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भारत-अमेरिका के बीच जल्द हो सकती है ट्रेड डील, ट्रंप ने किया इशारा: इंडोनेशिया की तर्ज पर लग सकता है टैरिफ, डेयरी और कृषि सेक्टर में कर रहा घुसने की कोशिश

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के साथ व्यापार समझौता जल्द होने के आसार जताए हैं। ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका, इंडोनेशिया की तर्ज पर भारत से जल्द ही व्यापार समझौता कर सकता है। ट्रंप का एक मकसद भारत के बाजार में अमेरिकी पहुँच को बढ़ाना भी है।

बहरीन के क्राउन प्रिंस और प्रधानमंत्री सलमान बिन हमद अल खलीफा के साथ ओवल ऑफिस में बुधवार (16 जुलाई 2025) को हुई एक बैठक के दौरान ट्रंप ने कहा, “अमेरिका भारत के साथ जल्द ही ट्रेड डील कर सकता है।” उन्होंने कुछ नए ट्रेड एग्रीमेंट्स की घोषणा करने की बात कही है।

व्यापार समझौते पर बात करते हुए ट्रंप ने कहा कि भारत के साथ ट्रेड डील इंडोनेशिया के साथ हुए करार के जैसा ही होगा। मंगलवार (15 जुलाई 2025) को अमेरिका ने इंडोनेशिया के साथ नए व्यापार समझौते की घोषणा की थी। इसके तहत इंडोनेशिया के सामानों पर अमेरिका में 19% टैरिफ लगेगा। इसके बदले मअमेरिकी वस्तुएँ इंडोनेशिया के बाजारों में अप्रतिबंधित और बिना टैरिफ के उपलब्ध होंगी। 

टर्ंप ने कहा, “हम बातचीत कर रहे हैं। सबसे अच्छा ट्रेड जो हम कर सकते हैं वो ये कि हमें एक पत्र भेजकर ये लिखना है कि आप 20, 25,30,35 फीसद का भुगतान करेंगे।”

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इंडोनेशिया ने अमेरिका से 50 बोइंग जेट, 15 अरब डॉलर (15000 करोड़ रुपए) की ऊर्जा खरीद, 4.5 अरब डॉलर के कृषि उत्पाद खरीदने का करार किया है। इसी की तर्ज पर ट्रंप ने कहा, “भारत इंडोनेशिया की तरह ही काम कर रहा है। ट्रेड डील के साथ ही हमें भारत के बाजार में एंट्री मिलेगी। यहाँ अब तक हमारी पहुँच नहीं थी। अब हमें वहाँ टैरिफ के जरिए प्रवेश मिल रहा है।”

भारत के साथ ट्रेड डील के बीच में ट्रंप ने ‘शायद’ भी जोड़ा। उन्होंने कहा, “कल भी एक समझौता हुआ है। एक और समझौता होने वाला है.. शायद भारत के साथ।” ट्रंप ने आगे कहा कि हमने 100 अरब डॉलर (10 हजार करोड़) का निवेश किया है। अब तक ऑटोमोबाइल, स्टील समेत कुछ क्षेत्रों में हमने टैरिफ अब तक नहीं लगाए हैं।

गौरतलब है कि भारत से वाणिज्य मंत्रालय का एक दल अमेरिका के साथ टैरिफ और ट्रेड डील पर द्विपक्षीय वार्ता के लिए अमेरिका में है। इस बातचीत का एक उद्देश्य वाहन और कृषि संबंधी क्षेत्रों में व्यापार को लेकर आने वाली अड़चनों को समय पर दूर करना है।

अमेरिका भारत के डेयरी समेत कई बाजारों में अपनी पहुँच बनाने को लालायित है। हालाँकि अब तक भारत ने अमेरिका को उन क्षेत्रों में प्रवेश नहीं दिया है।

न पढ़ाई-न लिखाई, खाली बिल्डिंग पर ‘सिटी मोंटेसरी’ का बोर्ड लगा सरकार से ले लिए पैसे: अल्पसंख्यक बच्चों के नाम पर MP में मिशनरी स्कूल-मदरसों ने किया स्कॉलरशिप स्कैम

भोपाल के जहांगीराबाद में एक पुरानी, खामोश बिल्डिंग खड़ी थी। बाहर एक बोर्ड लगा था – ‘सिटी मोंटेसरी स्कूल’। इस सुनसान इमारत में न तो क्लासरूम थे, न कोई शिक्षक। फिर भी इसी नाम पर 29 फर्जी छात्रों की लिस्ट बनाई गई। सरकार से ₹1.65 लाख की छात्रवृत्ति माँगी गई। पैसा भी मिल गया। मगर पढ़ाई कभी नहीं हुई।

ऐसे ही कई स्कूल और मदरसे सिर्फ कागज़ों पर थे। नाम, छात्रों की सूची और बैंक अकाउंट सब फर्जी थे। ये सिर्फ एक ही मकसद से बने थे, केंद्र सरकार की छात्रवृत्ति योजना से पैसा निकालना। कुछ स्कूलों की इमारतें अब दुकानों में बदल चुकी थीं। कुछ पूरी तरह गायब थे। कुछ चल रहे थे, मगर क्लास 5वीं तक। फिर भी उन्होंने 11वीं-12वीं के छात्रों के नाम से फर्जीवाड़ा किया।

इस पूरे नेटवर्क में 40 संस्थान शामिल हैं। इनमें 17 मदरसे भी हैं और 23 मिशनरी स्कूल भी। आँकड़ों के मुताबिक कुल ₹57.78 लाख का गबन हुआ।

ऐसे हुआ फर्जीवाड़ा: स्कूलों के नाम पर खाली इमारतें

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, जाँच में एक चौंकाने वाली बात सामने आई। जिन स्कूलों और मदरसों के नाम पर पैसे निकाले गए, वे असली में थे ही नहीं।

भोपाल के जहांगीराबाद में एक बोर्ड मिला। उस पर ‘सिटी मोंटेसरी स्कूल’ लिखा था। पर जब लोग उस जगह गए तो वहाँ कोई स्कूल नहीं था। सिर्फ एक खाली बिल्डिंग थी। वहाँ पढ़ाई-लिखाई का कोई काम नहीं होता था।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, एक पान वाले ने बताया कि यह बोर्ड दो साल से लगा है। उसने कभी कोई छात्र या टीचर नहीं देखा। इस ‘सिटी मोंटेसरी स्कूल’ ने 29 ऐसे छात्रों के नाम पर ₹1.65 लाख माँगे जो थे ही नहीं।

आगे जाँच में बेरसिया रोड पर एक बड़ी इमारत मिली। इसमें दो और स्कूल थे। एमजे कॉन्वेंट और सेंट डी’सूजा कॉन्वेंट स्कूल। इन स्कूलों ने 11वीं और 12वीं के छात्रों के लिए स्कॉलरशिप माँगी गई थी। लेकिन इन स्कूलों में ये कक्षा नहीं थी।

एमजे कॉन्वेंट ने 30 फर्जी छात्रों के लिए ₹1.7 लाख लिए। सेंट डी’सूजा ने दो छात्रों के लिए ₹11,400 लिए। एमजे कॉन्वेंट के एक कर्मचारी ने कबूल किया कि दिए गए नंबर फर्जी थे।

एक और मामला एंबर्ले कॉन्वेंट स्कूल का है। इसने 33 छात्रों के लिए ₹1.8 लाख का दावा किया। लेकिन यह स्कूल अब है ही नहीं। लिली टॉकीज के पास उसके पुराने पते पर अब एक क्लिनिक और दुकानें हैं। लोगों ने बताया कि वहाँ सालों से कोई स्कूल नहीं चला।

नकली छात्रों के बैंक खाते में पैसे

जानकारी के अनुसार, यह घोटाला बहुत आसान तरीके से किया जाता था। स्कूल और मदरसे झूठे छात्रों की जानकारी ऑनलाइन सरकारी पोर्टल पर डालते थे।

अधिकारी इन आवेदनों को बिना जाँचे ही आगे बढ़ा देते थे। ये आवेदन फिर जिले और राज्य के अधिकारियों से होते हुए केंद्र सरकार तक पहुँचते थे। जब आवेदन पास हो जाता था, तो ₹5,700 हर छात्र के हिसाब से बैंक खाते में आ जाते थे। पर ये खाते छात्रों के नहीं थे। ये स्कूल चलाने वालों के रिश्तेदारों या दोस्तों के थे।

जैसे ही पैसा खाते में आता था, उसे तुरंत निकाल लिया जाता था। इससे धोखाधड़ी को तुरंत पकड़ना मुश्किल हो जाता था।

मदरसे भी शामिल

इस घोटाले में 40 संस्थानों में से 17 मदरसे भी शामिल हैं। इन्होंने भी धोखाधड़ी में बड़ी भूमिका निभाई।

कुछ मदरसों ने लाखों रुपए हड़पे। जैसे- मदरसा मादुल उलूम ने ₹1,28,200 (एक लाख अट्ठाईस हजार दो सौ रुपए) का घोटाला किया। मदरसा दानिकी वसीरुल हयात ने ₹1,09,300 (एक लाख नौ हजार तीन सौ रुपए) हड़पे। होली फील्ड स्कूल ने ₹3,81,900 (तीन लाख इक्यासी हजार नौ सौ रुपए) का गबन किया।

