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जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ‘न्याय’ को जिंदा रखने के लिए जरूरी था आपका डटे रहना, क्योंकि कोर्टरूम को भी केजरीवाल बनाना चाहते थे अपनी ‘टुच्ची राजनीति’ का अड्डा

दिल्ली हाईकोर्ट ने शराब नीति केस (एक्साइज पॉलिसी केस) में AAP के संयोजक अरविंद केजरीवाल की उस माँग को खारिज कर दिया है जिसमें उन्होंने जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के इस मामले की सुनवाई से ‘रिक्यूजल’ (खुद को केस से अलग करने) की माँग की गई थी। यह कोई सीधा सा फैसला भर नहीं है बल्कि केजरीवाल के उस प्रोपेगेंडा को कानून का हंटर है जिसमें वो यह तय करने की कोशिश कर रहे थे कि कौन सा जज निष्पक्ष है और कौन नहीं।

केजरीवाल खुद को बेशक लोकतंत्र का मसीहा बताते ना थकते हों लेकिन उनकी यह दलील या कहें तो प्रोपेगेंडा लोकतंत्र की उस बुनियादी आत्मा के खिलाफ भी है जिसमें न्यायपालिका को स्वतंत्र और निष्पक्ष माना गया है। इस मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस शर्मा ने केजरीवाल के प्रोपेगेंडा के खिलाफ तल्ख टिप्पणियाँ की और साफ कर दिया कि वह इस मामले की सुनवाई से खुद को अलग नहीं करने वाली हैं।

जज की क्षमता का फैसला नेता नहीं ऊपरी अदालत करेगी: जस्टिस शर्मा

दरअसल, अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और अन्य आरोपितों ने कहा था कि जस्टिस शर्मा पहले भी उनके खिलाफ फैसले दे चुकी हैं, इसलिए उन्हें इस केस की सुनवाई नहीं करनी चाहिए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जज के बच्चों का नाम केंद्र सरकार के वकीलों के पैनल में है और इससे ‘हितों का टकराव’ हो सकता है।

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस शर्मा ने अपने फैसले में सख्त लहजे में कहा, “किसी जज की क्षमता (कम्पीटेंस) का फैसला कोई पक्षकार (लिटिगेंट) या नेता नहीं कर सकता। यह काम केवल ऊपरी अदालत का होता है। उन्होंने कहा कि कोई भी राजनेता इस सीमा को पार नहीं कर सकता और जज की योग्यता पर फैसला नहीं दे सकता।”

साथ ही उन्होंने कहा, “हर बार मुकदमा लड़ने वाला व्यक्ति जीत नहीं सकता। अगर उसे लगता है कि फैसला गलत या एकतरफा है तो उसका आकलन भी केवल ऊपरी अदालत ही करेगी। जैसे जिला अदालत (डिस्ट्रिक्ट कोर्ट) के फैसले को हाईकोर्ट (HC) देखती है और हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट (SC) जाँचती है।” उन्होंने कहा कि सिर्फ इस बात से कि किसी पक्षकार को यह डर है कि उसे इस कोर्ट से राहत नहीं मिलेगी वह जज पर पक्षपात का आरोप लगाने का आधार नहीं बन सकता।

यूँ तो जस्टिस शर्मा का बयान न्याय व्यवस्था के एक बुनियादी सिद्धांत को समझाने के लिए ही है लेकिन इसे समझना बेहद अहम है। न्यायपालिका में एक तय प्रक्रिया होती है। अगर किसी को लगता है कि निचली अदालत का फैसला गलत है, तो उसके लिए एक रास्ता पहले से बना हुआ है और वो है अपील का रास्ता। जैसे- जिला अदालत के फैसले को हाई कोर्ट देखता है और हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट देखता है। यानी किसी फैसले की सही या गलत होने की जाँच ऊपरी अदालत करती है, न कि वह व्यक्ति जो केस हार रहा है या जिसे फैसला पसंद नहीं आया।

जस्टिस शर्मा का दूसरा महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि ‘हर मुकदमा लड़ने वाला व्यक्ति जीत नहीं सकता’। इसका मतलब यह है कि अदालत में हमेशा एक पक्ष जीतेगा और दूसरा हारेगा। लेकिन हारने वाला पक्ष अगर सिर्फ इस आधार पर जज पर पक्षपात का आरोप लगाने लगे कि उसे राहत नहीं मिली तो यह न्याय व्यवस्था के लिए खतरनाक हो सकता है। अगर ऐसा मान लिया जाए तो हर असंतुष्ट पक्षकार जज बदलने की माँग करेगा और आगे चलकर इससे अदालतों का काम रुक जाएगा और न्याय प्रक्रिया प्रभावित होगी।

ताकि जनता के मन में जजों की निष्पक्षता बनी रही

केजरीवाल ने जो इस मामले पर प्रोपेगेंडा फैलाना शुरू किया है उसका मकसद यही है कि किसी भी तरह लोगों के मन में जस्टिस शर्मा को लेकर भ्रम पैदा किया जा सके। इससे होता ये कि अगर कल को फैसला केजरीवाल के खिलाफ भी आता तो वो यह कहना शुरू कर देते कि यही तो उन्हें पहले से उम्मीद थी। वहीं, उनके पक्ष में फैसला देने पर जस्टिस शर्मा के दबाव में आने को लेकर सवाल उठने शुरू हो जाते। लेकिन जस्टिस शर्मा ने न्याय के सिद्धांत को सबसे आगे रखा और केजरीवाल को खूब खरी-खरी भी सुनाई।

जस्टिस शर्मा ने जज पर हमलों पर संस्था पर हमला बताते हुए कहा, “जज किसी वादी के मन में पूर्वाग्रह से पैदा हुए बेबुनियाद शक को दूर करने या मनगढ़ंत आरोपों के आधार पर सुनवाई से खुद को अलग नहीं कर सकता। इस तरह का खतरा न केवल हाईकोर्ट्स तक पहुँचेगा, बल्कि जिला कोर्ट तक भी जाएगा।” उन्होंने साफ-साफ कहा कि अगर आज वो इस फैसले से खुद को अलग कर लेती हैं तो जनता के मन में यह धारणा बना जाएगी कि जज किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विरोध में काम करते हैं।

जजों को हटाने की माँग कहाँ जाकर रुकेगी?

केजरीवाल की इस माँग को मान लिया जाए तो फिर यह माँग कहा जाकर रुकेगी? जजों के भी परिवार हैं, उनके बच्चे हैं और वो कुछ ना कुछ काम करते ही होंगे। ऐसे में अगर हर बात को जजों के परिवार से जोड़कर पूर्वाग्रह पैदा कर लिया जाए तो यह नजीर कितनी खतरनाक हो सकती है। कल को जिसके भी पक्ष में फैसला नहीं आएगा वो जज पर इल्जाम लगा देगा, उसे बदलने की माँग करने लगेगा और फिर जजों-न्याय व्यवस्था के खिलाफ एक अंतहीन चक्र शुरू हो जाएगा।

न्यायपालिका की पूरी व्यवस्था इस भरोसे पर टिकी होती है कि जज निष्पक्ष होकर कानून के अनुसार फैसला करेंगे। अगर हर पक्षकार अपनी सुविधा के अनुसार जज बदलवाने लगे, तो यह ‘फोरम शॉपिंग’ जैसी स्थिति पैदा कर देता है। इसके बाद लोग उस जज की तलाश करेंगे जो उन्हें लगेगा कि वो उनके पक्ष में फैसला दे सके। इससे न सिर्फ न्यायिक प्रक्रिया कमजोर होती है बल्कि यह संदेश भी जाता है कि अदालतें दबाव में आ सकती हैं और यह लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा है।

जस्टिस शर्मा का कहना है कि केजरीवाल ने मनगढ़ंत और अटकलों पर आधारित आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि यह उनका पक्का फर्ज बन जाता है कि वह इसका बेखौफ होकर जवाब दें। उन्होंने कहा, “बदकिस्मती से मुझे दो मुकदमेबाजों के बीच का झगड़ा नहीं बल्कि एक मुकदमेबाज और मेरे एक जज के बीच का झगड़ा सुलझाना है। कोई भी जज, किसी मुक़दमेबाज के मन में पक्षपात को लेकर पैदा हुए बेबुनियाद शक को दूर करने के लिए, या मनगढ़ंत आरोपों के आधार पर खुद को केस से अलग नहीं कर सकता।”

उन्होंने केजरीवाल को आड़े हाथों लेते हुए कहा, “यह अदालत अपने और इस संस्था के सम्मान के लिए खड़ी रहेगी, भले ही यह मुश्किल क्यों न लगे। अगर ऐसे आधारों पर खुद को केस से अलग करने की बात मान ली जाती है तो इससे हमारी न्याय प्रक्रिया पर खतरा पैदा हो जाएगा। तब इसे ‘मैनेज्ड जस्टिस’ (प्रबंधित न्याय) कहा जाएगा।”

इसे इस तरह समझिए कि अगर बिना सबूतों के जजों की निष्पक्षता पर सवाल उठाए जाएँ और उन्हें हटाने की माँग की जाए तो यह धीरे-धीरे एक ट्रेंड बन सकता है। इसके चलते जजों पर मनोवैज्ञानिक दबाव बढ़ता है और वे विवादास्पद मामलों में निर्णय लेने से हिचक सकते हैं। इससे न्याय मिलने में देरी होगी और आम जनता का विश्वास न्याय व्यवस्था से उठ सकता है। इसलिए रिक्यूजल की माँग केवल असाधारण परिस्थितियों में ठोस और प्रमाणिक आधार पर ही होनी चाहिए न कि इसे एक राजनीतिक या कानूनी हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाए।

केजरीवाल का इतिहास रहा है बेबुनियाद आरोपों की ‘टुच्ची राजनीति’

अरविंद केजरीवाल की राजनीति की शुरुआत आरोप लगाने वाले अंदाज में ही हुई थी। बिना ठोस सबूतों के गंभीर आरोप लगाना, नैतिकता की ऊँची बातें करना और फिर उन्हीं आरोपों को राजनीतिक हथियार बनाकर जनभावनाओं को प्रभावित करना। यही उन्होंने राजनीति में किया और यही कोशिश अब वो कोर्ट में भी करने की कोशिश कर रहे हैं।

दरअसल, केजरीवाल का राजनीतिक उदय भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से हुआ। उस समय उन्होंने और उनकी टीम ने राजनीतिक दलों, उद्योगपतियों या सरकारी संस्थाओं पर। उस दौर में व्यवस्था से नाराज जनता के एक बड़ने वर्ग ने इन आरोपों को बिना ज्यादा सवाल किए स्वीकार कर लिया। लेकिन राजनीति और न्यायपालिका के बीच एक बहुत बड़ा अंतर है राजनीति में धारणा काम करती जाती है जबकि अदालत में केवल तथ्य और सबूत ही मायने रखते हैं।

यह ध्यान रखना चाहिए कि लोकतंत्र में न्यायपालिका अहम स्तंभ होती है। यदि राजनीतिक लाभ के लिए उस पर भी संदेह किए जाने लगेगा तो यह केवल एक व्यक्ति या एक पार्टी का मुद्दा नहीं रहता बल्कि यह पूरे लोकतांत्रिक ढाँचे के लिए खतरा बन जाता है। जब जनता के सामने बार-बार यह नैरेटिव बनाया जाता है कि ‘अगर फैसला हमारे पक्ष में नहीं आया, तो सिस्टम ही गलत है’ तो यह न्याय व्यवस्था में विश्वास को कमजोर करता है।

यह रास्ता खतरनाक है। क्योंकि यह धीरे-धीरे यह एक प्रवृत्ति बन जाती है। अगर हर हार के बाद न्यायपालिका पर ही सवाल उठाए जाएँगे तो आम जनता का भरोसा किस पर रहेगा? लोकतंत्र में असहमति का अधिकार है लेकिन संस्थाओं की गरिमा को गिराकर राजनीति करना पूरे सिस्टम को कमजोर करता है।

यह कहना गलत नहीं होगा कि आरोपों की राजनीति ने केजरीवाल को सत्ता तक पहुँचाया था लेकिन वही राजनीति अब उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती बनती सकती है। क्योंकि जब वही तरीका अदालत में अपनाया जाता है, तो वह न केवल असफल होता है बल्कि उल्टा नुकसान भी पहुँचाता है।

केजरीवाल ने एक चतुर राजनेता की तरह दाँव चला और अपनी कुटिल बुद्धि से टुच्ची राजनीति को कोर्ट तक खींच लिया। हालाँकि, जस्टिस शर्मा केजरीवाल के खिलाफ तनकर खड़ी हो गईं और उनके प्रोपेगेंडा को ध्वस्त कर दिया।

जिस Gen-Z पर फिदा था भारत का विपक्ष, महीने भर में उनका अपने ‘हीरो’ से होने लगा मोहभंग: नेपाल में फूटने लगा क्रांति का बुलबुला

