ओडिशा हाई कोर्ट ने एक नाबालिग लड़की का लगातार रेप करने वाले एक शख्स को अंतरिम जमानत दे दी है। आरोपित ने लड़की को 2 बार प्रेग्नेंट भी कर दिया था। उसका जबरदस्ती गर्भपात भी करवाया गया। अब कोर्ट ने पीड़िता से निकाह करने के लिए ही आरोपित को अंतरिम जमानत दी है।
ओडिशा हाई कोर्ट में ने 26 साल के आरोपित युवक हामिद को एक महीने के लिए यह अंतरिम जमानत दी है। ओडिशा हाई ने कहा है कि दोनों का रिश्ता किसी दबाव से नहीं बल्कि आपसी सहमति से बना था। हाई कोर्ट ने कहा है कि निकाह करने और जमानत खत्म होने के बाद हामिद को वापस लौटना होगा।
कोर्ट का कहना है कि दोनों के परिवार वाले उनकी शादी के लिए राजी हैं, इसलिए उसको जमानत दी जा रही है। ओडिशा हाई कोर्ट ने यह भी कहा है कि इस दौरान लड़की के लगाए आरोपों पर जाँच चलती रहेगी।
ओडिशा हाई कोर्ट ने यह फैसला सुनाने के दौरान किशोरों के प्रेम संबंध को लेकर टिप्पणियाँ भी की और POCSO के मामलों के विषय में भी बताया। हाँलाकि मामले की गंभीरता को समझते हुए जाँच लगातार जारी रहेगी।
क्या था मामला?
आरोपित को POCSO एक्ट के तहत 2023 में गिरफ्तार किया गया था। महिला का आरोप था कि 2019 में उसने शादी का वादा किया था और उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए थे। महिला ने बताया कि 2020 और 2022 में वह दो बार प्रेग्नेंट भी हुई थी, लेकिन उसने जबरदस्ती उसका गर्भपात करा दिया।
आरोपित के खिलाफ इसके बाद POCSO का मामला दर्ज हुआ था। आरोपित ने खुद को निर्दोष बताया और कहा कि पीड़िता से शादी करने से इंकार करने के बाद उसे झूठे केस में फँसाया जा रहा है। कुछ दिनों पहले आरोपित ने अंतरिम जमानत के लिए कोर्ट में अर्जी देते हुए कहा कि उसके और पीड़िता के परिवार वाले चाहते हैं कि उसकी शादी हो जाए।
हाई कोर्ट ने क्या कहा?
ओडिशा हाई कोर्ट ने इस सुनवाई के दौरान जमानत देते हुए कहा कि POCSO अधिनियम का उद्देश्य किशोरों की आपसी सहमति से बने प्रेम संबंधों को अपराध बनाना नहीं, बल्कि उसका उद्देश्य नाबालिगों की सुरक्षा और यौन शोषण पर रोक लगाना है।
फैसला सुनाते हुए जस्टिस संजीव कुमार पाणिग्रही ने कहा कि इस मामले में कानून को मशीनी तरीके से ना लागू किया जाए बल्कि सही दृष्टिकोण अपनाया जाए। हाई कोर्ट ने यह इस आधार पर कहा क्योंकि पीड़िता और आरोपित की उम्र आस-पास है और उनके बीच संबंध आपसी सहमति से बना था।
ओडिशा हाई कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में कभी कभार परिवार इसलिए केस दर्ज करवाते हैं क्योंकि उन्हें सामाजिक मूल्यों का भय होता है ना कि असल में अपने बच्चे की चिंता। हाई कोर्ट ने कहा कि कानून कभी-कभार परिवारों की लड़ाई का हथियार बन जाता है।
बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने मोदी सरकार के 11 साल पूरे करने पर सरकार की उपलब्धियाँ गिनवाईं। उन्होने कहा कि सरकार ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास’ के मंत्र के साथ आगे बढ़ रही है। पीएम मोदी ने देश की राजनीतिक संस्कृति को बदला है और नीतियों में परफॉर्म, रिफॉर्म और ट्रांसफॉर्म तीनों दिखता है।
पाकिस्तान को दिया मुँह तोड़ जवाब
जेपी नड्डा ने कहा, “जब उरी की घटना घटी तब पीएम मोदी ने कहा था, इसका जवाब दिया जाएगा और उसके बाद सर्जिकल स्ट्राइक हुई। पुलवामा की घटना घटी तो पीएम मोदी ने कहा था कि बहुत बड़ी गलती कर दी और इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा और बालाकोट एयर स्ट्राइक हुई। जब पहलगाम की घटना घटी, तब पीएम मोदी ने बिहार में कहा था कि कल्पना से परे जवाब दिया जाएगा और ऑपरेशन सिंदूर के माध्यम से आतंकियों के 9 ठिकाने ध्वस्त कर दिए गए।”
On the occasion of #11YearsOfSeva, I Inaugurated a special exhibition at the BJP Headquarters in New Delhi that highlights the game changing decisions and achievements that have defined the Modi government's journey over the past eleven years.
बीजेपी अध्यक्ष के मुताबिक, “बीते एक दशक में मोदी सरकार ने समाज के सभी वर्गों की चिंता की। महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए कई योजनाएँ चलाई गई। पायलट से आर्मी में कमीशन तक, सैनिक स्कूलों में दाखिले से लेकर एनडीए में भर्ती तक, लखपति दीदी से लेकर SHGs को प्रमोट करने तक हर क्षेत्र में मोदी सरकार में महिलाओं और SC-ST-OBC सभी को मुख्यधारा से जोड़ा है।”
बीते एक दशक में हमारी सरकार ने समाज के सभी वर्गों की चिंता की है।
हमने Women-Led Development को आगे बढ़ाया है। महिलाओं को पायलट बनाने से लेकर आर्मी में कमीशन देने तक, सैनिक स्कूलों में दाखिले से लेकर NDA में भर्ती तक, लखपति दीदी से लेकर SHGs को प्रमोट करने तक… मोदी सरकार में… pic.twitter.com/g2bdRzojzE
जेपी नड्डा ने कहा कि मोदी सरकार प्रो एक्टिव रही है। दूसरे देशों में आपदा की स्थिति में भारतीयों की सुरक्षित वापसी मोदी सरकार ने कराई। वहीं कोविड-19 महामारी के समय स्वदेशी वैक्सीन का निर्माण कर करोड़ो नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित की।
धारा 370 को अलविदा किया गया
पिछले 11 सालों में मोदी सरकार ने कई बोल्ड डिसीजन लिए हैं। “जम्मू कश्मीर में धारा 370 हटाने की बात हो या तीन तलाक हटाने की बाद, मोदी सरकार ने फैसले लेने में गुरेज नहीं की। धारा 370 हटाए जाने का जिक्र करते हुए उन्होने कहा कि लोगों ने कहा कि खून की नदियाँ बह जाएगी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। जम्मू कश्मीर में लोकसभा चुनाव के दौरान 58.46 फीसदी रहा जबकि जम्मू कश्मीर विधानसभा चुनाव में 63 फीसदी वोटिंग टर्नआउट रहा। वक्फ बोर्ड कानून लाने जैसे बड़े फैसले भी लिए गए। वहीं, भारत को आर्थिक रूप से मजबूत करने की दृष्टि से बड़े निर्णय मोदी सरकार में हुए हैं।”
2014 से पहले भ्रष्टाचार में डूबी थी सरकार
बीजेपी अध्यक्ष नड्डा के मुताबिक, “2014 से पहले की सरकार भ्रष्टाचार में डूबी हुई थी। कांग्रेस के दौर में नकारात्मक माहौल बना था, लेकिन वर्ष-2014 के बाद देश में सकारात्मक बदलाव आया है। आज भारत का आम नागरिक ये कहता है कि मोदी है तो मुमकिन है।”
25 करोड़ लोग आए गरीबी रेखा से बाहर