यूनिटी मिशन स्कूल ने ₹3,70,500 (तीन लाख सत्तर हजार पाँच सौ रुपए) का चूना लगाया। एफआर कॉन्वेंट स्कूल ने सबसे ज्यादा ₹5,45,100 (पाँच लाख पैंतालीस हजार एक सौ रुपए) का फर्जीवाड़ा किया। इनमें से कई मदरसे या तो चल नहीं रहे थे, या बड़ी कक्षाओं की पढ़ाई नहीं कराते थे। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या इन मदरसों को सिर्फ सरकारी पैसे लेने के लिए ही बनाया गया था।

मौजूदा जाँच

यह घोटाला तब सामने आया जब पिछड़े वर्ग और अल्पसंख्यक कल्याण बोर्ड ने 17 जून 2025 को शिकायत दर्ज कराई। मध्य प्रदेश राज्य बाल आयोग (MPSCPCR) भी इस मामले की जाँच शुरू करेगा और पूरे राज्य में नजर रखेगा। मंदसौर में भी कुछ मदरसों में गड़बड़ी मिली है।

वहीं, पुलिस ने धोखाधड़ी, जालसाजी और गबन की धाराओं में कानूनी कार्रवाई शुरू की है। यह रिपोर्ट राज्य सरकार और CBI को भी भेजी जाएगी ताकि मामले की और बड़ी जाँच हो सके।

यह घोटाला दिखाता है कि कैसे कुछ संस्थान सरकारी योजनाओं का गलत फायदा उठा रहे हैं। जिन संस्थानों को बच्चों की मदद करनी चाहिए थी, वे ही घोटाला कर रहे हैं। इससे उन छात्रों को नुकसान हुआ है जिन्हें छात्रवृत्ति मिलनी चाहिए थी और करदाताओं का पैसा बर्बाद हुआ है।

मंत्री का बयान

पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक कल्याण राज्य मंत्री कृष्णा गौर ने इस मामले से खुद को अलग कर लिया है। उन्होंने कहा कि यह घोटाला उनके मंत्री बनने से पहले का है।

हालाँकि, उन्होंने यह भी बताया कि विभाग ने जाँच शुरू कर दी है। मंत्री गौर ने भरोसा दिलाया कि दोषियों पर सख्त कार्रवाई होगी। उन्होंने कहा कि ‘किसी को भी छात्रों की छात्रवृत्ति का पैसा हड़पने का हक नहीं है।’ राज्य मंत्री कृष्णा गौर ने यह भी बताया कि सरकार अल्पसंख्यक और पिछड़े वर्गों की भलाई के लिए प्रतिबद्ध है।

मम्मी ला रही थी पीड़ित हिंदुओं को ही जेल में ठूँसने वाला ‘काला कानून’, रोहित वेमुला एक्ट से हिंदुओं को खंड-खंड करना चाहता है बेटा: बदले नहीं हैं कॉन्ग्रेस के इरादे

आज से लगभग 14 साल पहले देश में कॉन्ग्रेस की अगुवाई वाली UPA सरकार थी। UPA की यह सरकार ‘अल्पसंख्यकों का संसाधनों पर पहला हक़’ वाली नीति पर चलती थी। मुस्लिम तुष्टिकरण की पिच पर रोज चौके-छक्के लगाने की मंशा रखने वाली कॉन्ग्रेस ने इसी दौरान सांप्रदायिक हिंसा बिल से देश का परिचय करवाया था। यह बिल देश की बहुसंख्यक हिन्दू आबादी को दंगाई घोषित करने का दस्तावेज था। तब यह पास नहीं हो पाया था। लेकिन 14 साल बाद ऐसा ही एक बिल कॉन्ग्रेस ने दूसरी शकल में पेश किया है।

कर्नाटक में रोहित वेमुला बिल के नाम से यह नया शिगूफा छेड़ा है। इस बिल के प्रावधानों को लगातार कुछ वैसा ही बताया जा रहा है, जैसा 14 वर्ष पहले सांप्रदायिक हिंसा बिल के प्रावधानों को बताया गया था। जैसे बिना किसी सुनवाई के तब बहुसंख्यक आबादी को दंगाई बताने का प्रयास हो रहा था, वैसे ही अब नए बिल में एक बाद वर्ग के बच्चों को डिफ़ॉल्ट तौर पर शोषक बताने का प्रयास किया गया है। एक बिल माँ सोनिया गाँधी के दौर में आया था, दूसरा उनके बेटे राहुल गाँधी के कहने पर लाया गया है।

जिस कानून से आज मैं इस कर्नाटक के नए कानून की तुलना कर रहा हूँ, इसका मसौदा राष्ट्रीय सलाहकार समिति (NAC) ने बनाया था। यह NAC असल में और कुछ नहीं बल्कि देश की चुनी सरकार के ऊपर की सरकार थी, जिसकी मुखिया सोनिया गाँधी थीं और सदस्यों में योगेन्द्र यादव और हर्ष मांदर जैसे लोग शामिल थे। अगर ये क़ानून बन गया होता तो बहुसंख्यक हिन्दू पीड़ित होकर भी अपराधी की श्रेणी में आते और कथित अल्पसंख्यक दंगे कर के भी पीड़ित कहे जाते। हिन्दुओं को बिना कुछ किए ही सज़ा मिलती।

इस कानून के पास होने के बाद जिस भी इलाके में दंगा हो, वहाँ बहुसंख्यक आबादी ही दोषी मानी जाती। अब इस देश में बहुसंख्यक हिन्दू हैं, तो सब जगह वही दोषी होते। यहाँ तक कि अगर कोई हिन्दू किसी समुदाय विशेष वाले को अपना मकान बेचने से मना कर दे, फिर भी घृणा जैसे आरोप लग जाते। जघन्य अपराध कर के भी दंगाई बच निकलते तो पत्थरबाजी, गोलीबारी और बमबारी करने वालों के लिए ये क़ानून कितने बड़े ढाल का काम करता।

हिन्दुओं के पीड़ित होने के बाद भी उन्हें दोषी माना जाता। पुलिस आपकी सुनवाई तक नहीं करती। अब ये सब ‘गुण’ ‘कर्नाटक के इस नए कानून में मौजूद हैं। कर्नाटक सरकार के इस नए शिगूफा बिल के अनुसार, सामान्य वर्ग के छात्रों को छोड़कर बाकी सभी के लिए, यानी SC, ST, OBC और अल्पसंख्यक समुदाय को ‘अन्याय से बचाने’ के लिए प्रावधान बनाए गए हैं। इसके प्रावधान कहते हैं कि कोई भी पीड़ित या फिर उसके परिवार का व्यक्ति सीधे पुलिस में शिकायत दर्ज कर सकता है और बिना किसी सबूत के आरोप लगाया जा सकता है।

इसके बाद तुरंत एक्शन का भी नए कानून में प्रावधान है। बिल में किसी भी तरह के भेदभाव को गैर-जमानती और संगीन अपराध माना गया है। यानी आरोप लगते ही किसी भी छात्र को दोषी मान लिया जाएगा। अब आपने जो कर्नाटक के नए कानून में पढ़ा और सांप्रदायिक हिंसा बिल के बारे में पढ़ा था, उसमे समानता नजर आई होगी। एक बिल मुस्लिमों के तुष्टिकरण के लिए हिन्दुओं को बिन सुनवाई दोषी बना रहा था, दूसरा छात्रों को बिन सुनवाई दोषी बनाता है।

यानी माँ सोनिया गाँधी जिस स्कीम को लागू करना चाहती थी उसे ही थोड़ा सा मोडिफाई करके अब बेटे राहुल गाँधी ने कर्नाटक में लागू करने का प्रयास किया है। दरअसल, बात यह है कि पहले कॉन्ग्रेस चाहती थी कि वह मुस्लिमों का तुष्टिकरण करके सत्ता हासिल करती रहे। 2014 के बाद देश की राजनीति ऐसी पलटी कि हिन्दू संगठित हो गए, वोटबैंक की राजनीति करने वालों को सर पकड़ना पड़ा। लगातार कई चुनाव हारने के बाद कॉन्ग्रेस को समझ आया कि उसकी राह का रोड़ा यह हिन्दू एकता है।

फिर चाहे जातिगत जनगणना की बात हो, या फिर आरक्षण को 50% से ऊपर ले जाना और अब ये रोहित वेमुला बिल, यह सभी उसकी इसी नीति का एक टूल हैं। कॉन्ग्रेस की प्लेबुक कभी भी बदलती नहीं है। कभी वह शाह बानो तो कभी सांप्रदायिक हिंसा बिल तो कभी रोहित वेमुला के नाम पर बनाए गए कानून के रूप में सामने आती है।

राहुल-तेजस्वी के लिए काम पर लगे अजीत अंजुम-रवीश कुमार, FIR होते ही PCI-एडिटर्स गिल्ड का प्रलाप शुरू: प्रोपेगेंडा परोसना नहीं है ‘प्रेस की स्वतंत्रता’

पत्रकारों का एक संगठन है प्रेस क्लब ऑफ इंडिया (PCI)। इस संस्था का एक बार फिर से ‘दर्द’ प्रेस की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए उभर आया है। वजह है- बिहार में प्रोपेगेंडाबाज पत्रकार/यूट्यूबर पर एफआईआर दर्ज होना।

अजीत अंजुम पर ये एफआईआर बिहार में चल रहे मतदाता सूची वेरिफिकेशन के कार्य में बाधा डालने को लेकर दर्ज की गई है। BLO अंसारुल हक अंसारी की शिकायत पर ये एफआईआर बेगुसराय के बलिया थाने में दर्ज की गई है। हक ने बताया है कि अजीत अंजुम कथित रिपोर्टिंग के दौरान इस प्रोपेगेंडा को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे थे कि ‘मुस्लिम मतदाताओं को परेशान किया जा रहा है।’

