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एक हिंदू ने लिखा था पाकिस्तान का पहला कौमी तराना ‘ऐ सरजमीने पाक’… लेकिन भारत में बची जिंदगी: कट्टरपंथियों ने बदल डाला ‘काफिर का तराना’ भी

15 अगस्त 1947 की आधी रात को आजादी मिली, लेकिन इसके साथ ही इसके टुकड़े भी हो गए। भारत के एक हिस्से को तोड़कर पाकिस्तान का बना। आजादी तो एक ही दिन मिली, लेकिन पाकिस्तान 14 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस मनाता है। भारत से एक दिन पहले। इन सबके बीच बहुत कम लोग जानते होंगे कि पाकिस्तान का ‘कौमी तराना’ (राष्ट्रगान) किसी मुस्लिम ने नहीं, बल्कि एक हिंदू ने लिखा था।

इस तराने को पाकिस्तान की आजादी के बाद पहली बार 14 अगस्त 1947 को रेडियो लाहौर से प्रसारित किया गया था। हालाँकि, पाकिस्तान के बँटवारे के जिम्मेदार माने जाने वाले मोहम्मद अली जिन्ना की मौत के बाद इस तराने के बदल दिया गया। कहा गया कि एक इस्लामी मुल्क के तराने का लेखक एक काफिर कैसे हो सकता है।

‘तराना-ए-पाकिस्तान’ को लिखने वाले का नाम प्रोफेसर जगन्नाथ आजाद था। प्रोफेसर जगन्नाथ का जन्म पाकिस्तान के लाहौर में हुआ था और वे अपने मुल्क को बेहिसाब मोहब्बत करते थे। उन्होंने लाहौर की पंजाब यूनिवर्सिटी से फारसी में एमए किया था। वह पाकिस्तान में रहे, लेकिन हिंदू होने के कारण उन्हें वहाँ से भागना पड़ा और अंतत: हिंदुस्तान में ही बाकी उम्र गुजारना पड़ा।

जब पाकिस्तान का बँटवारा निश्चित हो गया तो जिन्ना को याद कि पाकिस्तान के लिए एक कौमी तराना होना चाहिए। वे इस तराने को एक उर्दू के एक ऐसे विद्वान से लिखवाना चाहते थे, जो हिंदू हो। उन्होंने लोगों से ऐसे व्यक्ति की तलाश करने का आदेश दिया। रेडियो लाहौर के अधिकारियों को बुलाकर 24 घंटों में ऐसे हिंदू शायर को तलाश करने का हुक्म दिया।

जिन्ना के कहने पर पाँच दिन में लिखा तराना

अधिकारियों ने जिन्ना को बताया कि लाहौर में बहुत ही काबिल एक हिंदू शायर रहते हैं, जिनका नाम जगन्नाथ आजाद। उर्दू में उनके आसपास मुस्लिम शायर भी नहीं ठहरते। पाकिस्तान की आजाद से 5 दिन से पहले उस शायर से मिलने खुद जिन्ना पहुँचे और उनसे कौमी तराना लिखने का आग्रह किया। जिन्ना ने कहा, “मैं आपको सिर्फ पाँच दिन का समय देता हूँ, आपको कौमी तराना लिखना है”।

इस पाँच दिन में जगन्नाथ आजाद ने तराना लिखा और वह 14 अगस्त 1947 की आधी रात को रेडियो लाहौर से प्रसारित किया गया। पाकिस्तान रेडियो ने इसे कंपोज किया और फिर इसे जिन्ना को सुनाया गया। जिन्ना को यह बेहद पसंद आया। 14 अगस्त की आधी रात को रेडियो लाहौर से इसे पहले कौमी तराने के रूप में प्रसारित किया गया। उसके बाद फिर 15 अगस्त को प्रसारित किया गया।

हालाँकि, पाकिस्तान के इस्लामी नेताओं और शायरों को यह पसंद नहीं था कि किसी हिंदू का लिखा हुआ तराना पाकिस्तान का कौमी तराना बने। इस तरह जब तक जिन्ना जिंदा रहे, 18 महीनों तक इसे पाकिस्तान का कौमी तराना का दर्जा हासिल रहा। जिन्ना के मौत के बाद इसे बदल दिया गया।

छोड़ना पड़ा पाकिस्तान

बँटवारे के बाद वह लाहौर नहीं छोड़ना चाहते थे। उन दिनों वे लाहौर के एक साहित्यिक पत्रिका में नौकरी किया करते थे। बँटवारे से पहले ही हालात बिगड़ने लगे थे, लेकिन बँटवारे के बाद पाकिस्तान में हिंदुओं का जीना हर बीतते पल के साथ मुश्किल होने लगा। अगले कुछ महीनों में अब जगन्नाथ को लाहौर में एक दिन भी काटना मुश्किल हो गया। तब उनके मुस्लिम दोस्तों ने उन्हें भारत चले जाने की सलाह दी।

जिस जमीन पर उनकी पैदाइश हुई, जिस मुल्क के लिए उन्होंने तराना लिखा, उसको छोड़ने का उन्होंने मन बना लिया। इस तरह अपना और अपने पूर्वजों का सब कुछ छोड़कर वे एक दिन भारत चले आए। यहाँ दिल्ली के लाजपत नगर स्थित शरणार्थी कैंप में रहने लगे। दिल्ली में आकर उन्होंने डेली मिलाप में नौकरी शुरू कर दी।

