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गीता जलाने की करते थे बातें, लेकिन ‘रंगीला रसूल’ के लेखक को मार डाला: नूपुर शर्मा के लिए मौत माँग रहे कट्टरपंथी, भाईचारे की बात कर इतिहास दोहराएगा हिन्दू?

‘टाइम्स नाऊ’ की एक डिबेट में हिस्सा लेते हुए भाजपा की पूर्व प्रवक्ता नुपूर शर्मा पर पैगंबर मुहम्मद के अपमान का आरोप लगा दिया गया, जिसके बाद उनकी जान खतरे में है। उनके विरुद्ध ‘ऑल्ट न्यूज’ के सह-संस्थापक मोहम्मद जुबैर जैसे भारतीय मुसलमानों ने स्थिति को भड़काया और देखते ही देखते वह पैगंबर का अपमान करने वाली घोषित कर दी गईं। इसके बाद अब तमाम इस्लामी संगठन और तालिबान-अलकायदा जैसे आतंकी नुपूर के सिर काटने की माँग कर रहे हैं। वहीं भारत के कुछ संगठन सामने आए हैं जिन्होंने इस्लाम के खिलाफ बोलने वालों को दंड देने के लिए विशेष कानून बनाने की माँग की है।

उत्तर प्रदेश के दारुल उलूम ने माँग की है कि नुपूर शर्मा को दंड दिया जाए। उनका कहना है कि जो कोई इस्लाम के प्रतीकों पर आपत्तिजनक टिप्पणी करके देश में नफरत फैलाने की कोशिश करे उन पर सख्ती से कार्रवाई हो।

अब ये बयान तो ऐसा है कि किसी भी इस्लामी संगठनों से इसकी अपेक्षा की जा सकती है लेकिन दारुल देवबंद के मौलाना मुफ्ती ने कहा है कि वो ऐसा कानून चाहते हैं जिसमें इस्लाम का अपमान करने वालों को सजा दी जाए।

कथिततौर पर मौलाना ने कहा, “मैं हमारे प्रिय पैगंबर पर आपत्तिजनक टिप्पणी की कड़ी निंदा करता हूँ। किसी भी धर्म के अनुयायियों की मजहबी भावनाओं को अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर नहीं आहत किया जा सकता। पैगंबर का अपमान मुस्लिम नहीं सहेंगे।” अपने बयान में उन्होंने कहा कि भारत सरकार को ऐसा विशेष कानून लाना चाहिए जो उन लोगों को सजा दे जो मुस्लिमों के प्रतीकों को निशाना बनाते हों”

मौलाना ने सामाजिक सौहार्दता पर बात करते हुए कहा कि भारत के मुसलमानों को एक विशेष कानून की जरूरत है। उनके मुताबिक, “भारत एक सेकुलर देश है और लोग यहाँ साथ में सदियों से रह रहे हैं। ऐसे में सांप्रदायिक और चरमपंथी न केवल देश की शांति को बिगाड़ रहे हैं बल्कि देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को भी छेड़ रहे हैं।”

शुरू करने से पहले यहाँ थोड़ा अचंभित हो जाते हैं कि देखो कैसे इस्लामी कट्टरपंथी की नफरत भी सामाजिक ताने-बाने की बात कर रही है। जबकि सच ये है कि यही लोग समाज की शांति और लोकाचार को आगजनी, दंगों, प्रदर्शनों और ‘गुस्ताख-ए-रसूल की एक सजा- सिर तन से जुदा’ जैसा नारा देकर छिन्न-भिन्न करते हैं, फिर अपने उसी शिकार को समाज सौहार्दता बिगाड़ने का दोषी देते हैं जिसका ये लोग भावना आहत होने के कारण सिर कलम करना चाहते हैं। इन लोगों का ऐसा ढंग वाकई हैरान करने वाला है क्योंकि ये हर बार यही करते हैं। पहले ये खुद ही किसी बात से आहत होते हैं, फिर दंगों के लिए दौड़ते हैं, हिंसा करते हैं, फिर शांति भंग करने का इल्जाम दूसरे इंसान पर लगाते हैं। ये सब बिलकुल ब्लैकमेल करने के हथकंडों की तरह है। जैसे क्या हम आपका देश जलाकर आप पर इल्जाम लगा दें क्या?

हर बार दोहराए जाने वाले हुए उसी एक पैटर्न के बावजूद ‘विशेष कानून की माँग’ केवल ये है कि मुस्लिम समुदाय की भावनाओं की रक्षा हो सके। कट्टरपंथियों की हिंसा के लिए पीड़ित को दोष देते हुए मौलाना मुफ्ती अब्दुल कासिम ने विशेष कानून को लाने की माँग की है ताकि उन लोगों को सजा हो सके जो मुस्लिमों के प्रतीकों का अपमान करते हैं, उनकी भावनाओं को आहत करते हैं। यही माँग अन्य संगठनों से भी आई है। यहाँ तक बॉलीवुड अभिनेता नसीरुद्दीन शाह तक ने ये कह दिया कि इस्लामी राज्यों में ईशनिंदा करने पर मौत की सजा मिलती है लेकिन भारत में कोई कार्रवाई तक नहीं हुई। भले ही शाह के इस बयान में प्रत्यक्ष रूप से विशेष कानून या मौत की माँग नहीं की गई लेकिन उनकी भावनाएँ साफ थीं कि आज का मुसलमान तभी ज्यादा खुश हो पाएगा जब देश में अलग से सख्त कानून आएगा जो मुस्लिमों की भावना आहत करने वालों को सजा देगा।

शायद किसी को ये विशेष कानून की माँग गैर-हानिकारक और गैर-जरूरी लग सकती है जिस पर शायद अभी हम ध्यान न दें। लेकिन इस दौरान ये पता होना चाहिए कि ये जो भी हो रहा है वह उन्हीं घटनाओं की पुनरावृत्ति है जिसके कारण भारत टूटा।

इस संदर्भ में महाश्य राजपाल को याद करना जरूरी है। उन्होंने रंगीला रसूल नाम से किताब छापी थी और अंत में इसके लिए वो मार दिए गए थे। हमने ज्यादातर इस किताब को लेकर बस यही सुना कि चूँकि महाशय राजपाल ने पैगंबर मोहम्मद पर ‘रंगीला रसूल’ नाम से व्यंग्य प्रकाशित किया था, इसलिए उन्हें मार दिया गया। लेकिन हम ये नहीं जानते कि उन्होंने ऐसा क्यों किया था। दरअसल 1923 में मुस्लिमों ने दो किताब प्रकाशित की थी। एक का नाम था- कृष्णा तेरी गीता जलानी पड़ेगी। इसमें उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण को लेकर अभद्र और अश्लील टिप्पणियाँ की हुई थी। इसके बाद अगली किताब थी- उन्नीसवीं सदी का महर्षि। ये किताब आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती पर अभद्र टिप्पणी करते हुए लिखी गई थी।

इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा लिखी गई इन्हीं किताबों के बदले पंडित चामूपति लाल जो कि महाशय राजपाल के अच्छे दोस्त थे उन्होंने पैगंबर मोहम्मद पर एक व्यंग लिखा और राजपाल से यह वादा लिया कि वो कभी भी इस किताब के लेखक यानी कि उनका नाम किसी को नहीं बताएँगे। शायद वह परिणाम जानते थे। किताब बिन किसी नाम के पब्लिश की गई। लेखक के नाम की जगह लिखा गया- “दूध का दूध, पानी का पानी।”

इस किताब के पब्लिश होने के बाद मुस्लिम समुदाय भड़क उठा। मोहनदास करमचंद गाँधी ने अपनी ‘यंग इंडिया’ में एक तरफा भाईचारे को दर्शाते हुए इस किताब की निंदा की और इस बात को एक सिरे से नजरअंदाज किया गया कि कैसे पहले मुस्लिमों ने हिंदुओं को भड़काया। 1924 में ब्रिटिशों ने इस किताब को बैन कर दिया। किताब के खिलाफ आईपीसी की धारा 153 ए के तहत तमाम केस दर्ज हुए। 1927 में महाश्य राजपाल को ये सबूत देख छोड़ दिया गया कि किताब में जो लिखा था वो सब तथ्यों पर आधारित था, इसलिए ये नहीं कह सकते कि इसने दो गुटों में नफरत बढ़ाई। जब इस किताब को लेकर फैसला कोर्ट ने सुनाया तो मुस्लिम भीड़ तिलमिला गई। उन्होंने दंगे शुरू कर दिए और महाश्य राजपाल का सिर तन से जुदा करने की माँग उठाई गई। नारों में बताया गया कि कैसे महाश्य राजपाल की हत्या शरीया में हलाल है।

जैसे ही मुस्लिम भीड़ उपद्रव पर उतरी उसके बाद 295 ए भी भीड़ की भावनाओं के मद्देनजर उसी साल ले आया गया। उससे पहले महाशय राजपाल को मारने की दो कोशिशें हो चुकी थीं। 