इस एफआईआर को लेकर प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने कहा है कि अजीत अंजुम जो कुछ भी कर रहे थे वो बतौर पत्रकार उनका ‘पेशेवर कार्य’ है। उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करना लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रेस की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने भी प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के तर्ज पर अजीत अंजुम के खिलाफ एफआईआर पर रोना रोया है। बिहार में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) जबसे शुरू हुआ है तभी से इसको लेकर विपक्ष, आंदोलनजीवी, NGO दुष्प्रचार अभियान चला रहे हैं। यह गैंग अपना अभियान लेकर सुप्रीम कोर्ट तक भी गया था। लेकिन देश की शीर्ष अदालत ने SIR पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। इसके बाद से अजीत अंजुम और रवीश कुमार जैसे कथित पत्रकारों की ‘सक्रियता’ काबिले गौर है।

रवीश कुमार ने दैनिक जागरण में प्रकाशित एक खबर का स्क्रीनशॉट एक्स/ट्विटर पर साझा किया है। यह खबर बिहार की मतदाता सूची से 35 लाख से अधिक नाम हटाने से संबंधित है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि जिन लोगों के नाम हटाए जाएँगे, उनमें से 12.56 लाख लोग ऐसे हैं, जो अब जीवित नहीं है। करीब 5.76 लाख लोग ऐसे हैं, जिनका नाम वोटर लिस्ट में एक से अधिक जगह पर दर्ज है। इसके अलावा करीब 17.38 लाख ऐसे लोग हैं, जो अस्थायी तौर पर बिहार से बाहर शिफ्ट हो चुके हैं।

रवीश कुमार ने अपने पोस्ट में कहा है, “35 लाख वोटर के नाम काटने की तैयारी है।” लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया है कि 35 लाख लोगों में एक बड़ी संख्या ऐसे लोगों है कि जो अब इस दुनिया में नहीं है। उन्होंने यह नहीं बताया है कि जो जीवित लोग नहीं है, उनका नाम वोटर लिस्ट में नहीं होना चाहिए। इसी तरह यह भी नहीं बताया है कि कोई भी व्यक्ति किसी एक ही जगह का मतदाता हो सकता है।

उन्होंने विपक्ष के प्रोपेगेंडा को हवा देते हुए यह बताने का प्रयास किया है कि चुनाव आयोग मनमर्जी से 35 लाख नाम काट रहा है। इसका कोई वैधानिक/संवैधानिक आधार नहीं है। आगे इसी पोस्ट में उन्होंने लिखा है कि आयोग को अब चुनाव नहीं करवाना चाहिए, सीधे रिजल्ट ही छाप देना चाहिए।

इसी तरह एक अन्य ट्वीट में रवीश कुमार ने एक वीडियो शेयर किया है। जिस वीडियो में लिखा गया है- दरभंगा में बीजेपी की महिला मोर्चा की जिलाध्यक्ष वोटर वेरिफिकेशन में BLO के साथ काम करते पाई गई। इस वीडियो को शेयर करते हुए रवीश कुमार ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से भी सवाल पूछ लिया है।

यह बताने की कोशिश की है कि चुनाव आयोग के इस अभियान में सिर्फ बीजेपी नेताओं की सक्रियता है, जबकि हकीकत यह है कि बिहार क तमाम दल SIR अभियान का हिस्सा हैं। मुख्य विपक्षी दल इस 47 हजार से अधिक कार्यकर्ता इस अभियान से जुड़े हुए हैं।

यह जानकारी चुनाव आयोग ने भी साझा की है। इसे गूगल में सामान्य सर्च से भी यह अधिकारिक फैक्ट प्राप्त किए जा सकते हैं। जाहिर है कि रवीश कुमार को भी यह जानकारी होगी। लेकिन जो फैक्ट की बात करे वो रवीश कुमार कैसा!

असल में बिहार में जबसे वोटर वेरिफिकेशन शुरू हुआ है राहुल गाँधी से लेकर तेजस्वी यादव तक, पप्पू यादव से लेकर असदुद्दीन ओवैसी तक इसे पिछड़ा, दलित, मुस्लिम विरोधी अभियान बताने की कोशिश कर रहे हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि इस अभियान से ही यह बात सामने आई है कि बिहार के 4 जिलों कटिहार, पूर्णिया, किशनगंज और अररिया में जनसंख्या से अधिक आधार कार्ड बने हुए हैं।

ये वैसै जिले हैं जो बांग्लादेश की सीमा से सटे हुए हैं। बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुस्लिमों की घुसपैठ को लेकर बदनाम रहे हैं। पिछले कुछ दशकों में इन जिलों की डेमोग्राफी तेजी से बदली है। किशनगंज में तो 70 प्रतिशत तक आबादी अब मुस्लिम हो चुकी है। ये वही किशनगंज है, जहाँ महीने में औसतन 26 से 28 हजार आवेदन निवास प्रमाण पत्र को लेकर किए जाते थे।

लेकिन SIR शुरू होने के बाद जुलाई 2025 के शुरुआती 6 दिनों में ही निवास प्रमाण पत्र बनवाने के लिए किशनगंज 1.28 लाख से अधिक आवेदन आए थे। राज्य के उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने ये आँकड़े सार्वजनिक करते हुए कहा था कि इससे पता चलता है कि किशनगंज में बड़ी संख्या में घुसपैठिए मौजूद हैं।

साफ है कि राजद-कॉन्ग्रेस जैसे विपक्षी दल हों या फिर उनके लिए पत्रकार का चोला पहनकर काम करने वाले अजीत अंजुम या रवीश कुमार, वे उसे प्रोपेगेंडा को बार-बार आगे बढ़ा रहे हैं। जिसे सुप्रीम कोर्ट खारिज कर चुका है, जिन भ्रमित दावों का चुनाव आयोग लगातार फैक्ट-चेक कर चुका है, जो दावें जमीनी वास्तविकताओं के आसपास भी नहीं टिकते हैं।

ऐसे में अजीत अंजुम पर कानूनी कार्रवाई से इस गैंग को दर्द होना ही था। PCI ने एक बयान जारी कर जो ‘दर्द’ छलकाया है, वह भी इसका ही प्रतीक है।

ये वही प्रेस क्लब ऑफ इंडिया है, जिसे अर्नब गोस्वामी जैसे पत्रकारों की गिरफ्तारी के बाद न प्रेस की स्वतंत्रता और न अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का खयाल आता है। ये वही प्रेस क्लब ऑफ इंडिया है, जो फिल्म निर्देशक विवेक अग्निहोत्री का ओपन प्रेस कॉन्फ्रेंस रद्द कर देता है, क्योंकि अग्निहोत्री ने ‘द कश्मीर फाइल्स’ जैसी फिल्म बनाकर कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार का सत्य दिखाया था।

वह सत्य जो इस्लाम का कट्टरपंथी और बर्बर चेहरा दिखाती है। वह सत्य जिसे दबाने की लिबरल गैंग पुरजोर कोशिश करता है। वह सत्य जिस पर यह चर्चा तक नहीं चाहता। ऐसा कर उन्हें कभी भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ध्यान नहीं आता।

अजीत अंजुम को लेकर प्रेस क्लब ऑफ इंडिया का ‘दर्द’ चोर-चोर मौसेरे भाई से अधिक कुछ भी नहीं है। प्रेस क्लब ऑफ इंडिया को न प्रेस की स्वतंत्रता की चिंता है। न पत्रकारों की अभिव्यक्ति की आजादी की चिंता है। वह केवल और केवल अपने एजेंडा को बिहार में बेनकाब होते देख तिलमिला रही है।

कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार इंडस्ट्री को जमीन देने में हुई फेल, आंध्र प्रदेश ने लपका मौका: CM नायडू के बेटे बोले- 8000 एकड़ जमीन एकदम रेडी, डिफेन्स-स्पेस-टेक्नोलॉजी सबके लिए अवेलेबल

कर्नाटक सरकार ने बेंगलुरु हवाई अड्डे के पास देवनहल्ली में प्रस्तावित एयरोस्पेस पार्क के लिए भूमि अधिग्रहण की योजना वापस ले ली है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने मंगलवार (15 जुलाई 2025) को घोषणा की कि यह योजना पूरी तरह से रद्द कर दी गई है और किसी भी किसान को जमीन देने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा।

सरकार ने पहले चन्नारायपटना और आसपास के गाँवों में 1777 एकड़ जमीन अधिग्रहण करने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन किसान शुरू से इसका विरोध कर रहे थे। उनका कहना था कि जमीन उपजाऊ है और यही उनकी आजीविका का जरिया है।

किसानों के 1198 दिनों से चल रहे विरोध के बाद सरकार ने यह फैसला लिया। मुख्यमंत्री ने कहा कि जो किसान जमीन देना चाहते हैं, सरकार उन्हें ज्यादा मुआवजा और विकसित भूखंड देगी। जो किसान खेती जारी रखना चाहते हैं, वे बिना रोकटोक ऐसा कर सकते हैं। यह फैसला किसानों के लिए एक बड़ी जीत मानी जा रही है।

आंध्र प्रदेश ने खुला निमंत्रण दिया

कर्नाटक द्वारा देवनहल्ली में एयरोस्पेस पार्क की योजना रद्द करने के तुरंत बाद, आंध्र प्रदेश ने इस मौके का फायदा उठाने की कोशिश की। आंध्र प्रदेश के मानव संसाधन विकास मंत्री नारा लोकेश ने सोशल मीडिया पर एयरोस्पेस कंपनियों को आंध्र आने का न्योता दिया। उन्होंने कहा कि आंध्र प्रदेश के पास एक आकर्षक एयरोस्पेस नीति है, जिसमें बेहतरीन प्रोत्साहन और 8000 एकड़ से ज्यादा तैयार जमीन मौजूद है, जो बेंगलुरु के पास ही है।