जिस Gen-z की आँधी पर सवार होकर बालेन शाह ने नेपाल की सत्ता तक की चढ़ाई पूरी की। उसका एक महीना भी पूरा नहीं हुआ है और नेपाल में असंतोष देखा जा रहा है। चाहे ‘भंसार नीति‘ हो या ‘स्वास्थ्य नीति’ जनता विरोध कर रही है। यहाँ तक कि छात्र राजनीति पर रोक लगाने के खिलाफ छात्र एकजुट हो रहे हैं। रहा सहा कसर गृहमंत्री पर लगे मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप ने पूरा कर दिया, क्योंकि Gen-z के आंदोलन की शुरुआत ही भ्रष्टाचार के खिलाफ हुई थी।

बालेन शाह का उदय भले ही एक ‘एंटी-एस्टैब्लिशमेंट’ और युवा नेतृत्व की जीत के रूप में देखा गया हो, लेकिन नेपाल की वास्तविक राजनीतिक व्यवस्था में कोई बड़ा बदलाव नहीं दिख रहा है। एक तरह से कहा जा सकता है कि एक महीने में ही बालेन शाह रूपी ‘गुब्बारा’ फूट गया है।

दरअसल बालेन शाह को लेकर जिस ‘जेनरेशनल शिफ्ट’ की बात की जा रही थी, वह अभी अधूरी नजर आ रही है। यह सही है कि उन्होंने पारंपरिक दलों से हटकर अपनी अलग पहचान बनाई और युवाओं के बीच खासा समर्थन हासिल किया, लेकिन उनकी राजनीतिक टीम और निर्णय प्रक्रिया में युवाओं और महिलाओं की भागीदारी काफी कम है यानी प्रतिनिधित्व के स्तर पर वही पुरानी व्यवस्था कायम है।

Gen-z का आंदोलन और सत्ता तक पहुँचे बालेन शाह

Gen-z आंदोलन के बाद 2025 में नेपाल में तख्ता पलट गई थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को पीएम पद से इस्तीफा देना पड़ा था। उस वक्त भी Gen-z बालेन शाह को ही अपना नेता मान रहे थे। बालेन शाह के समर्थन से ही सुशीला कार्की के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी। चुनाव हुए और बालेन शाह की पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी ने प्रचंड बहुमत पाया। 27 मार्च 2026 को बालेन शाह नेपाल के सबसे युवा प्रधानमंत्री बने। लेकिन Gen-z की उम्मीदों पर क्या खड़े नहीं उतर पा रहे बालेन शाह? आखिर क्यों कुछ महीने बाद ही नेपाल की सड़कों पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया है।

भारत-नेपाल के बीच बेटी-रोटी का संबंध रहा है। भारत- नेपाल सीमा से हर दिन हजारों लोग आवाजाही करते हैं और दिनचर्चा की वस्तुएँ खरीदते हैं। बालेन सरकार ने इसे हतोत्साहित करने के लिए 100 रुपए से ज्यादा कीमत के सामानों पर कस्टम ड्यूटी लगा दिया है। इससे सामान उन्हें खरीद कर नेपाल ले जाना काफी महँगा पड़ रहा है। पहले सीमा पर कड़ा पहरा नहीं था और बॉर्डर क्रॉस करने के लिए पहले से अनुमति लेने की जरूरत नहीं पड़ती थी। इसके विरोध में सीमावर्ती क्षेत्रों की जनता सड़कों पर उतर आई है।

लेकिन, बालेन शाह के निर्देश के बाद स्थितियाँ काफी बदल गई हैं। सीमा पार कर हर दिन सामानों की आवाजाही होती थी, उसमें कमी आ गई है। ऐसे में नेपाल को सामानों की कमी हो रही है। इससे महँगाई बढ़ने की आशंका है। सरकार भले ही टैक्स लगाकर पैसे कमा ले, लेकिन जनता बेहाल है। यही वजह है कि वहाँ विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं।

कई राजनीतिक संगठनों ने भी बालेन शाह की नीति का विरोध किया है। इनका कहना है कि पारंपरिक रिश्तों को कमजोर करने की कोशिश बालेन सरकार ने की है। यह नीतिगत फैसला बालेन सरकार को भारी पड़ सकता है।

भ्रष्टाचार के आरोप में गृहमंत्री गुरुंग फँसे

जिस भ्रष्टाचार के खिलाफ जेन जी ने विद्रोह किया था। केपी ओली की सरकार को उखाड़ फेंका था। उस भ्रष्टाचार का दीमक एक महीने में ही बालेन सरकार को लग गया है। प्रधानमंत्री बालेन शाह के कैबिनेट के अहम सदस्य गृहमंत्री सुदन गुरुंग मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों में फँस गए हैं। उन पर इस्तीफा देने का राजनीतिक दबाव बन रहा है।

सुदन पर विवादित बिजनेसमैन दीपक भट्ट की कंपनियों के शेयर खरीदने के आरोप हैं। ऐसे में सबकी नजर बालेन शाह पर टिकी हुई है। आखिर भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाने की बात करने वाले प्रधानमंत्री अब क्या कदम उठाते हैं।

नेपाली कॉन्ग्रेस समेत कई राजनीतिक दलों ने गृहमंत्री के खिलाफ स्वतंत्र जाँच की माँग की है। सिविल सोसायटी भी चाहती है कि जब तक जाँच हो, तब तक गृहमंत्री को पद से हट जाना चाहिए, क्योंकि इससे जाँच प्रभावित हो सकता है। जेन जी रेड फोर्स ने नैतिक आधार पर इस्तीफे की माँग करते हुए कहा है कि अगर गृहमंत्री गुरुंग अपने पद पर बने रहते हैं तो इससे जनता का विश्वास नई सरकार में कमजोर होगा।

स्वास्थ्य क्षेत्र में नीति पर विवाद

नेपाल में स्वास्थ्य क्षेत्र का राजनीतिकरण और भ्रष्टाचार के साथ साथ स्वास्थ्य बीमा का खस्ता हालत से लोग त्रस्त हैं। स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण से हाई क्वालिटी की स्वास्थ्य सेवाओं के लिए काफी खर्च करना पड़ता है। वहीं सरकारी अस्पतालों की हालत बुरी है। बुनियादी ढाँचा भी चरमरा गया है जिससे आम जनता का ठीक से इलाज करना दूभर हो गया है।

स्वास्थ्य संस्थानों में कर्मचारी संगठनों का बोलबाला है। इससे प्रबंधन और सेवाओं पर असर पड़ रहा है। जनता चाहती है कि हर हाल में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की हालत में सुधार हो, लेकिन सरकार इसे सुधारने के बजाए निजीकरण करने पर जोर दे रही है, जिससे आम जनता में असंतोष फैल रहा है।

छात्र राजनीति पर प्रतिबंध का पड़ रहा असर

जिस जेन जी के दम पर सत्ता तक पहुँचे बालेन शाह, उन्होंने अपने 100 दिनों के एक्शन प्लान में सबसे पहले छात्र राजनीति पर प्रतिबंध लगा दिया। बालेन शाह ने साफ कहा कि शिक्षण संस्थान अब राजनीति के लिए नहीं, बल्कि ज्ञान का केन्द्र होंगे यानी अब तक ‘राजनीति’ हो रही थी, वह गलत था।

छात्रों को दलगत राजनीति से ऊपर उठ कर स्टूडेंट काउंसिल बना कर अपनी समस्याओं को रखने का मौका उन्होंने दिया। ‘स्टुडेंट काउंसिल’ या ‘वॉइस ऑफ स्टूडेंट’ जैसे गैर राजनीतिक संगठन विकसित किए जाने की बात उन्होंने कही। छात्रों को अपनी समस्या के समाधान के लिए सरकार की छात्रों के लिए बनाए गए संगठन में जाने का विकल्प दिया है। छात्रों के अंदर इसको लेकर भी असंतोष पैदा हो रहा है।

दरअसल नेपाल में बालेन शाह का चुनाव दक्षिण एशियाई राजनीति में एक बदलाव को दर्शाता है। Gen-Z की जबरदस्त भागीदारी से बनी सरकार से लोगों को स्वच्छ शासन, प्रशासनिक दक्षता और पारंपरिक राजनीतिक ढाँचों से पूरी तरह अलग व्यवस्था बनाने की उम्मीद थी। उन्होंने योग्यता, पारदर्शिता और जवाबदेही जैसे नारे बुलंद किए थे। पुरानी व्यवस्था की जगह एक जवाबदेह सिस्टम बनाने का विश्वास दिलाया था।

लेकिन एक महीने में ही जनता का विश्वास हिलने लगा है। Gen-Z आंदोलन की दीर्घकालिक सफलता केवल नेतृत्व पर ही नहीं, बल्कि नागरिकों की निरंतर भागीदारी पर भी निर्भर करती है। देश के नागरिक लोकतंत्र में केवल वोट ही नहीं देते बल्कि सरकार के कामकाज पर अपना फैसला भी वोट के माध्यम से बताते हैं।

नेपाल का सिस्टम अभी भी नहीं बदला है। नौकरशाही पुरानी है और कामकाज का तरीका भी उनका पुराना ही है। इसमें बदलाव जरूरी है। शासन केवल लोकप्रियता या अच्छे इरादों से ही नहीं चलता, यह उन संस्थागत ढाँचों को बदलने की क्षमता पर निर्भर करता है, जो समाज में गहराई तक अपनी जड़ें जमा चुकी हैं।

बालेन शाह की असली परीक्षा अब शुरू हुई है। अगर प्रचंड जनादेश के बाद भी नेपाल की स्थिति नहीं बदलती है तो इसका परिणाम लोकतंत्र के लिए भी घातक हो सकता है। अभी तक लोकतंत्रिक बदलाव को जनता आशाभरी नजरों से देख रही है, वह शायद इसकी प्रभावशीलता पर ही सवाल उठाने लगे।

युवाओं का अगर मोहभंग हुआ, तो ये और भी ज्यादा खतरनाक हो सकता है। नेपाल ने आंदोलन के दौरान हुई हिंसक वारदातों और बड़े पैमाने पर खून खराबा झेला है। अगर फिर युवा सड़कों पर उतरे तो लोकतंत्र के लिए ‘काला दिन’ साबित होगा क्योंकि अब लोकतंत्र ही उनके चपेट में आएगा।

भारत में विपक्ष को Gen-z आंदोलन का था इंतजार

भारत की विपक्षी पार्टियों को भी Gen-z आंदोलन काफी पसंद रहा था। राहुल गाँधी से लेकर तमाम विपक्षी नेताओं ने जेन जी को भड़काना चाहा। उन्होंने पीएम मोदी के आवास तक में घुसने की अपील कर दी थी। सत्ता विरोधी लहर को नेपाल और बांग्लादेश की तरह भारत में आक्रमकता तक पहुँचाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।

‘संविधान बचाओ’ और ‘लोकतंत्र की रक्षा’ की बात कह जेन जी को अपनी राजनीतिक लड़ाई में शामिल करने की काफी कोशिश विपक्ष ने की, लेकिन सब बेकार हो गया। भारत में जेन जी लोकतांत्रिक व्यवस्था में यकीन रखते हैं। उन्हें वोट के जरिए अपनी आक्रमकता दर्शाने का मौका संविधान ने दे रखा है। वे इसका इस्तेमाल भी वोटर के तौर पर करते रहे हैं और विपक्ष को पटखनी देते रहे हैं।

BBC ने कहा- ‘मेट्रो खाली’, हकीकत में रिकॉर्ड सवारी और बढ़ता नेटवर्क: पढ़ें- अधूरे डेटा से गढ़े गए प्रोपेगेंडा का असली विश्लेषण

बीबीसी (BBC) ने एक लेख छापा जिसका शीर्षक था, “भारत ने मेट्रो पर अरबों खर्च कर दिए, लेकिन यात्री कहाँ हैं?” इस लेख को पढ़कर ऐसा लगता है जैसे भारत की मेट्रो परियोजनाएँ सही तरीके से काम नहीं कर रहीं और लोग उनका इस्तेमाल ही नहीं कर रहे। लेकिन असल तस्वीर इससे अलग है। हकीकत यह है कि BBC ने दिल्ली मेट्रो जैसे बड़े और सफल मॉडल को ‘अपवाद’ कहकर किनारे कर दिया और नई मेट्रो लाइनों के शुरुआती कम उपयोग वाले डेटा को ही पूरी कहानी मान लिया। यह तरीका पूरा सच नहीं दिखाता।

सच्चाई यह है कि किसी भी बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट- जैसे मेट्रो, हाईवे या एयरपोर्ट को पूरी तरह चलने और लोगों की आदत में आने में समय लगता है। शुरुआत में लोग धीरे-धीरे जुड़ते हैं, नेटवर्क बढ़ता है और फिर उपयोग तेजी से बढ़ जाता है। 2025–26 के आँकड़े बताते हैं कि दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में मेट्रो का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है। दिल्ली मेट्रो करोड़ों यात्रियों को रोज सफर करा रही है और मुंबई मेट्रो की नई लाइनों पर भी यात्रियों की संख्या हर महीने बढ़ रही है।

