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‘दादी जैसी नाक वाली’ प्रियंका गाँधी तक बन गई MP, पर बिहार की ‘कोयल’ रह गई बंजर: PM मोदी ने ₹1800 करोड़ से परियोजना को दी धार, 42000 हेक्टेयर जमीन की बुझेगी प्यास

1972 में अखंडित बिहार के सूखा प्रभावित इलाकों की सिंचाई के लिए राज्य सरकार ने एक परियोजना बनाई थी। नाम है- उत्तरी कोयल जलाशय परियोजना (North Koel Reservoir Project)। 53 साल बाद अब इस परियोजना के पूरे होने की उम्मीद जगी है, क्योंकि खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसमें दिलचस्पी ले रहे हैं।

जब इस परियोजना की नींव डली तब इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री थीं। केंद्र से राज्य तक कॉन्ग्रेस का एकछत्र शासन था। बाद के सालों में इंदिरा के बेटे राजीव गाँधी भी प्रधानमंत्री बने। उनकी बहू सोनिया गाँधी लगातार 10 सालों तक पर्दे के पीछे से सरकार हाँकती रहीं। लेकिन इस परियोजना की किसी ने सुध नहीं ली।

आज इंदिरा के पोते राहुल गाँधी में ‘पीएम मटेरियल’ देखने वालों की कमी नहीं है। पोती प्रियंका गाँधी, जिनके समर्थकों का दावा है कि ‘उनकी नाक दादी (इंदिरा) जैसी है’, सांसद बन चुकी हैं। लेकिन कोयल परियोजना के भाग्य नहीं बदले।

5 दशक पहले शुरू हुई थी परियोजना के पूरा होने पर झारखंड और बिहार के चार सूखाग्रस्त जिलों में 42301 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई हो सकेगी। 1972 में शुरू की गई ये परियोजना राजनीति और लालफीताशाही का शिकार हो गई।

वर्षों से लटकी परियोजनाओं की पीएम मोदी ने ली सुध

पीएम मोदी ने इस परियोजना समेत ऐसे लटके हुए दूसरे कई परियोजनाओँ को लेकर समीक्षा बैठक की। पीएम ने कहा कि परियोजनाओं की देरी से दोहरा नुकसान होता है। एक तो लागत बढ़ जाती है, वहीं दूसरी ओर लोग इतने समय तक लाभ से वंचित रह जाते हैं। इसलिए केन्द्र और राज्य के अधिकारी दोनों को मिलकर ऐसी परियोजना को खत्म करने का प्रयास करना चाहिए और लोगों को फायदा पहुँचाने पर काम करना चाहिए।

क्या है उत्तरी कोयल जलाशय परियोजना?

उत्तरी कोयल जलाशय परियोजना एक अंतरराज्यीय सिंचाई परियोजना है जिससे बिहार और झारखंड जुड़े हुए हैं। इसमें झारखंड के लातेहार के कुटकू गाँव से होकर बहने वाली उत्तरी कोयल नदी पर एक बाँध बनाने की योजना है। बाँध से 92 किलोमीटर दूर झारखंड के पलामू जिले के मोहम्मदगंज में बैराज बनेगा और फिर बैराज से दो नहरें निकलेंगी। दाहिनी मुख्य नहर (आरएमसी) और बैराज से बाईं मुख्य नहर (एलएमसी)

इस परियोजना की शुरुआत 1972 में किया गया था। उस वक्त बिहार और झारखंड अलग नहीं हुए थे। परियोजना को 1993 में वन विभाग ने रोक लगा दी थी क्योंकि बाँध में पानी जमा होने पर झारखंड के बेतला नेशनल पार्क और पलामू टाइगर रिजर्व को खतरा हो सकता था। काम रुकने के बाद यह परियोजना 71,720 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई के लिए सालाना जल दे रही थी।

2000 में जब बिहार से झारखंड अलग हुआ तो परियोजना के दोनों बैराज और बाँध झारखंड में आ गए। दो नहरों में से एक नहर झारखंड में रह गया जबकि दूसरा नहर बिहार और झारखंड दोनों में चला गया। बिहार में ये 79.08 किलोमीटर तक फैला हुआ है।

2017 में मोदी सरकार ने की थी पहल

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडल समिति ने उत्तरी कोयल जलाशय परियोजना के बाकी बचे कामों के लिए संशोधित 2,430.76 करोड़ रुपए की लागत से पूरा करने के लिए परियोजना को मंजूरी दी। इसमें केन्द्र का हिस्सा 1,836.41 करोड़ रुपए है।

अगस्त 2017 में बचे काम के लिए पहले 1,622.27 करोड़ रुपए को मंजूरी दी गई थी। इसमें केन्द्र का हिस्सा 1,378.60 करोड़ रुपये था। लेकिन अब इसे करीब 800 करोड़ रुपए बढ़ा दिया गया है।

हिन्दुओं को कलमा पढ़वा गोमांस खिलाता था छांगुर पीर, वीडियो भी बनाता था: रिपोर्ट, नेपाल बॉर्डर से सटे इलाकों की बदलना चाहता था डेमोग्राफी, इस्लामी धर्मांतरण गैंग के 5000+ शिकार

छांगुर पीर नेपाल से सटे जिलों में धर्मांतरण का अड्डा स्थापित करने में जुटा था। इसके लिए ₹10 करोड़ खर्च करने की तैयारी थी। 46 गाँवों के हिंदू युवाओं को टारगेट बनाने वाला था। छांगुर तकरीर के बहाने जलसों में पर्चे बाँटकर इन युवाओं की जिहाद के प्रति सोच जानने की कोशिश करता था। इन युवाओं को पैसों से मजबूत कर इस्लाम में परिवर्तन करने की साजिश रची थी।

खलिहान, तालाब और चारगाह की जमीन पर छांगुर का कब्जा

छांगुर की धर्मांतरण नेटवर्क को बढ़ाने के लिए सरकारी जमीनों पर कब्जा करने की प्लानिंग थी। साल 2022 से ही उसकी नजर विवादित और सरकारी जमीनों पर थी। इन जमीनों पर मजार और मदरसा खोलने की तैयारी थी। इसके लिए सरकारी प्रशासनिक अधिकारियों की मदद ले हा था।

ऐसे ही छांगुर ने बलरामपुर के उतरौला में दो जमीनों पर कब्जा किया। इनमें एक जमीन पर आलीशान कोठी बनाई, जिसे प्रशासन ने ध्वस्त करवा दिया है। वहीं दूसरी जमीन पर भी कोठी बनाई है, जिसकी तलाश अभी जारी है। इसके अलावा छांगुर की नजर लालगंज, रेहरामाफी, चपरहिया, बनघुसरा की सरकारी जमीनों पर थी।

उधर, उतरौला में छांगुर ने तहसील अधिकारियों की मिलीभगत से एक बड़े तालाब की जमीन को अपने नाम दर्ज करा लिया। इसी जमीन को 12 नवंबर 2023 को नीतू उर्फ नसरीन के नाम बेच भी दिया। जमीन की खरीद-फरोख्त में ₹1 करोड़ का भुगतान नसरीन से लिए जाने को भी बैनामें में दिखाया गया है।