कुछ समय बाद शायर जोश मलीहाबादी ने दिल्ली स्थित अपना मकान उन्हें रहने के लिए दे दिया। मलीहाबादी को सरकारी मकान मिल गया था। साल 1948 में आजाद को सूचना प्रसारण मंत्रालय की उर्दू पत्रिकाओं में सहायक संपादक की नौकरी मिल गई। बदलते समय के साथ वे सूचना आयुक्त भी रहे।

भारत और पाकिस्तान में किसी को नहीं पता था कि उन्होंने पाकिस्तान का कौमी तराना लिखा है। यह बात पाकिस्तान के उनके मित्रों को कुछ नेताओं-अधिकारियों को ही पता थी। हालाँकि, भारत में एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने खुद इसका खुलासा किया था।

जगन्नाथ आजाद का भारत में साल 2004 में निधन हो गया। उन्होंने 70 से ज्यादा किताबें लिखीं। जब 90 और 2000 के दशक में पाकिस्तान के आम लोगों को यह पता चला कि देश का पहला कौमी तराना जगन्नाथ आजाद ने लिखा तो इसे कई गायकों ने अपनी आवाज में गाया। इसे रेडियो पाकिस्तान से प्रसारित किया गया और खूब लोकप्रिय भी हुआ।

राकेश झुनझुनवाला का निधन, कहलाते थे शेयर मार्केट के किंग: लॉन्च की थी आकासा एयरलाइंस

शेयर कारोबारी राकेश झुनझुनवाला का निधन हो गया है। वो 62 साल के थे। उन्होंने मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में ली आखिरी साँस ली।

भारत के वॉरेन बफे कहलाने वाले राकेश झुनझुनवाला ने हाल में ही आकासा एयरलाइंस लॉन्च की थीं। आपको बता दें कि उन्हें 2-3 सप्ताह पहले अस्पताल से छुट्टी मिली थी।

मोदी सरकार को दिए थे 10 में से 9 अंक

भारत के सबसे बड़े निवेशक राकेश झुनझुनवाला ने कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ाई और इकॉनमी प्रबंधन के मामले में मोदी सरकार को 10 में से 9 अंक देने की बात कही थी। पत्रकार प्रभु चावला ने ‘इंडिया टुडे’ के शो ‘सीधी बात’ में उनसे ये सवाल पूछा था।

राकेश झुनझुनवाला ने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के उस बयान को याद करते हुए कहा था, जिसमें उन्होंने कहा था कि सरकार जब 100 रुपए देती है तो उसमें से 15 रुपए ही गरीब के पास पहुँचता है। उन्होंने कहा था कि आज स्थिति बदल गई है और सरकार जब 100 रुपए भेजती है तो गरीब के पास 85 रुपए पहुँचते हैं और मात्र 15 रुपए ही गुल होते हैं।

बायकॉट से ही बॉक्स ऑफिस पर डूबा ‘लाल सिंह चड्ढा’: बोले तरण आदर्श- हकीकत से मुँह न मोड़ो, कबूलो इसका असर

बॉलीवुड अभिनेता आमिर खान की फिल्म लाल सिंह चड्ढा का बॉक्स ऑफिस पर बुरा हाल होने के बाद फिल्म आलोचक तरण आदर्श ने अपना बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि कभी भी बहिष्कार के आह्वान को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। इसी के कारण लाल सिंह चड्ढा की हाल खस्ता हुई है

उन्होंने कहा, “बॉयकॉट के आह्वान को नकारना बंद करें कि इससे फिल्मों पर कोई असर नहीं पड़ता। कबूल करो कि बहिष्कार के इन आह्वानों से बॉक्स ऑफिस पर फर्क़ पड़ता है। खासकर लाल सिंह चड्ढा के मामले में ये हुआ है। अब इसका सामना करें।”

लाल सिंह चड्ढा का बुरा हाल

बता दें कि लाल सिंह चड्ढा फिल्म अपनी रिलीज से पहले से ही बॉयकॉट के कारण काफी चर्चा में रही है। लोग इस फिल्म पर बात जरूर कर रहे हैं लेकिन इसे देखने नहीं जा रहे। शुक्रवार को फिल्म का व्यवसाय 6.50-7.00 करोड़ रुपए के बीच सिमट रह गया, जबकि पहले दिन लाल सिंह चड्ढा का व्यवसाय 12 करोड़ रुपए था। इस तरह पहले दिन की अपेक्षा दूसरे दिन के व्यवसाय में 40 प्रतिशत से अधिक की गिरावट देखी गई।

थियेटर में लोगों की अनुपस्थिति को देखते हुए देश भर के कई सिनेमाघर के मालिकों ने शुक्रवार के लिए इसके 1300 शो को रद्द कर दिया था। वहीं, फिल्म रिलीज के दूसरे दिन यानी शुक्रवार को दोपहर से पहले वाले कई शो में दर्शक नहीं जुटे। पहले दिन कुछ ऐसे भी शो रहे जिन में सिर्फ 10-12 दर्शक ही फिल्म देखने पहुँचे।

करीना को भी करनी पड़ रही आखिर में अपील

उल्लेखनीय है कि फिल्म की रिलीज से पहले आमिर खान इस बहिष्कार के आह्वान को देख परेशान थे। वो लगातार दर्शकों से कह रहे थे कि उनकी फिल्म को देखा जाए। लेकिन इस विनती का असर फिल्म रिलीज के बाद नहीं देखने को मिला और हाल वही रहा। फिल्म के प्रदर्शन को देखते हुए करीना कपूर ने एक इंटरव्यू में लोगों से इस फिल्म का बॉयकाट नहीं करने की विनती की थी। उन्होंने कहा था, “कृपया इस फिल्म का बहिष्कार न करें, क्योंकि यह वास्तव में अच्छे सिनेमा का बहिष्कार करने जैसा है। और लोगों ने इस पर बहुत मेहनत की है। ढाई साल से इस फिल्म पर 250 लोगों ने काम किया है।” उ