दिल्ली मेट्रो से सीख: सिस्टम धीरे-धीरे मजबूत होता है

BBC का मुख्य तर्क है कि कई शहरों में मेट्रो में उम्मीद से कम यात्री सफर कर रहे हैं। लेकिन इस विश्लेषण में वह दिल्ली मेट्रो के पूरे सफर को नजरअंदाज कर देता है। जब दिल्ली मेट्रो शुरू हुई थी, तब भी इसे लेकर सवाल उठे थे। कई लोगों ने कहा था कि यह महँगा है और ज्यादा काम नहीं आएगा। शुरुआती समय में लोगों को मेट्रो स्टेशन तक पहुँचने में दिक्कत होती थी, क्योंकि फीडर बसें और ई-रिक्शा जैसी सुविधाएँ पूरी तरह विकसित नहीं थीं।

धीरे-धीरे हालात बदले। जैसे-जैसे नेटवर्क बढ़ा, लास्ट-माइल कनेक्टिविटी मजबूत हुई और लोगों की निर्भरता बढ़ती गई। आज दिल्ली मेट्रो देश ही नहीं, दुनिया के सबसे सफल पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम्स में गिनी जाती है। साल 2025 में इसमें औसतन 64.6 लाख लोग रोज यात्रा कर रहे हैं और साल भर में यह 235 करोड़ से ज्यादा यात्राएँ पूरी करती है। यह आँकड़ा एक बड़े देश जैसे न्यूजीलैंड की पूरी आबादी से भी ज्यादा है।

अब दिल्ली मेट्रो कमाई के मामले में भी मजबूत स्थिति में है। 2024-25 की रिपोर्ट के अनुसार, यह ₹412 करोड़ से ज्यादा का ऑपरेटिंग सरप्लस कमा रही है। इसका मतलब है कि मेट्रो सिर्फ चल ही नहीं रही, बल्कि अपने खर्च निकालकर मुनाफा भी दे रही है। यह साफ दिखाता है कि कोई भी मेट्रो सिस्टम शुरुआत में धीमा हो सकता है, लेकिन समय के साथ वह मजबूत, उपयोगी और आत्मनिर्भर बन जाता है।

मुंबई एक्वा लाइन की सच्चाई: ‘सुनसान’ नहीं, तेजी से बढ़ता इस्तेमाल

BBC ने मुंबई की नई एक्वा लाइन (मेट्रो-3) को ‘सुनसान’ बताने की कोशिश की, लेकिन जमीन पर तस्वीर अलग है। यह लाइन पूरी तरह अक्टूबर 2025 में शुरू हुई और अप्रैल 2026 तक इस पर 4 करोड़ से ज्यादा यात्री सफर कर चुके हैं। किसी भी नई मेट्रो लाइन के लिए इतने कम समय में यह बड़ी उपलब्धि मानी जाती है।

मुंबई की सभी मेट्रो लाइनों को मिलाकर अब रोज करीब 7.5 लाख लोग सफर कर रहे हैं। यह संख्या लगातार बढ़ रही है। जैसे-जैसे लोग नई लाइन के बारे में जान रहे हैं और कनेक्टिविटी बेहतर हो रही है, यात्रियों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है।

जहाँ तक किराए की बात है, 10 से 70 रुपए का खर्च मुंबई जैसे शहर में ज्यादा नहीं माना जाता। यहाँ लोग रोज ट्रैफिक में घंटों फँसते हैं। ऐसे में मेट्रो समय बचाती है और सफर आसान बनाती है। सरकार का काम सिर्फ आज की भीड़ संभालना नहीं, बल्कि भविष्य के लिए मजबूत ट्रांसपोर्ट तैयार करना भी है, ताकि सड़कों पर दबाव कम हो सके।

मेट्रो का बड़ा फायदा: सफर ही नहीं, जेब भी बचा रही है

मेट्रो का असर सिर्फ यात्रा तक सीमित नहीं है, यह लोगों की आर्थिक स्थिति भी सुधार रही है। जनवरी 2026 की ‘EAC-PM’ रिपोर्ट बताती है कि मेट्रो आने से लोगों का रोज का ट्रांसपोर्ट खर्च कम हुआ है। पेट्रोल, डीजल और टैक्सी पर होने वाला खर्च बच रहा है, जिससे लोगों के पास हर महीने कुछ अतिरिक्त पैसे बच रहे हैं।

इस बचत का सीधा फायदा घर के लोन (होम लोन) चुकाने में दिख रहा है। दिल्ली में मेट्रो वाले इलाकों में लोन न चुका पाने वाले लोगों की संख्या 4.42% कम हुई है। बेंगलुरु में EMI लेट करने वालों की संख्या 2.4% घटी है, जबकि हैदराबाद में समय से पहले लोन चुकाने वालों की संख्या 1.8% बढ़ी है।

सीधी भाषा में समझें तो मेट्रो लोगों की जेब में बचत डाल रही है। इससे उनका आर्थिक बोझ कम हो रहा है और जीवन आसान बन रहा है। लेकिन ऐसे बड़े फायदे अक्सर BBC जैसी कुछ रिपोर्ट्स में नजरअंदाज कर दिए जाते हैं।

क्या मेट्रो घाटे में है? असली तस्वीर समझिए

अक्सर कहा जाता है कि मेट्रो प्रोजेक्ट घाटे का सौदा हैं। लेकिन यह पूरी सच्चाई नहीं है। शुरुआत में हर मेट्रो सिस्टम ‘नेट लॉस’ दिखाता है, क्योंकि उस पर बड़े लोन और निर्माण का खर्च होता है। इसे ही डेप्रिसिएशन कहा जाता है। इसलिए सिर्फ कुल घाटा देखकर फैसला करना सही नहीं होता।

असल पैमाना होता है ‘ऑपरेटिंग सरप्लस’। यानी रोजमर्रा का खर्च निकालने के बाद क्या मेट्रो के पास पैसा बच रहा है या नहीं। उदाहरण के तौर पर, बेंगलुरु की नम्मा मेट्रो ने 2024-25 में 1,191 करोड़ रुपए कमाए और 229 करोड़ रुपए का ऑपरेटिंग सरप्लस हासिल किया। इसका मतलब है कि मेट्रो अपना खर्च निकालकर बचत भी कर रही है।

अहमदाबाद और लखनऊ जैसे शहरों में भी यात्रियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। साफ है कि यह पैसा बर्बाद नहीं हुआ, बल्कि शहरों के लिए लंबी अवधि का मजबूत ट्रांसपोर्ट सिस्टम तैयार हुआ है। इससे प्रदूषण कम हो रहा है और पर्यावरण को भी फायदा मिल रहा है।

BBC की रिपोर्ट पर सवाल: क्या पूरी तस्वीर दिखाई गई?

बीबीसी की रिपोर्ट को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि इसमें पूरी तस्वीर नहीं दिखाई गई। कुछ चुनिंदा आँकड़ों के आधार पर ऐसा निष्कर्ष दिया गया, जैसे मेट्रो प्रोजेक्ट सही दिशा में नहीं हैं, जबकि जमीनी हकीकत इससे अलग है।

आज भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा मेट्रो नेटवर्क बन चुका है, जो 1,000 किलोमीटर से ज्यादा फैल चुका है। यह अपने आप में दिखाता है कि यह सिस्टम लगातार बढ़ रहा है और शहरों की जरूरत बनता जा रहा है। मेट्रो ने लोगों को लंबे ट्रैफिक जाम से राहत दी है और सफर को ज्यादा आसान और आरामदायक बनाया है।

लास्ट-माइल कनेक्टिविटी और फीडर बसों की दिक्कतें अभी भी कई शहरों में हैं, लेकिन इन पर तेजी से काम हो रहा है। दिल्ली इसका सबसे अच्छा उदाहरण है, जहाँ समय के साथ मेट्रो लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गई है।

साफ है कि भारत में मेट्रो सिर्फ एक ट्रांसपोर्ट नहीं, बल्कि शहरी बदलाव का बड़ा जरिया बन रही है। यह धीरे-धीरे हर शहर की जरूरत और आदत बनती जा रही है, और इसी दिशा में आगे बढ़ रही है।

CM योगी ने बंगाल में लिया था ‘नेताजी’ जी का भी नाम, अधूरे क्लिप से TMC-कॉन्ग्रेस ने फैलाया प्रोपेगेंडा: जानिए रैली में दिए गए भाषण की पूरी सच्चाई

पश्चिम बंगाल के जॉयपुर विधानसभा क्षेत्र में एक चुनावी जनसभा के दौरान उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के भाषण का एक छोटा सा हिस्सा सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) की नेता महुआ मोइत्रा और कॉन्ग्रेस की प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेता समेत कई विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया कि CM योगी ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस के प्रसिद्ध नारे ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा’ का श्रेय स्वामी विवेकानंद को दे दिया।

महुआ मोइत्रा ने उन्हें ‘बुलडोजर बुद्धि’ तक कह डाला। लेकिन जब इस पूरे Video की पड़ताल की, तो सच्चाई कुछ और ही निकली। यह रिपोर्ट TMC और कॉन्ग्रेस के भ्रामक प्रचार और CM योगी के वास्तविक भाषण के बीच के अंतर को स्पष्ट करती है। विपक्ष ने इस छोटी सी बात को जानबूझकर इतना बड़ा मुद्दा बनाने का प्रयास इसलिए भी किया है क्योंकि योगी आदित्यनाथ न केवल एक मुख्यमंत्री हैं, बल्कि एक प्रतिष्ठित धार्मिक पीठ (गोरक्षपीठ) के प्रमुख भी हैं।

CM योगी के भाषण का सच

सोशल मीडिया पर फैलाया जा रहा Video अधूरा और काट-छाँट कर पेश किया गया है। भाषण के करीब 10 मिनट के बाद के हिस्से को अगर ध्यान से सुना जाए, तो स्पष्ट होता है कि सीएम योगी बंगाल की महान विभूतियों का जिक्र कर रहे थे। उन्होंने कहा, “याद करिए, स्वामी विवेकानंद इसी बंगाल की धरती से जन्मे हैं। स्वामी विवेकानंद ने कहा था… (यहाँ हल्का सा ठहराव लेकर उन्होंने नेताजी सुभाष चंद्र बोस का नाम लिया)… तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूँगा, नेताजी का यह उद्घोष भारत की आजादी का मंत्र बना।”

अक्सर रैलियों में जब वक्ता कई महापुरुषों का नाम एक साथ लेता है, तो शब्दों का प्रवाह (स्लिप ऑफ टंग) हो जाता है। CM योगी ने तुरंत उसी वाक्य में ‘नेताजी’ का नाम लेकर इसे स्पष्ट कर दिया था। लेकिन TMC ने केवल ‘स्वामी विवेकानंद’ और ‘नारे’ वाले हिस्से को जोड़कर इसे बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश की ताकि बंगाल की जनता के सामने उनकी छवि खराब की जा सके।

महुआ मोइत्रा और सुप्रिया श्रीनेत का गुमराह करने वाला पोस्ट

TMC सांसद महुआ मोइत्रा ने तथ्यों की जाँच किए बिना सोशल मीडिया पर CM योगी पर निजी हमला किया। उन्होंने लिखा, “हेलो बुलडोजर बुद्धि, अपने फैक्ट्स ठीक करो। नेताजी ने कहा था- तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा, स्वामी विवेकानंद ने नहीं। वापस यूपी जाकर फैंटा पियो और बंगाल को अकेला छोड़ दो।”

यह पोस्ट न केवल अपमानजनक था, बल्कि जानबूझकर जनता को गुमराह करने वाला भी था। TMC ने बंगाल में अपनी सरकार के खिलाफ बन रहे माहौल और ‘भ्रष्टाचार’ के मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए इस छोटी सी जुबान फिसलने वाली घटना को ‘तथ्यात्मक गलती’ के रूप में पेश किया।

वहीं, कॉन्ग्रेस की सुप्रिया श्रीनेत ने भी इस बहती गंगा में हाथ धोते हुए ट्वीट किया कि ‘योगी जी यह बात नेताजी ने 1944 में कही थी, जबकि विवेकानंद जी का निधन 1902 में हो गया था।’ दोनों ही नेताओं ने जनता को यह दिखाने की कोशिश की कि CM योगी को इतिहास की जानकारी नहीं है, जबकि उन्होंने जानबूझकर वीडियो के उस हिस्से को नजरअंदाज किया जहाँ स्पष्टीकरण मौजूद था।

सोशल मीडिया पर TMC-कॉन्ग्रेस की फजीहत: लोगों ने सिखाया ‘सुनने का सलीका’