6 अप्रैल, 1929 को वो दिन आया जब एक 19 साल के इल्मुद्दीन नामक बढ़ई ने महाश्य राजपाल के सीने में 8 बार चाकू घोंपकर उन्हें मौत के घाट उतार दिया। जिस समय उन्हें मारा गया वो अपनी दुकान के बाहर बैठे हुए थे। इस घटना से पहले कोर्ट कार्रवाई के दौरान उन्हें ऑफर दिया गया था कि पंडित चामुपति लाल का नाम बता दें। हालाँकि उन्होंने ऐसा करने से मना किया और बाद में मुँह बंद रखने की कीमत चुकाई। महाशय राजपाल के साथ जो हुआ वो सिर्फ किताब प्रकाशित करने के कारण हुआ, वो भी तब जब कोर्ट ने उन्हें रिहा कर दिया था और मुस्लिमों को उनकी भावनाओं के लिए एक कानून भी दे दिया गया था।

घटना के कुछ ही समय बाद ही देश का विभाजन हुआ और देश को तोड़ने वाले वो थे जिन्हें लगा था कि वो मुस्लिमों को शांत करवा लेंगे। ‘रंगीला रसूल’ विवाद के बाद हिंदुओं ने खिलाफत आंदोलन देखा, जिसे कॉन्ग्रेस और मोहनदास करमचंद गाँधी द्वारा समर्थन प्राप्त था। हिंदुओं ने मोहम्मद अली जिन्ना जैसे मुस्लिम नेताओं का उदय भी देखा जिनके कारण देश के टुकड़े हुए।

अब देखें तो रंगीला रसूल ने विभाजन की वजह नहीं था, लेकिन इसे पीछे और विभाजन के पीछे एक सामान्य तार जरूर था- मोहम्मद अली जिन्ना। जिन्ना ने ही महाशय राजपाल के हत्यारे की पैरवी कोर्ट में की थी जिनकी तारीफों के कसीदे आज भी वामपंथियों द्वार पढ़े जाते हैं और उनके सम्मान में गीत लिखे जाते है। पाकिस्तान ने तो जिन्ना का गाजी कहकर भी नवाजा था।

देश का विभाजन मजहबी आधार पर हुआ। ये इसलिए नहीं था कि हिंदुओं ने मुस्लिमों की माँगों को स्वीकार नहीं किया था। ये इसलिए था क्योंकि मुसलमानों को लगने लगा था कि वे यहाँ उत्पीड़ित हो रहे हैं। मुस्लिम समुदाय ने एकजुट होकर आवाज उठाई थी कि वे अपने लिए एक राष्ट्र चहते हैं और अब काफिरों के साथ आगे नहीं रह सकते। इस्लामी राष्ट्रवाद के विचार ने जनमानस को मुख्य रूप से प्रभावित किया, जहाँ उम्माह के प्रति मुस्लिमों का झुकाव भारत की ओर से बहुत ज्यादा था। ये कहा जाने लगा कि मुस्लिम लोग अपनी विशिष्ट मजहबी, सांस्कृतिक और राजनीतिक विचारधारा के साथ एक जगह नहीं रह सकते, इसलिए उन्हें एक अलग राज्य चाहिए।

क्या दो राष्ट्र सिद्धांत मुस्लिम समुदाय द्वारा महसूस की जा रही उत्पीड़न और अलगाव की भावना थी, जैसा कि कई वामपंथी इतिहासकारों ने हमें बताया? या इसे वीर सावरकर द्वारा चलाया गया जैसा कि वो दावा करते हैं? नहीं, बिलकुल नहीं। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के संस्थापक सैयद अहमद खान ने 1876 में कहा था, “मैं ये बात मान चुका हूँ कि हिंदू और मुसलमान कभी भी एक राष्ट्र में नहीं रह सकते क्योंकि इनका मजहब और जीने का तरीका दोनों एक दूसरे अलग है।”  इस कथन के 7 वर्षों बाद सैयद अहमद ने दोबारा अपने बोल दोहराए। उन्होंने कहा, “दोस्तों, भारत में दो महत्वपूर्ण समूह रहते हैं, जिन्हें हिंदुओं और मुसलमान नाम से जाना जाता है। हिंदू या मुसलमान होना आंतरिक विश्वास का मामला है जिसका आपसी संबंधों और बाहरी स्थिति से कोई लेना-देना नहीं है। इसलिए ऊपर वाले का हिस्सा उसपर छोड़ दें और अपने हिस्से की चिंता करें। भारत हम दोनों का घर है। भारत में लंबे समय से रहने के कारण दोनों का खून बदल चुका है।”

12 साल बाद उन्होंने कहा, “मान लो, अंग्रेजी साम्राज्य और सेना देश छोड़ दे। अपने साथ सबी तोपें, उनके शानदार हथियार और अन्य सभी चीजें लेकर चला जाए तो भारत का शासक कौन होगा? क्या ये संभव है कि इन परिस्थितियों में दो समूह मुसलमान और हिंदू एक सिंहासन पर बैठ सकें और सत्ता में बराबर रहें? निश्चित रूप से नहीं। यह आवश्यक है कि उनमें से कोई एक, दूसरे के ऊपर विजय प्राप्त करे। यह सोचना कि दोनों साथ में रह सकेंगे असंभव और अकल्पनीय है। जब तक एक समूह दूसरे समूह के ऊपर विजय प्राप्त नहीं कर लेता, उसे अपने अधीन नहीं बना लेता तब तक देश में शांति का शासन नहीं होगा।”

जिन्ना ने कहा था, “ये एक ख्वाब ही है कि हिंदू और मुस्लिम एक साथ राष्ट्र बनाएँगे।” जिन्ना ने महाशय राजपाल के हत्यारे की पैरवी के कुछ सालों बाद ही 1940 में मुस्लिम लीग को संबोधित करते हुए कहा था, “हिंदू और मुसलमान दो अलग-अलग धार्मिक दर्शन, सामाजिक रीति-रिवाजों और साहित्यिक परंपराओं से जुड़े हैं। वे न तो अंतर्विवाह करते हैं और न ही एक साथ खाते हैं, और वास्तव में वे दो अलग-अलग सभ्यताओं से संबंधित हैं जो मुख्य रूप से परस्पर विरोधी विचारों और धारणाओं पर आधारित हैं।”

महाशय राजपाल की हत्या ही दो राष्ट्र सिद्धांत थी जिसे एक व्यक्ति के खून से विस्तृत रूप से लिखा गया था। मुस्लिम समुदाय वाकई ये मानता था कि हिंदू और मुसलमानों का रहन-सहन इतना अलग है कि वो लोग कभी शांति से एक साथ नहीं रह सकते। रंगीला रसूल के मामले में देखें जिन्होंने हिंदू देवी-देवताओं के विरुद्ध भड़काऊ बातें लिखीं उसे कभी कोई नुकसान नहीं हुआ। जो शुरुआत में नाराजगी थी उसे भी महात्मा गाँधी और बुद्धिजीवियों द्वारा दबा दी गई। ज्यादातर लोग आज भी नहीं जानते हैं कि रंगीला रसूल हिंदू धर्म पर व्यंग्य करने की एक प्रतिक्रिया थी, न कि कोई मुस्लिमों के विरुद्ध नफरत।

वैसी स्थितियों में मुस्लिमों ने खुद सोच लिया कि हिंदुओं का अपमान स्वीकार्य है लेकिन ‘गुस्तान-ए-रसूल की सजा, सिर तन से जुदा’ है चाहे कानून में इसकी इजाजत हो या न हो। मुस्लिम समgदाय शरीया के मुताबिक जीना चाहते थे फिर चाहे राज्य उन्हें ये अनुमति दे या न दे, उनका इरादा इस इसे छीनना और लागू करके वो करने का था जो होता है- यानी चाकू लेकर महाशय राजपाल की हत्या।

सच्चाई यह है कि जिन्ना ने राजपाल के हत्यारे की पैरवी की थी और ये बताया कि ये कारनामा तो इस्लामी जगत में बहादुरी का प्रमाण है। ये उसी नेता द्वारा किया गया जिसने बाद में मुसलमानों की पाक जमीन तैयार की क्योंकि वो मानते थे काफिरों के लिए मौत की सजा ही जायज है। कोएनराड एल्स्ट ने अपनी पुस्तक ‘डीकोलोनाइजिंग द हिंदू माइंड’ में इसका उल्लेख किया है।

कोएनराड एल्स्ट ने अपनी पुस्तक ‘डीकोलोनाइजिंग द हिंदू माइंड’

आज जब नुपूर शर्मा मामले में दोबारा भावनाओं को आहत होने से बचाने के लिए विशेष कानून की माँग की जा रही है तो हमें इतिहास से सबक लेना होगा।

