म्यांमार की सीमा से सटे मणिपुर के चुराचांदपुर जिले में 13 नवंबर को असम राइफल्स के एक काफिले पर उग्रवादियों ने घात लगाकर हमला कर दिया था। इस हमले में एक कमांडिंग ऑफिसर, उनकी पत्नी, उनका 6 साल का बेटा और 46 असम राइफल्स के 4 अन्य जवानों की मौत हो गई थी। स्वराज्य की रिपोर्ट के अनुसार, सेना के कई शीर्ष अधिकारियों ने इस हमले के पीछे चीन का हाथ होने की आशंका जताई है।
पीपुल्स लिबरेशन आर्मी मणिपुर और मणिपुर नागा पीपुल्स फ्रंट (MNPF) ने इस हमले की जिम्मेदारी ली है। पीएलए (एम) के चीन के साथ मजबूत संबंध हैं और इसे पूर्व में बीजिंग से सहायता और प्रोत्साहन मिला है। असम राइफल्स के पूर्व महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) शौकीन चौहान ने स्वराज्य को बताया, ”चीन ने लंबे समय से पूर्वोत्तर के उग्रवादी समूहों को हथियारों, गुरिल्ला रणनीति और वैचारिक प्रशिक्षण दिया है। इन संगठनों के कई नेताओं ने चीन की यात्रा भी की है। उनके चीन के सैन्य और राजनीतिक दलों से भी घनिष्ठ संबंध हैं।”
मणिपुर से भारतीय सेना में पहले थ्री-स्टार जनरल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) कोंसम हिमालय सिंह ने बताया कि शनिवार को मणिपुर में घात लगाकर उग्रवादियों द्वारा किया गया हमला अपना वर्चस्व कायम करने का एक प्रयास था, क्योंकि इस समय आतंकवाद पर शिकंजा कसा हुआ है। लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) कोन्सम हिमालय सिंह ने कहा, “मणिपुर में फिर से उग्रवाद को बढ़ावा देने में चीन का हाथ है, क्योंकि मणिपुर पूर्वोत्तर का एकमात्र ऐसा राज्य है, जहाँ उग्रवाद अभी भी सक्रिय है।”
नागालैंड में दीमापुर के पास रंगपहाड़ में सेना के 3 कोर मुख्यालय से जुड़े एक ब्रिगेडियर के मुताबिक, मणिपुर में पीएलए और अन्य विद्रोही समूह का चीन के साथ घनिष्ठ संबंध है। उन्होंने स्वराज्य को बताया कि इन संगठनों के नेता चीन की सेना के लगातार संपर्क में रहते हैं। ब्रिगेडियर ने बताया कि 46 असम राइफल्स ने भारत-म्यांमार सीमा पर मादक पदार्थों की तस्करी के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है। मादक पदार्थों की तस्करी करने वाले कई गिरोह का भंडाफोड़ भी किया है। यह उग्रवादियों की आय का मुख्य स्रोत है। आय का स्त्रोत बंद हो जाने के कारण वे कर्नल त्रिपाठी से खार खाए बैठे थे, जिसके चलते उनकी हत्या कर दी गई।
सेना के शीर्ष अधिकारियों ने स्वराज्य को यह भी बताया कि चीन म्यांमार के शान, रखाइन और काचिन प्रांतों में उग्रवाद को बढ़ावा दे रहा है। वह उग्रवादियों के समूह को एके-सीरीज राइफलें, ग्रेनेड और चीनी कारखानों में बने अन्य गोला-बारूद की आपूर्ति कर रहा है। स्वराज्य ने यह भी लिखा है, ”ये सभी विद्रोही संगठन वामपंथी विचारधारा वाले हैं। ये सभी मणिपुर को एक कम्युनिस्ट देश बनाना चाहते हैं। चीन इन सभी समूहों के साथ-साथ पूर्वोत्तर के अन्य विद्रोही समूहों की कई दशकों से सहायता कर रहा है।”
मौत के बाद दफनाने के बजाय जलाने की इच्छा जताकर उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के सदस्य और पूर्व अध्यक्ष वसीम रिजवी फिर सुर्ख़ियों में आ गए हैं। रिजवी ने वसीयत बनाकर मौत के बाद कब्रिस्तान में दफन होने के बजाए श्मशान घाट पर जलाए जाने की इच्छा प्रकट की है। उन्होंने अपनी चिता को मुखाग्नि देने का अधिकार डासना मंदिर के महंत व जूना अखाड़े के महामंडलेश्वर यति नरसिम्हानंद सरस्वती को दिया है। इस संदर्भ में रिजवी ने एक वीडियो भी जारी किया है।
वायरल हो रहे अपने वीडियो में वसीम रिज़वी ने कहा है कि देश और पूरी दुनिया में उनके कत्ल की साजिश रची जा रही है और उनकी गर्दन काटने वाले को इनाम देने का एलान किया गया है। वसीम रिज़वी के अनुसार, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में कुरान की 26 आयतों को चुनौती दी और इस्लाम के पैगम्बर मोहम्मद पर किताब भी लिखी है, जिसके कारण कट्टरपंथी उनका कत्ल करना चाहते हैं।
रिजवी का कहना है कि कट्टरपंथियों ने उनकी लाश के लिए कब्रिस्तान में जगह नहीं देने की घोषणा की है। उनकी मौत के बाद देश में किसी तरह की अशांति न हो, इसीलिए उन्होंने अपनी वसीयत में मौत के बाद उनके पार्थिव शरीर को जलाने की इच्छा जताई है। उन्होंने कहा कि उनके पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार हिन्दू रीति-रिवाज़ से हो, इस संदर्भ में उन्होंने अपनी वसीयत की कॉपी प्रशासन को भी भेज दी है।
वसीम रिज़वी ने आगे कहा, “मैंने अपनी वसीयत में यह भी लिखा है कि मेरी मृत्यु के बाद मेरा शरीर मेरे लखनऊ में रहने वाले हिन्दू दोस्तों को दे दिया जाए।” उन्होंने अपनी मौत के बाद सभी लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की है। गौरतलब है कि जबसे वसीम रिजवी ने अपनी किताब का विमोचन यति नरसिंहानंद से करवाया है और कुरान के खिलाफ कोर्ट में याचिका दी है, तब से एक खास वर्ग उन्हें धमकिायाँ दे रहा है और उनके खिलाफ लगातार धरना प्रदर्शन कर रहा है।