सामने आईं और पीड़िताएँ

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, छांगुर पीर के धर्मांतरण नेटवर्क में 5000 से अधिक पीड़ित हैं। इनमें से एक लखनऊ की 31 साल की युवती हैं। युवती से 2015 में अमित नाम से अबू अंसारी ने उससे दोस्ती की। छांगुर ने साल 2020 में युवती का निकाह अबू अंसारी से कराकर धर्म परिवर्तन करवा दिया। इसके बाद से युवती के परिवार और दोस्तों ने उससे दूरी बना ली। युवती ने ही सबसे पहले छांगुर के खिलाफ FIR दर्ज कराई थी।

बेंगलुरु की रहने वाली एक युवती ने बताया 2021 में राजू राठौर नाम के युवक से इंस्टाग्राम पर दोस्ती हुई। उसका असली नाम वसीम था। वसीम ने नौकरी का लालच दिया और कहा कि करोड़पति शेख से निकाह कराएगा। फिर फर्जी पासपोर्ट बनवाकर सऊदी अरब बुला लिया। यहाँ छांगुर पीर से वीडियो कॉल पर बात हुई, जिसने धर्म परिवर्तन के लिए ब्रेनवॉश किया। मना करने पर वसीम ने अश्लील वीडियो बनाकर ब्लैकमेल किया। युवती ने 2023 में वापस आकर बेंगलुरु में वसीम के खिलाफ FIR दर्ज कराई।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, बलरामपुर जिले का चौधरीडीह गाँव का युवक भी छांगुर पीर के जाल में फँस गया। युवक ने बताया कि साल 2024 में छांगुर पीर ने धर्म परिवर्तन का दबाव बनाया। विरोध किया तो गुर्गों से जान से मार देने की धमकी दी। इसके बाद से युवक और उसका परिवार छिपकर रह रहा है। युवक ने बताया कि छांगुर ने ₹15 से ₹16 लाख देने का लालच भी दिया। युवक ने आगे बताया कि छांगुर हिंदुओं से कलमा पढ़वाता था और गोमांस भी खिलाता था। इसका वीडियो भी बनाता था।

गल्फ के अल नाहदा और एमिरेट्स NBD बैंकों में छांगुर के खाते

छांगुर ने सऊदी अरब से भी बढ़कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धर्मांतरण का नेटवर्क फैला रखा था। जाँच एजेंसियों को अंतरराष्ट्रीय कट्टरपंथी संगठनों से नेटवर्क जुड़े होने का शक है। छांगुर के करीबी नीतू उर्फ नसरीन और नवीन रोहरा के नाम पर विदेशों से फंडिंग की जाती थी। इससे जुड़े 8 विदेशी बैंकों में खाते मिले हैं।

ATS के अधिकारियों ने बताया कि अल नाहदा, एमिरेट्स NBD, मसरफ बैंक, अल अंसारी एक्सचेंज और वोस्ट्रो बैंक में भी छांगुर के सहयोगियों के खाते हैं। ATS अब पता लगाने में जुटी हैं कि इन खातों में कहाँ से पैसे भेजे जा रहे थे और इनका किस काम के लिए इस्तेमाल होना था।

अफगानिस्तान पर तालिबान का कब्जा होते ही ब्रिटेन ने चुपचाप 4000+ अफगानों को अपने यहाँ बसाया, खर्च किए ₹4600 करोड़: खबर दबाने को कोर्ट से ऑर्डर भी लिया

ब्रिटेन की सरकार चुपचाप 4500 अफगान अपने यहाँ लाकर बसा चुकी है। यह रीलोकेशन प्रक्रिया 2022 के बाद से लगातार चलती आ रही है। इस पर ब्रिटेन हजारों करोड़ रूपए खर्च कर चुका है। यह पूरा खुलासा अब ब्रिटेन के हाई कोर्ट के एक फैसले से हुआ है। अब तक मीडिया को भी इस मामले को रिपोर्ट करने से रोका गया था। ब्रिटेन सरकार को यह फैसला एक डाटा लीक के चलते लेना पड़ा है। अब ब्रिटेन की सरकार सवालों के घेरे में आ गई है।

क्या है मामला?

ब्रिटेन ने जिन लोगों को अफगानिस्तान से लाकर अपने यहाँ बसाया है, उनमें अफगान फ़ौज के पूर्व फौजी और उनके परिवार के साथ ही बाकी लोग शामिल हैं। अब तक यह मामला इसलिए नहीं मीडिया में आया था क्योंकि इस पर एक अदालत से रोक लगा दी गई थी। इस पर रिपोर्टिंग रोक दी गई थी।

जानकारी के अनुसार, फरवरी 2022 में यूके रक्षा मंत्रालय (MoD) के एक अधिकारी ने गलती से एक लिस्ट लीक कर दी थी, इसमें तालिबान के डर से यूके में शरण माँगने वाले करीब 19,000 अफ़गानों के नाम और व्यक्तिगत जानकारियाँ थीं।

यह लीक अगस्त 2023 में सामने आया था, जब यह जानकारियाँ फेसबुक पर वायरल हो गईं थी। इसके चलते हजारों अफगानों की जान सांसत में आ गई थी। इसके बाद, अप्रैल 2024 से ब्रिटेन सरकार ने चुपचाप अफगानों को ब्रिटेन लाना चालू कर दिया। इस प्रक्रिया पर अब तक 400 मिलियन पाउंड (₹46 अरब से अधिक) से खर्च हो चुका है।

यह भी आशंका जताई गई है कि इस पर ब्रिटिश नागरिकों के टैक्स का इतना ही पैसा अभी और खर्च होगा। सामने आया है कि अभी 600 पूर्व अफगान फौजी और उनके 1800 परिजन अफगानिस्तान में हैं और वापस निकाले जाने की राह देख रहे हैं।

इस मामले के खुलासे के बाद ब्रिटेन में पारदर्शिता और टैक्सपेयर के पैसे के उपयोग को लेकर प्रश्न उठे हैं। इस मामले की रिपोर्टिंग पर लगी रोक को हटाने के लिए हाल ही में इंडिपेंडेंट, द टाइम्स, टेलीग्राफ, फाइनेंशियल टाइम्स, प्रेस एसोसिएशन आदि ने कोर्ट में चुनौती दी थी।

डेटा लीक और अफगानों के गुप्त स्थानांतरण का खुलासा

करीब दो साल तक ब्रिटिश जनता को 2022 के डेटा लीक और उसके बाद हुए अफगानों के गुप्त स्थानांतरण के बारे में कुछ नहीं बताया गया, क्योंकि कंज़र्वेटिव सरकार ने 2023 में एक सुपर-इंजंक्शन (गोपनीयता बरतने वाला आदेश) कोर्ट से हासिल कर लिया था।

यह आदेश न केवल लीक की रिपोर्टिंग पर, बल्कि खुद आदेश के अस्तित्व की जानकारी पर भी रोक लगाता था। हाल ही में, जस्टिस चेम्बरलेन ने इस आदेश को हटा दिया। उन्होंने कहा कि इस तरह की गोपनीयता ने ‘लोकतांत्रिक जवाबदेही को पूरी तरह से बंद कर दिया’ और ‘अभिव्यक्ति की आजादी पर गंभीर असर’ भी डाला।