नुपूर शर्मा ने न केवल देश के कट्टरपंथियों की बल्कि कई इस्लामी देशों की नींव हिला कर रख दी है। उन्होंने जो टिप्पणी की वो लगातार ज्ञानवापी के शिवलिंग का मजाक उड़ता देखने के बाद की। कई मौलानाओं ने शिवलिंग को लेकर कहा था कि हिंदू लिंग की पूजा क्यों करते हैं। कुछ ने सड़क में खड़े किसी भी ढाँचे को शिवलिंग से जोड़ उसका अपमान किया और हिंदू धर्म को एक बर्बर पंथ के रूप में प्रदर्शित करने का प्रयास किया। ये सब सिर्फ इसलिए हुआ क्योंकि हिंदू अपना धार्मिक स्थल वापस चाहते हैं जिन्हें मुस्लिम आक्रमणकारियों ने तोड़ा। रंगीला रसूल मामले की तरह लगता है कि हिंदू समुदाय पर हुए शुरुआती हमले फिर भुला दिए गए थे। हालाँकि नुपूर शर्मा की टिप्पणी ने इसे अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बना दिया। जगह जगह गुस्ताख ए रसूल की एक सजा सिर तन से जुदा बोला जाने लगा, नुपूर के पुतले लगाए गए, उन्हें बीच रास्ते में फाँसी पर लटका दिखाया गया आदि।

ये सड़कों पर उतरती भीड़ बिलकुल वैसी है जैसी रंगीला रसूल का पहला संस्करण देख उतरी थी। ये लोग सच में मानते हैं कि देश का कानून जो काफिरों के राज्य में काफिरों ने बनाया है उससे बड़ा शरीया है।

यदि रंगीला रसूल विवाद और महाशय राजपाल की हत्या टू नेशन थ्योरी का एक एक्शन थी, तो नूपुर शर्मा की घटना इसका एक्शन रीप्ले है।

कम्युनिज्म के जनक माने जाने वाले कार्ल मार्क्स ने सन् 1854 कुरान और इससे निकलने वाले ‘मुस्लिम कानून’ के विषय में कहा था, “ये लोगों के नस्ल और भूगोल को स्पष्ट शब्दों में सिर्फ दो वर्गों में विभाजित कर देता है – इस्लाम में विश्वास रखने वाले, अर्थात मुस्लिम और दूसरा काफिर। काफिर, मतलब उनका दुश्मन। इस्लाम ‘काफिर’ के विषय में जो सिद्धांत देता है, उससे मुस्लिमों और गैर-मुस्लिमों के बीच अनंत काल तक दुश्मनी की व्यवस्था बनी रहेगी।”

उस समय में मोहनदास करमचंद गाँधी ने महाशय राजपाल की निंदा की लेकिन उपद्रवी भीड़ की नहीं। इसके बाद गाँधी ने मोपला मुसलमानों को सराहा और खिलाफत को समर्थन देकर हिंदुओं को उनके ही नरसंहार का जिम्मेदार ठहरा दिया। उस समय भी हमने देखा था कि इस्लामवादियों की भावना के मद्देनजर कैसे कानून ले आया गया।

आज हम लिबरलों को कट्टरपंथी भीड़ की निंदा करने की बजाय नुपूर शर्मा की निंदा करते देखते हैं। हमारे पास ऐसे राजनेता हैं जो नुपूर शर्मा को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा देते हैं ताकि इस्लामी देशों से उनके संबंध न खराब हों जिसके बाद मुस्लिम भीड़ सड़कों पर आती है और जुमा नमाज के बाद दंगे करती है। आज हमारे पास वो लोग हैं जो इस्लामी कट्टरपंथ के अस्तित्व को नकारते हैं जिससे भारत जूझ रहा है और दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगों को मुस्लिमों के विरुद्ध रची गई साजिश बताते हैं। आज हमें कट्टरपंथी भावना को दूर भगाने के लिए विशेष कानून की जरूरत लगती है।

भारत एक बहुत संवेदनशील मुकाम पर खड़ा है। हमने पहले भी दो राष्ट्र सिद्धांत के एक्शन में होने को नकारा था और आँख मूंदे रहना चुना था और अगर आज भी हम दोबारा भाईचारे, बहुलवाद, समकालिक संस्कृति जैसे शब्दों पर विचार को केंद्रित करके गलती दोहराना चुनते हैं तो वो समय दूर नहीं जब दोबारा से माँ भारती पर खतरा मंडराएगा। एक समय आएगा जब हम सोचेंगे कि काश हम भारत के पहले विभाजत से सीख ले लेते – और उस दिन हम अपने बच्चों की ओर देखेंगे और उन्हें ये समझाना कठिन होगा कि हमने उस चीज के लिए कुछ भी क्यों नहीं किया जिसे हम रोक सकते थे।

नोट: ये आर्टिकल ऑपइंडिया की चीफ एडिटर नुपूर शर्मा के मूल लेख पर आधारित है। आप लिंक पर क्लिक कर उसे पढ़ सकते हैं। इसका अनुवाद जयन्ती मिश्रा ने किया है।

कानपुर में रुपए देकर मदरसे के बच्चों से कराई पत्थरबाजी, बिरयानी खिलाकर पढ़ाया गया मजहबी कट्टरता का पाठ: CCTV फुटेज से हुआ खुलासा

उत्तर प्रदेश के कानपुर में 3 जून, 2022 को जुमे की नमाज के बाद हुई हिंसा के मामले में मदरसों में पढ़ने वाले बच्चे पुलिस की रडार पर है। हिंसा के दौरान इन बच्चों ने जमकर पत्थरबाजी की और बम फेंके थे। CCTV फुटेज और वायरल फोटो-वीडियो की जाँच से इस बात की पुष्टि हुई है। इस मामले में राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) के आदेश पर पुलिस ने जाँच शुरू की तो ऐसे कई चौकाने वाले खुलासे हुए।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस की जाँच में यह बात भी सामने आई है कि जिले में हिंसा कराने के लिए मदरसे के बच्चों को पैसे दिए गए थे। यहाँ तक कि हिंसा से पहले उन्हें कई बार बिरयानी भी खिलाई गई। साथ ही बच्चों को मजहबी कट्‌टरता का भी पाठ पढ़ाया गया था।

बता दें कि कश्मीर में पत्थरबाजी करने के लिए आतंकी समूह भी ऐसा करते रहे हैं। जिससे इलाके के मदरसे में पढ़ने वाले छात्र भी अब पुलिस के रडार पर हैं। इसके अलावा एक बार फिर से कानपुर हिंसा के आरोपितों को पाँच दिन की रिमांड पर लेने के लिए कोर्ट में अर्जी दी गई है। वहीं इस मामले में कानपुर पुलिस जल्द ही जाँच पूरी करके अपनी रिपोर्ट NCPCR को सौंपेगी।

रिपोर्ट के अनुसार, JCP आनंद प्रकाश तिवारी ने बताया, “बच्चों का हिंसा में शामिल होना गंभीर बात है। NCPCR ने भी इसका संज्ञान लेते हुए कानपुर पुलिस कमिश्नर विजय सिंह मीणा को जाँच का आदेश दिया है। अभी तक कि जाँच में सामने आया कि नाबालिग बच्चों को रुपए देकर हिंसा के लिए डायवर्ट किया गया।”

उन्होंने बताया कि बच्चों तक फंड सीधे नहीं, बल्कि अलग-अलग चैनल से भेजे गए। यानी इलाके के नेताओं और गली-मोहल्ले के लोगों से रुपए बँटवाए गए। जिससे तय समय पर सैकड़ों नाबालिग हाथ में पत्थर लेकर सड़कों पर उतर आए थे और जमकर पथराव और बमबाजी किया था।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस की जाँच में कानपुर के नामी बिल्डर हाजी वसी समेत आठ बिल्डरों का नाम सामने आया है। जिन्होंने कानपुर हिंसा के मास्टरमाइंड हयात जफर हाशमी को फंडिंग करते थे। पुलिस अब इस बात की भी जाँच कर रही है कि कहीं इस पैसे का इस्तेमाल हिंसा फैलाने के लिए तो नहीं किया गया है।

गौरतलब है कि कानपुर (Kanpur ) में 3 जून को इस्लामिक कट्टरपंथियों द्वारा की गई हिंसा के दौरान पेट्रोल बमों का इस्तेमाल किया गया था। इसको लेकर अब खुलासा हुआ है कि घटना के 48 घंटे पहले ही चरमपंथियों ने सुनियोजित तरीके से बोतलों में पेट्रोल इकट्ठा किया था। हिंसा के दैरान कानपुर में दंगाइयों ने करीब 50 धमाके किए थे।

रिपोर्ट के मुताबिक, कट्टरपंथियों ने शहर के डिप्टी पड़ाव स्थित भारत पेट्रोलियम के पंप से बोतलों में पेट्रोल भरवाया था। सीसीटीवी फुटेज से इसका खुलासा होने के बाद कानपुर के जिलाधिकारी ने पेट्रोल पंप का लाइसेंस कैंसिल कर दिया है। इसके साथ ही सभी 37 पंपों की जाँच के लिए स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम गठित कर दिया था।