महुआ मोइत्रा के इस पोस्ट के बाद सोशल मीडिया पर नेटिजन्स ने उन्हें जमकर आईना दिखाया। नेटिजन्स ने पूरा Video साझा करते हुए बताया कि योगी जी ने नेताजी का नाम स्पष्ट रूप से लिया था।

एक यूजर ने CM योगी की Video शेयर कर हुए लिखा, “मैडम कानों का इलाज कराओ, यूपी में अच्छे अस्पताल हैं।”

एक अन्य यूजर ने महुआ मोइत्रा को स्पष्ट कर लिखा, “योगी जी ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस के संदर्भ में ही नारा दिया था, विवेकानंद जी के साथ उसे नहीं जोड़ा। यह तथ्य की गलती नहीं, आपके सुनने की विफलता है।”

इसके अलावा एक और यूजर ने महुआ मोइत्रा को फटकार लगाते हुए लिखा, “सच्चाई जानने के बजाय आपने गाली देना चुना, जो आपकी राजनीति को दर्शाता है।”

विपक्ष के कुशासन और हिंदू गौरव पर कड़ा प्रहार

अपने उसी भाषण में योगी आदित्यनाथ ने TMC पर तीखे हमले किए थे। उन्होंने कहा कि बंगाल की धरती रामकृष्ण परमहंस, नेताजी और खुदीराम बोस की पावन धरा है, लेकिन आज TMC यहाँ राम भक्तों पर अत्याचार कर रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि TMC सरकार दुर्गा पूजा रुकवाती है और विसर्जन पर प्रतिबंध लगाती है। CM योगी ने स्वामी विवेकानंद के उस आह्वान को याद दिलाया जिसमें उन्होंने कहा था, “गर्व से कहो हम हिंदू हैं।”

योगी आदित्यनाथ का मुख्य निशाना TMC की तुष्टीकरण की राजनीति थी। उन्होंने बंगाल की जनता से विकास और सम्मान के लिए एकजुट होने की अपील की। शायद यही कारण है कि TMC ने उनके पूरे भाषण के मुख्य मुद्दों (सुरक्षा, धर्म और विकास) को दबाने के लिए एक छोटे से ‘वर्ड प्ले’ को प्रोपेगेंडा की तरह इस्तेमाल किया।

नोएडा से गुरुग्राम तक हुई हिंसा की साजिश रचने में आया जिस ‘मजदूर बिगुल दस्ता’ का नाम, जानिए उससे जुड़े हैं कौन लोग

नोएडा हिंसा को लेकर ‘मजदूर बिगुल दस्ता’ नाम के संगठन की साजिश का पता चला है। इससे मुख्य साजिशकर्ता आदित्य आनंद 2022 से जुड़ा हुआ था। मजदूर आंदोलन की आड़ में आगजनी, पथराव और सड़कें जाम की गई। आदित्य आनंद और उसके दोस्त रुपेश, मनीषा की गिरफ्तारी के बाद एक के बाद एक खुलासे हो रहे हैं।

नोएडा से गुरुग्राम, मानेसर से लेकर दिल्ली तक, जितने मजदूर आंदोलन हुए और हिंसा फैलाई गई, उसमें ‘मजदूर बिगुल दस्ता’ का हाथ सामने आ रहा है।

किन-किन संगठनों ने रची साजिश

जाँच एजेंसियों के मुताबिक, लखनऊ के ‘कॉमरेड अरविंद मेमोरियल ट्रस्ट’ के अंतर्गत कई संगठन चलाए जा रहे हैं। ये महिलाओं, छात्रों और युवाओं को अपने साथ जोड़ते हैं। इसके लिए आरडब्लूपीआई, नौजवान भारत सभा, एकता संघर्ष समिति, दिशा संगठन, ‘मजदूर बिगुल’ आदि संगठन चलाते हैं।

नोएडा हिंसा से पहले तीन दिनों तक इन संगठनों की आदित्य आनंद के नोएडा के सेक्टर 37 के अरुण विहार स्थित फ्लैट में बैठक हुई थी। ये बैठक तीन दिन 30 मार्च, 31 मार्च और 1 अप्रैल तक चली। बैठक में पूरी योजना बनाई गई। यह फ्लैट आदित्य आनंद ने एक रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल से किराए पर लिया था।

साजिशकर्ता और सॉफ्टवेयर इंजीनियर आदित्य आनंद ने लोगों को जुटाने के लिए व्हाट्सएप का इस्तेमाल किया। व्हाट्स एप ग्रुप के क्यूआर कोड के जरिए ज्यादा से ज्यादा लोगों को जोड़ा गया। ये ग्रुप 9-10 अप्रैल को बनाए गए। पहले तो मजदूरों को उनकी माँगों के लिए प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित किया। इसके बाद प्रदर्शन को हिंसक बनाने की साजिश रची गई। यही वजह है कि योगी सरकार ने जब माँगे मान ली, फिर भी हिंसा का वारदात हुई। कई जगहों पर सड़क जाम किया गया।

नामी गिरामी आईटी कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर आदित्य आनंद अपनी अच्छी खासी कमाई संगठन को दे रहा था। संगठन लोगों को कितना ‘जहरीला’ बना रहा था, इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि एक आरोपित ने पूछताछ में नक्सलियों के खात्मे के लिए चलाए गए ‘ऑपरेशन कगार’ को चुनौती दे दी। इससे साफ पता चलता है कि संगठन सिर्फ मजदूरों के नाम पर साजिश नहीं कर रहा, बल्कि इसके पीछे वामपंथ की खौफनाक विचारधारा है।

तकनीक का जमकर किया साजिश में इस्तेमाल

हिंसा के पैटर्न से अंदाजा लगाया जा सकता है कि तकनीक का इस्तेमाल भी इनलोगों ने जमकर किया। आनंद के घर पर एजेंसियों को पूरा ब्लूप्रिंट मिला है। इससे पता चलता है कि एक टारगेट पूरा होने के बाद व्हाटसएप ग्रुप डिलीट हो जाता था। इसके एडमिश को खास तरह के निर्देश दिए गए थे। वह ग्रुप से ‘लेफ्ट’ हो जाता था, ताकि पुलिस डिजिटल ट्रेल का पीछा न कर सके।

गुरुग्राम और मानेसर के बाद नोएडा तक यह तरीका अपनाया गया। ये लोग दिल्ली-एनसीआर में हर वह मुद्दा उठाना चाहते थे, जिससे लोग सड़कों पर उतर सकें और साजिश को अंजाम दिया जा सके।

नोएडा हिंसा केस में पुलिस को आदर्श नगर और शाहबाद डेयरी से कई इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स और दस्तावेज मिली हैं। पुलिस ने दो और आरोपित हिमांशु ठाकुर और सत्यम वर्मा को गिरफ्तार करने में सफलता पाई है। इनपर भीड़ को भड़काने और हिंसा फैलाने का आरोप है। ये लोग पिछले करीब महीने भर से पर्चा बाँट रहे थे और मजदूरों को भड़का रहे थे।

कुछ चैट्स में प्रदर्शनकारियों को मिर्ची पाउडर साथ लाने की सलाह दी गई, ताकि जरूरत पड़ने पर उसका इस्तेमाल किया जा सके। एक मैसेज में लिखा गया कि अगर पुलिस लाठी उठाए तो मिर्ची पाउडर काम आएगा और ज्यादा से ज्यादा लोग इसे लेकर आएँ। वहीं कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि जब तक उनकी माँगें पूरी नहीं होंगी तब तक हड़ताल जारी रहेगी।

कुछ ऐसे ही चैट मानेसर में हुई हिंसक आंदोलन को लेकर भी सामने आई है। इसमें कंपनी के मैनेजर को मारने और कंपनी में आग लगाने की साजिश का पर्दाफाश हुआ है। पुलिस की जाँच जारी है।

पुलिस अब ये पता लगाने में लगी है कि पूरे नेटवर्क का आर्थिक सोर्स क्या है। इनके विदेशी कनेक्शन की भी जाँच हो रही है। सफल युवाओं को आखिर किस तरह से संगठन ने जोड़ा और इसके पीछे खतरनाक प्लानिंग किसकी है? इसकी जाँच की जा रही है।

एक बार फिर बदल रहा मिडिल ईस्ट का नक्शा, इजरायल ने कब्जाया दक्षिणी लेबनान का हिस्सा: समझें- क्या यह स्थायी है या ईरान से सौदेबाजी का हथियार?

पूरी दुनिया जब अप्रैल 2026 के बीच में इजरायल-लेबनान के बीच 10 दिन के युद्धविराम पर नजर टिकाए हुए थी, तभी इजरायली सेना ने दक्षिणी लेबनान में एक नई ‘येलो लाइन’ (Yellow Line) या ‘फॉरवर्ड डिफेंस लाइन’ बना दी। इजरायली रक्षा बल (IDF) ने खुद एक नक्शा जारी कर बताया कि दक्षिणी लेबनान के अंदर करीब 10 किलोमीटर गहरी यह सैन्य जोन अब उनके नियंत्रण में है। पाँच डिवीजनों की ताकत के साथ इजरायली सैनिक इस लाइन के दक्षिण में तैनात हैं।

आईडीएफ ने कहा है कि उसके सैनिक हिजबुल्लाह के ठिकानों को नष्ट करने और उत्तरी इजरायल पर हमले रोकने के लिए मैदान में डटे हैं। हालाँकि लेबनान और हिजबुल्लाह इसे संप्रभु क्षेत्र पर कब्जा बताते हुए इस कदम का विरोध किया है। एक तरफ अभी युद्धविराम की स्याही सूखी भी नहीं है कि दूसरी तरफ इजरायली बुलडोजर दक्षिणी लेबनान के भीतर बसे गाँवों में घरों को तोड़ रहे थे, तोपें चल रहे थे और हवाई हमले हो रहे थे। हालाँकि अभी युद्धविराम लागू है, लेकिन छिटपुट हमले दोनों तरफ से हो रहे हैं।

लेबनान के दक्षिणी हिस्सा में घट रही यह घटना महज एक स्थानीय तनाव नहीं है। यह मिडिल ईस्ट के भू-राजनीतिक नक्शे में एक नया अध्याय जोड़ रही है। इजरायल ने पहले भी लेबनान पर कब्जा किया था, जिसमें 1982 से 2000 तक 18 साल तक दक्षिणी लेबनान पर कब्जा रखा था। तब भी उसने लिटानी नदी तक पहुँचने का सपना देखा था और आज फिर वही रणनीति इजरायल की तरफ से दोहराई जा रही है। लेकिन इस बार सवाल यह है कि क्या इजरायल का यह कब्जा स्थायी होगा? या उसका ये कदम अमेरिका-ईरान वार्ता में सौदेबाजी का हथियार बनेगा

येलो लाइन का जन्म और युद्धविराम का मजाक

मध्य पूर्व में एक बार फिर सीमाओं की लकीरें स्याही से नहीं, बल्कि टैंकों के टायरों और सैन्य चौकियों से खींची जा रही हैं। इजरायल द्वारा दक्षिणी लेबनान में बनाई गई ‘येलो लाइन’ (Yellow Line) ने दुनिया भर के कूटनीतिज्ञों और सैन्य विश्लेषकों को चौंका दिया है। यह सिर्फ एक सैन्य घेराबंदी नहीं है, बल्कि एक ऐसी रणनीतिक चाल है जो दशकों पुराने विवादों को नया रंग दे रही है।

दरअसल, अमेरिका की मध्यस्थता में 16 अप्रैल 2026 को इजरायल और लेबनान के बीच 10 दिन का युद्धविराम शुरू हुआ है। करीब 46 दिन के इजरायली हमलों और जमीनी ऑपरेशन के बाद यह समझौता हुआ। लेकिन कुछ घंटों में ही IDF ने दक्षिणी लेबनान में ‘येलो लाइन’ की घोषणा कर दी।

इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने साफ कहा, “हम लेबनान में 10 किलोमीटर गहरी मजबूत सुरक्षा पट्टी में रहेंगे। यह पहले से कहीं ज्यादा ठोस, निरंतर और मजबूत है। हम यहाँ से नहीं जाएँगे।”

IDF के बयान में कहा गया कि लाइन के दक्षिण में पाँच डिवीजनों के सैनिक हिजबुल्लाह के आतंकी ढाँचे को तोड़ रहे हैं। जिसकी वजह से 55 लेबनानी गाँवों और कस्बों में निवासियों को वापस लौटने की इजाजत नहीं दी गई।

अल जजीरा की रिपोर्ट के अनुसार, युद्धविराम शुरू होते ही इजरायली सेना ने हनीन गाँव में घर उड़ाए, बेत लिफ, अल-कांतारा और तौल पर तोपें दागीं। बुलडोजर से जमीन साफ की जा रही है। गाजा में इसी येलो लाइन मॉडल का इस्तेमाल हो रहा है, जहाँ का 60 प्रतिशत इलाका इजरायली नियंत्रण में है और सैकड़ों घर ध्वस्त किए गए। अब लेबनान में भी वही रणनीति दोहराई जा रही है।

हिजबुल्लाह के महासचिव नईम कासिम ने कहा, “युद्धविराम एकतरफा नहीं हो सकता। अगर इजरायल उल्लंघन करेगा तो हम जवाब देंगे। हमारे लड़ाके मैदान में हैं, ट्रिगर पर उँगली रखे हुए।” हिजबुल्लाह इसे देश का अपमान मान रहा है और पूर्ण वापसी की माँग कर रहा है।

इजरायल ने कब कब बदला मिडिल ईस्ट का नक्शा?