यह इस मामले में चेम्बरलेन का यह चौथा फैसला था। इससे पहले 3 फैसले निजी रूप से दिए गए थे, जो अब प्रकाशित किए जा चुके हैं। अदालती दस्तावेजों से पता चला कि तत्कालीन रक्षा मंत्री बेन वालेस ने खुद इस गुप्त आदेश के लिए आवेदन किया था।

रक्षा मंत्रालय ने बाद में कहा कि तालिबान को शायद पहले से ही डेटा लीक की जानकारी थी, इसलिए रिपोर्टिंग से खतरा ज्यादा नहीं बढ़ता।

सरकार ने माफी माँगी, लेकिन रिलोकेशन पर चुप्पी साधी

ब्रिटिश संसद में रक्षा मंत्री जॉन हीली ने 2022 के अफगान डेटा लीक से प्रभावित लोगों से ‘माफी’ भी माँगी है। उन्होंने इसे एक ‘गंभीर विभागीय गलती’ बताया, जो एक स्प्रेडशीट को सरकारी सिस्टम के बाहर ईमेल करने से हुई थी।

मेट्रोपॉलिटन पुलिस ने इस मामले में कोई आपराधिक जाँच नहीं की है। कंजर्वेटिव नेता केमी बेडेनोच ने भी इस मामले में माफी माँगी और कहा कि ‘किसी ने बहुत बड़ी गलती की है।’ हालाँकि, सरकार ने यह नहीं बताया कि यह लीक करने के जिम्मेदार अधिकारी पर कोई कार्रवाई हुई या नहीं।

इस लीक से प्रभावित अफगानों को सूचित किया गया है और उन्हें ऑनलाइन सतर्क रहने और अनजान संपर्कों से बचने की सलाह दी गई है। रक्षा मंत्रालय ने यह बताने से इनकार कर दिया कि इस लीक से किसी को सही में नुकसान हुआ है या नहीं।

अफगान डेटा लीक से ब्रिटेन पर उठ रहे सवाल

अफगानिस्तान में 20 साल की तैनाती के दौरान ब्रिटिश सेनाएँ अमेरिकी और नाटो सेनाओं के साथ मिलकर काम करती रहीं और उन्होंने स्थानीय अफगान सहयोगियों पर काफी भरोसा किया। 2022 का डेटा लीक न केवल इन सहयोगियों की जान को खतरे में डालता है, बल्कि इससे ब्रिटेन की अपने सहयोगियों की सुरक्षा और वादे निभाने की क्षमता पर भी गंभीर सवाल उठे हैं

रूस के साथ व्यापार किया तो लगेंगे कड़े प्रतिबंध: NATO का भारत-चीन-ब्राजील को अल्टीमेटम, यूक्रेन के साथ संघर्ष रोकने के लिए मॉस्को पर फूटा ट्रंप का ‘टैरिफ बम’

डोनाल्ड ट्रंप के रूस के साथ व्यापार करने पर रोक लगाने के बाद अब NATO ने भी दुनिया भर के देशों को रूस के साथ व्यापार करने पर अल्टीमेटम दिया है। इसमें उन्होंने साफ तौर पर भारत का नाम लिया है।

ट्रंप ने मंगलवार को रूस को चेतावनी दी थी कि यूक्रेन के साथ उसे 50 दिन के अंदर शांति समझौता करना पड़ेगा अन्यथा रूस पर 100% टैरिफ के साथ उसके साथ व्यापार करने वाले अन्य देशों पर भी सेकेंड्री टैरिफ लगाया जाएगा। इस कड़ी में ट्रंप ने NATO के सेक्रेटरी जनरल मार्क रूट से भी मुलाकात की थी।

अपनी मुलाकात में ट्रंप ने रूट से कहा था कि शांति समझौता न करने पर रूस के सामानों पर 100% तक टैरिफ लगेगा। साथ ही जो देश रूस के साथ व्यापार करत है, उश पर भी सेकेंड्री टैरिफ या सैंक्शन लगाए जाएँगे।

ट्रंप का कहना है कि अगर रूस ने युद्ध नहीं रोका तो उससे सामान खरीदने वाले देशों पर वो 100 प्रतिशत का टैरिफ लगा देंगे।

मार्क रूट में कहा है कि ब्राजील, चीन और भारत समेत कोई भी अन्य देश अगर रूस के साथ व्यापार जारी रखता है तो उन देशों पर कड़े प्रतिबंध लगाए जाएँगे। असल में यह सभी प्रतिबंध रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे संघर्ष को रोकने के लिहाज से लगाए जाने की कयास लग रहे हैं। डोनाल्ड ट्रंप इस युद्ध को रोकने के लिए पहले भी कई प्रयास कर चुके हैं लेकिन अब तक वे रूस के सामने विफल रहे हैं। ऐसे में अब वह रूस पर अपना टैरिफ बम फोड़ रहे हैं।

मार्क रूट ने कहा कि अगर आप बीजिंग, दिल्ली या ब्राजील में रहते हैं या वहाँ से आते हैं तो सावधान हो जाइए। यह सेकेंडरी सैंक्शंस आपके लिए नुकसानदायक हो सकते हैं। रूट में सभी देशों से अपील की है कि वह रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को फोन कर शांति वार्ता के लिए समझाएँ अन्यथा सेकेंडरी सैंक्शन से किसी भी देश को बचाया नहीं जा सकता।

रूस के साथ भारत पर भी दबाव

डोनाल्ड ट्रंप करने पर भारत पर पहले भी आपत्ति जाता चुके हैं। हालाँकि अमेरिका की आपत्ति को दरकिनार करते हुए भारत ने रूस के साथ निरंतर व्यापार चालू रखा है। अब रूस पर टैरिफ या अन्य देशों पर सेकेंडरी सैंक्शन लगाने वाले कदम से भारत को भी नुकसान पहुँच सकता है।

गौरतलब है कि अमेरिका ने यूरोपीय यूनियन समेत ब्राज़ील, म्यांमार, बांग्लादेश और कुछ अन्य देशों पर 20 से 50% तक का टैरिफ लगा दिया है। ये टैरिफ 1 अगस्त से लागू होगा। भारत अब तक इस सूची से बाहर है। इसके साथ ही अमेरिका और भारत के बीच ट्रेड डील होने की भी संभावना प्रबल है। ऐसे में इस तरह के सैंक्शन या रूस के साथ व्यापार पर प्रतिबंध का भारत की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ना लाजमी है।

रूस पर नहीं कोई असर

हालाँकि रूस में अभी भी अमेरिका के इस धमकी को नजरअंदाज कर रहा है। शांघाई सहयोग संगठन (SCO) में मंगलवार 15 जुलाई 2025 को विदेश मंत्रियों की बैठक में रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने कहा कि अमेरिका के प्रतिबंधों का सामना करने के लिए मॉस्को पूरी तरह से तैयार है। लावरोव ने आगे कहा कि रूस पहले से ही प्रतिबंधों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में नए प्रतिबंध से निपटने की भी क्षमता रूस के पास मौजूद है।

‘तुम काँवड़ लेकर मत जाना’: बच्चों को भविष्य की सलाह नहीं, वामपंथी प्रोपेगेंडा है बरेली के टीचर की कविता, शिक्षा के बहाने हिन्दुओं की पौध को ही ‘ब्रेनवॉश’ करने का हो रहा प्रयास