UAE ने 4 महीने के लिए सस्पेंड किया भारत से गेहूँ निर्यात: NDTV की खबर पर लिबरल गिरोह की उछल-कूद, यहाँ जानिए असली माजरा

संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने बड़ा कदम उठाते हुए भारत से आयात किए गए गेहूँ और गेहूँ के आटे को दूसरे देशों को निर्यात करने से मना कर दिया है। वहाँ के अर्थव्यवस्था मंत्रालय ने गेंहूँ के वैश्विक व्यापार प्रवाह का हवाला देते हुए अगले 4 महीने के लिए इस निर्यात पर बैन लगा दिया है।

उल्लेखनीय है कि भारत दुनिया का चौथा सबसे बड़ा गेंहूँ उत्पादक देश है। दुबई के कदम को लेकर रॉयटर्स ने एक न्यूज पब्लिश की, जिसे वामपंथी एजेंडा चलाने वाले चैनल NDTV ने ट्वीट किया। फिर क्या था न्यूज को जाने बिना ही कथित लिबरल्स, वामपंथी और इस्लामवादी मोदी सरकार को कोसने में लग गए। किसी ने भी ये आयात और निर्यात में अंतर समझने की कोशिश नहीं की। एनडीटीवी ने ट्वीट किया, “ब्रेकिंग: यूएई भारतीय गेहूँ के निर्यात को चार महीने के लिए बंद करेगा।”

इसके बाद शुरू होती है लिबरल वामपंथियों की अंधी दौड़। इसी क्रम में मिस्टर खान ना में ट्विटर यूजर ने श्रीलंका संकट की ओर इशारा करते हुए कहा कि अगले कुछ दिनों में भारत की हालत श्रीलंका के जैसी होने वाली है।

इस पर पलटवार करते हुए सीमा गुप्ता नाम की यूजर ने कमेंट किया कि बेवकूफ धर्म को निर्यात और आयात के बीच अंतर नहीं समझ आता।

इसी रेस में शामिल होते हुए जसप्रीत सिंह नाम के एक अन्य यूजर ने ट्वीट को समझे बिना कहा, “लगता है कि हमारे विदेशी संबंधों का सत्यानाश करके मानेंगे।”

@AffuRida नाम की एक यूजर ने भी इसी अंधी दौड़ में शामिल होते हुए कहा कि जिस दिन अरब भारत को तेल और गैस की आपूर्ति करना बंद कर देगा तो पूरा देश एक महीने के लिए रुक जाएगा।

फोटो साभार: मद्रासी का ट्विटर अकाउंट

यहीं नहीं, कथित लिबरल एक्ट्रेस रिचा चड्ढा ने भी न्यूज को समझे बिना ही झूठ फैलाने में लग गई। एक्ट्रेस ने लिखा, “नफरत के अंतरराष्ट्रीय आर्थिक प्रभावों का स्वागत है।”

फोटो साभार: ऋचा चड्डा का ट्विटर अकाउंट

ऋचा चड्ढा के आईक्यू पर सवाल उठाते हुए फर्रागो अब्दुल्ला ने कहा कि आईक्यू के इस स्तर पर तो एक्ट्रेस राहुल गाँधी की प्रतियोगी बन सकती हैं।

एनडीटीवी के ट्वीट को समझे बिना हरनीत सिंह नाम की यूजर ने सरकार पर तंज कसने की कोशिश करते हुए कहा कि हम वहाँ बुलडोजर कब भेज रहे हैं।

फोटो साभार: हरनीत सिंह का ट्विटर अकाउंट

क्या है पूरा मामला

गौरतलब है कि रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच पूरी दुनिया में गेंहू की माँग में बढ़ोतरी हुई है। इसी क्रम में भारत ने 14 मई को गेहूँ के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था। हालाँकि, पहले से जारी साख पत्र (एलसी) द्वारा समर्थित और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने की माँग करने वाले देशों को इससे छूट दी गई है। यूएई सरकार के आदेश के मुताबिक, 13 मई से पहले यूएई में लाए गए भारतीय गेहूँ का निर्यात या पुन: निर्यात करने की इच्छा रखने वाली कंपनियों को पहले अर्थव्यवस्था मंत्रालय को आवेदन करना होगा।

‘हर मुस्लिम लड़की हिन्दू से करे शादी, हैदराबाद से बच्चियों को खरीद ले जाते हैं शेख’: बोले तारिक फतेह – हिंसा के लिए मौलवी जिम्मेदार

लेखक तारिक फतेह ने पैगंबर मुहम्मद पर टिप्पणी का आरोप लगा कर नूपुर शर्मा के विरुद्ध हो रहे विरोध प्रदर्शन व हिंसा के ताज़ा घटनाक्रम पर अपनी राय रखी है। कनाडा में रहने वाले पाकिस्तानी मूल के विद्वान तारिक फतेह को इस्लाम के इतिहास पर शोध के लिए जाना जाता है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि भारत का मौजूदा मुस्लिम नेतृत्व आज के हिसाब से नहीं है, ये न तो ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी (FOE)’ को मान्यता देता है, न ही कोई आलोचना बर्दाश्त करता है।

उन्होंने दुनिया भर में मुस्लिमों के पिछड़ने का कारण भी यही बताया। उन्होंने कहा कि भले नूपुर शर्मा का लहजा ठीक न हो, लेकिन उन्होंने शिवलिंग पर की जा रही आपत्तिजनक टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया दी थी। उन्होंने कहा कि मुस्लिम नेतृत्व अभी भी 12वीं शताब्दी में जी रहा है, जहाँ उनका विश्वास लूटमार करने, गर्दन काटने, गर्दन काटने, पत्थरबाजी करने, घर जलाने में है। वरिष्ठ लेखक ने इसे मौजूदा मुस्लिम लीडरशिप की हताशा बताते हुए कहा कि अभी हो रही हिंसा देश का बँटवारा कराने वाली ताकतों का ही काम है।

‘दैनिक भास्कर’ से एक्सक्लूसिव बातचीत करते हुए तारिक फतेह ने कहा कि भारत का मुस्लिम नेतृत्व खुद को उम्माह से जोड़ता है और ये देवबंदी मौलवियों के हाथ में है। उन्होंने कहा कि अब न औरंगजेब जैसे मुग़ल आने वाले हैं, न तैमूर। ये सब कब के मर चुके। उन्होंने हिंसा के लिए मदरसों और मस्जिदों से निकलने वाले नेताओं और देवबंदी मौलवियों को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि दुनिया भर के मुस्लिम ‘कुफ्र पर जीत’ की दुआ माँगते हैं।

उन्होंने कहा कि जब तक ‘काफिर’ शब्द का इस्तेमाल होता रहेगा, भारत का मुस्लिम भारतीय नहीं बन सकेगा। उन्होंने सवाल दागा कि काफिर है कौन – हिन्दू, ईसाई और यहूदी? उन्होंने समाधान बताया कि मुस्लिमों को ऐसी लीडरशिप चाहिए, जो राजनीति और मजहब को अलग रखे। उन्होंने कहा कि कुछ लोगों की सोच है कि क़यामत का दिन तब तक नहीं आएगा, जब तक सारे हिन्दुओं को न मार डाला जाए और मंदिरों को न ध्वस्त किया जाए।

बकौल तारिक फतेह, मुस्लिम भारत को इस नजर से देखते हैं कि इस पर कब्ज़ा करना है। उन्होंने यूपी में दंगाइयों के घरों पर हो रही बुलडोजर कार्रवाई पर कहा कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कानून-व्यवस्था का प्रबंधन करना बेहतर समझते हैं, बेवजह उपद्रव करना मुस्लिमों का कसूर है। उन्होंने अरब की शिकायतों का जश्न मनाने वालों पर कहा कि इन्हें अपना मानना मुश्किल हो जाता है। उन्होंने निशाना साधा कि जिस क़तर में अल्पसंख्यकों को मतदान तक का अधिकार नहीं, वो भारत को ज्ञान दे रहा।

उन्होंने असदुद्दीन ओवैसी जैसों को दरकिनार कर आरिफ मोहम्मद खान जैसे नेताओं को आगे लाने की वकालत करने हुए कहा कि जब शेख लोग हैदराबाद से बाकियों को खरीद कर ले जाते हैं, तब ओवैसी जैसे लोग चुप रहे हैं। उन्होंने ऐसे नेताओं पर अपने हिसाब से संविधान के दुरुपयोग का आरोप लगाते हुए कहा कि वो भारत को इस्लामी रियासत समझते हैं। तारिक फतह ने कहा कि मौलवियों को मारपीट के अलावा कुछ नहीं सूझता। उन्होंने पाकिस्तान में अल्पसंख्यक विरोधी घटनाओं का उदाहरण दिया।

