उत्तर प्रदेश के मथुरा में बकरीद पर गोवंश की हत्या करने का मामला सामने आया है। गोवंश के अंग सड़क किनारे लटके मिले हैं। मामले में हिंदू संगठन के कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन किया। उन्होंने विरोध प्रदर्शन कर आरोपितों की गिरफ्तारी की माँग की। पुलिस ने इस मामले में 50 से ज्यादा लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की है।
पुलिस द्वारा दर्ज की गई FIR के अनुसार, 07 जून 2025 की रात 8 बजे बकरीद के मौके पर बरसाना रोड स्थित ईदगाह के सामने कसाईपाड़े पर गोवंश काटा गया। FIR में आरोप लगाया गया है कि गोवंश बचे अवशेषों को सड़क के किनारे लटका दिया गया है।
मामले में मथुरा के गोवर्धन क्षेत्र के रहने वाले 50 से अधिक लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है। इनमें साकिर, समीर, सोहिल, अनवर वकील, इन्तजार, अंसार, पिन्टू, आसीन, ओशो, स्टार, फाजल, शाहरूख, हन्नी कुरैशी, आरिफ, धौसी, बाबू, घोसी, सनी, उस्मान, फिरोज, रशीद, नज्जू, चाँद, फारूख, सोहेल समेत 50 अज्ञात लोग शामिल हैं।
घटना की FIR कॉपी ऑपइंडिया के पास मौजूद है। धीरज कौशिक नाम के व्यक्ति ने मामले को लेकर FIR दर्ज कराई है। पुलिस से की शिकायत में बताया गया कि ये कृत्य हिंदुओं को ठेस पहुँचाने के लिए अंजाम दिया गया है।
हिंदू संगठन का विरोध प्रदर्शन
घटना की सूचना मिलते ही स्थानीय लोग और हिंदू संगठनों ने इलाके में जमकर विरोध किया। आरोपितों के खिलाफ कार्रवाई की माँग को लेकर जमकर विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि अगर गोवर्धन जैसे धार्मिक स्थल पर गाय सुरक्षित नहीं है, तो देश में कहीं भी गाय सुरक्षित नहीं रही जाएगी।
? मथुरा : गोवर्धन में मुस्लिम बस्ती के समीप मिले अवशेष ?
? गौ रक्षक दल ने गोवंश अवशेष होने का किया दावा ? स्थानीय लोग और गौ रक्षकों में भारी आक्रोश ? गोवर्धन थाना पुलिस ने अवशेषों को कब्जे में लिया ? SSP के आदेश के बाद अज्ञात के खिलाफ मुकदमा दर्ज ? घटना के सीसीटीवी फुटेज… pic.twitter.com/tIQwfseMUH
— भारत समाचार | Bharat Samachar (@bstvlive) June 8, 2025
सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुँची और स्थिति को नियंत्रित किया। पुलिस ने गोवंश के अवशेषों को कब्जे में लेकर फोरेंसिक जाँच के लिए भेज दिया है। इसके साथ 50 से अधिक लोगों के खिलाफ दर्ज FIR दर्ज कर आरोपितों की तलाश शुरू कर दी गई है।
एसपी देहात ने कहा है कि शुरुआती जाँच में यह गोवंश का मांस ही लग रहा है, लेकिन पूर्ण जाँच के बाद ही पुष्टि की जा सकेगी। पुलिस ने फिलहाल इलाके में शांति बनाए रखने की अपील की है। उन्होंने कहा कि आरोपितों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
बेंगलुरु में RCB की IPL जीत के जश्न में हुए इवेंट को लेकर पुलिस ने पहले ही कॉन्ग्रेस को चेतावनी दी थी। पुलिस ने कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार को एक पत्र लिखा था। भगदड़ जैसी स्थिति ना बने, इसे रोकने को पुलिस ने कई सिफारिश भी दी थीं। हालाँकि, कॉन्ग्रेस सरकार ने इन्हें नजरअंदाज किया और 11 लोगों की मौत हो गई।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बेंगलुरु में IPL में RCB की जीत का जश्न मनाने के दौरान हुई भगदड़ के एक दिन पहले, DCP एमएन करिबसवाना गौड़ा ने कर्नाटक सरकार को एक पत्र भेज कर सुरक्षा व्यवस्था के लिए आगाह किया था।
इसमें उन्होंने मंगलवार (3 जून 2025) को विधान सौधा में बड़े पैमाने पर फैंस के जमा होने की संभावना और सुरक्षा कर्मियों की कमी के कारण व्यवस्था को लेकर गंभीर चेतावनी दी थी।DCP गौड़ा ने सुरक्षा के लिए अतिरिक्त पुलिस की तैनाती, ट्रैफिक नियंत्रण, एंटी-ड्रोन सिस्टम लगाने और सचिवालय में आधा दिन की छुट्टी घोषित करने समेत कई सिफारिशें की थी।
उन्होंने सचिवालय कर्मचारियों को अपने परिवार को कार्यक्रम में न लाने का आग्रह किया था। इन सभी सिफारिशों को कॉन्ग्रेस सरकार ने नजरअंदाज किया और 4 जून 2025 को हुए कार्यक्रम में व्यवस्था में चूक हुई और भारी भीड़ के कारण भगदड़ मच गई।
— ChristinMathewPhilip (@ChristinMP_) June 4, 2025
इस भगदड़ में 11 लोगों की मौत हो गई, इस घटना के बाद पुलिस ने अब तक 4 लोगों को गिरफ्तार किया है। कर्नाटक पुलिस ने RCB, DNA एंटरटेनमेंट और कर्नाटक राज्य क्रिकेट संघ (KSCA) के खिलाफ गैर इरादतन हत्या के तहत FIR दर्ज की है।
घटना के बाद कर्नाटक सरकार की सुरक्षा व्यवस्था और आयोजन की तैयारी पर गंभीर सवाल उठे हैं। पुलिस द्वारा दी गई पूर्व चेतावनी को नजरअंदाज करना और सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम न करना सरकार के लिए शर्मनाक साबित हुआ है। इसके कारण अब सरकार की ओर से जवाब माँगे जाने और सुरक्षा प्रबंधों में सुधार की संभावना जताई जा रही है।
हाला की मामले की जाँच अब पुलिस के साथ-साथ CID के अधिकारियों ने भी शनिवार (7 जून, 2025) से जाँच शुरु कर दी है। उन्होंने प्रवेश द्वार, भगदड़ वाले स्थान और कार्यालय के साथ-साथ अन्य स्थानों की भी जाँच की।
वही कर्नाटक सरकार ने 4 जून को बेंगलुरु में हुई भगदड़ की घटना की जाँच के लिए सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जॉन माइकल कुन्हा की एक सदस्यीय जाँच आयोग का गठन किया है।
“जैसे हम अपनी माँ को नहीं छोड़ सकते हैं, वैसे ही हम अपनी मातृभाषा को नहीं छोड़ सकते”
