था कि देवेंद्र फडणवीस मुख्यमंत्री होंगे, तब शिवसेना ने कोई आपत्ति नहीं जताई थी।

राज ठाकरे की पार्टी ने ये भी ऐलान किया है कि वोहलाल मांस के खिलाफ भी अभियान चलाएगी। उसने इसे टेरर फंडिंग से जोड़ते हुए कहा कि हिन्दुओं की आजीविका और राजस्व पर भी इसके कारण गलत असर पड़ा है। मनसे ने कहा कि हलाल मीट आतंकियों को वित्तीय मदद पहुँचाने वाला सबसे बड़ा तंत्र है, ऐसे में न सिर्फ झटका कारोबार प्रभावित हो रहा है, बल्कि शाकाहारी लोग भी इससे प्रभावित हो रहे हैं। मनसे के ‘व्यापारी सेना’ ने एक खुले खत के माध्यम से अपील की है कि हमारा पैसा आतंकियों की मदद के लिए नहीं जाना चाहिए।

गोरखनाथ मंदिर को उड़ाने की धमकी, हिंदू देवी-देवताओं पर आपत्तिजनक कमेंट: मुबारक अली गिरफ्तार, पड़ोसी को फँसाने के लिए रची थी साजिश

उत्तर प्रदेश की महाराजगंज पुलिस ने प्रसिद्ध गोरखनाथ मंदिर को उड़ाने की धमकी देने वाले मुबारक अली को गिरफ्तार किया है। उसने फेसबुक के जरिए मंदिर को बम से उड़ाने की धमकी दी थी। महाराजगंज पुलिस ने सोमवार (22 अगस्त 2022) को बताया कि फर्जी फेसबुक आईडी (Facebook ID) बनाकर धमकी दी गई थी। अली के पास से दो मोबाइल फोन भी बरामद किए गए हैं।

अपर पुलिस अधीक्षक आतिश कुमार सिंह ने उसकी गिरफ्तारी की पुष्टि की है। मुबारक अली कोतवाली थाना क्षेत्र के मटिहानिया गाँव का रहने वाला है। उसने कुछ दिन पहले ही फर्जी फेसबुक आईडी बनाकर गोरखनाथ मंदिर को बम से उड़ाने की धमकी दी थी। गिरफ्तार के बाद बताया कि पड़ोसी बसालत अली को फँसाने के लिए उसने ऐसा किया था। मुबारक ने फेसबुक पर फेक आईडी बसालत के मोबाइल नंबर का इस्तेमाल करके ही बनाई थी। इस आईडी से उसने हिंदू देवी-देवताओं पर आपत्तिजनक कमेंट भी किए थे।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मुबारक अली ने गाँव के ही बसालत अली से 40 हजार रुपए उधार लिए थे। वह पैसा नहीं लौटाना चाहता था। इसके कारण उसने बसालत को फँसाने की साजिश रची। बसालत के नंबर का इस्तेमाल कर फेक आईडी बनाई। उससे धमकी दी ताकि बसालत फँस जाए। लेकिन जाँच में वह पकड़ा गया।

गिरफ्तारी के बाद टी राजा सिंह BJP से सस्पेंड: हैदराबाद में लगे ‘सर तन से जुदा’ के नारे, कॉन्ग्रेस MLA राशिद खान ने कहा- मुसलमान कौम सड़कों पर उतरो

तेलंगाना में टी राजा सिंह की टिप्पणी के बाद शहर का माहौल गरमाया हुआ है। जगह-जगह ‘सर तन से जुदा’ के नारे लग रहे हैं। पुलिस राजा सिंह को गिरफ्तार कर चुकी है। बीजेपी ने भी राजा सिंह को पार्टी से निलंबित कर दिया है। लेकिन इसी बीच कॉन्ग्रेस नेता राशिद खान का एक भड़काऊ बयान सामने आया है।

ये भाषण गिरफ्तारी होने से पहले का है। इसमें राशिद खान सड़कों पर आकर आग लगाने की धमकी दे रहे हैं। उन्होंने कहा है कि अगर टी राजा सिंह के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं हुई तो वह कानून व्यवस्था को खराब कर देंगे। शहर में आग लगा देंगे।