‘कमीना जिंदा है क्या अब तक’: उधर मौत से जूझ रहे सलमान रुश्दी, इधर भारत के इस्लामी कट्टरपंथियों में जश्न का माहौल

न्यूयॉर्क में सलमान रुश्दी पर हुए हमले के बाद दुनिया भर के बुद्धिजीवी इस घटना पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं। इस बीच कुछ इस्लामी कट्टरपंथियों ने उनपर हुए हमले का जश्न मनाना शुरू कर दिया है। वहीं कुछ को दुख है कि उन्होंने अब तक दम क्यों नहीं तोड़ा।

सोशल मीडिया पर जगह-जगह ट्वीट देखने को मिल रहे हैं जिनमें कहीं कट्टरपंथी इस हमले का स्वागत कर रहे हैं तो कहीं कह रहे हैं कि ये डर अच्छा है।

बीबीसी पर प्रकाशित एक रिपोर्ट, जिसमें बताया गया था कि सलमान ने रुश्दी ने कहा था कि उनका जीवन सामान्य चल रहा है। उसके नीचे शोएब अली ने लिखा, “हाँ अब जिंदगी डर में चलेगी।” वहीं सोहेल रजा ने कहा, “अभी है? कि…”

सलमान रुश्दी पर हुए हमले के वीडियो के नीचे भी इस्लामी कट्टरपंथियों की रुश्दी के विरुद्ध घृणा देखी जा सकती है। एक यूजर पूछता है, “मरा क्या कमीना?” तो आतिफ असलम नाम का मुस्लिम रुश्दी के जिंदा होने पर लिखता है, “कमीना जिंदा है अब तक।”

इसी तरह शीबा लिखती है, “बढ़िया है! मर जाता तो ठीक था।”

अब्दुल माजिद कहता है, “देर आए दुरुस्त आए”

शाहिद कहता है, “पहले तो ये लोग जानबूझ कर इस्लाम के खिलाफ बोलते है, गलियाँ देते है या अल्लाह और उसके रसूल की शान में गुस्ताखियाँ करते हैं, फिर कुछ होता है तो विक्टिम कार्ड खेलते हैं। ऐसे गुस्ताख लोग अपने ऊपर होने वाली हिंसा के लिए खुद जिम्मेदार है। अगर ये गुस्ताखी न करता तो ऐसा न होता।”

इरफानुल्ला कहता है, “खुदा की लाठी बड़ी बेआवाज होती है।”

बता दें कि रुश्दी पर हुए हमले के बाद वह अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे हैं। इस बीच ये हमला देख भारत में जहाँ नुपूर शर्मा को लेकर चिंताएँ बढ़ गई हैं। वहीं बांग्लादेश से भागीं लेखिका तस्लीमा नसरीन भी घबराई हुई हैं। उन्होंने ट्वीट में ध्यान दिलाया है कि कैसे इस्लाम की आलोचना करने वाले 7वीं सदी में भी मारे जाते थे और आज 21वीं सदी पर भी उनपर हमला हो रहा है।

तस्लीमा नसरीन ने आज ट्वीट किया, “इस्लाम के आलोचक पहली दफा 7वीं शताब्दी में मारे गए ते और 21वीं सदी में भी वह मारे जाते हैं। ये लोग तब तक मारे जाते रहेंगे जब तक इस्लाम सुधरता नहीं, उसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अनुमति नहीं मिलती, हिंसा की निंदा नहीं की जाती, कट्टरपंथियों के बनने की जमीं नहीं ध्वस्त होती और कोई किताब पाक मानी जानी बंद नहीं होती। “

CM धामी ने 123 साल पुराने अद्वैत आश्रम में लगाया ध्यान, उत्तराखंड में 20 लाख तिरंगा वितरण का लक्ष्य: चंपावत में भागवत कथा का शुभारंभ

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने शनिवार (13 अगस्त, 2022) सुबह अद्वैत आश्रम, मायावती के प्रांगण में आश्रम के सेवा दल के साथ ‘हर घर तिरंगा अभियान’ के अंतर्गत तिरंगा यात्रा निकाली। साथ ही उन्होंने लोहाघाट (चंपावत) स्थित ऋषेश्वर मंदिर में पूजा-अर्चना भी की। सीएम ने श्रीमद्भागवत कथा के कलश यात्रा का शुभारंभ भी किया। मुख्यमंत्री ने रक्षाबंधन से जुड़े एक कार्यक्रम में भी शिरकत की, जहाँ कई महिलाओं ने उन्हें रखी बाँधी।

सीएम धामी ने इस दौरान कहा, “आज रक्षाबंधन कार्यक्रम में आए हुए आप सभी भाई-बहनों को मैं हाथ जोड़कर नमन करता हूँ। आप सभी ने 2017 में और 2022 में कैलाश दा को यहाँ से जीता कर भेजा, और जब मैं आप सभी के बीच में आपका आशीर्वाद लेने के लिए आया तो आप सभी ने 94% मत देकर कई रिकॉर्ड तोड़ दिए। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले 8 सालों से देश निरंतर आगे बढ़ रहा है।” सीएम धामी ने भारत-नेपाल सीमा पर स्थित मंच गाँव में भी तिरंगा यात्रा में भाग लिया।