तारिक फतेह ने कहा, “इस्लाम में पैगंबर मुहम्मद के इंतकाल के साथ ही दंगे शुरू हो गए। 18 घंटे तक नबी को दफनाया नहीं जा सका था। जागरूकता के कारण मुस्लिम अब एक्स-मुस्लिम बनते जा रहे। जिन मुस्लिम कट्टरपंथियों के कारण पाकिस्तान बना, वो यहीं रह गए। पैगंबर ने कभी भारत पर कब्ज़ा करने को नहीं कहा। क़तर के प्रति यहाँ के मुस्लिमों की निष्ठा है, जिसकी कोई हैसियत नहीं। PM मोदी ने अपने 8 वर्षों के शासनकाल में मुस्लिमों के विरुद्ध कुछ नहीं कहा। काशी-मथुरा पर मुस्लिम खुद विवाद ख़त्म करने की पहल करें।”

तारिक फतेह ने कहा कि हर मुस्लिम लड़की को हिन्दू लड़के से शादी करनी चाहिए। उन्होंने दिलीप कुमार जैसे अच्छे मुस्लिमों का उदाहरण दिया। उन्होंने शाहरुख़ खान और आमिर खान से अपील की कि वो मौलवियों को अपने घर जाने को कहें। आमिर खान की पत्नी किरण राव ने भारत में डर लगने की बात कही थी। इस पर तारिक फतेह ने उन्हें दुनिया के अन्य मुस्लिमों की हालत देखने की सलाह दी। नसीरुद्दीन शाह को समझदार बताते हुए उन्होंने कहा कि वो कभी-कभी दबाव में आकर गलतबयानी कर जाते हैं।

फटेहाल पाकिस्तान में चाय कटिंग: मंत्री ने कहा- रोज 2 कप चाय पीना कम करो, हम कर्ज लेकर लेकर चाय ला रहे हैं

कंगाली के कगार पर खड़े पाकिस्तान (Pakistan) ने अब अपने लोगों से कम चाय पीने के लिए कहा है, ताकि विदेशी मुद्रा की बचत की जा सके। इसके पहले एक एयरपोर्ट कर्मचारी ने देश में बढ़ते पेट्रोल के दामों को लेकर गधा गाड़ी से ऑफिस पहुँचने की अनुमति माँगी थी।

देश के योजना एवं विकास मंत्री अहसान इकबाल ने मंगलवार (14 जून 2022) को पत्रकारों से कहा कि पाकिस्तानी अपनी चाय की खपत को प्रति दिन ‘एक या दो कप’ कम कर सकते हैं, क्योंकि इसका आयात सरकार पर अतिरिक्त वित्तीय दबाव डाल रहा है।

अहसान इकबाल ने कहा, “हम जो चाय आयात करते हैं, वह कर्ज लेकर आयात की जाती है।” उन्होंने यह भी कहा कि देश में बिजली बचाने के लिए व्यवसायिक प्रतिष्ठानों को समय से पहले ही बंद करना चाहिए।

बता दें कि पाकिस्तान विश्व का सबसे बड़ा चाय आयातक देश है। ऑब्जर्वेटरी ऑफ इकोनॉमिक कॉम्प्लेक्सिटी के अनुसार, 22 करोड़ की जनसंख्या वाला पाकिस्तान साल 2020 में $640 मिलियन (5,001 करोड़ रुपए) से अधिक मूल्य का चाय का आयात किया था।

पाकिस्तान गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा है। वहाँ खाद्य, तेल, गैस से लेकर तमाम चीजों की कीमतों में लगातार वृद्धि देखी जा रही है। इस बीच विदेशी मुद्रा भंडार में भी तेजी से गिरावट दर्ज की गई है। वहाँ का विदेशी मुद्रा भंडार अब सिर्फ दो महीने के आयात के बराबर रह गया है।

रॉयटर्स के अनुसार, पाकिस्तान के केंद्रीय बैंक के पास फरवरी के अंत में विदेशी मुद्रा भंडार $16.3 बिलियन (1274 अरब रुपए) से गिरकर मई में $10 बिलियन (781 अरब रुपए) रह गया है।

वहीं, पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार को बचाने के लिए लोगों से कम चाय पीने की मंत्री इकबाल द्वारा की गई अपील का लोगों ने खूब उपहास उड़ाया। लोगों ने कहा कि चाय की खपत में कटौती करने से देश के आर्थिक संकट पर कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला।

खेत में घुस आया कुत्ता, किसान ने मारी 22 गोली: 2 घंटे तक तड़पने के बाद मर गया, राजस्थान की घटना

राजस्थान के जयपुर में एक किसान ने कुत्ते पर एयर गन से 22 गोलियाँ दाग दीं, जिससे उसकी मौत हो गई। वह कुत्ते के बार-बार खेत घुसने से गुस्साया था। किसान के खिलाफ तूंगा थाने में FIR दर्ज कराई गई है।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक किसान ने बेजुबान जानवर पर अपनी एयर गन से ताबड़तोड़ फायरिंग की थी। इससे कुत्ते की बॉडी में 22 छर्रे घुस गए थे। कुत्ता खेत में करीब 2 घंटे तक दर्द से कराहता रहा। लेकिन किसान को दया नहीं आई। तभी वहाँ से जाते हुए एक शख्स की नजर कुत्ते पर पड़ी। वह तपड़ते कुत्ते को हिंगोनिया गौशाला ले गया, जहाँ उसकी गंभीर स्थिति देखते हुए डॉक्टरों ने उसे पाँच बत्ती स्थित एनिमल हॉस्पिटल रेफर कर दिया है। इलाज के दौरान करीब 2 घंटे बाद कुत्ते की मौत हो गई।

पुलिस का कहना है कि मंगलवार (14 जून 2022) की सुबह करीब 7 बजे बस्सी के निकट मालूकपूरा निवासी सावंत सिंह (55) के खेत में कालू नाम का कुत्ता घुस गया था। जैसे ही सावंत ने खेत में कुत्ते को देखा उसने अपनी एयर गन निकाली और उस पर ताबड़तोड़ गोलियाँ दाग दीं।

गौरतलब है कि पिछले महीने भी राजस्थान के भरतपुर से एक दिल दहलाने वाला वीडियो सामने आया था। यहाँ एक व्यक्ति ने मामूली सी बात पर पालतू कुत्ते को जमीन पर पटक-पटक कर बेहरमी से मार डाला था। वह कुत्ता बाबूलाल गर्ग नाम के एक व्यक्ति का था। पड़ोस के मोहल्ले में रहने वाला अजय कोली जब भी उस रास्ते से गुजरता था, तभी वह कुत्ता उस पर भौंकने लग जाता था। अजय को यह बात बेहद बुरी लगती थी। एक रात शराब के नशे में धुत्त कोली ने कुत्ते के गले में रस्सी बाँधकर उसे जोर-जोर से जमीन पर पटकना शुरू कर दिया। वह तब तक कुत्ते को जमीन पर पटक-पटक कर मारता रहा, जब तक बेजुबान जानवर की मौत नहीं हो गई।

भारत, भगवा और हिंदुत्व का मजाक उड़ाने वाले वीर दास का गुजरात में विरोध, कई शो रद्द होने के बाद बोला हिन्दूफोबिक कॉमेडियन- कोरोना हो गया है

विदेशों में अपने शो के जरिए भारत का अपमान करने वाले कॉमेडियन वीर दास (Vir Das) के गुजरात में होने वाले कुछ शो रद्द कर दिए गए हैं। गुजरात के लोगों ने हिंदूफोबिक कॉमेडियन के खिलाफ विरोध शुरू कर दिया है, जिसके चलते उनके एक के बाद एक शो कैंसिल हो रहे हैं। उनके शो वापी समेत राज्य के चार शहरों में आयोजित किए गए। एबीवीपी और अन्य हिंदू संगठनों ने इन शो का कड़ा विरोध किया है, जिसके कारण कॉमेडियन के कुछ शो रद्द कर दिए गए हैं, जबकि अन्य को रद्द करने की माँग शुरू हो गई।

वीर दास का 15 जून को वापी में होने वाला शो रद्द कर दिया गया है। वडोदरा में भी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने 17 जून को होने वाले शो को रद्द करने को कहा है। वहीं, सूरत में भी एबीवीपी ने कार्यक्रम में राष्ट्र विरोधी गतिविधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की चेतावनी दी है। वडोदरा में एबीवीपी ने कलेक्टर, नगर आयुक्त और पुलिस आयुक्त को ज्ञापन देकर 17 जून को कॉमेडियन वीर दास का शो रद्द करने की माँग की है।