सरकार की अलग-अलग योजनाओं से गरीबी हटाने में मदद मिली है। उन्होने कहा, “गरीब कल्याण योजना, पीएम आवास योजना, उज्ज्वला योजना, जल जीवन मिशन, पीएम किसान सम्मान निधि और उजाला योजना जैसी हमारी प्रमुख योजनाओं ने जीवन बदल दिया है। हमने लगभग 40 करोड़ लोगों को जीवन बीमा और दुर्घटना बीमा कवरेज भी प्रदान किया है। नेतृत्व में मजबूत भरोसे के कारण मोदी सरकार के तहत लोगों की भागीदारी काफी बढ़ गई है। “
#WATCH | Delhi: Union Minister and BJP National President JP Nadda says "…Our flagship schemes like Garib Kalyan Yojana, PM Awas Yojana, Ujjwala Yojana, Jal Jeevan Mission, PM Kisan Samman Nidhi, and Ujala Yojana have transformed lives. We've also provided life insurance and… pic.twitter.com/S4LUuVyV5e
नड्डा के मुताबिक, ” मैं नोटबंदी की बात करता हूं, तो मुझे याद है कि कैसे हमारे राजनीतिक दल जनता को फायदा उठाने के लिए उकसा रहे थे। आप भूल गए होंगे, लेकिन मैं नहीं भूलता। लेकिन भारत का आम आदमी घंटों बैंक के सामने खड़ा रहा और मोदी सरकार के नोटबंदी के फैसले का समर्थन किया। जब नेतृत्व पर भरोसा होता है, तो जनता साथ देती है।”
दुनिया के सबसे ऊँचे पूलों में एक चिनाव ब्रिज का जिक्र करते हुए बीजेपी अध्यक्ष नड्डा ने कहा कि 1995 में नरसिम्हा राव सरकार के वक्त पुल का शिलान्यास हुआ था और अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में इसे ‘देश के लिए बहुमूल्य प्रोजेक्ट’ घोषित किया गया और पीएम मोदी ने इस प्रोजेक्ट को पूरा किया।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यसभा की तरफ से मिले एक पत्र के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज शेखर कुमार यादव के खिलाफ जाँच को रद्द कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट को राज्यसभा सचिवालय से मिली एक चिट्ठी में कहा गया कि यह मामला अब संसद के अधीन है।
इस आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने अपनी जाँच रोक दी। दरअसल राज्यसभा द्वारा भेजे गए पत्र में यह कहा गया था कि इस तरह की किसी भी कार्यवाही के लिए राज्यसभा के सभापति के पास अधिकार है। इसलिए राष्ट्रपति और संसद को ही अब इस मामले में निर्णय लेने का विशेषाधिकार है।
फिर सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर अपनी इन-हाउस जाँच रोक दी और कॉलेजियम को इसकी जानकारी दी। पूरा मामला 8 दिसम्बर, 2024 को विश्व हिन्दू परिषद् के विधि प्रकोष्ठ के द्वारा आयोजित कार्यक्रम का है जहाँ उन्होंने मुस्लिमों में कट्टरपंथ और रूढ़िवादिता को लेकर कुछ बातें कही थीं।
जस्टिस यादव ने यूनिफार्म सिविल कोड की वकालत करते हुए मुस्लिम समुदाय में मौज़ूद ट्रिपल तलाक और हलाला की आलोचना भी की। इतना ही नहीं उन्होंने बहुसंख्यक के अनुसार कानून बनाने की बात कही। उन्होंने कहा था, “हिंदुस्तान में रहने वाले बहुसंख्यक के अनुसार ही देश चलेग। एक से ज्यादा पत्नी रखने, तीन तलाक और हलाला के लिए कोई बहाना नहीं है और अब ये प्रथाएं नहीं चलेंगी।”
विभिन्न राजनीतिक दलों, वरिष्ठ वकीलों, नागरिक संगठनों और कुछ पूर्व न्यायाधीशों ने इस बयान को न्यायिक गरिमा और धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ बता दिया। कपिल सिब्बल के नेतृत्व में 55 विपक्षी सांसदों ने राज्यसभा में उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव भी दायर किया।
सुप्रीम कोर्ट ने 10 दिसंबर 2024 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से रिपोर्ट माँगी। इसके बाद 17 दिसंबर को तत्कालीन चीफ जस्टिस संजय खन्ना और चार अन्य वरिष्ठ न्यायाधीशों की कॉलेजियम बैठक में जस्टिस यादव को बुलाया गया।
जस्टिस यादव ने अपने ऊपर उठे विवाद को लेकर हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को पत्र लिख कर अपना जवाब दिया था। इस पत्र में जस्टिस यादव ने अपने संबोधन को नियमों के अनुसार बताया और इसे न्यायिक मर्यादा का उल्लंघन मानने से साफ इनकार कर दिया।
बांग्लादेशी नागरिकों को बंगाल की नागरिकता दिये जाने के सबूत सामने आए हैं। शेख हसीना को प्रधानमंत्री पद से हटाने के लिए बांग्लादेश में ‘छात्र विरोध प्रदर्शन’ में भाग लेने वाला न्यूटन दास अब बंगाल का नागरिक है।
यह खुलासा सबसे पहले टीवी9 बांग्ला ने शनिवार (7 जून 2025) को प्रकाशित एक रिपोर्ट में किया था। बांग्लादेशी नागरिक का नाम पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले के काकद्वीप शहर की मतदाता सूची में शामिल है।
न्यूटन दास का विधानसभा क्षेत्र काकद्वीप है, जबकि संसदीय क्षेत्र मथुरापुर आरक्षित सीट है। भारत में रहने वाले न्यूटन दास के भाई तपस दास ने माना है कि वह बांग्लादेशी नागरिक है।
न्यूटन दास को सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस सरकार ने नागरिकता दी है। उसका नाम वोटर सूची में भी मौजूद है यानी मतदान का अधिकार हासिल करने में वह कामयाब रहा है। उनके भाई तपस दास ने पुष्टि की, “उसे (न्यूटन दास) बांग्लादेश का मतदाता होना चाहिए। उनका जन्म वहीं हुआ था। वह कोविड-19 प्रकोप के बाद कुछ भूमि विवादों को निपटाने के लिए भारत आया था। मुझे नहीं पता कि वह अब कहाँ रहता है। मुझे नहीं पता कि वह यहाँ मतदाता कैसे बन गया?”
काकद्वीप पंचायत के सदस्य ने पुष्टि की है कि न्यूटन दास एक स्थानीय मतदाता हैं, लेकिन उन्होंने दावा किया कि उन्हें उनके बांग्लादेश से संबंधों के बारे में पता नहीं है।
Another shining example of the so-called “Egiye Bangla Model”!
The same Newton who was seen wielding a stick during Bangladesh’s quota reform movement is now a registered voter in Kakdwip, West Bengal!
— Dr. Sukanta Majumdar (@DrSukantaBJP) June 7, 2025
बांग्लादेश में 2024 के छात्र विरोध प्रदर्शन में भाग लेने की तस्वीरें ऑनलाइन सामने आने के बाद आरोपित मुश्किल में पड़ गया। शेख हसीना सरकार के खिलाफ आयोजित प्रदर्शनों के दौरान उसे लाठी और झंडों के साथ पोज देते देखा गया था।
Another shining example of the so-called “Egiye Bangla Model”!
The same Newton who was seen wielding a stick during Bangladesh’s quota reform movement is now a registered voter in Kakdwip, West Bengal!