*वसीम रिजवी ने ना अपने गले में लगी नकली रस्सी *इस्लामिक मोहर* को काट फेंका और मानवता के लिए सबसे बहादुरी वाला काम किया, जिसे कहते हैं *सच को दुनिया के सामने लाना, वो भी सीधे डासना मंदिर से, जहां से इस्लाम की कब्र खुदनी शुरू हुई आज उसके ताबूत में आखिरी कील ठोंक दी गई।*समय आ गया है pic.twitter.com/RmHe6ABoyR
मुंबई एनसीबी ने सोमवार (15 नवंबर) को नांदेड़ जिले से 1127 किलोग्राम नशीले पदार्थों की खेप जब्त की है। इसे आंध्र प्रदेश से महाराष्ट्र लाया जा रहा था। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के जोनल डायरेक्टर समीर वानखेड़े ने बताया कि इस मामले में दो संदिग्ध लोगों को पकड़ा गया है, उन्हें कोर्ट में पेश किया जाएगा। टीम इस मामले में दो संदिग्धों से पूछताछ कर रही है। छानबीन में पता चला है कि यह गाँजा आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम से लाया जा रहा था।
Mumbai NCB seized 1127 kgs* consignment this morning in Nanded district. It was being brought from Andhra Pradesh to Maharashtra. Two people intercepted, they will be produced before the court probe on: Narcotics Control Bureau Zonal Director Sameer Wankhede pic.twitter.com/rVPEnqrkpy
वहीं गुजरात आतंकवाद निरोधी दस्ते (एटीएस) ने मोरबी जिले के जिंजुदा गाँव से करीब 600 करोड़ रुपए की 120 किग्रा हेरोइन जब्त की है। इस सिलसिले में तीन लोगों को भी गिरफ्तार किया गया है। डीजीपी आशीष भाटिया ने बताया, खुफिया इनपुट के आधार पर गुजरात एटीएस को पता चला कि ड्रग्स यहाँ लाए जा रहे थे। 120 किलोग्राम हेरोइन बरामद की गई, जिसकी कीमत 600 करोड़ रुपए बताई जा रही है। प्रारंभिक जाँच में पता चला है कि आरोपित हेरोइन की खेप समुद्री मार्ग से लाए थे, जहाँ उन्हें एक पाकिस्तानी नाव से डिलीवरी मिली थी।
ATS apprehended three persons with 120 kg heroin worth Rs 600 crores. Preliminary investigation revealed that the consignment of heroin was brought by the accused via sea route where they had received a delivery from a Pakistani boat: DGP Ashish Bhatia pic.twitter.com/VQ4LEdfnQS
मीडिया से बातचीत में उन्होंने बताया इस मामले में जामनगर के जोदिया निवासी मुख्तार हुसैन, जिंजुडा मोरबी के निवासी शमशुद्दीन हुसैनमिया सैयद और सलाया देवभूमि द्वारका के गुलाम हुसैन उमर भगद को गिरफ्तार किया है। उन्होंने कहा, ”ड्रग की खेप पाकिस्तान निवासी जाहिद बशीर बलूच द्वारा भेजी गई थी। बलूच राजस्व खुफिया निदेशालय द्वारा जब्त की गई 227 किलोग्राम हेरोइन के एक पूर्व मामले में फरार था।”
इंडोनेशिया के संस्थापक और पहले राष्ट्रपति सुकर्णो की पुत्री सुकमावती ने 26 अक्टूबर 2021 को जैसे ही इस्लाम छोड़ हिन्दू धर्म अपनाया, भारत में इंडोनेशिया सुर्खियाँ बटोरने लगा। इंडोनेशिया में हिंदुओं की संख्या 2% से भी कम है और यहाँ के 17 हजार से अधिक द्वीप समूहों में बाली एकमात्र द्वीप है, जहाँ हिन्दू बहुसंख्यक हैं। बावजूद, जिस प्रकार से लोग हिन्दू धर्म में लौट रहे हैं, यह किसी आश्चर्य से कम नहीं।
इंडोनेशिया के हिन्दुओं के पास राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) जैसा कोई सामाजिक संगठन नहीं है। उनके पास भाजपा जैसा कोई राजनीतिक संगठन भी नहीं है। उनके पास ना कोई मठ है, ना कोई मठाधीश। ना कोई अम्बानी है ना अडानी। फिर भी ऐसा लग रहा है मानों विश्व का सबसे अधिक मुस्लिम आबादी वाला देश अब हिन्दू बन जाने को लालायित है।
सत्तर के दशक में सुलावेसी द्वीप के तोराजा लोगों ने हिन्दू धर्म में लौटने के अवसर को सबसे पहले पहचाना था। 1977 में सुमात्रा के कारो एवं बाटाक और 1980 में कालीमंतन के गाजू एवं दायक भी हिन्दू की छत्रछाया में लौट आए। इसके बाद अनेक स्थानीय जिवात्मवादी एवं जनजातीय धर्मों ने भी अपने अस्तित्व की रक्षा एवं इस्लाम और ईसाइयत के दबावों से बचने के लिए स्वयं को हिन्दू घोषित किया। साथ ही सन 1965 की उथल-पुथल के समय स्वयं को मुस्लिम घोषित करने वालों लाखों जनजातीय लोग भी अब हिन्दू धर्म में लौट रहे हैं।
जावा में शिक्षा प्राप्त करनेवाली सुदेवी 1990 में जज बनीं थीं। उनका पालन-पोषण मुस्लिम के रूप में हुआ था, किन्तु उन्होंने भी बाद में हिन्दू धर्म अपना लिया। रवि कुमार ने अपनी पुस्तक ‘इंडोनेशिया में हिंदू पुनरुत्थान’ को दस लाख से अधिक इंडोनेशियाई मुस्लिमों के हिन्दू धर्म में लौटने की कहानी बताई है। इस पुस्तक में उन्होंने उल्लेख किया है कि ‘सन 1999 की एक रिपोर्ट में नेशनल इंडोनेशियन ब्यूरो ऑफ़ स्टेटिस्टिक्स ने माना था कि गत दो दशकों में लगभग 1 लाख जावा निवासी आधिकारिक तौर पर इस्लाम से हिन्दू धर्म में वापस लौट गए हैं।’
इंडोनेशिया में हिंदू पुनरुत्थान के अंश
2017 में जावा की राजकुमारी कांजेंग महेंद्राणी ने भी हिन्दू धर्म अपना लिया था। हाल के वर्षों में सुकर्णों के परिवार से संबंध रखने वाले अनेक लोगों ने हिन्दू धर्म अपनाया है, जिनमें सबसे ताजा नाम ‘सुकमावती’ का है। इंडोनेशिया में ‘सुकमावती’ का जिस प्रकार का कद है, इससे यह भी अंदाजा लगाया जा रहा है कि आगे उनके अनेक अनुयायी भी उनके पीछे हिन्दू धर्म में लौट आएँगे।
तो प्रश्न है इंडोनेशियाई मुसलमान हिन्दू धर्म क्यों अपना रहे हैं?