साल 2022 में ये बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मासिक रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ के एक एपिसोड में कही थी। उस वक्त उन्होंने देश की जनता से अपील की थी कि हर कोई अपनी मातृभाषा बोले और उस पर गर्व भी करे। ये केवल प्रधानमंत्री का एक कथन मात्र नहीं था बल्कि उनकी एक कोशिश थी ताकि वो हर भाषा को सम्मान दिला सकें।
अब जब बतौर प्रधानमंत्री, नरेंद्र मोदी के कार्यकाल को 11 साल हो चुके हैं। ऐसे में हमें उन कार्यों पर भी गौर करना चाहिए जो उनकी नेतृत्व वाली सरकार ने स्थानीय भाषाओं और बोलियों के संरक्षण/संवर्धन, विकास को लेकर किया है।
आगे बढ़ने से पहले बता दें कि ये मुद्दा इसलिए भी अहम है क्योंकि भाषा ऐसा टॉपिक रहा है जिसको 1952 की जनगणना के बाद नेहरू ने भी तवज्जो नहीं दी थी। वहीं जब इंदिरा गाँधी सरकार आई तो उन्होंने भी भारतीय भाषाओं के साथ ऐसा अन्याय किया था जिसे कभी नहीं भूला जा सकता। उनकी सरकार ने 1971 की जनगणना के बाद उन भाषाओं के अस्तित्व को ही नकार दिया जिसे बोलने वालों की संख्या 10000 से कम थी। उन्होंने ऐसी भाषा को ‘अन्य भाषाओं’ की श्रेणी में रखा।
तो, ऐसे संघर्षों के साथ जिस देश में भाषा का इतिहास रहा हो, वहाँ तब में और अब में तुलना करना इतना भी मुश्किल नहीं है।
2014 से पहले क्षेत्रीय भाषाओं को सरकार का इतना समर्थन प्राप्त नहीं था, बोलियों को इतना महत्व नहीं दिया जाता था। मगर, मोदी सरकार आने के बाद ये तस्वीर बदली। जितना महत्व अंग्रेजी को दिया गया, उतना ही हिंदी को भी और जितना सम्मान संस्कृत को मिला, उतना ही पंजाबी, बंगाली, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, उड़िया को भी।
11 साल पहले भारतीय भाषाएँ जो चुनौतियों को सामने कर रही थीं वो धीरे-धीरे खत्म होने लगीं। भाषाओं के मानकीकरण पर काम होने लगा। बोलियों को महत्व दिया जाने लगा। नौकरियों के अवसर बढ़ने लगे।
टेक्स्ट किताबों का अनुवाद उन लोकल लैंग्वेज में भी होने लगा जिन्हें कोई पूछता नहीं था। जो भाषाई विवाद इस बीच हुए भी उन्हें मोदी सरकार ने सूझ-बूझ से सुलझाया और इस पूरे परिदृश्य को बदलने में उन्हें सिर्फ मौखिक मेहनत नहीं लगी बल्कि हर पल इस के लिए काम हुआ।
साल 2021 में केंद्रीय हिंदी समिति की बैठक हुई। इस बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पाँच और भाषाओं को शास्त्रीय भाषाओं के दर्जे से सुशोभित किया गया। इस फैसले के साथ ही भारत पहला ऐसा देश बना जहाँ 11 भाषाएँ क्लासिकल लैंग्वेज के तौर पर जानी जाती हैं। इतना ही नहीं सरकार ने, जो अकादमिक स्तर पर भाषा का प्रचार करके उसे बच्चे-बच्चे तक पहुँचाने का कार्य किया, वह उल्लेखनीय है।
इस दिशा में केवल प्राइमरी से लेकर 12 वीं तक की पढ़ाई को नहीं…इंजीनियरिंग, मेडिकल की पढ़ाई का कंटेंट भी भारतीय भाषाओं में आना शुरू हुआ। इस तरह युवाओं से लेकर बच्चे-बच्चे तक मातृभाषा पहुँचने लगी।
‘हिंदी शब्दसिंधु’ जैसी डिजिटल डिक्शनरी तैयार की गई जिसमें हिंदी-अंग्रेजी शब्दों के हर संदर्भ में मायने बताए गए। इसमें अलग-अलग क्षेत्र की शब्दावलियों को जोड़ा गया। हर लोकोक्ति- मुहावरे का अर्थ बताया गया और हर वो प्रयास किए गए जिससे लोगों के उनके सर्च के हिसाब से सहज नतीजे मिल सकें।
हाल की बात करें तो 2024 में भी हिंदी दिवस के मौके परभारतीय भाषा अनुभाग की स्थापना की गई। इसका उद्देश्य ही यही है ताकि क्षेत्रीय भाषाओं का महत्व सरकारी काम-काज में कभी खत्म न हो।
जैसे इसके लिए यूनिवर्सल ट्रांसलेशन सिस्टम तैयार हुआ है। इसके लिए C-DAC और भारतीय भाषा अनुभाग ने मिलकर काम किया ताकि इस तंत्र के जरिए केंद्र और राज्य के बीच आधिकारिक बातचीत बिन किसी भाषा विवाद के हो सके और साथ ही क्षेत्रीय भाषा का भी प्रचार हो सके।
कंठस्थ 3.0 और बहुभाषी जैसे बहुभाषीय अनुवाद सॉफ्टवेयर तैयार किए गए जिनके जरिए हिंदी और अन्य 15 भाषाओं के बीच की दूरियाँ सिमटीं। इसके अलावा ‘प्रोजेक्ट अस्मिता’ लाया गया जिसका उद्देश्य ही 5 सालों में 22000 किताबों को भारतीय भाषाओं में अनुवाद करना है।
BJP ने किया स्थानीय भाषाओं का प्रचार, युवाओं में बढ़ा मातृभाषा के लिए प्यार
गौरतलब है कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार में हमेशा से लोकल भाषाओं को महत्व देने का चलन रहा है। मोदी सरकार से पहले जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी तब बोदी, डोगरी, मैथिली और संथाली जैसी क्षेत्रीय भाषाओं को सम्मान मिला था। इसके बाद 2014 में प्रधानमंत्री मोदी बने और ओडिया, मराठी, पाली, प्राकृत, असमी, बंगाली भाषा को भी शास्त्रीय भाषाओं का दर्जा मिला।
इसके अलावा मोदी सरकार ने संस्कृत भाषा, तमिल, कन्नड़, तेलुगु, मलयालम और उड़िया जैसी भाषाओं के लिए विशेष शैक्षणिक संस्थान खोले, जिनके लिए ऐसा नहीं हुआ उनके लिए अलग से विशेष कोर्स शुरू करवाए गए।
आपको जानकर ये भी हैरानी होगी कि पिछले एक दशक में इन भाषाओं को उठाने के लिए मोदी सरकार की ओर से 130 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। इनमें सबसे ज्यादा तमिल के लिए 100 करोड़ रुपए दिए गए। तेलुगु और कन्नड़ को 11-12 करोड़ दिए गए। मलयालम और उड़िया को करीबन 16 करोड़… वहीं संस्कृत के प्रचार के लिए उसकी यूनिवर्सिटी के जरिए 2017 से 2022 के बीच में अब तक 1074 करोड़ दिए गए हैं।