राशिद खान प्रदेश में कॉन्ग्रेस कमिटी के सचिव हैं। उन्होंने टी राजा सिंह की गिरफ्तारी की माँग उठाने के दौरान कहा था,

“राजा सिंह हमेशा हमारे रसूल की शान में गुस्ताखी करते आ रहा है। ये आदमी गुस्ताख-ए-रसूल है। गुस्ताख-ए-इस्लाम है। इसे सलाखों के पीछे भेजो। अगर टी राजा सिंह की गिरफ्तारी नहीं हुई तो शहर में आग लगा दूँगा। अमन और सुकून गायब कर दूँगा। हर वक्त ऐसा हो कर रहा है। पुलिस डिपार्टमेंट सो रहा है। सीएम सो रहा है। गृहमंत्री सो रहा है। पूरे लोग नींद से उठ जाओ। इसे हिरासत में नहीं लिया गया तो मैं शहर की कानून-व्यवस्था खराब कर दूँगा।”

राशिद खान ने मुस्लिमों को भड़का कर सड़कों पर उतरने को कहा। राशिद ने कहा,

“मुसलमान कौम सड़कों पर उतरो। नींद से उठो। राजा सिंह हमारे रसूल की शान में गुस्ताखी कर रहा है। हम खामोश बैठकर तमाशा देख रहे हैं। नहीं! तमाशा हम नहीं देखने वाले। हम सड़कों पर उतरेंगे। अल्लाह की कसम, अगर 23 अगस्त तक यदि उसे गिरफ्तार नहीं किया गया तो फिर 24 अगस्त मैं गोशामहल को अंगार में बदल दूँगा। मैं किसी की नहीं सुनूँगा। गिरफ्तारी नहीं हुई तो मैं कानून व्यवस्था बर्बाद कर दूँगा।”

इससे पहले राशिद खान ने वसीम रिजवी के लिए भी ऐसे भड़काऊ बयान दिया था। राशिद ने कहा था कि वो ऐलान करते हैं जो कोई भी वसीम का सिर काट कर लाएगा उसे वो 25 लाख रुपए का इनाम देंगे। इसके अलावा राशिद खान बीते दिनों चार मीनार के पास नमाज पढ़ने की पैरवी भी कर चुके हैं। अब उन्होंने टी राजा सिंह की टिप्पणी को मुद्दा बनाकर कानून-व्यवस्था बिगाड़ने की बात की है।

बता दें कि टी राजा सिंह की वीडियो के बाद उनके विरुद्ध राज्य पुलिस ने आईपीसी की 153ए, 295 और 505 के तहत कार्रवाई की, जबकि बीजेपी ने उनको सस्पेंड किया है। पार्टी ने उन्हें ‘कारण बताओ’ नोटिस भेज 10 दिन का समय दिया है ताकि वो बता सकें कि आखिर पार्टी को उन्हें क्यों नहीं निकालना चाहिए।

जो हिंदुओं को बनाता था ईसाई उसकी हत्या पर बॉलीवुड फिल्म, उसकी विधवा को पद्मश्रीः जो संत कराते थे घर वापसी-बचाते थे गाय, उनको काट डालने की चर्चा तक नहीं

आज आपको एक पुरानी घटना की याद दिलाते हैं। याद इसीलिए भी दिलानी पड़ रही है, क्योंकि हम हिन्दू हैं और हम भूलते बहुत ज्यादा हैं। 16 अप्रैल, 2020 को महाराष्ट्र के पालघर में जिस तरह से मिशनरी प्रेरित भीड़ ने 2 साधुओं और उनके ड्राइवर की हत्या कर दी, ये घटना हमारे जेहन में ताज़ा है। लेकिन, हमें 23 अगस्त, 2008 को ओडिशा के कंधमाल में हुई एक घटना को भी याद करना होगा। स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती और उनके 4 शिष्यों की हत्या वाली घटना। जन्माष्टमी के दिन उनके शरीर को कुल्हाड़ी से काट डाला गया था।