सुकमावती के हिन्दू धर्म अपनाने के बाद भारतीय मीडिया ने मुख्य रूप से सबदापालन की उस भविष्यवाणी को याद किया जब सन 1478 में उन्होंने मजापहित साम्राज्य के अंतिम शासक ब्रविजय पँचम को इस्लाम कबूलने पर श्राप दिया था कि ‘500 वर्ष बाद प्राकृतिक आपदाओं के दौर में वे पुनः लौटेंगे और हिन्दू धर्म को पुनर्स्थापित करेंगे।’
यह बात सत्य है कि जिस प्रकार से 2004 में आई हिन्द महासागर की सुनामी में 2 लाख से अधिक इंडोनेशियाई नागरिकों की मृत्यु हो गई थी, फिर 2006 में हिन्द महासागर में आए भूकंप के कारण 5 हजार से अधिक लोगों ने जान गँवाई थी, फिर जावा में भूकंप, आदि घटनाओं के कारण वहाँ के निवासी सबदापालन की भविष्यवाणी को बड़ी गंभीरता से ले रहे हैं और ऐसी विपदाओं से बचने के लिए अपने पैतृक हिन्दू धर्म में लौट रहे हैं।
किन्तु सबदापालन के श्राप और भविष्यवाणी के अलावा कुछ अन्य गंभीर कारण भी हैं जिन्हें अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए। यहाँ जो सबसे पहला कारण सामने आता है, वह है इंडोनेशियाई लोगों में वास्तविक इतिहास का बोध एवं अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान। जाने-माने प्रोफ़ेसर शंकर शरण जी ने एक समय कहा था कि ‘भारतीय मुसलमानों के सामने यदि उनका वास्तविक इतिहास रख दिया जाए तो दूसरे ही क्षण वे सभी इस्लाम का त्याग कर देंगे।’
यद्यपि स्वतंत्रता के 70 वर्ष बाद भी हिन्दू बहुल भारतीय राज्य यह करने में सक्षम नहीं हो पाया है किन्तु मुस्लिम बहुल इंडोनेशिया ने यह कर दिखाया है। यहाँ मजपहित साम्राज्य एवं अन्य हिन्दू साम्राज्यों की उपलब्धियों पर बहुत बल दिया जाता है। ‘गजह मद’ जैसे हिन्दू सेनापति यहाँ के नेशनल हीरो हैं। यहाँ के मुस्लिमों को ज्ञात है कि उनके पूर्वज तुर्क या अफ़ग़ानिस्तान से आए लुटेरे नहीं अपितु सर्वधर्म समभाव रखने वाले हिंदू थे। इसलिए अपने इतिहास के मूल धर्म में जाना और अपने पूर्वजों के धर्म को अपनाना यहाँ गौरव का विषय बन गया है।
दूसरा बड़ा कारण है, यहाँ की संस्कृति में रामायण और महाभारत का प्रभाव। सुकर्णो के समय में पाकिस्तान के एक प्रतिनिधिमंडल को इंडोनेशिया में रामलीला देखने का मौका मिला। प्रतिनिधिमंडल में गए लोग इससे हैरान थे कि एक इस्लामी गणतंत्र में रामलीला का मंचन कैसे हो रहा है। यह सवाल उन्होंने सुकर्णो से भी किया। सुकर्णो ने तुरंत जवाब दिया कि ‘इस्लाम हमारा मजहब है और रामायण हमारी संस्कृति।’
यह कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं कि इंडोनेशिया के मुस्लिम रामायण और महाभारत अनेक भारतीयों से भी अधिक जानते हैं। यहाँ के लोगों की मानसिकता के साथ-साथ रग-रग में इन दो महाकाव्यों के पात्र बसे हुए हैं। यहाँ घर-घर में रामायण और महाभारत का पाठ होता है। यहाँ रामायण एवं महाभारत के चरित्रों के आधार पर नाम रखना बहुत ही आम बात है। यहाँ इन चरित्रों का उपयोग स्कूली शिक्षा के लिए भी होता है। साथ ही यहाँ वर्ष भर रामायण एवं महाभारत पर कार्यक्रम होते रहते हैं। इंडोनेशिया की रामलीला विश्वभर में प्रसिद्ध है।
रामायण एवं महाभारत के इस प्रभाव के कारण इंडोनेशियाई मुस्लिम हिन्दू धर्म के प्रति आकर्षित हो रहे हैं। साथ ही आज इंडोनेशिया के मुस्लिम मुसलमान कुरान भी पढ़ रहे हैं एवं दूसरी ओर रामायण और महाभारत भी। हिंदी के प्रसिद्द विद्वान फादर कामिल बुल्के ने 1982 में अपने एक लेख में लिखा था, “35 वर्ष पहले मेरे एक मित्र ने जावा के किसी गाँव में एक मुस्लिम शिक्षक को रामायण पढ़ते देखकर पूछा कि आप रामायण क्यों पढ़ते हैं? तो उन्हें उत्तर मिला कि मैं और अच्छा मनुष्य बनने के लिए रामायण पढ़ता हूँ।”
तीसरा, यहाँ जिस प्रकार से खुदाई के दौरान हिन्दू मंदिर मिल रहे हैं, इससे जनता में हिन्दू धर्म के प्रति एक कौतूहल एवं जिज्ञासा उत्पन्न हो रही है। भारत में हिंदुओं को अपना एक राम मंदिर बनाने के लिए मुस्लिम समुदाय से एक लंबा संघर्ष करना पड़ा, किन्तु इसके विपरीत इंडोनेशिया के मुस्लिमों ने हिन्दू एवं बौद्ध मंदिरों को वहाँ की धरती में से खोज निकाले हैं और उन्हें फिर से खड़ा करके पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रहे हैं।