इजरायल का विस्तारवाद नया नहीं है। साल 1918 में डेविड बेन-गुरियन और यित्जाक बेन-ज्वी ने ‘एरेट्स यिसराइल’ किताब में लिखा कि यहूदियों का देश लिटानी नदी तक फैला होना चाहिए। इसके बाद 1919 में वर्ल्ड जियोनिस्ट ऑर्गनाइजेशन ने पेरिस शांति सम्मेलन में लिटानी नदी को उत्तरी सीमा बताते हुए नक्शा पेश किया गया।

इजरायल की आजादी के बाद साल 1948 के अरब-इजरायल युद्ध में इजरायली सेना ने दक्षिणी लेबनान के 15 गाँवों पर कब्जा कर लिया। हालाँकि बाद में साल 1949 में आर्मिस्टिस समझौते के तहत इसमें से सात गाँवों को इजरायल को सौंप दिए गए।

इसके बाद साल 1978 में ऑपरेशन लिटानी के तहत इजरायल ने दक्षिणी लेबनान पर कब्जा कर लिया। इसके बाद वो साल 1982 में ऑपरेशन पीस फॉर गैलिली में बेरूत तक पहुँच गए। और फिर करीब 18 साल तक दक्षिणी लेबनान पर इजरायल का कब्जा बना रहा। हालाँकि साल 2000 में यूनिफिल और हिजबुल्लाह के दबाव में इजरायल ने वहाँ से वापसी की, लेकिन शेबा फार्म्स पर कब्जा आज भी जारी है।

वहीं साल 1967 के छह दिन युद्ध में गोलान हाइट्स (सीरिया) पर कब्जा कर लिया, जिसे साल 1981 में इजरायल ने अपने आप में मिला लिया। यही नहीं, वेस्ट बैंक और गाजा पर उसका साल 1967 से ही कब्जा है। और अब 2026 में लेबनान में फिर वही पैटर्न दिख रहा है, जिसमें पहले सुरक्षा जोन, फिर स्थायी नियंत्रण।

इजरायल का तर्क हमेशा ‘सुरक्षा’ रहा है। लेकिन आलोचक इसे ‘ग्रेटर इजरायल’ का हिस्सा मानते हैं, जिसमें लिटानी नदी, गोलान और वेस्ट बैंक शामिल हैं। अभी 2026 के जमीनी ऑपरेशन में इजरायल ने पहले ही दक्षिणी लेबनान के कई इलाकों में बफर जोन बना लिया था। जिसे अब येलो लाइन संस्थागत रूप दे रही है।

क्या यह स्थाई कब्जा है या ईरान से सौदेबाजी का हथियार?

विश्लेषकों का मानना है कि यह कब्जा अस्थायी नहीं होगा। चूँकि इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू साफ कह चुके हैं कि इजरायली सेना ‘क्लियर और सिक्योर’ पोजीशंस को छोड़ने वाली नहीं है। इसके साथ ही गाजा मॉडल की तरह लेबनान में भी सफाई अभियान जोर-शोर से चल रहा है, जिसकी वजह से लाखों लोग विस्थापित हो चुके हैं।

हालाँकि दक्षिणी लेबनान का यह इलाका (जिसपर अभी इजरायली सेना मौजूद) भविष्य की बातचीत (ईरान या लेबनान के साथ) में ‘लीवरेज’ (दबाव का हथियार) बन सकता है, इसमें कोई शक नहीं है।

दरअसल, इस इलाके का और खासकर हिज्बुल्लाह का ईरान से जुड़ाव और गहरा है। ईरान ने स्पष्ट किया कि लेबनान में युद्धविराम अमेरिका-ईरान वार्ता का पूर्व शर्त है। पाकिस्तान की मध्यस्थता में इस्लामाबाद में चल रही बातचीत में ईरान ने कहा कि जब तक इजरायल लेबनान से नहीं हटेगा, कोई समझौता नहीं होगा। ईरान के इस स्टैंड के बाद ही इजरायल-लेबनान में संघर्ष विराम हुआ, लेकिन अब जब ईरान बातचीत की टेबल पर आएगा तो उसके बाद सिर्फ हॉर्मूज ही नहीं दक्षिणी लेबनान का हिस्सा भी जोर-आजमाइश के लिए मौजूद रहेगा।

इस बीच, हिजबुल्लाह ने चेतावनी दी है कि अगर इजरायल नहीं हटा तो वे जवाब देंगे। लेबनानी सेना और सरकार भी संप्रभुता की बात कर रही है। यूएनएफआईएल (UNIFIL) पहले से ही रेजोल्यूशन 1701 का हवाला दे रही है, जिसमें इजरायल को ब्लू लाइन के दक्षिण में रहना चाहिए।

संयुक्त राष्ट्र से मान्यता मिलेगी या मिलेगी हमेशा की तरह निंदा?

इतिहास गवाह है कि संयुक्त राष्ट्र ने इजरायल के कब्जों को कभी मान्यता नहीं दी है। गोलान हाइट्स पर 1981 के एनेक्सेशन को यूएन ने अवैध घोषित किया। वेस्ट बैंक पर बस्तियों को भी वो अवैध कहता है। लेबनान भी रेजोल्यूशन 1701 (2006) के तहत इजरायल से पूर्ण वापसी की माँग करता रहा है। तो यूएन एक्सपर्ट्स ने इजरायल के बमबारी को ‘एथनिक क्लिंजिंग’ और ‘डोमिसाइड’ (घरों का विनाश) बताया है।

लेकिन व्यावहारिक रूप से देखें तो यूएन की ताकत बहुत सीमित है। यूएन में इजरायल के लिए उठ रही किसी भी समस्या पर अमेरिका तुरंत वीटो कर देता है। ऐसे में साल 2026 में भी यूएन सुरक्षा परिषद में इजरायल के खिलाफ प्रस्ताव तो आ सकते हैं, लेकिन कुछ भी लागू होना मुश्किल है। हालाँकि फ्रांस, कनाडा और यूरोपीय देशों ने ‘येलो लाइन’ की निंदा की है, लेकिन इजरायल ‘आत्मरक्षा’ का हवाला देकर कार्रवाई जारी रखे हुए है। ऐसे में अगर यूएन कोई निंदा प्रस्ताव लाता भी है, तो भी इजरायल पर कोई खास फर्क पड़ेगा, ये अभी तो नहीं देखा जा रहा।

भविष्य में होगी शांति या खुलेगा वॉर का नया फ्रंट?

अगर पाकिस्तान की मध्यस्थता में अमेरिका-ईरान की बातचीत सफल हुई तो लेबनान से इजरायली वापसी हो सकती है। हालाँकि विश्लेषकों का कहना है कि इजरायल न सिर्फ लेबनान बल्कि सीरिया में भी क्षेत्रीय विस्तार की रणनीति अपना रहा है। क्योंकि भविष्य की किसी भी बातचीत में यह जमीन ‘लीवरेज’ बनेगी। लेकिन इतिहास गवाह है कि जबरन कब्जा भी ज्यादा समय तक टिकता नहीं है।

चूँकि इजरायल पहले भी 18 साल के कब्जे के बाद साल 2000 में दक्षिणी लेबनान से हटा था, ऐसे में किसी समझौते और स्थाई सुरक्षा गारंटी के नाम पर वो फिर से अपने कदम वापस खींच भी सकता है। बशर्ते उस पर अमेरिकी दबाव बना रहे।

क्या हो सकती हैं संभावनाएँ?

फिलहाल, इस मामले में अभी दो ही संभावित रास्ते दिखते हैं-

रास्ता A (बड़ा समझौता): अगर अमेरिका ईरान को कुछ बड़ी आर्थिक राहत देता है और बदले में ईरान हिजबुल्लाह को सीमा से पीछे हटने के लिए मना लेता है, तो एक ‘अस्थाई डील’ हो सकती है। इसमें ‘येलो लाइन’ को हटाकर वहाँ लेबनानी सेना या एक मजबूत अंतरराष्ट्रीय फोर्स को तैनात किया जा सकता है।

रास्ता B (लंबा संघर्ष): यह ज्यादा संभव लग रहा है। इजरायल जिस तरह से 55 गाँवों को खाली कराकर वहाँ बुनियादी ढाँचे को नष्ट कर रहा है, उससे लगता है कि वह वहाँ ‘स्थाई सुरक्षा चौकियाँ’ बनाना चाहता है। अगर ऐसा हुआ, तो हिजबुल्लाह इसे अपनी संप्रभुता पर हमला मानकर गुरिल्ला वॉर शुरू करेगा, जिससे यह संघर्ष महीनों या सालों तक खिंच सकता है।

लेबनान में इजरायल की सैन्य उपस्थिति ने यह साफ कर दिया है कि पुरानी सीमाएँ अब सिर्फ कागज पर रह गई हैं। यह कब्जा न केवल लेबनान की भौगोलिक स्थिति को बदल रहा है, बल्कि यह ईरान और अमेरिका के बीच होने वाले ‘ग्रैंड बार्गेन’ का भविष्य भी तय करेगा।

बहरहाल, दशकों से युद्ध का मैदान बन चुका मिडिल ईस्ट अब भी दहक रहा है। क्षेत्रीय स्तर पर यह ‘ग्रेटर इजरायल’ vs ‘एक्सिस ऑफ रेसिस्टेंस’ (ईरान-हिजबुल्लाह-हमास) की जंग है। इन सबके बीच हकीकत यही है कि मिडिल ईस्ट का नक्शा सचमुच बदल रहा है। ऐसे में इजरायल का यह ताजा विस्तार स्थाई होता है या अस्थाई, ये देखने वाली बात होगी, क्योंकि इसका फौरी जवाब किसी के पास नहीं है। चूँकि अब पूरा मामला सौदेबाजी, समय और कूटनीतिक चालों में उलझ चुका है, ऐसे में इस समस्या को लेकर आगे क्या बदलाव आते हैं, इस पर नजर बनाए रखने की जरूरत होगी।

हिंदू कार्यकर्ता ने ईसाई मिशनरी को ‘आततायी’ कहा तो गोवा में दर्ज हो गया केस: जानें- सेंट जेवियर ने कैसे स्थानीय लोगों पर ढाए थे जुल्म, क्यों हिंदुओं का ऐसों के खिलाफ बोलना जरूरी

गोवा में ‘सेंट’ फ्रांसिस जेवियर पर दिए गए बयान को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। यहाँ हिंदू कार्यकर्ता गौतम खट्टर ने जेवियर को ‘आतंकवादी’ और ‘बर्बर’ शासक बताया। इस बयान पर गोवा में विपक्षी पार्टी, खासकर कॉन्ग्रेस ने आपत्ति जताई। इसके बाद कार्यकर्ता के खिलाफ धार्मिक भावनाएँ आहत करने के मामले में FIR दर्ज की गई।

हिंदू कार्यकर्ता का ‘सेंट’ जेवियर को लेकर बयान

दरअसल, हिंदू संगठन सनातन महासंघ के संस्थापक गौतम खट्टर ने ‘सेंट’ जेवियर को लेकर यह बातें गोवा के वास्को डा गामा शहर में 18 अप्रैल 2026 को परशुराम जयंती के अवसर पर आयोजित एक समारोह में की हैं। इस समारोह में राज्य के परिवहन मंत्री मौविन गोडिन्हो और विधायक संकल्प अमोनकर भी मौजूद हुए।

गौतम खट्टर ने कहा, “आतंकवादी और बर्बर क्रूर शासक सेंट जेवियर को जहाँ दफनाया गया, उसके शरीर को कीड़े लग गए, न आत्मा बची और न शरीर बचा। उसकी हड्डियों को कीड़ों ने खाकर चूरा-चूरा कर दिया। उसके बाद भी उसका कोई त्योहार होता है, जिसमें लाखों सनातनी वहाँ हाथ जोड़ते हैं। जिसने पूरा जीवन लाखों सनातनियों को धर्मांतरण कराने में लगाया, वही सनातनी आज उसके त्योहार पर हाथ जोड़ने जाते हैं।”

वीडियो पर कॉन्ग्रेस की आपत्ति, FIR की कार्रवाई

इस बयान का वीडियो भी इंटरनेट पर वायरल हुआ। तमाम लोगों ने इसे धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला बयान बताया और इसे ‘हेट स्पीच’ की श्रेणी में जगह दी। कॉन्ग्रेस ने भी गौतम खट्टर के ‘सेंट’ जेवियर के बयान पर आपत्ति जताई।