इसी तरह राष्ट्रीय शिक्षा नीति के जरिए भी मातृभाषा, क्षेत्रीय भाषाओं के उत्थान पर काम हो रहा है। पढ़ाने के लिए तरीके बदले जा रहे हैं। कविता-कहानियों के जरिए बच्चों को इनसे जोड़ा जा रहा है। जो लोग पहले क्षेत्रीय भाषाओं में पढ़ाई को कमजोरी मानते थे उन्हें अब नई नीतियों से बल मिला है कि वो भी लोकल लैंग्वेज में पढ़कर बाहरी दुनिया में उतने ही योग्य हैं जितना अंग्रेजी-हिंदी पढ़ने वाला। इस नई नीति ने जनजातीय भाषाओं को संरक्षित करने का काम किया है।
तकनीकी कोर्स हों या वोकेशनल कोर्स… सबको क्षेत्रीय भाषाओं में लाने के प्रयास हो रहे हैं ताकि स्थानीय बोलने वाला भी उनसे ज्ञान अर्जित कर सकें। सरकार ने 200 PM E-एजुकेशन चैनल भी खोले हैं ताकि हर भाषा का व्यक्ति वहाँ से जैसा कंटेंट जिस भाषा में चाहता है ले सके। इसी प्रकार दीक्षा प्लेटफॉर्म है जो 366370 से ज्यादा ई-कंटेंट 133 भाषाओं में उपलब्ध करवाता है इनमें 126 भारतीय हैं जबकि 7 विदेशी। अनुवादिनी ऐप आज मौजूद है जो 11 भाषाओं का अनुवाद उपलब्ध करवाता है।
इतना ही नहीं ये मोदी सरकार के प्रयास का ही परिणाम है कि अब JEE, NEET, CUET जैसी प्रतियोगिता परीक्षाएँ तक 13 क्षेत्रीय भाषाओं में आयोजित करवाई जाती हैं। सरकारी जॉब के लिए परीक्षाएँ 15 भाषाओं में होती हैं। तमिल-तेलुगु में लिखे साहित्यों को हिंदी भाषी भी पढ़ते हैं। महर्षि अगस्त्य के लिखी सामग्री पर, तमिल साहित्य में दिए उनके योगदान पर चर्चा होती है। काशी-तमिल, काशी-तेलुगु, काशी सौराष्ट्र संगमम जैसे पहलों से भारत की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि और विविध भाषाओं की केवल देश में नहीं विदेशों में भी चर्चा होती है और देश अपनी विविधताओं पर गर्व कर पाता है।
त्रिपुरा के मंडई गाँव में 8 जून 1980 को एक भीड़ ने सैकड़ों बंगाली हिंदुओं की हत्या कर दी थी। इस घटना में करीब 350 से 400 लोग मारे गए, जिसके बाद इस नरसंहार को ‘मंडई नरसंहार’ के नाम से जाना गया और यह स्वतंत्र भारत में जातीय व धार्मिक हिंसा की सबसे भयानक घटनाओं में से एक बन गई।
मंडई गाँव, त्रिपुरा की राजधानी अगरतला से लगभग 30 किलोमीटर दूर है। वहाँ बड़ी संख्या में जनजातीय लोग रहते थे। यहाँ रहने वाले बंगाली हिंदू अल्पसंख्यक थे, जो 20 साल पहले बांग्लादेश (तब के पूर्वी पाकिस्तान) से शरणार्थी बनकर आए थे।
1970 के दशक की क्षेत्रीय राजनीति और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद त्रिपुरा में बड़ी संख्या में बंगाली हिंदू शरणार्थियों के आने से जनजातीय आबादी में नाराजगी बनी हुई थी। इसी माहौल में बंगाली विरोधी भावना के आधार पर एक कट्टरपंथी जनजातीय राजनीतिक पार्टी ‘त्रिपुरा उपजाति जुबा समिति (TJUS)’ का उदय हुआ।
16 जून, 1980 को पिट्सबर्ग पोस्ट-गजट द्वारा मंडाई नरसंहार पर प्रकाशित एक लेख का स्क्रीनशॉट
मंडई नरसंहार पीछे माहौल तैयार करने में त्रिपुरा के सशस्त्र जनजातीय चरमपंथी समूह जैसे त्रिपुरा नेशनल वॉलंटियर्स (TNV) और संगक्राक आर्मी ने अहम भूमिका निभाई। इन समूहों ने उस समय की उग्र राजनीतिक स्थिति का फायदा उठाया।
नरसंहार से पहले की एक घटना ने तनाव को और भड़का दिया, जब लेम्बुचेरा बाजार में कुछ दुकानदार (जो शायद बंगाली था) उसने एक जनजातीय लड़के पर हमला किया। इसके बाद 1000 से ज्यादा जनजातियों की भीड़ ने बाजार पर हमला कर दिया, दुकानों में तोड़फोड़ की और लोगों को मार डाला।
त्रिपुरा उपजाति जुबा समिति (TJUS) के आंदोलन के चलते बाजार एक हफ्ते तक बंद रहा, जिससे माहौल और भी तनावपूर्ण हो गया। सशस्त्र जनजातीय चरमपंथी समूह ‘सांगक्राक आर्मी’, जो मिजो नेशनल फ्रंट (MNF) से हथियार खरीद रहा था, उसने हालात का फायदा उठाते हुए थेलाकुंग और गुलिराई जैसे बाजारों पर हमला किया।
इसके बाद 8 जून 1980 को करीब 1,000 जनजातीय लोगों की भीड़ ने हथियारों के साथ जिनमें बंदूक, भाला, तलवार, धनुष-तीर और दाओस (दरांती) लेकर मंडई गाँव के बंगाली हिंदू निवासियों पर अचानक हमला कर दिया, जिससे एक अलग ही हिंसा भड़क उठी।
16 जून, 1980 को सेंट जोसेफ गजट द्वारा मंडई नरसंहार पर प्रकाशित एक लेख का स्क्रीनशॉट सेंट जोसेफ गजट
चरमपंथियों ने पहले बंगाली हिंदू ग्रामीणों से पैसे की माँग की, जिनके पास मौजूद करीब 250 डॉलर (लगभग ₹21000) की सारी नकदी ले ली। इसके बाद पीड़ितों को गाँव के बाजार क्षेत्र में इकट्ठा किया गया और जबरन अपने घरों को जलते हुए देखने के लिए मजबूर किया गया।
टाइम मैगज़ीन की एक रिपोर्ट जो (दिनांक 30 जून 1980) में प्रकाशित हुई थी। उसके अनुसार “मंडई गाँव में सबसे भयानक नरसंहार में, जनजातियों ने पहले पैसे की माँग की, फिर गाँव के बाजार में बंगालियों को घेर लिया। भयभीत निवासियों को ये सब देखने के लिए मजबूर होना पड़ा, जबकि बंदूकों, भालों और दरांतियों से लैस जनजातियों ने घरों में आग लगा दी और उनमें रहने वालों को मार डाला।”
चरमपंथियों ने मंडई में हमला करते समय कोई दया नहीं दिखाई। भारतीय सेना को गाँव में कम से कम 350 बंगाली हिंदुओं के शव मिले, जिनके सिर कुचले हुए थे, अंग कटे हुए थे और बच्चों को चाकू से मारा गया था। कई सड़ी-गली लाशें नदियों में तैरती मिलीं।
एक दर्दनाक मामला 6 महीने के शिशु का था, जिसका शव उसकी माँ की लाश के पास टुकड़ों में फेंका गया था। सेना को पीड़ितों को उथली कब्रों में दफनाना पड़ा। मंडई पूरी तरह खंडहर में बदल गया था, चारों तरफ राख, जली हुई दीवारें, टूटे हुए बर्तन और सिलाई मशीनें बिखरी थीं।