इस हत्याकांड की गवाह थीं 130 बच्चियाँ, जो तुमुदिबंध के ‘कन्या आश्रम’ में पढ़ती थीं और जन्माष्टमी के मौके पर वहाँ आई हुई थीं। मृतकों में एक लड़का भी शामिल था। हत्यारों के पास AK-47 राइफल थे। साथ ही कई देशी कट्टे से लैस थे। इस हत्याकांड में जिनके नाम सामने आए, उनमें अधिकतर माओवादी ईसाई थे। कइयों ने इन गिरफ्तारयों को ‘कवर-अप’ भी बताया, क्योंकि ईसाई मिशनरियों की जगह इसे सिर्फ माओवादियों की करतूत बता कर धर्मांतरण कराने वाले गिरोह को बचाया गया।

स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या: माओवादियों की आड़ में ईसाई मिशनरियों को दे दिया गया ‘क्लीन चिट’

जैसा कि ये किसी से छिपा नहीं है, ईसाई मिशनरी सामान्यतः गरीब और पिछड़े इलाकों को अपना निशाना बनाते हैं। उन्हें इलाज के नाम पर चमत्कार दिखाया जाता है, चावल-दाल का लालच दिया जाता है और हिन्दू देवी-देवताओं को उनकी दुर्दशा के लिए जिम्मेदार ठहरा कर उनके भीतर हिन्दुओं के लिए घृणा भरी जाती है। इस तरह दलितों और जनजातीय समाज के लोगों का ईसाई धर्मांतरण कराने में वो सफल होते हैं। ये आज से नहीं, वर्षों से चल रहा है।

स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या के पीछे भी वही ईसाई मिशनरी थे, उनके द्वारा फैलाई गई वही हिन्दू घृणा थी। माओवादी नेता साब्यसायी पांडा ने इस हत्या की जिम्मेदारी ली थी। इससे आपको अंदाज़ा लग सकता है कि सालों तक लोगों का खून बहाने वाले माओवादी संगठनों में भी ईसाई मिशनरियों की कितनी पैठ थी। तभी महाराष्ट्र के भीमा-कोरेगाँव हिंसा के मामले में फादर स्टेन ‘स्वामी’ जैसे लोग जेल में थे। कंधमाल हत्याकांड के बाद पांडा ने यहाँ तक कहा था कि वो लालकृष्ण आडवाणी, अशोक सिंघल और प्रवीण तोगड़िया की भी हत्या करेंगे।

याद हो कि ये तीनों तब हिंदुत्व के फायरब्रांड नेता हुआ करते थे। माओवादी नेता के इस बयान के बाद लिबरल गिरोह के ये कह कर ईसाई मिशनरियों को ढकने का बहाना मिल गया कि ये तो माओवादियों का काम है, माओवादी हिन्दू ही हैं। लेकिन, ईसाई मिशनरियों की उनमें जो पैठ थी – उसकी बात कोई नहीं करता। आज तो स्थिति ये हो गई है कि कई पिछले इलाकों में हिन्दुओं (दलितों/जनजातीय लोगों) और ईसाईयों में भेद करना भी मुश्किल हो गया है, क्योंकि धर्मांतरण के बाद भी वो पहली की तरह ही रहते हैं। एक ही नई चीज जुड़ती है – हिन्दू घृणा।

स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती के RSS से करीबी रिश्ते थे और वो ‘विश्व हिन्दू परिषद (VHP)’ से जुड़े हुए थे। वो चकापाद में आश्रम बना कर 35 वर्षों से जनजातीय समाज के बीच हिन्दू धर्म को लेकर जागरूकता फैला रहे थे। उन्होंने ‘गुरुकुल संस्कृति विद्यालय’ भी खोल रखा था, जिसके माध्यम से स्नातक तक की शिक्षा दी जाती थी। ईसाई धर्मांतरण को लेकर वो मुखर थे और यही बात मिशनरियों को रास नहीं आ रही थी। इलाके में धर्मांतरण की राह में स्वामी उनके लिए रोड़ा बन रहे थे। गोहत्या के खिलाफ स्वामी जी आंदोलन चला रहे थे, ईसाई मिशनरी गोमांस का धंधा।