गोवा कॉन्ग्रेस ने अपने ‘एक्स’ अकाउंट पर गौतम खट्टर के बयान का वीडियो शेयर किया और लिखा, “हम सेंट फ्रांसिस जेवियर के खिलाफ की गई अपमानजनक टिप्पणियों की कड़ी निंदा करते हैं। ऐसे बयान ईसाई समुदाय की भावनाओं को गहरी ठेस पहुँचाते हैं और गोवा की उस सामाजिक एकता को नुकसान पहुँचा सकते हैं, जिसके लिए राज्य हमेशा जाना जाता रहा है। हम प्रशासन से अपील करते हैं कि इस मामले में जल्द और जिम्मेदारी के साथ कार्रवाई की जाए।”

इसके बाद कॉन्ग्रेस के विधायक पीटर डिसूजा ने वास्को पुलिस थाने गौतम खट्टर के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई। साउथ गोवा पुलिस अधीक्षक संतोष देसाई के मुताबिक, खट्टर को धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने का मामला दर्ज किया गया है।

अब यहाँ जानना जरूर है कि जिस फ्रांसिस जेवियर को ‘बर्बर शासक’ बताने पर कॉन्ग्रेस इसे धार्मिक भावनाओं की आहत होना बता रही है, उस फ्रांसिस जेवियर के कारनामे क्या हैं? कैसे वो भारत आया और उसने हिंदुओं का धर्मांतरण कराने का मिशन शुरू किया और जिसने इन्कार किया तो उसको बद से बदतर सजा दी गई। और जिस गोवा को आज ईसाई के नाम से जाना जाता है, यह पहचान जेवियर ने ही थोपी थी।

‘सेंट’ जेवियर का धर्मांतरण मिशन

फ्रांसिस जेवियर 06 मई 1542 को भारत के गोवा पहुँचा। वह अकेला नहीं आया था, बल्कि पुर्तगाल के राजा जॉन III के समर्थन और आदेश के साथ आया था। उस समय गोवा पूरी तरह पुर्तगाल के कब्जे में था और वहीं से पूरे एशिया में ईसाई मिशन चलाने की योजना बनाई गई थी।

गोवा पहुँचते ही जेवियर ने सबसे पहले बच्चों और गरीब तबके को निशाना बनाकर ईसाई का प्रचार शुरू किया। 1542 से 1545 के बीच उसने तटीय इलाकों, खासकर फिशरमैन समुदाय में बड़े पैमाने पर धर्मांतरण अभियान चलाया। कई ऐतिहासिक रिकॉर्ड बताते हैं कि पुर्तगाली शासन के दबाव और लालच में आकर स्थानीय हिंदू लोगों को अपना धर्म छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा।

1545 के बाद जेवियर ने गोवा को अपना बेस बनाकर मिशन को और फैलाया। उसने बार-बार पुर्तगाल के शासकों को पत्र लिखकर यहाँ ” कड़े धार्मिक कानून’ लागू करने की माँग की, ताकि जो लोग धर्मांतरण नहीं कर रहें उन पर दबाव बनाया जा सके। यही वह दौर था जब गोवा में संगठित तरीके से धर्मांतरण की प्रक्रिया तेज हुई और चर्च का प्रभाव लगातार बढ़ता चला गया।

‘सेंट’ जेवियर की हिंदू-घृणा और हिंदुओं पर अत्याचार

‘सेंट’ जेवियर पर मौजूदा लेख बताते हैं कि उन्हें हिंदू से इतनी घृणा थी कि वह उन्हें विधर्मी, काफिर तक कहकर संबोधित करते थे। वहीं ब्राह्मणों से उन्हें इतनी दिक्कत थी कि उन्हें वो ‘धोखेबाज और झूठा’ बताकर पेश करते थे ताकि समाज का विश्वास उनपर से उठ जाए। इसके अलावा वो ईसाई धर्म में लोगों को लाने के लिए ईसाई धर्म की खूबियों के अलावा ये बताते थे कि कैसे हिंदू और उनके देवी-देवता बुरे होते हैं।

फ्रांसिस के बारे में कहा जाता है कि उनके होते हुए गोवा में इतनी तेजी से धर्मांतरण की रफ्तार बढ़ी थी कि वो कई बार पूरे के पूरे गाँव को ईसाई बनवा देते थे। फिर हिंदू बच्चों को मंदिर में ले जाते थे और उनसे देवी-देवताओं को गाली देने को कहते थे, मूर्तियाँ तोड़ने, उनपर थूकने और उन्हें रौंदने के लिए कहते थे। साथ ही उन कलाकारों को भी धमकी दी जाती थी जो मूर्तियाँ बनाने का काम करते थे।

‘सेंट’ फ्रांसिस जेवियर ने गोवा पर जब पूरा कब्जा किया तो गैर इसाइयों के लिए स्थिति और बद्तर हो गई क्योंकि तब सत्ता ईसाई पादरियों के हाथ आ गई और हिंदू विरोधी कानून बनने शरू हुए। धर्मांतरण के लिए नृशंस यातनाएँ दी जाने लगी। हिंदू माता पिता के सामने बच्चों के अंग काटे जाने लगे। वहीं जो धर्मांतरण के लिए नहीं मानता था उसे सूली पर लटकाकर जलाना शुरू कर दिया गया।

इस तरह जेवियर के काल में धर्मांतरण को अंजाम दिया गया और आगे चल कर जब इतिहासकारों ने इस सच्चाई को लिखना चाहा तो उन्हें भी असहनीय यातनाएँ दी गईं। गोवा में एक ‘हाथकाटरो’ खंभ भी है। बताया जाता है कि ये हिंदुओं पर पुर्तगाली शासकों के बर्बरता का जीवंत साक्ष्य है। ईसाइयों द्वारा हिंदुओं को इससे बाँधकर उनके अंगों को तोड़ा जाता था।

अब ‘सेंट’ जेवियर का काल बीते कई सदी हो चुकी हैं। आज ईसाई समुदाय जो हमें उनके बारे में बताता है हम उसी को जानते हैं लेकिन अगर लोगों की सुनी सुनाई बातों से हटकर खुद समझना चाहते हैं कि ‘सेंट’ जेवियर हिंदुओं के लिए सोच क्या रखते थे तो एक पत्र में लिखी बात पढ़िए जो उन्होंने 1545 में कोचीन से लिखी थी

क्या है नेपाल की ‘भंसार नीति’, जिसके खिलाफ PM बालेन शाह के खिलाफ सड़कों पर उतरी जनता: जानें- टैक्स के इस ‘अव्यावहारिक सिस्टम’ के पीछे की वजह

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह के भारत विरोधी तेवर एक बार फिर सुर्खियों में है। उन्होंने नेपाली 100 रुपए से अधिक के सामान जो भारत से आते हैं, उस पर टैक्स लगाने के फैसले को सख्ती से लागू करना शुरू कर दिया है। सीमाओं पर भारतीय सामानों पर टैक्स की वसूली की जा रही है।

इससे नेपाल के लोगों को ज्यादा पैसे चुकाने पड़ रहे हैं और भारत-नेपाल से सटे इलाकों में खासतौर पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। भारत नेपाल के बीच हमेशा से रोटी-बेटी का रिश्ता रहा है। सीमा पर कड़ा पहरा नहीं रहा है और बॉर्डर क्रॉस करने के लिए पहले से अनुमति लेने की जरूरत भी नहीं रही है।

लेकिन, बालेन शाह के निर्देश के बाद स्थितियाँ काफी बदल गई हैं। सीमा पार कर हर दिन सामानों की आवाजाही होती थी, उसमें कमी आ गई है। ऐसे में नेपाल को सामानों की कमी हो रही है। इससे महँगाई बढ़ने की आशंका है। सरकार भले ही टैक्स लगाकर पैसे कमा ले, लेकिन जनता बेहाल है। यही वजह है कि वहाँ विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं।

क्या है नेपाल की ‘भंसार नीति’

नई भंसार नीति यानी कस्टम ड्यूटी के तहत भारत से आने वाले नेपाली 100 रुपए से अधिक की कीमत वाले सामानों को टैक्स देना होगा। खास कर रक्सौल, जोगबनी बॉर्डर पर इसे सख्ती से लागू कर दिया गया है। यहाँ सामानों पर 5 फीसदी से 80 फीसदी तक टैक्स वसूला जा रहा है।

नेपाल की मानें तो इस नीति का मकसद नेपाल के घरेलू उत्पादों और व्यापारियों को प्रोमोट करना और भारत से आने वाले सस्ते सामान पर रोक लगाना है। नेपाल सशस्त्र प्रहरी बल यानी नेपाल आर्म पुलिस फोर्स लाउडस्पीकर लगा कर लगातार सीमा पर नियम की जानकारी दे रही है और सख्ती कर रही है।

नेपाल के अधिकारी ने कहा, “कस्टम क्षेत्रों में अवैध आयात को रोकने के लिए ‘जीरो-टॉलरेंस’ की नीति अपनाना हमेशा से सरकार की नीति रही है। कस्टम अधिनियम में पहले से ही यह प्रावधान था कि नेपाली 100 रुपए से अधिक मूल्य के सामान पर शुल्क देना अनिवार्य है।” उन्होंने आगे कहा, “अब हम इस मामले में और भी अधिक सक्रिय हो गए हैं। मंत्री और प्रधानमंत्री की ओर से भी इसी तरह के निर्देश मिले हैं।”

भारतीय नंबर प्लेट वाले निजी वाहनों को अब बिना पूर्व अनुमति के नेपाल में प्रवेश करने से रोका जा रहा है। पहले भारतीय नंबर प्लेट वाली मोटरसाइकिलें अक्सर नेपाल में प्रवेश करती हुई दिखाई देती थीं, और कुछ लोग तो नेपाल के भीतर भी इसका धड़ल्ले से इस्तेमाल करते थे।

अब नेपाल में आसानी से जाया नहीं जा सकता। वाहनों को अब ‘वाहन पास’ पहले से लेना होगा। एक दिन नेपाल में रहने पर वाहन को 315 रुपए से 350 रुपए देना होगा। नेपाली करेंसी में इसकी कीमत करीब 500-600 रुपए है।

नेपाली की नई कस्टम नीति से भारत नेपाल के पारंपरिक रिश्ते प्रभावित हो रहे हैं। बॉर्डर से व्यापार कम हो गया है।

नेपाल में विरोध प्रदर्शन

नेपाल में नई कस्टम नीति को लेकर राजनीतिक दलों और स्थानीय निवासियों में गहरी नाराजगी है। लोग सड़कों पर उतर आए हैं। इनका कहना है कि यह फैसला मधेश क्षेत्र के लोगों के जीवन की असलियत को नजरअंदाज करता है।

नेपाल के बारा जिला मुख्यालय के कलैया भरत चौक पर 19 अप्रैल 2026 को लोग जमा हुआ और विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों में छोटे व्यापारी और आम लोग शामिल रहे। इनका कहना है कि ये फैसला लोगों पर आर्थिक बोझ डालने वाला है। सरकार बगैर सोचे समझे लोगों पर आर्थिक बोझ बढ़ा रहे हैं।

जनता समाजवादी पार्टी (JSP) की केंद्रीय समन्वय समिति के सदस्य उमेश यादव ने सरकार के इस कदम पर कड़ा रोष जताते हुए ‘चुने हुई सरकार का फासीवाद’ करार दिया। उन्होंने कहा, “सरकार जान-बूझकर सीमावर्ती क्षेत्र के लोगों को परेशान कर रही है, इससे आम जनता के बीच सरकार के प्रति गंभीर असंतोष बढ़ेगा।”

राष्ट्रीय मुक्ति पार्टी के महासचिव अनिल महासेठ ने कहा कि नेपाल और भारत के बीच खुली सीमा का निर्धारण काठमांडू या दिल्ली में एयरकंडीशन में बैठे लोग नहीं कर सकते। यहाँ खुली सीमा पर व्यावहारिक और वास्तविक सच्चाई नजर आती है।

उन्होंने कहना है कि बिराटनगर से लेकर नेपालगंज तक के निवासियों की चिंताओं को समझे बिना मनमाने ढंग से नीतियाँ थोपना पूरी तरह से ग़लत है।

राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के नेता और ‘खुली सीमा संवाद समूह’ के अध्यक्ष डॉ. राजीव झा का कहना है कि सरकार किसी भी हाल मं उन सामाजिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक संबंधों को न भूले, जो सदियों से नेपाल और भारत के बीच मौजूद हैं।

उनका कहना है कि आज के महँगाई के दौर में नेपाली 100 रुपये की सीमा तय करना बेहद कम और अव्यावहारिक है। सरकार को इस पर तत्काल पुनर्विचार करना चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि मायके आई बेटी साधारण उपहारों और व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए लाए गए सामान के बीच स्पष्ट अंतर होना चाहिए। खाद्य पदार्थों को सीमा शुल्क से मुक्त रखा जाना चाहिए।”

राष्ट्रीय एकता दल के अध्यक्ष विनय यादव ने इस कदम को ‘अघोषित नाकेबंदी’ करार दिया। उनका कहना है, “यह कदम 1950 की शांति और मैत्री संधि के प्रावधानों के विपरीत है। सरकार को घरेलू उपयोग की वस्तुओं पर से सीमा शुल्क की सीमा तत्काल हटा देनी चाहिए और सुरक्षाकर्मियों को नागरिकों के प्रति मित्रवत व्यवहार करने का निर्देश देना चाहिए।”

उन्होंने चेतावनी दी कि यदि नेपाल की सरकार ने सख्ती बंद नहीं की और 100 रुपए वाले नियम को वापस नहीं लिया, तो सीमावर्ती क्षेत्र के लोग सड़कों पर उतर जाएँगे। इनका कहना है कि इंटरनेशनल हवाई अड्डे पर तो सामानों से भरे सूटकेस लाने पर तो कोई कस्टम नहीं लगती, तो फिर मधेशियों को परेशान क्यों किया जा रहा है। उन्होंने पूछा कि क्या सीमा पार से थोड़ा सा नमक और तेल लाने पर लोगों के साथ तस्करों जैसा बर्ताव किया जाएगा?