— Dr. Sukanta Majumdar (@DrSukantaBJP) June 7, 2025
बीजेपी नेता सुकांत मजुमदार ने कहा, “असफल मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के विशेष प्रोत्साहन के कारण, सत्तारूढ़ पार्टी टीएमसी ने न केवल बम बनाने के उद्योग और कट मनी उद्योग में अग्रणी भूमिका निभाई है – बल्कि ‘अवैध घुसपैठ उद्योग’ भी काफी फल-फूल रहा है। तृणमूल कांग्रेस के बिना बंगाल के लोग कभी भी इस मॉडल को सही मायने में नहीं समझ पाते।”
उन्होने कहा कि ममता बनर्जी की घुसपैठ सिद्धांत और तुष्टिकरण की राजनीति की वजह से हजारों बांग्लादेशी ‘न्यूटन’ बंगाल में मतदान करते हैं। अवैध मतदाताओं और इन लाठीधारी बदमाशों को अपना समर्थन आधार बनाकर, वह पश्चिम बंगाल नहीं चला रही हैं… वह ग्रेटर बांग्लादेश के लिए खाका तैयार कर रही हैं,”
इस बीच सोशल मीडिया पर न्यूटन दास की तृणमूल कांग्रेस के नेता सुभाशीष दास के साथ एक तस्वीर सामने आई है। सुंदरबन के टीएमसी नेता आरोपी का जन्मदिन मनाते नजर आए।
टीवी9 बांग्ला से बात करते हुए सुभाशीष दास ने दावा किया कि न्यूटन के बांग्लादेशी नागरिक होने के बारे में उसे कोई खबर नहीं है।
आरोपित न्यूटन दास ने सोशल मीडिया पर वीडियो शेयर कर घड़ियाली आँसू बहाता हुआ दिखा।
न्यूटन ने आरोप लगाया कि 2024 में वारिस बनाए जाने के बाद वह भूमि विवादों को निपटाने के लिए बांग्लादेश गया था। ये महज संयोग है कि उसकी यात्रा और बांग्लादेश के ‘छात्र प्रदर्शन’ का वक्त एक ही था।
आरोपी ने दावा किया, “मैं 2014 से काकद्वीप में मतदाता हूँ। मैंने 2016 के विधानसभा चुनाव में भी भाग लिया था। हालाँकि, 2017 में मेरा वोटर कार्ड खो गया था, लेकिन हमारे विधायक की मदद से 2018 तक मुझे नया कार्ड मिल गया।”
इससे पहले मई 2022 में यह बात सामने आई थी कि तृणमूल कांग्रेस की उम्मीदवार अलो रानी सरकार, जिन्होंने 2021 का पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव लड़ा था, वह बांग्लादेश में अपने पति के साथ रहती है।
असम से घुसपैठियों को निकालने के लिए अब एक 7 दशक पुराना एक कानून उपयोग किया जाएगा। इस कानून के तहत घुसपैठियों को निकालने के लिए अदालत जाने की जरूरत नहीं होगी। इस कानून का इस्तेमाल करने की अनुमति सुप्रीम कोर्ट ने भी दी हुई है। वर्तमान में देश भर से बांग्लादेशी घुसपैठियों को निकालने के लिए ऑपरेशन पुशबैक चल रहा है।
असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने इस कानून को अमल में लाए जाने की जानकारी दी है। उन्होंने कहा है कि अवैध विदेशियों को निर्वासित करने के लिए अब हर बार अदालत जाने की जरूरत नहीं है। उन्होंने बताया कि असम सरकार 1950 के अप्रवासी निष्कासन आदेश का इस्तेमाल कर सकती है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में वैध माना है।
CM सरमा ने बताया कि इस कानून के तहत कलेक्टर को भी यह अधिकार है कि वह अवैध प्रवासियों को सीधे देश से बाहर भेजने का आदेश दे सकता है। CM सरमा ने यह सारी जानकारी शनिवार (7 जून, 2025) को नलबाड़ी जिले के दौरे के में दी है।
CM हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि किसी कारण से 1950 के इस कानून को भुला दिया गया था और सरकारी वकील भी इसका जिक्र नहीं करते थे। हाल ही में सरकार को इस कानून के अस्तित्व का पता चला है।
अब राज्य सरकार इसका इस्तेमाल अवैध प्रवासियों को वापस भेजने के लिए करेगी। उन्होंने कहा कि अब से अवैध प्रवासियों की पहचान होने पर उन्हें ट्रिब्यूनल भेजने की जरूरत नहीं होगी, बल्कि सीधे सीमा पार भेजा जाएगा।
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि असम में NRC (राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर) के कारण अवैध प्रवासियों की पहचान और उन्हें वापस भेजने की प्रक्रिया धीमी हो गई थी लेकिन अब इसे तेज किया जाएगा। उन्होंने बताया कि जैसे ही किसी अवैध प्रवासी की पहचान होगी, उसे बांग्लादेश भेज दिया जाएगा।
CM सरमा ने कहा कि अब इन मामलों को ट्रिब्यूनल में भेजने की जरूरत नहीं होगी और प्रक्रिया जल्दी शुरू की जाएगी, जिसके लिए तैयारियाँ चल रही हैं। हालाँकि, जिन लोगों ने अपने निष्कासन आदेश को अदालत में चुनौती दी है, उन्हें तब तक नहीं भेजा जाएगा जब तक अदालत फैसला नहीं देती।
सुप्रीम कोर्ट ने अक्टूबर 2024 में दिए गए फैसले में नागरिकता कानून की धारा 6ए को वैध बताया था। साथ ही कोर्ट ने कहा कि अप्रवासी (असम से निष्कासन) अधिनियम,1950 के प्रावधान भी इसमें शामिल माने जाएँगे और इनका इस्तेमाल अवैध प्रवासियों की पहचान के लिए किया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया था कि निष्कासन कानून और धारा 6ए एक-दूसरे के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि दोनों कानून साथ-साथ लागू हो सकते हैं। कोर्ट ने कहा था कि संसद द्वारा कानून पारित किया जाना यह दर्शाता है कि बांग्लादेश से असम में प्रवासियों का भारी प्रवाह हमेशा से चिंता का कारण रहा है।
गौर करने वाली बात यह है कि पश्चिमी सीमा से पाकिस्तान से आने वाले लोगों के लिए बना कानून ‘आवागमन नियंत्रण अधिनियम, 1952’ को जनवरी 1952 में खत्म कर दिया गया था। लेकिन पूर्वी सीमा के लिए बनाया गया कानून अप्रवासी (असम से निष्कासन) अधिनियम, 1950 आज भी लागू है। यह सिर्फ असम में लागू होता है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यह कानून इसलिए बनाया गया था क्योंकि विदेशी अधिनियम में पाकिस्तान से आए लोगों को शामिल नहीं किया गया था, इसलिए इनके लिए अलग से नियम की जरूरत थी।
इस कानून के अनुसार, अगर केंद्र सरकार को लगता है कि असम में बाहर से आया कोई व्यक्ति आम जनता या वहाँ की किसी अनुसूचित जनजाति के लिए नुकसानदायक है, तो सरकार उसे असम छोड़ने का आदेश दे सकती है और उसे बाहर निकाल सकती है।
यह अधिकार केंद्र सरकार के पास है। केंद्र सरकार इस शक्ति को अपने अधिकारियों या असम, मेघालय और नागालैंड की राज्य सरकारों के अधिकारियों को भी दे सकती है।
पश्चिम बंगाल के हावड़ा में अरियन खान ने एक हिन्दू महिला को 6 महीने तक एक फ्लैट में बंधक बनाकर रखा गया। महिला पॉर्न शूट करने से इनकार कर रही थी इसलिए आरोपित ने अपनी माँ श्वेता खान के साथ मिलकर उससे जमकर मारपीट की। उत्तर 24 परगना जिले की रहने वाली महिला को कई दिनों तक खाना नहीं दिया गया और महीनों तक बेरहमी से पीटा। उसके प्राइवेट पार्ट में लोहे के रॉड घुसाने की कोशिश की गई।