उत्तर प्रदेश के बरेली में बच्चों को हिन्दू मान्यताओं के खिलाफ भड़काने वाले एक शिक्षक के ऊपर FIR दर्ज हुई है। इस शिक्षक का नाम रजनीश गंगवार है। उसकी एक वीडियो भी वायरल हो रही है। इसमें वह हाथ में माइक लिए हुए एक कविता सुनाता दिखता है। उसके सामने कई कतार में बच्चे खड़े हैं। वीडियो में रजनीश गंगवार काँवड़ के ऊपर एक कविता गा रहा है। वह कविता के सहारे बच्चों को सलाह देता है कि वह काँवड़ में शामिल ना हों, इसके लिए वह कई कुतर्क भी अपनी कविता में शामिल करता है।

रजनीश की वीडियो वायरल होने के बाद उसके खिलाफ FIR दर्ज हुई तो ट्विटर से लेकर फेसबुक तक लिबरल गैंग रोने लगा। बच्चों को भड़काने वाले इस शिक्षक को ‘तार्किक’ बता कर FIR की कार्रवाई की निंदा हो रही है। हालाँकि, यह कोई नहीं कहना चाह रहा कि शिक्षक रजनीश ने जो कविता बच्चों को सुनाई है, वह कोई तर्कशील बात नहीं बल्कि सीधे तौर पर उनको उनके धर्म से विमुख करने का प्रयास और काँवड़ जैसी पवित्र परम्परा के खिलाफ भड़काना है।

रजनीश अपनी कविता में कहता है-

काँवड़ लेने मत जाना, तुम ज्ञान का दीप जलाना

मानवता की सेवा करके, तुम सच्चे मानव बन जाना

अब अगर रजनीश की मानें तो जो काँवड़ लेने जाता है, वह ज्ञान का दीप नहीं जला सकता। रजनीश दावा करता है कि जो लोग काँवड़ लेकर जाते हैं वह ना ही ज्ञान अर्जित कर पाते हैं और ना ही मानवता की सेवा कर पाते हैं। अपनी कविता में तर्क की भ्रूणहत्या करने वाला रजनीश यह भूल जाता है कि इस देश में प्रत्येक वर्ष लाखों-करोड़ों की संख्या में हिन्दू काँवड़उठाते हैं और अपने आराध्य को अर्पित करते हैं। यह कोई पिकनिक नहीं बल्कि कठिन यात्रा होती है।

उसका यह दावा कि यह लोग पढ़े-लिखे नहीं होते या फिर मानवता की सेवा नहीं करते दरअसल एक वामपंथी प्रोपेगेंडा है जिसमे धर्म को हमेशा ही ऐसे नजरिए से देखा जाता है जैसे वह अज्ञानता का पोषक हो। जबकि सनातन में तो विद्या को ही सर्वोच्च माना गया है। छोटे बच्चों का दिमाग रजनीश का यह महीन प्रोपेगेंडा नहीं पकड़ पाता होगा, ऐसे में वह भले ही उससे प्रश्न ना करें, लेकिन उसकी बातें सीधे तौर पर काँवड़ के खिलाफ भड़काने वाली हैं।

इसी कविता की कुछ लाइनों में वह दावा करता है कि काँवड़ ढोकर कोई वकील, DM-SP नहीं बना है। रजनीश की यह बात बताती है कि उसके दिमाग में वामपंथी विचार इस कदर भरे हुए हैं कि वह बच्चों को करियर का फर्जी डर दिखाने से नहीं चूकता। जिन DM-SP का वह उदाहरण देता है, वह भी अपने धर्म के पालन में पीछे नहीं हटते। अगस्त, 2024 में हरिद्वार के DM-SP ने स्वयं काँवड़ उठाई थी और महादेव को जल अर्पित किया था।

रजनीश यह नहीं बताता कि एक वर्ष में कुछ दिन के लिए चलने वाली काँवड़ यात्रा किस तरह उनको DM-SP बनने से रोक लेगी। उसको यह समझाना चाहिए कि धर्म को अफीम बताने वाले कितने कम्युनिस्ट रोज वैज्ञानिक बन रहे हैं। उसको यह भी समझाना चाहिए कि कि तरह से किसी बच्चे का काँवड़ उठाना उसे उसकी पढ़ाई से विमुख कर देगा। क्या कोई बच्चा काँवड़ उठा लेगा तो उसके किताब छूने पर मनाही लग जाएगी?

यदि कोई व्यक्ति चाहेगा तो ईश्वर के प्रति अपनी आस्था से समझौता किए बिना ही सफलता पाएगा और वकील अथवा DM-SP क्या है, बड़े से बड़े पद को छू सकता है। काँवड़ और शिक्षा एक दूसरे के दुश्मन नहीं है। असल में तो काँवड़ व्यक्ति को सामूहिकता और लक्ष्य प्राप्त करने में जरूरी एकाग्रता ही सिखाती है। और काँवड़ उठाने वाले कहीं दूसरे ग्रह से नहीं आते, वह हमारे आस-पास के लोग हैं जो बाकी दिनों में वकील-डॉक्टर, पत्रकार, शिक्षक और अधिकारी हैं।

इसी कविता में रजनीश ने दावा किया कि काँवड़ से बुद्धि-विवेक का विकास नहीं होगा। उसकी विष्ठा की उल्टी यहीं नहीं रुकी बल्कि उसने काँवड़ यात्रा जैसे पवित्र आयोजन से भांग-धतूरा और गांजे को जोड़ दिया। हाँ! यह बात ठीक है कि काँवड़ यात्रा के दौरान कुछ ऐसे लोग होंगे जो भांग खाते होंगे, संभवतः एकाध गांजा भी पीते हों। लेकिन वामपंथी रजनीश को समझना चाहिए कि इससे कहीं अधिक संख्या उनकी है जो नंगे पैर चलते हैं, जिनके कंधे काँवड़ के बोझ से छिलते हैं और छाले तक हो जाते हैं।

रजनीश इन सभी को नशेडी बताना चाहता है और काँवड़ यात्रा का अपमान करना चाहता है। वह स्कूल के भीतर नई पौध में वह जहर बोना चाहता है जो आगे चल कर कन्हैया कुमार या योगेन्द्र यादव जैसे सनातन विरोधी में तब्दील होती है। कभी कथित मानवता, कभी शिक्षा तो कभी विज्ञान को मुखौटा बना कर सनातन का यह अपमान किया जाता है। रजनीश भी यही करने का प्रयास कर रहा था, लेकिन सफल नहीं हो सका।

इस जहर की खेती के लिए रजनीश को शह देने वालों की कोई कमी नहीं हैं। उसके खिलाफ जब न्यायसंगत कार्रवाई हुई तो यह गैंग उसे बचाने आ गया। साक्षी जोशी जैसे पत्रकार तुरंत उसे बचाने आ जाते हैं। और वह ये काम तब करते हैं जब रजनीश खुद कार्रवाई का नाम सुनते ही माफी मोड में आ जाता है। रजनीश ने भी अब दुनिया भर की बातें करके अपने कृत्य को सही ठहराने की कोशिश की है। यहाँ पर स्पष्ट है कि रजनीश अगर गलत नहीं होता तो वह माफी क्यों माँगता।