उन्होंने कंपनियों से जल्द बातचीत की उम्मीद भी जताई। यह दिखाता है कि आंध्र प्रदेश इस परियोजना को अपने राज्य में लाकर खुद को एयरोस्पेस उद्योग का केंद्र बनाना चाहता है।

आंध्र प्रदेश का बड़ा औद्योगिक विकास

मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू के नेतृत्व में आंध्र प्रदेश सरकार रक्षा, एयरोस्पेस और अंतरिक्ष तकनीक जैसे प्रमुख क्षेत्रों में बड़े उद्योगों को आकर्षित करने के लिए सक्रिय रूप से काम कर रही है। राज्य की तटीय स्थिति, मजबूत बुनियादी ढाँचा और निवेशक-अनुकूल नीतियाँ मिलकर इसे निवेश के लिए एक आकर्षक स्थान बना रही हैं।

हाल ही में नायडू ने केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से मुलाकात की और सुझाव दिया कि उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु के बाद आंध्र प्रदेश को देश का तीसरा रक्षा औद्योगिक गलियारा बनाया जाए।

उन्होंने हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) को लड़ाकू विमान AMCA और LCA के निर्माण के लिए जमीन देने की पेशकश की है। नायडू ने राज्य में कई रक्षा और एयरोस्पेस क्लस्टर स्थापित करने की योजना भी बनाई है।

इनमें जग्गय्यापेटा-डोलकोंडा क्षेत्र में गोला-बारूद और मिसाइल निर्माण केंद्र, श्रीहरिकोटा के पास 2000 एकड़ में प्रक्षेपण केंद्र और उपग्रह निर्माण सुविधा, तथा लेपाक्षी-मदकासिरा क्षेत्र में विमान और इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन क्लस्टर शामिल हैं।

राज्य सरकार ने इस दिशा में विशेषज्ञों को भी जोड़ा है, पूर्व DRDO प्रमुख जी सतीश रेड्डी को रक्षा और एयरोस्पेस सलाहकार और पूर्व ISRO अध्यक्ष एस सोमनाथ को अंतरिक्ष तकनीक के मानद सलाहकार के रूप में नियुक्त किया गया है। इसके अलावा, 2 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कृष्णा जिले में एक मिसाइल परीक्षण रेंज की आधारशिला रखी, जिससे भारत की रक्षा रणनीति में आंध्र प्रदेश की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।

रक्षा ही नहीं अंतरिक्ष में भी आंध्र प्रदेश अग्रणी

आंध्र प्रदेश सिर्फ रक्षा ही नहीं, बल्कि अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी अग्रणी बनना चाहता है। मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने श्रीहरिकोटा और लेपाक्षी के पास दो ‘अंतरिक्ष शहर’ बसाने की योजना बनाई है।

इन शहरों में उपग्रह निर्माण, प्रक्षेपण यान तैयार करने और अंतरिक्ष अनुसंधान की सुविधाएँ होंगी, जो इसरो और निजी कंपनियों दोनों की जरूरतों को पूरा करेंगी। नायडू ने कहा कि आंध्र प्रदेश उपग्रह निर्माण से लेकर उन्नत अनुसंधान तक हर चीज के लिए पूरी तरह तैयार है और उन्होंने इस योजना में केंद्र सरकार से सहयोग की अपील की है।

यह पहल राज्य के औद्योगिक विकास की एक बड़ी रणनीति का हिस्सा है। नायडू के नेतृत्व में राज्य निवेश संवर्धन बोर्ड ने जून 2024 से अब तक 5 लाख करोड़ की 76 परियोजनाओं को मंजूरी दी है, जिससे हजारों लोगों को रोज़गार मिलेगा।

इसके अलावा आंध्र प्रदेश हरित ऊर्जा के क्षेत्र में भी आगे बढ़ रहा है और पिछले आठ महीनों में 4 ट्रिलियन (4 लाख करोड़) का निवेश आकर्षित कर चुका है। LG इलेक्ट्रॉनिक्स जैसी कंपनियाँ श्री सिटी जैसे शहरों में अपने प्लांट लगा रही हैं, जिससे राज्य में इलेक्ट्रॉनिक्स और स्मार्ट उपकरणों का निर्माण तेजी से बढ़ रहा है।

9 बौद्ध भिक्षुओं को सेक्स जाल में फँसाया, घर में जमा कर रखे थे 80000 फोटो-वीडियो: ब्लैकमेल कर वसूले 100 करोड़, थाइलैंड पुलिस ने ‘मिस गोल्फ’ को पकड़ा

थाईलैंड पुलिस ने 15 जुलाई 2025 को एक महिला को गिरफ्तार किया है। महिला पर कई बौद्ध भिक्षुओं को यौन संबंध बनाने के लिए उकसाने और फिर उसे ब्लैकमेल करने का आरोप है। उसके पास से चोरी का सामान भी बरामद हुए है।

पुलिस ने महिला को ब्लैकमेलिंग, मनी लॉन्ड्रिंग और चोरी करने के आरोप में गिरफ्तार किया है। पुलिस महिला को ‘मिस गोल्फ’ कह रही है।

पुलिस को मिले 80 हजार से ज्यादा वीडियो और तस्वीरें

पुलिस ने बताया कि उसके घर की तलाशी के दौरान भिक्षुओं को ब्लैकमेल करने के लिए इस्तेमाल की गई 80,000 से ज्यादा तस्वीरें और वीडियो मिले हैं। कई चैट लॉग मिले जिससे कई भिक्षुओं से उसके संबंधों का खुलासा हुआ है।

बौद्ध भिक्षुओं के ब्रह्मचर्य को पालन करने के नियम के उल्लंघन से बौद्ध संस्थानों में हलचल मच गई है। थाइलैंड में इस पर जबरदस्त बहस चल रही है। पिछले कुछ वर्षों में भिक्षुओं पर यौन अपराधों और मादक पदार्थों की तस्करी में शामिल होने के कई आरोप भी लगे थे।

रॉयल थाई पुलिस सेंट्रल इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो ने बताया है कि इस मामले में करीब 9 बौद्ध भिक्षुओं को संलिप्त पाया गया है, जिन्हें मठ से निष्कासित कर दिया गया है।

महिला की ऐसे हुई गिरफ्तारी

बैंकॉक के उत्तर में नोंथबुरी प्रांत में रहने वाली 35 साल की विलावान एम्सावत को गिरफ्तार किया गया। चोरी के सामान भी उसके पास से मिले हैं। पुलिस को महिला विलावान के खाते से पता चला है कि थाईलैंड के एक बौद्ध मंदिर के बैंक खाते से एक वरिष्ठ भिक्षु ने उसे पैसे ट्रांसफर किए।

महिला ने ये स्वीकार किया बौद्ध भिक्षुओं से ऐंठे पैसे

थाई पुलिस ने बताया कि महिला विलावान को वरिष्ठ भिक्षुओं से पैसे मिले। पुलिस ने जाँच में पाया कि महिला ने बौद्ध भिक्षुओं को जब अपने प्रेम जाल में फँसाना शुरू किया तो पिछले 3 सालों में उसके खाते में 11.9 मिलियन अमेरिकी डॉलर यानी 102.33 करोड़ रुपए आए। इनमें से ज्यादातर रकम बौद्ध भिक्षुओं ने ट्रांसफर किए हैं। जाँच में पता चला कि इनमें से अधिकांश पैसे ऑनलाइन खेली गई जुए वाली वेबसाइट पर खर्च कर दी गई।

मामले का ऐसे हुआ खुलासा

सेंट्रल इंवेस्टीगेशन ब्यूरो के उपायुक्त जारूनकियात पंकेव के मुताबिक जाँच पिछले महीने शुरू हुई और ये मामले तब सुर्खियों में आया जब बैंकॉक के एक प्रसिद्ध बौद्ध मंदिर के वरिष्ठ भिक्षु पर गाज गिरी। जाँच के दौरान पुलिस को पता चला कि महिला विलावन ने वरिष्ठ भिक्षु को अपने प्रेम जाल में फँसाया। उसने भिक्षु को बताया कि वह गर्भवती है और उसे 72 लाख थाई बाट की जरूरत है। ये रकम 222,000 अमेरिकी डॉलर या 1.85 करोड़ रुपए के बराबर है।

मामले के सामने आने के बाद थाइलैंड के मठ प्रशासन पर सवाल उठने लगे हैं। देशभर में थेरवाद संप्रदाय के बौद्ध भिक्षुओं की संख्या काफी है जिन्हें ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है। महिलाओं को छूने मात्र से इनके ब्रह्मचर्य पर सवाल उठने लगते हैं।

देश की बड़ी जनसंख्या बौद्ध धर्म को मानने वाली है और बौद्ध मठों को काफी दान दिया जाता है। ये पैसा बौद्ध भिक्षुओं, मठ के वरिष्ठ भिक्षुओं और दूसरे मद में खर्च होता है।

सेंट्रल इंवेस्टीगेशन ब्यूरो ने एक फेसबुक पेज बनाया है, जहाँ लोग किसी भिक्षुक की शिकायत कर सकते हैं। थाईलैंड में बड़े पैमाने पर बौद्ध भिक्षुओं की जाँच की जाएगी। जाँच के बाद कई बदलाव किये जाएँगे ताकि बौद्ध धर्म में लोगों की आस्था बनी रहे। मंदिर की वित्तीय व्यवस्था से जुड़े कानून में भी संशोधन किया जा सकता है।