अच्छी नौकरी और पैसे का दिया झाँसा
पीड़िता एक इवेंट मैनेजमेंट फर्म में काम करती थी। पीड़िता की मुलाकात अरियन खान से काम के दौरान हुई। उसने पीड़िता को हावड़ा में नौकरी देने का प्रस्ताव दिया, जहाँ उसे ज्यादा पैसे मिलेंगे। पीड़िता अरियन खान के बातों में आ गई और हावड़ा चली गई। उसे नौकरी पाने के बजाय आरोपित ने उसे बार डांसर के तौर पर काम करने का प्रस्ताव दिया। उसे पॉर्न शूट करने के लिए कहा गया। ऐसा नहीं करने पर पीड़िता को एक फ्लैट में कैद कर दिया गया।
A 23-year-old Hindu girl from Sodepur was lured with the promise of a job at a bar in Khardah. There, she came into contact with one Arian Khan from Domjur, Howrah. Later, Arian and his mother confined the girl in their home, subjected her to brutal torture, shaved her head, and… pic.twitter.com/NC82IDYazG
इस दौरान अरियन खान अपनी अम्मी श्वेता खान के साथ वहाँ आता और पीड़िता को प्रताड़ित करता। उसके प्राइवेट पार्ट में लोहे की रॉड डालने की कोशिश भी की गई। मारपीट के दौरान पीड़िता के सिर में चोट भी आई।
पीड़िता कुछ दिन पहले फ्लैट से भागने में कामयाब रही। उसे सागर दत्ता मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में भर्ती कराया गया। उसकी स्थिति नाजुक बताई जा रही है। उसने अधिकारियों को अपनी आपबीती सुनाई। इसके बाद पुलिस ने महिला के परिवार की शिकायत के आधार पर मामला दर्ज किया। पुलिस ने अरियन खान और उसकी माँ श्वेता खान को पकड़ने की कोशिश कर रही है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक श्वेता खान और अरियन खान ने मिलकर ‘इसारा एंटरटेनमेंट’ नाम से प्रोडक्शन कंपनी बनाई थी। 2021 में उन्होंने एक यूट्यूब चैनल भी लॉन्च किया था। हालाँकि चार साल के दौरान केवल 11 म्यूजिक वीडियो अपलोड किए गए। स्थानीय लोगों का दावा है कि अरियन और उनकी माँ ने अपने फ्लैट का किराया नहीं दिया। उनका यह भी कहना है कि श्वेता, जिसे स्थानीय तौर पर फुलटूशी बेगम के नाम से जाना जाता है, एक बार डांसर के तौर पर काम करती थी।
दुनियाभर के मलयाली प्रवासियों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन, वर्ल्ड मलयाली काउंसिल (WMC) ने 28-29 जून 2025 को अजरबैजान के बाकू में सम्मेलन की घोषणा की है। डब्लूएमसी के इस फैसले की कई संगठन ने आलोचना की है।
दरअसल मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अजरबैजान उन तीन देशों में शामिल है जिसने पाकिस्तान का समर्थन किया था। पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों को ध्वस्त किया था।
वर्ल्ड मलयाली काउंसिल के इस आयोजन का प्रचार वेबसाइट पर हो रहा है। ‘रोमांचक WMC वैश्विक सम्मेलन पैकेज’ में आलीशान होटल में ठहरना, निर्देशित शहर में घूमना, दैनिक नाश्ता, दोपहर का भोजन और रात का खाना, हवाई अड्डा स्थानांतरण, ई वीज़ा, फेलोशिप के साथ भव्य रात्रिभोज, फाउंटेन स्क्वायर, अग्नि मंदिर, धधकते पहाड़, बुलेवार्ड वॉकिंग टूर, ओल्ड बाकू वॉकिंग टूर आदि जैसे प्रतिष्ठित स्थलों पर दर्शनीय स्थल, डीजे पार्टी, अरबी और पश्चिमी नृत्य शामिल हैं। मूल रूप से यह किसी सम्मेलन का नहीं, बल्कि अजरबैजान के लिए एक टूर पैकेज का प्रचार-प्रसार जैसा लगता है।
22 अप्रैल, 2025 को पहलगाम आतंकी हमले के बाद, जिसमें 26 लोगों की जान चली गई थी, अजरबैजान ने पाकिस्तान का सार्वजनिक रूप से समर्थन किया था और ऑपरेशन सिंदूर के तहत भारत के जवाबी कार्रवाई की निंदा की थी। अजरबैजान ने पाकिस्तान के साथ एकजुटता दिखाई थी। बताया जाता है कि उसने पाकिस्तान को हथियार मुहैया कराए। अजरबैजान के रुख के चलते भारतीयों ने तुर्की के साथ-साथ अजरबैजान का भी बहिष्कार किया। पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ बड़ी संख्या में तुर्की में बने हथियारों का भी इस्तेमाल किया, जिसमें ड्रोन भी शामिल हैं।
इसके बावजूद, WMC बाकू में सम्मेलन कर अजरबैजान के पर्यटन को बढ़ावा दे रहा है। दुनिया भर के मलयाली लोगों से ‘अजरबैजान की यात्रा करने और अनुभव शेयर करने’ को कहा गया है। इससे WMC का भारत में विरोध शुरू हो गया है। आलोचकों का कहना है कि WMC अजरबैजान में पर्यटन को बढ़ावा दे रहा है, जबकि भारतीय पाकिस्तान का समर्थन करने की वजह से उसका बहिष्कार कर रहे हैं। इसका असर वहाँ की अर्थव्यवस्था पर भी दिखने लगा है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, खास तौर पर एक्स पर लोगों की प्रतिक्रिया आने लगी है। एक यूजर ने अपने पोस्ट में WMC के फैसले को ‘शर्मनाक’ बताया, समूह पर ‘भारत विरोधी राष्ट्र’ के साथ गठबंधन करने का आरोप लगाया और कार्यक्रम के बहिष्कार की अपील की।
Shame on World Malayalee Council for hosting the 2025 meet in Azerbaijan — a Pakistan ally & anti-India state. NRIs and foreign Malayalees should be ashamed of themselves for betraying their motherland. This isn't global unity — it's betrayal. #BoycottBaku2025#AntiIndiaEventhttps://t.co/2C2y6RpuOX
एक अन्य यूजर्स द राइटवेव ने लिखा कि अजरबैजान की विदेश नीति हमेशा पाकिस्तान के पक्ष में रही है, चाहे वह कश्मीर मुद्दा हो या आतंकवाद का मुद्दा। यूजर्स को शक है कि पाकिस्तान अपनी कूटनीतिक सफलता के लिए मलयाली लोगों का इस्तेमाल कर रहा है।
ലോക മലയാളി അസോസിയേഷൻ അസർബൈജനിൽ അവരുടെ കോൺഫറൻസ് നടത്താൻ പോകുന്നു. ഈ മാസം 27 മുതൽ 30 വരെയാണ് പരിപാടി. അസർബെയ്ജാൻ വിദേശനയം എന്നും പാകിസ്ഥാന് അനുകൂലമായി എഴുതപ്പെട്ടതാണ്. കശ്മീർ വിഷയത്തിൽ ആയാലും തീവ്രവാദ വിഷയത്തിൽ ആയാലും അവർ എന്നും പാകിസ്ഥാനെ പിന്തുണയ്ച്ചിട്ടെ ഉള്ളൂ. CUBAA ക്ക്… pic.twitter.com/1SzypE7rik
हालाँकि आयोजकों द्वारा यह तर्क दिया गया है कि अजरबैजान में सम्मेलन आयोजित करने का निर्णय जनता की राय को प्रभावित कर सकता है और भारत के प्रति शत्रुतापूर्ण व्यवहार करने वाले अजरबैजान को ‘सुधार’ सकता है।
Shri Pinarayi Vijayan , the Honorable Chief Minister of Kerala, Chief guest for the inauguration of the 14th Biennial Global Conference, World Malayalee Council – The inauguration ceremony to take place on 2nd August at 5:30 PM at Hyatt Regency Trivandrum Kerala Tourism Kerala pic.twitter.com/Y1xwIVzF1a