जावा में 15 बड़े हिन्दू मंदिर खोजे गए हैं, जिनमें परबनन शिव मंदिर और बोरोबुदुर बौद्ध विहार मुख्य हैं। अकेले बाली द्वीप में 20,000 से अधिक मंदिर हैं जो अपने आप में बहुत बड़ी बात है। इसके अतिरिक्त जकार्ता और अन्य द्वीपों में भी ऐसे बहुत से मंदिर खोजे गए हैं जिस कारण इंडोनेशिया के मुस्लिम लगातार हिन्दू धर्म से अपना जुड़ाव अनुभव कर पा रहे हैं और यही अनुभव उन्हें हिन्दू धर्म में लौटने की प्रेरणा दे रहा है।
चौथा और सबसे महत्वपूर्ण कारण जिस पर बहुत कम लोगों का ध्यान जाता है वह है इंडोनेशिया में भी बढ़ रही इस्लामिक कट्टरता। इस बात में कोई दो राय नहीं कि इंडोनेशिया के मुस्लिम सुल्तान हिन्दुओं को बलपूर्वक मुस्लिम बनाने में सफल रहे, किन्तु यहाँ चूँकि मुस्लिम शासकों की सत्ता बहुत कम समय तक ही रही इसलिए नए-नए मुस्लिमों का उस हद तक इस्लामीकरण नहीं हो पाया जितना भारत में हुआ। यही कारण है कि उपासना पद्धति और कुछ छोटे-मोटे रिवाज बदलने के बावजूद यहाँ के लोग हिन्दू संस्कृति में ही बने हुए हैं।
किन्तु अब जैसे-जैसे समय जा रहा है यहाँ भी कट्टरवादी ताकतें सक्रिय हो रही हैं। नतीजन यहाँ भी हिन्दू -मुस्लिम के बीच तनाव और आतंकवाद पग पसारने लगा है। 2002 में बाली द्वीप में अब तक के सबसे घातक आतंकी हमले में 240 लोगों की मौत हो गई थी। 2005 में एकबार फिर श्रृंखलाबद्ध आत्मघाती धमाकों में 26 लोगों की मौत हो गई और 100 से अधिक घायल हो गए।
इंडोनेशिया में हिंदू पुनरुत्थान के अंश
बाली बम धमाकों के दोषी अब्दुल अजीज ने स्वीकार किया था कि बाली द्वीप को हिन्दू बहुल होने के कारण ही हमलों के लिए चुना गया था। 2012 में सुमात्रा द्वीप के हिन्दुओं पर स्थानीय मुस्लिमों ने हमला किया, जिसमें 14 की मौत हो गई थी और 1000 से अधिक हिन्दू बेघर हो गए थे। इस प्रकार की इस्लामिक कट्टरता के चलते यहाँ के लोगों को भी अब वास्तविक कारण समझ आ रहा है। इंडोनेशिया में मज़बूत हो रही वहाबी विचारधारा के कारण यहाँ के लोगों का इस्लाम से विश्वास उठता जा रहा है और वे हिन्दू धर्म की ओर लौट रहे हैं।
उत्तर प्रदेश के आगरा जिले से एक लव जिहाद के प्रयास का मामला सामने आया है। यहाँ कमला नगर थाना क्षेत्र में रहने वाली एक छात्रा को मोहम्मद अनस ने अन्नू नाम से गुमराह कर अपने जाल में फँसाने का प्रयास किया। जब छात्रा ने मना कर दिया तब उसको जान से मारने की धमकी देने लगा। शिकायत के बाद पुलिस ने इस मामले में FIR दर्ज कर ली है। आरोपित को 15 नवम्बर 2021 (सोमवार) को गिरफ्तार कर लिया गया है।
थाना कमला नगर क्षेत्र अंतर्गत सोशल मीडिया एवं अन्य माध्यम से छेड़छाड़ की सूचना पर प्राप्त तहरीर के आधार पर त्वरित अभियोग पंजीकृत कर, आरोपी को गिरफ्तार करते हुए, की जा रही वैधानिक कार्यवाही के संबंध में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक आगरा द्वारा दी गई बाइट। pic.twitter.com/G2WbXpfWf8
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, आरोपित के धमकाने के बाद छात्रा स्कूल तक जाने से घबराने लगी। मिली जानकारी के अनुसार कक्षा 10 में पढ़ने वाली छात्रा ने इंस्टाग्राम पर अपना अकाउंट बना रखा था। वहाँ अन्नू नाम रखकर अनस लड़की का फॉलोवर बन गया था। उसके बाद वह छात्रा की हर पोस्ट पर कमेंट करने लगा। उसने छात्रा का इंस्टाग्राम से किसी तरह नंबर भी हासिल कर लिया। जब वह स्कूल या कोचिंग जाती, तब आरोपित छात्रा को प्रपोज करता।
जब छात्रा अनस के झाँसे में नहीं आई तो वो जान से मारने की धमकी देने लगा। इस डर से छात्रा ने क्लास जाना छोड़ दिया और घर में रहकर ऑनलाइन क्लास करने लगी। छात्रा के पिता ने अपनी बेटी को डरा-सहमा देखा तो इसका कारण पूछा। पिता को सच्चाई बताते हुए छात्रा रोने लगी।
पिता के अनुसार, उन्होंने बेटी से अनस को मिलने के लिए मैसेज करवाया, लेकिन वह नहीं आया। इसके बाद छात्रा के पिता ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई। आरोपित अनस छत्ता के गरीब नगर का रहने वाला है। छात्रा के पिता का कहना है कि आरोपित ने मामले को रफा-दफा करने के लिए अपने एक परिचित कॉन्स्टेबल से फोन भी कराया था।