थाईलैंड के कार्यवाहक प्रधानमंत्री फुमथम वेचायाचाई ने अधिकारियों को आदेश दिये हैं कि जाँच में किसी तरह की कोताही नहीं बरती जाए और दोषी भिक्षुओं को हर हाल में सामने लाया जाए ताकि लोगों का विश्वास कायम रह सके।

अकबर ने 30000 काफिरों (हिन्दू) का नरसंहार करवाया, औरंगजेब ने तोड़े मंदिर: 8वीं के बच्चों को मुगलों का असली इतिहास पढ़ाएगा NCERT, इस्लामी सल्तनत में हिन्दुओं पर हुए अत्याचारों का भी जिक्र

NCERT की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की नई किताब अब मुग़ल तथा इस्लामी आक्रान्ताओं की सच्चाई बताएगी। ‘समाज की खोज: भारत और उससे आगे भाग 1’ किताब में मुस्लिम आक्रांताओं की क्रूरता को भी बच्चों को पढ़ाया जाएगा। इस किताब में दिल्ली सल्तनत और मुगलों के शासनकाल को एक नए दृष्टिकोण से दिखाया गया है।

इस पुस्तक में बाबर को ‘क्रूर विजेता’, अकबर के शासन को ‘क्रूरता और सहिष्णुता का मिश्रण’ और औरंगजेब को ‘मंदिरों व गुरुद्वारों को नष्ट करने वाला’ बताया गया है। किताब में सल्तनत काल को लूट, विध्वंस और धार्मिक असहिष्णुता से भरा बताया गया है।

इंडियन एक्स्प्रेस के अनुसार, NCERT ने बताया है कि यह नई पुस्तक 13वीं से 17वीं शताब्दी के बीच के राजनीतिक घटनाक्रम, विद्रोहों और धार्मिक संघर्षों को केंद्र में रखती है, जिसे अब पहली बार कक्षा 8 में पढ़ाया जा रहा है। इससे पहले इसे 7वीं कक्षा में पढ़ाया जाता था।

सल्तनत काल और धार्मिक स्थलों पर हमले

नई पुस्तक में बताया गया है कि अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति मलिक काफूर ने श्रीरंगम, मदुरै, चिदंबरम और संभवतः रामेश्वरम जैसे प्रमुख हिंदू धार्मिक स्थलों पर आक्रमण किए। दिल्ली सल्तनत के दौरान बौद्ध, जैन और हिंदू मंदिरों पर कई बार हमले हुए। किताब के अनुसार, इन हमलों का उद्देश्य केवल लूट नहीं था, बल्कि मूर्तिभंजन यानी धार्मिक प्रतीकों का विनाश भी इसका मुख्य उद्देश्य था।

जजिया कर और गैर-मुस्लिम प्रजा

पुस्तक में ‘जजिया’ कर के बारे में भी बताया गया है। बताया गया है कि कुछ मुस्लिम शासकों द्वारा गैर-मुसलमानों (हिन्दुओं) पर लगाया गया था। किताब के अनुसार, यह कर उनके लिए सार्वजनिक अपमान का कारण भी बन गया। नई किताब के अनुसार, इस कर ने इस्लाम अपनाने के लिए एक प्रकार का वित्तीय और सामाजिक दबाव पैदा किया। कक्षा 7 की पुरानी किताब में जज़िया को भूमि कर के साथ वसूला गया कर बताया गया था, जबकि नई किताब इसे एक स्वतंत्र और अलग कर के रूप में पेश करती है।

बाबर – एक विजेता की दोहरी छवि

बाबर की आत्मकथा में उसे एक सुसंस्कृत और बौद्धिक रूप से जिज्ञासु व्यक्ति बताया गया है, लेकिन नई किताब में कहा गया है कि वह एक क्रूर विजेता था। किताब में बताया गया है कि उसने कई शहरों में नरसंहार किए, महिलाओं और बच्चों को गुलाम बनाया और लूटे गए शहरों के मारे गए लोगों की खोपड़ियों से मीनारें बनवाने पर गर्व महसूस किया। वहीं, पुरानी किताब में बाबर को केवल एक ऐसा शासक बताया गया था जिसे अपने सिंहासन से हटने के बाद काबुल और फिर दिल्ली और आगरा पर कब्ज़ा करने का अवसर मिला।

अकबर – सहिष्णुता और क्रूरता का मिश्रण

अकबर को नई किताब में एक ऐसा शासक बताया गया है जिसमें सहिष्णुता और क्रूरता दोनों के तत्व थे। नई किताब बताती है कि जब उसने चित्तौड़गढ़ के किले पर आक्रमण किया, तो लगभग 30,000 नागरिकों के नरसंहार का आदेश दिया।

किताब के अनुसार, अपनी जीत की घोषणा करते हुए उसने कहा कि उसने काफिरों के किलों और कस्बों पर कब्जा कर इस्लाम की स्थापना की और तलवार के बल पर मंदिरों को नष्ट कर काफिरों के प्रभाव को मिटा दिया। फिर अकबर ने बाद में विभिन्न धर्मों के प्रति सहिष्णुता दिखाई, फिर भी प्रशासन में गैर-मुसलमानों की संख्या अल्प ही रही।

औरंगजेब – धार्मिकता और राजनीति

नई किताब औरंगजेब के शासन को राजनीतिक और मजहबी दृष्टिकोणों से देखती है। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि उसके कई निर्णय राजनीतिक थे, उसके फरमान यह भी दिखाते हैं कि उसमें मजहबी कट्टरता भी थी।

उसने अपने राज्य के गवर्नरों को मंदिरों और धार्मिक शिक्षण संस्थानों को नष्ट करने के आदेश दिए। उसने काशी, मथुरा, सोमनाथ के मंदिरों, जैन धार्मिक स्थलों और सिख गुरुद्वारों को ध्वस्त करने का आदेश दिया।

आर्थिक और सामाजिक स्थिति

पुस्तक यह भी बताती है कि सल्तनत और मुगल शासन के अधीन एक मजबूत प्रशासनिक ढाँचा था और 13वीं से 17वीं शताब्दी के बीच आर्थिक गतिविधियाँ काफी जीवंत थीं। शहरों और बुनियादी ढाँचे में काफी प्रगति हुई, लेकिन 1600 के दशक के अंत में आर्थिक संकट और दबाव का दौर शुरू हुआ। इसके बावजूद, भारतीय समाज ने कस्बों, मंदिरों और अर्थव्यवस्था के अन्य पहलुओं के पुनर्निर्माण में लचीलापन और अनुकूलन क्षमता दिखाई।

मराठा और शिवाजी का योगदान

अध्याय के अंत में मराठों का वर्णन किया गया है, जिसमें शिवाजी को एक कुशल रणनीतिकार और दूरदर्शी नेता कहा गया है। उन्हें एक धार्मिक हिंदू बताया गया है जो अन्य धर्मों का सम्मान करते थे और अपवित्र हो चुके मंदिरों का पुनर्निर्माण करवाते थे।

किताब के भीतर मराठों को भारत के सांस्कृतिक विकास में एक महत्वपूर्ण योगदानकर्ता माना गया है। पुरानी किताब में शिवाजी को केवल एक कुशल प्रशासक और मराठा राज्य की नींव रखने वाला बताया गया था, लेकिन नई किताब में उनके धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण को भी महत्व दिया गया है।

नई किताब में दिल्ली सल्तनत के उत्थान-पतन, विजयनगर साम्राज्य, मुगलों का शासन, उनके खिलाफ हुए प्रतिरोध और सिखों के उदय को विस्तार से दर्शाया गया है। गौर करने वाली बात यह भी है कि पहले दिल्ली सल्तनत और मुगल इतिहास की पढ़ाई कक्षा 7वीं में होती थी।

लेकिन अब नए पाठ्यक्रम संरचना में बदलाव करते हुए, इसे 8वीं कक्षा में शामिल किया गया है। यह नई किताब पहले से कहीं ज्यादा आलोचनात्मक, विश्लेषणात्मक और तथ्यों पर आधारित है। इसमें शासकों की धार्मिक और सैन्य नीतियों का खुलकर अंदाजा लगाया गया है, जिसकी जानकारी पहले की किताबों में हल्की फुलकी ही दी गई थी।

सूर्य का आकार इतना बड़ा, फिर हनुमान जी ने कैसे निगला? – हिन्दू विरोधी पूछ रहे सवाल, जान लीजिए सनातन धर्म-दर्शन में छिपा जवाब

कुछ दिनों से सोशल मीडिया में सूर्य की तस्वीर वायरल की जा रही है और पूछा जा रहा है कि सूर्य का तो आकार फलाँ-फलाँ है तो हनुमान जी ने इसे कैसे निगल लिया? ऐसे प्रपंचियों को समझाना इस लेख का लक्ष्य नहीं, लेकिन कम से कम हिन्दुओं को तो चीजें पता होनी चाहिए। ख़ास बात ये है कि ये फ़ैलाने वाले कोई इस्लामी कट्टरपंथी नहीं हैं, बल्कि कई हिन्दू नाम वाले हैंडल भी हैं। इनका दलित हितों से कोई लेना-देना नहीं, लेकिन ये स्वयं को दलितों का ठेकेदार बताते हैं।