— World Malayalee Council – Global (@wmcglobal1) July 25, 2024
मलयाली समुदाय के भीतर डब्ल्यूएमसी का प्रभाव काफी है। अगस्त 2024 में इसके एक कार्यक्रम में केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन भी मौजूद रहे। सीएम तिरुवनंतपुरम में विश्व मलयाली परिषद के 14वें द्विवार्षिक वैश्विक सम्मेलन के उद्घाटन कार्यक्रम में शामिल हुए ।
इससे पहले केरल के कोचीन यूनिवर्सिटी बी.टेक एलुमनाई एसोसिएशन (CUBAA) ने पाकिस्तानी क्रिकेटर शाहिद अफरीदी को आमंत्रित किया था। 25 मई, 2025 को दुबई में ये कार्यक्रम आयोजित किया गया था जिसकी जमकर आलोचना हुई थी। भारत विरोधी टिप्पणियों के लिए जाने जाने वाले अफरीदी ने पहलगाम हमले के बाद भारतीय सुरक्षा बलों की आलोचना की थी, उन्हें “अक्षम” कहा था और ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान की “जीत” का जश्न मनाने के लिए एक कार रैली का नेतृत्व किया था।
CUBAA के अध्यक्ष ने हालाँकि बाद में विरोध को देखते हुए माफी मांगी। उन्होने दावा किया कि अफरीदी की मौजूदगी की जानकारी पहले से उन्हें नहीं थी।
भारत में अक्सर एक हिन्दू विरोधी गिरोह समाज को बाँटने की साजिश में लगा रहता है और इसके लिए उसका पहला हथियार होता है – दलितों को भड़काना। दलितों को बार-बार ये एहसास दिलाया जाता है कि वो हिन्दू समाज का हिस्सा नहीं हैं। ऐसे में कोई दलित बेटी UN (संयुक्त राष्ट्र) में ‘जय श्री राम’ के साथ अपने उद्बोधन की शुरुआत करे, तो ख़ुद को दलितों का ठेकेदार बताकर पेश करने वालों को अपनी चूलें हिलने का डर लगने लग्न स्वाभाविक है। ऐसा हुआ भी। उस दलित बेटी का नाम है रोहिणी घावरी वाल्मीकि।
वो रोहिणी, जिनके पिता इंदौर में सफाईकर्मी थे लेकिन बेटी ने स्विट्जरलैंड में PhD के लिए 1 करोड़ रुपए की स्कॉलरशिप प्राप्त की। ‘जनपॉवर फाउंडेशन’ चला रहीं डॉ रोहिणी घावरी वाल्मीकि सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं। हालाँकि, उनके फ़िलहाल चर्चा में रहने का विषय कुछ और है। रोहिणी एक सांसद के ख़िलाफ़ ख़ासी मुखर हैं। उक्त सांसद नीले गमछे के लिए जाने जाते हैं, भारत के सबसे चर्चित दलित आइकॉन के नाम पर अपना राजनीतिक दल चलाते हैं और उन्हें Y+ सुरक्षा प्राप्त है। आप डॉ रोहिणी घावरी वाल्मीकि के सोशल मीडिया हैंडल पर जाएँगे तो आपको बख़ूबी पता चल जाएगा कि वो नए-नवेले सांसद कौन हैं।
रोहिणी ने सांसद के कई वीडियो भी जारी किए हैं, जिनमें किसी में वो जमीन पर लेटकर माफ़ी माँगते हुए दिख रहे हैं तो किसी में रोते हुए दिखाई दे रहे हैं। कई चैट्स भी वायरल हुए हैं, जिनमें वो रोहिणी की प्रशंसा करते नहीं थक रहे हैं।
नीले गमछे वाले सांसद जी पर FIR की तैयारी
ख़ैर, तो ताज़ा ख़बर ये है कि अब सांसद जी के विरुद्ध औपचारिक FIR दर्ज होने जा रही है। ये सूचना ख़ुद रोहिणी ने ऑपइंडिया से बात करते हुए साझा की है। फ़िलहाल क़ानूनी सलाहों के कारण वो वीडियो के माध्यम से मीडिया संस्थानों से नहीं जुड़ पा रही हैं, लेकिन FIR दर्ज होने के बाद वो जल्द ही मुखर होकर कुछ नए खुलासे करेंगी। वो अदालत का दरवाजा भी खटखटाने जा रही हैं। डॉ रोहिणी घावरी इससे पहले भी उक्त सांसद के ख़िलाफ़ मुखर रही हैं और उनपर कई लड़कियों का जीवन बर्बाद करने का आरोप लगा चुकी हैं।
रोहिणी ने बताया था कि कैसे सांसद (तब वो सांसद नहीं, एक्टिविस्ट हुआ करते थे) ने अपनी शादी की बात छिपाकर कई लड़कियों की इज्जत के साथ खेला। ऑपइंडिया से बात करते हुए डॉ रोहिणी घावरी ने बताया कि कैसे उन्हें दलित समाज के सामने झूठा साबित करने के लिए उन्हें बदनाम करने की तमाम तरह की कोशिशें हुईं और दबाव डलवाकर उनसे वो पोस्ट्स X से डिलीट करवाए गए। उन्होंने बताया कि उन्हें अब भी धमकियाँ भिजवाई जा रही हैं, सांसद जी अपने लोगों से बातचीत में कह रहे हैं कि उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा, लड़की अपना ही करियर बर्बाद करेगी।
हालाँकि, रोहिणी इतनी अडिग हैं कि उनका कहना है कि उन्हें जेल जाना पड़े तो भी ग़म नहीं, वो इस देश की तमाम महिलाओं के सामने एक उदाहरण बनना चाहती हैं कि आपको घबराए बिना अपने साथ हो रहे अत्याचार के विरुद्ध लड़ाई लड़नी है। रोहिणी का कहना है कि शुरुआत में उन्होंने सोचा कि इस मामले को अधिक तूल न दिया जाए क्योंकि उनके मन में दलित एकता की बात थी, उन्हें भय था कि इससे दलित एकता खंडित होगी। बता दें कि आरोपित सांसद जहाँ जाटव समाज से आते हैं वहीं रोहिणी वाल्मीकि समुदाय से।
अपने आरोपों को लेकर दोबारा आक्रामक हुईं डॉ रोहिणी घावरी
पिछले एक सप्ताह से रोहिणी कुछ अधिक ही आक्रामक हैं। धोखेबाज, गद्दार, कलंकित, नीच, नामर्द, नालायक… ऐसे तमाम शब्दों का इस्तेमाल वो सांसद जी के लिए कर चुकी हैं। आप इससे ये समझिए कि वो किस आक्रामकता के साथ अपनी लड़ाई लड़ रही हैं। ऑपइंडिया से बात करते हुए वो कहती हैं कि वो गुस्से में हैं, वाल्मीकि समाज उनके साथ खड़ा है। उन्होंने कहा कि जनता हर किसी को जज करती है, पहले उन्हें लगा कि समाज स्वयं ही न्याय करेगा इसीलिए उन्होंने कोई क़ानूनी प्रक्रिया नहीं अपना – लेकिन, अब नहीं। इस दौरान वो समाज और जनता से भी नाराज़ दिखाई देती हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इस संघर्ष में उन्हें अबतक बदनामी मिली है, लांछन मिले हैं और उन्हें लेकर तरह-तरह की बातें की गई हैं।
डॉ रोहिणी घावरी की विचारधारा क्या है? वो स्वयं को आंबेडकरवादी तो बताती हैं, लेकिन साथ ही कहती हैं कि वो भारत की जनता को विभिन्न जातियों में बाँटकर नहीं देखतीं। विदेश से जब वो देखती हैं तो उन्हें हर भारतवासी अपना लगता है। वो ‘मनुवादी’ जैसे शब्दों से चिढ़ती हैं और ब्राह्मणों को सम्मान की नज़र दे देखती हैं। वो एक बार बता भी चुकी हैं कि स्विट्जरलैंड वाली स्कॉलरशिप की जानकारी देने वाले उनके एक ब्राह्मण शिक्षक ही थे, वहाँ वो नई-नई थीं तो एक ब्राह्मण सहेली ने ही उन्हें सहज बनाया, उन्हें UN का रास्ता दिखाने वाले भी एक ब्राह्मण ही थे। वो कहती हैं कि उनके लिए समर्पण और एकता महत्वपूर्ण है, जब वो विदेश में विदेशी दोस्तों के साथ सहजता के साथ रह सकती हैं, खा-पी सकती हैं – तो फिर देशवासियों संग क्यों नहीं?