उत्तर प्रदेश सरकार लखीमपुर खीरी हिंसा मामले में रिटायर्ड जज की निगरानी में जाँच के लिए तैयार है। प्रदेश सरकार की तरफ से पेश वकील हरीश साल्वे ने सोमवार (15 नवंबर 2021) को यह बातें कही। इस पर संज्ञान लेते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना, न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति हेमा कोहली की पीठ ने मामले को बुधवार (17 नवंबर 2021) के लिए सूचीबद्ध कर दिया है। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट में लखीमपुर खीरी हिंसा मामले में मुख्य आरोपित केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा के बेटे आशीष मिश्रा और दो अन्य की जमानत याचिका पर सुनवाई हो रही थी।
सोमवार को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लखीमपुर हत्याकांड की जाँच कर रहे अधिकारियों को अपग्रेड किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से वरिष्ठ अधिकारियों की सूची भी माँगी। जिसके बाद यूपी सरकार ने जाँच का नेतृत्व करने के लिए हाईकोर्ट के एक रिटायर्ड जज का चुनाव करने के लिए सुप्रीम कोर्ट से कहा। कोर्ट ने कहा कि नामों पर विचार करने के लिए उसे एक दिन की जरूरत है।
इसके अलावा कोर्ट ने जाँच टीम में अधिकारियों के स्तर को लेकर चिंता जाहिर की। मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना ने कहा, “चिंता यह है कि आपको मामले की जाँच कर रहे टीम को अपग्रेड करना होगा। इसमें उच्च ग्रेड के अधिकारियों की होने की जरूरत है।”
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने भी इस पर सहमति व्यक्त करते हुए कहा, “मौजूदा एसआईटी में ज्यादातर अधिकारी लखीमपुर से ही हैं। आप हमें उन आईपीएस अधिकारियों के नाम बताएँ जो यूपी कैडर से हैं लेकिन यूपी से संबंधित नहीं हैं।”
उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी के तिकुनिया इलाके में तीन अक्टूबर को हिंसा के दौरान चार किसान, एक पत्रकार समेत आठ लोगों की मौत हो गई थी। मामले में केंद्रीय गृह राज्यमंत्री के बेटे आशीष मिश्र समेत 20 अज्ञात लोगों के खिलाफ बलवा, हत्या के आरोप में मुकदमा दर्ज किया गया था। इस मामले में 13 आरोपित जेल में हैं। दूसरे पक्ष से सभासद सुमित जायसवाल की तहरीर पर अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया था।
सुमित जायसवाल ने मुकदमे में आरोप लगाया था कि प्रदर्शन कर रहे किसानों के बीच मौजूद कुछ अराजक तत्वों ने लाठियों और ईंट-पत्थरों से वाहन पर हमला किया जिसकी वजह से चालक हरिओम घायल हो गया और उसने सड़क के किनारे कार रोक दी। इसके बाद पत्रकार रमन कश्यप, कार चालक हरि ओम और बीजेपी कार्यकर्ताओं शुभम मिश्रा तथा श्यामसुंदर को प्रदर्शनकारियों ने पीट-पीटकर मार डाला।
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के जंबूरी मैदान में सोमवार (15 नवंबर) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आदिवासी समुदाय से ताल्लुक रखने वाले महान स्वतंत्रता सेनानी बिरसा मुंडा की जयंती पर उन्हें पुष्पांजलि अर्पित की। जनजातीय गौरव कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने सभी लोगों को बिरसा मुंडा के जन्मदिन की शुभकामनाएँ दीं। इस मौके पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, राज्यपाल मंगूभाई पटेल सहित कई नेता मौजूद रहे। साथ ही प्रधानमंत्री ने रानी कमलापति रेलवे स्टेशन का लोकार्पण भी किया। पहले इस स्टेशन का नाम हबीबगंज रेलवे स्टेशन था, जिसे अब बदल दिया गया है।
पीएम मोदी ने अपने संबोधन में कहा, ”आज का दिन पूरे देश के लिए बहुत बड़ा दिन है। आज भारत अपना पहला जनजातीय गौरव दिवस मना रहा है। आजादी के बाद देश में पहली बार इतने बड़े पैमाने पर पूरे देश के जनजातीय समाज की कला, संस्कृति, स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्र निर्माण में उनके योगदान को गौरव के साथ याद किया जा रहा है।” उन्होंने कहा कि आजादी के बाद की सरकारों ने आदिवासियों की समृद्ध विरासत के बारे में देश को नहीं बताया।
Madhya Pradesh: PM Narendra Modi pays floral tribute to tribal freedom fighter #BirsaMunda and greets people at Janjatiya Gaurav Diwas Mahasammelan in Bhopal. pic.twitter.com/QKCiAfTzdA