इस संबंध में ऑपइंडिया से बात करते हुए एबीवीपी वडोदरा शहर के प्रभारी व्रज भट्ट ने कहा, “वीर दास ने इससे पहले अपने शो में भारत के लिए अपमानजनक टिप्पणी की है। अब उनका शो वडोदरा में आयोजित किया जा रहा है। हिंदू मंदिरों पर अपमानजनक टिप्पणी करना और सस्ते प्रचार के लिए कॉमेडी के नाम पर भारत के खिलाफ बोलना यहाँ स्वागत योग्य नहीं है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने शो को रद्द करने की माँग की है। हमने इस संबंध में कलेक्टर, पुलिस आयुक्त और नगर आयुक्त को ज्ञापन सौंपा है। अगर यह शो रद्द नहीं किया गया तो हम विरोध प्रदर्शन का रास्ता अपनाएँगे।”

वडोदरा पुलिस सूत्रों के मुताबिक, मामले की जाँच की गई है और एबीवीपी द्वारा इसे रद्द करने का अनुरोध किए जाने के बाद आयोजकों से भी संपर्क किया जा रहा है। यदि शहर में लोगों की भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाला ऐसा कोई शो आयोजित किया जाता है, तो पुलिस देश में पहले से ही व्याप्त सांप्रदायिक तनाव को देखते हुए इस शो को प्रतिबंधित करने के लिए आवश्यक कदम उठाएगी।

वापी में VHP सदस्यों ने अधिकारियों को सौंपा ज्ञापन (फोटो साभार: ऑपइंडिया)

विश्व हिंदू परिषद के सदस्यों ने वापी प्रशासन के अधिकारियों को एक ज्ञापन सौंपा, जिसके बाद वीर दास का शो रद्द कर दिया गया। बुधवार (15 जून 2022) को विहिप ने वापी में आयोजित होने वाले कॉमेडियन के कार्यक्रम को रद्द करने के लिए वलसाड जिला कलेक्टर को भी एक ज्ञापन सौंपा। विश्व हिंदू परिषद ने शो को रद्द करने की माँग करते हुए कहा कि कॉमेडियन के कार्यक्रम में राष्ट्र विरोधी टिप्पणी और देवताओं को लेकर जोक्स किए जा सकते हैं। इससे न केवल वापी में बल्कि वलसाड जिले में भी सद्भाव खराब कर सकता है। वीएचपी के हस्तक्षेप के बाद वीर दास का वापी शो बंद कर दिया गया है। ऑपइंडिया से बात करते हुए, वापी में हॉल के प्रबंधन ने भी इसकी पुष्टि की है।

सूरत में भी एबीवीपी के सदस्यों ने वीर दास के शो के विरोध में आवाज उठाई है। ऑपइंडिया से बात करते हुए, एबीवीपी नेता हिमालय सिंह जाला ने कहा, “यदि कार्यक्रम में किसी भी तरह से हिंदू विरोधी या भारत विरोधी गतिविधियाँ हुईं, तो एबीवीपी के साथ-साथ अन्य हिंदू संगठन कानूनी कार्रवाई करेंगे। देश का अपमान बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। सूरत में 16 जून को वीर दास का कार्यक्रम आयोजित किया गया है।”

हालाँकि, 15 जून को होने वाला वापी शो रद्द होने के बाद वीर दास ने अपने फॉलोअर्स को ट्वीट करके बताया कि उन्हें कोरोना हो गया है। इसलिए वह गुजरात में होने वाला शो नहीं कर पाएँगे। उन्होंने लिखा, “गुजरात। अब कोरोना के लक्षण दिखने लगे हैं। मैं RTPCR टेस्ट कराने जा रहा हूँ। हमारी टीम गुजरात के लिए नई डेट्स पर काम कर रही है, जब भी वेन्यू उपलब्ध होंगे। आपके टिकट वापस कर दिए जाएँगे। सॉरी गुजरात! मुझे आशा है कि आप नई डेट्स पर वापस आएँगे।”

बता दें कि वीर दास वही विवादित कॉमेडियन है जिसने पिछले साल 16 नवंबर को अमेरिका के जॉन एफ केनेडी सेंटर में 7 मिनट तक भारत विरोधी प्रोपगेंडा को जमकर हवा दी थी। अपने वन लाइनर्स की मदद से उसने भारत को, भारत की राजनीति को, स्थानीय मुद्दों को, पीएम मोदी को खूब कोसा था और हर प्रोपगेंडाबाज की तरह उसने भारत में नारी को पूजने की जो परंपरा है उसे रेप से जोड़ा था।

इसके अलावा मंच पर खड़े होकर वीर दास ने कहा था, “मैं उस भारत से आता हूँ जहाँ महिला को सुबह पूजा जाता है और रात में गैंगरेप होता।” वीर दास की वन लाइनर्स में अजीब बात ये थी कि उसने अमेरिका में खड़े होकर भारत में हो रहे रेपों के बारे में बात की थी, लेकिन ये भूल गया था कि अमेरिका रेप मामलों में कई देशों से बहुत आगे है। वीर दास ने अपनी कॉमेडी के जरिए हिंदुओं को असहिष्णु दिखाते हुए भगवा रंग का भी मखौल उड़ाया था। साथ ही साथ भारत-पाकिस्तान मैच को लेकर क्रिकेट पर भी तंज कसा था। इसके बाद वैश्विक स्तर पर पीएम केयर फंड पर वीर दास ने सवाल उठाए थे और स्थानीय मुद्दों को भी उठाने से वीर दास ने गुरेज नहीं किया था।

जानलेवा मोमोज: दिल्ली में 50 साल के व्यक्ति की मौत के बाद AIIMS ने किया अलर्ट, कहा- अच्छे से चबाए बिना निगला तो घोंट सकता है दम

दिल्ली में एक 50 साल के व्यक्ति की मौत मोमोज (Momos) खाने से होने की बात सामने आई है। इस तरह मौत का यह देश की राजधानी में पहला केस बताया जा रहा है। दक्षिणी दिल्ली से इस व्यक्ति को मृत अवस्था में एम्स लाया गया था। पुलिस की पड़ताल से पता चला कि रेस्टोरेंट में खाना खाते वक्त वह गिर गया था।

दरअसल इस व्यक्ति की मौत गला चोक होने की वजह से हुई थी। पोस्टमार्टम से पता चला कि ऐसा मोमोज खाने की व​जह से हुआ। गले 5×3 सेंटीमीटर साइज का मोमोज फँसने के बाद दम घुटने से उसकी मौत हुई। शव के CT स्कैन से साँस की नली में कुछ फँसने की बात सामने आई थी।

जर्नल ऑफ फॉरेंसिक इमेजिंग के नवीनतम संस्करण में इस संबंध में रिपोर्ट प्रकाशित हुई है। मिंट ने AIIMS के फोरेंसिक विभाग के प्रमुख डॉ. सुधीर गुप्ता के हवाले से बताया है, “यह निष्कर्ष चिकित्सकीय राय के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। लेकिन इसका पता केवल CT Scan से ही चल सकता है। परंपरागत विजुअल पोस्टमार्टम में इसका पता नहीं लगाया जा सकता है।”

AIIMS की चेतावनी

मोमोज से मौत के पहले मामले के सामने आने के बाद दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) के विशेषज्ञों ने खाना खाते समय सावधानी बरतने की चेतावनी दी है। एम्स के फोरेंसिक विशेषज्ञों का कहना है कि मोमोज एक लोकप्रिय स्ट्रीट फूड है। लेकिन मैदे और तेल के इस्तेमाल की वजह से यह काफी स्लिपरी (चिकना) होता है। यदि अच्छी तरह चबाए बिना इसे निगला जाए तो यह गले में फँस सकता है। ऐसा होने पर दम घुटने से व्यक्ति की मौत भी हो सकती है।

AIIMS के फोरेंसिक डिपार्टमेंट के एडिशनल प्रोफेसर डॉ. अभिषेक यादव कहते हैं, “स्टीमी मोमोज दिल्ली के पसंदीदा स्ट्रीट फूड में से एक हैं। मोमोज ऊपर से फिसलन भरा और मुलायम होता है, जिसे अगर सही से चबाए बिना ही निगल लिया जाए तो ये घातक हो सकता है। इस मामले में मौत का कारण न्यूरोजेनिक कार्डिएक अरेस्ट था, जो मोमोज खाने के बाद दम घुटने से हुआ था।”

डॉ. यादव ने आगे कहा, “मोमोज 5×3 सेंटीमीटर आकार के होते हैं, जो काफी बड़ा है। लोगों को इसे खाने को लेकर सतर्क रहना चाहिए। जब भी ऐसी घटना हो तो मोमोज खाने वाले के पेट पर तेज दबाव डालने की जरूरत होती है। यह तब तक किया जाना चाहिए, जब तक फँसा भोजन मुँह से बाहर न आ जाए।”

कश्मीरी हिंदू और गौ तस्करों में अंतर क्या, दोनों की मौत एक जैसी: साउथ की हिरोइन साई पल्लवी के विवादित बोल, नक्सली बनकर आ रही पर्दे पर