सांसद जी को किन ‘बड़ी पार्टियों’ का समर्थन?
डॉ रोहिणी घावरी को लगता है कि उक्त सांसद जी को कुछ बड़ी राजनीतिक पार्टियों का भी समर्थन है। लेकिन, उन्हें विश्वास है कि एक बार उनके असली चरित्र के बारे में खुलासे हुए तो ऐसे दागदार व्यक्ति के साथ ख़ुद को जोड़ने में इन राजनीतिक दलों को शर्म आएगी और वो स्वयं को इनसे अलग कर लेंगे। भारत से कई लोगों ने उन्हें फोन करके FIR दर्ज कराने के लिए कहा है, ताकि वो न्याय के लिए आवाज़ उठा सकें। नीले गमछे वाले सांसद पर FIR होते ही विरोध प्रदर्शन शुरू होंगे। ब्राह्मण समाज के कई एक्टिविस्ट्स ने भी उन्हें समर्थन का भरोसा दिया है। कभी UN के ‘विश्व संसद’ में 3 बार भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकीं रोहिणी ने राम मंदिर निर्माण का बचाव करते हुए कई तर्क दिए थे।
चंद्रशेखर की राजनीति से ख़ुद चंद्रशेखर के अलावा आज तक किसी को कोई फ़ायदा नहीं हुआ बल्कि हज़ारो युवाओं का भविष्य बर्बाद हुआ है जो रोते रहते है यह फ़ोन तक नहीं उठाता !! इसकी राजनीति से समाज का बहुत नुक़सान हुआ है यह ख़ुद जानता है !! एक अच्छा लीडर लोगो का हित पहले देखता है ख़ुद का… pic.twitter.com/XBOm1lA7Hg
— Dr. Rohini Ghavari ( रोहिणी ) (@DrRohinighavari) June 8, 2025
अब डॉ रोहिणी घावरी की FIR व उनके द्वारा न्यायालय का दरवाजा खटखटाए जाने के बाद क्या होता है, ये तो समय बताएगा। लेकिन, इतना साफ़ है कि नीले गमछे वाले नए-नवेले सांसद जी के दिन ठीक नहीं चल रहे। रोहिणी कुछ अन्य लड़कियों की आपबीती भी सोशल मीडिया पर साझा कर रही हैं, ताकि अपने आरोपों की पुष्टि कर सकें। वो अब पीछे हटने के मूड में नहीं हैं। थोड़ी सी नाराज़गी उन्हें भारतीय क़ानूनों को लेकर भी है, क्योंकि उनका मानना है कि स्विट्जरलैंड में उन्हें किसी ने ग़लत तरीके से घूरा भी तो उसपर कार्रवाई होगी। लेकिन, अपने देश को लेकर नकारात्मक बातें न करने की बात कहकर रोहिणी इसपर चर्चा नहीं करना चाहतीं।
केरल के श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर में रविवार (8 जून 2025) को लगभग 270 साल बाद खास धार्मिक अनुष्ठान ‘महाकुंभाभिषेक’ हो रहा है। इस अनुष्ठान के साथ-साथ मंदिर में विश्वकसेन की मूर्ति को फिर से स्थापित किया गया है। इसके अलावा तिरुवंबाडी श्री कृष्णस्वामी मंदिर में भी ‘अष्टबंधकलशम’ नाम का एक महत्वपूर्ण पूजा-अनुष्ठान किया जाएगा।
Kerala | Sree Padmanabhaswamy Temple holds 'Maha Kumbhabhishekam' after 270 years. The ceremony will include the dedication of the domes in front of the main shrine, the re-installation of the Vishwaksena idol, and the ‘Ashtabandhakalasam’ ritual at the Thiruvambady Sree… pic.twitter.com/LGxzcUQu7c
महाकुंभाभिषेक: श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर में ऐतिहासिक धार्मिक अनुष्ठान
कुंभाभिषेक एक खास धार्मिक अनुष्ठान है, जो किसी तीर्थस्थल या मंदिर की पवित्रता और आध्यात्मिक ऊर्जा को फिर से जागृत करने के लिए की जाती है। यह प्रक्रिया आगम शास्त्रों पर आधारित होती है, जिनमें मंदिर निर्माण, पूजा और प्रतिष्ठा के नियम बताए गए हैं।
‘कुंभ’ का मतलब होता है जल से भरा पात्र, और ‘अभिषेक’ का अर्थ है मंदिर की मूर्तियों, स्तंभों और अन्य हिस्सों पर पवित्र जल का छिड़काव करना। यह जल अनेकों अनुष्ठानों के बाद तैयार किया जाता है ताकि स्थान को फिर से शक्ति और पवित्रता मिल सके।
जब कोई मंदिर नया बनता है, तब नूतन कुंभाभिषेकम नाम का विशेष अभिषेक किया जाता है। इस अनुष्ठान का उद्देश्य मंदिर की मूर्तियों में देवताओं की जीवन ऊर्जा को स्थापित करना होता है। इसके बाद 12 वर्ष के निश्चित अंतराल पर इस ऊर्जा को फिर से जागृत करने के लिए फिर से कुंभाभिषेक किया जाता है।
आवश्यकता पड़ने पर यह समय कम या ज़्यादा भी हो सकता है। श्रीपद्मनाभस्वामी मंदिर में जब महाकुंभाभिषेक किया जाता है, तब तिरुवंबाडी श्री कृष्णस्वामीमंदिर में अष्टबंधकलशम नाम का एक और अनुष्ठान भी होता है।
अष्टबंधकलशम में एक विशेष प्रकार का प्राकृतिक चिपकने वाला मिश्रण तैयार किया जाता है। इसमें लकड़ी की लाख, चूना पत्थर का पाउडर, राल, लाल गेरू, मोम, मक्खन और आठ प्रकार की जड़ी-बूटियाँ मिलाई जाती हैं। यह मिश्रण देवताओं की मूर्तियों को उनके आसनों पर मजबूती से स्थापित करने के लिए इस्तेमाल होता है।
ऐसा माना जाता है कि यह मिश्रण मूर्ति की ऊर्जा को 12 साल तक बनाए रखता है। अगर यही अष्टबंधन सोने से किया जाए, तो उस मूर्ति की ऊर्जा 100 वर्षों तक सक्रिय रहती है। इस तरह, कुंभाभिषेक और अष्टबंधकलशम जैसे अनुष्ठान मंदिरों की आध्यात्मिक शक्ति को बनाए रखने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
270 सालों बाद मंदिर में फिर से जागी आध्यात्मिक ऊर्जा
महाकुंभभिषेक समारोह श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर में इसलिए हो रहा है क्योंकि 2017 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त एक विशेषज्ञ समिति ने यह पाया कि मंदिर की कुछ मूर्तियाँ (विग्रह) क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं।