पीड़ितों को समय पर पुलिस सुरक्षा नहीं मिल पाई, क्योंकि सबसे नजदीकी पुलिस चौकी लगभग 11 किलोमीटर दूर जिरानिया में थी।
17 जून, 1980 को द मॉन्ट्रियल गजट द्वारा मंडई नरसंहार पर प्रकाशित एक लेख का स्क्रीनशॉट
मंडई नरसंहार के बाद त्रिपुरा के अन्य जिलों में भी हिंसा और आगजनी की घटनाएँ हुईं। अनुमान है कि इस हिंसा में 2,000 से 10,000 लोगों की मौत हुई। हिंसक और पूर्व नियोजित हमलों के चलते करीब 1,50,000 से 2,00,000 लोग जिनमें ज्यादातर बंगाली थे, अपने घर छोड़कर विस्थापित हो गए।
मंडई में भारतीय सेना की टुकड़ी 9 जून 1980 को कमांडर मेजर R राजमणि ने हत्याओं की क्रूरता की तुलना वियतनाम में हुए ‘1968 माई लाई नरसंहार’ से की। न्यूयॉर्क टाइम्स से बात करते हुए उन्होंने कहा, “मैंने माई लाई के बारे में सुना है। मुझे आश्चर्य है कि क्या वह यहाँ की तुलना में आधी भी भयानक थी।”
उन्होंने आगे कहा, “उस पहले दिन, मैंने एक 6 महीने के बच्चे को दो टुकड़ों में कटा हुआ देखा और प्रत्येक टुकड़ा उसकी मृत माँ के दोनों ओर पड़ा हुआ था। मैंने ऐसा पहले कभी नहीं देखा, और न ही मैं ऐसा देखना चाहता हूँ।”
17 जून 1980 को द टेलीग्राफ हेराल्ड द्वारा मंडई नरसंहार पर प्रकाशित एक लेख का स्क्रीनशॉट
UNIके एक रिपोर्टर ने मंडई की स्थिति का वर्णन करते हुए लिखा कि वहां खुली कब्रें थीं, जिनमें से एक में से एक हाथ बाहर निकला हुआ था। तत्कालीन पुलिस महानिरीक्षक सत्यव्रत बसु ने इस घटना को स्पष्ट रूप से ‘नरसंहार’ बताया था।
बंगाली हिंदू पीड़ितों ने सुनाई आपबीती
मंडई नरसंहार में जीवित बचे लोगों में से एक 20 वर्षीय बंगाली नाई हरधेम सील था, जिसने इस भयावह हमले में अपने माता-पिता, तीन बहनों और तीन भाइयों को खो दिया था। उन्होंने टाइम पत्रिका को बताया, “हर जगह खून ही खून था। एक आदमी ने मुझे अपने दाओ से मारा। मैं गिर पड़ा, फिर कई लाशें मेरे ऊपर गिरीं। शायद इसी वजह से मेरी जान बच गई।”
एक जीवित बची सुवर्णा प्रभा देब ने बताया कि मंडई में उनकी दो बेटियों और एक पोते की हत्या कर दी गई, जबकि उनका बेटा गंभीर रूप से घायल हो गया। एक अन्य जीवित बचे 65 वर्षीय अबानी डे ने बताया कि उन्होंने पहले पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में मुस्लिम भीड़ की हिंसा में अपने माता-पिता और बहन को खोया था।
“जब हम आए, तो यहाँ के जनजातीय लोगों ने हमारा स्वागत किया और हमें बसने में मदद की। हमें लगा कि हमें एक सुरक्षित जगह मिल गई है। अब यह। हम कहाँ जा सकते हैं?” उन्होंने मंडई नरसंहार के बाद मीडिया को बताया, जिसमें उन्होंने अपने 15 वर्षीय बेटे को खो दिया था।
उन्होंने दुख जताते हुए कहा, “एक जनजातीय आदमी ने उनके बाल पकड़े और एक दरांती से उनका सिर काट दिया। हम दूर से यह सब देख रहे थे।” एक अन्य जीवित बचे, नागेंद्र साहा (45) ने बताया कि कैसे उनके 2 बेटों को बेरहमी से मार दिया गया।
उन्होंने जोर देकर कहा, “जैसे ही जनजातीय लोग हमारे करीब आए, हमने जोर से प्रार्थना की कि हे भगवान, हमें बचाओ। जैसे ही हम बाहर निकले, उन्होंने हम पर अपने दाओ से हमला कर दिया। एक आदमी ने मेरे सिर पर वार किया और मैं बेहोश हो गया। मुझे मारने से पहले, मैंने देखा कि उसने एक बूढ़ी महिला को ज़मीन पर लेटने के लिए मजबूर किया और दाओ से उसका सिर कुचल दिया। मेरे दो बेटे एक-दूसरे के कुछ सेकंड के भीतर मर गए।”
1980 के मंडई नरसंहार के बाद त्रिपुरा के बंगाली बहुल इलाकों में जनजातीय लोगों पर भी हमले हुए। कई जगहों पर आगजनी हुई और शरणार्थियों का पलायन शुरू हो गया। जनजातीय समुदाय के लिए 12 से अधिक शरणार्थी शिविर बनाए गए। एक पीड़ित सुहेद देब बर्मन ने कहा, “हम अपनी ही ज़मीन पर शरणार्थी बन गए हैं।”
मंडई नरसंहार पर राजनीतिक प्रतिक्रिया
त्रिपुरा के तत्कालीन मुख्यमंत्री नृपेन चक्रवर्ती ने स्पष्ट शब्दों में कहा था, “यह पूरी तरह से पूर्व नियोजित हमला लगता है। वे हत्याओं की होड़ में लगे हुए हैं… लेकिन कोई भी इस तरह के नरसंहार की कल्पना नहीं कर सकता था।”
पीड़ितों ने आरोप लगाया कि इंदिरा गाँधी की नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने त्रिपुरा में बढ़ते जनजातीय असंतोष के बीच समय पर कोई सैन्य सहायता नहीं भेजी। राज्य सरकार को बर्खास्त करने पर विचार हुआ, लेकिन ये कदम नहीं उठाया गया। मंडई नरसंहार के बाद केंद्रीय गृह मंत्री जैल सिंह ने त्रिपुरा का दौरा कर हालात का जायजा लिया।
केंद्र ने राहत के तौर पर 5000 टन चावल भेजा और पीड़ितों के पुनर्वास का आश्वासन दिया। बचे हुए लोगों के लिए अस्थायी शरणार्थी शिविर बनाए गए।
17 जून, 19 को सरसोटा हेराल्ड-ट्रिब्यून द्वारा मंडई नरसंहार पर प्रकाशित एक लेख का स्क्रीनशॉट
त्रिपुरा की बदलती जनसांख्यिकी
त्रिपुरा में जातीय-धार्मिक तनाव की जड़ें दशकों पुरानी हैं। त्रिपुरी शासकों द्वारा बंगालियों को बसाने के प्रोत्साहन, 1947 के विभाजन और 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के बाद बंगालियों की बड़ी संख्या में आबादी बढ़ी, जिससे विवाद पैदा हुआ।
1980 के दशक में जनजातीय समुदायों (जो तेजी से ईसाई बन रहे थे) और बंगाली हिंदुओं के बीच संबंध बेहद तनावपूर्ण हो गए, जिसके चलते हिंसा और नरसंहार की घटनाएँ बढ़ीं। इसी दौरान जनजातीय आबादी घटकर 1971 में सिर्फ 28.95% रह गई, जिससे असंतोष और बढ़ गया।