दिमागी स्तर मापने के जो भी मापदंड हों, इनका स्तर शून्य से भी नीचे जाता है। अब समय आ गया है जब हनुमान जी वाली कथा को क्रमवार देखें और समझें कि ऐसा क्या है जो सनातन धर्म पर हमला करने वालों को समझ नहीं आ रहा है। कथा संक्षेप में यूँ है कि हनुमान जी भूखे थे तो उन्होंने उगते हुए सूर्य को फल समझकर उसे निगल लिया। वो धरती से कूदकर सीधे सूर्य के पास गए। इससे दुनिया में अँधेरा हो गया और इंद्र ने उनपर वज्रप्रहार किया। बाद में वायुदेव के रुष्ट होने के बाद सब देवताओं ने उन्हें वरदान दिया।

हनुमान जी सूर्य को देखकर उसे निगलने के लिए उद्यत होते हैं

सनातन धर्म में सूर्य केवल ऊपर जो दिखता है वही सूर्य नहीं है। वेदों में सूर्य ब्रह्माण्ड का नेत्र है, जो ब्रह्म के चक्षु हैं उन्हें भी सूर्य ही कहा गया है। हनुमान जी उस समय बालक थे, लेकिन ज्ञानप्राप्ति को लेकर वो इतने व्यग्र थे कि एक ही झटके में सारा ज्ञान पा लेना चाहते थे। कथा कुछ यूँ है कि हनुमान जी ने उदित होते सूर्य को देखा और उसे निगलने के लिए उद्यत हो उठे। अर्थात, उन्हें आत्मज्योति की हल्की झलक दिखाई दी और वो तुरंत ही उसे पूरा पाने के लिए निकल पड़े।

वेदांत में ब्रह्म को ‘चक्षुः सूर्य इवोदितः’ कहकर संबोधित किया गया है, अर्थात वो ब्रह्म को ज्ञान का स्रोत बताकर कहा गया है कि वो कुछ उस तरह उदित होते हैं जैसे सूर्य। सूर्योदय का दृश्य काफ़ी सुंदर होता है, लेकिन उस सुंदरता और मद्धिम किरणों के पीछे सूर्य भयंकर ज्वाला का स्रोत है। ठीक वैसे ही, ज्ञान का प्रकाश बहुत अच्छा लगता है लेकिन उसे पाने निकलने पर पता चलता है कि ये अथाह है। कोई सीधे ब्रह्मज्ञानी नहीं बन सकता, उसके लिए प्रक्रिया से गुजरनी होती है।

वायु हनुमान जी की रक्षा करते हैं

वायु का तात्पर्य यहाँ अदृश्य जीवनरक्षक से है, जो ज्ञानप्राप्ति के लिए यात्रा करने वालों की सुरक्षा करता है। इसके पीछे ये सन्देश है कि अगर आप ज्ञानप्राप्ति के लिए बड़ी से बड़ी कूद भी लगाएँगे, तो इस ब्रह्माण्ड की प्राणवायु आपका साथ देगी। आपकी साँसें सार्थक लक्ष्य के लिए उपयोग में लाई जा रही हैं, इसीलिए वो आपका साथ नहीं छोड़ेंगी। योगी श्री M कहते हैं कि ये श्वास ही है जो आपकी आत्मा और आपके शरीर के बीच की सेतु है, अगर इसपर आपका नियंत्रण है तो आपके मस्तिष्क पर भी आपका नियंत्रण है।

अतः, हनुमान जहाँ भी जाते हैं वायुदेव उनका साथ देते हैं, उनकी रक्षा करते हैं। हनुमान वायुपुत्र भी हैं। यही कारण है कि वो लंका से उड़कर हिमालय पर पहुँच जाते हैं और वहाँ से पूरे पर्वत को उठाकर वापस लौटते हैं। लंका में आग लगाकर भी वो जलते नहीं, ‘मरुत उनचास’ पूरी लंका जला देते हैं लेकिन हनुमान जी नहीं जलते। ये वायु संपूर्ण ब्रह्माण्ड में है, पृथ्वी के वातावरण में ये हवा के रूप में है। हनुमान को पवन-पुत्र कहा गया है।

हनुमान सूर्य के प्रकाश से जलते नहीं

इसका अर्थ है कि सच्चा ज्ञान कभी भी आपको हानि नहीं पहुँचाता है, ये आपको शुद्ध करता है। हनुमान एक निर्दोष बालक हैं, भले ही वो ज्ञान रूपी प्रकाश के परम स्रोत के पास पहुँच जाते हैं लेकिन वो जलते नहीं। भगवद्गीता (4.38) में भी श्रीकृष्ण कहते हैं – ‘न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते‘, दूसरी कोई भी ऐसी चीज नहीं है जो ज्ञान की तरह आपको निर्मल कर सके। हनुमान जी द्वारा सूर्य के समीप जाकर भी न जलने के पीछे का अर्थ यही है कि आप तैयार नहीं हैं फिर भी सत्य या परमज्ञान आपको कोई नुक़सान नहीं पहुँचाएगा।

राहु सूर्य को निगलने के लिए लपकता है

कथा कुछ यूँ है कि उसी समय सूर्य को खाने के लिए राहु भी आया था, लेकिन हनुमान के भय से वो भाग जाता है। राहु, यानी – माया, शंका, भय। जब हनुमान यहाँ पवित्रता और साहस के प्रतीक हैं, तो राहु यहाँ माया है। माया से अध्यात्म के माध्यम से ही निपटा जा सकता है। माया को ‘महाठगिनी’ भी कहा गया है, जैसे-जैसे ज्ञान की प्राप्ति होती है वैसे-वैसे माया के बादल छँटते चले जाते हैं। हनुमान जी की तरह ही अपने डर का सामना कीजिए, मस्तिष्क में ‘सत्व’ होगा तब राहु नाम का तमस भागता फिरेगा।

योग वशिष्ठ में श्रीराम को उपदेश देते हुए वशिष्ठ मुनि समस्त संसार को माया बताते हुए कहते हैं कि इसमें जो कुछ भी है सब माया है। राहु उसी माया का प्रतीक है यहाँ। राहु ने ग्रहण लगा दिया, मतलब आपका चित्त आपके वश में नहीं है और ज्ञानप्राप्ति नहीं हो पाएगी। हनुमान जी इससे बच गए।

इंद्र द्वारा हनुमान को ख़तरा समझकर उनपर वज्र प्रहार करना

हनुमान जी को भूख लगी, उन्होंने उदित होते सूर्य का सुंदर रूप देखा, उसे निगलने के लिए उड़ लिए, पास पहुँचकर भी जले नहीं, राहु भाग निकला – अब कथा आगे बढ़ती है। इंद्र ने हनुमान जी को ख़तरा मानकर उनपर वज्र प्रहार किया। ज्ञानप्राप्ति के मार्ग में भी सज़ा? इंद्र यहाँ दैवीय कर्म, व्यवस्था और अनुशासन के प्रतीक हैं। ज्ञान तो आपको नहीं जलाएगा, लेकिन दैवीय शक्तियाँ आपकी परीक्षा अवश्य लेंगी। दुःख ज़रूर आएँगे, लेकिन अगर आप सही रास्ते पर हैं तो ये सज़ा नहीं बल्कि बदलाव की प्रक्रिया का माध्यम बनेंगे।

दुःख कभी-कभी सुधार के लिए ही आते हैं, ये दैवीय सज़ा ही नहीं होते। इसके बाद कथा है कि हनुमान जी को नुक़सान पहुँचता है तो वायुदेव पूरे ब्रह्माण्ड को तड़पता हुआ छोड़कर निकल लेते हैं। इस ब्रह्माण्ड में सबकुछ एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है, भौतिकी के नियम भी यही कहते हैं। कई नियम हमें पता नहीं, लेकिन फिर भी वो अस्तित्व में हैं और अपना कार्य कर रहे हैं। न्यूटन से पहले भी गुरुत्वाकर्षण था। अंत में देवताओं को भी झुकना पड़ता है और हनुमान परमज्ञानी बनकर निकलते हैं।

इसके बाद जो रामायण में होता है, वो हम सबको पता है। मान लीजिए, हमें इतिहास की किसी घटना के बारे में जानना है। जो पुरातत्वविद होंगे, वो सीधे उपलब्ध साक्ष्यों का अध्ययन करेंगे। जो इतिहासकार होंगे, वो समकालीन साहित्य देखेंगे। जो छात्र होंगे, वो उन इतिहासकारों को पढ़ेंगे। जो आम लोग होंगे, वो उस घटना पर आधारित उपन्यास पढ़ेंगे। जो बच्चे होंगे, उन्हें चित्रकथा के रूप में वो घटना पढ़ाई जाएगी। जिसका ज्ञान का जो स्तर, कंटेंट उसके लिए उसी रूप में दिमाइज किया जाता है। सनातन धर्म में भी ऐसा ही है।

जिन्हें शंका है, वो हनुमान जी पर लिखे गए इस लेख को पढ़ सकते हैं। श्रीराम ने हनुमान जी की बातों से ही अंदाज़ा लगा लिया कि वो तीनों प्रमुख वेदों के ज्ञाता हैं। जब पहली बार श्रीराम उनसे मिले, उस प्रसंग में हनुमान जी काफी देर तक बोलते हैं। श्रीराम ने पाया कि इसके बावजूद उनके मुँह से एक भी अशुद्धि नहीं निकली। हनुमान जी की भौहें, ललाट, मुख और नेत्र के अलावा सभी अंग उनकी बातों के हिसाब से उनका साथ देते थे। यानी, सभी अंगों में और उनकी बातों में तालमेल दिखता था।

टैगोर, मुजीबुर और अब सत्यजीत रे… इस्लामी कट्टरपंथियों ने मकान से निकाली दुश्मनी: अपनी ही सांस्कृतिक विरासत को बर्बाद करने में जुटी यूनुस सरकार