इस रिपोर्ट के बाद मंदिर के जीर्णोद्धार (मरम्मत और नवीनीकरण) का काम शुरू हुआ, लेकिन कोविड-19 महामारी के कारण इसे बीच में ही रोकना पड़ा। मंदिर प्रबंधक बी श्रीकुमार ने बताया कि समिति की सिफारिशों के अनुसार मरम्मत का कार्य किया गया।
इसके पहले चरण में, लगभग चार साल पहले तिरुवंबाडी श्री कृष्णस्वामी मंदिर में चाँदी का एक स्तंभ स्थापित किया गया था। श्रीकुमार ने कहा कि जीर्णोद्धार का काम 2021 से धीरे-धीरे पूरा किया गया और अब यह पूरी तरह तैयार है।
उन्होंने इस अवसर को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि यह महाकुंभाभिषेक 270 वर्षों के बाद हो रहा है और भविष्य में कई दशकों तक दोबारा होने की संभावना नहीं है। उन्होंने कहा कि इतने सालों बाद मंदिर में हो रहे इस अनुष्ठान से दुनियाभर के भगवान पद्मनाभ के भक्तों के लिए एक दुर्लभ और शुभ अवसर है।
महाकुंभाभिषेक से पहले मंदिर में कई धार्मिक अनुष्ठान किए गए, जिनमें आचार्य वरणम, प्रसाद शुद्धि, धारा और कलशम जैसे अनुष्ठान शामिल हैं। ये सभी अनुष्ठान मंदिर की पवित्रता और आध्यात्मिक ऊर्जा को फिर से जागृत करने के लिए किए जाते हैं।
क्या आपने वृंदावन के श्री बाँके बिहारी मंदिर में दर्शन किए हैं? यदि आपका जवाब हाँ है तो आप भी तंग गलियों से गुजरे होंगे। भीड़भाड़, धक्कामुक्की में दर्शन किए होंगे। अव्यवस्था देखी होगी। आपने भी इस जगह के विकास की जरूरत महसूस की होगी।
हाल के वर्षों ने हिंदू समाज के सामने काशी, उज्जैन, अयोध्या ने उदाहरण प्रस्तुत किए हैं कि कैसे एक कॉरिडोर के निर्माण से धार्मिक स्थलों की तस्वीर बदली जा सकती है। बदहाली और बदइंजामी बीते दिनों की बात हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने श्री बाँके बिहारी मंदिर के कॉरिडोर के निर्माण का मार्ग भी प्रशस्त कर दिया है।
लेकिन इस फैसले पर एक तरफ सपा और कॉन्ग्रेस जैसी पार्टियाँ राजनीति कर रही हैं। दूसरी तरफ स्थानीय गोस्वामी समाज भी विरोध कर रहा है। सपा-कॉन्ग्रेस जैसी हिंदू पार्टियों का एजेंडा तो समझ में आता है, लेकिन मंदिर से जुड़े लोग क्यों इसका विरोध कर रहे हैं, यह जानने के लिए ऑपइंडिया के पत्रकार मौके तक पहुँचे। सभी पक्षों से बात की ताकि पाठकों तक विरोध से लेकर समर्थन तक की सही तस्वीर पहुँचे। साथ ही गोस्वामी समाज के विरोध के नाम पर मीडिया में परोसे जा रहे प्रोपेगेंडा को भी खत्म किया जा सके।
बाँके बिहारी मंदिर कॉरिडोर क्यों जरूरी?
हम 5 जून 2025 को दिल्ली से करीब 150 किलोमीटर दूर वृंदावन पहुँचे। वृंदावन में प्रवेश करते ही हमारी गाड़ी को होमगार्ड के एक जवान ने रोकते हुए पार्किंग में लगाने को कहा। लेकिन मीडिया से होने की बात जानने के बाद उसने हमे आगे जाने दिया। हम ई-रिक्शा के भारी ट्रैफिक को चीरते हुए हम गौतम पाड़ा चौराहे तक पहुँचे। यहाँ से बाँके बिहारी मंदिर करीब 500 मीटर दूर है, लेकिन गाड़ी आगे ले जाना संभव नहीं था। वहीं पार्किंग में गाड़ी लगाकर हम पैदल आगे बढ़े।
करीब 500 मीटर पैदल चलने के बाद हम सुबह करीब 11 बजे बाँके बिहारी पुलिस चौकी वाली मंदिर की मुख्य गली के सामने पहुँचे। अधिकांश पेड़े वाली दुकानों के सामने जूते-चप्पल उतरे हुए थे। जगह-जगह नालियाँ जाम थीं। कूड़ा-कचरा फैला हुआ था। यही हाल मंदिर के गेट नंबर-1 और 2 का भी था। सीढ़ियों पर श्रद्धालुओं के जूते-चप्पल बिखरे हुए थे।
श्रद्धालु बोले- क्या करें, कोई व्यवस्था ही नहीं है
अयोध्या के एपी पांडेय बाँके बिहारी जी का दर्शन कर बाहर निकले। एक दुकान के निचले हिस्से से जूते उठाते हुए ऑपइंडिया को बताया, “क्या करें कोई व्यवस्था नहीं है। यहाँ कॉरिडोर बनना चाहिए।”
एक अन्य श्रद्धालु अशोक कुमार गुप्ता ने कहा, “यहाँ दर्शन करने में ज्यादा समस्या होती है। अयोध्या में अच्छे से दर्शन हो जाता है। यहाँ हमारे बच्चे भीड़ में दब गए थे।”
साथ में खड़ी एक महिला भक्त का कहना था, “वीआईपी दर्शन के नाम पर किसी से 501 तो किसी से 1001 रुपए लिए जा रहे हैं। भीड़ से बच्चों की जान निकली जा रही थी। बच्चे बिना दर्शन के ही बाहर आ गए। इतना दूर दर्शन करने आए और दर्शन न मिले तो इससे बड़ा दुख और क्या होगा। अंदर जो गार्ड (सुरक्षाकर्मी) लगे हैं, उनका व्यवहार बहुत गंदा है। यहाँ भी कॉरिडोर बनना चाहिए।”
श्रद्धालु बोले- बाँके बिहारी मंदिर का भी कॉरिडोर बनना चाहिए
दर्शन करके लौटे एक युवा भक्त ने बताया, “काशी, उज्जैन, अयोध्या जैसा यहाँ भी कॉरिडोर बन जाएगा तो भक्तों को सुविधा हो जाएगी। यहाँ भक्तों के लिए न पीने का पानी है और न आराम करने की जगह।”
एक अन्य भक्त ने बताया, “पहले हम रोज आते थे। लेकिन जब से हादसे होने लगे तो महीने में एक बार आते हैं। कई बार भीड़ ज्यादा देखकर हम लोग लौट जाते हैं। कॉरिडोर जरूर बनना चाहिए।”
मंदिर के गेट नंबर 1 के सामने एक दुकान पर बैठकर रबड़ी खा रहे हरिद्वार से आए एक भक्त ने कहा, “जैसे गुरुद्वारों में भक्तों के लिए व्यवस्था होती है, वैसी हमारे किसी भी धार्मिक स्थल पर सुविधाएँ नहीं हैं। यही हाल वृंदावन का है। मंदिर कमेटियाँ पैसे के लालच में ही रहती हैं। यदि यहाँ कॉरिडोर बन जाए तो 10 गुना श्रद्धालुओं के साथ काम भी बढ़ जाएगा।”