सीएम धामी ने इस दौरान जानकारी दी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘स्वच्छ भारत अभियान ‘के तहत पूरे देश में करोड़ों शौचालय बनवाने का कार्य किया। उन्होंने ध्यान दिलाया कि कैसे ‘गरीब कल्याण योजना’ 2020 से लेकर अभी तक चल रही है, जिसके अंतर्गत करोड़ों लोगों को मुफ्त राशन दिया जा रहा है। साथ ही याद दिलाया कि जब पूरे विश्व में कोविड-19 महामारी आई तो प्रधानमंत्री के नेतृत्व में भारत ने ना सिर्फ अपने लिए वैक्सीन बनाई, बल्कि 20 करोड वैक्सीन दूसरे देशों को भी निर्यात की।

सीएम धामी ने गिनाया कि ‘उज्जवला गैस योजना’ के द्वारा पीएम मोदी ने करोड़ों माताओं-बहनों के आँसू पोंछने का कार्य किया है। साथ ही बताया कि ‘प्रधानमंत्री आवास योजना’ के अंतर्गत पीएम मोदी ने जरूरतमंदों को घर देने का कार्य किया है। उन्होंने कहा कि आज मोदी जी के नेतृत्व में एक शक्तिशाली और समृद्ध भारत बन रहा है और आज जो योजनाएँ बन रही हैं, वह पंक्ति के अंतिम छोर में खड़े व्यक्ति को ध्यान में रखते हुए बन रही हैं।

सीएम धामी ने गोरलचौड़ मैदान मार्ग, चम्पावत में मुख्यमंत्री कैंप कार्यालय का विधिवत पूजा-अर्चना करते हुए उद्घाटन किया। इस अवसर पर उन्होंने पर्यावरण संरक्षण का संदेश देते हुए पौधारोपण भी किया। अद्वैत आश्रम के सेवा दल के साथ उन्होंने ‘हर घर तिरंगा’ यात्रा भी निकाली। इस आश्रम की कल्पना स्वामी विवेकानंद ने की थी। इसे मार्च 1899 में बनाया गया था। उन्होंने यहाँ ध्यान भी किया। उत्तराखंड में 20 लाख घरों में तिरंगा वितरण का लक्ष्य है।

‘यूक्रेन युद्ध में दूसरे देशों के लोगों के लिए भी सुरक्षा कवच बन गया था तिरंगा’: कॉमनवेल्थ के चैंपियंस से मिले PM मोदी, बताई भारत के राष्ट्रध्वज की ताकत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कॉमनवेल्थ गेम्स 2022 में हिस्सा लेने वाले भारतीय खिलाड़ियों से मुलाकात की और उन्हें उनके प्रदर्शन के लिए शुभकामनाएँ दी। इस दौरान पीएम मोदी ने कहा कि तिरंगे की ताकत क्या होती है, ये हमने कुछ समय पहले ही यूक्रेन में देखा है। उन्होंने बताया कि कैसे तिरंगा युद्धक्षेत्र से बाहर निकलने में भारतीयों का ही नहीं, बल्कि दूसरे देशों के लोगों के लिए भी सुरक्षा कवच बन गया था। उन्होंने खिलाड़ियों का उत्साह बढ़ाया और आगे के लिए उनमें जोश भरा। साथ ही उन्हें स्कूली बच्चों से मिलने और उनका मार्गदर्शन करने की प्रक्रिया जारी रखने की सलाह दी।

पीएम मोदी ने खिलाड़ियों से कहा, “आप सभी CWG 2022 में मुकाबला कर रहे थे, लेकिन यहाँ करोड़ों भारतीय रतजगा कर रहे थे। देर रात तक आपके हर एक्शन, हर मूव पर देशवासियों की नजर थी। बहुत से लोग अलार्म लगाकर सोते थे कि आपके प्रदर्शन का अपडेट लेंगे। खेलों के प्रति इस दिलचस्पी, आकर्षण को बढ़ाने में आप सबकी बहुत बड़ी भूमिका है और इसके लिए आप सभी बधाई के पात्र हैं। अपनी बेटियों के प्रदर्शन से तो पूरा देश ही गदगद है। बॉक्सिंग हो, जूडो हो, कुश्ती हो, जिस प्रकार बेटियों ने डॉमिनेट किया, वो अद्भुत है।”

पीएम मोदी ने खिलाड़ियों से कहा कि आप सब देश को सिर्फ एक मेडल नहीं देते, सेलिब्रेट या गर्व करने का अवसर ही नहीं देते, बल्कि ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना को भी सशक्त करते हैं। उन्होंने कहा कि ये खिलाड़ी खेल में ही नहीं, बाकी सेक्टर में भी देश के युवाओं को बेहतर करने के लिए प्रेरित करते हैं। उन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स से पहले का अपना वादा याद दिलाया, जब उन्होंने कहा था कि तमाम व्यस्तताओं के बावजूद खिलाड़ियों के साथ विजय का उत्सव मनाने के लिए वो समय निकालेंगे।

पीएम मोदी ने कहा, “इस बार का हमारा जो प्रदर्शन रहा है, उसका ईमानदार आंकलन सिर्फ मेडल की संख्या से संभव नहीं है। हमारे कितने खिलाड़ी इस बार कड़ी टक्कर देकर लौटे है, ये भी अपने आप में किसी मेडल से कम नहीं है। जो खेल हमारी ताकत रहे हैं उनको तो हम मजबूत कर ही रहे हैं, हम नए खेलों में भी अपनी छाप छोड़ रहे हैं। हॉकी में जिस प्रकार हम अपनी लेगेसी को फिर हासिल कर रहे हैं, इसके लिए दोनों टीमों के प्रयास, उनकी मेहनत, उनके मिजाज उसकी बहुत-बहुत सराहना करता हूँ।”