भारतीय फिल्ममेकर सत्यजीत रे का बांग्लादेश में स्थित घर गिरा दिया गया है। मैमनसिंह शहर में बने सत्यजीत रे के पैतृक घर को न गिराने की गुजारिश भारत सरकार की ओर से भी की गई थी। भारत की ओर से कहा गया था कि ये एक सांस्कृतिक धरोहर है। इसकी मरम्मत और संरक्षण का बीड़ा भी भारत सरकार ने उठाने की बात कही थी। इसके बावजूद बांग्लादेश की युनुस सरकार नहीं मानी और ऐतिहासिकता की परवाह किए बिना इसे जमींदोज कर दिया।

सत्यजीत का ये घर असल में उनकी तीन पीढ़ियों से जुड़ा हुआ था। इस घर को सत्यजीत रे के दादा और कवि सुकुमार रे के पिता प्रसिद्ध बाल साहित्यकार उपेंद्र किशोर रे का पैतृक घर है। जर्जर होने के 10 साल पहले तक इस घर को पहले मैमनसिंह शिशु अकादमी के तौर पर भी इस्तेमाल किया जाता था। लेकिन बीते कुछ वर्षों से यह वीरान पड़ी थी। बांग्लादेशी अधिकारियों ने इमारत को जर्जर कहते हुए इसे नशेड़ियों का अ्डडा बताया था।

सिनेमा की रीढ़ रहे सत्यजीत

सत्यजीत रे विश्व सिनेमा के बड़े फिल्मकारों में से एक रहे हैं। उनकी फिल्मों ने भारतीय सिनेमा को वैश्विक पहचान दिलाई। वह फिल्म डायरेक्टर होने के साथ-साथ लेखक, संगीतकार और चित्रकार भी थे। उनके दादा उपेंद्र किशोर रे ने लगभग 100 साल पहले ये घर बनवाया था। जो वर्तमान में एक ऐतिहासिक धरोहर था। 1947 में बँटवारे के दौरान यह संपत्ति वर्तमान बांग्लादेश (पहले पूर्वी पाकिस्तान) के अधिकार क्षेत्र में चली गई थी।

भारत सरकार ने इस इमारत को बचाने की पेशकश भी की थी, लेकिन बांग्लादेशी प्रशासन ने इसे नजरअंदाज कर दिया।

रबींद्रनाथ टैगोर के घर पर भी हुए हमले

संस्कृति के विनाश में महज सत्यजीत रे का ही घर नहीं तोड़ा गया बल्कि इस कड़ी में नोबेल पुरस्कार विजेता रबींद्रनाथ टैगोर का भी नाम शामिल है। 8 जून 2025 को रबींद्रनाथ टैगोर के पैतृक घर रबींद्र कचहरी बाड़ी में 50-60 लोगों की भीड़ ने घुसकर तोड़फोड़ की और संग्रहालय, सभागार और संरक्षक कार्यालय को भी नुकसान पहुँचाया था। घटना ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आक्रोश पैदा किया।

अपनी सफाई में क्या बोले यूनुस

सत्यजीत रे के घर को गिराए जाने के बाद भारत सरकार में इसे अत्यंत खेदजनक बताया और बांग्लादेश सरकार से पुनर्विचार की अपील भी की। इसके बाद मोहम्मद यूनुस सरकार का कहना है कि अब उस जगह पर नई इमारत बनाई जाएगी ताकि शिशु अकादमी की गतिविधियाँ दोबारा शुरू की जा सकें। पर असल में ये हरकत बांग्लादेश की अंतरिम सरकार की असंवेदनशीलता और गैर-जिम्मेदाराना हरकत को दिखलाता है।

रबींद्रनाथ के घर पर तोड़फोड़ की घटना के बाद भी भारत ने तीखी प्रतिक्रिया दी थी और इसे “सांस्कृतिक स्मृति और सभ्यतागत निरंतरता पर सीधा हमला” बताया था। इसके बाद खुद की साख बचाने के दबाव में यूनुस सरकार ने जाँच और गिरफ्तारी की बात कही।

रवींद्रनाथ टैगोर और सत्यजीत रे दोनों ही बंगाली साहित्य, कला और विचारधारा को दुनिया के सामने लाने में और मजबूती से खड़ा करने में बेहद अहम भूमिका निभाई है। रबींद्रनाथ ने बांग्लादेश के साथ भारत का राष्ट्रगान भी लिखा। उनकी रचनाएँ बंगाली संस्कृति की आत्मा को साफतौर पर दिखलाती हैं।

इन दोनों के घरों के साथ हुई घटनाओं में एक समानता जरूर है और वह है- सरकार की निष्क्रियता और इस्लामीकरण करने वाले कट्टरपंथियों को बढ़ावा देने वाली चुप्पी। मोहम्मद यूनुस खुद नोबेल शांति पुरस्कार विजेता हैं। इसके बावजूद एक दूसरे नोबेल विजेता रबींद्रनाथ टैगोर की निशानी, उनके घर, जिससे न केवल भारत बल्कि बांग्लादेश के भी संस्कृति के बारे में दुनिया को पता चलता है, उसे बचाने में असफल रहे।

सत्यजीत रे के मामले में भी उनसे अपेक्षा थी कि वे सांस्कृतिक सहिष्णुता और विरासत संरक्षण को प्राथमिकता देंगे। लेकिन उनकी सरकार की नीतियाँ और प्रतिक्रियाएँ इस उम्मीद के विपरीत ही रही हैं। यह विडंबना ही है कि एक व्यक्ति, जिसने गरीबी हटाने और सामाजिक न्याय की बात की, उसकी सरकार सांस्कृतिक न्याय और ऐतिहासिक स्मृति की रक्षा में असफल रही।

अपने देश के संस्थापक के साथ भी किया अन्याय

ऐतिहासिकता को दरकिनार करने के साथ-साथ युनुस सरकार अपनी जड़ों को भी भुलाने के लिए हर विनाशकारी कदम उठाने को तैयार है। अंतरिम सरकार ने बांग्लादेश के संस्थापक बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान को राष्ट्रपिता के दर्जे से भी वंचित कर दिया। साथ ही उनके स्वतंत्रता सेनानी की मान्यता को रद्द किया ।

मुजीबुर रहमान ने 1971 के मुक्ति संग्राम का नेतृत्व किया, लाखों लोगों के लिए प्रेरणास्रोत बने और एक स्वतंत्र राष्ट्र की नींव रखी। देश को पाकिस्तान से आजादी दिलाने के उनके संघर्ष और बलिदान की अवहेलना करके असल में युनुस सरकार ने उनके अस्तित्व के साथ खिलवाड़ किया, उन्हें इतिहास से मिटाने की कोशिश की और उनके नाम को भी मुक्ति संग्राम की परिभाषा से हटा दिया।

नए अध्यादेशों के तहत उन्हें “मुक्ति संग्राम का सहयोगी” मात्र घोषित किया गया है, जिससे उनकी ऐतिहासिक भूमिका को गौण कर दिया गया है। इससे पहले यूनुस सरकार ने उनकी तस्वीर को करेंसी नोटों से हटाने और उनसे जुड़े राष्ट्रीय दिवसों को रद्द करने का भी निर्णय लिया था।

असल में युनुस का यह निर्णय शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग को निशाना बनाने के लिए था। मुजीबुर रहमान की विरासत को मिटाने की कोशिशें बांग्लादेश को उसके इतिहास से काटने की साजिश जैसी लगती हैं, जो अंततः देश की पहचान और आत्मसम्मान को कमजोर करती हैं।

यह सब उस समय हो रहा है जब बांग्लादेश को एक स्थिर और समावेशी नेतृत्व की आवश्यकता है। यूनुस, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शांति और सामाजिक न्याय के प्रतीक माने जाते हैं, उनकी सरकार का यह रवैया सांस्कृतिक और ऐतिहासिक न्याय के खिलाफ है।

बांग्लादेश की जनता और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह समझना होगा कि किसी भी शहर, राज्य या देश की सांस्कृतिक विरासत केवल ईंट-पत्थर की इमारतें नहीं होतीं, बल्कि वे समाज की आत्मा होती हैं। सत्यजीत रे और रबींद्रनाथ टैगोर जैसे व्यक्तित्वों की स्मृति को मिटाना, दरअसल उस आत्मा को ही नष्ट करना है।

मोहम्मद यूनुस सरकार उन लोगों का जखीरा है जिन्हें संस्कृति, विरासत, ऐतिहासिकता जैसे किसी भी शब्द से कोई वास्ता ही नहीं है। यह वे का इस्लामिक कट्टरपंथी हैं जिन्हें बस हर तरह से विनाश करना ही आता है।

जिनके घर गिराए गए या तोड़े गए या जो सेनानी रहे उन्होंने तो समाज के भले के लिए और समाज को आगे बढ़ने का ही काम किया पर यूनुस की सरकार में शामिल इस्लामिक कट्टरपंथी सिर्फ देश में अस्थिरता, अशांति और तनाव बढ़ाने के लिए ही जाने जा रहे हैं। भविष्य में मोहम्मद यूनुस सरकार इतिहास में एक ऐसी सत्ता के रूप में दर्ज होगी जिसने अपनी ही सांस्कृतिक जड़ों को काटने का काम किया।

बिहार में बांग्लादेशी साज़िश, लीक हुई ‘टूलकिट’: ‘बैक साइड’ में चोटिल पप्पू यादव और रवीश कुमार ने किया चुनाव के बहिष्कार का ऐलान