असल में यह सब कुछ और नहीं शिक्षा की चाशनी में डुबो कर दी जाने वाली हिन्दू घृणा की छोटी-छोटी डोज हैं। देश भर के कॉलेज-स्कूलों में ना जाने कितने ही रजनीश बैठे हुए हैं जो मौक़ा मिलते ही बच्चों को वामपंथ के जाल में लेना नहीं छोड़ते। अब अगर बरेली के रजनीश पर कोई कार्रवाई हो रही है तो वह ठीक है और यह एक मिसाल भी बनेगी।

हिन्दुओं-सनातन को गाली देने वाले वजाहत खान को सुप्रीम कोर्ट ने लताड़ा, कहा- बोलने की आजादी दूसरे के अपमान के लिए नहीं: सारी FIR एक साथ करने से भी किया इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने हिन्दुओं को गाली देने वाले वजाहत खान को जमकर फटकारा है। कोर्ट ने कहा है कि आजादी का दुरुपयोग नहीं करें। कोर्ट ने कहा कि सोशल मीडिया पर हो रहे अभिव्यक्ति की आजादी के गलत इस्तेमाल से मुकदमेबाजी बढ़ रही है। इससे न्यायिक सिस्टम धीमा पड़ जाता है और कई तरह की अड़चनें पैदा होती है।

वजाहत की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने लगायी फटकार

न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ वजाहत खान की अर्जी पर सुनवाई कर रही थी जिसमें भड़काऊ सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर चार राज्यों में दायर आपराधिक मामलों को एक साथ जोड़ने का आग्रह किया गया था। लेकिन कोर्ट ने इस पर कोई फैसला नहीं किया है।

अभिव्यक्ति की आजादी के साथ कर्तव्यों का करें पालन

कोर्ट ने वजाहत खान की सोशल मीडिया पर किए गये टिप्पणियों की आलोचना की और कहा कि सभी नागरिकों के लिए जरूरी है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इस्तेमाल करते समय संयम बरतें।
लोग अपने अधिकारों का इस्तेमाल तो कर रहे हैं लेकिन भाईचारा और सम्मान सुनिश्चत करने के लिए अपने कर्तव्यों की ओर ध्यान नहीं दे रहे हैं।

न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने कहा, “अभिव्यक्ति की आजादी एक बहुत ही अहम मौलिक अधिकार है। लेकिन अगर इस स्वतंत्रता का दुरुपयोग होता है, तो इससे मुकदमेबाजी होती है और अदालतें जाम हो जाती हैं।”

कोर्ट में वजाहत खान के वकील ने खान के माफी माँग लेने की बात कही। उन्होंने कहा, “मेरे आचरण के लिए कोई बहाना नहीं है। मुझे वही गलती दोहराने का कोई अधिकार नहीं है जिसका आरोप मैंने दूसरों पर लगाया था। ये ट्वीट पुराने थे और कुछ बातों की प्रतिक्रिया में थे। मैंने पहले ही माफ़ी मांग ली है।”

वजाहत की शिकायत पर पनौली हुई थी गिरफ्तार

वजाहत खान की शिकायत पर ही ऑपरेशन सिंदूर को लेकर मुस्लिम समुदाय के खिलाफ भड़काऊ पोस्ट करने पर सोशल मीडिया इफ्लुएंसर शर्मिष्ठा पनोली को पश्चिम बंगाल पुलिस ने गिरफ्तार किया था। शर्मिष्ठा की गिरफ्तारी के बाद बंगाल पुलिस ने वजाहत के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज कर उसे गिरफ्तार किया था।

जहाँ एक ओर शर्मिष्ठा को दो हफ्ते तक जेल में रखने के बाद भी उसकी बेल को नामंजूर कर दिया गया था। वहीं वजाहत ने उसकी गिरफ्तारी का जश्न मुस्लिम समुदाय के साथ मनाया था।

वजाहत के सोशल मीडिया पर हिंदू धर्म के देवी-देवताओं के खिलाफ अपमानजनक पोस्ट दिखा थे। इसके बाद लोगों ने उसकी गिरफ्तारी की माँग की थी। अपने सोशल मीडिया पोस्ट में वजाहत ने लिखा था “कामाख्या देवी मंदिर में ब्राह्मण को अन्य हिंदुओं से कटी हुई योनि की पूजा करवानी पड़ती है। इसमें अंतर करना बहुत मुश्किल है कि यह अंधभक्ति है या कोई मानसिक बीमारी।”

हिन्दुओं को दी थी वजाहत ने गाली

हिंदूओं को गाली देते हुए वजाहत ने एक पोस्ट में लिखा था “तुझ जैसी रं* पेट की औलाद रसूल के बारे में मेरी बात करे ये जेब नहीं देता…तू इसकी बात कर, तेरा कृष्णा कैसा रंगीला था देख…सच्चाई देख वहम में मत जी…झं$% सा&% तूने जो भी कहा वो सब तो झूठ और बहुत है लेकिन ये तेरे ही किताब का है सच पढ़, सु& के पि%$”

इंस्टाग्राम पर एक आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए उसने लिखा “अबे भो, ब… अपनी बहन से जाकर सीख तेरा धर्म ला, तेरा धर्म जो तेरी बहन कोठे में बैठ कर सिखाती है… या फिर वही धर्म तेरे घर पे आकर सिखाती है, चु कर ब*… अपनी बीवी को तुझ जैसा संघी काम चो है दूसरे के लिए चो* देता है और अपनी बहन चो* है… ब… सुन रं पेट का जाना… मेरे अबाओ अजदाद कन्वर्ट हुए भी ते ना तो हमें उनपर फक्र है…के गंदा धर्म शैतानों का पूजा करने वाला, लिंग का पूजा करने वाला धर्म चो* कर… पाक साफ धर्म अपना और हक धर्म अपना…फखर है उनपे…जा तू लिंगम पूजा कर…लौ*

उसने ट्वीट किया था “एक हिंदू अपनी साली को अंग-अंग पर रंग लगाते हुए और अपने दोस्तों को भी उसके साथ ऐसा करने का निमंत्रण देते हुए…हिंदू.. यहीं है इनकी असलियत… बलात्कारी संस्कृति।”

एक अन्य पोस्ट में उसने लिखा था, “नहीं वो उसकी बात कर रहा है जिसकी 16108  रखैलों के साथ रंग रसिया मनाता था…या चुपके-चुपके लड़कियों को नहाते हुए देखता था..”