बंगाली हिंदू आबादी, जिन्हें गैर-जनजातीय कहा जाता है, उन्हे 1947 और 1971 में मुस्लिम भीड़ की हिंसा से बचने के लिए त्रिपुरा जैसे पूर्वोत्तर राज्यों में शरण लेनी पड़ी। हालाँकि, व्यापार, सेवाओं, आर्थिक प्रगति, राजनीतिक प्रभाव और मैदानी इलाकों तक बेहतर पहुँच के चलते इन शरणार्थियों का प्रभाव बढ़ा।
इससे मूल जनजातीय आबादी में असंतोष और उग्रवाद को बढ़ावा मिला। 1980 का मंडई नरसंहार इस जातीय-धार्मिक संघर्ष का एक बड़ा और भयावह उदाहरण था, लेकिन यह आखिरी नहीं था।
2000 में बागबेर नरसंहार के दौरान प्रतिबंधित ईसाई त्रिपुरी संगठन नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (NLFT) के आतंकवादियों ने बंगाली हिंदू शरणार्थियों को गोली मार दी, और 2002 के सिंगिचेरा नरसंहार में 16 निहत्थे बंगाली हिंदुओं की बेरहमी से हत्या कर दी।
उग्रवाद का अंत और एक सकारात्मक पहलू
मंडई नरसंहार ने त्रिपुरा में बंगाली और जनजातीय दोनों ही समुदायों की सामूहिक स्मृति पर गहरे निशान छोड़े, और घटना के बाद गाँव के अधिकांश बंगाली निवासी भाग गए। मंडई 2009 तक उग्रवाद और जनजातीय उग्रवाद का केंद्र बना रहा, लेकिन इसके बाद यहाँ काफी सुधार हुआ।
नवंबर 2015 में यह रिपोर्ट किया गया कि मंडई ब्लॉक ने वित्तीय साक्षरता और समावेशन के क्षेत्र में देश के 6,835 अन्य ब्लॉकों से बेहतर प्रदर्शन किया, जिसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में मंडई ब्लॉक को सम्मानित भी किया।
पूर्व डीएम (पश्चिम त्रिपुरा) अभिषेक सिंह ने बताया, “मंडई ब्लॉक ने बैंकिंग और वित्तीय सेवाओं तक पहुंच प्रदान करने में 100% से अधिक लक्ष्य हासिल किया है और दूसरों के लिए एक आदर्श बन गया है। वित्तीय समावेशन के परिणामस्वरूप, ब्लॉक के अधिक से अधिक जनजातीय लोग अब सरकारी सहायता तक पहुँच के लिए बैंकों से जुड़ रहे हैं।”
त्रिपुरा में जातीय-धार्मिक संघर्ष अब कम हो गए हैं क्योंकि अधिकांश जनजातीय चरमपंथी संगठन आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में शामिल हो चुके हैं। आज त्रिपुरा प्रगति और विकास के नए युग में प्रवेश कर चुका है और अपने पुराने विवादों को पीछे छोड़ रहा है।
भारत के सिंधु जल समझौता निलंबित करने का असर पाकिस्तान पर दिखने लगा है। भीषण गर्मी में पाकिस्तान के बाँध सूख रहे हैं। इन बाँधों से पानी भी कम छोड़ा जा रहा है। इसके चलते पाकिस्तान में खेती पर असर पढ़ने की संभावना है। पानी कम होने का असर सीधे-सीधे आँकड़ों में भी दिखा है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पाकिस्तान में सिंधु नदी पर बने बाँधों से इस वर्ष कम पानी छोड़ा जा रहा है। पिछले वर्ष के मुकाबले इसमें लगभग 15% की कमी आई है। इस बात की पुष्टि आधिकारिक डाटा से हुई है। यह कमी बीते सप्ताह (1 जून 2025-8 जून 2025) में आई है।
सूखे पाकिस्तान के बाँध
पाकिस्तान में सिंधु नदी के सहारे ही खेती और बाकी उद्योग चलते हैं। यह पाकिस्तान के पंजाब समेत बाकी राज्यों की जीवनरेखा सरीखी है। इसी पर कई बाँध भी बनाए गए हैं। अब पाकिस्तान के पंजाब में सिंधु से छोड़ा जाने वाला पानी मात्र 1.24 लाख क्यूसेक रह गया है। पिछले वर्ष यह 1.44 लाख क्यूसेक था।
पाकिस्तान का सबसे महत्वपूर्ण तरबेला बाँध भी सूख रहा है। तरबेला बाँध में सिंधु नदी का स्तर वर्तमान में 1465 मीटर पर है। यह इसके डेड लेवल 1402 मीटर से थोड़ा ही ऊपर है। किसी बाँध का डेड लेवल वह स्तर होता है, जहाँ से पानी को आगे भेजने के लिए पम्प का इस्तेमाल होता है।
इससे ऊपर के स्तर से पानी स्वयं ही आगे बह जाता है। यह हाल सिर्फ तरबेला बाँध का ही नहीं है बल्कि सिंधु नदी पर ही बने चश्मा बाँध का भी यही हाल है। पाकिस्तान के मियांवाली में बने इस बाँध में पानी का स्तर, डेड लेवल मात्र से 6 मीटर ही ऊपर है। यहाँ डेड लेवल 638 मीटर का है, जबकि यहाँ पानी का स्तर 644 मीटर है।
इस भीषण गर्मी में पानी की लगातार माँग बढ़ने वाली है, ऐसे में जल्द ही पाकिस्तान को और पानी इन बाँधों से छोड़ना पड़ेगा। तब यह डेड लेवल पर जा सकते हैं। पाकिस्तान के एक और महत्वपूर्ण मंगला बाँध में भी यही हाल है। यह झेलम नदी पर पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में बना है।
इसमें भी डेड लेवल 1050 मीटर के निकट ही 1163 मीटर पर पानी आ चुका है। इस पानी की कमी से पाकिस्तान में केवल खेती ही नहीं बल्कि बिजली का उत्पादन भी प्रभावित होने वाला है। पाकिस्तान इन बाँधों से बनने वाली पनबिजली पर बड़े स्तर पर निर्भर है।
खरीफ बुवाई में 21% पानी की कमी
पाकिस्तान का पंजाब और सिंध प्रांत बड़े स्तर पर सिंधु नदी से आने वाले पानी पर निर्भर है, इसी से यहाँ खेती होती है। हाल ही में आई एक रिपोर्ट कहती है कि 10 जून, 2025 तक चलने वाली खरीफ की बुवाई में 21% पानी की कमी पाकिस्तान को इस वर्ष झेलनी पड़ेगी। यह असर सीधे तौर पर भारत के एक्शन का होगा।
पानी की कमी से परेशान पाकिस्तान अब लगातार भारत से सिंधु जल समझौते पर बात करने की गुहार लगा रहा है। उसने सिंधु जल समझौता निलंबित किए जाने के बाद 4 बार भारत को पत्र लिख कर ऐसा ना करने की गुहार लगाई है। पाकिस्तान ने यह पत्र भारत के जलशक्ति मंत्रालय को लिखे हैं। हालाँकि, भारत अपने स्टैंड पर कायम है।
क्या है सिन्धु जल समझौता?