पप्पू के आगे दो पप्पू, पप्पू के पीछे दो पप्पू। बोलो कितने पप्पू? पप्पू-पप्पू-पप्पू… जिधर देखो पप्पू की पप्पू। लखनऊ के कोर्ट में सरेंडर करता पप्पू। चुनाव आयोग को गाली देता पप्पू। पप्पू के मंच से भगाया जाता पप्पू। फिर भी बेटे का करियर बनाने के लिए पप्पू की तारीफ़ करता पप्पू।

पूर्णिया से निर्दलीय सांसद और कॉन्ग्रेस के नेता पप्पू यादव विपक्ष से कह रहे हैं कि वो बिहार में होने वाले विधानसभा चुनाव का बहिष्कार करे। पप्पू यादव का ख़ुद कॉन्ग्रेस ने 2024 के लोकसभा चुनाव में बहिष्कार कर दिया था, जिस कारण उन्हें निर्दलीय चुनाव लड़ना पड़ा था। अभी कुछ दिनों पहले हमें फिर से ये नज़ारा देखने को मिला जब बिहार में महागठबंधन के विरोध प्रदर्शन के दौरान कॉन्ग्रेस ने पप्पू यादव का बहिष्कार कर दिया। उन्हें मंच तक पर नहीं चढ़ने दिया गया, राहुल गाँधी के सुरक्षाकर्मियों ने धक्का देकर भगाया सो अलग।

पप्पू यादव से लेकर रवीश कुमार तक, चुनाव बहिष्कार वाला ‘टूलकिट’

लगता है पप्पू यादव की ‘बैक साइड’ में लगी चोट का कुछ असर उनके दिमाग पर भी हुआ है, इसीलिए उन्हें हर तरफ बहिष्कार-बहिष्कार ही दिखाई दे रहा है। बोल पप्पू यादव रहे हैं, लेकिन यह भाषा वही टूलकिट वाली है जो अराजकता को जन्म देती है। उस अराजकता से अराजक तत्व सत्ता हथियाने में कामयाब हो जाते हैं। जब लोकतान्त्रिक रूप से चुनी हुई सरकार को चुनाव में हराने में ये कामयाब नहीं होते हैं, तब यही तरीका अपनाया जाता है।

रवीश कुमार का भी कहना है – “चुनाव क्यों करा रहे हैं, प्रिंट कमांड दीजिए और रिज़ल्ट छाप दीजिए।” नेताओं और उनका एजेंडा चलाने वाले युट्यूबरों की भाषा एक सी दिख रही है, ये मात्र संयोग नहीं हो सकता। अंदरखाने जो साज़िश चल रही है, ये उसको अमल में लाने के लिए लगाए गए प्यादे हैं।

मामला कुछ यूँ है कि बिहार में मतदाता सूची में सुधार का अभियान चल रहा है। ये काम भाजपा या जदयू नहीं, बल्कि चुनाव आयोग द्वारा किया जा रहा है। 1 लाख BLO घर-घर जाकर मतदाता सूची को अपडेट कर रहे हैं। ख़ास बात यह है कि राजनीतिक दलों द्वारा नियुक्त डेढ़ लाख BLA इस कार्य में उनकी सहायता कर रहे हैं। ज़ाहिर है, इनमें विपक्षी दलों के भी एजेंट्स हैं। क्या पप्पू यादव ये कहना चाह रहे हैं कि कॉन्ग्रेस द्वारा नियुक्त बूथ लेवल एजेंट्स ठीक से अपना कार्य नहीं कर रहे हैं? जब प्रक्रिया में ख़ुद कॉन्ग्रेस पार्टी शामिल है, फिर भी अगर उसे दोष दिख रहा है – तो उसका ठीकरा कॉन्ग्रेस पर भी फूटना चाहिए न?

भारत में लागू करना चाहते हैं बांग्लादेश वाला ‘अराजक’ मॉडल

चुनाव का बहिष्कार करने वाला टूलकिट इनका आजमाया हुआ है। पिछले वर्ष बांग्लादेश में खालिदा जिया की पार्टी BNP ने आम चुनाव का बहिष्कार किया। इस टूलकिट पर चलते हुए विदेशी ताक़तों की मदद से चुनाव विरोधी माहौल बनाया जाता है। जैसे, बांग्लादेश में यूरोपियन यूनियन के एम्बेस्डर चार्ल्स व्हाइटली ने एक पत्र लिखकर चुनाव की विश्वसनीयता पर सवाल उठाया। इसी तरह, जनवरी 2019 में लंदन में सैयद शुजा नामक शख्स ने कथित EVM हैकिंग का लाइव डेमो दिखाया। ये ऐसा डेमो था कि वामपंथी मीडिया पोर्टलों तक को कहना पड़ा – इतना ग़लत कैसे हो सकता है भाई?

पप्पू यादव भी इसी भाषा में बोल रहे हैं। वो कह रहे हैं कि दुनिया को पता तो चले कि भारत कितना लोकतान्त्रिक है। विडम्बना देखिए, एक ऐसा नेता ये सब कह रहा है जो ख़ुद 2 प्रतिशत से भी कम अंतर से जीतकर लोकसभा पहुँचा है। ये खेल अभी शुरू नहीं हुआ है। पिछले वर्ष जब महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में महायुति गठबंधन की जीत हुई, तब भी ऐसी साज़िश रची गई थी। इसी महाराष्ट्र में जब लोकसभा चुनाव में MVA की जीत हुई थी, तब EVM और चुनाव में छेड़छाड़ की चर्चाएँ थम गई थीं। एक निलंबित पुलिस अधिकारी के बयान के सहारे प्रपंच रचने का प्रयास किया गया। महाराष्ट्र चुनाव पर चर्चाओं को अबतक खींचा जा रहा है, पिछले ही महीने राहुल गाँधी ने दर्जनभर अख़बारों में लेख लिखकर महाराष्ट्र में कथित मैच फिक्सिंग का रोना रोया।

महाराष्ट्र में दाल नहीं गली, महाराष्ट्र चुनाव पर प्रपंच को नेशनल इशू बनाने की कोशिश भी नहीं चल पाई – तो अब बिहार के सहारे इस फैंटेसी को पूरा करने का प्रयास किया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट भी कह चुका है कि चुनाव आयोग को ये तय करने का अधिकार है कि जो भारत के नागरिक नहीं हैं वो मतदाता सूची में न रहें। बिहार म 2003 में भी SIR, यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन हुआ था। नब्बे के दशक में भी देश में तीन-तीन बार ये किया जा चुका है, फिर हंगामा सिर्फ़ अभी क्यों? 1957 और 1961 में जब SIR हुआ था, तब जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री थे। नेहरू के समय हुआ तो सही, मोदी के समय ग़लत कैसे?

अब तो पहले जैसी दिक्कत भी नहीं है। सबकुछ ऑनलाइन भी उपलब्ध है। voters.eci.gov.in पर जाकर फॉर्म भरकर कोई भी व्यक्ति गणना प्रपत्र भर सकता है। जो कामकाज या पढ़ाई के सिलसिले में बिहार से बाहर रह रहे हैं, उनके लिए भी ये विकल्प खुला है। मैंने भी ऐसे ही अपना नाम दर्ज कराया है।

असल में इनकी पूरी योजना वो करने की है, जो ये किसान आंदोलन के दौरान नहीं कर पाए, जो ये शाहीन बाग़ उपद्रव के दौरान नहीं कर पाए। किसान आंदोलन के दौरान भी इंटरनेशनल टूलकिट चला था, जिसमें गायिका रिहाना और पॉर्नस्टार मिया खलीफा तक के पोस्ट्स आए थे। अब पप्पू यादव ने शुरुआत की है, देखते हैं किन-किन के पोस्ट आते हैं। जबसे इन्होंने बांग्लादेश की चुनी हुई प्रधानमंत्री शेख हसीना को दूसरे देश में शरण लेते हुए देखा है, तबसे इनकी बाँछें खिली हुई हैं। जब अराजकता के कारण शेख हसीना को बांग्लादेश छोड़ना पड़ा था, तब इन्होंने भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देश से बाहर शरण लेने को मजबूर करने के सपने देखे थे। तभी ये अराजकता को ‘युवा क्रांति’ बताकर उसका समर्थन कर रहे थे, हिन्दुओं के नरसंहार पर चुप थे।

बिहार में बुरी तरह विफल होगी ‘टूलकिट’ वाली साजिश

पप्पू यादव को सबसे पहले अपने पूर्णिया संसदीय क्षेत्र में जाना चाहिए, वहाँ के कॉन्ग्रेस के BLOs से पूछना चाहिए कि SIR कैसे होता है। वैसे पप्पू यादव के आसपास रहने वाले लोग बताते हैं कि जब तक वो दिन में एक इंटरव्यू नहीं देते हैं, तबतक उनके पेट में मरोड़ें उठती रहती हैं। जब वो लोगों के साथ होते हैं तब इतना बोलते हैं कि बाकियों को बोलने का मौक़ा भी नहीं मिलता।

इनके सामने समस्या ये आ रही है कि न बिहार में कॉन्ग्रेस का कोई अस्तित्व बचा है, न वहाँ भाजपा का मुख्यमंत्री हैं। सारी आलोचनाओं के बावजूद नीतीश कुमार का चेहरा क्लीन है, जिसके सामने चारा चोरी का ठप्पा वाला परिवार भी कहीं नहीं टिकता। जीतन राम माँझी और चिराग पासवान जैसे महादलित नेता NDA में हैं, इसीलिए यहाँ इनका जाति कार्ड भी नहीं चल पा रहा। अतः, जो साजिश महाराष्ट्र में विफल हुई उसका बिहार में भी फेल होना तय है। लेकिन हाँ, पप्पू यादव जैसे नेताओं के लगातार बोलते रहने से टूलकिट एक्सपोज होता रहेगा।