उन्होंने कहा कि अपने जीवन के महत्वपूर्ण कालखंड को वे आदिवासियों के बीच बिताएँ हैं। जीवन जीने का कारण, जीवन जीने के इरादे को आदिवासी परंपरा बखूबी प्रस्तुत करती है। पीएम ने अपने संबोधन में कहा कि जल जीवन मिशन के तहत 30 लाख परिवारों को अब नल से जल मिलना शुरू हो गया है। इनमें ज्यादातर इलाके जनजातियों के हैं। पहले की तरह हमारी बहन-बेटियों को अब पानी के लिए परेशान नहीं होना पड़ता है। पहले केवल बहाने बनाए जाते थे कि आम लोगों तक सुविधाएँ पहुँचाना मुश्किल है। ऐसा कहकर आदिवासियों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाता था।
Rani Kamlapati was forgotten. Neither the Britishers nor Congress gave her an appropriate position in history. But PM Narendra Modi renamed Habibganj Railway Station after Rani Kamlapati: Madhya Pradesh CM Shivraj Singh Chouhan pic.twitter.com/MBXSPF3wHa
वहीं, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जनजातीय गौरव दिवस और हबीबगंज रेलवे स्टेशन का नाम रानी कमलापति के नाम करने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को धन्यवाद दिया। उन्होंने कॉन्ग्रेस पार्टी पर हमला करते हुए कहा, ”पुरानी सरकारों ने सिर्फ एक परिवार को महिमामंडित किया, बल्कि आदिवासियों के योगदान को अपने षड्यंत्र से भुलाया। प्रधानमंत्री जी ने जनजातीय गौरव दिवस की घोषणा करके भारत माता का कर्ज उतारा है।” उन्होंने आगे कहा, ”भोपाल केवल नवाबों का इतिहास नहीं था, बल्कि अफगानी लुटेरे दोस्त मोहम्मद ने गोंड रानी कमलापति को इतना परेशान किया कि उन्हें जल समाधि लेना पड़ी। पीएम मोदी ने ऐसी रानी के नाम को सम्मान देकर अभूतपूर्व काम किया है।”
राजस्थान में जयपुर पुलिस को कुख्यात छैमार गैंग के विरुद्ध बड़ी सफलता हाथ लगी है। पुलिस ने डकैती, हत्या और लूट जैसे संगीन अपराधों में शामिल इस गैंग के 9 सदस्यों को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तार आरोपितों में साहिब खान उर्फ़ शेफ अली उर्फ़ मुनाजिर भी शामिल है। साहिब खान पर उत्तर प्रदेश पुलिस की STF यूनिट ने 25 हजार रुपए का इनाम भी घोषित कर रखा है। साहिब खान उर्फ़ मुनाजिर का अब्बा आदिल उर्फ़ शेर खान भी गिरफ्तार किया गया है। छापेमारी 11 और 12 नवम्बर 2021 को की गई।
यह कार्रवाई जयपुर कमिश्नरेट की CAT टीम, मानसरोवर थाना मुहाना और शिप्रा पथ थाना पुलिस ने मिल कर की। इन टीमों ने मिलकर एक वृहद सर्च अभियान छेड़ा था। जयपुर पुलिस कमिश्नरेट में डीसीपी (क्राइम) डॉ. अमृता दुहान के मुताबिक, क्राइम ब्रांच टीम को संदिग्धों की सूचना मिली थी। इस अभियान में कुल 54 संदिग्धों को पकड़ा गया था। यह अभियान शहर में होने वाले अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए डेरों और कच्ची बस्तियों में छेड़ा गया था। इसी सर्च अभियान के दौरान छैमार गिरोह के सदस्य गिरफ्तार किए गए हैं। बाकी संदिग्धों से भी पूछताछ जारी है।
छैमार गिरोह के गिरफ्तार आरोपितों के नाम आदिल उर्फ शेर खान, साहिब उर्फ सैफ अली, करीम खान, मादिल उर्फ मोहिन खान, सावेश खान, माजिद अली, आमिर उर्फ जाहिर, शाहिद खान, नदीम उर्फ बॉबी हैं। आदिल उर्फ शेरखान उत्तर प्रदेश का निवासी है। वह जयपुर के मानसरोवर के पास एक कब्रिस्तान के बगल छुपा हुआ था। गिरोह के सरगना साहिब को UP की औरैया पुलिस को सौंप दिया गया है।
जयपुर के अतिरिक्त पुलिस आयुक्त अजयपाल लांबा ने इनकी आपराधिक कार्यशैली की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि ये समूह घटना से पहले रात 9 से 10 बजे के बीच अपने लक्ष्य के आसपास एक सुनसान जगह पर मीटिंग करते हैं। वहीं पर ये सभी माँस और मदिरा का सेवन करते हैं। इसके बाद ये समूह एक हरे पेड़ से लकड़ियों को काटकर उसकी पूजा करते हैं। ये रात लगभग 2 बजे अपने टारगेट वाले घर में घुसते हैं। एक सदस्य छत से जा कर मुख्य द्वार खोलता है। फिर गिरोह के सारे सदस्य भी अंदर घुस जाते हैं।