भारत और पाकिस्तान, एक ही भूभाग का हिस्सा है। भारत से कई नदियाँ बह कर पाकिस्तान जाती हैं। सिंधु नदी तंत्र की नदियाँ पाकिस्तान के पानी का सबसे बड़ा स्रोत हैं। इन्हीं के पानी के बँटवारे को लेकर किया गया समझौता सिंधु जल समझौताकहलाता है।
यह समझौता वर्ष 1960 में हुआ था। इसके लिए लगभग एक दशक तक बातचीत पाकिस्तान और भारत के बीच चली थी। तब प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और पाकिस्तान के तानाशाह अयूब खान ने इसको मंजूरी दी थी। सिंधु जल समझौते के तहत सिंधु नदी तंत्र की 6 नदियों (व्यास, रावी, सतलुज, सिन्धु, चेनाब और झेलम) के पानी का बँटवारा होता है।
इस जल समझौते के अनुसार, पूर्वी नदियाँ (व्यास, रावी और सतलुज) के पानी पर पूरा अधिकार भारत का है। यानी इनमें बहने वाले पानी का वह किसी भी तरह से इस्तेमाल कर सकता है। भारत इन नदियों पर बाँध बना सकता है, उनकी जलधाराएँ मोड़ सकता है, उनसे नहरें निकाल सकता है और पूरा उपयोग कर सकता है।
सिंधु जल समझौते के अनुच्छेद 2 का खंड (1) कहता है, “पूर्वी नदियों का पूरा पानी भारत के अप्रतिबंधित उपयोग के लिए उपलब्ध रहेगा, सिवाय इसके कि इस अनुच्छेद में अन्यथा अलग से उसके लिए कोई प्रावधान किया गया हो।” पूर्वी नदियों को लेकर पाकिस्तान को दखलअंदाजी करने का कोई अधिकार नहीं है।
इसको लेकर भी अनुच्छेद 2 के खंड (2) में प्रावधान है। इसमें लिखा है, “घरेलू उपयोग को छोड़कर, पाकिस्तान सतलुज और रावी नदियों के पानी को बहने देने के लिए बाध्य होगा और उन स्थानों पर इनके पानी में किसी भी तरह का हस्तक्षेप नहीं होने देगा, जहाँ ये पाकिस्तान में बहती हैं और अभी तक पूरी तरह से पाकिस्तान में प्रवेश नहीं कर पाई हैं।”
दरअसल, यह नदियाँ पाकिस्तान में अंतिम रूप से घुसने से पहले कई बार दोनों सीमाओं के इधर-उधर बहती हैं। पूर्वी नदियों के अलावा बाक़ी पश्चिमी नदियों (सिंधु, झेलम, चेनाब) के पानी पर पूरा अधिकार पाकिस्तान का है। समझौता के अनुसार, भारत इन नदियों को लेकर कोई भी रोक नहीं लगा सकता।
समझौते का अनुच्छेद 3 का भाग (2) कहता है, “भारत पश्चिमी नदियों के जल को बहने देने के लिए बाध्य होगा, और इसमें किसी भी तरह के हस्तक्षेप की अनुमति नहीं देगा, कुछ परिस्थितियों को छोड़ कर।” यह परिस्थितियाँ घरेलू उपयोग और कृषि उपयोग से जुड़ी हुई हैं।
इस समझौते के तहत इन 6 नदियों के लगभग 70%-80% पानी पर पाकिस्तान को जबकि 20%-30% पानी पर भारत को अधिकार मिलता है। इसको लेकर पहले भी प्रश्न उठाए जाते रहे हैं कि इसका सीधा फायदा पाकिस्तान को मिला है और भारत का इससे कोई लाभ नहीं है।
अब जब भारत ने 22 अप्रैल, 2025 को हुए पहलगाम हमले के बाद ने यह समझौता रद्द कर दिया है, तो पाकिस्तान में पानी की कमी साफ़ तौर पर दिखने लगी है।
भारत ने वर्ष 12 वर्षों में लगभग 27 करोड़ लोगों को निर्धनता से बाहर निकाला है। अब भारत में लगभग 5% लोग ही निर्धनता में रह रहे है, जिनके लिए काम चल रहा है। यह सारी जानकारी वर्ल्ड बैंक ने अपनी एक रिपोर्ट में दी है।
वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2011-12 में भारत में अत्यंत निर्धनता में रहने वालों की संख्या 34.4 करोड़ से अधिक थी। वर्ष 2022-23 में यह संख्या 7.5 करोड़ हो गई। यानी इसमें लगभग तीन चौथाई से अधिक की कमी आई।
वर्ल्ड बैंक के अनुसार, वर्ष 2011-12 में 27% लोग भारत में अत्यंत निर्धनता में रह रहे थे। अब यह संख्या मात्र 5.3% ही रह गई है। वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट बताती है कि सबसे अधिक काम उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, ओडिशा और बिहार जैसे राज्यों में हुआ है।
इन राज्यों से सबसे अधिक लोग अत्यंत निर्धनता से बाहर निकाले गए हैं। भारत ने यह उपलब्धि तब हासिल की है जब वर्ल्ड बैंक ने किसी व्यक्ति को गरीब माने जाने के मानदंड बदले हैं और उन्हें और ऊँचा कर दिया है। भारत ने इसके बाद भी सफलता पाई है।
वर्ल्ड बैंक पहले $2.15 (लगभग ₹180) प्रतिदिन खर्चने वाले व्यक्ति को अत्यंत गरीब नहीं मानता था। यह पैमाना लम्बे समय से चला आ रहा था। हालाँकि, वर्ल्ड बैंक ने यह बदल कर $3 (लगभग ₹258) कर दी थी। यह मानदंड बढ़ाने के बावजूद भारत ने अत्यंत गरीबी में जी रहे लोगों को बाहर निकाला है।
यदि पुराना मानदंड ही लगाया गया होता तो भारत में 2022-23 में गरीबी का स्तर मात्र 2.3% पर आ जाता। गौरलतब है कि वर्ल्ड बैंक ने भारत की जो यह उपलब्धि बताई है, उसमें अधिकांश समय भाजपा की अगुवाई वाली NDA सरकार का शासन रहा है।
पहले के कई रिपोर्ट और सर्वे से स्पष्ट हुआ है कि उज्ज्वला योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना, हर घर बिजली और जल जीवन मिशन जैसी योजनाओं ने देश के उन लोगों का जीवन स्तर उठाने में सबसे अधिक सहायता की है, जो पहले इनसे वंचित थे।