नेपाल के रवैये को देखते हुए भारत सरकार ने भी सीमा पर चौकसी बढ़ा दी है। नेपाल आने और जाने वालों की सख्ती से जाँच की जा रही है, यहाँ तक की पैदल और साइकिल वालों के रिकॉर्ड भी रखे जा रहे हैं।

नेपाल सरकार की मंशा पर सवाल

नेपाल की बालेन सरकार का मानना है कि इससे छोटे-छोटे घरेलू उद्योग को बढ़ावा मिलेगा। भारत के सामान सस्ते होते हैं इसलिए नेपाल का लोकल बाजार प्रभावित हो रहा था। इसलिए ‘आत्मनिर्भरता’ और स्थानीय उत्पादों को बचाने के लिए यह कदम उठाया गया। बालेन शाह की नीति राष्ट्रवादी मानी जाती है।

भारतीय सामान पर सख्ती दिखा कर घरेलू समर्थन हासिल करने का तरीका भी ये माना जा रहा है। दरअसल बालेन शाह भारत के खिलाफ पहले भी बोलते रहे हैं।

नेपाल के अधिकारियों ने सरकार के फैसले का बचाव करते दिख रहे हैं। सीमा शुल्क विभाग के निदेशक किशोर बरतौला के मुताबिक यह कदम तस्करी रोकने के लिए उठाया गया है। उनका कहना है कि तस्कर थोड़े- थोड़े सामान मँगा कर उसे थोक में बेचते हैं।

इससे नेपाल के राजस्व में बढोतरी का भी तर्क दिया जा रहा है। कस्टम ड्यूटी से सरकार को सीधा राजस्व मिलता है। आर्थिक दबाव के बीच यह एक सरकार के आय का आसान स्रोत है। हालाँकि बरतौला इससे इनकार कर रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार को राजस्व बढ़ाने में इससे ज्यादा मदद नहीं मिलेगी।

इसे राजनीतिक संकेत भी कहा जा सकता है। इससे नेपाल के अंदर और बाहर यह संदेश जा रहा है कि सरकार ‘सख्त और फैसले लेने वाली’ है। दरअसल बालेन सरकार अपनी अलग पहचान बनाने में जुटी हुई है। लेकिन यह नीति ‘अव्यवहारिक’ है।

इससे भारत-नेपाल सीमा पर रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित हो रही है। भारत-नेपाल सीमा पर लोग रोजमर्रा की चीजें खरीदते हैं। शादी-ब्याह के मौके पर सीमा पार कर एक-दूसरे के घर आते-जाते हैं। ऐसे में ₹100 काफी कम है, जिससे ऊपर की वस्तुओं पर टैक्स लगाया गया है। इसे कम से कम ₹1000 किया जाना चाहिए।

सीमा पर सख्ती से दैनिक श्रमिकों की हालत ज्यादा खराब हो जाएगी। उनके सामने रोजी-रोटी का संकट आ जाएगा। इस नीति को लागू करना भी अपनेआप में एक चुनौती है। इससे सीमा पर भ्रष्टाचार को फलने- फूलने का मौका मिलेगा। इसलिए कम से कम रोजमर्रा की चीजों को इससे अलग रखा जाना चाहिए।

इस नीति का सीधा असर सीमा व्यापार पर पड़ रहा है। जो सामान आसानी से और कम कीमत पर नेपाली जनता को मिलती थी और भारत के छोटे व्यापारी लाभान्वित होते थे। नई भंसार नीति इस पर असर डालेगी। भारत-नेपाल के ‘रोटी-बेटी’ संबंधों के कारण यह मुद्दा ज्यादा संवेदनशील हो गया है।

दोनों देशों के बीच राजनयिक संवाद जारी है, जिससे रिश्तों की कड़वाहट में कमी आई है। बालेन शाह के कस्टम ड्यूटी वाले फैसले ने भारत के साथ रिश्तों को भी प्रभावित करेगा।

कभी देश की औद्योगिक ताकत था पश्चिम बंगाल लेकिन अब कर्ज के जंजाल में फंसा: जानें 2011 में TMC की सरकार आने के बाद कैसे बर्बाद हुआ राज्य, GDP का हिस्सा हुआ आधा

जैसे-जैसे पश्चिम बंगाल 2026 के विधानसभा चुनावों की ओर बढ़ रहा है, राज्य का माहौल राजनीतिक तनाव से भरा हुआ है। दार्जिलिंग के चाय बागानों से लेकर हुगली के औद्योगिक इलाकों और दक्षिण के तटीय गाँवों तक, हर कोना एक निर्णायक पल के लिए तैयार खड़ा है।

‘माँ, माटी, मानुषट जैसे नारों से आगे बढ़कर देखें तो एक अध्ययन यह दिखाता है कि जो राज्य कभी भारत की सबसे मजबूत आर्थिक ताकतों में गिना जाता था, वह धीरे-धीरे कर्ज और गिरावट के चक्र में फंसता गया। पहले वाम मोर्चा के लंबे शासन में और अब ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के पिछले पंद्रह सालों में।

2011 के बाद से संरचनात्मक गिरावट

Finskeptics की वित्तीय रिपोर्ट के अनुसार, जब नई सरकार आई थी तो उम्मीद थी कि औद्योगिक ठहराव खत्म होगा और एक ‘नई सुबह’ आएगी। लेकिन आँकड़े बताते हैं कि अर्थव्यवस्था की कमजोरियाँ खत्म नहीं हुईं, बल्कि और गहरी हो गई हैं।

राज्य सरकार ने कल्याणकारी योजनाओं का एक बड़ा नेटवर्क जरूर खड़ा किया है, जिससे गरीबों को तुरंत राहत मिलती है, लेकिन अर्थव्यवस्था का ‘इंजन’ कमजोर पड़ रहा है। सरकार ज्यादा से ज्यादा पैसा बाँटने में लगा रही है, जबकि भारी उद्योग और आईटी जैसे उत्पादक क्षेत्र पीछे छूटते जा रहे हैं। इसका असर बड़े संकेतकों में साफ दिखता है।

पश्चिम बंगाल का राष्ट्रीय GDP में हिस्सा घट रहा है, प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से नीचे है और हजारों कंपनियाँ राज्य छोड़कर जा चुकी हैं। निवेश का माहौल भी प्रभावित हुआ है। ‘कट मनी’ जैसे अनौपचारिक खर्च और मजदूर मामलों में राजनीतिक दखल ने निवेशकों का भरोसा कम किया है। बुनियादी ढाँचे की कमी और फैक्ट्रियों के बंद होने से औद्योगिक ढाँचा और कमजोर हुआ है।

एक औद्योगिक दिग्गज का लंबा पतन

इतिहास में पश्चिम बंगाल भारत के उद्योग का केंद्र था। आजादी के बाद यह देश के GDP में करीब 10% योगदान देता था। यह इंजीनियरिंग कंपनियों, जूट मिलों और पूर्वी भारत की व्यापारिक राजधानी के रूप में जाना जाता था। लेकिन पिछले सात दशकों में हालात और नीतियों के कारण इसकी नींव कमजोर होती गई।

बंटवारे का झटका, ‘फ्रेट इक्वलाइजेशन पॉलिसी’ जिसने खनिज आधारित उद्योगों में बंगाल की बढ़त खत्म कर दी और वाम शासन के दौरान उग्र मजदूर आंदोलन इन सबने गिरावट को लगातार बढ़ाया। 1960 में पश्चिम बंगाल भारत का तीसरा सबसे अमीर राज्य था। 2024 तक यह 24वें स्थान पर पहुँच गया।

ग्राफ (साभार: Finskeptics)

EAC-PM की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य का राष्ट्रीय GDP में हिस्सा 1960-61 के 10.5% से घटकर 2023-24 में सिर्फ 5.6% रह गया, यह किसी भी बड़े राज्य के लिए सबसे तेज गिरावट है। और भी चौंकाने वाली बात यह है कि प्रति व्यक्ति आय, जो कभी राष्ट्रीय औसत से 127.5% ज्यादा थी, अब घटकर 83.7% रह गई है।

ग्राफ (साभार: Finskeptics)

ओडिशा जैसे राज्य, जो कभी पीछे माने जाते थे, अब आगे निकल रहे हैं। इस लंबे पतन को अक्सर ‘बंगाल कर्स’ कहा जाता है, जो अलग-अलग सरकारों की नीतिगत गलतियों का जमा हुआ नतीजा है।

वर्तमान वित्तीय संकट: विकास की कीमत पर कल्याण

TMC सरकार के दौरान राज्य की वित्तीय स्थिति और नाजुक हो गई है। राज्य अब ऐसे चक्र में फंस गया है जहाँ वह रोजमर्रा के खर्च चलाने के लिए कर्ज ले रहा है, बजाय भविष्य के लिए संपत्ति बनाने के। राज्य का कर्ज 7.7 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा हो चुका है और राजकोषीय घाटा लगातार ऊँचा बना हुआ है।

कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च खासकर चुनावों के आसपास तेजी से बढ़ता है, लेकिन पूंजीगत निवेश पीछे रह जाता है। सरकार की कमाई का बड़ा हिस्सा पुराने कर्ज का ब्याज, वेतन और पेंशन में चला जाता है। इससे नई सड़कें, पुल और बिजली परियोजनाएँ बनाने के लिए बहुत कम पैसा बचता है, जो असल में निवेश और रोजगार लाते हैं।

मुख्य संकेतक इस असंतुलन को दिखाते हैं, राज्य की अपनी टैक्स आय की वृद्धि कमजोर है, क्रेडिट-डिपॉजिट रेशियो कम है और विदेशी निवेश भी सीमित है। MSME सेक्टर संख्या में बड़ा जरूर है, लेकिन ज्यादातर इकाइयाँ बहुत छोटी हैं और बड़े स्तर पर रोजगार देने में सक्षम नहीं हैं।

राजकोषीय और कर्ज का बढ़ता बोझ

2011 में जब TMC सत्ता में आई थी, तब राज्य का कर्ज लगभग 1.92 लाख करोड़ रुपए था। 2025-26 तक यह बढ़कर 7.7 लाख करोड़ रुपए होने का अनुमान है, यानी सिर्फ 15 साल में चार गुना। आज हर नागरिक पर औसतन करीब 70,653 रुपए का कर्ज है।

सरकार अपनी कमाई का 20% से 28% सिर्फ ब्याज चुकाने में खर्च कर रही है, जबकि दूसरे राज्यों में यह 5% से 15% के बीच होता है। सबसे बड़ी चिंता ‘रेवेन्यू डेफिसिट’ है। यानी राज्य कर्ज लेकर सब्सिडी और प्रशासनिक खर्च चला रहा है, न कि इंफ्रास्ट्रक्चर बना रहा है।

ग्राफ (साभार: Finskeptics)

वित्तीय वर्ष 2024-25 में राजकोषीय घाटा 4.02% तक पहुँच गया, जो सुरक्षित सीमा 3% से ज्यादा है। 2020 से 2025 के बीच राज्य ने 1.49 लाख करोड़ रुपए का राजस्व घाटा जमा किया। राज्य की पूंजीगत आय का 80% हिस्सा कर्ज से आ रहा है, यानी उधार पर सिस्टम चल रहा है।

औद्योगिक पलायन: क्यों जा रही हैं कंपनियाँ?