जानकारी के मुताबिक यह छैमार गिरोह उत्तर प्रदेश के सहारनपुर मुरादाबाद, अयोध्या, सम्बल, अमरोहा, फर्रूखाबाद और कानपुर के आस-पास डेरा डाल कर रहता है। भारत भर में घूमने के लिए ये ट्रेनों का इस्तेमाल करते हैं। छैमार गैंग 2 भागों में बँटा हुआ है। पहला पंजाबी भाषा में बात करने वाला पंजाबी छैमार और दूसरा पूरविया छैमार। छैमार गैंग में वही मुखिया बनता है जो कम-से-कम 6 हत्याएँ करता निर्धारित किए गए हैं। ये अपना निशाना घर के गेट पर शुभ विवाह और आपका हार्दिक स्वागत जैसे शब्द लिखा दे कर तय करते हैं। इसी के आधार पर ये घर में पैसे, जेवर आदि का अनुमान लगाते हैं। गिरफ्तारी के बाद ये जमानत में भी फर्जी कागज़ात लगा लेते हैं और अपना डेरा दूसरी जगह लगा लेते हैं।
छैमार गिरोह के सरगना फाती उर्फ कदीम उर्फ अशद खान को बुधवार (11 अगस्त 2021) को यूपी एसटीएफ ने गिरफ्तार किया था। तब फाती ने बताया था कि जिस भी शहर में उसे डकैती करनी होती थी तो उस इलाके में ये महिलाओं से भिखारी का वेश बनाकर रेकी करवाते थे और बाद में वारदात को अंजाम देते थे। रिपोर्ट के मुताबिक, 1997 में राजस्थान में इस गिरोह ने 7 लोगों की हत्याएँ की थी, जिसमें 2 बच्चे भी शामिल थे। एसटीएफ के खुलासे में बताया गया था कि यह गिरोह अब तक 200 लोगों की हत्याएँ कर चुका है। फाती ने दावा किया था कि वो केवल 15 दिनों में ही अपना गिरोह फिर से तैयार कर सकता है।
महाराष्ट्र के मालेगाँव, नांदेड़ और अमरावती जिलों में अल्पसंख्यकों के अधिकारों के संरक्षण की माँग की आड़ में जो कुछ भी हुआ वह पूरे देश ने देखा। प्रशासन को ज्ञापन देने के नाम पर जमा की गई अनियंत्रित (या फिर मुस्लिम संगठन द्वारा नियंत्रित?) भीड़ ने जो किया वह देश के सामने है। साथ ही सामने है सांप्रदायिक शक्तियों के आगे झुकने वाली राज्य सरकार, सत्ताधारी दलों के नेताओं द्वारा किसी तथाकथित साजिश के नाम पर जारी किए जाने वाले बयान और महाराष्ट्र प्रशासन की बेबसी जो पिछले कई वर्षों में बार-बार दिखाई दी है। जो भी हुआ वह हर तरह से न केवल सरकार, समाज, संविधान और कानून के विरुद्ध था बल्कि वर्तमान प्रशासन की क्षमता और संविधान की रक्षा के प्रति उसके दृष्टिकोण और वचनबद्धता को भी दर्शाता है।
शुक्रवार 12 नवंबर, 2021 के दिन जो हुआ वह अचानक नहीं हुआ। यह रज़ा अकादमी, अन्य संगठनों और व्यक्तियों द्वारा पूर्व घोषित था। पहले से वायरल हो रहे वीडियो वगैरह में बाकायदा इस बात की घोषणा की गई थी कि लोग दुकानें अपनी जिम्मेदारी पर खोलें क्योंकि भीड़ चाहती है कि सबकुछ बंद रहे। आखिर प्रशासन के लिए हिंसा का पूर्वानुमान लगाया जाना संभव क्यों नहीं था? वैसे भी भीड़ जमा करके उसे अनियंत्रित छोड़ने का रजा अकादमी जैसे मुस्लिम संगठनों का रिकॉर्ड पुराना है। ऐसा भी नहीं था कि रजा अकादमी महाराष्ट्र की धरती पर पहली बार भीड़ जमा करने वाली थी। आखिर आज़ाद मैदान में इसी संगठन ने अगस्त 2012 में जो कुछ भी किया और करवाया था उसे बीते अभी एक दशक नहीं हुए हैं।
इसबार इन जिलों में रजा अकादमी ने त्रिपुरा में अल्पसंख्यकों पर हुए तथाकथित जुल्म को आगे रखकर लोगों को जमा किया था। प्रश्न यह है कि जिस विषय या घटना को आगे रखकर यह भीड़ जमा की गई क्या वह विषय प्रासंगिक था? स्मरण रहे कि त्रिपुरा की सरकार और स्थानीय प्रशासन ने 29 अक्टूबर को जिम्मेदारी के साथ यह घोषणा की थी कि जिस मस्जिद के जलाए जाने की अफवाहें उड़ाई गई हैं उस मस्जिद को किसी तरह का कोई नुकसान नहीं हुआ है और ये अफवाह झूठी थी। 29 अक्टूबर और 12 नवंबर के बीच इस लंबे अंतराल में रजा अकादमी के लिए यह समझना क्या वाकई मुश्किल था कि त्रिपुरा में अल्पसंख्यकों पर हुए जुल्म की अफवाह झूठी है? क्या अकादमी के लिए त्रिपुरा सरकार की घोषणा पर विश्वास न करने का कोई कारण था?
प्रश्न यह है कि त्रिपुरा सरकार और स्थानीय प्रशासन की घोषणा के बाद इस भीड़ को जमा करने का क्या तुक था? जब देश एक महामारी से दो-चार हो रहा है तब प्रशासन को ज्ञापन देने के लिए आठ हज़ार लोगों को जमा करना किस हद तक तार्किक है? और यदि रजा अकादमी ने ऐसा कुछ करने की घोषणा कर भी दी थी तो महाराष्ट्र सरकार और इन जिलों में स्थानीय प्रशासन ने बातचीत करके इस भीड़ को जमा होने से रोकने का प्रयास क्यों नहीं किया? स्थानीय स्तर पर रजा अकादमी जैसे संगठन से सामयिक और उचित प्रश्न पूछना इतना दुर्लभ क्यों है? या फिर स्थानीय प्रशासन के लिए ऐसा करना कहीं इसलिए तो मुश्किल नहीं कि अकादमी को किसी तरह का राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है?