ऐसे ही उसने एक पोस्ट में लिखा था, “मेरे पास तुम्हारे लिए कुछ है… पहले अपने धर्म के बारे में पढ़ो। मूत्र पीने वाले बदमाश”

वेश्याओं के धर्मांतरण के लिए छांगुर पीर ने बना रखा था अलग गैंग, गरीब-SC हिन्दू भी निशाने पर: दुबई से बुलाता था ‘ट्रेनर’ मौलाना, लड़कियाँ फँसाने की होती थी ट्रेनिंग

जमालुद्दीन उर्फ छांगुर पीर ने धर्म परिवर्तन कराने के लिए तीन श्रेणियाँ बनाई थीं। इनमें अलग-अलग वर्ग की महिलाएँ और युवतियाँ शामिल की गईं। वहीं, मुस्लिम युवकों को भी नाम बदलकर हिंदू युवतियों को प्रेमजाल में फँसाकर धर्मांतरण कराने का काम सौंपा गया।

पहली श्रेणी में मुस्लिम महिलाएँ गरीब और अनुसूचित जाति की महिलाओं का ब्रेनवॉश कर धर्म परिवर्तन कराती थीं। दूसरी श्रेणी में मुस्लिम युवतियों को रखा गया, वेश्या महिलाओं को फँसाकर इस्लाम कबूल करवातीं। आखिरी श्रेणी में मुस्लिम युवक नाम बदलकर हिंदू युवतियों के पीछे लगाया गया।

दुबई से कट्टर मौलाना बुलाकर देता प्रशिक्षण

छांगुर पीर अपने गुर्गों को प्रशिक्षण देने के लिए दुबई से कट्टर मौलाना बुलाता था। उनके साथ नेपाल में सक्रिय दावत-ए-इस्लामी की टीम भी होती थी। ये मौलाना मुस्लिम युवकों को हिंदू युवती को फँसाने के तरीके बताते थे। साथ ही हिंदू धर्म के विरुद्ध ब्रेनवॉश करते थे। इस प्रशिक्षण के काम के लिए ही छांगुर पीर ने आलीशान कोठी बनवाई थी।

बलरामपुर की कोठी में बनाए तहखाने

छांगुर के धर्मांतरण के नेटवर्क में 579 जिलों में 3000 गुर्गे काम कर रहे थे। इस नेटवर्क को बढ़ाने के लिए छांगुर पूरी मेहनत से लगा हुआ था। उसने गुर्गों को प्रशिक्षण देने के लिए दो आलीशान कोठी भी बनवाई। इनमें पहले फ्लोर पर तहखाने बनाए गए, जिनमें रोजाना तकरीर कराने की तैयारी थी।

बलरामपुर के मधुपुर गाँव स्थित छांगुर की कोठी की निर्माण कराने वाली वसीउद्दीन ने बताया कि साल 2022 में कोठी बननी शुरू हुई थी। हालाँकि, अब तक पूरी तरीके से बनकर तैयार नहीं हुई है। उन्होंने बताया कि कोठी को पिलर पर खड़ा किया गया, जिससे छांगुर अपने हिसाब से कमरों को बाँट सके।

वसीउद्दीन ने कहा कि शुरुआत में ही लगा था कि किसी अवैध कार्य के लिए कोठी का निर्माण हो रहा है, लेकिन छांगुर ने बताया था कि वह विद्यालय खोलना चाहता था। बाद में उसने अस्पताल खोलने की बात कही। इसी तरह बार-बार झूठ बोलता रहा।

बता दें कि बलरामपुर स्थित कोठी को प्रशासन ने ध्वस्त कर दिया है। अब कोठी का मलबा पढ़ा दिखाई देता है। इसी कोठी में छांगुर अपने परिवार समेत नीतू और नवीन रोहरा के साथ रहता था।

गोंडा में भी छांगुर के अड्डे की तलाश

छांगुर पीर के धर्मांतरण नेटवर्क की जड़ें उत्तर प्रदेश के गोंडा में भी होने की आशंका है। यहाँ धानेपुर क्षेत्र के रेतवागाड़ा में छांगुर पीर के अड्डे की तलाश की जा रही है। ATS रमजान को ढूँढ रही है, जिससे छांगुर के बाकी सहयोगियों का पता निकलेगा।

मीडिया रिपोर्ट्स में सामने आया कि अयोध्या के करीब होने के चलते छांगुर गोंडा में भी अपनी जड़े मजबूत कर रहा था। यह काम रमजान को सौंपा गया था, वही वजीरगंज और नवाबगंज तक अपने डेरा जमा रहा था। पूरी जानकारी कि लिए ATS के अधिकारी जाँच में जुटे हैं।

राहुल गाँधी का ऑर्डर पाते ही कर्नाटक में ‘रोहित वेमुला एक्ट’ थोपने की तैयारी, जानिए क्यों इसके प्रावधानों को बताया जा रहा ‘संस्थागत उत्पीड़न’: क्या अहिन्दा तुष्टिकरण के लिए हिन्दुओं को बाँटने की हो रही साजिश

कर्नाटक में सिद्दारमैया सरकार आगामी मानसून सत्र में ‘रोहित वेमुला विधेयक 2025’ को पेश करने की पूरी तैयारी कर चुकी है। राहुल गाँधी के ‘हुक्म’ के बाद कर्नाटक सरकार ने छात्रों के बीच SC,ST,OBC और अल्पसंख्यक समुदाय को ‘अन्याय से बचाने’ का बीड़ा उठाया है।

रोहित वेमुला विधेयक का उद्देश्य कथित तौर पर उच्च शिक्षण संस्थानों में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और अल्पसंख्यक समुदायों के छात्रों के साथ होने वाले जातिगत भेदभाव और उत्पीड़न को रोकना है।

इस विधेयक का नाम हैदराबाद विश्वविद्यालय के पीएचडी छात्र रोहित वेमुला के नाम पर रखा गया है। 17 जनवरी 2016 को रोहित ने आत्महत्या कर ली थी। उसकी आत्महत्या के बाद पूरे देश में जातिगत भेदभाव को लेकर काफी आक्रोश सामने देखने को मिला था। हालाँकि बाद में यह बात जरूर साफ हुई कि रोहित वेमुला असल में दलित समुदाय से था ही नहीं।

बिल में क्या हैं प्रावधान

कर्नाटक सरकार ने इस विधेयक को राज्य के सभी सरकारी, निजी और डीम्ड विश्वविद्यालयों में लागू करने की बात कही है। इसके तहत सामान्य कैटेगरी के छात्रों को छोड़कर बाकी सभी के लिए, यानी SC, ST, OBC और अल्पसंख्यक समुदाय को अन्याय से बचाने की बात कह कानून बनाए गए हैं।

बिल में किसी भी तरह के भेदभाव को गैर-जमानती और संगीन अपराध माना गया है। इसमें पहली बार दोषी पाए जाने पर 1 साल की जेल और ₹10,000 जुर्माना और दोबारा अपराध पर 3 साल की जेल और ₹1 लाख जुर्माना का प्रावधान है। साथ ही, दोषी संस्थानों को राज्य सरकार से वित्तीय सहायता नहीं मिलेगी और पीड़ित को सीधे मुआवजा देने की व्यवस्था भी की गई है।

बिल के तहत कोई भी पीड़ित या फिर उसके परिवार का व्यक्ति सीधे पुलिस में शिकायत दर्ज कर सकता है और बिना किसी सबूत के आरोप लगाया जा सकता है। दोषी पाए जाने पर आरोपित को 1 लाख रुपए तक का मुआवजा देना पड़ेगा।

एक तरह से सामान्य श्रेणी के छात्रों को रंजिश में SC/ST/OBC या अल्पसंख्यक समुदाय का कोई भी व्यक्ति बड़े आराम से जेल भिजवा सकता है। जब तक व्यक्ति निर्दोष साबित नहीं हो जाता तब तक वो दोषी ही माना जाएगा।

इससे भी बड़ी विडंबना ये है कि आरोपित के साथ-साथ उस व्यक्ति को भी इस एक्ट के तहत जेल हो सकती है जिसने आरोपित की मदद की हो, उकसाया हो या फिर वो भी जिसने रोकने की कोशिश नहीं की।

सोशल मीडिया पर जानकार इसे एक संस्थागत उत्पीड़न है। उनका कहना है कि इसे ‘सामाजिक न्याय’ की चाशनी में लपेटकर परोसा जा रहा है। कई विश्लेषक ये भी कह रहे हैं कि जब इसी तरह का SC-ST एक्ट इस वर्ग को संरक्षण देने के लिए पहले से ही मौजूद है तो फिर इस तरह का एक्ट थोप कर संस्थानों के माहौल में द्वेष भरने की क्या आवश्यकता है?