दुनिया के सबसे बड़े उद्योगपतियों में से एक मुकेश अंबानी ने इंस्टीट्यूट ऑफ केमिकल टेक्नोलॉजी (ICT), मुंबई को ₹151 करोड़ का अनुदान दिया है। यह दान उन्होंने अपने प्रोफेसर शर्मा को ‘गुरु दक्षिणा’ के तौर पर दिया है जिन्होंने उनका सही मार्गदर्शन किया था। ICT के लिए यह अब तक का सबसे बड़ा दान है।
मुकेश अंबानी ने यहा दान देने की घोषणा अनीता पाटिल की किताब ‘द डिवाइन साइंटिस्ट’ के लॉन्च के मौके पर की। ये किताब पद्म विभूषण प्रोफेसर मन मोहन शर्मा के जीवन पर आधारित है, जो मुकेश अंबानी के भी गुरु रहे हैं।
बुक लॉन्च में गुरु दक्षिणा का जिक्र करते हुए उन्होंने ऐलान किया कि वो संस्थान को 151 करोड़ का अनुदान करेंगे। उन्होंने बताया कि प्रोफेसर शर्मा उनसे कहा करते थे – मुकेश तुम्हें ICT के लिए कुछ बड़ा करना होगा। इसलिए ये उन्हीं के लिए हैं।
#WATCH | Mukesh Ambani, Chairman and Managing Director, Reliance Industries, announced an unconditional grant of Rs 151 crore to the Institute of Chemical Technology, Mumbai, from where he graduated in the 1970s. pic.twitter.com/cHyu9ds8QU
आगे उद्योगपति ने बताया कि उ्न्होंने जानबूझकर IIT-बॉम्बे के ऊपर UDCT को चुना था। उन्होंने कहा, “UDCT कैंपस आना हमेशा एक पवित्र मंदिर में आने जैसा लगता है। प्रोफेसर शर्मा, मैं आपको अपने सबसे सम्मानित गुरु, मेरे मार्गदर्शक और प्रेरणा के स्रोत के रूप में सम्मान देता हूँ।”
मुकेश अंबानी ने भारतीय केमिकल इंडस्ट्री के विकास का सारा श्रेय प्रोफेसर शर्मा को देते हुए उन्हें राष्ट्र गुरु बताया। साथ ही कहा- “मेरे लिए प्रोफेसर शर्मा एक अलकेमिस्ट हैं, धातुओं के नहीं, बल्कि दिमागों के। उनके पास जिज्ञासा को ज्ञान में, ज्ञान को व्यावसायिक मूल्य में और ज्ञान और व्यावसायिक मूल्य दोनों को हमेशा के लिए रहने वाली बुद्धि में बदलने की शक्ति है।”
बता दें कि ICT को पहले यूनिवर्सिटी डिपार्टमेंट ऑफ केमिकल टेक्नोलॉजी के नाम से जाना जाता था। इसकी स्थापना 1933 में यूनिवर्सिटी ऑफ बॉम्बे ने की थी। 2008 में इसका नाम बदला गया और इसे डीम्ड यूनिवर्सिटी का दर्जा दिया गया।
उत्तर प्रदेश के देवरिया में एक ईश मोहम्मद नाम के व्यक्ति ने बकरीद पर अल्लाह को अपनी ही कुर्बानी दे डाली। शख्स ने ऐसा करने से पहले एक नोट भी लिखा जिसमें उसने बताया कि किसी ने उसका कत्ल नहीं किया, वो खुद ये कर रहा है। वहीं उसकी बीवी ने बताया कि उसके शौहर पर भूत-प्रेत का साया था जो उन्हें पटकता भी था। इस घटना के बाद हर कोई हैरान है। मौलवियों का कहना है कि खुद की कुर्बानी देना में नाजायज होता है। ऐसा नहीं किया जाना चाहिए।
पूरी घटना देवरिया गौरी बाजार थाना क्षेत्र की है। 60 वर्षीय ईश मोहम्मद ने शनिवार (7 जून 2025) को बकरीद के मौके पर एक सुसाइड नोट लिखने के बाद अपना गला रेत लिया। घर के बाहर बनी झोपड़ी से उसके तड़पने की आवाज सुन कर परिवार वाले आए तो उन्होंने देखा कि झोपड़ी में चारो तरफ खून बिखरा था और ईश मोहम्मद दर्द से तड़प रहा था। आनन – फानन में उसे गोरखपुर मेडिकल ले जाया गया, जहाँ उसने दम तोड़ दिया।
ईश मोहम्मद ने मरने से पहले एक सुसाइड नोट लिखा था। नोट में उसने लिखा है, ”इंसान बकरे को बेटे की तरह पोसकर कुर्बानी करता है। वो भी जीव हैं। कुर्बानी करनी चाहिए। मैं खुद अपनी कुर्बानी अल्लाह के रसूल के नाम से कर रहा हूं। किसी ने मेरा कत्ल नहीं किया है। सुकून से मिट्टी देना। किसी से डरना नहीं है।”
उत्तर प्रदेश – जिला देवरिया में बकरीद पर 60 वर्षीय ईश मोहम्मद ने अपनी कुर्बानी दे दी। गला काटकर जान दे दी।
सुसाइड नोट में लिखा– "इंसान बकरे को अपने बेटे की तरह पोसकर कुर्बानी करता है। वो भी जीव है, कुर्बानी करना चाहिए। मैं खुद अपनी कुर्बानी अल्लाह के रसूल के नाम से कर रहा हूं" pic.twitter.com/JsX2TLUxow
परिवार वालों का कहना है कि ईश मोहम्मद एक मजहबी इंसान था। सुबह बकरीद के मौके पर वह ईद-उल-अजहा की नमाज पढ़कर घर आया था। घर आने के बाद वह बाहर बनी झोपड़ी में चला गया था। उसकी कराह सुनकर घर वाले अंदर पहुँचे तो देखा कि उसने अपना गला रेत लिया है। वहीं मृतक की पत्नी हाजरा खातून ने बताया कि उनके पति पर भूत-प्रेत का साया था और वे अक्सर आज़मगढ़ की दरगाह जाया करते थे। तीन दिन पहले ही दरगाह से लौटा था। इसके बाद ये घटना हुई।
अब इस मामले पर ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के अध्यक्ष मौलाना शहाबुद्दीन रजवी ने कहा, “इस्लाम की रोशनी में खुद की कुर्बानी देना बिल्कुल नाजायज है। इस्लाम इस तरह की कुर्बानी की इजाजत नहीं देता है। अल्लाह ने इंसान को बनाया है, वो इंसान की कुर्बानी नहीं चाहता है।”
झारखंड की राजधानी राँची से करीब 60 किलोमीटर दूर तामड़ गाँव में देउड़ी मंदिर है। यहाँ जनजातीय समाज के रीति-रिवाज़ और ब्राह्मण परंपराएँ साथ-साथ निभाई जाती हैं। यहाँ दोनों समुदाय के लोग मिलकर पूजा-पाठ करते हैं। यहाँ मौजूद 15 पुजारियों में से आधे ब्राह्मण और आधे जनजातीय समाज से हैं। समय के साथ मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया लेकिन मूल परंपरा और आस्था अब भी उतनी ही मजबूत हैं।