ऐसे प्रश्नों के पीछे कारण हैं। दरअसल सच यह है कि वर्तमान महाराष्ट्र सरकार रजा अकादमी की जायज़-नाजायज़ माँगों को हाल के वर्षों में लगातार कान देती रही है। अकादमी के लोग मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और अन्य नेताओं से बार-बार मिलते रहे हैं। शायद यही कारण है कि संगठन समय-समय पर किसी न किसी बहाने महाराष्ट्र में अपनी ताक़त दिखाता रहा है। अगस्त 2012 में म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों पर होने वाले जुल्म को आगे रखकर विरोध के नाम पर जमा भीड़ ने कैसे आज़ाद मैदान में दंगा किया यह देश को अभी तक याद है। सऊदी अरब में सिनेमा हाल खुलने के विरोध से लेकर फ्रांस के राष्ट्राध्यक्ष के खिलाफ फतवा जारी करने की माँग हो, CAA और NRC का विरोध, COVID प्रोटोकॉल को लचीला बनाकर मस्जिद खोलने की माँग हो या उस दौरान जुलूस निकालने की, यह संगठन हर मुद्दे पर माँगों के बहाने अपनी ताक़त दिखाने का कोई मौका हाथ से जाने नहीं देना चाहता।
यह सरकार द्वारा बार-बार माँगे सुनने का असर ही है जो रजा अकादमी के नेताओं को अपनी जायज-नाजायज माँगे बार-बार रखने के लिए प्रेरित करता है। वैसे संगठन का नाम इसके अकादमिक संगठन होने का आभास देता है पर सच यह है कि इसके द्वारा जमा की गई भीड़ ने समय-समय पर जिस तरह का आचरण किया है उससे निपटना सरकार और प्रशासन के लिए चुनौती साबित हुआ है। शायद यही कारण है कि संगठन बार-बार सरकार की बाँह ऐंठने में कामयाब होता दिखाई देता है। पर प्रश्न यह है कि इन सब के बीच कानून और संवैधानिक व्यवस्था तथा सांप्रदायिक वातावरण का भविष्य कैसा दिखाई देता है? यह ऐसा प्रश्न है जो महाराष्ट्र की राज्य सरकार से इसलिए किया जाएगा क्योंकि वह बार-बार इसके आगे लाचार दिखाई देती रही है।
इस प्रश्न का उत्तर संवैधानिक और कानून व्यवस्था का भविष्य तय करेगा।
जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में वामपंथी छात्रों ने 14 नवंबर 2021 को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के छात्रों से बुरी तरह मारपीट की। इस घटना में ABVP के कई कार्यकर्ता घायल हो गए। उधर SFI की अध्यक्ष आइशी घोष ने हमले के लिए एबीवीपी को जिम्मेदार ठहराया। इस पूरी घटना में 10 से ज्यादा लोगों के घायल होने की खबर है। संगठन की राष्ट्रीय सचिव निधि त्रिपाठी ने बताया कि ये हमला बैठक के दौरान हुआ। इसमें एक कार्यकर्ता की ऊंगली तोड़ी गई और एक दिव्यांग को भी मारा गया।
जेएनयू में बैठक कर रहे अभाविप कार्यकर्ताओं पर हमला कर वामपंथियों ने एक बार फिर अपना असली चेहरा दिखाया है। अभाविप, जेएनयू में कार्यकर्ताओं पर हुए हमले की कड़ी निन्दा करते हुए जेएनयू प्रशासन और @DelhiPolice से ऐसे अराजक व गुंडा तत्वों पर कठोर कार्रवाई करने की मांग करती है। pic.twitter.com/qcGycOcG44
कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, एबीवीपी छात्रों पर 100-200 के करीब वामपंथियों ने हमला बोला। जिसके बाद 10 छात्र घायल हो गए। एबीवीपी की जेएनयू ईकाई के अध्यक्ष शिवम ने बताया कि वो लोग शेड्यूल मीटिंग के लिए इकट्ठा हुए थे। लेकिन वामपंथी वहाँ रात 9:45 पर घुसे और कहने लगे कि उनकी मीटिंग वहाँ होगी। इस पर एबीवीपी की ओर से कहा गया कि वो लोग मीटिंग खत्म करके चले जाएँगे लेकिन उसके बाद वामपंथी नहीं मानें और खुद को कमरे का मालिक बताने लगे। इसके बाद ‘ढपली वाले ग्रुप’ ने एबीवीपी कार्यकर्ताओं पर हमला किया।
शिवम ने बताया कि जैसे 5 जनवरी को होस्टल कैंपस में घुस कर मारपीट की गई थी वैसे ही इस बार भी हुआ है। उनके मुताबिक ये लोग जहाँ भी बहुसंख्यक होते हैं वहाँ यही होता है। उनके ऊपर 5 जनवरी बाद बार-बार ऐसे अटैक हो रहे हैं। उनकी माँग है कि पुलिस प्रशासन इस पर संज्ञान ले और घायलों को न्याय दिलाए।
एबीवीपी के मुताबिक वामपंथियों ने महिलाओं और दिव्यांगों पर हमला किया। इस घटना में संगठन से जुड़ी श्रीदेवी और दिव्यांग अंकित पर अटैक हुआ। वहीं कन्हैया और अभिषेक नाम के छात्र गंभीर रूप से घायल बताए जा रहे हैं।
बता दें कि घटना की बाबत ऑपइंडिया ने शिवम चौरसिया से बात की। उन्होंने सारी घटना विस्तार से बताकर कहा कि वामपंथी उन लोगों के सामने आरएसएस मुर्दाबाद, एबीवीपी मुर्दाबाद, एबीवीपी कैंपस छोड़ो के नारे लगा रहे थे। वह लोग संगठन के नए सदस्यों को डरा धमका रहे थे।
ABVP'S GOONS UNLEASHED VIOLENCE IN JNU TODAY.
Time and again these criminals have unleashed violence on students and have disrupted campus democracy.
Will the JNU Administration still be silent ? Will no actions be taken on the goons ?
इस पूरे हमले की घटना में स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) की नेता और जेएनयू छात्र संघ की अध्यक्ष आइशी घोष ने बयान जारी किया है। घोष के मुताबिक पूरी हिंसा एबीवीपी वालों ने की और कैंपस लोकतंत्र को बाधित किया। उन्होंने एबीवीपी कार्यकर्ता को गुंडा बताया और पूछा कि क्या जेएनयू प्रशासन अब भी कार्रवाई नहीं करेगा।