2008 वो साल था, जब माओवादियों की हिंसा ओडिशा में चरम पर थी। विशेष सुरक्षा बल ‘ग्रे हाउंड्स’ के 28 कमांडो को माओवादियों ने घात लगा कर मार डाला था। इसके कुछ ही महीने की अंतराल पर हुए हमले में 17 पुलिस के जवान फिर से मार डाले गए। इसके लिए बारूदी सुरंग विस्फोट का सहारा लिया गया। इसके अगले साल सांसद सुदामा मरांडी पर भी हमला हुआ, जिसमें उनके 3 सुरक्षा कर्मी मारे गए। इन सभी के बीच में स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की भी हत्या हुई।

एक वृद्ध संत और उनके 4 शिष्यों की हत्या पर चर्चा नहीं, विरोध प्रदर्शन के बाद हिन्दुओं को बदनाम करने पर मीडिया का था ध्यान

लेकिन, 2008 में उस दौर के साक्षी रहे लोग जानते हैं कि इस हत्याकांड को मीडिया ने प्रमुखता नहीं दी। न तो ईसाई धर्मांतरण को लेकर बेहद हुई और न ही माओवादियों में मिशनरियों के प्रभाव की। तब सोशल मीडिया का जन्म ही हुआ था, ऐसे में वो प्रभावी नहीं था। आमजनों को वही पता चलता था, जो गिरोह विशेष के पत्रकार उन्हें बताते थे। और इस हत्याकांड के बाद उन्हें क्या बताया गया? यही कि हिन्दुओं ने ईसाईयों पर अत्याचार किया है।

अर्थात, स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती और उनके 4 अनुयायियों के नरसंहार को प्राथमिकता नहीं दी गई ख़बरों में, लेकिन इसके बाद हिन्दुओं ने विरोध प्रदर्शन किया तो वो मुद्दा बन गया। हिन्दुओं के विरोध प्रदर्शन को हिंसक बता कर इस हत्याकांड को ही भुला दिया गया। लेखकों ने इसकी तुलना गोधरा काण्ड के बाद गुजरात में दंगों से की। आज भी गोधरा में 59 रामभक्तों, जिनमें महिलाएँ-बच्चे भी थे, उन्हें ज़िंदा जलाने वाली घटना और इसके पीछे के दोषियों की बात नहीं की जाती है, लेकिन इसके बाद हुए दंगों के लिए हिन्दुओं को दोषी ज़रूर ठहराया जाता है।

स्वामी लक्ष्मानन्द सरस्वती भी ओडिशा के वनवासी समाज से ताल्लुक रखते थे। वो कन्द वनवासी समाज के थे, जिन्हें काफी शक्तिशाली माना जाता है। हिमालय पर तपस्या के बाद समाज की भलाई के लिए वो वापस आ गए थे। संघ प्रचारक श्याम जी जब उनके आश्रम में गए थे तो उन्होंने देखा था कि कितने संघर्षों से वो ये काम कर रहे हैं। खाना बनाने के लिए पर्याप्त बर्तन नहीं थे, जिससे भोजन पकाने में ज्यादा समय लगता था। प्रकाश के लिए पर्याप्त लालटेन की व्यवस्था नहीं थी, जिस कारण रात में पढ़ाई में दिक्कतें आती थीं।

उस समय इन दोनों ने मिल कर गाँवों में भगवान जगन्नाथ की यात्रा निकाली और जनजातीय समाज को फिर से अपनी जड़ों की तरफ मोड़ा। भगवान जगन्नाथ के प्रति आस्था के पुनर्जीवित होने के कारण कई धर्मांतरित ईसाई वापस हिन्दू धर्म में आए। स्वामी जी शंख बजाते थे और जल छींटते थे, जिससे औपचारिक रूप से वापस घर-वापसी होती थी। अब आप समझ सकते हैं कि इस नव-जागरण के कारण ईसाई मिशनरियों में कैसी खलबली मची होगी।

यही कारण है कि वनवासी समाज स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या के बाद उग्र हो गया और जिन लोगों ने ईसाई धर्मांतरण कर लिया था, उनके प्रति उनमें आक्रोश भर गया था। इसके बाद विरोध प्रदर्शन और हिंसा हुई, जिसके लिए हिन्दुओं को जिम्मेदार ठहराते हुए मीडिया गिरोह ने स्वामी जी की हत्या को भुला दिया। 80 से अधिक उम्र के एक समाजसेवी और उनके 4 शिष्यों के नरसंहार के बारे में हमें उस तरह से चीजें पता नहीं चल पाईं, जैसा पालघर में हुआ था।