प्रधानमंत्री ने खिलाड़ियों से कहा कि आप सभी का जिला, राज्य, भाषा भले कोई भी हो, लेकिन आप भारत के मान, अभिमान के लिए, देश की प्रतिष्ठा के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हैं। उन्होंने कहा कि आपकी भी प्रेरणा शक्ति तिरंगा है और तिरंगे की ताकत क्या होती है, ये हमने कुछ समय पहले ही यूक्रेन में देखा है। उन्होंने ख़ुशी जताई कि ‘खेलो इंडिया’ के मंच से निकले अनेक खिलाड़ियों ने इस बार बेहतरीन प्रदर्शन किया है। नए टैलेंट की खोज और उनको पोडियम तक पहुँचाने के प्रयासों को उन्होंने और तेज करने पर बल दिया।

शराबी शौहर, कंफ्यूज बीवी, हत्या को उकसाती अम्मी: घरेलू हिंसा से भरी ‘Darlings’ में ‘खाला-जुल्फी’ की चुम्मी का छौंक, दर्शक भी बोले- ये है बेस्ट सीन

पिछले दिनों नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई आलिया भट्ट और विजय वर्मा की डार्लिंग्स (Darlings) फिल्म काफी चर्चा में थी। इसके दो कारण थे। पहला ये कि इसे लेकर एक पक्ष ने कहा कि इस फिल्म में महिलाओं के खिलाफ होने वाली घरेलू हिंसा का बिलकुल सटीक प्रस्तुतिकरण है, जबकि दूसरे पक्ष का कहना था कि इस फिल्म में पुरुषों के विरुद्ध हिंसा को बढ़ावा देने का प्रयास हुआ है।

दोनों पक्ष अपनी जगह सही थे। फिल्म की शुरुआत में जहाँ हमजा नाम का शराबी शौहर अपनी बीवी बदरू के साथ नशे में धुत होकर मारपीट करता दिखाया जाता है, तो वहीं दूसरे हाफ में 3 साल तक प्रेम के नाम पर हिंसा को सहने वाली बदरू को ‘मिसकैरिज’ हो जाने के बाद एकदम से ‘बदला लेने वाली बीवी’ के रूप में दिखाया जाता है।

वैसे तो फिल्म की स्टोरी जो है वो एक मुस्लिम दंपत्ति हमजा-बदरू के ईर्द-गिर्द घूमती है। पुरुष के साथ किए गए व्यवहार के कारण जहाँ कुछ लोग इस फिल्म न देखने को बोल रहे हैं, वहीं नारीवादी इस फिल्म में आलिया की तारीफ करते हुए इसे देखने की सलाह दे रहे हैं।

आलिया-विजय के अलावा कुछ अन्य कैरेक्टर भी हैं जो एक्टिंग के चलते तारीफें बटोर रहे हैं उनमें बदरू की अम्मी शमशू (शेफाली शाह) और लेखक जुल्फी (रौशन मैथ्यू) भी हैं।

दर्शकों को भा गई खाला-जुल्फी की चुम्मी

फिल्म में बदरू की अम्मी को जुल्फी नाम का ‘असफल लेखक’ खाला कहकर बुलाता है। शुरुआत में ऐसा लगता है जैसे जुल्फी का झुकाव उसकी खाला की बेटी ‘बदरू’ पर है। लेकिन फिल्म खत्म होने से कुछ वक्त पहले सामने आता है कि हकीकत में जुल्फी को तो खाला क्यूट लगती थीं।

इसके बाद क्या? ये जानने के बाद खाला शमशू, जुल्फी को 5 सेकेंड तक चुम्मी देती है और ये सीन घरेलू हिंसा से भरी पूरी फिल्म में हाईलाइट हो जाता है। सोशल मीडिया पर अगर आप देखेंगे तो शराबी शौहर, अवसाद के कारण हिंसक हुई बीवी और हमेशा अपनी बेटी बदरू को उसके शौहर के लिए उकसाती अम्मी के अलावा, यदि डार्लिंग्स किसी वजह से चर्चा में है तो उसका कारण यही है कि लोगों को ये 5 सेकेंड का किसिंग सीन हैरान कर गया।

लोग ‘खाला शमशू’ को क्यूट कह रहे हैं और जुल्फी किरदार की तारीफ कर रहे हैं। फिल्म को लेकर आ रही कड़ी आलोचना और समीक्षाओं के बीच यूजर्स ने इस सीन को राहत देने वाला बताया है। वहीं कुछ लोगों ने तो ये तक कहा कि उन्हें ये फिल्म नहीं पसंद आई क्योंकि इसमें खाला और जुल्फी के रोमांस के सीन इतने कम थे। वहीं कुछ अंदाजा लगा रहे हैं कि शायद खाला ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वो जुल्फी को भ्रमित करना चाहती हों।

मौसी को कहते हैं खाला

आपको बता दें कि मुस्लिम परिवारों में खाला शब्द का प्रयोग मौसी के लिए किया जाता है। जुल्फी भी फिल्म में शमशू को खाला ही कहता दिखता है, जिसकी वजह से अंदाजा नहीं लगता कि ऐसा फिल्म में कुछ दिखाया जा सकता है। हालाँकि फिल्म के खत्म होने से आधा घंटा पहले ऐसा सीन आता है जिससे दर्शकों में दोनों के बीच रोमांस देखने की और इच्छा बढ़ती है। लेकिन बाद में ऐसा नहीं होता। फिल्म का अंत हमजा की मौत से होता है। दिखाया जाता है कि कैसे हमजा की मौत से बदरू आजाद हो गई है और अब वो अपना जीवन जी पाएगी।

क्यों हो रही तारीफ, क्यों है आलोचना?