यह मंदिर सिर्फ आम श्रद्धालुओं के लिए ही नहीं बल्कि खुद टीम इंडिया के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी के लिए भी खास है। जो हर बड़ी सीरीज़ से पहले यहाँ आशीर्वाद लेने पहुँचते हैं।
मंदिर का इतिहास
देउड़ी मंदिर का इतिहास लगभग 700 साल पुराना माना जाता है। कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण नागवंशी वंश के राजा ने 14वीं सदी में करवाया था। नागवंशी राजाओं का झारखंड में लंबा शासन रहा था। वे माँ दुर्गा के उपासक थे।
मान्यता है कि राजा ने एक बार माँ दुर्गा से किसी युद्ध में विजय का आशीर्वाद माँगा था और जब उनकी इच्छा पूरी हुई तो उन्होंने इस मंदिर की स्थापना की। माँ देउड़ी को यहाँ माँ दुर्गा के विशेष रूप में पूजा जाता है और उन्हें पाँच मुखों और 10 भुजाओं वाली देवी के रूप में स्थापित किया गया है।
मंदिर की संरचना
देउड़ी मंदिर की वास्तुकला अद्भुत है। पूरा मंदिर बड़े-बड़े पत्थरों से बना है और इसकी बनावट नागर शैली की झलक देती है। मंदिर का मुख्य गर्भगृह छोटा है। लेकिन इसके भीतर स्थापित देवी की मूर्ति बहुत प्रभावशाली है। मूर्ति को काले पत्थर से बनाया गया है और इसकी विशेषता इसके पाँच चेहरे और 10 भुजाएँ हैं। जो देवी को सर्वशक्तिमान दर्शाती हैं।
मंदिर के चारों ओर पत्थरों की दीवारें हैं जो देखने में बहुत प्राचीन लगती हैं। मंदिर का प्रवेश द्वार भी विशेष रूप से सजाया गया है। जहाँ पर देवी की झाँकी और लोककथाओं से जुड़े चित्र देखे जा सकते हैं। गर्भगृह के चारों ओर एक परिक्रमा पथ भी है। जहाँ भक्त पूजा के बाद घूमते हैं। मंदिर का आँगन खुला है, जहाँ विशेष पर्वों और नवरात्रि के दौरान हजारों की संख्या में श्रद्धालु एकत्र होते हैं।
कैसे पहुँचे मंदिर ?
देउड़ी मंदिर राँची से लगभग 60 किलोमीटर दूर राँची-जमशेदपुर रोड पर तामड़ प्रखंड के देउड़ी गाँव में स्थित है। यहाँ पहुँचने के लिए राँची से सड़क मार्ग द्वारा आसानी से जा सकते हैं। राँची रेलवे स्टेशन या बिरसा मुंडा एयरपोर्ट से टैक्सी या बस लेकर भी मंदिर तक पहुँचा जा सकता है। तामड़ तक नियमित लोकल बसें भी चलती हैं जो मंदिर के पास ही रुकती हैं।
मंदिर तक पहुँचने का रास्ता प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर है, जिससे यात्रा का अनुभव और भी मनमोहक हो जाता है। मंदिर के पास श्रद्धालुओं के लिए खाने-पीने की दुकानें और छोटे-छोटे रुकने के स्थान भी मौजूद हैं।
पाकिस्तान का एक पूर्व पुलिसकर्मी भारतीय यूट्यूबरों को जासूसी जाल में फँसा रहा था। इस पूर्व पुलिसकर्मी का नाम शाकिर जट्ट है। वह ISI से जुड़ा हुआ था। वह खुद अब एक यूट्यूबर है। एजेंसियों को यह जानकारी पूछताछ में हासिल हुई है। यह भी पता चला है कि जासूसी के आरोप में गिरफ्तार यूट्यूबर 10 दिन लाहौर में साथ रहे थे।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पूछताछ के दौरान गिरफ्तार यूट्यूबर जसबीर ने बताया कि वह पाकिस्तान के खुफिया ऑपरेटिव शाकिर उर्फ जट्ट रंधावा और पूर्व पाकिस्तानी पुलिस अधिकारी नासिर ढिल्लन से जुड़ा हुआ था। नासिर अब यूट्यूबर बन चुका है।
वह इसी बहाने भारतीय यूट्यूबरों से सम्पर्क करता था। और उसने पाकिस्तान में जसबीर की मुलाकात ISI अधिकारियों से करवाई। जसबीर ने 2020, 2021 और 2024 में पाकिस्तान की यात्रा की थी और वहीं उसे ISI ने भारत में जासूसी के लिए उसको तैयार किया। जसबीर का यूट्यूब चैनल ‘जान महल वीडियो’ है, जिसके 11 लाख से ज्यादा सब्सक्राइबर हैं।
यह भी सामने आया है कि जसबीर का लिंक ज्योति मल्होत्रा से भी था। मल्होत्रा को भी पाकिस्तान के लिए जासूसी करने के आरोप में गिरफ्तार किया जा चुका है। पता चला है कि इस शाकिर जट्ट से ज्योति की भी पहचान थी। उसने दोनों को एक साथ पाकिस्तान बुलाया था।
दोनों एक साथ पाकिस्तान भी गए थे और 10 दिन लाहौर में रुके थे, वही उन्हें ISI हैंडलर एहसान-उर-रहीम उर्फ दानिश से मिलवाया गया, जो उस समय दिल्ली में पाकिस्तान उच्चायोग में काम कर रहा था। इस दानिश को भारत ने मई में पाकिस्तान वापस भेज दिया था।
जाँच में यह भी सामने आया कि नासिर ढिल्लन और उसकी साथी नौशाबा शहजाद उर्फ मैडम एन ने भारत से गए हिंदू और सिख पर्यटकों को निशाना बनाया और सोशल मीडिया के जरिए प्रभावशाली लोगों को जासूसी के लिए तैयार किया।
वे भारतीय यूट्यूबर्स को पाकिस्तान बुलाकर उच्चायोग के अधिकारियों से मिलवाते थे और फिर जासूसी के काम सौंपते थे। अभी के लिए जसबीर सिंह की पुलिस रिमांड को दो दिनों के लिए बढ़ा दी है। जाँच में यह भी पता चला है कि ISI इन भारतीय यूट्यूबरों उन निशानों की वीडियो व्लॉग के रूप में बनवाती जो महत्वपूर्ण हैं।
इस तरीके से किसी को शक भी नहीं होता और जानकारियाँ भी पाकिस्तान पहुँच जाती थीं। सामान्य तौर पर देखने पर यह वीडियो कोई टूर व्लॉग लगतीं। इसके अलावा इन इन्फ्लुएंसर और यूट्यूबर के जरिए पाकिस्तान अपनी छवि भारत में सुधारना चाहता था। एजेंसियाँ इस मामले में रोज नई कड़ियाँ खोल रही हैं। अभी जाँच जारी है।