कॉन्ग्रेस-BJD के सांसदों पर स्वामी जी पर हमले के थे आरोप, माओवादियों को गिरफ्तार कर हो गई कार्रवाई की इतिश्री

स्वामी जी की हत्या करने के लिए करीब 30 लोगों की टोली आई थी और सभी ने अपने चेहरे ढक रखे थे। 1966 में हिमालय से वापस लौटने के 1 साल बाद ही उन्होंने आश्रम का संचलान शुरू कर दिया था। ये भी जानने लायक बात है कि जब उनकी हत्या हुई, तब माओवादियों की जिला कमिटी में 70% ईसाई ही थे। हालाँकि, ये पहली घटना नहीं थी जब उन पर हमले हुए। 2007 में क्रिसमस के दिन ब्राह्मणीगाँव में ईसाईयों ने मंदिर के सामने अपना दरवाजा लगाने का काम शुरू कर दिया था।

इससे हिन्दू भी भड़क गए और दोनों पक्षों में संघर्ष में 5 लोगों की मौत हुई थी। मौके पर पहुँचे स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती पर भी हमला कर दिया गया था। हत्या से पहले उन पर 8 बार हत्या के प्रयास हो चुके थे। 8 हमलों के बावजूद स्थानीय पुलिस-प्रशासन उनकी सुरक्षा को लेकर गंभीर नहीं था। जब उनकी हत्या हुई, उस समय उनका बॉडीगार्ड छुट्टी पर था और उनकी सुरक्षा में लगे 4 कॉन्स्टेबल बाजार गए हुए थे। उन कॉन्स्टेबलों के पास हथियार तक नहीं थे। स्वामी जी को गोलियों से भून डाला गया, फिर कुल्हाड़ी से काट डाला गया।

उससे पहले उन पर हुए हमलों में BJD और कॉन्ग्रेस के नेता भी शामिल थे। कॉन्ग्रेस के राज्यसभा सांसद रहे राधाकांत नाइक का उन पर हुए हमलों में हाथ था, जो ‘वर्ल्ड विज़न’ नामक एक ईसाई संस्था हुआ था। जब वो बस से जा रहे थे, तब BJD के ही एक ईसाई लोकसभा सांसद ने उनके रास्ता रोक कर उन पर हमला किया था। हत्या से एक सप्ताह पहले उन्होंने हत्या की धमकी की FIR पुलिस में दायर की थी। उनकी हत्या के बाद स्थानीय एसपी और थाना प्रभारी को सस्पेंड कर के सरकारी कार्रवाई की इतिश्री हो गई।

1999 में ओडिशा में ही हुई थी ईसाई मिशनरी की हत्या, बॉलीवुड ने बना दी फिल्म भी

हिन्दू साधु-संतों की हत्याओं के मामले में भले ही उसके बाद हुई प्रतिक्रिया को हाइलाइट कर के हिन्दुओं को ही दोषी ठहराया जाता है, लेकिन बाकी मजहबों को लेकर ऐसा नहीं होता। इसके लिए हमें जाना होगा 1999 में, जब ग्राहम स्टेंस नाम के एक ईसाई मिशनरी और उसके दो बच्चों की हत्या कर दी गई थी। इसे खूब मीडिया कवरेज मिला और हिन्दुओं को विलेन बनाया गया। बॉलीवुड ने तो 2019 में ‘The Least of These: The Graham Staines Story’ नाम से एक फिल्म भी बना डाली।

सोचिए, 1999 में हुई एक घटना को लेकर बॉलीवुड ने हिन्दुओं को दोषी ठहराते हुए फिल्म बना दिया, लेकिन इसके 9 साल बाद हुई घटना को लेकर कहीं कोई चर्चा ही नहीं हुई। ऑस्ट्रेलिया से आया ग्राहम स्टेंस केंदुझार जिले में सक्रिय था और उस पर दलितों एवं जनजातीय समाज का बलपूर्वक धर्मांतरण कराने के आरोप भी लगे थे। यूपीए-1 की सरकार ने उसकी पत्नी को पद्मश्री भी दिया। 2016 में उसे मदर टेरेसा के नाम वाला एक अंतरराष्ट्रीय अवॉर्ड भी मिला।