डार्लिंग्स फिल्म में दिखाए गए हिंसक कंटेंट के कारण ही इसकी आलोचना हो रही हैं। लोगों का कहना ही कि फिल्म में महिला के साथ होती ज्यादती दिखाने का जो प्रयास हुआ है वो सराहनीय है और हर कोई उससे कनेक्ट कर पा रहा है। लेकिन, फिल्म में जो घरेलू हिंसा को रोकने की बजाय पुरुषों के खिलाफ हिंसा करने को बढ़ावा दिया गया है, वो निंदनीय है। फिल्म में ये भी दिखाया गया है कि शमशू ने भी अपने शौहर के अत्याचारों से तंग आकर उसे एक जमाने में कैंची से गोदकर मारा होता है और बाद में वह बेटी से भी वही करने को कहती दिखती है।

‘देखनी ही है तो कचरा नहीं, हिन्दू धर्म की ओरिजिनल फिल्म देखो’: ‘कार्तिकेय 2’ के कायल हुए लोग, अनुपम खेर का भी अभिनय शानदार

बॉलीवुड की दो बिग बजट और मल्टी स्टारर फिल्मों की रिलीज के बीच साउथ इंडियन फ़िल्म इंडस्ट्री की एक फ़िल्म भी शनिवार (13 अगस्त, 2022) रिलीज हो गई है। साउथ की इस फ़िल्म का नाम है ‘कार्तिकेय 2’ (Karthikeya 2), जिसका पहला पार्ट ‘कार्तिकेय’ साल 2014 में बड़े पर्दे पर था।

‘कार्तिकेय 2’ उस समय रिलीज हुई है जबकि बॉलीवुड फिल्मों का बड़े पैमाने पर बॉयकॉट किया जा रहा है। इस बॉयकॉट का ही यह असर रहा कि, आमिर खान (Aamir Khan) जैसे स्टार को ‘इमोशनल ब्लैकमेल’ करने से लेकर माफी तक माँगनी पड़ी है। हालांकि, इसके बाद भी आमिर खान की फ़िल्म ‘लाल सिंह चड्ढा’ (Laal Singh Chaddha) का बॉयकॉट लगातार जारी है।

कार्तिकेय 2 की बात करें तो निखिल सिद्धार्थ (Nikhil Siddharth) और अनुपमा परमेश्वरन इसमें मुख्य किरदारों में हैं। रिलीज डेट बार-बार बदलने के बाद आखिरकार शनिवार को ये बड़े पर्दे पर आ गई। रक्षाबंधन होने के कारण इस बार लंबा वीकेंड है, इसलिए सिनेमाघरों में इस फ़िल्म के लिए काफी भीड़ देखने को मिल रही है।

फिल्म ‘कार्तिकेय 2’ की कहानी की बात करें तो ये फिल्म भगवान श्रीकृष्ण और द्वारका के रहस्यों पर आधारित है। इसमें भगवान की एक भविष्यवाणी होती है, जिससे जुड़े रहस्यों पर पर्दा उठाने के लिए ही पूरी कहानी गढ़ी गई है। इस भविष्यवाणी के बाद डॉ कार्तिकेय, यानी निखिल सिद्धार्थ और उनकी माँ भगवान श्रीकृष्ण की पवित्र नगरी द्वारका की यात्रा करते हैं।

इस यात्रा के दौरान ही डॉ कार्तिकेय (निखिल सिद्धार्थ के किरदार का नाम) को भगवान श्रीकृष्ण की भविष्यवाणी और रहस्यों का बारे में पता चलता है। कार्तिकेय यह जानना चाहता है कि आखिर यह कौन सा रहस्य है और इसका समाधान कैसे किया जाए।

इस फ़िल्म का डायरेक्शन और कहानी चंदू मोंडेती की है। मोंडेती थ्रिलर फ़िल्म के लिए जाने जाते हैं, वह इतिहास को वर्तमान से और वर्तमान को इतिहास से जोड़ने के बेहतरीन लेखन के लिए मशहूर हैं। फ़िल्म में निखिल सिद्धार्थ, अनुपम खेर के अलावा अनुपमा परमेश्वरन, श्रीनिवास रेड्डी, विवा हर्षा और आदित्य मेनन भी शानदार भूमिका में हैं।

फिल्म का प्रोडक्शन टीजी विश्व प्रसाद और अभिषेक अग्रवाल ने किया है, जबकि पीपल मीडिया फैक्ट्री और अभिषेक अग्रवाल आर्ट्स द्वारा इसे प्रेजेन्ट किया गया है। इस फिल्म की कोरियोग्राफी कार्तिक घट्टामनेनी ने की है और म्यूजिक मशहूर संगीतकार काला भैरव का है।

दर्शकों का कहना है कि कहानी का फ्लो पूरी मूवी में बेहद शानदार है। फ़िल्म के पहले हाफ को फैंस जहाँ अच्छा कह रहे हैं, वहीं सेकंड हाफ को उससे भी बेहतर बता रहे हैं।

कार्तिकेय 2 देखने के बाद फैंस बेहद खुश नजर आए और उन्होंने सोशल मीडिया पर अलग-अलग तरह की प्रतिक्रिया दी है। ऊपर संलग्न ट्वीट्स में आप उन प्रतिक्रियाओं को देख सकते हैं।

‘खुद हटा लिए जाने चाहिए विकास के आड़े आने वाले मजहबी स्थल’: बोले केंद्रीय मंत्री – अनिवार्य हो इजरायल जैसी सैन्य ट्रेनिंग, तिरंगे का विरोधी राष्ट्रप्रेमी नहीं