साउथ की मशहूर अदाकारा साई पल्लवी की एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है। इस वीडियो को लेकर दावा है कि उन्होंने कश्मीर में हुए हिंदुओं के नरसंहार की तुलना गौतस्करों पर होते हमलों से की। उन्होंने कहा कि ये दोनों ही चीजें नहीं होनी चाहिए। उनके इस बयान के बाद अब सोशल मीडिया पर लोग उनकी आलोचना कर रहे हैं।

पल्लवी ने तेलुगु में दिए अपने इंटरव्यू में वामपंथ और दक्षिणपंथ से लेकर कश्मीरी हिंदुओं और गौतस्करों पर अपनी बात की। इस इंटरव्यू में जब उनसे विवेक अग्निहोत्री की ‘द कश्मीर फाइल्स’ को लेकर सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे कश्मीरी पंडित मारे गए। उन्होंने अपनी बात रखते रखते आतंकवादियों द्वारा की गई हिंदुओं की हुई उन निर्मम हत्याओं को, स्थानीयों द्वारा गौतस्करों पर किए गए हमलों से जोड़ा।

उन्होंने कहा, “हाल में कोविड के समय में कुछ मुस्लिम लोग गाय को गाड़ी में ले जा रहे थे तो उन हमला हुआ और जय श्रीराम के नारे लगे। तो अगर आप मजहबी विवाद पर बात करते हैं तो फिर इन दोनों घटनाओं में अंतर क्या गहै? वो तब हुआ। ये अब हुआ। क्या फर्क है? जो बात है वो ये कि हमें हमेशा सही रहना चाहिए बस। अगर हम अच्छे इंसान नहीं हैं। तो ऐसा नहीं हो सकता। अगर आप हैं तो आप न्याय के साथ खड़े होंगे और निष्पक्ष रहेंगे।”

साई पल्लवी के इस बयान को सुनने के बाद अब नेटीजन्स उनके ऊपर भड़के हुए हैं। लोगों का कहना है कि पूरी बातचीत को संभालते-संभालते, खुद को निष्पक्ष दिखाते हुए इन्होंने कश्मीरी पंडितों की तुलना गौतस्करों से कर ही दी। आखिर कौन इन्हें बताएगा कि कश्मीरी पंडित क्यों मारे गए।

कश्मीरी हिंदू नाम के यूजर ने साई को कहा, “पल्लवी, किसी रैंडम मुस्लिम के पीटे जाने में और पूरे समुदाय को जड़ से उखाड़ फेंक देने में फर्क होता है। हमारे दर्द को और गहरा मत करो। आओ और देशो हमारे टूटे घर और दिल। हमने नरसंहार देख लिया पर न्याय का अब भी इंतजार हैं। हर चीज प्रोपेगेंडा नहीं होती।”

बता दें कि साई पल्लवी की आने वाली विराटा परवम है। इस फिल्म में वह नक्सली का रोल निभाएँगे। फिल्म में बाहुबली फेम राणा दग्गूपति भी हैं। उन्होंने नक्सल लीडर का रोल निभाया है।

मुस्लिमों के 2 हथियार- भीड़ और हिंसा: 5 ऐसे मौके जब इस्लामवादियों की बातें कबूल करने को मजबूर हुई भारत सरकार

इस्लामवादियों ने किसी को झुकाने, अपने आधिपत्य को साबित करने और अपने आलोचकों को चुप कराने के लिए हिंसा को रणनीतिक टूल के रूप में हमेशा से इस्तेमाल किया है। सदियों से हिंसा को संस्थागत रूप देकर अपनी धार्मिक हठधर्मिता और मजहब के आलोचनात्मक मूल्यांकन को रोक दिया है।

जब भाजपा की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा ने इस्लामिक हदीसों का उदाहरण देकर इस्लाम के पैगंबर मुहम्मद पर टिप्पणी की तो इस्लामवादियों ने हिंसा करने में कोई हिचकिचाहट नहीं हुई। इतना ही नहीं, इस हिंसा का उपयोग उन्होंने आलोचकों में डर पैदा करने और सरकार पर दबाव बनाने के लिए भी किया।

इस्लामवादी कभी नहीं चाहते कि इस्लाम की शिक्षाओं या पैगंबर मुहम्मद के जीवन की कभी खुली चर्चा की जाए। जो कोई भी इस्लाम या पैगंबर मुहम्मद पर बात करता है, उसे इस्लामवादियों से कड़ी प्रतिक्रिया का सामना करना पड़ता है और वे सड़कों पर हिंसा करते हैं। उनके लिए इस्लाम अहिंसक और उनके पैगंबर आलोच्य नहीं हैं।

अगर किसी ने इस्लाम या पैगंबर के बारे में कुछ कहा तो सड़कों पर उतर पर हिंसा का विद्रुप खेल खेलने से परहेज नहीं करते। ये इस्लामवादी झुंड और प्रचंड हिंसा के इस्तेमाल से सरकारों और अधिकारियों को अपनी बोली मनवाने के लिए मजबूर करने में काफी सफल रहे हैं। उन्होंने इस्लामी सिद्धांतों के सार्वजनिक बहस के किसी भी प्रयास को दबाने और भारत की सहस्राब्दी पुरानी बहुलतावादी संस्कृति को दबाने के लिए हिंसा को वीटो के रूप में इस्तेमाल करने के कौशल में महारत हासिल कर ली है।

भारतीय तटों पर इस्लामी आक्रमणकारियों के आगमन ने खानाबदोश जनजातियों की आदिम संस्कृति को नष्ट किया, जो ‘काफिरों’ और गैर-इस्लामियों के खिलाफ दमन के साधन के रूप में हिंसा का उपयोग करने से नहीं कतराते थे। हिंदुओं, जैनियों, बौद्धों और अन्य धर्मों के लोगों पर अत्याचार किया गया, उन्हें सताया गया और मार डाला गया, क्योंकि उन्होंने अपने धर्म को छोड़ने और इस्लाम को अपनाने से इनकार कर दिया था।

भारत के अधिकांश इतिहास में हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच संघर्ष जारी रहा, क्योंकि मुस्लिम शासकों ने हिंदुओं का नरसंहार किया, उनके पूजा स्थलों को ध्वस्त कर दिया और उनकी महिलाओं को गुलाम के रूप में लिया। पिछली शताब्दी में इस्लामवादियों ने अपनी राजनीतिक और सामाजिक ताकत को मजबूत करने के लिए सड़कों पर हिंसा को एक रणनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया। इस हथियार पर उन्होंने क्या हासिल किया, ऐसे पाँच प्रमुख बिंदुओं की चर्चा करेंगे।

भारतीय दंड संहिता में धारा 295A को शामिल करना

इस्लामवादियों ने अपनी माँगों को आगे बढ़ाने और मौजूदा सरकार से रियायतें हासिल करने के लिए लंबे समय से हिंसा का इस्तेमाल करते रहे हैं। हालाँकि, उनकी पहली सबसे बड़ी उपलब्धि भारतीय दंड संहिता (IPC) में धारा 295A को शामिल करने के साथ आई। धारा 295A किसी भी धर्म या उसके विश्वासों का अपमान कर धार्मिक भावनाओं को आहत करने संबंधित है।

धारा 295A की जड़ें 1927 से जुड़ी हैं, जब हिंदू देवी-देवताओं का मजाक उड़ाने वाले इस्लामवादियों के लगातार उकसावे के जवाब में ‘रंगीला रसूल’ नामक एक पुस्तक प्रकाशित की गई थी। ‘रंगीला रसूल’ शीर्षक से एक पैम्फलेट लॉन्च किया, जो मुहम्मद के घरेलू जीवन पर एक व्यंग्य है।

इसे पैगंबर मुहम्मद का अपमान बताते हुए अविभाजित भारत के मुस्लिमों ने तीखी प्रतिक्रिया दी। इसके विरोध में इस्लामवादी सड़कों पर उतर आए और इसके लेखक और प्रकाशक की गिरफ्तारी की माँग की। प्रकाशक महाशय राजपाल को शुरू में गिरफ्तार किया गया था, लेकिन बाद में अदालत ने उन्हें रिहा कर दिया।

इसके बाद कई जगहों पर मौलानाओं द्वारा भड़काऊ भाषण दिए गए, जिसके बाद दंगे भड़क उठे। जमीयत-उलेमा-ए-हिंद की एक आधिकारिक शाखा अल-जमीयत ने एक लेख में चेतावनी दी थी कि ‘शरिया के तहत पैगंबर का अपमान करने की सजा मौत है और पैगंबर का अपमान करने वालों को मारना कानूनी रूप से जायज है’।

महाशय राजपाल की रिहाई के बाद विरोध और प्रदर्शनों को देखते हुए ब्रिटिश सरकार ने धार्मिक भावनाओं का अपमान करने के खिलाफ एक कानून बनाने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसके बाद साल 1927 में भारतीय दंड संहिता में धारा 295A को सम्मिलित किया गया। हा