स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती द्वारा जनजातीय समाज के उत्थान के लिए साढ़े 4 दशकों तक किए गए कार्यों के बदले उन्हें क्या मिला? क्या हत्याकांड के बाद भी मीडिया ने उनके योगदान को याद किया अथवा सरकारों ने कोई सम्मान दिया? ग्राहम स्टेंस पर तो ग्रामीणों को बीफ खिला कर धर्मभ्रष्ट करने तक के आरोप थे। आज आपको मीडिया में ग्राहम स्टेंस को याद करते हुए कई आर्टिकल मिल जाएँगे, कई पुस्तकें मिल जाएँगी, लेकिन स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती को लेकर कुछ नहीं मिलेगा।

ग्राहम स्टेंस हत्याकांड को हिन्दुओं को बदनाम करने की एक साजिश भी बताया जाता है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज डीपी वधवा की अध्यक्षता वाली कमिटी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था कि मुख्य आरोपित का किसी संगठन से ताल्लुक नहीं है। लेकिन, अल्पसंख्यक आयोग ने इसे नकारते हुए खुद की जाँच में ‘बजरंग दल’ को दोषी बताया। न्यायिक कमिटी की जाँच में ये भी पाया गया था कि जिस कैंप में हत्या हुई, वहाँ ईसाई धर्मांतरण का काम चल रहा था और बाइबिल वगैरह की शिक्षा दी जा रही थी।

आज ये सवाल उठता है कि माओवादियों के जिन क्षेत्रों में पुलिस-परेशान भी नहीं जा पाता, वहाँ ईसाई मिशनरी बेख़ौफ़ होकर कैसे पहुँच जाते हैं? तो इतिहास के विश्व में इस सवाल पर भी मंथन कीजिए कि जहाँ स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती पैदल भी सुरक्षित नहीं थे, वहाँ ईसाई मिशनरी ग्राहम स्टेंस कैसे बीवी-बच्चों के साथ बेख़ौफ़ घूमता था? स्वामी जी को न पद्मश्री मिला, न कोई इंटरनेशनल अवॉर्ड और न ही हत्या पर कोई फिल्म ही बनी।

शिवसेना किसकी? उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे की लड़ाई संवैधानिक पीठ के हवाले, 25 अगस्त तक चुनाव आयोग को फैसला करने से SC ने रोका

महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना को लेकर उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इसे पाँच जजों की बड़ी बेंच को सौंप दिया है। शीर्ष अदालत ने महाराष्ट्र सेना बनाम शिवसेना विवाद में उद्धव और शिंदे गुटों द्वारा एक-दूसरे के खिलाफ दायर 7 याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए इसे संविधान पीठ को सौंप दिया।

बता दें कि शिवसेना के 16 विधायकों की अयोग्यता का मामला सुप्रीम कोर्ट में उठाया गया है। इसके अलावा शिवसेना के चुनाव चिह्न को लेकर शिंदे और ठाकरे गुटों के बीच झगड़ा है। इस मामले में अब अगली सुनवाई गुरुवार (25 अगस्त, 2022) को होगी।

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी और न्यायमूर्ति हिमा कोहली की पीठ ने कहा, “मामले में गुरुवार को संविधान पीठ के समक्ष सूचीबद्ध करें और पीठ शुरुआत में निर्वाचन आयोग की कार्यवाही से संबंधित चुनाव चिह्न के संबंध में फैसला करेगी। और पहले निर्णय लिया जाएगा कि क्या चुनाव आयोग के समक्ष कार्यवाही पर रोक लगानी है?”

बता दें कि कई संवैधानिक मुद्दे, विशेष रूप से 10 वीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) से संबंधित मुद्दे भी याचिकाओं में शामिल हैं। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 10वीं अनुसूची पर व्यापक विचार विमर्श की जरूरत है। वहीं स्पीकर और डिप्टी स्पीकर की शक्तियों को भी सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ परिभाषित करेगी।

रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में CM एकनाथ शिंदे ने दलबदल, विलय और अयोग्यता से जुड़े कई संवैधानिक सवाल उठाए हैं। जहाँ इस मामले को प्रधान न्यायाधीश एन. वी. रमणा की अध्यक्षता वाली पीठ ने गुरुवार को संविधान पीठ के समक्ष याचिकाओं को सूचीबद्ध करने का आदेश दिया। वहीं निर्वाचन आयोग को शिंदे गुट की उस याचिका पर कोई आदेश पारित नहीं करने का निर्देश दिया जिसमें शिंदे गुट ने कहा था कि उसे असली शिवसेना माना जाए और पार्टी का चुनाव चिह्न आवंटित किया जाए।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में टिप्पणी करते हुए कहा कि नेबाम राबिया के फैसले की समीक्षा करने की भी जरूरत है। दरअसल, नेबाम रेबिया के फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि स्पीकर के लिए दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता याचिकाओं पर फैसला करना संवैधानिक रूप से अनुचित था, जबकि अध्यक्ष के कार्यालय से अपने स्वयं के निष्कासन के लिए संकल्प की सूचना लंबित थी।

‘नीतीश कुमार को हिंदुओं को अपमानित करना पसंद, क्या वे मक्का जाएँगे’: बिहार के CM को बीजेपी ने घेरा, मुस्लिम मंत्री के साथ गया के मंदिर में किया था प्रवेश

मुस्लिम मंत्री के साथ गया के विष्णुपद मंदिर में प्रवेश करने को लेकर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (Nitish Kumar) घिरते जा रहे हैं। बीजेपी ने कहा है कि नीतीश कुमार को हिंदुओं की आस्था से खिलवाड़ करना पसंद है। साथ ही पूछा है कि अपना साम्प्रदायिक सद्भाव दिखाने के लिए क्या वे मक्का जा सकते हैं?

बिहार बीजेपी के अध्यक्ष संजय जायसवाल (Sanjay Jaiswal) ने मंगलवार (23 अगस्त 2022) को कहा, “”सोमवार को जिस प्रकार से हिंदू धर्म का अपमान हुआ है, उसकी जितनी निंदा की जाए कम है। नीतीश कुमार जान-बूझकर इसराइल मंसूरी को लेकर विष्णुपद गए। हिंदू समाज को अपमानित करना उन्हें बहुत पसंद है। वे कई वर्षों से गया के विष्णुपद मंदिर जाते रहे हैं। वे इस बात को अच्छे से जानते हैं कि वहाँ गैर हिंदुओं का प्रवेश वर्जित है।”

जायसवाल ने कहा, “नीतीश कुमार ने न केवल हिंदुओं को अपमानित किया है, बल्कि सामाजिक ताना-बाना तोड़ने की कोशिश भी की है। मैं पूछना चाहता हूँ कि क्या वे अपना साम्प्रदायिक सद्भाव दिखाने के लिए मक्का जाएँगे?” बिहार बीजेपी अध्यक्ष ने इस घटना को लेकर नीतीश कुमार से सार्वजनिक माफी की माँग की है। ऐसा नहीं होने पर सड़क से सदन तक मुख्यमंत्री का पार्टी द्वारा विरोध किए जाने की बात कही है।

जायसवाल ने कहा कि नीतीश कुमार मंसूरी के मंदिर जाने को सेकुलरिज्म बताएँगे। लेकिन यह सेकुलरिज्म मक्का में क्यों नहीं है? उन्होंने कहा, “जब मस्जिद में उसी मजहब के लोग जाएँगे तो मंदिर में सिर्फ हिंदुओं के प्रवेश की अनुमति के नियम का भी पालन किया जाना चाहिए।”

गौरतलब है कि नीतीश कुमार सोमवार (22 अगस्त 2022) को गया के विष्णुपद मंदिर में पूजा-पाठ करने गए थे। इस मंदिर के बाहर स्पष्ट रूप से लिखा है- यहाँ गैर-हिंदुओं का प्रवेश वर्जित है। इसके बावजूद नीतीश के साथ बिहार के सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्री मोहम्मद इसराइल मंसूरी भी मंदिर के गर्भगृह में चले गए थे। इसको लेकर हिंदुओं ने नाराजगी जताई है। इस घटना के बाद मंदिर प्रबंधकारिणी समिति के अध्यक्ष शंभु लाल बिठ्‌ठल ने भगवान विष्णु से क्षमा माँगी। गर्भगृह को गंगा जल से धोया गया।