आजादी के 75 वर्ष पूरे होने पर देश भर में ‘अमृत महोत्सव’ मनाया जा रहा है। तमाम कार्यक्रमों और आयोजनों के बीच जो सबसे ज्यादा आकर्षण का केंद्र है, वो है ‘हर घर तिरंगा’ अभियान। इस मौके पर जहाँ एक तरफ देश भर में उत्साह तिरंगा यात्राएँ निकाली जा रहीं हैं तो दूसरी तरह कुछ वामपंथी व कट्टरपंथी तत्व इस अभियान का विरोध भी कर रहे हैं। ऑपइंडिया ने इस पूरे मामले पर भारत सरकार के आवासन एवं शहरी कार्य राज्यमंत्री व लखनऊ के मोहनलालगंज संसदीय सीट से सांसद कौशल किशोर से बात की।

75 सप्ताह पहले ही प्रधानमंत्री ने कर दी थी घोषणा

कौशल किशोर ने तिरंगा यात्रा का विरोध करने वालों को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा, “आजादी के अमृत महोत्सव की घोषणा प्रधानमंत्री मोदी ने 75 सप्ताह पहले ही कर दी थी। इसमें अमृत सरोवर बनाने, प्रधानमंत्री स्व-रोजगार योजना का लाभ पाए 75 जिलों के स्ट्रीट वेंडरों (रेहड़ी-पटरी वालों) का सम्मेलन जैसे तमाम काम हो रहे हैं। यह पूरे देश का एक राष्ट्रव्यापी उत्सव है। लोगों से तिरंगा आदान-प्रदान करने को भी कहा गया है।”

तिरंगे का विरोधी राष्ट्रप्रेमी नहीं हो सकता

कौशल किशोर ने आगे कहा, “तिरंगे या विरोध करने वाले राष्ट्रप्रेमी नहीं हो सकते। राष्ट्रध्वज ही नहीं, पहले राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान का भी विरोध किया जा चुका है। ये विरोधियों के डर और हताशा का परिणाम है। जनता सब कुछ देख रही है और अब वो बहुत जागरूक है। ऐसी हरकतें खुद विरोधियों के लिए ही घातक हैं। इसमें भी जो विरोध कर रहे हैं इसका मतलब उनके अंदर राष्ट्रप्रेम नहीं है।”

इजरायल जैसी सैन्य ट्रेनिंग से खत्म हो सकता है आतंकवाद

केंद्रीय राज्यमंत्री ने आगे बताया, “इजरायल एक ऐसा देश है जहाँ किसान से ले कर अधिकारी तक के बेटों को अनिवार्य सैन्य ट्रेनिंग दी जाती है। अगर यही ट्रेनिंग भारत में भी शुरू कर दी जाए तो युवाओं में पहले से कूट-कूट का भरा देशप्रेम और अधिक निखर कर बाहर आएगा। इसी के बाद आतंकवाद और जातिवाद की तरफ युवाओं को बहकाने वालों की साजिशें नाकाम होंगी। किसी भी देश की अच्छी बातें अपनाने में दिक्कत क्या है? भारत को इजरायल बनाने की विरोध स्वरूप बातें करने वाले नादानी में ऐसा कर रहे हैं।”

ऑपइंडिया से बात करते केंद्रीय नगर विकास राज्यमंत्री कौशल किशोर

आत्मनिर्भर भारत के नारे के बाद 300 प्रोडक्ट देश में बनने लगे

कौशल किशोर ने आगे कहा, “प्रधानमंत्री मोदी के आत्मनिर्भर भारत की निर्माण की पहल से पहले 300 प्रोडक्ट ऐसे थे जो विदेश से खरीदे जाते थे। अब वो सब उत्पाद भारत में ही बनने लगे हैं। हमारा देश अब आत्मनिर्भर भारत बनने की राह पर है। असल में इन सभी बातों का विरोध करने वालों को इजरायल या किसी और के बारे में कुछ नहीं पता है। उन्हें सिर्फ मोदी का विरोध करना है। असल में विपक्ष के पास आर्थिक, सामाजिक जैसी कोई भी नीति है ही नहीं।”

डॉलर की कीमत रुपए के मुकाबले पिछली सरकारों में बढ़ी

रुपए की डॉलर के मुकाबले घट रही कीमत के सवाल पर केंद्रीय राज्यमंत्री कौशल किशोर ने कहा, “जब देश आजाद हुआ, तब रुपया डॉलर के लगभग बराबर था। पिछली सरकारों की गलत आर्थिक नीतियों से डॉलर की कीमत रुपए के मुकाबले बढ़ती चली गई जो 70 वर्षों तक लगातार बढ़ती गई। आज जब हमारी सरकार प्रधानमंत्री के नेतृत्व में समाज के सभी वर्गों की भलाई के लिए काम कर रहे हैं तो विपक्ष केवल हमले किए जा रहा है।”

देश के विकास के लिए खुद हटा लेने चाहिए मज़हबी स्थान

नगरों के विकास में अक्सर आड़े आते मज़हबी स्थलों के मुद्दे पर केंद्रीय नगर विकास राज्यमंत्री ने कहा, “आस्था स्थान से नहीं होती है। आस्था का संबंध ऊपर वाले से है। स्थान तो निर्धारित किया जाता है कि हम वहाँ बैठ कर ऊपर वाले की इबादत करेंगे। ऐसे स्थानों को अगर खुद ही आस्थावान या मज़हबी लोग आपसी सहमति से हटा लें तो देश के विकास में तेजी आएगी।”