बाँके बिहारी मंदिर में दर्शन के लिए उमड़े श्रद्धालु (फोटो: ऑपइंडिया)
शाम के समय 5:30 बजे मंदिर के कपाट खुलने थे। लेकिन 3 बजे से ही भक्तों की भीड़ आनी शुरू हो गई थी। 5:30 बजते-बजते श्रद्धालुओं की करीब 250 मीटर लंबी लाइन लग चुकी थी।
इस बीच भक्त तेज धूप में गेट नंबर 1 पर मंदिर के पट खुलने के इंतजार में जमीन पर बैठे पंखा हिला रहे थे। भक्तों की भीड़ कैमरे को देखते ही सामूहिक तौर पर राधे-राधे का जयकारा लगाने लगती है और बातचीत में कॉरिडोर निर्माण का समर्थन करती है।
कारोबारियों का दावा- मंदिर कमेटी ने नहीं की कोई व्यवस्था
राजकुमार खंडेलवाल की दुकान 1948 से ही मंदिर की मुख्य गली में है। उन्होंने ऑपइंडिया को बताया, “कॉरिडोर बनना चाहिए। लेकिन दुकान और मकान वालों को मुआवजा मिले।” उन्होंने गली की तरफ दिखाते हुए कहा, “यहाँ की व्यवस्था बहुत ही खराब। नालियाँ जाम पड़ी हैं। चारों और गंदगी है। जूते-चप्पल बिखरे रहते हैं। यात्रियों के लिए लॉकर रूम, टॉयलेट जैसी सुविधा नहीं है। पीने का पानी तक उपलब्ध नहीं है।”
वे कहते हैं, “इसे आप प्रशासन की कमी समझें या फिर मंदिर कमेटी की, श्रद्धालुओं के बैठने का कोई स्थान नहीं है। मंदिर कमेटी की लापरवाही के कारण ही 2022 में हादसा हुआ था।”
कॉरिडोर निर्माण का कारोबारी गोविंद भी समर्थन करते हैं। उन्होंने कहा, “कॉरिडोर समय की माँग है। हम इसके लिए हाईकोर्ट तक गए थे। लेकिन यह ध्यान रखना चाहिए कि कॉरिडोर बनने से वृंदावन की कुंज गलियों का महत्व और यहाँ की प्राचीनता नष्ट नहीं हो।” उनका यह भी कहना था कि कॉरिडोर निर्माण से पहले सरकार को भीड़ मैनेजमेंट पर ध्यान देना चाहिए।
कारोबारी नवीन गौतम ने बताया, “हम कॉरिडोर निर्माण के विरोध में नहीं हैं। लेकिन वृंदावन का स्वरूप नहीं बदलना चाहिए। गोस्वामी समाज की ओर इशारा करते हुए कहते हैं कि जहाँ सांप है सरकार वहीं लाठी चलाए। हमारे ठाकुर जी को कोई नहीं ले जा सकता।”
ऐसा नहीं है कि सभी कारोबारी कॉरिडोर का समर्थन ही कर रहे हैं। कुछेक इसके विरोध में भी हैं। हमने पाया कि ज्यादातर कारोबारी इस मामले पर खुलकर कैमरे के सामने बात करने से भी बचते रहे थे।
बाँके बिहारी कॉरिडोर का विरोध क्यों कर रहे सेवायत गोस्वामी समाज?
मंदिर के प्रांगण में मौजूद सेवादार श्रीनाथ गोस्वामी ने ऑपइंडिया से बातचीत में कहा, “यहाँ कॉरिडोर की कोई आवश्यकता नहीं है। हमने सरकार को दो अन्य विकल्प सुझाए थे। लेकिन सरकार ने उन विकल्पों की तरफ ध्यान ही नहीं दिया। 2016 में इसी तरह के कॉरिडोर का प्रस्ताव जब अखिलेश यादव लेकर आए थे, तब योगी आदित्यनाथ ने विरोध किया था। आज वे खुद इस कॉरिडोर का समर्थन क्यों कर रहे हैं, यह समझ नहीं आ रहा।”
गोस्वामी समाज कॉरिडोर का कर रहा है विरोध (फोटो: ऑपइंडिया)
गोपेश गोस्वामी मंदिर कमेटी के प्रवक्ता रह चुके हैं। वर्तमान में मंदिर के शयनभोग सेवाधिकारी हैं। ऑपइंडिया ने उनसे कॉरिडोर के विरोध की वजह पूछी। उन्होंने सबसे पहले ‘वृंदावन में बढ़ती भीड़’ के आँकड़ों को अविश्वनीय कहा। कहा कि वृंदावन में इतनी भीड़ ही नहीं है कि मंदिर और उसके आसपास के इलाके का स्वरुप किसी भी तरह से बदलने की जरूरत हो। उन्होंने योगी आदित्यनाथ सरकार की परियोजना तीर्थ विकास परिषद् को इस पूरे विवाद की जड़ में बताया।
उन्होंने कहा, “इस परिषद् के गठन का उद्देश्य वृन्दावन के अन्य मंदिरों तक भक्तों को पहुँचाना था। लेकिन परिषद् अपने काम में विफल रहा। इसके उपाध्यक्ष शैलजाकान्त मिश्र मंदिर के काम में सदैव से सरकारी दखल चाहते हैं। कॉरिडोर कुछ अधिकारियों और भूमाफियाओं के गठजोड़ का नतीजा है।”
राजयोग सेवाधिकारी ज्ञानेन्द्र किशोर गोस्वामी का कहना है, “अब हमारे पास दो विकल्प बचते हैं। या तो हमें पलायन करना होगा, या फिर आत्महत्या के लिए मजबूर होना पड़ेगा। उनका कहना है यह कॉरिडोर केवल VIP के लिए बन रहा है। जब तक मंदिर की व्यवस्था हमारे हाथ में थी, कभी कोई अव्यवस्था नहीं रही।”
बाँके बिहारी कॉरिडोर के विरोध में एकत्र हुईं गोस्वामी समाज की महिलाएँ (फोटो: ऑपइंडिया)
जब हम गोस्वामी समाज के लोगों से बातचीत कर रहे थे उस दौरान इस समाज की महिलाएँ भी बाँके बिहारी मंदिर के बाहर विरोध-प्रदर्शन करने के लिए एकत्र हुईं थी। उनका कहना था कि एक महंत होकर भी योगी आदित्यनाथ उनकी बात नहीं सुन रहे हैं। तिरुपति मंदिर के चर्बी वाले लड्डू की घटना का उदाहरण देते हुए उनका कहना था कि सरकारी नियंत्रण के बाद इसी तरह की अव्यवस्था यहाँ भी देखने को मिलेगी।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने कॉरिडोर के निर्माण के लिए जमीन खरीदने की उत्तर प्रदेश सरकार को अनुमति दे दी है। जमीन की रजिस्ट्री श्री बाँके बिहारी के नाम पर होगी। साथ ही सरकार मंदिर के पैसे का इस्तेमाल भी इस कार्य में कर सकेगी। माना जा रहा है कि कॉरिडोर बनने के बाद 10 हजार से अधिक श्रद्धालु एक साथ दर्शन कर सकेंगे। इस फैसले के बाद बाँके बिहारी मंदिर के लिए यूपी सरकार ने ट्रस्ट की भी स्थापना कर दी है।