जो दलित नहीं, उसके नाम पर बिल

कर्नाटक सरकार ने रोहित वेमुला के नाम पर दलित विधेयक बना दिया गया जबकि रोहित असल में दलित था ही नहीं। अब इस पर लोग सवाल भी उठा रहे हैं। 2017 में आंध्र प्रदेश सरकार ने रोहित का अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र रद्द कर दिया था और कहा था कि वह ओबीसी वर्ग से हैं ऐसे में शेड्यूल कास्ट का प्रमाण पत्र धोखाधड़ी से बनवाया गया।

इसके लिए तेलंगाना पुलिस ने भी 3 मई 2024 को हाई कोर्ट में एक क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की थी। इसमें बताया गया था कि रोहित वेमुला SC श्रेणी से नहीं था और उसने आत्महत्या इसलिए की क्योंकि उसे अपनी जाति की सच्चाई के उजागर होने का डर था। क्लोजर रिपोर्ट में यह बात भी सामने आई थी कि उनकी मृत्यु के लिए कोई भी व्यक्ति या संस्थान जिम्मेदार नहीं था।

रोहित वेमुला के माता-पिता ने भी इस बात को स्पष्ट किया है कि वह SC-ST समुदाय से नहीं बल्कि वेद्देरा जाति से आते हैं। रोहित के पिता ने यह तक भी कहा था कि उनके बेटे की हत्या हुई थी और वामपंथी समूह ने रोहित की मौत का इस्तेमाल मोदी सरकार के खिलाफ माहौल बनाने के लिए किया।

राहुल ने लिखी पाती और बन गया विधेयक

रोहित की मौत के बाद शुरुआत में उसे दलित बताया गया। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने वामपंथी मीडिया और प्रोपेगेंडा पोर्टल्स के साथ मिलकर जातिगत भेदभाव का मुद्दा उठाया और मोदी सरकार पर निचली जातियों को दबाने का आरोप लगाया।

नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने 16 अप्रैल 2025 को कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को पत्र लिखा और कहा कि कॉलेज और विश्वविद्यालयों में ‘रोहित वेमुला अधिनियम’ लेकर आया जाए ताकि जातिगत भेदभाव समाप्त हो सके।

यह माँग तब आई जब उन्होंने संसद में दलित, आदिवासी और OBC समुदाय के छात्रों और शिक्षकों से मुलाकात की और कहा कि उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव होता है। इसके बाद सरकार कर्नाटक सरकार ने मानसून सत्र में रोहित वेमुला एक्ट को पेश करने की घोषणा भी की कर दी।

बता दें रोहित के सुसाइड नोट में उन्होंने स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) से नाराज़गी जताई थी। इसके बावजूद वामपंथी समूह आज भी रोहित की याद में कार्यक्रम करते हैं और इसके जरिए गैर-दलित हिंदुओं को निशाना बनाया जाता है।

न्याय की आड़ में कॉन्ग्रेस की अहिन्दा वोटबैंक की रणनीति

सामाीजिक न्याय की आड़ लेकर इस बिल में जिन-जिन वर्गों को शामिल किया गया है वो असल में कॉन्ग्रेस की अहिन्दा वोट बैंक की राजनीति का एक हिस्सा है। कॉन्ग्रेस की रणनीति कर्नाटक में हमेशा से ‘अहिन्दा’ यानी अल्पसंख्यक, OBC और दलित वोटबैंक को मजबूत करने को लेकर सामने दिखी है।

‘अहिन्दा’ शब्द सबसे पहले कॉन्ग्रेस के नेता देवराज उर्स ने दिया था। बाद में सिद्धारमैया ने इससे अपनी सियासी पहचान स्थापित कर ली। इसी रणनीति के तहत 2015 की जनगणना में OBC और मुस्लिम आरक्षण बढ़ाने की सिफारिश की गई थी।

कर्नाटक में मुस्लिम आबादी 18.08% है और वो OBC में सबसे बड़ा समूह है। कॉन्ग्रेस का मानना है कि जितना वह मुस्लिमों और OBC को आरक्षण देगी, उतना ही पार्टी का वोटबैंक मजबूत होता जाएगा।

जातिगत जनगणना ‘सामाजिक न्याय’ या दो-धारी तलवार

कर्नाटक में जातिगत जनगणना का मुद्दा कॉन्ग्रेस के लिए दो-धारी तलवार बन गया है। एक तरफ पार्टी अपने ‘सामाजिक न्याय’ के नैरेटिव को बनाए रखना चाहती है, जिसके तहत वो OBC, मुस्लिम और दलित वोटबैंक को साधने की कोशिश कर रही है।

दूसरी तरफ लिंगायत और वोक्कालिगा जैसे प्रभावशाली समुदायों का विरोध उसे बैकफुट पर ले आया है। डीके शिवकुमार का बयान कि “हम हर समुदाय को साथ लेकर चलेंगे” साफ तौर पर कॉन्ग्रेस की मजबूरी को दिखाता है।

राहुल गाँधी जातिगत जनगणना को राष्ट्रीय स्तर पर अपनी सियासी पहचान का हिस्सा बनाना चाहते थे, लेकिन अब खुद इस जंजाल में फँसते जा रहे हैं। उनकी पार्टी अब तक न तो 2015 की रिपोर्ट को लागू कर पाई, न ही इसे पूरी तरह खारिज कर पा रही है।

एक ओर बीजेपी इसे कॉन्ग्रेस की नाकामी और सियासी ड्रामेबाजी बता रही है तो दूसरी ओर कर्नाटक की जनता के बीच ये सवाल उठ रहा है कि क्या कॉन्ग्रेस सच में सामाजिक न्याय की बात करती है, या ये सिर्फ वोटबैंक की राजनीति है?