हालाँकि, कानून बनने के बाद भी इस्लामवादी ‘गुस्ताख-ए-रसूल की एक ही सजा, सर तन से जुदा’ का का पालन करते रहे और दो साल बाद 1929 में एक 19 वर्षीय इल्म उद दीन नाम के इस्लामवादी ने चाकू मारकर महाशय राजपाल की हत्या कर दी।

भारत का बँटवारा

भारत का विभाजन इतिहास का एक और खूनी अध्याय है, जब इस्लामवादियों ने हिंसा के और हिंदू विरोधी दंगों के जोर पर भारत का बँटवारा कर अपने लिए पाकिस्तान ले लिया। भारत की स्वतंत्रता के वर्षों पहले द्वि-राष्ट्र सिद्धांत देने वाली मुस्लिम लीग ने कट्टरपंथी मुसलमानों को शरिया द्वारा शासित एक इस्लामी देश का वादा करके संगठित किया।

हालाँकि, जब कॉन्ग्रेस ने मुस्लिम लीग की भारत विभाजन के माँग को खारिज कर दिया तो देश भर में हजारों और लाखों इस्लामवादी हिंसा के लिए सड़कों पर उतर आए। इस दौरान दंगे, हिंसा और बर्बरता करके उन्होंने अपनी माँगों को मनवाने के लिए बाध्य किया। अंत में कॉन्ग्रेस भारत विभाजन के लिए सहमत हो गई।

सैटेनिक वर्सेज के कारण छुपने के लिए बाध्य हुए सलमान रुश्दी

लेखक सलमान रुश्दी की 1989 में लिखित ‘द सैटेनिक वर्सेज’ को ईशनिंदा बताकर मुस्लिम समुदाय बड़े पैमाने पर बवाल कर दिया। इस्लामवादियों ने इस किताब को लेकर रुश्दी पर इस्लाम को ‘धोखेबाज, अज्ञानी और यौन रूप से विचलित धर्म’ के रूप में चित्रित करने का आरोप लगाया।

भारत भी रुश्दी की इस किताब से प्रभावित था। इस्लामवादियों के आगे झुकते हुए खुद को लोकतांत्रिक कहने वाला भारत द सैटेनिक वर्सेज पर पहले प्रतिबंध लगाकर कुछ चुनिंदा देशों में से एक बन गया। भारत के गृह मंत्रालय ने तब राजीव गाँधी के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार से सिफारिश की थी कि उक्त पुस्तक के प्रकाशन और बिक्री से भारत में दंगों जैसी स्थिति पैदा हो सकती है।

राजीव गाँधी सरकार ने गृह मंत्रालय की सिफारिश को स्वीकार कर लिया और किताब पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा कर दी। उधर ईरान के अयातुल्ला रूहोल्लाह खुमैनी ने मुस्लिमों से रुश्दी को मारने का फातवा जारी कर दिया था। यहाँ तक ​​कि कॉन्ग्रेस ‘उदारवादी मुस्लिम’ सलमान खुर्शीद ने भी किताब पर प्रतिबंध को सही ठहराया था।

इस्लामवादियों के आगे आत्मसमर्पण करते हुए सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया। हालाँकि, कई इस्लामी मुल्कों ने पुस्तक पर प्रारंभिक प्रतिबंध हटा दिया, लेकिन भारत ने प्रतिबंध को जारी रखा। इस पूरे प्रकरण ने कट्टरपंथी को अपने फैसलों को प्रभावित करने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता के लिए अपनी पुरानी प्रतिबद्धता को कमजोर करने की अनुमति देकर भारत सरकार उनकी आगे की रणनीति को आसान कर दिया।

शाह बानो मामले में राजीव गाँधी द्वारा घुटने टेकना

1986 में राजीव गाँधी की सरकार ने मुस्लिम कट्टरपंथियों के सामने आत्मसमर्पण कर एक खतरनाक मिसाल कायम की। मोहम्मद अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम एवं अन्य मामले को लेकर कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा पारित कानून को भारत के राजनीतिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण क्षण के रूप में याद किया जाता है।

दरअसल, 62 वर्षीय मुस्लिम महिला शाह बानो ने अप्रैल 1978 में अदालत में एक याचिका दायर कर अपने तलाकशुदा पति और इंदौर (मध्य प्रदेश) के वकील मोहम्मद अहमद खान से गुजारा भत्ता की माँग की। शाह बानो के पति खान ने कहा कि वह किसी भी हर्जाने के लिए भुगतान के लिए बाध्य नहीं हैं, क्योंकि वह इस्लामी कानून के तहत उनकी पत्नी नहीं हैं।

दोनों की शादी 1932 में हुई थी और उनके पाँच बच्चे थे- तीन बेटे और दो बेटियाँ। शाह बानो ने अदालत में अपने पाँच बच्चों के लिए भरण-पोषण का दावा दायर किया। अगस्त 1979 में शाह बानो ने स्थानीय अदालत में भरण-पोषण का मामला जीता, जो खान को 25 रुपये प्रति माह के रखरखाव के साथ प्रदान करने का आदेश दिया। हालाँकि, खान ने इस आधार पर दावे को चुनौती दी कि भारत में मुस्लिम पर्सनल लॉ में पति को तलाक के बाद इद्दत अवधि के लिए केवल रखरखाव प्रदान करने की जरूरत होती है।

मामला जब सुप्रीम कोर्ट पहुँचा तब अप्रैल 1985 में एक ऐतिहासिक फैसले में कोर्ट ने शाह बानो के पक्ष में फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालय के फैसले को यह कहते हुए बरकरार रखा कि वह अपने पति द्वारा भरण-पोषण के लिए भुगतान की हकदार थी।

इसके बाद इस्लामवादियों ने हिंसा की अपनी कला का इस्तेमाल करते हुए एक बार फिर हिंसा और डराने-धमकाने का सहारा लिया। मुस्लिम कट्टरपंथियों ने फैसले को मुस्लिम पर्सनल लॉ को कमजोर करने के प्रयास के रूप में इसके खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए।

मुस्लिम कट्टरपंथियों और मौलवियों ने 1984 में चुनी गई तत्कालीन राजीव गाँधी सरकार को मुस्लिम महिला (तलाक पर संरक्षण अधिनियम), 1986 पारित करने के लिए बाध्य किया। इस कानून ने शाह बानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को उलट दिया। इस कानून ने तलाकशुदा मुस्लिम महिला को केवल इद्दत की अवधि के दौरान या तलाक के 90 दिनों तक भरण-पोषण की व्यवस्था की।

इस्लामी कट्टरपंथियों के दबाव में नरसिम्हा राव सरकार ने पूजा स्थल अधिनियम बनाया

1990 के दशक की शुरुआत में राम जन्मभूमि आंदोलन हिंसा और दंगों के साथ जुड़ गया, क्योंकि मुस्लिम कट्टरपंथियों ने विवादित बाबरी ढाँचे को लेकर हिंदू पक्ष की माँग के विरोध में सड़कों पर उतर गए। चूँकि आंदोलन अपने चरम पर था तो इस्लामवादियों का यह दबाव काम नहीं आया और वे रियायत की बात करने लगे।

नतीजतन, केंद्र में नरसिम्हा राव सरकार ने भारत में हिंदुओं द्वारा राम जन्मभूमि जैसे सुधार आंदोलनों को रोकने के उद्देश्य से एक नया कानून बनाया। यह कानून पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम 1991 था।

इस अधिनियम के उद्देश्यों में कहा गया है कि 15 अगस्त 1947 के दिन के स्वरूप वाले किसी पूजा स्थल के रूप या चरित्र में बदलाव से संबंधित को कोई भी वाद मान्य नहीं होगा और न्यायालय ऐस किसी वाद पर विचार नहीं कर सकता। हालाँकि, इसमें अयोध्या के राम मंदिर के मुद्दे को अलग रखा गया था।

इसका मतलब है कि यदि पूजा स्थल 15 अगस्त 1947 को एक मस्जिद है, तो इसका चरित्र एक मस्जिद ही रहेगा, भले ही वह मूल रूप से एक मंदिर क्यों ना हो। इस अधिनियम में पूजा स्थल के स्वरूप में किसी भी तरह के बदलाव की कोशिश के लिए सजा का प्रावधान किया गया है।

इस प्रकार, इस्लामवादी सरकार से अनुकूल कानून हासिल करने में सफल रहे, ताकि भविष्य में उनके कब्जे वाले हिंदू धार्मिक स्थलों को पुनः प्राप्त करने के लिए राम जन्मभूमि जैसा कोई आंदोलन न हो सके।

जब वाराणसी के ज्ञानवापी मस्जिद के वुज़ुखाना के अंदर शिवलिंग की खोज की गई तो इस्लामवादियों ने हिंदुओं को पूजा स्थल अधिनियम- 1991 के प्रावधानों का हवाला दिया और कहा कि वे इस पर दावा नहीं कर सकते।