सलमान रुश्दी की किताब पर सबसे पहले भारत ने ही लगाया था बैन, मुस्लिम तुष्टिकरण में अव्वल थी राजीव गाँधी सरकार: आज तक भड़क रही वो आग

प्रसिद्ध लेखक सलमान रुश्दी (Salman Rushdie) पर शुक्रवार (13 अगस्त, 2022) पर न्यूयॉर्क में एक कार्यक्रम से पहले हमला कर दिया गया। हादी मतार नाम के संदिग्ध ने कई बार चाकू मार कर रुश्दी को गंभीर रूप से घायल कर दिया। फरवरी 1989 में ईरान के अयातुल्ला खुमैनी ने उनकी पुस्तक ‘द सेटेनिक वर्सेज’ को लेकर उनके खिलाफ फतवा जारी किया था। ये भी जानने लायक है कि रुश्दी की किताब को बैन करने वाला पहला देश ईरान, नहीं बल्कि भारत था। अक्टूबर 1988 में सबसे पहले भारत ने इस किताब को बैन कर दिया था।

रुश्दी पर हुए हमले के बाद से एक बार फिर से किताब ‘द सेटेनिक वर्सेज सुर्खियों में आ गई है। यही वो किताब है, जिसके कारण रुश्दी की जान पर 3 दशक से खतरा मँडरा रहा है। ईरान के अयातुल्ला खुमैनी ने 14 फरवरी, 1989 को उनके खिलाफ फतवा जारी किया था। भारत की राजीव गाँधी सरकार ने इसे सबसे पहले बैन कर के अपने ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ वाला रवैया दिखाया।

उस समय के भारत के प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने 1985 में शाह बानो केस में सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलट कर पहले ही जता दिया था कि उनकी सरकार इस्लामी कट्टरपंथियों के सामने झुकी हुई है। इसके बाद ‘द सेटेनिक वर्सेज’ को बैन करके उन्होंने इस्लामवादियों के सामने अपनी गर्दन फिर झुका ली। दिलचस्प बात ये है कि भारत ने कभी भी पुस्तक पर एकमुश्त प्रतिबंध नहीं लगाया, इसकी बजाए, ‘सीमा शुल्क अधिनियम’ के तहत पुस्तक के आयात पर बैन लगाते हुए, वित्त मंत्रालय के माध्यम से किताब को प्रतिबंधित कर दिया गया।

इतना ही नहीं, कॉन्ग्रेस सरकार ने रुश्दी के भारत आने पर भी रोक लगा दी। हालाँकि, इस फैसले को 11 साल बाद 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने हटा दिया।

‘द सेटेनिक वर्सेज’ किताब को पहली बार 26 सितंबर, 1988 को ब्रिटेन में पब्लिश किया गया था। भारत ने इसके आयात पर 10 दिनों के अंदर बैन लगा दिया था। इसके बाद भी किताब की कुछ प्रतियाँ भारतपहुँच चुकी थीं, लेकिन हाल के दिनों में नूपुर शर्मा के समर्थकों का हश्र देखने के बाद हम समझ सकते हैं कि उस समय कोई सामने आकर अपने पास इस किताब की प्रति होने की बात क्यों नहीं स्वीकार रहा था।

इस किताब को बैन करने का आह्वान उस समय कॉन्ग्रेस के सांसद सैयद शहाबुद्दीन और खुर्शीद आलम खान (सलमान खुर्शीद के अब्बा) ने किया था। शहाबुद्दीन ने किताब के खिलाफ एक याचिका दायर की थी। याचिका में इस पुस्तक को सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा बताया गया था। जिसके बाद इस किताब पर बैन लगा दिया गया था। CNN के फरीद जकारिया के अब्बा रफीक जकारिया भी इस किताब को बैन करने के अभियान में सबसे आगे थे।

राजीव गाँधी जैसे कमजोर प्रधानमंत्री ने वही किया, जो उनसे अपेक्षित था। अपनी पार्टी के मुस्लिम सांसदों के दबाव में आकर उन्होंने किताब पर प्रतिबंध लगा दिया। इससे वो आग लगी, जो आज तक जल रही है। भारत में किताब बैन होने के बाद सूडान, बांग्लादेश, श्रीलंका और दक्षिण अफ्रीका में भी इस किताब पर प्रतिबंध लगा दिया गया।

ब्रिटेन, जहाँ ये किताब पहली बार पब्लिश हुई थी, वहाँ इसके खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुआ था। किताब की प्रतियों में आग लगा दी गई थी। इसके बावजूद तत्कालीन प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर की सरकार ने इस किताब को बैन करने से इनकार कर दिया था। ये विरोध जल्द ही पाकिस्तान और उसके बाद अमेरिका में भी फैला।

जब ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खुमैनी ने देखा कि विश्व स्तर पर इस पुस्तक का जबरदस्त विरोध हो रहा है तो वो भी इस विवाद में कूद पड़े। उन्होंने इसके लेखक और प्रकाशकों के खिलाफ फतवा जारी कर दिया। इसके बाद ईरान ने रुश्दी के सिर पर 6 मिलियन डॉलर (अब के 47.77 करोड़ भारतीय रुपए) के इनाम घोषित कर दिया।

फतवे का कोई ‘एक्सपायरी डेट’ तो था नहीं, इसलिए वो आज तक मान्य है। हो सकता है कि इस फतवे ने ही हमलावर हादी मतार को रुश्दी पर हमले के लिए प्रेरित किया हो। अक्टूबर 1988 में राजीव गाँधी ने ‘द सेटेनिक वर्सेज’ को बैन करके जो चिंगारी धधकाई थी, वही आज भी असहिष्णुता की आग को भी भड़का रही है।