दलित न होते हुए भी रोहित वेमुला के नाम पर विधेयक लाकर कॉन्ग्रेस को भले ही कुछ राजनीतिक लाभ मिल जाए, लेकिन इसके कारण समाजिक न्याय से ज्यादा लोगों के बीच ऊँच-नीच या विभाजन होगा और उन छात्रों के लिए भी परेशानी खड़ी होगी जिन्हें इस एक्ट में किसी भी तरह का संरक्षण नहीं मिला है

इसके साथ ही ये बात भी गौर करने वाली है कि कॉन्ग्रेस का लाया ये एक्ट सिर्फ कर्नाटक के साथ साथ हिमाचल प्रदेश और तेलंगाना जैसे कॉन्ग्रेस शासित राज्यों तक भी पहुँच सकता है।

‘मंदिर की जमीन पर बनी है मस्जिद’: हिन्दू संगठन MP के जबलपुर में कर रहे विरोध, बताया- वक्फ बोर्ड ने 3 गुना जमीन ली, CM मोहन यादव ने SDM हटाया

मध्य प्रदेश के जबलपुर में हिन्दू संगठनों ने कहा है कि एक मंदिर की जमीन पर मस्जिद बनाई गई। इसको लेकर जबलपुर के राँझी में सोमवार (14 जुलाई 2025) को जमकर हंगामा हुआ। यह विवाद तब और बढ़ गया जब जबलपुर के कलेक्टर ने एक विवादित पोस्ट कर दी।

अब रांझी स्थित मढ़ई में गायत्री मंदिर की जमीन पर मस्जिद होने के विवाद ने एक बड़े प्रदर्शन का रुप ले लिया है। जानकारी के अनुसार, जबलपुर के रघुवीर सिंह मरावी ने 12 जुलाई को एक पोस्ट की थी, जिसमें मस्जिद निर्माण से जुड़ी जानकारी साझा की गई थी। इसके बाद हिन्दू इस मामले में कार्रवाई की माँग करने लगे।

इसके बाद जबलपुर कलेक्टर के ऑफिशियल अकाउंट से शेयर की गई पोस्ट में लिखा गया कि मौके पर कभी मंदिर निर्मित होने या मंदिर की भूमि पर मस्जिद निर्मित होने जैसा कोई प्रमाण नहीं पाया गया है। कलेक्टर की पोस्ट में दावा था कि मस्जिद का निर्माण बंदोबस्त के पूर्व उनके कब्जे और मालिकाना हक की जमीन पर ही हुआ है।

इसके कुछ ही घंटे बाद इस पोस्ट को डिलीट भी कर दिया गया था। लेकिन उससे पहले हिंदूवादी संगठन के कार्यकर्ताओं ने पोस्ट देख ली थी। इस मामले में हिंदू संगठन प्रमाण के साथ ये बता रहे हैं कि मस्जिद का निर्माण मंदिर वाली जगह पर किया गया है। उन्होंने कलेक्टर के दावों को गलत बताया और विरोध की बात कही।

वह कलेक्टर की पोस्ट के बाद और गुस्साए गए। आक्रोशित हिंदुओं ने SDM रघुवीर सिंह का अर्थी जुलूस भी निकाला। यह मामला मध्य प्रदेश के CM मोहन यादव तक भी पहुँच गया। उन्होंने इस मामले में मुख्यमंत्री मोहन यादव ने जाँच कमेटी गठित करने का आश्वासन दिया है।

SDM को भी हटा दिया गया है। हिंदुओं ने मंगलवार (15 जुलाई 2025) को भी प्रदर्शन करने के लिए कहा था। लेकिन बाद में विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं ने कहा कि मुख्यमंत्री के जाँच के आदेश के बाद उन्होंने अपने कार्यक्रम को स्थगित कर दिया गया है।

नए SDM ऋषभ जैन का कहना है कि यह पोस्ट SDM की जानकारी के बिना शेयर की गई थी। हिंदू संगठनों ने आरोप लगाया है कि खसरा नंबर 169 की जमीन पर मस्जिद निर्माण किया गया है। संगठन का कहना है कि वक्फ बोर्ड के नाम पर केवल 1000 वर्गफीट भूमि का आवंटन है और मस्जिद का निर्माण लगभग 3000 वर्गफीट में किया गया है।

हिंदू संगठनों का आरोप है कि मस्जिद की आड़ में अवैध रूप से मदरसा भी संचालित किया जा रहा है। इससे पहले मस्जिद कमेटी ने यह मामला हाईकोर्ट में भी दायर किया था, हालाँकि सबूत के तौर पर कागजों की कमी के चलते केस वापस लेना पड़ा था।

26/11 जैसे हुई थी पहलगाम हमले की साजिश, ‘लोकल’ लोगों को शामिल ना करने का ISI ने दिया था ऑर्डर: रिपोर्ट में बताया- सरगना सुलेमान 7 दिन पहले ही आ गया था कश्मीर

पहलगाम आतंकी हमले में शामिल तीनों आतंकी पाकिस्तानी थे। सुरक्षा एजेंसियों ने इसका खुलासा किया है। एजेंसी का कहना है कि हमले की योजना पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI और आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा ने मिलकर बनाई थी। इसे अमलीजामा पहनाने के लिए पाकिस्तानी आतंकियों को शामिल किया गया ताकि किसी को शक न हो।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक सुरक्षा एजेंसियों ने कहा है कि ISI ने लश्कर कमांडर साजिद जट्ट को निर्देश दिया था कि वह जम्मू-कश्मीर में केवल पाकिस्तानी आतंकियों का ही इस्तेमाल करे, ताकि उसकी पहचान छिपी रहे। यही वजह है कि किसी भी कश्मीरी आतंकी को इस हमले में शामिल नहीं किया गया।

रिपोर्ट्स की माने तो सुरक्षा सूत्रों का कहना है कि यह हमला 26/11 मुंबई हमले की तरह ही लश्कर-ISI की एक मिली-जुली योजना थी। हमले के लिए स्थानीय लोगों को जरुरत के हिसाब से शामिल करने का निर्देश दिया गया था।

जानकारी के अनुसार पहलगाम हमले का लीडर आतंकी सुलेमान था। सुरक्षा एजेंसियों ने शंका जताई है कि सुलेमान पाकिस्तान की स्पेशल फोर्सेज का पूर्व कमांडो था और 2022 में उसने पाकिस्तान के पंजाब में लश्कर-ए-तैयबा के मुरीदके सेंटर में ट्रेनिंग ली थी।

खूफिया एजेंसियों को सैटेलाइट फोन के विश्लेषण से पता चला है कि 15 अप्रैल 2025 को सुलेमान त्राल के जंगल में छिपा हुआ था। यानी वह घटना के पहले से ही बैसरन में हमले की जगह पहुँच चुका था। एक और खुलासे के तहत पता चला कि सुलेमान अप्रैल 2023 में पुंछ में सेना के ट्रक पर हुए हमले में भी शामिल था। इस हमले में पाँच सैनिक मारे गए थे।

इससे पहले फाइनेंसियल एक्शन टास्क फ़ोर्स (FATF) ने पहलगाम आतंकी हमले की निंदा करते हुए कहा था कि पहलगाम जैसा हमला बिना किसी फंडिंग के नहीं हो सकता। FATF ने इस संबंध में एक बयान भी जारी किया था।

FATF ने कहा था “आतंकवादी हमले दुनिया भर में लोगों की जान लेते हैं, उन्हें अपंग बनाते हैं और भय पैदा करते हैं। FATF ने कहा था  “यह और हाल ही में हुए अन्य हमले, बिना पैसे और आतंकवादी समर्थकों के बीच पैसे के लेन-देन के साधनों के बिना नहीं हो सकते थे”। अपने आधिकारिक बयान में FATF ने कहा था कि वह मामले में एक्शन लेते हुए आतंकी फंडिंग पर एक विश्लेषण भी जारी करेगा।

बता दें कि 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में आतंकियों ने निर्दोष हिंदुओं को निशाना बनाया था। इस आतंकी हमले में 26 लोग मारे गए थे। इसके बाद भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ ऑपरेशन सिंदूर चलाया था। जिसके तहत भारतीय सेना ने पाकिस्तान के कई आतंकी ठिकानों को ध्वस्त किया था।