2011 के बाद से 6,600 से ज्यादा कंपनियाँ, जिनमें 110 सूचीबद्ध कंपनियाँ भी शामिल हैं, पश्चिम बंगाल छोड़ चुकी हैं। यह सिर्फ अस्थायी गिरावट नहीं, बल्कि पूंजी का स्थायी पलायन है। कंपनियाँ महाराष्ट्र, गुजरात और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में जा रही हैं, क्योंकि वहाँ का माहौल ज्यादा अनुकूल है।

चार्ट (साभार: Finskeptics)

राज्य में ‘बंगाल ग्लोबल बिजनेस समिट’ जैसे बड़े आयोजन होते हैं और बड़े निवेश के वादे किए जाते हैं, लेकिन जमीन पर केवल करीब 4% प्रस्ताव ही लागू हो पाते हैं। एक बड़ा कारण ‘सिंडिकेट सिस्टम’ है, जहाँ राजनीतिक समर्थन वाले समूह निर्माण सामग्री और मजदूरों पर नियंत्रण रखते हैं और ‘कट मनी’ माँगते हैं।

इसके अलावा ‘घेराव’ संस्कृति भी नए रूप में वापस आई है, जिससे TMC शासन में 177 फैक्ट्रियाँ बंद हुईं, जबकि पिछली सरकार में यह संख्या 83 थी। औद्योगिक उत्पादन भी घटकर 13.5% से सिर्फ 3.9% रह गया है।

श्रम और क्षेत्रीय संकट: पतन की मानवीय कीमत

आर्थिक संकट का असर सीधे लोगों की जिंदगी पर पड़ा है। रोजगार की कमी के कारण पश्चिम बंगाल अब देश के सबसे बड़े श्रम आपूर्तिकर्ता राज्यों में से एक बन गया है। 2025 तक करीब 22.4 लाख मजदूर राज्य से बाहर केरल, कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में काम कर रहे हैं।

यह एक तरह से ‘खामोश जनमत’ है कि अगर राज्य में अवसर होते, तो लोग अपने घर छोड़कर बाहर काम करने नहीं जाते। उत्तर बंगाल के चाय बागानों में स्थिति बेहद गंभीर है। 2025 में उत्पादन 50-60% तक गिर गया और 80% बागान घाटे में हैं।

मजदूरी में भारी अंतर है, जहाँ सिक्किम में 500 रुपए रोज मिलते हैं, वहीं बंगाल में सिर्फ 250 रुपए मिलते हैं। इसका नतीजा कुपोषण और एनीमिया के रूप में सामने आया है। अलीपुरद्वार जिले में 36% मजदूर कुपोषित हैं और 88% एनीमिया से पीड़ित हैं। कुछ बंद बागानों में तो लोग भूख से मरने तक की स्थिति में पहुँच गए हैं।

व्यापक आर्थिक कमजोरी: बाकी राज्यों से पीछे

मैक्रो स्तर पर भी पश्चिम बंगाल पीछे रह गया है। राज्य का GDP में हिस्सा घट चुका है और प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से नीचे है। वित्तीय वर्ष 25 में राज्य की विकास दर सिर्फ 9.91% रही, जो बड़े राज्यों में सबसे कम है। क्रेडिट-डिपॉजिट रेशियो 46% से 52% के बीच है, जो राष्ट्रीय औसत से करीब 30% कम है।

इसका मतलब है कि यहाँ जमा पैसा दूसरे राज्यों में निवेश हो रहा है। MSME सेक्टर में 99.9% इकाइयाँ माइक्रो हैं यानी छोटे स्तर की, जो बड़े पैमाने पर रोजगार नहीं दे सकतीं। 2019 से 2024 के बीच 2,200 से ज्यादा MSMEs बंद हो चुके हैं। राज्य का खुद का टैक्स संग्रह भी कमजोर है और इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च 5.3% से घटकर सिर्फ 3% रह गया है।

इन सभी आँकड़ों से एक साफ और चिंताजनक तस्वीर सामने आती है। पश्चिम बंगाल एक उत्पादन आधारित अर्थव्यवस्था से हटकर निर्भरता आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। यह औद्योगिक रोजगार से हटकर प्रवासी मजदूरों की कमाई पर निर्भर होता जा रहा है। राज्य का आर्थिक हिस्सा घट रहा है, फैक्ट्रियाँ बंद हो रही हैं और कर्ज बढ़ता जा रहा है।

आज की आर्थिक चुनौतियाँ किसी अस्थायी मंदी का परिणाम नहीं, बल्कि एक गहरे संरचनात्मक असंतुलन का नतीजा हैं। कल्याणकारी खर्च बढ़ाने के साथ उत्पादन, निवेश और उद्योग पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया, जिससे यह कमजोर आर्थिक मॉडल बन गया है। उच्च कर्ज, कम निवेश, उद्योगों का पलायन और बढ़ता प्रवासन, ये सभी उसी असंतुलन के जुड़े लक्षण हैं।

यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

url- West Bengal economy witnessed massive decline under TMC government after 2011

समीर ने पकड़ा और रिजवान ने चाकू से धड़ाधड़ किए वार, अहमदाबाद में हिंदू युवक की पार्किंग विवाद में हत्या: गुस्साए लोगों ने की आगजनी-तोड़फोड़, पढ़ें- FIR की डिटेल्स

गुजरात के अहमदाबाद के धांधुका में शनिवार (18 अप्रैल 2026) को दो मुस्लिम युवकों ने एक हिंदू युवक धर्मेश भरवाड की हत्या कर दी। बताया जा रहा है कि यह विवाद बाइक पार्किंग की बात से शुरू हुआ और यह इतना बढ़ गया कि दोनों आरोपितों ने मिलकर धर्मेश पर चाकू से हमला कर दिया। घायल हालत में धर्मेश को तुरंत अस्पताल ले जाया गया लेकिन इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई।

इस घटना के बाद इलाके में तनाव फैल गया और स्थानीय हिंदू समुदाय के लोग आक्रामक हो गए। कुछ जगहों पर दुकानों में तोड़फोड़ और आगजनी की घटनाएँ भी हुईं। स्थिति को संभालने के लिए पुलिस ने तुरंत कार्रवाई की और धांधुका में भारी पुलिस बल तैनात किया गया। अहमदाबाद ग्रामीण के SP समेत कई वरिष्ठ अधिकारी भी मौके पर पहुँचे और हालात को नियंत्रण में किया।

मृतक धर्मेश के चचेरे भाई राहुल भरवाड ने इस मामले में धांधुका पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई। इसी शिकायत के आधार पर पुलिस ने FIR दर्ज की। FIR की एक कॉपी ऑपइंडिया के पास भी मौजूद बताई जा रही है।

पुलिस ने जाँच के दौरान आरोपित की पहचान रिजवान निजाम मनियार और समीर मोहम्मद अमदानी के रूप में की और दोनों को कुछ ही घंटों में गिरफ्तार कर लिया गया। फिलहाल पुलिस दोनों से पूछताछ कर रही है।

घटना के बारे में जानकारी देते हुए बताया गया कि शनिवार (18 अप्रैल 2026) को धर्मेश ने अपने चचेरे भाई राहुल से कहा था कि वह एक रिश्तेदार का हाल-चाल जानने जा रहे हैं और राहुल को भी साथ चलने के लिए कहा। इसके साथ ही उन्होंने राहुल से एक बाइक लाने को भी कहा था।

इसके बाद राहुल रणपुर चौराहे पर पहुँचे, जहाँ उनकी मुलाकात धर्मेश से हुई। इसी दौरान धर्मेश ने राहुल की बाइक यह कहकर ले ली कि वह बैंक जा रहे हैं और बाइक बैंक के पास खड़ी कर दी।

इसी बात को लेकर आरोपित रिजवान और समीर ने धर्मेश से झगड़ा शुरू कर दिया और उन्हें धमकी भी दी। हालाँकि, धर्मेश ने उनकी बात को नजरअंदाज कर दिया और राहुल को फोन करके बताया कि वह अपने रिश्तेदार के घर जा रहे हैं।

गाड़ी के पास खड़े होकर आरोपित ने किया हमला

धर्मेश और राहुल बैंक में अपना काम पूरा करने के बाद अपने रिश्तेदार के घर जाने के लिए अलग-अलग बाइकों से निकले थे। जैसे ही वे नसीब सोसाइटी के पास पहुँचे, तभी दोनों आरोपितों ने उनका रास्ता रोक लिया और धर्मेश को गालियाँ देने लगे। जब धर्मेश और राहुल ने उन्हें समझाने की कोशिश की तो बात और बढ़ गई। आरोपित ने हमला करते हुए धर्मेश को पकड़ लिया और कहा, “बैंक में क्या बात कर रहे थे, आज तो तुम्हें खत्म करना ही होगा।”

शिकायत में राहुल ने बताया कि समीर मोहम्मद ने धर्मेश को पकड़ रखा था जबकि रिजवान ने चाकू से उस पर वार किया। राहुल ने बीच-बचाव करने की कोशिश की लेकिन तब तक धर्मेश पर कई वार किए जा चुके थे और वह गंभीर रूप से घायल हो चुका था।

हमले के बाद दोनों आरोपित मौके से फरार हो गए। उधर घायल धर्मेश को तुरंत अस्पताल ले जाया गया लेकिन उसकी हालत बहुत गंभीर थी। इलाज के दौरान डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। शिकायत के मुताबिक, अस्पताल ले जाते समय धर्मेश ने खुद हमलावरों के नाम रिजवान और समीर बताए थे।

राहुल की शिकायत के आधार पर पुलिस ने आरोपित रिजवान निजाम मनियार और समीर मोहम्मद अमदानी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 103(1), 351(3), 352 और 54 के साथ-साथ गुजरात पुलिस अधिनियम की धारा 135 के तहत मामला दर्ज किया है। पुलिस ने इस घटना को एक सोची-समझी आपराधिक साजिश मानते हुए जाँच शुरू कर दी है।

ओपइंडिया से बातचीत में मृतक धर्मेश के भाई और शिकायतकर्ता राहुल ने बताया कि आरोपितों ने मामूली विवाद को लेकर धर्मेश पर धारदार हथियार से हमला किया। उन्होंने यह भी कहा कि आरोपित कहते हुए गए “आज इसे जिंदा नहीं छोड़ेंगे, इसे मार डालो।” राहुल ने बताया कि उसने अपने भाई को बचाने की पूरी कोशिश की लेकिन आरोपितों ने उसे पकड़ लिया, जिससे वह धर्मेश को बचा नहीं सका।

SIT का गठन करेगी पुलिस

इस पूरे मामले को लेकर अहमदाबाद ग्रामीण के एसपी ओम प्रकाश जाट ने बताया कि उन्होंने पीड़ित परिवार से मुलाकात की है और परिवार के लोगों ने अब तक की पुलिस कार्रवाई पर संतोष जताया है। उन्होंने कहा कि मृतक के परिवार ने मामले में सख्त कार्रवाई और विस्तृत जाँच की माँग की है।

एसपी ने आगे कहा, “परिवार की माँग को ध्यान में रखते हुए हम अपने वरिष्ठ अधिकारियों और सरकार से चर्चा करने के बाद इस मामले की जाँच के लिए एक विशेष जाँच समिति (SIT) का गठन करेंगे।” इसके साथ ही उन्होंने यह भी आश्वासन दिया कि मामले की पैरवी मजबूत तरीके से हो सके, इसके लिए एक विशेष लोक अभियोजक की नियुक्ति की सिफारिश भी की जाएगी।


इसके अलावा जिला पुलिस प्रमुख ने जानकारी दी कि अब इलाके की सभी दुकानें खुल चुकी हैं और स्थिति पूरी तरह शांत है। पुलिस ने उसी रात से इलाके में तलाशी अभियान शुरू कर दिया था और संदिग्ध लोगों से पूछताछ भी की जा रही थी।

घटना का संक्षिप्त विवरण देते हुए पुलिस अधिकारी ने बताया कि बाइक को लेकर हुए विवाद के बाद रिजवान और समीर नाम के दो लोगों ने एक चरवाहे युवक पर हमला किया। इस दौरान हुई हाथापाई में युवक की मौत हो गई। पुलिस का कहना है कि मामले की गहराई से जाँच की जा रही है और आरोपितों की गिरफ्तारी के बाद आगे की कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी गई है।

गौरतलब है कि इसी क्षेत्र में साल 2022 में भी एक ऐसी ही घटना सामने आई थी, जब किशन भरवाड़ नाम के एक हिंदू युवक की कथित तौर पर भगवान कृष्ण की तस्वीर पोस्ट करने के कारण हत्या कर दी गई थी। दिनदहाड़े उसे गोली मार दी गई थी, जिससे पूरे इलाके में सनसनी फैल गई थी। बाद में इस मामले में एक मौलवी समेत कई आरोपितों को गिरफ्तार किया गया था।

किशन भरवाड़ की उस घटना को स्थानीय लोग अब तक भूल नहीं पाए थे और जब इस तरह की एक और वारदात सामने आई तो लोगों में आक्रोश बढ़ गया। हालाँकि, फिलहाल पुलिस की कार्रवाई के बाद इलाके में स्थिति शांत बताई जा रही है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)